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Sunday, March 28, 2010

वेल डन अब्‍बा : बोमन ईरानी का जलवा - मृत्युंजय प्रभाकर

अच्छे अभिनेताओं की कद्र हमेशा रही है और रहेगी। बोमन ईरानी ने अपनी अभिनय प्रतिभा से अपनी खास पहचान बनाई है और एक अच्छा-खासा दर्शक वर्ग भी। वह जितने सहज तरीके से अपनी भूमिका उत्कृष्टता से निभा ले जाते हैं इस हफ्ते प्रदर्शित दोनों ही फिल्में इस बात की गवाह हैं। दो फिल्में और भूमिकाएं तीन। श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म "वेल डन अब्बा" में बोमन जु़ड़वा भाइयों की दोहरी भूमिका में हैं तो कबीर कौशिक की फिल्म "हम, तुम और घोस्ट" में भूत की भूमिका में। तीनों पात्रों को बोमन ने जितने नेचुरल तरीके से प्ले किया है वह देखने लायक है। बोमन के दर्शकों के लिए यह हफ्ता सच में खास है।

श्याम बेनेगल की फिल्मों में गांव और कस्बायी समाज हमेशा से प्रमुखता से रहा है। उनकी पिछली फिल्म "वेलकम टू सज्जनपुर" भी कस्बायी धरातल की फिल्म थी और लोगों को पसंद आई थी। "वेल डन अब्बा" में बेनेगल एक बार फिर गांव की ओर लौटे हैं और सरकारी लोककल्याणकारी योजनाओं की जो हालत है उसका परीक्षण किया है। हाल ही में आई सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुस्लिम समाज का जो अक्स दिखाया गया है फिल्म उसकी पुष्टि करती है। बहुत दिनों बाद बॉलीवुड में ऐसी फिल्म आई है जिसका मुख्य पात्र एक मुस्लिम किरदार है। फिल्म हल्के-फुल्के संवादों और दृश्यों के माध्यम से आगे ब़ढ़ती है पर कहीं-कहीं खिंच गई है। इस फिल्म की खोज मिनिषा लांबा हैं जिन्होंने अपने काम से सबको प्रभावित किया है। रवि किशन, राजेंद्र गुप्ता, ईला अरुण, यशपाल शर्मा, रजित कपूर आदि भी अपनी भूमिकाओं में जमे हैं।

Saturday, March 27, 2010

फिल्‍म समीक्षा : वेल डन अब्बा:

 हंसी-खुशी के बेबसी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

इन दिनों हम कामेडी फिल्मों में क्या देखते-सुनते हैं? ऊंची आवाज में बोलते एक्टर, बैकग्राउंड का लाउड म्यूजिक, हीरोइन के बेवजह डांस, गिरते-पड़ते भागते कैरेक्टर, फास्ट पेस में घटती घटनाएं और कुछ फूहड़-अश्लील लतीफों को लेकर लिखे गए सीन ़ ़ ़ यही सब देखना हो तो वेल डन अब्बा निराश करेगी। इसमें ऊपर लिखी कोई बात नहीं है, फिर भी हंसी आती है। एहसास होता है कि हमारी जिंदगी में घुस गए भ्रष्टाचार का वायरस कैसे नेक इरादों की योजनाओं को निगल रहा है। श्याम बेनेगल ने बावड़ी (कुआं) के बहाने देश की डेमोक्रेसी को कतर रहे करप्शन को उद्घाटित किया है। उन्होंने आम आदमी की आदत बन रही तकलीफ को जाहिर किया है।

अरमान अली मुंबई में ड्राइवर है। वह अपनी बेटी मुस्कान की शादी के लिए छुट्टी लेकर गांव जाता है। गांव से वह तीन महीनों के बाद नौकरी पर लौटता है तो स्वाभाविक तौर पर बॉस की डांट सुनता है। अपनी नौकरी बचाने के लिए वह गांव में अपने साथ घटी घटनाएं सुनाता है और हमारे सामने क्रमवार दृश्य खुलने लगते हैं। अनपढ़ अरमान अली सरकार की कपिल धारा योजना के अंतर्गत बावड़ी के लिए आवेदन करता है और रिश्वत के कुचक्र में फंस जाता है। रिश्वत के पर्याय भी कितने परिचित शब्द हैं- घंटा, लोटा आदि।

श्याम बेनेगल ने इस बार हैदराबाद के पास की पृष्ठभूमि चुनी है। यहां दकिनी बोली जाती है। गांव के सरपंच से लेकर राज्य मंत्री तक फैले भ्रष्टतंत्र से हम वाकिफ होते हैं और यह भी देखते हैं कि आम जन लामबंद हो जाए तो राजनीतिक पार्टियां उनकी मांगों के आगे मजबूर होती हैं। अरमान अली अपनी बेटी मुस्कान के साथ मिल कर आंदोलन खड़ा करता है और सरकारी नुमाइंदों समेत मंत्री तक को भी जनहित में नए फैसलों के लिए विवश करता है।

बोमन ईरानी, मिनिषा लांबा और इला अरूण ने वेल डन अब्बा के प्रमुख किरदारों के रूप में निर्देशक के उद्देश्य को अच्छी तरह से पर्दे पर उतारा है। बोमन ईरानी की शातिर मासूमियत अच्छी लगती है। वह भोला है, लेकिन हरिशंकर परसाई का बेचारा भला आदमी नहीं रह गया है। शायद इसी भ्रष्ट तंत्र ने उसे चालाक बना दिया है। बोमन ईरानी ने अपनी भूमिका को पूरी सहजता और प्रभाव के साथ निभाया है। बोमन अपनी भंगिमाओं से साधारण संवादों को भी मारकबना देते हैं। मिनिषा लांबा ने मुस्कान के रूप में अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया है। समीर दत्तानी के लिए आरिफ असहज रहा है। सहयोगी कलाकारों में श्याम बेनेगल की टीम के सुपरिचित एक्टर हैं, जो छोटी से छोटी भूमिकाओं में भी अपनी संलग्नता जाहिर करते हैं।

अशोक मिश्र ने रहीम के दोहों का सुंदर उपयोग किया है। शांतनु मोइत्रा का संगीत फिल्म के भाव और अंतस को अच्छी तरह प्रकट करता है।

पुन:श्च - मुस्लिम पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म केमुख्य किरदार मुसलमान हैं, लेकिन वे देश के दूसरे नागरिकों की तरह ही तकलीफ में हैं। फिल्म में हिंसा और आतंकवाद नहीं है।

***1/2 साढ़े तीन स्टार

Wednesday, March 24, 2010

LSD- सरीखी फिल्मों की हमें ज़रुरत है-

LSD- सरीखी फिल्मों की हमें ज़रुरत है
महीने, दो महीने पहले सुनील शानबाग द्वारा निर्देशित नाटक 'सैक्स, मोरेलिटी और सेंसरशिप' देखा था l इसमें गालियों की भरमार थी और मै बार-बार ये सोच रहा था कि शुक्र है हमारे बुज़ुर्ग लोग यहाँ नहीं आये वर्ना उनकी थोथी नैतिकता के पैरों तले हम बेवजह कुचले जाते l इस नाटक में सुनील शानबाग ने 'सखाराम बाइनडर' को उपजीव्य बनाकर इस अनैतिक दौर में 'सैक्स' और 'मोरेलिटी' को डिफाइन करने की सफल कोशिश की है l यह कोशिश सफल इसलिए है कि न सिर्फ यह सैंसरशिप के वास्तविक पैमानों को खोलती है बल्कि इस तथाकथित नैतिकता और मूल्यों के युग में आज के वक़्त की असलियत को सैंसर करने के षड्यंत्र को भी दिखाती है l
'लव,सैक्स और धोखा' में भी मुझे कुछ ऐसा ही अनुभव होता है फर्क सिर्फ इतना है कि वहां असलियत को सैंसर करने के षड्यंत्र को दिखाया गया था और यहाँ असल जिंदगी को, जिससे बहुधा हमें मुँह फेरने की आदत है l मै ये सब बातें फिल्म और नाटकों के सामान्य दर्शक की हैसियत से कह रहा हूँ और मुझे लगता है कि एक सामान्य दर्शक का रेस्पोंस क्योंकि प्रोफैशनैलिटी के दबाव से मुक्त होता है इसलिए उसके महत्व को हमें समझने की कोशिश करनी चाहिए l LSD को देखने के क्रम में यह दर्शक कई वर्गों में हमें दिखता है एक वर्ग वह है जो इस फिल्म में 'सेक्स' की आस लिए गया था हालाँकि इसकी उम्मीद कम है क्योंकि सेक्स दर्शन अब दुर्लभ नहीं रहा उससे वैबसाईट भरी पड़ी है
एक वर्ग और है इसे हम बौद्धिक वर्ग कह सकते है इसने दिबाकर बैनर्जी की पहली दोनों फिल्में 'खोंसला का घोंसला' और 'ओये लक्की, लक्की ओये' देखीं हैं जो दिबाकर के प्रयोगों की प्रगतिशील समझ से वाकिफ है जो वस्तुत: दिबाकर बैनर्जी के इस नए प्रयोग को देखने गया था दिबाकर ऐसे दर्शक को निराश नहीं करते बिलकुल सुनील शानबाग की तरह l

इस फिल्म की रिलीज़ के दिन(१९ मार्च) शाम को जब घर लौटा तो एक मीडिया चैनल पर एक समीक्षक(कुछ अजनबी से) को इस फिल्म को कोसते हुए सुना, यूँ तो वो भी उनकी पिछली दोनों फिल्मों के प्रशंसक थे लेकिन इस फिल्म(लव,सेक्स और धोखा) के शीर्षक में 'सैक्स' शब्द को देखकर ही वे भभक उठे, उन्हें शिकायत थी कि दिबाकर इस फिल्म से समाज में अश्लीलता फ़ैलाने की कोशिश कर रहे हैंl शायद इससे उनकी नैतिकता प्रभावित हुई थीl
तब तक मैंने फिल्म नहीं देखी थी लेकिन जब देखी तो किसी एंगल से भी वो अश्लील या फूहड़ नहीं लगी बल्कि इससे कही ज्यादा सेक्सुअल सीन तो हमें महेश भट्ट की फिल्मों में देखने को मिल जाते हैं l यदि आप उसे अश्लीलता माने तो? हालांकि मै इसे अश्लीलता नहीं मानता यह तो सच्चाई के सारनाथ का छिपा हुआ शेर मात्र है
हालांकि यह फिल्म उन लोगों को निराश कर सकती है जो सिनेमा को एक मनोरंजन और आनंद प्रदान करने वाली विधा मानते हैं, यह उन लोगों में भी खीज पैदा कर सकती है जो इसमें 'लव,सेक्स और धोखा' की जगह 'प्यार,इश्क और मोहब्बत' पर सेक्स कैसे हावी होता है? यह देखने गए हों l साथ ही यह उन लोगों के लिए भी निराशा और गुस्से का सबब साबित हो सकती है जो समाज में व्याप्त अनैतिकता और विद्रूप स्थितियों से मुँह फेरने को ही मूल्य और नैतिकता मानते हों इस तरह के लोग दरअसल एक तरह के यूटोपिया में रहने के आदि हैं लेकिन जो लोग दिबाकर बैनर्जी के काम से परिचित हैं वो इन सब ढकोंसलों को दरकिनार करते हुए एक बौद्धिक दर्शक की हैसियत से इस फिल्म को देखने के खूबसूरत पर खतरनाक एहसास से वाकिफ ज़रूर होंगे l.
दिबाकर का यह नजरिया वाकई काबिलेतारीफ है कि बिना किसी शूटिंग लोकेशन के, बिना किसी बड़े नामी हीरो-हिरोइन के, और फिजूलखर्ची किये बिना वह हमें हमारे समाज-तंत्र की विद्रूप स्थितियों की खबर दे देते है वे दरअसल व्यावसायिक सिनेमा के दौर में जोखिम लेते हुए एक बौद्धिक नज़रिए को कायम रखने का प्रयोग कर रहे है l ये हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम इसे एक पोसिटिव नज़रिए से देखें ना कि इसे एक 'सेक्स को बढ़ावा देने वाली फिल्म' कहकर नकार दें l
सच तो ये है कि इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे आप अनैतिक या सेक्सुअल कहेंगे, यह तीन छोटी डोक्युमेंटरी को मिलाकर बनी एक फिल्म है क्या आज भी प्रेमियों को मौत की सजा नहीं सुनाई जाती? क्या आज भी भारत में ज़्यादातर सेक्स स्कैंडल हिडन कैमरों की मदद से नहीं बनते? क्या मीडिया में 'पैड न्यूज़' या 'ब्लैकमैलिंग' नहीं होती ? अगर दिबाकर इन्हें हमारे सामने रख़ रहे है तो हमें इन्हें एक्सेप्ट करने में हिचक क्यों हो रही है ? क्या फिल्म के शीर्षक में 'सैक्स' शब्द के होने के कारण ही ये बखेड़ा खड़ा हो रहा है यदि ऐसा है तो हमें इससे उबरने की ज़रुरत है l
दिबाकर अपनी इस फिल्म में शायद यह दिखाना चाहते हैं कि छोटा-बड़ा हर कैमरा अपने आप में एक निर्देशक है इन मायनो में निर्देशक, निर्देशक कम एडिटर की भूमिका ज्यादा निभाता जान पड़ता है l क्योंकि कैमरा तो सिर्फ शूट करता है लेकिन निर्देशक उस शूटिंग को (LSD के सन्दर्भ में) सही मायने में एडिट करता चलता है इस फिल्म की तीन कहानियों को एक ही कलात्मक विचार में पिरोने की सफल कोशिश के दौरान दिबाकर डायरेक्टर-कम-एडिटर बन गए हैं ज़रुरत है इस तरह के नए प्रयोगों को तवज्जो देने की ताकि हर गली हर नुक्कड़ पर एक निर्देशक-एक एडिटर का ख्वाब जन्म ले सके l साहित्य में यह कहा जाता है कि ऐसी कोई वस्तु नहीं जिस पर कविता न लिखी जा सके l इस फिल्म के सन्दर्भ में दिबाकर हमें यही बताने की कोशिश करते हैं l
यह फिल्म हमें रश्मि(एक कैरेक्टर) जैसी उन तमाम लड़कियों के बारे में सोचने के लिए विवश करती है जो ना चाहते हुए भी उस स्कैंडल का हिस्सा हैं जिसका दायरा घर से लेकर मीडिया की चहल-पहल और यू-ट्यूब तक फैला है यह फिल्म शायद सबसे दर्दनाक तरीके से एक सांवली, भावुक(ईमानदार) लड़की की बदकिस्मती को ही नहीं दिखाती बल्कि इस ठरकी समाज के उस नंगेपन को भी दिखाती है जो कहता है कि 'कपडे उतारने के बाद काली-गोरी सब अच्छी लगती हैं l'
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Tuesday, March 23, 2010

