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Friday, April 30, 2010

फिल्‍म समीक्षा : हाउसफुल

-अजय ब्रह्मात्‍मज


सचमुच थोड़ी ऐसे या वैसे और जैसे-तैसे साजिद खान ने हाउसफुल का निर्देशन किया है। आजकल शीर्षक का फिल्म की थीम से ताल्लुक रखना भी गैर-जरूरी हो गया है। फिल्म की शुरुआत में साजिद खान ने आठवें और नौवें दशक के कुछ पापुलर निर्देशकों का उल्लेख किया है और अपनी फिल्म उन्हें समर्पित की है।

इस बहाने साजिद खान ने एंटरटेनर डायरेक्टर की पंगत में शामिल होने की कोशिश कर ली है। फिल्म की बात करें तो हाउसफुल कुछ दृश्यों में गुदगुदी करती है, लेकिन जब तक आप हंसें, तब तक दृश्य गिर जाते हैं। इसे स्क्रीनप्ले की कमजोरी कहें या दृश्यों में घटनाक्रमों का समान गति से आगे नहीं बढ़ना, और इस वजह से इंटरेस्ट लेवल एक सा नहीं रहता।

दो दोस्त, दो बहनें और एक भाई, दो लड़कियां, एक पिता, एक दादी और एक करोड़पतियों की बीवी़, कामेडी आफ एरर हंसने-हंसाने का अच्छा फार्मूला है, लेकिन उसमें भी लाजिकल सिक्वेंस रहते हैं। हाउसफुल में कामेडी के नाम पर एरर है। सारी सुविधाओं (एक्टरों की उपलब्धता और शूटिंग के लिए पर्याप्त धन) के बावजूद लेखक-निर्देशक ने कल्पना का सहारा नहीं लिया है। कुछ नया करने की कोशिश भी नहीं है। साजिद खान को विश्वास है कि उनकी फूहड़ कामेडी को दर्शक मिल जाएंगे। आजकल ऐसी गलतफहमियां दमदार होती जा रही हैं, क्योंकि बेचारे दर्शक मनोरंजन की कटौती और कमी के इस दौर में साधारण मनोरंजन से ही खुद को तृप्त करने की कोशिश करते हैं।

हाउसफुल में आधे दर्जन से ज्यादा कलाकारों की जमघट है। उन्होंने मेहनत की है और बेजान दृश्यों और संवादों में अपनी प्रतिभा से जान डालने की कोशिश की है। अक्षय कुमार और रितेश देशमुख की जोड़ी कई दृश्यों में प्रभावशाली रही है। उनके बीच की टाइमिंग से सीन जानदार बने हैं। अर्जुन रामपाल एक अलग अंदाज में आते हैं। हीरोइनों में लारा दत्ता निश्चित ही सहज और नैचुरल हैं। हंसाने लायक दृश्यों के लिए आवश्यक एनर्जी का वह सदुपयोग करती हैं। दीपिका अपने प्रयास में अटकती नजर आती हैं। सिर्फ निर्देशक के भरोसे रहने पर यह दिक्कत आती है। जिंदगी के तजुर्बो से एक्टिंग में निखार आता है। भले ही आप रुलाएं या हंसाएं, फिल्में देख कर या डायरेक्टर की बात सुन कर यह नहीं होता। सीन समझ जाने पर भी जरूरी एक्सप्रेशन चेहरे पर तभी आएंगे, जब उनका एक्सपीरिएंस या एक्सपोजर हो। यही दिक्कत जिया खान की भी रही है। इसी फिल्म में बोमन ईरानी और लिलेट दूबे के अभिनय से भी हम इसे समझ सकते हैं। वे सीमित स्पेस में ही कुछ कर जाते हैं।

कपड़े पहना रहे हों या कपड़े उतार रहे हों, दोनों ही प्रक्रियाओं में साजिद खान के एस्थेटिक सेंस और सीन में संगति नहीं बैठती। कलाकारों की प्रतिभा और उनसे मिले भरपूर सहयोग का भी वे समुचित उपयोग नहीं कर पाते। यही वजह है कि अंतिम प्रभाव में हाउसफुल सिर्फ टाइमपास प्रतीत होती है।

फिल्म का क्लाइमेक्स फूहड़ तरीके से सोचा और फिल्मांकित किया गया है। हंसी के समंदर में सारे चरित्र गड्डमड्ड हो गए हैं। अपनी तो जैसे-तैसे गीत का फिल्मांकन और नृत्य संयोजन रोचक और आकर्षक नहीं है।

** दो स्टार

Tuesday, April 27, 2010

दरअसल : नहीं करते हम लेखकों का उल्लेख

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों एक लेखक के साथ लंबी बैठक हुई। वे साहित्यिक लेखक नहीं हैं। फिल्में लिखते हैं। उनकी कुछ फिल्में पुरस्कृत और चर्चित हुई हैं। हाल ही में उनकी लिखी फिल्म वेलडन अब्बा की समीक्षकों ने काफी तारीफ की। वे समीक्षकों से बिफरे हुए थे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा, किसी भी अंग्रेजी समीक्षक ने फिल्म की तारीफ में लेखक का हवाला नहीं दिया। उन्होंने यह जानने और बताने की जरूरत नहीं समझी कि वेलडन अब्बा का लेखक कौन है? बोमन ईरानी की तारीफ करते हुए भी उन्हें खयाल नहीं आया कि जरा पता कर लें कि इस किरदार को किसने रचा? मैं एनएसडी के स्नातक और संवेदनशील लेखक अशोक मिश्र की बात कर रहा हूं। उन्होंने ही श्याम बेनेगल की वेलकम टू सज्जनपुर भी लिखी थी। इन दिनों वे श्याम बेनेगल के लिए एक पॉलिटिकल कॉमेडी फिल्म लिख रहे हैं। यह शिकायत और नाराजगी केवल अशोक मिश्र की नहीं है। वे सीधे व्यक्ति हैं, इसलिए उन्होंने अपना असंतोष जाहिर कर दिया। बाकी चुपचाप खटते (लिखते) रहते हैं। वे समीक्षकों से कोई उम्मीद नहीं रखते। निर्माता-निर्देशक भी उन्हें अधिक महत्व नहीं देते। उनका नाम पर्दे पर पुरानी परंपरा के तहत आ जाता है। कथा, पटकथा और संवाद फिल्म लेखन के तीनों खंडों में सक्रिय व्यक्तियों का नाम देने का रिवाज है। कुछ बैनर अपने लेखकों का नाम पोस्टर पर देते हैं। पोस्टर पर लेखकों का नाम देने की ग्लैमरस शुरुआत सलीम-जावेद ने पूरे हक से की थी। वैसे देश की आजादी के आगे-पीछे भी पोस्टर पर कभी-कभी लेखकों के नाम आते थे। बाद में लेखक मुंशी बन गए और फिल्म के प्रोमोशन में उनके योगदान को नजरअंदाज किया जाने लगा। सलीम-जावेद का किस्सा मशहूर है कि उन्होंने पहले निर्माता से पोस्टर पर नाम देने का आग्रह किया। उसने आग्रह नहीं माना, तो उन्होंने शहर में पोस्टर लगते ही कुछ आदमी भेजकर पोस्टरों पर अपने नाम लिखवा दिए। यह हिम्मत सलीम-जावेद कर सकते थे। दोनों को स्टार राइटर माना जाता था और अलग होने तक दोनों ने इस गरिमा का पूरा लुत्फ उठाया।

उनके बाद फिल्मों में लेखकों का महत्व सिमटता गया। निर्देशक और स्टार किसी हिंदीभाषी सहायक की मदद से कहानी और संवाद लिखने लगे और उसका फुल क्रेडिट भी लेने लगे। धीरे-धीरे स्थिति यह आ गई कि लेखक नामक जीव अदृश्य जैसा हो गया। उसका नाम तो आता था, लेकिन वह निराकार होता था। कोई नहीं जानता था कि उस नाम का कोई व्यक्ति है भी या नहीं? फिर नया दौर आया। सूरज बड़जात्या ने इसकी जोरदार शुरुआत की। उन्होंने खुद अपनी फिल्म की कहानी लिखी। उसके बाद आए ज्यादातर निर्देशकों ने बाहरी लेखकों से मदद लेनी बंद कर दी। सभी लेखक हो गए। केवल संवादों के लिए उन्हें लेखक किस्म के व्यक्ति की जरूरत पड़ती थी। वह भी मूल लेखक नहीं होता था। उसे संवाद अंग्रेजी में दे दिए जाते थे। वह उसे हिंदी में अनूदित कर देता था। यह सिलसिला आज भी चल रहा है। ऐड फिल्म और मुंबई या अन्य मेट्रो के पले-बढ़े ज्यादातर डायरेक्टर अंग्रेजी में ही सोचते और लिखते हैं। हिंदी के लिए पर अनुवादक उर्फ लेखक को भाड़े पर ले आते हैं।

सभी कहते हैं कि कंटेंट इज किंग, लेकिन इस कंटेंट को क्रिएट करने वाले व्यक्ति को फिल्म इंडस्ट्री में न तो इज्जत मिलती है और न पैसे। फिल्म समीक्षक, पत्रकार और पत्र-पत्रिकाएं भी लेखकों के नाम से परहेज करते हैं। लेखकों का उल्लेख करना उन्हें स्पेस की बर्बादी लगती है। दुमछल्ले स्टारों से पेज भरने और रंगने से संतुष्ट हम सभी को लगता है कि हम पाठकों की जरूरतें पूरी कर रहे हैं। हम अपना दायित्व भूल रहे हैं कि पाठकों को समुचित जानकारी देना भी एक प्रकार का मनोरंजन है।

Monday, April 26, 2010

भविष्य का सिनेमा मुंबई का नहीं


जयपुर. हिंदी सिनेमा केवल मुंबई की बपौती नहीं है और मैं मानता हूं कि हर प्रदेश का अपना सिनेमा होना चाहिए। यह सिनेमा के विकास के लिए जरूरी है। यह बात जाने माने फिल्म पत्रकार अजय बत्मज ने ‘समय, समाज और सिनेमा’ विषय पर हुए संवाद में कही। जेकेके के कृष्णायान सभागार में शनिवार को जवाहर कला केन्द्र और भारतेन्दु हरीश चन्द्र संस्था की ओर से आयोजित चर्चा में उन्होने सिनेमा के जाने अनजाने पहलुओं को छूने की कोशिश की।
उन्होने कहा कि मुझे उस समय बहुत खुशी होती है जब मैं सुनता हूं कि जयपुर ,भोपाल या लखनऊ का कोई सिनेमा प्रेमी संसाधन जुटा कर अपनी किस्म की फिल्म बना रहा है। सिनेमा के विकास के लिए उसका मुंबई से बाहर निकलना जरूरी है। साथ ही उन्होने यह बात भी कही कि महाराष्ट्र में जहां मराठी फिल्म बनाने वाले फिल्मकारों को 15 से 60 लाख तक की सब्सिडी दी जाती है मगर राजस्थान जैसे प्रदेश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
वह कहते हैं कि मुझे आशा है कि भविष्य का सिनेमा मुंबई का नहीं होगा। आज के सिनेमा की दशा और दिशा के प्रति आशान्वित अजय ने कहा कि सबसे अच्छी बात जो आज के सिनेमा में देखने को मिल रही है वह यह कि पिछले पांच सालों में जो भी निर्देशक आए हें वह मुंबई से बाहर के हैं। उन्होने इंडस्ट्री के पुराने दिग्गजों पर अपना कलात्मक क्षमता से इतना दबाव बना दिया कि ‘कभी खुशी कभी गम’ बनाने वाले ‘माय नेम इज खान’ जैसी फिल्में बनाने लगे।
बकौल अजय हिंदी सिनेमा कभी नहीं मर सकता। अब तो सिनेमा बनाना आसान हो गया है और यही वजह है कि अब मोबाइल पर भी फिल्में बनाई जा रही हैं। डिजीटल कैमरे पर बनी फिल्में ऑल इंडिया रिलीज हो रही हैं।

सिनेमा एक प्रोडक्ट
सिनेमा एक प्रोडक्ट है जो हिंदी में बनाया तो जाता है मगर यह जरूरी नहीं कि उसको देखने वाले भी हिंदी भाषी ही हों। वैसे भी अब फिल्मकारों का फोकस इस पर नहीं है कि उनकी फिल्म को कितने लोग देख रहे हैं बल्कि उनका ध्यान इस बात पर रहता है कि जितने लोगों ने देखा उनसे कितना पैसा आया।
सिनेमा के बदलते मानदंडों पर बात करते हुए उन्होने कहा कि ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म ने 400 करोड़ का मुनाफा कमाया। अब फिल्मकारों का लक्ष्य उस आकंड़े को छूना है। अब सिनेमा अमीरों के लिए बन रहा है। किसी को इससे सरोकार नहीं है कि जो सिंगल स्क्रीन में सिनेमा देखता था अब वह कहां सिनेमा देखेगा। सबकी निगाहें अमीर दर्शकों पर है और उन्हीं को फोकस कर फिल्में बनाई जा रही हैं।


अभाव में प्रयोग होते हैं
उन्होने कहा कि जिन सफल प्रयोगवादी फिल्मों की चर्चा की जाती है उसके पीछे कारण यह रहता है कि अभावों में प्रयोग होते हैं और गरीब लोग ज्यादा प्रखर होते हैं। यही वजह है कि वह लोग कम बजट में भी बेहतर सिनेमा बनाने में कामयाब रहते हैं...

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एक और सूचना, जो इस ख़बर में शामिल नहीं है...
अजय ब्रह्मात्मज से बातचीत की युवा ब्लॉगर, फिल्मकार और शिल्पकार निधि सक्सेना व जयपुर के पत्रकार रामकुमार ने। कार्यक्रम का संचालन डेली न्यूज़ के सप्लिमेंट हमलोग के प्रभारी डॉ. दुष्यंत ने किया.

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वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज से जयपुर के जवाहर कला केंद्र में आत्मीय बातचीत का ब्योरा....


