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Friday, October 29, 2010

फिल्म समीक्षा:दाएं या बाएं

-अजय ब्रह्मात्मज

ना कोई प्रेमकहानी, ना ही कोई गाना-बजाना.. ढिशुम-ढिशुम भी नहीं.. बेला नेगी की दाएं या बाएं पहाड़ी जीवन की एक सरल कहानी है, जो संवेदनशील तरीके से पहाड़ में आ रहे बदलाव की झलक देती है। बेला ने रमेश मजीला को फिल्म के नायक के तौर पर चुना है, जो हिंदी फिल्मों के कथित नायक की परिभाषा में फिट नहीं होता। आम जिंदगी में हम कहां फिल्मी नायक होते हैं? रोजमर्रा की जिंदगी के संघर्ष में हमारे कुछ फैसले खास होते हैं। उनसे दिशा बदल जाती है। रमेश मजीला की जिंदगी में भी ऐसी घड़ी आती है और उसका फैसला हमें प्रभावित करता है।

पहाड़ों से मुंबई आकर टीवी सीरियल के लेखक बन चुके रमेश शहरी माहौल से उकता कर अपने गांव काण्डा लौट जाते हैं। उनके सामने कोई स्पष्ट प्लान नहीं है। उन्हें यह भी नहीं मालूम कि गांव में आजीविका का कैसे इंतजाम हो पाएगा। बस एक जज्बा कि अब गांव में ही कुछ करना है। गांव लौटने के बाद स्थानीय प्रतिभाओं को प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से वे काण्डा कला केन्द्र की स्थापना की योजना बनाते हैं। इस बीच एक जिंगल लिखने से उनके घर कार आ जाती है। आने के साथ ही कार उनकी गतिविधियों की धुरी बन जाती है। हम गांव में आ रही तब्दीली को विभिन्न स्तरों पर महसूस करते हैं। रमेश मजीला परिवार, दोस्त और ख्वाहिशों के बीच उलझते जाते हैं। आखिरकार उन्हें अपनी तुच्छता और कार की व्यर्थता का एहसास होता है। वे सब कुछ छोड़ कर अपने परिवार के साथ गांव की और लौटते हैं।

बेला नेगी ने मध्यवर्गीय परिवार के सपनों और संवेदना को पहाड़ी परिवेश की प्राकृतिक खूबसूरती के बैकड्राप में चित्रित किया है। उन्होंने फिल्मी ताम-झाम और लटकों-झटकों का इस्तेमाल नहीं किया है। स्थानीय संसाधनों ,प्रतिभाओं और सामग्रियों के इस्तेमाल से फिल्म विश्वसनीय और नैचुरल लगती है। हालांकि सीमित बजट का दबाव दृश्यों के विधान में नजर आता है, लेकिन वह कथा प्रवाह के आड़े नहीं आता। दीपक डोबरियाल पहाड़ों में बाहर से गए एक्टर नहीं लगते। उन्होंने रमेश मजीला की मनोदशा को समझा है। यही वजह है कि उनकी भाव-भंगिमाएं बनावटी नहीं लगतीं। सहयोगी कलाकारों का अनगढ़पन फिल्म के लिए उपयोगी साबित हुआ है। इस फिल्म में विख्यात संस्कृतिकर्मी गिरदा उर्फ गिरीश तिवारी को देखा जा सकता है। उनका हाल ही में निधन हुआ है। दाएं या बाएं पहाड़ों से शहरों की ओर निकल रही आबादी की समस्या को भोले तरीके से रखती है। साथ ही हिंदी सिनेमा के विषय में आ रहे फैलाव और बदलाव का छोटा उदाहरण बनती है।

*** तीन स्टार


Sunday, October 24, 2010

फिल्‍म समीक्षा : दस तोला

-अजय ब्रह्मात्‍मज

सोनापुर का सोनार शंकर पिता की बीमारी, कुंवारी बहन की जिम्मेदारी और फटेहाल जिंदगी के बीच फंसा व्यक्ति है। वह पड़ोस की लड़की स्वर्णा से प्रेम करता है, लेकिन स्वर्णा के काइयां पिता की ख्वाहिशें बड़ी हैं। अपनी बेटी को सुखी देखने के लिए वे दुबई का दामाद चाहते हैं। स्वर्णा अपने पिता को मनाने के लिए शंकर को दस तोला का हार बनाने की तरकीब बताती है। हार मिलने के बाद पहले पिता और फिर बेटी की नियत बदल जाती है। फिल्म के अंत में उन्हें अपनी गलतियों का एहसास और पश्चाताप होता है।

इस सादा प्रेम कहानी का परिवेश कस्बाई है। निर्देशक अजय ने कस्बाई जीवन को अच्छी तरह चित्रित किया है। उनके किरदार विश्वसनीय लगते हैं, लेकिन घटना विहीन उनका जीवन अधिक रुचि पैदा नहीं करता। इस वजह से फिल्म ठहरी हुई लगती है। मनोज बाजपेयी का अभिनय भी बांधे नहीं रख पाता, क्योंकि उसमें अधिक स्कोप नहीं है।

मनोज बाजपेयी जैसे सशक्त अभिनेता का ऐसी फिल्मों में दुरूपयोग ही होता है। वे अपनी मेहनत और समर्पण से भी दर्शकों को लुभा नहीं पाते। फिल्म का सादा होना कोई कमी नहीं है, लेकिन वह रोचक, घटनापूर्ण और गतिशील तो हो। छोटी सी बात को लंबा तान दिया गया है।

रेटिंग- ** दो स्टार


Saturday, October 23, 2010

फिल्‍म समीक्षा : झूठा ही सही

लंदन के मजनूं


झूठा ही सही: लंदन के मजनूं

अब्बास टायरवाला की झूठा ही सही के किरदार आधुनिक रंग-रूप और विचार के हैं। उनकी जीवन शैली में माडर्न मैट्रो लाइफ का पूरा असर है। अपनी बोली, वेशभूषा और खान-पान में वे पारंपरिक भारतीय नहीं हैं। वे लंदन में रहते हैं और उनके लिए भारत-पाकिस्तान का भी फर्क नहीं है। विदेशी शहरों में रह चुके दर्शक भारत और पाकिस्तान के मूल नागरिकों के बीच ऐसी आत्मीयता से परिचित होंगे। यह सब कुछ होने के बाद जब मामला प्रेम का आता है तो उनके किरदार लैला-मजनूं और शीरी-फरहाद की कहानियों से आगे बढ़े नजर नहीं आते। 21वीं सदी के पहले दशक के अंत में भी मिश्का को पाने के लिए सिद्धार्थ को तेज दौड़ लगानी पड़ती है और लंदन के मशहूर ब्रिज पर छलांग मारनी पड़ती है। नतीजा यह होता है कि यह फिल्म अंतिम प्रभाव में हास्यास्पद लगने लगती है।

