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Friday, November 26, 2010

फिल्‍म समीक्षा : ब्रेक के बाद

थीम और परफार्मेस में दोहराव

ब्रेक के बाद: थीम और परफार्मेस  में दोहराव-अजय ब्रह्मात्‍मज

आलिया और अभय बचपन के दोस्त हैं। साथ-साथ हिंदी सिनेमा देखते हुए बड़े हुए हैं। मिस्टर इंडिया (1987) और कुछ कुछ होता है (1998) उनकी प्रिय फिल्में हैं। यह हिंदी फिल्मों में ही हो सकता है कि ग्यारह साल के अंतराल में आई फिल्में एक साथ बचपन में देखी जाएं और वह भी थिएटर में। यह निर्देशक दानिश असलम की कल्पना है, जिस पर निर्माता कुणाल कोहली ने मोहर लगाई है।

इस साल हम दो फिल्में लगभग इसी विषय पर देख चुके हैं। दोनों ही फिल्में बुरी थीं, फिर भी एक चली और दूसरी फ्लॉप रही। पिछले साल इसी विषय पर हम लोगों ने लव आज कल भी देखी थी। इन सभी फिल्मों की हीरोइनें प्रेम और शादी को अपने भविष्य की अड़चन मान बे्रक लेने या अलग होने को फैसला लेती हैं। उनकी निजी पहचान की यह कोशिश अच्छी लगती है, लेकिन वे हमेशा दुविधा में रहती हैं। प्रेमी और परिवार का ऐसा दबाव बना रहता है कि उन्हें अपना फैसला गलत लगने लगता है। आखिरकार वे अपने प्रेमी के पास लौट आती हैं। उन्हें प्रेम जरूरी लगने लगता है और शादी भी करनी पड़ती है। फिर सारे सपने काफुर हो जाते हैं। ब्रेक के बाद इसी थीम पर चलती है।

कहानी में नयापन नहीं है। चूंकि दीपिका पादुकोण और इमरान खान को इसी विषय की फिल्मों में हम देख चुके हैं, इसलिए उनके परफार्मेस में दोहराव दिखता है। वैसे भी इमरान खान बतौर एक्टर अपनी पहली फिल्म से आगे नहीं निकल पा रहे हैं। उन्हें अपनी लैंग्वेज के साथ बॉडी लैंग्वेज पर भी काम करना चाहिए। दीपिका पादुकोण में आकर्षण है और वह मेहनत भी करती हैं, लेकिन हिंदी संवादों के उच्चारण में वह पिछड़ जाती हैं। साफ लगता है कि वह शब्दों का अर्थ समझे बगैर उन्हें बोल रही है। उन्हें मालूम ही नहीं कि वाक्य में कहां किस शब्द पर जोर डालना है या ठहरना है। नतीजतन उनकी मेहनत अंतिम प्रभाव में असफल रहती है।

इस फिल्म में पारंपरिक बुआ का अलग किस्म का चित्रण है। वह अपने हीरो भतीजे से उसकी प्रेमिकाओं के बारे में हंसी-मजाक कर लेती हैं और तीन शादियां करने के बाद तीन तलाक भी ले चुकी हैं। आखिर दानिश ऐसी बुआ के मार्फत क्या बताना या कहना चाहते हैं? फिल्म की कहानी किसी क्रम में आगे नहीं बढ़ती। लेखक-निर्देशक की मर्जी से पात्र भारत और विदेश आते-जाते रहते हैं। फिल्म में मॉरीशस को आस्ट्रेलिया दिखाने की कोशिश भी बचकानी है।

* एक स्टार


तैयार हो रही है एडल्ट शो की जमीन

-अजय ब्रह्मात्‍मज

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फैसले के मुताबिक 17 नवंबर से बिग बॉस और राखी का फैसला टीवी शो अपने एडल्ट कंटेंट की वजह से रात के ग्यारह बजे के बाद ही प्रसारित होने लगे। स्वाभाविक रूप से इस सरकारी फैसले पर अलग-अलग किस्म की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। एक समूह पूछ रहा है कि क्यों बिग बॉस और राखी का फैसला ही प्राइम टाइम से बाहर किए गए, जबकि कई सीरियलों और दूसरे टीवी शो में आपत्तिजनक एडल्ट कंटेंट होते हैं। अब तो टीवी न्यूज चैनल प्राइम टाइम पर सेक्स सर्वेक्षण तक पेश करते हैं और विस्तार से सेक्स की बदलती धारणाओं और व्यवहार का विश्लेषण करते हैं। ऐसी स्थिति में दो विशेष कार्यक्रमों को चुनकर रात ग्यारह के बाद के स्लॉट में डाल देने को गलत फैसला माना जा रहा है। वहीं दूसरा समूह सरकारी फैसले का समर्थन करते हुए बाकी सीरियल और शो पर भी शिकंजा करने की वकालत कर रहा है। इस समूह के मुताबिक, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ लोग अश्लीलता परोसते हैं और दर्शकों को उत्तेजित कर अपने शो की टीआरपी बढ़ाते हैं। प्राइम टाइम पर आ रहे इन कार्यक्रमों के दौरान बच्चे जागे रहते हैं, इसलिए उन्हें रात के ग्यारह के बाद धकेल कर सरकार ने सही काम किया है।

कुछ महीनों और सालों के गैप के बाद किसी कार्यक्रम पर विवाद होने के पश्चात ऐसी बहसें आरंभ हो जाती हैं। दो पक्ष बन जाते हैं। तर्क-वितर्क का सिलसिला शुरू हो जाता है। दरअसल.., पिछले कुछ सालों में टीवी और फिल्म के कंटेंट में तेजी से बदलाव आया है। यह बदलाव किसी घोषणा और एजेंडा के तहत नहीं आया है। दर्शकों का एक्सपोजर बढ़ा है और अब कई परिवार में पुरानी वर्जनाएं नहीं रह गई हैं। अब परिवार के वयस्क सदस्य एक साथ बैठकर भी एडल्ट कंटेंट की फिल्में और टीवी शो देखते हैं। समाजशास्त्री तय करेंगे कि यह सामाजिक विकास है या पतन? सच्चाई यह है कि दर्शक पहले से अधिक उदार और खुली सोच के हो गए हैं।

निश्चित ही टीवी चैनलों के प्राइम टाइम पर बच्चे जागे रहते हैं और किशोर मस्तिष्क पर एडल्ट कंटेंट का बुरा असर हो सकता है, लेकिन इस संदर्भ में विचारणीय है कि आज भी परिवार में रिमोट किसके हाथ में रहता है। अब भी परिवार के मुखिया, गार्जियन या माता-पिता ही रिमोट के बटन दबाते हैं। बच्चों के हाथ में रिमोट दिया भी जाता है तो उनके लिए कार्टून शो या चिल्ड्रेन प्रोग्राम देखने की छूट मिलती है। बच्चे बिग बॉस या राखी का फैसला परिवार के वयस्क सदस्यों के साथ ही देखते हैं। वास्तव में भारतीय समाज में वयस्क दर्शकों का बड़ा समूह ऐसे कार्यक्रमों में रुचि लेता है। वह अपनी उत्तेजना यहीं से हासिल करता है। वयस्कों की संगत में ही बच्चे एडल्ट कंटेंट से वाकिफ होते हैं। अधिकांश घर-परिवारों में टीवी दर्शन का कोई अनुशासन नहीं होता। न ही परिवार के सभी सदस्यों की रुचि का खयाल रखते हुए शो और सीरियल देखने का समय तय किया जाता है। चैनल सर्फिंग करते-करते जहां निगाह अटक जाती है, वही शो चलने लगता है। बताने की जरूरत नहीं कि जिसके हाथ में रिमोट है, उसकी निगाहें कहां अटकती हैं।

