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Friday, December 31, 2010

दर्शकों की पसंद, फिल्मों का बिजनेस

-अजय ब्रह्मात्‍मज

न कोई ट्रेड पंडित और न ही कोई समीक्षक ठीक-ठीक बता सकता है कि किस फिल्म को दर्शक मिलेंगे? फिल्मों से संबंधित भविष्यवाणी अक्सर मौसम विभाग की भविष्यवाणियों की तरह सही नहीं होतीं। किसे अनुमान था कि आशुतोष गोवारीकर की फिल्म खेलें हम जी जान से को दर्शक देखने ही नहीं आएंगे और बगैर किसी पॉपुलर स्टार के बनी सुभाष कपूर की फिल्म फंस गए रे ओबामा को सराहना के साथ दर्शक भी मिलेंगे? फिल्मों का बिजनेस और दर्शकों की पसंद-नापसंद का अनुमान लगा पाना मुश्किल काम है। हालांकि इधर कुछ बाजार विशेषज्ञ फिल्मों के बिजनेस की सटीक भविष्यवाणी का दावा करते नजर आ रहे हैं, लेकिन कई दफा उन्हें भी मुंह छिपाने की जरूरत पड़ती है। दशकों के कारोबार के बावजूद फिल्म व्यापार बड़ा रहस्य बना हुआ है।

हिंदी फिल्मों के इतिहास में अधिकतम सफल फिल्में दे चुके अमिताभ बच्चन पहली पारी के उतार के समय अपनी फ्लॉप फिल्मों से परेशान होकर कहते सुनाई देते थे कि दर्शकों के फैसले के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। कभी बॉक्स ऑफिस पर सफलता की गारंटी समझे जाने वाले अमिताभ बच्चन ने यह बात घोर हताशा में कही थी, लेकिन हिंदी फिल्मों की यही सच्चाई है। दूसरी तरफ बाजार के बढ़ते प्रभाव ने अब धीरे-धीरे दर्शकों के दिमाग में बिठा दिया है कि बॉक्स ऑफिस पर सफल हुई फिल्में अच्छी होती हैं। मीडिया रिपोर्ट भी फिल्मों की कामयाबी से प्रेरित होती है। अच्छा का सीधा मतलब मुनाफे से है। अगर फिल्म मुनाफा दे रही है, तो गोलमाल-3 अच्छी फिल्म कही जाएगी। फिल्म को दर्शक नहीं मिले तो नेक इरादों और सुंदर कोशिश के बावजूद खेलें हम जी जान से बुरी फिल्म की श्रेणी में आ जाएगी। कैसी विडंबना है?

आखिर दर्शक कैसे तय करते हैं कि उन्हें कौन सी फिल्म देखनी है? यह स्थिति लगभग भारतीय चुनाव की तरह है। कोई भी राजनीतिक पार्टी चुनाव में दावा नहीं कर सकती कि उसे कितने प्रतिशत मत मिलेंगे और उसका कौन सा उम्मीदवार निश्चित रूप से विजयी होगा। इस अनिश्चितता के बावजूद कई बार हवा चलती है और किसी एक वजह से सभी उम्मीदवारों को फायदा हो जाता है। फिल्मों के साथ भी यही होता है। कभी गाना, कभी स्टार, कभी किसी और वजह से कोई फिल्म गर्म हो जाती है और उसे दर्शक मिल जाते हैं। अभी गीत शीला की जवानी.. ने गदर मचा रखा है और माना जा रहा है कि फराह खान की तीस मार खां को जबरदस्त ओपनिंग मिलेगी। इस फिल्म का वीकऐंड बिजनेस अच्छा रहेगा।

स्टार संपन्न और आक्रामक प्रचार से फिल्मों को ओपनिंग मिल जाती है। उसके बाद फिल्म का कंटेंट ही दर्शकों को वापस खींचकर थिएटर में लाता है। किसी भी फिल्म को बड़ी कामयाबी वापस आए दर्शकों से ही मिलती है। लोगों ने भी सुना होगा कि सिनेप्रेमी पसंद आई फिल्मों को बार-बार देखते हैं। कभी दोस्तों के साथ तो कभी परिजनों के साथ, तो कभी किसी और बहाने से। ऐसी ही फिल्में जबरदस्त हिट होती हैं। 3 इडियट्स और दबंग को अनेक दर्शकों ने बार-बार देखा है।

आमतौर पर माना जाता है कि समीक्षकों की राय से फिल्म का बिजनेस अप्रभावित रहता है। इसी साल की बात करें, तो लव सेक्स और धोखा, उड़ान, तेरे बिन लादेन, फंस गए रे ओबामा और बैंड बाजा बारात देखने के लिए समीक्षकों ने ही दर्शकों को प्रेरित किया। इन सभी फिल्मों को अच्छी ओपनिंग न हीं मिली थी, लेकिन समीक्षकों से मिली सराहना से इनके दर्शक बढ़े। हां, बड़ी कॉमर्शियल फिल्मों की भ‌र्त्सना करने से भी फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि आम दर्शक उन्हें देखने का मन बना चुके होते हैं। ऐसे कट्टर दर्शकों की राय बदल पाना किसी के वश में नहीं होता।


Thursday, December 30, 2010

संग-संग : सुतपा सिकदर और इरफान खान के साथ

-अजय ब्रह्मात्‍मज

टूट गई मजहब की दीवार: इरफान खान-सुतपायह प्रेम कहानी है। यह सहजीवन है। यह आधुनिक दांपत्‍य है

इरफान खान और सुतपा सिकदर दिल्ली स्थित एनएसडी में मिले। साल था 1985 ... दिल्ली की सुतपा ने अपनी बौद्धिक रुचि और कलात्मक अभिरुचि के विस्तार के रूप में एनएसडी में दाखिला लिया था और इरफान खान जयपुर से न समा सके अपने सपनो को लिए दिल्ली आ गए थे। उनके सपनों को एनएसडी में एक पड़ाव मिला था। इसे दो विपरीत धु्रवों का आकर्षण भी कह सकते हैं, लेकिन अमूमन जीवन नैया में एक ही दिशा के दो यात्री सवार होते हैं। सुतपा और इरफान लंबे समय तक साथ रहने (लिविंग रिलेशन) के बाद शादी करने का फैसला किया और तब से एक-दूसरे के सहयात्री बने हुए हैं। मुंबई के मड इलाके में स्थित उनके आलीशान फ्लैट में दर-ओ-दीवार का पारंपरिक कंसेप्ट नहीं है। उन्होंने अपने रिश्ते के साथ घर में भी कई दीवारें हटा दी हैं। शुरूआत करें तो...

इरफान - जब मैं जयपुर से दिल्ली जा रहा था तो मेरी मां चाहती थी कि मैं पहले शादी हो जाए। उन्होंने दबाव भी डाला कि निकहा कर लो, फिर चाहे जहां जाओ। मेरे मन में ऐसी कोई इच्छा नहीं थी। बहरहाल, एनएसडी आए तो पहली बार पता चला कि लड़कियां भी दोस्त हो सकती हैं। उनसे दीगर बातें की जा सकती हैं। जयपुर में लडक़ी से दोस्ती का सीधा मतलब होता है कि वह आप की महबूबा ...दोस्त ... लडक़ा-लडक़ी दोस्त हो सकते हैं...यह सोच ही नहीं सकता था। मुझे सुतपा अच्छी लगती थीं। इन से इंटरेस्टिंग बातें होती थीं। मुझे अपने बारे में कुछ छिपाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। मैं अपना डर भी इन से शेयर कर लेता था। एनएसडी में सुतपा तेज थीं। डिजाइन, परफार्मेंस सब में आगे... मैं उन पर गौर करता था। कोई फिल्म देख कर आता था तो उनसे बातें करता था। अब कह सकते हैं कि हमलोग एक ही ढंग से सोचते थे। वहीं से गड़बड़ी शुरू हुई।

सुतपा - मेरे साथ ऐसी बात नहीं थी। मैं तो दिल्ली की ही पढ़ी-लिखी थी। मेरी दोस्ती थर्ड इयर के स्टूडेंटस के साथ थी। इन लोगों को शुरू से प्राब्लम थ्ज्ञी कि ये तो थर्ड इयर वालों के साथ रहती है। फ्रेशर पार्टी में कहीं से खाने-पीने का इंतजाम किया गया। उसी में इरफान ने अट्रेक्ट किया। उनमें झिझक के साथ एक प्राउड फीलिंग भी थी। बाद में उनकी क्योरिसिटी मुझे अच्छी लगती रही। कुछ भी जानने-समझने की कोशिश ़ ़ ़ उनके बारे में बातें। इरफान तो यों ही कह रहे हैं कि मैं परफॉर्म करती थी। सही कहूं तो इन में यह समर्पण शुरू से रहा है। उनमें एक मासूमियत भी थी। मुझे कई दफा कोफ्त होती थी कि भला इस उम्र में कोई इतना मासूम कैसे हो सकता है? इरफान को दिक्कत होती थी कि मैं अपने टीचर अनुराधा कपूर और कीर्ति जैन को उनके नाम से बुलाती थी। इरफान ने कुछ प्योर किस्म का था, जो मुझे बड़े शहरों के लडक़ों में नहीं दिखा था। वैसे भी कोई लडक़ा आप पर निर्भर रहने लगे तो वह अच्छा लगने लगता है।

सुतपा - इरफान अशुद्ध नहीं हुए हैं। इनकी जबरदस्त ग्रोथ हुई है। सच कहूं तो मैं बहुत पीछे रह गई हूं। एनएसडी में निश्चित ही इनसे अधिक जानकार और समझदार थी। अभी हम सब कुछ उलट गया है। मैं कहूंगी कि मेरे अंदर वह ड्राइव नहीं था। मेरे अंदर जो भी था नैचुरल और रॉ था। मैंने उसे तराशा नहीं। इरफान ने हमेशा सारी चीजों को तराशा। वे आगे-आगे बढक़र सीखते रहे। कोई बच्चा एक किताब पढक़र खुश हो जाता है तो कुछ दस किताबें पढऩा चाहता है। मैं हमेशा जल्दी में रहती थी। किसी डिबेट में जीत जाना मेरे लिए काफी होता था। जबकि इरफान के बाद डिबेट का सब्जेक्ट समझ जाते थे। अभी मैं कह सकती हूं कि करियर को लेकर मैं सचेत नहीं थी। मैं करिअरिस्ट नहीं थी। लेकिन शुरू से मैं इडेपेंटेंट रही। 14 साल की उम्र के बाद मैंने पिता जी से पैसे नहीं लिए। कभी नहीं लिया। मेरी कोशिश रही कि मैं हमेशा फायनेंसयिली किसी पर निर्भर न रहूं। मुझे 7 से 5 की नौकरी भी नहीं करनी थी। इसी चक्कर में थिएटर हो गया। थिएटर में सभी तारीफ करने लगे टीचर की मैं फेवरिट रही। फिर लगा कि कोई बात तो होगी। मुझे अब जाकर लगता है कि मेरा कोई गोल था नहीं।

इरफान - सुतपा का फिल्मों से कुछ लेना-देना था ही नहीं। एनएसडी में फिल्म भी नहीं देखते थे। मैं एक बार जबरदस्ती गंगा जमनादिखाने ले गया था। मेरा क्लियर था। मैं तो एनएसडी भी फिल्मों के लिए गया था।

सुतपा - मैं तो थिएटर टीचर बनना चाहती थी। हम दोनों ने अलग-अलग उद्देश्य से एनएसडी गए थे। मेरे घर में टीवी नहीं था। मेरे पैरेंट्स साल में एक-दो बार फिल्में दिखाते थे। जिन फिल्मों को अवार्ड वगैरह मिल जाते हैं। विज्ञान भवन में जाकर फिल्म देखते थे। इरफान ने गंगा जमनादिखाई। मुझे इतनी गंदी लगी। मैंने कहा भी कि क्या फिल्म दिखाने ले गए। तब हमलोग इंटेलेक्चुअल किस्म की दुनिया में जीते थे। बंगाल की सत्यजित राय और मृणाल सेन की फिल्में देखते थे। हिंदी कमर्शियल सिनेमा से परिचय नहीं था। अब देखिए कि उसके लगभग बीस सालों के बाद मुझे दबंगअच्छी लगती है। तब मैं सोच भी नहीं सकती थी कि गोविंदा की फिल्म देखूंगी। अभी मुझे गोविंदा जैसा एक्टर कोई और नहीं दिखता। क्या गजब की उनकी टाइमिंग है? मुझे लगता है कि तब मैं खुले दिमाग से फिल्म देखने नहीं जाती थी, अभी देखना शुरू किया तो अलग-अलग किस्म की फिल्में अच्छी लगती हैं।

इरफान-सुतपा - शादी के बारे में तो सोचा ही नहीं था। जब कागजों की जरूरत पडऩे लगी तो शादी का खयाल आया। घर लेना था। हमलोग साथ रहते थे। कभी बात भी नहीं की शादी की...लिविंग रिलेशनशिप तो अभी पैशन में आ गया है। हमने इसके बारे में सोचा ही नहीं। हम लोगों ने साथ रहने का फैसला कर लिया। ऐसा नहीं था कि दोनों पार्टनर की तलाश में थे। ट्राय कर रहे थे... उसकी जरूरती ही रही। दोनों एक-दूसरे को अच्छे लगे। फायनेंसियली भी हम आजाद रहे। मैं उन लड़कियों की तरह नहीं थी कि परिवार की जिम्मेदारी मर्द की है। अगर मैं कुछ कमाती हूं तो वह मेरी कमाई है। मेरे साथ की कई लड़कियां ऐसे ही सोचती थीं।

सुतपा - 96 में हमलोगों ने शादी कर ली। मेरे बड़े बेटे का जन्म होने वाला था। और फिर दूसरी जरूरतों में भी लोग पूछने लगे थे...

