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Saturday, January 30, 2010

फिल्‍म समीक्षा : इश्किया

उत्‍तर भारतीय परिवेश की रोमांचक कथा


-अजय ब्रह्मात्‍मज

अभिषेक चौबे की पहली फिल्म इश्किया मनोरंजक फिल्म है। पूर्वी उत्तरप्रदेश की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म के दो मुख्य किरदार मध्यप्रदेश केहैं। पुरबिया और भोपाली लहजे से फिल्म की भाषा कथ्य के अनुकूल हो गई है। हिंदी फिल्मों में इन दिनों अंग्रेजी का चलन स्वाभाविक मान लिया गया है। लिहाजा अपने ही देश की भाषाएं फिल्मों में परदेसी लगती हैं। अभिषेक चौबे ने निर्भीक होकर परिवेश और भाषा का सदुपयोग किया है। इश्किया वास्त व में हिंदी में बनी फिल्म है, यह हिंदी की फिल्म नहीं है।

खालू जान और बब्बन उठाईगीर हैं। कहीं ठिकाना नहीं मिलने पर वे नेपाल भागने के इरादे से गोरखपुर के लिए कूच करते हैं। रास्ते में उन्हें अपराधी मित्र विद्याधर वर्मा के यहां शरण लेनी पड़ती है। वहां पहुंचने पर उन्हें मालूम होता है कि विद्याधर वर्मा तो दुनिया से रूखसत कर गए। हां, उनकी बीवी कृष्णा हैं। परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि खालूजान और बब्बन को कृष्णा के यहां ही रूकना पड़ता है। इस बीच कृष्णा, खालू जान और बब्बन के अंतरंग रिश्ते बनते हैं। सब कुछ तात्कालिक है। न कोई समर्पण है और न ही कोई वायदा। सच तो ये है कि सारे किरदार स्वार्थी हैं और वे अपने हितों के लिए एक-दूसरे का इस्तेमाल करते हैं। शायद ऐसी ही है दुनिया।

इश्किया एक स्तर पर कृष्णा की भी कहानी है। पति ने उसे छोड़ दिया है। शरीर, मन और जीवन में भूखी कृष्णा को खालूजान और बब्बन के स्वार्थ में भी स्नेह की ऊर्जा मिलती है। खालूजान और बब्बन ही उस पर आसक्त नहीं होते। कृष्णा भी शारीरिक संबंधों का बराबर आनंद लेती है। यह नए किस्म का चरित्रांकन है, जहां औरत पवित्रता की मू‌िर्त्त भर नहीं है। फिल्म के क्लाइमेक्स में पता चलता है कि अपने पति से बिफरी और नाराज कृष्णा घर में शरण लिए खालूजान और बब्बन का इस्तेमाल करती है और अपने पति को लौटने के लिए मजबूर करती है। आखिरी दृश्य में वह झुलस गए पति पर तरस भी नहीं खाती। वह अपनी आजाद जिंदगी के राह पर मनपसंद व्यक्तियों के साथ निकल जाती है।

अभिषेक चौबे और विशाल भारद्वाज ने फिल्म की चुस्त पटकथा में रोमांच बनाए रखा है। इस फिल्म की विशेषता है कि अगले दृश्यों और प्रसंगों का अनुमान नहीं हो पाता। चूंकि अनजाने किरदार हैं, इसलिए उनकी मनोदशा से दर्शक भी अनजान हैं। संवादों में धार और चुटीलापन है। साथ ही इन संवादों में परिवेश की सामाजिक और राजनीतिकअर्थछवियां हैं। दो व्यक्तियों के बीच जमीन-आसमान का फर्क हम सभी समझते हैं, लेकिन उनके बीच हिंदू-मुसलमान का फर्क बताना नया मुहावरा है। फिल्म के कई दृश्य संवादों और अभिनय से जानदार बन गए हैं। नसीरुद्दीन शाह, अरशद वारसी और विद्या बालन की तिगड़ी नहीं होती तो फिल्म का क्या होता? अच्छी फिल्मों की एक पहचान यह भी है कि उनके किरदारों में दूसरे कलाकारों की कल्पना नहीं की जा सके। कृष्णा की भूमिका विद्या के अलावा कौन कर सकता है?

नसीरुद्दीन शाह, अरशद वारसी और विद्या बालन ने मिल कर फिल्म को प्रभावशाली बना दिया है। विद्या सच कहती हैं कि वह कैमरे के आगे बेशर्म हो जाती हैं। उफ्फ, कैमरे से ऐसी अंतरंगता अब दुर्लभ हो गई है। विद्या बालन ने बाडी लैंग्वेज और चेहरे के भावों से दृश्यों को सेक्सी बना दिया है। निर्देशक को अंग प्रदर्शन की जरूरत ही नहीं पड़ी है। निश्चित ही ऐसे दृश्यों में साथी कलाकारों की ईमानदार सहभागिता की दरकार रहती है। अरशद वारसी और नसीरुद्दीन शाह ने भरपूर साथ दिया है। उन दोनों की सहजता और स्वाभाविकता भी उल्लेखनीय हैं। उनके नामों के साथ कई दृश्यों के उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिनमें उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया है।

विशाल की एक खासियत को अभिषेक चौबे ने भी अपनाया है। सहयोगी चरित्रों के लिए परिचित कलाकारों को नहीं चुना गया है। इस फिल्म में मुश्ताक, विद्याधर वर्मा और नंदू के किरदारों को निभा रहे कलाकारों को हम पहले से नहीं जानते, इसलिए वे अधिक प्रभावशाली लगते और दिखते हैं। सलमान शाहिद, आदिल और आलोक कुमार की यही खूबी है।

विशाल भारद्वाज और गुलजार की जोड़ी हो तो गीत-संगीत लोकप्रिय होने के साथ फिल्म के लिए उपयोगी और सुंदर भी होते हैं। इश्किया में अभिषेक चौबे ने भी विशाल की तरह पुरानी फिल्मों के चुनिंदा गीतों का सही दृश्यों में उचित उपयोग किया है। इश्किया लिरिकल थ्रिलर है।

**** चार स्टार


Friday, January 29, 2010

फिल्‍म समीक्षा : रण

मध्यवर्गीय मूल्यों की जीत है रण


-अजय ब्रह्मात्‍मज

राम गोपाल वर्मा उर्फ रामू की रण एक साथ पश्चाताप और तमाचे की तरह है, जो मीडिया केएक जिम्मेदार माध्यम की कमियों और अंतर्विरोधों को उजागर करती है। रामू समय-समय पर शहरी जीवन को प्रभावित कर रहे मुद्दों को अपनी फिल्म का विषय बनाते हैं। पिछले कुछ सालों से इलेक्ट्रोनिक मीडिया के प्रभाव और उसमें फैल रहे भ्रष्टाचार पर विमर्श चल रहा है। रामू ने रण में उसी विमर्श को एकांगी तरीके से पेश किया है। फिल्म का निष्कर्ष है कि मीडिया मुनाफे के लोभ और टीआरपी के दबाव में भ्रष्ट होने को अभिशप्त है, लेकिन आखिर में विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक और पूरब शास्त्री के विवेक और ईमानदारी से सुधरने की संभावना बाकी दिखती है।

मुख्य रूप से इंडिया 24-7 चैनल के सरवाइवल का सवाल है। इसके मालिक और प्रमुख एंकर विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक अपनी जिम्मेदारी और मीडिया के महत्व को समझते हैं। सच्ची और वस्तुनिष्ठ खबरों में उनका यकीन है। उनके चैनल से निकला अंबरीष कक्कड़ एक नया चैनल आरंभ करता है और मसालेदार खबरों से जल्दी ही टाप पर पहुंच जाता है। विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक के बेटे जय मलिक की चिंता है कि टीआरपी की लड़ाई में कैसे चैनल को आगे लाया जाए? वह अपने उद्योगपति बहनोई नवीन और विरोधी पार्टी के नेता मोहन पांडे के साथ मिल कर खबरों की साजिश रचते हैं। बेटे के विश्वास में मलिक से खबर चल जाती है और सत्तापलट हो जाती है। मोहन पांडे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन जाते हैं। इंडिया 24-7 चैनल टाप पर आ जाता है। उद्योगपति नवीन को नए अनुबंध मिल जाते हैं। इन सब के बीच भ्रष्टाचार की इस जीत के आड़े आ जाता है मध्यवर्गीय मूल्यों और नैतिकताओं का पक्षधर पूरब शास्त्री।

रण वास्तव में मध्यवर्गीय नैतिकता और मूल्यों की प्रासंगिकता और विजय की कहानी है। भारतीय समाज में हर निर्णायक आंदोलन और अभियान में मध्यवर्ग की खास भूमिका रही है। भ्रष्ट हो रहे मीडिया तंत्र में आदर्शो और मूल्यों के साथ आए पूरब शास्त्री की हताशा ही विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक को पश्चाताप और ग्लानि के लिए विवश करती है। अपने दर्शकों से किया विजय का अंतिम संवाद मीडिया की हकीकत को तार-तार कर देता है। मीडिया में आए भटकाव की वजहों को हम समझ पाते हैं।