सौजन्य से...दैनिक भास्कर, जयपुर

भविष्य का सिनेमा मुंबई का नहीं



जयपुर. हिंदी सिनेमा केवल मुंबई की बपौती नहीं है और मैं मानता हूं कि हर प्रदेश का अपना सिनेमा होना चाहिए। यह सिनेमा के विकास के लिए जरूरी है। यह बात जाने माने फिल्म पत्रकार अजय बrात्मज ने ‘समय, समाज और सिनेमा’ विषय पर हुए संवाद में कही। जेकेके के कृष्णायान सभागार में शनिवार को जवाहर कला केन्द्र और भारतेन्दु हरीश चन्द्र संस्था की ओर से आयोजित चर्चा में उन्होने सिनेमा के जाने अनजाने पहलुओं को छूने की कोशिश की।
उन्होने कहा कि मुझे उस समय बहुत खुशी होती है जब मैं सुनता हूं कि जयपुर ,भोपाल या लखनऊ का कोई सिनेमा प्रेमी संसाधन जुटा कर अपनी किस्म की फिल्म बना रहा है। सिनेमा के विकास के लिए उसका मुंबई से बाहर निकलना जरूरी है। साथ ही उन्होने यह बात भी कही कि महाराष्ट्र में जहां मराठी फिल्म बनाने वाले फिल्मकारों को 15 से 60 लाख तक की सब्सिडी दी जाती है मगर राजस्थान जैसे प्रदेश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
वह कहते हैं कि मुझे आशा है कि भविष्य का सिनेमा मुंबई का नहीं होगा। आज के सिनेमा की दशा और दिशा के प्रति आशान्वित अजय ने कहा कि सबसे अच्छी बात जो आज के सिनेमा में देखने को मिल रही है वह यह कि पिछले पांच सालों में जो भी निर्देशक आए हें वह मुंबई से बाहर के हैं। उन्होने इंडस्ट्री के पुराने दिग्गजों पर अपना कलात्मक क्षमता से इतना दबाव बना दिया कि ‘कभी खुशी कभी गम’ बनाने वाले ‘माय नेम इज खान’ जैसी फिल्में बनाने लगे।
बकौल अजय हिंदी सिनेमा कभी नहीं मर सकता। अब तो सिनेमा बनाना आसान हो गया है और यही वजह है कि अब मोबाइल पर भी फिल्में बनाई जा रही हैं। डिजीटल कैमरे पर बनी फिल्में ऑल इंडिया रिलीज हो रही हैं।

सिनेमा एक प्रोडक्ट
सिनेमा एक प्रोडक्ट है जो हिंदी में बनाया तो जाता है मगर यह जरूरी नहीं कि उसको देखने वाले भी हिंदी भाषी ही हों। वैसे भी अब फिल्मकारों का फोकस इस पर नहीं है कि उनकी फिल्म को कितने लोग देख रहे हैं बल्कि उनका ध्यान इस बात पर रहता है कि जितने लोगों ने देखा उनसे कितना पैसा आया।
सिनेमा के बदलते मानदंडों पर बात करते हुए उन्होने कहा कि ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म ने 400 करोड़ का मुनाफा कमाया। अब फिल्मकारों का लक्ष्य उस आकंड़े को छूना है। अब सिनेमा अमीरों के लिए बन रहा है। किसी को इससे सरोकार नहीं है कि जो सिंगल स्क्रीन में सिनेमा देखता था अब वह कहां सिनेमा देखेगा। सबकी निगाहें अमीर दर्शकों पर है और उन्हीं को फोकस कर फिल्में बनाई जा रही हैं।


अभाव में प्रयोग होते हैं
उन्होने कहा कि जिन सफल प्रयोगवादी फिल्मों की चर्चा की जाती है उसके पीछे कारण यह रहता है कि अभावों में प्रयोग होते हैं और गरीब लोग ज्यादा प्रखर होते हैं। यही वजह है कि वह लोग कम बजट में भी बेहतर सिनेमा बनाने में कामयाब रहते हैं...

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एक और सूचना, जो इस ख़बर में शामिल नहीं है...
अजय ब्रह्मात्मज से बातचीत की युवा ब्लॉगर, फिल्मकार और शिल्पकार निधि सक्सेना व जयपुर के पत्रकार रामकुमार ने। कार्यक्रम का संचालन डेली न्यूज़ के सप्लिमेंट हमलोग के प्रभारी डॉ. दुष्यंत ने किया.

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वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज से जयपुर के जवाहर कला केंद्र में आत्मीय बातचीत का ब्योरा....


सौजन्य से...दैनिक भास्कर, जयपुर

Saturday, April 24, 2010

फिल्‍म समीक्षा : सिटी आफ गोल्‍ड

-अजय ब्रह्मात्‍मज

फीलगुड और चमक-दमक से भरी फिल्मों के इस दौर में धूसर पोस्टर पर भेडि़यों सी चमकती आंखों के कुछ चेहरे चौंकाते हैं। हिंदी फिल्मों के पोस्टर पर तो अमूमन किसी स्टार का रोशन चेहरा होता है। सिटी आफ गोल्ड हिंदी की प्रचलित फिल्म नहीं है। महेश मांजरेकर ने आज की मुंबई की कुछ परतों के नीचे जाकर झांका है। उन्होंने नौवें दशक के आरंभिक सालों में मुंबई के एक कराहते इलाके को पकड़ा है। यहां भूख, गरीबी, बीमारी और फटेहाली के बीच रिश्ते जिंदा हैं और जीवन पलता है। समाज की इन निचली गहराइयों पर विकास की होड़ में हम नजर नहीं डालते।

महेश मांजरेकर ने मुंबई के मिलों की तालाबंदी के असर को दिखाने के लिए एक चाल चुना है। इस चाल के दड़बेनुमा कमरों में मिल मजदूरों का परिवार रहता है। सिटी आफ गोल्ड की कहानी धुरी परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। इस परिवार का एक बेटा बाबा ही कहानी सुनाता है। बाबा के साथ अतीत के पन्ने पलटने पर हम धुरी परिवार की जद्दोजहद से परिचित होते हैं। लेखक जयंत पवार और निर्देशक महेश मांजरेकर ने सोच-समझ कर सभी चरित्रों को गढ़ा है। उनका उद्देश्य मुख्य रूप से मिलों की हड़ताल के बाद इन परिवारों की दुर्दशा, भटकाव और बिखरते सपनों को चित्रित करना रहा है।

मिल मालिकों के प्रतिनिधि के तौर पर महेन्द्र हैं। सिटी आफ गोल्ड टकराव से अधिक बिखराव, भटकाव और टूटन पर फोकस करती है। धुरी परिवार की चार संतानों (तीन बेटे और एक बेटी) के चुने भिन्न राहों के जरिए हम उस समय के माहौल को अच्छी तरह समझ पाते हैं।

वास्तव की जोरदार दस्तक से आए निर्देशक महेश मांजरेकर हिंदी फिल्मों की चकाचौंध में अपनी वास्तविकता खो बैठे थे। एक अंतराल के बाद वे अपनी विशेषताओं के साथ इस फिल्म में नजर आते हैं। हालांकि सिटी आफ गोल्ड में वास्तव की शैली का प्रभाव है, लेकिन यही महेश मांजरेकर का स्वाभाविक सिग्नेचर है। महेश मांजरेकर ने इस फिल्म में सच्चाई की सतह को अधिक खुरचने की कोशिश नहीं की है। वे मिलों की हड़ताल और मिल मजदूरों के उजड़ने के पीछे की राजनीति में नहीं जाते। फिर भी यह संकेत देने से नहीं चूकते कि मिल मालिकों की लिप्सा और पालिटिशियन के स्वार्थ ने ही मुंबई के उन इलाकों को पहले वीरान किया, जहां आज ऊंची इमारतें, शापिंग माल और मल्टीपलेक्स खड़े हैं। आज की चमकती मुंबई की नींव में गहरा अंधेरा है। इस गहरे अंधेरे के ही धूसर चरित्र सिटी आफ गोल्ड में नजर आते हैं।

शशांक शेंडे, सीमा विश्वास, सचिन खेडेकर जैसे धुरंधरों के साथ विनीत कुमार, करण पटेल, सिद्धार्थ जाधव और वीणा जामकर जैसे अपेक्षाकृत नए कलाकारों का सहज अभिनय फिल्म का आकर्षण है। इन चारों ने अपने किरदारों को जीवंत और प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है। खास कर विनीत और करण उम्मीद जगाते हैं। सिटी आफ गोल्ड ने हिंदी फिल्मों को कुछ नए भरोसेमंद चेहरे दिए हैं।

*** तीन स्टार


Thursday, April 22, 2010

बढ़ेंगी सेंसर सर्टिफिकेट की श्रेणियां,भाषा,नग्‍नता,हिंसा और विषय होंगे आधार

-अजय ब्रह्मात्‍मज 

दर्शकों की अभिरुचि की वजह से तेजी से बदल रहे भारतीय सिनेमा के मद्देनजर देश के सिनेमैटोग्राफ एक्ट में आवश्यक बदलाव लाने की जरूरत सभी महसूस कर रहे हैं। इसी दबाव में लंबे समय से अटके इस एक्ट में आवश्यक बदलाव के लिए इस बार सिनेमैटोग्राफ बिल पेश किया जा रहा है। बिल में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की कार्यप्रणाली और गठन में भी कुछ सुधार किए जाएंगे। आम दर्शकों के हित में सबसे जरूरी सुधार सेंसर की श्रेणियों को बढ़ा कर किया जा रहा है। पिछले कुछ सालों से फिल्मकार और दर्शक महसूस कर रहे थे कि सेंसर बोर्ड की तीन प्रचलित श्रेणियां भारतीय फिल्मों के वर्गीकरण के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अभी तक भारत में यू (यूनिवर्सल- सभी के योग्य), यूए और ए श्रेणियों के अंतर्गत ही फिल्में श्रेणीकृत की जाती हैं। कई निर्देशक सालो पुरानी इस परिपाटी को आज के संदर्भ में अप्रासंगिक और अर्थहीन मानते हैं। उनकी नजर में हमें फिल्मों के श्रेणीकरण में विदेशों के अनुभव से लाभ उठाकर इनकी संख्या बढ़ानी चाहिए ताकि किशोर उम्र के दर्शकों के देखने योग्य फिल्मों का स्पष्ट वर्गीकरण हो सके।

आम दर्शक नहीं जानते कि फिल्मों के प्रमाणन की श्रेणियां कैसे तय की जाती हैं। आम धारणा है कि अगर नग्न और अश्लील दृश्य हों तो फिल्मों को ए सर्टिफिकेट दे दिया जाता है। यह सच होते हुए भी पूरा सच नहीं है। दुनिया के हर देश में सेंसर सर्टिफिकेट मुख्य रूप से भाषा, हिंसा, नग्नता और विषय के आधार पर दिए जाते हैं। माना जाता है कि दर्शकों के उम्र और उनकी ग्राह्य शक्ति को ध्यान में रख कर ये श्रेणियां बनाई जाती हैं। अभी तक भारतीय फिल्में यू, यूए और ए प्रमाणन के साथ ही रिलीज की जाती हैं। यूए एक सामान्य श्रेणी बन गई है, जिसमें उम्र की कोई सीमा स्पष्ट नहीं की गई है। नए बिल में यूए 12प्लस और 14 प्लस दो श्रेणियां सुनिश्चित की जा रही हैं। इसके अलावा पहले से मौजूद एस (स्पेशल) कैटेगरी को सख्ती से लागू किया जाएगा। इस श्रेणी में स्पेशल फिल्में होती हैं, जो विशेष समूह, समुदाय और वर्ग के लिए होती हैं। इस श्रेणी में ज्यादातर गैरफीचर फिल्में ही होती हैं। फिल्म निर्माताओं और समाजशास्त्रियों की राय है कि भारतीय फिल्मों में नया श्रेणीकरण आवश्यक है। लेकिन थिएटरों में प्रवेश कर रहे दर्शकों पर सख्त नजर रखी जाना जरूरी है, ताकि दर्शक श्रेणियों और नियमों का उल्लंघन न करें। देखा जाता है कि छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन थिएटरों में किशोर उम्र के दर्शक आसानी से एडल्ट फिल्में देख आते हैं। प्राय: कालेज और हाईस्कूल की ऊंची जमात के बच्चे नियमों की परवाह नहीं करते। थिएटर के कर्मचारी और प्रशासन भी उन पर ध्यान नहीं देते। उल्लेखनीय है कि ए श्रेणी की फिल्में जब टीवी पर प्रसारित की जाती हैं तो उनमें से कुछ बोल्ड, नग्न और कठोर भाषा के दृश्य हटा दिए जाते हैं। माना जाता है कि टीवी पर आ रही फिल्में परिवार के सभी सदस्य देखते हैं।

ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी आदि देशों में अलग-अलग नामों से कम से कम पांच-छह श्रेणियां सुनिश्चित हैं। एडल्ट और जनरल के बीच में पीजी (पैरेंटल गाइडेंस) की अनेक श्रेणियां रहती हैं। फ्रांस में 10, 12, 16, 18 की उम्रों के लिए अलग-अलग श्रेणियां हैं। ब्रिटेन में यह वर्गीकरण 12, 15 और 18 का है तो जर्मनी में 6, 12 और 16 का। तुर्की में 7, 11, 13, 16 और 18 की उम्र का खयाल रखते हुए श्रेणियां बनाई गई हैं। इंटरनेट यूजर्स को मालूम होना चाहिए कि यूट्यूब के वीडियो का भी श्रेणीकरण किया गया है। अगर आप गौर करें तो गफलत नहीं हो सकती। आपके घर में गलती से एडल्ट वीडियो बच्चे नहीं देख सकते। यूट्यूब एल (लैंग्वेज), एन (न्यूडिटी), एस (सेक्सुअल सिचुएशन) और वी (वायलेंस) की मात्रा के आधार पर प्लस जोड़ कर बता देता है कि आप जो वीडियो देखने जा रहे हैं, उसमें भाषा, नग्नता और हिंसा किस मात्रा में है।

देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर हम भारत सरकार की इस पहल पर संतोष कर सकते हैं, लेकिन हमें यह भी देखने की जरूरत है कि सेंसर बोर्ड के प्रमाणन के बाद फिल्म किसी प्रकार की आपत्ति का शिकार न हों। विभिन्न समुदाय, समूह, वर्ग और व्यक्ति सेंसर बोर्ड से ज्यादा ताकतवर न साबित हों। भारत सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि फिल्में सही ढंग से सेंसर हों और सेंसर की जा चुकी फिल्मों का निर्बाध प्रदर्शन हो।

Monday, April 19, 2010

रावण का पोस्‍टर


 रावण का पोस्‍टर देख कर आप की क्‍या राय बनती है ? दो-चार शब्‍दों में कुछ 

Sunday, April 18, 2010

जोखिम से मिलेगी जीत

-अजय ब्रह्मात्‍मज

मध्य प्रदेश, कश्मीर, महाराष्ट्र और केरल के दूर-दराज इलाकों में फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त इन हीरोइनों के पास न तो मुंबई के स्टूडियो का सुरक्षित माहौल है और न वे सारी सुविधाएं हैं, जिनकी उन्हें आदत पड़ चुकी है। सभी हर प्रकार से जोखिम के लिए तैयार हैं। ग्लैमर व‌र्ल्ड की चकाचौंध से दूर प्राकृतिक वातावरण में धूल-मिट्टी, हवा, जंगल और बगीचे में फिल्म की जरूरत के मुताबिक परिधान पहने इन हीरोइनों को देखकर एकबारगी यकीन नहीं होता कि अभी कुछ दिनों और घंटों पहले तक वे रोशनी में नहाती और कमर मटकाती हीरो के चारों ओर चक्कर लगा रही थीं।

साफ दिख रहा है कि हिंदी फिल्मों की कहानी बदल रही है और उसी के साथ बदल रही है फिल्मों में हीरोइनों की स्थिति और भूमिका। फार्मूलाबद्ध कामर्शियल सिनेमा में आयटम गर्ल और ग्लैमर डॉल की इमेज तक सीमित हिंदी फिल्मों की हीरोइनों के बारे में कहा जाता रहा है कि वे नाच-गाने के अलावा कुछ नहीं जानतीं। ऐसे पूर्वाग्रही भी चारों सीनों में क्रमश: कट्रीना, प्रियंका, दीपिका और ऐश्वर्या की मौजूदगी से महसूस करेंगे कि हीरोइनों ने कुछ नया करने की ठान ली है। कुछ भी कर गुजरने को तैयार गंभीर हीरो की तर्ज पर अब वे 'शी-हीरो' या मैरियम वेबस्टर डिक्शनरी का सहारा लें तो 'शीरो' बन रही हैं। उन्हें निर्देशकों का सहयोग मिल रहा है। उन पर भरोसा किया जा रहा है और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं लिखी जा रही हैं।

जी हाँ, इस साल आप हीरोइनों को गंभीर किस्म की विविध भूमिकाओं में देखेंगे। पिछले दिनों एक निर्देशक ने शिकायत की थी कि आज नरगिस, मधुबाला, मीना कुमारी, वहीदा रहमान और नूतन जैसी अभिनेत्रियां नहीं हैं, इसलिए फिल्मों में हीरोइनों के लिए ठोस भूमिकाएं नहीं लिखी जातीं। निश्चित ही उक्त निर्देशक राजनीति में कट्रीना, सात खून माफ में प्रियंका, खेले हम जी जान से में दीपिका और रावण में ऐश्वर्या को देखने के बाद अपनी राय बदलेंगे। इन चारों के साथ करीना कपूर, विद्या बालन, कोंकणा सेनशर्मा, लारा दत्ता और बिपाशा बसु भी कुछ नया और जोरदार करने के प्रयास में हैं। सभी को लगने लगा है कि अगर लंबी पारी खेलनी है और दर्शकों के बीच स्थायी जगह के साथ इतिहास में दर्ज होना है तो ठोस और यादगार भूमिकाएं करनी होंगी। देश के अनुभवी निर्देशकों का विश्वास जीतना होगा। अपनी क्षमता से उन्हें प्रेरित करना होगा कि वे हीरोइनों की दमदार भूमिका वाली कहानियां चुनें। फिल्म की शूटिंग में सुविधाओं और नखरों को भुलाकर हर किस्म का समर्थन और सहयोग देना होगा। पूर्ण समर्पण के बाद ही उन्हें प्रतिष्ठित हीरोइनों के समूह में शामिल किया जाएगा। निश्चित ही इसमें दर्शकों का भी योगदान है। उनकी स्वीकृति ने ही हीरोइनों को ऐसी भूमिकाओं को चुनने का साहस दिया है। यह एक प्रकार का जोखिम है, लेकिन इस जोखिम में जीत की संभावना है। आखिरकार सफलता संभावनाओं की जोखिम भरी छलांग ही तो है!