इरफान - मैं इनके घर जाता था। कभी किसी ने नहीं पूछा कि क्या करना है? कभी इनके घर में कोई खुसफुसाहट नहीं हुई। सभी देखते थे कि मैं आता-जाता हूं। कभी किसी ने नहीं पूछा कि शादी करोगे, नहीं करोगे, कब करोगे...

सुपता - 1992 के दंगे के बाद थोड़ा तनाव हो गया था। मेरा भाई डिप्रेशन में चला गया था। उसका फोन आया कि तुमलोग कहां हो... उसकी आवाज गहरी खाई से आती लग रही थी। मजहब का मामला कभी आया ही नहीं। एक बार इरफान ने कहा भी कि अगर तुम्हारी मां चाहें तो मैं धर्म परिवर्तन कर सकता हूं। मेरी मां ने साफ मना कर दिया था कि क्यों अपना धर्म छोड़ोगे?

इरफान - इनके पिता से मेरी अधिक बातें नहीं होती थीं, लेकिन उनके मन में प्यार रहता था। उनके अंतिम दिनों में मैं मिलने गया था। काफी बातें हुई थीं। उनके शौक अलग किस्म के थे। उन्होंने अपने घर के बाहर पेड़ लगाए थे। उनका जबरदस्त लगाव था मुझ से। मुझे तब लगा था कि अगर मैं उनके पास बैठा तो उनका दर्द कम होगा।

सुतपा - इरफान का अपने परिवार एक अलग दर्जा है। इरफान भी अपनी मां की बहुत इच्जत करते हैं। हर तरह से मदद करते हैं। उन्होंने जाहिर कर दिया था कि मैं अपनी जिंदगी में किसी की दखल बर्दाश्त नहीं करूंगा। परिवार के लोगों ने सोचा नहीं और शायद उन्होंने समझ लिया होगा कि कहने पर भी इरफान मानेंगे नहीं। सच कहूं तो हिंदू परिवारों में मुसलमानों को लेकर धारणाएं बिठा दी जाती हैं। कहा जाता है कि वे बहुत गंदे रहते हैं। जब मैं इनके परिवार में गई तो मेरी धारणाएं टूटीं। संयोग ऐसा रहा कि दिल्ली से होने के बावजूद इरफान के पहले मेरा कोई मुसलमान दोस्त नहीं था। इरफान पहले मुसलमान दोस्त हैं, जो बाद में मेरे पति हो गए। मेरे लिए सब नया था। मुझे थोड़ा सांस्कृतिक झटका जरूर लगा था। इरफान और उनकी मां के बीच हर तरह की बातचीत होती है। उनका मध्यवर्गीय परिवार है। मुसलमान होने की वजह से माना जा सकता है कि वे कंजर्वेटिव होंगे, लेकिन मैंने उल्टा पाया कि मैं अपने पैरेंट्स से हर तरह की बात नहीं कर सकती थी। लेकिन इरफान अपनी मां से सारी बातें करते थे। फिर भी कहूंगी कि इरफान की मां के गहरे दिल में जाकर रहता है कि मैं धर्म परिवर्तन कर लूं।

इरफान - मेरी मां जिस माहौल में रही। उस माहौल में यह सोच नैचुरल है। कंवेशनल सोच तो यही है। धर्म की बात छोड़ दें तो साथ रहने पर लगने लगता है कि मुक्ति तो धर्म बदलने के बाद ही मिलेगी। मेरी मां की चिंता रहती है कि सुतपा तो जन्नत नहीं जा पाएगी। वह इसकी मिट्टी के लिए परेशान रहती है।

सुतपा - मेरे ससुराल में मुझे मिला कर तीन बहुएं हैं, लेकिन इरफान की मां सबसे च्यादा मेरे करीब हैं। वह मुझ से अपनी हर चिंताएं शेयर करती हैं। मझली से उनकी बनी नहीं और छोटी को वह नाकाबिल मानती हैं। अपनी करीबी जाहिर करने के साथ उनकी चिंता बढ़ती है और वह कह बैठती हैं कि कलमा पढ़ ले। उन्हें लगता है कि इतनी प्यारी लडक़ी है और दोजख में जाएगी। वह गुस्से में या नफरत के भाव से नहीं बोलतीं या दबाव नहीं डालतीं।

इरफान - मेरी मां सुतपा का परलोक सुधारना चाहती हैं।

दिल्ली

इरफान - दिल्ली से आने का इरादा ऐसे ही बन गया। सोचा कि चलें कुछ काम करेंगे। मैंने एक्टिंग में कोशिश की। सुपता को लिखने का शौक था तो वह लिखाई में हाथ आजमाने लगीं। हमें काम मिलता रहा। हमलोग कुछ न कुछ करते रहे।

सुपता - हमलोगों को कभी स्ट्रगल नहीं करना पड़ा। हां, एक कमरे से चार कमरे और फिर इस डुप्लेक्स में आने का स्ट्रगल रहा, पर काम के लिए अपनानित नहीं होना पड़ा। कोई दौड़-भाग नहीं करनी पड़ी।

इरफान - तब तो हम ने सोचा भी नहीं था कि क्या होगा या क्या करना है? उस उम्र तो बेहतर काम पाने और खुद को देखने की ख्वाहिश रहती है। भौतिक जरूरतें तो पैसे आने के बाद पैदा होती हैं। मेरी एक ही इच्छा थी कि मैं अपनी खिडक़ी खोलूं तो सामने कोई मकान न दिखे।

सुतपा - उसी चक्कर में तो हमलोग गोरेगांव गए। वहां ऊपर के माले पर फ्लैट लिया। वहां भी मॉल आ गया तो अब यहां आ गए। मैं खोज-खोज कर इरफान की इच्छा पूरी की। अजीब इत्तफाक है कि इस मामले में हम दोनों एक ही तरह सोचते थे। मुझे बहुत कोफ्त होती थी, जब डीएन नगर में सामने ब्रश करता हुआ आदमी खिडक़ी से दिखता था। वह इमेज कभी नहीं भूल सकती। हमें जैसे ही मौका मिला, हम ने बड़ी और खुली जगह ली। उस जगह हमलोग काफी सुरक्षित थे क्योंकि वह इरफान के अंकल का फ्लैट था। दिल्ली से आने के बाद तो यह तकलीफ बड़ी होती थी।

इरफान - मुझे नेचर अच्छा लगता है। पेड़, पहाड़, जंगल मुझे खींचते है। बारिश होती है तो मैं बिल्कुल अलग आदमी हो जाता हूं। सुतपा भी ऐसा ही सोचती है।

सुतपा - इस वजह से हमारा प्यार नहीं हुआ। प्यार होने के बाद हमें यह समानता दिखी। इरफान और हम मुंबई के बाहर होते हैं तो हमारे बीच लड़ाई ही नहीं होती है। तब घरेलू चिंताएं नहीं रहती। इंसानों के बनाई चीजें नहीं दिखतीं।

इरफान - हमारी समस्याएं इंसानों की बनाई बतरतीब चीजों से है। हमें यह बर्दाश्त नहीं होता।

सुतपा - मैं न्यू क्लीयर फैमिली से आई थी। इरफान की च्वाइंट फैमिली थी। शुरू में बहुत दिक्कत होती थी। कैसे मिले? किस के साथ क्या व्यवहार करें? अब तो ठीक हो गया है सब कुछ। दो साल पहले गई तो पता चला कि वास्तव में संयुक्त परिवार का क्या मजा है? मैं 15 दिनों तक वहां रही। इरफान तो च्यादा बाहर नहीं निकलते थे। मैं तो अपने देवरों के बाइक पर घूमती रहती थी। हमें पता ही नहीं रहा कि बच्चे क्या खा रहे हैं, कहां खेल रहे हैं? मैं -- की तरह घूमती रहती थी। मैंने पूरा एंच्वाय किया। इनके परिवार में खूब उत्सव चलता है। लोग बाग आते जाते रहते हैं। 12-1 बजे तक लोग मिलने आते रहते थे।

इरफान - करिअर

इरफान - सतपा मेरा काम जानती हैं। उन्हें बताना और समझाना नहीं पड़ता। कभी देर रात में निकलना। कभी सुबह लौटना। कभी हफ्तों-महीनों तक बाहर रहना। उस दरम्यान गॉसिप छप जाना। मुझे उस तरह से समझाना नहीं पड़ता। सुतपा सारी चीजें समझती हैं। हर कदम उन्होंने साथ दिया है। हमारी साथ काम करने की बहुत इच्छा है लेकिन वह मुमकिन नहीं है, ‘बनेगी अपनी बातसीरियल के समय हमने कोशिश की थी, लेकिन हमारे झगड़े बहुत होते थे।

सुतपा - बनेगी अपनी बातके समय च्यादा झगड़े ही नहीं हुए थे। बाद में तिग्मांशु धूलिया के लिए हमने एक बेस्ट सेलर बनाया था, उसमें काफी झगड़े हुए थे। इरफान बड़े अच्छे डायरेक्टर हैं। अभी कहूंगी तो शरमाएंगे और मना करेंगे, लेकिन अगर इरफान डायरेक्ट करें तो अभी के सारे डायरेक्टरों से अच्छा काम करेंगे।

इरफान - शायद मैं कभी डायरेक्ट करूं, लेकिन मुझे लगता है कि हम साथ काम नहीं कर सकते। हमारी रायटर-डायरेक्टर की टीम नहीं बन सकती। सुतपा अच्छे तरीके से बताती हैं कि मेरी कौन सी परफार्मेंस गलत रही। वह अच्छी क्रिटिक हैं। फिल्मों के बारे में ठीक-ठीक बताती हैं। मैं शुरू से उन पर भरोसा करता हूं। एनएसडी में मैं इतना गंदा एक्टर था। उस समय सुतपा ईमानदारी से मेरे काम की बुराई करती थीं और मुझे बर्दाश्त नहीं होता था। जब तक मैंने खुद को कैमरे में नहीं देखा।़ तब तक मुझे लगता रहा कि मैं बहुत अच्छा एक्टर हूं। एक प्ले को रिकॉर्ड किया था। उसे देखने पर मेरे पैरों के नीचे से जमीन निकल गई थी। उस प्ले के लिए मैंने सुतपा के भाई को भी बुला लिया था। उन्होंने प्ले देखने के बाद रिएक्ट नहीं किया। लोग बहुत तारीफ करते थे। सुतपा बहस करती थी।

