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Thursday, December 31, 2009

दरअसल:अनुराग, इम्तियाज और विशाल

-अजय ब्रह्मात्मज
अपनी पसंद की फिल्मों के बारे में लिखना सहज नहीं होता। साल की 100 से अधिक फिल्मों में से श्रेष्ठ फिल्मों को चुनना व्यक्तिगत अभिरुचि के साथ इस तथ्य पर भी निर्भर करता है कि व्यापक दर्शक वर्ग ने उन फिल्मों को कैसे रिसीव किया? सन 2009 की बात करूं, तो सबसे पहले तीन युवा निर्देशकों की फिल्मों का उल्लेख करूंगा। अनुराग कश्यप, इम्तियाज अली और विशाल भारद्वाज की फिल्में हिंदी फिल्मों में आ रहे बदलाव का संकेत देती हैं। तीनों फिल्मकार हिंदी प्रदेश के हैं। उन्होंने हिंदी समाज के सोच और मुहावरे को बारीकी से फिल्मों में रखा है। तीनों की अलग शैली है और अपनी विलक्षणता से उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को अचंभित किया है। अनुराग कश्यप की पहली फिल्म पांच थी। लंबे समय तक वह सेंसर की उलझनों और निर्माता की उदासी के कारण डिब्बे में पड़ी रही। इधर किसी ने उसे इंटरनेट पर लीक कर दिया। अभी अनुराग के प्रशंसक उसे इंटरनेट से डाउनलोड कर धड़ल्ले से देख रहे हैं। अनुराग की ब्लैक फ्राइडे पसंद की गई थी, लेकिन उसे फीचर फिल्म नहीं माना गया। फिर भी मुंबई के दंगों पर आधारित ब्लैक फ्राइडे उस समय के विचलित लोगों के मर्म को सामने ले आती है। मार्मिक और मानवीय ब्लैक फ्राइडे को डाक्यूमेंट्री के दर्जे में नहीं डाला जा सकता। अनुराग की नो स्मोकिंग के प्रयोग और प्रतीक को बहुत कम दर्शक समझ पाए। इस साल अनुराग की देव डी और गुलाल को कुछ समीक्षक और दर्शकों ने पसंद किया। दोनों ही फिल्मों में नवीनता और साफगोई के साथ चरित्रों को पेश करने की अनुराग की हिम्मत अच्छी लगी। दोनों ही फिल्में भिन्न किस्म से म्यूजिकल थीं। अनुराग को इंडस्ट्री ने स्वीकार कर लिया है। अब उन्हें एक ऐसी फिल्म बनानी है, जिससे आम दर्शकों के बीच उनकी पहचान बने।
इम्तियाज अली की पहली फिल्म सोचा न था का शीर्षक उनकी कामयाबी पर भी लागू होता है। अभय देओल और आयशा टाकिया की इस फिल्म को समीक्षकों ने इंडस्ट्री के लोग और दर्शकों से ज्यादा पसंद किया। उन्हें जब वी मेट जैसी बड़े बजट की फिल्म मिली। करीना कपूर और शाहिद कपूर की दोस्ती के दिनों में यह फिल्म बनी और उनके अलगाव के समय रिलीज हुई। जब वी मेट की एनर्जी ने सभी को प्रभावित किया। खास कर करीना की अल्हड़ अदायगी और शाहिद के संजीदा अभिनय की वजह से इम्तियाज की इस रोमांटिक फिल्म के जबर्दस्त कामयाबी मिली। इस साल उनकी लव आज कल आई। आशंका थी कि दीपिका पादुकोण और सैफ अली खान के साथ वे रोमांस की लहर पैदा कर पाएंगे या नहीं? फिल्म लगी, तो आशंकाएं निर्मूल निकलीं और पूरा देश इस फिल्म की धुन पर आहूं-आहूं करता नजर आया।
विशाल भारद्वाज संजीदा निर्देशक हैं। उन्होंने मकड़ी से शुरुआत कर जल्दी ही मकबूल से मकबूलियत हासिल कर ली। ब्लू अंब्रेला में उन्होंने फिर से मासूमियत को दर्ज किया, तो ओमकारा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति के खुरदुरे पहलू को सामने लाए। यह फिल्म राजनीति से अधिक परस्पर संबंधों में शक और संदेह के घात-आघात को चित्रित करती है। इस साल कमीने में विशाल ने मुंबई की पृष्ठभूमि में जुड़वा भाइयों की फरेबी कहानी सुनाई। कमीने पर विदेशी फिल्मकार टैरवाटिवो का असर दिखा, लेकिन विशाल की यही शैली है। वे हिंसा और अपराध के साथ रिश्तों की कहानी भी कहते हैं। कमीने के संगीत की गूंज अभी तक समाप्त नहीं हुई है। देव डी, लव आज कल और कमीने के साथ मुझे स्लमडॉग करोड़पति, लक बाई चांस, दिल्ली 6, फ्रोजेन, संकट सिटी, चिंटू जी, ह्वाट्स योर राशि, जेल और पा भी अच्छी लगीं।

