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Wednesday, June 30, 2010

डायरेक्टर न होता तो जर्नलिस्ट होता: मधुर भंडारकर

-अजय ब्रह्मात्मज

डायरेक्टर न होता तो जर्नलिस्ट होता: मधुर भंडारकर

पहली बार चांदनी बार से ख्याति अर्जित की निर्देशक मधुर भंडारकर ने। इसके पहले बतौर निर्देशक उनकी एक फिल्म आई थी, जिसने निराश किया था। चांदनी बार भी मुश्किल से पूरी हुई। फैंटेसी एवं रिअलिटी के तत्वों को जोडकर सिनेमा की नई भाषा गढी है मधुर ने। उनकी फिल्में सीमित बजट में संवेदनशील तरीके से मुद्दे को उठाती हैं। इन दिनों वे कॉमेडी फिल्म दिल तो बच्चा है जी की तैयारियों में लगे हैं।

कब खयाल आया कि फिल्म डायरेक्ट करनी है?

बचपन में गणपति महोत्सव, सत्यनारायण पूजा, जन्माष्टमी जैसे त्योहारों पर सडक घेर कर 16 एमएम प्रोजेक्टर से दिखाई जाने वाली ब्लैक-व्हाइट और कलर्ड फिल्में देखता था। किसी से कह नहीं पाता था कि डायरेक्टर बनना है। मेरे दोस्त हीरो, विलेन या कॉमेडियन की बातें करते थे, मैं टेकनीक के बारे में सोचता था। शॉट आगे-पीछे या ऊपर-नीचे हो तो चौंकता था कि इसे कैसे किया होगा? ट्रॉली और क्रेन के बारे में नहीं जानता था। तभी समझ में आ गया था कि वी. शांताराम, विजय आनंद और राज खोसला की फिल्में अलग होती हैं।

फिर..

मैंने विडियो कैसेट का बिजनेस शुरू किया जो पांच साल से ज्यादा चला। मेरे पास 17-18 सौ कैसेट थे। यह काम इसलिए पसंद था कि इसमें फिल्में देखने को मिलती थीं। उसी दौर में मैंने श्याम बेनेगल की कलयुग और मंडी देखीं। निशांत और भूमिका नहीं देख पाया था। तब हमें इन्हें देखने की इजाजत नहीं मिलती थी। तभी सत्यजित राय, श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी जैसे निर्देशकों के बारे में सुना। इसके बाद सुभाष घई की हीरो और गोविंद निहलानी की अ‌र्द्धसत्य कई-कई बार देखी। गोल्डी साहब और गुरुदत्त की फिल्में अच्छी लगीं। देव आनंद की गाइड तीस-पैंतीस बार देखी। मैंने महबूब स्टूडियो में राज खोसला को माटी मांगे खून की शूटिंग करते देखा। रवि टंडन कीखुद्दार, देव साहब की स्वामी दादा, प्रकाश मेहरा की नमकहलाल की शूटिंग देखी। स्टार्ट, साउंड, कट सुन कर मुझे जोश आ जाता था। ज्यादातर तो मैं सेट पर पीछे की ओर खडा रहता था, लेकिन जिन लोगों को कैसेट देता था, उनके सेट पर थोडे विश्वास के साथ चला जाता था। एक बार किसी एक्टर को एक ही डायलॉग पंद्रह बार बोलते देख मैं खीझ गया। बाद में पता चला कि सीन को बेहतर बनाने के लिए डायरेक्टर ऐसा कराते हैं।

कोई टीचर या गाइड भी था, जिसने दिशा दी हो?

नहीं। मेरे पास छोटा सा प्रोजेक्टर था, जो मेट्रो थिएटर के पास से खरीदा था। उसके अंदर रील डालकर चलाता था और शो करता था। बांबे लैब के बाहर फेंकी गई रीलें लाता था और उन्हें चिपका कर अपनी स्टोरी और फिल्में बनाता था। मेरी फिल्म में एक साथ देव आनंद, अमिताभ बच्चन और फिरोज खान होते थे। हालांकि नहीं जानता था कि फिल्म बनाने का मौका कौन देगा। राज सिप्पी के पास गया तो उनके 12 असिस्टेंट थे। बाद में कैसेट के काम में घाटा हुआ तो घरवालों ने कुछ और करने को कहा। कपडे का बिजनेस किया, कुछ और भी काम किए, लेकिन मन तो फिल्मों में ही था। सीन देखकर फिल्म का नाम बता देता था। जर्नलिस्ट दोस्त किसी सीन के बारे में बताते हुए फिल्म का नाम पूछते थे और मैं सही नाम बता देता था। कास्टिंग के सारे नाम पढता था। पंढरी दादा का नाम हर फिल्म में आता था। वे प्रसिद्ध मेकअप मैन थे। सोचता था कि डायरेक्टर न बना तो फिल्म जर्नलिस्ट जरूर बन जाऊंगा।

फिर फिल्मों का सिलसिला कैसे चला?

बडे डायरेक्टरों ने मौका नहीं दिया तो मैं छोटे डायरेक्टरों के पास गया। कहीं काम मिला तो पैसा नहीं मिला। आने-जाने का खर्च भी नहीं निकलता था। मैं जूनियर आर्टिस्ट को बुलाने, क्राउड को संभालने, मेकअपमैन को बुलाने, एक्टर को बुलाने का काम करता था। तब वैनिटी वैन नहीं होते थे। फिल्म सिटी में रात के दो बजे पैक-अप होने के बाद टेंपो में आर्ट डिपार्टमेंट का सामान लादा जाता था। उसी में बैठकर मेन रोड तक आता था। बातें तो सारी याद हैं, लेकिन किसी के प्रति गुस्सा नहीं है।

किसने मौका दिया? या कहां अप्रोच किया?

मेरे दूर के मामा को मेरे पैशन के बारे में मालूम था। उन्होंने पूछा कि राम गोपाल वर्मा के साथ काम करोगे? फिल्म शिवा तब रिलीज होने वाली थी। मैंने सोचा, कोई मिडिल एज आदमी होगा, जिसने धार्मिक फिल्म बनाई होगी। फिल्म देखी और मिलने चला गया। इसके बाद तो उनका फैन बन गया। उन्होंने मुझे हैदराबाद रात की शूटिंग के दौरान बुलाया और कहा कि उनका असिस्टेंट बन जाऊं। संयोग ही था कि उनकी भी विडियो कैसेट लाइब्रेरी थी। उनके साथ चार-पांच साल, यानी रंगीला तक रहा। रंगीला में एसोसिएट डायरेक्टर था।

बचपन में देखी गई कौन सी फिल्में याद रहीं और क्यों?

प्यासा में वहीदा रहमान जी ने गुलाबो का जो किरदार निभाया था, वह लाजवाब था। ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर वह फिल्म देखी थी। फिल्म की लाइटिंग भी बेहतरीन थी। फिर हृषीकेष मुखर्जी की फिल्म अनाडी देखी। उसमें ललिता जी का किरदार आज तक याद है।

मुंबई के किस इलाके में रहते थे आप? परिवार के बारे में बताएं।

बांद्रा-खार में। खादापुरी इंडस्ट्रियल इलाके में हम रहते थे। पिता जी इलेक्ट्रिक कॉन्ट्रैक्टर थे, मां हाउसवाइफ। बहन पढती थी। फिल्मों के कीडे ने मुझे ही काटा था। दूरदर्शन पर ही फिल्में देखते थे। घर में टीवी नहीं था, स्कूल से लौटते हुए दूसरों के घर जाकर फिल्म देखता और फिर घर लौटकर सबको उसकी कहानी सुनाता था।

आप राम गोपाल वर्मा के असिस्टेंट रहे, लेकिन उनकी शैली का प्रभाव आप पर नहीं दिखता। आपने अलग शैली विकसित की।

हर असिस्टेंट अपने डायरेक्टर से टेकनीक सीखता है, लेकिन जब फिल्में बनाता है तो अपने हिसाब से बनाता है। रंगीला के समय मुझे लगा कि अब अपनी फिल्म डायरेक्ट करनी चाहिए। मेरे पास अनुभव व जानकारी थी, लेकिन इंडस्ट्री में मेरा कोई गॉडफादर नहीं था। एक साल तक किसी ने फिल्म नहीं दी। लोग कहते भी थे कि कमर्शियल फिल्म बनाऊं। तब मैंने त्रिशक्ति बनाई। विडियो कैसेट के व्यापारी बाबू भाई लाठीवाला प्रोड्यूसर थे।

यह फिल्म चांदनी बार के पहले बनी? त्रिशक्ति के बारे में लोग नहीं जानते।

वह पिक्चर आई और चली गई। इसमें मिलिंद गुणाजी, शरद कपूर, अरशद वारसी थे। फिल्म बनने में तीन साल लगे, तब तक सब्जेक्ट, एक्टर और पिक्चर, सब बासी हो गया और बॉक्स ऑफिस पर मेरे एक्टरों की वैल्यू नहीं रह गई। मैंने जिनको भी फिल्म दिखाई, उनसे यही कहा कि यह मेरा आखिरी काम नहीं है। मैं रामू का एसोसिएट था तो लोगों को मुझ पर थोडा भरोसा तो था।

पहली फिल्म की विफलता से लोग निराश हो जाते हैं। आप टिके रहे और अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब हुए? कैसे?

त्रिशक्ति एक साल की बेकारी के बाद हताशा में रिलीज की थी। वह मेरे मन की फिल्म नहीं थी। फ्लॉप का टैग भी लग गया था। किसी हीरो का सपोर्ट नहीं था, कोई आर्थिक मदद देने वाला भी नहीं था। मैं पत्नी और मां से कहता हूं कि लकी हूं, क्योंकि ऐसे कई डायरेक्टर थे, जो पहली फिल्म फ्लॉप होने के बाद गुमनामी में खो गए। त्रिशक्ति के समय कई लोगों से बात भी हुई, लेकिन सभी इस फिल्म का नतीजा देखना चाहते थे। शत्रुघ्न सिन्हा हमेशा कहते हैं कि फिल्मों में सफलता का अनुपात एक प्रतिशत से ज्यादा नहीं होता। मैंने भी सोचा कि काम न मिला तो टीवी सीरियल करूंगा। मैं लोगों से कहता था कि किसी से मिलवा दो, कोई मेरे साथ काम करने को तैयार नहीं था। प्रोड्यूसर कन्नी काटते थे। मिलने पर कहते थे कल सुबह फोन करो। सुबह फोन करने पर साफ कह देते थे कि अभी कोई फिल्म नहीं है।

निराशा के इस दौर में खुद पर कैसे विश्वास बना रहा?