[सीन-1]

भोपाल में हजारों की भीड़ के बीच अपनी साड़ी के पल्लू से बेपरवाह दोनों हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन करती बिंदु सेक्सरिया को देख कर यकीन नहीं होता कि कट्रीना कैफ किसी रोल में इतने आत्मविश्वास से भरी नजर आ सकती हैं। अपने रूप, यौवन और मादक अदाओं से हिंदी फिल्मों के दर्शकों की फेवरिट बन चुकी कट्रीना को समीक्षकों ने अभी तक सीरियस भूमिकाओं के योग्य नहीं माना। विदेश से भारत आई इस अदाकारा ने प्रकाश झा की फिल्म राजनीति में एक जुझारू राजनीतिज्ञ की भूमिका में सभी को चौंका दिया है। माना जा रहा है कि इस फिल्म में कट्रीना अपने बारे में बनी सारी धारणाओं को तोड़ एक नई छवि के साथ उभरेंगी।

[सीन-2]

राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने और खतरों के खिलाड़ी के अगले सीजन की होस्ट की खबरों से सुर्खियों में छाई प्रियंका चोपड़ा ने ट्वीट किया कि वह विशाल भारद्वाज की फिल्म सात खून माफ की शूटिंग के लिए उत्तर भारत के एक अनजान शहर में जा रही हैं। उन्होंने शहर का नाम गुप्त रखा, लेकिन प्रशसकों ने अगले ही दिन बुरका पहन कर जाती प्रियंका चोपड़ा की तस्वीर ऑनलाइन कर फिल्म की लोकेशन और लुक जाहिर कर दी। वह काश्मीर के एक बाग में बुरका पहने नजर आई। ह्वाट्स योर राशि? में वह बारह रूपों में दिखी थीं तो सात खून माफ में उनके सामने नसीरूद्दीन शाह और इरफान खान समेत सात अभिनेता होंगे। उन सभी के साथ प्रियंका चोपड़ा को अपना दम-खम दिखाना पड़ेगा और यह साबित करना होगा कि वह किसी से कम नहीं हैं।

[सीन-3]

गोवा के करीब महाराष्ट्र के छोटे शहर सावंतवाड़ी में रात के तीन बजे हैं। खेत और बगीचों से आ रही झिंगुरों की आवाजें रात की खामोशी का संगीत सुना रही हैं। अंधेरी रात के इस सन्नाटे में सावंतवाड़ी के पास के गांव में पूरी हलचल है। लाइट, कैमरा, साउंड के बाद आशुतोष गोवारिकर के एक्शन कहते ही बंदूक दागने की 'धांय' सुनाई पड़ती है। मानीटर पर हम देखते हैं कि बंगाली स्टाइल में साड़ी पहने दीपिका पादुकोन और अभिषेक बच्चन खिड़कियों से बाहर झांक रहे हैं। यह आशुतोष गोवारिकर की फिल्म खेलें हम जी जान से का एक महत्वपूर्ण सीन है। आजादी की लड़ाई के दिनों में चिटगांव के विद्रोह पर आधारित इस फिल्म में दीपिका पादुकोन क्रांतिकारी कल्पना दत्ता की भूमिका निभा रही हैं।

[सीन-4]

शहरी सभ्यता से दूर केरल के जंगलों में ऐश्वर्या राय को डर है कि कहीं उनके शरीर से जोंक न चिपक जाए। इस खौफ के बावजूद वह पति अभिषेक बच्चन के साथ अस्थायी कैंप में डटी हुई हैं। आधुनिक सुविधाओं से वंचित ऐश्वर्या राय की एक ही चिंता है कि मणिरत्नम को उनका वांछित शॉट मिल जाए। हर सीन को हिंदी में शूट करने के बाद तमिल में शूट किया जा रहा है। डबल मेहनत हो रही है। फिर भी न चेहरे पर शिकन है और न जुबान पर उफ्फ। वह मणिरत्नम की फिल्म रावण में सीता की भूमिका निभा रही हैं। हिंदी और तमिल दोनों भाषाओं में बन रही इस फिल्म में वह कलात्मक चुनौतियों से जूझ रही हैं। कोशिश है कि दर्शकों को उर्जा से भरपूर उनकी भंगिमा दिखे।

[क्या सोचते हैं निर्देशक]

''दीपिका में एक ठहराव है। वह क्लासिकल ब्यूटी है। कल्पना का कैरेक्टर बहुत स्ट्रांग है और दीपिका इस कैरेक्टर को सही प्रभाव के साथ निभा रही है। हिंदी की कामर्शियल फिल्मों में हीरोइनें ज्यादातर गानों और रोमांस के लिए रहती हैं। मेरी कोशिश रहती है कि ऐसा न हो। मैं कहानी लिखते समय हीरोइनों की ठोस मौजूदगी सुनिश्चित करता हूं। फिल्मों में हीरोइनों के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करना चाहिए।''

[आशुतोष गोवारिकर]

''पहली फिल्म इरूवर से रावण तक में ऐश्वर्या राय के कमिटमेंट में फर्क नहीं आया है। अभी वह ज्यादा रिफाइंड और मैच्योर हो गई हैं। उम्मीद करता हूं कि वह इसी समर्पण के साथ आगे भी काम करती रहेंगी।''

[मणिरत्नम]

''नयी उम्र की हीरोइनों में प्रियंका चोपड़ा जैसी विविधता कम है। कमीने में उन्होंने मराठी लड़की की भूमिका को जीवंत किया। सात खून माफ में उनकी भूमिका अधिक चुनौतीपूर्ण है। अच्छी बात है कि वह अपनी जिम्मेदारियों को समझती हैं और पूरा सहयोग देती हैं। उन्हें सेट से जाने की जल्दबाजी नहीं रहती। फिल्म के लिए आवश्यक वर्कशॉप में वह सभी के साथ भाग लेती हैं। मैंने हमेशा उन्हें एक हीरो की तरह ही पाया है।''

[विशाल भारद्वाज]

''कट्रीना जैसी समर्पित, विनम्र और लगनशील अभिनेत्री हाल-फिलहाल कोई और नहीं दिखी। वह अपना काम करेक्ट और परफेक्ट करने की कोशिश में रहती हैं। एक दिन वह गलतफहमी में किसी और सीन की तैयारी कर आ गई थी, जबकि हमें शपथ ग्रहण का सीन करना था। कट्रीना ने माफी मांगी। पूरी शपथ को याद किया और अगले दिन एक टेक में शूट किया। मुझे कभी कट्रीना की वजह से दूसरा टेक नहीं लेना पड़ा।''

[प्रकाश झा]

Saturday, April 17, 2010

फिल्म समीक्षा :फूँक 2

-अजय ब्रह्मात्मज
दावा था कि फूंक से ज्यादा खौफनाक होगी फूंक-2, लेकिन इस फिल्म के खौफनाक दृश्यों में हंसी आती रही। खासकर हर डरावने दृश्य की तैयारी में साउंड इफेक्ट के चरम पर पहुंचने के बाद सिहरन के बजाए गुदगुदी लगती है। कह सकते हैं कि राम गोपाल वर्मा से दोहरी चूक हो गई है। पहली चूक तो सिक्वल लाने की है और दूसरी चूक खौफ पैदा न कर पाने की है।
इस फिल्म के बारे में रामू कहते रहे हैं कि मिलिंद का आइडिया उन्हें इतना जोरदार लगा कि उन्होंने निर्देशन की जिम्मेदारी भी उन्हें सौंप दी। अफसोस की बात है कि मिलिंद अपने आइडिया को पर्दे पर नहीं उतार पाए। रामू ने भी गौर नहीं किया कि फूंक-2 हॉरर फिल्म है या हॉरर के नाम पर कामेडी। किसी ने सही कहा कि जैसी कामेडी फिल्म में लाफ्टर ट्रैक चलता है, पाश्‌र्र्व से हंसी सुनाई पड़ती रहती है और हम भी हंसने लगते हैं। वैसे ही अब हॉरर फिल्मों में हॉरर ट्रैक चलना चाहिए। साथ में चीख-चित्कार हो तो शायद डर भी लगने लगे।
फूंक-2 में खौफ नहीं है। आत्मा और मनुष्य केबीच का कोई संघर्ष नहीं है, इसलिए रोमांच नहीं होता। फिल्म में कुछ हत्याएं होती हैं, लेकिन उन हत्याओं से भी डर नहीं बढ़ता। पर्दे पर खून की बूंदाबूंदी होती है, फिर भी रगों में खून की गति तेज नहीं होती। फूंक-2 की आत्मा कुछ दृश्यों में स्थिर मुद्रा में आड़ी-तिरछी, उल्टी-सीधी खड़ी, टंगी, बैठी नजर आती है। उसकी निष्क्रियता संभावित खौफ को भी मार देती है। वक्त आ गया है कि रामू और दूसरे निर्देशक हारर फिल्मों की कहानियों पर मेहनत करें। कहानी में घटनाएं रहेंगी, तभी तकनीक से उन्हें खौफनाक बनाया जा सकेगा।
* एक स्टार

फिल्‍म समीक्षा : पाठशाला

हिंदी फिल्मों में शिक्षा, स्कूल, पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धति मुद्दा बने हुए हैं। 3 इडियट में राजकुमार हिरानी ने छात्रों पर पढ़ाई के बढ़ते दबाव को रोचक तरीके से उठाया था। अहमद खान ने पाठशाला में शिक्षा के व्यवसायीकरण का विषय चुना है। नेक इरादे के बावजूद पटकथा, अभिनय और निर्देशन की कमजोरियों की वजह से पाठशाला बेहद कमजोर फिल्म साबित होती है।

बढ़ती फीस, छात्रों को रियलिटी शो में भेजने की कोशिश, छात्रों के उपयोग की चीजों की ऊंची कीमत और मैनेजमेंट के सामने विवश प्रिंसिपल ़ ़ ़ अहमद खान ने शिक्षा के व्यवसायीकरण के परिचित और सतही पहलुओं को ही घटनाओं और दृश्यों के तौर पर पेश किया है। इस दबाव के बीच अंग्रेजी शिक्षक उदयावर और स्पोर्ट्स टीचर चौहान की पहलकदमी पर सारे टीचर एकजुट होते हैं ओर वे छात्रों को असहयोग के लिए तैयार कर लेते हैं। छोटा-मोटा ड्रामा होता है। मीडिया में खबर बनती है और मुद्दा सुलझ जाता है।

विषय की सतही समझ और कमजोर पटकथा फिल्म के महत्वपूर्ण विषय को भी लचर बना देती है। सारे कलाकारों ने बेमन से काम किया है। सभी कलाकारों के निकृष्ट परफार्मेस के लिए पाठशाला याद रखी जा सकती है। नाना पाटेकर, शाहिद कपूर, सुशांत सिंह और आयशा टाकिया सभी ढीले-ढाले और थके-थके दिखाई देते हैं। कहना चािहए कि उन सभी ने मिलकर अहमद खान के भ्रम को फिल्म का रूप दे दिया है। सिर्फ अहमद खान ही नहीं, वे सभी इस कमजोर फिल्म के हिस्से हैं।

* एक स्टार

Friday, April 16, 2010

दरअसल : हिंदी फिल्मों में बढ़ते इंग्लिश संवाद

-अजय बह्मात्‍मज  

हमारे समाज में इंग्लिश का चलन बढ़ा है और बढ़ता ही जा रहा है। हम अपनी रोजमर्रा की बातचीत में बेहिचक इंग्लिश व‌र्ड्स का इस्तेमाल करते हैं। अभी तो यह स्थिति हो गई है कि ठीक से हिंदी बोलो, तो लोगों को समझने में दिक्कत होने लगती है। इसी वजह से अखबार और चैनलों की भाषा बदल रही है। हिंदी वाले (लेखक और पत्रकार) लिखते समय भले ही हिंदी शब्दों का उपयोग करते हों, लेकिन उनकी बातचीत में अंग्रेजी के शब्द घुस चुके हैं। बोलते समय खुद को अच्छी तरह संप्रेषित करने के लिए हम अंग्रेजी शब्दों का सहारा लेते हैं। हालांकि देखा गया है कि दोबारा बोलने या सही संदर्भ और कंसर्न के साथ बोलने पर ठेठ हिंदी भी समझ में आती है, लेकिन हम सभी जल्दबाजी में हैं। कौन रिस्क ले और हमने मान लिया है कि कुछ जगहों पर अंग्रेजी ही बोलना चाहिए। फाइव स्टार होटल, एयरपोर्ट, ट्रेन में फ‌र्स्ट एसी, किसी भी प्रकार की इंक्वायरी आदि प्रसंगों में हम अचानक खुद को अंग्रेजी बोलते पाते हैं, जबकि हम चाहें तो हिंदी बोल सकते हैं और अपना काम करवा सकते हैं। कहीं न कहीं हिंदी के प्रति एक हीनभावना हम सभी के अंदर मजबूत होती जा रही है।

समाज में आ रहे इस भाषायी बदलाव को फिल्म के लेखकों और निर्देशकों ने समझ लिया है। उन्होंने अपने दर्शकों की सुविधा के लिए फिल्म की भाषा में बदलाव आरंभ कर दिया है। फिल्मों के शीर्षक से लेकर सूची तक में अंग्रेजी का उपयोग आम हो गया है। किसी को आपत्ति नहीं होती। फिल्मों के संवादों में अंग्रेजी का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। शहरी विषयों और शहरी किरदारों की वजह से लेखक और निर्देशकों को अंग्रेजी के उपयोग का मौका मिलता है। इधर आई अनेक फिल्मों में देखा गया कि लेखक-निर्देशक ने पूरे-पूरे संवाद अंग्रेजी में जाने दिए। पहले की फिल्मों में अंग्रेजी संवाद आते थे, तो कोई न कोई किरदार उसका आशय हिंदी में समझा देता था। अब इसकी जरूरत नहीं है। वैसे भी संवादों के दोहराव से दृश्य लंबे होते हैं। कुछ निर्माता अंग्रेजी संवादों की फिल्मों को इंटीरियर (छोटे शहरों और कस्बों) में रिलीज करते समय डब कर देते हैं। कुछ हिंदी सबटाइटिल दे देते हैं। निर्माता-निर्देशकों को अभी तक किसी ने नहीं बताया है कि इससे उनकी फिल्मों की दर्शकता में कितनी कमी आती है।