Tuesday, December 29, 2009

स्वानंद किरकिरे से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

- आपको राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। राष्ट्रीय पुरस्कार एक तरीके से बहुत बड़ी पहचान होती है। आप किस रूप में देखते हैं इसे?

0 हर पुरस्कार के बारे में बातें होती है कि ये पुरस्कार ठीक नहीं है, वो पुरस्कार ठीक नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय पुरस्कार के बारे में ऐसा कुछ नहीं कह सकते। यह बड़ी प्रतिष्ठा की बात होती है कि किसी काम को राष्ट्रीय पहचान मिले। राष्ट्रीय पंरस्कार मिलता है तो उसका सुख अलग है। सुख से ज्यादा एक संतुष्टि की भावना होती है। मैं चला था इंदौर से और यहां आकर मैंने काम करना शुरू किया था। इतनी जल्दी इस कैरियर में इतना बड़ा पुरस्कार मिल जाए, इसकी उम्मीद भी नहीं थी और न कभी आकांक्षा थी। घर-परिवार के लिए बहुत खुशी की बात है। सभी लोगों को लगा कि स्वानंद सही जगह पर गया हुआ है। दूसरी बात यह होती है कि राष्ट्रीय पुरस्कार में पूरे हिंदुस्तान की फिल्में रहती हैं। उनके साथ आपकी प्रतियोगिता रहती है। यह किसी और फिल्म पुरस्कार की तरह नहीं है कि आपकी फिल्म कितनी चली है या गाना कितना हिट हुआ है? या आप किस लॉबी में बैठे हुए हैं या किसके साथ आपने काम किया है? असके साथ किया है तो आपको अवार्ड मिलेगा, इसके साथ नहीं किया है तो नहीं मिलेगा। इस वजह से सभी लोग राष्ट्रीय पुरस्कार का सम्मान करते हैं। इसे करियर में मील का पत्थर मान सकते हैं।

- घर में अशोक स्तंभ लगा हुआ कोई कागज हो या ट्राफी हो तो गर्व होता होगा?

0 बिल्कुल... राष्ट्रपति से पुरस्कार ले रहा है,मेरे घर वालों के लिए यही बड़ी बात है। अब राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार मिल रहा है... क़ुछ तो किया ही होगा।

- बंदे में था दम गीत को लेकर क्या कहेंगे आप? उस गीत की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं?