सुतपा - पर मैं एक्टर के साथ कभी शादी नहीं करती। मुझे कोई अफसोस नहीं रहा कि मैंने काम छोड़ दिया। मैं टीवी पर एक्टिव थी। बाद में टीवी पर कुछ करने लायक रह नहीं गया। राधा की बेटियां कुछ कर दिखाएगीकर रही थी। एक टाइम के बाद लगा कि अब कुछ नहीं हो सकता। फिल्म के लिए जरूरी नेटवर्किंग नहीं कर पाई। स्टारों से दोस्ती नहीं की। मेरे अंदर वह चीज ही नहीं है। खामोशीऔर शब्दमें बड़े-बड़े स्टार थे। मैं शब्दकी शूटिंग में भी एक दिन नहीं गई। अपनी लिखी फिल्मों के सेट पर तो रह ही सकती थी। शब्दमें ऐश्वर्या को एक लाइन पर प्रॉब्लम थी तो उसने गोवा से फोन किया कि एक बार सुतपा से बात तो करा दो। मेरे व्यक्तित्व में ही कोई कमी होगी। फिल्मों के लिए वह जरूरी है। अभी सुजॉय घोष के लिए एक फिल्म कर रही हूं। विद्या बालन ने कहा कि सुतपा लिख दें तो अच्छा रहेगा। फिर अच्छा भी लगा। इरफान के एक्टर होने का यह फायदा हुआ है कि खूब घूमने का मौका मिलता है। पता नहीं मैं अकेले इतना घूम पाती कि नहीं? इरफान की सफलता से मेरी यात्राएं होती है। मैं आजाद नहीं हूं। अभी मैं निर्भर हूं, लेकिन मैं कुछ करूंगी और अच्छा करूंगी।

इरफान - सुतपा कह सकती हैं कि मन का काम मिलेगा तो करूंगी। हम तो मजदूर हैं। हम ना नहीं कर सकते। हमें शूटिंग पर जाना है तो जाना है।

सुतपा - मेरी चाहतें भी तो कम हैं। मैं डिजाइनर कपड़े नहीं पहनती। मेरा खर्चा ही क्या है कि मैं मरूं। अपने दोस्तों को देख कर हैरानी होती है कि वे क्यों ऐसा कर रही हैं।

संतुलन

सुतपा - मैं तो मानती हूं कि दोनों के बीच तालमेल रहे। अगर दोनों समान रूप से व्यस्त हो जाएं तो दिक्कत होती है। मीरा नायर जैसी हस्ती हो तो अलग बात है। नेम सेकके समय देखा था। वह घर भी संभालती थीं। इंटरनेशनल फिल्म डायरेक्टर रही हैं। अपनी यूनिट की प्रॉब्लम भी सुलझा रही हैं। इरफान और तब्बू के कमरे में कौन से फूल लगेंगे, वह भी चुन रही हैं। समय निकालकर योग भी कर रही है। एक दिन के लिए इरफान के बच्चे आए हैं तो उनके लिए भी समय निकालना है। उनकी एनर्जी देख कर मैं हैरत में पड़ गई। सारे एंजेंडा पूरी कर लेती हैं।

इरफान - मैं नहीं कर सकता। मुझ से नहीं हो पाता। मैं तो चिढऩे लगता हूं।

सुतपा - मैं पूछती भी हूं कि तुम क्यों टरकते हो? शाहरुख भी तो स्टार है। बिजी है, लेकिन बच्चों को साथ खेलता है। जाओ काम करो और घर में आकर बेस्ट हस्बैंड और फादर बन जाओ।

इरफान - कम से कम बताता रहा हूं कि मैं अपने बीवी बच्चों से बहुत प्यार करता हूं।

आखिरी निर्णय

सुतपा - बड़ा फैसला अमूमन इरफान लेते हैं। उदाहरण के लिए उनके यहां नहीं होने पर मुझे यह घर पसंद आ जाए तो मैं आगे बढ़ कर हां नहीं बोल सकती। मैं इरफान की रजामंदी लूंगी या उनके आने का इंतजार करूंगी।

इरफान - मेरी तरफ से ऐसा कोई दबाव नहीं है। सुतपा को लगता है कि कहीं कोई चूक न हो जाए। बड़ा फैसला है। मैं अपनी चिंताओं से परेशान रहता हूं। मैं नहीं चाहता कि मेरी चिंताओं का असर बच्चों पर पड़े। मैं उन्हें परेशानियों बचाना चाहता हूं। कई बार आउटडोर में उन्हें ले जाना चाहता हूं, ले भी जाता हूं। वह जो एक्सपीरिएंस है वह पढ़ाई से बड़ा है। यह मुझे अपने पिता से मिली है। वे हमलोगों को जीप में लेकर जंगलों में निकल जाते थे। शनिवार-रविवार को हमलोग बाहर जरूर जाते थे। मेरे बचपन के वे पल सबसे ज्यादा सुहाना और जादुई है। मैं बच्चों की जिंदगी में वही जादू लाना चाहता हूं। पढ़ाई तो बोझ है।

सुतपा - मैं पढ़ाई को बोझ के तौर पर नहीं लेती। मेरा मानना है कि बच्चे मस्ती करें और घूमें, लेकिन पढ़ाई ना छोड़ें। उन्हें पढऩा चाहिए। इस मामले में मैं पारंपरिक मां हूं। इरफान सचमुच मानते हैं कि बच्चे पढ़ें या ना पढ़ें?

इरफान - मैंने स्कूल में जो पढ़ा था, वह कहां काम आया? मेरी पढ़ाई तो स्कूल-कॉलेज से निकलने के बाद शुरू हुई। खुद को जाना फिर पढऩा शुरू किया। मेरी पढ़ाई आज भी खत्म नहीं हुई है। वह तो बढ़ती जा रही है। अलग-अलग विषय सीख समझ रहा हूं।

सुतपा - इरफान भाग्यशाली रहे। उन्हें सब मिल गया। मुझे अपने बेटों की चिंता है। कल को वे बड़े होंगे तो उनके पास पढ़ाई और डिग्री तो रहनी चाहिए।

इरफान - आदमी अपने रास्ते खोज लेता है। कोई निकम्मा नहीं रहता। हम अपनी असुरक्षा बच्चों में डाल देते हैं। सोसायटी इतनी भ्रष्ट हो चुकी है। सारी विधा उस भ्रष्टाचार से बचाने या निबटने के लिए दी जाती है। बच्चा खुद की खोज ही नहीं कर पाता। मैं तो चाहूंगा कि बच्चा अपनी मर्जी से पढ़े और खेले।

सुतपा - मैं नहीं स्वीकार करती। हां, अगर मुझे कोई टीचर मिल जाए, जो मेरे बच्चे की पढ़ाई का खयाल रखे तो ठीक है। वर्ना मैं नहीं चाहूंगी कि वह दिन भर लैपटॉप से चिपका रहे और प्ले स्टेशन में भिड़ा रहे। अगर मेरे पास इतना वक्त होता और मैं इस काबिल होती कि उन्हें पढ़ा पाती तो मैं तुरत स्कूल से नाम कटवा देती। हम जिस माहौल में हैं, उसका तो खयाल रखना पड़ेगा।

खर्च

सतपा - इरफान को पता नहीं रहता कि कहां क्या खर्च हो रहा है?

इरफान - मैं ढाई तीन महीने तक बाहर था। इन ट्रीटमेंट के मूड में था। उस सीरिज के लिए मुझे कितनी मेहनत करनी पड़ी।

Thursday, December 16, 2010

देसवा में दिखेगा बिहार

-अजय ब्रह्मात्‍मजदेसवा में दिखेगा बिहारनितिन चंद्रा की फिल्म देसवा लुक और थीम के हिसाब से भोजपुरी फिल्मों के लिए नया टर्रि्नग प्वाइंट साबित हो सकती है। भोजपुरी सिनेमा में आए नए उभार से उसे लोकप्रियता मिली और फिल्म निर्माण में तेजी से बढ़ोतरी हुई, लेकिन इस भेड़चाल में वह अपनी जमीन और संस्कृति से कटता चला गया। उल्लेखनीय है कि भोजपुरी सिनेमा को उसके दर्शक अपने परिजनों के साथ नहीं देखते। ज्यादातर फिल्मों में फूहड़पन और अश्लीलता रहती है। इन फिल्मों में गीतों के बोल और संवाद भी द्विअर्थी और भद्दे होते हैं। फिल्मों में भोजपुरी समाज भी नहीं दिखता।

भोजपुरी सिनेमा के इस परिदृश्य में नितिन चंद्रा ने देसवा में वर्तमान बिहार की समस्याओं और आकांक्षाओं पर केंद्रित कहानी लिखी और निर्देशित की है। इस फिल्म में बिहार दिखेगा। बक्सर के गांव से लेकर पटना की सड़कों तक के दृश्यों से दर्शक जुड़ाव महसूस करेंगे। नितिन चंद्रा बताते हैं, मैंने इसे सहज स्वरूप दिया है। मेरी फिल्म के तीस प्रतिशत संवाद हिंदी में हैं। आज की यही स्थिति है। आप पटना पहुंच जाइए, तो कोई भी भोजपुरी बोलता सुनाई नहीं पड़ता। मैं चाहता तो इस फिल्म की शूटिंग राजपिपला या वाई में कर सकता था, लेकिन चाहता था कि फिल्म की शूटिंग बिहार में करूं। मैंने शूटिंग में किया जाने वाला खर्च बिहार में किया है और वहां के स्थानीय कलाकारों को मौका भी दिया है। देसवा में नए ऐक्टरों के साथ आशीष विद्यार्थी जैसे मंझे अभिनेता हैं। इस संबंध में नितिन बताते हैं, मैं भोजपुरी फिल्मों के पॉपुलर स्टारों को लेकर अपनी फिल्म को पुरानी इमेज में नहीं डालना चाहता था। उनकी अपनी एक इमेज बनी हुई है। लोग फिल्म देखेंगे, तो पाएंगे कि मेरे कैरेक्टर रियल और सचे हैं। उन किरदारों के लिए हमें नए चेहरों के साथ सशक्त अभिनेताओं की जरूरत थी। मुझे खुशी है कि फिल्म के सभी कलाकारों ने पूरा सहयोग दिया।

नितिन की बहन नीतू चंद्रा ने इस फिल्म के निर्माण में सहयोग देने के साथ फिल्म में एक गीत पर डांस भी किया है। नितिन उस गीत की जानकारी देते हैं, यह बहुत पॉपुलर लोकगीत है। हमने इस गीत में शहरों के नाम जोड़कर उसे नया रंग दिया है। सजधज चलनी मोरनिया के चाल.. सौतन जर मरै.. गीत नीतू पर फिल्माया है। गोवा के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में देसवा के बीस मिनट के अंश का विशेष प्रदर्शन किया गया। नितिन गर्व के साथ जोड़ते हैं, उसे देखकर गोवा में मौजूद देश-विदेश के प्रतिनिधियों और पत्रकारों ने एक स्वर में यही कहा कि भोजपुरी में कुछ नया होता दिख रहा है। नितिन नए साल के आरंभ में देसवा रिलीज करना चाहते हैं।

