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Friday, July 30, 2010

फिल्म समीक्षा : वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई

- ajay brahmatmaj
सबसे पहले तो इस फिल्म के शीर्षक पर आपत्ति की जा सकती है। वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई, इस शीर्षक का आशय कितने हिंदी दर्शक समझ पाएंगे या शीर्षक अब अर्थहीन हो गए हैं। बहरहाल, निर्माता-निर्देशक ने समाज और दर्शकों के बदलते रुख को देखते हुए यही शीर्षक जाने दिया है। यह आठवें दशक की मुंबई की कहानी है, जब अंडरव‌र्ल्ड अपनी जड़ें पकड़ रहा था और अपराध की दुनिया में तेजी से नैतिकता बदल रही थी।
हिंदी में गैगस्टर फिल्में घूम-फिर कर मुंबई में सिमट आती हैं। पहले कभी डाकुओं के जीवन पर फिल्में बना करती थीं। फिर स्मगलर आए और अब अंडरव‌र्ल्ड से आगे बढ़कर हम टेररिस्ट तक पहुंच चुके हैं। अपराध की अंधेरी गलियों का रोमांच दर्शकों को हमेशा आकर्षित करता है। वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई में इसी आकर्षण को भुनाने का ध्येय स्पष्ट है। मिलन लुथरिया ने आठवें दशक की कहानी चुनने के साथ परिवेश और शैली में भी आठवें दशक का असर रखा है। एक-दो भूलें भी हैं, जैसे कि कागज के बड़े थैलों का इस्तेमाल या डिजीटल वायरलेस सिस्टम..आठवें दशक में ये चलन में नहीं थे। थोड़ी असावधानी कैसे दृश्य का इंपैक्ट खत्म करती है, इसका उदाहरण सुल्तान मिर्जा का अंतिम भाषण है। सुलतान उस दौर के जिस माइक से बोल रहे हैं, वह खोखला है। ऊपरी डिजाइन बराबर है, लेकिन उसकी सुराखों से पीछे खड़े सुलतान की कमीज दिख रही है। यह लापरवाही है या चूक..
थोड़ी गभ्ाीरता से मिलन लुथरिया की फिल्म देखें तो यह खोखलापन चरित्र निर्माण, संवाद और दृश्यों में भी है। सुल्तान मिर्जा और शोएब के किरदार को मुंबई के कुख्यात डान से संबंधित मिथकों से गढ़ा गया है। उनमें वास्तविकता की ठोस गहराई नहीं है। खोखले माइक की तरह ही ये खोखले किरदार नकली किस्म के फिल्मी संवाद बोलते हैं। लंबे अर्से के बाद हिंदी फिल्म में डायलागबाजी सुनाई पड़ती है, लेकिन इमरान हाशमी जैसे अक्षम कलाकार संवादों के प्रभाव को फीका कर देते हैं। अजय देवगन के सामने वे मजबूत और लोक समर्थित किरदार को भी बखूबी नहीं निभा पाते। अजय देवगन के अभिनय में गाढ़ापन है। उन्होंने अपने लुक, मुद्राओं और संवाद अदायगी से सुल्तान मिर्जा को दमदार बना दिया है। कंगना रनौत और प्राची देसाई ने अपने किरदारों को सहजता से निभाया है। रणदीप हुडा अवश्य सरप्राइज करते हैं। ईमानदार पुलिस आफिसर एग्नेल को उन्होंने आवश्यक तरीके और अंदाज से निभाया है।
ऐसी फिल्मों की समस्या है कि रियलिटी के करीब होने के कारण ये अपराधियों के संबंध में नए मिथक तैयार करती हैं। इसी फिल्म में दो अपराधियों में एक को नेकदिल और दूसरे को लालची के तौर पर दिखाया गया है। जीत लालची अपराधी की होती है। फिल्म यहीं खत्म नहीं होती..बाद में दो पंक्तियां उभरती हैं कि वह आज भी दूर देश में बैठा मुंबई पर राज कर रहा है। अपराधियों के इस ग्लोरिफिकेशन से आखिर हम दर्शकों को क्या मेसैज देना चाहते हैं। सिनेमा सिर्फ तकनीक नहीं है, वह विषय और विचार भी है। इस लिहाज से वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई की सराहना नहीं की जा सकती।
*** तीन स्टार

दरअसल : इंडियन ओशन का संगीत

-अजय ब्रह्मात्‍मज

आमिर खान की अनुषा रिजवी निर्देशित पीपली लाइव में एक गीत है जिंदगी से डरते हो..। यह गीत अभी उतना पॉपुलर नहीं हुआ है, लेकिन नून मीम राशिद के बोलों को ध्यान से सुनें, तो इस गाने में जिंदगी की चुनौतियों का सामना करने और उनसे जूझने का जोश और आह्वान स्पष्ट रूप से है। इसे इंडियन ओशन के अशीम चक्रवर्ती ने गाया है। कहते हैं यह उनका गाया आखिरी गीत है। अशीम अब इस दुनिया में नहीं हैं। इडियन ओशन में मुख्य रूप से उनकी आवाज ही गूंजती थी। इंडियन ओशन देश के मशहूर फ्यूजन बैंड का नाम है। फिल्मों में उन्होंने ब्लैक फ्राइडे में संगीत दिया था। उसका एक गीत रुक जा.. काफी पॉपुलर हुआ था।

भारत में फ्यूजन बैंड और संगीत मंडलियों की अधिक लोकप्रियता नहीं है। हालांकि पिछले डेढ़-दो दशकों में कई बैंड और मंडलियां आई, लेकिन दो-चार गानों की लोकप्रियता के बाद गुमनाम हो गई। विदेशी तर्ज और हिंदी फिल्मों के पुराने गानों को नए तरीके से पेश कर उन्हें तात्कालिक पहचान तो मिली, पर उनमें मौलिकता और भारतीयता की कमी रही। इस लिहाज से इंडियन ओशन के गीत-संगीत में एक निरंतरता है। यह कभी बहुत ज्यादा पॉपुलर नहीं रहा, लेकिन उसके श्रोता गंभीर और वफादार रहे। इंडियन ओशन के हर एलबम का जोरदार स्वागत हुआ। अपनी इस गंभीर स्वीकृति और लोकप्रियता के बावजूद वे पॉपुलैरिटी चार्ट में पिछड़ जाते हैं। वैसे संगीत में उनके अभ्यास का यह मकसद भी नहीं है। इंडियन ओशन की सबसे बड़ी खूबी शब्द और धुनों के चुनाव में है। उनके गीत भी बेहद रोमानी हैं, लेकिन उनमें प्रचलित रुझान नहीं है। उनके स्वर का आवेग आलोडि़त करता है और अपने साथ बहा ले जाता है। उन्होंने भारतीय मानस और चिंतन परंपरा से गीत लिए हैं। कुछ लिखे हैं, तो कुछ लोकगीतों को अपने ढंग से गाया है। उन्होंने संगीत के क्षेत्र में भी काफी प्रयोग किए हैं। उनके कुछ सिग्नेचर वाद्य यंत्र हैं। सुनते ही पता लग जाता है कि यह इंडियन ओशन का ही संगीत हो सकता है। और उनकी ऊंची अनुनादित होती आवाज बांध लेती है। सुष्मित सेन, अशीम चक्रवर्ती, राहुल राय और अमित किलम चार संगीतकारों की मंडली ही इंडियन ओशन की जान हैं। इनमें से अशीम चक्रवर्ती का 25 दिसंबर, 2009 को निधन हो गया था। इंडियन ओशन ने अपने नए एलबम खजूर रोड को अशीम की श्रद्धांजलि के रूप में पेश किया है। यह विचित्र नाम वास्तव में उनके अभ्यास के स्थान का नाम है। दिल्ली के करोलबाग में वे 16-330, खजूर रोड में नियमित अभ्यास करते थे और अपने ज्यादातर गीत यहीं तैयार किए थे। खजूर रोड के साथ इंडियन ओशन एक नया प्रयोग कर रहा है। संगीत कंपनियों की मनमानी और फ्री डाउनलोडिंग की समस्या को देखते हुए उन्होंने खुद ही इस एलबम के गीतों को श्रोताओं के फ्री डाउनलोडिंग के लिए उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की है। 25 जुलाई को एलबम का एक गीत उनके साइट पर डाल दिया गया, जिसे कोई भी डाउनलोड कर सकता है। योजना है कि अभी से हर महीने एक गीत श्रोताओं को मुफ्त डाउनलोडिंग के लिए साइट पर डाला जाएगा।