उन दिनों घर लौटता था तो नींद नहीं आती थी। घर वाले कहते थे कि दूसरा काम करूं। कभी किसी एक्टर से मिलने जाता तो उनकी मेकअप वैन के बाहर दो-तीन घंटे इंतजार करता था। तब जाकर वे निकलते थे और फिर यह कहकर टरका देते कि अगले दो-तीन साल तक टाइम नहीं है। मैंने फैसला कर लिया था कि अगली फिल्म अपने मन से बनाऊंगा। मैं हमेशा कहता हूं कि खुद पर भरोसा होना चाहिए। तभी कोई आप पर इन्वेस्ट करेगा। सामने वाले को जहां लगा कि यह डरा हुआ है तो वह क्यों इन्वेस्ट करेगा? मुझे पता था कि मैं खोटा सिक्का नहीं हूं। तब चांदनी बार आई।

चांदनी बार की प्रेरणा कैसे और कहां से मिली? इसमें आपकी अलग शैली दिखी और दर्शकों-समीक्षकों ने इसे स्वीकार किया।

त्रिशक्ति के फ्लॉप होने के बाद मैं निराश था। मेरा दोस्त स्टॉक मार्केट का ब्रोकर था। एक दिन वह मुझे बार में ले गया, जहां मैंने बार ग‌र्ल्स को बीयर सर्व करते देखा। मैं दो-तीन बार वहां गया, फिर सोचा कि क्यों न इनकी जिंदगी पर फिल्म बनाऊं। कहानी लिखी और दो-तीन प्रोड्यूसरों से मिला। सभी ने मना कर दिया। एक ने कहा कि इसमें चार-पांच गाने और अश्लील दृश्य भरो, नग्न लडकियां दिखाओ। मैंने उनसे स्क्रिप्ट वापस ले ली। फिर आर. मोहन से मिला। उनके बेटे को त्रिशक्ति तकनीकी रूप से अच्छी लगी थी। उन्होंने कहा था कि छोटे बजट की कोई फिल्म हो तो बताना। मैंने उन्हें कहानी सुनाई। उनके हां कहने पर चांदनी बार पर छह महीने तक रिसर्च किया।

हिंदी कमर्शियल फिल्मों में ऐसे रिसर्च नहीं होते। आप समकालीन सामाजिक विषय पर फिल्म बना रहे थे, शोध की क्या प्रक्रिया थी?

त्रिशक्ति में एक कैरेक्टर था अन्ना। बार बिजनेस में उसकी पहचान थी। उसी ने मुझे वहां के कल्चर के बारे में बताया, बार मालिकों, डांसर्स से मिलवाया। पहले लडकियों को बात करने में शर्म आती थी। कुछ मुलाकातों के बाद उनका भरोसा जगा तो उन्होंने अपना दर्द मुझसे बांटा। ग्लैमर, डांस और बीयर के पीछे की दर्दनाक कहानियां मालूम हुई। मेरे पास इतना मटीरियल है कि आठ-दस चांदनी बार बना सकता हूं।

कास्टिंग को लेकर दिक्कत हुई? तब्बू को कैसे राजी किया?

आर. मोहन ने तब्बू से यह कहकर मिलवाया कि मैं रामू का असिस्टेंट हूं। मैंने उनसे कहा कि मेरी फ्लॉप फिल्म के बारे में भी बता दें तो उन्होंने कहा कि तब्बू अगर पूछें तो बता देना। मैं तब्बू से मिला और बता दिया कि मेरी फिल्म फ्लॉप हो चुकी है। फिर भी तब्बू ने स्क्रिप्ट सुनी और कहानी सुनने के बाद कहा कि, मैं यह फिल्म कर रही हूं। सच कहूं तो लिखते समय तब्बू ही मेरे दिमाग में थीं। उनका लुक, कोमलता और परिपक्वता सभी मेरी नायिका से मिलता था, जो दो बच्चों की मां थी।

कभी लगा कि सही मौकेनहींमिल पा रहे हैं? या फिल्म इंडस्ट्री से अपेक्षित सपोर्ट नहीं मिल रहा है। इस भेदभाव पर गुस्सा आया?

गुस्सा आता भी तो क्या कर सकता था! तकलीफ होती थी। शुरू में बडे स्टार कास्ट के साथ महंगी फिल्में नहीं मिलीं। मुझे जो मिला, उसी में मैंने अपनी पहचान बनाई। अगर मेरे पीछे भी कोई रहता तो फर्क पडता। लेकिन मेरी स्थिति मरता क्या न करता वाली थी। पैसा व काम चाहिए। नाम मिल गया तो अतिरिक्त लाभ समझो।

चांदनी बार के बाद सत्ता व आन को देखकर लगा कि मधुर ग्लैमर की चकाचौंध में खो रहे हैं। आन से फायदा नहीं हुआ।

चांदनी बार व सत्ता नायिका प्रधान फिल्में थीं। लोगों ने कहा कि मधुर सिर्फ नायिका प्रधान फिल्में बना सकता है। तब सोचा कि कमर्शियल फिल्म भी बनानी होगी। अपनी फिल्मों से संतुष्टि तो मिलती थी, पैसे नहीं मिलते थे। छवि तोडने के लिए आन की, लेकिन तब पुलिस अफसरों पर इतनी फिल्में आ रही थीं कि फिल्म फ्लॉप हो गई।

आपने अपने प्रिय निर्देशकों में राज खोसला, विजय आनंद, गुरु दत्त का नाम लिया। श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी से भी आप प्रभावित रहे। राम गोपाल वर्मा से आपने क्या सीखा?

रामू जी का कैमरा एंगल और टेकनीक अलग होता है। उनकी फिल्मों में बहुत भाषणबाजी नहीं होती। पांच सालों तक किसी के साथ काम करें तो कुछ चीजें स्वाभाविक रूप से शैली में शामिल हो जाती हैं। हां-किसी की नकल नहीं की। कोशिश यही की है किअपनी शैली विकसित करूं।

पेज-3, कॉरपोरेट, ट्रैफिक सिग्नल जैसी फिल्में महानगरों में पल रही संस्कृति को अलग कोणों से उभारती हैं। यह आपका सचेत प्रयास था या अनायास ऐसा होता चला गया?

मैंने मेट्रो लाइफ पर तीन फिल्में बनानी चाही थीं। पेज-3, कॉरपोरेट, ट्रैफिक सिग्नल उसी सिरीज की ट्रायलोजी है। पेज-3 कॉकटेल पार्टी कल्चर और उसमें शामिल होने वाले लोगों पर है। कॉरपोरेट में बिजनेस व‌र्ल्ड के अप्स एंड डाउन हैं। ट्रैफिक सिग्नल ब्लैक कॉमेडी व ह्यूमर थी। मैं शहरी जीवन की विसंगतियों को फिल्मों के जरिये लाने में सफल रहा। लोगों ने पेज-3 संस्कृति के बारे में इस फिल्म के बाद ही जाना।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आ रहे नए डायरेक्टर्स को क्या सुझाव देंगे। यहां सफलता का अनुपात एक प्रतिशत है तो वे कैसे तैयारी करें?

यहां स्ट्रगल है। कोई भी एक्टर शुरू में साथ काम करने के लिए तैयार नहीं होगा। अपना विषय चुनें और उस पर भरोसा रखें। डायरेक्शन में आने के लिए टेकनीक की समझ और स्क्रिप्ट पर पकड जरूरी है। पेज-3 के समय मेरा मजाक बना, लेकिन वह फिल्म लोगों को अच्छी लगी।

आपकी फिल्मों में मध्यवर्गीय दृष्टिकोण दिखता है। फैशन में वह काफी स्पष्ट था। मेघना माथुर किसी भी मध्यवर्गीय परिवार की महत्वाकांक्षी लडकी हो सकती है

मैं स्वयं मध्यवर्ग का हूं तो मेरी सोच भी वैसी ही है। फैशन में मेघना माथुर छोटे शहर से आई लडकी थी। उसे दर्शकों ने आइडेंटिफाई किया। इंडस्ट्री के लोगों को भी वह रिअल कैरेक्टर लगी। मैं रिअलिटी और फैंटेसी के बीच बैलेंस बना कर चलता हूं।

कामयाबी से मधुर भंडारकर में कितना बदलाव आया?

मेरा मूल स्वभाव वही है। अब व्यस्तता बढी है तो प्राथमिकताएं भी बदलीं। जो लोग मुझे राम गोपाल वर्मा के समय से जानते हैं, वे कहते हैं कि मधुर नहीं बदला। लेकिन दायरा बढा, नए दोस्त बने। साइकिल से विडियो कैसेट बांटने वाले मधुर को भूल जाऊं, ऐसा हो ही नहीं सकता।



दरअसल: किताब के रूप में 3 इडियट्स की मूल पटकथा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

विधु विनोद चोपड़ा ने एक और बढि़या काम किया। उन्होंने 3 इडियट्स की मूल पटकथा को किताब के रूप में प्रकाशित किया है। मूल पटकथा के साथ फिल्म के लेखक और स्टारों की सोच और बातें भी हैं। अगर कोई दर्शक, फिल्मप्रेमी, फिल्म शोधार्थी 3 इडियट्स के बारे में गहन अध्ययन करना चाहता है, तो उसे इस किताब से निश्चित रूप से मदद मिलेगी। 20-25 साल पहले हिंद पॉकेट बुक्स ने गुलजार और राजेन्द्र सिंह बेदी की लिखी पटकथाओं को किताबों के रूप में छापा था। उसके बाद पटकथाएं छपनी बंद हो गई।

पाठक और दर्शकों को लग सकता है कि प्रकाशकों की पटकथाओं में रुचि खत्म हो गई होगी। सच्चाई यह है कि एक लंबा दौर ऐसी हिंदी फिल्मों का रहा है, जहां कथा-पटकथा जैसी चीजें होती ही नहीं थीं। यकीन करें, हिंदी फिल्मों में फिर से कहानी लौटी है। पटकथाएं लिखी जा रही हैं। उन्हें मुकम्मल करने के बाद ही फिल्म की शूटिंग आरंभ होती है।