Sunday, December 12, 2010

क्राइम कलाकार है तीस मीर खां-फराह खान


-अजय ब्रह्मात्मज

इस मुलाकात के दिन जुहू चौपाटी पर ‘तीस मार खां’ का लाइव शो था। सुबह से ही फराह खान शो की तैयारियों की व्यस्तता में भूल गईं कि उन्हें एक इंटरव्यू भी देना है। बहरहाल याद दिलाने पर वह वापस घर लौटीं और अगले गंतव्य की यात्रा में गाड़ी में यह बातचीत की। फिल्म की रिलीज के पहले की आपाधापी में शिकायत की गुंजाइश नहीं थी। लिहाजा सीधी बातचीत ...
- बीस दिन और बचे हैं। कैसी तैयारी या घबराहट है?
0 आज से पेट में गुदगुदी महसूस होने लगी है। कल तक एक्साइटमेंट 70 परसेंट और घबराहट 30 परसेंट थी। आज घबराहट 40 परसेंट हो गई है। मुझे लगता है कि रिलीज होते-होते मैं अपने सारे नाखून कुतर डालूंगी। हमने एक बड़ा कदम उठाया है। यह हमारी कंपनी की पहली फिल्म है। ऐसे में घबराहट तो बढ़ती ही है। व्यस्तता भी बढ़ गई है। आप देख रहे हो कि अपने तीनों बच्चों को लेकर मैं डबिंग चेक करने जा रही हूं। सुबह स्पेशल इफेक्ट चेक किया। फिर मछली लेकर आई। अभी बच्चों को उनकी दादी के पास छोडूंगी। डबिंग चेक करूंगी। फिर लौटते समय बच्चों को साथ घर ले जाऊंगी। उनके साथ दो घंटे बिताने के बाद जुहू चौपाटी के लाइव शो के लिए निकलूंगी। इस व्यस्तता में भूल गई कि आपसे बातचीत भी करनी थी।
- आप एक व्यस्त मां हैं। अपने बच्चों की देखभाल कैसे करती हैं?
0 ‘तीस मार खां’ मेरी नई संतान है। अभी उसी को ज्यादा समय देना पड़ता है। किसी बच्चे की तरह ही रिलीज के पहले फिल्म को प्यार, देखभाल और सेक्यूरिटी देनी पड़ती है। अभी क्रिएटिव संतान और बायलॉजिकल संतानों के बीच संतुलन बिठाना पड़ रहा है।
- आप की पिछली दोनों फिल्म सफल रहीं। कोई भी निर्माता खुशी-खुशी आपकी नई फिल्म का निर्माता बन जाता। फिर अपनी प्रोडक्शन कंपनी की बात क्यों सोची?
0 उसकी तीन वजहें हैं ... जार, दीवा और अन्या। तीनों यहां गाड़ी में आपके आस-पास हैं। इन्हीं तीनों को ध्यान में रख कर अपनी कंपनी का नाम भी हमने थ्रीज कंपनी रखा है। मैं इसे करिअर प्रोमोशन के तौर पर देखती हूं। सफल डायरेक्टर के लिए जरूरी है तो वह खुद ही प्रोड्यूसर बने। प्रोड्यूसर बनने के बाद फिल्म उसकी प्रोपर्टी हो जाती है। हमारे बाद उन पर बच्चों का अधिकार होगा। निर्माता बनना एक प्रकार से अचल संपत्ति खरीदने के समान है। शिरीष और मैंने सोचा कि फिल्ममेकिंग का सारा काम हमलोग खुद ही करते हैं तो किसी और के लिए क्यों काम करें? इस फिल्म के लिए मैंने जितना काम किया है। उससे कुछ ज्यादा ही पहली दोनों फिल्मों के लिए किया था।
- अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म में फराह खान कितनी डिमांडिंग रहती हैं?
0 फिल्म में मैं कोई समझौता नहीं करती। सभी जानते हैं कि मैं बहुत ही इकानॉमिकल टेक्नीशियन हूं। फालतू पैसे खर्च नहीं करवाती हूं। शिरीष बहुत उदार निर्माता हैं। हमने इस फिल्म का एक निश्चित बजट रखा था। फिल्म उसी बजट में बन गई है। किसी दूसरे डायरेक्टर को हायर करने पर शिरीष को आटे-दाल का भाव पता चलेगा। मैं तो घर की डायरेक्टर हूं। वैसे शिरीष ने मुझे ट्रेन और हवाई जहाज भी बना कर दिए। भले ही उसके लिए एक करोड़ से ज्यादा खर्च हो गए। मैं अपनी शूटिंग में किसी प्रकार की रूकावट नहीं चाहती थी। इसलिए खुद ही ट्रेन और हवाई जहाज बनवा लिए। फिल्म में ‘तीस मार खां’ उड़ते हुए हवाई जहाज को बचाता है।
- फिल्म वास्तव में क्या है?
0 बहुत ही इंटरेस्टिंग प्लाट है। यह चालाक तरीके से लिखी गई है। एंटरटेनिंग है। फिल्म में कोई सोशल मैसेज नहीं है। सोशल मैसेज के लिए आप एसएमएस का उपयोग कीजिए या किताब पढि़ए। मेरा मानना है कि फिल्म का प्राथमिक उद्देश्य मनोरंजन करना होता है। मैं तो यही कहूंगी कि फिल्म देखने आओ, एंज्वाय करो और जाओ। कहते हैं ‘तीस मार खां’ बादशाह अकबर के जमाने में हुआ करता था। वास्तव में उसने तीस मक्खी मारे थे और डींग मारी थी कि उसने तीस शेर मारे हैं। उसी की तरह हमारी फिल्म का हीरो भी फेंकूचंद है, लेकिन दुनिया का सबसे बड़ा क्राइम कलाकार है। प्रोमो में आपने सुना होगा कि वह आधा रॉबिनहुड हैं। मुसीबत में पडऩे पर वह हीरोगिरी नहीं करता। वहां से उलटे पांव भाग खड़ा होता है।
- और शीला क्या कर रही हैं?
0 शीला उसकी गर्लफ्रेंड है। वह एक्ट्रेस हैं। उसको कट्रीना कैफ बनना है। उसको ग्लैमरस हीरोइन बनना है।
- माना जा रहा है कि क्रिसमस पर आई फिल्में अवश्य हिट होती हैं?
0 अच्छा हो गया। पहले केवल दीवाली पर रिलीज फिल्में हिट होती थीं। अब क्रिसमस और ईद भी शामिल हो गए हैं। वास्तव में फेस्टिवल के समय सभी मस्ती के मूड में रहते हैं। उस समय कोई एंटरटेनिंग फिल्म रहे तो परिवार के साथ देखने निकलते हैं। उन दिनों बच्चों की छुट्टी रहती है। मुझे पूरा यकीन है कि ‘तीस मार खां’ बच्चों को खूब पसंद आएगी। मेरी फिल्म का विलेन निराला है। वे हिप से जुड़े ट्विन हैं। रोडिज के रघु और राजीव को हमने लिया है। ‘शीला की जवानी’ अभी से हिट हो चुकी है।
-आप के पति शिरीष कुंदर ने कैसा सहयोग दिया?
0 इस फिल्म में शिरीष को आठ क्रेडिट मिल रहे हैं। सबसे पहले तो उन्होंने इतनी अच्छी स्क्रिप्ट लिखी और फिर फिल्म बढऩे के साथ टैलेंट दिखते गए। मैं उनके मल्टी टैलेंट के बारें में समझ गई थी। तभी तो शादी की।
- इन दिनों फिल्म की पैकेजिंग और मार्केटिंग पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है। जबकि कोई भी फिल्म कंटेंट और क्वालिटी की वजह से ही दर्शकों के बीच लोकप्रिय होती हैं। आप क्या कहेंगी?
0 निश्चित ही कंटेंट और क्वालिटी ही काम करती है। फिर भी अभी पब्लिसिटी का जमाना है। जैसे आप सुने हुए ब्रांड का ही टूथपेस्ट खरीदते हैं। वैसे ही आपकी बहुत अच्छी फिल्म के बारे में सभी को मालूम होना चाहिए। मैं पब्लिसिटी पर पूरा ध्यान देती हूं। यही वजह है कि तमाम व्यस्तताओं के बीच मीडिया और प्रोमोशन के लिए समय निकालती हूं। हमने चलती ट्रेन में म्यूजिक रिलीज किया। अभी तक उसकी चर्चा ठंडी नहीं हुई है। आज हम लाइव शो कर रहे हैं। जुहू चौपाटी आने वाले लोग फिल्म के कलाकारों को आमने-सामने देख सकेंगे।

Friday, December 10, 2010

इम्तियाज अली से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत

डिलीवरी ब्वॉय से बना डायरेक्टर: इम्तियाज अली-अजय ब्रह्मात्‍मज

सिनेमा की आरंभिक छवियों के बारे में कुछ बताएं?

जमशेदपुर में पला-बढा हूं। वहां मेरे फूफा जान के तीन सिनेमा घर हैं। उनका नाम एच. एम. शफीक है। करीम, जमशेदपुर और स्टार टाकीज थे उनके। करीम और जमशेदपुर टाकीज के पास ही उनका घर भी था। सांची के पास है यह। वहां के थिएटरों में शोले तीन साल चली थी। टिकट निकालने के चक्कर में हाथ तक टूट जाया करते थे। नई पिक्चर लगती थी तो हम छत पर चढ कर नजारा देखते थे। हॉल के दरवाजों का खुलना, वहां की सीलन, दीवारों की गंध...सब-कुछ रग-रग में बसा हुआ है।

घर में फिल्में देखने की अनुमति थी?

नहीं। यह शौक अच्छा नहीं समझा जाता था। पिक्चर छुपकर देखते थे। गेटकीपर हमें पहचानते थे। हाफ पैंट पहने कभी भी थिएटर में चले जाते। कई बार सीट नहीं मिलती तो जमीन पर बैठ कर फिल्म देखते थे। सीन बेकार लगता तो दूसरे हॉल में चले जाते। लार्जर दैन लाइफ छवियां और लोगों की दीवानगी..मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म देखने आ रहे हैं तो खुद को मिथुन ही समझते। स्क्रीन के बीच में पंखे का चलना दिख रहा है। सीटें तोडी जा रही हैं। एक-दो बार पर्दे फाड दिए गए। नॉर्थ इंडिया के छोटे से कस्बे में पिक्चर का क्रेज देखते ही बनता था। मैं फूफी के घर पर एक साल रहा हूं। हम पटना से ट्रांसफर होकर जमशेदपुर गए थे। उन दिनों एयर कूल्ड हॉल होते थे। गर्मी में दरवाजे खोल दिए जाते। हमारी खिडकी से पर्दे का छोटा सा हिस्सा दिखता था। एक खास एंगल से पिक्चर दिखती थी। सीन देखकर कहानी का अंदाज लगा लेते थे।

ऐसी कोई फिल्म, जो पूरी तरह याद हो?

फिल्में टुकडों में ही ज्यादा देखीं। धर्मेद्र की लोफर याद है। शोले पूरी याद है।

सिनेमा देखने के लिए कोई तैयारी नहीं होती थी? घर के सिनेमा हॉल थे, जब मर्जी हुई देख ली?

छिपकर फिल्में देखना तो एडवेंचर था। पकडे जाने पर मार भी पडती थी। गेटकीपर जाने देता था, लेकिन चिढ जाता तो शिकायत लगाता। घर वाले जाते तो पूरी तैयारी होती थी। फिल्म देखना और फूफी के घर जाना साथ-साथ होता था। पटना में टिकट खरीदकर फिल्म देखते थे। मम्मी-डैडी को फिल्में देखना पसंद है। खासकर मम्मी को, लेकिन तब फिल्म देखने की बात अच्छी नहींसमझी जाती थी। मैं फिल्मों में हूं, लेकिन फिल्मी पत्रिकाएं घर पर नहीं आतीं। मैं खुद इसकी सहमति नहीं दूंगा।

जमशेदपुर से कब तक रिश्ता रहा?

पैदा जमशेदपुर में हुआ था। इसके बाद हम पटना चले गए थे। आठवीं के बाद फिर से जमशेदपुर आ गया। बारहवीं के बाद पढाई के लिए दिल्ली चला गया। मम्मी-डैडी से मिलने जमशेदपुर आता-जाता था।

दिल्ली जाने के पहले फिल्मों में आने या मुंबई आने का इरादा जाहिर किया?

कभी-कभी दिमाग में ये बातें आती थीं। लेकिन जमशेदपुर में रहकर यह सपना मुश्किल लगता था। दिल्ली जाने से पहले पक्का नहीं सोचा था कि मुंबई जाऊंगा। जेहन में बडी सी बिल्डिंग हुआ करती, जिसे फिल्म इंडस्ट्री समझता था। सोचता था कि वहां जाऊंगा तो फलां से मिलूंगा, ये कहूंगा या वो कहूंगा।

बिहार में माहौल नहीं था या करियर के प्रति निश्चित सोच थी कि दिल्ली गए?