मर्द,सैक्स और कैमरा-रवीश कुमार

लव,सेक्स और धोखा। पूरी फिल्म में कैमरा वैसे ही देखता है जैसे हमारे समाज में मर्दों की नज़र मौका देखकर लड़कियों को देखती है। इस नज़र को बनाने में कई तरह की परिस्थितियां सहायक होती हैं। कैमरा अलग-अलग एंगल से अपनी नायिकाओं को तंग नज़रों की ऐसी गहराई में धकेलता है जहां हास्य पैदा करने की कोशिश,मर्दवादी विमर्श को ही स्थापित करती है। धोखा कुछ भी नहीं है। सब हकीकत है। हिलता-ड़ुलता एमोच्योर कैमरा अपने बोल्ड दृश्यों को उलट कर लड़कियों की निगाहों से भी मर्दों को देखता तो बराबरी की बात सामने आती। लड़कियों को बेचारी और शिकार की तरह देखकर अब अच्छा नहीं लगता। फिल्म में वो सेक्स को अपने हथियार की तरह इस्तमाल करने की बजाय उसके साथ सरेंडर करती लगती हैं। फिल्म से यह उम्मीद इसलिए कि लव-सेक्स और धोखा बालीवुडीय सिनेमा और न्यूज़ चैनलों का क्रिटिक बनने की कोशिश करता है। निर्देशक की कोशिश है कि जैसा मर्द देखता है वैसा ही दिखा दो।

नीतीश कटारा हत्याकांड की झलक और डिपार्टमेंटल स्टोर में काम करने वाली लड़कियां और टीआरपी की कैद में फंसा एक ईमानदार पत्रकार। चालू गोरी लड़की शादी का कार्ड बांट कर निकल लेती है और सांवली लड़की अपने रूप के बेचारेपन का शिकार होकर यूट्यूब की गलियों में पहुंच जाती है। आत्महत्या से बचकर लौटी मिरिगनयना तू नंगी(बंदी) अच्छी लगती है गाने वाले लकी को फंसाने आती है। नहीं फंसा पाती। कैमरा सेक्स के मर्दवादी नज़रिये के हिसाब से ज़ूम इन होता रहता है। मर्दवादी नज़रिया अपने कैमरे के इस एंगल को जस्टीफाई करने के लिए कहानी का सहारा लेता है।

एक तरह से आप देख सकते हैं कि हमारे समाज में लड़कों की नज़र में लड़कियों को कैसे बड़ा किया गया है। रूप-रंग-अंग। उपभोक्तावादी नज़रिया। जिन पर मर्दों की आंखों का अधिकार है। दिवाकर इस तस्वीर को मुंह पर दे मारते हैं। समाज के इस चिर सत्य को यह फिल्म क्यों बदल दे। इसी विमर्श के हिसाब से एक सवाल उठता है कि सारी बेकार लगने वाली लड़कियां ही नायिका क्यों हैं। कोई सेक्स बम जैसी नायिका नहीं है। उनकी लाचारी ही फिल्म के घटनाक्रम को क्यों आगे बढ़ाती है। किसी का पिता मर गया है तो कोई भाग कर आई है। फिर ठीक है ऐसी लाचार शिकार लड़कियों की कथा क्यों न कही जाए।

कहानी के किरदार बीच बीच में लौट कर अच्छा प्रसंग बनाते हैं। स्टिंग आपरेशन की दुनिया में सरकार गिराने वाला पत्रकार खुद मीडिया के भीतर के स्टिंग में फंसा लगता है। चश्मा,मूंछ और उसका अनस्मार्ट लुक बेचारेपन के साथ मौजूद है। स्टिंग और ब्लैकमेल के विमर्श में अटका हुआ है। फिल्मकार ने संपादिका और चंपू का सही चित्रण किया है। आज मीडिया में जो भी हो रहा है वो इसी तरह के काबिल लोगों की देन है। न कि बाज़ार का दबाव। संपादिका अपने फार्मूले पर कायम है। फार्मूले से उसका विश्वास नहीं हिलता। फिल्मकार उसे जवाब देने की कोशिश नहीं करता। सिर्फ दो दिन का पेमेंट भरवा लेता है। वैसे ही जैसे सूचना मंत्रालय के नोटिसों का जवाब देकर पीछा छुड़ा लिया जाता है।

हिन्दी न्यूज़ चैनलों ने फिल्म कथाकारों को काफी खुराक दिया है। चर्चगेट की चुड़ैल। स्टिंग की दुनिया का सच। जिसे अब न्यूज़ चैनलों ने खुद करना छोड़ दिया है। पर मीडिया का मज़ाक उड़ाना अच्छा लगता है। मीडिया मिशन नहीं है। सत्ता के करीब दिखने के लिए संविधान का अघोषित-अलिखित चौथा स्तंभ बन गया। खुद ही बोलता रहता है कि हम वाचडॉग है। बिना वॉच का डॉग बन गया है मीडिया। ये एक चाल है मीडिया को सत्ता प्रतिष्टान के रूप में कायम करने के लिए। चंद पत्रकारों के मिशन और संघर्षपूर्ण जीवन को भुना कर मीडिया उद्योग बाकी करतूतों को छुपाने के लिए नैतिकता का जामा पहन लेता है। पत्रकार के लिए पत्रकारिता मिशन है। कंपनी के लिए नहीं। एकाध मामूली अपवादों को छोड़ दें तो इसका प्रमाण लाना मुश्किल हो जाएगा। पत्रकारिता सिर्फ और सिर्फ एक धंधा है। जैसे साबुन बेचने वाला अपने साबुन को गोरा कर देने के अचूक मंत्र की तरह पेश करता है वैसे ही मीडिया कंपनी अपनी ख़बरों को। वरना उन लोगों से पूछिये जो न्यूज़ रूम में फोन करते रहते हैं कि बिल्डर ने सोसायटी में ताला बंद कर दिया है। आप प्लीज़ आ जाइये और कोई नहीं जाता। अच्छा है कि अब इस कंफ्यूज़न को विभिन्न मंचों से साफ किया जा रहा है।

फिल्म बालीवुडीय सिनेमा का मज़ाक उड़ाती है। पिछले बीस सालों की एक बड़ी कथा राहुल और सिमरन का मज़ाक। उसे हास्य में बदलकर हमारे समय के सबसे बड़े नायक शाहरूख़ ख़ान के अभिनय क्षमता(जिस पर खुद उन्हें भी संदेह रहता है) का पोल खोल देती है। शाहरूख़ ख़ान बनना सिर्फ एक चांस की बात है। लव सेक्स और धोखा का एक मैसेज यह भी है। लुगदी साहित्य की तरह बनी यह फिल्म हमारे समय की तमाम लुगदियों की ख़बर लेती है। आदी सर का शुक्रिया अदा कर दिवाकर दिखा देते हैं कि फिल्मों का असर कल्पनाओं के कोने कोने में कैसा होता है। कैमरा का बांकपन ही बेहद आकर्षक पहलु है। यह एक बड़ा काम है। होम वीडियो सी लगने वाली कर्मिशयल फिल्म बनाना आसान काम नहीं। एक तरह से आप यह भी देख सकते हैं कि बंबई गए तमाम असफल फिल्मकारों,कथाकारों,नायक-नायिकाओं के सपने इस तरह की फिल्मों के पर्दे पर आकर सुपरहिट फिल्मों और फिल्मकारों को जूता मार रहे हैं। कहानी का नायक इंस्टीट्यूट के लिए फिल्म बना रहा है।

यह फिल्म नहीं है। अ-फिल्म है। किसी महान फिल्म की बची खुची कतरनों से बनाई एक फिल्म। बहुत अच्छा प्रयोग है। फिल्म लोकप्रिय नहीं हो सकती। इंटरवल में जब काफी मांगा तो लड़के ने कहा कि फिल्म ने पका दिया न। कोई देखने नहीं आ रहा। मैंने कहा कि ऐसी बात तो नहीं। तो जवाब मिला कि अच्छा आप पके नहीं। प्रयोग बनाम फार्मूला के बीच फिल्म फंस गई है। वैसे ही जैसे न्यूज टीवी की दुनिया में ईमानदार पत्रकार फंस गया है। वैसे ही जैसे हमलोगों से लोग पूछ देते हैं कि भाई साहब आपके शो की रेटिंग क्यों नहीं आती। इसका जवाब तो है मगर देकर क्या फायदा। जीवन एकरेखीय नहीं होता। कई तरह की धारायें साथ चलती हैं। कभी कोई धारा ऊपर आ जाती है तो कभी कोई नीचे चली जाती है।

कुछ लोगों को पसंद आने वाली फिल्म है। दिवाकर बनर्जी ने फिल्म पर आयोजित सेमिनारों में दिखाये जाने के लिए एक अच्छी फिल्म बना दी है। धीरजधारी लोगों को फिल्म पसंद आएगी। वर्ना न्यूज़ चैनलों के कबाड़ से पात्र उठाकर बनाई गई कहानियों का वही हश्र होता है जो रण से लेकर तमाम फिल्मों का हो चुका है। लगता है कि हमारे समय के कथाकार भी टीआरपी के झांसे में फंस कर अपना पैसा डुबा दे रहे हैं। उन्हें लगता है कि न्यूज़ चैनलों पर दिख रहा है, ज़रूर लोकप्रिय होगा तो बस उससे प्रेरणा लेकर फिल्म ही बना देते हैं। अख़बारों के कॉलमकारों ने इस फिल्म को चार-चार स्टार दिये हैं। फिर भी फिल्म को जनप्रिय बनाने में मदद नहीं मिल रही। कई बार निर्देशक शिकायत करते हैं कि उनकी फिल्म को रिव्यू नहीं मिली इसलिए नहीं चली। इस फिल्म के लिए यह शिकायत नहीं होनी चाहिए। वैसे चलने के लिए ही क्यों कोई फिल्म बनाये। दिवाकर का यही फैसला बड़ा लगता है।