ऐसा साहस इंडियन ओशन ही कर सकता है। सात गीतों को सात महीनों में श्रोताओं को फ्री देने के बाद वे एलबम लेकर आएंगे। उनका मानना है कि संगीत कंपनियां उनके एलबम को लेकर अधिक उत्सुक नहीं रहतीं। उल्टा एलबम आ जाने के बाद श्रोताओं से वे पैसे वसूलती हैं, इसलिए इंडियन ओशन ने सोचा है कि वे श्रोताओं को पहले ही मुफ्त में अपने गीत दे देंगे। अपने नए प्रयोग में वे सफल रहे, तो मुमकिन है कि दूसरे बैंड और मंडलियां भी श्रोताओं से सीधे कनेक्ट करने के लिए यही तरीका अपनाएं। श्रोताओं के लिए यह हर सूरत में फायदेमंद है।

भारतीय संगीत के परिदृश्य में इंडियन ओशन की मौजूदगी एक जोरदार हस्तक्षेप है। इसने अपने गीतों के माध्यम से बताया है कि जमीन से जुड़े रह कर वास्तविक दुनिया के गीतों से भी श्रोताओं को आनंद दिया जा सकता है। उनके गीत सुनते समय जोशीला रोमांच होता है। लोक धुनों और आधुनिक संगीत के फ्यूजन से वे नई ध्वनियां पैदा करते हैं और सुखद तरीके से उन्मादित होने का मौका देते हैं। कभी अवसर मिले, तो इस बैंड को लेकर बनी फिल्म लीविंग होम -द लाइफ ऐंड म्यूजिक ऑफ इंडियन ओशियन जरूर देखें। अनोखा अनुभव होगा।


Monday, July 26, 2010

बी आर चोपड़ा का सफ़र -भाग चार...प्रकाश रे

प्रकाश रे बी आर चोपड़ा पर एक सिरीज लिख रहे हैं...

भाग-4
बी आर चोपड़ा का 1955 में अपनी कम्पनी बी आर फ़िल्म्स शुरू करना एक साहसी क़दम था. उनके ख़ाते में बस एक ही हिट फ़िल्म दर्ज़ थी. उस समय फ़िल्म उद्योग स्टार सिस्टम और धनी निर्माताओं के चंगुल में था. इसके अलावा राज कपूर, शांताराम, महबूब ख़ान, बिमल राय, ए आर कारदार, गुरु दत्त आदि कई ऐसे दिग्गज 'निर्माता-निर्देशक' मौजूद थे जो व्यावसायिक तौर पर बड़े सफल तो थे ही, साथ ही अपने सिनेमाई सौंदर्य से 1950 के दशक को हिंदुस्तानी सिनेमा के स्वर्ण-युग के रूप में ढाल रहे थे.

बी आर फ़िल्म्स के शुरुआत की कहानी कुछ इस प्रकार है: एक दिन चोपड़ा नई फ़िल्म के सिलसिले में शशधर मुखर्जी से मिलने जा रहे थे. उनकी पत्नी ने पूछा, 'तो फिर आप दूसरे निर्माता के लिये काम करने जा रहे हैं? आप ख़ुद ही फ़िल्म क्यों नहीं बनाते?' चोपड़ा ने कहा कि पैसे तो हैं नहीं. इस पर उनकी पत्नी ने कहा कि उनके पास दस हज़ार रुपये हैं जिसमें से वह पांच हज़ार लेकर काम शुरू कर दें. बाक़ी से वह तीन माह तक घर का खर्च चला लेंगी. इसी पांच हज़ार से इस कम्पनी शुरू की गयी. कहा जा सकता है कि चोपड़ा ने दूसरे निर्माताओं के लिये काम करने में हो रही दिक्क़तों के बारे में घर में चर्चा की होगी जिस कारण उनकी पत्नी ने कम्पनी बनाने का सुझाव दिया होगा.

बी आर फ़िल्म्स का प्रतीक-चिन्ह एक ग्लोब में अविभाजित भारत का नक्शा दर्शाता है. इस पर आदर्शवाक्य के रूप में Ars Longa Vita Brevis छ्पा हुआ है. इसका अर्थ है कि जीवन लघु है और कला/शिल्प व्यापक. यही वाक्य सिने-हेराल्ड पत्रिका का आदर्श-वाक्य भी हुआ करता था जिसे चोपड़ा ने लाहौर में बरसों सम्पादित किया था. यह वाक्य लैटिन भाषा का है और एक बड़े वाक्य का हिस्सा है. पूरा वाक्य है- Ars longa, vita brevis, occasio praeceps, experimentum periculosum, indicium difficile. इसे चिकित्सा-विज्ञान के पिता माने जाने वाले हिप्पोक्रेट्स के वक्तव्यों से लिया गया है. प्रतीक-चिन्ह में एक पुरुष हथौड़ा और औद्योगिक चक्र लिये हुए है और एक स्त्री अपने सर पर अनाज के पौधों का गठ्ठर ढो रही है. परदे पर इस चिन्ह के साथ गीता के सांख्य योग खण्ड से लिया गया पद महेंद्र कपूर की आवाज़ में सुनाई देता है- कर्मण्ये वा धिकारस्ते....इस प्रतीक-चिन्ह में बी आर चोपड़ा के दर्शन को पढ़ा जा सकता है जो आधुनिक ज्ञान के साथ पारंपरिक बोध से भी जुड़ा था और उसमें कला एवं समाज के लिये समर्पण का भाव था. सिने-हेराल्ड से बी आर फ़िल्म्स तक इन आदर्शों के साथ जीने का परिणाम ही था कि चोपड़ा शांताराम, महबूब ख़ान और बिमल राय की फ़िल्मों की सामाजिक प्रतिबद्धता से गहरे तक प्रभावित थे.

अपनी कम्पनी में निवेश करने के लिये चोपड़ा ने वी वी पुरी को तैयार कर लिया. पुरी थॉम्पसन प्रेस के मालिक थे और राज कपूर और महबूब ख़ान की फ़िल्मों के लिये धन मुहैय्या कराते थे. इण्डिया टूडे और आजतक के मालिक अरुण पुरी श्री वी वी पुरी के पुत्र हैं. थॉम्पसन प्रेस बड़ी संख्या में पुस्तकों और पत्रिकाओं का प्रकाशन करता है. बहरहाल, चोपड़ा ने निर्माता-निर्देशक के रूप में अपने बैनर के तहत तीन फिल्में बनाईं- एक ही रास्ता (1956), नया दौर (1957) और साधना (1958). तीनों फिल्में बड़ी सफल रहीं तथा अपने विषय-वस्तु और कलात्मकता के लिये भी सराही गयीं. इनका मेलोड्रामाई अंदाज़ और बेजोड़ गीत-संगीत आज भी दर्शकों को खींचते हैं. चोपड़ा ने इन फ़िल्मों को निश्चित अवधि में पूरा कर और सफल बना कर फ़िल्मी दुनिया में अपनी जगह मज़बूत कर ली. उनके आत्मविश्वास का ही नतीज़ा था कि इन सफलताओं के बाद उन्होंने सात साल से उनके साथ सहयोगी रहे अपने भाई यश चोपड़ा को बतौर निर्देशक 1959 में धूल का फूल के साथ मैदान में उतार दिया. दोनों भाई अगले पचास साल तक हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े नामों में शुमार होने वाले थे.