सिद्धार्थ लंदन में गुजर-बसर कर रहा एक साधारण युवक है। वह सुंदर लड़कियों को देख कर हकलाने लगता है। उसमें रत्ती भर भी आत्मविश्वास नहीं है। दूसरी तरफ मिश्का को उसके प्रेमी ने धोखा दे दिया है। संयोग से दोनों की बातचीत होती है, जो बाद में दोस्ती में बदलती है और प्रेम हो जाता है। इस कहानी में पेंच है कि सिद्धार्थ का एक रूप फिदातो है, जो सिर्फ टेलीफोन पर ही मिलता है। फिदातो और सिद्धार्थ के एक ही होने का भेद खुलने पर कहानी टर्न लेती है और फिर उसे संभालने में निर्देशक का सुर बिगड़ जाता है। फिल्म फिसल जाती है।

गलत कास्टिंग का इतना सटीक उदाहरण नहीं मिल सकता। नायिका के तौर पर पाखी मिश्का के किरदार के साथ न्याय नहीं कर पाती। वह पूरी तरह से अनफिट लगती हैं। सिद्धार्थ के रूप में हैडसम और स्मार्ट जॉन अब्राहम का चुनाव भी गलत है। दब्बू स्वभाव के किरदार को जॉन निभा नहीं पाते। वे विश्वसनीय नहीं लगते। अलबत्ता इस फिल्म में सहयोगी कलाकारों और किरदारों ने सुंदर काम किया है। ए आर रहमान और अब्बास टायरवाला की जोड़ी इस बार गीत-संगीत में जाने तू या जाने ना का जादू पैदा नहीं कर सकी है। अब्बास टायरवाला की लेखन और निर्देशन क्षमता पर यह फिल्म प्रश्न चिह्न लगाती है।

रेटिंग- *1/2 डेढ़ स्टार


Friday, October 22, 2010

फि‍ल्‍म समीक्षा : रक्‍त चरित्र

-अजय ब्रह्मात्‍मज

बदले से प्रेरित हिंसा


रक्त चरित्र: बदले से प्रेरित हिंसा

लतीफेबाजी की तरह हिंसा भी ध्यान आकर्षित करती है। हम एकटक घटनाओं को घटते देखते हैं या उनके वृतांत सुनते हैं। हिंसा अगर बदले की भावना से प्रेरित हो तो हम वंचित, कमजोर और पीडि़त के साथ हो जाते हैं, फिर उसकी प्रतिहिंसा भी हमें जायज लगने लगती है। हिंदी फिल्मों में बदले और प्रतिहिंसा की भावना से प्रेरित फिल्मों की सफल परंपरा रही है। राम गोपाल वर्मा की रक्त चरित्र उसी भावना और परंपरा का निर्वाह करती है। राम गोपाल वर्मा ने आंध्रप्रदेश के तेलुगू देशम पार्टी के नेता परिताला रवि के जीवन की घटनाओं को अपने फिल्म के अनुसार चुना है। यह उनके जीवन पर बनी बायोपिक (बायोग्रैफिकल पिक्चर) फिल्म नहीं है।

कानूनी अड़चनों से बचने के लिए राम गोपाल वर्मा ने वास्तविक चरित्रों के नाम बदल दिए हैं। घटनाएं उनके जीवन से ली है, लेकिन अपनी सुविधा के लिए परिताला रवि के उदय के राजनीतिक और वैचारिक कारणों को छोड़ दिया है। हिंदी फिल्म निर्देशकों की वैचारिक शून्यता का एक उदारहण रक्त चरित्र भी है। विचारहीन फिल्मों का महज तात्कालिक महत्व होता है। हालांकि यह फिल्म बांधती है और हमें फिल्म के नायक प्रताप रवि से जोड़े रखती है। अनायास हिंसा की गलियों में उसका उतरना और अपने प्रतिद्वंद्वियों से हिंसक बदला लेना उचित लगने लगता है। राम गोपाल वर्मा ने प्रताप रवि और उसके परिवार की सामाजिक और राजनीतिक प्रतिबद्धता को रेखांकित नहीं किया है। ऐसा करने पर शायद फिल्म गंभीर हो जाती और दर्शकों का कथित मनोरंजन नहीं हो पाता।

फिल्म जिस रूप में हमारे सामने परोसी गई है, उसमें राम गोपाल वर्मा अपनी दक्षता और अनुभव का परिचय देते हैं। उन्होंने अपने नैरेशन में घटनाओं और हत्याओं पर अधिक जोर दिया है। केवल शिवाजी राव और प्रताप रवि के संसर्ग के दृश्यों में ड्रामा दिखता है। रक्त चरित्र एक्शन प्रधान फिल्म है। एक्शन के लिए देसी हथियारों कट्टा, कटार, हंसिया का इस्तेमाल किया गया है, इसलिए पर्दे पर रक्त की उछलती बूंदे और धार दिखती हैं। राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म में हिंसा को कथ्य में पिरोने से अधिक ध्यान उसके दृश्यांकन में दिया है। मुमकिन है कुछ दर्शकों को मितली आए या सिर चकराए। राम गोपाल वर्मा ने रक्त और खून के साथ सभी क्रियाओं, विशेषणों, समास, उपसर्गो और प्रत्ययों का उपयोग किया है। गनीमत है कि उनके लेखकने रक्त के पर्यायों का इस्तेमाल नहीं किया है। रक्त चरित्र को आज के भारत की महाभारत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश में उन्होंने अन्य भावनाओं को दरकिनार कर दिया है। इस फिल्म में पिता-पुत्र संबंध, परिवार के प्रति प्रेम, सत्ता की चाहत और वंचितों के उभार जैसी भावनाएं हैं। फिल्म वंचितों और समृद्धों के संघर्ष और अंतर्विरोध से आरंभ होती है, लेकिन कुछ दृश्यों केबाद ही व्यक्तिगत बदले की लकीर पीटने लगती है। प्रताप रवि कहता भी है कि बदला भी मेरा होगा। यह भाव ही फिल्म की सीमा बन जाता है और रक्त चरित्र हमारे समय के महाभारत के बजाए चंद व्यक्तियों के रक्तरंजित बदले की कहानी बन कर रह जाती है।