इधर हिंदी सिनेमा पर चल रहे शोध और अध्ययन का विस्तार हुआ है। लंबे समय तक केवल अंग्रेजीदां लेखक और पश्चिम के सौंदर्यशास्त्री और लोकप्रिय संस्कृति के अध्येता ही हिंदी फिल्मों पर शोध कर रहे थे। उनकी छिटपुट कोशिश का भी गहरा असर हुआ। अब भारत में भी संस्थान, विश्वविद्यालय और अकादमियों ने हिंदी फिल्मों में रुचि ली है। समस्या यह है कि अपने यहां फिल्मों के दस्तावेजीकरण का चलन नहीं है। निर्माता-निर्देशकों में अपनी फिल्मों को संरक्षित करने का आग्रह नहीं दिखता। कभी किसी निर्माता से उनकी फिल्मों की रिलीज की तारीख और साल पूछ लें, तो वे बगलें झांकने लगते हैं। हालांकि इंटरनेट पर आई सूचनाओं की बाढ़ से बेसिक जानकारियां मिल जाती हैं, लेकिन विस्तार में जाने पर वहां भी कुछ हाथ नहीं आता। इस संदर्भ में 3 इडियट्स की पटकथा का किताब में आना स्वागत योग्य कदम है। विधु विनोद चोपड़ा ने कहा है कि वे अपनी फिल्मों के साथ ही क्लासिक फिल्मों की पटकथा भी प्रकाशित करवाएंगे। इस दिशा में सबसे पहले गुरुदत्त की फिल्मों पर काम चल रहा है। फिल्में देख कर संवाद और दृश्य लिखना थोड़ा मुश्किल काम होता है। यह उल्टी प्रक्रिया है, इसलिए इसमें मूल का आनंद नहीं मिल सकता। फिर भी जहां कुछ मौजूद नहीं है, वहां इस तरह की हर कोशिश महत्वपूर्ण हो जाती है। गुरुदत्त के साथ हिंदी के सभी महत्वपूर्ण निर्देशकों की फिल्मों से संबंधित सामग्रियों का दस्तावेजीकरण होना चाहिए। फिल्मों के प्रचार में करोड़ों झोंक देने वाले निर्माता और कारपोरेट हाउस अपनी फिल्म की एक प्रिंट भी संरक्षण नेशनल फिल्म आर्काइव को नहीं भेज पाते। उन्हें इस संदर्भ में भी सोचना चाहिए।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को अपने स्तर पर भी यह कोशिश करनी चाहिए। अगर हम अपनी आने वाली पीढि़यों को सिने साक्षर बनाना चाहते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि भविष्य का सिनेमा अधिक उपयोगी और सार्थक होगा, तो हमें इस दिशा में अभी से पहल करनी चाहिए। फिल्मों से संबंधित सामग्रियों का संकलन और संग्रह मुश्किल काम नहीं है। फिल्म की रिलीज के साथ-साथ यह कर लिया जाए, तो अधिक यत्न भी नहीं करना पड़ेगा। इधर अमिताभ बच्चन खुद से संबंधित हर तरह की सामग्रियों का संग्रह कर रहे हैं। मालूम नहीं कि उन सामग्रियों के सार्वजनिक उपयोग की वे अनुमति देंगे या नहीं, लेकिन इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे अकेले ऐसे स्टार हैं, जिनसे संबंधित अधिकांश सामग्रियों का दस्तावेजीकरण चल रहा है। अब तो उनके बेटे अभिषेक बच्चन ने भी इसे अपना लिया है। 3 इडियट्स के किताब के रूप में आने की खुशी के बावजूद एक शिकायत है कि इसे हिंदी में लाने के बारे क्यों नहीं सोचा गया? अभी जरूरत है कि हम उत्तर भारत के हिंदीभाषी पाठकों और दर्शकों के बीच ऐसी किताबें ले जाएं। वे भविष्य के हिंदी सिनेमा के ठोस दर्शक बनेंगे और उनके बीच से ही भविष्य के निर्देशक निकलेंगे।


Monday, June 28, 2010

नग्नता, नंगापन और मिस्टर सिंह मिसेज मेहता - प्रवेश भारद्वाज

बचपन से ही रुपहले परदे पर थिरकते बिम्ब मुझे आकर्षित करते थे. लखनऊ, इलाहाबाद, शाहजहांपुर, उन्नाव और बरेली में बड़े होते हुये फिल्मों को देखने का सिलसिला लगातर परवान चढ़ता गया. मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में थे और उनको भी फ़िल्मों का खूब शौक था. वे फ़िल्म देखने के लिये हम भाई-बहनों को भी साथ ले जाते थे. मैं आज भी सोचता हूं तो लगता है कि बहुत कम लोग अपने बच्चों को फ़िल्म दिखाने के मामले में इतने आज़ाद ख्याल होंगे. स्कूल के दूसरे बच्चे मेरी प्रतीक्षा करते थे कि मैं कब उन्हें अपनी देखी ताज़ा फ़िल्म की कहानियां सुनाउं. मुझे लगता है कि सहपाठियों को फ़िल्म की कहानी सुनाने के इसी शौक ने मेरे अंदर कहीं न कहीं दर्शक होने के अतिरिक्त भी फ़िल्मों से जुड़ने के बीज डाले.

मिस्टर सिंह मिसेज मेहता


1992 में मैं मुंबई पहुंचा और यहां मैंने धीरे-धीरे काम सिखा. श्याम बेनेगल की फ़िल्म ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ में मुझे सहायक के रुप में इंट्री मिली. सोनी पर आने वाले धारावाहिक ‘शाहीन’ में मैंने पहली बार बतौर निर्देशक काम किया. मैं और मेरी पत्नी श्रुति बहुत मेहनत और गंभीरता से इसे लिखते थे लेकिन एक दिन मुझे अपने ही धारावाहिक से निकाल दिया गया. खैर, उस समय मुझे याद आया कि मैं मुंबई फ़िल्म बनाने के लिये आया था, धारावाहिक बनाने के लिये नहीं.

उसी दौर में मैंने अपनी पहली स्क्रिप्ट लिखी- ‘शिकस्त’. लेकिन यह फ़िल्म कई बार शुरु हो कर बंद हो गई. मित्र अनुराग कश्यप के सहयोग से एक स्क्रिप्ट ‘जलेबी’ के नाम से भी लिखी पर वो भी शुरु नहीं हो पाई. मनु कुमारन से मेरा परिचय एक मित्र ने कराया था. उनको ‘जलेबी’ की स्क्रिप्ट काफी पसंद आई और हम लोग अक्सर मिलने लगे. एक रोज यूं ही बातचीत के दौरान मैंने उन्हें एक आइडिया सुनाया और उनको वह आइडिया पसंद आ गया.


बचपन से ही अखबार और पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली एगोनी आंट कॉलम देखता आया हूं. मुझे हमेशा लगता था कि ये कौन लोग हैं, जो सब लोगों की दिक्कतों को ठीक कर सकते हैं. उनके साथ अगर कुछ ऐसा हो तो क्या होगा ? मेरी फ़िल्म ‘मिस्टर सिंह मिसेज मेहता’ के बीज यहीं से अंकुरित हुये.

फ़िल्म की नायिका नीरा एक वेबसाइट में एगोनी आंटी है. मुझे इन कॉलम में लिखे गये पत्रों की बेबाक आत्मीयता बहुत भाती है. मैंने भी कोशिश की है कि उसी बेबाकी से फ़िल्म बनाई जाये. हालांकि पटकथा लिखने के दौरान एगोनी आंटी वाला एंगल छूट गया पर सच यही है कि फ़िल्म की कहानी उसी से निकली है.

फ़िल्म की कहानी कुछ यूं है कि नीरा और करन सिंह हाल ही में लंदन आये हैं. एक दिन नीरा को जब पता चलता है कि करन का किसी और महिला से संबंध है तो नीरा उसके फोन से नंबर लेकर उस महिला को फोन करती है. फोन पर हलो सुनने के बार नीरा जानना चाहती है कि कि वो कौन है, क्या है, कैसी है. और वो डायरेक्टरी असिस्टेंस से पता निकाल कर वहां पहुंचती है. घबराई हुई नीरा को वहां अश्विन मिलता है. ये कहानी अश्विन और नीरा के संबंधों की कहानी है, जहां नीरा के पति मिस्टर सिंह का अश्विनी की पत्नी मिसेज मेहता से अफेयर है.

अक्सर शॉर्ट स्टोरी में सिर्फ एक या दो किरदार होते हैं. मैंने भी कोशिश की है कि इस फ़िल्म में अधिक किरदार न हों. निर्मल वर्मा की लंदन प्रवास की कहानियों से भी मैं प्रेरित था. जी नहीं, उनकी जादुई भाषा जैसा इस फ़िल्म में कुछ नहीं है. आज के माडर्न वर्ल्ड सिनेमा में जिस ढंग से कैमरा आदि का प्रयोग किया जाता है फ़िल्म की टोन को आत्मीय या फर्स्ट पर्सन बनाने के लिये, मैंने कुछ प्रयास किये हैं. मुझे लगता है कि सुधी दर्शक उनका आनंद लेंगे.



कम पैसे से बनने वाली फ़िल्मों का कोई माई-बाप नहीं होता है. अधिकतर लोग यहां पर मुंबईया फ़िल्मों में काम करने के लिये आये हैं. ऊपर से हमारे पास पैसे भी बहुत कम थे. इसलिये कॉस्टिंग में बहुत दिक्कत हुई. अधिकतर अभिनेताओं का कहना था कि ऐसी फ़िल्म क्यों बना रहे हो. फिर फ़िल्म में ‘नग्नता’ भी थी. बहुत से लोगों ने कहा कि स्क्रिप्ट तो अच्छी है लेकिन ये कैसे भरोसा कर लें कि फ़िल्म भी अच्छी बनेगी. नया डायरेक्टर प्याज बहुत खाता है और उसे काफी चीज़ें अपने हिसाब से करनी होती हैं. लगभग सौ अभिनेताओं-अभिनेत्रियों ने किसी न किसी कारण से फ़िल्म में काम करने से मना कर दिया. बाद में मुझे लंदन से कास्टिंग करनी पड़ी.