(अगले हफ़्ते ज़ारी)

Sunday, July 25, 2010

दरअसल : स्टारहीन फिल्में भी देखते हैं दर्शक

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पहले लव सेक्स और धोखा, फिर उड़ान और जल्दी ही पीपली लाइव आएगी। तीनों फिल्मों में कुछ जबरदस्त समानताएं देखी जा सकती हैं। इनमें से किसी भी फिल्म में कोई परिचित और पॉपुलर स्टार नहीं है और न ही इनमें हिंदी फिल्मों की प्रचलित चमक-दमक है। दिबाकर बनर्जी की फिल्म लव सेक्स और धोखा के कलाकारों के नाम अब शायद ही याद हों, लेकिन उस फिल्म के किरदारों को हम नहीं भूल सकते। इसी प्रकार उड़ान के बाल और किशोर कलाकारों का नाम फिल्म की रिलीज के पहले कोई नहीं जानता था। यह मुमकिन है कि कुछ महीनों बाद हम उनके नाम फिर भूल जाएं, लेकिन रोहन और अर्जुन को हम नहीं भुला सकते। आमिर खान के होम प्रोडक्शन की फिल्म पीपली लाइव की भी यही विशेषता है। इस फिल्म के कलाकारों में मात्र रघुवीर यादव को हम थोड़ा-बहुत जानते हैं। उनके अलावा कोई भी कलाकार हिंदी फिल्मों के आम दर्शकों से पूर्व परिचित नहीं है। तीनों स्टारहीन फिल्मों की खासियत है कि इनके विषय स्ट्रांग हैं और सारे कैरेक्टर अच्छी तरह गढ़े गए हैं। इनमें दर्शकों को रिझाने के लिए किसी भी फॉर्मूले का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

लव सेक्स और धोखा नुकसान में नहीं रही। एकता कपूर जैसी कॉमर्शियल प्रोड्यूसर भी दिबाकर बनर्जी की फिल्म के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन से संतुष्ट रहीं। रिलीज से पहले ही कान फिल्म फेस्टिवल में नामांकित होने के कारण उड़ान के बारे में सभी जान गए हैं। इस फिल्म को समीक्षकों की भरपूर सराहना मिली है। उम्मीद की जा सकती है कि उसी अनुपात में दर्शक भी पसंद करें। पीपली लाइव की बात करें, तो फिल्मों के प्रचार में निपुण आमिर खान वे अपने खास शैली से इसे लाइमलाइट में ला दिया है। उनकी वजह से इस फिल्म के प्रति जिज्ञासा बढ़ गई है। हालांकि एक प्रोमो में उन्होंने खुद का ही मजाक उड़वाया है और यह संदेश दिया है कि हर फिल्म लगान नहीं होती। कायदे की बात करें, तो पीपली लाइव से लगान जैसी उम्मीद करना उचित नहीं है। यह फिल्म लागत निकालने के साथ थोड़ा मुनाफा कमा ले, तो भी आमिर खान की पहल से प्रेरित होकर हिंदी फिल्मों के कॉमर्शियल प्रोड्यूसर ऐसी फिल्मों में धन लगाने के लिए आगे आ सकते हैं। इससे हिंदी सिनेमा का आवश्यक विस्तार होगा। तीनों फिल्मों की चर्चा, जिज्ञासा और तदनंतर कामयाबी से संकेत मिल रहा है कि हिंदी सिनेमा नए तरीके से फैल रही है और नए दर्शक भी जुटा रही है।

इस स्तंभ में मैं लगातार दोहराता रहा हूं कि कंटेंट स्ट्रॉन्ग हो तो दर्शक फिल्में पसंद करते हैं। दर्शकों को पॉपुलर स्टार अच्छे लगते हैं। उन्हें नाचते-गाते देखकर उनका मन रमता है। उन्हें ऐक्शन दृश्यों में देखकर वे रोमांचित होते हैं। फिर भी ऐसे पारंपरिक दर्शक हमेशा नए विषयों पर नए तरीके से बनी फिल्मों का स्वागत करते हैं। वे इसमें न तो स्टार खोजते हैं और न ही नाच-गाने की उम्मीद रखते हैं। मनोरंजन पर जोर देने वालों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि रियल, वास्तविक और सामाजिक विषयों पर बनी फिल्में भी पर्याप्त मनोरंजन करती हैं। गौर करें, तो इन तीनों फिल्मों के नायक आम आदमी हैं। हम सभी उन्हें रोजाना अपने आसपास और परिवारों में देखते हैं। उनकी जिंदगी की जटिलताएं भी रोचक हैं। अपनी लड़ाई में उनकी जीत या हार हमें प्रेरित करती है। जीवन का बेहतर पक्ष दिखाती है।

अच्छी बात है कि दर्शक ऐसी फिल्मों को पसंद कर रहे हैं। फिलहाल एक दिक्कत जरूर है कि जिस तरह पैरेलल सिनेमा के दौर में मीडिया ने श्याम बेनेगल सरीखे फिल्मकारों का समर्थन किया था, वैसा समर्थन दिबाकर बनर्जी, विक्रमादित्य मोटवाणी और अनुषा रिजवी को नहीं मिल पा रहा है। मीडिया थोड़ी उदारता दिखाए और ग्लैमर का चश्मा उतार कर इनके बारे में पाठकों को समय से जानकारी दे, तो हम हिंदी सिनेमा में श्रेष्ठ और सार्थक फिल्मों की तरफ बढ़ सकते हैं। स्टारहीन फिल्मों के लिए भी दर्शक जुटा सकते हैं।


Friday, July 23, 2010

हिंदी सिनेमा का मुंबई तक सीमित रहना उसके भविष्‍य के लिए सही नहीं-डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

(फिल्‍मकार डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत)

- हिंदी सिनेमा की वर्तमान स्थिति को आप किस रूप में देखते हैं?

