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Saturday, February 27, 2010

फिल्‍म समीक्षा : तीन पत्‍ती

नयी और अलग सी


प्रचलित और सामान्य फिल्मों की शैली से अलग है तीन पत्ती। इसके दृश्य विधान में नवीनता है। इस में हिंदी फिल्मों के घिसे-पिटे खांचों में बंधे चरित्र नहीं हैं। फिल्म की कहानी भी अलग सी है। एकेडमिक जगत, छल-कपट और लालच की भावनाएं और उन्हें चित्रित करने की रोमांचक शैली के कारण फिल्म उलझी और जटिल लग सकती है।

व्यंकट सुब्रमण्यम मौलिक गणितज्ञ हैं। वे गणित में प्रोबैबिलिटी के समीकरण पर काम कर रहे हैं। अपनी धारणाओं को आजमाने के लिए वे तीन पत्ती के खेल का सहारा लेते हैं। उनका लक्ष्य एकेडमिक है, लेकिन उनके साथ आए प्रोफेसर शांतनु और चार स्टूडेंट धन के लालच में हैं। इस लालच की वजह से उनके रिश्ते और इरादे में बदलाव आता है। आइजक न्यूटन अवार्ड लेने लंदन पहुंचे व्यंकट सुब्रमण्यम वहां के गणितज्ञ पर्सी से मन का भेद खोलते हैं। फिल्म प्ऊलैशबैक और व‌र्त्तमान मे ं चलने लगती है। वे उस कचोट का भी जिक्र करते हैं, जिसकी वजह से वे खुद को इस अवार्ड का हकदार नहीं मानते। फिल्म के अंत में हम देखते हैं कि उनके साथ छल करने वाला व्यक्ति ही उन्हें अवार्ड दिलवा कर प्रायश्चित करता है। आखिरकार तीन पत्ती हिंदी की पारंपरिक फिल्मों की लीक पर आ जाती है और यहीं फिल्म कमजोर पड़ जाती है।

लीना यादव ने रोचक कहानी बुनी है। उसे उसी रोचकता के साथ उन्होंने शूट भी किया है। उन्हें सिनेमैटोग्राफर असीम बजाज की पूरी मदद मिली है। स्पेशल इफेक्ट के जरिए वह मुख्य किरदारों केमनोभावों और दुविधाओं को भी पर्दे पर ले आती हैं। अमिताभ बच्चन ने गणितज्ञ व्यंकट की भूमिका को सहज रूप से विशिष्ट बनाया है, लेकिन इस बार उनकी संवाद अदायगी बनावटी लगी। वे चाल-ढाल में तो दक्षिण भारतीय व्यक्तित्व ले आते हैं, लेकिन बोलचाल में उनका परिचित पुरबिया अंदाज नहीं छूटता। आर माधवन इस बार अपने रोल के साथ न्याय नहीं कर सके हैं। नए एक्टर उम्मीद जगाते हैं। नीयत आयटम गीत में आई लड़की की मोहक और मादक अदाएं दृश्य के अनुकूल हैं। बेन किंग्सले इस फिल्म में सिर हिलाने, हामी भरने और सवाल पूछने तक ही सीमित रह गए हैं।

लीना यादव की तीन पत्ती हिंदी फिल्मों में आ रहे बदलाव की बानगी है। नई लीक पर चल रही ये फिल्में थोड़ी अनगढ़ और प्रयोगशील होती हैं, इसलिए दर्शकों को फार्मूलाबद्ध मनोरंजन नहीं दे पातीं।

*** तीन स्टार


फिल्‍म समीक्षा : कार्तिक कालिंग कार्तिक

बुनावट से ज्यादा सजावट



इस फिल्म में फरहान अख्तर, दीपिका पादुकोन, राम कपूर, शेफाली छाया, विपिन शर्मा और क्युंगमिन ब्रांड फोन की मुख्य भूमिकाएं हैं। सभी एक्टरों के साथ फिल्म एक्शन का एक हिस्सा फोन को भी मिला है। निर्देशक विजय ललवानी ने स्पि्लट पर्सनैलिटी या सिजोफ्रैनिक व्यक्तित्व के कार्तिक का मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है। समाज में कार्तिक जैसे कई लड़के प्रतिभाशाली होने के बावजूद हीनभावना से ग्रस्त रहते हैं। बचपन, परवरिश और वर्गीय मूल्यों के दबाव में घुटते रहते हैं। उनकी अंतरात्मा कई बार उन्हें झकझोरती और इस व्यूह से बाहर निकाल लेती है, लेकिन सभी इतने भाग्यशाली नहीं होते। कार्तिक भी ऐसे ही दब्बू व्यक्तित्व का युवक है। फिल्म में उसकी अंतरात्मा फोन के जरिए बोलने लगती है। उसमें भारी तब्दीली आती है। कभी नजरअंदाज किया जा रहा कार्तिक अचानक सभी का अजीज बन जाता है। सफलता की सीढि़यां चढ़ता कार्तिकएक मोड़ पर अपनी अंतरात्मा से उलझ जाता है और फिर उसकी फिसलन आरंभ होती है। लेकिन हिंदी फिल्म का हीरो कभी गिरा नहीं रह सकता। उसकी प्रेमिका उसे संभाल लेती है और इस तरह कार्तिक कालिंग कार्तिक का सभी फिल्मों तरह सुखद अंत हो जाता है।

युवा निर्देशक अलग होने की कोशिश करते हैं, लेकिन हिंदी फिल्मों के प्रचलित फार्मूले से निकल नहीं पाते। विजय ललवानी की फिल्म के द्वंद्व में ही फंदा है, इसलिए फिल्म झटके से गिरती है। दीपिका पादुकोन ने फिल्म में आकर्षक स्टाइल केकपड़े पहने हैं। फिल्म में दिखाए गए आफिस का इंटीरिअर सुंदर है। कार्तिक का कमरा भी डिजाइनर है। कार्तिक जब आक्रामक और आकर्षक बनता है तो उसके कपड़ों में क्रीज और चमक आ जाती है। वैसे वह स्मार्ट होने के बाद ब्लैकमेल भी करता है। आज यही स्मार्टनेस है। राम कपूर और शेफाली छाया को भी खूबसूरत परिधान दिए गए हैं। फिल्म की सजावट अच्छी है। बुनावट में कमियां हैं। वह कहानी के निर्वाह की कमजोरियों से आई है। कार्तिक की भूमिका में फरहान अख्तर का मैच्योर चेहरा आड़े आता है। विविधता के लिए अभिनेता फरहान अख्तर को अपने होम प्रोडक्शन की अभी और फिल्में करनी होंगी।

(क्युंगमिन फोन के खास उल्लेख की वजह है। इस कोरियाई फोन को फिल्म में जापानी बताया गया है। फिल्म में कई बार फोन फोकस में आया है। फोन पर कोरियाई लिपि में लिखे शब्द बार-बार निर्देशक और कला निर्देशक की लापरवाही जाहिर करते हैं।)

** दो स्टार


Thursday, February 25, 2010

दरअसल : मुनाफा बांटने में हर्ज क्या है ?

-अजय ब्रह्मात्‍मज

मानव संसाधन विकास मंत्रालयके के अधीन गठित कॉपीराइट संशोधन समिति से आमिर खान ने इस्तीफा दे दिया है। उन्हें ऐसा लगा कि जावेद अख्तर के हवाले से छपी खबरों में उन्हें बेवजह निशाना बनाया गया है और उनकी छवि धूमिल की गई है। ऐसा संकेत मिल रहा था कि पूरे मामले में आमिर का विरोधी रवैया है और वे गीतकारों के साथ मुनाफा शेयर करने के पक्ष में नहीं हैं।

विमर्श के दौरान उठे विरोधी स्वर को समझने-गुनने से पहले जावेद अख्तर द्वारा सार्वजनिक कर देना एक प्रकार की जल्दबाजी कही जाएगी। अगर इसके साथ समिति की नैतिकता जोड़ी जाए, तो मसला और गंभीर हो जाता है। बहरहाल आमिर के इस्तीफे से कॉपीराइट संशोधन का मुद्दा सरेआम हो गया। चैनल और अखबारों की नजर उस पर गई और पिछले हफ्ते से ही किसी न किसी बहाने से इस पर बहस और खबरें चल रही हैं। आम नागरिक के लिए कॉपीराइट का मुद्दा उतना गंभीर नहीं है। अचानक आमिर ने उन्हें सचेत कर दिया है। यह अच्छा झटका है। अभी चल रही बहस और खबरों से कॉपीराइट के मुद्दे को जानने-समझने का मौका मिल रहा है।

यह मामला लंबे समय से अटका पड़ा था। दुनिया भर में कॉपीराइट के प्रावधानों में नित नए संशोधन किए जाते हैं। नए माध्यमों के उपयोग और प्रचलन में आने के बाद उनके संदर्भ में नए अधिकार सुनिश्चित किए जाते हैं। कोशिश रहती है कि मूल सर्जक को उसके योगदान का निरंतर लाभ मिलता रहे। पश्चिमी देशों में कॉपीराइट नियम इतने सख्त हैं कि किसी भी कृति के व्यावसायिक उपयोग और व्यापार में उनका खयाल रखा जाता है। कोशिश होती है कि उन नियमों का उल्लंघन न हो। अगर किसी ने उल्लंघन किया और वह पकड़ में आ गया, तो उसे मुआवजे के तौर पर भारी रकम चुकानी पड़ती है। कई बार जेल जाने की नौबत भी आ जाती है।

अपने देश में गरीबी, बदहाली और बेरोजगारी की वजह से कॉपीराइट की कोई परवाह नहीं करता। रचनाकार अपनी कृतियों की वाजिब कीमत नहीं ले पाते। उन्हें अपनी मौलिकता, बुद्धि और रचना सस्ते में बेचनी पड़ती है। फिल्मों के संदर्भ में निर्माता, किताबों के मामले में प्रकाशक और नौकरी के मामलों में मालिक कम से कम पैसे देकर ज्यादा से ज्यादा उपयोग करते हैं। हिंदी का कोई लेखक खुश होकर नहीं कहता कि प्रकाशक ने उसे समुचित पैसे दिए। इसी प्रकार फिल्मों का हर लेखक और गीतकार दुखी दिखता है। जो लोग महंगे और मशहूर हैं, वे भी संतुष्ट नहीं हैं। उनकी असंतुष्टि की वजह से ही कॉपीराइट का मुद्दा इस रूप में सामने आया है।

दरअसल, अगर कोई गीत पॉपुलर होता है और वह ज्यादा से ज्यादा बजता है, तो सिर्फ फिल्म कंपनी या म्यूजिक कंपनी ही पूरे लाभ पर कुंडली मारकर कैसे बैठ सकती है? स्वानंद किरकिरे ने सही कहा है कि अगर आप पैसे कमा रहे हैं, तो थोड़ा बांटने में क्या हर्ज है? विदेश में तो लेखक और गीतकारों को पच्चीस प्रतिशत तक का हिस्सा मिलता है। अपने देश में ही गीतकार और लेखक को एकमुश्त पैसे दे देने के बाद कुछ और नहीं दिया जाता। ऐसी स्थिति में लेखक और गीतकारों का दावा उचित है, ..और फिर वे अतिरिक्त लाभ में से ही हिस्सा मांग रहे हैं।

अभी कॉपीराइट संशोधन के ज्यादातर मुद्दे फिल्मों से संबंधित हैं। फिल्मों से बाहर के क्षेत्रों में भी कॉपीराइट के मामलों पर विचार होना चाहिए। प्रकाशन संस्थानों के क्रय-विक्रय और लेखकों के कॉपीराइट पर जांच समिति बैठनी चाहिए। क्या 50 करोड़ से अधिक हिंदी भाषियों के बीच किसी पुस्तक की 500 प्रतियों की ही खपत होती है या प्रकाशक सही आंकड़े नहीं देता..?