(मूल लेख में कुछ बदलाव किया गया है। कुछ पंक्तियां बाद में जोड़ी गईं हैं)

Monday, March 22, 2010

लव, सेक्स और धोखा समीक्षा - मृत्‍युंजय प्रभाकर

आज लगभग सभी मध्य वर्गीय परिवारों के पास अपना वीडियो कैमरा है जिससे वे अपने दैनिक और खास आयोजनों को वह हमेशा के लिए यादगार के तौर पर सुरक्षित रखना चाहते हैं। मोबाइल फोन में उपलब्ध वीडियो रिकार्डिंग की सुविधा का इस्तेमाल भी खूब हो रहा है लेकिन इन्हीं साधारण उपकरणों से ब़ड़ी फिल्म बनाना उस बॉलीवुड के लिए निश्चय ही ब़ड़ा प्रयोग है जहां फिल्मों का बजट सौ करो़ड़ के आंक़ड़े को छूने को बेताब हो। लेकिन आपके पास जब बेहतर आइडिया हों तो इन छोटे कैमरों से भी ब़ड़ी फिल्में बनाई जा सकती हैं। "खोसला का घोंसला" और "ओय लकी लकी ओय" जैसी वैकल्पिक धारा की फिल्में बनाने वाले निर्देशक दिबाकर बनर्जी ने एक बार फिर अपनी नई फिल्म "लव, सेक्स और धोखा" से दर्शकों को चौंकाया है जिसे साधारण और

घरेलू वीडियो से किया गया है, यहां तक कि मोबाइल से भी।

फिल्म तीन अलग-अलग कहानियां कहती है जो इसके चरित्रों से ज्यादा अपने कथ्य से अधिक जु़ड़ी हैं। तीनों कहानियों के मूल में लव, सेक्स और धोखा है। यह तीनों ही चीजें नमक की तरह हमारी जिंदगी में घुले-मिले हैं जिनसे जीवन के किसी न किसी मो़ड़ पर हमें दो-चार होना प़ड़ा है। सबसे ब़ड़ी बात यह है कि यह फिल्म नायकों की नहीं जीवन और उसकी परिस्थितियों में उलझे चरित्रों की कहानी कहती है जहां न सब कुछ बुरा है न ही सिर्फ अच्छा। प्यार के नाम पर जान दे देने वाले अबोध भी हैं और प्यार के नाम पर शरीर पाकर उसके वीडियो बेचने वाले भी और म्यूजिक वीडियो में काम के नाम पर शरीर मांगने वाले भी। इन सबमें प्यार, सेक्स और धोखे की दास्तान है। कहीं अपना बनाने वाले ही धोखा देते हैं तो कहीं अपनों से ज्यादा पराए काम आते हैं। यही जिंदगी है जिससे आज की युवा और कामकाजी पी़ढ़ी जी रही है। पूरी फिल्म स्टिल वीडियो से शूट की गई है और अभिनेता बहुत ही सहज प्रतीत होते हैं। ऐसे जैसे अभिनय नहीं कर रहे बल्कि अपनी जिंदगी जी रहे हों।

Sunday, March 21, 2010

ऑडिएंस को मैच्योर करनेवाली फिल्मः लव,सेक्स,धोखा-विनीत कुमार

विनीत कुमार की यह पोस्‍ट उनकी अनुमति से चवन्‍नी छाप रहा है। आप भी अगर कुछ सिनेमा पर लिख रहे हैं तो यहां साझा कर सकते हैं। पता है chavannichap@gmail.com

जाहिर है जब सिनेमा के शीर्षक में ही सेक्स शब्द जुड़ा हुआ हो तो उसके भीतर की कहानी आध्यात्म की नहीं होगी। लेकिन ये भी है कि फिल्म LSD(लव,सेक्स,धोखा)सिर्फ और सिर्फ सेक्स की कहानी नहीं है और न ही अब तक की हिन्दी सिनेमा की ग्रामेटलॉजी पर बनी प्यार और धोखे की कहानी है। प्रोमोज के फुटेज से कहीं ज्यादा इन तीनों शब्दों ने फिल्म के प्रोमोशन के फेवर में काम किया हो लेकिन अगर सामान्य ऑडिएंस इन तीनों शब्दों के लालच में आकर फिल्म देखने जाती है तो संभव है कि उन्हें निराश होना पड़े। ले-देकर सुपर मार्केट के सीसीटीवी कंट्रोल रुम की करीब 40-45 सेकंड की सीन है जो फिल्म शीर्षक में जुड़े सेक्स शब्द को सीधे तौर पर जस्टीफाई करती है जहां आदर्श(राजकुमार यादव) और रश्मि(नेहा चौहान)को सेक्स करते हुए दिखाया गया है,सीन का एक बड़ा हिस्सा ब्लर किया हुआ है। इंटरनेट पर आवाजाही करनेवाले लोगों के लिए ये सीन कोई अजूबा नहीं है। हां ये जरुरी है कि फिल्म के भीतर कई ऐसे मौके और घटनाएं हैं जहां कभी प्यार तो कभी धोखा की लेबलिंग में सेक्स एम्बीएंस पैदा करने की मजबूत कोशिशें हैं। लेकिन इस पकड़ने के लिए बारीक नजर और गहरी समझ की जरुरत पड़ती है जो सामान्य ऑडिएंस के लिए मेहनत का काम लगे।

इस सिनेमा की खासियत है कि सिर्फ नाम से ही एक धारणा बन जाती है कि फिल्म के भीतर क्या होगा,नाम और पोस्टर देखकर ही थिएटर के बाहर ही हम फाइनल एंड तक पहुंच जाते हैं कि फिल्म की कहानी क्या होगी। लेकिन दिलचस्प है कि फिल्म देखते हुए धारणा एकदम से टूटती है। अंत क्या कुछ मिनटों बाद समझ आ जाता है कि इन तीनों शब्दों में दिलचस्पी लेनेवाले लोगों के लिए ये फिल्म लगभग धोखे जैसा साबित होती है जबकि जो लोग इन तीन शब्दों को अछूत और'हमारी फैमिली अलाउ नहीं करेगी' मूल्यों को ढोते हुए इसे नहीं देखते हैं तो समझिए कि उन्होंने एक 'रिच फिल्म'को मिस कर दिया। खालिस मनोरंजन और ऑडिएंस की हैसियत से थोड़ा हटकर अगर आप फिल्म और मीडिया स्टूडेंट की हैसियत से इस फिल्म को देख पाते हैं तो ये आपकी सिनेमा की समझ को रिडिफाइन करने के काम जरुर आएगी।

सिनेमा बनानेवालों ने जिस तरह से बॉक्स ऑफिस,कमाई,मार्केटिंग,पॉपुलरिटी आदि मानकों को ध्यान में रखकर सिनेमा का एक फार्मूला गढ़ लिया है,कमोवेश उन तमाम सिनेमा को देखते हुए ऑडिएंस ने भी सिनेमा के भीतर से मनोरंजन हासिल करने का एक चालू फार्मूला गढ़ लिया है। ये फार्मूला कई बार तो बहुत ही साफ तौर पर दिखाई देता है लेकिन कई बार सबकॉन्शस तरीके से। इसलिए LSD के बारे में ये कहा जाए कि इसने बने-बनाए हिन्दी सिनेमा के फार्मूले को तोड़ने की कोशिश की है तो ऐसा कहना उतना ही सही होगा कि इस सिनेमा को देखते हुए ऑडिएंस के मनोरंजन हासिल करने का फार्मूला भी टूटता है। जिस तरह से फिल्म शुरु होते ही घोषणा कर दी जाती है कि इसमें वो सबकुछ नहीं है जो कि बाकी के सिनेमा शुरु से देखते आए हैं और न ही ये उन फिल्मों की उस अभ्यस्त ऑडिएंस के लिए हैं। अगर आप नैतिकता, फैमिली इन्टरटेन्मेंट,ढिंचिक-ढिंचिक गानों की मुराद लेकर इस फिल्म को देखने जाते हैं तो आपकी सलाह है कि घर पर रहकर आराम कीजिए। हिम्मत जुटाकर लव और धोखे की कहानी देखने जाना चाहते हैं तो भी रहने दीजिए। अगर सेक्स के लोभ में जा रहे हैं तो वही 40-45 सेकंड की सीन है जिसके लिए आप इतनी मशक्कत क्यों करेंगे? आप इस फिल्म को तभी देखने जाइए जब आप फिल्म देखने के तरीके और बनी-बनायी आदत को छोड़ना चाहते हैं,आपको सिनेमा के नयापन के साथ-साथ इस बात में भी दिलचस्पी है कि 'हाउ टू वाच सिनेमा?'

सिनेमा की कंटेट पर बात करें तो नया कुछ भी नहीं है। तीन कहानी है और ये तीनों कहानियों से सिनेमा तो सिनेमा हिन्दी के टीवी सीरियल अटे पड़े हैं। पहली कहानी फिल्म स्कूल के एक स्टूडेंट राहुल(अंशुमन झा)की है जो डिप्लोमा के लिए आदित्य चोपड़ा और दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे से प्रेरित होकर एक फिल्म बनाना चाहता है और इसी क्रम में उसे श्रुति(श्रुति) से अफेयर हो जाता है। श्रुति को पाने के लिए वो उसकी फैमिली तक एप्रोच करता है, अपने सिनेमा की सिक्वेंस में उसके बाप की मर्जी से रद्दोबदल करता है और बाप को भी उसमें शामिल करता है। श्रुति की शादी तय हो जाने की स्थिति में दोनों भागकर शादी कर लेते हैं। बाद में श्रुति का बाप दोनों को कॉन्फीडेंस में लेकर वापस अपने घर बुलाता है लेकिन रास्ते में ही उसकी शह पर उसका भाई दोनों के टुकड़े-टुकड़े करके दफना देता है। राहुल और श्रुति का बैग्ग्राउंड अलग है और इस फिल्म को देखते हुए हमें डीयू में हुई ऐसी ही एक घटना की याद आती है। दूसरी कहानी सुपर मार्केट की है जहां सुरक्षा के नाम पर लगे सीसीटीवी कैमरे के फुटेज को चैनलों के हाथों बेचा जाता है,उससे ब्लैकमेलिंग की जाती है। यही रश्मि और आदर्श के बीच अफेयर होता है और उसी सीसीटीवी कंट्रोल रुम में रश्मि अपनी दोस्त श्रुति की मौत की खबर सुनकर हाइपर इमोशनल होती है और आदर्श के साथ सेक्स के स्तर पर जुड़ती है। यहां पर आकर फिल्म का ट्रीटमेंट जरुर नया है। आदर्श इस पूरे सीन को एमएमएस का रुप दे रहा होता है जो कि बाद में इन्टरनेट पर सुपरमार्केट स्कैंडल के नाम से देखा जाता है।..और तीसरी कहानी टीवी जर्नलिस्ट प्रभात(अमित सियाल)और उसका सहारा लेकर मीडिया के भीतर स्टिंग ऑपरेशन को लेकर की जानेवाली तिकड़मों को लेकर है। प्रभात संजीदा टीवी पत्रकार है और वो प्रोफेशन की शर्तों के बीच भी इंसानियत को बचाए रखना चाहता है। इस क्रम में वो मेरठ में नंगी लड़की की तस्वीर नहीं दिखा पाता है और अपनी बॉस से जब-तब ताने सुनता है। वो कास्टिंग काउच की शिकार डांसर मृगनयना/नैना विश्वास(आर्य बनर्जी)को सुसाइड करने से बचाता है। प्रभात के स्टिंग ऑपरेशन से देश की सरकार गिर चुकी है और जो कहानी वो सिनेमा में बताता है वो तहलका की कहानी के करीब है। तहलका को स्टिंग ऑपरेशन का ब्रांड के तौर पर स्थापित किया जाता है। इसी क्रम में वो नैना का बदला लेने के लिए पॉप स्टार लॉकी लोकल(हेनरी टेंगड़ी)का स्टिंग ऑपरेशन करता है। इस हिस्से में मीडिया की जो छवि बनायी गयी है वो फिल्म 'रण'में पहले से मौजूद है। सुपर मार्केट पर जो स्टोरी है वो दरअसल मधुर भंडारकर की एप्रोच का ही विस्तार है जो सिटी स्पेस में नए-नए प्रोफेशन के बीच के खोखलेपन को समेटती है। इसलिए ये फिल्म कंटेंट के स्तर पर अलग और बेहतर होने के बजाय ट्रीटमेंट के स्तर पर ज्यादा अलग है। सिनेमा के तीनों शब्द एक क्रम में अपनी थीसिस पूरी न करके वलय बनाते हैं और कहानी एक जगह सिमटकर आ जाती है। कहानी फिर वहां से अलग-अलग हिस्सों में बिखरती है इसलिए ये सीधे-सीधे फ्लैशबैक में न जाकर रिवर्स,फार्वर्ड में चलती है जो कि हम अक्सर काउंटर नोट करते हुए करते हैं। हां ये जरुर है कि डायलॉग डिलिवरी में कहीं कहीं ओए लक्की लक्की ओए का असर साफ दिखता है।