हम भले ही खुश हो लें कि रात के ग्यारह के बाद बिग बॉस और राखी का फैसला प्रसारित होने से हमारे बच्चे एडल्ट प्रदूषण से बच जाएंगे, लेकिन यकीन मानिए कि इससे प्राइम टाइम का विस्तार होगा। चूंकि ग्यारह के बाद भी इन कार्यक्रमों को दर्शक मिलेंगे, इसलिए ग्यारह के बाद का समय भी प्राइम टाइम हो जाएगा। सच का सामना और कहीं तो होगा भी ग्यारह के बाद प्रसारित होते थे, फिर भी उनकी टीआरपी अच्छी रही। ग्यारह के बाद बिग बॉस और राखी का फैसला के प्रसारण से वह जमीन तैयार हो रही है, जिस पर एडल्ट कार्यक्रमों के बीज डाले जाएंगे। उसे सुरक्षित समय बताकर पोर्नो और एडल्ट फिल्म, चैनल और शो का प्रसारण आरंभ हो सकता है। देश में ऐसे कार्यक्रमों के दर्शक तैयार बैठे हैं। वैसे इसमें बुराई भी नहीं है। पोर्नो और प्लेब्वॉय किस्म के शो के लिए मौजूद दर्शकों की चाहत जरूरत और बाजार को देखते हुए समाजशास्त्रियों को ऐसा रास्ता खोजना चाहिए कि कैसे एडल्ट शो प्रसारित किए जा सकें। उन्हें ग्यारह के बाद ठेल कर या टीवी से निकाल कर काम नहीं चल सकता। अब उस नजरिए की आवश्यकता है, जो ऐसे कार्यक्रमों के दर्शकों की जरूरत समझ कर ठोस कदम उठा सके।


Thursday, November 25, 2010

जरूरी है चिटगांव विद्रोह के सूर्य सेन को जानना: आशुतोष गोवारीकर

जरूरी है चिटगांव विद्रोह के सूर्य सेन को जानना: आशुतोष गोवारीकरआशुतोष गोवारीकर की हर नई फिल्म के प्रति दर्शकों और समीक्षकों की जिज्ञासाएं और आशंकाएं कुछ ज्यादा रहती हैं। इसकी एक बड़ी वजह है कि लगान के बाद वे एक जिम्मेदार निर्देशकके रूप में सामने आए हैं। उनकी फिल्में हिंदी फिल्मों के पारंपरिक ढांचे में होते हुए भी चालू और मसालेदार किस्म की नहीं होतीं। उनकी हर फिल्म एक नए अनुभव के साथ सीख भी देती है। खेलें हम जी जान से मानिनी चटर्जी की पुस्तक डू एंड डाय पर आधारित चिटगांव विद्रोह पर केंद्रित क्रांतिकारी सूर्य सेन और उनकेसाथियों की कहानी है..

स्वदेस से लेकर खेलें हम जी जान सेतक की बात करूं तो आप की फिल्में रिलीज के पहले अलग किस्म की जिज्ञासाएं बढ़ाती हैं। कुछ शंकाएं भी जाहिर होती हैं। आप इन जिज्ञासाओं और शंकाओं को किस रूप में लेते हैं।

इसे मैं दर्शकों और समीक्षकों की रुचि और चिंता के रूप में लेता हूं। हम सभी प्रचलित धारणाओं से ही अपनी राय बनाते हैं। जब जोधा अकबर में मैंने रितिक रोशन को चुना तो पहली प्रतिक्रिया यही मिली कि रितिक अकबर का रोल कैसे कर सकते हैं? यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। ह्वाट्स योर राशि? के समय मेरी दूसरी फिल्मों के आलोचक ही कहने लगे कि रोमांटिक कामेडी की क्या जरूरत है? आशुतोष को तो अपनी किस्म की सोशल फिल्में करनी चाहिए। कैसी बनेगी यह फिल्म? पीरियड फिल्म की घोषणा करता हूं तो प्रतिक्रिया आती है कि कुछ और क्यों नहीं करते? फिर से पीरियड बना रहे हैं। अब आदत हो गई है कि कुछ भी करूं लोग अनुमान, आशंका और जिज्ञासा आरंभ कर देते हैं।

आदत होना अलग बात है, लेकिन आहत भी तो होते होंगे?

ना ना.. तारीफ तो ठीक है, लेकिन मैं शंका और आलोचना पर पूरा गौर करता हूं। उन बिंदुओं को उठा लेता हूं। उन्हें सकारात्मक और संरचनात्मक तरीके से लेता हूं। फिल्म बनाते समय उन बिंदुओं को ध्यान में रखता हूं। मैं खुले दिल से तारीफऔर आलोचना सुनता और पढ़ता हूं। उनसे सीखता हूं।

एक प्रचलित सोच और धारणा है कि आशुतोष गोवारीकर खुद को बहुत गंभीर फिल्ममेकर मानते हैं। इस दबाव में वे गंभीर फिल्में बनाते हैं। दर्शकों को सिखाने-समझाने का दायित्व ओढ़ लिया है आपने?

हमारी रोजमर्रा जिंदगी में कुछ थीम और विषय ऐसे हैं, जिन से रोजाना हम दो-चार होते हैं, लेकिन हमें उनकी गंभीरता का एहसास नहीं होता। कभी दोस्तों के साथ बातें करते,अखबार पढ़ते या टीवी देखते समय अचानक एहसास होता है। वैसे ही फिल्म भी एक जरिया है एहसास दिलाने का। मेरी पहली कोशिश रहती है कि दर्शकों का मनोरंजन हो, लेकिन उसके साथ एक सीख भी मिले, जो घर जाने के बाद भी याद रहे। फिल्म देखना मेला घूमने से अलग होना चाहिए। इसका आनंद सिर्फ देखते समय तक न रहे। स्वदेस और जोधा अकबर में संदेश है। ह्वाट्स योर राशि? नारी सशक्तिकरण की फिल्म थी। मैंने जिम्मेदारी ओढ़ी नहीं है। मैं अंदर से ऐसा महसूस करता हूं। खेलें हम जी जान से के सूर्य सेन के बारे में पढ़ने के बाद लगा कि उन पर फिल्म आनी चाहिए ताकि सभी लोग उनके बारे में जान सकें। मैं अपना एहसास दर्शकों के साथ शेयर करना चाहता हूं। फिल्म बनाने का मेरा उद्देश्य सीख देना नहीं है। मैं कहानी, कहानी में निहित भावना और उस भावना के प्रभाव पर ध्यान देता हूं। स्वदेस में एक राष्ट्रवादी अप्रोच है। हमलोग ज्यादातर निजी समस्याओं में उलझे रहते हैं। थोड़ा ठहर कर समुदाय और समाज के बारे में सोचें तो हर व्यक्ति परिवर्तन ला सकता है और हर परिवर्तन हमारे ही हित में है।

आपकी हर फिल्म में कुछ लोग एकत्रित होते हैं और फिर एक सामूहिक अभियान पर निकलते हैं। स्वदेस में भी व्यक्ति के समूह से जुड़ने या समूह को जागृत करने की बात है। इस कॉमन थीम के बारे में क्या कहेंगे?