0 हिंदी सिनेमा पर गंभीरता से विचार करें तो लंबे समय तक श्याम बेनेगल और गोविंत निहलानी सक्रिय रहे। उनके साथ के फिल्मकारों ने फिल्मों की समानंतर भाषा गढऩे और खोजने की कोशिश की। उनमें से प्रकाश झा को मैं एक ऐसे फिल्मकार के तौर पर देख रहा हूं, जिन्होंने समानांतर और व्यावसायिक सिनेमा में संयोग और मेल कराने की अच्छी कोशिश की है। गौर करें तो फिलहाल हिंदी सिनेमा में सार्थक सिनेमा के लिए कम जगह रही है। उसके अपने व्यवसायिक कारण हैं। सच्चाई है कि हिंदी सिनेमा ने घोषणा कर दी है कि उसका साहित्य का सार्थकता से कोई संबंध नहीं है। सिनेमा का लक्ष्य और उद्देश्य मनोरंजन करने तक सीमित कर दिया गया है। उसमें लतीफेबाजी और चुटकुलेबाजी आ गई है। फिर सार्थकता कहां से आएगी। अफसोस की बात है कि दर्शकों ने स्वीकार कर लिया है और फिल्मकारों पर मुनाफे का दबाव है। पहले माना जाता था कि सिनेमा कला और व्यवसाय का योग है। अब सिनेमा के कला कहने पर प्रश्न चिह्न लग गया है। अगर यह कला है तो कला का उद्देश्य क्या है? कला का मापदंड क्या है? परखने चलेंगे तो कला वाली कोई बात ही नहीं दिखेगी। मैं संक्षेप में यही कह सकता हूं कि हिंदी सिनेमा का लक्ष्य धीरे-धीरे व्यवसाय ही हो रहा है। इस व्यवसाय के लिए हम धरातल तक पहुंच रहे हैं। हिंदी के मेनस्ट्रीम सिनेमा में कथा, विषय और प्रयोग के स्तर पर कोई विविधता लक्षित नहीं होती। दुर्भाग्य है कि हिंदी सिनेमा हमारे समाज का भी प्रतिनिधित्व नहीं करता। अतीत और वर्तमान की कोई झलक इसमें नहीं मिलती। न ही हिंदी सिनेमा भारतीय समजा के संघर्ष का प्रतिनिधित्व कर रहा है। कभी-कभार कुछ छिटपुट फिल्में मिल जाती हैं। कोई निर्देशक अपनी जिद्द में कुछ कर जाता है। कभी अनुराग कश्यप तो कभी प्रकाश झा ऐसी कोई फिल्म बना लेते हैं, जो अलग होकर भी प्रासंगिक हो जाती है। कभी श्याम बेनेगल 'वेलकम टू सज्जनपुरबना लेते हैं। ध्यान दें तो श्याम बेनेगल नए सिरे से संघर्ष कर रहे हैं।

- क्या हिंदी सिनेमा के लिए इसे अच्छी स्थिति कहेंगे? व्‍यवसाय भले ही बढ़ जाए, कलात्‍मकता तो खत्‍म होगी

0 निश्चित ही यह सकारात्मक स्थिति नहीं है। अभी तक हिंदी सिनेमा ऐसी स्थिति में नहीं आया है, जहां विषयों की विविधता पर ध्यान दिया जा रहा हो। हिंदी सिनेमा अपनी भारतीय पहचान भी खो रहा है। इन दिनों फिल्मों का निर्माण और व्यापार कुछ चेहरों की बदौलत हो रहा है। सफलतम कलाकार या सफलतम निर्देशक हो तभी बाजार के निवेशकों का विश्वास उत्पन्न होता है। उन्हें लगता है कि लोकप्रिय स्टार का आकर्षण दर्शकों को सिनेमाघर में ले आएगा। इस तरह हिंदी सिनेमा स्टारों के जादू तक सीमित हो गया है। भारत के निवेशक मान ही नहीं रहे हैं कि कहानी का भी अपना कोई जादू होता है। मैं कह सकता हूं कि देश के 99 प्रतिशत फिल्में किसी ने किसी सिलेब्रिटी के वजह से बन रही हैं। यह दिख रहा है। यह गलत हो रहा है,मैं ऐसा भी नहीं कहूंगा। निश्चित ही निवेशक को अपनी राशि वापस मिलनी चाहिए। तभी वह दूसरी फिल्म बना पाएगा। सृजन के सभी माध्यमों में ऑडियो विजुअल सबसे महंगा और व्यापक मानते हैं। इसमें सक्रिय अभिरुचियां भी बहुत अलग-अलग हैं। इसलिए जिस प्रकार का प्रयोग हमें पश्चिम के सिनेमा में, ईरान के सिनेमा में या चीन और कोरिया के सिनेमा में दिख रहा है, उन से हम कोसों दूर हैं। फिल्मों के बनने या न बनने के निर्णय करने वाले सौभाग्य या दुर्भाग्य से डीवीडी देखकर समझदार हुए लोग हैं। अभी तक हमारी ज्यादातर फिल्में किसी और देश के सिनेमा पर आधारित है। कॉरपोरेट की बाढ़ आने से निर्देशकों को शुरू में यह विश्वास हुआ था कि फिल्मों के लिए नई कहानियां चुनी जाएंगी,लेकिन वह एक भ्रम साबित हुआ। कॉरपोरेट हाउस किसी भी प्रकार के जोखिम के लिए तैयार नहीं है। वह फिल्म शुरू करने के पहले ही मुनाफे का आकलन करते हैं। वास्तव में कॉरपोरेट प्रोडक्शन हाउस में बाबू किस्म के लोग होते हैं। उन्हें साल के अंत में एक निश्चित लाभ दिखाना होता है। इसलिए वे बड़े कलाकार और बड़े निर्देशक पर जोर देते हैं। ताकि सफलता सुनिश्चित हो। फिर भी हम देख रहे हैं कि फिल्में नहीं पसंद की जा रही हैं। अपने देश में स्क्रिप्ट के मूल्यांकन की कोई व्यवस्था नहीं है। इसकी कोई ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती है। योग्यता को सफलता का पर्याय माना जाता है। जो सफल है,वही योग्य है। बगैर कटु हुए मैं कहना चाहता हूं कि जिस देश में भाषा, कला और साहित्य के स्तर पर इतनी विविधता हो वहां हम हिंदी में ऐसी फिल्में नहीं बना पा रहे हैं,जिन्हें पुरस्कार योग्य समझा जा सके। ऑस्कर की बात छोड़ें, राष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी को पुरस्कार नहीं मिल रहे हैं। इंटरनेशनल सर्किट में चल रहे भारतीय सिनेमा में हिंदी की फिल्में कम है। मुझे तो हिंदी फिल्मों में कथा का घोर अभाव दिखता है। कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा जैसी स्थिति है। अभी सारा जोर मनोरंजक फिल्म बनाने पर है। कुछ लोग बना पाते हैं और कुछ नहीं बना पाते हैं। लेकिन मनोरंजन के दबाव में हमारी फिल्म साधारण और साधारण से नीचे की है। फिलहाल मुझे नहीं दिखता कि भविष्य में तुरंत कोई बदलाव होगा। अभी सिनेमा की शर्तें है, सफल निर्देशक, सफल कलाकार और सफलता की संभावना।

- दर्शकों के रुचि में भी कोई बदलाव दिख रहा है क्या? ऐसा लगता है कि दर्शकों के पास विकल्प हैं।

0 निश्चित ही दर्शकों के पास चुनाव के विकल्प हैं। पहले एक वैक्यूम था। आठवें-नौवें दशक में सामांतर सिनेमा का कोई पर्याय नहीं था। कलाबोध और अभिरुचि के दर्शक सामांतर सिनेमा के सीमा में ही रहते थे। विदेशी फिल्में सहजता से उपलब्ध नहीं होती थी। आज दुनिया भर की अच्छी फिल्में डीवीडी और नेट पर मिल जाती हैं। दर्शक अपनी भूख मिटा लेता है। दर्शकों का एक समूह खुद को टीवी से रिझाए रखता है, उसे चलती-फिरती तस्वीरें देखनी है। उसके लिए फिल्में सार्थक या निरर्थक नहीं होती। हमने बीच के दौर में दर्शकों को भी खुद से अलग किया। सार्थक सिनेमा के नाम पर पॉलिटिकल खेमें या पर्सनल एजेंडा की फिल्में बनती रही। ऐसी फिल्मों में आम दर्शकों की रुचि को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया। एकांगी राजनैतिक दृष्टिकोण की फिल्मों से दर्शकों का जुड़ाव नहीं बन पाया। अब इसे दर्शकों का दबाव कहें या उनके अभिरुचि में आए बदलाव का असर ... हम देख रहे हैं कि समानांतर सिनेमा के फिल्मकार मेनस्ट्रीम सिनेमा में जगह बनाने और पांव टिकाने की कोशिश में लगे हैं। कुछ फिल्मकार इस कोशिश में मुंह के बल गिरे और कुछ भ्रष्ट होकर सफल हुए। आप गौर करें तो ऐसे फिल्मकारों की श्रेष्ठ फिल्में वही हैं जो उन्होंने बीस साल पहले बनाई थी। मालूम नहीं लोग मेरी इस राय को कैसे लें लेकिन श्याम बाबू का नाम लेते ही मुझे 'अंकुरऔर 'निशांतकी ही याद आती है। गोविंद निहलानी की चर्चा होने पर मैं 'आक्रोशऔर 'अर्द्धसत्‍यकी बात करता हूं। हमें अपना कैनवास बड़ा करना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन इस कोशिश में बाजार के दबाव का संतुलन आवश्यक हो जाता है। मुझे खुशी है कि प्रकाश झा उसमें सफल हो गए हैं। उन्होंने 'दामुलसे शुरूआत की थी और आज उनकी 'राजनीतिहर जगह देखी जा रही है। उन्होंने नई भाषा गढ़ी है और स्टारों और कलाकारों का संतुलित चयन करते हैं।

- कहते हैं दूसरी भारतीय भाषाओं में मनोरंजन का ऐसा दबाव नहीं है?