अव्वल तो ये कि फिल्म को देखते हुए कहीं से नहीं लगता कि हम वाकई कोई फिल्म दे रहे हैं। स्क्रीन पर कैमरे का काउंटर लगातार चलता है,एक तरफ बैटरी का सिबंल है और ठीक उसके नीचे सिकार्डिंग और लाइट स्टेटस। जिन लोगों ने मीडिया में काम किया है उन्हें महसूस होगा कि वो पूरे रॉ शूट से काम के फुटेज का काउंटर नोट करने के लिए वीटीआर में टेप को तेजी से भगा रहे हैं। श्रुति,रश्मि और नैना की कहानी को देखते हुए आपके मुंह से अचानक से निकल पड़ेगा- अरे,ऐसा ही तो होता है,यही तो हमने वहां नोएडा में भी देखा था। फुटेज का जो कच्चापन है जिसमें कि कई बार कुछ भी स्टैब्लिश नहीं होता लेकिन दिखाया जाता है वो संभव है कई बार असंतोष पैदा करे कि इतना तो हम भी कर लेते हैं,इसमें नया क्या है? लेकिन यही से सिनेमा के डीप सेंस पैदा होते हैं। कई अखबारों और चैनलों ने तो कहा ही है कि इस फिल्म की खूबसूरती इस बात में है कि कहीं से नहीं लगता कि किसी भी कैरेक्टर ने सिनेमा के लिए अपने चरित्र को जिया है बल्कि वो स्वाभाविक रुप से ऐसै ही हैं। मुझे लगता है कि इसमें ये भी जोड़ा जाना चाहिए कि ये सिनेमा हमें रिसाइकल बिन में फेंके गए फुटेज से सिनेमा बनाने की तकनीक औऱ समझ पैदा करती है। ऐसा लगता है कि यहां वीडियो एडीटर गायब है लेकिन असर को लेकर कही भी कुछ अनुपस्थित नहीं है।
बीच-बीच में पर्दे का ब्लैक आउट हो जाना,दूरदर्शन की तरह रंगीन पट्टियों का आना,तस्वीरों का हिलना जिसमें कोई कहता है इसका सिग्नल खराब है,इसमें चोर मामू और मामू चोर दिखता है,ये सबकुछ हमें उन दिनों की तरफ वापस ले जाता है जहां से हमने सिनेमा को देखना शुरु किया,खासकर दूरदर्शन पर सिनेमा को देखना शुरु किया। इसमें दूरदर्शन की ऑडिएंस का इतिहास शामिल है। संभवतः हमलोग वो अंतिम पीढ़ी हैं जिसने कि दूरदर्शन पर धुंआधार फिल्में देखी जिसे कि LSD ने पकड़ा है,नहीं तो लगता है ये इतिहास यही थम जाएगा।

कुल मिलाकर ये फिल्म जिसमें कि न गाने हैं,न कोई शोबाजी है ऑडिएंस को 'सिनेमा लिटरेट' करने का काम करती है। एक गहरा असर छोड़ती है कि अच्छा सिनेमा को ऐसे भी दिखाया जा सकता है/अच्छा ऐसे भी देखा जा सकता है? हां ये जरुर है कि सिंगल स्क्रीन में देखनेवाली ऑडिएंस को ये सिनेमा मनोरंजन के स्तर पर निराश करे या फिर ये भी संभव है कि वो थियेटर से ये कहते हुए निकले- चालीस सेकेंड के सीन में ही पूरा पैसा वसूल हो गया,हम तो यही देखने आए थे,बाकी तो सब पहिले से देखा हुआ था। ऐसे में ये फिल्म सेक्स के नाम पर फुसफुसाहट पैदा करने से बाहर निकालती है।

13 खिलाड़ी 1 प्रियंका चोपड़ा

प्रियंका चोपड़ा जल्द ही कलर्स के रिएलिटी शो 'खतरों के खिलाड़ी' के नए सीजन में मेजबान की भूमिका निभाएंगी। इससे पहले भी वह 'डॉन' और 'द्रोण' में एक्शन के कारनामे दिखा चुकी हैं। एक खास बातचीत में उन्होंने बताया कि मेरे पास टीवी शो के आफर आते रहते हैं। मैंने खतरों के खिलाड़ी के लिए इसलिए हां किया कि यह मेरी पर्सनालटी से मेल खाता है। मैं बहुत ही एडवेंचरस, आउटगोइंग और स्पोर्टी हूं। मुझे लगा कि इस शो को मैं अच्छी तरह कर सकती हूं। प्रियंका मानती हैं कि अक्षय कुमार पिछले दो सीजन में इसे एक ऊंचाई पर ले जा चुके थे। मुझे सिर्फ उसे आगे लेकर जाना है।

प्रियंका बताती हैं कि मैं अभी 'डॉन-2' की तैयारी कर रही हूं। उसमें भी काफी एक्शन है। फिल्मों के एक्शन एसपीरिएंस मेरे काम आएंगे। इस शो के लिए मुझे थोड़ी ट्रेनिंग लेनी होगी और ज्यादा फिट होना होगा। इस बार शो को रोमांचक बनाने के लिए प्रतियोगियों के रूप में 13 भारतीय और इंटरनेशनल क्रिकेट खिलाड़ी चुने जाएंगे। चूंकि सारे प्रतियोगी पुरूष हैं, इसलिए खतरों का लेवल ऊंचा रहेगा। कुछ स्टंट तो मैं खुद भी करूंगी ताकि प्रतियोगियों को प्रोत्साहन मिले और मुझे आनंद आए। मूल फार्मेट तो वही रहेगा, लेकिन इस बार मस्ती-मजाक बढ़ जाएगा।

प्रियंका ने बताया कि यह रिएलिटी शो दक्षिण अफ्रीका से शिफ्ट होकर ब्राजील जा रहा है। ब्राजील के घने जंगलों और समुद्रतटों पर इसका आनंद ज्यादा बढ़ जाएगा। क्रिकेट खिलाड़ियों के नामों का अभी फैसला नहीं हुआ है, लेकिन प्रियंका चाहती हैं कि अच्छा मिक्स रहे। अगर हरभजन सिंह हों तो एंड्रयू सिमंड्स भी हों। युवराज सिंह के साथ-साथ ब्रैट ली हों।

आईपीएल की फेवरेट टीम के बारे में पूछने पर प्रियंका ने डिप्लोमैटिक जवाब दिया कि मेरे कई दोस्त आईपीएल में एक्टिव हैं, इसलिए किसी एक को फेवरेट नहीं कह सकती। मेरे लिए तो जो जीत जाए, वही सिकंदर होगा। उन्होंने भविष्य में आईपीएल टीम खरीदने में असमर्थता जताई और कहा कि मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं। 'खतरों के खिलाड़ी' की शूटिंग के बारे में उन्होंने बताया कि विशाल भारद्वाज की फिल्म की शूटिंग खत्म होते ही मैं 'खतरों के खिलाड़ी' करूंगी।

Saturday, March 20, 2010

फिल्‍म समीक्षा : लव सेक्‍स और धोखा

रोमांचक अनुभव देगी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

दिबाकर बनर्जी ने कथ्य और क्राफ्ट की नवीनता से हिंदी फिल्मों में कुछ नया जोड़ा है। लव सेक्स धोखा यानी एलएसडी हिंदी की आम फिल्म नहीं है। यह फिल्म वास्तविक अर्थो में हट के है और दिबाकर की खूबी है कि वे अपनी बात डट के कहते हैं। कई बार नए विषयों की प्रस्तुति में निर्देशक थोड़े डरे रहते हैं। एलएसडी में प्रयोग को लेकर कोई संशय नहीं है। निर्देशक का आत्मविश्वास बैनर के नाम से लेकर अंतिम क्रेडिट रोल तक दिखाई पड़ता है।

एलएसडी में तीन कहानियां हैं। तीनों के किरदार एक-दूसरे से सीधे नहीं जुड़े हैं, लेकिन वे कुछ दृश्यों में एकत्र होकर कथावृत्त तैयार करते हैं। पहली कहानी में फिल्म स्कूल का छात्र अपनी डिप्लोमा फिल्म बनाते-बनाते नायिका बनी अभिनेत्री से प्रेम करने लगता है। फिल्मों के प्रेम से आवेशित वह शादी कर लेता है, लेकिन उसकेप्रेमविवाह का अंजाम फिल्मों की तरह नहीं होता। दूसरी कहानी में डिपार्टमेंटल स्टोर के कर्मचारी के प्रेम और सेक्स को मर्यादित ढंग से चित्रित किया गया है। प्रेमी-प्रेमिका पर पड़ रहे सामाजिक, आर्थिक और नैतिक दबाव को हम महसूस कर सकते हैं। तीसरी कहानी का नायक स्टिंग आपरेशन में भी मध्यवर्गीय नैतिकता का पालन करने से मजाक का पात्र बनता है, फिर भी वह उसे छोड़ नहीं पाता। दिबाकर बनर्जी के किरदार मध्यवर्ग से आते हैं। वे अपने वर्गीय मूल्यों के समर्थन या विरोध में खड़े रहते हैं। एलएसडी में मध्यवर्गीय विसंगतियों और विकृतियों को उन्होंने दृश्यरतिकता (वोयरिज्म) के संदर्भ में चित्रित किया है। यह फिल्म समाज में देखने-दिखाने की बढ़ रही प्रवृत्ति पर सीधे उंगली रखती है। एलएसडी हमारी कमजोर नब्ज पर उंगली रखती है, इसलिए तकलीफ दे सकती है। दिबाकर बनर्जी ने इस फिल्म में हिंदी फिल्मों की टेकिंग, लाइटिंग और दृश्य संरचना के नियमों का पालन नहीं किया है। अस्थिर कैमरे का मूवमेंट दर्शकों को सीट पर स्थिर नहीं रहने देगा। यह फिल्म दूसरी रोचक फिल्मों की तरह मोहक दृश्यों में डुबोती नहीं है। दर्शक उपलाते रहते हैं और सच्चाइयों से रूबरू होते हैं। यकीन करें एलएसडी फिल्म देखने का नया रोमांचक अनुभव देती है।

फिल्म के शीर्षक में सेक्स शब्द आने से मध्यवर्गीय दर्शकों की आशंका बढ़ सकती है, लेकिन यह फिल्म अश्लील या फूहड़ नहीं है। यह फिल्म कामुक दृश्यों से रमती नहीं है, इसलिए उत्तेजना और अश्लील रोमांच से बची रहती है। फिल्म देखते हुए हम वोयरिज्म के प्रभाव से वाकिफ होते हैं। यह फिल्म अप्रत्यक्ष तरीके से एमएमएस और पोर्नो के प्रति सावधान और संवेदनशील करती है। हमें पता चलता है कि हमारे क्षणिक रोमांच के पीछे की असलियत क्या है?