Tuesday, February 23, 2010

हिंदी टाकीज द्वितीय : फिल्‍में देखने का दायरा बढ़ा है और सलीका भी - मनीषा पांडे


लंबे अंतराल के बाद हिंदी टाकीज की नई कड़ी। आखिर मनीषा पांडे ने लिख दिया और चवन्‍नी उये यहां अविकल प्रस्‍तुत कर रहा है।मनीषा में एक बेचैनी और क्रिएटिव कंफ्यूजन है,जो उन्‍हें अपनी उम्र की दूसरी लड़कियों से अलग कद देता है। वह पड़ी-लिखी और सुसंगत विचारों की हैं। उनके व्‍यक्तित्‍व में एक जल्‍दबाजी है। अपने परिचय में वह लिखती हैं ... 11 सितंबर, 1980 को इलाहाबाद में जन्‍म हुआ। जैसे जैसे बड़े हुए ये जानने की जद्दोजहद में उम्र गुजरी कि हम कौन हैं, क्‍यों हैं और हमारे जीवन का मकसद क्‍या है? होश के साथ जो चारों ओर लोगों को बदहवासियों में दौड़ते पाया तो लगा क्‍या इस दौड़ में शामिल हो जाने को ही आए हैं हम भी। शायद नहीं। न आएं हो तब भी दौड़ रहे हैं उसी भीड़ में। सीधे शब्‍दों में कहूं तो पत्रकार हूं, भोपाल में दैनिक भास्‍कर के फीचर एडीटर के पद पर शोभायमान। पर ये वो नहीं है, जो चाहा है जिंदगी से। जो चाहा है, वो अभी ना के बराबर किया है। फिर भी उम्‍मीद रौशन है कि एक दिन जरूर वो करेंगे, जो चाहते हैं। संसार के हर सुख, हर गम से बेपरवाह निकल पड़ेंगे अपनी यायावरी पर। घूमेंगे जहान में, देखेंगे दुनिया और लिखेंगे। लिखेंगे कि जिसमें सबसे ज्‍यादा सुख है।

एक मुख्‍तसर सी जिंदगी में जाने क्‍या-क्‍या ऐसा होता है कि जिनके साथ रिश्‍ता बनते-बनते बनता है और जो बनता है तो ऐसा कि फिर वो आपके होने का ही हिस्‍सा हो जाते हैं। कई बार ये रिश्‍ते जज्‍बाती और जिस्‍मानी रिश्‍तों से भी कहीं ज्‍यादा मजबूत और अपनापे भरे होते हैं, जो जिंदगी के हर उल्‍टे-सीधे टेढ़े-मेढ़े मोड़ों पर पनाह देते रहते हैं।

किताबों के बाद मेरी जिंदगी में फिल्‍मों की भी कुछ ऐसी ही जगह रही है। हालांकि बचपन की गलियों की ओर लौटूं तो हमारे घर में फिल्‍मों से रिश्‍ता इतना सीधा, मीठा और सुकूनदेह नहीं था, जैसाकि किताबों के साथ हुआ करता था। पापा जिला प्रतापगढ़ के जिस पंडिताऊ, सतनारायण की कथा बांचू और ज्‍योतिषधारी ग्रामीण परिवेश से इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रगतिशील इंकलाबी वातावरण में आए थे तो यहां आने के साथ ही उन्‍होंने लेनिन, मार्क्‍स और माओ के दुनिया को बदल देने वाले विचारों से दोस्‍ती तो गांठ ली थी लेकिन सिनेमा और प्‍यार-मुहब्‍बत के मामलों में बिलकुल अनाड़ी थे। लेनिन की संकलित रचनाएं, क्‍या करें और साम्राज्‍यवाद पूंजीवाद की चरम अवस्‍था तक तो मामला दुरुस्‍त था, लेकिन इससे आगे बढ़कर वो ये किसी हाल मानने को तैयार न थे कि लेनिन की कोई फ्रांसीसी प्रेमिका भी थी। उन्‍हें ये बात लेनिन के चरित्र को मटियामेट करने के लिए दक्षिणपंथियों द्वारा रची गई साजिश नजर आती।

फिल्‍मों से हजार गज का फासला बनाए रखते। उपन्‍यास और कविताओं से तो उनका छत्‍तीस का आंकड़ा था। वो इस कदर रूखे और गैररूमानी थे कि फिल्‍मों के नाम से ही बरजते थे। ब्‍याहकर इलाहाबाद आने से पहले मां ने बॉम्‍बे में काफी फिल्‍में देखी थीं, लेकिन शादी के बाद पापा ने इलाहाबाद में बस एक फिल्‍म दुलहन वही जो पिया मन भाए दिखाकर ये मान लिया था कि अब जिंदगी भर मां को फिल्‍में दिखाने का कोटा वो पूरा कर चुके हैं। मां पति की बांह से सटकर देखी उस इकलौती फिल्‍म का किस्‍सा आज भी बड़ी मुलायमियत से भरकर सुनातीं। ये बात अलग है कि बड़े होने के बाद मैंने उस फिल्‍म के मुतल्लिक ये फरमान जारी किया कि नई ब्‍याही दुल्‍हन को आते साथ ही इतने रूढ़िवादी टाइटल वाली फिल्‍म दिखाना दरअसल एक सामंती और पितृसत्‍तात्‍मक निर्णय था। मां बेलन मेरी ओर फेंककर गरजतीं, बंद कर अपना ये नारीवाद, लेकिन ऐसा करते हुए उन्‍हें हंसी आ जाती।

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पता नहीं, पापा को फिल्‍मों और टीवी के नाम से इतनी चिढ़ क्‍यों थी। तीसरी क्‍लास में नाना के एक पोर्टेबल ब्‍लैक एंड व्‍हाइट टीवी खरीदकर लाने तक हमारे घर में कोई टीवी नहीं था और पड़ोस की जया शर्मा के घर चित्रहार देखने जाने के लिए मां से बड़ी चिरौरी करनी पड़ती। मां इस हिदायत के साथ भेजती थीं कि पापा के आने से पहले भागकर चली आना। बगल के घर में मेरा एक कान चित्रहार और दूसरा कान पापा के आने की आहट पर लगा रहता था।

मेरी मुमकिन याददाश्‍त के मुताबिक मैंने कभी मां-पापा को सिनेमा हॉल जाते नहीं देखा। एक बार उनके एक दोस्‍त हमें सपरिवार राजा हिंदुस्‍तानी दिखाने ले गए थे। मैं पूरी फिल्‍म में आंख फाड़-फाड़कर स्‍क्रीन को देखती रही कि कहीं ऐसा न हो कि कोई सीन देखने से रह जाए और पापा पूरी फिल्‍म में तमतमाए बैठे रहे। बाद में दोस्‍त की बारह बजाई। मुझे यकीन था कि ये सारी नाराजगी इस वजह से थी कि एक बड़ी हो रही लड़की भी साथ बैठी थी। अकेले होते तो निश्चित ही इतना न गरजते। पर मैं खुश थी कि मुझे एक फिल्‍म देखने को मिली। गरज लो, बरज लो, चाहे तो कूट भी लो, पर मुझे फिल्‍म देखने दो। फिल्‍में देखना मुझे इस कदर पसंद था कि इसके लिए मैं लात खाने को भी तैयार रहती थी।

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मात्र उन्‍तीस साल की जिंदगी में सिनेमा हॉल के स्‍याह अंधेरों की भी एक बड़ी रूमानी इमेज मेरे दिलोदिमाग पर कायम है। पहली क्‍लास में एक कजिन के साथ पहली दफा मैं सिनेमा हॉल गई थी। विक्रम बेताल टाइप कोई फिल्‍म थी, जिसमें मुकुट लगाए कोई आदमी आसमान में उड़ता था, राजकुमार सांप निगल लेता था, राजकुमारी भिखारी से शादी कर लेती थी और सुराही में से भूत निकल आता था। मैं चकित होकर बार-बार अपनी कुर्सी से उठ जाती, लगता अभी पर्दा फाड़कर अंदर घुस जाऊंगी। आंखें ऐसे बाहर निकली आती थीं कि लगता कि निकलकर अभी टपक जाएंगी। मैं महीनों वो रोमांचक मंजर नहीं भूल पाई। सपने में भी सिनेमा हॉल का नीम स्‍याह अंधेरा और पर्दे पर भागती-दौड़ती तस्‍वीरें आती थीं। कैसी अनोखी चीज थी।

इसके अलावा ज्‍यादातर फिल्‍में मैंने बॉम्‍बे में अपने ननिहाल की बदौलत ही देखी थीं। मां और मौसी के साथ मिथुन चक्रवर्ती और फरहा खान की पति, पत्‍नी और तवायफ देखी। समझ में क्‍या खाक आई होगी, पर पर्दे पर काफी इजहारे मुहब्‍बत था। कुछ अजीब-अजीब से इश्किया जुमले थे, जो सिर के पार जाते। फिल्‍म क्‍या थी पता नहीं, पर सिनेमा हॉल का वह रूमानी अंधेरा मेरे दिल में रौशन था। यूनिवर्सिटी जाने से पहले मैंने ऐसे ही कुछ-कुछ फिल्‍में अपने अमीर मुंबईया रिश्‍तेदारों के रहमो-करम पर देखी थी।

टीवी देखने की हमारे घर में कतई इजाजत नहीं थी, इसलिए घर में फिल्‍में देखने का सवाल ही नहीं उठता था। सिर्फ नौ बजे समाचार से पहले टीवी ऑन होता, एक बूढ़ा और नाजनीना आकर दुनिया का हाल सुनाते और फिर बेचारे बुद्वूबक्‍से का बटन गोल घूमता और वो चुपचाप कोने में पड़ा अपनी किस्‍मत को रोता था। नब्‍बे के दशक के पहले कुछ सीरियल जरूर देखे जाते थे। पर जैसे ही वीपी सिंह की सरकार गई, नरसिम्‍हा राव, डंकल आदि के साथ लोगों की जहनियत में अशांति फैलाने शांति अर्थात मंदिरा बेदी आईं और हर रोज दोपहर में स्‍वाभिमान सीरियल आने लगा तो सीरियलों की आमद पर भी बंदिश लग गई। टीवी चलनी ही नहीं है, बात खत्‍म। पापा से बहस करने का हमारा दीदा नहीं था। उनका निर्णय मां समेत हम सभी को मानना ही होता था।