लगता है कि रामू ने पहले फिल्म का क्लाइमेक्स और निष्कर्ष तय कर लिया था और फिर किरदारों और घटनाओं को उस निष्कर्ष के लिए जोड़ा गया है। इस जल्दबाजी में फिल्म की संरचना और पटकथा कमजोर पड़ गई है। मीडिया का तंत्र वैसा नहीं है, जो फिल्म में दिखाया गया है, लेकिन मीडिया के लक्ष्य, साधन, स्रोत और विचार को रामू ने सही तरीके से पिरोया है। थोड़े और रिसर्च और गंभीरता से काम लिया गया होता तो रण मीडिया के ऊपर बनी सार्थक फिल्म होती। अभी यह सतह को खरोंचती हुई निकल जाती है। गहरे उतरने पर च्यादा प्रदूषण, भष्टाचार और उसके कारण दिखाई पड़ते।

अमिताभ बच्चन ने एक बार फिर साबित किया है कि अभिनय में भाव और भाषा का कैसे सुंदर उपयोग किया जा सकता है। कांपती उंगलियों की वजह से हथेलियां जुड़ नहीं पातीं। पश्चाताप की पीड़ा शब्दों में निकलती है और आंखें नम हो जाती हैं। फिल्म के अंतिम संवाद को अमिताभ बच्चन ने मर्मस्पर्शी बना दिया है। सुदीप ने जय मलिक के द्वंद्व को अच्छी तरह व्यक्त किया है, लेकिन क्या उन्हें हर तनाव के दृश्य में सिगरेट पीते दिखाना जरूरी था? मोहनिश बहल और राजपाल यादव की मौजूदगी उल्लेखनीय है। फिल्म में महिला पात्रों पर फोकस नहीं है, फिर भी नीतू चंद्रा और गुल पनाग अपने हिस्से का उचित निर्वाह करती हैं। क्लाइमेक्स में नीतू चंद्रा की बेबसी प्रभावित करती है।

पुन:श्च - अमेरिकी समाजशास्त्री और चिंतक नोम चोमस्की ने 1989 में पहली बार सहमति का निर्माण- मीडिया का राजनीतिक अर्थशास्त्र व्याख्यान दिया था। बाद में 1992 में इसी पर एक डाक्यूमेंट्री - मैन्युफैक्चरिंग कंसेट नाम से बनी थी। रण के संदर्भ में ये लेख और फिल्म प्रासंगिक हैं।

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*** तीन स्टार

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Thursday, January 28, 2010

रोमांटिक फिल्म है इश्किया - अभिषेक चौबे

विशाल भारद्वाज के साथ काम करते हुए अभिषेक चौबे ने निर्देशन की बारीकियां सीखीं और फिर इश्किया का निर्देशन किया। उत्तर भारत से मुंबई पहुंचे युवा अभिषेक की इश्किया में उत्तर प्रदेश का माहौल है। बातचीत अभिषेक से..
पहले अपने बारे में बताएंगे?
मैं उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले का हूं। पिताजी बैंक में थे। उनके साथ बिहार, झारखंड और हैदराबाद में स्कूलों की पढ़ाई की। फिर दिल्ली के हिंदू कॉलेज में एडमिशन लेने के साथ ही तय किया कि फिल्मों में निर्देशन करना है। मुंबई मैं 1998 में आ गया था। पहले फिल्म शरारत में सहायक रहा। फिर विशाल भारद्वाज के साथ जुड़ गया।
विशाल भारद्वाज से कैसे जुड़े और यह जुड़ाव कितना उपयोगी रहा?
वे मकड़ी बना रहे थे। उन दिनों उन्हें एक सहायक की जरूरत थी और मुझे काम चाहिए था। पहली मुलाकात में ही हमारी छन गई। उनके साथ-साथ मेरा विकास हुआ। मकबूल के समय उन्होंने मुझे लेखन में शामिल किया। ब्लू अंब्रेला का पहला ड्राफ्ट तैयार करने का मौका दिया। ब्लू अंब्रेला से कमीने तक उनके साथ मैं लिखता रहा। फिर मैंने इश्किया की स्क्रिप्ट लिखी।
इश्किया के बारे में क्या कहेंगे?
मेरे पास इश्किया के किरदार थे और एक ढीली कहानी थी। विशाल ने सुनने के बाद काम करने को कहा। हमने पहला ड्राफ्ट साथ में तैयार किया। उन्होंने इसमें संगीत दिया। मुझमें विश्वास जाहिर किया और मेरे लिए निर्माता की खोज की। इस फिल्म में विशाल की छाप लोगों को मिलेगी।
यह पूर्वी उत्तर प्रदेश की फिल्म लग रही है?
मेरा मन था कि मेरी पहली फिल्म उत्तर प्रदेश के मेरे इलाके की हो। मैं वहां की संस्कृति और समाज को जानता हूं। उस दुनिया की मेरी समझ है। मेरे लिए वह आसान भी था। मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश की सोशल रियलिटी नहीं दिखा रहा हूं। मेरे कैरेक्टर उस बैकड्राप और कल्चर में हैं। आजकल उस इलाके के बारे में फिल्में नहीं बनतीं। आप देखें कि यूपी-बिहार के दर्शकों के लिए वहां के किरदारों पर फिल्में नहीं बन पा रही हैं। इस तथ्य से मुझे परेशानी होती है। मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि पर यह मेरी आखिरी फिल्म नहीं होगी।
किरदार और कहानी के बारे में बात करें, तो ये सब जमीनी और परिचित लग रहे हैं?
बिल्कुल.., यह खालू जान, बब्बन और कृष्णा की कहानी है। बब्बन और उनके खालू छोटे चोर और उठाईगीर हैं। दोनों मध्यप्रदेश के भगोड़े हैं। वे गोरखपुर के पास एक गांव में विधवा कृष्णा के घर में छिपे हैं। यह रोमांटिक फिल्म है। इसका नाम ही इश्किया है।
विद्या को इस रोल के लिए तैयार करना आसान था?
उन्होंने स्क्रिप्ट सुनते ही हां कर दी थी। इस रोल को निभाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। हां, गाली बोलने में थोड़ी झिझक हुई, लेकिन किरदार को समझने के बाद दिक्कत नहीं हुई। उन्होंने इस रोल को संजीदगी के साथ जिया है।
..धोने से पहले मेरे गांव में तमंचा चलाना सिखाते हैं जैसे संवाद क्या महज चौंकाने के लिए हैं?
नहीं, खाली जगह पर आप बरतन लिख दें, तो संवाद फीका हो जाएगा। फिल्म में गालियों का इस्तेमाल बेवजह नहीं किया जाता। विशाल की ओमकारा और कमीने में भी ऐसे संवाद थे। ऐसा होने से फिल्म ए सर्टिफिकेट पाती है।

Friday, January 22, 2010

फिल्‍म समीक्षा : वीर

उन्नीसवीं सदी में 'बॉलीवुड' रोमांस

-अजय ब्रह्मात्‍मज

सलमान खान, शक्तिमान तलवार, शैलेष वर्मा, कृष्ण राघव, गुलजार, साजिद-वाजिद और आखिरकार अनिल शर्मा ़ ़ ़ इन सभी में किस एक को वीर के लिए दोषी माना जाए? या सभी ने मिल कर एक महत्वाकांक्षा से मुंह मोड़ लिया। रिलीज के पहले फिल्म ने पीरियड का अच्छा भ्रम तैयार किया था। लग रहा था कि सलमान खान की पहल पर हमें एक खूबसूरत, सारगर्भित, भव्य और नाटकीय पीरियड फिल्म देखने का अवसर मिलेगा। यह अवसर फिल्म शुरू होने के चंद मिनटों के अंदर ही बिखर गया। फिल्म में वीर और यशोधरा का लंदन प्रवास सिर्फ प्रभाव और फिजूलखर्ची के लिए रखा गया है।वीर अपनी संपूर्णता में निराश करती है। कुछ दृश्य, कोई एक्शन, कहीं भव्यता, दो-चार संवाद और अभिनय की झलकियां अच्छी लग सकती हैं, लेकिन कतरों में मिले सुख से बुरी फिल्म देखने का दुख कम नहीं होता।