अगले महीने अनुराग बसु की फिल्म काइट्स रिलीज होगी। इस फिल्म में आधे से अधिक संवाद अंग्रेजी और स्पेनिश में हैं। पहले निर्माता राकेश रोशन ने उनके हिंदी अनुवाद की बात सोची थी, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि अभी इसकी जरूरत नहीं है। एक बातचीत में राकेश रोशन का तर्क था कि आजकल सभी अंग्रेजी बोलते और समझते हैं। खासकर मेट्रो और मल्टीप्लेक्स के दर्शक के बात-व्यवहार की पहली भाषा अंग्रेजी बनती जा रही है। इस स्थिति में मुझे जरूरी नहीं लगता कि इंग्लिश डायलॉग को फिर से हिंदी में बताया जाए। देसी दर्शकों की सुविधा के लिए अवश्य अंग्रेजी संवाद के हिंदी सबटाइटिल दिए जाएंगे। काइट्स अगर सफल रही, तो निश्चित ही हिंदी फिल्मों की स्क्रिप्ट और संवाद की भाषा में बड़ा परिवर्तन आएगा। इस संभावित बदलाव से अब बच नहीं सकते।

चाहें तो हिंदी प्रेमी इस बदलाव पर रो सकते हैं, खीझ सकते हैं और हिंदी फिल्म के निर्माता-निर्देशकों को गालियां दे सकते हैं। किंतु ऐसा करते समय वे अपने ही समाज को नजरअंदाज कर रहे होंगे। उन्हें खुद अपने घर-परिवार और पास-पड़ोस में मुआयना करना चाहिए कि किस प्रकार इंग्लिश व‌र्ड्स हिंदी शब्दों को हमारी रोजमर्रा की बातचीत से धकिया कर निकाल रहे हैं। सिनेमा शून्य में थोड़े ही बनता है। वह हमारे समाज से ही परिचालित होता है।

Thursday, April 15, 2010

हिंदी टाकीज द्वितीय:सिनेमा के कई रंग-ओम थानवी

यह संस्मरण चवन्नी ने मोहल्ला लाइव से लिया है . ओम थानवी से अनुमति लेने के बाद इसे यहाँ प्रकाशित करते हुए अपार ख़ुशी हो रही है.ओम जी ने इसे चवन्नी के लिए नहीं लिखा,लेकिन यह हिंदी टाकीज सीरिज़ के लिए उपयुक्त है।


भाषाई विविधता और वैचारिक असहमतियों का सम्‍मान करने वाले विलक्षण पत्रकार। पहले रंगकर्मी। राजस्‍थान पत्रिका से पत्रकारीय करियर की शुरुआत। वहां से प्रभाष जी उन्‍हें जनसत्ता, चंडीगढ़ संस्‍करण में स्‍थानीय संपादक बना कर ले गये। फिलहाल जनसत्ता समूह के कार्यकारी संपादक। उनसे om.thanvi@ expressindia.com पर संपर्क किया जा सकता है।

हमारे कस्बे फलोदी में तब एक सिनेमा हॉल था। अब दो हैं। पर पहले जो था उसमें सिनेमा तो था, हॉल नहीं था। यानी चारदीवारी थी, छत नहीं थी। सर्दी हो या गरमी, नीले गगन के तले सिनेमा का अजब प्यार पलता था। और तो और, ‘हॉल’ में कुर्सियां भी नहीं थीं। मुक्ताकाशी था, इसलिए फिल्में दिन ढलने के बाद ही देखी-दिखायी जा सकती थीं।
उस सिनेमाघर का नाम था – श्रीलटियाल टाकीज। लटियाल देवी का नाम है, इसलिए ‘श्री’ उपसर्ग। ऐसे ही बीकानेर में घर के पास जो सिनेमाघर था, उसका नाम था श्रीगंगा थिएटर। किसी महाराजा के नाम पर कोई चीज – इमारत हो या शहर – बगैर उपसर्ग के कैसे तामीर हो सकती है! लोग तो देवता के नाम पर इंसान के नामकरण में भी श्री जड़ना नहीं भूलते थे : श्रीनारायण बगरहट्टा!
बीकानेर में आधिकारिक तौर पर तब तीन सिनेमाघर थे। चौथा हमने अपने स्रोतों से तलाश लिया था। वह शहर से बाहर फौजी छावनी में था। श्रीकरणी थिएटर। करणी माता बीकानेर की कुलदेवी हैं। निशानेबाज के रूप में मशहूर हुए महाराजा करणी सिंह का नाम उसी देवी के नाम पर रखा गया था।
पर श्रीकरणी थिएटर केवल नाम में शाही था। वह दरअसल फलोदी के श्रीलटियाल टाकीज का सहोदर था। जबकि श्रीगंगा थिएटर रियासत के दौर की निशानी था। भव्य और आरामदेह। वह रंग प्रदर्शनों के लिए बना ‘थिएटर’ था, ‘टाकीज’ की शक्ल उसने बोलती फिल्मों के आविष्कार के कई साल बाद अख्तियार की। पर हमें श्रीकरणी थिएटर ज्यादा रास आता था। साठ पैसे के टिकट के मुकाबले वहां टिकट सिर्फ बीस पैसे था। दूसरे, जान-पहचान के चेहरे भी वहां नहीं होते थे, जिनसे आंख चुराएं।
उस दौर के सिनेमा के कई रंग बरबस याद आते हैं। जैसे श्रीलटियाल टाकीज में पहले बैठे-बैठे, फिर फर्श पर पसर कर फिल्म देखना। या श्रीगंगा थिएटर में किस्तों में फिल्म देखना। किस्तों में यों, कि आधी फिल्म आज, आधी कल! बच्चों का फिल्म देखना तब कोई सुरुचिपूर्ण काम नहीं समझा जाता था। पर पिता जी खुद अच्छी फिल्म देखने को उकसाते थे। पैसा देते थे। ‘जागते रहो’, ‘आशीर्वाद’ जैसी फिल्में सुझाते थे। या चार्ली चैपलिन, लारेल-हार्डी या आयवरी-मर्चेंट की ‘द गुरु’। विदेशी फिल्में इतवार को सुबह दस बजे के शो में ही चलती थीं। हिंदी फिल्मों को देखते वे छोटी होती थीं।
पर हमें शौक था रोज का। ज्यादा मजा ‘फूल और पत्थर’ (शांति, तू नहीं जानती, दुनिया कितनी जालिम है!), या ‘मेरे हुजूर’ (कौनसे ऐसे शहर में कौन सी ऐसी फिरदौस है, जिसे हम नहीं जानते!) में था। या ‘वक्त’ और ‘पाकीजा’, जिनके संवाद फिल्म चलने से पहले लोगों की जुबान पर होते थे। या दारा सिंह – रंधावा भाइयों की फिल्में, जिनमें फिल्म का कोई तत्त्व शायद ही रहता होगा।
इनमें अधिकांश फिल्में किस्तों में देखीं। किस्तों में इसलिए नहीं कि फिल्में लंबी होती थीं। दरअसल फिल्म देखते थे स्कूल से नागा कर। फिल्म खत्म होती, तब तक पीछे स्कूल की छुट्टी हो चुकी होती थी। देर से घर पहुंच कर रोज कोई सफाई दें, उससे बेहतर उपाय यह था कि आधी फिल्म देखकर वक्त पर घर पहुंच जाएं। अगले रोज स्कूल से घर लौटें और किसी बहाने बाहर निकल कर मध्यांतर के बाद की बाकी फिल्म देख आएं!
आप कहेंगे, यह कैसे होगा। मध्यांतर में फिल्म छोड़ सकते हैं, पर मध्यांतर के बाद भला किस सीट पर बैठेंगे! तो जनाब, किस्तों में फिल्म देखने वाला बीकानेर शहर में मैं अकेला नहीं था! ज्यादा नहीं, पर सिनेमा को समर्पित ढेर शौकीन थे। उन्हीं में हर रोज कुछ ‘हाफ टिकट’ यानी ‘इंटरवल’ बेचने वाले रहते तो कुछ खरीदने वाले। झूठ न समझें, एकाध बार तो यह भी किया कि मध्यांतर के बाद की फिल्म पहले देखी, मध्यांतर से पहले की बाद में!
मगर हम ही नहीं थे। जो उम्र में बड़े थे और कमाते थे, वे फिल्म पर खर्च का बाकायदा बजट रखते थे। एकाधिक बार फिल्म देखने वाले तो बेशुमार थे। कुछ एक ही फिल्म को आधा दर्जन दफा, या इससे भी ज्यादा देखने के लिए बदनाम थे। मेरे एक मामा ने ‘दो रास्ते’ बीस बार देखी थी।
लगातार फिल्में देखने वालों में नंदकिशोर आचार्य जैसे भले और रचनाधर्मी लोग भी थे। नवरात्र के श्रद्धालु जैसे वक्फे भर के लिए मांस-मदिरा छोड़ देते हैं, शहर के छात्र परीक्षा के दिनों में संजीदा होकर सिनेमाघरों से मुंह मोड़ लेते। पर आखिरी परीक्षा खत्म होने के बाद सीधे सिनेमाघर पहुंचते। रंगकर्मी और कथाकार वागीश कुमार सिंह सुबह आखिरी परीक्षा देने के बाद दिन में बाकी बचे तीनों शो देख आते थे। फिल्मों के कुछ रसिया ऐसे भी थे जो एक शो देखकर निकलते, दूसरे दरवाजे से अगले शो के लिए दाखिल हो जाते। अक्सर उसी फिल्म के लिए।
नयी फिल्में तब भी शुक्रवार के ‘शुभ दिन’ शुरू होती थीं। धाकड़ फिल्म हो तो पहला शो सुबह छह बजे शुरू होता। हम ‘पढ़ने वाले’ बच्चे-किशोरों का छह बजे के शो के लिए निकलना नामुमकिन था। उन वीरों को हम ईर्ष्या से देखते थे, जो हर कीमत पर पहला शो देख आते। उनका कौल था, बस पहला शो, वरना यह फिल्म कभी न देखूंगा। ऐसे जुनूनी सिनेमा प्रेमी, सुनते थे, रात सिनेमा की खिड़की के बाहर ही कहीं सो रहते हैं। एहतियातन वे अपनी हवाई चप्पल खिड़की के सामने बने जंगले में रख देते। सुबह पांच बजे, खिड़की में आहट हो उससे पहले, ऐसी चप्पलों की छोटी-मोटी कतार लग जाती थी। शहर के लोग निहायत शरीफ थे। कभी नहीं सुना कि बाद में आने वाले ने किसी चप्पल को फांद लिया हो। हां, खिड़की खुलने के बाद शराफत की गारंटी खत्म हो जाती। चप्पल पांव में हों तो ठीक, वरना टिकट गया और चप्पल भी!
लंबी फिल्में तब ज्यादा पसंद की जाती थीं। फिल्म डिवीजन की न्यूजरील के खत्म होने के बाद फिल्म बोर्ड का प्रमाण-पत्र परदे पर आते ही पूरे हॉल में एक हिस्स की गूंज उठती। असल में लगभग हर दर्शक फिल्म की ‘रीलों’ की संख्या पढ़ते हुए उसका उच्चारण भी करता था।
एक और याद, जो शायद अजीब लगे। सिनेमाघर के गलियारे में हम लोग हॉल के दरवाजे पर कान सटा कर फिल्म को सिर्फ सुनते थे। इसलिए कि एक बार देखी फिल्म पर दुबारा पैसा खर्च करने की ताब न थी, तो संवाद-संगीत सुनने भर से काम चला लेते थे। शायद मेरे जैसे फिल्म प्रेमियों (!) के लिए ही एचएमवी ने ‘मुगले-आजम’ और पॉलीडोर ने ‘शोले’ के संवादों की एलपी तक निकाल दीं। फिल्म को देखें ही नहीं, सुनें भी!
तब हर फिल्म के गानों के रेकार्ड निकलते थे। बाद में कैसेट आये। अब सीडी-डीवीडी के जमाने में पूरी फिल्म मिल जाती है, तो केवल गानों की क्या जरूरत। नये बाजार के सामने फिल्मी गानों का बाजार भी कुछ सिमट गया है। लेकिन विदेशों में आज भी बहुत-सी फिल्मों का संगीत अलग से बिकता है। गाने तो वहां की फिल्मों में आम तौर पर होते नहीं, पर दृश्यों के साथ चलते संगीत का अपना वजन होता है।
कीसलोव्स्की की ‘थ्री कलर्स’ त्रयी या काकोयानिस की ‘जोरबा द ग्रीक’ क्लासिक होते हुए भी बार-बार कब देख सकते हैं। लेकिन इन फिल्मों के संगीत की सीडी मैंने दर्जनों बार सुनी होगी। ऐसा संगीत यों तो दृश्य में प्रभाव पैदा करने का सहारा होता है, लेकिन फिल्म की स्थितियों के मुताबिक तैयार की गयी रचनाएं अलग से सुनने पर फिल्म के दृश्य की याद ही नहीं दिलातीं, कभी अलग रचना का सुख भी देती हैं।
तो हॉल के बाहर खड़े होकर भी फिल्म देखने का सुख हम अनुभव कर सकते थे। जो फिल्में न देख सकें, उनके चित्र (‘पोस्टर’) देखकर खुश हो लेते। नादानी कहिए या दीवानगी, फिल्मगीरी के ऐसे किस्से हजार होंगे! शायद ऐसे प्रतिबद्ध दर्शकों के चलते ही देश में फिल्में हफ्तों-महीनों नहीं, कभी-कभी बरस-दो बरस चल जाती थीं। क्या आज सिनेमा के प्रति दीवानगी कुछ कम नहीं हो गयी है? क्या ऐसी फिल्में नहीं आतीं जिनसे समाज अपने को जोड़ सके? या सिनेमा अब मनोरंजन का अहम साधन नहीं रहा?
ऐसा लगता तो नहीं। बीच में जरूर सिनेमा के बुरे दिन आये। टीवी की ‘क्रांति’ ने सिनेमा को पीछे ढकेल दिया। सिनेमाघर टूट-बिखर कर मॉल या शॉपिंग सेंटरों में बदल गये। लेकिन इन्हीं बाजारों में – कहते हैं – मल्टीप्लेक्स के चलन ने डूबते फिल्म उद्योग को फिर पटरी पर ला खड़ा किया है। क्या सचमुच?
आजकल ज्यादा फिल्में मैं घर पर देखता हूं। इसमें फिल्म का चुनाव और समय की सुविधा का तालमेल रहता है। फिर भी सिनेमा हॉल में एक जमात के बीच फिल्म देखने का अनुभव बिलकुल अलग होता है। पर फिल्म का चुनाव वहां सीमा में होगा। अपनी पसंद की फिल्म आप वहां नहीं चलवा सकते!
बहरहाल, पिछले दिनों मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में जाकर सात फिल्में देखीं।
एक मित्र का कहना है कि मैं विदेशी फिल्मों से आक्रांत रहता हूं। फ्रांसीसी, इतालवी, जर्मन, स्पानी, ईरानी, तुर्की। हिंदी फिल्मों को हिकारत से देखता हूं। जबकि हिंदी फिल्में अंतरराष्ट्रीय स्तर को छूने लगी हैं। ऑस्कर नामित फिल्मों से होड़ लेती हैं। उन्होंने जब अमिताभ बच्चन की ‘ब्लैक’ की तारीफ में कसीदे पढ़े तो फौरन ‘चाणक्य’ सिनेमाघर को मुंह किया। निराश हुआ। अमिताभ की अतिनाटकीयता से वाकिफ होते हुए भी जोखिम ली और पछताया। वास्तविकता यह है कि हिंदी फिल्मों में कथा, पटकथा, संगीत, छायाकारी आदि के मामले में विशुद्ध बाजारू रवैया रहता है। सिनेमाघर में हिंदी फिल्म का संगीत इस तरह सिर पर चढ़ कर बजता है जैसे सिर फोड़ने पर आमादा हो।
फिर भी कभी-कभी खबर रखनी चाहिए कि क्या कुछ चल रहा है। इस बार पहले ‘कमीने’ देखी। फिर भरपूर तारीफ सुनकर ‘थ्री इडियट्स’। बाद में ‘अतिथि तुम कब जाओगे’, ‘एलएसडी’ यानी ‘लव, सेक्स और धोखा’, ‘वेल डन अब्बा’ और देर-दुरुस्त ‘इश्किया’। ‘कमीने’ पिछले वर्ष की फिल्म है। विशाल भारद्वाज की फिल्मों में कसावट के साथ नया अंदाज रहता है, जो हॉल से बाहर आते वक्त दर्शक को बेचैन नहीं करता। ‘इश्किया’ में सिनेमा का विवेक अनुभव होता है। कथानक के अनुकूल छायाकारी, गठे हुए संवाद, सधा हुआ अभिनय, कारगर संगीत। निर्देशक अभिषेक चौबे की यह पहली फिल्म है। विशाल भारद्वाज इसके निर्माता हैं और संगीत, पटकथा-संवादों में भी शरीक रहे हैं। उन्हें सिनेमा की गहरी समझ है, जो ‘मकबूल’ में श्रेष्ठ रूप में सामने आयी। उनका मार्गदर्शन भी चौबे को मिला होगा।
‘एलएसडी’ के निर्देशक दिवाकर बनर्जी दो फिल्मों ‘खोसला का घोंसला’ और ‘ओए लकी लकी ओए’ में अपनी प्रतिभा की झलक दे चुके हैं। लेकिन ‘एलएसडी’ फिल्म जर्मन मूल के फिल्मकार माइकल हेनेके की शैली की नकल है। नकल अपने में बुरी चीज नहीं है। पिकासो ने कहा था, खुद की नकल करने से बेहतर है दूसरे की नकल करना। इसमें आप सीखते हैं; अपनी नकल खुद को वहीं रखती है, जहां पहले थे। ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ शरद जोशी के व्यंग्य से प्रेरित है। साफ, निर्दोष प्रहसन के रूप में देखने के बाद इसे हम भूल सकते हैं।
लेकिन सबसे निराश किया शलाका-पुरुष श्याम बेनेगल की फिल्म ‘वेल डन अब्बा’ ने। अनिल अंबानी के ‘बिग सिनेमा’ के लिए बनायी गयी फिल्म में उन्होंने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया है। गरीबी की रेखा के नीचे दिखाने से लेकर कर्ज की मंजूरी के तिकड़मों को हंसी-मजाक के बीच उन्होंने बखूबी झलकाया है। लेकिन फिल्म धीमी चलती है और कोई नया कोण नहीं देती। यह खयाल सताने लगता है कि यह अंकुर, मंथन, भूमिका या जुनून के निर्देशक की फिल्म है। दुर्भाग्य से बेनेगल शायद मानने लगे हैं कि बाजार में कायम रहने के लिए फिल्म को अब बड़े समझौते करने पड़ते हैं। अंगरेजी में नामकरण तक के।
‘थ्री इडियट्स’ एक बेहतर कॉमेडी हो सकती थी। लेकिन एक तो उपदेशक या शिक्षा सुधार की भंगिमा अख्तियार करते हुए अतिरंजना के घेरे में दाखिल हो गयी। दूसरे, तर्क की वकालत करने वाली फिल्म अतिवादी स्थितियों में घुसती चली गयी। मसलन वैक्यूम क्लीनर के सहारे प्रसव, दुपहिए पर ‘एंबुलेंस’ आदि। फिल्म का संपादन बेहद लचर है। जैसे लेखक खुद अपनी रचना का बेहतर संपादन नहीं कर सकता, राजकुमार हीरानी जैसे प्रतिभावान निर्देशक को अपनी फिल्म का संपादन खुद करने से बचना चाहिए। कुशल संपादन से फिल्म में कसावट आती, अवधि भी कम होती।
इन फिल्मों की समीक्षा करना मेरा मकसद नहीं है, लेकिन गौर करें कि ये फिल्में पूरी तरह हिंदी फिल्मों के दशकों पुराने नाच-गान के फार्मूले पर आधारित नहीं हैं। जबकि आजकल कमोबेश हर फिल्म – ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ सहित – वर्जिश मार्का सामूहिक नृत्य और मशीनी लय वाले झमाझम संगीत से भरी होती हैं। जिन फिल्मों का मैंने जिक्र किया है, उनमें ज्यादातर हास्य-रस के फार्मूले का दोहन करती हैं। पहले हास्य की जगह हाशिये पर होती थी। ‘हाफ टिकट’ से लेकर ‘जाने भी दो यारों’ तक अनेक विशुद्ध रूप से हास्यप्रधान फिल्मों के बावजूद।
लेकिन अब गरीबी और भ्रष्टाचार में भी हास्य की संभावनाएं खोजी जा रही हैं। कहना न होगा, इससे फिल्म में मनोरंजन तो बना रहता है, लेकिन कथ्य की धार को ये कुछ कुंद भी करती हैं। बात के खुलासे के लिए एक उदाहरण दिया जा सकता है : ‘थ्री इडियट्स’ में गरीब मां बेलन से लकवाग्रस्त पति की छाती खुजाती है और केश-सने बेलन से रोटी बेल कर बेटे के दोस्तों को परोसती है। परिवार की दारुण हालत से भौंचक्क दोस्तों को इससे उबकाई आती है। पर दृश्य दर्शकों को हंसाता है। ठीक वैसे, जैसे तीसरे ‘इडियट’ की तकरीर में ‘चमत्कार’ की जगह ‘बलात्कार’ शब्द का अनवरत प्रयोग।
हंसाने के लिए हर चीज को हंसी में नहीं ढाला जा सकता। लगता है हिंदी सिनेमा अपने बचे रहने की जद्दोजहद में सारे हथकंडे आजमा रहा है। इसके बावजूद स्थिति यह है कि एकाध फिल्म को छोड़कर किसी में पचास दर्शक भी नहीं दिखाई दिये। कतार दूर, आगे पीछे दूसरा ग्राहक तक नहीं। भीतर दूर तक खाली सीटें।
सिनेमा ने तकनीक के स्तर पर बहुत तरक्की की है। लेकिन कोई मुकम्मल दिशा उसे अब भी दरकार है। सबसे बड़ा तो विचार या प्रत्यय का टोटा है। महात्मा गांधी के संघर्ष तक को हमारे फिल्मकार तब तक फिल्म के काबिल नहीं समझते, जब तक कोई अंगरेज उन पर सफल फिल्म बना कर न दिखा दे। एटनबरो के बाद जरूर जानू बरुआ से लेकर श्याम बेनेगल तक गांधी को कैमरे में उतार चुके हैं। बीच-बीच में हमें ‘परजानिया’ या ‘फिराक’ जैसी फिल्में देखने को मिल जाती हैं, जो गुजरात के खून-खराबे को भी परदे पर लाने में नहीं झिझकतीं। लेकिन फार्मूलों – चाहे पुराने हों या नये – के भरोसे चलने वाली फिल्मों के समक्ष उनकी तादाद नगण्य है।
इसमें क्या शक कि हालात बहुत बदल गये हैं। भाग-दौड़ और आपाधापी के दौर में सिनेमा के लिए पहले जैसा जुनून और फुरसत लोगों के पास नहीं है। लेकिन उनके पास साधन बढ़े हैं। टीवी ने सिनेमा के बाजार को जिस तरह घेर लिया था, मॉल संस्कृति में मल्टीप्लेक्स उसे छुड़ा लाने की जुगत में हैं। शहरों में सही, सौ-डेढ़ सौ रुपये का टिकट लोग खरीदते हैं। मेरे घर के इर्द-गिर्द ही कोई तीस सिनेमा हॉल हैं। शायद तीस से ज्यादा। दस मॉल हैं। हरेक में तीन, कहीं-कहीं चार सिनेमा हॉल हैं। खरीदारी या तफरीह की चहलकदमी के बीच सिनेमा अपना बाजार फिर खड़ा कर रहा है। लेकिन उसे क्यों लगता है दर्शक हर चीज मनोरंजन की चाशनी में ग्रहण करना चाहता है? दर्शक को आकर्षित करने का जुगाड़ उसे जैसे हिंसा और हंसी में ही नजर आता है। इससे आगे बात जब कभी जाती है – राजनीति, भ्रष्टाचार या डगमग मीडिया को मुद्दा बनाकर – तो उसे इतने स्थूल और अवास्तविक धरातल पर चित्रित किया जाता है कि यथार्थ विद्रूप की शक्ल ले बैठता है।
मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों की सीढ़ियां उतरते हुए यही लगता है कि दर्शक की उदासीनता अपनी जगह होगी, सिनेमा की दुनिया में एक बेरुखी-सी छायी है। हमारे नये निर्देशकों में प्रतिभा और ऊर्जा खूब है। तकनीक में हम कहीं पीछे नहीं। समस्या बेहतर कथानक और सलीके की है। या अभिनय में इरफान खान और अक्षय कुमार या नंदिता दास और कैटरीना कैफ की खूबियां-सीमाएं समझने की। उम्मीद ही कर सकते हैं कि नये बाजारों के बीच पनप रहा सिनेमा बेहतर मुकाम हासिल करने का जतन करेगा।
(ओम थानवी का पाक्षिक स्‍तंभ अनंतर। जनसत्ता, 11 अप्रैल 2010 से साभार)

