Search This Blog

Sunday, May 30, 2010

पुस्‍तक समीक्षा : सिनेमा भोजपुरी

-अजय ब्रह्मात्‍मज 

भोजपुरी सिनेमा के ताजा उफान पर अभी तक पत्र-पत्रिकाओं में छिटपुट लेख लिखे जाते हैं। कुछ सालों पहले लाल बहादुर ओझा ने भोजपुरी सिनेमा के आविर्भाव और आरंभिक स्थितियों पर एक खोजपूर्ण लेख लिखा था। उसके बाद से ज्यादातर लेख सूचनात्मक ही रहे हैं। विश्लेषण की कमी से हम भोजपुरी सिनेमा की खूबियों और खामियों के बारे में अधिक नहीं जानते। आम धारणा है कि भोजपुरी फिल्मों में अश्लील और फूहड़ गाने होते हैं। सेक्स, रोमांस और डांस के नाम पर भोंडापन रहता है। भोजपुरी का गवंईपन लाउड और आक्रामक होता है। यह गरीब और मजदूर तबके के दर्शकों का सिनेमा है, जिसमें एस्थेटिक का खयाल नहीं रखा जाता। भोजपुरी फिल्मों के हीरो के तौर पर हम रवि किशन, मनोज तिवारी और निरहुआ को जानते हैं। इन तीनों की पब्लिक इमेज का भोजपुरी फिल्मों के दर्शकों पर जो भी असर हो, हिंदी सिनेमा के आम दर्शक उनमें भदेसपन देखते हैं। भोजपुरी फिल्मों की चर्चा होते ही भोजपुरी दर्शक और सिनेमाप्रेमी बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। उनके पास गर्व करने लायक तर्क नहीं होते। अविजित घोष की पुस्तक सिनेमा भोजपुरी इस हीन भाव को खत्म करती है। अविजित ने साक्ष्यों, इंटरव्यू और फिल्मों के आधार पर भोजपुरी सिनेमा को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखा है। पहली पुस्तक लिखने की चुनौतियां उनके सामने रही हैं, क्योंकि संदर्भ सामग्री के लिए वे मुख्य तौर पर बनारस की रंभा पत्रिका और उसके संपादक मुन्नू कुमार पांडे पर आश्रित रहे हैं। इन सभी तथ्यों और विवरणों से भोजपुरी सिनेमा के विकास का खाका मिल जाता है, लेकिन भोजपुरी सिनेमा के अंतर्निहित द्वंद्व, मुश्किलों और चुनौतियों को हम नहीं समझ पाते। अविजित घोष इस पुस्तक में भोजपुरी सिनेमा की संभावनाओं पर बात नहीं करते। अगर उन्होंने भोजपुरी सिनेमा को लेकर चल रहे विमर्श पर नजर डाली होती तो कुछ नए पहलू भी इस पुस्तक में आ जाते। यह पुस्तक सूचना, जानकारी और रेफरेंस की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अविजित घोष ने पिछले पचास सालों के सभी प्रमुख व्यक्तियों, फिल्मों और तथ्यों को इस पुस्तक में जगह दी है। 

Thursday, May 27, 2010

दरअसल :सूचनाओं का व्‍यसन है ट्विटर


-अजय ब्रह्मात्‍मज  



पिछले दिनों अमिताभ बच्चन भी ट्विटर पर आ गए। उन्होंने अपना नाम सीनियर बच्चन रखा है। यह ठीक भी है, क्योंकि अभिषेक बच्चन पहले से ही जूनियर बच्चन के नाम से ट्विट कर रहे हैं। बच्चन पिता-पुत्र के साथ हिंदी फिल्मों के अनेक सितारे ट्विटर पर हैं। पापुलर सितारों में शाहरुख खान, सलमान खान, रितिक रोशन, अर्जुन रामपाल, शाहिद कपूर, प्रियंका चोपड़ा, मल्लिका शेरावत, गुल पनाग, लारा दत्ता, दीपिका पादुकोण आदि रेगुलर ट्विट करते हैं। यहां से इनके प्रशंसकों को सारी ताजा सूचनाएं मिलती रहती हैं। साथ ही सितारों को फीडबैक भी मिल जाता है। कम से कम उन्हें अंदाजा हो जाता है कि उनके प्रशंसक क्या सोच रहे हैं?

शाहरुख खान ट्विट के मामले में सबसे बेहतर हैं। उनका विनोदी स्वभाव, बीवी-बच्चों से लगाव, दोस्तों से बर्ताव और मानवता के लिए सद्भाव सब कुछ 140 अक्षरों में अच्छी तरह व्यक्त हो जाता है। उनके संवाद में मैत्री भाव रहता है। वे कभी आतंकित नहीं करते और न ही अपने दर्शन से बोर करते हैं। माय नेम इज खान की रिलीज के समय उन्होंने ट्विट करना आरंभ किया और तब से हर महत्वपूर्ण जानकारी उन्होंने ट्विट के माध्यम से ही दी। सलमान खान अपने मिजाज के मुताबिक सरल और सीधे हैं ट्विट पर। वे बेलौस तरीके से अपनी सोच रखते हैं। पता चलता है कि उनका जेनरल आईक्यू कैसा है और उन्हें किन तरह की बातों में मजा आता है। वैसे उनके प्रशंसक खुश रहते हैं और तत्काल रिएक्ट और रिट्विट करते हैं।

ट्विटर के जरिए हमारे सितारों ने दर्शकों और प्रशंसकों से सीधा रिश्ता बना लिया है। कई बार अखबार और टीवी उनके ट्विट को ही समाचार का रूप देकर प्रकाशित और प्रसारित करते हैं। चूंकि सभी सितारों से हर पल संपर्क नहीं साधा जा सकता और नई परिस्थितियों में सितारों और मीडिया का ज्यादातर संवाद एकतरफा हो रहा है, इसलिए मनोरंजक समाचारों की भूख मिटाने के लिए मीडिया को ट्विटर का निवाला लेना और देना पड़ रहा है। इस सच्चाई को स्वीकार करने में गुरेज नहीं करना चाहिए कि इन दिनों सूचनाओं के वितरण में सितारों की मनमानी बढ़ गई है।

गौरतलब है कि ट्विटर के जरिए दी गई सितारों की सूचनाएं महज जानकारियां होती हैं। उन जानकारियों को मीडिया के लोग, फिल्म पत्रकार, पंडित और विश्लेषक ही सही संदर्भ और परिपे्रक्ष्य देते हैं। संदर्भ और परिप्रेक्ष्य मिलने पर ही जानकारियों का महत्व और वजन बढ़ता है। जाहिर सी बात है कि सितारों और दर्शकों के बीच मीडिया का महत्व बना रहेगा। मीडिया की अपनी एक जरूरी भूमिका है और वह खत्म नहीं होगी। उसी भूमिका की वजह से सितारों को भी मीडिया की जरूरत पड़ती रहेगी।

ट्विटर वास्तव में सूचनाओं की तात्कालिकता का व्यसन है। हम अभी के क्षण में क्या कर, सोच और देख रहे हैं। इसकी जानकारी हमारे मित्रों, शुभचिंतकों और प्रशंसकों को मिल जाती है। यह सोच और सूचनाओं का एकआयामी स्लाइस है। रेगुलर फॉलो करने पर उम्मीद है कि तारतम्य बने और हम किए गए हर नए ट्विट का मतलब समझ सकें। फिर भी यह हमेशा संभव नहीं है। दूसरे यह आत्ममुग्धता से प्रभावित और प्रेरित शगल है। सितारे अपनी तारीफ के कायल होते हैं और अधिकांश फॉलोअर चैलेंज नहीं करते। वे आलोचना करते समय भी आभाचक्र में रहते हैं। एक ही कोशिश रहती है कि दूसरे फॉलोअर भी जान सकें कि हम क्या सोच रहे हैं। क्या कोई सितारा अपने सभी फॉलोअर के जवाब ट्विट या सवाल पढ़ता है? यह मुमकिन ही नहीं है।

Sunday, May 23, 2010

रा.वन की जानकारी शाहरूख खान के ट्विटों से

- अजय ब्रह्मात्‍मज  

फिल्म बनाना प्रेम करने की तरह है..फन ़ ़ ़एक्साइटिंग ़ ़ ़ सेक्सी ़ ़ ़ और आपको मालूम नहीं रहता कि आखिरकार वह क्या रूप लेगा? अगर फिल्म रा.वन हो तो इन सारे तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है और उसी अनुपात में बढ़ती है हमारी जिज्ञासा। शाहरुख खान की रा.वन निश्चित ही 2010 की महत्वाकांक्षी फिल्म होगी। अनुभव सिन्हा के निर्देशन में बन रही इस फिल्म के हीरो ़ ़ ़ ना ना 'सुपरहीरो' हैं शाहरुख खान।

कहते हैं शाहरुख खान अपने बेटे आर्यन, उसके दोस्तों और उसकी उम्र के तमाम बच्चों के लिए इस फिल्म का निर्माण कर रहे हैं। वे देश के बच्चों को 'देसी सुपरहीरो' देना चाहते हैं। शाहरूख खान ट्विटर पर लिखते हैं कि जब वे छोटे बच्चे थे तो बड़ी बहन के टाइट्स के ऊपर अपना स्विमिंग सूट पहन कर गर्दन में तौलिया बांध कर उड़ने की कोशिश करते थे। उस समय वे निश्चित ही अपनी चौकी, खाट या पलंग से फर्श पर गिरे होंगे।

चालीस सालों के बाद उनके बचपन की ख्वाहिश बेटे की इच्छा के बहाने उड़ने जा रही है। अनुभव सिन्हा के निर्देशन में विदेशी तकनीशियनों की मदद से यह मुमकिन हो रहा है। साल भर पहले तक अनुभव सिन्हा निश्चित नहीं थे कि रा.वन कब शुरू होगी? माय नेम इज खान की रिलीज के पहले अचानक किंग खान ने फैसला सुनाया कि वे पहले रा.वन की शूटिंग करेंगे। सारे समीकरण बदल गए। पुरानी भरोसेमंद दोस्त फराह खान से नाराजगी की खबर आई और अनुभव सिन्हा की रा.वन के प्रति आशंकाएं जाहिर की गई।

हिंदी फिल्मों के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि फिल्म का हीरो स्वयं फिल्म के बारे में लगातार जानकारियां दे रहा है। शाहरूख खान लगातार ट्वीट कर रहे हैं। हालांकि ट्वीट के 140 अक्षरों में छिटपुट और बिखरी जानकारियों से किसी निष्कर्ष या धारणा पर पहुंचना आसान नहीं है, लेकिन झलक तो मिल ही जाती है। जरूरी है कि आप ध्यान से पढ़ें, एक साथ पढ़ें और पंक्तियों और संदेशों के बीच के मनोभावों को पढ़ सकें।

सब से पहले यह समझ लें कि रा.वन अलग फिल्म है। मणि रत्‍‌नम की अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय की रावण से इसका कोई लेना-देना नहीं है। शाहरुख की एक ट्वीट के अनुसार रा.वन वास्तव में 'रैंडम एक्सेस वर्जन वन' का शार्ट कोड है। शाहरुख इसमें सुपरहीरो बने हैं। वे दुनिया को बचाते हैं। दुनिया को बचाने के लिए वे कूदते-फांदते और उड़ते हैं। एक बार इस फिल्म का कास्ट्यूम पहन लेने के बाद शाहरुख खा-पी नहीं सकते और न ही नित्य क्रियाओं से निवृत हो सकते हैं। उन्होंने सेट पर अपनी मजबूरी को नियम बना दिया। डायरेक्टर समेत यूनिट के सभी सदस्यों का खाना-पीना बंद हो गया। शाहरुख ने ट्वीट किया- फिल्म मेकिंग टीम वर्क है, लेकिन यह डेमोक्रेटिक नहीं है। हीरो ही अगर प्रोड्यूसर हो तो वह किसी प्रकार की मनमानी कर सकता है, लेकिन यह मनमानी नहीं, वास्तव में मौज-मस्ती है। एक मुश्किल और चैलेंजिंग फिल्म को सहज तरीके से शूट करने के लिए आवश्यक है कि सेट का माहौल हल्का-फुल्का और जोश से भरा हो।

अपनी एनर्जी के लिए विख्यात शाहरुख खान ने रा.वन की शूटिंग बीस मार्च से आरंभ की। याद करें तो इसी वक्त आईपीएल आरंभ हुआ था। उनकी टीम कोलकाता नाइट राइडर्स ने कुछ बेहतर और कुछ बुरे मैच खेले और फाइनल से पहले बाहर हो गई। रेड चिलीज के सीईओ बॉबी चावला स्ट्रोक के शिकार हुए और कोमा में चले गए। शाहरुख खुद शूटिंग के दौरान ही गोवा, मुंबई, कोलकाता के दौरे करते रहे और बीच में दो दिनों का समय निकाल कर मलेशिया भी गए। अभी उनकी बीवी गौरी खान न्यूयार्क में हैं। वे अपने बच्चों आर्यन और सुहाना को भी संभालते हैं। वे ट्वीट करते हैं कि मैं जल्दी से घर लौट कर उनके साथ खेलना और सोना चाहता हूँ। साफ झलकता है कि शाहरूख हम सभी की तरह साधारण इंसान हैं और उनकी चिंताएं किसी मध्यवर्गीय पिता जैसी हैं।

..और जैसे कोई कसर बाकी थी कि उन्हें भारी जुकाम हो गया। शाहरुख खान ने ट्विटर पर लिखा कि सुपरहीरो को जुकाम है, लेकिन पर्दे पर थकान नहीं दिखनी चाहिए। पता नहीं चलना चाहिए कि शॉट देते समय हीरो बुखार में तप रहा था। एक और ट्वीट: ऊपर से एक्शन के सीन ़ ़ ़ हवा में लटक कर करतब दिखाने के शॉट ़ ़ ़ और उफ्फ घुटने का दर्द!