फिल्म शुरू होते ही वॉयसओवर आता है कि अंग्रेजों ने पिंडारियों को इतिहास में जगह नहीं दी, लेकिन उन्हें अफसाना बनने से नहीं रोक सके। इस फिल्म में उस अफसाने के चित्रण ने दर्शकों को पिंडारियों के सच से बेगाना कर दिया। लेखक और निर्देशक ने उन्नीसवीं सदी के बैकड्राप में बॉलीवुड रोमांस दिखाया है। सिवा कास्ट्यूम के फिल्म में कोई नवीनता नहीं है। हमने कई फिल्मों में सलमान खान और सोहेल खान की जोड़ी देखी है। सलमान खान का एक रंगी रोमांस अब अधिक नहीं लुभाता है। सलमान खान आकर्षक व्यक्तिगत के धनी हैं। उनका शरीर सुडौल और आंखें जानलेवा हैं। उनकी मुस्कान दर्शकों के दिलों को छलनी करती है, लेकिन उसके आगे क्या? डांस, रोमांस और भावमुद्राओं में दोहराव ़ ़ ़ सलमान के समकालीनों (आमिर खान और शाहरुख खान) ने खुद को बदला है। वे लोकप्रिय और स्वीकृत छवि से निकलने की सफल कोशिश कर रहे हैं, जबकि सलमान खान अपनी लोकप्रियता को संभालने के प्रति लापरवाह हैं। वीर उनके कट्टर प्रशंसकों को भी निराश कर सकती है।

पिंडारी, अंग्रेज, उन्नीसवीं सदी का भारत कुछ भी तो फिल्म में ढंग से रेखांकित नहीं हो पाया है। बार-बार सुरीली अंखियों वाले गीत और जहां हाथ लगाऊंगा, पांच सेर गोश्त निकाल लूंगा संवाद सुनाई पड़ते हैं। हद तो तब होती है, जब एक सीन में वीर गोश्त निकाल भी लेता है और अनमने भाव से कहता है कि वजन कर लेना, पांच सेर ही होगा। सेर और छटाक जैसे संवाद बोलने मात्र से फिल्म पीरियड हो जाती है तो कोस, मील, कट्ठा, बीघा शब्द भी इस्तेमाल कर लेते। संवाद और प्रभावशाली और पीरियड-पीरियड हो जाते।

फिल्म में गीतों की भरमार है। एक के बाद एक गीत इस तरह से पिरोए गए हैं कि घटनाएं असर नहीं करतीं। एक्शन और ड्रामा का भ्रम दे रही वीर वास्तव में घिसी-पिटी रोमांटिक फिल्म है। हां, हम इसे उन्नीसवीं की साज-सज्जा में देखते हैं, इसलिए कुछ नया देखने का भ्रम थोड़ी देर तक बना रहता है। मिथुन चक्रवर्ती और पुरू राज कुमार अपनी भूमिकाओं से प्रभावित करते हैं। बाकी कलाकारों में सलमान खान समेत सभी सामान्य हैं। फिल्म की हीरोइन जरीन खान कुछ फ्रेम में ही खास एंगल से सुंदर दिखती हैं।

हां, सेट, लोकेशन और एक्शन में संबंधित निर्देशकों और तकनीशियनों ने पूरी मेहनत की है। वे भव्यता क्रिएट करने में सफल रहे हैं। उन्हें लेखक,कलाकार और निर्देशक उचित साथ नहीं दे पाए हैं।

** दो स्टार


Thursday, January 21, 2010

दरअसल : भारतमाता का संरक्षण

-अजय ब्रह्मात्‍मज
हालांकि यह तात्कालिक जीत है, लेकिन इसका प्रतीकात्मक महत्व है। भारतमाता सिनेमा को चालू रखने के लिए मराठी समाज की एकजुटता उल्लेखनीय है। पिछले कुछ सालों से आई मल्टीप्लेक्स लहर में बड़े शहरों के सिंगल स्क्रीन और छोटे-मझोले सिनेमाघर टूट रहे हैं। उन्हें बचाने की कोई केंद्रीय या प्रादेशिक नीति नहीं है। देखते ही देखते सिंगल स्क्रीन थिएटरों के आंगन और भवनों में मल्टीप्लेक्स चलने लगे हैं। सरकारी सुविधाओं और टैक्स रियायतों की वजह से थिएटर मालिक भी मल्टीप्लेक्स को बढ़ावा दे रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में मुंबई के लालबाग में स्थित भारतमाता सिनेमा को बंद करने के फैसले से मराठी फिल्मों के प्रेमियों को जबरदस्त धक्का लगा है।
सात साल से एनटीसी और भारतमाता सिनेमा के बीच विवाद चल रहा है। भारतमाता सिनेमा की लीज समाप्त हो चुकी है। एनटीसी चाहती है कि भारतमाता जमीन खाली कर दे। कानूनी तौर पर भारतमाता सिनेमा की जीत अनिश्चित लगती है। फिर भी भारतमाता सिनेमा से स्थानीय दर्शकों और मराठी फिल्म इंडस्ट्री का भावनात्मक लगाव है। लगभग सत्तर साल पुराने इस थिएटर में पिछले कुछ सालों से केवल मराठी फिल्में रिलीज हो रही हैं। महाराष्ट्र सरकार ने यह प्रावधान किया है कि प्रांत के मल्टीप्लेक्स थिएटर भी मराठी फिल्में दिखाएं। मल्टीप्लेक्स मालिक इस प्रावधान का औपचारिक पालन करते हैं। कुछ सिंगल स्क्रीन और पुराने थिएटरों में ही नियमित रूप से मराठी फिल्में दिखाई जाती हैं। उनमें से भारतमाता सिनेमा प्रमुख है, क्योंकि यहां केवल मराठी फिल्में ही दिखाई जाती हैं।
कोर्ट ने एनटीसी के समर्थन में भारतमाता सिनेमा के खिलाफ फैसला सुनाया है। इस फैसले के क्रियान्वयन के पहले मराठी बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाकार और फिल्मप्रेमी एकजुट हो गए हैं। वे सभी प्रदेश की सरकार पर दबाव डाल रहे हैं कि भारतमाता सिनेमा में फिल्मों का प्रदर्शन चलता रहे। भारतमाता सिनेमा मराठी संस्कृति की अस्मिता से जुड़ गया है। कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि भारतमाता सिनेमा बंद होने पर मराठी फिल्मों के प्रदर्शन की वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी। मराठी समाज इस आश्वासन से संतुष्ट नहीं है। भारतमाता सिनेमा के आसपास निम्न आय समूह के लोग रहते हैं। इन मराठीभाषी मुंबईकरों के लिए 25-30 रुपये का टिकट जेब पर भारी नहीं पड़ता। अगर भारतमाता सिनेमा बंद होता है, तो वे मराठी फिल्मों से वंचित होंगे। उनके लिए यदि मराठी फिल्मों के प्रदर्शन की वैकल्पिक व्यवस्था हो भी गई, तो टिकट के ज्यादा पैसे देने पड़ेंगे। दरअसल, मल्टीप्लेक्स संस्कृति ने सिंगल थिएटर के दर्शकों को सिनेमाघरों से दूर किया है। ऊंची कीमत के टिकट नहीं खरीद पाने की स्थिति में मेट्रो शहरों के चवन्नी छाप दर्शक पाइरेटेड डीवीडी पर जल्दी से जल्दी फिल्में देखते हैं। सभी शहरों में स्थानीय प्रशासकों ने सिंगल स्क्रीन तोड़ने और मल्टीप्लेक्स के निर्माण की सुविधा देते समय निम्न आय के दर्शकों का खयाल नहीं किया है। मुंबई के पश्चिमी उपनगर में अब गिनती के सिंगल थिएटर बचे हैं और वे अपने इलाके के सारे दर्शकों को समेट नहीं पाते। मुंबई जैसी ही स्थिति दूसरे शहरों की भी है। हिंदी सिनेमा के आम दर्शकों को लगातार वंचित किया जा रहा है, जबकि फ‌र्स्ट डे फ‌र्स्ट शो देखने का उसे भी लोकतांत्रिक अधिकार है। अपनी गरीबी और सिंगल स्क्रीन थिएटर नहीं होने के कारण दर्शकों का महत्वपूर्ण समूह पाइरेटेड डीवीडी मार्केट में मददगार हो जाता है। निश्चित ही स्थानीय प्रशासकों का इन वंचित दर्शकों का खयाल रखना चाहिए और भारतमाता सिनेमा जैसे सिनेमाघरों के संरक्षण का रास्ता निकालना चाहिए।

Monday, January 18, 2010

लाखों-करोड़ों लोगों के लिए काम करता हूं: सलमान खान


फिल्म के विज्ञापन और तस्वीरों से दर्शकों के बीच उत्साह बनता दिख रहा है। वीर में क्या जादू बिखेरने जा रहे हैं आप?

मुझे देखना है कि दर्शक क्या जादू देखते हैं। एक्टर के तौर पर अपनी हर फिल्म में मैं बेस्ट शॉट देने की कोशिश करता हूं। कई बार यह उल्टा पड़ जाता है। दर्शक फिल्म ही रिजेक्ट कर देते हैं।

वीर जैसी फिल्म करने का इरादा कैसे हो ्रगया? पीरियड फिल्म का खयाल क्यों और कैसे आया? और आप ने क्या सावधानियां बरतीं?