एक अकेला आदमी बदलाव नहीं ला सकता, लेकिन वह बदलाव की भावना फैला सकता है। बदलाव सही में लाना है तो वह सामूहिक प्रयास से ही आ सकता है। अगर युवाओं को जागृत कर दिया जाए तो बदलाव लाया जा सकता है। हर पुरानी पीढ़ी अपनी नयी पीढ़ी को सब कुछ सौंपती है। क्या हम पिछली पीढ़ी से मिली समस्याओं को सुलझा पाए या हम ने उसे ज्यों के त्यों आगे बढ़ा दिया। आम तौर पर हमें सामूहिक समस्याएं किसी और की जिम्मेदारी लगती हैं और हम लापरवाह हो जाते हैं। मैं युवाओं की जागृति और सामूहिक प्रयास में यकीन करता हूं। झगड़ने से कुछ नहीं होता है। समस्या सुलझानी है तो साथ में आना होगा। लगान में तो कितनी समस्याएं थीं। ज्यादा न बताऊं तो भी खेलें हम जी जान से में 64 लोगों का एक साथ आना बड़ी क्रांतिकारी सोच है। मुझे अचंभा लगता है कि कैसे अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग एक साथ आए होंगे। ऐसा क्या हुआ.. किस मोटिवेशन से वे सभी एकत्रित हुए और अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हो गए। देश की आजादी का वह जज्बा आज नहीं है। आज हमें किसी के खिलाफ नहीं लड़ना है। आज हमें अपने सामाजिक दानवों से लड़ना है। अगर सामूहिकता या बदलाव की सोच की यह चिंगारी मेरी फिल्म से मिल सके तो मैं बहुत खुश होऊंगा।

इतिहास हमेशा विजेता लिखते हैं, लेकिन पराजितों का संघर्ष भी एक सच्चाई होती है। हमेशा सत्ता वर्ग तय करता है कि हमें इतिहास में क्या पढ़ाया जाए? इतिहास की पुस्तकों से सूर्य सेन गायब रहे। उन्हें प्रकाशित करने की आप की यह कोशिश हिंदी फिल्मों में चल रहे हंसी और हिंसा के इस दौर में कितनी सफल होगी?

लोग पूछते हैं कि क्या इस जमाने में ऐसी फिल्मों की जरूरत है? मेरी राय है कि ऐसी फिल्मों की आज ज्यादा जरूरत है। एहसास जगाना जरूरी है। ठीक है कि फुल एंटरटेनमेंट का दौर है, लेकिन क्या सभी माइंडलेस एंटरटेनमेंट में लग जाएं। एंटरटेनमेंट हो, लेकिन यह भी बताया और एहसास दिलाया जाए कि देश में ऐसे क्रांतिकारी रहे हैं। चिटगांव विद्रोह में तो ज्यादातर किशोर और युवक थे। हमें उनकी भूमिका समझनी चाहिए। समाज का विकास या आंदोलन एक रिले रेस की तरह है, जिसमें अंतिम रेखा छूने वाले की जय-जय होती है। उस रेस के पूर्व धावकों पर ध्यान नहीं जाता। हमें उन पर भी ध्यान देना चाहिए। स्वतंत्रता आंदोलन में इतनी धाराएं थीं। हमें उन धाराओं के बारे में जानना चाहिए। मैं नहीं बता सकता कि सूर्य सेन इतिहास की किताबों में क्यों नहीं हैं? हो सकता है कि विभाजन के बाद हम ने उन्हें पूर्व पाकिस्तान या बांग्लादेश के इतिहास का हिस्सा मान बैठे हों। बंगाल में भी आज के किशोर सूर्य सेन से अच्छी तरह परिचित नहीं हैं।

क्या कंज्यूमर सोसायटी में देशभक्ति या राष्ट्रवाद की सामूहिक भावना दर्शकों को प्रभावित कर पाएगी?

मेरे दिल में उम्मीदें जिंदा हैं। मुझे लगता है कि ऐसी फिल्मों की जरूरत है और यह फिल्म चलेगी। देशभक्ति की भावना तो जन्मजात होती है, लेकिन राष्ट्रवाद की भावना जगाना जरूरी है। अपने देश के लिए जान दे देना देशभक्ति है, लेकिन देश की तरक्की के लिए जान देना राष्ट्रवाद है। आज हमें इसकी जरूरत है। फिल्म में यह भावना अपनी क्षमता के साथ व्यक्त करने पर मुझे आंतरिक शांति मिलती है। मुझे सुकून मिलता है।

इस फिल्म के दरम्यान सूर्य सेन की जिंदगी और विचार को आपने करीब से समझा होगा। उनका क्या योगदान है?

मेरी कोशिश बस इतनी है कि सबसे पहले हम उनके बारे में जानें। हम चाफेकर बंधु, भगत सिंह, सावरकर, खुदीराम बोस समेत सभी प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी के बारे में जानते हैं, लेकिन सूर्य सेन के बारे में कुछ नहीं जानते। सूर्य सेन ने एक बड़े समूह के साथ नियोजित कोशिश की। यह बहुत बड़ा मोटिवेशन है। 13-14 साल के बच्चे उस विद्रोह में शामिल थे। हमारे लिए जानना जरूरी है कि अस्सी साल पहले सूर्य सेन ने कैसे यह संभव किया? उन्होंने देश के लिए निस्वार्थ कार्य किया। स्कूल टीचर थे, इसलिए किशोरों के साथ उनका अधिक जुड़ाव था। उनमें एक बौखलाहट थी कि कुछ करना है। कुछ ऐसा करना है, जिसका असर पूरे देश में हो और ब्रिटिश सरकार विद्रोह की भावना के प्रभाव को समझे। उनकी पैशन फॉर कंट्री गजब की है।

सूर्य सेन के चिटगांव विद्रोह का संदर्भ क्या है?

1929 में गांधी जी ने कहा था कि कोई हिंसा के मार्ग पर नहीं चलेगा। हमें एक साल का मौका दो। हम आजादी लाएंगे। 1930 की जनवरी में सूर्य सेन ने कहा कि एक साल बीत चुका है। आजादी हमें नहीं मिली है। अब मेरा एक प्लान है, जो मैं करना चाहता हूं। हिंसा या अहिंसा..आजादी के उद्देश्य से हर मार्ग सच्चा है। चिटगांव विद्रोह से भगत सिंह भी प्रभावित हुए। सूर्य सेन के पहले खुदीराम बोस और जतिन दास हरी थे। सूर्य सेन के योगदान को सलाम नहीं किया गया।

इस फिल्म की शूटिंग सावंतवाड़ी में करने के पीछे जमीनी सुविधाएं भर थीं या कोई और वजह थी?

हम चिटगांव गए। वहा जाकर तो देखा तो रियल लोकेशन उजड़ चुके हैं। घटनाओं के मुख्य पांच स्थानों पर निशान नहीं बचे हैं। हमने बंगाल में कोलकाता के आसपास और शांति निकेतन भी देखा.. वे शूटिंग के लिए सही नहीं लगे। 1930 की फिल्म बनाते समय खास खयाल रखना था। महाराष्ट्र में मुझे सावंतवाड़ी में वैसा ही परिवेश मिला। यहां का लैंडस्कोप मिलता-जुलता है। चिटगांव बंगाल की खाड़ी के समीप है और सावंतवाड़ी अरब सागर के निकट है। यहां का माहौल शूटिंग के लिए सही था।

अभिषेक बच्चन और दीपिका पादुकोण के चुनाव के बारे में क्या कहेंगे?

किताब पढ़ते समय सूर्य सेन के लिए पहला चेहरा अभिषेक बच्चन का ही ध्यान में आया। उनके साथ काफी समय से काम करने की इच्छा थी। पहले मेरे पास स्क्रिप्ट नहीं थी कोई। मैं स्टार के बाद स्क्रिप्ट के बारे में नहीं सोचता। जो सोचते और करते हैं, वे गलत नहीं है। उसके लिए अलग प्रतिभा चाहिए। चलो स्टार आ गया है, अब स्क्रिप्ट तैयार करो। अभिषेक बच्चन को भी स्क्रिप्ट पसंद आई। कल्पना दत्ता का चेहरा दीपिका से काफी मिलता है। किताब की लेखिका मानिनी चटर्जी का भी यही मानना है।

क्रांतिकारी फिल्म में गानों की कल्पना करना और उसे पिरोना तो चुनौती रही होगी। क्या जरूरी थे गाने? अब तो इंटरवल फार्मेट भी खत्म करने की बात चल रही है।

मैं बगैर गानों के फिल्म नहीं बना सकता। गाने मेरे लिए जरूरी हैं। कभी-कभी गाने फिल्म के दृश्यों के प्रभाव को बढ़ा देते हैं। गीत में जिस प्रभाव के साथ कथ्य को रखा जा सकता है, वह संवादों में संभव नहीं है। देशभक्ति और दोस्ती की भावना जाहिर करने के लिए मुझे संगीत की जरूरत थी। इंटरवल वाली फिल्मों के साथ मैं बड़ा हुआ हूं। मेरी फिल्मों में तो रहेगा इंटरवल। जब तक मेरा मोहभंग न हो जाए, तब तक इंटरवल चलता रहेगा।