घुटने और कंधे का आपरेशन करवा चुके शाहरुख खान ने दो सालों के बाद इस फिल्म में एक्शन के लिए जरूरी उछल-कूद की। अपनी क्रिकेट टीम के फिजियो एंड्रयू और ट्रेनर एड्रियन से घुटने का उपचार करवाया, लेकिन एक्शन दृश्यों में तो शरीर का हर जोड़ हिल जाता है। पैंतालीस की उम्र में हवा में लटक कर करतब दिखाने के पीछे एक ही लगन और एक ही जोश है कि जब आडिएंस फिल्म देखने आए तो रोमांचित हो। उसे भरपूर मजा आए और हैरतअंगेज कारनामों और करतबों से वह चौंके।

शाहरुख मानते हैं कि रा.वन का असली स्टार वीएफएक्स है। कारनामों और करतबों को वीएफएक्स से ही हैरतअंगेज बनाया जाएगा। सौ-डेढ़ सौ दिनों की शूटिंग के बाद उससे ज्यादा दिन स्पेशल इफेक्ट और इमेज गढ़ने में लगेंगे। प्रभावशाली वीएफएक्स के लिए उनकी रेड चिलीज की अपनी टीम के साथ हालीवुड के विशेषज्ञ भी काम कर रहे हैं। हालीवुड के विशेषज्ञों की खासियत है कि वे स्टारों के दबाव में नहीं आते और 'चला लेंगे' कह कर किसी शॉट से समझौता नहीं करता। शाहरुख मजेदार ट्वीट करते हैं: स्टार नाम के चिड़िया की जान जाए तो जाए, दर्शकों को सिनेमा का खिलौना मिलना चाहिए। गर्मी के इस मौसम में कास्ट्यूम और मास्क पहन कर घंटों किसी सीन को तेज रोशनी में शूट करने की तकलीफ कोई स्टार ही समझ सकता है, लेकिन इस तकलीफ का यही मजा है कि दर्शकों की तालियां मिलती हैं और फिल्म चल गई तो जेब भी भरती है। और मालूम है आप को ़ ़ ़ रा.वन के सुपरहीरो को जुकाम हो गया है। जिसे गोली नहीं भेद सकती, वह छींकों से परेशान है। कैसी विडंबना है?

Saturday, May 22, 2010

दरअसल:मेनस्ट्रीम सिनेमा में नार्थ-ईस्ट के किरदार

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों एक फिल्म आई थी बदमाश कंपनी। यशराज फिल्म्स के लिए इसे परमीत सेठी ने निर्देशित किया था। फिल्म का विषय पुराना था, लेकिन उसकी प्रस्तुति नई थी। हीरो के भटकने और फिर सुधरने की फिल्में हम सातवें और आठवें दशक में खूब देखते थे। खासकर संयुक्त परिवार के विघटन और न्यूक्लियर फैमिली के विकास के दौर में ऐसी ढेर सारी फिल्में आई। शहरों के विकास के साथ माइग्रेशन बढ़ा और पारिवारिक रिश्तों के नए समीकरण बने।

सामाजिक संरचना के इस संक्रमण काल में हमारे हीरो भी संकट के शिकार हुए। अब संक्रमण नए किस्म का है। उपभोक्तावाद और बाजार के दबाव में उद्यमशीलता बढ़ी है, लेकिन बाकी सरोकार छीज गए हैं। अब व्यक्ति स्वयं की चिंता में रहता है और चाहता है कि उसकी मेहनत का फल उसे ही मिले। समाज में आ रहे बदलाव के इस भाव को ही परमीत सेठी ने फिल्मी शॉर्टकट में दिखाया था।

बदमाश कंपनी में एक खास बात भी थी। इस के चार प्रमुख किरदारों में से एक जिंग को सिक्किम का बताया गया था। गौर करें, तो हिंदी फिल्मों के नायक और सहयोगी किरदार मुख्य रूप से पंजाब के होते हैं या फिर उनकी कोई पहचान ही नहीं होती। उनका सरनेम हटा दिया जाता है। वे रोहित, राज, विजय, अजय आदि होते हैं। हालांकिचरित्रांकन या चरित्र निर्माण का ऐसा कोई लिखित नियम नहीं है, लेकिन यह सच्चाई है कि हिंदी फिल्मों का नायक दक्षिण भारत (एक दूजे के लिए अपवाद है) का नहीं होता। वह नार्थ ईस्ट का भी नहीं होता। वह यादव, पासवान, महतो आदि भी नहीं होता। हमारे समाजशास्त्री इस संदर्भ में शोध कर सकते हैं। वह दलित समुदाय से भी नहीं होता। हिंदी फिल्मों के अघोषित नियमों के मुताबिक ही हीरो के नाम तय किए जाते हैं। उनकी शक्ल-ओ-सूरत तय की जाती है। आम मुहावरा है कि फलां में हीरो मैटीरियल नहीं है। हीरो मैटीरियल का मतलब क्या होता है? बदमाश कंपनी इस लिहाज से एक प्रस्थान है। फिल्म के चार मुख्य चरित्रों में से एक को सिक्किम का बताया गया है। उसका नाम जिंग है। उसकेसाथ वे सारे मजाक होते हैं, जो उत्तर-पूर्व के भारतीय नागरिकों को महानगरों में झेलने पड़ते हैं। उन्हें कोई सहज ही चीनी कह बैठता है और यह बताने से भी नहीं हिचकता सारे नार्थ-ईस्टर्न लोग एक जैसे ही लगते हैं। बदमाश कंपनी में जिंग मुख्य किरदार है। वह अपने माखौल का पलट कर जवाब देता है और एक तरीके से पूरे नार्थ-ईस्ट का प्रतिनिधि बन जाता है। परमीत सेठी ने उसे मेनस्ट्रीम के हिस्से के रूप में पेश कर उल्लेखनीय सामाजिक और राजनीतिक पहल की है। उन्होंने अलग-थलग समझे जाने वाले एक किरदार को पॉपुलर हिंदी फिल्म में मुख्य भूमिका दी है। उन्होंने एक फिल्म में झटाक से वह कर दिखाया है, जो सालों से केंद्र सरकार और नार्थ-ईस्ट की सरकारें नहीं कर पा रही हैं।

हिंदी फिल्में भारतीय समाज की सोच और मानसिकता को गैरइरादतन तरीके से पेश करती हैं। शुद्ध कॉमर्शियल हिंदी फिल्मों में भी हमारे समय का समाज दिखता है। हमारे रवैयों को किरदारों के रवैयों के रूप में देखा जा सकता है। हर फिल्म के किरदार भिन्न और स्वतंत्र होते हैं, लेकिन उनमें एक प्रकार से सोच और समझ की सामूहिकता नजर आती है। तभी वे पूरे भारत और भारत के बाहर के दर्शकों का मनोरंजन कर पाती हैं। उन्हें व्यापक स्वीकृति मिलती है। बदमाश कंपनी से सिक्किम के किरदार को मेनस्ट्रीम में स्वीकृति मिली है। इसके पहले हमने यशराज फिल्म्स की ही चक दे इंडिया में हाकी खिलाड़ी के रूप में नार्थ-ईस्ट की लड़कियों को देखा था। कोशिश होनी चाहिए कि हम नार्थ-ईस्ट और दूसरे प्रांत के किरदारों को फिल्म के प्रमुख चरित्र के रूप में और ज्यादा पेश करें और भारत की राजनीतिक-सामाजिक एकता को बढ़ावा दें।

Friday, May 21, 2010

फिल्‍म समीक्षा:काइट्स

-अजय ब्रह्मात्‍मज 

रितिक रोशन बौर बारबरा मोरी की काइट्स के रोमांस को समझने के लिए कतई जरूरी नहीं है कि आप को हिंदी, अंग्रेजी और स्पेनिश आती हो। यह एक भावपूर्ण फिल्म है। इस फिल्म में तीनों भाषाओं का इस्तेमाल किया गया है और दुनिया के विभिन्न हिस्सों के दर्शकों का खयाल रखते हुए हिंदी और अंग्रेजी में सबटाइटल्स दिए गए हैं। अगर आप उत्तर भारत में हों तो आपको सारे संवाद हिंदी में पढ़ने को मिल जाएंगे। काइट्स न्यू एज हिंदी सिनेमा है। यह हिंदी सिनेमा की नई उड़ान है। फिल्म की कहानी पारंपरिक प्रेम कहानी है, लेकिन उसकी प्रस्तुति में नवीनता है। हीरो-हीरोइन का अबाधित रोमांस सुंदर और सराहनीय है। काइट्स विदेशी परिवेश में विदेशी चरित्रों की प्रेमकहानी है।

जे एक भारतवंशी लड़का है। वह आजीविका के लिए डांस सिखाता है और जल्दी से जल्दी पैसे कमाने के लिए नकली शादी और पायरेटेड डीवीडी बेचने का भी धंधा कर चुका है। उस पर एक स्टूडेंट जिना का दिल आ जाता है। पहले तो वह उसे झटक देता है, लेकिन बाद में जिना की अमीरी का एहसास होने के बाद दोस्ती गांठता है। प्रेम का नाटक करता है। वहीं उसकी मुलाकात नताशा से होती है। नताशा के व्यक्तित्व और सौंदर्य से वह सम्मोहित होता है। नताशा भी पैसों के चक्कर में जिना के भाई टोनी से शादी का फरेब रच रही है। दोनों एक-दूसरे से यह राज जाहिर करते हैं तो उनके बीच का रोमांस और गहरा हो जाता है। जे और नताशा का रोमांस दोनों भाई-बहनों को नागवार गुजरता है। उसके बाद आरंभ होती है चेजिंग, एक्शन और भागदौड़। जे और नताशा साथ होने की हर संभव कोशिश करते हैं। शादी रचाते हैं, लेकिन उनके दुश्मनों को यह सब मंजूर नहीं। वे उनकी जान के पीछे पड़े हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स अवसाद पैदा करता है।

अनुराग बसु की गैंगस्टर और मैट्रो देख चुके दर्शकों को इस फिल्म में भी उनकी शैली की झलक मिलेगी। अनुराग बसु की फिल्मों में विशाल दुनिया में दो प्रेमियों की अंतरंगता अनोखे तरीके से चित्रित की जाती है। हर फिल्म में उनका सिग्नेचर शॉट रहता है, जिसमें हीरो-हीरोइन छत पर बैठे अपने प्रेम के भरपूर एहसास में डूब कर दुनिया से बेपरवाह हो जाते हैं। उस क्षण उन्हें भविष्य की चिंता नहीं रहती। रोमांस का यह आवेश कम फिल्मकार चित्रित कर पाते हैं। काइट्स में रितिक रोशन और बारबरा मोरी के केमिस्ट्रिी में रोमांस की शारीरिकता भी व्यक्त हुई है। हिंदी फिल्मों के प्रचलित रोमांस में आलिंगनबद्ध प्रेमी-प्रेमिका भी एक-दूसरे से खिंचे-खिंचे नजर आते हैं। काइट्स के रोमांस में शरीर अड़चन नहीं है। रितिक रोशन की मेहनत और बारबरा मोरी की स्वाभाविकता से हमें काइट्स में नए किस्म का रोमांस दिखता है। रोमांस के साथ ही फिल्म का एक्शन निराला है। रितिक रोशन एक्शन दृश्यों में विश्वसनीय लगते हैं। डांसर रितिक रोशन के प्रशंसकों को इस फिल्म में भी कुछ नए स्टेप्स मिल जाएंगे।

नए लोकेशन की खूबसूरती फिल्म की सुंदरता बढ़ाती है। काइट्स में निर्देशक ने स्थानीय प्राकृतिक संपदाओं का प्रासंगिक उपयोग किया है। सिनेमैटोग्राफी फिल्म के प्रभाव में इजाफा करती है। फिल्म का संगीत कमजोर है। अगर परिवेश और आधुनिकता का खयाल रखते हुए संगीत में नई ध्वनियां सुनाई पड़तीं तो ज्यादा मजा आता। काइट्स हिंदी फिल्मों की संक्राति (ट्रांजिशन) के दौर का सिनेमा है। यह नए सिनेमा का स्पष्ट संकेत देती है और पारंपरिक हिंदी फिल्मों की खूबियों को समाहित कर प्रयोग कराती है। फिल्म में मिश्रित भाषा का प्रयोग अनूठा है। 

*** तीन स्टार

Tuesday, May 18, 2010

सिर्फ़ नाम की "हाऊसफ़ुल"-अजय कुमार झा

यह पोस्‍ट अजय कुमार झा ने लिखी है।उनके शब्‍दों में.... फ़िल्म समीक्षा लिख रहे हैं ............अरे भाई प्रौफ़ेशनली नहीं जी ....बस फ़िल्म देख ली ...तो भेजा इतन फ़ुंका कि सोचा अब दूसरों के पैसे तो बच जाएं .........सो एक समीक्षा तो लिख ही दें ..जिसने पढ ली उसके तो पैसे बच ही जाएंगे .......कम से कम ....रुकिए थोडी देर...