0 उस गीत का और उस फिल्म का पूरा मामला ही बड़ा रोचक है। अपने लिखे सारे गीतों में मैं सबसे बेहतर गीत शायद उसे ना मानूं। लेकिन जिस परिवेश के लिए लिखा गया था उसमें वो बिल्कुल सही तरीके से बैठा था। एक नयी भाषा निकालने की सोची गई थी, एक नए तरीके से गांधी के बारे में गीत लिखने की प्लानिंग थी। निश्चित रूप से मैं अकेला उसका पूरा श्रेय नहीं ले सकता। उसमें राजकुमार हिरानी भी थे, उसमें विधु विनोद चोपड़ा भी थे और पूरी टीम ही थी। ये सोचा गया था कि मुन्ना भाई के सेंसिबलिटी से महात्मा गांधी के लिए गीत लिखा जाए। ये अच्छा चैलेंज था। उसमें बहुत खतरा भी था। गांधी जी की इतनी बड़ी छवि है और उन पर इतने अच्छे गीत लिखे जा चुके हैं। साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल... उस छवि को आप आहत न करें और आप का गीत थोड़ा बचकाना भी न लगे। ऐसा भी न लगे कि यार ये क्या मजाक उड़ा रहे हैं बापू का। लेकिन वह खतरा सिर्फ इस गीत के साथ नहीं था, पूरी फिल्म के साथ था। ऐसा हो सकता था कि अनजाने में एकदम बापू की छवि के साथ खिलवाड़ हो जाए,क्योंकि मुन्ना भाई गांधी जी के स्वभाव का विलोम था। काफी मेहनत के बाद हम उस भाषा तक पहुंचे थे।

- इसको टीम वर्क कह लें। राजकपूर के जमाने में होता था। सुनते हैं वे गीतकार और संगीतकार के साथ बैठकी करते थे। आजकल ऐसा टीम वर्क नहीं दिखता

0 आजकल कुछ ही जगह बचे हैं, जहां वैसा होता है। राजकुमार हिरानी हैं, विधु विनोद चोपड़ा हैं, यहां पर हमलोग एक साथ बैठ कर काम करते हैं। वैसा माहौल शायद कहीं और नहीं मिलेगा। बाकी जगह तो ट्रैक भेज दिया जाता है, गाना लिख दो, जो भी लिखना है लिख कर भेज दो। शब्दों के प्रति या किसी खास विचार के प्रति कोई रूझान नहीं रहता। टीम वर्क का नतीजा काफी अच्छा निकलता है। मेरे पास क्राफ्ट है, मेरे पास संवेदना है,लेकिन कोई जरूरी नहीं है कि हमेशा मेरे पास कोई दिशा हो। मुझे कोई दिशा दिखाने वाला चाहिए होता है। क्योंकि मैं सिर्फ गीतकार हूं। मैं एक बार में पूरी कहानी को समझ नहीं सकता हूं। और गीत कहानियों के लिए बनते हैं, गीत फिल्मों के लिए बनते हैं। ये कांसेप्ट हमारे यहां से जा चुका है लगभग। कोई भी गाना हो, किसी भी फिल्म में लगा दो और नाच लो। हिंदी सिनेमा में कभी भी गाने का औचित्य सिर्फ इतना नहीं था। गाना फिल्म के अंदर नहीं बल्कि फिल्म के बाहर भी लोगों की जिंदगी से जुड़ता था। फिल्म ना भी देखी हो, लेकिन गाने पसंद होते हैं। गानों की निजी इयत्ता भी होती थी। विनोद के साथ काम करते हुए या सुधीर के साथ काम करता हुए कम से कम ये सुकून रहता है कि एक दिशा और विचार के साथ कुछ पाने की कोशिश की जाती है।

- इधर एक नया रवैया दिख रहा है कि लेखन में जब डायरेक्टर या क्रिएटिव प्रोडयूसर अपने सहयोग और छोटे योगदान का भी क्रेडिट ले लेता है। पहले ऐसा नहीं होता था। आपका अनुभव कैसा रहा?