Friday, November 19, 2010

फिल्‍म समीक्षा : गुजारिश

सुंदर मनोभावों का भव्य चित्रण

-अजय ब्रह्मात्‍मज
सुंदर मनोभावों  का भव्य चित्रण गुजारिश

पहले फ्रेम से आखिरी फ्रेम तक गुजारिश किसी जादू की तरह जारी रहता है। फिल्म ऐसा बांधती है कि हम अपलक पर्दे पर चल रही घटनाओं को देखते रहते हैं। इंटरवल भी अनायास लगता है। यह संजय लीला भंसाली की अनोखी रंगीन सपनीली दुनिया है, जिसका वास्तविक जगत से कोई खास रिश्ता नहीं है। फिल्म की कहानी आजाद भारत की है, क्योंकि संविधान की बातें चल रही हैं। पीरियड कौन सा है? बता पाना मुश्किल होगा। फोन देखकर सातवें-आठवें दशक का एहसास होता है, लेकिन रेडियो जिदंगी जैसा एफएम रेडियो और सैटेलाइट न्यूज चैनल हैं। मोबाइल फोन नहीं है। संजय लीला भंसाली इरादतन अपनी फिल्मों को काल और समय से परे रखते हैं। गुजारिश में मनोभावनाओं के साथ एक विचार है कि क्या पीडि़त व्यक्ति को इच्छा मृत्यु का अधिकार मिलना चाहिए? गुजारिश एक अद्भुत प्रेमकहानी है, जिसे इथेन और सोफिया ने साकार किया है। यह शारीरिक और मांसल प्रेम नहीं है। हम सभी जानते हैं कि इथेन को गर्दन के नीचे लकवा (क्वाड्रो प्लेजिया) मार गया है। उसे तो यह भी एहसास नहीं होता कि उसने कब मल-मूत्र त्यागा। एक दुर्घटना के बाद दो सालों के अस्पतालों के चक्कर के बाद इथेन बिस्तर और ह्वील चेयर तक सीमित अपनी जिंदगी को स्वीकार कर लेता है। वह जिंदगी को दिल से जीने की वकालत करता है। वह अगले बारह सालों तक अपना उल्लास बनाए रखता है, लेकिन लाचार जिंदगी उसे इस कदर तोड़ती है कि आखिरकार वह इच्छा मृत्यु की मांग करता है। असाध्य रोगों और लाचारगी से मुक्ति का अंतिम उपाय मौत हो सकती है, लेकिन देश में इच्छा मृत्यु की इजाजत नहीं दी जा सकती। अपना जीवन इथेन को समर्पित कर चुकी सोफिया आखिरकार उसके लिए वरदान साबित होती है।

निर्भरता और समर्पण से प्रेम पैदा होता है। जिंदादिल इथेन पूरी तरह से सोफिया पर निर्भर है और सोफिया को अपने दुखी दांपत्य से निकलने का एक मकसद मिल गया है। दोनों का आत्मिकप्रेम रूहानी है। भंसाली स्पष्ट नहीं करते कि इथेन का आखिर में क्या हुआ? लेकिन क्लाइमेक्स में इथेन के मैलोड्रामैटिक स्पीच के बाद दर्शक अनुमान लगा सकते हैं कि क्या हुआ होगा?

भंसाली इस पीढ़ी के विरल फिल्मकार हैं। वे ट्रेंड, फैशन, प्रचलन आदि का पालन नहीं करते। उनके सुंदर संसार में सब कुछ सामान्य से अधिकसुंदर, बड़ा और विशाल होता है। पूरे माहौल में भव्यता नजर आती है। उनकी फिल्मों में आम जिंदगी भी पिक्चर पोस्टकार्ड की तरह चमत्कृत करती है। गुजारिश में इथेन और सोफिया के बैक ग्राउंड पर विचार करेंगे तो हमें निराशा होगी। भंसाली के किरदारों का सामाजिक आधार एक हद तक वायवीय और काल्पनिक होता है। उनके आलोचक कह सकते हैं कि भंसाली अपनी फिल्मों की खूबसूरती, भव्यता और मैलोड्रामा की दुनिया को रीयल नहीं होने देते। गुजारिश की भी यही सीमा है। एक समय के बाद जिज्ञासा होती है कि और क्या? भंसाली की फिल्में मानव स्वभाव और उसके मनोभावों का मनोगत चित्रण करती हैं। सब कुछ इतना सुंदर और परफेक्ट होता है कि हिंदी फिल्मों के सामान्य दर्शक की चेतना कांपने लगती है। यों लगता है कि कोई गरीब मेहमान किसी अमीर की बैठक में आ गया है और आलीशान सोफे के कोने पर संभल कर बैठने में फिसलकर फर्श पर आ गया है। भंसाली के सिनेमा का आभिजात्य दर्शकों को सहज नहीं रहने देता। हां, अगर दर्शक सहज हो गए और भंसाली की शैली से उनका तादात्म्य हो गया तो वे रससिक्त हुए बिना नहीं रह सकते।

गुजारिश भंसाली, सुदीप चटर्जी, सब्यसाची मुखर्जी, रितिक रोशन और ऐश्वर्या राय की फिल्म है। गोवा के लोकेशन ने फिल्म का प्रभाव बढ़ा दिया है। एक्टिंग को बॉडी लैंग्वेज से जोड़कर मैनरिज्म पर जोर देने वाले एक्टर रितिक रोशन से सीख सकते हैं कि जब आप बिस्तर पर हों और आपका शरीर लुंज पड़ा हो तो भी सिर्फ आंखों और चेहरे के हाव-भाव से कैसे किरदार को सजीव किया जा सकता है। निश्चित ही रितिक रोशन अपनी पीढ़ी के दमदार अभिनेता हैं। उनकी मेहनत सफल रही है। ऐश्वर्या राय उम्र बढ़ने के साथ निखरती जा रही हैं। कोर्ट में उनका बिफरना, क्लब में उनका नाचना और क्लाइमेक्स के पहले खुद को मिसेज मैकरहनस कहना.. इन दृश्यों में ऐश्वर्या के सौंदर्य और अभिनय का मेल याद रह जाता है। वकील बनी शरनाज पटेल भी अपनी भूमिका के साथ न्याय करती हैं। आदित्य रॉय कपूर थोड़े कमजोर रह गए।

फिल्म का संगीत का विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भंसाली ने स्वयं धुन बनाई है और नए गीतकारों के शब्द जोड़े हैं। गीतों के भाव में फिल्म के विषय की गहराई नहीं आ पाई है। भाव ज्यादा गहरे हैं, शब्द सतह पर धुन के सहारे केवल तैर पाते हैं। गहरे नहीं उतर पाते।

**** चार स्टार


लता मंगेशकर को मिले सम्मान के बहाने

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले सप्ताह बुधवार की शाम को मुंबई में एक पुरस्कार समारोह में लता मंगेशकर को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। उन्हें उनकी छोटी बहन आशा भोसले और ए आर रहमान ने सम्मानित किया। इस अवसर पर रहमान ने अपनी मां का बताया एक संस्मरण सुनाया कि उनके पिता रोज सुबह लता मंगेशकर की तस्वीर का दर्शन करने के बाद ही संगीत की रचना करते थे। उन्होंने प्रकारांतर से लता मंगेशकर की तुलना सरस्वती से की। सम्मान के पहले समारोह में आए संगीतकारों ने उनके गीत एक प्यार का नगमा है.. गाकर उन्हें भावभीनी स्वरांजलि दी। शंकर महादेवन ने गीत गाया, तो शांतनु मोइत्रा और उत्तम सिंह ने गिटार और वायलिन बजाकर संगीतपूर्ण संगत दी। दर्शक भी भावविभोर हुए। सम्मान के इस अवसर पर भी आशा भोसले ने अपनी शिकायत दर्ज की। उन्होंने कहा कि दीदी कभी मेरे गाने नहीं सुनतीं। आज भी वे देर से आई। आशा की शिकायत पर हंसते हुए लता ने पलट कर कहा कि तू हमेशा झगड़ती है, लेकिन मैं तुम्हें पहले की तरह आज भी माफ करती हूं। आशा ने तुरंत जवाब दिया कि माफ तो करना ही पड़ेगा। मां तो माफ करती ही है। इस नोकझोंक में थोड़ी देर के लिए लगा कि मामला तूल पकड़ेगा और दोनों बहनों की लड़ाई सार्वजनिक हो जाएगी, लेकिन लता जी ने बड़प्पन दिखाते हुए प्रसंग बदल दिया।

