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Sunday, March 28, 2010

वेल डन अब्‍बा : बोमन ईरानी का जलवा - मृत्युंजय प्रभाकर

अच्छे अभिनेताओं की कद्र हमेशा रही है और रहेगी। बोमन ईरानी ने अपनी अभिनय प्रतिभा से अपनी खास पहचान बनाई है और एक अच्छा-खासा दर्शक वर्ग भी। वह जितने सहज तरीके से अपनी भूमिका उत्कृष्टता से निभा ले जाते हैं इस हफ्ते प्रदर्शित दोनों ही फिल्में इस बात की गवाह हैं। दो फिल्में और भूमिकाएं तीन। श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म "वेल डन अब्बा" में बोमन जु़ड़वा भाइयों की दोहरी भूमिका में हैं तो कबीर कौशिक की फिल्म "हम, तुम और घोस्ट" में भूत की भूमिका में। तीनों पात्रों को बोमन ने जितने नेचुरल तरीके से प्ले किया है वह देखने लायक है। बोमन के दर्शकों के लिए यह हफ्ता सच में खास है।

श्याम बेनेगल की फिल्मों में गांव और कस्बायी समाज हमेशा से प्रमुखता से रहा है। उनकी पिछली फिल्म "वेलकम टू सज्जनपुर" भी कस्बायी धरातल की फिल्म थी और लोगों को पसंद आई थी। "वेल डन अब्बा" में बेनेगल एक बार फिर गांव की ओर लौटे हैं और सरकारी लोककल्याणकारी योजनाओं की जो हालत है उसका परीक्षण किया है। हाल ही में आई सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुस्लिम समाज का जो अक्स दिखाया गया है फिल्म उसकी पुष्टि करती है। बहुत दिनों बाद बॉलीवुड में ऐसी फिल्म आई है जिसका मुख्य पात्र एक मुस्लिम किरदार है। फिल्म हल्के-फुल्के संवादों और दृश्यों के माध्यम से आगे ब़ढ़ती है पर कहीं-कहीं खिंच गई है। इस फिल्म की खोज मिनिषा लांबा हैं जिन्होंने अपने काम से सबको प्रभावित किया है। रवि किशन, राजेंद्र गुप्ता, ईला अरुण, यशपाल शर्मा, रजित कपूर आदि भी अपनी भूमिकाओं में जमे हैं।

Saturday, March 27, 2010

फिल्‍म समीक्षा : वेल डन अब्बा:

 हंसी-खुशी के बेबसी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

इन दिनों हम कामेडी फिल्मों में क्या देखते-सुनते हैं? ऊंची आवाज में बोलते एक्टर, बैकग्राउंड का लाउड म्यूजिक, हीरोइन के बेवजह डांस, गिरते-पड़ते भागते कैरेक्टर, फास्ट पेस में घटती घटनाएं और कुछ फूहड़-अश्लील लतीफों को लेकर लिखे गए सीन ़ ़ ़ यही सब देखना हो तो वेल डन अब्बा निराश करेगी। इसमें ऊपर लिखी कोई बात नहीं है, फिर भी हंसी आती है। एहसास होता है कि हमारी जिंदगी में घुस गए भ्रष्टाचार का वायरस कैसे नेक इरादों की योजनाओं को निगल रहा है। श्याम बेनेगल ने बावड़ी (कुआं) के बहाने देश की डेमोक्रेसी को कतर रहे करप्शन को उद्घाटित किया है। उन्होंने आम आदमी की आदत बन रही तकलीफ को जाहिर किया है।

अरमान अली मुंबई में ड्राइवर है। वह अपनी बेटी मुस्कान की शादी के लिए छुट्टी लेकर गांव जाता है। गांव से वह तीन महीनों के बाद नौकरी पर लौटता है तो स्वाभाविक तौर पर बॉस की डांट सुनता है। अपनी नौकरी बचाने के लिए वह गांव में अपने साथ घटी घटनाएं सुनाता है और हमारे सामने क्रमवार दृश्य खुलने लगते हैं। अनपढ़ अरमान अली सरकार की कपिल धारा योजना के अंतर्गत बावड़ी के लिए आवेदन करता है और रिश्वत के कुचक्र में फंस जाता है। रिश्वत के पर्याय भी कितने परिचित शब्द हैं- घंटा, लोटा आदि।

श्याम बेनेगल ने इस बार हैदराबाद के पास की पृष्ठभूमि चुनी है। यहां दकिनी बोली जाती है। गांव के सरपंच से लेकर राज्य मंत्री तक फैले भ्रष्टतंत्र से हम वाकिफ होते हैं और यह भी देखते हैं कि आम जन लामबंद हो जाए तो राजनीतिक पार्टियां उनकी मांगों के आगे मजबूर होती हैं। अरमान अली अपनी बेटी मुस्कान के साथ मिल कर आंदोलन खड़ा करता है और सरकारी नुमाइंदों समेत मंत्री तक को भी जनहित में नए फैसलों के लिए विवश करता है।

बोमन ईरानी, मिनिषा लांबा और इला अरूण ने वेल डन अब्बा के प्रमुख किरदारों के रूप में निर्देशक के उद्देश्य को अच्छी तरह से पर्दे पर उतारा है। बोमन ईरानी की शातिर मासूमियत अच्छी लगती है। वह भोला है, लेकिन हरिशंकर परसाई का बेचारा भला आदमी नहीं रह गया है। शायद इसी भ्रष्ट तंत्र ने उसे चालाक बना दिया है। बोमन ईरानी ने अपनी भूमिका को पूरी सहजता और प्रभाव के साथ निभाया है। बोमन अपनी भंगिमाओं से साधारण संवादों को भी मारकबना देते हैं। मिनिषा लांबा ने मुस्कान के रूप में अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया है। समीर दत्तानी के लिए आरिफ असहज रहा है। सहयोगी कलाकारों में श्याम बेनेगल की टीम के सुपरिचित एक्टर हैं, जो छोटी से छोटी भूमिकाओं में भी अपनी संलग्नता जाहिर करते हैं।

अशोक मिश्र ने रहीम के दोहों का सुंदर उपयोग किया है। शांतनु मोइत्रा का संगीत फिल्म के भाव और अंतस को अच्छी तरह प्रकट करता है।

पुन:श्च - मुस्लिम पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म केमुख्य किरदार मुसलमान हैं, लेकिन वे देश के दूसरे नागरिकों की तरह ही तकलीफ में हैं। फिल्म में हिंसा और आतंकवाद नहीं है।

