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Monday, September 27, 2010

कश्यप बंधु की कामयाबी

कश्यप बंधु की कामयाबी


कश्यप बंधु की कामयाबी

दस सितंबर को अभिनव सिंह कश्यप की फिल्म दबंग देश-विदेश में रिलीज हुई और पहले ही दिन दर्शकों की भीड़ की वजह से हिट मान ली गई। ईद के मौके पर रिलीज हुई सलमान खान की इस फिल्म के प्रति पहले से दर्शकों की जिज्ञासा बढ़ी थी। संयोग ऐसा रहा कि फिल्म ने आम दर्शकों को संतुष्ट किया। यह फिल्म मल्टीप्लेक्स के साथ सिंगल स्क्रीन थिएटर में भी चल रही है। दबंग की कामयाबी ने अभिनव को पहली ही फिल्म से सफल निर्देशकों की अगली कतार में लाकर खड़ा कर दिया है। ताजा खबर है कि उन्हें अगली फिल्मों के लिए पांच करोड़ से अधिक के ऑफर मिल रहे हैं।

शायद आप जानते हों कि अभिनव चर्चित निर्देशक अनुराग कश्यप के छोटे भाई हैं। अनुराग भी अलग किस्म से सफल हैं, लेकिन उन्हें पांच फिल्मों के बाद भी दबंग जैसी कॉमर्शियल कामयाबी नहीं मिली है। वे ऐसी सफलता की बाट जोह रहे हैं, लेकिन दूसरे स्तर पर उनकी कामयाबी भी कई फिल्मकारों के लिए ईष्र्या का कारण बनी हुई है। वे अपनी विशेष फिल्मों की वजह से मशहूर हैं।

जिस हफ्ते अभिनव की फिल्म दबंग देश-विदेश में रिलीज हुई। ठीक उन्हीं दिनों अनुराग की फिल्म दैट गर्ल इन येलो बूट्स वेनिस के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित की गई। अगले हफ्ते यह फिल्म 19 सितंबर को टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित और प्रशंसित हुई। अनुराग भारत की युवा पीढ़ी के ऐसे निर्देशकों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो भारतीय सिनेमा को इंटरनेशनल सिनेमा के समकक्ष लाने की कोशिश में लगे हैं। देव डी की कॉमर्शियल कामयाबी के बावजूद अनुराग ने दैट गर्ल इन येलो बूट्स जैसी छोटी और सार्थक फिल्म बनाई और बताया कि सारे युवा निर्देशक स्टार और बिग बजट की गिरफ्त में नहीं आते।

कहते हैं कि परिवार और परिवेश का असर हमारी क्रिएटिव सोच पर पड़ता है। एक ही परिवार के छोटे-बड़े भाई अभिनव और अनुराग की सोच की भिन्नता पर गौर करें, तो पाएंगे कि एक ही परिवेश और परिवार से आने के बावजूद सिनेमा के प्रति दोनों का अप्रोच बिल्कुल अलग है। आरंभ में लगभग एक जैसे काम के साथ आगे आए अभिनव और अनुराग में यह भिन्नता पिछले पांच-छह सालों में आई है। अनुराग अपने आक्रामक व्यक्तित्व और जुझारू स्वभाव की वजह से हमेशा चर्चा में रहे, जबकि उनके छोटे भाई अभिनव को अधिक व्यावहारिक और सोशल स्वभाव का माना जाता है। अभिनव की शुरू से कोशिश रही कि उन्हें अनुराग की प्रतिलिपि या प्रतिछाया नहीं माना जाए। इस कोशिश में उन्होंने एक अलग राह चुनी और दबंग तक आ गए। अभी कहना मुश्किल है कि दबंग ही अभिनव की सोच है। उनके करीबी जानते हैं कि दबंग उनकी कथा के ढांचे पर सलमान खान द्वारा खड़ी की गई फिल्म है। इसे सलमान ने अपनी तरह से बनाया और पेश किया है। इस फिल्म के निर्देशक अभिनव जरूर हैं, लेकिन दबंग सौ फीसदी उनकी फिल्म नहीं कही जा सकती। फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश के लिए अभिनव ने दबंग के रूप में शुल्क चुकाया है। उम्मीद की जा सकती है कि उनकी अगली फिल्में उनके स्वभाव और सोच की होंगी। यह खुशी की बात है कि बनारस के एक गैरफिल्मी मध्यवर्गीय परिवार से आए दो भाई आज अपने-अपने ढंग से फिल्म इंडस्ट्री में कामयाब हो चुके हैं। उनकी कामयाबी हजारों युवकों को प्रेरित करेगी।


Thursday, September 16, 2010

बदलता दौर, बदलते नायक-मंजीत ठाकुर

भारत में सिनेमा जब शुरु हुआ, तो फिल्में मूल रुप से पौराणिक आख्यानों पर आधारित हुआ करती थीं। लिहाजा, हमारे नायक भी मूल रुप से हरिश्चंद्र, राम या बिष्णु के किरदारों में आते थे।