विवाहेतर संबंधों की कहानी कहने में एक अजीब-सी ज़िम्मेदारी सिर पड़ जाती है. सोचना पड़ता है कि कहीं आप विवाहेतर संबंधों की वकालत तो नहीं कर रहे हैं. फ़िल्म में न्यूडिटी भी है. कई अभिनेत्रियों के साथ जब विस्तार से बात हुई तो पता चला कि उन में से कई ऐसी हैं, जिन्हें इन दृश्यों से परहेज नहीं है बल्कि उन्हें चिंता इस बात की थी कि इस से धूमिल हुई उनकी इमेज का क्या होगा ? नग्नता और नंगापन में आपको भेद समझना होगा. ये बात काफी लोग समझते हैं पर सबकी अपनी सोच है. मैं दूसरों की सोच का भी सम्मान करता हूं.

कला के हर स्टूडेंट को न्यूड पेंटिंग करने की ट्रेनिंग दी जाती है. इसलिए जब स्क्रिप्ट में न्यूड पेंटिंग की ज़रुरत पड़ी तो ये ज़रूरी हो जाता है कि मैं अपने पक्ष की बात रखूँ. कहानी के इस मोड़ पर अश्विन और नीरा एक दूसरे से जुड़ चुके हैं लेकिन फिर भी जब नीरा न्यूड पोज़ करती है तो वो पेंटिंग उनके रिश्ते का मूर्त रूप बन जाती है. इस में मेरे लिए बहुत ज़रूरी है कि फ़िल्म के दर्शक के मोरल कोड के हिसाब से नीरा पतिता नहीं लगनी चाहिए.

उस दायरे में, जहाँ आप खुद सही और ग़लत की विवेचना कर रहे हों, ये बहुत ज़रूरी था कि इस सीन को ऐसे शूट किया जाये, जहाँ यह erotic न होकर candid लगे. मैं शुरू से कहता आया हूँ कि इस फ़िल्म को महिलाएं भी देखें. तो न्यूडिटी ऐसे शूट करनी थी कि वो नंगाई न लगे. सेंसर ने उन सीन को ब्लर करने को कहा है पर कहानी के हिसाब से दर्शक को पता है कि नीरा नयूड पोज कर रही है और उसका अपना मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है.

खैर, अब फ़िल्म दर्शकों के सामने है. मैं जरुर चाहूंगा कि मेरे इस पहले प्रयास को देखिये और बताइये कि ये कैसा रहा. ये फ़िल्म केवल मेरा पहला प्रयास नहीं है. फ़िल्म के दूसरे कई साथी भी पहली बार इस माध्यम में उतरे हैं. कैमरामैन महेंद्र प्रधान और फ़िल्म के संपादक प्रणव धिवार की भी ये पहली फ़िल्म है. शुजात ख़ान साहब ने भी किसी फ़िल्म में पहली बार संगीत दिया है. आपलोगों की राय मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण होगी.

* लेखक 'मिस्टर सिंह मिसेज मेहता' फ़िल्म के निर्देशक हैं.

Sunday, June 27, 2010

फिल्‍म समीक्षा मिस्‍टर सिंह मिसेज मेहता

-अजय ब्रह्मात्‍मज

प्रवेश भारद्वाज की फिल्म मिस्टर सिंह मिसेज मेहता हिंदी फिल्मों में बार-बार दिखाई जा चुकी विवाहेतर संबंध की कहानी को नए एंगल से कहती है। प्रवेश भारद्वाज विवाहेतर संबंधों पर कोई नैतिक या सामाजिक आग्रह लेकर नहीं चलते। खास परिस्थिति में चार किरदारों और उनके बीच के संबंधों को उन्होंने सहज और संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया है। फिल्म की प्रस्तुति में कोई ताम-झाम नहीं है और न ही उनके किरदार जिंदगी से बड़े हैं।

लंदन की व्यस्त और आपाधापी भरे जीवन में हम मिस्टर सिंह और मिसेज मेहता के अवैध संबंध से परिचित होते हैं। निर्देशक की रुचि उनके संबंधों में नहीं है। वे उनके लाइफ पार्टनर की जिंदगी में उतरते हैं। मिस्टर सिंह की पत्‍‌नी नीरा और मिसेज मेहता के पति अश्रि्वनी के दंश, द्वंद्व और दुविधा को प्रवेश ने काव्यात्मक तरीके से चित्रित किया है। अपने पति के विवाहेतर संबंध से आहत नीरा मिसेज मेहता के पति से मिल कर अपना दुख-दर्द बांटती है। दो आहत व्यक्तियों को एक-दूसरे की संगत में राहत मिलती है। वे करीब आते हैं और अनायास खुद को हमबिस्तर पाते हैं। नीरा बदले की भावना से ग्रस्त नहीं है और न ही अश्विनी मौके का फायदा उठाता है। बस, दोनों के बीच वही घटता है, जिस से वे आहत हैं।

प्रवेश भारद्वाज ने शहरी माहौल में भावनात्मक तौर पर असुरक्षित दो व्यक्तियों के शारीरिक संबंध को उचित या अनुचित बताने या ठहराने के बजाय परिस्थितियों के चित्रण पर ध्यान दिया है। उन्होंने अंतरंग दृश्यों में भी शालीनता बरती है। दृश्यों को उत्तेजक और कामुक नहीं होने दिया है। फिल्म के नग्न दृश्य अश्लील नहीं लगते, क्योंकि निर्देशक का उद्देश्य दर्शकों को उत्तेजित करना नहीं है। नीरा और अश्रि्वनी के संबंधों की कोमलता को प्रवेश ने गीत-संगीत से निखारा है। संवादों में अव्यक्त भाव गीतों में व्यक्त हुए हैं। अमिताभ वर्मा और उस्ताद शुजात हुसैन खान के गीत-संगीत से कथ्य और भाव को गहराई मिली है। कलाकारों में प्रशांत नारायणन प्रभावित करते हैं। पहली फिल्म में प्रवेश भारद्वाज की संभावनाएं नजर आती हैं। मेलोड्रामा और मुठोड़ न होने से फिल्म थोड़ी सुस्त लग सकती है, किंतु इस फिल्म की यही स्वाभाविक गति हो सकती थी।

*** तीन स्टार


Friday, June 25, 2010

फिल्‍म समीक्षा रावण

मनोरम दृश्य, कमजोर कथा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

मणि रत्‍‌नम की रावण निश्चित ही रामायण से प्रेरित है। अभिषेक बच्चन रावण उर्फ बीरा, ऐश्वर्या राय बच्चन रागिनी उर्फ सीता और विक्रम देव उर्फ राम की भूमिका में हैं। बाकी पात्रों में भी रामायण के चरित्रों की समानताएं रखी गई हैं।मणि रत्‍‌नम इस फिल्म के अनेक दृश्यों में रामायण के निर्णायक प्रसंग ले आते हैं। पटकथा लिखते समय ही मानो हाईलाइट तय कर दिए गए हों और फिर उन घटनाओं के इर्द-गिर्द कहानी बुनी गई हो। इसकी वजह से उन दृश्यों में तो ड्रामा दिखता है, लेकिन आगे-पीछे के दृश्य क्रम खास प्रभाव नहीं पैदा करते। मणि रत्‍‌नम ने राम, सीता और रावण की मिथकीय अवधारणा में फेरबदल नहीं किया है। उन्होंने मुख्य पात्रों के मूल्य, सिद्धांत और क्रिया-कलापों को आज के संदर्भ में अलग नजरिए से पेश किया है।

मणि रत्‍‌नम देश के शिल्पी फिल्मकार हैं। उनकी फिल्में खूबसूरत होती हैं और देश के अन देखे लोकेशन से दर्शकों का मनोरम मनोरंजन करती हैं। रावण में भी उनकी पुरानी खूबियां मौजूद हैं। हम केरल के जंगलों, मलसेज घाट और ओरछा के किले का भव्य दर्शन करते हैं। पूरी फिल्म में प्रकृति के पंचतत्वों में से एक जल विभिन्न रूपों में मौजूद है। फिल्म के सभी पात्र भीगे और गीले नजर आते हैं। नृत्य-गीत, एक्शन और इमोशन के दृश्य पानी से सराबोर हैं। कुछ दृश्यों में तो सामने बारिश हो रही है और पीछे धूप खिली हुई है। पहाड़, नदी और झरने कोहरे में डूबे हैं। प्राचीन इमारतों पर काई जमी है। मणि रत्‍‌नम इन सभी के जरिए फिल्म का भाव और वातावरण तैयार करते हैं। सब कुछ अद्भुत रूप से नयनाभिरामी है।

फिल्म के कथ्य की बात करें तो मणि रत्‍‌नम ने बीरा और देव को आमने-सामने खड़ा करने के साथ उनके बीच रागिनी को विवेक के तौर पर रखा है। रागिनी कुछ समय तक बीरा के साथ रहने और उसके पक्ष को समझने के बाद अपने पति देव के इरादों और उद्देश्यों पर सवाल उठाती है। उसे लगता है कि बीरा गलत नहीं है। सरकार के प्रतिनिधि के रूप में वह अपने पति को देखती है और इस निर्णय पर पहुंचती है कि बीरा ज्यादा मानवीय और नेक है। उसमें एक निश्छलता है। वह अपने समाज के लिए बदले की भावना से उसका अपहरण तो करता है, लेकिन उसे सिर्फ हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है। रागिनी के प्रति उसके मन में प्रेम जागता है, लेकिन वह मर्यादा हीन नहीं है। वह उसे छूता तक नहीं है। बीरा के चंगुल से रागिनी को देव निकाल लेता है और सीता की अग्नि परीक्षा की तरह रागिनी से पॉलीग्राफ टेस्ट की बात करता है। यहां आज की सीता यानि रागिनी बिफरती है और फिर से बीरा के पास पहुंच जाती है। रामायण की कथा का यह विस्तार दर्शक नहीं पचा पाएंगे। हालांकि आखिरकार बीरा मारा जाता है, लेकिन फिल्म का क्लाइमेक्स इस वजह से कमजोर हो जाता है।

कलाकारों में विक्रम सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। सहयोगी भूमिकाओं में आए निखिल द्विवेदी, रवि किशन और प्रियमणि अपेक्षित योगदान करते हैं। रागिनी के किरदार के द्वंद्व को ऐश्वर्या राय बच्चन ने अच्छी तरह व्यक्त किया है। बीरा के रूप में अभिषेक बच्चन अधिक प्रभावित नहीं करते। वे बीरा के स्वभाव के भिन्न भावों को नहीं ला पाते। हो सकता है कि लेखक-निर्देशक ने उन्हें ऐसी ही हिदायत दी हो,लेकिन उसकी वजह से फिल्म का इंपैक्ट कमजोर हुआ है। बीरा रावण का मुख्य पात्र है और वही चरित्र और अभिनय के लिहाज से कमजोर हो गया है।

** 1/2 ढाई स्टार

Monday, June 14, 2010

बेहोशी नशा खुश्‍बू क्‍या क्‍या न हमारी आंखों में

यह गीत आप 17 जून के बाद सुन सकते हैं। फिलहाल शायरी का मजा लें ...