नए कलाकार फिल्म की खासियत हैं। वे सभी पात्रों को विश्वसनीय बना देते हैं। हिंदी फिल्मों के नियमित दर्शक भी अनुमान नहीं लगा सकते कि आगामी दृश्यों में ये पात्र कैसा व्यवहार करेंगे या उनके साथ क्या होगा? इस फिल्म का महत्वपूर्ण किरदार कैमरा है। वह दृश्यों को दिखाने के साथ निर्देशक का दृष्टिकोण भी रखता चलता है।

**** चार स्टार

Friday, March 19, 2010

फिल्‍म समीक्षा : शापित

डराने में सफल 

-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी में बनी डरावनी फिल्में लगभग एक जैसी होती हैं। किसी अंधविश्वास को आधार बनाकर कहानी गुंथी जाती है और फिर तकनीक के जरिए दर्शकों को चौंकाने की कोशिश की जाती है। साउंड इफेक्ट से दृश्यों का झन्नाटेदार अंत किया जाता है और हम अपेक्षित ढंग से अपनी सीट पर उछल पड़ते हैं। विक्रम भट्ट अपनी डरावनी फिल्मों में कुछ अलग करते हैं और दर्शकों में डर पैदा करने में सफल होते हैं।

शापित में अमन अपनी प्रेमिका काया के परिवार को मिले पुराने शाप को खत्म करने के लिए आत्मा की तलाश में निकलता है। इस खोज में डॉ ़पशुपति उसके साथ हैं। पता चलता है किएक दुष्ट आत्मा सदियों पहले दिए अभिशाप की रक्षा कर रही है। उस आत्मा की मुक्ति के बाद ही शाप से मुक्त हुआ जा सकता है। चूंकि अमन और काया के बीच बेइंतहा प्यार है, इसलिए अमन हर जोखिम के लिए तैयार है।

विक्रम भट्ट ने स्पेशल इफेक्ट से दृश्यों को डरावना बनाने के साथ उनके पीछे एक लॉजिक भी रखा है। अपनी खासियत के मुताबिक उन्होंने मुख्य किरदारों की प्रेमकहानी में दुष्टात्मा को विलेन की तरह पेश किया है। अतीत में लौटने केदृश्य सुंदर हैं। विक्रम ने पीरियड गढ़ने और उन्हें फिल्मांकित करने में अपनी दक्षता दिखाई है। कला निर्देशक से उन्हें इस फिल्मांकन में भरपूर सहयोग मिला है।

पहली फिल्म के लिहाज से आदित्य नारायण निराश नहीं करते। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ अमन के किरदार को निभाया है। कद-काठी में हिंदी फिल्मों के हीरो की प्रचलित छवि से अलग होने के बावजूद आदित्य नारायण अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं। नयी अभिनेत्री श्वेता अग्रवाल निराश करती हैं। दोनों के बीच आवश्यक केमिस्ट्री पैदा नहीं हो पाई है। छोटी भूमिका में भी शुभ जोशी पर ध्यान जाता है।

*** तीन स्टार

Thursday, March 18, 2010

शीर्षक में सेक्‍स लिखने का साहस

-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्मों में सेक्स की चर्चा बार-बार होती रहती है, लेकिन सेक्स का तात्पर्य सिर्फ उत्तेजक, कामुक, मादक और वासनात्मक दृश्यों से रहा है। हम इसे यौनाकर्षण भी कह सकते हैं। सेक्स यानी कामवासना और रतिक्रिया से हिंदी फिल्में परहेज करती रही हैं। फूलों के टकराने से लेकर जिस्मों के लहराने तक आज भी हिंदी फिल्मों के पर्दे पर रतिक्रिया प्रतीकात्मक या संकेतात्मक रूपों में चित्रित होती रही है। अतीत में अवश्य भारतीय विषयों ने कामशास्त्र की रचना की, लेकिन व‌र्त्तमान में यह वर्जित विषय है। इस पर न तो खुली बहस होती है और न लोकप्रिय माध्यम में इसके चित्रण की अनुमति मिलती है। इस परिप्रेक्ष्य में दिबाकर बनर्जी की फिल्म लव सेक्स और धोखा का शीर्षक चौंकाता है। पहली बार किसी फिल्म निर्देशक ने शीर्षक में ही सेक्स शब्द रखा है। खोसला का घोसला और ओय लकी लकी ओय दोनों ही फिल्मों में दिबाकर बनर्जी ने समाज की सतह के नीचे के बात-व्यवहार-प्रवृत्ति को रोचक शैली में प्रस्तुत किया था। ऊपरी तौर पर हास्य और मनोरंजन से भरपूर ये फिल्में ठहर कर सोचने पर मर्माहत करती हैं। लकी को चोरी के रास्ते पर धकेलने में पूरा समाज शामिल है। खोसला और खुराना के बीच मूल्यों का अंतर आ चुका है। दिबाकर की दोनों ही फिल्में हिंदी फिल्मों की प्रचलित नैरेटिव का इस्तेमाल नहीं करतीं। वे नई बात कहते हैं, इसलिए नए तरीके अपनाते हैं। लव सेक्स और धोखा में तीन कहानियां साथ-साथ चलती हैं। लव, सेक्स और धोखा के भाव पर केंद्रित तीनों कहानियां हमारे समाज की विसंगतियों को मार्मिक और तार्किक तरीके से उजागर करती हैं। दिबाकर बनर्जी मानते हैं कि लव और सेक्स की हमारी धारणा मुख्य रूप से फिल्मों और मीडिया से बनी है। हम अनचाहे ही निजी जिंदगी में या तो फिल्मों की नकल करने लगते हैं या फिर प्रेमी-प्रेमिका से वैसी ही चाहत रखते हैं। हम भूल जाते हैं कि वास्तविक जीवन में प्रेमी प्रेमिका एक-दूसरे की बांहों में हों तो भी पाश्‌र्र्व में वायलिन नहीं बजते और न ही सुरम्य वादियों की पृष्ठभूमि तैयार होती है। इस देश के अधिकांश प्रेमी-प्रेमिका असुरक्षित माहौल में मिलते हैं। समाज से जगह और समय चुरा कर प्रेम करते हैं। दिबाकर मानते हैं कि डिजिटल युग में लव और सेक्स देखने-दिखाने की चीज बन चुकी है। कुछ सेकेंड और मिनट के एमएमएस या फुटेज देखते समय हम अपनी कामुक इच्छाओं की भरपाई करते हैं। हमारे मानस में क्षण भर के लिए भी खयाल नहीं आता कि एमएमएस में मौजूद दोनों व्यक्तियों को किस अवस्था और परिस्थिति में कैमरे में कैद किया होगा और फिर उनके निजी पलों को किसी ने सार्वजनिक कर देने की हिमाकत की होगी। कीहोल से किसी के बेडरूम में झांकने का स्फुरण आखिरकार मानसिक विकृति ही है। सेक्स जैसे वर्जित विषय पर फिल्म बनाना दिबाकर जरूरी समझते हैं और इसकी वकालत करते हैं। उनकी राय में हम फिल्मों में वायलेंस और एक्शन देखते हैं, जबकि सेक्स से परहेज करते हैं। शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा मिले, जिसने अपनी जिंदगी में सेक्स न किया हो। स्त्री-पुरुष का यह स्वाभाविक मानवीय व्यवहार है, जबकि एक-दूसरे की जान लेना अमानवीय और अस्वाभाविक है। फिर ऐसी स्वाभाविक क्रिया से परहेज के पाखंड की क्या जरूरत है, जबकि वायलेंस को स्वीकृति मिली हुई है। दिबाकर को नहीं लगता कि भारतीय दर्शकों को लव सेक्स और धोखा शीर्षक से कोई विरक्ति होगी। इस फिल्म का एक गीत तू नंगी अच्छी लगती है आपत्तियों के बाद तू गंदी अच्छी लगती है कर दिया गया है। शब्दों के इस फेरबदल के बावजूद फिल्म का भाव वही है। लव सेक्स धोखा हम सभी के अंदर मौजूद दृश्यरतिकता को छूती है और उसके प्रति सचेत करती है।

Sunday, March 14, 2010

‘आमिर’ होने में कोई बुराई नहीं ......................................

आमिर के जन्मदिन के मौके पर कनिष्क क यह लेख चवन्नी के पाठकों के लिए है.आप भ चाहें तो यहाँ लिख सकते हैं.अपने लेख chavannichap@gmail.com पर पोस्ट करें.साथ इस लेख पर अपनी राय दें.युवा लेखक को प्रोत्साहन मिलेगा।

14 मार्च जन्‍मदिन पर विशेष

-कनिष्क राज सिंह चौहान

परफ़ेक्‍शनिस्‍ट और भेरोसेमंद के इतर आमिर के लिए अब ज़िम्‍मेदार या ज़वाबदेह जुमले का इस्‍तेमाल किया जाए तो ज़्यादा बेहतर होगा. पिछले 10 सालों में आई उनकी फ़िल्‍में उन्‍हें ज़्यादा ज़वाबदेह साबित करती है. जवाबदेही दर्शकों, सिनेमा और बाज़ार के प्रति. और कुछ हद तक समाज के लिए भी. आमिर के चाहने वालों की तादाद में अचानक से काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई है ख़ासकर युवा वर्ग ने एक रोल मॉडल की तरह उसे अख्तियार किया है. इसकी वजह उसकी फ़िल्‍मों से ज़्यादा उसका परसोना है, जो दृढ़, विश्‍वसनीय और नैतिक है. इसी व्यक्तित्व को दर्शक उसके किरदारों से भी जुड़ा पाते हैं.

होली से इडियट्स तक उसने गज़ब की तरक्‍की की है. शुरुआती अंतराल में कुछ 'डिज़ाज़्टर' भी उसके नाम रही लेकिन संभलते हुए आगे दोहराव से बचा रहा. उसे कबूलने में भी हर्ज़ नहीं कि उसके करियर की सबसे बड़ी गलती पहली सफलता के बाद एक साथ नौ फ़िल्‍में साइन करना रही. इन नाकामयाबियों ने आलोचकों के मुँह खोल दिए. हालाँकि दिल, हम हैं राही प्‍यार के, दिल है कि मानता नहीं, जो जीता वही सिकंदर के मार्फ़त उसने वन फ़िल्‍म वंडर मानकर ख़ारिज़ करने वालों के मुँह पर फिर ताले भी जड़े. लेकिन ये सिर्फ व्‍यावसायिक कामयाबियाँ थीं.असल फ़िल्‍म रंगीला थी जिसने ना सिर्फ आमिर की अदाकारी का लोहा मनवाया बल्‍कि उसकी सिनेमाई समझ को लोगों के सामने पुख्‍़ता किया जिसे पहले दख़ल कहा जा रहा था. इसके बाद गुलाम, अर्थ, सरफ़रोश से उसका कद बढ़ना शुरु हुआ.

आमिर के फ़िल्‍मों में सार्थकता और व्‍यावसायिकता का अनूठा सम्‍मिश्रण देखने को मिलता है. जो एक अदाकार और स्‍टार के रूप में उसे ज़्यादा घनिष्‍ठ बनाता है और उसे दिलीप कुमार और अमिताभ बच्‍चन के श्रेणी में ला खड़ा करता है. भले ही उसके पास असरदार कद काठी और आवाज़ ना हो और भले ही उसने अवसाद और आवेग प्रधान किरदार ना जिए हों. लेकिन नेकनीयती और सिनेमा के प्रति ईमानदारी लिजेंड्स के बीच उसके लिए जगह बनाती है. कहने को उसके हिस्‍से में कागज़ के फ़ूल, जागते रहो जैसी महानता ना हो लेकिन लगान, बसंती और तारे देखते वक्‍़त हृदय कुछ वैसा ही स्‍पंदित होता है. उसे गुरुदत्‍त, दिलीप या संजीव कुमार की तरह इमोशंस की अदायगी के मौके ना मिले हों लेकिन कोई शक नहीं यदि कोई प्‍यासा उसके हिस्‍से आई तो वह निराश नहीं करेगा. बसंती और तारे में इसकी झलक देखने को मिलती भी है. चाहे वह मुँह में निवाला लिए रोता डीजे हो या इशान की परेशानी बताते वक्‍त पानी का गिलास माँगता राम शंकर निकुंभ. आमिर ने भावनाएँ उड़लने में कभी कोताही नहीं बरती.