दरअसल : सेंसर बोर्ड की सावधानियां

-अजय ब्रह्मात्‍मज    


फिल्मों के विषय, संवाद और रेफरेंस के संबंध में पैदा हो रहे नित नए विवादों के मद्देनजर सेंसर बोर्ड कुछ ज्यादा ही सावधान हो गया है। जब भी किसी फिल्म के प्रसंग में कोई आपत्ति उठती है, तो सेंसर बोर्ड को भी अनायास कठघरे में खड़ा किया जाता है। सवाल पूछे जाते हैं कि सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने क्यों ध्यान नहीं दिया? बार-बार की जवाबदेही से बचने के लिए सेंसर बोर्ड के सदस्य एहतियातन विवादास्पद दृश्य और संवादों को पहले ही कटवा देते हैं। थोड़ी भी शंका होने पर वे निर्माता पर दबाव डालते हैं। इन दिनों फिल्में जिस जल्दबाजी और हड़बड़ी में रिलीज की जा रही हैं, उसमें समय की कमी और दांव पर लगे पैसे को ध्यान में रखते हुए निर्माता आनाकानी नहीं करता। निर्देशक ने ना-नुकुर की, तो उस पर दबाव डाला जाता है। सेंसर के सुझाव के मुताबिक दृश्य काट कर, संवाद बदल कर या शब्दों को ब्लिप कर फिल्में रिलीज हो रही हैं। पिछले दिनों विशाल भारद्वाज, दिबाकर बनर्जी, संजय गुप्ता जैसे निर्माता-निर्देशक सेंसर बोर्ड की इन सावधानियों के शिकार हुए। विशाल भारद्वाज के कमीने में उत्तर प्रदेश के एक शहर का नाम बदल कर कुछ और करना पड़ा था। उन्हें अभिषेक चौबे की फिल्म इश्किया में भी संवाद ब्लिप करने पड़े और शब्द काटने पड़े। दिबाकर की हाल में रिलीज हुई एलएसडी की पहली कहानी में जातिबोधक सरनेम हटाने की सलाह मिली। रिलीज की तारीख और सेंसर की आपत्ति के बीच का वक्त इतना कम था कि दिबाकर को सेंसरबोर्ड की हिदायत माननी पड़ी। इस वजह से फिल्म की पहली कहानी का इंपैक्ट ही बदल गया या यह कहें कि निर्देशक की बात सही परिप्रेक्ष्य में व्यक्त नहीं हो सकी। नाम, जाति और प्रतिष्ठा के नाम पर हो रही प्रेमी युगलों की हत्या के चित्रण द्वारा दिबाकर कथित रूप से विकसित समाज की विसंगतियों और विद्रूपताओं की ओर इंगित कर रहे थे। फिल्म में यह इशारा तो समझ में आता है, लेकिन उसका संदर्भ खो जाता है।

सेंसर बोर्ड सचेत रहे, लेकिन उसे ऐसे महत्वपूर्ण विषय, तथ्य और चित्रणों के प्रति उदार और संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए। ठीक है कि समाज में सहिष्णुता खत्म हो गई है और जरा सी बात से किसी के भी अहं को ठेस लग जाती है। हर व्यक्ति, समुदाय और समाज मूल्यों के रक्षक के तौर पर नजर आता है और सेंसर द्वारा प्रमाणित फिल्म का प्रदर्शन रोक देने की खुली चुनौती दे देता है। कानून-व्यवस्था इतनी कमजोर और ढीली हो गई है कि प्रशासन जल्दी से समर्पण कर देता है और चाहता है कि विवाद में उलझी पार्टियां खुद ही बीच का रास्ता खोज लें। ऐसे में क्रिएटिविटी पर अंकुश बढ़ता जा रहा है। इस दमघोटू माहौल में लेखक और निर्देशक पहले से ही सावधान रहते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि कई आवश्यक विषय पर्दे पर नहीं आ पा रहे हैं। प्रयोगशील निर्देशक किसी भी विवाद की संभावना से फिल्म की रिलीज बाधित होने से बचने के लिए सुरक्षित रास्ता अपना रहे हैं। वे सामान्य और रेगुलर फिल्में बना रहे हैं। एक युवा निर्देशक की बनी-बनाई फिल्म एक बड़ी कारपोरेट कंपनी ने खरीदी। बाद में उसे देखने पर उन्हें लगा कि उक्त फिल्म उनके बिजनेस हितों के खिलाफ जा सकती है, क्योंकि उसमें कुछ ऐसे मुद्दे हैं। उन्होंने उस फिल्म को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। युवा निर्देशक को नहीं मालूम कि वह फिल्म कभी रिलीज भी हो पाएगी या नहीं?

Monday, April 12, 2010

पैशन से बनती हैं फिल्में: सूरज बड़जात्या

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
पिछली सदी का आखिरी दशक एक्शन के फार्मूले में बंधी एक जैसी फिल्मों में प्रेम की गुंजाइश कम होती जा रही थी। दर्शक ऊब रहे थे, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री को होश नहीं था कि नए विषयों पर फिल्में बनाई जाएं। फिल्म इंडस्ट्री का एक नौजवान भी कुछ बेचैनी महसूस कर रहा था। प्रेम की कोमल भावनाओं को पर्दे पर चित्रित करना चाहता था। सभी उसे डरा रहे थे कि यह प्रेम कहानियों का नहीं, एक्शन फिल्मों का दौर है। प्रेम कहानी देखने दर्शक नहीं आएंगे, लेकिन उस नौजवान को अपनी सोच पर भरोसा था। उसका नाम है सूरज बडजात्या और उनकी पहली फिल्म है, मैंने प्यार किया। कुछ वर्ष बाद आई उनकी फिल्म हम आपके हैं कौन को एक मशहूर समीक्षक ने मैरिज विडियो कहा था, लेकिन दर्शकों ने उसे भी खुले दिल से स्वीकार किया। सौम्य, सुशील और संस्कारी सूरज बडजात्या को कभी किसी ने ऊंचा बोलते नहीं सुना। सूरज ने अभी तक बाजार के दबाव को स्वीकार नहीं किया है। प्रस्तुत है फिल्मों में उनके सफर विभिन्न आयामों पर एक समग्र बातचीत।

कौन सी शुरुआती फिल्में आपको याद हैं?