लता मंगेशकर ने कहा कि लाइफटाइम अचीवमेंट अवश्य दें, लेकिन उसके बाद आर्टिस्ट को भूल न जाएं। उसे काम दें और उसे विकास करने के नए अवसर दें। कहीं लता मंगेशकर अपने दर्द का बयान तो नहीं कर रही थीं? दशकों से हिंदी फिल्मों की गायकी में उनका एकछत्र साम्राज्य रहा। उनके सामने किसी और गायिका को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला। केवल उनकी छोटी बहन आशा भोंसले ही उनके आसपास नजर आती हैं। संगीत के गलियारे में लोग दबी आवाज में दोनों बहनों के मनमुटाव की बातें करते हैं। आज लता मंगेशकर गायकी की जिस ऊंचाई पर बैठी हैं। वहां तक पहुंचने का सपना भी नई गायिकाएं नहीं देख सकतीं। किसी में न उतनी वैरायटी है और न वे लगातार गा पा रही हैं। सुनिधि चौहान और श्रेया घोषाल के बाद किसी गायिका की पहचान नहीं बन पाई है। ऐसे माहौल में नई से नई गायिकाओं के प्रति संगीतकारों के रुझान को देखते हुए ही लता मंगेशकर ने यह बात कही होगी। कहीं न कहीं वे आज फिल्मों में न गा पाने की अपनी तकलीफ जाहिर कर रही थीं।

गौर करें, तो हिंदी फिल्मों में गायकी तेजी से बदली है। अभी संगीतकार किसी एक गायक पर निर्भर नहीं करते। यह भी देखा जा रहा है कि एक गायक फिल्म के सभी गाने नहीं गाता। गायकों को पहचान के संकट से गुजरना पड़ रहा है।

अभी पॉपुलर स्टारों के साथ गायकों का एसोसिएशन नहीं होता है। वे दिन गए, जब मुकेश का गाना सुनते ही एहसास हो जाता था कि इसे पर्दे पर राज कपूर ने ही गाया होगा। इसी प्रकार दिलीप कुमार की आवाज मोहम्मद रफी और देव आनंद की आवाज किशोर कुमार थे। अभी किसी पॉपुलर सितारे के लिए किसी खास गायक की जरूरत महसूस नहीं होती। जो गायक पॉपुलर हो जाए, उसकी आवाज सभी सितारों के लिए इस्तेमाल की जाने लगती है। उदाहरण के लिए, राहत फतेह अली खान सभी की आवाज बन चुके हैं। उन्हें किसी एक स्टार से नहीं जोड़ा जा सकता।

लता मंगेशकर या आशा भोसले की तरह आज किसी गायिका या गायक को मौका नहीं मिल सकता। अभी स्वर से ज्यादा ध्यान धुन पर रहता है और आर्केस्ट्रा इतना ज्यादा व ऊंचा होता है कि गायकों की आवाज दब जाती है। गायक भी अधिक मेहनत करते नजर नहीं आते। उनके हिंदी और उर्दू के उच्चारण में सफाई नहीं रहती। इधर अंग्रेजी बोलों का चलन बढ़ा है। गौर करें, तो सारे गायक अपनी अंग्रेजी के सही उच्चारण पर बहुत ध्यान देते हैं और हिंदी-उर्दू के प्रति बेपरवाह रहते हैं। अगर ये गायक लता मंगेशकर जैसा नाम और काम करना चाहते हैं, तो निश्चित ही उन्हें लगन बढ़ानी होगी।

लता मंगेशकर को मिले सम्मान के बहाने


Monday, November 15, 2010

मुझे आड़े-टेढ़े किरदार अच्छे लगते हैं-संजय लीला भंसाली

-अजय ब्रह्मात्‍मज

संजय लीला भंसाली की 'गुजारिश' में रहस्यात्मक आकर्षण है। फिल्म के प्रोमो लुभावने हैं और एहसास हो रहा है कि एक खूबसूरत, संवेदनशील और मार्मिक फिल्म हम देखेंगे। संजय लीला भंसाली अपनी पीढ़ी के अलहदा फिल्ममेकर हैं। विषय, कथ्य, क्राफ्ट, संरचना और प्रस्तुति में वे प्रचलित ट्रेंड का खयाल नहीं रखते। संजय हिंदी फिल्मों की उस परंपरा के निर्देशक हैं, जिनकी फिल्में डायरेक्टर के सिग्नेचर से पहचानी जाती हैं।

- आप की फिल्मों को लेकर एक रहस्य सा बना रहता है। फिल्म के ट्रेलर और प्रोमो से स्पष्ट नहीं है कि हम रितिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन को किस रूप और अंदाज में देखने जा रहे हैं। क्या आप 'गुजारिश' को बेहतर तरीके से समझने के सूत्र और मंत्र देंगे?

0 'गुजारिश' मेरी आत्मा से निकली फिल्म है। मेरी फिल्मों में नाप-तौल नहीं होता। मैं फिल्म के बारे में सोचते समय उसके बाक्स आफिस वैल्यू पर ध्यान नहीं देता। यह भी नहीं सोचता कि समीक्षक उसे कितना सराहेंगे। मेरे दिल में जो आता है, वही बनाता हूं। बहुत मेहनत करता हूं। ढाई सालों के लिए दुनिया को भूल जाता हूं। फिल्म के विषय के अनुसार जो दृश्य और ध्वनियां दिमाग में आती हैं, उन्हें संयोजित करता रहता हूं।

'गुजारिश' आज के समय की फिल्म है। एक क्वाड्रोप्लेजिक व्यक्ति की कहानी है। गर्दन के नीचे उसे लकवा मार गया है। उसकी उंगलियां तक काम नहीं करतीं। चौदह सालों में उसकी स्थिति बिगड़ती ही जा रही है। इस बीमारी से ग्रस्त होने के पहले वह जादूगर था। वह शारीरिक रूप से बंध जाने पर भी अपने जीवन में जादू खोजने की कोशिश करता है। वह अपनी खोज से लोगों का जिंदगी के प्रति नजरिया बदल देना चाहता है। वह मशीनों के सहारे जीना नहीं चाहता, लेकिन उसने प्यार पा लिया है। वह उस प्यार को जीना चाहता है। चौदह सालों तक सेवा करने वाली नर्स से उसका एक रिश्ता बन चुका है। मेरा मानना है कि ट्रेलर में सिर्फ संकेत देना चाहिए। बता नहीं देना चाहिए कि क्या कहानी है? 30, 60, 90 सेकेंड के ट्रेलर में आप फिल्म का सार कैसे समझ सकते हैं? फिल्म का ट्रीटमेंट और टेंपरामेंट समझ में आ जाए तो काफी है। दर्शक खुद को फिल्म के लिए तैयार कर लेता है।

- क्या फिल्मों का फर्क ट्रीटमेंट से ही होता है?