0 इस गाने की ही बात करें तो 'बंदे में था दम...' पंक्ति मेरे जहन से नहीं निकली। विनोद ने सुझाया। उस लाइन तक पहुंचने में हम दोनों साथ-साथ थे। पांच दिन का प्रोसेस रहा। उनके जहन से निकली या मेरे जहन से निकली, वो अच्छी लाइन निकली। हमारे लिए वह महत्वपूर्ण था। यह बड़प्पन भी होता है। अगर कोई एक धुन सुझा कर उसका क्रेडिट लेने लगूं तो फिर टीम एफर्ट कैसा हुआ? ये मैंने बनाया, ये तूने किया का भाव आ गया तो फिर मैं अपनी अच्छी चीज आपको क्यों दूंगा। फिल्म का हर काम डायरेक्टर के दिमाग से होता है। 'बंदे में था दम...' खुद के लिए नहीं लिख रहा हूं। वह उस फिल्म के लिए उस डायरेक्टर की जरूरत के लिए लिख रहा हूं। उस एक लाइन से गाना पूरा नहीं होता है। उसके आगे दो अंतरे और पूरी बात आगे गढऩी पड़ती है। हां, एक शुरूआत हो जाती है। 'क्यों खोया खोया चांद की फिराक में, तलाश में लिख रहा था तो धुन थोड़ी सी बना दी थी मैंने उसकी। मैं उसके लिए लडऩे नहीं बैठा है कि ये धुन मेरी है। ठीक है लिखते-लिखते थोड़ी धुन बन गई।

- आप संगीत का भी ज्ञान रखते हैं?

0 हां, थोड़ा-बहुत... लेकिन ऐसा होता रहता है। मेरा कहना है कि ये तो क्रिएटिव प्रोसेस में होता रहता है। कई बार आपको समझना पड़ता है। कभी-कभी गायक भी दो शब्द सुधार देता है आपके। वह गाना गाने खड़ा होता है और पूछता है कि सर मैं इसको ऐसा बोलकर देखूं क्या? और कई बार चीज अलग बन जाती है। लेकिन उसे क्रेडिट थोड़े ही मिल जाता है। वह चाहता भी नहीं है। सौभाग्य की बात है कि यहां पर मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। विनोद ने बड़प्पन से उसे छोड़ा। अगर विनोद कहते कि हां मेरे को क्रेडिट चाहिए तो शायद मैं ना भी नहीं कर पाता। क्योंकि 'बंदे में था दम' उनके जहन से निकला था।

- मुंबई किस इरादे से आए थे। गीत लिखने आए थे?

0 नहीं, गीत लिखने नहीं आया था। मैं सिनेमा में काम करने आया था। मुझे डायरेक्शन ही करना था और करना है। मैंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से मैंने प्रोडक्शन डिजाइन और डायरेक्शन का ही डिप्लोमा लिया है। वहां पर मैं एक्टिंग नहीं करता था। उसके साथ-साथ मैंने लेखन में कुशलता हासिल कर ली थी। अपने नाटक भी लिखता था। उस वक्त लोगों ने बताया कि लेखक बन कर जाओगे तो ज्यादा आसानी होगी तुमको। क्योंकि टेलीविजन नया-नया आया था उन दिनों। उन दिनों टेलीविजन के लिए लेखकों की बहुत जरूरत थी। मैंने एक नाटक किया था नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के रंगमंडल के साथ-एक सपना। भगत सिंह के दस्तावेजों के आधार पर मैंने वह नाटक लिखा था। भगत सिंह ने अपने भाई को एक चिट्ठी लिखी थी। उस चिट्ठी पर आधारित एक नाटक किया था। उस नाटक को टीवी प्रोड्यूसर मंजू सिंह ने देखा था। उन्होंने मुझे बोला कि आजादी की पचासवीं सालगिरह पर वह भगत सिंह के जीवन पर सीरियल बना रही हैं।

- कौन सा साल था? यह तो 1997 की बात होगी?