पांच-छह साल की उम्र से ट्रायल में जाता था। फिल्म सूरज और चंदा याद है। दक्षिण भारत में बनी इस फिल्म के हीरो संजीव कुमार थे। मैंने उसे पांच-छह बार देखा था। उसमें तलवारबाजी थी, गाने अच्छे थे। एक गाना याद है, पूरब दिशा से परदेसी आया..। इसके बाद धर्मवीर फिल्म देखी, जिसमें जीतेंद्र थे।

परिवार में फिल्मों का माहौल था। दादा तारांचद जी सहित पिता जी तक से हमेशा फिल्मों को लेकर बातचीत होती थी। पिता प्रोडक्शन में थे। वे मुझे एडिटिंग, साउंड और स्क्रिप्ट के बारे में बताते थे। मैं बारह साल की उम्र से स्क्रिप्ट सेशन में आने-जाने लगा। तबसे अलग-अलग लेखकों के करीब रहा। डॉ. राही मासूम रजा, ब्रजेंद्र गौड, कामना चंद्रा जी के साथ बैठकें मुझे याद हैं। नदिया के पार का हर गाना मुझे याद है।

बैठकों में आप मूक श्रोता होते थे या हिस्सा भी लेते थे?

पिता जी का स्पष्ट निर्देश था कि चुपचाप बैठकर नोट करते जाओ। तुम्हें जो भी बात समझ में आती है उन्हें लिखो और बाद में मुझे बताओ। उनसे मुझे सीखने को मिला कि कैसे चरित्र और गाने बनते हैं। रात के दो-दो बजे तक गानों पर बहस चलती थी। सुन मेरी लैला गीत मुझे याद है। सात बजे से लेकर सुबह तीन बजे तक हम म्यूजिक रूम में बैठे रहे। एक जुनून सा था। बहस हो जाती थी। फिल्म मैंने प्यार किया की स्क्रिप्ट मैंने रातों में लिखी थी। दो-दो, तीन-तीन बजे तक संवाद लिखता रहता था। मुझे लगता है कि हर फिल्ममेकर में वह पैशन होना चाहिए। बाकी सब अपने-आप आ जाता है। संवाद लिखे जाने के बाद उन्होंने एक अच्छा कैमरामैन दिया और एक अच्छा एडिटर दिया। उन्होंने कहा कि तुम नए हो, इसलिए तुम्हारे बाजू मजबूत होने चाहिए। सच कहूं तो मैंने प्यार किया और हम आपके हैं कौन दोनों फिल्में खेल-खेल में बनीं। मेरी चिंता सिर्फ यह रहती थी कि कैमरामैन क्या कहेंगे? फिल्में बनीं, चलीं और पसंद आई। अब मुझे लगता है कि टेकनीक से ज्यादा एस्थेटिक्स महत्वपूर्ण है। आज मैं स्टेज करना चाहता हूं, जहां कैमरों की बंदिश न हो। बगैर तकनीक के इमोशन दिखाना चाहता हूं।

जब मैंने प्यार किया के बारे में सोचा, एक्शन फिल्मों का दौर था। अलग हटकर फिल्में बनाने की प्रेरणा कैसे मिली?

हमारी कुछ फिल्में नहीं चली थीं। सोचा कि फिल्में बनाना बंद कर देना चाहिए। दादा जी का कहना था कि एक फिल्म और बनाओ। उनके निर्देश पर ही हमने इस फिल्म में पूरी ऊर्जा और पूंजी लगा दी। स्थिति यह थी कि मैंने प्यार किया न चलती तो राजश्री की दुकान बंद करनी पडती। मुझे बजट से वंचित रखा गया। कोई आर्टिस्ट नहीं मिला। सलमान खान मिले। जो हीरोइन चाहता था, वह नहीं मिली। क्योंकि उन्हें उतना पारिश्रमिक नहीं दे सकता था। फिर भाग्यश्री आई। लता मंगेशकर जी के तैयार होने से हमें बडी शक्ति मिली। उन दिनों वे फिल्मों में अधिक नहीं गा रही थीं। लता जी से फिल्म को ग्रेड मिला, सेंसिबिलिटी मिली।

हम आपके हैं कौन जैसी फिल्म के बारे में दो तरह की बातें हुईं। कुछ ने इसे रूढिवादी फिल्म कहा तो कुछ ने कहा कि इसने भविष्य के लिए नया विषय दिया।

मेरे लिए हम आपके हैं कौन सांस्कृतिक प्रेम कहानी है। उस जमाने में गाडियों में रोमांटिक गाने चलते थे। हमने उसे संस्कृति का आधार दिया। मेरा मानना है कि फिल्मों में संस्कृति का सही चित्रण जरूरी है। रामायण पर आधारित धारावाहिक को दर्शकों ने बहुत पसंद किया। शास्त्रों को रूढिवादी कहना ठीक नहीं होगा। उनमें विज्ञान के बीज हैं। फिल्म रिलीज होने के बाद शादी की रस्में पूछने के लिए लोग मुझे फोन करने लगे थे। अमेरिका और इंग्लैंड में इस फिल्म को लोगों ने परिवार के साथ बैठकर देखा। मैं इसे पिछडी सोच या रूढिवादिता नहीं मानता।

कहा जाता है कि आपने फिल्मों में उच्च मध्यवर्गीय संस्कारों की स्थापना की। आपको मालूम होगा कि हम आपके हैं कौन के बाद जयमाल प्रथा या जूता चुराने का फैशन आ गया। माधुरी दीक्षित की साडी लोकप्रिय हो गई। बनारसी साडियों की बिक्री बढी। संस्कृति के ऐसे चित्रण के प्रभाव को तो प्रगतिशील नहीं कहा जा सकता।

रीति-रिवाजों और संस्कारों को हमने ग्लैमराइज किया। फिल्म कमर्शियल थी, इसलिए उसमें वैभव दिखाया गया। वह फिल्म शुद्ध रूप से व्यावसायिक फिल्मों के दर्शकों के लिए बनाई गई थी। मुंबई के लिबर्टी सिनेमाघर में इसका पहला शो रखा गया था। पूरी इंडस्ट्री के लोगों का कहना था कि यह फिल्म तो गई। इंटरवल में कुछ लोगों ने कहा कि सूरज ऐसी गलती हो जाती है, तुम अगली फिल्म जल्दी शुरू कर दो। मैंने ख्ाुद देखा कि लोग हर दस-पंद्रह मिनट पर बाहर निकल रहे थे। मुझे कई लोगों ने कहा कि फिल्म के कारण शादी के खर्चे बढ गए हैं। लेकिन यह अलग सोच है।

हम आपके हैं कौन के बाद हिंदी सिनेमा तेजी से ग्लोबल हुआ। आजकल ऐसी फिल्में ज्यादा हैं, जिन्हें एन.आर.आई. या अप्रवासी भारतीय देखें। हिंदी फिल्मों के विकास के लिए आप इसे कितना जरूरी या गैरजरूरी मानते हैं? विवाह जैसी फिल्म साल में एक-दो बन जाती हैं। हिंदी सिनेमा भारतीय दर्शकों के प्रति अपना दायित्व निभा पा रहा है?

जो फिल्में चलती हैं या चल रही हैं या बॉक्स ऑफिस पर व्यवसाय कर रही हैं, वे सभी निर्माता के विश्वास पर बनी हैं। मैंने एक फिल्म बनाई, मैं प्रेम की दीवानी हूं। एक साल पहले यश चोपडा की फिल्म दिल तो पागल है आई। उसका कलेक्शन अच्छा रहा। कुछ कुछ होता है जैसी फिल्म खूब चली। हम साथ साथ हैं का बिजनेस थोडा कम हुआ। फिर मैंने मैं प्रेम की दीवानी हूं बनाई, नहीं चली। उसमें मेरा पूरा यकीन नहीं था। मैंने एक ट्रेंड की नकल की। लोगों ने कहा यह तो हम देखते ही हैं। तुम्हारी फिल्मों में हम तुमको देखना चाहते हैं। आप विदशों के लिए बनाएं या मल्टीप्लेक्स के लिए, लेकिन वही सिनेमा बनाएं जिसमें आपका यकीन हो। जैसे ही सोचेंगे कि इतने पैसे लगा कर इतना पैसा कमा लूंगा, फिल्म नहींचलेगी। दर्शकों के पास आज ढेरों विकल्प हैं। मल्टीप्लेक्स का फायदा यह है कि आपकी सोच को सराहने के लिए समझदार दर्शक मिल जाते हैं। मैं ख्ाुद मुंबई मेरी जान देखने जाऊंगा, क्योंकि मैं डायरेक्टर का काम देखना चाहता हूं। मैं राजकुमार हिरानी, आमिर ख्ान की फिल्में देखने जाऊंगा, क्योंकि उनकी फिल्म में कुछ नया होता है। संजय लीला भंसाली की ब्लैक कोलकाता में दमदम के एक थिएटर में मैंने देखी। सिनेमाघर में न तो ए.सी. चल रहा था, न पंखे ठीक से चल रहे थे। लोग रो रहे थे। यह पॉवर ऑफ सिनेमा है। फिल्में सिर्फ जुनून से बनती हैं।

मैंने सुना है कि आप हर फिल्म देखते हैं, वह भी थिएटर में जाकर।

मैं कोशिश करता हूं कि हर फिल्म थिएटर में देखूं। कुछ फिल्में छूट जाती हैं तो उन्हें डी.वी.डी. पर देखता हूं।

क्या यह दर्शकों के मनोभाव को समझने के लिए करते हैं? सामाजिक जीवन से आपका ज्यादा परिचय नहीं रहा है। ऐसे में फिल्मों के विषय के बारे में कैसे सोचते हैं?

पहली ताकत वितरण से आई थी। हमें मालूम था कि किस एंगल की कहानी चली और कौन सी नहीं चली थी। नल दमयंती, झांसी की रानी नहीं चली। हमारा परिवार थिएटर जाता था। वहां मैनेजर से मुलाकात होती थी। हम उनकी पूरी बातें सुनते थे और उनसे फीडबैक लेते थे। हमने सुन सजना बनाई, जिसमें मिथुन चक्रवर्ती और रंजीता थे। वह फिल्म सत्यम में लगी थी। पहला शो देखकर निकले तो किसी दर्शक ने कहा, क्या बकवास फिल्म बनाई है, मिथुन को अंधा बना दिया..? यह कमेंट मुझे आज भी याद है। लोग मिथुन को अंधे, बेसहारा और बेबस रूप में देख कर ख्ाुश नहीं हुए। मिथुन को ऐसा दिखाना हमारी गलती थी।

आपके नाम के साथ बडजात्या न लगा होता तो यह यात्रा कितनी मुश्किलों से भरी होती?

शायद आज तक असिस्टेंट बना रहता। एक बार लेख टंडन जी के घर स्क्रिप्ट सुनाने गया था। उन्होंने कहा, सूरज तुम बहुत भाग्यशाली हो। मैंने पूछा-क्यों? उनका जवाब था कि तुम्हारे पिता हैं न प्रोडक्शन के लिए। चाचा डिस्ट्रीब्यूशन का काम देख लेंगे। कोई फाइनेंस देख लेगा। तुम्हारा काम सिर्फ फिल्म बनाना है। वहां से लौटते समय मैंने फैसला किया कि अगर मैं इतना भाग्यशाली हूं तो मैं मेहनत करूंगा। कितने प्रतिभाशाली लोग इंतजार कर रहे हैं। अब टीवी का माध्यम आ गया है तो कुछ लोगों को मौके मिल जाते हैं। हमारे समय में तो कुछ भी नहीं था।

दस-पंद्रह वर्षो में जो भी डायरेक्टर आए, ख्ाुद फिल्में लिखते हैं। पहले यह काम लेखक का था। यह फर्क क्यों आया?

राज कपूर और गुरुदत्त लेखकों से कहानी लिखवाते थे, तो भी उनका अपना नजरिया होता था। लोग वर्षो तक फिल्म की तैयारी करते थे। लेखक, संगीत निर्देशक, गीतकार रोज मिलते थे और फिल्म को आगे बढाते थे। बी.आर. चोपडा और महबूब खान के यहां गोष्ठियां होती थीं। मेरी कोशिश है कि एक ऐसी यूनिट बने। अभी मैं इसे लेकर सोच रहा हूं। स्थापित लोगों को लेकर ऐसी टीम बनाना मुश्किल है। मेरी कोशिश है कि नए लोगों को जमा करूं। आज निर्माता फटाफट कहानी चाहते हैं। ऐसे में कई लेखक मना कर देते हैं कि रात में बता कर सुबह काम चाहोगे तो कैसे होगा। डायरेक्टर को खुद कलम या कीबोर्ड संभालना पडता है। तीसरी श्रेणी ऐसे लोगों की है, जिनका अपने काम से ज्यादा लगाव है। उनके विचारों व सोच को लेखक समझ नहीं पाते। मेरे पास कोई लेखक आता है तो दो मिनट में समझ में आ जाता है कि उससे ट्यूनिंग बैठेगी या नहीं? पहले फिल्मकारों, लेखकों ने जिंदगियां जी थीं। आज फिल्मकार और लेखक डी.वी.डी. से जीवन देखते हैं। फाइव स्टार होटल में बैठकर हिंदी फिल्म लिखेंगे तो फिल्म कैसी बनेगी?

आप हिंदी फिल्म की स्क्रिप्ट अंग्रेजी में लिखते हैं तो भी फिल्म ठीक नहीं बनती। आप सही कह रहे हैं। हमारी मजबूरी है कि हमें सभी को रोमन में स्क्रिप्ट देनी पडती है। ज्यादातर लोगों के लिए रोमन में स्क्रिप्ट तैयार करनी पडती है। मुझे याद है कि पंकज कपूर ने हिंदी में स्क्रिप्ट मांगी थी। लेकिन वैसे कलाकार कितने हैं? अभी तो कुछ कलाकारों को हिंदी बोलनी तक नहीं आती।

डायरेक्टर का काम कमांडिंग व डिमांडिंग होता है, जबकि आप विनम्र स्वभाव के हैं। किस तरह पेश आते हैं कलाकारों से?

सेट पर डायरेक्टर को सबसे बडे एक्टर की तरह रहना चाहिए। मैं एक-एक चीज के बारे में पहले से सोचता हूं। पहले से मालूम हो कि किसी सीन में किस एक्टर का क्या महत्व है? मैं नहीं चाहता कि अनिर्णय की स्थिति में रहूं। डायरेक्टर कन्फ्यूज भी है तो उसे दिखाना चाहिए कि वह सब जानता है। पहली फिल्म के सेट पर मैं अग्रेसिव था। बाद में महसूस किया कि शांति से मदद मिलती है। चीखने-चिल्लाने से काम पर फर्क पडता है। उसमें थोडी चीजें अच्छी हो जाती हैं, लेकिन कुछ चीजें बुरी हो जाती हैं। डायरेक्टर को एक्टर के सामने शांत-चित्त होना चाहिए। मैंने चीखने-चिल्लाने से लेकर सेट पर एक्टर को रुलाने तक का काम किया है। यह भी दबाव डाला है कि एक ही शॉट में चाहिए। फिर महसूस किया कि एक्टर और तकनीशियन सुकून में रहें तो फिल्म अच्छी बनती है। मुमकिन है किसी दिन शूटिंग न हो सके, लेकिन घबराना नहीं चाहिए।

कॉलेज के दिनों में बदमाशी करने का मौका नहीं मिला?