यहां की पीरियड फिल्में देखते समय अक्सर मैं थिएटर में सो गया। ऐसा लगता है कि पिक्चर जिस जमाने के बारे में है, उसी जमाने में रिलीज होनी चाहिए थी। डायरेक्टर फिल्म को सीरियस कर देते हैं। ऐसा ल्रगता है कि उन दिनों कोई हंसता नहीं था। सोसायटी में ह्यूमर नहीं था। लंबे सीन और डायलाग होते थे। मल्लिका-ए-हिंद पधार रही हैं और फिर उनके पधारने में सीन निकल जाता था। इस फिल्म से वह सब निकाल दिया है। म्यूजिक भी ऐसा रखा है कि आज सुन सकते हैं। पीरियड फिल्मों की लंबाई दुखदायक होती है। तीन,साढ़े तीन और चार घंटे लंबाई रहती थी। उन दिनों 18-20 रील की फिल्मों को भी लोग कम समझते थे। अब वह जमाना चला गया है। इंटरेस्ट रहने तक की लेंग्थ लेकर चलें तो फिल्म अच्छी लगेगी। आप सेट और सीन के लालच में न आएं। यह फिल्म हाईपाइंट से हाईपाइंट तक चलती है। इस फिल्म के डायलाग भी ऐसे रखे गए हैं कि सबकी समझ में आए। यह इमोशनल फिल्म है। एक्शन है। ड्रामा है।

इस फिल्म के निर्माण में आपने अनिल शर्मा से कितनी मदद ली है?

अनिल शर्मा ने इस फिल्म को अकल्पनीय बना दिया है। दूसरा कोई डायरेक्टर ऐसी कल्पना नहीं कर सकता था। इस फिल्म के सीन करते हुए मुझे हमेशा ल्रगता रहा कि मैं उन्नीसवीं सदी में ही पैदा हुआ था। कास्ट्यूम और माहौल से यह एहसास हुआ। वह जरूरी भी था। हमें दर्शकों को उन्नीसवीं सदी में ले जाना था। फिल्म देखते हुए पीरियड का पता चलना चाहिए ना?

आपकी आंखों में हमेशा एक जिज्ञासा दिखती है। ऐसा लगता है कि आप हर आदमी को परख रहे होते हैं। क्या सचमुच ऐसा है?

वास्तव में मैं खुद में मगन रहता हूं। ऐसा लग सकता है कि मैं आप को घूर या परख रहा हूं, लेकिन माफ करें ़ ़ ़वह मेरे देखने का अंदाज है। मैं क्या लो्रगों को परखू्रंगा? आप लोग मुझे तौलते-परखते हैं और फिर लिखते हैं।

अभी हम लोग जिस आटो रिक्शा से आ रहे थे, उसके ड्रायवर ने आप का नाम सुनने पर कहा कि सलमान सच्ची में स्टार हैं। हमने कारण पूछा तो उसने कहा कि सलमान ्रगरीबों की मदद करते हैं ़ ़ ़ क्या आप अपनी इस इमेज से परिचित हैं?

मैं जितना करना चाहता हूं या मुझे करना चाहिए ़ ़ ़ वह अभी तक नहीं हो पाया है। मैं कोशिश कर रहा हूं। अपने सोचे हुए मुकाम के आसपास भी अभी नहीं पहुंचा हूं। मैं बीइंग ह्यूमन को डिफर्रेट लेवल पर ले जाना चाहता हूं। वह मुझ से अकेले नहीं हो्रगा। मुझे सबकी मदद चाहिए।

आप का नाम है। शोहरत, इज्जत, फिल्में सब कुछ हासिल कर लिया है आप ने? अब किस वजह से आप कुछ करना चाहते हैं। और क्या हासिल करना है?

काम नहीं करेंगे तो घर में बैठ कर क्या करेंगे? हमारे प्रोफेशन में कोई एक्टर सिर्फ अपने लिए काम नहीं करता। वह लाखों-करोड़ों लो्रगों के लिए काम करता है। अगर एक महीना मैं शूटि्रंग न करूं तो लाइटब्वाय, स्पाटब्वाय, फाइटर, डांसर, कैमरा, एक्जीबिटर्स, डिस्टीब्यूटर्स, लैब, एडिटर और न जाने कितने लो्रगों का काम रूक जाए्रगा। उसके बाद थिएटर हैं। आम दर्शक हैं। दर्शकों को मनोरंजन मिलना चाहिए ना? हम काम नहीं करेंगे तो कारोबार कैसे चलेगा?

पिछले दिनों आपने चुनाव प्रचार में भी नेताओं की मदद की। क्या खुद को देश के प्रति जिम्मेदार मानते हैं?

बार-बार मैं सुनता हूं कि लोग सरकार को दोष देते हैं। मेरा सवाल है कि आप अपना काम करते हो कि नहीं? वोट डालते हो कि नहीं? जब तक आप वोट नहीं दोगे, तब तक कैसे अच्छी सरकार की उम्मीद कर सकते हो। और फिर तालीम की बात करें तो 15 साल की तालीम सभी को मिलनी चाहिए। अगर हर बच्चा दसवीं तक भी पढ़ ले तो बेकारी से निकल जाएगा। स्कूल जाने और किताबें पढ़ने से फायदा होता है। बचपन से किसी धंधे में लग जाओगे तो खाक तरक्की करोगे। पढ़ो और फिर काम के बारे में सोचो। इसके अलावा मुझे लगता है कि इंटर रेलिजन शादियां होनी चाहिए। अगर यह टे्रंड चल गया तो सारे दंगे-फसाद थम जाएंगे।

आप की वीर एक खास समुदाय पर है। पिंडारियों को लुटेरा कौम माना जाता रहा है। आप उस कौम के हीरो को वीर के रूप में पर्दे पर पेश कर रहे हैं ़ ़ ़ इस तरफ ध्यान कैसे गया?

पिंडारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ खुद को एकजुट किया था। वे मूल रूप से किसान थे। जब उन्हें लूट लिया गया तो वे भी लूटमार पर आ गए, लेकिन उनका मकसद था आजादी । आजादी की चि्रंगारी उन्होंने लगायी थी। मैंने एक फिल्म देखी थी बचपन में ़ ़ ़ उस से प्रेरित होकर मैंने पिंडारियों पर इसे आधारित किया। भारत का इतिहास अंग्रेजों ने लिखा, इसलिए अपनी खिलाफत करने वाली कौम को उन्होंने ठग और लुटेरा बता दिया। इस फिल्म में हमलोगों ने बताया है कि पिंडारी क्या थे?

आपने पिता जी की मदद ली कि नहीं? आप दोनों ने कभी साथ में काम किया है क्या?

उन्होंने मेरी एक फिल्म लिखी थी पत्थर के फूल। उसके बाद उन्होंने लिखना ही बंद कर दिया। वे मेरे पिता हैं तो उनकी मदद लेना लाजिमी है। किसी भी फिल्म में कहीं फंस जाते हैं तो उनकी मदद लेते हैं। और वे तुरंत सलाह देते हैं।

इस फिल्म के लिए अलग से मेहनत करनी पड़ी क्या?

पहले मैंने बाडी पर काम शुरू किया। फिर पता चला कि उस समय लो्रग सिक्स पैक नहीं बनाते थे। वे हट्टे-कट्टे रहते थे। उनकी टा्रंगों और जंघाओं में भी दम रहता था। इसके बाद देसी एक्सरसाइज आरंभ किया। माडर्न तरीके में लो्रग धड़ से नीचे का खयाल नहीं रखते। ऐसा ल्रगता है कि माचिस की तीलियों पर बाडी रख दी गयी हो। मुझे मजबूत व्यक्ति दिखना था।

अभी फिल्मों के प्रोमोशन पर स्टार पूरा ध्यान देने लगे हैं। अब तो आप भी मीडिया से खूब बातें करते हैं?

करना पड़ता है। आप के लिए तो एक इंटरव्यू है। लेकिन मुझे अभी पचास इंटरव्यू देने हैं। फिर भी पता चले्रगा कि कोई छूट गया। पहले का समय अच्छा था कि ट्रेलर चलता था। फिल्मों के पोस्टर ल्रगते थे और दर्शक थिएटर आ जाते थे। अभी तो दर्शकों को बार-बार बताना पड़ता है कि भाई मेरी फिल्म आ रही है। पहले थोड़ा रिलैक्स रहता था। कभी मूड नहीं किया तो काम पर नहीं गए। अभी ऐसा सोच ही नहीं सकते। प्रोमोशन, ध्यान, मेहनत सभी चीज का लेवल बढ़ गया है।


Sunday, January 17, 2010

खबरों को लेकर मची जंग है रण-रामगोपाल

एक समय था कि राम गोपाल वर्मा की फैक्ट्री का स्टांप लगने मात्र से नए एक्टर, डायरेक्टर और टेक्नीशियन को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री और आईडेंटिटी मिल जाती थी। वे आज भी यही कर रहे हैं, लेकिन राम गोपाल वर्मा की आग के बाद उनकी क्रिएटिव लपटों में थोड़ा कम ताप महसूस किया जा रहा है। अपनी ताजा फिल्म रण में उन्होंने इलेक्ट्रानिक मीडिया के माहौल को समझने की कोशिश की है। वे इस फिल्म को महत्वपूर्ण मानते हैं और यह है भी-

[मीडिया पर फिल्म बनाने की बात कैसे सूझी?]