0 बिल्कुल ट्रीटमेंट ही डायरेक्टर का पर्सनल स्टेटमेंट होता है। आप 'देवदास' को ही देखें। पीसी बरूआ ने एक तरह से बनायी। बिमल राय ने उससे अलग बनाई। मेरी देवदासउन दोनों से अलग है और अनुराग कश्यप की मुझ से अलग है। हमारे बीच ट्रीटमेंट का फर्क है। बिमल राय जी हमेशा श्रेष्ठ रहेंगे। हम उनके पैर छुएंगे, लेकिन हमारा ट्रीटमेंट अलग है। वी.शांताराम, राज कपूर, महबूब खान...सभी की स्टाइल अलग है। ट्रीटमेंट ही डायरेक्टर की पहचान होती है। ट्रीटमेंट में कैमरे की प्लेसिंग, सौंग की रिकार्डिंग और पिक्चराइजेशन, कैरेक्टर पेश करने का एटीट्यूड...इन सब से सिग्नेचर तय होता है। मुझे आड़े-टेढ़े किरदार अच्छे लगते हैं, जिनमें तेवर होता है, जिंदगी के प्रति गुस्सा होता है, लेकिन प्यार भी होता है। मुझे रंगीन और रंगीले किरदार चाहिए। 'ब्लैक' की मिशेल देख नहीं सकती, लेकिन बात और तेवर मजबूत हैं। मेरे कैरेक्टर टेंपरामेंटल होते हैं।

- ऐसा लगता है कि आप अपनी फिल्मों को दृश्यों और ध्वनियों में पहले सजा लेते हैं। आम दर्शक मुख्य रूप से कहानी और एक्शन पर ध्यान देता है, जबकि आप संवेदनाओं और दृश्यात्मक विधानों में ज्यादा मन लगाते हैं। कई बार यह सवाल उठता है कि संजय प्रचलित किस्म और शैली की फिल्में क्यों नहीं बनाते?

0 मुझे लगता है कि किसी भी कहानी को अपने ढंग से कहूं तभी तो मेरे कुछ बनाने और कहने का मतलब है। दोस्तोवस्की की कहानी को मैंने अपनी तरह से सांवरियामें रखा। दोस्तोवस्की की कहानी टाइमलेस है। मैं उसे समय में कैसे बांधूं। वह स्टोरी हर समय प्रासंगिक रहेगी। समय के साथ चलना क्या होता है? 'सांवरिया' में मुझे आज की कहानी कहनी थी। आप किसी पेंटर पर कैसे दबाव डाल सकते हैं कि उसकी हर पेंटिंग समय के साथ चले और उसके बारे में बताए। वास्तव में यह हमारे देखने का नजरिया है। हम अपनी सीमाएं फिल्मों और रचनाओं में खोजने-लादने लगते हें। लता जी का गाया 'आएगा आने वाला' आज भी ताजा है। फिल्म हमारा इंटरपटेशन है। समय के साथ फिल्म, संगीत, पेंटिंग को बांधना या देखना ठीक नहीं है। गुजारिशबिल्कुल आज की फिल्म है। लोगों को लगता है कि मेरी रूह बूढ़ी हो गई है या मैं बुजुर्ग व्यक्ति हूं। मैं समय के पार चला गया हूं। अस्सी-नब्बे साल का हो गया है। यह इंप्रेशन बन गया है। सच यही है कि मेरे कैरेक्टर कंफर्टेबल जोन में नहीं रहते। मेरी वॉयस अलग है। मेरे गाने भी पापुलर फार्मेट के नहीं होते। मैं हिट होने के लिए म्यूजिक नहीं चुनता। हम दिल दे चुके सनमका अलबम दो महीनों तक नहीं बिका था। उसके बाद उसकी बिक्री को रोकना मुश्किल हो गया। मेरी फिल्मों में गुब्बारे, पोमपोम, डिस्को डांस नहीं दिखेगा। लेकिन क्या आज का समय यही सब है। मेरी फिल्म में टाइमलेस इमोशन रहता है। पुराने वैल्यू और वर्चुज मिलेंगे। अच्छे आर्ट के गुण मिलेंगे। मुझ पर जिन मूल्यों और गुणों का असर है, वह आर्ट डायरेक्शन, डॉयलॉग, म्यूजिक में आता है। मुझे पर बिमल राय और वी.शांताराम का बहुत असर है। मैं उनकी तरह की विजुअल फिल्में बनाना चाहता हूं। उनकी लिगेसी को मैं चलाए रखना चाहता हूं। मैं इसकी कोशिश जरूर करता हूं। औकात है कि नहीं, यह लोग बताएंगे। शायद उस लिगेसी की वजह से लोगों को लगता है कि मैं पुराने किस्म का डायरेक्टर हूं। मैं पीरियड में थोड़े ही जीता हूं। गुजारिशका संगीत आप को पुराना लगता है क्या? '100 ग्राम जिंदगी' का एक्सप्रेशन देखें? सारा संगीत गिटार पर आधारित है।

- आप के कटु आलोचक भी मानते हैं कि आपकी फिल्मों में विजुअल ट्रीट मिलता है। सौंदर्य का वैभव दिखता है...

0 सिनेमा एक विजुअल माध्यम है। मेरी कोशिश होनी चाहिए कि मैं विजुअली, सिनैमेटिकली और साउंड वाइज आपको एक इमोशन तक ले जाऊं। वही मेरी सफलता होगी। खुशी, गम, हंसी...सारे दृश्य आपके दिमाग में बैठ जाएं। 'ब्लैक' और 'हम दिल दे चुके सनम' के सीन लोगों को याद हैं। अगर मैं दर्शकों को विजुअली ओवरपावर नहीं करता, मोहित नहीं करता तो मुझे फिल्म नहीं बनानी चाहिए। मुझे कहानी लिखनी चाहिए। रेडियो पर जाकर सुनानी चाहिए अपनी कहानी। मेरी फिल्मों में स्टोरी तो रहती ही है। स्टोरी के बगैर फिल्म नहीं बन सकती।

- आप की फिल्मों में इमोशन और एक्सप्रेशन के लिए सिर्फ संवादों का सहारा नहीं लिया जाता। उसमें बैकग्राउंड, म्यूजिक, प्रापर्टी...बाकी चीजें भी बोल रही होती हैं। हम अचानक थोड़े अलर्ट हो जाते हैं ...

0 हमलोग ऐसी कद्र के भूखे होते हैं। अगर हर दर्शक इतना ध्यान दे तो उसे बहुत मजा आएगा। मैं अपनी तैयारी के बारे में बताऊं तो एक साल कहानी पर काम करता हूं। उस काम के समय भी म्यूजिक चालू रहता है। म्यूजिक मूड के हिसाब से बदलता है, लेकिन मुझे हमेशा म्यूजिक चाहिए। कहानी के सीन को म्यूजिक और दृश्य में सोचता हूं। उसमें आर्ट डायरेक्टर, कास्टयूम डिजाइनर, सिनेमेटोग्राफर मदद करते हैं। हमलोग बिल्डिंग बनाने वाले मजदूर से दस गुना ज्यादा मेहनत करते हैं। मैं स्टोरी बोर्ड में फिल्म को नहीं बांधता। मेरी फिल्म का एक ढांचा रहता है। स्टोरी बोर्ड पहले जरूर रहता है, लेकिन शूट पर जाते समय उसे फाड़ कर फेंक देता हूं। जब सेट पर सब मौजूद रहते हैं तो सब कुछ नया हो जाता है ।आप को बताऊं कि डेढ़-दो साल की सारी मेहनत और बातचीत किसी सीन को करते समय टक से याद आ जाती है। उस वक्त जो महसूस होता है, वही करता हूं। कई बार कैमरामैन से बहस होती है कि पहले कुछ और बताया था...अभी कुछ और कर रहा हूं। कैमरामैन को फिर से मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन उस से जान आ जाती है। मैं एक्टर को स्क्रिप्ट में नहीं बांधता। कुछ चीजें तैयार होती हैं, लेकिन कुछ चीजें साफ बदल जाती है। लाइट जलने, कॉस्ट्यूम पहनने, कैमरा ऑन होने और एक्टर के कैरेक्टर में आने के बाद कई चीजें बदल जाती हैं। जो क्रिएट होता है, वह उस क्षण में सोचा गया होता है। आप इमैजिन करें ना कि जब आप रितिक और ऐश्वर्या से कोई सीन आफिस में डिस्कस कर रहे हैं और उसे शूट कर रहे हैं...दोनों में बहुत फर्क आ जाता है। कोरियोग्राफी ऑफ सीन पर मेरा ज्यादा ध्यान रहता है। वह आप पहले से तय नहीं कर सकते। किरदार किधर से आया, कहां ठहरा और फिर से किधर गया। कैमरा घूमा...सीन एंड कैसे होगा।य़ह सब अहम है। गुरुदत्त की फिल्मों का हर सीन मुझे कोरियोग्राफ्ड लगता है। वे और वी शांताराम...दोनों का काम ध्यान से देखें। वे कैरेक्टर के मूवमेंट की अहमियत समझते थे। शॉट डिवीजन देखें उनका...शॉट का संयोजन - उनकी फिल्मों के हर सीन में एक बात रहती है। स्टेटमेंट रहता है।