रक्त चरित्र विवेक ओबेराय और अभिमन्यु सिंह के अभिनय के लिए याद की जाएगी। विवेक ने अपनी पिछली फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने प्रताप के क्रोध और प्रतिहिंसा के भाव को चेहरे, भाव और चाल में अच्छी तरह उतारा है। अभिमन्यु सिंह के रूप में हमें एक गाढ़ा अभिनेता मिला है। इस चरित्र के रोम-रोम से क्रूरता फूटती है और अभिमन्यु ने किरदार की इस मनोदशा को खूंखार बना दिया है। अन्य कलाकारों में सुशांत सिंह, राजेन्द्र गुप्ता, शत्रुघ्न सिन्हा और कोटा श्रीनिवास राव का सहयोग सराहनीय है।

फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर में चल रहे संस्कृत के श्लोक स्पष्ट होते तो फिल्म का प्रभाव बढ़ता। राम गोपाल वर्मा की अन्य फिल्मों की तरह ही बैकग्राउंड स्कोर लाउड और ज्यादा है।

रेटिंग- तीन स्टार


Thursday, October 21, 2010

आखिरी दो महीने में रेगुलर मनोरंजन

-अजय ब्रह्मात्‍मज

इस दीपावली पर हंसी के दो पटाखे छूटेंगे। पिछले तीन सालों से हर दीपावली में कामयाबी की रोशनी में नहा रहे रोहित शेट्टी और अजय देवगन की गोलमाल-3 पांच नवंबर को आएगी। इस दीपावली पर विपुल शाह भी अक्षय कुमार और ऐश्वर्या राय के साथ इसमें शरीक हो रहे हैं। दोनों ही फिल्में कॉमेडी हैं। गोलमाल तो पहले से ही मनोरंजक ब्रांड बन चुका है। विपुल शाह एक्शन रिप्ले में आठवें दशक के लटके-झटके लेकर आएंगे। राजेश खन्ना और सुनील दत्त की याद दिलाएगी उनकी फिल्म। वैसे विपुल की फिल्मों में संदेश का पुट रहता है। देखना होगा कि एक्शन रिप्ले में वे किस इमोशन पर जोर डाल रहे हैं।

संजय लीला भंसाली की गुजारिश का इंतजार है। उनकी पिछली फिल्म सांवरिया भले ही बॉक्स ऑफिस पर पिट गई हो, लेकिन उनकी फिल्मों की पोएट्री और लय आकर्षित करती है। इस बार उन्होंने ऐश्वर्या राय के साथ रितिक रोशन को चुना है। हमने रितिक और ऐश्वर्या को इसके पहले धूम-2 और जोधा अकबर में देखा है। उनकी जोड़ी का तीसरा अंदाज गुजारिश में दिखेगा। सिलेटी रंग में लहराती और खिलखिलाती छवियों की मधुर लय अच्छी लग रही है। संजय की कल्पना और रितिक की मेहनत अवश्य ही कुछ कमाल करेगी।

इमरान खान और दीपिका पादुकोण की ब्रेक के बाद से ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। दोनों ही अभी तक अपनी अभिनय क्षमता का परिचय नहीं दे सके हैं। वे चर्चित हैं। यूथ में पसंद किए जाते हैं, लेकिन अभी आम दर्शक उन पर भरोसा नहीं करते। ब्रेक के बाद की घटनाओं में दर्शकों की कितनी रुचि हो सकती है? हां, दीपिका की ही दिसंबर में रिलीज हो रही खेलें हम जी जान से से जरूर बड़ी उम्मीदें हैं। इस फिल्म में वे क्रांतिकारी कल्पना दत्ता का किरदार निभा रही हैं। आशुतोष गोवारीकर ने 1930 में चिटगांव विद्रोह पर यह फिल्म बनाई है। आशुतोष पीरियड फिल्मों के निर्देशन में माहिर हैं। उनकी लगान और जोधा अकबर हम देख चुके हैं। इस बार वे अभिषेक बच्चन और दीपिका के साथ स्वतंत्रता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी को फिर से प्रस्तुत कर रहे हैं। फिल्म के आरंभिक ट्रेलर से एक बेहतरीन फिल्म की उम्मीद बंधती है।

दिसंबर में ही यशराज फिल्म्स की बैंड बाजा बारात आएगी। पिछली कुछ फिल्मों से यशराज की फिल्में दर्शकों को पसंद नहीं आ रही हैं। इस फिल्म का टाइटल भी आकर्षित नहीं कर रहा है। निर्देशक मनीष शर्मा और हीरो रणवीर सिंह भी नए हैं। केवल अनुष्का शर्मा को अभी तक हमने देखा है। उसी हफ्ते आ रही नो प्रॉब्लम रोचक हो सकती है। अनीस बज्मी के निर्देशन में संजय दत्त, अनिल कपूर, अक्षय खन्ना, बिपाशा बसु, कंगना रनौत और नीतू चंद्रा को एक साथ देखने दर्शक आ सकते हैं। अनीस बज्मी की कॉमेडी में गति रहती है। उन्होंने डेविड धवन की शैली को आगे बढ़ाया है। इस साल सबसे अधिक फिल्में लेकर आए अजय देवगन की इस साल की आखिरी फिल्म टूनपुर का सुपरहीरो होगी। यह फिल्म लाइव एनीमेशन है। इसमें अजय के साथ काजोल भी हैं और हैं कई सारे एनीमेटेड किरदार।

साल के अंतिम आकर्षण के तौर पर तीसमार खान आएगी। फराह खान की इस फिल्म में अक्षय कुमार और कट्रीना कैफ की सफल जोड़ी है। फराह ने शाहरुख खान को धता बताकर अक्षय को इसमें लिया है। फराह खुद को मनमोहन देसाई की उत्तराधिकारी मानती हैं और कुछ वैसी ही शैली में दर्शकों का मनोरंजन करती हैं। तीसमार खान में फराह के साथ उनके पति शिरीष कुंदर का भी क्रिएटिव योगदान है।

कुल मिलाकर आखिरी दो महीने में हम आम दर्शकों के लिए रेगुलर मनोरंजन की आस लग सकते हैं। इन दो महीनों में केवल आशुतोष गोवारीकर की खेलेंगे हम जी जान से ही थोड़ी अलग और विशेष फिल्म लगती है। बाकी तो हंसाने का दौर चल रहा है और वैसी ही फिल्में आ रही हैं