न्यूज चैनलों में आए विस्फोट के बाद से ही मेरी जिज्ञासा थी कि अचानक लोगों की रुचि समाचारों में बढ़ गयी है या फिर न्यूज चैनलों का अपना कोई स्वार्थ है? मैं इसे समझने की कोशिश में लगा था। दो साल पहले एक चैनल पर समाचार देखते हुए मुझे लगा कि अभी तो किसी भी रिपोर्ट को एडिट से विश्वसनीय बनाया जा सकता है। न्यूज मेकिंग लगभग फिल्म मेकिंग की तरह हो गयी है। वास्तविक तथ्यों और फुटेज को जोड़कर आप किसी भी घटना का फोकस बदल सकते हैं। सवाल है कि खबरें बनती हैं या बनायी जाती है? ऐसी बातों और घटनाओं ने मुझे रण बनाने के लिए प्रेरित किया।

[आपने फिल्म बनायी है, इसलिए इस स्थिति के कारणों पर भी गौर किया होगा। आप क्या सोचते और समझते हैं?]

वास्तव में चैनलों को 24 घंटे समाचार चाहिए। दूसरे सैकड़ों चैनलों से आपकी होड़ है। आपको लगातार दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींचना है। उसके लिए नाटक, लाउडनेस और एक्शन जरूरी है। यह आसान काम नहीं है। चैनलों के इस दबाव को समझने पर मीडियाकर्मियों से मेरी सहानुभूति है।

[क्या सचमुच मीडिया प्रभावित कर रहा है समाज को। क्या आप भी प्रभावित होते हैं?]

यह मीडिया का असर ही है कि मैं रण फिल्म बना रहा हूं। मीडिया जागरूकता बढ़ाने के काम आता है। यह संबंधित लोगों को सोचने पर विवश करता है। उन पर दबाव पड़ता है कि जब सारा देश इस मुद्दे को जानता है तो उन्हें कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। यह दबाव सरकार पर भी पड़ता है। मीडिया पर सरकारी नियंत्रण न होना अच्छी बात है। अगर नियंत्रण हो जाए तो वह समाज के लिए अधिक खतरनाक हो जाएगा। मेरा सवाल फिल्म में विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक रखते हैं कि 'तमाम सिस्टम हम बनाते हैं, तो मीडिया के सिस्टम में आई खराबी कौन दूर करेगा?' इस मामले में हम सभी को सोचना होगा।

['रण' के किरदारों को किस तरह तय किया? उन किरदारों को निभाने वाले कलाकारों के चुनाव के बारे में कुछ बताएं?]

मेरी कोशिश रही है कि मीडिया में प्रचलित सभी दृष्टिकोण फिल्म के किरदारों द्वारा अभिव्यक्त हों। अंबरीष और विजय हर्षव‌र्द्धन (अमिताभ बच्चन)विरोधी सोच के हैं। दूसरी तरफ मोहन पांडेय (परेश रावल) जैसे नेता हैं। आनंद प्रकाश त्रिपाठी (राजपाल यादव) जैसा किरदार है। पूरब शास्त्री (रीतेश देशमुख) और जय (सुदीप) हैं। इनके अलावा नंदिता शर्मा, नलिनी कश्यप, यास्मीन हुसैन और प्रिया मलिक हैं।

[इन सभी में किस ने आप को सरप्राइज किया?]

रीतेश और सुदीप ने चौंकाया। रीतेश को दर्शक इधर ज्यादा कामिक किरदारों में देखते रहे हैं। उनसे ऐसी गंभीर भूमिका की उम्मीद नहीं की होगी। सुदीप अच्छे परफॉर्मर हैं। वे अमिताभ बच्चन के बेटे की भूमिका निभा रहे हैं।

[अमिताभ बच्चन का उल्लेख नहीं कर रहे हैं आप?]

वे टेरिफिक रोल में हैं और उन्होंने उसे अचीव किया है। बच्चन बुरा काम करें तो आप चौंक सकते हैं। अमिताभ बच्चन ने अच्छा काम किया है ़ ़ ़ यह बहुत पुराना वाक्य हो गया है।




Saturday, January 16, 2010

दरअसल : पोस्टर पालिटिक्‍स

-अजय ब्रह्मात्‍मज

हाल-फिलहाल में रिलीज हुई फिल्मों को थोड़ा ध्यान से देखें और पढ़ें। पोस्टरों में छपी तस्वीर, लिखे शब्द और के्रडिट लाइन पर गौर करें। सहज रूप से आप जान जाएंगे कि निर्माता पोस्टर के माध्यम से क्या बताना चाह रहा है? हालांकि पोस्टर की डिजाइन में मुख्य अभिनेता, अभिनेत्री, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर की सलाह पर विचार किया जाता है, लेकिन सच कहें, तो हिंदी फिल्मों का हीरो ही पोस्टर फाइनल करता है। उसके ओके करने के बाद ही पोस्टर के रूप में फिल्मों का फ‌र्स्ट लुक बाहर किया जाता है।

यह सच है कि फ‌र्स्ट लुक पर आजकल बहुत जोर दिया जाता है। फिल्म निर्माता इसे एक इवेंट बना देते हैं और फिर मीडिया कवरेज पाते हैं। ऐसे इवेंट में मुख्य रूप से बातचीत फ‌र्स्ट लुक पर होनी चाहिए, लेकिन फिल्म रिपोर्टर और फिल्म स्टार अपने परिचित और नियमित दायरे से बाहर नहीं निकल पाते। वे फिल्म के बारे में सारी बातें करते हैं। बस, फ‌र्स्ट लुक पीछे रह जाता है। फ‌र्स्ट लुक या पहला पोस्टर फिल्म का मूड बताता है। एक तस्वीर या मोंटाज के जरिए निर्माता-निर्देशक बताते हैं कि फिल्म में आप क्या देखने जा रहे हैं। पब्लिसिटी डिजाइनर इसे कलात्मक रूप देता है। सलमान खान की हिट फिल्म वांटेड और आ रही फिल्म वीर के पोस्टर को देखते हुए आप रजिस्टर करेंगे कि उनके शरीर सौष्ठव के साथ आक्रामक भंगिमाओं पर फोकस किया गया है। रोमांटिक हीरो सलमान को अलग छवि देने की कोशिश की जा रही है। इनमें सलमान के अलावा किसी और की तस्वीर नहीं है।

लगे हाथ लोगों को बता दूं कि आजकल इसके लिए अलग से फोटो शूट किए जाते हैं। पहले फिल्मों के पोस्टर फिल्म के किसी दृश्य से तैयार किए जाते थे। फिल्म की थीम के अनुरूप इमोशन के क्लोजअप होते थे। फिल्म के किरदारों और स्टारों के फेस वैल्यू के आधार पर उन्हें पोस्टर में जगह दी जाती थी। पोस्टर में उनकी तस्वीरों की साइज का अनुपात उनके मार्केट वैल्यू पर निर्भर करता था। पिछले दिनों एक पोस्टर आर्टिस्ट ने बताया कि पुराने जमाने में पोस्टर पर हीरो, हीरोइन और विलेन के चेहरे उनकी लोकप्रियता दर्शाते थे। उन्होंने विलेन की भूमिका निभाने वाले एक कलाकार का जिक्र किया कि पोस्टर में अपनी तस्वीर बड़ी करने के लिए उन्होंने 20,000 रुपए देने की बात भी की थी। यह बात छठे दशक की है। तब न तो मीडिया विस्फोट हुआ था और न ही एक्पोजर के इतने एवेन्यू थे। मुझे याद है कि रामगोपाल वर्मा की फिल्म सत्या रिलीज हुई थी, तब फिल्म के हीरो की बड़ी तस्वीरें पोस्टर पर थीं। सत्या में जे डी चक्रवर्ती ने फिल्म के नायक सत्या की भूमिका निभाई थी। फिल्म रिलीज होने के एक हफ्ते के अंदर भीखू म्हात्रे का किरदार इतना पापुलर हो गया कि निर्माता ने फटाक से नया पोस्टर छपवाया और उसमें भीखू का किरदार निभा रहे मनोज बाजपेयी की तस्वीर लगाई। ऐसा अनेक बार हुआ है कि फिल्म की रिलीज के बाद दर्शकों की रुचि से पोस्टर की डिजाइन बदल जाए।