***1/2 साढ़े तीन स्टार

Sunday, March 21, 2010

13 खिलाड़ी 1 प्रियंका चोपड़ा

प्रियंका चोपड़ा जल्द ही कलर्स के रिएलिटी शो 'खतरों के खिलाड़ी' के नए सीजन में मेजबान की भूमिका निभाएंगी। इससे पहले भी वह 'डॉन' और 'द्रोण' में एक्शन के कारनामे दिखा चुकी हैं। एक खास बातचीत में उन्होंने बताया कि मेरे पास टीवी शो के आफर आते रहते हैं। मैंने खतरों के खिलाड़ी के लिए इसलिए हां किया कि यह मेरी पर्सनालटी से मेल खाता है। मैं बहुत ही एडवेंचरस, आउटगोइंग और स्पोर्टी हूं। मुझे लगा कि इस शो को मैं अच्छी तरह कर सकती हूं। प्रियंका मानती हैं कि अक्षय कुमार पिछले दो सीजन में इसे एक ऊंचाई पर ले जा चुके थे। मुझे सिर्फ उसे आगे लेकर जाना है।

प्रियंका बताती हैं कि मैं अभी 'डॉन-2' की तैयारी कर रही हूं। उसमें भी काफी एक्शन है। फिल्मों के एक्शन एसपीरिएंस मेरे काम आएंगे। इस शो के लिए मुझे थोड़ी ट्रेनिंग लेनी होगी और ज्यादा फिट होना होगा। इस बार शो को रोमांचक बनाने के लिए प्रतियोगियों के रूप में 13 भारतीय और इंटरनेशनल क्रिकेट खिलाड़ी चुने जाएंगे। चूंकि सारे प्रतियोगी पुरूष हैं, इसलिए खतरों का लेवल ऊंचा रहेगा। कुछ स्टंट तो मैं खुद भी करूंगी ताकि प्रतियोगियों को प्रोत्साहन मिले और मुझे आनंद आए। मूल फार्मेट तो वही रहेगा, लेकिन इस बार मस्ती-मजाक बढ़ जाएगा।

प्रियंका ने बताया कि यह रिएलिटी शो दक्षिण अफ्रीका से शिफ्ट होकर ब्राजील जा रहा है। ब्राजील के घने जंगलों और समुद्रतटों पर इसका आनंद ज्यादा बढ़ जाएगा। क्रिकेट खिलाड़ियों के नामों का अभी फैसला नहीं हुआ है, लेकिन प्रियंका चाहती हैं कि अच्छा मिक्स रहे। अगर हरभजन सिंह हों तो एंड्रयू सिमंड्स भी हों। युवराज सिंह के साथ-साथ ब्रैट ली हों।

आईपीएल की फेवरेट टीम के बारे में पूछने पर प्रियंका ने डिप्लोमैटिक जवाब दिया कि मेरे कई दोस्त आईपीएल में एक्टिव हैं, इसलिए किसी एक को फेवरेट नहीं कह सकती। मेरे लिए तो जो जीत जाए, वही सिकंदर होगा। उन्होंने भविष्य में आईपीएल टीम खरीदने में असमर्थता जताई और कहा कि मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं। 'खतरों के खिलाड़ी' की शूटिंग के बारे में उन्होंने बताया कि विशाल भारद्वाज की फिल्म की शूटिंग खत्म होते ही मैं 'खतरों के खिलाड़ी' करूंगी।

Friday, March 19, 2010

फिल्‍म समीक्षा : शापित

डराने में सफल 

-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी में बनी डरावनी फिल्में लगभग एक जैसी होती हैं। किसी अंधविश्वास को आधार बनाकर कहानी गुंथी जाती है और फिर तकनीक के जरिए दर्शकों को चौंकाने की कोशिश की जाती है। साउंड इफेक्ट से दृश्यों का झन्नाटेदार अंत किया जाता है और हम अपेक्षित ढंग से अपनी सीट पर उछल पड़ते हैं। विक्रम भट्ट अपनी डरावनी फिल्मों में कुछ अलग करते हैं और दर्शकों में डर पैदा करने में सफल होते हैं।

शापित में अमन अपनी प्रेमिका काया के परिवार को मिले पुराने शाप को खत्म करने के लिए आत्मा की तलाश में निकलता है। इस खोज में डॉ ़पशुपति उसके साथ हैं। पता चलता है किएक दुष्ट आत्मा सदियों पहले दिए अभिशाप की रक्षा कर रही है। उस आत्मा की मुक्ति के बाद ही शाप से मुक्त हुआ जा सकता है। चूंकि अमन और काया के बीच बेइंतहा प्यार है, इसलिए अमन हर जोखिम के लिए तैयार है।

विक्रम भट्ट ने स्पेशल इफेक्ट से दृश्यों को डरावना बनाने के साथ उनके पीछे एक लॉजिक भी रखा है। अपनी खासियत के मुताबिक उन्होंने मुख्य किरदारों की प्रेमकहानी में दुष्टात्मा को विलेन की तरह पेश किया है। अतीत में लौटने केदृश्य सुंदर हैं। विक्रम ने पीरियड गढ़ने और उन्हें फिल्मांकित करने में अपनी दक्षता दिखाई है। कला निर्देशक से उन्हें इस फिल्मांकन में भरपूर सहयोग मिला है।

पहली फिल्म के लिहाज से आदित्य नारायण निराश नहीं करते। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ अमन के किरदार को निभाया है। कद-काठी में हिंदी फिल्मों के हीरो की प्रचलित छवि से अलग होने के बावजूद आदित्य नारायण अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं। नयी अभिनेत्री श्वेता अग्रवाल निराश करती हैं। दोनों के बीच आवश्यक केमिस्ट्री पैदा नहीं हो पाई है। छोटी भूमिका में भी शुभ जोशी पर ध्यान जाता है।

*** तीन स्टार

Sunday, March 14, 2010

‘आमिर’ होने में कोई बुराई नहीं ......................................

आमिर के जन्मदिन के मौके पर कनिष्क क यह लेख चवन्नी के पाठकों के लिए है.आप भ चाहें तो यहाँ लिख सकते हैं.अपने लेख chavannichap@gmail.com पर पोस्ट करें.साथ इस लेख पर अपनी राय दें.युवा लेखक को प्रोत्साहन मिलेगा।

14 मार्च जन्‍मदिन पर विशेष

-कनिष्क राज सिंह चौहान

परफ़ेक्‍शनिस्‍ट और भेरोसेमंद के इतर आमिर के लिए अब ज़िम्‍मेदार या ज़वाबदेह जुमले का इस्‍तेमाल किया जाए तो ज़्यादा बेहतर होगा. पिछले 10 सालों में आई उनकी फ़िल्‍में उन्‍हें ज़्यादा ज़वाबदेह साबित करती है. जवाबदेही दर्शकों, सिनेमा और बाज़ार के प्रति. और कुछ हद तक समाज के लिए भी. आमिर के चाहने वालों की तादाद में अचानक से काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई है ख़ासकर युवा वर्ग ने एक रोल मॉडल की तरह उसे अख्तियार किया है. इसकी वजह उसकी फ़िल्‍मों से ज़्यादा उसका परसोना है, जो दृढ़, विश्‍वसनीय और नैतिक है. इसी व्यक्तित्व को दर्शक उसके किरदारों से भी जुड़ा पाते हैं.