हाजिर है समीक्षा....

आज दर्शक यदि मल्टीप्लेक्स में सिनेमा देखने जाता है तो कम से कम इतना तो चाहता ही है कि जो भी पैसे टिकट के लिए उसने खर्च किए हैं वो यदि पूरी तरह से न भी सही तो कम से कम पिक्चर उतनी तो बर्दाश्त करने लायक हो ही कि ढाई तीन घंटे बिताने मुश्किल न हों । साजिद खान ने जब हे बेबी बनाई थी तो उसकी बेशक अंग्रेजी संस्करण के रीमेक के बावजूद उसकी सफ़लता ने ही बता दिया था कि दर्शकों को ये पसंद आई । और कुछ अच्छे गानों तथा फ़िल्म की कहानी के प्रवाह के कारण फ़िल्म हिट हो गई । साजिद शायद इसे ही एक सैट फ़ार्मूला समझ बैठे और कुछ अंतराल के बाद , उसी स्टार कास्ट में थोडे से बदलाव के साथ एक और पिक्चर परोस दी । मगर साजिद दो बडी भूलें कर बैठे इस पिक्चर के निर्माण में , पहली रही कमजोर पटकथा , कमजोर और मजबूत तो तब कही जाती शायद जब कोई पटकथा होती , दूसरी और फ़िल्म के न पसंद आने की एक वजह रही , बिल्कुल ही बेमजा गीत संगीत ।

बहुत कम ही पिक्चर ऐसी होती है जिसमें पहले ही दस मिनट में वो दर्शकों, को बांध कर रखने लायक दृश्य उपस्थित कर पाती हैं ,और इसी तरह कुछ पिक्चरें पहले दस मिनट में ही दर्शकों का मन उचाट कर देती हैं।
फ़िल्म की शुरूआत कब हुई और अंत कब हुआ ये तो जब निर्देशक ही तय न कर पाए तो दर्शक की क्या बिसात । पूरी फ़िल्म एक ही शब्द "पनौती " के इर्दगिर्द घूमती है । इस शब्द का अर्थ वास्तव में क्या होता है ये तो नहीं पता मगर दर्शकों को भी देख कर यही लगता है जब मकाओ , और लंदन जैसी जगहों पर भी पनौती हो सकते हैं तो फ़िर भारत में ऐसा क्यों नहीं दिखता कहीं । फ़िल्म एक बेहद ही थके हुए बुझे हुए और शिथिल सा चेहरा बनाए व्यक्ति की है जो सिर्फ़ किस्मत का रोना रहता है । बावजूद इसके , दोस्त और उसकी पत्नी का बहुत सारा नुकसान होने के , आराम से किसी करोडपति व्यावसायी की बेटी से शादी हो जाने के , इसके बाद फ़टाफ़ट पत्नी का अलग हो जाना, दूसरी प्रेमिका का समुद्र के अंदर से निकल कर बाहर आ जाना , और तमाम मुश्किलों के बाद और प्रेमिका के कडक भाई की लाई डिटेक्टर के बावजूद उसे अपनी प्रेमिका मिल जाती है , हां नौकरी का फ़िर भी कोई पता नहीं और पनौती का लेबल लगा रहता है या हट जाता है ये तो साजिद खान के अलावा और कोई जान नहीं पाता ।

अभिनय के मामले में , बेशक अक्षय ने अपनी हंसोड छवि से परे हटकर खुद को पेश किया है मगर लगता है कि उनके चिपके बालों के साथ वाला लुक भी उनकी छवि को चिप्पू सा ही छोड गया है । रितेश खुद को रिपीट करते ही लगते हैं और शायद इसमें वे स्वाभाविक से ही दिखते हैं । लारा जहां रितेश से बडी दिखीं हैं वहीं दीपिका खूबसूरत तो दिखी हैं , मगर पूरी फ़िल्म में यदि एक भी दृश्य में पूरे कपडे पहने हुए दिख जाती तों शायद कुछ अलग टेस्ट भी मिलता । इनके अलावा , बहुत समय बाद पर्दे पर दिखाई देने वाले रणधीर कपूर , के अलावा , छोटी भूमिकाओं वाले सभी कलाकार जैसे चंकी पांडे, जिया खान , अर्जुन रामपाल , बोमन ईरानी आदि ने अपनी भूमिका को रूटीन अंदाज़ में ही निभाया है । वैसे ऐसी कहानियों में अभिनय क्षमता दिखाने की गुंजाईश जरा कम ही रहती है । पिक्चर में तीन जीव तोते, शेर और बंदर , फ़िल्म के प्रोमो में देखने में जितने असरदार लग रहे थे उतने ही बेकार पिक्चर में देखने में लगे । कुछ दृश्य जरूर ही हंसाने वाले रहे हैं । गाने सभी भी बेस्वाद , और जबरन सुनाए जैसे लगे । "तुझे हैवेन दिखाऊंगी "जैसे गानों को जहां वाहियात गानों की श्रेणी में रखा जा सकता है तो वहीं फ़ुल वोल्यूम में गाये गाने , "वोल्यूम कम कर " बस एवें ही था । जो गाना थोडा बहुत पसंद किया जा रहा है वो भी रिमेक ही है "अपनी तो जैसे तैसे कट जाएगी " । विदेशी लोकेशन्स पर शूट करने में जितना मजा कलाकारों को आया होगा उतना ही कैमरे को भी आया है , फ़ोटोग्राफ़ी सुंदर बन पडी है । कुल मिलाकर ऐसी फ़िल्मों के लिए आपको ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पडता है क्योंकि ये कुछ दिनों में ही , ये किसी न किसी चैनल पर दिखाई जाएगी ।

Monday, May 17, 2010

दरअसल:क्यों पसंद आई हाउसफुल?

-अजय ब्रह्मात्‍मज 

हाउसफुल रिलीज होने के दो दिन पहले एक प्रौढ़ निर्देशक से फिल्म की बॉक्स ऑफिस संभावनाओं पर बात हो रही थी। पड़ोसन, बावर्ची और खट्टा मीठा जैसी कॉमेडी फिल्मों के प्रशंसक प्रौढ़ निर्देशक ने अंतिम सत्य की तरह अपना फैसला सुनाया कि हाउसफुल नहीं चलेगी। यह पड़ोसन नहीं है। इस फिल्म को चलना नहीं चाहिए। 30 अप्रैल को फिल्म रिलीज हुई, महीने का आखिरी दिन होने के बावजूद फिल्म को दर्शक मिले। अगले दिन निर्माता की तरफ से फिल्म के कलेक्शन की विज्ञप्तियां आने लगीं। वीकएंड में हाउसफुल ने 30 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया। अगर ग्लोबल ग्रॉस कलेक्शन की बात करें, तो वह और भी ज्यादा होगा।

बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के इस आंकड़े के बाद भी हाउसफुल का बिजनेस शत-प्रतिशत नहीं हो सका। हां, दोनों साजिद (खान और नाडियाडवाला) फिल्म की रिलीज के पहले से आक्रामक रणनीति लेकर चल रहे थे। उन्होंने फिल्म का नाम ही हाउसफुल रखा और अपनी बातचीत, विज्ञापन और प्रोमोशनल गतिविधियों में लगातार कहते रहे कि यह फिल्म हिट होगी। आप मानें न मानें, लेकिन ऐसे आत्मविश्वास का असर होता है। आम दर्शक ही नहीं, मीडिया तक इस आक्रामक प्रचार के चपेट से नहीं बच पाता। हाउसफुल फिल्म का रिव्यू भले ही अच्छा नहीं रहा हो, लेकिन उसकी रिपोर्ट अच्छी रही। सभी ने उसके बिजनेस के बारे में रिपोर्ट की। हर रिपोर्ट का यही स्वर रहा कि हाउसफुल कामयाब है। अगर फिल्म को 25-30 प्रतिशत ओपनिंग मिलती, तो दोनों साजिद मुंह के बल गिरते और फिर उन्हें उनके बड़बोलेपन के लिए लताड़ा जाता। अच्छा हुआ कि ऐसा नहीं हुआ। फिर भी इस सवाल का जवाब मिलना चाहिए कि फिल्म बिजनेस की अनिश्चितता के बावजूद वे कैसे इतने श्योर थे? ट्रेड मैगजीन में अगले दिन कामयाबी के विज्ञापन छपे थे, जबकि ये पेज शुक्रवार से पहले निश्चित किए जाते हैं। ट्रेड पंडितों और कुछ समीक्षकों ने बॉक्स ऑफिस की रिपोर्ट आने के पहले ही इसे ब्लॉकबस्टर कहना और लिखना आरंभ कर दिया था। क्या सभी को आभास हो गया था कि हाउसफुल की कामयाबी सुनिश्चित है या फिर यहां भी किसी प्रकार की फिक्सिंग का गेम हुआ है। ऐसा कहा जाता है कि बड़े निर्माता और निर्देशक फिल्म रिव्यू खरीद लेते हैं। ट्रेड पंडितों के मुंह से अपने हित की बातें करवाने का रिवाज पुराना है। देश के कुछ मशहूर ट्रेड पंडित अपनी ऐसी निर्माताप्रिय भविष्यवाणियों और समीक्षा के लिए मशहूर हैं।

फिल्म के चलने का मतलब है कि इसे दर्शक देख रहे हैं। अगर 75 प्रतिशत दर्शक भी देख रहे हैं, तो इसकी पड़ताल होनी चाहिए कि इन दर्शकों को हाउसफुल में क्या अच्छा लगा? दर्शकों की रुचि के आधार पर हमें देखना होगा कि क्यों हाउसफुल जैसी फिल्में ज्यादा पसंद की जा रही हैं? उस दिन की बातचीत में पड़ोसन का जिक्र आने पर एक समीक्षक ने कहा था कि अगर आज पड़ोसन बनती और रिलीज होती, तो दर्शक उसे देखने ही नहीं जाते। हमें यह भी देखना चाहिए कि जिस साल पड़ोसन रिलीज हुई थी, उस साल उसने कैसा बिजनेस किया था? अभी पसंद की जा रही अनेक फिल्में अपनी रिलीज के समय चल नहीं पाई थीं और समीक्षकों ने भी तब उन्हें खारिज कर दिया था।

यकीन करें, समय के साथ दर्शक ही किसी फिल्म को बड़ी और कामयाब बनाते हैं। फिल्मों का बिजनेस करना और समय के साथ उसका महत्व बढ़ना दो अलग बातें हैं। समय बीतने के साथ हाउसफुल जैसी फिल्में दर्शकों की याददाश्त से निकल जाएंगी। फिर भी इस प्रवृत्ति का अध्ययन होना ही चाहिए कि क्यों अभी फूहड़ और अश्लील किस्म की कॉमेडी ज्यादा पसंद की जा रही है। क्या हम सभी भावुक और गंभीर नहीं रहे या हम सभी हंसोड़ हो गए हैं। कुछ तो वजह है कि हाउसफुल को दर्शक मिले और संभव है कि ऐसी फिल्मों को आगे भी दर्शक मिलें।