एक और वाकया याद आ गया। सभी जानते हैं कि सलीम-जावेद के नाम पोस्टर पर छपते थे, लेकिन क्या आपको मालूम है कि इसके लिए उन्होंने क्या युक्ति लगाई थी? दीवार की रिलीज के समय तक लेखक के रूप में उनका बड़ा नाम हो गया था। उन्होंने निर्माता से आग्रह किया था कि पोस्टर पर उनका नाम डालें। निर्माता ने उनकी बात नहीं मानी। फिल्म रिलीज होने के पहले शहर में पोस्टर लगे। पोस्टरों पर अपना नाम न देख कर सलीम-जावेद ने कुछ लोगों को पैसे दिए और उन्हें निर्देश दिया कि सभी पोस्टरों पर लेखक -सलीम-जावेद लिख दो। पोस्टर के ऊपर हाथों से बड़े अक्षरों में लेखक सलीम-जावेद लिखे जाने पर लोगों ने उन्हें नोटिस किया। फिल्म सफल हुई, तो निर्माता ने भी पोस्टर में उनके नामों को जगह दी।


Monday, January 11, 2010

फिल्‍म समीक्षा : प्‍यार इंपासिबल

पासिबल है प्‍यार

सामान्य सूरत का लड़का और खूबसूरत लड़की ़ ़ ़ दोनों के बीच का असंभावित प्यार ़ ़ ़ इस विषय पर दुनिया की सभी भाषाओं में फिल्में बन चुकी हैं। उदय चोपड़ा ने इसी चिर-परिचित कहानी को नए अंदाज में लिखा है। कुछ नए टर्न और ट्विस्ट दिए हैं। उसे जुगल हंसराज ने रोचक तरीके से पेश किया है। फिल्म और रोचक हो जाती, अगर उदय चोपड़ा अपनी भूमिका को लेकर इतने गंभीर नहीं होते। वे अपने किरदार को खुलने देते तो वह ज्यादा सहज और स्वाभाविक लगता।

अलीशा का दीवाना है अभय, लेकिन वह अपनी भावनाओं का इजहार नहीं कर पाता। वह इंटेलिजेंट है, लेकिन बात-व्यवहार में स्मार्ट नहीं है। यही वजह है कि पढ़ाई पूरी होने तक वह आई लव यू नहीं बोल पाता। सात सालों के गैप के बाद अलीशा उसे फिर से मिलती है। इन सात सालों में वह एक बेटी की मां और तलाकशुदा हो चुकी है। वह सिंगापुर में सिंगल वर्किंग वीमैन है। इस बीच अभय ने अपने सेकेंड लव पर ध्यान देकर एक उपयोगी साफ्टवेयर प्रोग्राम तैयार किया है, लेकिन उसे कोई चुरा लेता है। उस व्यक्ति की तलाश में अभय भी सिंगापुर पहुंच जाता है। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनती है कि वह अलीशा के घर में उसकी बेटी को संभालने की नौकरी करने लगता है। समर्पण, तारीफ, समझदारी और गलतफहमी के साथ कहानी आगे बढ़ती है। एक पाइंट के बाद हम भी चाहने लगते हैं कि अलीशा का मिलन अभय से ही होना चाहिए। ऑन स्क्रीन लूजर के प्रति यह समर्थन स्वाभाविक है।

उदय चोपड़ा मस्त एक्टर हैं। वे दुखी कामिकल किरदारों को अच्छी तरह निभाते हैं। इस फिल्म में वे और निखरे हैं। स्वयं को च्यादा स्क्रीन स्पेस देने के लोभ से वे बचे रहते तो फिल्म चुस्त और प्रभावशाली हो जाती। प्रियंका चोपड़ा अनुभवी अभिनेत्री के तौर पर दिखती हैं। वह छोटे मनोभावों और दुविधाओं को भी बारीकी से निभाती हैं। इस फिल्म में वह खूब जंची हैं। उन्होंने अलीशा के किरदार को जीवंत कर दिया है। छोटे बालों में उनका लुक फिल्म का एक और आकर्षण बन गया है, लेकिन उनके परिधानों के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती। मनीष मल्होत्रा ने अलीशा के किरदार के बजाए प्रियंका चोपड़ा एक्ट्रेस की छवि के लिहाज से ड्रेस डिजाइन कर दी है।

और एक सवाल ़ ़ ़ क्या चश्मा लगाने से व्यक्ति साधारण और अनाकर्षक हो जाता है। हिंदी फिल्मों की दशकों पुरानी इस धारणा से अलग जाकर भी सोचा जा सकता था। अलीशा की छह साल की बेटी को प्रेम के प्रेरक रूप में दिखाना भी हिंदी फिल्मों का फार्मूला है। करण जौहर की कुछ कुछ होता है में भी हम ऐसी लड़की से मिल चुके हैं। बहरहाल, प्यार इंपासिबल का फील अच्छा है और दोनो चोपड़ा प्यार के एहसास को बढ़ाते हैं।

**1/2 ढाई स्टार


Sunday, January 10, 2010

रितिक रोशन :अभिनय में अलबेला

-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्मी परिवारों के बच्चों को अपनी लांचिंग के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता। उनके मां-बाप सिल्वर स्क्रीन पर उतरने की उनकी ख्वाहिश जल्दी से जल्दी पूरी करते हैं। इस सामान्य चलन से विपरीत रही रितिक रोशन की लांचिंग। जनवरी, 2000 में उनकी पहली फिल्म कहो ना प्यार है दर्शकों के सामने आयी, लेकिन उसके पहले पिता की सलाह पर अमल करते हुए उन्होंने फिल्म निर्माण की बारीकियों को सीखा। वे अपने पिता के सहायक रहे और किसी अन्य सहायक की तरह ही मुश्किलों से गुजरे। स्टारों की वैनिटी वैन के बाहर खड़े रहने की तकलीफ उठायी। कैमरे के आगे आने के पहले उन्होंने कैमरे के पीछे की जरूरतों को आत्मसात किया। यही वजह है कि वे सेट पर बेहद विनम्र और सहयोगी मुद्रा में रहते हैं। उन्हें अपने स्टाफ को झिड़कते या फिल्म यूनिट पर बिगड़ते किसी ने नहीं देखा।

[कामयाबी से मिला कान्फीडेंस]

रितिक रोशन मैथड, रिहर्सल और परफेक्शन में यकीन करते हैं। 1999 की बात है। उनकी पहली फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई थी। फोटोग्राफर राजू श्रेष्ठा के स्टूडियो में वे फोटो सेशन करवा रहे थे। उन्होंने वहीं बातचीत और इंटरव्यू के लिए बुला लिया था। स्टूडियो के अंदर बज रहे मधुर संगीत और तेज रोशनी में वे एक खास मुद्रा को कैमरे में कैद करना चाहते थे। वे चाहते थे कि बाएं कान के पास गाल से टपकने को तैयार पसीने की बूंदें दिखें। उस परफेक्ट बूंद के लिए उन्होंने आधे घंटे लगाए और हो रही देरी के लिए आंखों से ही माफी मांगी। बाद में इंटरव्यू हुआ तो बातचीत में उनकी हकलाहट की समस्या पता चली। थोड़ी हैरत भी हुई कि इस हकलाहट के साथ वे फिल्म के संवाद कैसे बोल पाएंगे? कहो ना प्यार है रिलीज हुई तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को बहुमुखी प्रतिभा का धनी स्टार मिला। पर्दे पर संवाद अदायगी में उनकी हकलाहट आड़े नहीं आई। डबिंग में तकनीक की मदद से उन्होंने उस पर काबू पा लिया। और फिर कहो ना प्यार है की अद्वितीय कामयाबी से उनकी हकलाहट भी लगभग जाती रही। कामयाबी से मिले कान्फीडेंस ने उन्हें इस बीमारी से जुड़ी ग्रंथियों से दूर किया। अपने धैर्य, समर्पण और निरंतर अभ्यास से उन्होंने स्वयं को निखारा और परफेक्ट किया।

[वह दौर भी देखा है]

पहली फिल्म की अप्रतिम सफलता के बाद उनकी तीन फिल्मों फिजा, मिशन कश्मीर और यादें के बाक्स आफिस कलेक्शन ने निराश किया। यह पहला झटका था। 2001 में आई करण जौहर की कभी खुशी कभी गम चली, लेकिन उसमें अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान भी थे। उसकी सफलता का वाजिब श्रेय उन्हें नहीं मिल पाया। उसके बाद आप मुझे अच्छे लगने लगे, ना तुम जानो न हम, मुझसे दोस्ती करोगी और मैं प्रेम की दीवानी हूं नहीं चली तो रितिक रोशन को 'वन फिल्म वंडर' कहा जाने लगा। उन दिनों रितिक रोशन गहन निराशा और असुरक्षा महसूस कर रहे थे। वे अपनी गलती और कमी नहीं समझ पा रहे थे। गौर करें तो इन सभी फिल्मों में निर्माता-निर्देशकों ने रितिक रोशन की लोकप्रियता को भुनाने और मुनाफा कमाने की जल्दबाजी दिखायी थी। उस झोंक में सूरज बड़जात्या जैसे निर्देशक भी रितिक रोशन का सही उपयोग करने में चूक गए थे।