कॉलेज के समय में इधर-उधर की बात सोच नहीं पाया। परिवार बेहद मुश्किलों में था। अभी कुछ दिन पहले मेरे छोटे बेटे ने कहा, पापा किताब खरीदनी है। केवल पांच सौ रुपये की है। यह केवल शब्द मुझे परेशान करता है। मैं पत्नी से पूछता हूं कि क्या हमारी परवरिश में कमी रह गई? बच्चों को पैसे का मूल्य नहीं मालूम। हम पर जो दबाव था, उससे आगे मदद ही मिली। मेरा लक्ष्य था कि फिल्म बनानी है, दबाव था कि फिल्म बनाने लायक सुविधाएं नहीं थीं। इन चीजों ने मुझे प्रभावित किया।

आधुनिक सोच के साथ भारतीय मूल्यों में भी आपका विश्वास रहा है। एक साथ दोनों का सम्मिश्रण कैसे किया?

शुरू की तीन फिल्मों तक मेरे विचार मिले-जुले थे। विवाह के बाद मैं भारतीय मूल्यों पर जोर देने लगा हूं। मैंने रवींद्र जैन जी से कहा कि गाने में हिंदी बोल रखें, भले ही बिके या न बिके। नए बच्चे, मेरे बेटे तक हिंदी नहीं जानते, हिंदी के अखबार नहीं पढ सकते। आप सीधे जयंशकर प्रसाद से पढाई शुरू नहीं कर सकते। छोटी-छोटी चीजें जाननी होंगी। कानों में हिंदी शब्द तो पडें।

अपने बारे में क्या कहेंगे?

मैं अंतर्मुखी स्वभाव का हूं। मेरे फिल्मों में जो हीरो आते हैं, उन्हें मैं उस रूप में प्रस्तुत करता हूं जो मैं बनना चाहता हूं। सारे हीरो मेरी कल्पना से पैदा हुए हैं। उनमें मैं हूं। मैं सरल व्यक्ति हूं। मुझे इससे फर्क नहीं पडता कि मेरे बारे में कौन क्या कह रहा है? मेरी एक ही धुन रही है कि मैं फिल्म बनाऊं, बस।

Saturday, April 10, 2010

फिल्‍म समीक्षा : प्रिंस

एक्शन से भरपूर 

-अजय ब्रह्मात्‍मज  

हिंदी फिल्मों में प्रिंस की कहानी कई बार देखी जा चुकी है। एक तेज दिमाग लुटेरा, लुटेरे का प्रेम, प्रेम के बाद जिंदगी भी खूबसूरती का एहसास, फिर अपने आका से बगावत, साथ ही देशभक्ति की भावना और इन सभी के बीच लूट हथियाने के लिए मची भागदौड़ (चेज).. प्रिंस इसी पुराने फार्मूले को अपनाती है, लेकिन इसकी प्रस्तुति आज की है, इसलिए आज की बातें हैं। मेमोरी, चिप, कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर आदि शब्दों का उपयोग संवादों और दृश्यों में ता है। यह फिल्म एक्शन प्रधान है। शुरू से आखिर तक निर्देशक कुकू गुलाटी ने एक्शन का रोमांच बनाए रखा है।

फिल्म की कहानी कुछ खास नहीं है। एक नया मोड़ यही है कि प्रिंस की याददाश्त किसी ने चुरा ली है। छह दिनों में उसकी याददाश्त नहीं लौटी तो रोजाना अपने दिमाग में लगे चिप के क्रैश होने से वह सातवें दिन जिंदा नहीं रह सकता। समस्या यह है कि याददाश्त खोने के साथ वह अपनी आखिरी लूट के बारे में भी भूल गया है। उस लूट की तलाश देश की सरकार, विदेशों से कारोबार कर रहे अंडरव‌र्ल्ड सरगना और स्वयं प्रिंस को भी है। इसी तलाश में जमीन, आसमान, नदी, पहाड़ और इमारतें नापी जाती हैं। मोटर सायिकल, कार, हेलीकॉप्टर, नदी में उलटी कार और मोटर बोट पर यह चेजिंग चलती है, जो साउंड इफेक्ट और कैमरे के करतब से हैरतअंगेज लगती है। फिल्म देखते समय रोमांच बना रहता है, जैसे कि किशोर उम्र में हम सभी घंटों वीडियो गेम खेलते नहीं थकते और रोमांचित रहते हैं।

इस फिल्म में कहानी और इमोशन न खोजें। हालांकि दो-चार प्रेम, आलिंगन और चुंबन के हैं, लेकिन उनसे कहानी नहीं बनती। याददाश्त खोने के बाद माया के रूप में आई तीन लड़कियों के साथ कहानी को इंटरेस्टिंग ट्विस्ट और टर्न दिया जा सकता था, लेकिन डायरेक्टर का लक्ष्य एक्शन था। उन्होंने उसी पर पूरा ध्यान दिया है।

एक्शन के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म अच्छी लगेगी। विवेक ओबेराय और उनके साथ आए दूसरे कलाकारों ने पूरी मेहनत की है और रोमांच का लेवल फीका नहीं होने दिया है। खास कर विवेक ओबेराय टेकनीक सैवी एक्शन हीरो के रूप में जंचे हैं। उनकी भाव-भंगिमा और फुर्ती एक्शन दृश्यों में जमती है। एक्शन के दृश्यों में कई बार लाजिक को दरकिनार कर दिया जाता है। निर्देशक कुकू गुलाटी अपनी सुविधा के लिए प्रिंस में भी ऐसी लिबर्टी लेते हैं। तीनों लड़कियों में नंदना सेन और अरुणा शिल्ड के हिस्से ही कुछ सीन आए हैं। अरुणा रोमांटिक और एक्शन दृश्यों में निराश नहीं करतीं। फिल्म के गीत मधुर हैं। एक्शन फिल्म में रोमांटिक गीत की गुंजाइश निकाली है निर्देशक ने। सचिन गुप्ता का संगीत कर्णप्रिय है।

*** तीन स्टार

Monday, April 5, 2010

फिल्‍म समीक्षा : तुम मिलो तो सही

-अजय ब्रह्मात्‍मज 

इस फिल्म को देखने की एक बड़ी वजह नाना पाटेकर और डिंपल कपाडि़या हो सकते हैं। दोनों के खूबसूरत और भावपूर्ण अभिनय ने इस फिल्म की बाकी कमियों को ढक दिया है। उनके अव्यक्त प्रेम और साहचर्य के दृश्यों उम्रदराज व्यक्तियों की भावनात्मक जरूरत जाहिर होती है। तुम मिलो तो सही ऊपरी तौर पर तीन प्रेमी युगलों की प्रेम कहानी लग सकती है, लेकिन सतह के नीचे दूसरी कुलबुलाहटें हैं। कबीर सदानंद अपनी पहली कोशिश में सफल रहते हैं। नाना पाटेकर और डिंपल कपाडि़या दो विपरीत स्वभाव के व्यक्ति हैं। दोनों अकेले हैं। नाना थोड़े अडि़यल और जिद्दी होने के साथ अंतर्मुखी और एकाकी तमिल पुरुष हैं, जबकि डिंपल मुंबई की बिंदास, बातूनी और सोशल स्वभाव की पारसी औरत हैं। संयोग से दोनों भिड़ते, मिलते और साथ होते हैं। इनके अलावा दो और जोडि़यां हैं। सुनील शेट्टी और विद्या मालवड़े के दांपत्य में पैसों और जिंदगी की छोटी प्राथमिकताओं को लेकर तनाव है, जो बड़े शहरों के युवा दंपतियों के बीच आम होता जा रहा है। अंत में सुनील को अपनी गलतियों का एहसास होता है और दोनों की जिंदगी सुगम हो जाती है। रेहान और अंजना दो भिन्न पृष्ठभूमि के युवा हैं और यही उन्हें एक-दूसरे की तरफ खींचता है। कबीर सदानंद ने लकी कैफे को केंद्र बना कर आज की मुंबई की दिक्कतों और मुश्किलों के बीच साथ जीने की स्वाभाविक इच्छा को सुंदर तरीके से चित्रित किया है। फिल्म किसी संदेश या उपदेश के दावे के साथ आरंभ नहीं होती, लेकिन चरित्रों के टकराव और साथ रहने में हमें अनायास ही मिलकर रहने की शिक्षा मिलती है। नाना और डिंपल ने इस फिल्म को बांधे रखा है। लंबे गैप के बाद तुम मिलो तो सही में डिंपल का स्वाभाविक अभिनय देख कर मन में यह सवाल जागता है कि वह एक्टिंग से क्यों दूर रहती हैं? रेहान खान और अंजना सुखानी ने अपनी सीमित भूमिकाओं को ठीक-ठीक निभाया है। दोनों अभी कैमरे के सामने पूरी तरह से खुल नहीं पाए हैं। सुनील शेट्टी की एक्टिंग का अलग अंदाज कुछ दृश्यों में दिखा है। विद्या मालवाड़े अपने इमोशनल सीन में नाटकीय हो गई हैं।

*** तीन स्टार

Sunday, April 4, 2010

कामेडी का बुद्धिमान चेहरा बोमन ईरानी

-अजय ब्रह्मात्‍मज 


हिंदी फिल्मों में कॉमेडी के इंटेलीजेंट और मैच्योर फेस के रूप में हम सभी बोमन ईरानी को जानते हैं।

44 साल की उम्र में फिल्मों में बोमन देर से आए, लेकिन इतने दुरुस्त आए कि अभी उनके बगैर सीरियस कामेडी की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने कामेडी जॉनर की ज्यादा फिल्में नहीं की हैं, लेकिन अपनी अदाओं और भंगिमाओं से वे किरदार को ऐसी तीक्ष्णता दे देते हैं कि वह खुद तो हास्यास्पद हो जाता है, लेकिन दर्शकों के दिल में हंसी की न मिटने वाली लकीर छोड़ा जाता है।

पिछले हफ्ते उनकी फिल्म वेल डन अब्बा आई। इस फिल्म में उन्होंने प्यारे अब्बा के रूप में हंसाने के साथ देश की सोशल और पॉलिटिकल सिचुएशन पर तंज भी किया। यह श्याम बेनेगल की खासियत है, लेकिन उसे पर्दे पर बोमन ईरानी ने बड़ी सहजता के साथ उतारा।

हिंदी फिल्मों में अपनी मजबूत मौजूदगी से वाकिफ बोमन के लिए कॉमेडी केले के छिलके से फिसलना नहीं है। बोमन कहते हैं, इस पर कोई बचा हंस सकता है, क्योंकि वह चलते-फिरते व्यक्ति को गिरते देख कर चौंकता है और उस गिरने के पीछे का लॉजिक नहीं समझ पाने के कारण हंसता है। मेरी कामेडी केले के छिलके से फिसलने के बाद या उसके पहले शुरू होती है। आपको मालूम है कि कुछ घटने वाला है, लेकिन मैं कैसे रिएक्ट करूंगा या करता हूं, उसी से मेरे परफार्मेस में भिन्नता आती है। बोमन खुद को लकी मानते हैं कि वे फिल्मों में देर से आए और उसकी वजह से उन्हें खास किस्म के रोल मिले।

हालांकि जोश से सन 2000 में उन्होंने शुरुआत की, लेकिन लेट्स टॉक से उन्हें पहचान मिली। राजकुमार हिरानी की मुन्नाभाई एमबीबीएस में डा. जेसी अस्थाना के रोल में बोमन ने बता दिया कि वे पहले के कामेडियन की तरह सिर्फ चेहरे बना-बिगाड़कर या भोंडी हरकत कर दर्शकों को नहीं हंसाएंगे। उनकी आवाज और संवाद अदायगी के खास अंदाज ने उन्हें सबसे अलग बना दिया और सिलसिला चल निकला।

अपने फिल्मी सफर से संतुष्ट बोमन ने कहा, मैंने लगभग 50 फिल्में कर ली हैं या जल्दी ही कर लूंगा, लेकिन ऐसा लगता है कि मैं सदियों से फिल्में ही कर रहा हूं। मुझे सारे बड़े डायरेक्टर और बैनरों ने आजमाया और अपनी जरूरत के लिए फिट पाया। हमारी उम्र के एक्टर अगर फिल्मों में फिट होते हैं, तभी उन्हें रोल मिलते हैं। यह सचाई है कि हमारे लिए रोल नहीं लिखे जाते। हां, रोल के लिए चुन लिए जाने के बाद हमारी कमियों के हिसाब से हमें काटा-छांटा जाता है। कोशिश की जाती है कि रोल में हम फिट हो जाएं। इसी काट-छांट में जो हरकतें करता हूं, उससे आपको हंसी आती है। आपको लगता है कि मैं हंसा रहा हूं। वास्तव में मैं अपनी जान की दुहाई और उस रोल से होने वाली कमाई के लिए कसमसा रहा होता हूं। सच कहूं, तो हम सभी एक्टर बंदर होते हैं और निर्देशक मदारी, जो हमें जमा हुई भीड़ के मुताबिक करतब दिखाने के लिए कहता है।

अपनी कॉमेडी में गंभीरता और सैटेरिकल होने के पुट को वे अपनी उम्र के साथ जोड़ते हैं। उसके अलावा वे अपनी पारसी पृष्ठभूमि का योगदान भी मानते हैं। उन्होंने बताया, एक तो मैं पारसी हूं। हम लोगों का सेंस ऑफ ह्यूमर थोड़ा अलग होता है। हम लोग निजी जिंदगी में एक-दूसरे की चुटकी लेने से नहीं चूकते। फिल्मों में पारसियों को बेवकूफ और जिद्दी व्यक्ति के रूप में दिखाया जाता रहा है। हम लोग वैसे नहीं होते। हमारे बोलने में नाक से आवाज आती है, लेकिन हम नकचढ़े नहीं होते। एक तो मैं पारसी और ऊपर से इस उम्र का, लिहाजा ओवरबोर्ड एक्टिंग कर ही नहीं सकता। मैं खुशनसीब हूं कि दर्शकों ने मुझे पसंद कर लिया।

अपनी अभिनय शैली के बारे में बोमन का कहना है, मैं अलग से कुछ नहीं सोचता। सबसे पहले निर्देशक की सलाह सुनता हूं और फिर उसके बताए तरीके से सामने बैठे या खड़े एक्टर के साथ मेल-जोल कर थोड़ी-बहुत एक्टिंग कर लेता हूं। हर एक्टर का अभिनय सहयोगी एक्टर के काम से चमकता है। वायरस का ही किरदार देखें। अगर साथ में आमिर खान नहीं होता, तो मैं कितना बेवकूफ लगता। वैसे मुझे बेवकूफ ही लगता था। मेरे कहने का मतलब समझ रहे हैं ना!