- आप की फिल्मों को देखते हुए कई बार लगता है कि दृश्य में एक्टर चूक गए या मोमेंट ऑफ सीन को ठीक से छू नहीं सके। क्या आप को भी लगता है कि एक्टर कई बार आप की कल्पना को पर्दे पर नहीं उतार पाते। आप को मिले हुए शॉट से ही काम चलाना पड़ता है...

0 क्या आप को ऐसा लगता हे? मुझे जब तक अपनी पसंद का शॉट नहीं मिल जाता, मैं तब तक एक्टर को नहीं छोड़ता। कई बार ऐसा लगता है कि एक्टर ने सब कुछ दे दिया। अब उस से आगे नहीं जा सकता तो छोड़ देता हूं। कई बार यह भी होता है कि एक्टर बेहतर दे चुका होता है और हम गलत शॉट चुन लेते हैं। ब्लैकके एक सीन में रानी मां को फोन करती है कि मैं फेल हो चुकी हूं। उस सीन का रानी ने पहला टेक कमाल का दिया था, लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगा। फिर मैंने छह टेक लिए। उसने छह टेक दिल लगा कर दिए, लेकिन मुझे लगा कि मजा नहीं आ रहा है। फिर रानी ने कहा कि मैंने पहले ही शॉट में सब दे दिया था, तुम देख नहीं पाए या कैसे नहीं देखा? मुझे छह टेक के बाद लगा कि और कुछ नहीं हो सकता। बाद में एडीटिंग टेबल पर देखा तो उसका पहला ही शॉट सबसे अच्छा था। कभी-कभी मैं नहीं देख पाता। मैं तो ज्यादा लालची हूं। मेरे असिस्टेंट पक जाते हैं और रिक्वेस्ट करते हैं कि अब अगला शॉट लो। कई बार मैं नहीं देख पाता। कई बार वे नहीं दे पाते और कई बार हम दोनों का सोचा नहीं हो पाता। बिल्कुल परफेक्ट काम हो जाए तो शायद मुझे रिटायर होना पड़ जाए। फिर खोज खत्म हो जाएगी। अभी तक की अपनी फिल्मों के हासिल से मैं संतुष्ट और खुश हूं। खामोशीसे पचास गुना ज्यादा मेहनत गुजारिशमें हुई है। मेरी मेहनत और बेहतर काम करने की ख्वाहिश बढ़ती जा रही है।

-तो कह सकते हैं कि आप अपने एक्टरों ये संतुष्ट हैं?

आप ही बताएं न कि ब्लैकमें अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी मुझे और क्या दे देते? उनके परफार्मेंस की ऊंचाई है उसमें। ग्रेट परफार्मेंस। 'गुजारिश' में रितिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन का अभिनय... वे अमर हो गए हैं। वे हमेशा याद किए जाएंगे इस फिल्म के लिए। मेरी अपेक्षा से ज्यादा उन्होंने दिया है। सलमान खान ने खामोशीमें स्क्रिप्ट से ज्यादा मुझे दिया। वह सब पेपर पर था ही नहीं। सलमान और सीमा विश्वास खामोशीको अलग ऊंचाई पर ले गए। मुझे खामोशीमें सीमा का परफार्मेंस मेरे सारे एक्टरों में सबसे ज्यादा पसंद है। मैं तो कैमरे से देखता रहता था। वह नाना के पीछे आउट फोकस में खड़ी रहती थी, लेकिन वहां भी कुछ करती रहती थीं। कोई डर या असुरक्षा नहीं कि इस सीन में फलां मुझे खा जाएगा कि पी जाएगा कि घोल जाएगा। सलमान का छोटा सा रोल था, लेकिन उनका परफार्मेंस देखिए। मुझे हमेशा एक्टरों का सपोर्ट मिला। वे मुझे प्यार करते हैं। मैं उनसे और उनके किरदारों से बहुत प्यार करता हूं। सारे किरदार मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है। उन फिल्मों के समय में उन एक्टरों से गहरा प्यार करता था। वे मेरे लिए सिंहासन पर रहते हैं। मैं मनीषा कोईराला, रानी मुखर्जी, ऐश्वर्या राय, शाहरुख खान से और बेहतर की मांग नहीं कर सकता ...उन्होंने अपना श्रेष्ठ दिया है। मैं कभी असंतुष्ट नहीं रहा। असंतुष्ट रहने पर सीन शूट ही करता रहूंगा।

- आप की फिल्मों में डायरेक्टर और एक्टर का मिलन बिंदु ढलान की तरफ लगता है। मेरे खयाल में वह उठान की तरफ होना चाहिए। एक्टर आप की कल्पना को ऊपर ले जाए...

0 मेरे विचार से एक्टर और डायरेक्टर एक ही ऊंचाई पर रहे तो फिल्म बेहतरीन बनती है। किसी एक के ऊपर या नीचे होने पर फिल्म कमजोर हो जाती है। दोनों समान धरातल पर मिलें।

- 'गुजारिश' में इच्छा मृत्यु (मर्सी किलिंग) का सवाल है। इस पर कुछ आपत्तियां भी की जा रही हैं। क्या आप को लगता है कि अपने यहां अभिव्यिक्त की पूरी आजादी नहीं मिल पाती...

0 अभिव्यक्ति की आजादी और उसकी मर्यादा तय करना तो एक लंबी बहस है। मेरा कहना है कि सिर्फ विषय पर आपत्ति न करें फिल्म देखने के बाद बात करें। अभिव्यक्ति की आजादी में इरादा और उद्देश्य स्पष्ट हो। हमें उसी आधार पर तय करना चाहिए। मेरे लिए ड्रामा और कंफ्लिक्ट चाहिए। इस बीमारी से ग्रस्त बहुत सारे लोग नहीं जीना चाहते हैं या इस तकलीफ से निकलना चाहते हैं। उनमें से बहुत सारे जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे जिंदा रहना चाहते हैं। कुछ रितिक के दोस्त भी बन गए हैं। रितिक ने उनके लिए बहुत कुछ किया है। उनकी जिंदगी बदल दी है। गुजारिशमें इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति के द्वंद्व को समझने की कोशिश है। और फिर किस लेवल की बीमारी है...आप क्या-क्या कर सकते हैं...कर पाते हैं? 'गुजारिश' में 'देवदास' की तरह का नैरेटिव है। ड्रामा है और उसका विस्फोट है। इसमें खुशी और आनंद है, क्योंकि हीरो को प्यार मिल गया है। वह जिंदगी से प्यार करता है। जिंदगी से मिली चीजों से प्यार करता है। हिंदी फिल्म में यह अब तक नहीं आया है। बगैर देखे ही लोग आरोप लगा रहे हैं या बता हरे हैं कि फिल्म में तो ये है, वो है...। मैं तो चाहूंगा कि इस विषय पर बहस हो। हैदराबाद की एक मां ने अपने बेटे के लिए इच्छा मृत्यु की मांग की है? उनकी अड़चनों को भी समझना होगा। इस मुद्दे पर बात तो हो। हमें बहस और बातचीत के लिए खुला होना चाहिए। यह फिल्म सभी को देखनी चाहिए। किसी की भी जिंदगी के साथ ऐसा हो सकता है? रातोंरात जिंदगी बदल जाती है। यह सौ ग्राम जिंदगी है। मीठी है और मिर्ची है। जितनी मिली है, उसे ही संभाल कर खर्च करना है। जिंदगी को प्यार करना जरूरी है। गुजारिशराजेश खन्ना की आनंदजैसी फिल्म है। मेरे लिए यह बहुत बड़ी चुनौती रही। जब तक सांस और जोश है, तब तक मैं नई दीवारों पर चढ़ता रहूंगा।

- इस फिल्म का संगीत खास है। आप पहली बार संगीत निर्देशन में कदम रख रहे हैं?