होली से इडियट्स तक उसने गज़ब की तरक्‍की की है. शुरुआती अंतराल में कुछ 'डिज़ाज़्टर' भी उसके नाम रही लेकिन संभलते हुए आगे दोहराव से बचा रहा. उसे कबूलने में भी हर्ज़ नहीं कि उसके करियर की सबसे बड़ी गलती पहली सफलता के बाद एक साथ नौ फ़िल्‍में साइन करना रही. इन नाकामयाबियों ने आलोचकों के मुँह खोल दिए. हालाँकि दिल, हम हैं राही प्‍यार के, दिल है कि मानता नहीं, जो जीता वही सिकंदर के मार्फ़त उसने वन फ़िल्‍म वंडर मानकर ख़ारिज़ करने वालों के मुँह पर फिर ताले भी जड़े. लेकिन ये सिर्फ व्‍यावसायिक कामयाबियाँ थीं.असल फ़िल्‍म रंगीला थी जिसने ना सिर्फ आमिर की अदाकारी का लोहा मनवाया बल्‍कि उसकी सिनेमाई समझ को लोगों के सामने पुख्‍़ता किया जिसे पहले दख़ल कहा जा रहा था. इसके बाद गुलाम, अर्थ, सरफ़रोश से उसका कद बढ़ना शुरु हुआ.

आमिर के फ़िल्‍मों में सार्थकता और व्‍यावसायिकता का अनूठा सम्‍मिश्रण देखने को मिलता है. जो एक अदाकार और स्‍टार के रूप में उसे ज़्यादा घनिष्‍ठ बनाता है और उसे दिलीप कुमार और अमिताभ बच्‍चन के श्रेणी में ला खड़ा करता है. भले ही उसके पास असरदार कद काठी और आवाज़ ना हो और भले ही उसने अवसाद और आवेग प्रधान किरदार ना जिए हों. लेकिन नेकनीयती और सिनेमा के प्रति ईमानदारी लिजेंड्स के बीच उसके लिए जगह बनाती है. कहने को उसके हिस्‍से में कागज़ के फ़ूल, जागते रहो जैसी महानता ना हो लेकिन लगान, बसंती और तारे देखते वक्‍़त हृदय कुछ वैसा ही स्‍पंदित होता है. उसे गुरुदत्‍त, दिलीप या संजीव कुमार की तरह इमोशंस की अदायगी के मौके ना मिले हों लेकिन कोई शक नहीं यदि कोई प्‍यासा उसके हिस्‍से आई तो वह निराश नहीं करेगा. बसंती और तारे में इसकी झलक देखने को मिलती भी है. चाहे वह मुँह में निवाला लिए रोता डीजे हो या इशान की परेशानी बताते वक्‍त पानी का गिलास माँगता राम शंकर निकुंभ. आमिर ने भावनाएँ उड़लने में कभी कोताही नहीं बरती.

एक वक़्त में एक फ़िल्‍म करना कोई आसान काम नहीं ख़ासकर तब जबकि आप बड़ी व्‍यावसायिक ताकत बन चुके हों, लेकिन आमिर एक वक्‍़त पर कई फ़िल्‍म करने से बेहतर एक फ़िल्‍म के सारे पहलुओं पर नज़र रखने को ज़्यादा बेहतर मानते हैं. उनकी फ़िल्‍म के हर पक्षों पर उनका असर होता है. आमिर के पास एक सुलझा हुआ सिनेमाई दिमाग है जो उससे सर्वश्रेष्‍ठ दिलवाता है भले ही वह नए निर्देशकों से काम कर रहा हो. धर्मेश दर्शन, जॉन मैथ्‍यू, फ़रहान अख्‍़तर हो या आशुतोष गोवारीकर, इन्‍होंने अपना सर्वश्रेष्‍ठ आमिर के संग ही दिया है.

आमिर क्रिटिकल होने के मौके कम ही देता है. उनकी खूबियों को नज़रअंदाज़ करते हुए उनका कायल ना होना वाकई एक मुश्‍किल काम है. किसी कलाकार के लिए इससे बड़ी उपलब्‍धि नहीं हो सकती कि उसके आलोचकों को उसकी तारीफ़ करना पड़े. गज़नी के बाद सिनेमा की एक अग्रणी मैगज़ीन को आमिर की तारीफ़ में लिखना ही पड़ा कि हम आखिर कब तक उस आदमी को नकारते रहें जिसे हम पसंद नहीं करते जबकि वह शानदार है. वैसे बसंती और तारे के बाद गज़नी और इडियट्स करने को कई आलोचकों ने हाथ वापस खींचना बताया और आमिर को सीमित करार दे दिया. बहरहाल इससे सीमित होने की बजाय वर्सेटाइल होने का भान ज़्यादा होता है. ये कुछ स्पीलबर्ग के शिडनर्स लिस्ट्स के बाद लोस्ट वर्ल्ड में डायनासोरस की ओर लौटने सा है. गज़नी के बाद एक प्रख्या़त समीक्षक ने टिप्‍पणी भी की थी कि यह आमिर की फ़िल्म नहीं लगती, इसके ज़रिए आमिर ने मसाला फ़िल्मों के सुपरसितारों को बताया है कि मैं भी ऐसी फ़िल्में कर सकता हूँ और ज़्यादा बेहतर तरीके से.

ना उसकी फ़िल्‍मों में, ना किरदारों में दोहराव देखने को मिलता है. चाहे रंगीला का मुन्‍ना हो या गुलाम का सिद्धू दोनों ही टपोरी मुंबई के अलग-अलग कोनों के लगते हैं. जो जीता वही सिकंदर, दिल चाहता है, बसंती और इडियट्स के कॉलेज स्‍टूडेंट में भी ढूँढें कोई समानता नहीं मिल पाती. वह हर फ़िल्‍म में राहुल और राज नहीं है. मुन्‍ना, सिद्धू, राजा, अजय सिंह राठौड़, भुवन, आकाश, डीजे, संजय सिंघानिया, रैंचों जैसे कई किरदार उसने भारतीय सिनेमा को बख्‍़शे हैं. वह अपने सुपरस्‍टार के दायरे में रहते हुए भी पेरेलल सिनेमा के घेरे में हो आया है. वह सिर्फ बेहतरीन फ़िल्‍मों से जुड़ना चाहता है अब तक कि फ़िल्‍में कितनी बेहतरीन रही है ये बहस का विषय हो सकता है लेकिन अपनी तरफ़ से उसने हमेशा बेहतरी का प्रयास किया है.