Tuesday, October 19, 2010

फिल्‍म समीक्षा : रामायण-द एपिक

-अजय ब्रह्मात्‍मज

राम की चिर-परिचित कहानी को लेकर बनी रामायण-द एपिक की नवीनता एनीमेशन, विजुअल ट्रीट और किरदारों की आवाज में है। नयी तकनीक से त्रिआयामी प्रभाव देती रामायण-द एपिक भव्य, रंगीन और रोचक फिल्म है। निर्माता केतन देसाई और निर्देशक चेतन देसाई राम कथा के मुख्य अंशों को लेकर बच्चों के मनोरंजन और ज्ञान के लिए एक उपयोगी फिल्म बनाई है।

केतन और चेतन की टीम ने राम, रावण, सीता, लक्ष्मण और हनुमान का चारित्रिक विशेषताओं के साथ उनका रूप गढ़ा है। वे आकर्षक और उपयुक्त दिखते हैं। रामायण-द एपिक में कथा के भाव पक्ष से अधिक एक्शन दृश्यों को चुना गया है। वीडियो गेम और विदेशी एनीमेशन फिल्मों के इस दौर में बाल और किशोर दर्शकों को पुरानी कथा शैली से नहीं रिझाया जा सकता। निर्देशक ने उनकी बदली मानसिकता को ध्यान में रखते हुए एक्शन और ड्रामा से भरपूर सीन रखे हैं, इसीलिए कहानी मुख्य रूप से वनवास के चौदह साल के आखिरी साल में घटी घटनाओं पर ही केंद्रित है। सीता अपहरण, सुग्रीव प्रसंग, हनुमान का लंका प्रवेश और लंका दहन, राम-रावण युद्ध आदि के चित्रण में निर्देशक की कल्पना नजर आती है। उनकी टीम ने बिल्कुल निराश नहीं किया है।

फिल्म रामायण-द एपिक की एक विशेषता किरदारों की आवाज है। बाल दर्शक भले ही उन आवाजों से पूर्व परिचित नहीं हों, लेकिन उनकी सुघड़ और सटीक आवाज किरदारों को जीवंत कर देती है। राम की शालीनता, सीता की सादगी, रावण का दंभ और हनुमान की श्रद्धा को मनोज वाजपेयी, जूही चावला, आशुतोष राणा और मुकेश ऋषि ने उपयुक्त स्वर दिया है। विशेष उल्लेखनीय है आशुतोष की आवाज। उन्होंने अपनी आवाज से रावण की क्रूरता और खल स्वभाव को अच्छी तरह संप्रेषित किया है।

फिल्म के एनीमेशन में रंग-रूप और आकार में ताजगी है। सभी किरदार नए लगते हैं। यहां तक कि कैकेयी और मंथरा की साजिश के दृश्य में भी उन्हें कुरूप करने की कोशिश नहीं की गई है। रामायण-द एपिक पारंपरिक आख्यान और आधुनिक तकनीक का सुंदर संयोग है। यह फिल्म बताती है कि हम एनीमेशन विधा में लगातार दक्ष होते जा रहे हैं। अब निर्देशकों को पौराणिक आख्यानों के एनीमेशन के साथ ही आधुनिक भाव बोध की कथाएं भी एनीमेशन में लानी चाहिए।

रेटिंग: 1/2 साढ़े तीन स्टार


Monday, October 18, 2010

फिल्‍म समीक्षा : नॉक आउट

-अजय ब्रह्मात्‍मज

दो घंटे की फिल्म में दो घंटे की घटनाओं को मणि शंकर ने रोमांचक तरीके से गुंथा है। यह फिल्म एक विदेशी फिल्म की नकल है। शॉट और दृश्यों के संयोजन में मणि शंकर विदेशी फिल्म से प्रेरित हैं, लेकिन इमोशन, एक्शन और एक्सप्रेशन भारतीय हैं। उन्होंने भारतीयों की ज्वलंत समस्या का एक फिल्मी निदान खोजा है, जो खामखयाली से ज्यादा कुछ नहीं, फिर भी नॉक आउट अधिकांश हिस्से में रोमांचक बनी रहती है।

यह फिल्म सिर्फ इरफान के लिए भी देखी जा सकती है। टेलीफोन बूथ के सीमित स्पेस में कैद होने और एक हाथ में लगातार रिसीवर थामे रखने के बावजूद इरफान अपनी भाव मुद्राओं और करतबों से दर्शकों को उलझाए रखते हैं। उनके चेहरे के भाव और एक्सप्रेशन लगातार बदलते हैं,लेकिन वे किरदार की दुविधा,पश्चाताप,असमंजस और व्याकुलता को नहीं छोड़ते। उन्होंने निर्देशक की कल्पना को अच्छी तरह साकार किया है। इरफान के अभिनय की तरह फिल्म की संरचना भी उम्दा होती और इस पर किसी विदेशी फिल्म की नकल का आरोप नहीं होता तो निश्चित ही यह साधारण फिल्म नहीं रहती।

भारत से स्विस बैंक में जा रहे धन को फिर से भारत लाने का यह प्रयास अविश्सनीय और बचकाना है। हां, अगर इस फिल्म के बहाने इस मुद्दे पर दर्शकों का ध्यान जाए और वे जागृत हों तो निश्चित ही फिल्म का उद्देश्य पूरा होता है। मणि शंकर ने बताया कि अंग्रेजों ने अपने शासन काल में जितना धन नहीं लूटा, उससे अधिक धन सारे नेता पिछले साठ सालों में देश के बाहर ले जा चुके हैं। वह धन भारत आना चाहिए, लेकिन नॉक आउट के बताए रास्ते से लाना तो नामुमकिन है। इस अविश्वसनीय कहानी को इरफान और सुशांत सिंह जैसे सधे अभिनेताओं ने सहज और विश्वसनीय बनाया है। संजय दत्त का आकर्षक व्यक्तित्व फिल्म का प्रभाव बढ़ाने में कोई मदद नहीं करता और कंगना रनौत माफ करें, कंगना को संवाद अदायगी के लिए उच्चारण पर ध्यान देना होगा। सिर्फ वेशभूषा पर ध्यान देने से किरदार नहीं बनता। कंगना की कमजोरियां इस फिल्म में जाहिर हो गई हैं। टीवी जर्नलिस्ट की भूमिका में वह लचर और बेकार लगी हैं।