फिल्‍मों से पापा की इस कदर नाराजगी की वजह‍ जो बड़े होने के बाद मुझे समझ में आई वो ये थी कि दुनिया में चाहे मुहब्‍बत पर जितने ताले लगे हों, लड़का-लड़की को एक-दूसरे से छिपाकर सात घड़ों के अंदर रखा जाता हो, फिल्‍में सभी अमूमन प्‍यार-मुहब्‍बत और आशनाई के इर्द-गिर्द ही घूमती थीं। पापा को यकीन था कि छोटी बच्चियों को इस तरह के बेजा ख्‍यालों से दूर रखना बेहद जरूरी है वरना उनके दिमाग में तमाम ऊटपटांग चीजें आ सकती हैं, वो राह भटक सकती हैं और मुहब्‍बत के चक्‍करों में फंस सकती हैं। इसलिए घर में ऐसी किसी चीज की आमद पर सख्‍त पाबंदी थी। पापा के तमाम इंकलाबी विचार उन्‍हें ये नहीं सिखा पाए कि किसी लड़की की जिंदगी में मुहब्‍बत के बगीचे गुलजार होने के लिए सिनेमा की कोई जरूरत नहीं होती। जब धरती पर सिनेमा का नामोनिशान तक न था और न मुहब्‍बत के बाजार थे, लोग तब भी प्रेम करते थे और ज्‍यादा आजादी से करते थे। ये वाहियात नियम तो हमने बनाए, जलील फसीलें खड़ी कीं और फसीलें जितनी ऊंची होती गईं, मन में चोरी-छिपे मुहब्‍बत का दरिया उतना ही गहरा।

फिल्‍मों के संसार में मेरी ज्‍यादा आजाद घुसपैठ मेरे यूनिवर्सिटी जाने के बाद शुरू हुई। जैसे-जैसे बाहरी दुनिया में मेरी आवाजाही और दखल बढ़ने लगा, मेरी जिंदगी में मां-पापा का दखल कम होने लगा। इलाहाबाद में भी यूनिवर्सिटी के दिनों में मैं अकसर दोस्‍तों के साथ सिनेमा देखने चली जाती। लेकिन ये जाना सिर्फ सिनेमाई संसार में ही मेरा पहला आजाद कदम नहीं था, बल्कि यह एक हिंदी प्रदेश के छोटे शहर के बेहद कस्‍बाई, कटोरे जैसे दिमागों वाले लोगों की दुनिया में भी मेरा शुरुआती कदम था। द लीजेंड ऑफ भगत सिंह जैसी फिल्‍मों पर भी हॉल में धांय-धांय सीटियां बजतीं, कमेंट होते। लड़कियों के लिए इस कदर तरसे, उकताए और पगलाए हुए लोग थे कि पर्दे पर भगत सिंह की मंगेतर भी आ जाए तो सीट पर बैठे-बैठे आहें भरने लगते थे। और रंगीला जैसी फिल्‍म हो तो कहना ही क्‍या। शिल्‍पा शेट्टी यूपी-बिहार हिलातीं और इलाहाबादी मर्दानगी के दिल पर कटार चलती।

हम भी चुपचाप कोने में बैठे उर्मिला और शिल्‍पा की किस्‍मत से रश्‍क करते और फिल्‍म खत्‍म होने के बाद बड़े सलीके से अपने दुपट्टे संभालते सिनेमा हॉल से बाहर आते।

लेकिन फिल्‍मों का संसार सिर्फ शिल्‍पा शेट्टी और उर्मिला मार्तोंडकर तक तो सीमित था नहीं।

जीवन में देखी पहली बहुत गंभीर फिल्‍म जिसने भीतर-बाहर सब रौंद डाला था, वो बैंडिट क्‍वीन थी। यूनिवर्सिटी से एक बार मैं और मेरी एक दोस्‍त क्‍लास बंक करके सिविल लाइंस के राजकरन पैलेस पहुंचे, बैंडिट क्‍वीन देखने। तब मैं शायद सिर्फ साढ़े अठारह साल की थी। गेटकीपर बोला, आपके देखने लायक नहीं है। मैं थोड़ा सा घबराई भी थी। एक बार लगा कि लौट चलें। लेकिन फिर गुस्‍सा भी आया। तुम क्‍या कोई चरित्र निर्धारक समाज के सिपाही हो, जो बताओगे कि किसके देखने लायक है, किसके नहीं। हम बोले, नहीं हमें देखनी है। वो रहस्‍यपूर्ण बेशर्मी से मुस्‍कुराया।

एक सीन बहुत खराब है मैडम।

कोई बात नहीं।

फिलहाल हमें भीतर जाने को मिल गया। भीतर का नजारा तो और भी संगीन और वहशतजदा था। शहर के सारे हरामी, लफंगे जमा हो गए लगते थे। पान चबाते, गुटका थूकते, जांघें खुजाते, पैंट की जिप पर हाथ मलते, एक आंख दबाते, हम दोनों को देखकर अपने साथ के लोगों को कोहनी मारते, इशारे करते हिंदुस्‍तान के इंकलाबी नौजवान किसी बेहद मसालेदार मनोरंजन के लालच में वहां इकट्ठे थे। भीतर जाकर हमें थोड़ा डर लगा था। पर तभी हमरी नजर एक प्रौढ़ कपल पर पड़ी। हमने थोड़ी राहत की सांस ली। भला हो उस फटीचर सिनेमा हॉल का कि जहां नंबर से बैठने का कोई नियम नहीं था। सो हमने कोने की एक सीट पकड़ी और हम दोनो के बगल वाली सीट पर वो आंटी बैठीं और हम फिल्‍म देखने लगे।

मैंने जिंदगी में बहुत सी तकलीफदेह फिल्‍में देखी हैं, पर वो मेरी याद में पहली ऐसी फिल्‍म थी, जिसका हर दृश्‍य हथौड़े की तरह मेरे दिलोदिमाग पर नक्‍श होता जा रहा था। वो दर्द और बदहवासियों का कभी न खत्‍म होने वाला सिलसिला जान पड़ती थी। जैसे-जैसे फिल्‍म आगे बढ़ती जाती, लगता मैं सुलगते अंगार निगल रही हूं। रोते-रोते आंखें सूज आईं। आवाज गले में ही अटकी रही। मैं कांपती, बदहवास और संज्ञाशून्‍य सी उस फिल्‍म को देखती रही। फूलन देवी का दर्द अपनी ही धमनियों में दौड़ता सा लगा था।

हमसे आगे वाली रो में बैठे दो लड़के बीच-बीच में मुड़-मुड़कर हम दो लड़कियों को देखते रहते और बेहयाई से मुस्‍कुराते थे। फिल्‍म के सबसे तकलीफदेह हिस्‍सों पर हॉल में दनादन सीटियां बजीं, गंदे जुमले उछले और मर्दों की बेशर्म सिसकारियों की आवाजें आती रहीं। मेरी उम्र तब सिर्फ साढ़े अठारह साल थी। दुनिया की कमीनगियों से ज्‍यादा वास्‍ता न पड़ा था और न ही लात खाते-खाते मैं पत्‍थर हो गई थी। एक छोटा बच्‍चा जरा सी तेज आवाज से भी हदस जाता है और तीस पार कर हम इतने संगदिल हो चुके होते हैं कि गालियों और लात-जूतों पर भी आंसू नहीं बहाते। तकलीफें हमारे खून में बस जाती हैं, हम उनके साथ रहने-जीने के आदी हो जाते हैं। लेकिन तब तक तकलीफों से मेरी ऐसी आशनाई नहीं हुई थी। वो मेरी तब तक की जिंदगी का सबसे दुखद क्षण था। मैं इतनी ज्‍यादा तकलीफ महसूस कर रही थी कि उसी क्षण मर जाना चाहती थी। मुझे लगा कि मैं खड़ी होकर जोर से चीखूं। सबकी हत्‍या कर दूं। फूलन देवी पर्दे से बाहर निकल आए और उन ठाकुरों के साथ-साथ हॉल में बैठे सब मर्दों को गोली से उड़ा दे। जून, 99 की वो दोपहर मेरे जेहन पर ऐसे टंक गई कि वक्‍त का कोई तूफान उसे मिटा नहीं सका। आज भी आंख बंद करती हूं तो वो दृश्‍य फिल्‍म की रील की तरह घूमने लगता है।

फिल्‍म खत्‍म होने के बाद जब हम बाहर निकले तो मेरी आंखें सूजकर लाल हो गई थीं। मैं अब भी मानो किसी सपने में चल रही थी। चारों ओर लोग ठहाके लगा रहे थे, आपस में भद्दे मजाक कर रहे थे। हमें देखकर आंख दबा रहे थे।

कैसी है ये दु‍निया? कैसा इंसान रचा है हमने? वो फूलन तो एक थी, लेकिन इन सब मर्दों की बीवियां, उनकी बहनें, माएं सबकी जिंदगी फूलन जैसी ही है। सबके हाथ में एक-एक बंदूक होनी चाहिए और उड़ा देना चाहिए इन सब हरामियों को।

***

मैंने जिंदगी में सबसे धुंआधार फिल्‍में बंबई में देखीं। हॉस्‍टल भी किस्‍मत से ऐसी जगह था कि दसों दिशाओं में दस कदम पर इरोज, लिबर्टी, मेट्रो, स्‍टर्लिंग, न्‍यू एंपायर, न्‍यू एक्‍सेलसियर और थोड़ी ज्‍यादा दूर रीगल थिएटर थे। 2001 के बाद से मेरे बॉम्‍बे रहने के दौरान जितनी भी फिल्‍में आईं, लगभग सब मैंने थिएटर में देखीं। वहां रिलीज होने वाली फिल्‍मों का कैनवास जरा ज्‍यादा व्‍यापक था। अंग्रेजी फिल्‍में, ऑस्‍कर विनर फिल्‍में, बंगाली फिल्‍में, समांतर सिनेमा और मल्‍टीलिंग्‍वल मल्‍टीप्‍लेक्‍स फिल्‍में सभी कुछ देख डालीं, यहां तक कि एक्‍सक्‍यूज मी, स्‍टाइल और मस्‍ती टाइप की बेहद थर्ड क्‍लास डबल मीनिंग फिल्‍में भी मेरे देखने से नहीं छूटीं। जिस्‍म, मर्डर, पाप और हवा जैसी मूर्ख फिल्‍में भी। उस समय इस तरह भटक-भटककर फिल्‍में देखना आवारगी की ही एक इंतहा थी। प्रणव को भी फिल्‍मों का शौक था। इसलिए हम साथ कहीं और जाएं न जाएं, पर फिल्‍में जरूर देखते थे। उसके अलावा भी मैं कभी देखने की मौज में, कभी अवसाद और अकेलेपन में तो कभी मुहब्‍बत की रूमानियों में सिनेमा हॉलों के अंधेरों में पनाह लेती थी। धकाधक फिल्‍में देखती थी। आजादी का नया-नया स्‍वाद था, सिनेमाई कल्‍पनाओं की तारीक रौशनियों से पर्दे उठने शुरू ही हुए थे, दफ्तर का जिन्‍न नहीं था, समय की मारामारी नहीं और रुपहले पर्दे का रोमांस तो था ही। इन तमाम कारणों से मैं फिल्‍मों और फिल्‍में मुझसे करीबी हुए।

