रोमांचक अनुभव देगी
-अजय ब्रह्मात्मज
दिबाकर बनर्जी ने कथ्य और क्राफ्ट की नवीनता से हिंदी फिल्मों में कुछ नया जोड़ा है। लव सेक्स धोखा यानी एलएसडी हिंदी की आम फिल्म नहीं है। यह फिल्म वास्तविक अर्थो में हट के है और दिबाकर की खूबी है कि वे अपनी बात डट के कहते हैं। कई बार नए विषयों की प्रस्तुति में निर्देशक थोड़े डरे रहते हैं। एलएसडी में प्रयोग को लेकर कोई संशय नहीं है। निर्देशक का आत्मविश्वास बैनर के नाम से लेकर अंतिम क्रेडिट रोल तक दिखाई पड़ता है।
एलएसडी में तीन कहानियां हैं। तीनों के किरदार एक-दूसरे से सीधे नहीं जुड़े हैं, लेकिन वे कुछ दृश्यों में एकत्र होकर कथावृत्त तैयार करते हैं। पहली कहानी में फिल्म स्कूल का छात्र अपनी डिप्लोमा फिल्म बनाते-बनाते नायिका बनी अभिनेत्री से प्रेम करने लगता है। फिल्मों के प्रेम से आवेशित वह शादी कर लेता है, लेकिन उसकेप्रेमविवाह का अंजाम फिल्मों की तरह नहीं होता। दूसरी कहानी में डिपार्टमेंटल स्टोर के कर्मचारी के प्रेम और सेक्स को मर्यादित ढंग से चित्रित किया गया है। प्रेमी-प्रेमिका पर पड़ रहे सामाजिक, आर्थिक और नैतिक दबाव को हम महसूस कर सकते हैं। तीसरी कहानी का नायक स्टिंग आपरेशन में भी मध्यवर्गीय नैतिकता का पालन करने से मजाक का पात्र बनता है, फिर भी वह उसे छोड़ नहीं पाता। दिबाकर बनर्जी के किरदार मध्यवर्ग से आते हैं। वे अपने वर्गीय मूल्यों के समर्थन या विरोध में खड़े रहते हैं। एलएसडी में मध्यवर्गीय विसंगतियों और विकृतियों को उन्होंने दृश्यरतिकता (वोयरिज्म) के संदर्भ में चित्रित किया है। यह फिल्म समाज में देखने-दिखाने की बढ़ रही प्रवृत्ति पर सीधे उंगली रखती है। एलएसडी हमारी कमजोर नब्ज पर उंगली रखती है, इसलिए तकलीफ दे सकती है। दिबाकर बनर्जी ने इस फिल्म में हिंदी फिल्मों की टेकिंग, लाइटिंग और दृश्य संरचना के नियमों का पालन नहीं किया है। अस्थिर कैमरे का मूवमेंट दर्शकों को सीट पर स्थिर नहीं रहने देगा। यह फिल्म दूसरी रोचक फिल्मों की तरह मोहक दृश्यों में डुबोती नहीं है। दर्शक उपलाते रहते हैं और सच्चाइयों से रूबरू होते हैं। यकीन करें एलएसडी फिल्म देखने का नया रोमांचक अनुभव देती है।
फिल्म के शीर्षक में सेक्स शब्द आने से मध्यवर्गीय दर्शकों की आशंका बढ़ सकती है, लेकिन यह फिल्म अश्लील या फूहड़ नहीं है। यह फिल्म कामुक दृश्यों से रमती नहीं है, इसलिए उत्तेजना और अश्लील रोमांच से बची रहती है। फिल्म देखते हुए हम वोयरिज्म के प्रभाव से वाकिफ होते हैं। यह फिल्म अप्रत्यक्ष तरीके से एमएमएस और पोर्नो के प्रति सावधान और संवेदनशील करती है। हमें पता चलता है कि हमारे क्षणिक रोमांच के पीछे की असलियत क्या है?
नए कलाकार फिल्म की खासियत हैं। वे सभी पात्रों को विश्वसनीय बना देते हैं। हिंदी फिल्मों के नियमित दर्शक भी अनुमान नहीं लगा सकते कि आगामी दृश्यों में ये पात्र कैसा व्यवहार करेंगे या उनके साथ क्या होगा? इस फिल्म का महत्वपूर्ण किरदार कैमरा है। वह दृश्यों को दिखाने के साथ निर्देशक का दृष्टिकोण भी रखता चलता है।
**** चार स्टार
2 comments:
अच्छा ?देखते हैं !शुक्रिया !
U are right. Itz a brilliant film.
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