पहली बोलती फिल्म आलम आरा’ (1931) के पहले ही हिंदी सिनेमा की अधिकांश परिपाटियाँ तय हो चुकी थीं, लेकिन जब पर्दे पर आवाज़ें सुनाई देने लगीं तोअभिनेताओं के चेहरों और देह-भाषा के साथ अभिनय में गले और स्वर की अहमियत बढ़ गई।

1940 का दशक हिंदी सिनेमा का एक संक्रमण-युग था। वह सहगल, पृथ्वीराज कपूर,सोहराब मोदी, जयराज, प्रेम अदीब, किशोर साहू, मोतीलाल, अशोक कुमार सरीखे छोटी-बड़ी प्रतिभाओं वाले नायकों का ज़माना था तो दूसरी ओर दिलीप कुमार, देव आनंद, किशोर कुमार और भारत भूषण जैसे नए लोग दस्तक दे रहे थे।

पारसी और बांग्ला अभिनय की अतिनाटकीय शैलियां बदलते युग और समाज में हास्यास्पद लगने लगीं, उधर बरुआ ने बांग्लादेवदासमें नायक की परिभाषा को बदल दिया।

अचानक सहगल और सोहराब मोदी जैसे स्थापित नायक अभिनय-शैली में बदलाव की वजह से भी पुराने पड़ने लगे। मोतीलाल और अशोक कुमार पुराने और नए अभिनय के बीच की दो अहम कड़ियाँ हैं। इन दोनों में मोतीलाल सहज-स्वाभाविक अभिनय करने में बाज़ी मार ले जाते हैं। लेकिन कलकत्ता में लगातार तीन साल चलने वाली क़िस्मत में प्रतिनायक के किरदार में अशोक कुमार एक अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे।

आजा़दी के आसपास ही परदे पर देवानंद, राजकपूर और दिलीप कुमार सितारे की तरह उगे। दिलीप कुमारनुमा रोमांस का मतलब था ट्रैजिक रोमांस। दिलीप कुमार,रोमांस हो या भक्ति, मूल रुप से अपनी अदाकारी को केंद्र में रखते थे, और वे ट्रेजिडी किंग के नाम से मशहूर भी हो गए। दिलीप कुमार ने अभिनय की हदें बदल डालीं।


आजादी के बाद के युवाओं में रोमांस का पुट भरा, देवानंद ने। देवानंद कॉलेज केलड़कों में, एडोलेसेंट लेवल पर काफी लोकप्रिय थे। देव आनंद हॉलीवुड के बड़े नायक ग्रेगरी पेक से प्रभावित तो हुए लेकिन पेक की कुछ अदाओं को छोड़कर उन्होंने उनसे अच्छा अभिनय कभी नहीं सीखा जो पेक की रोमन हॉलिडे’, ‘टु किल ए मॉकिंग बर्डया दि गांस ऑफ़ नावारोनेमें दिखाई देता है।

एक मज़ेदार प्लेब्वॉय बनकर ही रह गए देवानंद की लोकप्रियता कई बार दिलीप कुमार और राजकपूर से ज़्यादा साबित हुई। इस तिकड़ी में देव ही ऐसे थे जिनकी नकल करोड़ों दर्शकों ने की, लेकिन उनके किसी समकालीन ने उसकी नकल करने की ज़ुर्रत नहीं की।

राज कपूर, एक अच्छे अभिनेता तो थे ही लेकिन उससे भी बड़े निर्देशक थे। अपनी फिल्मों में अदाकार के तौर पर उन्होंने हमेशा आम आदमी को उभारने की कोशिश की। आर के लक्ष्मण के आम आदमी की तरह के चरित्र उन्होने रुपहलेपरदे पर साकार करने की कोशिश की।

राज कपूर, दिलीप कुमार और देवानंद, ये तीनों एक स्टाइल आइकॉन थे। लेकिन इन तीनों का जादू तब चुकने लगा, जब एक किस्म का रियैलिटी चेक (जांच) जिदंगी में आया।

इस तिकडी़ के शबाब के दिनों में ही बलराज साहनी ने दो बीघा ज़मीन केज़रिए मार्क्सवादी विचारों को सिनेमाई स्वर दिए। दो बीघा ज़मीन उ ज़माने की पहली फिल्म थी, जिसमें इटालियन नव-यथार्थवाद की झलक तो थी ही,इसका कारोबार भी उम्दा रहा था।

फिल्म में बेदखल सीमांत किसान की भूमिका को बलराज ने जीवंत कर दिया था। बेहद हैंडसमरहे साहनी हिंदी सिनेमा के पहलेअसलीकिसान-मज़दूर के रूप में पहचाने गए। दरअसल, अभिनय के मामले में अपने समकालीनों से बीस ही रहे साहनी, ओम पुरी, नसीर और इरफान के पूर्वज ठहरते हैं।

गुरुदत्त बेहद निजी किस्म की फिल्में बनाते थे। लेकिन उनका दायरा बेहद सार्वजनिक हुआ करता था।

गुरुदत्त ने परदे पर एक अलग तरीके के नायक की रचना की। काग़ज़ के फूलके नायक ने दुनिया के बेगानेपन पर अपनी तल्ख़ टिप्पणी छोड़ी।