एक वक़्त में एक फ़िल्‍म करना कोई आसान काम नहीं ख़ासकर तब जबकि आप बड़ी व्‍यावसायिक ताकत बन चुके हों, लेकिन आमिर एक वक्‍़त पर कई फ़िल्‍म करने से बेहतर एक फ़िल्‍म के सारे पहलुओं पर नज़र रखने को ज़्यादा बेहतर मानते हैं. उनकी फ़िल्‍म के हर पक्षों पर उनका असर होता है. आमिर के पास एक सुलझा हुआ सिनेमाई दिमाग है जो उससे सर्वश्रेष्‍ठ दिलवाता है भले ही वह नए निर्देशकों से काम कर रहा हो. धर्मेश दर्शन, जॉन मैथ्‍यू, फ़रहान अख्‍़तर हो या आशुतोष गोवारीकर, इन्‍होंने अपना सर्वश्रेष्‍ठ आमिर के संग ही दिया है.

आमिर क्रिटिकल होने के मौके कम ही देता है. उनकी खूबियों को नज़रअंदाज़ करते हुए उनका कायल ना होना वाकई एक मुश्‍किल काम है. किसी कलाकार के लिए इससे बड़ी उपलब्‍धि नहीं हो सकती कि उसके आलोचकों को उसकी तारीफ़ करना पड़े. गज़नी के बाद सिनेमा की एक अग्रणी मैगज़ीन को आमिर की तारीफ़ में लिखना ही पड़ा कि हम आखिर कब तक उस आदमी को नकारते रहें जिसे हम पसंद नहीं करते जबकि वह शानदार है. वैसे बसंती और तारे के बाद गज़नी और इडियट्स करने को कई आलोचकों ने हाथ वापस खींचना बताया और आमिर को सीमित करार दे दिया. बहरहाल इससे सीमित होने की बजाय वर्सेटाइल होने का भान ज़्यादा होता है. ये कुछ स्पीलबर्ग के शिडनर्स लिस्ट्स के बाद लोस्ट वर्ल्ड में डायनासोरस की ओर लौटने सा है. गज़नी के बाद एक प्रख्या़त समीक्षक ने टिप्‍पणी भी की थी कि यह आमिर की फ़िल्म नहीं लगती, इसके ज़रिए आमिर ने मसाला फ़िल्मों के सुपरसितारों को बताया है कि मैं भी ऐसी फ़िल्में कर सकता हूँ और ज़्यादा बेहतर तरीके से.

ना उसकी फ़िल्‍मों में, ना किरदारों में दोहराव देखने को मिलता है. चाहे रंगीला का मुन्‍ना हो या गुलाम का सिद्धू दोनों ही टपोरी मुंबई के अलग-अलग कोनों के लगते हैं. जो जीता वही सिकंदर, दिल चाहता है, बसंती और इडियट्स के कॉलेज स्‍टूडेंट में भी ढूँढें कोई समानता नहीं मिल पाती. वह हर फ़िल्‍म में राहुल और राज नहीं है. मुन्‍ना, सिद्धू, राजा, अजय सिंह राठौड़, भुवन, आकाश, डीजे, संजय सिंघानिया, रैंचों जैसे कई किरदार उसने भारतीय सिनेमा को बख्‍़शे हैं. वह अपने सुपरस्‍टार के दायरे में रहते हुए भी पेरेलल सिनेमा के घेरे में हो आया है. वह सिर्फ बेहतरीन फ़िल्‍मों से जुड़ना चाहता है अब तक कि फ़िल्‍में कितनी बेहतरीन रही है ये बहस का विषय हो सकता है लेकिन अपनी तरफ़ से उसने हमेशा बेहतरी का प्रयास किया है.

बाज़ार के दबाव को सहते हुए भी सार्थक सिनेमा और कलात्‍मक संतुष्‍टि ख़ोजने वाले आमिर सचमुच सम्‍मान के हकदार हैं. पता नहीं शाहरूख़, सलमान, अक्षय को आगे आने वाला वक्‍़त किसलिए याद रखे लेकिन आमिर को सीमाओं से परे जाकर काम करने वाले कलाकार के रूप में याद किया जाएगा. वह सही मायनों में लीडर है जो फ़िलहाल भारतीय सिनेमा को लीड कर रहा है. वैसे आमिर का अर्थ भी लीडर है, इसलिए आमिर होने में को़ई बुराई भी नहीं. जन्‍मदिन मुबारक.

Saturday, March 13, 2010

फिल्‍म समीक्षा : राइट या रांग,न घर के न घाट के,हाइड एंड सीक

-अजय ब्रह्मात्‍मज

राइट या रांग


पुरानी शैली का अपना आकर्षण होता है। हम आज भी पुरानी फिल्में पसंद करते हैं। उन्हें देखते हैं। ठीक उसी तरह पुरानी शैली में बनी नई फिल्म भी पसंद आ सकती है। नीरज पाठक ने कसी हुई स्क्रिप्ट लिखी है। वे दर्शकों को कुछ और सोचने का मौका नहीं देते, इसी वजह से कुर्सी पर लाचार बैठे सनी देओल को देखकर भी कोफ्त नहीं होती। इंटरवल में हाल से बाहर निकलने और फिर लौटने के बीच हम आगे की कहानी बुनते हैं, लेकिन नीरज पाठक रोमांचक झटका देते हैं। फिल्म एक नया मोड़ लेती है, जिसमें राइट और रॉन्ग के बीच का फर्क मिटने लगता है।

अजय और विनय की इस कहानी में अजय की बीवी, विनय की बहन और अजय का कजिन शामिल हैं। ईमानदार, जांबाज और विलपावर का धनी अजय रिश्तों के पेंच से टूट जाता है। वह एक फूलप्रूफ व्यूह रचता है। बदला लेने के बाद सभी की आंखों में धूल झोंक कर कोर्ट से बाइज्जत बरी हो जाता है, लेकिन वह अपने राइट दोस्त को रॉन्ग होते नहीं देख पाता। उसे सच बता देता है। दोस्ती, प्रतिद्वंद्विता, छल, विवाहेतर संबंध, लोभ, वासना और पिता-पुत्र के रिश्तों को समेटती राइट या रॉन्ग आखिर तक दिलचस्प बनी रहती है।

ईषा कोप्पिकर के लिए यह चुनौतीपूर्ण भूमिका थी, लेकिन लेखक उनके किरदार को गहराई और विस्तार नहीं दे पाए हैं। पूरी फिल्म मुख्य रूप से अजय और एक सीमा तक विनय पर निर्भर करती है। अजय और विनय की भूमिकाओं में सनी देओल और इरफान निराश नहीं करते। इरफान मामूली दृश्यों में भी अनोखे अंदाज से दर्शकों को लुभा ले जाते हैं। सनी देओल अपनी छवि से आज भी नहीं निकल पा रहे हैं। उनकी पिस्तौल से निकली गोली लगती है तो आदमी हवा में लहरा जाता है। कभी लगता है कि पीछे दीवार न हो तो वह कहां जाकर गिरेगा? कोंकणा सेन शर्मा को मिली भूमिका इंटरवल के बाद जोड़ी गई लगती है।

राइट या रॉन्ग की खूबी उसका लेखन है। निश्चित ही इसके लिए नीरज पाठक और उनके सहयोगी गिरीश धमीजा और संजय चौहान बधाई के पात्र हैं।

*** तीन स्टार



न घर के न घाट के

हिंदी सिनेमा का एक पहलू न घर के न घाट के है। ऐसी फिल्में इन दिनों लगभग नहीं बनती हैं। गांव से शहर आए मासूम हीरो की कहानी में मुंबई के निर्देशकों की रुचि नहीं रही। राहुल अग्रवाल ने हिंदी सिनेमा के उन दर्शकों को तोहफा दिया है, जो सरल गंवई किरदारों की कहानियां देखना पसंद करते हैं।

देवकी नंदन त्रिपाठी को मुंबई में नौकरी मिलती है। वे अपना टीनहा बक्सा और अचार-पकवान लेकर मुंबई पहुंच जाते हैं। मुंबई में एक टपोरी मदन खचाक के साथ उनके रहने का जुगाड ़ बैठता है। बाद में माता-पिता उनकी बीवी को लेकर मुंबई आते हैं। पुलिस धोखे से उनकी बीवी को बार गर्ल समझकर गिरफ्तार कर लेती है। देवकी को कहा जाता है कि वह प्रूफ करे कि मिथिलेश कुमार उसकी पत्‍‌नी हैं। सत्यापन के कई मजेदार प्रसंगों से गुजरने के बाद फिल्म एक संदेश भी देती है कि विवाह का प्रमाणपत्र अवश्य बनवा लेना चाहिए।

मुंबई के समंदर में गांव की नइया के हिचकोलों में आनंद है। यह फिल्म शहर बनाम गांव पर नहीं है। दो सोच, लाइफ स्टाइल, आदतों और जरूरतों को लेकर बनी न घर के न घाट के गांव के सरल जीवन की मासूमियत के साथ शहरी जीवन की हकीकत का बयान करती है। दोनों के बीच भेद है। कोई टकराहट नहीं है।

इस फिल्म की जान रवि किशन हैं। उन्होंने मदन खचाक के किरदार को फूहड़ और अश्लील नहीं होने दिया है। भाषा और तहजीब में टपोरी होने के बाद भी रिश्तों और भावनाओं के प्रति मदन संवेदनशील है। लेखक ने बड़ी होशियारी से नए अभिनेता राहुल अग्रवाल को परेश रावल, ओमपुरी या रवि किशन के साथ जोड़कर दृश्यों को सरस बनाए रखा है। हालांकि ओम पुरी और परेश रावल की मौजूदगी फिल्म को रोचक बनाती है, लेकिन वे अपनी तरफ से फिल्म में कुछ नहीं जोड़ते हैं।

मल्टीप्लेक्स के दर्शकों के बीच जगह बनाने की होड़ में फंसी यह फिल्म उन्हें कम पसंद आएगी। सिंगल थिएटर और छोटे शहरों के दर्शकों के लिए यह मनोरंजक फिल्म है।

**1/2 ढाई स्टार


हाइड एंड सीक

शॉन आरान्हा की हाइड एंड सीक साइकोलोजिकल सस्पेंस थ्रिलर है। कुछ परिचित और कुछ अपरिचित कलाकारों के साथ बनी इस फिल्म की यही विशेषता है कि इसमें नयापन शॉन ने अलग किस्म की रोमांचक कहानी चुनी है। उसे नए तरीके से फिल्मांकित भी किया है।

बारह सालों के बाद कुछ किरदार एक शापिंग माल में बेहोशी से जगते हैं। उन्हें किसी ने बंद शापिंग माल में डाल दिया है। रात के अंधेरे में उन पर हमले होते हैं और एक-एक कर चार किरदारों की मौत होती है। सिर्फ दो बचे रह जाते हैं। उनमें से एक ने ही यह साजिश रची है। फिल्म की खूबी है कि अंत तक सस्पेंस बना रहता है।

सस्पेंस फिल्मों के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म रोचक लग सकती है। कलाकारों में अर्जन बाजवा, पूरब कोहली, मृणालिनी शर्मा और अमृता पटकी ने सुंदर अभिनय किया है।

** दो स्टार


Thursday, March 11, 2010

दरअसल : हिंदी फिल्में और क्रिकेट

-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्में किसी आपदा, विपदा, खुशी और गम से संचालित नहीं होतीं। हर समय और मौसम में उनकी मांग बनी रहती है। आम दर्शक को इससे सस्ता मनोरंजन नहीं मिलता, इसलिए वे हर सूरत में सिनेमाघरों की ओर रुख करते हैं, लेकिन पिछले दो साल से आयोजित आईपीएल के क्रिकेट मैचों ने इस धारणा को बदला है। 2008 में आयोजित पहले आईपीएल के समय यह संभावना व्यक्त की गई थी कि इससे फिल्मों का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन प्रभावित होगा। वास्तविक आंकड़े कभी नहीं मिल पाते, लेकिन ट्रेड पंडितों ने बताया कि आईपीएल की वजह से फिल्में अपेक्षित व्यवसाय नहीं कर सकीं। पिछले साल आईपीएल दक्षिण अफ्रीका चला गया था, फिर भी हिंदी फिल्मों का व्यवसाय प्रभावित हुआ। इस साल आईपीएल की तारीखों की घोषणा के साथ बड़ी फिल्मों ने किनारा कर लिया है। कुछ फिल्में आईपीएल के पहले और कुछ बाद में खिसक गई। सबने बिजनेस और कलेक्शन को ध्यान में रखकर ऐसा किया। अभी तक जो संभावना और धारणा थी, वह वास्तविकता बन चुकी है। फिल्म निर्माता और इस कारोबार से जुड़े सभी व्यक्तियों ने स्वीकार कर लिया है कि आईपीएल के दौरान फिल्में रिलीज करना जोखिम का काम है। कुछ फिल्में जरूर रिलीज हो रही हैं, लेकिन कहा जा रहा है कि इन फिल्मों पर कोई बड़ा दांव नहीं लगा है।

गौर करें, तो आईपीएल के दौरान मल्टीप्लेक्स में दर्शकों की गिरावट देखी गई थी। हालांकि यह गिरावट बुरी या छोटी फिल्मों की वजह से भी हो सकती है। वैसे भी अस्सी फीसदी फिल्में पर्याप्त दर्शक न मिलने से फ्लॉप होती हैं। निर्माता, वितरक और स्टार अपनी फिल्मों की क्वालिटी का मूल्यांकन करने की बजाय बाहरी कारणों से दिल बहलाते हैं। पिछले दो साल में आईपीएल के दौरान फ्लॉप हुई फिल्मों को आईपीएल का जोरदार बहाना मिला। इस बार एहतियातन निर्माता और वितरकों ने फिल्म की रिलीज आगे-पीछे खिसका दी, लेकिन क्या गारंटी है कि आईपीएल के बाद रिलीज होने पर उनकी साधारण फिल्मों को पर्याप्त दर्शक मिल जाएं?