0 जी1997-98 की बात है। सीरियल का काम हाथ में लेकर मैं मुंबई आया। एक-डेढ़ साल तक वह सीरियल लिखता रहा। बनता रहा और दूरदर्शन पर आता रहा। चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह ये-वो... उसके बाद कुछ और जगह पर लिखने का प्रयास किया। थोड़ा जिंदगी ने ऊपर-नीचे किया। फिर दिल्ली जाना हुआ,फिर वापस आया। आखिरकार 2000 में मैं सुधीर मिश्रा से मिला। 2000 में सुधीर मिश्रा के साथ एक सीरियल लिखना और उनको असिस्ट करना शुरू किया। उनकी 'कलकत्ता मेल' फिल्म बन रही थी। सुधीर के साथ काम करने का इरादा बहुत पहले से था। 1988 से उनकी फिल्में देख रहे हैं तो उनके लिए एक आदर भाव था। उन्होंने मुझे कहा कि हां करो, ... उनके पास एक फिल्म लिखने के लिए या था। वो भी एक बड़ा मजेदार किस्सा है। वासु भगनानी और टुटु शर्मा मिलकर एक फिल्म प्रोड्यूस कर रहे थे। मुझे पंकज पाराशर ने सुधीर से मिलवाया था। हमलोगों को फिल्म लिखने के लिए साइन कर लिया गया था । पहली बार साइनिंग एमाउंट भी मिल गया था। मैं और अपराजित शुक्ल दोनों को पच्चीस-पच्चीस हजार रुपए मिले थे। बड़ी खुशी हुई। हम सुधीर के साथ कहानी लिखते थे। एक-दो महीने तक मामला चलता रहा। फिर एक दिन सुधीर ने कहा कि, 'तुम लोग अच्छे लडक़े हो, तुमको एक बात बताता हूं। यह फिल्म नहीं बनेगी। यह चलता रहेगा। यह सिर्फ ढकोसला है। कुछ महीनों के बाद फिल्म बंद हो जाएगी। तुमको अगर जारी रखना है तो करते रहो, मेरी कोई मनाही नहीं है। अगर तुमको सचमुच कुछ करना है तो मेरा एक सीरियल बन रहा है,उसे लिखो। तब तुम्हारे कुछ पैसे-वैसे बनेंगे। वे 'तलाश' सीरियल बना रहे थे। उसी वक्त उनको असिस्टेंट की जरूरत थी। उन्होंने कहा कि कोई असिस्टेंट चाहिए मुझे। तो मैंने ही हाथ खड़ा किया। मैंने कहा कि मैं करूंगा। तब वे बोले कि रायटर जैसा सम्मान नहीं मिलेगा, लात मिलेगी। मैंने कहा चलिए ये भी मंजूर है। 'कलकत्ता मेल' के बाद फिर 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' बनी। उसके बाद 'चमेली' बनी। 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' रिलीज होने के पहले 'चमेली' बन के रिलीज हो गई थी। कई साल पहले थिएटर में 'बावरा मन...' गाना लिखा था। 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' की शूटिंग के दौरान मैंने केके को गा कर सुनाया था। के के को बहुत पसंद आया था। उसने सुधीर को बोला कि इसका गाना सुना है क्या आपने? सुधीर ने गाना सुनकर बोला कि ये गाना मुझे फिल्म में दे दो। मैं कहा नेकी और पूछ पूछ ... ले लो आप। उन्होंने शांतनु को सुनाया। शांतनु मोइत्रा म्यूजिक डायरेक्टर थे। उन्होंने कहा कि हां मुझे ऐसा ही गाना चाहिए। उसे मैंने गाया भी था। फिर उस गाने को प्रदीप सरकार ने सुन लिया था। उन दिनों वे विनोद चोपड़ा के यहां परिणिता के लिए कोशिश कर रहे थे। उन्होंने मुझे दो गाने लिखने के लिए दिए। गीत लिखने के बाद विनोद के पास चला गया मैं। एक सिलसिला बन गया। उन दिनों मैं कह रहा था कि मुझे थोड़े ही गीतकार बनना है? तब सारिका ने कहा था कि अभी जो बस मिल रही है, चढ़ जाओ। अभी मत सोचो कि ये करना है, वो नहीं करना है। जो करने को मिल रहा है, करो और इंडस्ट्री में आगे बढ़ते चलो। यहीं से फिर रास्ते खुलेंगे। और वही हुआ भी। धुनों पर गाना लिखना मुझे पता नहीं था। डर था कि मैं लिख पाऊंगा या नहीं लिख पाऊंगा? 'परिणिता' के वक्त मुझे लगा कि नहीं हो पाएगा। मैंने कोशिश की और हो गया।'