बॉम्‍बे में हॉस्‍टल की लड़कियों के साथ भी मैंने कई बार फिल्‍में देखीं, लेकिन बहुत कम। फिल्‍म देखते समय मेरे रोने से वो हैरतजदा होतीं और मेरा मजाक उड़ाती थीं। इसलिए मैं ज्‍यादातर अकेले ही फिल्‍म देखती थी। हां, किसी फिल्‍म में प्‍यार-मुहब्‍बत का इजहार अगर खासे इरॉटिक अंदाज में हो तो हॉस्‍टल में उस फिल्‍म की अच्‍छी माउथ पब्लिसिटी हो जाती थी और सब मरती-मराती फिल्‍म देखने पहुंच जातीं। रोमांटिक फिल्‍मों की खासी मांग थी, जिनमें सच्‍चा प्‍यार दिखाया जाता, हीरो हिरोइन के लिए जान देने को तैयार हो जाता। बरसों गुजर जाते, वे मिल न पाते तब भी मन ही मन प्‍यार करते रहते थे। हम लड़कियां ऐसी फिल्‍में देखकर आंसू बहातीं। हम ये मान लेते कि पर्दे पर प्रीती जिंटा नहीं हम ही हैं और शाहरुख खान ने हमारे लिए ही इतने बरस गुजार दिए। असल जिंदगियों में प्‍यार कहीं नहीं था। सिर्फ कुछ टाइम पास था, कैलकुलेशन था, बहुत पेटी इंटरेस्‍ट थे, मूर्खतापूर्ण मुहब्‍बती भंगिमाएं थीं, भावुक, कुंदजेहन इमोशंस थे। सब था पर प्‍यार नहीं था। और ऐसे में साथिया, देवदास और वीर जारा देखकर हम अपनी जिंदगी के अभाव भरते थे। हर दृश्‍य के साथ हमारे चेहरे की बदलती भंगिमाएं बताती थीं कि हमने उस फिल्‍म को कितना आत्‍मसात कर लिया था। सभी का ये हाल था। फिल्‍में हमारे अभावों और कुंठाओं पर मरहम लगाती थीं। हम प्रीती जिंटा के साथ खुश और दुखी होते और फिर उसी बेरहम चिरकुट कैलकुलेशनों वाली दुनिया में लौट आते।

****

तब फिल्‍में देखने का एक अजीब सा नशा था। आज भी है। सिनेमा हॉल के रूमानी अंधेरे में बैठने का। पर अब उस तरह नहीं देखती। अब तो किसी फिल्‍म के आजू-बाजू, दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे कहीं भी बी एच ए डबल टी लिखा हो तो गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो लेती हूं। वो फिल्‍म नहीं देखनी, चाहे धरती सूरज को छोड़ चंद्रमा का ही चक्‍कर क्‍यों न लगाने लगे।

इतने सालों में सिनेमा की टूटी-फूटी जो भी समझ बनी, उसके साथ फिल्‍में देखने का दायरा बढ़ा है और सलीका भी। अब मैं थिएटर में जाकर बहुत कम फिल्‍में देखती हूं। रॉक ऑन, माय नेम इज खान, वेक अप सिड एंड फिड, यहां तक कि थ्री इडियट्स टाइप मध्‍यवर्गीय चेतना संसार में सुनामी ला देने वाली फिल्‍में भी मैं भूलकर भी थिएटर में देखने नहीं जाती। गलती से पा देख ली थी और पूरे समय यही सोचती रही कि ये फिल्‍म बनाने वाले दर्शक को मूर्ख, गधा, आखिर क्‍या समझते हैं। वो कुछ भी उड़ेलते रहेंगे और हम भावुक होकर लोट लगाएंगे।

थ्री इडियट्स के युग परिवर्तनकारी विचारों से लहालोट होने वाले, पा देखते हुए भावुक होकर आंसू बहाने वाले और वेक अप सिड की जेंडर सेंसिबिलिटी को कोट करने वाले हिंदी सिनेमाई दर्शकों की सेंसिबिलिटी के बारे में जरा थमकर, रुककर सोचने की जरूरत महसूस होती है। ये फिल्‍में अब मुझे छूती नहीं, उल्‍टे इरीटेशन होता है, गुस्‍सा आता है कि सौ रुपए फूंक दिए। बीच-बीच में कुछ फिल्‍में ऐसी भी आती हैं कि आपका ज्‍यादा मूड खराब न हो, जैसे पिछले साल जोया अख्‍तर की लक बाय चांस थी या इस साल इश्‍किया। ये फिल्‍में ऐसी खराब नहीं हैं, पर बर्गमैन, कुरोसावा, बहमन घोबादी, मखमलबाफ, मजीदी, वांग कारवाई, त्रूफो, फेलिनी, बुनुएल, स्‍पीलबर्ग, फासबाइंडर, त्रोएसी और अभी एक नए इस्राइली निर्देशक इरान कोलिरिन की फिल्‍में देखने के बाद सिनेमा से आपकी उम्‍मीदें बढ़ जाती हैं।

सिनेमा की थोड़ी समझ और तमीज आने और इस माध्‍यम की ऐसी अनोखी कलाकारी, इतना ताकतवर इस्‍तेमाल देखने के बाद लगता है कि सिनेमा सिर्फ एक चोट खाए, पिछड़े, दुखी मुल्‍क के लोगों के अभावों, कुंठाओं को बेचने और भुनाने का माध्‍यम भर नहीं है। ये अपने भीतर इतनी ताकत समेटे है कि किसी इंसान का जमीन-आसमानी बदलाव कर सकता है, दिल में छेद कर सकता है, हिला सकता है, बना और मिटा सकता है। ये मन और सोच की दुनिया बदल सकता है।

इसलिए अब मैं उस सिनेमा की तलाश में रहती हूं कि जो मन में छेद करे और पहले के छेदों को भर सके। जो अभावों पर मरहम न लगाए, पर उसे समझने और उसके साथ गरिमा से जीने का सलीका सिखाए। जो संसार की एक ठीक-ठीक, भावुक नहीं, पर संवेदनशील समझ पैदा करे।

निश्चित तौर पर हिंदी फिल्‍में ये काम नहीं करतीं।

हिंदी फिल्‍मों से मैंने क्‍या सीखा और समझा, वो एक अलग बड़ा पेचीदा मसला है, लेकिन फिर भी अगर दस फिल्‍मों की लिस्‍ट बनानी ही हो तो शायद मैं इन दस फिल्‍मों का नाम शुमार करना चाहूंगी।

तीसरी कसम

कागज के फूल

पाकीजा

अंगूर

मोहन जोशी हाजिर हों

नसीम

मम्‍मो

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ब्‍लैक फ्राइडे

चक दे इंडिया

लक बाय चांस

How well do you know Shah Rukh Khan? - ROFLquiz.com

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Saturday, February 20, 2010

फिल्‍म समीक्षा : तो बात पक्‍की

उलझी हुई सीधी कहानी


-अजय ब्रह्मात्‍मज

केदार शिंदे ने मध्यवर्गीय मानसिकता की एक कहानी चुनी है और उसे हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करने की कोशिश की है। उन्हें तब्बू जैसी सक्षम अभिनेत्री का सहारा मिला है। साथ में शरमन जोशी और वत्सल सेठ जैसे आकर्षक कलाकार हैं। इन सभी के बावजूद तो बात पक्की हास्य और विडंबना का अपेक्षित प्रभाव नहीं पैदा करती।

ऋषिकेश मुखजी, बासु चटर्जी और गुलजार की तरह हल्की-फुल्की और रोचक फिल्म बनाने का आइडिया सुंदर हो सकता है, लेकिन उसे पर्दे पर उतारने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है। केदार शिंदे की फिल्म की शुरूआत अच्छी है, किंतु इंटरवल के बाद फिल्म उलझ जाती है। राजेश्वरी की इच्छा है कि उसकी छोटी बहन निशा की शादी किसी योग्य लड़के से हो जाए। उसे पहले राहुल सक्सेना पसंद आता है, लेकिन युवराज सक्सेना के आते ही वह राहुल के प्रति इरादा बदल लेती है। राहुल और युवराज के बीच फंसी निशा दीदी के हाथों में कठपुतली की तरह है, जिसकी एक डोर राहुल के पास है। युवराज से निशा की शादी नहीं होने देने की राहुल की तरकीब सीधे तरीके से चित्रित नहीं हो पाई है। इसके अलावा फिल्म की सुस्त गति से थिएटर में जम्हाइयां आ सकती हैं। अभी दर्शकों को तेज फिल्में देखने की आदत जो हो गई है।

तब्बू का अभिनय फिल्म के लिए उचित है। किंतु उनकी प्रतिभा का यह उपयोग फिल्म इंडस्ट्री और तब्बू के प्रशंसकों के लिए अनुचित है। शरमन जोशी अपनी चुहलबाजी से हंसाते हैं। बाद में उनके किरदार को ही उलझा दिया गया है। इसका असर उनके परफार्मेस पर पड़ा है। वत्सल सेठ दिखने में सुंदर और आकर्षक है। अच्छा होता किउनके अभिनय के बारे में यही बात कही जा सकती। युविका चौधरी के पास कुछ कर दिखाने के सीमित अवसर थे।

** दो स्टार


Friday, February 19, 2010

फिल्‍म समीक्षा : क्लिक

साउंड से डराने की कोशिश


-अजय ब्रह्मात्‍मज

किर्र... किर्र... फ्लैश... खींच गई तस्वीर। तस्वीर में उतरती धुएं की लकीर... धुएं की लकीर यानी कोई आत्मा और फिर उस आत्मा के पीछे का रहस्य। इस रहस्य के उद्घाटन में आधी फिल्म निकल जाती है। तब तक संदीप चौटा अलग-अलग ध्वनियों से दृश्यों में डर भरने की कोशिश करते हैं। हर दृश्य धम्म, धड़ाक म, फट-फटाक, थड , च्यूं-च्यूं जैसी किसी ध्वनि और शार्प कट के साथ अकस्मात खत्म होता है। निर्देशक को लगा होगा कि दर्शकों के डर के के लिए यह इफेक्ट कारगर होगा, लेकिन सिनेमाघरों में बैठे दर्शक हंस पड़ते हैं। पर्दे पर दिखाया जा रहा खौफ सिनेमाघर में नहीं पसर पाता। निर्देशक नई युक्ति निकालता है। वह आत्मा के बाद शरीर तक पहुंचता है। शरीर पलटने पर हमें एक विकृत चेहरा दिखता है, जिसे उसकी मां प्यार से चूमती और सो जाने के लिए कहती है। मां को भ्रम है कि उसकी बेटी मरी नहीं है। वह उसे बीमार समझती है। अंतिम संस्कार न हो पाने की वजह से आत्मा भटकती रहती है। इस आत्मा और फिल्म के किरदारों के बीच रिश्ता रहा है। वही अब सता और डरा रहा है।

संगीत सिवन की क्लिक साधारण किस्म की डरावनी फिल्म है। उन्हें फिल्म के मुख्य कलाकारों श्रेयस तलपडे़ और सदा से कोई मदद नहीं मिल पाई है। दोनों फीके रहे हैं।