0 ठीक-ठीक बता पाना मेरे लिए मुश्किल होगा। लेकिन जब मैं गिरीश कासरवल्ली या अदूर गोपाल कृष्णन या बंगाल के निर्देशकों की तारीफ सुनता हूं तो मुझे खुशी होती है कि वे आज भी अपनी पसंद की सार्थक फिल्में बना पा रहे हैं। हिंदी के अंर्तनिहित समस्या है कि इसको दर्शक समूह बहुत व्यापक है और यह सुपरिभाषित समाज, जाति और संस्कृति तक सीमित नहीं है। एक साथ अनेक अभिरुचियां काम कर रही होती हैं। अन्य भारतीय भाषाओं में फिल्मों का बड़ा बजट नहीं होता। इसके अलावा मुझे यह भी दिखता है हिंदी के दर्शक साक्षरता कम होने के वजह से सिनेसाक्षर नहीं हैं। बंगाल, केरल आदि राज्यों में फिल्म सोसायटी सक्रिय रही है और दर्शकों में सिनेमा की अभिरुचि सुसंस्कृत हुई है। उन भाषाओं में चल रहे प्रयोग को सराहना मिलती है। हिंदी सिनेमा की कुछ अपनी मजबूरियां भी हैं।

- क्या उसे कमर्शियल दबाव कह सकते हैं?

0 कमर्शियल सिनेमा शुरू से रहा है। दादा साहेब फालके की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चन्द्रभी एक कमर्शियल फिल्म थी। आज हम उसे कला से जोड़ देते हैं। विडंबना है कि लगभग सौ सालों के बाद अगर आज कोई 'राजा हरिश्चन्द्रबनाने निकले तो उसे निवेशक नहीं मिलेंगे। समाज में ही अतीत के प्रति कोई सम्मान नहीं है। उल्टा उन्हें दकियानूसी माना जाता है। देश में चल रहे आर्थिक विकास से सभी चीजों का व्यावसायीकरण हुआ है। व्यावसायीकरण का सीधा असर चिंतन और कला पर दिखता है। मुझे लगता है कि आपका व्‍यापक दर्शक और मनोरंजक फिल्में बनाने की होड़ में हम हिंदुस्तान की आत्मा को मार रहे हैं। विदेशों में जाकर शूट करना कहीं से भी गलत नहीं है। लेकिन अब तो फिल्मों की कहानी भी अभारतीय हो रही है। मैं भारत में शूट करने के पक्ष में हूं। अपनी आगामी फिल्म 'काशी का अस्सीकी शूटिंग मैं बनारस में करूंगा। काशी से जिस अस्सी को देखकर मैं लौटा हूं। वह दस सालों के बाद ऐसा नहीं रहेगा। तेजी से चल रहे परिर्वतन में सांस्कृतिक धरोहर और सांस्कृतिक अवधाराणाएं तेजी से बदलेगी। हमारे ऑडियो विजुअल मीडियम में देश की भाषा संस्कृति और इतिहास के लिए कोई जगह नहीं होगी। मुझे आश्चर्य नहीं होगा कि अगर दशाश्वमेध घाट, राजा घाट और अस्सी घाट पर मोबाइल फोन और पीज्जा की दुकानें दिखें। हमारे सांस्कृतिक अड्डे भी मॉल और दुकानों में परिवर्तित हो जाएंगे। मैंने तीन साल में ही अंतर देखा है। पहले किसी नाव पर कोई विज्ञापन नहीं होता था। अभी सारी नौकाओं पर किसी न किसी कंज्युमर प्रोडक्ट के विज्ञापन दिखने लगे हैं। गंगा नदी में विज्ञापन तैर रहा है। जहां तक हमारी नजरें देख सकती हैं, वहां तक वस्तुओं के विज्ञापन लगे होंगे। इसके पहले के बाजार पूरे समाज को, उसकी संस्कृति के साथ निगल ले मैं एक फिल्मकार के तौर पर उसे सैल्यूलाइड पर सुरक्षित कर लेना चाहता हूं।

- ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में भौगोलिक दूरियां मिटने के साथ अभिरुचियों फर्क भी खत्म हो रहा है। सिनेमा के विकास के लिहाज से यह कितना फायदेमंद है?

0 भौगोलिक दूरियां अवश्य मिटे, पूरी दुनिया करीब आए। 'वसुधैव कुटुंबकमका हमारा नारा रहा है। लेकिन ग्लोबलाइजेशन के साथ-साथ मैं चाहूंगा कि सांस्कृतिक विविधता बनी रहे। शांतिपूर्ण सांस्कृतिक सहअस्तित्व हो। मुझे खतरा दिख रहा है कि समृद्ध और संपन्न देश की संस्कृति हम सभी पर हावी हो रही है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम भारत के सिनेमा की पहचान बना कर रख सकें। यह मेरी चाहत है। ऐसा होगा कि नहीं होगा यह कह पाना मुश्किल है।

- आज के संदर्भ में पिंजर के निर्देशन के अनुभवों को किस रूप में देखते हैं?