जमशेदपुर में स्कूल तो अच्छे हैं, लेकिन कॉलेज अच्छे नहीं हैं। स्कूल के दिनों में ही थिएटर से लगाव हो गया था। प्रिंसिपल ने एक बार कहा कि अलादीन व हिज मैजिकल लैंप प्ले करना है। ऑडिशन दे दो। धीरे-धीरे सारे सांस्कृतिक कार्यक्रमों की जिम्मेदारी मुझे मिलने लगी। टीम बनाता था, एक्टिंग भी करता था। डायरेक्ट करने लगा तो रोटरी क्लब व अन्य जगहों से ऑफर मिलने लगे। ये प्ले खुद लिखने और डायरेक्ट करने होते थे।

घर में किसी का रिश्ता फिल्मों से था?

मेरे पिता सिंचाई विभाग में इंजीनियर रहे हैं। अभी भी वे सिंचाई विभाग में सलाहकार हैं। पाकिस्तान में खालिद मामू हैं, जो दरअसल मेरी मां के मामू हैं। वे पाकिस्तानी रंगमंच की बडी हस्ती हैं। एक वही फिल्मों से जुडे हैं।

इंजीनियर पिता चाहते होंगे कि आप भी उसी फील्ड में जाएं। कितने भाई-बहन हैं?

मेरे दो छोटे भाई हैं। पढाई-खेलकूद में मैं अच्छा रहा। यदि मेरे स्कूल में तब बास्केट बॉल खेलने की सुविधा होती तो मैं खिलाडी बनता। रिजल्ट ठीक रहता था। मम्मी-डैडी ने रोका नहीं, सिर्फ सावधान किया। वे मुझे आई.ए.एस. अधिकारी के रूप में देखते थे। साइंस स्टूडेंट था। जब उन्हें लगा कि मैं दूर निकल गया हूं तो डांटा-समझाया। लेकिन रोका बिलकुल नहीं। कुल मिलाकर उन्होंने मुझे सपोर्ट किया।

स्कूल के दिनों में कोई ऐसा व्यक्ति था, जिसने आप पर गहरा प्रभाव छोडा हो?

दो-तीन टीचर थीं। एक हैं मिसेज अशोक शांता। उनका सही नाम शांता अशोक कुमार है। नौवीं कक्षा में मैं फेल हो गया था। शर्मिदगी की बात थी। उन्होंने मुझे समझाया। कहती थीं, कोई बात नहीं, 75 प्रतिशत आएं या 90 प्रतिशत, जिंदगी यहीं खत्म नहीं होती। इंग्लिश टीचर दीपा सेनगुप्ता थीं। फेल भी हुआ तो अंग्रेजी में अच्छे मा‌र्क्स थे। मेरे निबंध क्लास में पढे जाते थे। मैं अंग्रेजी कविताएं लिखता तो मैम को पढने के लिए देता था। वह मुझे गाइड करती थीं। अब तक भी इंटरनेट के जरिये मैं इन दोनों टीचर्स के संपर्क में हूं।

कोई प्रेम-प्रसंग रहा? छोटे शहरों में प्यार तो जागता है, लेकिन खिल नहीं पाता?

अलादीन और जादुई चिराग की हीरोइन थीं प्रीति, वही आज मेरी पत्‍‌नी हैं। आठवीं कक्षा से ही प्रेम था। साथ रहते बीस साल हो गए अब।

दिल्ली जाने का मकसद क्या था?

पढाई के लिए गया था। फिजिक्स, केमिस्ट्री में मैंने पढाई की थी, लेकिन इंजीनियरिंग में नहीं जाना था। मेरे सभी दोस्त इंजीनियर हैं। मेरा चयन भी हुआ, लेकिन मुझे नहीं करना था। दिल्ली में एक्सपोजर था, सिर्फ इसलिए वहां गया। हिंदू कॉलेज में एडमिशन लिया और थिएटर करने लगा।

थिएटर का सिलसिला जमशेदपुर में शुरू हो गया था। वही सिलसिला जारी रहा या नए सिरे से कुछ शुरू हुआ?

जमशेदपुर छोडने तक मैं थिएटर करने लगा था। मेरे शो के टिकट बिकने लगे थे। हिंदू कॉलेज पहुंचने पर पता चला कि ड्रमैटिक सोसायटी बंद है पिछले आठ-नौ सालों से। मैंने उसे फिर से शुरू किया। उसका नाम इब्तदा रखा। साल में दो-तीन शो करते थे। वहां मैंने विजय तेंदुलकर और महेश ऐलकुंचवर के प्ले किए। मराठी नाटककार ज्यादा पॉपुलर थे। मोहन राकेश के प्ले को हर कोई मंचित करता था। हमने वसंत देव के अनुवादों का मंचन किया। पहले साल मैंने होली और जाति न पूछो साधु की किए। उसके बाद के दो सालों में ओरिजनल प्ले भी लिखे और किए। फिर एक्ट वन से जुडा। उनके साथ दो-तीन प्ले किए। वहां एक्ट करता था और कॉलेज में डायरेक्ट करता था।

छात्र राजनीति के संपर्क में नहीं आए आप?

नहीं, मुझे थिएटर में ही मजा आता था। दिल्ली में छात्र राजनीति स्कूल की तरह नहीं थी। वह होल-टाइमर राजनीति थी। 1992-93 की बात है। छात्र-नेताओं के अभियानों में चला जाता था, लेकिन रुचि थिएटर में थी। हिंदू कॉलेज के प्रिंसिपल सी.पी. वर्मा थे। उन्होंने साफ कहा कि पास होना जरूरी है और उपस्थिति पूरी हो। उपस्थिति रजिस्टर पर साइन तो उन्होंने कर दिए। फिर कहा कि दो प्रोडक्शन करने हैं कॉलेज के लिए। मुझे और क्या चाहिए था। अंग्रेजी साहित्य मेरा विषय था और मैं टॉपर था तब। अपने कॉलेज के अलावा आई.टी. कॉलेज, मिरांडा में जाकर भी प्ले करता था। मिरांडा जाते हुए तो कुछ लडके यूं ही साथ चलते थे कि लडकियों को देखने को मिलेगा।

सिनेमा में जाने की बात थी या नहीं?

नहीं। थिएटर, थिएटर, थिएटर...और कुछ याद नहीं था। एक्ट वन में एन. के. थे। फिल्मों का उनका लंबा अनुभव था। मैं जूनियर था तो उनसे बात नहीं हो पाती थी। मैंने सिर्फ सुना था कि फलां फिल्म उन्होंने असिस्ट की है।

मुंबई का रुख कैसे किया?

ग्रेजुएशन के बाद सोचा कि जर्नलिस्ट बनूं। आई.आई.एम.सी. या जामिया के बारे में पता था। जामिया में एडमिशन नहीं हो सका। मेरे शफीक अंकल ने अजीब बात कही, बेटे, जब कहीं दंगा-फसाद होगा तो सब शहर से बचने के लिए भाग रहे होंगे और तुम वहां कवरेज के लिए जाओगे। जर्नलिस्ट नहीं बनना था-सो नहीं बना। एक तरह से अच्छा ही हुआ। मुंबई जाना था। घर वालों को नहीं कह सकता था कि फिल्म के लिए जाना है।

लेकिन क्यों?

पर्सनल वजह यह थी कि प्रीति (मेरी पत्‍‌नी) मुंबई में थीं। फिर हुआ कुछ यूं कि मैं मुंबई आया तो उन्हें जमशेदपुर बुला लिया गया। यहां आया तो सोचा कि एडवर्टाइजिंग में स्कोप है। साथ में मार्केटिंग करूंगा। इसलिए जेवियर्स में एडमिशन ले लिया। वहां एक प्ले किया। कोर्स पूरा किया तो नौकरी नहीं मिली। मेरे कोर्स वाले कहते थे कि मैं सबसे तेज था और सबसे ज्यादा जरूरतमंद भी। शादी करनी थी और उसके लिए पैसे कमाने जरूरी थे। 20-21 की उम्र थी। एक महीना परसेप्ट कम्युनिकेशंस के बाहर खडा रहा। मुद्रा सहित कई जगहों पर भटका। साल भर लगभग बेरोजगार था। सोचता था कि मुझे ही क्यों नौकरी नहीं मिल रही है, जबकि सभी को पता है कि मैं बेहतर लेखक हूं। अब सोचता हूं तो लगता है कि दरअसल मुझे कुछ और करना था। झक मारकर एक नौकरी की, क्योंकि वही मिली।

क्या नौकरी थी?

जी टीवी में प्रोडक्शन असिस्टेंट की। वर्ली से टेप लेकर बांद्रा स्टूडियो जाना होता था। वहां एडिट हो जाता था उसका लॉग शीट बना कर इंचार्ज को देना होता था। हजार-पंद्रह सौ की नौकरी थी। एक तरह से डिलीवरी ब्वाय था, एडिटिंग देखता था। एडिटर से बात होने लगी तो दिमाग उधर चलने लगा। डायलॉग लिखने के बाद यह सब करने लगा। टीवी के लिए वॉयस ओवर देना शुरू किया। प्रोमो का एक डिपार्टमेंट बन गया। मैं और मेरा दोस्त शंकर उसके हेड बन गए। मेरा कभी कोई बॉस नहीं रहा। पहले डिलीवरी ब्वॉय था। फिर यह डिपार्टमेंट बना। जो हेड आने वाला था, वह नहीं आया तो हम इंचार्ज बन गए। तीन महीने गुजरे। फिर क्रेस्ट कम्युनिकेशंस से जुडा।

यही टर्निग पाइंट बना शायद?

हां। एक दिन अनुराग कश्यप आया। उसने कहा, क्रेस्ट में छह हजार की नौकरी है। मुझे मिली थी, लेकिन मैं स्क्रिप्ट लिख रहा हूं। मैंने तुम्हारे लिए बात की है। इंटरव्यू में अनुराग भी साथ में था। छह हजार मिलने लगे तो लगा कि शादी कर सकता हूं। अनुराग को भी पता थी मेरी सिचुएशन। सब एक ही नाव पर सवार थे। पहली सैलरी सात हजार मिली, क्योंकि वे मेरे काम से खुश थे, फिर दस हजार हो गई। वहां सोलह घंटे लिखने की आदत हो गई। तब श्याम खन्ना विदेशी एड लेते थे। मैं उनकी स्क्रिप्ट लिखता था। टीवी डिपार्टमेंट बना। पुरुषक्षेत्र बना तो मैंने ही डायरेक्ट किया। उसके पहले सिर्फ लिखता था। एक कहानी लिखी थी, जिसे श्याम बेनेगल ने डायरेक्ट किया। मेरे लिए बडी बात थी। ये सब सीरियल प्रपोजल थे। जो क्रेस्ट बना रही थी। मैं टीवी का क्रिएटिव डायरेक्टर था। श्याम बेनेगल के लिए रॉन्ग नंबर लिखी थी। एक विधवा व आठ साल के बच्चे की कहानी थी यह, जिनके फोन पर रॉन्ग नंबर आता था। फिर कैसे उस बच्चे की रॉन्ग नंबर वाले आदमी से दोस्ती होती है। इसी की नाटकीय कहानी थी यह। अब लगता है कि वह नाटक भी हो सकता था। डेढ-दो साल हुए। शादी हो गई। पुरुषक्षेत्र डायरेक्टर के तौर पर मेरा पहला काम था। हालांकि उसमें डायरेक्शन जैसी बात नहीं थी। इससेपहले किसी सीरियल या फिल्म के सेट तक पर नहीं गया था। सीधा डायरेक्टर बन गया।

तब तक सिनेमा में रुचि जग चुकी थी? अनुराग कश्यप तो स्ट्रगल कर रहे थे?