* एक स्टार


Thursday, February 18, 2010

दरअसल: पा‌र्श्व गायन बढ़ती भीड़, खोती पहचान

-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों के पा‌र्श्व गायन में बड़ा परिवर्तन आ चुका है। अभी फिल्मों में अनेक गीतकार और संगीतकारों के गीत-संगीत के उपयोग का चलन बढ़ गया है। कुछ फिल्मों में छह से अधिक गीतकार और संगीतकार को एक-एक गीत रचने के मौके दिए जाते हैं। गायकों की सूची देखें, तो वहां भी एक लंबी फेहरिस्त नजर आती है। अब किसी फिल्म का नाम लेते ही उसके गीतकार और संगीतकार का नाम याद नहीं आता, क्योंकि ज्यादातर फिल्मों में उनकी संख्या दो से अधिक होने लगी है। अगर भूले से कभी कोई गीत याद आ जाए, तो उसके गीतकार और संगीतकार का नाम याद करने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है। गायकी की बात करें, तो जावेद अली, शाबिर तोषी, शिल्पा राव, मोहित चौहान, कविता सेठ, आतिफ असलम, पार्थिव गोहिल, अनुष्का मनचंदा, बेनी दयाल, श्रद्धा पंडित, जुबीन, हरद कौर, मीका, तुलसी कुमार, नेहा भसीन आदि दर्जनों गायक विभिन्न फिल्मों में एक-दो गाने गाते सुनाई पड़ते हैं। अगर आप हिंदी फिल्म संगीत के गंभीर शौकीन हों, तो भी कई बार आवाज पहचानने में दिक्कत होती है। संगीत का मिजाज बदलने से आर्केस्ट्रा पर ज्यादा जोर रहता है। ऐसे में गायकों की आवाज संगीत में दब जाती है। एक लिहाज से यह अच्छा है कि इतनी प्रतिभाओं को अवसर मिल रहे हैं, लेकिन पहचान और नाम की दृष्टि से सारे गायक भीड़ में शामिल प्रतीत होते हैं। उनकी गायकी और आवाज की विशेष पहचान नहीं बन पाती है।
पहले फिल्म स्टार और गायकों की जोड़ी बन जाती थी। मोहम्मद रफी, मुकेश और किशोर कुमार से लेकर उदित नारायण, सोनू निगम और अभिजीत तक खास स्टारों के लिए गीत गाने की वजह से विशेष पहचान बना पाए। उनके गाये गीतों को हम उनकी आवाज से पहचान लेते हैं। गौर करें, तो सोनू निगम और सुखविंदर के बाद पुरुषों में और श्रेया घोषाल और सुनिधि चौहान के बाद महिलाओं में किसी भी सिंगर की जोरदार पहचान नहीं बनी है। इन सभी की विशिष्ट आवाज है। नए गायकों में कई संभावनाओं से भरे हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, इसलिए उनकी वैरायटी और रेंज समझ में नहीं आती। किसी फिल्म का कोई गीत अचानक लोकप्रिय होता है, तो उसके गायक को हम कुछ समय तक याद रखते हैं, लेकिन अगले गीत के जोर पकड़ते ही हमें कोई नया गायक अच्छा लगने लगता है।
अब शायद ही किसी फिल्म के सारे गीत एक गायक को मिल पाते हैं। कई बार गायकों की आवाज स्टारों पर फबती भी नहीं, लेकिन निर्माता-निर्देशककी जिद के आगे संगीतकारों को झुकना पड़ता है। उन्हें एक स्टार के लिए कई गायकों का इस्तेमाल करना पड़ता है। इसके अलावा इधर संगीतकार खुद भी गायकी में हाथ आजमाने लगे हैं। पहले हेमंत कुमार, एस.डी. बर्मन और आर.डी. बर्मन जैसे संगीतकार विशेष गीतों को ही स्वर देते थे। अब गायकों को संगीतकारों से ही खतरा महसूस होने लगा है, क्योंकि निर्माता खर्च और समय बचाने के लिए उनकी शौकिया गायकी को बढ़ावा दे रहे हैं। कई बार ऐसा हुआ है कि संगीतकार ने गायक के स्वर में गीत रिकार्ड करने के पहले खुद गाकर देखा और वही फाइनल हो गया।
फिलहाल पा‌र्श्व गायन में बढ़ती भीड़ का कोई निदान नहीं दिख रहा है। लोकप्रिय कलाकारों का ध्यान गीतों से अधिक कपड़ों, शारीरिक सौष्ठव और स्टाइल पर रहता है। फिल्मों के आकर्षण के तौर पर गीत-संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रहने पर एक लापरवाही दिखाई पड़ती है कि किसी से भी गवा लो और किसी का भी म्यूजिक ले लो। इन दिनों कुछ बड़े निर्देशक ही एक गीतकार और एक संगीतकार पर निर्भर रहते हैं।

Sunday, February 14, 2010

लंबे गैप के बाद तब्बू तो बात पक्की में दिखेंगी। केदार शिंदे निर्देशित इस फिल्म में उनके साथ शरमन जोशी और वत्सल सेठ भी हैं। बातचीत तब्बू से..।

लंबे गैप के बाद आप फिल्म तो बात पक्की केसाथ आ रही हैं?

बहुत समय से कॉमेडी करने की इच्छा थी। ऐसी कॉमेडी, जिसमें रोल अच्छा हो और कहानी भी हो। यह चलती-फिरती कॉमेडी फिल्म नहीं है। यह छोटे शहर के मिडिल क्लास फैमिली की कहानी है। कोई मुद्दा या समस्या नहीं है। फिर फिल्म के निर्माता रमेश तौरानी ने साफ कहा कि आप नहीं करेंगी, तो हम फिल्म नहीं बनाएंगे। उनका आग्रह अच्छा लगा। फिर बात पक्की हो गई।

नए डायरेक्टर के साथ फिल्म करने के पहले कोई उलझन नहीं हुई?

मेरे लिए नए डायरेक्टर के साथ काम करने का सवाल उतना मायने नहीं रखता। मैंने ज्यादातर नए डायरेक्टर के साथ ही काम किया है। मैंने कभी किसी नए डायरेक्टर के साथ काम करने को रिस्क नहीं समझा। कहानी और स्क्रिप्ट पर भरोसा है, तो मैं हां कर देती हूं।

क्या स्क्रिप्ट पढ़कर आप डायरेक्टर पर भरोसा कर लेती हैं?

हां, इतनी समझ तो हो ही गई है। भरोसा तो आप बड़े डायरेक्टर का भी नहीं कर सकते। मैं इतना नहीं सोचती। मुझे जिन फिल्मों में सराहना मिली या जो फिल्में हिट हुई, वे किसी बड़े डायरेक्टर या बैनर की नहीं थीं। मैंने कभी डायरेक्टर के लिए इंतजार नहीं किया। हां, अभी निर्माता का नाम जरूर देखती हूं। अगर अच्छा और मजबूत निर्माता न हो, तो फिल्म अटक जाती है। यहां तो रमेश तोरानी हैं।

अपने किरदार और कहानी के बारे में बताएं?

मैं लाउड कैरेक्टर राजेश्वरी के रोल में हूं। वह काफी एग्रेसिव और जोड़-तोड़ वाली है। वह अपनी बहन निशा की शादी किसी राजकुमार से करना चाहती है, इसके लिए हर तरीके अपनाती है। लोगों को कभी उस पर गुस्सा आ सकता है, लेकिन उसकी ख्वाहिश है। वह बहन के लिए चिंतित रहती है।

आप काफी दिनों से खामोश रहीं। इधर कोई फिल्म भी नहीं आई। वजह?

मैं तो हमेशा खामोश रहती हूं। अपना काम करती रहती हूं। फिल्में आती हैं, तब भी ज्यादा चूं-चपड़ नहीं करती। इस बार निर्माता का दबाव था कि आप सामने आएं और बोलें, इसलिए मैं दिख रही हूं और लोग मुझे सुन रहे हैं। आजकल रिलीज के समय प्रचार पर बहुत जोर रहता है।

आप रिजल्ट पर ज्यादा ध्यान देती हैं या प्रोसेस का आनंद उठाती हैं?

मैं रिजल्ट पर ध्यान देती, तो फिल्में नहीं कर पाती, जो मैंने किए हैं। कई बार फिल्में साइन करो, तो कुछ लोग समझाते हैं, लेकिन मैंने कभी दूसरों की बातों पर ध्यान नहीं दिया। मैं प्रोसेस का आनंद उठाती हूं। मैं काम करने में बिलीव करती हूं। फल की चिंता नहीं करती। अगर किसी फिल्म की शूटिंग में मजा नहीं आया हो, तो उसके हिट होने पर भी खुशी नहीं मिलती।

आपको अपनी कौन-सी फिल्म पसंद और याद हैं?

माचिस तो है ही। उसके अलावा चांदनी बार, अस्तित्व, मकबूल और चीनी कम का नाम लूंगी। मैंने दूसरी भाषा की भी फिल्में की हैं। उन्हें सराहना मिली है। अफसोस कि मेरे हिंदी फिल्मों के दर्शक उनके बारे में नहीं जानते।

ऐसा नहीं लगता कि योग्यता के मुताबिक आपको फिल्में नहीं मिलीं?

मैं करती ही नहीं। आपको क्यों लगता है कि मुझे फिल्में नहीं मिलती हैं? मेरे पास आने से लोग डरते हैं। मुझे कम फिल्में ही अच्छी लगती हैं। बीस साल हो गए हैं अभिनय करते हुए और मैंने मुश्किल से चौंसठ फिल्में की हैं।


Friday, February 12, 2010

फिल्‍म समीक्षा : माय नेम इज खान

साधारण किरदारों की विशेष कहानी


-अजय ब्रह्मात्‍मज

करण जौहर ने अपने सुरक्षित और सफल घेरे से बाहर निकलने की कोशिश में माय नेम इज खान जैसी फिल्म के बारे में सोचा और शाहरुख ने हर कदम पर उनका साथ दिया। इस फिल्म में काजोल का जरूरी योगदान है। तीनों के सहयोग से फिल्म मुकम्मल हुई है। यह फिल्म हादसों से तबाह हो रही मासूम परिवारों की जिंदगी की मुश्किलों को उजागर करने के साथ धार्मिक सहिष्णुता और मानवता के गुणों को स्थापित करती है। इसके किरदार साधारण हैं, लेकिन फिल्म का अंतर्निहित संदेश बड़ा और विशेष है।

माय नेम इज खान मुख्य रूप से रिजवान की यात्रा है। इस यात्रा के विभिन्न मोड़ों पर उसे मां, भाई, भाभी, मंदिरा, समीर, मामा जेनी और दूसरे किरदार मिलते हैं, जिनके संसर्ग में आने से रिजवान खान के मानवीय गुणों से हम परिचित होते हैं। खुद रिजवान के व्यक्तित्व में भी निखार आता है। हमें पता चलता है कि एस्परगर सिंड्रोम से प्रभावित रिजवान खान धार्मिक प्रदूषण और पूर्वाग्रहों से बचा हुआ है। मां ने उसे बचपन में सबक दिया था कि लोग या तो अच्छे होते हैं या बुरे होते हैं। वह पूरी दुनिया को इसी नजरिए से देखता है। रिजवान की यह सीमा भी है कि वह अच्छाई और बुराई के कारणों पर गौर नहीं करता। उन्हें समझने की कोशिश नहीं करता। फिल्म के निर्देशक करण जौहर की वैचारिक और राजनीतिक सीमाओं की हद में रहने से रिजवान खान आतंकवाद की ग्लोबल समस्या और मुसलमानों के प्रति बनी धारणा को सिर्फ छूता हुआ निकल जाता है। हम इस धारणा के प्रभाव को महसूस करते हैं, लेकिन उत्तेजित और प्रेरित नहीं होते।