Sunday, May 16, 2010

स्‍वागत है साउथ के सुपरस्‍टार विक्रम का 'रावण' में


-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में एक्टर डबल-ट्रिपल रोल निभाते रहे हैं। संजीव कुमार ने नया दिन नयी रात में नौ रोल तो कमल हासन ने दसावतार में दस रोल निभाए। अब साउथ के सुपरस्टार विक्रम नए किस्म का रिकार्ड बना रहे हैं।

विक्रम ने रावण के हिंदी और तमिल दोनों संस्करणों में काम किया है, लेकिन दोनों भाषाओं में दो अलग किरदार निभाए हैं। वे हिंदी संस्करण में देव की भूमिका में नजर आएंगे तो तमिल संस्करण में बीरा के रूप में चौंकाएंगे। संभवत: विश्व सिनेमा में पहली बार किसी अभिनेता को इस किस्म की दोहरी भूमिका निभाने का मौका मिला है।

मणि रत्नम दोनों ही भाषाओं में रावण की शूटिंग साथ-साथ कर रहे थे। उन्होंने देव और बीरा के रूप में विक्रम को बड़ी चुनौती दी थी। विक्रम इस चुनौती पर खरे उतरे हैं। दोनों भाषाओं में रावण देखने के बाद ही दर्शक विक्रम की प्रतिभा के आयामों से परिचित हो सकेंगे।

लगभग बीस सालों से दक्षिण भारत की तमिल, तेलुगू, मलयालम की फिल्मों में छोटी-बड़ी भूमिकाएं निभा रहे विक्रम को हिंदी फिल्मों के दर्शक पहली बार रावण में देखेंगे। मणि रत्नम की नजर में वे बहुत पहले से अटके थे। वे 1994 में बांबे में उनहें मनीषा कोइराला के अपोजिट साइन करना चाहते थे, लेकिन तब विक्रम के बाल लंबे थे, दाढ़ी बढ़ी हुई थी और कद-काठी दुबली थी। विक्रम को बांबे छूटने और मणि रत्नम के साथ काम न कर पाने का अफसोस रहा। उल्लेखनीय है कि तमिल फिल्मों में भी उन्हें आरंभ में बड़ी फिल्में नहीं मिल रही थीं। सरवाइवल के लिए विक्रम ने तमिल फिल्मों में हीरो के रूप में आ रहे दूसरी भाषाओं के एक्टर को आवाज दी। उनकी डबिंग की और स्टारडम के लिए स्ट्रगल करते रहे। लंबे स्ट्रगल के बाद मिली कामयाबी ने उनहें विनम्र बना दिया है। नाम तो उनका विक्रम है, लेकिन स्वभाव और बात-व्यवहार में वे विनम्र और विनोदी हैं। उनका सेंस आफ हयूमर और बातचीत में वन लाइनर याद रह जाता है।

विक्रम ने हिंदी फिल्मों में आने की पहले जोरदार कोशिश नहीं की। कई बार फिल्मों के प्रस्ताव मिले, लेकिन कभी स्क्रिप्ट तो कभी प्रोडक्शन हाउस पसंद न आने की वजह से विक्रम से हिंदी फिल्मों के दर्शक वंचित रहे। वे मजाकिया स्वर में कहते हैं, ''तमिल फिल्मों में बीस साल पहले मेरी एंट्री हुई थी। हिंदी फिल्मों के लिए मैं नया चेहरा हूं, इसलिए बिल्कुल फ्रेश और यंग फील कर रहा हूं। नए एक्टर जैसी ही घबराहट महसूस कर रहा हूं। मालूम नहीं कि हिंदी के दर्शक मुझे कितना पसंद करेंगे? पसंद भी करेंगे या पट से रिजेक्ट कर देंगे।''

रावण की दोहरी भूमिकाओं की चुनौती की बात चलने पर वे बताते हैं, ''निश्चित ही मुश्किल काम था, क्योंकि दोनों ही कैरेक्टर अपने किस्म से इंटेंस और इंपार्टेट हैं। मणि सर दोनों कैरेक्टर की शूटिंग में थोड़ा गैप रखते थे और मुझे तैयार होने का मौका देते थे। हिंदी संस्करण के प्रोमोशन में आप अभिषेक बच्चन को जिस रूप में देख रहे हैं, लगभग वैसा ही रूप तमिल संस्करण में मैंने रखा है। हम दोनों की एक्टिंग स्टाइल का फर्क जरूर दिखेगा। हम सभी लोकेशन पर साथ ही थे, लेकिन मैंने हमेशा यही कोशिश की कि मैं अभिषेक बच्चन को शूट करते हुए नहीं देखूं। यही कोशिश अभिषेक ने भी की। हम दोनों नहीं चाहते थे कि बीरा के अभिनय में हम एक-दूसरे से प्रभावित हों।''

केवल विक्रम और ऐश्वर्या राय ही हिंदी और तमिल दोनों भाषाओं में हैं। ऐश्वर्या राय फिल्म की नायिका हैं। दोनों ही भाषाओं में उन्होंने एक ही किरदार निभाया है, लेकिन उनके सहयोगी कलाकार दोनों भाषाओं में बदल गए हैं। हिंदी में उनके सामने अभिषेक बच्चन हैं तो तमिल में विक्रम हैं। हिंदी में विक्रम सेकेंड लीड देव बने हैं। विक्रम बताते हैं, ''मेरे लिए थोड़ी मुश्किल थी कि तमिल की शूटिंग करते समय ऐश्वर्या के साथ मेरा ऑनस्क्रीन रिलेशन अलग होता था और जब हिंदी वर्सन की शूटिंग करता था तो वह बिल्कुल अलग हो जाता था। मुझे लगता है कि यह ऐश्वर्या राय के लिए भी चुनौती रही होगी कि वे एक ही टाइम फ्रेम में दो अलग-अलग भंगिमाओं में कैसे दिखें? इसके अलावा हम सभी को थोड़ा आराम भी मिल जाता था, लेकिन उन्हें तो हर सीन रिपीट करना पड़ता था। सीन वही रहता था, लेकिन एक्टर बदल जाते थे। भाषा बदल जाती थी।''

विक्रम और ऐश्वर्या राय की केमेस्ट्री की काफी चर्चा है। इस संबंध में पूछने पर वे झेंप जाते हैं और अपने विनोदी अंदाज में बताते हैं, ''बेशक हिंदी मेरे लिए नई लैंग्वेज है, लेकिन रोमांस के लिए जरूरी बाडी लैंग्वेज मेरे लिए नई नहीं है। मैं दक्षिण की भाषाओं में कई फिल्में कर चुका हूं। उनमें हीरोइनों के साथ मेरी जोड़ियां पसंद की गई हैं।''

विक्रम मानते हैं कि मनोरंजन की दुनिया में अब भाषा कोई दीवार नहीं रह गई है। एक्टर नए काम और अनुभव की तलाश में दूसरी भाषाओं की फिल्में कर रहे हैं। उनका मुंबई आकर बसने का कोई इरादा नहीं है। वे भौगोलिक दूरी को बाधा नहीं मानते। भविष्य की योजनाओं के बारे में वे आश्वस्त स्वर में कहते हैं, ''अगर हिंदी फिल्मों के दर्शकों और निर्माताओं को मेरा काम अच्छा लगा और उन्होंने बुलाया तो जरूर हिंदी फिल्में करने आऊंगा। मुंबई में ठहरने का अभी कोई इरादा नहीं है। दक्षिण में मेरे पास हर तरह की फिल्में हैं। मैं सीमित बजट की फिल्में बना रहा हूं, जिनमें यंग एक्टर काम कर रहे हैं!''

Friday, May 14, 2010

फिल्म समीक्षा:बम बम बोले

-अजय ब्रह्मात्मज
प्रियदर्शन के निर्देशकीय व्यक्तित्व के कई रूप हैं। वे अपनी कामेडी फिल्मों की वजह से मशहूर हैं, लेकिन उन्होंने कांजीवरम जैसी फिल्म भी निर्देशित की है। कांजीवरम को वे दिल के करीब मानते हैं। बम बम बोले उनकी ऐसी ही कोशिश है। यह ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी की 1997 में आई चिल्ड्रेन आफ हेवन की हिंदी रिमेक है। प्रियदर्शन ने इस फिल्म का भारतीयकरण किया है। यहां के परिवेश और परिस्थति में ढलने से फिल्म का मूल प्रभाव बदल गया है।
पिनाकी और गुडि़या भाई-बहन हैं। उनके माता-पिता की हालत बहुत अच्छी नहीं है। चाय बागान और दूसरी जगहों पर दिहाड़ी कर वे परिवार चलाते हैं। गुडि़या का सैंडल टूट गया है। पिनाकी उसे मरम्मत कराने ले जाता है। सैंडिल की जोड़ी उस से खो जाती है। दोनों भाई-बहन फैसला करते हैं कि वे माता-पिता को कुछ नहीं बताएंगे और एक ही जोड़ी से काम चलाएंगे। गुडि़या सुबह के स्कूल में है। वह स्कूल से छूटने पर दौड़ती-भागती निकलती है, क्योंकि उसे भाई को जूते देने होते हैं। भाई का स्कूल दोपहर में आरंभ होता है। कई बार गुडि़या को देर हो जाती है तो पिनाकी को स्कूल पहुंचने में देर होती है। जूते खरीद पाने का और कोई उपाय न देख पिनाकी इंटर स्कूल दौड़ में शामिल होने का फैसला करता है। वह तीसरा आना चाहता है ताकि उसे ईनाम में जूते मिलें। संयोग ऐसा कि वह प्रथम आ जाता है। फिल्म भाई-बहन के मनोभावों को सहेजती गरीबी में पल रहे बच्चों को सहज तरीके से पेश करती है। भाई-बहन के साथ उनके माता-पिता के संघर्ष की भी कहानी चलती है, जिसमें आतंकवाद से प्रभावित इलाके में ईमानदार और सभ्य नागरिक के दीन-हीन संघर्ष का चित्रण है।
बम बम बोले का मूल देख चुके दर्शकों को इस फिल्म से खुशी नहीं होगी, क्योंकि मूल की तरह का सहज प्रवाह और मासूमियत इस फिल्म में नहीं है। प्रियदर्शन ने बंगाल के चाय बागान का परिवेश लिया है, लेकिन मजदूरों के बच्चे होने पर भी भाई-बहन खालिस हिंदी बोलते हैं। यह मुमकिन हो सकता है, लेकिन वे जिस कांवेंट स्कूल में पढ़ते हैं,वहां सूचनाएं हिंदी में लिखी जाती है और वह भी गलत हिंदी में.. तीसरा ईनाम को तिसरा ईनाम.. प्रियदर्शन की कामेडी फिल्मों में भी ऐसी चूक होती है। क्या पूरी यूनिट में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं रहता जो पूरे पर्दे पर दिखाई जा रही सूचना की हिंदी व‌र्त्तनी सुधार दे।
बम बम बोले मूल की तुलना में कमजोर फिल्म है, लेकिन हिंदी फिल्मों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह कथित रूप से बड़ी और पापुलर फिल्मों से उत्तम है। बम बम बोले संवेदनशील फिल्म है। भाई-बहन की बांडिंग और गरीबी में भी उनकी जिंदादिली प्रेरित करती है। दर्शील सफारी और जिया वस्तानी ने सुंदर काम किया है। अतुल कुलकर्णी अपनी पीढ़ी के संजीदा अभिनेता हैं। उन्होंने लाचार लेकिन ईमानदार पिता के चरित्र को अच्छी तरह निभाया है।
**1/2 ढाई स्टार

दरअसल:क्यों पसंद आई हाउसफुल?