हां, अनुराग व अन्य साथी फिल्मों के स्ट्रगलर थे। मैं जिंदगी का स्ट्रगलर था। अनुराग को मैं दिल्ली से जानता था। वह यहां मेरे होस्टल में भी रहा था। पुरुषक्षेत्र खत्म हुआ तो अनुपम खेर ने बुलाया। उनके दोस्त रवि राय इम्तहान बनाते थे। उनका कोई झगडा हो गया था। अनुपम किरण की वजह से मिले। किरण मुझे जानती थीं। वह कहती थीं कि हम साथ मिलकर काम करें। हम सोच ही रहे थे कि रवि राय छोडकर चले गए। फिर समझ नहीं आया कि क्या करें। मैं असमंजस में रहा, लेकिन मैंने कर लिया। इस तरह मैं डायरेक्टर हो गया और सीरियल नंबर वन हो गया। पुरुषक्षेत्र में मुझे अवार्ड मिल गया था, तो लोगों को लगता था कि अवार्ड विनिंग डायरेक्टर है। उन दिनों अवार्ड मूंगफली की तरह नहीं बंटते थे। लिखता मैं खुद था। थिएटर के अनुभव से एक्टर को समझ लेता था। कैमरा और टेक्नीक मैं उनसे ही सीखता था। पता चलता था कि जो ट्रॉली लगा रहा है, वह भी मुझसे ज्यादा जानता है। उन लोगों के साथ रहकर ही काम सीखा। ट्रॉली पर रखा कैमरा, क्रेन पर रखा, क्रेन को ट्रॉली पर डाला। अशोक बहल कैमरामैन ने मुझसे कहा, तू टेक्नीकली बडा स्ट्रॉन्ग डायरेक्टर है। उस दिन मैंने उनके साथ पार्टी की।

इम्तिहान के बाद...

कुछ और सीरियल किए। एक प्रोडयूस भी किया। तब तक फिल्म का कीडा लग चुका था। लगा कि फिल्म करनी चाहिए। कई लोगों के साथ काम करने लगा। बस इसी तरह यह सिलसिला चल निकला।


Thursday, December 9, 2010

देसी मुन्नी, शहरी शीला

देसी मुन्नी, शहरी शीला-अजय ब्रह्मात्‍मज

धुआंधार प्रचार से शीला की जवानी.. की पंक्तियां लोग गुनगुनाने लगे हैं, लेकिन शीला..शीला.. शीला की जवानी.. के बाद तेरे हाथ नहीं आनी.. ही सुनाई पड़ता है। बीच के शब्द स्पष्ट नहीं हैं। धमाधम संगीत और अंग्रेजी शब्द कानों में ठहरते ही नहीं। धप से गिरते हैं, थोड़ा झंकृत करते हैं और फिर बगैर छाप छोड़े गायब हो जाते हैं। यही वजह है कि आइटम सांग ऑफ द ईयर के स्वघोषित दावे के बावजूद शीला की जवानी.. का असर मुन्नी बदनाम हुई.. के जैसा नहीं होगा। मुन्नी.. को कोई दावा नहीं करना पड़ा। उसे दर्शकों ने आइटम सांग ऑफ द ईयर बना दिया है।

दबंग में आइटम सांग की जरूरत सलमान खान ने महसूस की थी। उन्होंने इसके लिए मुन्नी बदनाम हुई.. पसंद किया और पर्दे पर असहज स्थितियों और दृश्यों की संभावना के बावजूद अपनी छोटी भाभी मलाइका अरोड़ा को थिरकने के लिए आमंत्रित किया। सभी जानते हैं कि पूरी दुनिया के लिए अजीब कहलाने वाले सलमान खान अपने परिवार में कितने शालीन बने रहते हैं। मुन्नी बदनाम हुई.. ने कमाल किया। देखते ही देखते वह दबंग की कामयाबी का एक कारण बन गया।

मुन्नी बदनाम हुई.. वास्तव में लौंडा बदनाम हुआ.. का फिल्मी और थोड़ा श्लील रूपांतरण है। ओरिजनल गीत में लौंडे और नसीबन की रति क्रियाओं का वर्णन है। मुन्नी बदनाम हुई.. में मुन्नी के सार्वजनिक और सर्वसुलभ होने का वर्णन है। दबंग में मुन्नी नितंब के झटकों के साथ प्रवेश करती है। उसकी अदाओं में देहाती उम्फ है, जिसके सभी दीवाने हैं। चुलबुल पांडे उसके दर्शन में ही पूरी बोतल का नशा.. पाकर अपनी सुध-बुध खो बैठता है। वह उसे सिनेमा हॉल तक की संज्ञा दे देता है। वर्तमान भारतीय समाज में सिनेमा हॉल से अधिक सार्वजनिक और मनोरंजक जगह नहीं हो सकती।

मुन्नी का गंवईपन आकर्षित करता है। मुन्नी के कपड़े लाल और हरे हैं। उसने ट्रेडिशनल प्रिंट का चोली और घाघरा पहन रखा है। इसके बरक्स शीला के कपड़े डिजाइनर हैं। चमक-दमक के साथ उसमें शहरी संस्कार है। शीला एक गाने में इतनी बार कपड़े बदलती है कि वह नकली लगने लगती है। शीला के ठुमकों में देसीपन नहीं है। मुन्नी साइड से रिझाती है, तो शीला सामने से बुलाती है। वास्तव में यह संस्कृति का फर्क है। मुन्नी देसी है तो शीला शहरी। शीला के डांस की पृष्ठभूमि में स्पेशल इफेक्ट और सेट पर फाइबर और क्रिस्टल की सिंथेटिक चमक है, जबकि मुन्नी का माहौल धूसर और गेरुआ है। ये रंग हमारे मानस में बचपन से बैठे हैं। इसके अलावा मुन्नी अपने गाने की हर पंक्ति में खुद को सार्वजनिक करती जाती है। वह बताती है कि उसका आम उपयोग या उपभोग किया जा सकता है। इसके विपरीत शीला दावा करती है आई एम टू सेक्सी फॉर यू.. और तेरे हाथ नहीं आनी..। उसके इस उद्गार में टच मी नॉट का भाव है। शीला अहंकारी है और मुन्नी बदनाम होने पर भी न्योछावर होने के लिए तैयार है। मुन्नी के जादुई प्रभाव का सोंधापन हर उम्र, तबके और क्षेत्र के दर्शकों को भा चुका है। उसका असर प्राकृतिक है, जबकि शीला किसी विज्ञापन की तरह आक्रामक है। वह अपनी जरूरत पैदा करने की कोशिश में है, जबकि मुन्नी जरूरत बनी हुई है। निश्चित ही दोनों गानों के पीछे इतनी बातें नहीं सोची गई होंगी, लेकिन हर रचना के पीछे सक्रिय दिमाग की अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि होती है। उसी से प्रेरित होकर वह सायास या अनायास कुछ रचता है। गौर करें, तो मुन्नी भारत का गीत है, तो शीला इंडिया का।

Sunday, December 5, 2010

सीरियल में सिनेमा की घुसपैठ

-अजय ब्रह्मात्‍मज

इसकी आकस्मिक शुरुआत सालों पहले भाई-बहन के प्रेम से हुई थी। तब एकता कपूर की तूती बोलती थी। उनका सीरियल क्योंकि सास भी कभी बहू थी और कहानी घर घर की इतिहास रच रहे थे। एकता कपूर की इच्छा हुई कि वह अपने भाई तुषार कपूर की फिल्मों का प्रचार अपने सीरियल में करें। स्टार टीवी के अधिकारी उन्हें नहीं रोक सके। लेखक तो उनके इशारे पर सीन दर सीन लिखने को तैयार थे। इस तरह शुरू हुआ सीरियल में सिनेमा का आना। बड़े पर्दे के कलाकार को जरूरत महसूस हुई कि छोटे पर्दो के कलाकारों के बीच उपस्थित होकर वह घरेलू दर्शकों के भी प्रिय बन जाएं। यह अलग बात है कि इस कोशिश के बावजूद तुषार कपूर पॉपुलर स्टार नहीं बन सके। यह भी आंकड़ा नहीं मिलता कि इस प्रयोग से उनकी फिल्मों के दर्शक बढ़े या नहीं, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री को प्रचार का एक और जरिया मिल गया।

प्रोफेशनल और सुनियोजित तरीके से संभवत: पहली बार जस्सी जैसी कोई नहीं में हम तुम के स्टार सैफ अली खान को कहानी का हिस्सा बनाया गया। यशराज फिल्म्स की तत्कालीन पीआर एजेंसी स्पाइस के प्रमुख प्रभात चौधरी याद करते हैं, ''वह अलग किस्म की फिल्म थी। इसके प्रचार में आदित्य चोपड़ा नई युक्तियों का सहारा ले रहे थे। आप को याद होगा कि एक अंग्रेजी अखबार में कार्टून स्ट्रिप भी चलाए थे।''

यूनिवर्सल के पराग देसाई बताते हैं, ''कुछ फिल्म स्टार तो प्रचार की ऐसी जरूरतों के लिए सहज तैयार हो जाते हैं, लेकिन प्रचार और साक्षात्कार से यथासंभव दूर रहने वाले अजय देवगन को राजी करना मुश्किल काम होता है।'' अजय देवगन साफ कहते हैं, ''अगर पीआर एजेंसी का प्रेशर न हो तो मैं बिल्कुल न जाऊं। मैं शुरू से मानता रहा हूं कि आखिरकार फिल्म ही चलती है। दर्शकों को फिल्म अच्छी लगनी चाहिए।''

ज्यादातर फिल्म स्टार इसे जरूरी ट्रेंड मान कर पीआर की सलाह पर अमल करते हैं, लेकिन वे यहां भी परफॉर्म कर रहे होते हैं। उनकी अंदरूनी इच्छा नहीं रहती कि उस सीरियल या टीवी शो का हिस्सा बनें, पर मजबूरी क्या नहीं कराती। सो, नवंबर के दूसरे पखवाड़े में रितिक रोशन गुजारिश के प्रचार के लिए जी टीवी के सारे गा मा पा सिंगिंग स्टार में गए। वहां उन्होंने खुद भी गीत गाए। इन्हीं दिनों बिग बॉस और केबीसी में फिल्म सितारों का जमघट देखा गया। इनमें सभी अपनी फिल्मों के प्रचार के लिए गए थे।

प्रभात चौधरी कहते हैं, ''वास्तव में यह दोनों के लिए विन-विन सिचुएशन है। इस से सीरियलों का आकर्षण बढ़ता है, जो उनकी टीआरपी में नजर आता है। दूसरी तरफ फिल्म की जानकारी वैसे दर्शकों के बीच पहुंच जाती है, जो फिल्म शो, प्रिंट मीडिया या दूसरे पारंपरिक माध्यमों के करीब नहीं हैं।''

सीरियलों में फिल्मी सितारों की बढ़ती मौजूदगी की आर्थिक वजह भी है। बीते महीनों में टीवी चैनलों ने विज्ञापन दर बढ़ा दी हैं। फिल्मों के प्रोमो के लिए दी जाने वाली रियायत भी खत्म की जा रही है। ऐसी स्थिति में सभी फिल्म निर्माताओं के लिए विज्ञापन के समय खरीद पाना संभव नहीं रहा है। सो, फिल्म निर्माताओं ने बीच का रास्ता खोज निकाला है। वे पॉपुलर सीरियलों की कहानी में अपनी फिल्म के कलाकारों के लिए जगह बनवाते हैं। इसके एवज में उन्हें प्रचार मिल जाता है।

सब टीवी के तारक मेहता का उल्टा चश्मा में सबसे अधिक फिल्मों के कलाकार आते हैं। इस सीरियल के निर्माता असित कुमार मोदी बताते हैं, ''हमें फिल्म निर्माता अप्रोच करते हैं तो हम अपने लेखकों के साथ बैठ कर उनकी फिल्मों के लिए सिचुएशन बनाते हैं। कोशिश रहती है कि सीरियल के दर्शकों को झटका न लगे और उनका अतिरिक्त मनोरंजन भी हो जाए। दो दूनी चार के प्रचार के लिए आए ऋषि कपूर और नीतू को दर्शकों ने खूब पसंद किया।'' असित मानते हैं कि चूंकि तारक मेहता का उल्टा चश्मा गुजरात समेत पश्चिम भारत में बहुत पापुलर है, इसलिए निर्माता इस सीरियल में आना चाहते हैं।

फिल्म की रिलीज के समय रियलिटी शो में कलाकार लंबे समय से आते रहे हैं। सीरियलों में उनके आने की फ्रीक्वेंसी अभी बढ़ी है। 2010 की आखिरी तिमाही में अजय देवगन आक्रोश के लिए क्राइम पेट्रोल में, सलमान खान दबंग के लिए लागी तुझ से लगन, मल्लिका सहरावत हिस्स के लिए न आना इस देश लाडो जॉन अब्राहम झूठा ही सही के लिए एफआईआर में नजर आए।

आक्रामक प्रचार के इस दौर में सीरियल मुफ्त के माध्यम के रूप में सामने आए हैं। युवा टीवी विश्लेषक विनीत कुमार के शब्दों में, ''बॉलीवुड के सितारे टेलीविजन पर आकर कोई एहसान नहीं करते, बल्कि दोनों के बीच एक मैच्योर बिजनेस समझौता बना है। प्रमोशन के जरिए, टेलीविजन उन्हें सिनेमाघरों से पहले लोगों के ड्राइंग रूम और बेडरूम में पहुंचाने का काम करता है।''

कहना मुश्किल है कि सीरियल और फिल्मों का यह हनीमून कितना लंबा चलेगा? फिलहाल दोनों पक्षों को मजा आ रहा है और दोनों खुद को फायदे में समझ रहे हैं!