बाज़ार के दबाव को सहते हुए भी सार्थक सिनेमा और कलात्‍मक संतुष्‍टि ख़ोजने वाले आमिर सचमुच सम्‍मान के हकदार हैं. पता नहीं शाहरूख़, सलमान, अक्षय को आगे आने वाला वक्‍़त किसलिए याद रखे लेकिन आमिर को सीमाओं से परे जाकर काम करने वाले कलाकार के रूप में याद किया जाएगा. वह सही मायनों में लीडर है जो फ़िलहाल भारतीय सिनेमा को लीड कर रहा है. वैसे आमिर का अर्थ भी लीडर है, इसलिए आमिर होने में को़ई बुराई भी नहीं. जन्‍मदिन मुबारक.

Saturday, March 13, 2010

फिल्‍म समीक्षा : राइट या रांग,न घर के न घाट के,हाइड एंड सीक

-अजय ब्रह्मात्‍मज

राइट या रांग


पुरानी शैली का अपना आकर्षण होता है। हम आज भी पुरानी फिल्में पसंद करते हैं। उन्हें देखते हैं। ठीक उसी तरह पुरानी शैली में बनी नई फिल्म भी पसंद आ सकती है। नीरज पाठक ने कसी हुई स्क्रिप्ट लिखी है। वे दर्शकों को कुछ और सोचने का मौका नहीं देते, इसी वजह से कुर्सी पर लाचार बैठे सनी देओल को देखकर भी कोफ्त नहीं होती। इंटरवल में हाल से बाहर निकलने और फिर लौटने के बीच हम आगे की कहानी बुनते हैं, लेकिन नीरज पाठक रोमांचक झटका देते हैं। फिल्म एक नया मोड़ लेती है, जिसमें राइट और रॉन्ग के बीच का फर्क मिटने लगता है।

अजय और विनय की इस कहानी में अजय की बीवी, विनय की बहन और अजय का कजिन शामिल हैं। ईमानदार, जांबाज और विलपावर का धनी अजय रिश्तों के पेंच से टूट जाता है। वह एक फूलप्रूफ व्यूह रचता है। बदला लेने के बाद सभी की आंखों में धूल झोंक कर कोर्ट से बाइज्जत बरी हो जाता है, लेकिन वह अपने राइट दोस्त को रॉन्ग होते नहीं देख पाता। उसे सच बता देता है। दोस्ती, प्रतिद्वंद्विता, छल, विवाहेतर संबंध, लोभ, वासना और पिता-पुत्र के रिश्तों को समेटती राइट या रॉन्ग आखिर तक दिलचस्प बनी रहती है।

ईषा कोप्पिकर के लिए यह चुनौतीपूर्ण भूमिका थी, लेकिन लेखक उनके किरदार को गहराई और विस्तार नहीं दे पाए हैं। पूरी फिल्म मुख्य रूप से अजय और एक सीमा तक विनय पर निर्भर करती है। अजय और विनय की भूमिकाओं में सनी देओल और इरफान निराश नहीं करते। इरफान मामूली दृश्यों में भी अनोखे अंदाज से दर्शकों को लुभा ले जाते हैं। सनी देओल अपनी छवि से आज भी नहीं निकल पा रहे हैं। उनकी पिस्तौल से निकली गोली लगती है तो आदमी हवा में लहरा जाता है। कभी लगता है कि पीछे दीवार न हो तो वह कहां जाकर गिरेगा? कोंकणा सेन शर्मा को मिली भूमिका इंटरवल के बाद जोड़ी गई लगती है।

राइट या रॉन्ग की खूबी उसका लेखन है। निश्चित ही इसके लिए नीरज पाठक और उनके सहयोगी गिरीश धमीजा और संजय चौहान बधाई के पात्र हैं।

*** तीन स्टार



न घर के न घाट के

हिंदी सिनेमा का एक पहलू न घर के न घाट के है। ऐसी फिल्में इन दिनों लगभग नहीं बनती हैं। गांव से शहर आए मासूम हीरो की कहानी में मुंबई के निर्देशकों की रुचि नहीं रही। राहुल अग्रवाल ने हिंदी सिनेमा के उन दर्शकों को तोहफा दिया है, जो सरल गंवई किरदारों की कहानियां देखना पसंद करते हैं।

देवकी नंदन त्रिपाठी को मुंबई में नौकरी मिलती है। वे अपना टीनहा बक्सा और अचार-पकवान लेकर मुंबई पहुंच जाते हैं। मुंबई में एक टपोरी मदन खचाक के साथ उनके रहने का जुगाड ़ बैठता है। बाद में माता-पिता उनकी बीवी को लेकर मुंबई आते हैं। पुलिस धोखे से उनकी बीवी को बार गर्ल समझकर गिरफ्तार कर लेती है। देवकी को कहा जाता है कि वह प्रूफ करे कि मिथिलेश कुमार उसकी पत्‍‌नी हैं। सत्यापन के कई मजेदार प्रसंगों से गुजरने के बाद फिल्म एक संदेश भी देती है कि विवाह का प्रमाणपत्र अवश्य बनवा लेना चाहिए।

मुंबई के समंदर में गांव की नइया के हिचकोलों में आनंद है। यह फिल्म शहर बनाम गांव पर नहीं है। दो सोच, लाइफ स्टाइल, आदतों और जरूरतों को लेकर बनी न घर के न घाट के गांव के सरल जीवन की मासूमियत के साथ शहरी जीवन की हकीकत का बयान करती है। दोनों के बीच भेद है। कोई टकराहट नहीं है।

इस फिल्म की जान रवि किशन हैं। उन्होंने मदन खचाक के किरदार को फूहड़ और अश्लील नहीं होने दिया है। भाषा और तहजीब में टपोरी होने के बाद भी रिश्तों और भावनाओं के प्रति मदन संवेदनशील है। लेखक ने बड़ी होशियारी से नए अभिनेता राहुल अग्रवाल को परेश रावल, ओमपुरी या रवि किशन के साथ जोड़कर दृश्यों को सरस बनाए रखा है। हालांकि ओम पुरी और परेश रावल की मौजूदगी फिल्म को रोचक बनाती है, लेकिन वे अपनी तरफ से फिल्म में कुछ नहीं जोड़ते हैं।

मल्टीप्लेक्स के दर्शकों के बीच जगह बनाने की होड़ में फंसी यह फिल्म उन्हें कम पसंद आएगी। सिंगल थिएटर और छोटे शहरों के दर्शकों के लिए यह मनोरंजक फिल्म है।