0 मुझे लगता है कि पिंजर के निर्देशन के समय मैं बाजार को इतना नहीं समझ रहा था। वह फिल्‍म व्‍यवसाय से अधिक भावना से प्रेरित थी। उस समय मल्‍टीप्‍लेक्‍स की शुरूआत हुई थी, आज जैसी स्थिति नहीं थी। तब मैंने बड़े स्‍टारों का इंतजार नहीं किया था अगर आज फिल्‍म बनानी होगी तो मुझे इस पर ध्‍यान देना होगा। मेरी अपनी समस्‍या है कि मैं हमेशा बड़ा कैनवास खोजता हूं। उसमें एक्‍टर या कैरेक्‍टर जो भी हों लेकिन कैनवास छोटा करना मुश्किल होता है। काशी का अस्‍सी में कैनवास तो बहुत बड़ा है लेकिन लागत कम है। लोगों को आश्‍चर्य हो सकता है कि ऐसा कैसे हो सकता है? दरअसल इस फिल्‍म में बनारस का कैनवास बहुत बड़ा है। अभिव्‍यक्ति के संदर्भ में मेरी आकांक्षा रहती है कि मेरे पास विशाल पृष्‍ठ भूमि हो, जिसके सामने में अपने चरित्रों को दिख सकूं। यहां मेरे पास गंगा है, गंगा के घाट हैं। मेरे पास वे दृश्‍य हैं जो भारतियों के लिए अंजान है। बनारस जाने के बाद ही मैंने वहां गंगा की विशालता। उसके घाटों के विशालता और वहां के जीवन की गति को महसूस कर सका। वहां वर्तमान और प्राचीन एवं पुरातन और नवीन एक साथ है। बनारस में बदलता हुआ भारत दिखाई देता है। बनारस में 2010 का भी भारत है और सदियों पहले का अतीत भी जिंदा है। इस फिल्‍म की शूटिंग में मेरे सामने चुनौतियां रहेंगी। सारे पर्यटन स्‍थल और तीर्थ स्‍थलों पर बहुत भीड़ होती है। अगर मेरी फिल्‍म में स्‍टार आते हैं तो उन्‍हें देखने की आकांक्षा में सैकड़ों लोग आ सकते हैं। भारत में कहीं भी आप शूटिंग करें तो स्‍टारों के प्रशंसकों और सामान्‍य दर्शकों का यह दबाव बना रहता है। मैं अपनी फिल्‍मों में पृथक पहचान के चरित्र ढूंढ रहा होता हूं। कथा ढूंढ रहा होता हूं ऐसी कथा जिसका सीधा संबंध भारत से है। पिंजर का सीधा संबंध भारत से है। वह सामान्‍य चरित्रों की कहानी थी। जो परिस्थितियों के कारण असाधारण हो गया था। काशी का अस्‍सी का कथा असाधारण है, लेकिन उसमें आज का भारत है। बीस-तीस साल के बाद उसे पिंजर के तरह ही देखा जा सकेगा। काशी का अस्‍सी में 1986 से 2000 तक का भारत दिखेगा। हम देख पाएंगे कि इस दौर में भारत का क्‍या संघर्ष था। काशीनाथ सिंह ने इस संघर्ष और मनीषा को रोचक तरीके से लिखे हैं। पिंजर मूलत: गंभीर विषय पर बनी फिल्‍म है। काशी का अस्‍सी का विषय भी गंभीर है। लेकिन काशीनाथ सिंह ने इसे रोचक तरीके से लिखा है। मेरे लिए यह नया जोनर है। इसमें व्‍यंग है। यह कॉमेडी के पास है और कॉमेडी दूर भी है। सबसे बड़ी बात है कि विषय बहुत मौजू और सार्थक है। मैं इसे अपना सौभाग्‍य मानता हूं कि काशीनाथ जी ने मुझे कॉपी राइट दिया। पिछले डेढ़ सालों से मैं इस‍की स्क्रिप्‍ट लिख रहा हूं। पिंजर से मैंने सीखा है कि हमने जो रिस्‍क लेने जा रहे हैं उसमें सृजन और लागत के बीच एक तालमेल हो। एक भी अतीरिक्‍त दृश्‍य न हो, एक दिन भी एक्‍सट्रा न हो। फिल्‍म की लंबाई जितनी कम होगी, उसे उतने ज्‍यादा दर्शक मिलेंगे। पिंजर के रिलीज के समय तक मेरे समझ में आ गया था कि फिल्‍म की लंबाई ज्‍यादा है। काशी का अस्‍सी लिखते समय मैंने स्क्रिप्‍ट में ही कटाई-छंटाई कर दी है।

- काशी का अस्‍सी चुनने की क्‍या वजह रही? क्‍या इसे फिल्‍म में ढालना आसान होगा?

0 काशी का अस्‍सी वर्तमान का कहानी है। इस समय को मैं देख भी रहा हूं। यह एक ऐसे व्‍यक्ति द्वारा लिखी गई है जो बनारस का ही रहने वाला है। वह बनारस की आत्‍मा और सभ्‍यता को समझता है। बनारस की संस्‍कृति से परिचित है। इन दिनों दबाव है कि फिल्‍में यूथ को कनेक्‍ट करे। आम दर्शकों की उम्र 15 से 35 मानी जा रही है। इसे लिखते समय मैंने ध्‍यान में रखा है कि दर्शकों को थिएटर तक लाने के सारे आकर्षण हों। पिंजर के अनुभवों से यह बात समझ में आई कि सिनेमा आपके साथ लोकधर्मी माध्‍यम है। यह लोकभोग्‍या माध्‍यम है। अपने क्रिएटिव एक्‍सप्रेशन के साथ-साथ आपको दर्शकों की आकांक्षाओं और उनकी टिकट की लागत के बदले में मनोरंजन देना होगा। मेरे एक भतीजे ने अमेरिका में पिंजर देखी और उसका पहला सवाल था कि इसमें मनोरंजन कहां है? हालांकि साहित्‍य में दुख और अवसाद भी एक रस है। लेकिन सिनेमा का दर्शक अभी सिर्फ आनंद और मनोरंजन चाहता है। यदि साथ में कुछ सार्थक बातें हो जाए तो यह संयोग होगा। उनको ध्‍यान में रखते हुए मैंने इस फिल्‍म का नाम अस्‍सी @ काशी रखा है। मालूम नहीं कि मैं अपनी सोच का निर्वाह कर पाऊंगा या नहीं।

- आपका अधिकांश काम साहित्‍य केंद्रित या साहित्‍य पर आधारित रहा है? साहित्‍य पर बार-बार लौटने की क्‍या वजह है?

0 साहित्‍य पर मैं बार-बार इसलिए लौटता हूं कि वहां पुख्‍ता विषय मिल जाता है। कई ऐसे फिल्‍मकार हैं जो सिर्फ व्‍यवसाय के लिए फिल्‍म नहीं बनाते हैं। हमलोगों ने फिल्‍म को अभी गंभीर व्‍यवसाय नहीं माना है। मुझ जैसे व्‍यक्ति को साहित्‍य से सहारा मिल जाता है। हम जब तक किसी बात, कथा या विचार से अभिभूत नहीं हो जाते, तब तक फिल्‍म बनाने का प्रयत्‍न नहीं करते। मैंने ऐसी सफल फिल्‍में देखी हैं जिन्‍हें देख कर थिएटर में हंसा हूं। मेरा अच्‍छा मनोरंजन भी हुआ है, मैं उन्‍हें बार-बार देखता हूं। लेकिन अगर पूछे कि क्‍या मैं वैसी फिल्‍में बनाना चाहूंगा तो मेरा उत्‍तर होगा नहीं। मैं वही फिल्‍म बनाना चाहूंगा, जिसके विषय से मैं स्‍वयं अभिभूत हूं। वह फिल्‍म ऐसी हो जो मेरे समय में और मेरे बाद भी कुछ वर्षों तक सराही जाए। यह मेरी रचनात्‍मक भूख है। साहित्‍य चुनने का एक बड़ा लाभ है कि लेखक ने अपने अनुभवों से उस विषय का ताना-बाना बूना होगा। दूसरे अगर वह प्रसिद्ध लेखक है तो इसका मतलब है कि वो पाठकों की अभिरुचि का है। दुर्भाग्‍य से हमलोग बहुत नहीं पढ़ते हैं इसलिए हमारे हाथ बहुत सारी कहानियां नहीं आती है। किसी अच्‍छे निर्देशक के हाथ साहित्‍यक कहानी लगे तो वह उस पर फिल्‍म बनाना चाहेगा। कुछ निर्देशक अपनी फिल्‍म को साहित्‍यक स्‍तर पर ले जाना चाहते हैं। जिन्‍हें लगता है कि फिल्‍में भी सौंदर्य की अनुभूति देती है। हिंदी सिनेमा में यह प्रवृति कम है। दक्षिण और बंगाल में ऐसी चेतना सक्रिय है और वहां के दर्शक उन्‍हें पसंद करते हैं। मेरा मानना है कि हर फिल्‍म का एक दर्शक होता है। फिल्‍म की लागत और उसके व्‍यवसाय का संतुलन तो रखना ही पड़ेगा। हरिश्‍चंद्राची फैक्‍ट्री के निर्देशक को कोई निर्माता नहीं मिल रहा था तो उसने अपना घर गिरवी पर रख दिया। वह अपनी फिल्‍म से अभिभूत था। अंत में उन्‍हें दर्शक, पुरस्‍कार वितरक सब मिले। मराठी में होने के बावजूद वह फिल्‍म बड़े दर्शक समूह तक पहुंची। देश-विदेश की ज्‍यादातर सफल फिल्‍में साहित्‍य से प्रेरित या उन पर आधारित रही हैं।