0 संगीत तो मेरे जीवन का हिस्सा है। मैं उसके बगैर जिंदा नहीं रह सकता। आंख खुलने के साथ मुझे संगीत चाहिए। हर जगह। गाड़ी चलाते, नहाते, काम करते, मीटिंग करते, लिखते-पढ़ते...हर समय संगीत चाहिए। कोई भी संगीत सुनता हूं। मेरे लिए हर साज और आवाज अजीज है। मैंने कोई सीमा नहीं रखी है। मेरी फिल्मों में संगीत बहुत महत्वपूर्ण रहता है। इस फिल्म का निर्माण म्यूजिकल रहा है। फिल्म से जुड़ा हर व्यक्ति म्यूजिकल था। हमने आज के मूड की रिकार्डिंग की है तो बांबे टाकीज के समय की शैली भी अपनायी है। इस फिल्म के संगीत ने मुझे बंधनरहित कर दिया है। आप पा रहे होंगे कि मैं खुश हूं और खूब बातें कर रहा हूं।

- बिल्कुल आप खुले और खिले दिल से बातें कर रहे हैं?

0 पहले मैं थोड़ा डरा और सकुचाया रहता था। गाता था लेकिन जोर से नहीं गाता था। केवल गुनगुनाता था। अब मैं कहीं भी गा लेता हूं। मेरा गला खुल गया है। रितिक, ऐश्वर्या और आदित्य राय कपूर भी गाते हैं। इस फिल्म की म्यूजिक रिलीज में आप ने देखा होगा कि सभी गा रहे थे।

- आप की तारीफ करूंगा कि इस तरह का समारोह मैंने कई सालों के बाद देखा। पुराने जमाने का माहौल याद आ गया...

0 मुझे मजा आता है। इस फिल्म के दरम्यान जिंदगी से मेरी मुलाकात हुई है। म्यूजिक रिलीज के समय मैं लगातार गा रहा था। सभी एक्टर और सिंगर मंच पर गाने आए। मैं खुद गया। सचमुच म्यूजिकल समारोह हो गया था।

- आप लेखन, निर्देशन, कोरियोग्राफी, एडीटिंग, म्यूजिक सब कुछ कर रहे हैं। क्या आप भी सत्यजित राय की तरह फिल्म निर्माण के सभी पहलुओं पर अपना संपूर्ण नियंत्रण चाहते हैं? आप को टोटल जीनियसकहा जा रहा है

0 उनसे तुलना करना उचित नहीं होगा। मैं अपनी परेशानी या प्रक्रिया बता सकता हूं। अब संगीत निर्देशन लें...मैंने एक भाव और धुन बताया और निर्देशक से मांगा तो लोगों ने कहना शुरू किया कि तुम जानते हो कि तुम्हें क्या चाहिए तो खुद क्रिएट करो। 'ब्लैक' के समय भी गाता रहता था। अमित जी ने सावधान किथा कि म्यूजिकल मत बना देना। हमारे दिमाग में क्रिएटर के तौर पर पच्चीस बातें चल रही होती हैं। अपनी बात रखना और उसकी मांग करना किसी और के काम में हस्तक्षेप नहीं है। मैं अपने कलाकारों और तकनीशियनों को पूरा मौका देता हूं। मैं एडीटिंग सीख कर आया हूं...अभी नाचना और एक्टिंग करना बाकी है। हर कलाकार के लिए लयकारी जरूरी है। पूरी टीम की लयकारी एक साथ होनी चाहिए। थोड़ा ऊंचा-नीचा हो तो फिल्म में फर्क आ जाता है।

- टीम के चुनाव पर पूरा ध्यान देते हैं?

0 मैं अपनी टीम काफी सोच-समझ कर चुनता हूं। फिल्म के सुर के हिसाब से सभी तकनीशियन को चलना चाहिए। इस फिल्म में कलाकारों का सहयोग भरपूर मिला है। स्क्रिप्ट से परफार्मेंस तभी बढ़ता है, जब एक्टर फिल्म के सुर में आ जाता है। मेहनत तो सभी करते हैं, लेकिन मेहनत और समझ के साथ लय और पागलपन होना चाहिए। वर्ना सभी मैकेनिकल दिखेंगे। मैं स्पॉनटैनिटी पर बहुत जरूर देता हूं। कोई अचानक कुछ कर दे और चौंका दे तो खुश होता हूं।

- आप झल्लाते किन बातों पर हैं?

0 कोई ढंग से काम न करे, ढीला करे तो मुझे गुस्सा आ जाता है ...इनएफिसियेंसी बर्दाश्त नहीं कर पाता। मैं बेटर या बेहतर कर पाने की गुंजाइश नहीं छोड़ पाता। मैं चाहता हूं कि सभी अपनी जिंदगी और काम को भरपूर इज्जत दें। काम को सबसे बेहतर तरीके से पेश करें तो आप की पर्सनैलिटी और सोच उभर कर सामने आती है। आप का सिग्नेचर दिखता है। पेशगी का आर्ट बढऩा चाहिए। मुझे नकारात्मक अप्रोच के लोग पसंद नहीं हैं। कोई निगेटिव अप्रोच से परेशान करे तो अच्छा नहीं लगता। अभी मेरा गुस्सा कम हो गया है। वैसे गुस्सा करना बुरी बात नहीं है। हम प्यार करते हैं या सिखाना चाहते हैं, इसलिए गुस्सा करते हैं। विनोद चोपड़ा हम पर गुस्सा करते थे। उन्होंने सिखाया है। पहले उस्ताद कितना मारते थे...वे सिखाना चाहते थे। आप को श्रेष्ठता तक पहुंचाना चाहते थे। मन रम जाए तो कोई कष्ट ही नहीं होता। फिल्म बनाने की मुश्किलों में हमें कोई तकलीफ नहीं होती।

- मीडियोक्रेटी के इस दौर में भी आप अपने पैशन पर कायम हैं और बगैर समझौता किए अपने किस्म की फिल्में बना रहे हैं। यह ताकत कहां से मिलती हैं...

0 मुझे साथी मिल जाते हैं, मुझे निर्माता मिल जाते हैं। इस बार रोनी स्क्रूवाला ने पहले स्क्रिप्ट पढ़ी। फिल्म के महत्व, प्रभाव और बिजनेश को समझने के बाद उसने हां की। मुझे लगता है कि आप ईमानदारी से काम करें तो इनवेस्टर मिल जाते हैं। फिल्म के बजट पर चलने वाली बहस के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता। मैं अपने ढंग से शूट करता हूं और पूरे दिल से करता हूं। मैं अपने काम को लेकर पैशनेट हूं और अपने सहयोगियों से पैशन मांगता हूं। नहीं मिल पाता तो गुस्सा होता हूं। कोई गलती करेगा तो क्या करूंगा? सूरज बडज़ात्या भी गुस्सा होते हैं। मैं तो अपने आप से गुस्सा हो जाता हूं। उसी गुस्से की वजह से अच्छा काम करना चाहता हूं। मैं फिल्म बना रहा हूं, कोई सत्संग थोड़े ही कर रहा हूं।