**1/2 ढाई स्टार


हाइड एंड सीक

शॉन आरान्हा की हाइड एंड सीक साइकोलोजिकल सस्पेंस थ्रिलर है। कुछ परिचित और कुछ अपरिचित कलाकारों के साथ बनी इस फिल्म की यही विशेषता है कि इसमें नयापन शॉन ने अलग किस्म की रोमांचक कहानी चुनी है। उसे नए तरीके से फिल्मांकित भी किया है।

बारह सालों के बाद कुछ किरदार एक शापिंग माल में बेहोशी से जगते हैं। उन्हें किसी ने बंद शापिंग माल में डाल दिया है। रात के अंधेरे में उन पर हमले होते हैं और एक-एक कर चार किरदारों की मौत होती है। सिर्फ दो बचे रह जाते हैं। उनमें से एक ने ही यह साजिश रची है। फिल्म की खूबी है कि अंत तक सस्पेंस बना रहता है।

सस्पेंस फिल्मों के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म रोचक लग सकती है। कलाकारों में अर्जन बाजवा, पूरब कोहली, मृणालिनी शर्मा और अमृता पटकी ने सुंदर अभिनय किया है।

** दो स्टार


Thursday, March 11, 2010

दरअसल : हिंदी फिल्में और क्रिकेट

-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्में किसी आपदा, विपदा, खुशी और गम से संचालित नहीं होतीं। हर समय और मौसम में उनकी मांग बनी रहती है। आम दर्शक को इससे सस्ता मनोरंजन नहीं मिलता, इसलिए वे हर सूरत में सिनेमाघरों की ओर रुख करते हैं, लेकिन पिछले दो साल से आयोजित आईपीएल के क्रिकेट मैचों ने इस धारणा को बदला है। 2008 में आयोजित पहले आईपीएल के समय यह संभावना व्यक्त की गई थी कि इससे फिल्मों का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन प्रभावित होगा। वास्तविक आंकड़े कभी नहीं मिल पाते, लेकिन ट्रेड पंडितों ने बताया कि आईपीएल की वजह से फिल्में अपेक्षित व्यवसाय नहीं कर सकीं। पिछले साल आईपीएल दक्षिण अफ्रीका चला गया था, फिर भी हिंदी फिल्मों का व्यवसाय प्रभावित हुआ। इस साल आईपीएल की तारीखों की घोषणा के साथ बड़ी फिल्मों ने किनारा कर लिया है। कुछ फिल्में आईपीएल के पहले और कुछ बाद में खिसक गई। सबने बिजनेस और कलेक्शन को ध्यान में रखकर ऐसा किया। अभी तक जो संभावना और धारणा थी, वह वास्तविकता बन चुकी है। फिल्म निर्माता और इस कारोबार से जुड़े सभी व्यक्तियों ने स्वीकार कर लिया है कि आईपीएल के दौरान फिल्में रिलीज करना जोखिम का काम है। कुछ फिल्में जरूर रिलीज हो रही हैं, लेकिन कहा जा रहा है कि इन फिल्मों पर कोई बड़ा दांव नहीं लगा है।

गौर करें, तो आईपीएल के दौरान मल्टीप्लेक्स में दर्शकों की गिरावट देखी गई थी। हालांकि यह गिरावट बुरी या छोटी फिल्मों की वजह से भी हो सकती है। वैसे भी अस्सी फीसदी फिल्में पर्याप्त दर्शक न मिलने से फ्लॉप होती हैं। निर्माता, वितरक और स्टार अपनी फिल्मों की क्वालिटी का मूल्यांकन करने की बजाय बाहरी कारणों से दिल बहलाते हैं। पिछले दो साल में आईपीएल के दौरान फ्लॉप हुई फिल्मों को आईपीएल का जोरदार बहाना मिला। इस बार एहतियातन निर्माता और वितरकों ने फिल्म की रिलीज आगे-पीछे खिसका दी, लेकिन क्या गारंटी है कि आईपीएल के बाद रिलीज होने पर उनकी साधारण फिल्मों को पर्याप्त दर्शक मिल जाएं?

मल्टीप्लेक्स के थिएटरों ने इस बार आईपीएल के दौरान फिल्म और दर्शकों की मंदी से निबटने का कारगर तरीका निकाला है। उन्होंने फिल्म व्यवसाय को नुकसान पहुंचाने वाले कारण को ही आय का साधन बना लिया है। इस साल क्रिकेट के दर्शक आईपीएल के मैचों का सीधा प्रसारण मल्टीप्लेक्स के बिग स्क्रीन पर देखेंगे। मालूम नहीं, दर्शकों को कितनी रकम खर्च करने के बाद यह आनंद मिलेगा। हां, इतना तय है कि मल्टीप्लेक्स के मालिक पिछले दो साल में आईपीएल के दौरान होने वाले नुकसान की इस साल भरपाई कर लेंगे। खबर है कि आईपीएल मैचों का टिकट 500 रुपये का होगा। यह भी देखना होगा कि कितने दर्शक थिएटरों की ओर रुख करते हैं। घर में टीवी पर क्रिकेट मैच देखते समय यह सुविधा रहती है कि आप फोन कर लें या कोई दूसरा छोटा-मोटा काम कर लें। थिएटर में जाने पर पूरा समय क्रिकेट मैच में ही बीतेगा।

देश के दो प्रमुख शगल क्रिकेट और फिल्म का यह अद्भुत मिलन ट्रेड पंडित और मीडिया महंतों को व्यवसाय के नए अवसर देगा। अगले साल इस अवसर के दोहन की ठोस रणनीति भी नजर आएगी। थिएटर में क्रिकेट दिखाने के इस साल के प्रयोग के परिणाम पर अगले साल की रणनीति और योजनाएं निर्भर करेंगी। फिलहाल ऐसा लग रहा है कि आईपीएल के दौरान फिल्मी मनोरंजन लगभग ठहर जाएगा, लेकिन क्या ऐसा ही होगा?