रेटिंग: दो स्टार


Sunday, October 17, 2010

मैं अपनी इमेज को फन की तरह लेती हूं-मल्लिका सहरावत

-अजय ब्रह्मात्मज

करीब महीने भर पहले डबल धमालके लिए मल्लिका सहरावत लॉस एंजेल्स के लंबे प्रवास से लौटीं। वहां वह अपनी फिल्म हिस्सके पोस्ट प्रोडक्शन और हालीवुड स्टारों की संगत में समय बिता रही थीं। दूर देश में होने के बावजूद वह अपने भारतीय प्रशंसकों के संपर्क में रहीं। ट्विटर ने उनका काम आसान कर दिया था। करीब से उन पर नजर रखने वालों ने लिखा कि विदेश के लंबे प्रवास से लौटने पर एयरपोर्ट से ही मल्लिका की जबान बदल गई थी। उन्हें बीच में जीभ ऐंठकर अमेरिकी उच्चारण के साथ बोलते सुना गया था, लेकिन एयरपोर्ट पर टीवी इंटरव्यू देते समय फिर से उनकी खालिस बोली की खनक सुनाई पड़ी। सालों पहले अपने ख्वाबों को लेकर हरियाणा से निकली मल्लिका ने अपने सफर में कई उतार-चढ़ाव देखे। वह अभी शीर्ष पर नहीं पहुंची हैं, लेकिन उनकी अदा और अंदाज का निरालापन उन्हें नजरअंदाज नहीं होने देता। झंकार से यह खास बातचीत डबल धमालके लोकेशन पर मुंबई के उपनगर कांदिवली के एक स्कूल के पास हुई। वह थोड़ी फुर्सत में थी और उन्होंने परिचित पत्रकारों को बुला रखा था। हमारी मुलाकात लगभग पांच सालों के बाद हो रही थी।

-पांच सालों का लंबा वक्त गुजर गया। बातचीत का सिलसिला कहां से शुरू करें?

0 आप जहां से हुकम करो...अच्छा पहले यह बताओ कि मैं दुबली दिख रही हूं क्या? आप इतने सालों के बाद मुझे देख रहे हो। बताओ कि कैसी लग रही हूं?

(किसी लडक़ी और वह भी अभिनेत्री के ऐसा पूछने पर आप अच्छी लग रही हैं के सिवा कोई जवाब दे सकते हैं क्या? मल्लिका ज्यादा स्लिम और सुघड़ हो गई हैं। अपनी देह का खास ध्यान रखती हैं वह ... मेरा जवाब होता है आप अच्छी लग रही हैं और खुशी है कि आप जीरो साइज के चक्कर में नहीं हैं)

मल्लिका - ना.. ना..उसमें तो जाना ही नहीं है। आप ने सुना ही होगा बोन आर फॉर डॉग्स - मैन लाइक मीट (वह अपनी ही बात पर खिलखिलाकर हंसने लगती हैं। मल्लिका का यह खास अंदाज है कि वह सामने बैठे व्यक्ति को अपनी खुशी में ले आती हैं।) आप देखें कि हिंदी फिल्मों में जीरो साइज हीरोइनें ज्यादा पापुलर नहीं रहीं। अपने यहां तो भरे-पूरे जिस्म की हीरोइनें पसंद की जाती हैं।

- अच्छी बात है कि आप लगातार एक्टिव हो। ट्विट से आप की गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है। अपने प्रशंसकों के साथ आपके रिश्ते में पर्देदारी नहीं दिखती। आप उनके हर तरह के सवालों के जवाब बेतकल्लुफ अंदाज में देती हैं... यह सब कैसे आरंभ हुआ?

0 जब मैं लॉस एंजेल्स गई तो सच बताऊं कि मुझे अपने देश, प्रशंसकों और प्रियजनों की बेहद याद आ रही थी। मुझे मेरे पब्लिसिस्ट ने सलाह दी कि आप ट्विटर अकाउंट खोलो और सभी से बात करो। मुझे बहुत खुशी हुई कि बगैर किसी मिडिएटर के मैंने अपने प्रशंसकों से सीधे बात कर सकती हूं। उनके सवालों के जवाब दे सकती हूं। मुझे मजा आने लगा कि 140 कैरेक्टर में अपनी जवाब दे सकती हूं। ट्विट पर मैंने पोस्ट, वीडियो और अपनी तस्वीरें भी डालीं।

- एक दिन आप अपने अकाउंट से दुनिया भर के प्रशंसकों को उनकी भाषा में जवाब दे रही थीं और फिर बाद में बता भी दिया कि ट्रांसलिट्रेशन की मदद से आप यह कर रही थीं। मुझे लगता है कि आप की साफगोई प्रशंसकों को पसंद आई होगी?

- बिलकुल। पहले तो वे चौंके और जब मैंने सच बताया तो बहुत खुश हुए। आप जानते हो कि मैं अपने इरादों और बातों में हमेशा ईमानदार रही हूं। आगे भी ऐसी ही रहूंगी।

- चर्चा थी कि मल्लिका अब भारत लौट कर नहीं आएंगी? मुंबई के बाद अब उनका पड़ाव हालीवुड ही रहेगा...

0 मैं वापस आ गई हूं,यही बहुत बड़ा जवाब है। यह इंडस्ट्री मेरा घर है। यहां के लोग मेरे दर्शक हैं। मैं एक एक्टर हूं तो मुझे हालीवुड, स्पेन, कोरिया जहां से भी फिल्म मिलेगी, मैं वहां जाकर फिल्में करूंगी। मुझे हालीवुड की स्क्रिप्ट मिली लव बराक’ ... उसके लिए मैं वहां गई। मैं कान फिल्म फेस्टिवल गई। फिर लौट कर आ गई। फिर से कोई फिल्म मिलेगी तो भविष्य में भी जाऊंगी। वहां जाने और रहने का मतलब यह नहीं है कि मैं वहां बस जाऊंगी।

- लॉस एंजेल्स का एक्सपीरिएंस कैसा रहा? आप वहां हिस्सका भी कुछ काम करती रहीं?

0 बहुत अच्छा एक्सपीरिएंस रहा। हिस्सका डायरेक्शन हालीवुड के डायरेक्टर ने किया है। अगर मैं हिस्सके यूनिक पाइंट की बात करूं तो सबसे पहले यही कहूंगी कि वह पूरी तरह से हिंदी फिल्म है। इच्छाधारी नागिन की फिल्म है। बनाई है जेनिफर लिंच ने...लेकिन उन्होंने इसे देसी फिल्म की तरह बनाया है। यह फुल ऑन देसी फिल्म है, जिसमें मैं इच्छाधारी नागिन का किरदार निभा रही हूं। ख्वाहिशमें मैंने 17 किस दिए थे, लेकिन वहां एक इंसान था मेरे साथ। इस फिल्म में तो मेरे साथ नाग है। वह मेरे लिए चैलेंजिंग था। लिंच का कहना था कि तुम नागिन का किरदार निभा रही हो...बी पैशनेट एंड सेक्सी। नकली नाग के साथ सेक्सी कैसे हो सकती थी?