[बगैर मेकअप किया मुश्किल किरदार]

आलोचना के इस दौर में रितिक रोशन ने आत्ममंथन और कॅरिअर विश्लेषण किया। उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं तय करने के साथ आमिर खान से सबक लिया। एक समय में एक फिल्म करने और उसे पूरी तल्लीनता के साथ करने की रणनीति पर अमल किया। नतीजा कोई मिल गया के रूप में सामने आया। पिता राकेश रोशन के निर्देशन में बनी इस फिल्म में रितिक रोशन ने ऑटिज्म के शिकार बच्चे की प्रभावशाली भूमिका निभायी थी। पा में हम सभी अमिताभ बच्चन के ऑरो रूपांतरण की तारीफ कर रहे हैं। गौर करें तो छह साल पहले रितिक रोशन ने बगैर मेकअप के उस मुश्किल किरदार को पर्दे पर विश्वसनीय बना दिया था।

[हैरतअंगेज एक्शन का जोखिम]

कोई मिल गया में सही मायने में उन्हें 'लक्ष्य' मिल गया था। 2003 से 2009 के बीच उनकी केवल चार फिल्में आई। लक्ष्य, कृष, धूम-2 और जोधा अकबर में उनके किरदारों का बारीक अध्ययन करें तो सभी एक-दूसरे से स्वभाव और प्रकृति में कोसों दूर हैं। आगे-पीछे आई धूम-2 और जोधा अकबर में रितिक रोशन और ऐश्वर्या राय के परफार्मेस की भिन्नता चौंकाती है। एक अत्याधुनिक और दूसरी पीरियड, लेकिन दोनों में ही परफेक्ट नजर आते रितिक रोशन। उसके पहले कृष में उन्हें कोई मिल गया के नायक को सुपरहीरो की ऊंचाई तक ले जाने का मौका मिला था। इस फिल्म में हैरतअंगेज एक्शन का जोखिम रितिक ने उठाया था। वे शूटिंग के दरम्यान घायल भी हुए थे, लेकिन एक्शन और परफार्मेस से उन्होंने कृष को रोमांचक एवं बच्चों के बीच लोकप्रिय बना दिया था। कृष की कामयाबी इसी में है कि यह फिल्म बच्चों के साथ बड़ों को भी पसंद आई थी।

[जीवंत किया ऐतिहासिक किरदार]

जोधा अकबर में उन्होंने उस अकबर की भूमिका को निभाने की चुनौती स्वीकार की, जो पृथ्वीराज कपूर का पर्याय मानी जाती है। उन्होंने युवा अकबर के रूप में आशुतोष गोवारिकर की सोच के अनुरूप परफार्मेस किया और ऐतिहासिक किरदार को अपेक्षित गहराई के साथ जीवंत किया। इस फिल्म को देखते समय दर्शकों को रत्ती भर खयाल नहीं आया कि उन्होंने अभी-अभी धूम-2 में रितिक रोशन को बिल्कुल अलग अंदाज में देखा था।

[सभी निर्देशक करते हैं तारीफ]

रितिक रोशन के सभी डायरेक्टर उनके समर्पण और परफेक्शन की तारीफ करते हैं। रितिक निर्देशक की सोच और कल्पना को अभिनय से सींचते हैं। अपनी फिल्मों की शूटिंग के दरम्यान रितिक रोशन कोई और काम नहीं करते। वे दूसरे पापुलर स्टारों की तरह खाली समय का उपयोग एड, इवेंट या परफार्मेस से पैसे कमाने में नहीं करते। उनका खाली समय परिवार के लिए समर्पित रहता है।

[इस साल होगा डबल धमाका]

सन् 2004 से रितिक रोशन की फिल्में हर दूसरे साल आती रही हैं। 2010 में उनके प्रशंसक और दर्शक खुश हो सकते हैं, क्योंकि इस साल उनकी दो फिल्में काइट्स और गुजारिश रिलीज होंगी। पिछले साल काइट्स की शूटिंग के दरम्यान जब बारबरा मोरी और उनके बीच के रोमांस की खबरें आई तो उनके करीबियों को आश्चर्य हुआ था। पत्नी और परिवार के लिए समर्पित रितिक रोशन से संबंधित झूठी खबरों की सच्चाई जल्दी ही सामने आ गई। काइट्स के दृश्यों के लिए जरूरी रितिक रोशन और बारबरा मोरी की अंतरंगता को वास्तविक समझने की भूल किसी से हो गई थी। बहरहाल, काइट्स अभी रिलीज नहीं हुई है। इस फिल्म के निर्देशक अनुराग बसु की बात को सही मानें तो हिंदी फिल्मों के इतिहास में काइट्स जैसी फिल्म नहीं बनी है। अभी तक ऐसे नायक की कल्पना ही नहीं की गयी थी। अभिनय और नायकत्व को विस्तार दे रहे रितिक रोशन ने संजय लीला भंसाली की गुजारिश में नयी चुनौती स्वीकार की है। उन्होंने पैराप्लेजिया से ग्रस्त व्यक्ति की भूमिका निभायी है, जिसे पूरी फिल्म में ह्वीलचेयर पर ही रहना है। यह भी एक संयोग है कि रितिक रोशन और ऐश्वर्या राय की यह तीसरी फिल्म होगी!




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Saturday, January 9, 2010

फिल्‍म समीक्षा : दूल्‍हा मिल गया

अधूरी कहानी, कमजोर फिल्म

-अजय ब्रह्मात्‍मज

डायरेक्टर और अभिनेत्री के बीच समझदारी और केमिस्ट्री हो तो फिल्म बहुत अच्छी बनती है। राज कपूर से लेकर संजय लीला भंसाली तक की फिल्में उदाहरण के रूप में देखी जा सकती हैं। बहरहाल, हर नियम के अपवाद होते हैं। मुदस्सर अजीज की फिल्म दूल्हा मिल गया ऐसी ही अपवाद फिल्म है। सुष्मिता सेन, शाहरुख खान और फरदीन खान की मौजूदगी और विदेशों के आकर्षक लोकेशन के बावजूद फिल्म बांध नहीं पाती। ऐय्याश और फिजूलखर्ची के शौकीन बेटे को वसीयत से सुधारने की पुरानी तरकीब में नए किस्म के छल-प्रपंच, प्रेम और सहानुभूति को जोड़कर बनी दूल्हा मिल गया में कई पुरानी फिल्मों की झलकियां मिल सकती हैं। मुदस्सर अजीज के पास कहानी का ढांचा नहीं है। वे एकसामान्य कहानी को दूसरी फिल्मों के दृश्य से सजाते चले जाते हैं। यहां तक कि मुख्य किरदारों का भी विश्वसनीय चरित्रांकन नहीं कर पाते। शाहरुख खान को उपयोग के लिए जबरदस्ती पीआर जी का कैरेक्टर गढ़ा गया है। अपनी व्यस्तता के बीच से समय निकालकर शाहरुख खान ने बेमन से शूटिंग पूरी करने की औपचारिकता निभा दी है।

सुष्मिता सेन के लिए अपने किरदार को निभा पाना मुश्किल नहीं रहा है। वह एक माडल की अदाओं और भंगिमाओं को पर्दे पर उतारती हैं, लेकिन क्या वैसी भाव-भंगिमाएं आवश्यक थीं? फरदीन खान अपने मोटापे की वजह से थके-थकेलगते हैं। उन्हें खुद को फिर से खोजने की जरूरत है। इन दिनों पापुलर स्टार नए किरदारों को निभाने की चुनौतियां स्वीकार कर रहे हैं, जबकि फरदीन खान की लापरवाही अब स्क्रीन पर नजर आने लगी है। नयी अभिनेत्री ईशिता शर्मा में आकर्षण है और उन्होंने अपने किरदार पर मेहनत भी की है, लेकिन अधूरे ढंग से लिखी कहानी में उनके किरदार के विकास पर लेखक-निर्देशक ने विशेष ध्यान नहीं दिया है।

*1/2 डेढ़ स्टार


Friday, January 8, 2010

दरअसल:वर्चुअल पब्लिसिटी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्मों की रिलीज तक निर्माता, निर्देशक और उसके कलाकार फिल्म के प्रचार का हर कारगर तरीका अपनाते हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के जरिए अपने इंटरव्यू में दर्शकों को फिल्म के बारे में बताते हैं।