इसी दशक में मदर इंडिया भी आई। परदे पर विद्रोह और आदर्शवाद साथ दिखा। भारत माता के रुप में उकेरी गई नरगिस ने अपने ही डकैत बेटे को गोली मारकर आदर्शवाद की नई छवि गढ़ दी। लेकिन दर्शकों का एक ऐसा वर्ग तैयार होना शुरु हो चुका था, जिसकी सहानुभूति डकैत बेटे सुनील दत्त से थी।

उधर अभिनय-शैली के मामले शुरु में एल्विस प्रेस्ली से प्रभावित शम्मी कपूर ने बाद में खुद की जंगलीशैली विकसित की । इसका गहरा असर जितेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती वगैरह से होता हुआ गोविंदा तक आता है। यह संकोचहीन नाच-गाने का पॉपुलर कल्चर है।

1969 में को शक्ति सामंत की ब्लॉकबस्टर आराधना ने रोमांस के एक नए नायक को जन्म दिया, जो पूछ रहा था, मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू....इस के साथ ही हिंदी सिनेमा में सुपरस्टारडम की शुरुआत हुई। राजेश खन्ना दिलीप कुमार की परंपरा में थे और रोमांटिक किरदारों में नजर आते रहे। किशोर कुमारकी आवाज़ गीतों के लिए परदे पर राजेश खन्ना की आवाज़ बन गई, और इसने राजेश खन्ना को एक मैटिनी आइडल बना दिया। परदे पर पेड़ों के इर्द-गिर्द नाच-गाने लोगों को दुनियावी मुश्किलों से कुछ देर के लिए तो दूर कर देते थे लेकिन समाज परदे पर परीकथाओं जैसी प्रेमकहानियों को देखकर कर कसमसा रहा था।


जाहिर है, सिनेमा का एक बेहद प्रचलित मुहावरा विलिंग सस्पेंसन ऑफ़ डिसविलिफ़ सच होता दिख रहा था।

लेकिन तभी परदे पर रोमांस की नाकाम कोशिशों के बाद फिल्म जंज़ीर में एक बाग़ी तेवर की धमक दिखी, जिसे लोगों ने अमिताभ बच्चन के नाम से जाना। गुस्सैल निगाहों को बेचैन हाव-भाव और संजीदा-विद्रोही आवाज़ ने नई देहभाषा दी। और उस वक्त जब देश जमाखोरी, कालाबाज़ारी और ठेकेदारों-साहूकारों के गठजोड़ तले पिस रहा था, बच्चन ने जंजीर और दीवार जैसी फिल्मों के ज़रिए नौजवानों के गुस्से को परदे पर साकार कर दिया।

विजय नाम का यह नौजवान इंसाफ के लिए लड़ रहा था, और उसे न्याय नहींमिले तो वह अकेला मैदान में कूद पड़ता था।

लेकिन बदलते वक्त के साथ इस नौजवान के चरित्र में भी बदलाव आया। जंजीरमें उसूलों के लिए सब-इंसपेक्टरी छोड़ देने वाला नौजवान देव तक अधेड़ हो जाताहै। देव में इसी नौजवान के पुलिस कमिश्नर बनते ही उसूल बदल जाते हैं, और वह समझौतावादी हो जाता है।

90 के दशक की शुरुआत में अमिताभ बच्चन का गुस्सैल नौजवान अप्रासंगिक होता दिखा। 90 के दशक में भारत बदला, नई नीतियां आ गईं और तरक्की की ओर जाने के रास्ते बदल गए, तो बाग़ी तेवरों के लिए दर्शकों के लिए जो अपीलथी, वो ख़त्म होने लगी।

रेगुलराइजेशन होने लगा तो नए हिंदुस्तान को दिखाने के लिए सिनेमा में नए चेहरों की ज़रुरत पड़ी। इस मौके को वैश्विक भारतीय बने राज मल्होत्रा यानी शाहरुख ख़ान ने थाम लिया। इनका किरदार नौकरी के लिए कतार में नहीं लगता, उसे भूख की चिंता नहीं है, वह एनआरआई है, और अपने प्यार को पाने लंदन से पंजाब के गांव तक आ जाता है।


आमिर में शाह रुख़ जैसी अपील तो नही है लेकिन वह अदाकारी में शाह रुख़ से कई क़दम आगे हैं। शाह रुख़ तड़क-भड़क में आगे हैं लेकिन अपनी फ़िल्मों में मैथड एक्टिंग के ज़रिए आमिर, शाह रुख़ के जादू पर काबू पा लेते हैं। एक तरह से आमिर मिडिल सिनेमा में मील के पत्थर है तो शाहरुख सुपर सितारे की परंपरा के वाहक।


Wednesday, September 15, 2010

दरअसल:प्रतिभा और प्रतिमा

हिंदी फिल्मों समेत पॉपुलर कल्चर के सभी क्षेत्रों में इन दिनों प्रतिमाओं की तूती बोल रही है। इन्हें आइकॉन कहा जा रहा है और उन पर केंद्रित रिपोर्ट, फीचर और समाचार लिखे जा रहे हैं। इस भेड़चाल में प्रतिभाएं कहीं पीछे रह गई हैं। उनकी किसी को चिंता नहीं है। सभी प्रतिमाओं के पीछे भाग रहे हैं। कहते हैं आज का बाजार इन्हीं प्रतिमाओं की वजह से चल रहा है।