Sunday, March 7, 2010

स्‍टार प्रोफाइल : अजय देवगन

-अजय ब्रह्मात्‍मज
मुंबई के लोकप्रिय स्टारों के नाम डालकर इंटरनेट सर्च करें तो नतीजों से आप चौंक जाएंगे। कम लोगों को सर्च रिजल्ट पर यकीन होगा। थोड़ी देर के लिए आप भी हैरत में पड़ जाएंगे कि क्या सचमुच अजय देवगन अपनी पीढ़ी के सबसे व्यस्त अभिनेता हैं? उनकी अतिथि तुम कब जाओगे अभी रिलीज हुई है और पांच फिल्में कतार में हैं। उनमें से टुनपूर का सुपरहीरो और राजनीति पूरी हो चुकी है। बाकी तीन गरम हवा, वन्स अपऑन अ टाइम इन मुंबई और गोलमाल-3 निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं। लंबे समय के बाद अजय देवगन की एक्शन फिल्म दिसंबर में आरंभ हो जाएगी, जिसे उनके चहेते डायरेक्टर रोहित शेट्टी डायरेक्ट करेंगे।

[काफी व्यस्त है शेड्यूल]

बगैर शोरगुल और मीडिया हाइप के अजय देवगन अपने काम में मशगूल रहते हैं। शूटिंग ने इतना व्यस्त कर रखा है कि वे अपने ही घर में अतिथि की तरह आते हैं। पिछले दिनों तमिलनाडु के मदुरै शहर में गरम हवा के सेट पर उनसे मुलाकात हुई, बताने लगे, ''इस फिल्म की शूटिंग के बाद मुंबई लौटूंगा। वहां चंद दिनों की शूटिंग करने के बाद गोलमाल-3 के लिए गोवा चला जाऊंगा। इस बीच वन्स अप ऑन अ टाइम की बाकी शूटिंग एवं राजनीति के प्रमोशन के सिलसिले में देश-विदेश के शहरों में जाना होगा।'' इधर माय नेम इज खान के प्रोमोशन में काजोल भी व्यस्त थी। पति-पत्नी लंबे अर्से के बाद गरम हवा के सेट पर ही कराईकुडी में मिले। व्यस्त स्टारों की जिंदगी में ऐसी तनहाइयां आम हैं। अगर मियां-बीवी दोनों एक्टिव हों तो ऐसी तनहाई आफत लगती है। घर-परिवार से दूर उन्हें हफ्तों बाहर रहना पड़ता है।

[असमंजस से आत्मविश्वास तक]

एक्शन डायरेक्टर वीरू देवगन के बेटे अजय देवगन का आरंभ से ही फिल्मों से लगाव रहा। हर युवक की तरह शुरू में वे भी स्पष्ट नहीं थे कि क्या करना है? आरंभिक झुकाव निर्देशन की तरफ रहा। शेखर कपूर और दीपक शिवदासानी की सहायक रहे। अतीत के पन्नों को पलटते हुए अजय ने कहा, ''मेरे पिता फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा था। फिल्मी आंगन में ही मैं बड़ा हुआ। शुरू में खुद वीडियो फिल्में बनाई और शेखर एवं दीपक का सहायक रहा। निर्देशन में संभावनाएं दिख रही थीं। एक्टर बनने को लेकर ज्यादा आश्वस्त नहीं था। इतना तय था कि फिल्मों में ही कुछ करना है। सच कहूं तो फूल और कांटे मिलने तक असमंजस में था। फिल्म चली, दर्शकों का प्यार मिला और मुझे अपनी पहचान के साथ अपने पांव पर खड़े रहने की जमीन मिल गई।''

[आंखों की वह उदास बेचैनी]

फूल और कांटे के प्रीमियर का निमंत्रण लेकर अजय देवगन महेश भट्ट से मिलने गए थे। महेश भट्ट ने उस लमहे को याद करते हुए लिखा है, ''हमलोग संजय दत्ता और श्रीदेवी की गुमराह की शूटिंग कर रहे थे। उस फिल्म के निर्माता यश जौहर थे। हम दोनों एयरकंडीशंड मेकअप वैन में बैठे थे। दरवाजे पर दस्तक देने के बाद साधारण एवं औसत चेहरे का एक लड़का संकोच के साथ अंदर आया। फाइट मास्टर वीरू देवगन के बेटे के रूप में अपना परिचय देते हुए उसने कहा, ''मेरे पापा ने आप दोनों को आज प्रीमियर पर बुलाया है, जरूर आइएगा।'' उसके निकलते ही यश जौहर ने सवाल किया, ''क्या यह लड़का हीरो बन सकता है?'' मेरा जवाब था, ''मुझे उसमें संभावना दिखती है। उसमें एक इंटेनसिटी है। अगर किसी निर्देशक ने उस इंटेनसिटी को उभारा तो वह पर्दे पर कमाल कर देगा। क्या आप ने उसकी आंखें देखीं? लगता है कहीं गहरे चोट लगी है दिल में, उसकी आंखों में एक उदास बेचैनी है।''

[नए अभिनेता जैसी तल्लीनता]

प्रियदर्शन गरम हवा में पहली बार अजय देवगन को निर्देशित कर रहे हैं। उत्तारभारत के बैकड्राप पर बन रही यह फिल्म मुश्किल समय की खलबली का चित्रण करती है। प्रियदर्शन कहते हैं, ''अजय ऊपरी तौर पर शांत और स्थिर दिखते हैं, लेकिन उनके अंदर भारी उथल-पुथल चल रही होती है। इतनी फिल्में करने के बावजूद उनकी तल्लीनता और सहभागिता किसी नए अभिनेता जैसी है। वे संतुष्ट भी हैं। मैंने कभी उन्हें अपने सीन के लिए परेशान नहीं देखा।'' प्रकाश झा की फिल्म राजनीति में मनोज बाजपेयी ने उनके साथ काम किया है। कई दृश्यों में दोनों साथ दिखेंगे। अजय के साथ अपने अनुभवों को शेयर करते हुए मनोज बाजपेयी कहते हैं, ''अपनी योग्यता और क्षमता पर उन्हें यकीन है, लेकिन वे कभी इसका प्रदर्शन नहीं करते। वे अपने किरदार को सुनते हैं और फिर निर्देशक के सुझाए मनोभाव को अपने खास अंदाज में पेश करते हैं।''

[बॉडी लैंग्वेज का इस्तेमाल]

संवादों पर अजय की निर्भरता नहीं रहती। एक्टिंग में एक्सप्रेशन के महत्व पर अजय देवगन की स्पष्ट राय है, ''कई बार संवाद से अधिक इंपैक्ट एक्सप्रेशन का होता है। मैं अपनी चुप्पी, आंखों और चाल का इस्तेमाल करता हूं। मुझे लगता है कि फिल्म सिर्फ संवादों का माध्यम नहीं है। अगर वही करना है तो रेडियो प्ले करें।'' अजय देवगन की इस खूबी को प्रकाश झा एक्टिंग की इकॉनोमी कहते हैं। गंगाजल और अपहरण के बाद राजनीति के साथ दोनों की सामाजिक-राजनीतिक फिल्मों की त्रयी पूरी होगी। प्रकाश झा के शब्दों में, ''अजय अपनी पीढ़ी के सशक्त अभिनेता हैं। उन्हें मालूम रहता है कि हर सीन में उन्हें कितना एक्ट करना है। वे फालतू एक्टिंग नहीं करते और न ही ओवरबोर्ड जाते हैं। वे अपने किरदारों को समझते और विकसित करते हैं। पर्दे पर उसे निखार देते हैं।''