बेहोशी नशा खुश्‍बू क्‍या क्‍या न हमारी आंखों में

उलझी हैं मेरी सांसें कुछ ऐसे तुम्‍हारी सांसों में

मदहोशी का मंजर है कुछ मीठा गुलाबी सा

बिजली सी लपकती है छूने से तुम्‍हारी सांसों में

रह रह के धड़कता है एहसास तुम्‍हारा यह

भीगे है पसीने में ठंडी सी जलन है सांसों में

फुरसत से ही उतरेगा आंखों से तुम्‍हारा सुरूर

इस पल तो महकती है बस खुश्‍बू तुम्‍हारी सांसों में

गीत-अमिताभ वर्मा संगीत-उस्‍ताद शुजात हुसैन खान

मिस्‍टर सिंह मिसेज मेहता का एक गीत

Saturday, June 12, 2010

मनोज बाजपेयी और अनुराग कश्‍यप का साथ आना

-अजय ब्रह्मात्‍मज

एक अर्से बाद.., या कह लें कि लगभग एक दशक बाद दो दोस्त फिर से साथ काम करने के मूड में हैं। मनोज बाजपेयी और अनुराग कश्यप साथ आ रहे हैं। उनकी मित्रता बहुत पुरानी है। फिल्म इंडस्ट्री में आने के पहले की दोनों की मुलाकातें हैं और फिर एक सी स्थिति और मंशा की वजह से दोनों मुंबई आने पर हमसफर और हमराज बने।

अनुराग कश्यप शुरू से तैश में रहते हैं। नाइंसाफी के खिलाफ गुस्सा उनके मिजाज में है। छोटी उम्र में ही जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों ने उन्हें इस कदर हकीकत से रूबरू करवा दिया कि वे अपनी सोच और फैसलों में आक्रामक होते चले गए। बेचैनी उन्हें हर कदम पर धकेलती रही और वे आगे बढ़ते गए। तब किसी ने नहीं सोचा था कि उत्तर भारत से आया यह आगबबूला अपने अंदर कोमल भावनाओं का समंदर लिए अभिव्यक्ति के लिए मचल रहा है। वक्त आया। फिल्में चर्चित हुई और आज अनुराग कश्यप की खास पहचान है। कई मायने में वे पायनियर हो गए हैं। इस पर कुछ व्यक्तियों को अचंभा हो सकता है, क्योंकि हम फिल्म इंडस्ट्री को सिर्फ चमकते सितारों के संदर्भ में ही देखते हैं।

हमारी इसी सीमित और भ्रमित सोच का एक दुष्परिणाम यह भी है कि फिल्मों की लोकप्रियता के आधार पर ही हम ऐक्टर को आंकते हैं। हमारी नजर में नसीरुद्दीन शाह या ओमपुरी की अहमियत ही नहीं बनती। बाद की पीढ़ी में बात करें, तो हम मनोज बाजपेयी और इरफान खान की तारीफ करते हैं। उनकी प्रतिभा के कायल हैं, लेकिन उन्हें रणबीर कपूर और शाहिद कपूर का दर्जा नहीं देते। अपने ही देश में स्टार और ऐक्टर का इतना बड़ा फर्क नजर आता है। यह लोकप्रियता और प्रतिष्ठा तक ही सीमित नहीं है। इसका असर उनके पारिश्रमिक और पैठ में भी दिखाई पड़ता है। कई निर्देशक बताते हैं कि वे मनोज या इरफान सरीखे कलाकारों के साथ फिल्म शुरू करना चाहते हैं, लेकिन कारपोरेट हाउस और कथित फिल्म इंडस्ट्री उनमें निवेश लाभदायक नहीं मानती। एक धारणा बना दी गई है कि हीरो पॉपुलर हो, तो फिल्मों को आरंभिक दर्शक मिलते हैं। वैसे काइट्स की असफलता ने ऐसी धारणा की पोल खोल दी है।

ऐसी स्थिति में अगर मनोज बाजपेयी और अनुराग कश्यप साथ आते हैं, तो उनकी फिल्म में दर्शक, बाजार और फिल्म इंडस्ट्री की रुचि बनती है। एक संभावना बनती है कि बेहतर फिल्म दिखेगी। गौर करें, तो अनुराग कश्यप और मनोज बाजपेयी ने सत्या, शूल और कौन में साथ काम किया। उसके बाद दोनों अलग हो गए। अलग होने की खास वजहें थीं। उन पर विस्तार से कभी और लिखूंगा। इस अलगाव से दोनों मर्माहत हुए, लेकिन अहं की वजह से एक-दूसरे से नजर मिलाने से बचते रहे। व्यक्तिगत मुलाकातों में दोनों ने एक-दूसरे के साथ काम करने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन दोनों हाथ मिलाने से बचते रहे और बर्फ जमती गई। अभी वह बर्फ पिघली है। दोनों की तरफ से कोशिश हुई। दोनों अपने स्थान से आगे बढ़े और फिर साथ मिले।

इस अलगाव और अंतराल का एक पॉजीटिव पक्ष भी है। अभी अनुराग कश्यप की स्वतंत्र हैसियत है और मनोज बाजपेयी का आजाद रसूख है। दोनों में से कोई भी एक-दूसरे पर अहसान नहीं कर रहा है और न ही समर्थन या बढ़ावा दे रहा है। दोनों अलग-अलग तरीके से सफल हैं। दो सफल कलाकार मिल रहे हैं और उनके इस मिलन से उनकी सफलताएं ही मजबूत होंगी। हां, दर्शकों को कुछ अच्छी फिल्में मिलेंगी और कई नई प्रतिभाओं को प्रेरणा मिलेगी। गैरफिल्मी परिवार से आए एक अभिनेता, निर्देशक, तकनीशियन की सफलता हजारों युवा प्रतिभाओं के लिए मार्गदर्शन का काम करती है।

मनोज बाजपेयी और अनुराग कश्यप का साथ आना दर्शक, प्रशंसकों और उनके शुभचिंतकों के लिए शुभ संदेश है। वैसे अभी से कुछ शक्तियां इस कोशिश में सक्रिय हो गई हैं कि मनोज और अनुराग की साझा फिल्में शुरू न हो सकें। जी हां, यह फिल्म इंडस्ट्री आखिरी समय तक बाहरी लोगों के खिलाफ लगी रहती है।


Thursday, June 10, 2010

थोड़ी तो पागल हूं: सोनम कपूर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 


फिल्मों की संख्या और हिट-फ्लॉप के लिहाज से देखें तो सोनम कपूर के करियर में कोई उछाल नहीं दिखता, लेकिन फिल्म, परफार्मेस और फिल्म इंडस्ट्री में उनकी मौजूदगी पर गौर करें, तो पाएंगे कि सोनम का खास मुकाम है। वे सही वजहों से खबरों में रहती हैं और उनके प्रशंसकों की तादाद बढ़ती जा रही है। उनकी आई हेट लव स्टोरीज इसी महीने रिलीज होगी। फिर आएगी आयशा और फिर..। बातचीत सोनम से..

प्रेम कहानी के बारे में क्या कहेंगी?

मुझे व्यक्तिगत तौर पर प्रेम कहानियां बहुत पसंद हैं। आई हेट लव स्टोरीज के मेरे किरदार सिमरन को भी लव स्टोरीज अच्छी लगती हैं। इमरान खान इस फिल्म में जे के रोल में हैं। उन्हें लव स्टोरीज अच्छी नहीं लगतीं। दोनों मिलते हैं। दोनों के बीच नोक-झोंक चलती है और फिर दोनों के बीच भारी कन्फ्यूजन होता है।

आई हेट लव स्टोरीज किस बैकड्रॉप की कहानी है?

फिल्मी बैकड्रॉप है। दोनों एक फिल्म डायरेक्टर के असिस्टेंट हैं। वह डायरेक्टर लव स्टोरीज के लिए मशहूर है। इमरान असिस्टेंट डायरेक्टर हैं और मैं आर्ट डायरेक्टर हूं। हम दोनों की सोच अलग है। ज्यादातर मामलों में हम दोनों एक तरह से सोचते ही नहीं। जे को सिमरन की जिंदगी नकली लगती है। उसे लगता है कि सिमरन फिल्मी पर्दे से निकल कर बाहर आ गई है। वास्तविक दुनिया से उसका कोई वास्ता नहीं है। उसकी जिंदगी में सब कुछ परफेक्ट है।

सिमरन तो बड़ा पॉपुलर नाम है हिंदी फिल्मों का?

बिलकुल, हिंदी फिल्मों के प्रभाव में ही मेरा नाम सिमरन पड़ा है। जे को लगता है कि मैं बिल्कुल फिल्मी हूं। रियल दुनिया में ऐसी लड़की नहीं होती। जे सिमरन को थोड़ी पागल भी समझता है।

इमरान खान के साथ काम करने का अनुभव मजेदार रहा होगा। आप दोनों समान उम्र के हैं।

इमरान की कुछ खूबियां हैं। वे बड़े ही संस्कारी और मेहनती तो हैं ही, बहुत विनम्र और बैलेंस्ड मिजाज के भी हैं। वे किसी झंझट और खिटपिट में नहीं रहते। वे आते हैं, अपना काम करते हैं और चले जाते हैं। फिल्म खत्म होते-होते वे मेरे दोस्त भी बन गए हैं। हमारी दोस्ती ऐसी है कि साथ में फिल्म मिले, तो हम दोनों अवश्य करना चाहेंगे।

आप खुद एक फिल्मी परिवार से हैं। एक्टिंग से पहले आप संजय लीला भंसाली की असिस्टेंट रहीं। सिमरन का किरदार आपके लिए नया नहीं रहा होगा?