फिल्मों की बात करें, तो अभी ऐसी अनेक प्रतिमाएं मिल जाएंगी, जिनमें मौलिक प्रतिभा नहीं है। ऐसी प्रतिमाएं किसी न किसी तरह चर्चा में बनी रहती हैं। कहा और माना जाता है कि मीडिया और पीआर का पूरा तंत्र ऐसी प्रतिमाओं को पहले क्रिएट करता है और फिर उन्हें भुनाता है। किसी जमाने में पेपर टाइगर हुआ करते थे। इन दिनों पेपर आइकॉन हो गए हैं। इनका सारा प्रभाव कागजी होता है। कई ऐसे फिल्म स्टार हैं, जिन्हें हम दिन-रात देखते, सुनते और पढ़ते रहते हैं, लेकिन महीनों-सालों से उनकी कोई फिल्म नहीं आई है। कभी कोई आ भी गई, तो दर्शक उसे देखने नहीं गए। फिर आश्चर्य होता है कि क्या सचमुच पाठक ऐसे स्टार्सं के बारे में पढ़ना चाहते हैं या किसी प्रपंच के तहत वे अखबारों और टीवी के पर्दे पर मुस्कराते नजर आते रहते हैं।

किसी स्टार का नाम लेकर उसकी तौहीन करने की मेरी कोई मंशा नहीं है, लेकिन अनेक पॉपुलर और बिग स्टार अपनी ही फिल्मों के सपोर्टिग स्टार के टैलेंट के पासंग भी नहीं होते। फिर भी वे छाए रहते हैं। उन्हें केंद्रीय भूमिकाएं मिलती हैं। उन्हें ज्यादा पारिश्रमिक मिलता है। वे अपने प्रभाव से प्रतिभाओं को हाशिए पर रखते हैं और कहीं न कहीं इस साजिश में भी संलग्न रहते हैं कि मौलिक प्रतिभाओं को बड़े अवसर न मिल जाएं। वे इरादतन उन्हें धकियाते हैं और मंच से गिरा भी देते हैं। अफसोस की बात है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इस अंदरूनी षड्यंत्र और कुचक्र पर कभी कुछ नहीं लिखा जाता। कभी कोई पत्रकार लिखने का साहस करे, तो हमारे स्टार जल्दी ही उसकी छुट्टी करवा देते हैं। अगर कभी वे ऐसा नहीं कर पाते, तो उसे वंचित और अछूत बनाकर रख देते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी अनेक अनकही दास्तानें हैं।

प्रतिभा और प्रतिमा में भ और म का फर्क है। पेट भरने पर प्रतिभा खुद ही प्रतिमा बनने के लिए सक्रिय हो जाती है। सभी क्षेत्रों में देखा गया है कि शुरुआती दिनों में अपनी प्रतिभा की विलक्षणता से चौंकाने और जगह बनाने के बाद ज्यादातर कलाकार चूकने लगते हैं। उनमें प्रतिभा की ठोस पूंजी नहीं रहती और न निरंतर अभ्यास से वे उसे बढ़ाने की कोशिश करते हैं। नतीजा यह होता है कि वे आरंभिक गौरव का मुकुट धारण कर लेते हैं। वे चाहते हैं कि उसी जगमगाहट में उनकी जिंदगी निकल जाए।

हमारा यह दौर चकाचौंध से भरा है। हमें केवल चमकती चीजें ही दिखाई पड़ती हैं। यही वजह है कि जनमानस में भी प्रतिभाओं से अधिक प्रतिमाओं की पूजा होती है। हमारी संस्कृति में भी मूर्ति पूजा का चलन है, जो भ्रष्ट रूप में हमारे सामाजिक जीवन में प्रतिमा पूजा और प्रशंसा के तौर पर सामने आ रहा है। जरूरत है कि हम अपने समय की प्रतिभाओं को पहचानें। उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने के अवसर दें और उनके योगदान को रेखांकित करें। उन गुमनाम प्रतिभाओं की भी प्रतिमाएं बताएं। दरअसल, हमें प्रतिभा की कद्र करनी चाहिए। प्रतिभा हो तभी प्रतिमा का महत्व है।


Saturday, September 4, 2010

एवरेस्ट से आगे जाना है मुझे..: करीना कपूर

-अजय ब्रह्मात्‍मज
एवरेस्ट से आगे जाना है मुझे..: करीना कपूर

खुशी की बात है कि दस साल आपके करियर को हो रहे हैं। इसमें बहुत सारे मोमेंट्स रहे होंगे जो सेलब्रेशन के रहे होंगे, कुछ एक डिप्रेशन के भी रहे होंगे। कुछ एक ऐसे भी होंगे,जहां लगा होगा कि छोड दें इंडस्ट्री। ऐसा भी लगा होगा कभी कि नहीं अभी कुछ करना है। कैसे देखती हैं दस वर्षो के अपने सफर को?