मल्टीप्लेक्स के थिएटरों ने इस बार आईपीएल के दौरान फिल्म और दर्शकों की मंदी से निबटने का कारगर तरीका निकाला है। उन्होंने फिल्म व्यवसाय को नुकसान पहुंचाने वाले कारण को ही आय का साधन बना लिया है। इस साल क्रिकेट के दर्शक आईपीएल के मैचों का सीधा प्रसारण मल्टीप्लेक्स के बिग स्क्रीन पर देखेंगे। मालूम नहीं, दर्शकों को कितनी रकम खर्च करने के बाद यह आनंद मिलेगा। हां, इतना तय है कि मल्टीप्लेक्स के मालिक पिछले दो साल में आईपीएल के दौरान होने वाले नुकसान की इस साल भरपाई कर लेंगे। खबर है कि आईपीएल मैचों का टिकट 500 रुपये का होगा। यह भी देखना होगा कि कितने दर्शक थिएटरों की ओर रुख करते हैं। घर में टीवी पर क्रिकेट मैच देखते समय यह सुविधा रहती है कि आप फोन कर लें या कोई दूसरा छोटा-मोटा काम कर लें। थिएटर में जाने पर पूरा समय क्रिकेट मैच में ही बीतेगा।

देश के दो प्रमुख शगल क्रिकेट और फिल्म का यह अद्भुत मिलन ट्रेड पंडित और मीडिया महंतों को व्यवसाय के नए अवसर देगा। अगले साल इस अवसर के दोहन की ठोस रणनीति भी नजर आएगी। थिएटर में क्रिकेट दिखाने के इस साल के प्रयोग के परिणाम पर अगले साल की रणनीति और योजनाएं निर्भर करेंगी। फिलहाल ऐसा लग रहा है कि आईपीएल के दौरान फिल्मी मनोरंजन लगभग ठहर जाएगा, लेकिन क्या ऐसा ही होगा?


Sunday, March 7, 2010

स्‍टार प्रोफाइल : अजय देवगन

-अजय ब्रह्मात्‍मज
मुंबई के लोकप्रिय स्टारों के नाम डालकर इंटरनेट सर्च करें तो नतीजों से आप चौंक जाएंगे। कम लोगों को सर्च रिजल्ट पर यकीन होगा। थोड़ी देर के लिए आप भी हैरत में पड़ जाएंगे कि क्या सचमुच अजय देवगन अपनी पीढ़ी के सबसे व्यस्त अभिनेता हैं? उनकी अतिथि तुम कब जाओगे अभी रिलीज हुई है और पांच फिल्में कतार में हैं। उनमें से टुनपूर का सुपरहीरो और राजनीति पूरी हो चुकी है। बाकी तीन गरम हवा, वन्स अपऑन अ टाइम इन मुंबई और गोलमाल-3 निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं। लंबे समय के बाद अजय देवगन की एक्शन फिल्म दिसंबर में आरंभ हो जाएगी, जिसे उनके चहेते डायरेक्टर रोहित शेट्टी डायरेक्ट करेंगे।

[काफी व्यस्त है शेड्यूल]

बगैर शोरगुल और मीडिया हाइप के अजय देवगन अपने काम में मशगूल रहते हैं। शूटिंग ने इतना व्यस्त कर रखा है कि वे अपने ही घर में अतिथि की तरह आते हैं। पिछले दिनों तमिलनाडु के मदुरै शहर में गरम हवा के सेट पर उनसे मुलाकात हुई, बताने लगे, ''इस फिल्म की शूटिंग के बाद मुंबई लौटूंगा। वहां चंद दिनों की शूटिंग करने के बाद गोलमाल-3 के लिए गोवा चला जाऊंगा। इस बीच वन्स अप ऑन अ टाइम की बाकी शूटिंग एवं राजनीति के प्रमोशन के सिलसिले में देश-विदेश के शहरों में जाना होगा।'' इधर माय नेम इज खान के प्रोमोशन में काजोल भी व्यस्त थी। पति-पत्नी लंबे अर्से के बाद गरम हवा के सेट पर ही कराईकुडी में मिले। व्यस्त स्टारों की जिंदगी में ऐसी तनहाइयां आम हैं। अगर मियां-बीवी दोनों एक्टिव हों तो ऐसी तनहाई आफत लगती है। घर-परिवार से दूर उन्हें हफ्तों बाहर रहना पड़ता है।

[असमंजस से आत्मविश्वास तक]

एक्शन डायरेक्टर वीरू देवगन के बेटे अजय देवगन का आरंभ से ही फिल्मों से लगाव रहा। हर युवक की तरह शुरू में वे भी स्पष्ट नहीं थे कि क्या करना है? आरंभिक झुकाव निर्देशन की तरफ रहा। शेखर कपूर और दीपक शिवदासानी की सहायक रहे। अतीत के पन्नों को पलटते हुए अजय ने कहा, ''मेरे पिता फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा था। फिल्मी आंगन में ही मैं बड़ा हुआ। शुरू में खुद वीडियो फिल्में बनाई और शेखर एवं दीपक का सहायक रहा। निर्देशन में संभावनाएं दिख रही थीं। एक्टर बनने को लेकर ज्यादा आश्वस्त नहीं था। इतना तय था कि फिल्मों में ही कुछ करना है। सच कहूं तो फूल और कांटे मिलने तक असमंजस में था। फिल्म चली, दर्शकों का प्यार मिला और मुझे अपनी पहचान के साथ अपने पांव पर खड़े रहने की जमीन मिल गई।''

[आंखों की वह उदास बेचैनी]

फूल और कांटे के प्रीमियर का निमंत्रण लेकर अजय देवगन महेश भट्ट से मिलने गए थे। महेश भट्ट ने उस लमहे को याद करते हुए लिखा है, ''हमलोग संजय दत्ता और श्रीदेवी की गुमराह की शूटिंग कर रहे थे। उस फिल्म के निर्माता यश जौहर थे। हम दोनों एयरकंडीशंड मेकअप वैन में बैठे थे। दरवाजे पर दस्तक देने के बाद साधारण एवं औसत चेहरे का एक लड़का संकोच के साथ अंदर आया। फाइट मास्टर वीरू देवगन के बेटे के रूप में अपना परिचय देते हुए उसने कहा, ''मेरे पापा ने आप दोनों को आज प्रीमियर पर बुलाया है, जरूर आइएगा।'' उसके निकलते ही यश जौहर ने सवाल किया, ''क्या यह लड़का हीरो बन सकता है?'' मेरा जवाब था, ''मुझे उसमें संभावना दिखती है। उसमें एक इंटेनसिटी है। अगर किसी निर्देशक ने उस इंटेनसिटी को उभारा तो वह पर्दे पर कमाल कर देगा। क्या आप ने उसकी आंखें देखीं? लगता है कहीं गहरे चोट लगी है दिल में, उसकी आंखों में एक उदास बेचैनी है।''

[नए अभिनेता जैसी तल्लीनता]

प्रियदर्शन गरम हवा में पहली बार अजय देवगन को निर्देशित कर रहे हैं। उत्तारभारत के बैकड्राप पर बन रही यह फिल्म मुश्किल समय की खलबली का चित्रण करती है। प्रियदर्शन कहते हैं, ''अजय ऊपरी तौर पर शांत और स्थिर दिखते हैं, लेकिन उनके अंदर भारी उथल-पुथल चल रही होती है। इतनी फिल्में करने के बावजूद उनकी तल्लीनता और सहभागिता किसी नए अभिनेता जैसी है। वे संतुष्ट भी हैं। मैंने कभी उन्हें अपने सीन के लिए परेशान नहीं देखा।'' प्रकाश झा की फिल्म राजनीति में मनोज बाजपेयी ने उनके साथ काम किया है। कई दृश्यों में दोनों साथ दिखेंगे। अजय के साथ अपने अनुभवों को शेयर करते हुए मनोज बाजपेयी कहते हैं, ''अपनी योग्यता और क्षमता पर उन्हें यकीन है, लेकिन वे कभी इसका प्रदर्शन नहीं करते। वे अपने किरदार को सुनते हैं और फिर निर्देशक के सुझाए मनोभाव को अपने खास अंदाज में पेश करते हैं।''

[बॉडी लैंग्वेज का इस्तेमाल]

संवादों पर अजय की निर्भरता नहीं रहती। एक्टिंग में एक्सप्रेशन के महत्व पर अजय देवगन की स्पष्ट राय है, ''कई बार संवाद से अधिक इंपैक्ट एक्सप्रेशन का होता है। मैं अपनी चुप्पी, आंखों और चाल का इस्तेमाल करता हूं। मुझे लगता है कि फिल्म सिर्फ संवादों का माध्यम नहीं है। अगर वही करना है तो रेडियो प्ले करें।'' अजय देवगन की इस खूबी को प्रकाश झा एक्टिंग की इकॉनोमी कहते हैं। गंगाजल और अपहरण के बाद राजनीति के साथ दोनों की सामाजिक-राजनीतिक फिल्मों की त्रयी पूरी होगी। प्रकाश झा के शब्दों में, ''अजय अपनी पीढ़ी के सशक्त अभिनेता हैं। उन्हें मालूम रहता है कि हर सीन में उन्हें कितना एक्ट करना है। वे फालतू एक्टिंग नहीं करते और न ही ओवरबोर्ड जाते हैं। वे अपने किरदारों को समझते और विकसित करते हैं। पर्दे पर उसे निखार देते हैं।''

अजय देवगन की इस साल की छह फिल्मों की लिस्ट में हर विधा की फिल्में हैं। कामेडी, सोशल ड्रामा, एक्शन और थ्रिलर; सच्ची ऐसी वैरायटी समकालीन स्टारों में किसी और के पास नहीं हैं।

[कॅरिअर का टर्निग प्वाइंट]

अजय देवगन की आंखों की उदास बेचैनी और अंदरूनी आक्रामकता को महेश भट्ट ने अपनी फिल्म जख्म में उभारा। अजय देवगन जख्म को अपने कॅरिअर का टर्निग प्वाइंट मानते हैं। उन्होंने बताया, ''मुझे जख्म और उसके बाद हम दिल दे चुके सनम और प्यार तो होना ही था से बड़ी पहचान मिली। इन तीनों फिल्मों के पहले मेरे पास घिसी-पिटी एक्शन फिल्में आ रही थीं। एक्शन में भी नयापन नहीं बच गया था। इन तीन फिल्मों के बाद मुझे बेहतर संभावनाओं के बेहतरीन किरदार मिलने लगे।'' अजय देवगन एक्टर की जन्मजात और नैसर्गिक प्रतिभा पर यकीन करते हैं। वे मानते हैं कि डायरेक्टरों और फिल्मों से हम उस मौलिक योग्यता को मांजते और निखारते हैं।