-अजय ब्रह्मात्‍मज 

हाउसफुल रिलीज होने के दो दिन पहले एक प्रौढ़ निर्देशक से फिल्म की बॉक्स ऑफिस संभावनाओं पर बात हो रही थी। पड़ोसन, बावर्ची और खट्टा मीठा जैसी कॉमेडी फिल्मों के प्रशंसक प्रौढ़ निर्देशक ने अंतिम सत्य की तरह अपना फैसला सुनाया कि हाउसफुल नहीं चलेगी। यह पड़ोसन नहीं है। इस फिल्म को चलना नहीं चाहिए। 30 अप्रैल को फिल्म रिलीज हुई, महीने का आखिरी दिन होने के बावजूद फिल्म को दर्शक मिले। अगले दिन निर्माता की तरफ से फिल्म के कलेक्शन की विज्ञप्तियां आने लगीं। वीकएंड में हाउसफुल ने 30 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया। अगर ग्लोबल ग्रॉस कलेक्शन की बात करें, तो वह और भी ज्यादा होगा।

बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के इस आंकड़े के बाद भी हाउसफुल का बिजनेस शत-प्रतिशत नहीं हो सका। हां, दोनों साजिद (खान और नाडियाडवाला) फिल्म की रिलीज के पहले से आक्रामक रणनीति लेकर चल रहे थे। उन्होंने फिल्म का नाम ही हाउसफुल रखा और अपनी बातचीत, विज्ञापन और प्रोमोशनल गतिविधियों में लगातार कहते रहे कि यह फिल्म हिट होगी। आप मानें न मानें, लेकिन ऐसे आत्मविश्वास का असर होता है। आम दर्शक ही नहीं, मीडिया तक इस आक्रामक प्रचार के चपेट से नहीं बच पाता। हाउसफुल फिल्म का रिव्यू भले ही अच्छा नहीं रहा हो, लेकिन उसकी रिपोर्ट अच्छी रही। सभी ने उसके बिजनेस के बारे में रिपोर्ट की। हर रिपोर्ट का यही स्वर रहा कि हाउसफुल कामयाब है। अगर फिल्म को 25-30 प्रतिशत ओपनिंग मिलती, तो दोनों साजिद मुंह के बल गिरते और फिर उन्हें उनके बड़बोलेपन के लिए लताड़ा जाता। अच्छा हुआ कि ऐसा नहीं हुआ। फिर भी इस सवाल का जवाब मिलना चाहिए कि फिल्म बिजनेस की अनिश्चितता के बावजूद वे कैसे इतने श्योर थे? ट्रेड मैगजीन में अगले दिन कामयाबी के विज्ञापन छपे थे, जबकि ये पेज शुक्रवार से पहले निश्चित किए जाते हैं। ट्रेड पंडितों और कुछ समीक्षकों ने बॉक्स ऑफिस की रिपोर्ट आने के पहले ही इसे ब्लॉकबस्टर कहना और लिखना आरंभ कर दिया था। क्या सभी को आभास हो गया था कि हाउसफुल की कामयाबी सुनिश्चित है या फिर यहां भी किसी प्रकार की फिक्सिंग का गेम हुआ है। ऐसा कहा जाता है कि बड़े निर्माता और निर्देशक फिल्म रिव्यू खरीद लेते हैं। ट्रेड पंडितों के मुंह से अपने हित की बातें करवाने का रिवाज पुराना है। देश के कुछ मशहूर ट्रेड पंडित अपनी ऐसी निर्माताप्रिय भविष्यवाणियों और समीक्षा के लिए मशहूर हैं।

फिल्म के चलने का मतलब है कि इसे दर्शक देख रहे हैं। अगर 75 प्रतिशत दर्शक भी देख रहे हैं, तो इसकी पड़ताल होनी चाहिए कि इन दर्शकों को हाउसफुल में क्या अच्छा लगा? दर्शकों की रुचि के आधार पर हमें देखना होगा कि क्यों हाउसफुल जैसी फिल्में ज्यादा पसंद की जा रही हैं? उस दिन की बातचीत में पड़ोसन का जिक्र आने पर एक समीक्षक ने कहा था कि अगर आज पड़ोसन बनती और रिलीज होती, तो दर्शक उसे देखने ही नहीं जाते। हमें यह भी देखना चाहिए कि जिस साल पड़ोसन रिलीज हुई थी, उस साल उसने कैसा बिजनेस किया था? अभी पसंद की जा रही अनेक फिल्में अपनी रिलीज के समय चल नहीं पाई थीं और समीक्षकों ने भी तब उन्हें खारिज कर दिया था।

यकीन करें, समय के साथ दर्शक ही किसी फिल्म को बड़ी और कामयाब बनाते हैं। फिल्मों का बिजनेस करना और समय के साथ उसका महत्व बढ़ना दो अलग बातें हैं। समय बीतने के साथ हाउसफुल जैसी फिल्में दर्शकों की याददाश्त से निकल जाएंगी। फिर भी इस प्रवृत्ति का अध्ययन होना ही चाहिए कि क्यों अभी फूहड़ और अश्लील किस्म की कॉमेडी ज्यादा पसंद की जा रही है। क्या हम सभी भावुक और गंभीर नहीं रहे या हम सभी हंसोड़ हो गए हैं। कुछ तो वजह है कि हाउसफुल को दर्शक मिले और संभव है कि ऐसी फिल्मों को आगे भी दर्शक मिलें।

Monday, May 10, 2010

'राजनीति' महाभारत से प्रेरित है : मनोज बाजपेयी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

राजनीति में रोल क्या है आप का?

पॉलिटिकल फैमिली में पैदा हुआ है मेरा किरदार। बचपन से पावर देखा है उसने। उसके अलावा कुछ जानता भी नहीं और वही वह चाहता है। वह जानता है कि जो पोजिशन और पावर है, वह उसे ही मिलनी चाहिए। जिद्दी आदमी है, तेवर वाला आदमी है। कहीं न कहीं मैं ये कहूंगा कि बहुत ही धाकड़ खिलाड़ी भी है राजनीति में। तो वह चालाकी भी करता है। लेकिन जब विपत्ति आती है तो कहीं न कहीं अपने तेवर और जिद्दी मिजाज की वजह से उसका दिमाग काम नहीं कर पाता। वीरेन्द्र प्रताप सिंह नाम है। वीरू भैया के नाम से मशहूर है।

खासियत क्या है? पॉलिटिकल रंग की अगर बात करें तो ़ ़ ़

जो राजनीति उसे विरासत में मिली है और जिसे छोड़ पाने में हमलोग बड़े ही असमर्थ हो रहे हैं, वीरू उस राजनीति की बात करता है। वह राजनीति अभी ढह रही है या चरमरा रही है। चरमराने के बाद डिप्रेशन आ रहा है लोगों में। उसी डिप्रेशन को वीरेन्द्र प्रताप सिंह रीप्रेजेंट करता है।

वीरेन्द्र प्रताप सिंह को निभाने के लिए क्या कोई लीडर या कोई आयकॉन आपके सामने था?

कोई आयकॉन सामने नहीं था। चूंकि बचपन से हम एक ऐसे परिवार और माहौल में पले-बढ़े हैं, जहां न्यूजपेपर अनिवार्य माना जाता था। जाहिर सी बात है कि राजनीति में हमार ी रुचि एक आम शहरी आदमी से ज्यादा रही है। ज्यादा जागरुकता रही है राजनीति को लेकर। मैंने इस कैरेक्टर को एक गैर राजनीतिक आदमी के ऊपर ढाला है। एक फ्यूडल आदमी के ऊपर ढाला है। उसके अनुरूप मैंने ढलने की कोशिश की है।

महाभारत वाली बात कितनी सच है कि राजनीति के किरदार उस से प्रेरित हैं?

बिल्कुल सच है। यह एक तरीके से महाभारत का ट्रिब्यूट है और महाभारत के बहुत सारे पात्र आपको इसमें चलते-फिरते नजर आएंगे। महाभारत को आज के दौर की राजनीति में डाल दिया गया है।

वीरू भाई किससे प्रेरित हैं।

दुर्योधन से। दुर्योधन का जब मैं नाम लेता हूं तो आपको समझ में आ जाएगा कि वह राजा ही था। उसे लगता था कि हर चीज जो उसे दी जा रही है,उसमें कुछ कमी है। हर चीज जो उसे मिलनी चाहिए, उसमें बाधाएं डाली जा रही हैं। महाभारत कहता भी है कि पूरे तौर से न कोई सही है और न कोई गलत है। कृष्ण कहते हैं कि सभी अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। सही और गलत का निर्णय लेना तो भगवान के हाथ में है।

अंतत: जो जीत जाता है, वही सही होता है?

महाभारत में जीता कौन? जीता कृष्ण। उसके अलावा तो कोई जीता नहीं।

क्या अलग एक्सपीरियेंस रहा है राजनीति का? फिल्म और डायरेक्टर प्रकाश झा के संदर्भ में पूछ रहा हूं?

प्रकाश जी हमारे ही इलाके के हैं और हमने साथ में कभी काम नहीं किया था। ये बात मुझे भी खटकती थी और बाद में मुझे पता चला कि उनको भी यह बात खटक रही थी। हम दोनों एक ऐसी फिल्म में साथ आ रहे हैं, जो उनके और मेरे दोनों के करियर के लिए खास फिल्म है। मुझे सबसे अच्छी और अनोखी बात लगी कि प्रकाश जी की टीम पूरी तरह से आर्गेनाइज्ड है। मैंने बड़ी फिल्में भी की है, बहुत ही बड़ी-बड़ी फिल्में की हैं और बहुत छोटी फिल्में भी की है। मैंने ऐसी व्यवस्था कहीं नहीं देखी।

प्रकाश झा के बारे में क्या कहेंगे? उनकी फिल्मों के बारे में?

प्रकाश जी देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों को लेकर फिल्में बनाते हैं। इस पर उनकी पकड़ बहुत अच्छी है। वे बहुत निर्भीक होकर काम करते हैं, क्योंकि उनकी आस्था है इन विषयों पर। दूसरा वे गाहे-बेगाहे एक पॉलीटिशियन भी हैं, समाज सेवक भी हैं। एक एक्टर के तौर पर आप बहुत कुछ लेने के मूड में होते हैं, बहुत कुछ ले सकते हैं और बहुत ज्यादा लोभी बन जाते हैं। इस फिल्म में मैंने जो काम किया है, उसमें 70 प्रतिशत काम प्रकाश झा का है। उनका मेरे अभिनेता के ऊपर अथाह विश्वास था। मेरा उनकी जानकारी और निर्देशन के ऊपर। काम करने के दौरान मैं बहुत कम अपने डायरेक्टर से पूछता हूं कि आप बताइए मैं इसको कैसे करूं? मैं बार-बार इनके पास जाता था, बताइए मैं इसको कैसे करूं।

Sunday, May 9, 2010

आजादी है इश्क-बारबरा मोरी

-अजय ब्रह्मात्मज 


उनका अंदाज जितना बिंदास है, बोल उतने ही बेबाक। काइट्स की विदेशी नायिका बारबरा मोरी से बातचीत के अंश- 


[काइट्स के बारे में क्या कहना चाहेंगी?]

अमेजिंग लव स्टोरी है। मैं फाच्र्युनेट हूं कि इस फिल्म का पार्ट बनने का मौका मिला। यह मेरी पहली एक्शन, इंग्लिश और बॉलीवुड मूवी है। मैं सचमुच बहुत खुश हूं।

[इस फिल्म के पहले भारत के बारे में आप क्या विचार रखती थीं? कितना जानती थीं?]

मैं भारत और यहां के सिनेमा के बारे में अधिक नहीं जानती थी। यह जानती थी कि यहां की फिल्म इंडस्ट्री बहुत बड़ी है, लेकिन यहां की फिल्में नहीं देखी थीं। मैं छुट्टी बिताने के लिए भारत आना चाहती थी। संयोग देखिए कि छुट्टी मनाने के बजाए काम करने आ गई और लगभग दो महीने रही। इस बार भी दस दिनों तक रहूंगी। भारत में मेरा हर अनुभव नया और आनंददायक रहा। यहां मैं जिससे भी मिली, उसने मेरे दिल को छुआ।

[भारत में कौन-कौन सी जगहें देख पाई?]

अभी तक मुंबई और गोवा ़ ़ ़ दूसरे ट्रिप में छुट्टी मनाने के लिए गोवा गई थी। वहां के समुद्रतट बहुत अच्छे हैं।

[रितिक के साथ काम का अनुभव अपने देश के एक्टरों से कितना अलग रहा?]

रितिक परफेक्शनिस्ट हैं। मैंने कभी ऐसे एक्टर के साथ काम नहीं किया था। वे डायलॉग और लुक सब पर ध्यान देते हैं। वे अच्छे कंपैनियन हैं। उन्होंने मेरा पूरा खयाल रखा।

[भारत और आप के देश में सांस्कृतिक भिन्नता है क्या?]

बिल्कुल है, लेकिन कई समानताएं भी हैं। आप के यहां मसालेदार भोजन होता है, हमारे यहां भी यही हाल है। आप के देश में बगैर शादी किए मां बनना एक समस्या है। मेरे देश में यह आम बात है। कई सिंगल मदर्स मिल जाएंगी। मेरा भी एक बेटा है, लेकिन मैंने शादी नहीं की है।

[मतलब आप के देश में विवाह रूपी संस्था बहुत मजबूत नहीं है?]

मजबूत है, लेकिन मेरे लिए नहीं है। मेरी अपनी चाहत है कि शादी न करूं लेकिन मां बन सकूं, तो मैं ऐसा कर सकती हूं। आप के यहां यह आम बात नहीं है। अगर मैं किसी से प्रेम करूंगी तो उसके साथ रहूंगी। प्यार खत्म हो जाएगा तो अलग हो जाऊंगी। मुझे तलाक के बारे में नहीं सोचना होगा। कोई मुआवजा नहीं देना होगा।

[आप के लिए प्रेम क्या है?]