इस किरदार को समझने और उसमें ढलने में अधिक मेहनत नहीं लगी, लेकिन शूटिंग के समय उसे परफॉर्म करते समय ध्यान देना पड़ा। सिमरन मेरी जिंदगी के करीब है।

पहले भंसाली और फिर राकेश मेहरा जैसे डायरेक्टर के साथ काम करने के बाद आपने पहली बार किसी जवान और नए डायरेक्टर के साथ काम किया, कैसा अनुभव रहा?

पुनीत यंग और फ‌र्स्ट टाइम डायरेक्टर हैं। वे जिंदगी को बिल्कुल अलग नजरिए से देखते हैं। उनका लेखन बहुत अच्छा है। इस उम्र में ही उन्होंने लेखन और निर्देशन एक साथ किया है। मिलने पर शक हो सकता है कि इतना यंग लड़का कैसे डायरेक्ट करेगा, लेकिन स्क्रिप्ट पढ़ने के साथ ही पता चल जाता है कि वे बखूबी डायरेक्ट कर सकते हैं। फिल्म के संवाद अच्छे हैं। उन्होंने फिल्म के गाने भी खुद चुने हैं। वे बहुत ही प्रतिभाशाली हैं। अपनी उम्र के हिसाब से वे अधिक समझदार हैं।

समान उम्र के लोगों के बीच झगड़ा और मनमुटाव भी होते हैं..?

मेरा किसी से झगड़ा नहीं होता। मैं तो डायरेक्टर की ऐक्ट्रेस हूं। वे जैसा कहते हैं, वैसा करती हूं। अगर कभी किसी डायलॉग या सीन में मुझे बदलाव की जरूरत महसूस होती है, तो मैं पूरे रेसपेक्ट के साथ डायरेक्टर से कहती हूं। वे मान लें तो ठीक, न मानें, तो मैं कोई जिरह नहीं करती। कागज पर लिखी चीजों को परफॉर्म करते समय थोड़ा-बहुत तो बदलना ही पड़ता है।

आपकी एक पहचान फैशन आइकॉन की भी है। यह कैसे हुआ?

मुझे अच्छे कपड़े पसंद हैं और लोग उस पर लिखते रहते हैं, इसलिए चर्चा हो जाती है। सच कहूं, तो मुझे कपड़े बहुत पसंद हैं और मुझे सजना-धजना अच्छा लगता है। इसमें मेरा मन लगता है। आजकल की लड़कियां ज्यादा कैजुअल रहती हैं, लेकिन मुझे लगता है कि पब्लिक फीगर को थोड़ा सजकर रहना चाहिए। लोग आपको देख कर खुश होते हैं। फिर उन्हें खुशी से क्यों महरूम करें। मैं मानती हूं कि लड़कियों को सज-संवर कर रहना चाहिए। किसी और के लिए नहीं, मैं तो खुद के लिए करती हूं और फिर सिर्फ कपड़े ही नहीं होते। उसके साथ ज्वेलरी, एक्सेसरीज, जूते और मेकअप भी.., इन सब पर ध्यान देती हूं।

तो कोई ब्रांड या डिजाइनर पसंद है या जो अच्छा लग जाए..?

मैं चुन-चुन कर ड्रेसेज लेती हूं। अगर कोई साड़ी पसंद आ जाए, तो उसे लेकर मैं उसका कॉन्सेप्ट बदल सकती हूं। मैं साड़ी, शर्ट-पैंट, सलवार, कमीज और बाकी दूसरी ड्रेसेज भी पसंद करती हूं।

कह सकते हैं कि आप बाद में डिजाइनर बनेंगी और आपका भी एक ब्रांड होगा?

ना बाबा ना। मैं लिखना चाहूंगी। मैंने लोगों को पहले भी बताया है कि मैं राइटर बनना चाहती हूं। मुझे फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखनी है। मैं बाद में फिल्में भी बनाऊंगी। अपनी स्क्रिप्ट पर फिल्म बना कर मुझे बहुत खुशी होगी।

बीच में खबर आई थी कि आप पापा के साथ एक फिल्म कर रही हैं?

गलत खबर थी। मुझे पापा के साथ फिल्म करनी है, लेकिन कोई अच्छी स्क्रिप्ट मिले और डायरेक्टर हम दोनों को ढंग से पेश करे, तभी। फिलहाल ऐसी कोई फिल्म नहीं है।

आयशा के बारे में अभी क्या बताएंगी?

मेरी बहन उसे प्रोड्यूस कर रही है। वह मेरी फेवरिट किताब पर आधारित है। किताब की लेखिका जेन आस्टन हैं। यह किरदार उन्हें भी बहुत पसंद रहा है। मूल किताब का नाम एम्मा है। इस फिल्म में अभय देओल मेरे साथ हैं। नए ऐक्टरों में उनकी खास पहचान है। यह रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है। दर्शकों को पूरा मजा आएगा। अभी मजेदार फिल्में करूंगी।

कोई कॉमेडी फिल्म भी कर रही हैं?

थैंक्यू कर रही हूं। पिछले चार साल में मुझे एहसास हुआ है कि मेरा स्ट्रॉन्ग प्वॉइंट कॉमेडी है। मैं कॉमेडी फिल्मों में खुद को देखना चाहती हूं। यह भी पता चल जाए कि मैं कितना कुछ कर पाती हूं। वैसे, मुझे पूरा भरोसा है कि मैं सफल रहूंगी।

और मौसम की क्या खबर है?

उस फिल्म के प्रति मेरी भी जिज्ञासा है। मैं शूटिंग के लिए जा रही हूं। अभी मुझे जो मालूम है, वह मैं आपको नहीं बता सकती। मतलब फिल्म के बारे में कुछ नहीं बताऊंगी। पंकज कपूर जी तो पंकज कपूर ही हैं।

खबर थी कि कई सारी हीरोइनों पर विचार करने के बाद आपका नाम इसके लिए फाइनल हुआ?

जी, मैं बहुत लकी हूं। मेरा दूसरा नाम लकी ही है। मुझे पता नहीं है कि क्या-क्या हुआ, लेकिन अपने चुने जाने से मैं बहुत खुश हूं।

आपकी उम्र में तो इश्क-प्रेम आदि की खबरें आनी चाहिए..?

मैं पर्सनल लाइफ के बारे में बात नहीं करूंगी। कोई मेरा दोस्त या प्रेमी है कि नहीं है, यह सब नहीं बताऊंगी। हां, मैं अपने दोस्त और परिवार के लिए पूरा समय निकालती हूं। अगर वे नहीं होंगे तो काम भी नहीं होगा। इमोशनल ऐंकरिंग तो होनी चाहिए।

आपको खुद कौन सी लव स्टोरी वाली फिल्म पसंद है?

दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, मुगल-ए-आजम और कागज के फूल।

कहते हैं कि अभी के यूथ करियर के आगे बाकी इमोशन पर गौर नहीं करते?

बाकी चीजें करेंगे तो करियर कैसे बनाएंगे। अभी इतना कॉम्पिटीशन है। आगे रहने या बने रहने के लिए जरूरी है कि हम अपने काम पर ध्यान दें। आजकल सब कुछ बहुत प्रैक्टिकल और फास्ट हो गया है। मेरे दोस्त भी ऐसे ही हैं, लेकिन मैं आपको बता दूं कि दुर्भाग्य से मैं ऐसी नहीं हूं। मेरे लिए करियर के समान दूसरी चीजें भी महत्व रखती हैं। मैं थोड़ी पागल हूं। मैं दिमाग से कभी नहीं सोचती।

Monday, June 7, 2010

राजनीति को फिल्म से अलग नहीं कर सकता: प्रकाश झा


=अजय ब्रह्मात्मज

हिप हिप हुर्रे से लेकर राजनीति तक के सफर में निर्देशक प्रकाश झा ने फिल्मों के कई पडाव पार किए हैं। उन्होंने डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी बनाई। सामाजिकता उनकी विशेषता है। मृत्युदंड के समय उन्होंने अलग सिनेमाई भाषा खोजी और गंगाजल एवं अपहरण में उसे मांजकर कारगर और रोचक बना दिया। राजनीति आने ही वाली है। इसमें उन्होंने सचेत होकर रिश्तों के टकराव की कहानी कही है, जिसमें महाभारत के चरित्रों की झलक भी देखी जा सकती है।

फिल्मों में हाथ आजमाने आप मुंबई आए थे? शुरुआत कैसे हुई?

दिल्ली यूनिवर्सिटी से फिजिक्स ऑनर्स करते समय लगा कि सिविल सर्विसेज की परीक्षा दूं, लेकिन फिर बीच में ही पढाई छोडकर मुंबई आ गया। सिर्फ तीन सौ रुपये थे मेरे पास। जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स का नाम सुना था, वहां पढना चाहता था। यहां आकर कुछ-कुछ काम करना पडा और दिशा बदलती गई। मुंबई आते समय ट्रेन में राजाराम नामक व्यक्ति मिले, जो शुरू में मेरे लिए सहारा बने। वे कांट्रेक्टर थे। उनके पास दहिसर में सोने की जगह मिली।

फिर जे. जे. स्कूल नहीं गए?

वहां गया तो मालूम हुआ कि सेमेस्टर आरंभ होने में अभी समय है। मेरे पास कैमरा था। फोटो खींचता था। मुंबई में काम के लिहाज से सबसे पहले इंग्लिश स्पीकिंग इंस्टीट्यूट में नौकरी मिली। अंग्रेजी अच्छी थी तो पढाने का काम मिल गया। वहां बिजनेस मैन आते थे। तीन-चार घंटे पढाने के बाद बचे हुए खाली समय में गैलरियों के चक्कर लगाता था। दहिसर में एक आर्ट डायरेक्टर आगा जानी थे। वे मुझे धरमा फिल्म के सेट पर ले गए। उन्हें लगा कि मैं उन्हें असिस्ट कर सकता हूं। फिल्मी दुनिया से वह मेरा पहला जुडाव रहा। उस दिन धरमा के सेट पर राज को राज रहने दो गाने की शूटिंग चल रही थी। एक कोने में खडा होकर मैं लगातार सब देखता रहा। आगा जानी लौटने लगे तो मैंने कहा कि आप चलिए, मैं आ जाऊंगा। मुझ पर इस माहौल का जादुई असर हो रहा था। मन में विचार आया कि यही करना है। जिंदगी का लक्ष्य मिल गया।

इससे पहले कितनी फिल्में देखीं?