शहरों में होर्डिग और पोस्टर लगाए जाते हैं। ऑनलाइन पब्लिसिटी की जाती है। टीवी पर प्रोमो चलते हैं और सिनेमाघरों में चल रही फिल्मों के साथ आगामी फिल्मों के ट्रेलर दिखाए जाते हैं। इन दिनों फिल्मों की रिलीज के पहले अनेक तरह के प्रोमोशनल इवेंट होते हैं, जिनमें कंज्यूमर प्रोडक्ट कंपनियां फिल्मी सितारों के साथ कार्यक्रम करती हैं। ताजा तरीका आमिर खान का रहा। उन्होंने दर्शकों को चुनौती दी कि वे उन्हें खोजें या पकड़ लें। लुकाछिपी के इस खेल से उन्होंने 3 इडियट्स को प्रचारित किया। फल सामने दिख रहा है। यह फिल्म बड़े शहरों के मल्टीप्लेक्स के साथ छोटे-बड़े शहरों के सिंगल स्क्रीन थिएटरों में भी संतोषजनक व्यवसाय कर रही है। उन्हें अपनी फिल्मों के नए प्रचारक भी मिले हैं।

अभी तक ट्रेड पंडित और फिल्म पत्रकारों से आपने सुना होगा कि फलां फिल्म की अच्छी ओपनिंग नहीं लगी है, लेकिन उम्मीद है कि माउथ पब्लिसिटी (मौखिक प्रचार) से दर्शक बढ़ेंगे। हाल-फिलहाल में कुछ फिल्में मौखिक प्रचार से सफल साबित हुई। राजकुमार हिरानी की पहली फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस के साथ यही हुआ था। मौखिक प्रचार काम करता है। इधर इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइट के पॉपुलर होने के बाद नया चलन दिख रहा है। अब फिल्मों के प्रशंसक और समर्थक अपनी पसंद की फिल्मों के बारे में बताते हुए लिखने और दिखने लगे हैं। अंतिम कुछ महीनों से ऐसे समर्थक और प्रशंसकों की संख्या बढ़ी है।

पिछले दिनों अचानक एक ईमेल मिला, जिसमें इंदौर के राजीव नेमा की वीडियो क्लिपिंग का लिंक था। 4 मिनट से ज्यादा के इस क्लिपिंग में उन्होंने 3 इडियट्स के बारे में बताया था। साथ में यह भी उल्लेख किया था कि फिल्म रिलीज होने के छह घंटे के अंदर यह वीडियो पोस्ट की है। उन्होंने रोचक इंदौरी शैली में फिल्म की तारीफ की है। मेरा मानना है कि उनके इस लिंक को देख चुके हजारों नेटयूजर में से दस प्रतिशत भी दर्शक बन गए हों, तो उन्होंने 3 इडियट्स की कामयाबी में योगदान किया है। उनकी इस कोशिश को हम सुविधा के लिए वर्चुअल पब्लिसिटी कह सकते हैं। इसके अंतर्गत आम दर्शक फिल्म पसंद आने पर ब्लॉग, सोशल नेटवर्क, यू ट्यूब और एसएमएस आदि के जरिए अपनी बात लिखते, बोलते और दिखते हैं। गौर करें, तो हर सप्ताह फिल्म रिलीज होने के बाद इंटरनेट पर फिल्म प्रेमी नेटयूजर की आवाजाही बढ़ जाती है। कुछ साल पहले तक हम जिसे माउथ पब्लिसिटी कहते थे। वह अब वर्चुअल पब्लिसिटी के रूप में सामने आ रही है। मौखिक प्रचार की अपनी सीमाएं थीं, जिसमें एक दर्शक अपने परिचित, रिश्तेदार, मित्र और सहकर्मियों को ही बता पाता था। वर्चुअल पब्लिसिटी में आपकी लिखी और वीडियो पर कही बातों को दुनिया भर में फैले हजारों नेटयूजर पढ़ते और देखते-सुनते हैं। निर्माता-निर्देशकों और ट्रेड पंडितों ने अभी तक फिल्मों के वर्चअुल प्रचारकों पर गौर नहीं किया है। वर्चुअल पब्लिसिटी के जरिए आम दर्शक ग्लोबल नेटयूजर आडिएंस से इंटरेक्ट करता है। अगर कोई फिल्म उसे अच्छी नहीं लगी, तो वर्चुअल पब्लिसिटी के जरिए वह नुकसान भी पहुंचा सकता है। दरअसल, गुमनाम और मुफ्त प्रचारकों की वर्चुअल पीढ़ी अपनी पसंद-नापसंद के हिसाब से फिल्मों का बिजनेस प्रभावित करने लगी है।


Wednesday, January 6, 2010

इश्किया के गाने

कुछ शब्‍द इधर-उधर हुए हैं। गुलजार के प्रशंसकों पहले ही माफी मांग रहा है चवन्‍नी।

इब्‍न-ए-बतूता

इब्‍न-ए-बतूता ता ता ता ता ता ता ता ता ता

इब्‍न-ए-बतूता ता ता

बगल में जूता ता ता

इब्‍न-ए-बतूता ता ता

बगल में जूता ता ता

पहने तो करता है चुर्र

उड़ उड़ आवे आ आ, दाना चुगे आ आ

उड़ उड़ आवे आ आ, दाना चुगे आ आ

इब्‍न-ए-बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता

पहने तो करता है चुर्र

उड़ उड़ गावे, दाना चुगे ये

उड़ जावे चिड़िया फुर्र

फुर्र

इब्‍न-ए-बतूता

इब्‍न-ए-बतूता

यहीं अगले मोड़ पे, मौत खड़ी है

अरे मरने की भी, क्‍या जल्‍दी है

इब्‍न-ए-बतूता

अगले मोड़ पे, मौत खड़ी है

अरे मरने की भी क्‍या जल्‍दी है

हॉर्न बजाके, आवे जाये

दुर्घटना से देर भली है

चल उड़ जा उड़ जा फुर्र फुर्र

इब्‍न-ए-बतूता ता ता

बगल में जूता ता ता

पहने तो करता है चुर्र

उड़ उड़ आवे आ आ, दाना चुगे आ आ

उड़ जावे चिड़िया फुर्र

इब्‍न-एएएएएएएएए-बतूता

इब्‍न-एएएएएएएएए-बतूता

दोनो तरफ से, बजती है ये

आए हाय जिंदगी, क्‍या ढोलक है

दोनों तरफ से, बजती है ये

आए हाय जिंदगी, क्‍या ढोलक है

हॉर्न बजाके, आ बगियन में

अरे थोड़ा आ गए

अरे चल चल चल उड़ जा उड़ जा

फुर्र, फुर्र फुर्र

इबन-ए-बतूता ता ता

(इबन-ए-बतूता ता ता)

बगल में जूता ता ता

(बगल में जूता ता ता)

पहने तो करता है चुर्र

उड़ उड़ आए आ आ

(उड़ उड़ आए आ आ)

दाना चुगे आ आ

उड़ जाए चिड़िया फुर्र

दिल तो बच्‍चा है

ऐसी उलझी नजर उनसे हटती नहीं

दांत से रेशमी डोर कटती नहीं

उम्र कब की बरस के सुफेद हो गई

कारी बदरी जवानी की छंटती नहीं

वरना ये धड़कन बढ़ने लगी है

चेहरे की रंगत उड़ने लगी है

डर लगता है तनहा सोने में जी

दिल तो बच्‍चा है जी

दिल तो बच्‍चा है जी

थोड़ा कच्‍चा है जी

हां दिल तो बच्‍चा है जी

ऐसी उलझी नजर उनसे हटती नहीं

दांत से रेशमी डोर कटती नहीं

उम्र कब की बरस के सुफेद हो गई

कारी बदरी जवानी की छंटती नहीं

किसको पता था पहलू में रखा

दिल ऐसा पाजी भी होगा

हम तो हमेशा समझे थे कोई

हम जैसा हाजी ही होगा

हां ये जोर करे, कितना शोर करे

बेवजह बातों पे ऐवैं गौर करें

दिल सा कोई कमीना नहीं

कोई तो रोके, कोई तो टोके

इस उम्र अब खाओगे धोखे

डर लगता है इश्‍क करने में जी

दिल तो बच्‍चा है जी

दिल तो बच्‍चा है जी

थोड़ा कच्‍चा है जी

हां दिल तो बच्‍चा है जी

ऐसी उलझी नजर उनसे हटती नहीं

दांत से रेशमी डोर कटती नहीं

उम्र कब की बरस के सुफेद हो गई

कारी बदरी जवानी की छंटती नहीं

ऐसी उदासी बैठी है दिल पे

हंसने से घबरा रहे हैं

सारी जवानी कतरा के कटी

पीरी में टकरा गए हैं

दिल धड़कता है तो ऐसे लगता है वो

आ रहा है यहीं देखता ही न वो

प्रेम की मारे कटार रे

तौबा ये लम्‍हे कटते नहीं

क्‍यों आंखों से मेरी हटते नहीं क्‍यों

डर लगता है तुझसे कहने में जी

दिल तो बच्‍चा है जी

दिल तो बच्‍चा है जी

थोड़ा कच्‍चा है जी

हां दिल तो बच्‍चा है जी

ऐसी उलझी नजर उनसे हटती नहीं

दांत से रेशमी डोर कटती नहीं

उम्र कब की बरस के सुफेद हो गई

कारी बदरी जवानी की छंटती नहीं