अजय देवगन की इस साल की छह फिल्मों की लिस्ट में हर विधा की फिल्में हैं। कामेडी, सोशल ड्रामा, एक्शन और थ्रिलर; सच्ची ऐसी वैरायटी समकालीन स्टारों में किसी और के पास नहीं हैं।

[कॅरिअर का टर्निग प्वाइंट]

अजय देवगन की आंखों की उदास बेचैनी और अंदरूनी आक्रामकता को महेश भट्ट ने अपनी फिल्म जख्म में उभारा। अजय देवगन जख्म को अपने कॅरिअर का टर्निग प्वाइंट मानते हैं। उन्होंने बताया, ''मुझे जख्म और उसके बाद हम दिल दे चुके सनम और प्यार तो होना ही था से बड़ी पहचान मिली। इन तीनों फिल्मों के पहले मेरे पास घिसी-पिटी एक्शन फिल्में आ रही थीं। एक्शन में भी नयापन नहीं बच गया था। इन तीन फिल्मों के बाद मुझे बेहतर संभावनाओं के बेहतरीन किरदार मिलने लगे।'' अजय देवगन एक्टर की जन्मजात और नैसर्गिक प्रतिभा पर यकीन करते हैं। वे मानते हैं कि डायरेक्टरों और फिल्मों से हम उस मौलिक योग्यता को मांजते और निखारते हैं।


Friday, March 5, 2010

फिल्म समीक्षा : अतिथि तुम कब जाओगे?,थैंक्स माँ,रोड मूवी

-अजय ब्रह्मात्मज
अतिथि तुम कब जाओगे?
सामान्य जीवन के हास्य प्रसंग
पिछले कुछ सालों में लाउड कामेडी ने यह स्थापित किया है कि ऊंची आवाज मैं चिल्लाना, गिरना-पड़ना और बेतुकी हरकतें करना ही कामेडी है। प्रियदर्शन और डेविड धवन ऐसी कामेडी के उस्ताद माने जाते हैं। उनकी कामयाबी ने दूसरे निर्देशकों को गुमराह किया है। दर्शक भी भूल गए है कि कभी हृषीकेष मुखर्जी, गुलजार और बासु चटर्जी सरीखे निर्देशक सामान्य जीवन के हास्य को साधारण चरित्रों से पेश करते थे। अश्रि्वनी धीर की अतिथि तुम कब जाओगे? उसी श्रेणी की फिल्म है। यह परंपरा आगे बढ़नी चाहिए।
पुनीत फिल्मों का संघर्षशील लेखक है। वह कानपुर से मुंबई आया है। उसकी पत्‍‌नी मुनमुन बंगाल की है। दोनों का एक बेटा है। बेटा नहीं जानता कि अतिथि क्या होते हैं? एक दिन चाचाजी उनके घर पधारते हैं, जो खुद को पुनीत का दूर का रिश्तेदार बताते हैं। शुरू में उनकी ठीक आवभगत होती है, लेकिन छोटे से फ्लैट में उनकी मौजूदगी और गंवई आदतों से पुनीत और मुनमुन की जिंदगी में खलल पड़ने लगती है। चाचाजी को घर से भगाने की युक्तियों में बार-बार विफल होने के क्रम में ही पुनीत और मुनमुन को एहसास होता है कि कैसे चाचाजी उनकी रोजमर्रा जिंदगी के हिस्सा हो गए हैं। अश्रि्वनी धीर ने अतिथि के इस प्रसंग को रोचक तरीके से फिल्म में उतारा है। उन्होंने फिल्म को बढ़ाने के लिए कुछ दृश्य और प्रसंग जोड़े हैं, जिनसे मूल कहानी थोड़ी ढीली होती है। फिर भी अजय देवगन, परेश रावल, कोंकणा सेन शर्मा और सहयोगी कलाकारों ने फिल्म को बांधे रखा है। परेश रावल की अभिनय क्षमता का अश्रि्वनी धीर ने सार्थक उपयोग किया है। अजय देवगन बहुमुखी अभिनेता के तौर पर निखर रहे हैं। वे लाउड कामेडी के साथ ऐसी हल्की-फुल्की कामेडी भी कर सकते हैं। कोंकणा सेन शर्मा तो हैं ही सहज अभिनेत्री। मुकेश तिवारी, संजय मिश्र, अखिलेन्द्र मिश्र और सतीश कौशिक का अभिनय और योगदान उल्लेखनीय है।
कोंकणा के संवादों में स्त्रीलिंग-पुल्लिंग की गलतियां उनके चरित्र को बारीकी से स्थापित करती है। इस फिल्म का कितने आदमी थे प्रसंग रोचक है। परेश रावल ने उस प्रसंग को अपने अंदाज से मजेदार बना दिया है। उन्हें वीजू खोटे का बराबर सहयोग मिला है। बस, एक ही शिकायत की जा सकती है कि परेश रावल को इतना ज्यादा वायु प्रवाह करते नहीं दिखाना चाहिए था। पर आजकल हिंदी फिल्मों का यह आम दृश्य हो गया है।
***1/2 साढ़े तीन स्टार
थैंक्स मां
अनाथ बच्चों की मार्मिक कथा
इरफान कमल की थैंक्स मां डैनी बाएल की स्लमडाग मिलियनेयर के पहले बन चुकी थी, लेकिन अभी रिलीज हो सकी। इस फिल्म में इरफान ने मुंबई की मलिन बस्तियों के आवारा और अनाथ बच्चों के माध्यम से अधूरे बचपन की मार्मिक कथा बुनी है। उन्होंने पेशेवर चाइल्ड एक्टर के बजाए नए चेहरों को चुना है और उनसे बेहतरीन काम लिया है।
म्युनैसिपैलिटी खुद अनाथ बच्चा है। वह खुद को सलमान खान कहलाना पसंद करता है। दूसरे आवारा और अनाथ बच्चों के साथ वह पाकेटमारी और चिंदीचोरी कर अपना गुजर-बसर करता है। उसकी एक ही इच्छा है कि किसी दिन अपनी मां से मिले। बाल सुधार गृह से भागते समय उसे दो दिनों का एक बच्चा मिलता है। वह उस निरीह बच्चे को संभालता है। अपने दोस्तों की मदद से वह उस बच्चे की मां तक पहुचने में सफल रहता है, लेकिन सच्चाई का पता चलने पर हतप्रभ रह जाता है।
फिल्म में बताया गया है कि देश में रोजाना 270 बच्चे अनाथ छोड़ दिए जाते हैं। इन बच्चों की जिंदगी शहर की गुमनाम गलियों में गुजरती है और वे आजीविका के लिए अपराध का आसान रास्ता चुन लेते हैं। इरफान कमल ने ऐसे अनाथ बच्चों के मर्म को पर्दे पर कुछ किरदारों के माध्यम से दिखाया है। अपनी ईमानदार कोशिश केबावजूद वे अनाथ बच्चों की परिस्थिति के प्रति मार्मिकता नहीं जगा पाते। कुछ ही दृश्य प्रभावित करते हैं। सभी बच्चों ने उम्दा और स्वाभाविक अभिनय किया है। संजय मिश्र और रघुवीर यादव को निर्देशक ने उचित उपयोग किया है।
**1/2 ढाई स्टार
रोड मूवी
सफर में बने रिश्ते
हिंदी सिनेमा में विषय के स्तर पर आ रहे विस्तार को हम रोड,मूवी में देख सकते हैं। यह पारंपरिक हिंदी फिल्म नहीं है, जिसमें घिसे-पिटे किरदारों को लेकर कहानी बुनी जाती है। इस फिल्म के किरदार बेनाम हैं। उन्हें उनके नाम से हम नहीं जानते। संयोग से चार व्यक्ति एक सफर में साथ हो जाते हैं। वे मिल कर दुर्गम राहों से निकलते हैं। सफर के दौरान ही उनके रिश्ते बनते हैं, जो फिल्म खत्म होने के साथ अपनी राह ले लेते हैं।
फिल्म में कहानी की उम्मीद के साथ गए दर्शकों को निराशा हो सकती है। यह फिल्म दृश्यात्मक और प्रतीकात्मक है। आपसी रिश्तों में एक-दूसरे की जरूरत और मूल मानवीय भावनाओं का अच्छा तालमेल है। यह फिल्म अभय देओल और सतीश कौशिक के लिए देखी जा सकती है। तनिष्ठा चटर्जी सामान्य हैं। देव बेनेगल ने मुख्य पात्र की दोहरी यात्रा को अच्छी तरह से गुंथा और चित्रित किया है।
**1/2 ढाई स्टार