इश्क का मतलब आजादी है। अगर आप किसी से प्रेम करते हैं तो ज्यादा आजादी महसूस करते हैं।

[क्या आपने अब भारतीय फिल्में देखी? हिंदी फिल्मों में क्या खास बात दिखी?]

यहां आने के बाद देखी हैं। मैं शाहरुख खान, प्रियंका चोपड़ा और ऐश्वर्या राय से मिल चुकी हूं। फिल्में मैंने रितिक, अनुराग बसु और राकेश रोशन की ही देखी है। हिंदी फिल्मों में डांसिंग रहती है। डांसिंग और सिंगिंग में मजा आता है।

[क्या आप ने फिल्म में डांस किया है?]

हां, किया था, लेकिन लगता है कि वह अच्छा नहीं था, इसलिए फाइनल प्रिंट से काट दिया गया।

[क्या हिंदी फिल्मों की भावुकता आप को पसंद है?]

अगर वह काइट्स की तरह है तो पसंद है। यह ईमानदार, भावुक और सच्ची प्रेम कहानी है। इस फिल्म को देखते हुए ऑडिएंस रोएगी। आप फिर से प्यार करने लगेंगे। यह बहुत ही इमोशनल फिल्म है।

[क्या आप ने हिंदी सीखी ़ ़ ़ कुछ बोल सकती हैं?]

सिर्फ गालियां। गालियां सीखी हैं । फिल्म का एक संवाद है, 'मैं उल्लू की पट्ठी हूं ़ ़ ़ मैं तुम्हें प्यार करती हूं।' हा ़ ़ हा ़ ़ हा ़ ़


Saturday, May 8, 2010

स्क्रीन प्ले खुद लिखने में आता है मजा: अनुराग बसु

-अजय ब्रह्मात्‍मज

थिएटर एवं टीवी से फिल्मों में आए युवा निर्देशक अनुराग बसु ने टीवी सोप और सीरियलों के बाद एकता कपूर की फिल्म कुछ तो है के निर्देशन में कदम रखा, लेकिन पूरा नहीं कर पाए। साया को अपनी पहली फिल्म मानने वाले अनुराग, भिलाई से 20 की उम्र में मुंबई आए थे। लंबे संघर्ष के बाद सफलता मिली और अभी उन्हें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भरोसेमंद और सफल निर्देशक माना जाता है।

बचपन में कैसी फिल्में देखते थे?

होश संभालने के बाद से पापा-मम्मी को नौकरी के साथ थिएटर में मशगूल पाया। बचपन ग्रीन रूम में बीता। वे रिहर्सल करते, मैं होमवर्क करता। चाइल्ड आर्टिस्ट था। पापा सुब्रतो बसु और मां दीपशिखा भिलाई (छत्तीसगढ) के मशहूर रंगकर्मी हैं। हमारे ग्रुप का नाम अभियान था। वहां फिल्मों का चलन कम था, लेकिन अमिताभ बच्चन की फिल्में मैंने देखीं। तेजाब, कर्मा, हम और अग्निपथ याद हैं।

सिनेमा के प्रति रुझान कैसे हुआ?

मेरा झुकाव आर्ट और थिएटर की ओर था। भिलाई में पढाई का माहौल था। स्टील प्लांट के लोग बच्चों की पढाई पर पूरा ध्यान देते थे। ग्यारहवीं-बारहवीं तक मैंने भी जम कर पढाई की। इंजीनियरिंग में चयन हुआ। फिर लगा कि पांच साल पढाई के बाद आठ घंटे की नौकरी करनी पडेगी। इसी बीच श्याम बेनेगल ने पापा को डिस्कवरी ऑफ इंडिया के लिए बुलाया। छत्तीसगढ से तीजनबाई और पापा आए थे।

अच्छा तो एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से आपके पिता का जुडाव पहले हुआ था..?

पापा ही आए पहले मुंबई, लेकिन यहां का स्ट्रगल वे नहीं कर सके, लेखक बन गए। मैं तो बारहवीं के बाद आया। भिलाई में लोग मजाक करते थे कि पापा इस उम्र में हीरो बनने गए हैं। मम्मी ने यहीं ट्रांसफर ले लिया था। हम मीरा रोड के पास काशी मीरा में एक छोटे से कमरे में रहते थे। यह 1994 की बात है। मैंने कॉलेज में इंटर कॉलेजिएट थिएटर के कॅम्पिटीशन में भाग लिया। प्राइज भी मिले। भिलाई में प्राइज मिलने पर लोगों को लगता था कि पापा ने लिखा होगा। यहां अपनी वजह से तारीफ मिली तो हौसला बढा। पृथ्वी थिएटर जाना शुरू किया। कॉलेज के साथ प्लेटफॉर्म परफार्मेस करता था। मन लग रहा था।

फिल्मों का संयोग कैसे बना? रंगकर्मी कुछ ऐसा ख्वाब देखते हैं, उन्हें मौके मिल जाते हैं। क्या वैसा ही हुआ?

कई दोस्त एक्टिंग में थे। पृथ्वी थिएटर के पास ही प्रकाश मेहरा का ऑफिस था। एक बार वे वहां जा रहे थे तो मैं भी चला गया। उन्होंने तस्वीरें मांगीं, लेकिन तब तक मैंने तस्वीर नहीं खिंचवाई थीं। उन्होंने पहला नुक्स यह निकाला कि मेरे सामने के दांतों के बीच गैप है। फिर भी मुझे चुन लिया गया और हीरो के चार दोस्तों में से एक का रोल मुझे मिला। मैंने पूछा- कैरेक्टर क्या है? जवाब मिला, कोई नहीं है। चार दोस्त हैं, जो लेना है, ले लो। मेरे हिस्से क्यों, क्या, हां.. जैसे संवाद आए। एक सीन में हीरो के पीछे डांस करना था। औरों को डांस नहीं आता था तो मुझे मौका मिल गया। कमल मास्टर कोरियोग्राफर थे। उन्हें दिन के साढे आठ सौ रुपये मिलते थे। मैं उनके साथ प्रैक्टिस करने लगा। लेकिन माहौल मुझे जंचा नहीं। मैं इंडस्ट्री की अनिश्चितता से घबरा गया। उधर पापा की हालत यह थी कि कभी काम रहता था, कभी नहीं। दहिसर में कोचिंग क्लासेज में पढाया। कुछ दिन एंकर स्विच में सेल्समैनी भी की। पढाई पर ध्यान दिया। रिजल्ट अच्छा रहा और बीएआरसी (भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर) में रिसर्च फेलो का काम मिला। सोचा एक बार फिर से फिल्में ट्राई करके देखूं।

फिल्मी माहौल खींच रहा था या..?

अंतिम कोशिश के तहत पापा ने दो-तीन लोगों के पास भेजा। गौतम अधिकारी, रमण कुमार, राजन वाघमारे से एक ही दिन में मिलने गया। लंच के वक्त रमण कुमार से मिलने गया। दिन भर बाहर खडा रहा, फिर विनीता नंदा ने अगले दिन आने को कहा। तब जानकी कुटीर गया, मुझे नौकरी मिल गई। मैं साढे छठा असिस्टेंट था। आधे में गिना जाता था। रमण तारा डायरेक्ट कर रहे थे। सोचा था कि फिजिक्स ऑनर्स के बाद एफटीआईआई चला जाऊंगा। रमण ने कहा, काम करते हुए सीखो। अफसोस होता है, व‌र्ल्ड सिनेमा से अपरिचित रह गया।

क्यों नहीं जा सके एफटीआईआई?

उन दिनों पायलट बनाने का चक्कर शुरू हो गया था। मैंने चोरी-छिपे एक कांसेप्ट जीटीवी में जमा किया था, जिसे एप्रूवल मिला, लेकिन रमण कुमार ने छुट्टी नहीं दी। बोले, काम करो या नौकरी छोड दो। मैंने नौकरी छोडी। तब तक चौथा या पांचवां असिस्टेंट बन चुका था। लगा डायरेक्टर नहीं बन पाऊंगा। पायलट बना कर जमा किया, फिर चक्कर शुरू हुए। तभी करुणा समतानी ने पायलट के आधार पर रमण कुमार से मेरे बारे में कुछ कहा। उन्होंने मुझे एक सीन शूट करने को कहा। अगले रोज आधे दिन की शूटिंग मिली और पूरा सोप मिल गया। तारा के सौ से ज्यादा एपीसोड किए। कुछ सीरियल भी डायरेक्ट किए। एफटीआईआई छूट गया।

आपने अपनी कंपनी भी शुरू की थी। सीरियल बनाने के दौरान ही महेश भट्ट जी से भी मुलाकात हुई थी।

मैंने अभियान नामक कंपनी बनाई। थ्रिलर, सैटरडे सस्पेंस और मंजिलें अपनी अपनी जैसे सीरियल बनाए। अजीब दास्तान भी थी। उसी के कारण फिल्म मिली। एक बार उसकी एडिटिंग में महेश भट्ट आए। उन्होंने मेरे काम की तारीफ की। वे प्लस चैनल से जुडे थे। अजीब दास्तान के एपीसोड तनुजा चंद्रा भी करती थीं। वे शायद उनका काम देखने आए थे। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, तुम्हें फिल्में करनी चाहिए। उनके जाने के बाद एडिटर ने समझाया कि भट्ट साहब की आदत है उन्होंने कइयों का दिमाग खराब किया है, लेकिन तुम चढना मत।

पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने की जिद थी आपके भीतर?

पापा ने नाटक को पूरी जिंदगी सौंप दी। कहते थे कि नाटक में न अटको, कुछ नहीं मिलेगा। एक दिन मैंने एकता कपूर से कहा-मैं सब छोडना चाहता हूं। उन्होंने पूछा, करोगे क्या? मैंने कहां, फिल्में बनाऊंगा। एकता ने अगले दिन बुलाकर कहा, हम फिल्म बनाएंगे। कुछ तो है फिल्म की घोषणा हो गई। तुषार कपूर, एषा देओल व ऋषि कपूर आए। प्री-प्रोडक्शन के दौरान लगा कि यूनिट को मेरी काबिलीयत पर भरोसा नहीं है। एकता फिल्म को दूसरे नजरिये से देख रही थीं, मैं दूसरे ढंग से। आखिर मैंने फिल्म छोड दी और सीरियल में लौट आया। दबाव बढे, दुविधा भी बढती गई।

महेश भट्ट ने साया के डायरेक्शन के लिए कब बुलाया? क्या फिल्म का सपना अधूरा रहने जैसा एहसास हुआ?

असुरक्षा नहीं महसूस होती थी। टीवी का काम आता था। दुर्गा विसर्जन के दिन मेरे फोन की घंटी बजी। महेश भट्ट साहब का कॉल था। उन्होंने कहा, फौरन ऑफिस आओ। उन्होंने पूछा,कोई कहानी है तुम्हारे पास? मेरे न कहने पर उन्होंने साया की कहानी दी। इस तरह उन्होंने फिल्मों में मुझे सेकंड बर्थ दिया।

आप साया को अपनी पहली फिल्म मानते हैं, जबकि कुछ तो है की लगभग पूरी शूटिंग आपने की थी?

कुछ तो है मैंने नहीं, मेरे असिस्टेंट अनिल ने पूरी की थी। इसके अनुभव बुरे रहे। मैंने अब तक यह फिल्म नहीं देखी। कभी टीवी पर आए तो चैनल बदल देता हूं। साया भी पूरी तरह मेरी फिल्म नहीं है, मैंने नहीं लिखी। निर्देशक के भीतर से कहानी निकलनी चाहिए। किसी के लिखे पर फिल्म बनाने से संतुष्टि नहीं होती।

आपके समकालीन निर्देशक खुद ही फिल्म लिखते हैं। पहले एक रायटिंग टीम होती थी। निर्देशक डायरेक्ट करते थे। सूरज बडजात्या व आदित्य चोपडा के बाद आए निर्देशक अपनी लिखी फिल्में ही निर्देशित कर रहे हैं।

यह हमारी पीढी की कमजोरी है। हम दूसरों के लिखे को सही ढंग से शूट नहीं कर पाते। मैं मानता हूं कि दूसरे की स्क्रिप्ट पर अच्छी फिल्म नहीं बना सकता। लेखक से साफ कहता हूं कि स्क्रीन प्ले मैं लिखूंगा। इसे लिखने में कच्ची फिल्म बन जाती है। मेरी राय है कि किसी एक का पॉइंट ऑफ व्यू ही फिल्म में होना चाहिए।

ऐसा कब लगा कि दूसरों के लिखे को ठीक से व्यक्त नहीं कर पाएंगे?