वैचारिक सीमा और राजनीतिक अपरिपक्वता के बावजूद माय नेम इज खान की भावना छूती है। करण जौहर अपने विषय के प्रति ईमानदार हैं। सृजन के क्षेत्र में एहसास और विचार हायर नहीं किए जा सकते। लेखक और निर्देशक का आंतरिक जुड़ाव ही विषय को प्रभावशाली बना पाता है। करण जौहर के पास कलाकारों और तकनीशियनों की सिद्धहस्त टीम है, इसलिए कथा-पटकथा के ढीलेपन के बावजूद फिल्म टच करती है। इस फिल्म में के रविचंद्रन के छायांकन का महत्वपूर्ण योगदान है।

माय नेम इज खान के संदर्भ में शाहरुख खान और काजोल के परफार्मेस की परस्पर समझदारी उल्लेखनीय है। दोनों नाटकीय दृश्यों में एक-दूसरे के पूरक के रूप परफार्म करते हैं और अंतिम प्रभाव बढ़ा देते हैं। काजोल का प्रवाहपूर्ण अभिनय किरदार को जटिल नहीं रहने देता। उनकेभाव और प्रतिक्रियाओं में आकर्षक सरलता और आवेग है। निश्चित ही उनकी आंखें बोलती हैं। शाहरुख खान ने इस फिल्म में अपनी परिचित भंगिमाओं को छोड़ा है और रिजवान खान की चारीत्रिक विशेषताओं को आवाज और अभिनय में उतारा है। कुछ दृश्यों में वे अपनी लोकप्रिय छवि से जूझते दिखाई पड़ते हैं। अभिनय की ऐसी चुनौतियां ही एक्टर के दायरे का विस्तार करती हैं। स्वदेस, चक दे इंडिया के बाद माय नेम इज खान में शाहरुख खान ने कुछ अलग अभिनय किया है। फिल्म का गीत-संगीत कमजोर है। निरंजन आयंगार भावों को शब्दों में नहीं उतार पाए हैं। उनके संवादों में भी यह कमी है।

हालांकि करण जौहर की माय नेम इज खान भी उनकी अन्य फिल्मों की तरह मुख्य रूप से अमेरिका में शूट हुई है, लेकिन फिल्म का मर्म हम महसूस कर पाते हैं। अच्छी बात है कि यह फिल्म सिर्फ आप्रवासी भारतीयों के द्वंद्व और दंश तक सीमित नहीं रहती। यह अमेरिका में रह रहे विदेशी मूल के नागरिकों की पहचान के संकट से जुड़ती है और मुसलमान के प्रति बनी ग्लोबल धारणा को तोड़ती है। माय नेम इज खान एंड आई एम नाट अ टेररिस्ट का संदेश समझ में आता है।

**** चार स्टार


दरअसल : आ रहे हैं विदेशी तकनीशियन

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले हफ्ते मैं हेमा मालिनी की फिल्म टेल मी ओ खुदा के सेट पर था। जोधपुर के बालसमंद में शूटिंग चल रही है। मयूर पुरी निर्देशित इस फिल्म की कहानी चार शहरों में प्रवास करती है। जोधपुर में राजस्थान के हिस्से की शूटिंग हो रही थी, जिसमें एषा देओल, अर्जन बाजवा और चंदन सान्याल के साथ मधु और विनोद खन्ना हैं। इस सेट पर रेगुलर इंटरव्यू और कवरेज के दौरान दो व्यक्तियों ने ध्यान खींचा। एपल नामक कैमरामैन राजस्थान के हिस्से की फोटोग्राफी कर रहे थे और एलेक्स फिल्म के मेकअप आर्टिस्ट थे। दोनों विदेशी मूल के हैं।

एलेक्स मलेशिया के हैं। मलेशिया में एक भारतीय वीडियो शूटिंग के समय उनका भारतीय यूनिट से संपर्क हुआ। उसके बाद एक-दो छोटे वेंचर में काम करने के बाद उन्होंने विवेक ओबेराय की फिल्म प्रिंस की और अभी टेल मी ओ खुदा का मेकअप डिपार्टमेंट देख रहे हैं। सेट पर मौजूद तमाम भारतीयों के बीच इन विदेशियों को आराम से अपना काम करते देख कर खुशी और गर्व हुआ। हिंदी समेत सभी भारतीय फिल्में अब इस ऊंचाई तक पहुंच गई हैं कि विदेशी आर्टिस्ट और तकनीशियन यहां बेहिचक काम खोज रहे हैं।

टेल मी ओ खुदा में चार विदेशी कैमरामैन होंगे, जो चारों शहरों के हिस्सों की अलग-अलग शूटिंग करेंगे। फरहान अख्तर ने भी लक्ष्य के लिए विदेशी कैमरामैन का सहारा लिया था। कृष के स्पेशल इफेक्ट और स्टंट सीन के लिए राकेश रोशन ने विदेशी तकनीशियनों को भारत बुलाया था। उनकी अगली फिल्म का निर्देशन अनुराग बसु ने किया है। हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ रिलीज हो रही इस फिल्म में कई विदेशी तकनीशियन हैं। शाहरुख खान की निर्माणाधीन फिल्म रा1 में 40 प्रतिशत तकनीशियन विदेशी होंगे। कह सकते हैं कि हिंदी फिल्में अब उस मुकाम पर पहुंच गई हैं, जहां विदेशी तकनीशियनों की खपत हो रही है। कई बार वे भारतीय तकनीशियनों से सस्ते और योग्य भी ठहरते हैं। चूंकि मंदी का असर विदेशों में ज्यादा है और तकनीकी विकास से कई तकनीशियन बेरोजगार हो रहे हैं, इसलिए वे एशियाई देशों की तरफ उम्मीद से देख रहे हैं। उन्हें इधर काम के अवसर के साथ सुनिश्चित कमाई दिख रही है।

इस ट्रेंड पर दो प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। पहली प्रतिक्रिया स्वाभाविक है, जो असुरक्षा से पैदा होती है। हिंदी फिल्मों के तकनीशियन पूछ सकते हैं कि क्या वे किसी प्रकार अयोग्य हैं? ..और अगर विदेशी तकनीशियनों को धड़ल्ले से काम मिलता रहा, तो उनका फ्यूचर क्या होगा? इस असुरक्षा में वे अड़ंगा लगा सकते हैं। दूसरी प्रतिक्रिया यह है कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री अब विदेशियों को भी रोजगार देने में सक्षम हो गई है। गौरतलब है कि पहले विदेशी तकनीशियनों को श्रेष्ठ और उत्तम जानकारी के लिए लाया जाता था। हिमांशु राय के समय से यह परंपरा चली आ रही है। वर्तमान परिपे्रक्ष्य में श्रेष्ठता से अधिक कुशलता और बचत पर जोर दिया जा रहा है। वर्तमान में हमारे अपने तकनीशियन हर लिहाज से उत्तम काम कर रहे हैं। खुद उन्हें भी विदेशी फिल्मों में काम मिल रहा है।

ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में योग्यता और जरूरत ही तकनीशियन, कलाकार और निर्देशकों को जोड़ रही है। उन्हें अपनी भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकलने के लिए प्रेरित कर रही है। हमें विदेशी तकनीशियनों की आमद का स्वागत करना चाहिए..।