दरअसल : ख्वाबों को जगाते थे साहिर

-अजय ब्रह्मात्‍मज

किस्सा मशहूर है कि गीतकार-शायर साहिर लुधियानवी अपनी फिल्मों के पारिश्रमिक के तौर पर संगीतकार से एक रुपया ज्यादा लिया करते थे। इसी बात पर कभी एस.डी.बर्मन से उनकी ठन गई थी। दोनों ने प्यासा के बाद कभी साथ काम नहीं किया। आज जब गीतकार रॉयल्टी और कॉपीराइट की लड़ाई लड़ रहे हैं, तब साहिर की कैफियत ज्यादा मौजू हो जाती है। आजादी की राह पर से लेकर लक्ष्मी तक उन्होंने केवल 113 फिल्मों के गाने लिखे। अपने गानों से उन्होंने बेजोड़ मकबूलियत हासिल की। उनके फिल्मी गीतों में उनकी गजलों और नज्मों के कथ्य की गहराई झलकती है। ऐसा लगता है कि अपनी सामाजिक और राजनीतिक समझदारी का जोड़न (जामन) डालकर उन्होंने फिल्मी गीतों को जमाया है।

8 मार्च, 1921 को लुधियाना में जन्मे साहिर का बचपन मां सरदार बेगम के साथ बीता। उनके पिता जागीरदार चौधरी फजल अहमद थे। कहते हैं, अपने पति की बारहवीं शादी से तंग आकर सरदार बेगम ने उनकी हवेली छोड़ दी थी। उन्होंने तलाक ले लिया और बेटे साहिर को अकेले दम पाला। मां के जुझारू व्यक्तित्व के साए में पले साहिर का साबका प्रोग्रेसिव सोच से हुआ। वे छोटी उम्र में ही जागरूक और संजीदा हो गए। हालांकि पूरे खानदान में शायरी का शौक किसी को नहीं था, लेकिन साहिर छोटी उम्र से ही मशहूर शायरों की गजल और नज्मों को दोहराने के साथ अपने खयालात जाहिर करने लगे थे। अपनी शायरी के बारे में उनका मशहूर जुमला है, दुनिया ने तजुर्बातों-हवादिस की शक्ल में, जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूं मैं.. गौरतलब है कि सिर्फ 24 साल की उम्र में उनका पहला संकलन तल्खियां नाम से आ चुका था। इस संकलन की नज्मों से उस जमाने के नामचीन शायर और एडीटर चौंक गए थे। साहिर को तुरंत ख्याति मिली। रुतबा बढ़ा। वे उस उम्र में ही अदब-ए-लतीफ और शाहकार के संपादक बन गए। फिल्मों में तो वे बाद में आए। उसके पहले लाहौर, दिल्ली और हैदराबाद में अपनी शायरी और आकर्षक व्यक्तित्व से उन्होंने अनगिनत मुरीद तैयार कर लिए थे। बंटवारे के समय उनकी मां को रिफ्यूजी के रूप में पाकिस्तान भेज दिया गया था। माहौल शांत होने पर वे मां से मिलने गए और एक बार लाहौर में ही बसने की सोची। डेढ़ साल वहां रहे भी, लेकिन बचपन से सभी मजहबों के दोस्तों के बीच पले-बढ़े तरक्कीपसंद सोच के साहिर को पाकिस्तान का मौसम दमघोटू लगा। वे भारत लौट आए और फिर उन्होंने मुंबई के लिए कूच किया। तब मुंबई तरक्कीपसंद शायर और साहित्यकारों का गढ़ था। उर्दू के दूसरे मशहूर-ओ-मारुफ शायर-साहित्यकार मुंबई में एक्टिव थे।

साहिर के फिल्मी गीतों से वाकिफ उनके प्रशंसकों को उनकी गजलों और नज्मों को भी पढ़ना चाहिए। गीतों में व्यक्त उनके भाव अधिक सांद्र और गहरे रूप में उनकी शायरी में नजर आते हैं। वहां उनकी सोच अधिक चटख और आजाद है। उन्होंने अपने समय के सभी सामाजिक मुद्दों पर लिखा है। उनका स्वर कभी नारेबाजी का नहीं रहा। वे अपनी बातें पूरी नफासत और इमकान के साथ रखते थे। हाल ही में उनकी गजल, नज्म और फिल्मी गीतों का संकलन जाग उठे ख्वाब कई नाम से आया है। पेंग्विन से प्रकाशित इस संकलन का संपादन मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, कांतिमोहन सोज और रेखा अवस्थी ने किया है। इसकी प्रस्तावना गुलजार ने लिखी है। साहिर के बारे में युवा निर्देशक अनुराग कश्यप लिखते हैं, साहिर के गानों ने मुझे दिशा दी है। अपनी आवाज मैंने उनके गीतों में पाई है।