टीवी के जमाने से ही। लिखने में ज्यादा मजा आता था। पहले अपनी इस क्वालिटी को नहीं जानता था। साया की स्क्रिप्ट भट्ट साहब ने दी थी। मर्डर के समय मैंने उनसे कहा कि आपके आइडिया को मैं लिखता हूं। मर्डर सफल रही तो गैंगस्टर में छूट मिली। फिर मेट्रो आई। मैं खुद को लेखक-निर्देशक मानता हूं। हालांकि इसके कारण फिल्में कम हो जाती हैं। हम पहले लिखते हैं, फिर शूटिंग करते हैं तो वक्त ज्यादा लगता है।

निर्देशक के रूप में फिल्म के मुनाफे पर आपका कितना ध्यान रहता है? निर्माता का कितना दबाव होता है?

देखिए, निर्देशक बाजार की मांग व दबाव में काम करते हैं, फिर भी कुछ नया-बेहतर करने की कोशिश करते हैं। डायरेक्टर को मालूम होना चाहिए कि उसे कितना स्पेस मिला है। उसे बजट में काम करना आना चाहिए। उसके दिमाग से ही बजट कंट्रोल में रहता है। सही बजट की फिल्म विफल नहीं होती। सिनेमा व्यवसाय है। इसमें सबको लाभ होना चाहिए।

टीवी से कई डायरेक्टर फिल्मों में आए हैं। मीडियम का कितना रोल होता है?

टीवी से आए लोग निश्चित समय में काम पूरा करना जानते हैं। वहां रोज एक एपीसोड खत्म करना होता है। उन्हें पता होता है कि चार आने की मुर्गी को बारह आने का कैसे दिखाना है? गैंगस्टर व मेट्रो फिल्में बजट से ज्यादा महंगी दिखती हैं। टीवी की ट्रेनिंग ही इसमें काम आई। हम किसी एक चीज के कारण शूटिंग नहीं रोकते। इससे प्रोड्यूसर खुश रहते हैं। टीवी से आए लोग पैसे की वैल्यू जानते हैं।

कुछ लोगों का कहना है कि टीवी से आए लोग बडा नहीं सोच पाते, जबकि सिनेमा लार्जर दैन लाइफ माध्यम है।

मेट्रो की शूटिंग के दौरान अपने प्रोडक्शन के सीरियल लव स्टोरी की शूटिंग की थी। दिन में डेढ-दो मिनट मेट्रो की शूटिंग करता था। रात में लव स्टोरी का 20 मिनट का एपीसोड बनाता था। दोनों माध्यमों के टेकनीक-इंपेक्ट के बारे में आप स्पष्ट हैं तो मुश्किल नहीं होगी। लेकिन जिन लोगों ने फिल्मों से काम शुरू किया है, उनके लिए टीवी मुश्किल होगा।

पंद्रह साल पहले आज के अनुराग की कल्पना की थी?

मैंने अपना काम सौ प्रतिशत ईमानदारी व लगन से किया। टीवी में भी मेहनत की, इसलिए मुझे फिल्म डायरेक्ट करने का मौका मिला।

किन लोगों को रोल मॉडल मानते हैं?

सबसे बडे आदर्श तो पापा थे। रविवार और दिनमान आता था मेरे घर। पढने पर जोर था। कहते हैं कि जिस फिल्म का फ‌र्स्ट हाफ अच्छा होता है, उसका सेकंड हाफ भी ठीक होता है। जिंदगी में भी ऐसा है। फ‌र्स्ट हाफ में पापा के साथ अच्छी ट्रेनिंग हुई, ट्रेनिंग की पॉलिशिंग फिल्मों में हुई। रमण जी के यहां हर तरह का ज्ञान मिला। कई गुरु हैं। याद नहीं कि फोकस करना किसने सिखाया, मगर मैं अच्छी तरह कैमरा फोकस करता हूं। काम से डिटैच होना भट्ट जी से सीखा। वो कहते हैं, जिंदगी जियो और सिनेमा के मजे लो। खुद से पूछो,फिल्म क्यों बना रहे हो? राकेश रोशन केसाथ अच्छा अनुभव था। अभी भी सीख रहा हूं।

थ्रिलर ज्यादा प्रिय है आपको? कॉमेडी-रोमांटिक फिल्म बनाएंगे?

कॉमेडी फिल्म बनाना चाहता हूं। आइडिया पर काम करता हूं, फिर कहानी बुनता हूं। फिल्म मनोरंजक होनी चाहिए। यह तब होगा, जब लिखने-शूट करने में मजा आएगा। कई बार तो पूरी स्क्रिप्ट लिखने के बाद मजा नहीं आया, मैंने उसे फेंक दिया। मैं उसकी मरम्मत नहीं करता।

आपकी फिल्में एंटरटेनिंग हैं, लेकिन सोशल कंसर्न की कमी खलती है..।

अभी मेरा ध्यान एंटरटेनमेंट पर है। अपनी भी सफलता चाहिए। उम्र के साथ ही अनुभव आते हैं। मेट्रो में मैंने बडे शहर के रिश्तों की बात उठाई थी। उसमें नायिका को स्टैंड लेता दिखाने की बात नहीं सोची। शायद मैं इतना परिपक्व नहीं था कि रिश्तों पर स्टैंड लूं। मुझे याद है कि आपने मेरी आलोचना की थी।

छत से कुछ खास लगाव है आपको? गैंगस्टर में छत पर होने वाला रोमांस रोमांचित करता है। प्रेरणा कहां मिली?

मुझे छत पसंद है, जैसे यश चोपडा को सरसों के खेत पसंद हैं। मेरा व तानी का रोमांस छत पर ही अधिक हुआ। चौपाटी या रेस्तरां कम ही गए। अच्छा लगता है कि कोई आपको नहीं देख रहा है और आप सबको देख रहे हैं। सब भाग रहे हैं, आप प्रेम कर रहे हैं। आपके सामने शहर रोशन होता है। मुझे पहाडों की शूटिंग से अधिक मजा शहरों की शूटिंग में आता है। भीड में शूट करना एक्साइटिंग लगता है। छत से शहर की धडकन को महसूस कर सकते हैं।

मध्यवर्गीय होने के बावजूद आपकी फिल्में बडे शहरों की हैं। यह सचेत निर्णय था कि जीवन के अनुभव फिल्मों में नहीं आने देंगे?

मैंने जो कहानियां चुनीं, वे घूम-फिर कर मेट्रो में आ जाती हैं। मेट्रो भिलाई में दो हफ्ते में उतर गई। कोफ्त होती है कि मैं जहां का हूं, वहींके लोग मेरी फिल्में नहीं देखते। मैं एंटरटेनमेंट व बिजनेस का ध्यान रखता हूं। कुछ लोग इससे दुखी हो जाते हैं कि क्रिएटिव व्यक्ति को ऐसे नहीं सोचना चाहिए। मेरी चिंता है कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल हो।

काइट्स हिंदी की सबसे महंगी फिल्म मानी जा रही है?

काइट्स दो भाषाओं में बनी है। राकेश रोशन से मुझे पूरी छूट मिली। फिल्म को इंटरनेशनल स्टैंडर्ड देना चाहते थे। यह हिंदी फिल्मों को एक नई ऊंचाई पर ले जाने वाली फिल्म है।

फिल्मोग्राफी

साया - 2003

मर्डर - 2004

तुम सा नहीं देखा - 2004

गैंगस्टर- 2006

लाइफ इन मेट्रो- 2007

Friday, May 7, 2010

फिल्‍म समीक्षा : बदमाश कंपनी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

सन 1994.. मुंबई की गलियों में पले तीन लुक्खे  कुछ नया करने की सोचते हैं। उनमें से करण तेज दिमाग का लड़का है। मध्यवर्गीय परिवेश और परिवार में उसका दम घुटता है। जल्दी से अमीर बनने के लिए वह पहले विदेशों से सामान लेकर आनेवाला कुरियर ब्वॉय बनता है और फिर अपनी चालाकी से एक दांव खेलता  है।

कामयाब होने के बाद उसकी ख्वाहिशें  और मंजिलें बढ़ती हैं। अब वह अमेरिका जाने का सपना देखता  है। वहां भी  वह अपनी जालसाजी में कामयाब रहता है, लेकिन बाद में उसके इगो  और जिद से त्रस्त होकर उसके दोस्त अलग हो जाते हैं। जालसाजी के एक मामले में वह फंसता है। जेल जाता है। जेल से निकलने के बाद उसमें बड़ा बदलाव आता है। वह मेहनत से इज्जत कमाने की कोशिश करता है। इस बार सारे दोस्त मिल जाते हैं और गर्लफ्रेंड भ् ाी  बीवी के तौर पर आ जाती है।

परमीत सेठी की बदमाश कंपनी पिछली सदी के अंतिम दशक में अमीर बनने का ख्वाब  देख  रहे शहरी युवकों के फरेब को जाहिर करती है। पिछले सालों में इस विषय पर कई फिल्में आई हैं। परमीत  सेठी उसी कहानी को रोचक तरीके और नए पेंच के साथ कहते हैं। बदमाश कंपनी में शाहिद कपूर नए लुक में हैं। उनके साथ वीर दास और मेइयांग  चैंग  जैसे नए सपोर्टिग  एक्टर और रब ने बना दी जोड़ी की अनुष्का  हैं। नए चेहरों की यह फिल्म बासी विषय में भी ताजगी का एहसास देती है। क्लाइमेक्स के सीन में परमीत  सेठी लड़खड़ा गए हैं। इन दिनों ज्यादातर निर्देशकों की यह दिक्कत है कि वे अपनी कहानी समेट नहीं पाते हैं। परमीत  सेठी भी फिल्म से जगी उम्मीद को अंत तक नहीं निभा पाते हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स उलझा हुआ है।

परमीत की यह पहली फिल्म है। उस लिहाज से उनका नैरेटिव  इंटरेस्टिंग  है। उन्होंने बेपरवाह और बेफिक्र युवकों की कहानी में इमोशन  और वैल्यूज  अच्छी तरह पिरोए हैं। बदमाश कंपनी दोस्ती और परिवार के महत्व को रेखांकित  करती है। हालांकि पिता की भूमिका  बहुत लंबी नहीं है, लेकिन उनका चरित्र आदमकद है। नायक अपने पिता के सच्चरित्र से प्रभावित  होता है और अंत में बदलता है। कहानी में चरित्रों का ऐसा समीकरण पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में प्रचलित था। बिगड़े और भटके  युवक और नायक फिल्म  के अंत में सही राह पर लौट आते थे। बदमाश कंपनी नए कलेवर में उसी शैली की फिल्म  है।

कमीने के बाद शाहिद कपूर की पर्सनैलिटी में बदलाव आया है। उनकी लुक और इमेज  में फर्क आया है। पहले उनके चेहरे की मासूमियत कई बार उनके अभिनय  में बाधा बन जाती थी। अब वे मैच्योर  दिखते  हैं। उन्होंने बदमाश कंपनी में सधा अभिनय किया है। केवल उत्तेजक दृश्यों में उनकी ऊंची आवाज खटकती है। वीर दास और मेइयांग  चैंग  सहज रहे हैं। उन्होंने  मुख्य किरदार को उचित सपोर्ट दिया है। नायिका की भूमिका अच्छी तरह से परिभाषित नहीं है। इस कारण अनुष्का  शर्मा अपनी प्रतिभा  की सिर्फ झलक भर  दे पाती हैं। सीमित मौजूदगी के बावजूद उनकी बातें और अदाएं याद रहती हैं।

** 1/2  ढाई स्टार

Thursday, May 6, 2010

दरअसल : बनेंगी प्रादेशिक फिल्‍में

-अजय ब्रह्मात्‍मज

मुंबई में बन रहीं हिंदी फिल्में तेजी से मेट्रो और मल्टीप्लेक्स के दर्शकों की रुचि के मुताबिक बदल रही हैं। किसी भी प्रोडक्ट की मार्केटिंग में उसके टार्गेट गु्रप की पसंद-नापसंद का खयाल रखा जाता है। ज्यादातर कंज्यूमर प्रोडक्ट इसी तरीके से बाजार और ग्राहकों की मांग पूरी कर मुनाफा कमाते हैं। फिल्में भी प्रोडक्ट हैं। आप चाहें, तो उसे कंज्यूमर प्रोडक्ट न कहें, लेकिन आज के परिवेश में दर्शकों (ग्राहकों) की रुचि, पसंद और मांग के आधार पर ही उनका निर्धारण होता है। फिल्मों के बाजार में भी उन दर्शकों का ज्यादा खयाल रखा जा रहा है, जो ज्यादा पैसे खर्च करते हैं। मुंबई के निर्माता-निर्देशक बाकी दर्शकों की परवाह नहीं करते।