बोमन वेल डन अब्बा को अपने करियर का सबसे बड़ा चैलेंज मानते हैं। श्याम बेनेगल की तारीफ करते हुए वे कहते हैं, पहली बार उनकी फिल्म में मुझे लीड रोल मिला। साथ में कोई स्टार या आइटम भी नहीं था।

उस फिल्म में स्टोरी और राइटिंग ही स्टार है और फिर श्याम बाबू की क्या टीम है? छोटे-छोटे रोल में आए एक्टर के परफार्मेस भी दंग करते हैं। मुझे तो यही अछा लगा कि श्याम बाबू ने मुझे अरमान के रोल के लिए चुना। हिंदी फिल्मों की कॉमेडी और उसके भविष्य की बात चली, तो बोमन ने खास अंदाज में आंख मारते हुए बताया, देखो, अपने को काम मिलता रहेगा। बदहाली, मुश्किल और तेज भागती जिंदगी में अब फिल्मों से ही हंसने के अवसर मिलते हैं। आप याद करो ना कि कब अपनी बीवी, बचों या मां-पिताजी के साथ किसी बात पर आप लास्ट टाइम हंसे थे। जिसे देखो वही गुस्से में है। नाराजगी के साथ शिकायतों का पुलिंदा लिए घूम रहा है। हम उसकी जिंदगी में हंसने के पल लाते हैं, क्योंकि उसके आगे-पीछे हमारी एक-दूसरे से कोई अपेक्षा नहीं रहती।

पहचान और मशहूरियत के बीच बोमन को तब तकलीफ होती है, जब सरेराह लोग उन्हें मसखरा समझ कर उनसे लतीफे या ऐसी हरकत की उम्मीद करते हैं कि उन्हें हंसने का मौका मिले। उन्होंने सुनाया कि एक बार सुबह-सुबह फ्लाइट पकड़ने के लिए सिक्योरिटी चेक की लाइन में लगा था। कुछ सहयात्री घेर कर खड़े हो गए और फिर कुछ सुनाने की फरमाइश करने लगे। मुझे अच्छा नहीं लगा।

हमारा काम पर्दे पर हंसाना है। वास्तविक जिंदगी में हम भी दर्शकों की तरह आम आदमी हैं। हर दम लतीफेबाजी थोड़े ही करते रहते हैं। ऐसे ही तो नहीं फिसल जाएंगे। सिचुएशन बने। केले का छिलका गिरा हो और हमारी नजर उस पर नहीं पड़े तो जाहिर है कि फिसलेंगे और आप हंसेंगे। आप कहेंगे कि फिसल कर दिखाओ, तो कैसे चलेगा?

Thursday, April 1, 2010

मन का काला सिनेमा - वरुण ग्रोवर

चवन्‍नी को वरुण का यह लेख मोहल्‍ला लाइव पर मिला। उनकी अनुमति से उसे यहां पोस्‍ट किया जा रहा है।


लव


मैं तब करीब सोलह साल का था। (सोलह साल, हमें बताया गया है कि अच्छी उम्र नहीं होती। किसने बताया है, यह भी एक बहुत बड़ा मुद्दा है। लेकिन शायद मैं खुद से आगे निकल रहा हूं।) क्लास के दूसरे सेक्शन में एक लड़की थी जिसे मेरा एक जिगरी दोस्त बहुत प्यार करता था। वाजिब सवाल – ‘प्यार करता था’ मतलब? वाजिब जवाब – जब मौका मिले निहारता था, जब मौका मिले किसी बहाने से बात कर लेता था। हम सब उसे महान मानते थे। प्यार में होना महानता की निशानी थी। ये बात और थी कि वो लड़की किसी और लड़के से प्यार करती थी। यहां भी ‘प्यार करती थी’ वाला प्रयोग कहावती है। फाइन प्रिंट में जाएं तो – दूसरा लड़का भी उसको बेमौका निहारता था, और (सुना है) उसके निहारने पर वो मुस्कुराती थी। दूसरा लड़का थोड़ा तगड़ा – सीरियस इमेज वाला था। जैसा कि हमने देखा है – एक दिन सामने वाले खेमे को मेरे दोस्त के इरादे पता चल गये और बात मार-पीट तक पहुंच गयी। मैंने भी बीच-बचाव कराया। सामने वाले लड़के से दबी हुई आवाज़ में कहा कि असल में तुम्हारी पसंद (माने लड़की) है ही इतनी अच्छी कि इस बेचारे की बड़ी गलती नहीं है। (ये लाइन मैं रट के गया था। ‘डर’ फिल्म में है।) सुलह हो गयी पर उसके बाद मेरे दोस्त का प्यार कुर्बान हो गया। उसने उस लड़की को भुलाने की कोशिश की। हम लोगों ने इस मुश्किल काम में उसकी मदद की। उसकी महानता ‘प्यार करने वाले’ खेमे से निकलकर ‘प्यार पूरा नहीं हो पाया’ वाले खेमे में शिफ्ट हो गयी। पर कभी भी, अगले दो सालों तक, ऐसा नहीं हुआ कि उसने हिम्मत हारी हो या हमने ही ये माना हो कि किस्सा ख़त्म हो गया है। हम सब मानते थे कि दोस्त का प्यार सच्चा है और यही वजह काफी है कि वो सफल होगा।

आज सोच के लगता है कि हम लोग साले कितने फ़िल्मी थे। लेकिन फिर लगता है कौन नहीं होता? हमारे देश में (या आज की दुनिया में?) option ही क्या है? प्यार की परिभाषा, प्यार के दायरे, प्यार में कैसा feel करना चाहिए इसके हाव-भाव, और प्यार में होने पर सारे universe की हमारी तरफ हो जाने की चुपचाप साज़िश – ये सब हमें हिंदी रोमांटिक फिल्मों से बाल्टी भर भर के मिला है। हमने उसे माना है, खरीदा है, और मौक़ा पड़ने पर बेचा भी है। लंबी परंपरा है – या कहें पिछली सदी की सबसे बड़ी conspiracy। राज कपूर ने प्यार को नौकरी और चरित्र के बराबर का दर्ज़ा दिया, गुरुदत्त ने कविता और दर्द की रूमानियत से पोता, शम्मी कपूर, देव आनंद और राजेश खन्ना ने मस्ती का पर्याय बनाया, बच्चन एंड पार्टी ने सख्त मौसम में नर्मी का इकलौता outlet, और 80 के दशक के बाद यश चोपड़ा, करन जौहर, शाहरुख और अन्य खानों ने तो सब मर्जों की दवा।

मैं जानता हूं ये कोई नयी बात नहीं है, लेकिन इसमें खास ये है कि ये अब तक पुरानी भी नहीं हुई है। और एक खास बात है कि अब तक किसी ने भी ऊंची आवाज़ में ये नहीं कहा है कि इस conspiracy ने उसकी जिंदगी खराब कर दी। जब कभी ऐसा मौक़ा आया भी [एक दूजे के लिए (1981), क़यामत से क़यामत तक (1987), देवदास (2002)] जहां प्यार के चलते दुखांत हुआ, वहां भी प्यार को कभी कटघरे में खड़ा नहीं किया गया। बल्कि उल्टा ही असर हुआ – जमाने की इमेज और ज़ालिम वाली हो गयी (मतलब प्यार में एक नया element जुड़ गया – adventure का), प्यार के सर पर कांटों का ताज उसे ईश्वरीय aura दे गया, और ‘हमारे घरवाले इतने illogical नहीं’ का राग दुखांत के परदे के पीछे लड़खड़ाती सुखांत की अगरबत्ती को ही सूरज बना गया। (और ये भी जान लें कि फिल्मकार यही चाहते थे। कभी जाने, कभी अनजाने।)

दिबाकर बनर्जी की ‘लव सेक्स और धोखा’ की पहली कहानी लव की इस लंबी चली आ रही conspiracy को तोड़ती है। बल्कि ये कहें कि उसकी निर्मम ह्त्या करती है। इस कहानी को देखते हुए मुझे वो सब बेवकूफियां याद आयीं जो मैंने कभी की हैं या दूसरों को सुझायी हैं – जैसे हाथ पर रूमाल बांध कर style मारना, पहली नज़र में प्यार हो जाना, आवाज़ बदल कर बोलना, ‘प्यार करते हो तो भाग जाओ, बाकी हम देख लेंगे’ वाला भरोसा देना। और इसमें एक दिल दहला देने वाला अंत है जो मैंने अक्सर अखबारों में पढ़ा है, पर सिनेमा के परदे पर देखूंगा – ये कभी नहीं सोचा था। और सिनेमा के परदे पर इस तरह देखना कि सच से भी ज्यादा खतरनाक, कई गुना ज्यादा magnified और anti-glorified लगे इसके लिए मैं तैयार नहीं था। ये परदे पर राहुल और श्रुति की honour killing नहीं, मेरी जवानी की जमा की हुई naivety का खून था। ये कुंदन शाह – अज़ीज़ मिर्ज़ा वाले फीलगुड शहर में कुल्हाड़ी लेकर आंखों से खून टपकाता, दौड़ता दैत्य था। (शायद ये उपमाएं खुद से खत्म न हों, इसलिए मुझे रुकना ही पड़ेगा)

और दिबाकर ने बहुत चतुराई से इस दैत्य को छोड़ा। जब तक हमें भरोसा नहीं हो गया कि परदे पर दिखने वाले राहुल और श्रुति हमीं हैं, जब तक हमने उन पर हंसना छोड़कर उनके साथ हंसना शुरू नहीं किया, जब तक बार बार हिलते कैमरे के हम अभ्यस्त नहीं हो गये तब तक हमें उस काली रात में सुनसान रास्ते पर अकेले नहीं भेजा। और उस वक्त, जब बाहर के परेशान कर देने वाले सन्नाटे ने आगाह कर दिया कि अब कुछ बुरा होने वाला है, हम बेबस हो गये। कार रुक गयी, हमें उतारा गया, और…

मिहिर ने District 9 के बारे में लिखा था – ये दूर तक पीछा करती है और अकेलेपन में ले जाकर मारती है। मैं कहूंगा ‘लव सेक्स और धोखा’ की पहली कहानी दूर तक आपके साथ चलती है, और आपके पसंदीदा अकेलेपन में ले जाकर मारती है। और तब आप सोचते हैं – ये आज तक सिनेमा में पहले क्यों नहीं हुआ? या शायद – अब भी क्यों हुआ?

सेक्स

अंग्रेज़ी में इसे ‘hot potato’ कहते हैं। और हमारे यहां नंगे हाथों की कमी नहीं। हमारे देश में सेक्स के बारे में बात करना कुंठा की पहली निशानी माना जाता है। साथ ही दुनिया में सबसे ज्यादा पोर्न वीडियो देखने वाले देशों में भी हमारा नंबर है। दुनिया में सबसे ज्यादा बलात्कार भी किसी किसी दिन भारत में होते हैं और किसी मॉडल के तौलिया लपेटने पर सबसे ज्यादा प्रदर्शन भी। मां-बहन-बीवी-बेटी से आगे हमारी मर्यादा के कोई symbol नहीं हैं, न ही इनके बहुत आगे की गालियां। इतनी सारी complexities के बीच दिबाकर ने डाल दिये दो किरदार – जो भले भी हैं, बुरे भी। इतिहास की चादर भी ओढ़े हुए हैं, और भविष्य की तरह नंगे भी हैं।

एक मर्द है। सभी मर्दों की तरह। अपने बहुत अंदर ये ज्ञान लिये हुए कि ये दुनिया उसी की है। ये जानते हुए कि women empowerment सिर्फ एक बचकाना खेल है – चार साल के बच्चे को डाली गयी underarm गेंद ताकि वो बल्ले से कम से कम उसे छुआ तो पाये। ये जानते हुए कि औरत सिर्फ साक्षी है मर्द के होने की। मर्द के प्यार, गुस्से, बदतमीजी और उदारता को मुकम्मल करने वाली चश्मदीद गवाह।

और सामने एक औरत है। ये जानते हुए कि दुनिया उसकी नहीं। ये जानते हुए कि साहब बीबी और गुलाम में असली गुलाम कौन है। ये जानते हुए कि वो कुछ नहीं अपनी देह के बिना। कुछ नहीं देह के साथ भी, शायद।

जिस cold-blooded नज़र से दिबाकर ने ये कहानी दिखायी है, वो इसे दो बहुत ही अनोखे, एक बार फिर, परेशान कर देने वाले आयाम देती है। पहला – क्या दुनिया भर में लगे कैमरे ‘मर्द’ ही नहीं हैं? ठंडे, वॉयर, सब पर नज़र रखते। दूसरा – इस नये world order, जिसमें कैमरा हमेशा हमारे सर पर घूम रहा है, उससे हमारा आसान समझौता। सैम पित्रोदा ने हाल ही में कहा है कि तकनीकी क्रांति का पहला दौर खत्म हो गया है – सबके पास मोबाइल फोन है, सबके पास इंटरनेट होगा। दूसरा दौर शुरू होने वाला है जिसमें सबको tag किया जाएगा – हर इंसान आसानी से ‘पकड़ा’ जा सकेगा। मेरे लिए ये दोनों आयाम बहुत ही डरा देने वाले हैं। (यहां याद आती है 2006 की शानदार जर्मन फिल्म ‘द लाइव्ज ऑव अदर्ज़’ – एक तानाशाह सरकार की ‘total control’ policy को अमल में लाते छुपे हुए रिकॉर्डर।) भरोसा, जैसा कि इस कहानी में निशा करती है आदर्श पर, बहुत खतरनाक चीज़ हो जाएगी, जल्द ही। खास कर के मर्द-औरत के बीच, सत्ता-प्रजा के बीच, देखनेवाले-दिखनेवाले के बीच।

इसलिए अगर कहा जाए कि इस कहानी में ‘सेक्स’ का असली मतलब सिर्फ ‘सेक्स’ की क्रिया से नहीं बल्कि महिला-पुरुष के फर्क से भी है, तो गलत नहीं होगा। इतनी loaded होने की वजह से ही इस कहानी में cinematic टेंशन सबसे ज्यादा है, (critics’-word-of-the-month) layers भी बहुत सारी हैं और किरदार भी सबसे ज्यादा relatable हैं। एक बार को आपको कहानी अधूरी लग सकती है। मुझे भी लगा कि कुछ और होना चाहिए था – आदर्श का बदलना या निशा का टूटना। लेकिन फिर याद आया कहानी दिबाकर नहीं दिखा रहे – कहानी वो कैमरा दिखा रहा है। जितनी दिखायी वो भी ज्यादा है।

धोखा

Sting operation हमारे लिए नये हैं। कुछ लोगों का मानना है ये ‘डेमोक्रेसी’ के मेच्योर होने का प्रमाण है। कुछ का इससे उल्टा भी मानना है। और कुछ का बस यही मानना है कि इससे उनके चैनल को फायदा होगा। इस तीन अध्याय वाली फिल्म की इस तीसरी कहानी में तीनों तरह के लोग हैं। ये कहानी बाकी दोनों कहानियों के मुकाबले हल्की और दूर की है। या शायद दूर की है, इसलिए हल्की लगी। लेकिन ये पक्का है कि दूर की है। इसलिए बहुत परेशान भी नहीं करती। इसमें भी, दूसरी कहानी की तरह, एक बहुत बड़ा moral decision बीचों-बीच है। लेकिन पहली और दूसरी कहानी के personal सवालों के बाद इसके सवाल बहुत ही दुनियावी, बहुत ही who-cares टाइप के लगते हैं।

शायद दिबाकर यही चाहते हों। कह नहीं सकते। लेकिन ये जरूर है कि तीनों कहानियों की ordering काफी दिलचस्प है। फिल्म बहुत ही impersonal note पर शुरू होती है – और धीरे-धीरे personal होती जाती है। और फिर nudity की हद तक नज़दीक आने के बाद दूर जाना शुरू करती है। और अंत में इतनी दूर चली जाती है कि item song पर खत्म होती है।

लेकिन item song से कुछ बदलता नहीं। ये फिल्म अंधकार का ही उत्सव है। हमारी सभ्यता का एक बेहद disturbing दस्तावेज – जिसने पुराने मिथकों को तोड़ने की कोशिश की है, नये डरों को जन्म दिया है, और अपने एक गीत में साफ़ कहा है – ‘सच सच मैं बोलने वाला हूं – मैं मन का बेहद काला हूं।’

(वरुण ग्रोवर। आईआईटी से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद युवा फिल्‍मकार, पटकथा लेखक और समीक्षक हो गये। कई फिल्‍मों और टेलीविज़न कॉमेडी शोज़ के लिए पटकथाएं लिखीं। 2008 में टावर्स ऑफ मुंबई नाम की एक डाकुमेंट्री फिल्‍म भी बनायी। उनसे varun.grover26@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)