तिलैया के आर्मी स्कूल में पढता था। दिल्ली आकर पढाई में लगा रहा। कॉलेज के दिनों में पाकीजा दो-तीन बार देखी। पेंटिंग-मूर्तिकारी का भी शौक था। धरमा की शूटिंग देखने के अगले दिन आगा साहब ने डायरेक्टर चांद से मिलवा दिया। मैं उनका तेरहवां असिस्टेंट बन गया। मेरे जिम्मे चाय-कुर्सियों का इंतजाम था। कुछ असिस्टेंट तो चार-पांच साल से थे। चीफ असिस्टेंट देवा 13 साल से सहायक थे। मैं सिर्फ पांच दिन ही यहां असिस्टेंट रहा। रोज के तब पांच रुपये मिलते थे।

ऐसा क्यों?

पांच दिन में ही लगा कि असिस्टेंट बना रहा तो बारह-पंद्रह साल कोई उम्मीद नहीं रहेगी। छठे दिन शेड्यूल खत्म होते ही एफ.टी.आई.आई. के बारे में पता करने पूना चला गया। पता चला कि मैं केवल एक्टिंग के लिए ही क्वालीफाई कर रहा हूं। पढाई ग्रेजुएशन में ही छोड दी थी। मुंबई लौटने के बद मैंने दहिसर छोड दिया। सोचा कि ऐसी नौकरी करूं, जिसमें पढाई के लिए समय मिले। ताडदेव के एक रेस्टरां में आवेदन किया। कोलाबा में उनका ब्रांच खुल रहा था। मालिकों में तीन भाई थे। उनमें से एक सैनिक स्कूल में पढ चुका था। उसने मुझे तीन सौ रुपये महीने पर रखा। समय निकाल कर मैं पढाई करता था। कुछ पैसे बच जाते थे, बाद में यही पैसे पूना में फीस देने के काम आए।

यह कब की बात है?

1973 में पूना गया था। वहां मैंने एडिटिंग में एडमिशन लिया। मेरे साथ डेविड धवन, रेणु सलूजा थे। डायरेक्शन में केतन मेहता, कुंदन शाह, विधु विनोद चोपडा, सईद मिर्जा थे। नसीरुद्दीन और ओम पुरी भी थे। 1974 में वहां स्ट्राइक हुई। गिरीश कर्नाड थे तब..। इंस्टीट्यूट बंद हो गया, हमें कैंपस छोडना पडा।

आपका पहला काम 1975 में आया था। उसकी योजना कैसे बनी?

पूना से लौटने पर शिवेन्द्र सिंह का घर मेरा ठिकाना बना। उनका भतीजा मंजुल सिन्हा मेरा दोस्त था। हम दोनों चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी, फिल्म्स डिवीजन जैसी जगहों से कुछ काम जुगाड लेते थे। स्क्रिप्ट वगैरह में मदद कर देते थे। तभी पता चला कि गोवा सरकार वहां की संस्कृति पर डॉक्यूमेंट्री बनाना चाहती है। कोशिश करने पर वह हमें मिल गई। अंडर द ब्लू नाम से मेरा पहला काम सामने आया।

यह फीचर फिल्मों के पहले की तैयारी थी या फिल्म मेकिंग के अभ्यास का उपाय? आपकी रुचि तो फीचर फिल्म बनाने में थी?

तब फीचर फिल्म कोई नहीं दे रहा था। कम समय और लागत में डॉक्यूमेंट्री बन जाती थी। पांच-छह सालों तक डॉक्यूमेंट्री बनाता रहा, पैसे बचा कर दुनिया घूमता रहा। इस एक्सपोजर का फायदा हुआ। 1979 में बैले डांसर फिरोजा लाली पर बा द दा यानी डांस बाई टू डॉक्यूमेंट्री शुरू की। इस सिलसिले में सोवियत संघ और लंदन गया। इस दौरान फिल्ममेकर के तौर पर मेरे अंदर बडा परिवर्तन आया। मेरी फिल्मों में यथार्थ का नाटकीय चित्रण रहता है। इसके सूत्र इसी प्रवास में हैं।

बिहारशरीफके दंगों पर बनी डॉक्यूमेंट्री काफी चर्चित रही थी..।

लंदन से लौटते हुए दंगों की खबर मिली थी। मार्च का महीना था। बी.बी.सी. पर खबर दिखी। मुझे बहुत धक्का लगा। मुंबई आते ही मैं फिल्म्स डिवीजन गया। वहां चीफ प्रोड्यूसर एन.एस. थापा से मैंने यूनिट की मांग की और बिहार शरीफगया। इस डॉक्यूमेंट्री की हृषीकेष मुखर्जी ने भी काफी तारीफकी थी।

परिवार से कोई संपर्क था कि नहीं?

1975 में मेरी डॉक्यूमेंट्री आई। तब पिताजी मोतिहारी में थे। मां-पिताजी ने फिल्म वहीं देखी। उसे देखकर पिता सन्नाटे में आ गए और मां रोने लगीं। उन्होंने पिता से मुंबई चलने को कहा। मैंने 1972 में घर छोडा। यह 1975 के अंत या 1976 के शुरू की बात है। मैं जुहू में पेइंग गेस्ट था। मां से पत्राचार था, लेकिन पिताजी से तो बात भी नहीं होती थी। दोनों अचानक मुंबई आ गए। तब उनसे बराबरी के स्तर पर बात हुई। वे हफ्ते भर रहे। उन्हें मुंबई दर्शन करवा दिया। उस बातचीत के बाद अपने प्रति उनका वास्तविक कंसर्न समझ में आया। खुद पर गुस्सा भी आया।

डायरेक्टर प्रकाश झा के इस निर्माण काल में किन व्यक्तियों और घटनाओं का सहयोग मिला?

बिहारशरीफपर फिल्म बनाने के दौरान बहुत कुछ समझ में आया। रियलिज्म, पॉलिटिक्स और सोसायटी का टच भी वहीं से आया। मजिस्ट्रेट वी. एस. दूबे ने मदद की और छूट दी। फिल्म को मैंने शैवाल की धर्मयुग में प्रकाशित एक कविता से खत्म किया। उनकी कहानी कालसूत्र पर मैंने दामुल बनाई। तभी मनमोहन शेट्टी से दोस्ती हुई। दामुल के लिए हां करते हुए उन्होंने कहा कि उसे बैलेंस करने के लिए कमर्शियल फिल्म भी सोचो। मैंने उन्हें हिप हिप हुर्रे की कहानी सुनाई। दोनों साथ में बनाने की बात थी। बिहार में शूटिंग होनी थी। हिप हिप हुर्रे की शूटिंग के दौरान मैं इतना थक गया कि उसे एडिट कर रिलीज कर देना चाहा। दामुल में छह महीने की देर हो गई। वह दूसरी फिल्म बनी, जबकि पहले सोची थी।

दामुल को पुरस्कार मिलने के बाद आप समानांतर सिनेमा के अग्रणी फिल्मकारों में आए। परिणति के बाद अचानक गायब हो गए। क्या फिल्म माध्यम से विरक्ति हो गई?

जीवन अजीब ढंग से व्यस्त हो गया था। शादी की तो दांपत्य जीवन डिस्टर्ब रहा। फिल्मों के साथ डॉक्यूमेंट्री व टीवी का काम जारी रखा। 1989 के दिनों में लगा कि निचुड जाऊंगा। खुद को रिवाइव करने की जरूरत महसूस होने लगी तो पटना लौट गया। वहां एक-दो संस्थाओं के साथ मिल कर काम किया। संस्था अनुभूति बनाई। उसके जरिये मैंने बहुत सारे युवकों को प्रशिक्षित किया। एफ.टी.आई.आई. के सतीश बहादुर को बुलाकर फिल्म एप्रीसिएशन के कोर्स चलाए। चंपारण में संस्था संवेदन बनाई और युवकों को छोटे-मोटे उद्योगों के लिए प्रेरित किया। मैंने एक बेटी गोद ली थी। मां के देहांत के बाद परिवार बिखर गया। मैं बेटी दिशा को लेकर मुंबई आ गया। नए सिरे से शुरुआत की।

दूसरी पारी की क्या मुश्किलें थीं? फिल्म इंडस्ट्री में तो रिवाज है कि जो चला गया उसे भूल जा..।

कुछ महीने जुहू के एक होटल में था। फिर मनमोहन शेट्टी से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा कि अब दस-बारह लाख में फिल्में नहीं बन सकतीं। कम से कम सत्तर-अस्सी लाख लगेंगे। जोड-तोड करो। मैंने मृत्युदंड की कहानी लिखी थी। उसे एन.एफ.डी.सी. में जमा किया। तिनका-तिनका फिर से जोडना शुरू किया।

दोबारा मुंबई आने पर आप की पहली फिल्म बंदिश बनी थी?

बंदिश एक अपवाद है। वैसी फिल्म मैंने पहले या बाद में नहीं बनाई। मुंबई आने पर जावेद सिद्दीकी, रॉबिन भट्ट और सुरजीत सेन से मुलाकात हुई। उन्होंने मिलकर फिल्म लिखी थी। फिल्म में जैकी श्राफ आए तो फायनेंसर भी मिल गया। सबने कहा कि सेटअप तैयार हो गया है तो काम करो। बंदिश में इंटरेस्ट नहीं रहा। मैं बगैर स्क्रिप्ट के फिल्म नहीं बनाता। विषय मेरे अनुकूल नहीं था। लेकिन यह बात समझ में आई कि कमर्शियल फिल्मों का काम कैसे होता है। मृत्युदंड में पॉपुलर हीरोइन को लेना तभी तय हो गया था।

माधुरी दीक्षित को मृत्युंदड के लिए कैसे राजी किया?