इंडस्ट्री की बच्ची हूं मैं, क्योंकि कपूर खानदान की हूं। बचपन से परिवार में सभी को फिल्मों में काम करते देखा है। सिनेमा से मेरा प्यार और लगाव फैमिली की वजह से है। डिप्रेशन के मोमेंट्स नहीं आए कभी। स्ट्रगल जरूर था। मेरा स्ट्रगल कुछ अलग तरीके का था। बाकी लडकियों का स्ट्रगल जहां खत्म होता है, मैंने वहीं से शुरू किया है। मेरी बहन करिश्मा पहले से थी। लोग जानते थे कि करिश्मा की बहन है। पहले ही से लोगों के दिमाग में बैठ गया था। रिफ्यूजी ने मेरे करियर को शुरू में ही टॉप पर डाल दिया था। अरे ये तो स्टार है, ये ये है, ये वो है। फिल्में नहीं चलीं तो भी लोगों का प्यार बना रहा। प्रेस ने कुछ और लिखना शुरू कर दिया। मेरे लिए बडी बात है कि इंडस्ट्री से ही हूं। मैं घबराई नहीं। मैंने वो जो पैशन था, जो लगाव था, वह नहीं छोडा। दादा जी की बात हमेशा दिमाग में रख के चली जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां। यही भाव मन में रख के फिल्में कीं। कुछ फिल्में चलीं, कुछ नहीं चलीं। यह तो इंडस्ट्री की रीति है। कोई फिल्म चलेगी, कोई नहीं चलेगी। मुझे ज्यादा डिप्रेशन नहीं रहता है कि फलां फिल्म नहीं चली, क्योंकि हर फिल्म में मेरा परफॉर्मेस सराहा गया है। मैं इंडस्ट्री में टिकी इसलिए हूं कि मुझे एक्टिंग करना ज्यादा अच्छा लगता है। मुझे फैमिली की पोजीशन आगे करनी है। अभी अच्छा लगता है कि रणबीर आया है कपूर खानदान से। क्योंकि पहले केवल करिश्मा और मैं थी। अभी कोई और साथ देने आया है तो अच्छा लगता है।

फिल्में चलें न चलें, करीना चलती रहीं। इसे दर्शकों का प्यार कह लें या आपकी मेहनत। दर्शकों ने कभी आपको जाने ही नहीं दिया। उन्होंने रिंग से बाहर कभी निकलने ही नहीं दिया। आप से कभी गलतियां भी हुई तो उन्होंने नजरअंदाज किया।

ऑडियंस, फैन, डायरेक्टर और मीडिया, मैं तो सभी के नाम लूंगी। सब ने हमेशा मेरे टैलेंट पर विश्वास रखा है। टैलेंटेड है, हर रोल कर सकती है। वह सहारा हमेशा रहा है, थैंक्स।

आपकी भूमिकाओं में विविधता रही है। कह सकते हैं कि आप इंडस्ट्री में पैदा हुई हैं। सारी सुविधाएं आपको मिलती रही हैं। मैं चमेली, देव,ओमकारा जैसी फिल्मों के किरदारों का नाम लूंगा। इन्हें निभाने की प्रेरणा कैसे मिली? ढेर सारे एक्टर कहते हैं कि एक्टिंग अपने अनुभवों को जीना है, लेकिन जो किरदार आपके अनुभव क्षेत्र से बाहर के हों, उनके बारे में क्या कहेंगी?

अनुभव सिर्फ देखने और जीने का नहीं होता है। मैं बहुत स्पॉन्टेनियस एक्टर हूं। मैं उस कैरेक्टर के बारे में सोचती हूं। डायरेक्टर से बात करती हूं। फिर खुद उसकी इमेज बनाती हूं और तय करती हूं कि मुझे क्या करना चाहिए। मैं आधा घंटा सोच कर कुछ नहीं करती। रोना हो तो मैं अभी रोना शुरू कर दूंगी। इसे गॉड गिफ्ट कह सकते हैं। कॉमेडी सीन करना हो तो ऐसे भी मैं कर लेती हूं। एक्टिंग का इतना पैशन है कि अपने आप आ जाता है। मैं मेथड एक्टर नहीं हूं।

आपकी एक्टिंग में कोई मेथड नहीं हैं? लाइफ में कोई मेथड है?