Tuesday, February 9, 2010

पापुलैरिटी को एंजाय करते हैं शाहरुख

-अजय ब्रह्मात्मज
शाहरुख खान से मिलना किसी लाइव वायर को छू देने की तरह है। उनकी मौजूदगी से ऊर्जा का संचार होता है और अगर वे बातें कर रहे हों तो हर मामले को रोशन कर देते हैं। कई बार उनका बोलना ज्यादा और बड़बोलापन लगता है, लेकिन यही शाहरुख की पहचान है। वे अपने स्टारडम और पापुलैरिटी को एंजाय करते हैं। वे इसे अपनी मेहनत और दर्शकों के प्यार का नतीजा मानते हैं। उन्होंने इस बातचीत के दरम्यान एक प्रसंग में कहा कि हम पढ़े-लिखे नहीं होते तो इसे लक कहते ़ ़ ़ शाहरुख अपनी उपलिब्धयों को भाग्य से नहीं जोड़ते। बांद्रा के बैंडस्टैंड पर स्थित उनके आलीशान बंगले मन्नत के पीछे आधुनिक सुविधाओं और साज-सज्जा से युक्त है उनका दफ्तर। पूरी चौकसी है। फिल्मी भाषा में कहें तो परिंदा भी पर नहीं मार सकता, लेकिन फिल्म रिलीज पर हो तो पत्रकारों को आने-जाने की परमिशन मिल जाती है।
उफ्फ! ये ट्रैफिक जाम
मुंबई में कहीं भी निकलना और आना-जाना मुश्किल हो गया है। मन्नत से यशराज स्टूडियो (12-15 किमी) जाने में डेढ़ घंटे लग जाते हैं। मैं तो जाने से कतराता हूं। मेरा नया आफिस खार में बन रहा है। लगता है कि यहीं है, लेकिन 35 मिनट से ज्यादा लगते हैं। कई बार ऐसा होता है कि 10-15 मिनट के काम से आफिस निकलता हूं, लेकिन लौटते-लौटते ढाई घंटे बीत जाते हैं। सड़कों पर बहुत क्राउड हो गया है अभी। कार्टर रोड पर हमेशा भीड़ लगी रहती है। मैं गलियों से निकलता हूं फिर भी फंस जाता हूं।
बेस्ट सिटी, दिल्ली
दिल्ली इस वक्त इंडिया के बेस्ट सिटी हो गई है। इंफ्रास्ट्रक्चर इतना अच्छा हो गया है। मैट्रो चालू हो गया है। ब्रिज बन गए हैं। सड़क पर कहीं रुकना नहीं पड़ता। मैं अभी तक मैट्रो में नहीं चढ़ा हूं। एक बार जाना था। मुझे ओपनिंग के लिए भी बुलाया था। मैं जा नहीं सका। अभी तो मुंबई में भी मैट्रो आ रही है। तब शायद मुंबई में कहीं आना-जाना आसान हो जाए।
सिक्युरिटी और प्रशंसक
दिल्ली और नॉर्थ में सिक्युरिटी का प्राब्लम हो जाता है। मैं कई बार सुनता हूं कि एक्टर गए और झगड़ा हो गया। मैं बहुत क्लियर हूं इस मामले में। अच्छी सिक्युरिटी रखो। किसी को चोटें-वोटें न लगें। भीड़ और भगदड़ में क्या होता है? हम तो भाग जाते हैं गाड़ी में बैठकर ़ ़ ़ मैंने एक-दो बार देखा है, कुछ लोग गिर जाते हैं। बहुत बुरा लगता है। एक बार किसी सिनेमाघर की ओपनिंग में गया था। कैमरामैन पीछे खिसकते-खिसकते कांच तोड़ गया। अच्छा हुआ कि नीचे नहीं गिरा, नहीं तो जान भी जा सकती थी। कोलकाता में काफी भीड़ लग जाती है। पिछले दिनों कोई गुवाहाटी बुला रहा था। मैंने समझाया कि वहां फंक्शन न करें। सिक्युरिटी की समस्या से कई शहरों में नहीं जा पाता। अपने सभी प्रशंसकों से मिलना नहीं हो पाता।
माय नेम इज खान
अलग किस्म की फिल्म है। वो सभी चीजें डालने की कोशिश की है, जो होनी चाहिए। यह इंडियन सिनेमा है। ज्यादा तामझाम नहीं रखा है। फिल्म की कास्ट और मेकिंग कमर्शियल रखी है। कैरेक्टर बहुत अमीर नहीं हैं, लेकिन लुक में रिचनेस है। बड़ी फिल्म है। अमेरिका में शूट हुई है। यह चक दे नहीं है। इसमें लव स्टोरी भी है। काजोल, शाहरुख और करण हों तो दर्शक की उम्मीदें रहती हैं। हम उन्हें निराश नहीं कर सकते। यह एक ड्रामैटिक फिल्म है। इस फिल्म को दूर से देखो तो एक लव स्टोरी और मुसलमान की कहानी लगती है। पास आकर देखो हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई में फर्क नहीं दिखेगा। सच कहूं तो यह एक साउथ एशियन व्यक्ति की कहानी है, जो अमेरिका में रहता है। इस फिल्म से साउथ एशिया के सभी लोग आइडेंटिफाय करेंगे। अमेरिका में हमें बराबरी का दर्जा नहीं मिला हुआ है। फर्क बरकरार है। ईस्ट और वेस्ट की सोच का भी फर्क है।
टेररिज्म का बैकड्राप
यह फिल्म टेररिज्म के ऊपर नहीं है। इसमें उसका बैकड्रॉप है। उस माहौल में कुछ किरदार फंस गए हैं। इस फिल्म के किरदारों पर टेररिज्म का बटर फ्लाय इफेक्ट है। ऐसे इफेक्ट में हम शामिल नहीं होते हैं, लेकिन प्रभावित होते हैं। उदाहरण केलिए किसी की बीवी रूठ के विदेश जा रही है। वह उसे मनाने जा रहा है। टैक्सी बुलाता है। तभी शहर में दंगा भड़क जाता है और टैक्सी ड्रायवर को कोई मार देता है। वह व्यक्ति समय पर एयरपोर्ट नहीं पहुंच पाता। बीवी विदेश चली जाती है। अब उस दंगे से उस व्यक्ति की जिंदगी तो तबाह हो गई, लेकिन वह दंगे में शामिल नहीं था। माय नेम इज खान के किरदार इसी तरह टेररिज्म से प्रभावित होते हैं।
सच्चे किरदारों पर आधारित
यह फिल्म सच्चे किरदारों पर आधारित है। मैं मिल चुका हूं उनसे। मियां मुसलमान हैं और बीवी हिंदू। मियां ने एक दंगे में उसे बचाया था। दंगे में उसके पति को मार दिया गया था। बाद में दोनों ने शादी कर ली थी। अमेरिका में 9-11 की घटना के तीन महीने बाद दिसंबर में वे बेचारे ईद मना रहे थे। किसी ने शिकायत कर दी तो पुलिस पूछताछ के लिए ले गई। बीवी ने तब अपनी बीमार बेटी का खयाल करते हुए पुलिस से कह दिया कि मैं तो हिंदू हूं ... मैं जाऊं। पुलिस वैसे भी उन्हें छोड़ने वाली थी। बीवी पहले चली गई। मियां आधे घंटे के बाद घर पहुंचा। उसने बीवी से पूछा, मैंने तुम्हारी जान बचाई। तुम्हारा बच्चा मुझे बाप जैसा प्यार करता है और तुम्हें यह कहने की जरूरत पड़ गई कि तुम मुसलमान नहीं हो। मैं तुम्हें नहीं समझा सका कि मुसलमान होना गलत नहीं है तो दुनिया को क्या समझाऊंगा। तब से दोनों आपस में बातचीत नहीं करते। शादीशुदा हैं। एक घर में रहते हैं, लेकिन उनके संबंध खत्म हो गए हैं। कल हो न हो के समय की बात है। हमें आयडिया अच्छा लगा तो हम ने इस पर काम किया। 9-11 के टेररिस्ट अटैक करने वाले को क्या मालूम कि उसकी वजह से एक मियां-बीवी की जिंदगी तबाह हो गई।
इमोशनल रियलिटी
इमोशनल रियलिटी यूनिवर्सल होती है। किसी के मरने पर सभी को दुख होता है। जन्म लेने पर खुशी होती है। प्यार सबको अच्छा लगता है। झगड़े से सभी डरते हैं। आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं। सभी जगह एक ही भाव होते हैं। यही हमारा नवरस है। जर्मनी में मेरे लाखों फैन हैं। उन्हें भाषा समझ में नहीं आती, गाना समझ में नहीं आता, मेरी शक्ल समझ में नहीं आती, लेकिन पर्दे पर मुझे रोता हुआ देख कर रोते हैं। अब आप अवतार ही देखें। इस फिल्म को देखते हुए आप किरदारों के इमोशन के साथ जुड़ जाते हैं। इमोशनल रियलिटी सभी को अपील करती है। मुझे विश्वास है कि अगर हमने अच्छी एक्टिंग की है और फिल्म की स्टोरी लाइन सही है तो फिल्म लोगों को पसंद आएगी, क्योंकि वे इमोशनली कनेक्ट होंगे।
नए डायरेक्टर
नए डायरेक्टर में मुझे इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप और अनुराग बसु पसंद हैं। ये सिनेमा का विस्तार कर रहे हैं। इनकी फिल्मों से इंडियन सिनेमा का व‌र्ल्ड व्यू बदल सकता है। उनकी फिल्मों में कुछ इंटरनेशनल बातें होती हैं। अनुराग कश्यप थोड़े ऑफ बीट हैं, अगर इन सभी के लिए प्लेटफार्म क्रिएट हो तो अच्छी बात होगी।
प्राइस नहीं मांगता
ज्यादातर लोगों को यकीन नहीं होगा, लेकिन जिन फिल्मों में मैं एक्टिंग करता हूं, उनके लिए प्राइस नहीं मांगता। अगर फिल्म पहले हफ्ते चल जाती है तो प्रोडयूसर खुद आकर पैसे दे देते हैं। पिछले दस-बारह साल में किसी प्रोड्यूसर को मैंने नहीं बताया कि ये मेरा प्राइस है। किसी से निगोशिएट नहीं किया। शुरू में करते थे, जब पैसे नहीं थे। इस से एक मैसेज गया कि पैसे देकर मुझ से फिल्म नहीं करा सकते। पैसे देकर आप बाकी सब कुछ करा सकते हैं। एड करा सकते हैं। डांस करा सकते हैं। पार्टी कर लें। फिल्म की वजह से ही मैं हूं, वो नहीं बिकता। वह दिल से होता है तो होता है, अन्यथा नहीं होता।
विवेक वासवानी
मैं सच कहता हूं कि अगर विवेक वासवानी नहीं होता तो मैं मुंबई में नहीं होता। झूठे दिल से नहीं, सच बता रहा हूं। उसने अजीज मिर्जा को पटाया, जूही चावला को लाया। अमृता सिंह को घुमाया। नाना पाटेकर को समझाया। जी पी सिप्पी से मुझे राजू बन गया जैंटलमैन में लांच करवा दिया। उसने ऐसा समां बांध दिया था कि जिस पार्टी में जाऊं, सामने से लोग ऐसे मिलते थे कि इंडिया का सबसे बड़ा स्टार आ गया। उस रेपुटेशन से ही मुझे एक-दो साल काम मिले।
एक दिन में चार पिक्चर
मुझे अच्छी तरह याद है कि एक ही दिन में चार पिक्चर साइन की थी। दिल आशना है, किंग अंकल, राजू बन गया जेंटल मैन और चमत्कार चारों फिल्में एक ही दिन मिली थीं। इतनी अच्छी शुरूआत रही।
प्रिपरेशन
मैं रिजवान खान वाली बीमारी से ग्रस्त दो लोगों से मिला हूं। मेरे दोस्त ले आए थे। उनसे 14 दिनों तक मिला। वे चुपचाप बैठते हैं। बोलते नहीं हैं। मैं उन्हें बैठे हुए देखता और आब्जर्ब करता था। फिर मैंने एक का वाक, एक का बाल, थोड़ा अटक कर बोलना या रिपीट करना ़ ़ ़ ये सब नोट किया। वे आंखें मिलाकर बातें नहीं करते। वे जमीन पर देखकर बातें करते हैं। यह फिल्म रोमांटिक है, लेकिन आंखों से आंखों के मिलने का चक्कर ही नहीं है। मुझे इंटरेस्टिंग लगा यह कंसेप्ट कि डू रोमांस विदाउट एक्सप्रेसिंग। उन्हें छूना नहीं आता। गले मिलना नहीं आता। वैसे वे बहुत इंटेलिजेंट होते हैं। इस किरदार को निभाने के लिए आंखें भी चढ़ाई हैं। एक रोमांटिक सीन में मेरी आंखें टेढ़ी लगेंगी।
सीरियस हूं मैं भी
लोग मुझ से बार-बार कहते हैं कि मैं हर फिल्म में एक जैसा ही दिखता हूं तो वही मैंने भी कहना शुरू कर दिया। ऐसे सवालों से मैं गुस्सा नहीं होता। मैं अपनी एक्टिंग के बारे में सीरियसली बातें नहीं करता तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं सीरियसली एक्टिंग नहीं करता हूं। अगर मैं हर फिल्म में सेम हूं तो लोग बीस सालों से मेरी फिल्में क्यों देख रहे हैं? एक ही फिल्म देखते रहते। हर फिल्म में कुछ तो अलग करता ही हूं न। क्या अभी एक्टिंग के बारे में बोलना शुरू कर दूं कि क्या-क्या किया? आपको जवाब दे सकता था कि मैंने बहुत मेहनत की और लीन हो गया रोल के अंदर और छह महीने तक... ऑस्कर वाइल्ड ने लिखा था कि दुनिया का सबसे बोरिंग आदमी होता है वह, जो हाउ आर यू पूछने पर अपने बारे में बताने लगता है। टेक्नीकल बातें मैं क्या बताऊं? मौका और दस्तूर देखकर हम लोग काम करते हैं। डान एकदम स्टाइलिश है तो स्टाइल से चलूंगा, बैठूंगा, बातें करूंगा। बाल, कपड़े, बंदूक ़ ़ ़ सब कुछ स्टाइल में होंगे। अभी रा 1 करूंगा तो वही सुपरहीरो बनूंगा। मैं तो कहता हूं कि इंटेंस एक्टर से जरा बगीचे में तुझे देखा तो ये जाना सनम करा के दिखा दो। मैं वो कर सकता हूं और चक दे भी कर सकता हूं। अभी मुझे सीरियस एक्टिंग नहीं करनी है। मुझे कुछ हंसी की पिक्चर करनी है।
अवार्ड और एक्टिंग
किसी ने कहा था कि कामेडी करो तो लोग उसे एक्टिंग न हीं मानते। मुझे लगता है कि गोविंदा को अवश्य नेशनल अवार्ड मिलना चाहिए। मेरी बड़ी तमन्ना है नेशनल अवार्ड जीतने की। मुझे लगा कि चक दे और स्वदेस में मैंने अच्छा किया। वही एक अवार्ड मुझे नहीं मिला है। मेरी तमन्ना है कि आस्कर मिलने से पहले नेशनल मिल जाए तो अच्छा रहेगा। नहीं तो सभी को बुरा लगेगा कि देखो आस्कर मिल गया, नेशनल नहीं मिला। नेशनल अवार्ड मिले तो बच्चे भी खुश होंगे।
करण जौहर
वे जिस उम्र और मुकाम पर रहते हैं, उसी पर फिल्म बनाते हैं। 25-26 साल की उम्र में उन्होंने कुछ कुछ होता है बनायी थी। फिर डैडी के साथ उनका रिलेशन बेहतर हुआ और फैमिली को करीब से समझा तो उन्होंने कभी खुशी कभी गम बनाई। कल हो न हो बनाते समय उनके पिता की मौत हुई। उसके बहुत उनके सारे दोस्तों के विवाह टूट रहे थे तो उन्होंने कभी अलविदा ना कहना बनाई। अभी उन्होंने माय नेम इज खान बनाई है। इसमें आज का मुद्दा है।
इंडिया का मुसलमान
मेरी जिंदगी खुशहाल है। मैं इंडिया का मुसलमान हूं। हिंदू डोमिनेटेड देश में सुपर स्टार हूं। हिंदू से शादी हुई है मेरी। मुझे कभी कोई परेशानी नहीं हुई। न तो देश के अंदर और न देश के बाहर। मैं तो हर तरह से सही हूं, लेकिन दूसरों की कहानियां सुनता हूं तो मुझे लगता है कि इस पर बातें होनी चाहिए। मैंने महसूस किया है कि अभी परसेप्शन बदल रहा है।
एक किस्सा
दुनिया के एक अमीर आदमी से एक रिपोर्टर ने पूछा कि तुम्हारे पास इतने पैसे हैं। बड़ा बिजनेस है। हर बार ठीक बिजनेस कैसे कर लेते हो? अमीर ने कहा, हमेशा सही डिसीजन लेता हूं। भला यह भी कोई बात हुई? चलो, यही बताओ कि सही डिसीजन कैसे लेते हो? रिपोर्टर का अगला सवाल था। अमीर आदमी ने जवाब दिया, एक्सपीरिएंस से... फिर रिपोर्टर ने पूछा, एक्सपीरिएंस कहां से आया? अमीर ने जवाब दिया, गलत डिसीजन से, बार-बार गलत डिसीजन लेने से एक्सपीरिएंस हो गया।