- वैसे आप इच्छाधारी तो हैं,जो चाहती हैं पूरा कर लेती हैं। आप इच्छाधारी नागिन से कम हैं क्या?

0 क्या बात करते हैं? मैंने अपनी इच्छाओं के साथ मेहनत भी की है। अपने देश में इच्छाधारी नागिन का पापुलर मिथ है। पिछले 24 सालों से इस विषय पर कोई फिल्म नहीं आई है। इस फिल्म की शूटिंग के दरम्यान मुझे पता चला कि साउथ में इच्छाधारी नागिन के मंदिर हैं, जहां औरतें संतान के वरदान के लिए जाती हैं। मैंने नागों के बारे में डिटेल में पढ़ा।

- आप यकीन करती हैं ऐसे मिथ पर ...

0 मुझे नहीं मालूम कि इच्छाधारी नागिन होती है कि नहीं? और वे बदला लेती है क्या...इस फिल्म में मैं तो बदला लेती हूं और मेरे शिकार अपनी जान के लिए प्रार्थना करते हैं।

- इच्छाधारी नागिन ही बदला लेती है या मल्लिका भी...

0 दोनों...मजाक की बात छोड़ें तो एक एक्टर के लिए नागिन का रोल निभाना। कैमरे के आगे नागिन में तब्दील होना। ऐसा अवसर मुश्किल से मिलता है। मुझे भट्ट साहब की हिदायत याद आती है... वे कहते थे ...बाद में पछताओगी और तरस जाओगी ऐसे रोल के लिए। अपने किरदारों को खुद में सोख लो। केरल में कीचड़ में शूटिंग करते समय बदन पर जोंक और कीड़ों को रेंगते देख कर लगता था कि कहां फंस गई, लेकिन अब पर्दे पर देखती हूं तो संतोष होता है।

- कितना मुश्किल रहा नागिन में बदलना?

0 बहुत मुश्किल प्रोसेस था। तीन घंटों में मुझे नागिन में ढाला जाता था। फिर मैं चल नहीं सकती थी। सेट पर मुझे वे उठा कर ले जाते थे। खाना-पीना भी छोड़ देती थी, क्योंकि मैं बाथरूम भी नहीं जा सकती थी। ऊपर से जेनिफर कहती थी कि ग्लैमरस और सेक्सी दिखो। आप बताएं, पेट में दाना न हो तो कोई सेक्सी कैसे दिखेगा? फिर भी मैंने कोशिश की।

- कितने दिनों के बाद आप लौटी हैं? कैसा स्वागत हुआ आपका?

0 एक ही साल तो लगातार बाहर रही। मुंबई लौटी तो एयरपोर्ट पर पूरा मीडिया मौजूद था। मेरा भाई विक्रम मुझे लेने आया था। दिल भर आया। इतना प्यार और अपनापन दिखाया लोगों ने। उस दिन मैंने महसूस किया कि मेरे प्रशंसकों का जूता भी सिर-आंखों पर। वे मेरी दुनिया हैं। मैं आज जो भी हूं, उन्हीं की वजह से हूं।

- और इंडस्ट्री का रवैया? क्या कह सकता हूं कि आप जितने दिन बारह रहीं, उतने दिन इंडस्ट्री ने इंतजार किया?

0 कोई किसी का इंतजार नहीं करता, पर एक बात कहूंगी कि इंडस्ट्री मेरे प्रति बहुत जेनेरस रही। आते ही डबल धमालकी शूटिंग शुरू हो गई। अभी तो दुनिया ग्लोबल विलेज हो गई है। फेसबुक और ट्विटर ने सभी से जोड़ रखा है। आप अभी न्यूयॉर्क में हो और कल मुंबई में हो। मेरे दो घर हो गए हैं - मुंबई और लॉस एंजेल्स।

- हालीवुड में क्या रवैया रहा आपके प्रति? वहां की फिल्म कब रिलीज हो रही है?

0 उनका भी रवैया बहुत अच्छा रहा। हालीवुड की फिल्म अगले साल रिलीज होगी। अभी पोस्ट प्रोडक्शन का काम चल रहा है। उसका भारतीय टायटल लव बराकहोगा। हालीवुड में पालिटिक्स ऑफ लवनाम से वह रिलीज होगी। उसका रफ ट्रेलर सभी ने देखा होगा। बिल क्लिंटन से हुई मुलाकात में मैंने उन्हें इस फिल्म के बारे में बताया तो वे खुश हुए कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट के बीच कोई रोमांटिक कामेडी बन रही है। उन्होंने खैर मनाया कि यह सीरियस फिल्म नहीं है। उन्होंने फिल्म देखने की इच्छा जाहिर की है।

- ‘पालिटिक्स ऑफ लवतो आप पर्दे पर करेंगी, लेकिन जीवन में चल रहे पॉलिटिक्स ऑफ फेम के बारे में क्या कहेंगी?

0 यह तो आज है, कल नहीं है। मैं इसे सीरियसली नहीं लेती। अपने एक्टर होने को मैं एंज्वॉय करती हूं। किसे मालूम कि कल क्या होगा? मेरे लिए हिस्सएक बड़ा एक्सपीरिएंस है। मैं चाहूंगी कि ऐसी फिल्में करती रहूं।

- ‘हिस्सके आगे-पीछे आप ज्यादातर कामेडी फिल्में कर रही हैं। आप की जैसी इमेज बन चुकी है, उस से मिजाज में ये फिल्में थोड़ी अलग हैं?

0 सबसे पहले तो आप ये बताएं कि मेरी क्या इमेज है?

- आप एक सेक्सी इमेज की एक्ट्रेस हो, जो रियल लाइफ में काफी बिंदास और इंडपेंडेट मिजाज की है।

0 वो तो मैं हूं। लेकिन आप बताएं कि मर्डरअश्लील फिल्म थी क्या? और अगर थी तो 2004 की बड़ी हिट कैसे हो गई?

- आप की रियल पर्सनैलिटी और इमेज में थोड़ा फर्क है, लेकिन बड़े चालाक तरीके से आप अपनी इमेज को मेंटेन करती हैं। आप के ट्विट हों या बातें... उनमें एक खुलापन और बिंदासपन है, जो कई बार प्रशंसकों और दर्शकों की संतुष्टि के लिए लिखा-कहा लगता है...