इस माहौल में ही नए सिनेमा के विस्तार की संभावनाएं छिपी हुई हैं। मुझे साफ दिख रहा है कि अगर मुंबई के फिल्म निर्माता इसी तरह देशी दर्शकों से बेपरवाह रहे, तो उनके लिए एक नया सिनेमा उभरेगा। पिछले पांच-छह सालों में भोजपुरी सिनेमा ने इसी वैक्यूम को भरा है। भोजपुरी सिनेमा अपनी सीमा और कलात्मक संकीर्णताओं के कारण उभरने के बावजूद ठोस स्वरूप नहीं ले सका। इसकी अगली कड़ी के रूप में हिंदी का प्रादेशिक सिनेमा उभरेगा। थोड़ी हिम्मत और सहूलियत के बाद हिंदीभाषी प्रदेशों का स्थानीय सिनेमा सामने आएगा। आप यकीन करें कि किसी न किसी रूप में उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और अन्य प्रदेशों का हिंदी सिनेमा अस्तित्व ग्रहण करेगा। यह हिंदी में होते हुए भी प्रदेश विशेष की भाषा, संस्कृति और सरोकार से निर्धारित होगा।

इन दिनों जयपुर में चुटकी बजा के की शूटिंग चल रही है। यह पी किरण की सीमित बजट की फिल्म है। इसे मॉर्निग वॉक के निर्देशक अरूप दत्त निर्देशित कर रहे हैं। चुटकी बजा के वास्तव में स्थानीय कोशिश से बन रही फिल्म है। सात व्यक्तियों के फिल्मप्रेमी समूह ने फिल्म बनाने का सामूहिक सपना देखा। उन्होंने इस सपने को पूरा करने के लिए मुंबई आने की जरूरत नहीं समझी। उनमें से तपन भट्ट, गजेंद्र श्रोत्रिय और रामकुमार सिंह ने कहानी लिखी। एस एल इंदालिया ने गीत लिखे, तो राजीव थानवी ने संगीत तैयार किया। बात आई निर्देशन की, तो उन्होंने अनुभवी लेकिन सीमित बजट में काम करने के लिए तैयार अरूप दत्त को जयपुर बुला लिया। इस तरह उनके सपने का स्वरूप बना और अब वह धीरे-धीरे आकार ले रहा है। फिल्म की मुख्य भूमिकाओं में स्थानीय कलाकार ही चुने गए हैं। केवल मुकेश तिवारी परिचित कलाकार हैं, जो राजस्थान के बाहर से आए हैं। बाकी आशीष शर्मा, शिल्पी शर्मा, ईशान आदि राजस्थान के ही हैं। मजेदार तथ्य है कि नई होने के बावजूद चुटकी बजा के की टीम जयपुर में सुचारु तरीके से फिल्म की शूटिंग कर रही है।

चुटकी बजा के के उदाहरण से सबक लेकर सभी हिंदीभाषी प्रदेशों के फिल्म प्रेमी अपने शहरों में ही शुरुआत कर सकते हैं। पहले की तरह फिल्म बनाने या उसमें काम करने के लिए मुंबई आना जरूरी नहीं रह गया है। अब ये सपने अपने शहरों में भी पूरे हो सकते हैं। मालेगांव, मेरठ, देहरादून, रांची और दूसरे शहरों में छोटे-मोटे प्रयास हो रहे हैं। ये फिल्में स्थानीय स्तर पर ही वितरित की जाती हैं और लागत के अनुपात में मुनाफा भी कमा लेती हैं। धीरे-धीरे इनकी लागत बढ़ सकती है और भविष्य में हिंदी फिल्मों के टक्कर में ये फिल्में खड़ी हो सकती हैं।

अगर हम दक्षिण भारत की फिल्मों का उदाहरण लें, तो मुख्य रूप से एक प्रदेश की तमिल, तेलुगू कन्नड़ और मलयालम फिल्में व्यवसाय के लिहाज से हिंदी फिल्मों से कम नहीं हैं। तमिल और तेलगू फिल्मों का बजट और बिजनेस तो कई बार हिंदी फिल्मों से ज्यादा होता है। वास्तव में हमें ऐसे स्वप्नजीवी निर्माता-निर्देशकों की जरूरत है, जो अपने प्रदेश विशेष की विशेषताओं को सेल्युलाइड पर उतार सकें और उसे अपने प्रदेश में ठीक से वितरित और प्रदर्शित करने का नेटवर्क तैयार कर सकें। यह मुश्किल तो है, लेकिन नामुमकिन नहीं है।

Sunday, May 2, 2010

प्यार की उड़ान है काइट्स-राकेश रोशन

-अजय ब्रह्मात्‍मज


उनकी फिल्मों का टाइटल अंग्रेजी अक्षर 'के' से शुरू होता है और वे बॉक्स ऑफिस पर करती हैं कमाल। रिलीज से पहले ही सुर्खियां बटोर रही नई फिल्म काइट्स के पीछे क्या है कहानी, पढि़ए राकेश रोशन के इस स्पेशल इंटरव्यू में-

[इस बार आपकी फिल्म का शीर्षक अंग्रेजी में है?]

2007 में अपनी अगली फिल्म के बारे में सोचते समय मैंने पाया कि आसपास अंग्रेजी का व्यवहार बढ़ चुका है। घर बाहर, होटल, ट्रांसपोर्ट; हर जगह लोग धड़ल्ले से अंग्रेजी का प्रयोग कर रहे हैं। लगा कि मेरी नई फिल्म आने तक यह और बढ़ेगा। ग्लोबलाइजेशन में सब कुछ बदल रहा है। अब पाजामा और धोती पहने कम लोग दिखते हैं। सभी जींस-टीशर्ट में आ गए हैं और अंग्रेजी बोलने लगे हैं। यहीं से काइट्स का खयाल आया। एक ऐसी फिल्म का विचार आया कि लड़का तो भारतीय हो, लेकिन लड़की पश्चिम की हो। उन दोनों की प्रेमकहानी भाषा एवं देश से परे हो।

]यह प्रेम कहानी भाषा से परे है, तो दर्शक समझेंगे कैसे?]

पहले सोचा था कि भारतीय एक्ट्रेस लेंगे और उसे मैक्सिकन दिखाएंगे। बताएंगे कि वह बचपन से वहां रहती है, इसलिए उसे हिंदी नहीं आती। फिर लगा कि यह गलत होगा। यह सब सोच कर विदेशी लड़की ली और फिल्म की शूटिंग भी विदेश में की। हमारी फिल्म का हीरो जय है। वह इस लड़की के साथ टूटी-फूटी भाषा में कम्युनिकेट करता है। इस फिल्म में जबरदस्ती हिंदी संवाद नहीं रखे गए। अंग्रेजी संवादों को एक्सप्लेन भी नहीं किया गया है हिंदी में। लड़की स्पेनिश बोलती है और उसे हमारा हीरो समझ लेता है तो निश्चित ही दर्शक भी समझ लेंगे। प्यार किसी भाषा, मजहब और देश से बंध कर नहीं रहता। यह दो ऐसे प्रेमियों की कहानी है, जो एक-दूसरे की भाषा नहीं समझते। ऐसे प्यार की मुसीबतें हो सकती हैं और फिर हम ने दिखाया कि दोनों प्यार के लिए किस हद तक जा सकते हैं? उन्हें अपने प्यार के लिए क्या-क्या करना पड़ता है?

[काइट्स की थीम क्या है? किस तरह की प्रेमकथा है यह?]

रितिक ने मेरे साथ कहो ना ़ ़ ़ प्यार है की थी। काइट्स एक अलग लवस्टोरी है। इसमें हीरो-हीरोइन किसी और उद्देश्य से निकलते हैं, लेकिन रास्ते में कोई और चीज मिल जाती है। फिर उन्हें दुविधा होती है कि इस रास्ते जाएं या उस रास्ते ़ ़ ़ दूसरा रास्ता चुनते ही उनमें प्यार होता है। उसके साथ मुसीबतें भी बढ़ती है, फिर भी वे अपने प्यार का झंडा गाड़ते हैं। काइट्स यानी पतंगों की तरह वे हवा के खिलाफ उड़ते हैं। प्यार के आकाश में मिलते हैं। जितनी तेज हवा होगी, पतंग की उड़ान उतनी ऊंची होती है। काइट्स का सिंबोलिक इस्तेमाल किया गया है टायटल में।

[प्रयोग तो अच्छा है, पर क्या सबको पसंद आएगा?]

अभी कोई भी नहीं कह सकता कि काइट्स कितनी चलेगी, पर टेक्नीकली और मेकिंग के लिहाज से हमने व‌र्ल्ड स्टैंडर्ड के टेक्नीशियन और नो हाऊ का इस्तेमाल किया है। फोटोग्राफी, बैकग्राउंड, लोकेशन, परफार्मेस किसी भी फील्ड में आप काइट्स की तुलना दुनिया की अच्छी फिल्मों से कर सकते हैं। काइट्स के लिए मैंने 58 कारें खरीदी थी। एक एकड़ जमीन किराए पर लेकर गैराज बनाया था। वहां 16 मैकेनिक रोजाना काम करते थे। उन कारों को विशेष गाड़ियों से उठाकर शूटिंग के लिए ले जाया जाता था, क्योंकि बगैर रजिस्टर्ड नंबर प्लेट के आप कार सड़क पर नहीं चला सकते थे। हम हाईवे किराए पर लेकर अपनी शूटिंग करते थे। जो गाड़ियां ठुक जाती थीं, उन्हें रिपेयर किया जाता था। अभी तक हिंदी फिल्में इस पैमाने पर शूट ही नहीं की गई हैं।

[निर्देशन के लिए अनुराग बसु का नाम कैसे फाइनल हुआ? इस पर रितिक का रिस्पांस क्या रहा?]

डायरेक्टर अनुराग बसु के बारे में मैंने बाद में पता किया। पहले तो उस साल के सभी अवार्ड समारोह में कृष, मुन्नाभाई, रंग दे बसंती के साथ गैंगस्टर का नाम सुन कर मैं चौंक रहा था। मैंने गैंगस्टर मंगा कर देखी। मुझे अनुराग बसु का काम पसंद आया। मैंने अनुराग को बुलाया और पूछा कि क्या तुम्हारे पास कोई कहानी है? उसके ना कहने पर मैंने काइट्स की कहानी दी। उसे झिझक थी। उसने कहा भी कि,''मैं तो छोटे बजट की फिल्में लिखता और बनाता हूं, फिर रितिक के बारे में कैसे सोच सकता हूं।'' खैर, मैंने कहानी देकर कहा कि अगर तुम्हारे दिल को यह कहानी छुए तो इस पर काम शुरू करो। अनुराग ने एक महीने का समय मांगा। कुछ महीनों के बाद आकर अनुराग ने कहानी सुनाई। उसने कहानी का सुर पकड़ लिया था। उसका नैरेटिव मुझ से अलग था। मुझे उसकी कहानी पसंद आई। मैंने ग्रीन सिग्नल दिया तो भी अनुराग को विश्वास नहीं हो रहा था। उसने फिर से पूछा, ''आप सच्ची में मुझे रितिक दे रहे हैं?'' मैंने अनुराग को आश्वस्त किया कि सिर्फ रितिक ही नहीं दे रहा हूं। मैं भी तुम्हारे साथ हूं प्रोड्यूसर के तौर पर। तुम्हारे दिमाग में जो आता है लिखो और जितना उड़ सकते हो ़ ़ ़ उड़ो। फिर तो उसने ऐसी उड़ान भरी कि सभी को खुश कर दिया। पहली बार में ही रितिक मंत्रमुग्ध हो गया। उसका एक ही सवाल था कि कब शुरू करनी है फिल्म?

[आपको बॉलीवुड की चाल से हट कर काम करने वाला निर्माता माना जाता है। इतना रिस्क लेने से डर नहीं लगता?]

दरअसल..मैं एक तरह की फिल्में बना ही नहीं सकता। मैंने पिछली कामयाब फिल्म को कभी नहीं दोहराया। मैंने खुदगर्ज, खून भरी मांग, करण-अर्जुन, खेल, कहो ना ़ ़ ़ प्यार है, कोई ़ ़ ़ मिल गया और कृष जैसी फिल्म के बाद काइट्स का निर्माण किया। मैं हमेशा चैलेंजिंग विषय लेता हूं। शुरू में हमेशा लगता है कि इस बार फिल्म नहीं बन पाएगी, फिर चौकन्ना होकर काम करता हूं। मुझे यह सुनने का शौक है कि मेरी पिक्चर देखने के बाद लोग कहें कि वाह, क्या पिक्चर बनाई है?