Saturday, December 4, 2010

हिंदी फिल्मों की हदबंदी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले सप्ताह आई ब्रेक के बाद की आलिया कन्फ्यूज्ड है। वह प्रेम के एहसास और शादी की योजना से दूर रहना चाहती है। उसे करियर बनाना है। उसे अपनी संतुष्टि के लिए कुछ करना है। इसी कोशिश में वह प्रेमी अभय से ब्रेक लेती है और देश छोड़ कर चली जाती है। उसे लगता है कि अभय का प्रेम उसके भविष्य की राह का रोड़ा है। डेढ़ घंटे के ड्रामे के बाद जो होता है, वह हर हिंदी फिल्म में होता है। अंत में वह देश लौटती है और अभय के साथ शादी के मंडप में बैठ जाती है।

इधर की कुछ फिल्मों में ऐसी हीरोइनें बार-बार दिख रही हैं। इम्तियाज अली की फिल्म लव आज कल की भी यही थीम थी। वहीं ये इसकी शुरुआत मान सकते हैं। आई हेट लव स्टोरीज और आयशा भी हमने देखीं। कुछ और फिल्में होंगी। इन सभी फिल्मों के कॉमन थीम में कन्फ्यूज्ड लड़कियां हैं। सभी आज की लड़कियां हैं। आजाद सोच की आधुनिक लड़कियां, जो अपनी एक स्वतंत्र पहचान चाहती हैं। इस पहचान के लिए वे संघर्ष करती हैं, लेकिन हिंदी फिल्मों की हदबंदी उन्हें आखिरकार प्रेमी और हीरो के पास ले आती हैं।

हिंदी फिल्मों में ढेर सारी चीजें बदल कर भी नहीं बदलतीं। प्रेम और शादी से पूरी फिल्म में भाग रही लड़कियों का चित्रण इसका उदाहरण है। फिल्म के आखिरी दृश्यों में जब इन लड़कियों को प्रेम व परिवार के एहसास के साथ शादी की जरूरत महसूस होती है, तो उनकी जिद, लड़ाई और अस्मिता की तलाश बेमानी लगने लगती है। उन्हें उसी पारंपरिक परिवेश में वापस ले आया जाता है। किसी भी फिल्म में यह नहीं बताया जाता कि प्रेम के स्वीकार या शादी के लिए हामी भरने के बाद उनके सपनों का क्या हुआ? कई दफा वे अपनी पढ़ाई या करियर छोड़ कर लौट आती हैं। इसे हम किस बदलाव के रूप में स्वीकार करें? गौर करें, तो इन फिल्मों में लड़कियों के सतीत्व की भी रक्षा लेखक-निर्देशक करते रहते हैं। स्वतंत्र इरादों के बावजूद लड़की किसी दूसरे लड़के से दोस्ती तक नहीं करती। हीरोइनों को प्रेम और दोस्ती की आजादी अभी तक हिंदी फिल्मों में नहीं मिली है। हीरो चाहे, तो एक से अधिक लड़कियों से दोस्ती करने के बाद भी हीरोइन के पास वापस आ सकता है। हीरोइन उससे कोई सवाल नहीं करेगी। उसे अपना लेगी। हीरोइन ऐसा करे, तो वह हीरो और दर्शकों के लिए अछूत हो जाएगी।

निश्चित ही यह हमारे सामाजिक ढांचे का असर है। प्रगति और विकास के साथ ग्लोबलाइजेशन से हमारे जीवन में फर्क आ गया है। जीवनशैली बदल रही है, लेकिन सोच-समझ के मामले में हम अभी तक दकियानूस बने हुए हैं। उसी सोच के प्रभाव में लेखक-निर्देशक लड़कियों की छटपटाहट तो दिखाते हैं, लेकिन फिर उन्हें पुराने खांचों में बिठाकर परंपरा का भी निर्वाह कर देते हैं। तर्क यह दिया जाता है कि हमारे दर्शक अभी इतने नहीं बदले हैं कि उन्हें आजाद तबियत की हीरोइनें दिखाई जा सकें। मेकरों को डर रहता है कि दर्शकों का बड़ा समूह यानी पुरुष हीरोइनों की आजादी बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।

इसके विपरीत फेमिनिज्म का एक दौर रहा है और उसके असंगत प्रभाव में ऐसी फिल्में आई, जिनमें पुरुष सत्ता को चुनौती देकर ही कर्तव्य की इतिश्री समझ ली गई। ऐसी फिल्में पुरुष विरोध के नाम पर स्त्रियों का एकांगी चित्रण करती हैं। दरअसल.. हमें संतुलित और प्रोग्रेसिव सोच के लेखकों-निर्देशकों की जरूरत है, जो बदलते वक्त के साथ स्त्री-पुरुष के चित्रण और निरूपण में भी बदलाव लाएं। हीरो और हीरोइनों को हिंदी फिल्मों की हदबंदी से निकालने की कोशिश करें।


Friday, December 3, 2010

फिल्‍म समीक्षा : फंस गए रे ओबामा

अमेरिकी मंदी पर करारा व्यंग्य-अजय ब्रह्मात्‍मज

बेहतरीन फिल्में सतह पर मजा देती हैं और अगर गहरे उतरें तो ज्यादा मजा देती हैं। फंस गए रे ओबामा देखते हुए आप सतह पर सहज ही हंस सकते हैं, लेकिन गहरे उतरे तो इसके व्यंग्य को भी समझ कर ज्यादा हंस सकते हैं। इसमें अमेरिका और ओबामा का मजाक नहीं उड़ाया गया है। वास्तव में दोनों रूपक हैं, जिनके माध्यम से मंदी की मार का विश्वव्यापी असर दिखाया गया है।

अमेरिकी ओम शास्त्री से लेकर देसी भाई साहब तक इस मंदी से दुखी और परेशान हैं। सुभाष कपूर ने सीमित बजट में उपलब्ध कलाकारों के सहयोग से अमेरिकी सब्जबाग पर करारा व्यंग्य किया है। अगर आप समझ सकें तो ठीक वर्ना हंसिए कि भाई साहब के पास थ्रेटनिंग कॉल के भी पैसे नहीं हैं।

सच कहते हैं कि कहानियां तो हमारे आसपास बिखरी पड़ी हैं। बारीक नजर और स्वस्थ दिमाग हो तो कई फिल्में लिखी जा सकती हैं। प्रेरणा और शूटिंग के लिए विदेश जाने की जरूरत नहीं है। महंगे स्टार, आलीशान सेट और नयनाभिरामी लोकेशन नहीं जुटा सके तो क्या.. अगर आपके पास एक मारक कहानी है तो वह अपनी गरीबी में भी दिल को भेदती हैं। क्या सुभाष कपूर को ज्यादा बजट मिलता और कथित स्टार मिल जाते तो फंस गए रे ओबामा का मनोरंजन स्तर बढ़ जाता? इसका जवाब सुभाष कपूर दे सकते हैं। दर्शक के तौर पर हमें फंस गए रे ओबामा अपनी सादगी, गरीबी और सीमा में ही तीक्ष्ण मनोरंजन दे रही है।

सिंपल सी कहानी है। आप्रवासी ओम शास्त्री गण कृत्वा, घृतम पीवेत की आधुनिक अमेरिकी कंज्यूमर जीवन शैली के आदी हो चुके हैं। मंदी की मार में अचानक सब बिखरता है तो उन्हें अपनी पैतृक संपत्ति का खयाल आता है। वे भारत पहुंचते हैं। यहां मंदी के मारे बेचारे छोटे अपराधी उन्हें मोटा मुर्गा समझ कर उठा लेते हैं। बाद में पता चलता है ओम शास्त्री की अंटी में तो धेला भी नहीं है। यहीं से मजेदार चक्कर शुरू होता है और हम एक-एक कर दूसरे अपराधियों से मिलते जाते हैं। हर अगला अपराधी पहले से ज्यादा शातिर और चालाक है, लेकिन उन सभी से अधिक स्मार्ट निकलते हैं ओम शास्त्री। वे खुद पर अपराधियों के ही दांव चलते हैं और अपना उल्लू सीधा करते जाते हैं।

फंस गए रे ओबामा उत्तर भारत के अपराध जगत के स्ट्रक्चर में नेताओं की मिलीभगत को भी जाहिर कर देती है। यह कोरी कल्पना नहीं है। यही वास्तविकता है। सुभाष कपूर बधाई के पात्र हैं कि वे अर्थहीन हो रही कामेडी के इस दौर में नोकदार बात कहने में सफल रहे। इसमें निश्चित ही उनके लेखन की मूल भूमिका है। उनके किरदारों को संजय मिश्र, रजत कपूर, मनु ऋषि, अमोल गुप्ते, सुमित निझावन और नेहा धूपिया ने अच्छी तरह से निभाया है। संजय मिश्र, मनु ऋषि और रजत कपूर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। तीनों ने अपने किरदारों को अभिनय से अतिरिक्त आयाम दिया है।

खयाल ही नहीं आया कि फिल्म में गाने नहीं हैं।

**** चार स्टार


फिल्‍म समीक्षा : खेलें हम जी जान से

इतिहास का रोचक और जरूरी पाठ-अजय ब्रह्मात्‍मज

आजादी की लड़ाई के अनेक शहीद गुमनाम रहे। उनमें से एक चिटगांव विद्रोह के सूर्य सेन हैं। आशुतोष गोवारीकर ने मानिनी चटर्जी की पुस्तक डू एंड डाय के आधार पर उनके जीवन प्रसंगों क ो पिरोकर सूर्य सेन की गतिविधियों का कथात्मक चित्रण किया है। स्वतंत्रता संग्राम के इस अध्याय को हम ने पढ़ा ही नहीं है, इसलिए किरदार, घटनाएं और प्रसंग नए हैं। खेलें हम जी जान से जैसी फिल्मों से दर्शकों की सहभागिता एकबारगी नहीं बनती, क्योंकि सारे किरदार अपरिचित होते हैं। उनके पारस्परिक संबंधों के बारे में हम नहीं जानते। हमें यह भी नहीं मालूम रहता है कि उनका चारीत्रिक विकास किस रूप में होगा। हिंदी फिल्मों का आम दर्शक ऐसी फिल्मों के प्रति सहज नहीं रहता। खेलें हम जी जान से 1930 में सूर्य सेन के चिटगांव विद्रोह की कहानी है। उन्होंने अपने पांच साथियों और दर्जनों बच्चों के साथ इस विद्रोह की अगुवाई की थी। गांधी जी के शांति के आह्वान के एक साल पूरा होने के बाद उन्होंने हिंसात्मक क्रांति का सूत्रपात किया था। सुनियोजित योजना से अपने सीमित साधनों में ही चिटगांव में अंग्रेजों की व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया था। इस विद्रोह में किशोरों के साथ महिलाओं ने भी हिस्सा लिया था। चिटगांव विद्रोह सूर्य सेन और उनके साथियों की सूझ-बूझ, साहस और स्वतंत्रता की अभिलाषा का प्रतीक है। राष्ट्रीय भावना की लहर में पढ़ने-लिखने की उम्र के किशोरों ने प्राणोत्सर्ग किया था। खेलें हम जी जान से इतिहास का रोचक और जरूरी पाठ है।