- अपने यहां सिनेमा और साहित्‍य का संबंध सहज नहीं रहा है। अधिकांश साहित्‍यकारों की शिकायत है कि फिल्‍में बनाते समय निर्देशक उनकी कृति की हत्‍या कर देते हैं। विवादों से बचने के लिए फिल्‍मकार भी किसी साहित्‍यक कृति पर फिल्‍म बनाने से बचते हैं

0 सा‍मान्‍य तौर पर संदेह और अविश्‍वास बना हुआ है। गौर करें तो हमारे यहां ऐसा साहित्‍य लिखा भी नहीं जा रहा है, जिसे आसानी से सिनेमा में ढाला जा सके। मेरे एक मित्र विश्‍वास पाटिल हैं, उनका अध्‍ययन है वृहद उपन्‍यासों को फिल्‍म में ढालना मुश्किल होता है। जबकि कहानियों और नाटकों पर फिल्‍में बन जाती हैं। नाटक संवाद प्रधान होते हैं इसलिए निर्देशक को सुविधा मिलती है। कहानी के मामले में निर्देशक अपनी कल्‍पना से उसका विस्‍तार कर सकता है। अभी हर निर्देशक एक अच्‍छी कहानी की तलाश में है। ये कहानियां कहीं से भी मिल सकती हैं।

- कहते हैं कि दर्शकों का प्रोफाइल बदल रहा है। मल्‍टीप्‍लेक्‍स संस्‍कृति ने सिनेमा के विषयों को प्रभावित किया है। आप क्‍या मानते हैं?

0 मल्‍टीप्‍लेक्‍स के दर्शक सिर्फ शहरों में हैं। बांदा, बलिया जैसे छोटे शहरों में अभी मल्‍टीप्‍लेक्‍स की कल्‍पना नहीं कर सकते हैं। विकास के साधन पहले शहरों में आते हैं फिर वे छोटे शहरों और देहातों के तरफ जाते हैं। टीवी का उदाहरण बहुत अच्‍छा होगा, सैटेलाइट चैनल आने के बाद ज्‍यादातर टीवी सीरियल शहरों तक सीमित रहे। अभी सैटेलाइट और डीटीएच कस्‍बों और गांव में पहुंच चुका है। नतीजा साफ दिख रहा है। टीवी पर गंवई सीरियलों की बाढ़ आ गई है। उनकी प्रामाणिकता और वास्‍तविकता अलग शोध का विषय है लेकिन शहरी निर्माताओं की रुचि देहातों बढ़ी है। उसका साफ कारण है व्‍यवसाय। मेरा मानना है कि मल्‍टीप्‍लेक्‍स के दर्शक सिर्फ मनोरंजन के लिए फिल्‍में देखते हैं। इस‍के अलावा मल्‍टीप्‍लेक्‍स जिस आनंद का अनुभव देता है वह नया है। मल्‍टीप्‍लेक्‍स के दर्शकों को मैंने फिल्‍म देखते समय भी एसएमएस करते और मोबाइल पर बातें करते देखा है। उनके लिए फिल्‍म अलग तरह का टाइम पास है। छोटे शहरों में फिल्‍म देखने का उद्देश्‍य कस्‍बों और शहरों का दर्शक के लिए फिल्‍म देखना एक समारोह की तरह होता है। मुझे लगता है जल्‍दी ही दर्शकों का यह भेद मिटेगा और फिल्‍मों के विषयों में विस्‍तार आएगा। पहले नई फिल्‍मों को गांव पहुंचने में दो-तीन महीने लग जाती थी। अभी हर जगह के लोग एक साथ फिल्‍में देख रहे हैं। दर्शकों के पास बेहतर सिनेमा का भी विकल्‍प आ गया है। हम अच्‍छी फिल्‍में नहीं बनाएंगे तो वे हिंदी फिल्‍में देखना बंद भी कर देंगे। टीवी के जरिए वे दुनिया भर का सिनेमा देख सकते हैं और अब तो विदेशी फिल्‍में डब होकर हिंदी में आ रही हैं। उन्‍होंने भारतीय दर्शकों के रुचि, ताकत और पसंद को समझा है। वे धीरे-धीरे अपनी पैठ बना रहे हैं। आप देखें कि 2012 और अवतार जैसी फिल्‍में भारत में खूब चली। भाषा अवरोध नहीं रही। मैं तो कहूंगा कि गांव में बैठे दर्शका का भी प्रोफाइल बदल रहा है।

- अपने यहां अभी तक बॉक्‍स ऑफिस कलेक्‍शन ही फिल्‍मों के हिट या फ्लॉप होने का लक्षण ताता है। ऐसा लग रहा है कि जल्‍दी ही फिल्‍मों की आय के और जरिए विकसित होंगे। जैसे कि डीवीडी, टीवी प्रसारण आदि

0 सही कह रहे हैं। विदेशों में डीवीडी, होम वीडियो और टीवी से फिल्‍मों की अच्‍छी आमदनी हो जाती है। दर्शक बार-बार देखते हैं। अपने यहां भी डीवीडी सस्‍ते हो रहे हैं और इसकी संभावना बढ़ती जा रही है। हो सकता है कि कस्‍बों और छोटे शहरों में थोड़ी देर से मल्‍टीप्‍लेक्‍स बने ले‍किन डीवी और सैटेलाइट के जरिए वहां के भी दर्शक नई फिल्‍मों का आनंद ले सकेंगे। अब इस प्रसार को रोक पाना मुश्किल है।

- क्‍या आपको नहीं लगता कि हिंदी फिल्‍मों के निर्माण का विकेंद्रीकरण होना चाहिए। अभी तक सबकुछ मुंबई में केंद्रित है। जबकि नई तकनीकी सुविधाओं से कहीं भी फिल्‍म बनाना आसान हो गया है

0 यह जरूरी है। हिंदी सिनेमा का मुंबई तक सीमित रहना उसके भविष्‍य के लिए सही नहीं है। यहां के निर्माता-निर्देशक मुनाफे और व्‍यवसाय के लीक पर चलते हैं। वे स्‍टारों पर आश्रित रहते हैं। अगर हिंदी प्रदेशों में सिनेमा विकसित होगा तो मुंबई का एकाधिकार टूटेगा और एकरसता भी खतम होगी। मुझे लगता है तब भी हमारे समाज की कहानियां फिल्‍मों में आ पाएंगी। मुंबई के निर्माता-निर्देशकों ने अपने ऊपर यह बोझ ले लिया है कि उन्‍हें ज्‍यादा से ज्‍यादा दर्शकों को संतुष्‍ट करना है। उसकी वजह से ही स्‍टार सिस्‍टम बढ़ा है। अभी भोजपुरी सिनेमा का विकास दिख रहा है लेकिन वह भटकाव का शिकार है। अधिकांश भोजपुरी फिल्‍में हिंदी फिल्‍मों की भोंडी नकल है।