फिल्‍म समीक्षा : स्‍ट्राइकर

स्लम लाइफ पर बनी वास्तविक फिल्म


-अजय ब्रह्मात्‍मज

चंदन अरोड़ा की स्ट्राइकर में प्रेम, अपराध, हिंसा और स्लम की जिंदगी है। सूर्या इस स्लम का युवक है, जो अपने फैसलों और विवेक से अपराध की परिधि पर घूमने और स्वाभाविक मजबूरियों के बावजूद परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेकता। वह मुंबई की मलिन बस्ती का नायक है। हिंदी फिल्मों में मुंबइया निर्देशकों ने ऐसे चरित्रों से परहेज किया है। मलिन बस्तियों के जीवन में ज्यादातर दुख-तकलीफ और हिंसा-अपराध दिखाने की प्रवृति रही है। स्ट्राइकर इस लिहाज से भी अलग है।

सूर्या मुंबई के मालवणी स्लम का निवासी है। उसका परिवार मुंबई के ंिकसी और इलाके से आकर यहां बसा है। बचपन से अपने भाई की तरह कैरम का शौकीन सूर्या बाद में चैंपियन खेली बन जाता है। कैरम के स्ट्राइकर पर उसकी उंगलियां ऐसी सधी हुई हैं वह अमूमन स्टार्ट टू फिनिश गेम खेलता है। स्थानीय अपराधी सरगना जलील उसका इस्तेमाल करना चाहता है,लेकिन सूर्या उसके प्रलोभन और दबावों में नहीं आता। सूर्या की जाएद से दोस्ती है। सूर्या कमाई के लिए छोटे-मोटे अपराध करने में नहीं हिचकता। दोनों दोस्त एक-दूसरे की मदद किया करते हैं। लगभग 15 सालों की इस कहानी में हम सूर्या के अतीत में भी जाते हैं। परिवार से उसके संबंध आत्मीय और कंसर्न से भरे हैं। बाबरी मस्जिद ढहने के बाद मुंबई में हुए दंगों के दरम्यान मालवणी बेहद संवेदनशील इलाका माना जा रहा था। पुलिस और प्रशासन की निगाह टिकी हुई थी। चूंकि मालवणी में मुसलमानों की तादाद लगभग 90 फीसदी थी, इसलिए आशंका व्यक्त की जा रही थी कि हिंदू दंगों के शिकार हो सकते हैं। तनाव के इस माहौल में सूर्या जैसे चरित्रों ने मालवणी को महफूज रखा। फिल्म में जलील दंगा भड़काने के नापाक इरादे से अपनी जुगत में लगा है। तभी नाटकीय तरीके से सूर्या का आगमन होता है और मुंबई भारी तबाही से बच जाती है। हम ऐसे किरदारों के किस्सों से वाकिफ नहीं हो पाते। स्ट्राइकर मालवणी की सच्ची घटनाओं पर बनी काल्पनिक फिल्म है।

चंदन अरोड़ा ने फिल्म को रियलिस्ट अंदाज में शूट किया है। उन्होंने स्लम की जिंदगी को उसकी धड़कनों के साथ कैमरे में कैद किया है। नौवें दशक की मुंबई के परिवेश को गढ़ने में चंदन ने छोटे डिटेल पर भी ध्यान दिया है। स्ट्राइकर में परिवेश और चरित्रों का सुंदर संतुलन है। फिल्म के किरदार थोपे हुए नहीं लगते। सिद्धार्थ ने स्क्रिप्ट की जरूरत के मुताबिक अपने लुक को उम्र के अनुसार बदला है। यह फिल्म उनके अभिनय की बानगी है। रंग दे बसंती हम उनकी प्रतिभा की झलक भर देख पाए थे। उनके साथ जाएद की भूमिका में अंकुर विकल ने बराबर का साथ दिया है। अंकुर में नसीरूद्दीन शाह जैसी स्वाभाविकता और खुलापन है। आदित्य पंचोली बदले अंदाज में प्रभावशाली लगे हैं। उन्होंने जलील के किरदार को संयत तरीके से निभाया है। हिंदी फिल्मों में पहली बार आ रही पद्मप्रिया अच्छी लगी हैं। उनके किरदार को और बढ़ाया जा सकता था, लेकिन निर्देशक का लक्ष्य रोमांस से अधिक रिलेशनशिप रहा है।

फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और गीत-संगीत उल्लेखनीय है। चंदन ने अनेक संगीतकारों की मदद ली है। स्वानंद किरकिरे और विशाल भारद्वाज ने अपने संगीत से फिल्म के मूल भाव को गहराई दी है। फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर से दृश्यों के प्रभाव बढ़े हैं।

*** तीन स्टार


Friday, February 5, 2010

इश्किया : सोनाली सिंह

इश्किया............सोचा था की कोई character होगा लेकिन......पूरी फिल्म में इश्क ही इश्क और अपने-अपने तरीके का इश्क। जैसे भगवान् तो एक है पर उसे अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग रूप में उतार दिया है । जहाँ खालुजान के लिए इश्क पुरानी शराब है जितना टाइम लेती है उतनी मज़ेदार होती है । इसका सुरूर धीरे - धीरे चढ़ता है । वह अपनी प्रेमिका की तस्वीर तभी चाय की मेज़ पर छोड़ पाता है जब उसके अन्दर वही भाव कृष्णा के लिए जन्मतेहै । वहीँ उसके भांजे के लिए इश्क की शुरुआत बदन मापने से होती है उसके बाद ही कुछ निकलकर आ सकता है। कहे तो तन मिले बिना मन मिलना संभव नहीं है। व्यापारी सुधीर कक्कड़ के लिए इश्क केवल मानसिक और शारीरिक जरूरतों का तालमेल है । वह बस घरवाली और बाहरवाली के लिए समर्पित है और किसी की चाह नहीं रखता। मुश्ताक के लिए उसकी प्रेमिका ही सबकुछ है । वह प्रेम की क़द्र करता है । उसे अहसास है " मोहब्बत क्या होती है '। इसी वजह से वह विलेन होने के बाबजूद, मौका मिलने के बाद भी अंत में कृष्ण, खालुजान या फिर बब्बन किसी पर भी गोली नहीं चला पता। विद्याधर वर्मा के लिए प्रेम है पर कर्त्तव्य से ऊपर नहीं। गलत विचारधारा के लिए लढ़े या फिर सही विचारधारा का समर्थक हो एअक फौजी और सिपाही का जो ज़ज्बा होता वही उसका है। जब कृष्णा उसके कर्त्तव्य के आड़े आ जाती है तो वह उसको मारने में कोई कसर नहीं छोड़ता और सालों तक कोई खैर-खबर भी नहीं लेता। पर जब वही कृष्णा सालों बाद उसके सामने आकर खड़ी हो जाती है तो उसकी आँखों में आंसू उमड़ आते है और वह उसे साथ लेकर जाने की जिद पकड़ लेता है। फिल्म का केंद्रीय चरित्र है कृष्णा ...........नारी मन को पर्त दर पर्त खोलती कृष्णा जिसे पूरी तरह विद्या बालन ने जीवंत कर दिया है। मासूम सी कृष्णा, चिंगारी सी कृष्णा ,पूजा के फूल सी कृष्णा और दूसरों को fool बनाती कृष्णा। हम बहुत spontaneous reaction की दाद देते है तब एक औरत की spontaneity को स्वीकारते क्यों नहीं है ।हम दोगला आचरण क्यों करते है ?फिल्म love and hate relationship का भी बढ़िया उदहारण प्रस्तुत करती है। पति के जाने के बाद सुने घर की नीरस आवाज़ों को सुनती हुयी ज़िन्दगी काटती कृष्णा ,जो एक बार पति से मिलने के लिए इतना बढे षड़यंत्र की सूत्रधार बनती है,वही कृष्णा पति को जलाकर मार डालने में कोई कसर नहीं छोडती है और साथ मैं खुद भी जलकर मर जाना चाहती है।उसे जिंदगी का कोई मोह नहीं है।पर जब जीती है तो अपने भरसक अंदाज़ में ।.तो फिर........इतना लम्बा इंतज़ार क्या बदले की भावना से ?क्या वह भूली नहीं की इसी पति ने उसे मार डालने में कोई क़सर नहीं बाकी रखी थी या वह एक पूर्वनियोजित षड़यंत्र था............मेरे ख्याल से बीतते सालों में कृष्णा लगातार सोचती रही थी की उसका पति उससे प्यार करता है या नहीं। उसे मार डालना चाहता था या बस पीछा छुड़ाना चाहता था। एक पल में उसे पति के साथ गुज़ारे पलों की याद आती है, वह प्रेम से महकने लगती है दूसरे ही पल उसे अपने से पीछा छुड़ाया जाना याद आता है तो उसे सारी रात -रात भर नींद नहीं आती ..........................वाह!!!!!!क्या अंतरद्वंद उतारा है परदे पर.