लाइफ में मैंने कहा न कि मैंने हमेशा दिल की बात सुनी है। मुझे लोगों की ज्यादा परवाह नहीं है। सिर्फ अपने परिवार की परवाह है। मेरी फैमिली पर कोई दाग और चोट नहीं आनी चाहिए। मैं अपने मां-बाप और करिश्मा से बहुत प्यार करती हूं। मैंने करियर से ज्यादा अपनी फैमिली को अहमियत दी है। एक खास दर्जे पर रखा है। मैं अपनी फिल्मों में कितनी भी व्यस्त रहूं, फैमिली के लिए वक्त निकालती हूं। फैमिली को प्यार देती और उनसे प्यार लेती हूं। यह सब कॉन्फिडेंशियल रहता है। किसी को बताने की क्या जरूरत है।

आपके पेशे में फिट रहना जरूरी है। इसके अलावा होठों पर मुस्कान रहनी चाहिए। आंखों में चमक रहनी चाहिए। आप पब्लिक फिगर हैं। कहीं से भी न दिखे कि आप

आजकल मीडिया भी इतनी एक्टिव है। हमेशा सवार रहती है। ठीक है, उसमें कोई खराबी नहीं है। इसी में जी रहे हैं हम लोग। चल रहे हैं। चौबीसों घंटे अलर्ट रहना पडता है। मैंने हमेशा अपने दिल की बात सुनी है। मुझे बहुत हेल्प किया है मीडिया ने। मैंने कभी मनिप्युलेट नहीं किया है। लोग तो हमें हमेशा फ्रेश और स्माइलिंग फेस में देखना चाहते हैं। उनके दिमाग में इमेज बनी रहती है। उन्हें क्या मतलब कि किसी दिन हमारा भी मूड खराब रहता है।

मुझे याद है एक इंटरव्यू में आपने कहा था कि मैं रोल के लिए किसी के घर खाना बनाने नहीं जाती और रोल के लिए मैं किसी के साथ शॉपिंग नहीं कर सकती?

सुनने में आता है कि कई ऐक्ट्रेसेज ऐसा करती हैं, पर कभी देखा तो है नहीं। सुनने में आता है कि वे फोन करती हैं आजकल। इस हीरो को फोन करती हैं। उस प्रोड्यूसर को फोन करती हैं। मैंने आज तक किसी को बोला नहीं है। मेरे पास अपने-आप फिल्में आई हैं।

फैमिली के अलावा दोस्तों पर भी पूरा ध्यान देती हैं?

कुछ बचपन के दोस्त हैं। कुछ फिल्मों से बाहर के दोस्त हैं। दो-तीन लोग हैं मेरे फ्रेंड, जैसे रीना है। उन सभी से मिलती रहती हूं। उनसे अलग तरह की एनर्जी और फीलिंग मिलती है।

रीना से कई बार मेरी बात हुई। वह भी बताती हैं कि कैसे करीना आज की करीना होने पर भी पहले की करीना हैं।

जब दो साल की थी, तब से उसके साथ मैं खेल रही हूं। आज तक वह रिश्ता कायम है। ऐसे कई लोग रहे हैं। वे मेरी फैमिली के जैसे हैं। हीरो के साथ कोई ज्यादा दोस्ती नहीं है। हम लोग साथ में काम करते हैं, बस जैसे अजय देवगन हो गए, अक्षय कुमार हैं। ये सब करिश्मा के हीरो हैं। मुझे एकदम बच्ची की तरह लेकर चलते हैं सब। पूरा खयाल रखते हैं। अच्छा लगता है। इंडस्ट्री में बाकी किसी के साथ सोशलाइजिंग नहीं है। एक डायरेक्टर हैं करण जौहर उनके साथ अच्छा लगता है। दोस्ती-यारी है हमारी। एक-दो महीनों में एक बार मिल लेते हैं। फिल्मों के अलावा सारी बातें होती हैं। मैंने करण को कभी नहीं बोला है कि पिक्चर में लो। उनके पास रोल हो तो बात करते हैं, नहीं तो कभी फिल्म के बारे में बात नहीं करते हैं। मुझे बिलकुल पसंद नहीं है कि मैं किसी से फिल्म के लिए बात करूं या यह सोचूं कि फलां के साथ मेरी पेयरिंग हो जाएगी तो करियर को फायदा होगा। यह सब कभी किया ही नहीं।

कहा और माना जाता है कि आपमें एरोगेंस है। इस एरोगेंस को आपके आलोचक पसंद नहीं करते। उनकी राय में इंडस्ट्री की फ‌र्स्ट फैमिली की होने की वजह से आपमें यह अहंकार है। क्या कहेंगी?

मुझमें एरोगेंस नहीं है। पहले लोग ऐसा बोलते थे। चूंकि मेरा स्ट्रगल दूसरी हीरोइनों जैसा नहीं था, इसलिए लोगों को लगा होगा कि करीना तो कपूर खानदान की है। उसे सब हासिल है। सारे डायरेक्टर तो उसके पास हैं। अगर आप कहीं और से आकर छोटी शुरुआत करते हैं तो पूरी सिंपैथी मिलती है।

अंडरडॉग के प्रति वैसे ही

करीना कभी अंडरडॉग रही ही नहीं। यही तो प्रॉब्लम रहा है। इसलिए लोगों को लगता है कि मैं एरोगेंट हूं। जो फैन हैं मेरे, मीडिया में जो बात करते हैं मुझसे, उनसे पूछें तो कहेंगे कि मैं बिलकुल एरोगेंट नहीं हूं। मेरी पर्सनैलिटी ही ऐसी है। थोडी दूरी रही है सबसे। किसी से ज्यादा भाव नहीं लेना है और न देना है तो लोगों को लगा कि एरोगेंस है। यहां एक लडकी का रिस्पेक्ट नहीं है। हमें अकेले ही जूझना पडा है। करिश्मा भी अकेली लडकी थी। मेरी मां ने मुझे अकेले पाला। खुद को प्रोटेक्ट करना सिखाया।

तो एरोगेंस आपका रक्षाकवच है?