Wednesday, July 21, 2010

समाज का अक्स है सिनेमा - मंजीत ठाकुर

हिंदी सिनेमा पर मंजीत ठाकुर ने यह सिरीज आरंभ की है।
भाग-1

सिनेमा, जिसके भविष्य के बारे में इसके आविष्कारक लुमियर बंधु भी बहुत आश्वस्त नहीं थे, आज भारतीय जीवन का जरूरी हिस्सा बना हुआ है। 7 जुलाई 1896, जब भारत में पहली बार किसी फिल्म का प्रदर्शन हुआ था, तबसे आज तक सिनेमा की गंगा में न जाने कितना पानी बह चुका है। हम अपने निजी औरसामाजिक जीवन की भी सिनेमा के बग़ैर कल्पना करें तो वह श्वेत-श्याम ही दिखेगा।

सिनेमा ने समाज के सच को एक दस्तावेज़ की तरह संजो रखा है। चाहे वह 1930 में आर एस डी चौधरी की बनाई व्रत हो, जिसमें मुख्य पात्र महात्मा गांधी जैसा दिखता था और इसी वजह से ब्रितानी सरकार ने इस फिल्म को बैन भी कर दिया था, चाहे 1937 में वी शांताराम की दुनिया न माने। बेमेल विवाह पर बनी इस फिल्म को सामाजिक समस्या पर बनी कालजयी फिल्मों में शुमार किया जा सकता है।

जिस दौर में पाकिस्तान अलग करने की मांग और सांप्रदायिक वैमनस्य जड़े जमा चुका था, 1941 में फिल्म बनी पड़ोसी, जो सांप्रदायिके सौहार्द्र पर आधारित थी। फिल्म शकुंतला के भरत को नए भारत के मेटाफर के रुप में इस्तेमाल किया गया था। जाति हालांकि आज भी लगान और राजनीति तक में दिखी है,लेकिन इससे बहुत पहले 1936 में ही देविका रानी और अशोक कुमार बॉम्बे टॉकीज़ की अछूत कन्या में जाति प्रथा का मुद्दा उठा चुके थे। दलित मुद्दे पर फिल्मों में बाद में बनी फिल्म सुजाता को कोई कैसे बिसरा सकता है।

देश आजाद हुआ तो एक नए किस्म का आदर्शवाद छाया था। फिल्में भी इस लहर से अछूती नहीं थीं। देश के नवनिर्माण में उसने कदमताल करते हुए युवा वर्ग को नई दिशा, नया सोच और नए सपने बुनने के अवसर प्रदान किए।

50 का दशक संयुक्त परिवार और सामाजिक समरता की फ़िल्मोंका दशक था। संसार’, ‘घूँघट’,घराना’, औरगृहस्थीजैसी फ़िल्मों ने समाज की पारिवारिक इकाई में भरोसे को रुपहले परदे पर आवाज़ दी।

इन्हीं मूल्यों और सुखांत कहानियों के बीच कुछ ऐसी फिल्में भी इस दौर में आईं, जिनने समाज में वैचारिक स्तर पर आ रहे बदलाव को रेखांकित भी किया।

एक ओर तो राज कपूर-दिलीप कुमार-देव आनंद की तिकड़ी अपने रोमांस के सुनहरे रोमांस से दुनिया जीत रहे थे। लेकिन राज कपूर की फिल्मों एक वैचारिक रुझान साफ दिख रहा था, और वह असर था मार्क्सवादका। गौरी से करिअर शुरु करने वाले राज कपूर अभिनेता के तौर पर चार्ली चैप्लिन का भारतीय संस्करण पेश करने की कोशिश में थे। हालांकि श्री 420 में वह नायिका के साथ एक ही छतरी के नीचे बारिश में भींगकर गाते भी हैं, और इस तरह राज कपूर ने दब-छिप कर रहने वाले भारतीय रोमांस को एक नया अहसास दिया।

हालांकि, भारतीय सिनेमा के संदर्भ में किसी विचारधारा की बात थोड़ी विसंगत लग सकती है। लेकिन पचास के दशक के शुरुआती दौर में विचारधारा का असर फिल्मों पर दिखा। बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन भारत में नव-यथार्थवाद का मील का पत्थर है।

लेकिन ज्यादातर भारतीय फिल्मों में वामपंथी विचारधारा के दर्शन होते हैं वह कोई क्रांतिकारी विचारधारा न होकर सामाजिक न्याय की हिमायत करने वाली है। इसमें समाज सुधार, भूमि सुधार,गाँधीवादी दर्शन और सामाजिक न्याय सभी कुछ शामिल है। लेकिन हर आदर्शवाद की तरह फिल्मों का यह गांधी प्रेरित आदर्शवाद ज्यादा दिन टिका नहीं। ऐसे में आराधना से राजेश खन्ना का आविर्भाव हुआ। खन्ना का रोमांस लोगों को पथरीली दुनिया से दूर ले जाता, यहां लोगों ने परदे पर बारिश के बाद सुनसान मकान में दो जवां दिलों को आग जलाकर फिर वह सब कुछ करते देखा, जो सिर्फ उनके ख्वाबों में था।

इस तरह का पलायनवाद ज्यादा टिकाऊ होता नहीं। सो, ताश के इस महल को बस एक फूंक की दरकार थी। दर्शक बेचैन था। मंहगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और पंगु होती व्यवस्था से लड़ने वाली एक बुलंद आवाज़ कीज़रुरत थी। ऐसे में एक लंबे लड़के की बुलंद आवाज़ परदे पर गूंजने लगी गई। इस नौजवान के पास इतना दम था कि वह व्यवस्था से खुद लोहा ले सके, और ख़ुद्दारी इतनी कि फेंके हुए पैसे तक नहीं उठाता।

कुछ लोग तो इतना तक कहते है कि अमिताभ के इसी गुस्सेवर नौजवान ने सत्तर के दशक में एक बड़ी क्रांति की राह रोक दी। बहरहाल, अमिताभ का गुस्सा भी कुली, इंकलाब आते-आते टाइप्ड हो गया। जब भी इस अमिताभ ने खुद को या अपनी आवाज को किसी मैं आजाद हूं में, या अग्निपथ में बदलना चाहा, लोगों ने स्वीकार नहीं किया।

तो नएपन के इस अभाव की वजह से लाल बादशाह, मत्युदाता, और कोहराम का पुराने बिल्लों और उन्हीं टोटकों के साथ वापस आया अमिताभ लोगों को नहीं भाया। वजह- उदारीकरण के दौर में भारतीय जनता का मानस बदल गया था। अब लोगो के पास खर्च करने के लिए पैसा था, तो वह रोटी के मसले पर क्यों गुस्सा जाहिर करे।

ऐसे में एक और नए लड़के ने दस्तक दी। यह लड़का कूल है, इतना कि अपने प्यार को पाने लंदन से पंजाब के गांव तक चला आए। परदेसी भारतीयों की कहानियों पर और परदेसी भारतीयों के लिए बनाई गई फिल्मों में शाहरुख खान का किरदार राज मल्होत्रा एक सिंबल के तौर पर उभरा।

हालांकि, परदेसी भारतीयों के लिए बनाए जा रहे सिनेमा में तड़क-भड़क ज्यादा हो गया और भारत के आम आदमी का सिनेमा के कथानक से रिश्ता कमजोर हो गया। ऐसे में मिड्ल सिनेमा ताजा हवा का झोंका बनकर आया है। व्यावसायिक रुप से सफल इन फिल्मों का क्राफ्ट और कंटेंट दोनों मुख्यधारा की फिल्मों से बेहतर है। आमिर खान की लगान, तारे ज़मीन पर जैसी कई फिल्मों, शाहरुख की स्वदेश और चक दे इंडिया,और श्याम बेनेगल की वेवकम टू सज्जनपुर और बेलडन अब्बा ने सामयिक विषयों को फिल्मो में जगह दी है। और तब अलग से यह कहने की ज़रुरत रह नही जाती कि सिनेमा समाज का अक्स है।