0 चालाक तरीके से... आप का यह इंटरपटेशन मुझे अच्छा लगा। प्रशंसकों को जो बातें पसंद हैं, वैसी ही बातें करती हूं। मुझे किसी भी सवाल का जवाब देने में कोई हिचक नहीं होती, लेकिन ऐसा न समझें कि मैं अपने प्रशंसकों को उत्तेजित करने के लिए वैसा कुछ लिखती हूं। मैं वैसे ही सोचती हूं और मुझे सेक्स की बातें करने में कोई झिझक नहीं होती। मुझे लगता है कि मेरे प्रशंसक भी मेरे जवाब से संतुष्ट रहते हैं। सारी समस्या है कि मीडिया ने मुझे खास ढंग से प्रोजेक्ट किया। वे उसे बढ़ाते और बताते रहते हैं। सेक्सी होना तो मेरे व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। मैं और भी कुछ हूं। फिर भी मीडिया के इस अटेंशन से मुझे दिक्कत नहीं होती। 2005 में मैं जैकी चान के साथ कान फिल्म फेस्टिवल गई थी तो स्वाभाविक रूप से मीडिया ने ज्यादा ध्यान दिया था। मैं अपनी इमेज को फन की तरह लेती हूं। मैं पूरा एंज्वॉय करती हूं। मैं उसके साथ प्ले करती हूं। मर्लिन मुनरो, मधुबाला और माधुरी दीक्षित की सेक्सी इमेज रही। मैं गर्ल नेक्स्ट डोर नहीं हूं। दर्शकों को गर्ल नेक्स्ट डोर ही चाहिए तो वे थिएटर न आएं ...पड़ोस की लडक़ी को ही देखें।

- अपनी सोसायटी में अभी तक सेक्सुयैलिटी को स्वीकार नहीं किया गया है। वात्सयायन और कामसूत्र के देश में अंग्रेजों के साथ आईं विक्टोरियन धारणाएं ही प्रचलित हैं, इसलिए आप की बातें मीडिया और प्रशंसकों को चौंकाती हैं ...शरीर को देखने का हमारा नजरिया संर्कीण कहा जाएगा क्या?

0 यह तो मीडिया और समाज तय करे। मैंने मर्डरमें स्विम शूट पहना था तो बवाल हो गया था, लेकिन उसके बाद तो हीरोइनों ने लाइन लगा दी। क्या-क्या नहीं पहना हीरोइनों ने...और यह शरीर? यह तो आप पुरूषों की वजह से अश्लील मान लिया गया है।

- अगर मैं पूछूं कि पश्चिमी पुरुष से भारतीय पुरुष कितने भिन्न हैं तो क्या जवाब होगा आप का?

0 हाथ मिलाने से लेकर किस करने और हग करने तक में फर्क है। वहां एक खुलापन है। अपने यहां लिहाज और शर्म है, लेकिन अपने देश का यूथ बदल चुका है। पश्चिमी प्रभाव माने या उसका एक्सप्रोजर कहें ...वह नए एक्सपीरिएंसेज के लिए तैयार है।

- क्या दर्शक बदल रहे हैं?

0 ‘मर्डरके समय कितना विवाद हुआ था, लेकिन आप ने इश्कियाको स्वीकार कर लिया। वह तो खुले आम फ्लर्ट करती है। उसके सामने मर्डरका मेरा किरदार फीका लगता है। अभी लोगों की मोरैलिटी बदल रही है। बड़े शहरों में लडक़े-लड़कियों के विचार बदल रहे हैं। मुझे लड़कियों के पत्र आते हैं - मल्लिका यू शोन द वे। मुझे ऐसा लगता है कि एक हिंदुस्तान में कई हिंदुस्तान बसते हैं और एक आदमी के अंदर कई आदमी रहते हैं। और इन सारी बातों से क्या फर्क पड़ता है? अगर वे मेरी फिल्में देख रहे हैं तो सब ठीक है। आखिरकार यह शो बिजनेश है।

- लेकिन मल्लिका का सफर लोगों को प्रेरित करता है। आप की कामयाबी और करतूत हम लिखते हैं तो उसका एक असर होता है़...ऐसे में आप खुद को कितना जिम्मेदार महसूस करती हैं?

0 मुझे लगता है कि हिंदी अखबारों का ज्यादा असर होता है। मेरा उन पाठकों से एक कनेक्शन भी बनता है। मुझे लगता है कि वे मुझे अपने इलाके का और अपनी पहुंच में पाते हैं। गौर करें तो हम सभी दुविधा और पाखंड में जीते हैं। दुविधा से तो आप निकल सकते हैं। पाखंड से नहीं निकल सकते। हमारा समाज पाखंडी रहा है। ख्वाहिशऔर मर्डरके समय से मैं यह महसूस कर रही हूं। आप ने सही कहा कि मेरा सफर लंबा रहा है। मैं तो यही कहूंगी कि अपनी लड़ाई होशियारी से चुनें, क्योंकि प्रतिभा आप के चुनाव पर निर्भर करती है। भट्ट साहब ने बहुत पहले इसका एहसास करवाया था...

- थोड़ा स्पष्ट करें, क्योंकि यह छोटे शहरों की महत्वाकांक्षी लड़कियों के लिए महत्वपूर्ण है?

0 अपने निजी अनुभव से मैं यह जानती हूं कि लड़कियों को करिअर बनाने के लिए बढ़ावा नहीं दिया जाता। हमेशा लड़कियों को कहा जाता है कि तुम बड़ी हो गई, शादी करो, बच्चे पैदा करो और घर बसाओ। मुझे लगता है कि हमें अपनी जमीन तलाश कर लेनी चाहिए और उस पर टिके रहना चाहिए। अपने बड़ों और परिवार को कभी शर्मिंदा न होने दें। आज कल के बच्चे बहुत समझदार हैं। वे माता-पिता को ठेस नहीं पहुंचा सकते, लेकिन माता-पिता भी बच्चों को समझें। लड़कियां ईमानदार और तेज हो गई हैं। अपने समाज को देखते हुए ही व्यवहार करें।

- कई बार करिअर के चुनाव में परिवार आड़े आ जाता है। फिर क्या करें? आप के भी करिअर में ऐसी मुश्किलें आई थीं...