आशुतोष गोवारीकर सूर्य सेन और उनके साथियों के चिटगांव विद्रोह की सही झलक देते हैं। कला निर्देशक नितिन चंद्रकांत देसाई और कॉस्ट्यूम डिजायनर न ीता लुल्ला से उन्हें अपेक्षित सहयोग मिला है। फिल्म का परिवेश वास्तविक लगता है। पीरियड गढ़ने में आशुतोष गोवारीकर सफल रहे हैं। अस्सी साल पहले के उस परिवेश भी भाषा तय करने में उनसे थोड़ी चूक हुई है। संवादों की भाषायी विविधता अखरती है और कलाकारों द्वारा शब्दों का गलत उच्चारण कानों में चुभता है। हिंदी से अपरिचित या अल्प परिचित दर्शकों का ध्यान इस पर न जाए, लेकिन हिंदी दर्शक को कलाकारों की यह लापरवाही बुरी लगती है। खास कर दीपिका पादुकोण को इस तरफ अतिरिक्त ध्यान देना चाहिए। वह खतरा बोलती हैं तो कतरा सुनाई पड़ता है।

खेलें हम जी जान से में सिकंदर खेर अपनी सहजता से चकित करते हैं। फिल्म में उनकी आंखें लगातार बोलती रहती हैं। सूर्य सेन के सहयोगी बने अभिनेताओं ने अपनी भूमिकाओं को सही ढंग से निभाया है। किशोर अभिनेता नैचुरल और प्रिय लगते हैं। अपनी मासूमियत और जोश से वे किरदार और कलाकार दोनों रूपों में प्रभावित करते हैं। दीपिका पादुकोण और विषाखा सिंह सामान्य हैं। अभिषेक बच्चन ने अभिनय में संयम और सूक्ष्मता का परिचय दिया है। कुछ दृश्यों में उनमें अमिताभ बच्चन के उबलते गुस्से की अभिव्यक्ति की झलक मिलती है। यह नकल नहीं, निखार है। आशुतोष गोवारीकर ने अपने अभिनेताओं को अधिक नाटकीय नहीं होने दिया है।

फिल्म के गीत भाव और अर्थ से पूर्ण हैं, लेकिन वे फिल्म की लंबाई बढ़ाते हैं। ऐसी फिल्म में गीत-संगीत के उपयोग में सावधानी आवश्यक है। लगातार सुने जाने के बावजूद वंदे मातरम का उदगार हमारी चेतना को झंकृत करता है। आशुतोष गोवारीकर ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक अनपढ़े अध्याय को पर्दे पर उतारने की कोशिश की है। खेलें हम जी जान से चालू मनोरंजन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

**** चार स्टार


नहीं-नहीं आलिया बहुत क्लियर है straight फॉरवर्ड -सोनाली सिंह

सोनाली सिंह ने ब्रेक के बाद की आलिया के संदर्भ में यह टिप्‍पणी दी है।

प्रेम गली अति साकरी जिसमे समाये न दोय" वाली कहावत पुरानी हो चुकी है.आजकल के प्रेम की गलियां बहुत फिसलन भरी है जिन पर बहुत संभल - संभल कर कदम बढ़ाने पढ़ते है अन्यथा आपका हाल गुलाटी की बुआ जैसा हो सकता है.फिल्म का सबसे खुबसूरत पक्ष बेइंतहा , बेशर्त प्यार करने वाला गुलाटी और बेहद restless n confused character आलिया है.नहीं-नहीं आलिया बहुत क्लियर है straight फॉरवर्ड .इतनी साफ दिल की लड़कियां भला मिलती है आजकल ?
फिल्म देखने मेरे साथ गए दोस्तों को आलिया confused लगी थी पर मुझे नहीं.......मैं आलिया की बैचेनी महसूस कर सकती थी.यह बैचेनी कुछ कर पाने की,कुछ न कर पाने की, किन्ही अर्थों में मैडम बावेरी की बैचेनी से कम नहीं थी.हममे से कोई भी परफेक्ट नहीं है.किसी के पास परफेक्ट लाइफ नहीं.हर कोई परफेक्ट लाइफ पाना चाहता है....किसी के पास प्यार है तो करियर नहीं. अगर करियर है तो प्यार नहीं.
"जिंदगी एक तलाश है और हर किसी को अपनी-अपनी मंजिलों की तलाश है."बात सिर्फ इतनी है की जिंदगी अब बहुत सी मंजिलों की तलाश हो गयी है.एक मंजिल तक पहुचते है तो दूसरी मंजिल पीछे छूट जाती है.सारी मंजिलों को समेत ले अपने साये में ,वह हौसला अब कहाँ..................
चलिए point पर आते है आलिया....जिसे पिता का प्यार नहीं मिला पर दूसरी तमाम कमियों को गुलाटी के प्यार ने भर दिया.जो २० साल की उम्र में अपनी verginity खो देने का दावा करती है तो क्या बुरा करती है .दूसरी तरफ गुलाटी की बहन अपनी शादी और शादी के बाद होने वाले बच्चों के सपनों में खोयी है .बात सिर्फ इतनी है जिंदगी भरपुर जिओ अपने अंदाज़ से.जो करना चाहते हो करो बस रिग्रेट मत करो.......खैर हमारी आलिया तो इतनी crystal clear है की रिग्रेट करने का कोई चांस ही नहीं..
अब भाई प्यार तो हो गया आ गयी करियर की बात .वह भी तो बनाना है.लड़की अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी, अपने लिए एक space चाहती थी , क्या बुराई है? बुरा हो गुलाटी महाराज का जो थोड़े दिनों के लिए भी उसे अकेला नहीं होने देते.....यही आलिया की खीज का कारण बन जाता है.she is commited .her life is one man show. then whats the hell gulati doing in Australia??? यह बात तो आप भी मानते होंगे जब तक कोई चीज़ आप कुछ दिनों के लिए खो नहीं देते तब तक अपनी जिंदगी में उसकी असली अहमियत नहीं जान सकते? यही आलिया के साथ हुआ .जब देखा माँ को बस खोने ही वाली है वापस अपने सपनों को छोड़कर आ गयी.दिखा सकता है कोई इतना साहस .हर किसी को पता है की माँ थोड़े दिनों के लिए ही नाराज़ होती फिर मान जाती पर यह आलिया की संवेदनशीलता थी की वह माँ को अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी.उसे पता था की पिता के छोड़ने के बाद उसके इस फैसले से माँ किस कदर अकेलेपन से टूट सकती थी.माँ को टूटने से बचने के लिए उसने अपने सपनों ko टूटने देना बेहतर समझा.
एक जिंदगी में, एक दिन में आप तमाम तरह की बातें सोचते है , उनपर आप अमल करते है ,भले आपका पसंदीदा रंग सफ़ेद है,अगर हरे रंग की ड्रेस पर आपका दिल आ जाता है, उसे खरीद लेते है.पहन कर इतराते है.इसका मतलब यह नहीं की आप confused है .यह दिखाता है की आप जिंदगी को कितना जीते है !!!! अगर आलिया मास कॉम पढने जाती है और एक्टिंग का ऑफर मिल जाता है .क्या बुराई है ? आखिर पढने के बाद भी तो यही करना है तो अभी क्यों नहीं? जिंदगी इतनी complicated है थोड़े बहुत confusions चलते है.थोड़ी- बहुत गलतियाँ चलती है .सबसे बड़ी बात आप अपनी गलतियों से सीख लेकर उन्हें सुधार लेते हो और हमारी आलिया भी वही करती है....
भला हो , गुलाटी का जो finally आलिया को अकेला छोड़ देता है,यही वक़्त है जब आलिया को महसूस करने का समय मिलता है की उसे जिंदगी में क्या चाहिए ? उसकी असली ख़ुशी कहाँ है ?वह लौट आती है वापस अपने गुलाटी के पास जो unconditionaly उससे प्यार करता है.
कहानी का plus point है गुलाटी , सरस प्रेम का स्रोत , ऐसे लोग कहाँ मिलते है आजकल? आलिया भाग्यशाली थी.कही न कही या कभी न कभी प्रेम एकतरफा जरूर होता है.अगर एक बिगाड़ता है तो दूसरा संभलता है.overall love completes each -other .

Thursday, December 2, 2010

अनुराग कश्यप की प्रोडक्शन नंबर 7

-अजय ब्रह्मात्‍मज

सत्या, कौन और शूल में मनोज बाजपेयी और अनुराग के बीच अभिनेता और लेखक का संबंध रहा। शूल के बाद दोनों साथ काम नहीं कर सके, पर दोनों ही अपनी खास पहचान बनाने में कामयाब रहे। ग्यारह सालों के बाद दोनों फिर से साथ आ रहे हैं। इस बार अनुराग लेखक के साथ निर्देशक भी हैं।

इस संबंध में उत्साहित मनोज कहते हैं, 'संयोग रहा कि हम शूल के बाद एक साथ काम नहीं कर सके। अनुराग की देव डी और गुलाल में खुद के न होने का मुझे अफसोस है। कोई बात नहीं, अनुराग को अपनी नई फिल्म के लिए मैं उपयुक्त लगा। मुझे खुशी है कि उनके निर्देशन में मुझे अभिनय करने का मौका मिला है।'

इधर अनुराग भी अपनी नई फिल्म को लेकर काफी उत्साहित हैं। इस फिल्म का अभी नामकरण नहीं हुआ है। अनुराग बताते हैं, 'मेकिंग के दौरान ही कोई नाम सूझ जाएगा। सुविधा के लिए इसे आप मेरी 'प्रोडक्शन नंबर- 7' कह सकते हैं।' उत्साह की खास वजह पूछने पर अनुराग के स्वर में खुशी सुनाई पड़ती है, 'मैं अपनी जड़ों की तरफ लौट रहा हूं। अपनी जन्मभूमि में पहली बार फिल्म शूट कर रहा हूं। बनारस के आसपास ओबरा और अनपरा में मेरा बचपन गुजरा है। फिर से वहां अपने काम के साथ लौटने में रोमांचित महसूस कर रहा हूं। यह मेरी अभी तक की सबसे महंगी फिल्म है।'

तीन पीढि़यों के खूनी संघर्ष पर आधारित यह थ्रिलर फिल्म है। बदले की इस कहानी का एक किरदार शहर भी है। शहर बदलने के साथ फिल्म के किरदारों का प्रतिशोध किस तरह बदला? इसपर केंन्द्रित होगी अनुराग की फिल्म। अनुराग ने इस फिल्म में मनोज बाजपेयी के साथ जयदीप अहलावत, नवाजुद्दीन, ऋचा चड्ढा, हुमा कुरैशी, रीमा सेन, अनुरीता झा, विनीत सिंह, विपिन शर्मा, पियूष मिश्रा को मुख्य भूमिकाएं दी हैं। इसके साथ ही वे फिल्म में स्थानीय प्रतिभाओं का भी उपयोग करेंगे।

स्थानीय संस्कृति में रची-बसी अनुराग की 'प्रोडक्शन नंबर-7' के संगीत में लोकगीतों की छटा होगी। फिल्म का संगीत स्नेहा खानविलकर ने तैयार किया है। चलते-चलते अनुराग कहते हैं, 'मुझे उम्मीद है कि अपनी जन्मभूमि से मुझे पूरा सहयोग मिलेगा। अगले चार महीनों तक मेरी यूनिट का डेरा बनारस के आसपास ही रहेगा। यों तो हर फिल्म महत्वाकाक्षी होती है, लेकिन 'प्रोडक्शन नंबर-7' से इमोशनल लगाव है। यह मेरी तरह मेरी जन्मभूमि में ही आकार लेगी।'