क्योंकि यह इंडस्ट्री बहुत खतरनाक जगह है। यहां लडकियों को अपनी रक्षा स्वयं करनी पडती है।

आप भी मानती हैं इस चीज को?

मानती हूं। यहां टैलेंट की कद्र तो है, मगर बहुत सारे लोगों को बिना टैलेंट के भी मिला है। लेकिन आखिरकार टैलेंट की ही जीत होती है।

फिल्म इंडस्ट्री में भी मेल डॉमिनेशन है। क्या आपको लगता है कि उसकी वजह से आपको समान अवसर नहीं मिले?

मुझे अच्छे रोल मिले हैं। रिफ्यूजी से लेकर 3 इडियट्स तक। 3 इडियट्स वैसे मेल डॉमिनेटेड फिल्म है, फिर भी मेरा कैरेक्टर पसंद किया गया। यह इस पर निर्भर करता है कि आप मिले रोल को कैसे निभाते हैं! अभी भी लोग बोलते हैं कि करीना ने अच्छा रोल किया। जहां भी मैं जाती हूं, छोटे-छोटे बच्चे आकर बोलते हैं तो अच्छा लगता है। एक समय के बाद आपकी जैसी पर्सनैलिटी हो, आप जैसी एक्ट्रेस हों, वैसे रोल लिखे या बदले जाते हैं।

किसी डायरेक्टर से रोल की वजह से क्रिएटिव लेवल पर बहस हुई?

स्क्रिप्ट अच्छी लगती है, तभी हां करती हूं। एक बार डिसाइड कर लिया है कि इनके साथ काम करना है तो आगे कुछ नहीं बोलती। जैसे मैंने डिसाइड कर लिया कि कम्बख्त इश्क में काम करूंगी तो सेट पर मैं नहीं बोल सकती कि ऐसे नहीं करना है, वैसे नहीं करना है। फिल्म साइन की है तो जिस तरह से डायरेक्टर को दिखाना है, दिखाए। मैं सेट पर अपना दिमाग नहीं चलाती। इंटरफेयर नहीं करती।

किनकी सलाह या मदद लेती हैं ?

कभी-कभी करिश्मा से बात कर ली तो ठीक है। सैफ हमेशा सलाह देता है। उसने कहा है कि कभी दूसरों के बारे में मत सोचना। सिर्फ अपने बारे में सोचो और अपने से ही कंपीट करो। मीडिया में जो लिखा जाता है, उस पर ध्यान मत दो, इसलिए मैं अपने मकसद के ऊपर लगी हूं।

आपकी पर्सनैलिटी में एक मेल कॉन्फिडेंस भी है। क्या मां और आप दोनों बहनों की वजह से एक पुरुष की कमी पूरी करने के लिए आपने उसे डेवलप कर लिया?

हां, शायद वो था। वो हमेशा रहा है। हम दोनों बहनों पर मॉम ने ज्यादा ध्यान दिया है। स्ट्रांग पर्सनैलिटी हो गई है मेरी। मुझे खास इंडिविजुअल नेचर मिला है। काम करने की लगन मिली है। हमने एक दीवार बना रखी है। खुद को प्रोटेक्ट करने के लिए जरूरी था। यह बचपन से हो गया है।

पहला डिसीजन जो आपने लिया हो और पूरी फैमिली ने एक्सेप्ट कर लिया हो?

छोटी उम्र में ही डिसाइड कर लिया था कि करिश्मा हीरोइन बनेगी तो मैं भी हीरोइन बनूंगी। चाहे कुछ भी हो। वहां टॉप पर पहुंचेंगे, वो भी हमने डिसाइड कर लिया था। कपूर खानदान का नाम रोशन करेंगे। पापा को यह प्रॉमिस किया, क्योंकि वो बहुत प्रेशर और टेंशन में थे कि क्या होगा। बच्चों का क्या होगा? अकेले कैसे सरवाइव करेंगी। अभी मैं अपने फादर के साथ बैठती हूं तो उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं कि मेरी बेटियों ने एकदम हीरो जैसा काम किया है, तो अच्छा लगता है।

अगर मैं आप से पूछूं इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में जितनी भी हीरोइन रही हैं जो टॉप पर पहुंचीं, उनमें से किसी तक पहुंचना आपके एंबिशन में है या बिलकुल अलग ऊंचाई पर पहुंचना चाह रही हैं।

मुझे तो माउंट एवरेस्ट से भी आगे जाना है। बहुत कम एक्ट्रेस हैं, जिन्हें मैं रिस्पेक्ट करती हूं। पहले की हैं कुछ जैसे वहीदा जी, नर्गिस जी, शर्मिला जी, माधुरी, श्रीदेवी, करिश्मा एंड काजोल। बाकी एक्ट्रेस की तरफ मैंने ध्यान नहीं दिया। मैंने जिनके नाम लिए वे लोग स्टार भी थे और उनमें एक्टिंग की भी तलब थी। आजकल की ज्यादातर हीरोइनों की फिल्में नहीं देखी हैं। प्रियंका में थोडी-बहुत तलब है। एक्टिंग की तरफ उनका ध्यान है तो देखने में अच्छा लगता है।