0 हां, मुझे तो बहुत दिक्कत हुई थी मेरे पिता ने मुझे आज तक माफ नहीं किया। फिल्मों में मेरी एंट्री को वे स्वीकार नहीं सके। मैं उन्हें मिस करती हूं। मुझे परिवार का पूरा समर्थन और प्यार नहीं मिला। उसकी कमी महसूस होती है। मेरा भाई हमेशा मेरे साथ रहा। लेकिन अभी फर्क आ गया है। छोटे शहरों के पैरेंट्स भी समझने लगे हैं। बेहतर होता है कि परिवार के समर्थन से ख्वाब बुनें।

- आप के भाई हिस्सके निर्माता हैं...

0 हां, उसने बहुत बड़ा रिस्क लिया है। यह मैं तेरी नागिन...टाइप की फिल्म नहीं है। वक्त काफी आगे बढ़ गया है। वीएफएक्स का इस्तेमाल किया गया है। मैं फिल्म में जिंदा इंसान को निगल जाती हूं। यह कोई आसान काम है। सात इंसानों को निगल जाती हूं।

- अचानक डबल धमालका इरादा कैसे हो गया?

0 मुझे लगा कि वेलकमके बाद डबल धमालही किया जा सकता है। इस बीच कुछ और किया नहीं है। हिस्सथ्रिलर है। उसके बाद कामेडी का तडक़ा ठीक रहेगा।

- और क्या बताना चाहोगे आप?

0 आप बताओ कि आप क्या जानना चाहते हो? चलो मैं एक सवाल पूछती हूं कि मीडिया क्यों मुझे हमेशा सेक्सी इमेज में पेश करती है। मेरे पास और भी चीजें हैं। सेक्स तो एक पहलू है।

- वह इसलिए कि बाकी एक्ट्रेस न तो तस्वीर से और न बातों से सेक्सी इमेज बनाने के काम आ पाती हैं। तस्वीरें खिंचवा भी लें तो उनकी बातों में खुलापन नहीं रहता। मल्लिका इस मायने में सब के काम आ जाती है

0 बिल्कुल सही कह रहे हैं आप। तो आप मान रहे हो कि मैं सबसे अलग हूं। शुरू से ही मेरा ऐसा माइंडसेट रहा। भट्ट साहब ने उसे मजबूत किया। अगर सभी लेफ्ट जा रहे होंगे तो मैं राइट जाऊंगी। और ऐसा करते हुए भी मैं उसमें डूबती नहीं हूं। मैं इसमें पर्सनली शामिल नहीं हूं। मेरे लिए यह गेम है। लाइफ इज टू बी एंटरटेंड एंड एंटरटेन। मैं अपने प्रशंसकों को ट्विटर पर साफ बताती हूं कि आप सारी चीजें सीरियसली मत लो। आप बताओ कि हालीवुड के लॉस एंजेल्स के सिटी हाल में मेरा सम्मान हुआ। वहां के कौंसिल मेंबर और मेयर ने मेरा सम्मान किया। यह सब मुझे रिच करता है।

- लेकिन इस ग्लैमर, सम्मान और नाम में मल्लिका खो तो नहीं गई? हरियाणा की वह किशोर लडक़ी, जिसकी आंखों में सपने चमकते थे ...

0 बिल्कुल नहीं। मेरी नाक भले ही आसमान में हो, मेरे पैर जमीन पर ही हैं। बहुत अच्छा समय चल रहा है। अभी हिस्सआ रही है। हिंदी फिल्म को एक हालीवुड डायरेक्टर ने डायरेक्ट किया है। इसमें होली, नागिन और सारे अपने मसाले हैं।

- कहते हैं कि एक्टर ऑफ स्क्रीन और ऑन स्क्रीन परफॉर्म ही करता रहता है। इसमें उसका सेल्फ और रियल इमोशन खो जाता है...

0 यह सच है। हर वक्त परफार्मेंस चलता रहता है,लेकिन उनके बीच भी मल्लिका रहती है। जब किसी ग्लोबल आइकॉन से मिलती हूं और वे मुझे रिकॉगनाइज करते हैं तो बहुत खुशी होती है। मेरे लिए वे खास क्षण होते हैं। मेरी आंखों में फिर से सारे सपने तैरने लगते हैं। कुछ तो है कि मुझ से मिलने वाले ही स्टार स्ट्रक हो जाते हैं। यह सच है। मैं तो ट्रेंड सेटर रहा हूं।

- किन लोगों की मदद मिलती है आप को ...

0 लॉस एंजेल्स में जैकी चान के स्टाफ से काफी मदद मिली। मेरे साथ भट्ट साहब का आर्शीवाद रहता है और ऑफ कोर्स मेरा भाई विक्रम... इन सभी की मदद से मैं आगे बढ़ती रहती हूं। मैं भट्ट साहब को बहुत मिस करती हूं।

- कुछ और कर रहे हो आप?

0 पुनर्जन्म पर एक हिंदी फिल्म है, लेकिन अभी उसके बारे में नहीं बता सकती। ऑफर तो आते ही रहते हैं। मैं फिल्मों में दीवार पर सजे फूल की तरह नहीं आना चाहती। मैंने कुछ गलत फिल्में भी की हैं, लेकिन उनसे सीखा है। सभी ऐसे फैसलों से गुजरते हैं। फ्लॉप भी जरूरी हैं। उनसे आप जमीन पर आ जाते हैं।

- हिस्समें आप के साथ इरफान खान हैं। वे बहुत संजीदा अभिनेता माने जाते हैं। आपका कैसा अनुभव रहा?

0 इरफान के साथ सेट पर रहने से ही आप बहुत कुछ सीख सकते हैंं। वे काफी मदद करते हैं। वे विदेशों में अच्छा कर रहे हैं। उनकी खास पहचान है क्या? उनकी वजह से फिल्म के इंटरनेशनल मार्केट में खरीदार मिले। लिंच से भी मदद मिली।

- पश्चिम और भारत के अनुभवों के बाद बेस्ट क्या है आपके लिए?

0 मैं तो दोनों जगह से बेस्ट चुनूंगी। भारत की गर्मजोशी साथ रखूंगी। पश्चिम का प्रोफेशनलिज्म हमें सीखना चाहिए। हमारी मेहमानवाजी कहीं और नहीं है। वहां शूटिंग करते समय भारतीय मेरे लिए खाना लाते थे तो पश्चिम की यूनिट के लोग चौंकते थे कि तुम कैसे किसी का भी लाया खाना खा सकते हो? तुम्हें डर नहीं लगता। पश्चिम के लोग प्रशंसकों के प्यार को नहीं समझ पाते। भला मेरा प्रशंसक मुझे नुकसान पहुंचाएगा?