सुभाष घई को कहानी सुनाते हुए मैंने उनका नाम लिया था। उन्होंने ही माधुरी को फोन किया। फिल्मिस्तान स्टूडियो में खलनायक के गीत चोली के पीछे की शूटिंग चल रही थी। शॉट के बीच में उन्होंने बहुत गौर से कहानी सुनी। तभी उन्होंने शॉट रोका और पौन घंटे तक कहानी सुनी। कहानी खत्म होते ही उन्होंने हां कर दी। शूटिंग के दरम्यान ही यूनिट भी खडी हो गई। फिल्म सफल रही।

मृत्युदंड के बाद आपने एक अलग भाषा विकसित की..।

मैं नए दौर में पॉपुलर सिनेमा के लोकप्रिय तत्वों को समाहित कर अपनी शैली और भाषा खोज रहा था। मृत्युदंड में उसकी शुरुआत हुई, जो गंगाजल और अपहरण में विकसित हुई। राजनीति में वह फुल फॉर्म में है। एक बात साफ है कि दर्शक जिस भाषा को समझते हैं, उसी में बात करनी होगी। इसका फायदा यह हुआ कि आज मैं अपनी बात मजबूती से कह पाता हूं। सीन, सब्जेक्ट, सिनेमैटिक, डायलॉग, कंस्ट्रक्शन सभी क्षेत्रों की समझ विकसित की। पॉपुलर फिल्मों के ढांचे में ही फिल्में बना रहा हूं, लेकिन वे प्रचलित फॉर्मूले में नहीं हैं।

आपने राजनीति से परहेज नहीं किया। कमर्शियल ढांचे में बनी फिल्मों में भी मजबूत सामाजिक-राजनीतिक दृष्टिकोण रहता है।

मैं बिहार का हूं। बिहारी समाज सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय है। आम आदमी भी राजनीतिक समझ रखता है। दामुल पारंपरिक सामंतवादी परिवेश की फिल्म है। फिर 1990 में मंडल कमीशन और ओपन मार्केट की नीति से समाज में ठेकेदार बढे और धार्मिक कट्टरता बढी। पारंपरिक सामंतवादी समीकरण में आए बदलाव को मैंने मृत्युदंड में रखा। मृत्युदंड के बाद पॉलिटिकली बैकवर्ड समझे जाने वाले लोग सत्ता में आए। इसके बाद पिछडी जातियों में मतभेद बढे। इसे गंगाजल में दिखाया है। अपहरण में बेरोजगारी और लॉ एंड ऑर्डर में आए बिखराव की दास्तान थी। अब राजनीति और लोकतांत्रिक ढांचे में आ रहे परिवर्तन को समझने के लिहाज से राजनीति बनाई है।

राजनीति को देश की वर्तमान राजनीति से प्रेरित कहा जा रहा है?

राजनीति के किरदार आदिकाल में भी थे, आज भी हैं। हमारा देश लोकतांत्रिक है और लोकतंत्र लगातार मजबूत भी हुआ है, लेकिन परिवार और वंश भी चल रहे हैं। सत्तर के बाद पावर बंटा, नई शक्तियां उभरीं। अब वे खुद सत्ता का केंद्र बन गई हैं और अपने तरीकेसे परिवार और वंश को बढावा दे रही हैं। राजनीति में फ‌र्स्ट फेमिली से लेकर लास्ट तक यही प्रवृत्ति दिखाई पड रही है। फिल्म राजनीति में परिवार, व्यक्ति और समाज तीनों के बीच के रिश्तों की कहानियां हैं। इसमें महाभारत के चरित्रों की झलक भी मिलेगी।

राजनीति में पॉपुलर कलाकारों को लेने की कोई खास वजह है?

फिल्म मृत्युदंड में माधुरी को लिया था। बीच में अजय देवगन को लेकर दो फिल्में बनाई। राजनीति में ज्यादा कैरेक्टर हैं। उस लिहाज से मैंने कास्टिंग की है। रणबीर कपूर और कट्रीना कैफको रोल अच्छे लगे, इसलिए उन्होंने हां की। पॉपुलर एक्टर्स से फिल्म चर्चा में रहती है और आम दर्शक उन्हें देखने आते हैं। यकीनन रणबीर और कट्रीना ने अब तक ऐसे रोल नहीं किए हैं।


Friday, June 4, 2010

फिल्म समीक्षा:राजनीति

राजनीतिक बिसात की चालें
-अजय ब्रह्मात्मज
भारत देश के किसी हिंदी प्रांत की राजधानी में प्रताप परिवार रहता है। इस परिवार केसदस्य राष्ट्रवादी पार्टी के सक्रिय नेता हैं। पिछले पच्चीस वर्षो से उनकी पार्टी सत्ता में है। अब इस परिवार में प्रांत के नेतृत्व को लेकर पारिवारिकअंर्तकलह चल रहा है। भानुप्रताप के अचानक बीमार होने और बिस्तर पर कैद हो जाने से सत्ता की बागडोर केलिए हड़कंप मचता है। एक तरफ भानु प्रताप केबेटे वीरेन्द्र प्रताप की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं तो दूसरी तरफ भानुप्रताप के छोटे भाई चंद्र प्रताप को मिला नेतृत्व और उनके बेटे पृथ्वी और समर की कशमकश है। बीच में बृजलाल और सूरज कुमार जैसे उत्प्रेरक हैं। प्रकाश झा ने राजनीति केलिए दमदार किरदार चुने हैं। राजनीतिक बिसात पर उनकी चालों से खून-खराबा होता है। एक ही तर्कऔर सिद्धांत है कि जीत के लिए जरूरी है कि दुश्मन जीवित न रहे।
प्रकाश झा की राजनीति मुख्य रूप से महाभारत के किरदारों केस्वभाव को लेकर आज के माहौल में बुनी गई कहानी है। यहां कृष्ण हैं। पांडवों में से भीम और अर्जुन हैं। कौरवों में से दुर्योधन हैं। और कर्ण हैं। साथ में कुंती हैं और थोड़ी उदारता से काम लें तो द्रौपदी हैं। महाभारत के ठोस किरदारों के साथ मशहूर फिल्म गाडफादर से भी साम्राज्य बचाने की कोशिशें ली गई हैं। यहां भी मुख्य किरदार बाहर से आता है और परिवार पर आए खतरों को देखते हुए अनचाहे ही साजिशों में संलग्न होता है और फिर नृशंस भाव से हिसाब बराबर करता है।
राजनीति का देश की राजनीति से सीधा ताल्लुक नहीं है। हां, व‌र्त्तमान राजनीतिक परिदृश्य की झलक मिलती है। पिछले एक-डेढ़ दशकों में उभरी ताकतों और उनकी वजह से प्रभावित हो रही राजनीति के संकेत मिलते हैं, लेकिन राजनीति किसी एक पार्टी, वाद या सिद्धांत पर निर्भर नहीं है। कह सकते हैं कि यह फिल्म नेपथ्य में चल रही नेतृत्व की छीनाझपटी को उजागर करती है। राजनीतिक दांवपेंचों से वाकिफ दर्शक फिल्म के पेंच अच्छी तरह समझ सकेंगे और उन्हें उनमें अपने प्रदेशों, राज्यों और यहां तककि जिला स्तर की राजनीतिक उठापटक दिखेगी। प्रकाश झा ने फिल्म को वास्तविक नहीं रखा है, लेकिन उन्होंने इसे इतना काल्पनिक भी नहीं रखा है कि सब कुछ नकली, कृत्रिम और वायवीय दिखने लगे। पृथ्वी, समर, वीरेन्द्र, सूरज, बृजलाल, चंद्र प्रताप और भानु प्रताप को हम विभिन्न पालिटिकल पार्टियों में आए दिन देखते रहते हैं।
राजनीति के नायक अवश्य समर प्रताप यानि रणबीर कपूर हैं, लेकिन प्रकाश झा और अंजुम रजबअली ने इस तरह कथा बुनी है कि प्रमुख कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए पर्याप्त स्पेस और मौके मिले हैं। सीमित दृश्यों में भी आए किरदार अच्छी तरह गढ़े गए हैं। नसीरुद्दीन शाह, चेतन पंडित, खान जहांगीर खान और नाना पाटेकर अपनी भूमिकाओं में सक्षम और प्रभावशाली लगे हैं। किरदारों के बड़े समूह के साथ न्याय करते हुए उनके चरित्रों का उपयोगी निर्वाह प्रकाश झा और अंजुम रजबअली के लिए चुनौती रही होगी। उनके लेखन का कमाल चुटीले, धारदार और प्रासंगिक संवादों में भी दिखता है। उल्लेखनीय है कि हिंदी संवादों के स्वभाव और निहितार्थ को अच्छी तरह समझने की वजह से मनोज बाजपेयी, अजय देवगन और चेतन पंडित दृश्यों को जीवंत बना देते हैं। मनोज बाजपेयी की तीक्ष्णता इस फिल्म में उभर कर आई है। वे शातिर, वंचित और परिस्थिति के शिकार चरित्र के रूप में स्वाभाविक लगते हैं। उन्होंने अपने चरित्र को नाटकीय और ओवरबोर्ड नहीं जाने दिया है।
राजनीति की खूबी इसका लोकेशन और दृश्यों के मुताबिक जनता की भीड़ है। प्रकाश झा और उनके कला निर्देशकजयंत देशमुख ने फिल्म की जरूरत के मुताबिक सब कुछ संजोया है। फिल्म सिर्फ भीड़ और भाषण तक सीमित नहीं रहती। अहं और नेतृत्व की लालसा में मानवीय स्वभाव के लक्ष्णों की भी जानकारी मिलती है। फिल्म का पार्श्‍व संगीत प्रभावशाली है। हर नाटकीय दृश्य की शुरूआत में लगता है कि म्यान से तलवारें निकल रही हों। एक सिहरन सी पैदा होती है।
कलाकारों में अर्जुन रामपाल और रणबीर कपूर चौंकाते हैं। खास कर अर्जुन ने पृथ्वी के किरदार के द्वंद्व को अच्छी तरह पकड़ा है। रणबीर कपूर के संयत तरीके से समीर को पर्दे पर उतारा है। एक चालाक रणनीतिज्ञ के तौर पर खेली जा रही साजिशों में वे उत्तेजित न होते हुए भी प्रभावित करते हैं। कट्रीना कैफ इंदु की मानसिकता को समझने और निभाने में सफल रही हैं।
राजनीति हर लिहाज से देखने लायक फिल्म है। लंबे अर्से के बाद हिंदी भाषा, संस्कृति और राजनीति की खूबियों के साथ हिंदी में बनी यह फिल्म अच्छा मनोरंजन करती है।
**** 1/2 साढ़े चार स्टार