ऊंचाई की तरफ बढने के साथ अकेलापन बढता जाता है। किसी को साथ लेकर ऊपर नहीं जा सकते।

सफर में एक बात ध्यान रखना पडता है कि जो ऊपर जाता है, उसको एक बार नीचे आना ही पडता है। फैमिली और अच्छे दोस्तों का साथ रहना चाहिए। जो लोग ऊपर चढते हुए मिले हैं न, हमेशा उनका हाथ पकड कर चलना चाहिए। उनको कभी भूलना नहीं चाहिए। एंबिशन तो है, लेकिन मुझे अपने तरीके से पहुंचना है।


Friday, September 3, 2010

फिल्‍म समीक्षा : वी आर फैमिली

-अजय ब्रह्मात्‍मज

क्या आप ने स्टेपमॉम देखी है? यह फिल्म 1998 में आई थी। कुछ लोग इसे क्लासिक मानते हैं। 12 सालों के बाद करण जौहर ने इसे हिंदी में वी आर फेमिली नाम से प्रोड्यूस किया है। सौतेली मां नाम रखने से टायटल डाउन मार्केट लगता न? बहरहाल, करण जौहर ने इसे आधिकारिक तौर पर खरीदा और हिंदी में रुपांतरित किया है। इस पर चोरी का आरोप नहीं लगाया जा सकता,फिर भी इसे मौलिक नहीं कहा जा सकता। इसका निर्देशन सिद्धार्थ मल्होत्रा ने किया है। इसमें काजोल और करीना कपूर सरीखी अभिनेत्रियां हैं और अर्जुन राजपाल जैसे आकर्षक अभिनेता हैं।

हिंदी में ऐसी फिल्में कम बनती हैं, जिन में नायिकाएं कहानी की दिशा तय करती हों। वी आर फेमिली का नायक कंफ्यूज पति और प्रेमी है, जो दो औरतों के प्रेम के द्वंद्व में है। साथ ही उसे अपने बच्चों की भी चिंता है। 21 वीं सदी में तीन बच्चों के माता-पिता लगभग 15 सालों की शादी के बाद तलाक ले लेते हैं। तलाक की खास वजह हमें नहीं बतायी जाती। हमारा परिचय तीनों किरदारों से तब होता है जब तलाकशुदा पति के जीवन में नई लड़की आ चुकी है। पूर्व पत्‍‌नी माया और प्रेमिका श्रेया की आरंभिक भिड़ंत के बाद ही पता चल जाता है कि माया कैंसर से पीडि़त है और उसकी जिंदगी अब चंद दिनों के लिए बची है। सालों को लमहों में जीने की डॉक्टर की सलाह के बाद माया चाहती है कि श्रेया उसके परिवार में आ जाए और बच्चों की जिम्मेदारी संभाल ले। सब कुछ इतना भावुक,अश्रुपूर्ण और मैलोड्रामैटिक हो जाता है कि उनकी परेशानियों से कोफ्त होने लगती है। सुबकते-रोते हुए फिल्म देखने के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म पसंद आएगी।

करण जौहर ब्रांड की फिल्में विभ्रम का सृजन करती है। इस फिल्म की कथा भूमि विदेश की है। नाते-रिश्ते और स्त्री-पुरुष संबंध के पहलू विदेशी हैं। भारत के चंद महानगरों में विवाह की ऐसी समस्याओं से दंपति जूझ रहे होंगे, लेकिन मूल रूप से विदेशी चरित्रों और स्थितियों को लेकर बनी यह फिल्म अपने आसपास की लगने लगती है, क्योंकि इसमें हमारे परिचित कलाकार हैं। वे हिंदी बोलते हैं। वी आर फेमिली भारतीय कहानी नहीं है। यह थोपी हुई है। जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर विदेशियों को पीछे खड़ा कर विदेशों में फिल्मांकित इन फिल्मों से करण लगातार हिंदी फिल्मों के दर्शकों को मनोरंजन के विभ्रम में रखने में सफल हो रहे हैं। ंिहंदी सिनेमा के लिए यह अच्छी स्थिति नहीं है।

दो अभिनेता या अभिनेत्री एक साथ फिल्म में आ रहे हों तो दर्शक उनके टक्कर से मनोरंजन की उम्मीद रखते हैं। काजोल और करीना कपूर के प्रशंसक इस लिहाज से निराश होंगे, क्योंकि लेखक-निर्देशक ने उनके बीच संतुलन बना कर रखा है। काजोल और करीना कपूर दक्ष अभिनेत्रियां हैं। दोनों अपने किरदारों को सही ढंग से निभा ले गई हैं। अर्जुन रामपाल को सिर्फ आकर्षक लगना था। शंकर उहसान लॉय का संगीत अब सुना-सुना सा लगने लगा है।

** दो स्टार