Friday, March 5, 2010

फिल्म समीक्षा : अतिथि तुम कब जाओगे?,थैंक्स माँ,रोड मूवी

-अजय ब्रह्मात्मज
अतिथि तुम कब जाओगे?
सामान्य जीवन के हास्य प्रसंग
पिछले कुछ सालों में लाउड कामेडी ने यह स्थापित किया है कि ऊंची आवाज मैं चिल्लाना, गिरना-पड़ना और बेतुकी हरकतें करना ही कामेडी है। प्रियदर्शन और डेविड धवन ऐसी कामेडी के उस्ताद माने जाते हैं। उनकी कामयाबी ने दूसरे निर्देशकों को गुमराह किया है। दर्शक भी भूल गए है कि कभी हृषीकेष मुखर्जी, गुलजार और बासु चटर्जी सरीखे निर्देशक सामान्य जीवन के हास्य को साधारण चरित्रों से पेश करते थे। अश्रि्वनी धीर की अतिथि तुम कब जाओगे? उसी श्रेणी की फिल्म है। यह परंपरा आगे बढ़नी चाहिए।
पुनीत फिल्मों का संघर्षशील लेखक है। वह कानपुर से मुंबई आया है। उसकी पत्‍‌नी मुनमुन बंगाल की है। दोनों का एक बेटा है। बेटा नहीं जानता कि अतिथि क्या होते हैं? एक दिन चाचाजी उनके घर पधारते हैं, जो खुद को पुनीत का दूर का रिश्तेदार बताते हैं। शुरू में उनकी ठीक आवभगत होती है, लेकिन छोटे से फ्लैट में उनकी मौजूदगी और गंवई आदतों से पुनीत और मुनमुन की जिंदगी में खलल पड़ने लगती है। चाचाजी को घर से भगाने की युक्तियों में बार-बार विफल होने के क्रम में ही पुनीत और मुनमुन को एहसास होता है कि कैसे चाचाजी उनकी रोजमर्रा जिंदगी के हिस्सा हो गए हैं। अश्रि्वनी धीर ने अतिथि के इस प्रसंग को रोचक तरीके से फिल्म में उतारा है। उन्होंने फिल्म को बढ़ाने के लिए कुछ दृश्य और प्रसंग जोड़े हैं, जिनसे मूल कहानी थोड़ी ढीली होती है। फिर भी अजय देवगन, परेश रावल, कोंकणा सेन शर्मा और सहयोगी कलाकारों ने फिल्म को बांधे रखा है। परेश रावल की अभिनय क्षमता का अश्रि्वनी धीर ने सार्थक उपयोग किया है। अजय देवगन बहुमुखी अभिनेता के तौर पर निखर रहे हैं। वे लाउड कामेडी के साथ ऐसी हल्की-फुल्की कामेडी भी कर सकते हैं। कोंकणा सेन शर्मा तो हैं ही सहज अभिनेत्री। मुकेश तिवारी, संजय मिश्र, अखिलेन्द्र मिश्र और सतीश कौशिक का अभिनय और योगदान उल्लेखनीय है।
कोंकणा के संवादों में स्त्रीलिंग-पुल्लिंग की गलतियां उनके चरित्र को बारीकी से स्थापित करती है। इस फिल्म का कितने आदमी थे प्रसंग रोचक है। परेश रावल ने उस प्रसंग को अपने अंदाज से मजेदार बना दिया है। उन्हें वीजू खोटे का बराबर सहयोग मिला है। बस, एक ही शिकायत की जा सकती है कि परेश रावल को इतना ज्यादा वायु प्रवाह करते नहीं दिखाना चाहिए था। पर आजकल हिंदी फिल्मों का यह आम दृश्य हो गया है।
***1/2 साढ़े तीन स्टार
थैंक्स मां
अनाथ बच्चों की मार्मिक कथा
इरफान कमल की थैंक्स मां डैनी बाएल की स्लमडाग मिलियनेयर के पहले बन चुकी थी, लेकिन अभी रिलीज हो सकी। इस फिल्म में इरफान ने मुंबई की मलिन बस्तियों के आवारा और अनाथ बच्चों के माध्यम से अधूरे बचपन की मार्मिक कथा बुनी है। उन्होंने पेशेवर चाइल्ड एक्टर के बजाए नए चेहरों को चुना है और उनसे बेहतरीन काम लिया है।
म्युनैसिपैलिटी खुद अनाथ बच्चा है। वह खुद को सलमान खान कहलाना पसंद करता है। दूसरे आवारा और अनाथ बच्चों के साथ वह पाकेटमारी और चिंदीचोरी कर अपना गुजर-बसर करता है। उसकी एक ही इच्छा है कि किसी दिन अपनी मां से मिले। बाल सुधार गृह से भागते समय उसे दो दिनों का एक बच्चा मिलता है। वह उस निरीह बच्चे को संभालता है। अपने दोस्तों की मदद से वह उस बच्चे की मां तक पहुचने में सफल रहता है, लेकिन सच्चाई का पता चलने पर हतप्रभ रह जाता है।
फिल्म में बताया गया है कि देश में रोजाना 270 बच्चे अनाथ छोड़ दिए जाते हैं। इन बच्चों की जिंदगी शहर की गुमनाम गलियों में गुजरती है और वे आजीविका के लिए अपराध का आसान रास्ता चुन लेते हैं। इरफान कमल ने ऐसे अनाथ बच्चों के मर्म को पर्दे पर कुछ किरदारों के माध्यम से दिखाया है। अपनी ईमानदार कोशिश केबावजूद वे अनाथ बच्चों की परिस्थिति के प्रति मार्मिकता नहीं जगा पाते। कुछ ही दृश्य प्रभावित करते हैं। सभी बच्चों ने उम्दा और स्वाभाविक अभिनय किया है। संजय मिश्र और रघुवीर यादव को निर्देशक ने उचित उपयोग किया है।
**1/2 ढाई स्टार
रोड मूवी
सफर में बने रिश्ते
हिंदी सिनेमा में विषय के स्तर पर आ रहे विस्तार को हम रोड,मूवी में देख सकते हैं। यह पारंपरिक हिंदी फिल्म नहीं है, जिसमें घिसे-पिटे किरदारों को लेकर कहानी बुनी जाती है। इस फिल्म के किरदार बेनाम हैं। उन्हें उनके नाम से हम नहीं जानते। संयोग से चार व्यक्ति एक सफर में साथ हो जाते हैं। वे मिल कर दुर्गम राहों से निकलते हैं। सफर के दौरान ही उनके रिश्ते बनते हैं, जो फिल्म खत्म होने के साथ अपनी राह ले लेते हैं।
फिल्म में कहानी की उम्मीद के साथ गए दर्शकों को निराशा हो सकती है। यह फिल्म दृश्यात्मक और प्रतीकात्मक है। आपसी रिश्तों में एक-दूसरे की जरूरत और मूल मानवीय भावनाओं का अच्छा तालमेल है। यह फिल्म अभय देओल और सतीश कौशिक के लिए देखी जा सकती है। तनिष्ठा चटर्जी सामान्य हैं। देव बेनेगल ने मुख्य पात्र की दोहरी यात्रा को अच्छी तरह से गुंथा और चित्रित किया है।
**1/2 ढाई स्टार

दरअसल : ख्वाबों को जगाते थे साहिर

-अजय ब्रह्मात्‍मज

किस्सा मशहूर है कि गीतकार-शायर साहिर लुधियानवी अपनी फिल्मों के पारिश्रमिक के तौर पर संगीतकार से एक रुपया ज्यादा लिया करते थे। इसी बात पर कभी एस.डी.बर्मन से उनकी ठन गई थी। दोनों ने प्यासा के बाद कभी साथ काम नहीं किया। आज जब गीतकार रॉयल्टी और कॉपीराइट की लड़ाई लड़ रहे हैं, तब साहिर की कैफियत ज्यादा मौजू हो जाती है। आजादी की राह पर से लेकर लक्ष्मी तक उन्होंने केवल 113 फिल्मों के गाने लिखे। अपने गानों से उन्होंने बेजोड़ मकबूलियत हासिल की। उनके फिल्मी गीतों में उनकी गजलों और नज्मों के कथ्य की गहराई झलकती है। ऐसा लगता है कि अपनी सामाजिक और राजनीतिक समझदारी का जोड़न (जामन) डालकर उन्होंने फिल्मी गीतों को जमाया है।

8 मार्च, 1921 को लुधियाना में जन्मे साहिर का बचपन मां सरदार बेगम के साथ बीता। उनके पिता जागीरदार चौधरी फजल अहमद थे। कहते हैं, अपने पति की बारहवीं शादी से तंग आकर सरदार बेगम ने उनकी हवेली छोड़ दी थी। उन्होंने तलाक ले लिया और बेटे साहिर को अकेले दम पाला। मां के जुझारू व्यक्तित्व के साए में पले साहिर का साबका प्रोग्रेसिव सोच से हुआ। वे छोटी उम्र में ही जागरूक और संजीदा हो गए। हालांकि पूरे खानदान में शायरी का शौक किसी को नहीं था, लेकिन साहिर छोटी उम्र से ही मशहूर शायरों की गजल और नज्मों को दोहराने के साथ अपने खयालात जाहिर करने लगे थे। अपनी शायरी के बारे में उनका मशहूर जुमला है, दुनिया ने तजुर्बातों-हवादिस की शक्ल में, जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूं मैं.. गौरतलब है कि सिर्फ 24 साल की उम्र में उनका पहला संकलन तल्खियां नाम से आ चुका था। इस संकलन की नज्मों से उस जमाने के नामचीन शायर और एडीटर चौंक गए थे। साहिर को तुरंत ख्याति मिली। रुतबा बढ़ा। वे उस उम्र में ही अदब-ए-लतीफ और शाहकार के संपादक बन गए। फिल्मों में तो वे बाद में आए। उसके पहले लाहौर, दिल्ली और हैदराबाद में अपनी शायरी और आकर्षक व्यक्तित्व से उन्होंने अनगिनत मुरीद तैयार कर लिए थे। बंटवारे के समय उनकी मां को रिफ्यूजी के रूप में पाकिस्तान भेज दिया गया था। माहौल शांत होने पर वे मां से मिलने गए और एक बार लाहौर में ही बसने की सोची। डेढ़ साल वहां रहे भी, लेकिन बचपन से सभी मजहबों के दोस्तों के बीच पले-बढ़े तरक्कीपसंद सोच के साहिर को पाकिस्तान का मौसम दमघोटू लगा। वे भारत लौट आए और फिर उन्होंने मुंबई के लिए कूच किया। तब मुंबई तरक्कीपसंद शायर और साहित्यकारों का गढ़ था। उर्दू के दूसरे मशहूर-ओ-मारुफ शायर-साहित्यकार मुंबई में एक्टिव थे।

साहिर के फिल्मी गीतों से वाकिफ उनके प्रशंसकों को उनकी गजलों और नज्मों को भी पढ़ना चाहिए। गीतों में व्यक्त उनके भाव अधिक सांद्र और गहरे रूप में उनकी शायरी में नजर आते हैं। वहां उनकी सोच अधिक चटख और आजाद है। उन्होंने अपने समय के सभी सामाजिक मुद्दों पर लिखा है। उनका स्वर कभी नारेबाजी का नहीं रहा। वे अपनी बातें पूरी नफासत और इमकान के साथ रखते थे। हाल ही में उनकी गजल, नज्म और फिल्मी गीतों का संकलन जाग उठे ख्वाब कई नाम से आया है। पेंग्विन से प्रकाशित इस संकलन का संपादन मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, कांतिमोहन सोज और रेखा अवस्थी ने किया है। इसकी प्रस्तावना गुलजार ने लिखी है। साहिर के बारे में युवा निर्देशक अनुराग कश्यप लिखते हैं, साहिर के गानों ने मुझे दिशा दी है। अपनी आवाज मैंने उनके गीतों में पाई है।