- कौन सा गाना था?

0 'पिहू बोले पिया बोले' और सूना मन का आंगन' ... य़े गाने मैंने धुनों पर लिखे थे। फिर विनोद के साथ ही रहा। उनकी दो-तीन फिल्में बन रही थी 'एकलव्य' और 'लगे रहो मुन्ना भाई' बन रही थी तो संवाद लेखन भी उनके साथ किया और अभी कर रहा हूं। 'तालीशमान' जो राम माधवानी बना रहे हैं। उसका स्क्रीनप्ले और डायलॉग कर रहा हूं और निर्देशन की दिशा में अग्रसर हूं। किसी तरह से फिल्म बनानी है।

- पहले सीरियल लेखन और फिर गीत लेखन... क़भी यह डर नहीं रहा कि कहीं फंस तो नहीं रहे हैं। एनएसडी से आए कई प्रतिभावान छात्र यहां खुद को बर्बाद कर चुके हैं

0 बहुत ज्यादा डर था। इसीलिए मैं सुधीर मिश्रा से मिला... क्योंकि मंजू सिंह के साथ जो सीरियल कर रहा था, उसमें एक अच्छी बात थी कि कम से कम भगत सिंह की जिंदगी पर सीरियल था। 52 एपीसोड में खत्म होना था। उसका एक अंत मुझे पता था कि यह इसके आगे नहीं जाएगा नहीं। मैं डेली सोप लिखने से डरता था। क्योंकि मुझे मालूम था कि इस कुचक्र में उलझ गए आप तो फिर आप उलझ गए। और कई अच्छे-अच्छे लेखकों को, अच्छे-अच्छे लोगों को सिर्फ पैसे की वजह से... क्योंकि मुंबई में सरवाइव करना... उस जंजाल में घुसते हुए देखा है और वे निकल ही नहीं पाए। कई प्रतिभाएं स्वाहा हो गयीं। मुझे वह खतरा था। मैं सुधीर का शुक्रिया अदा करूंगा कि उन्होंने मुझे सीरियल लिखने को बोला और साथ में असिस्टेंट बना लिया। फिर सुधीर ने बहुत अच्छा कर दिया कि असिस्टेंट को इतने पैसे नहीं मिलते। पांच-सात हजार रुपया मिलते थे उस जमाने में। महीने के चार एपीसोड बनते थे, डेली का जमाना शुरू नहीं हुआ था। उन्होंने कहा तू चारों लिखेगा तो फंस जाएगा। तू दो लिख, दो किसी और को दे। दो मैं लिखता था मेरे पैसे बन जाते थे। फिर वह सीरियल बंद हो गया तो उन लोगों ने निम्बस का एक डेली सीरियल दिलवा दिया था। उन्होंने वहां कहा था कि ये सिर्फ पांच एपीसोड लिखेगा। पांच एपीसोड और डायलॉग लिखने होते थे। दोनों मिलाकर कुछ बीस हजार रुपए बन जाते थे। उन्होंने सलाह दी कि इस पर बस चुप रहना। बीस हजार रुपए कमाना और असिस्ट करो मुझे चुपचाप आकर। उन्होंने कहा था कि कुछ नहीं कर सकते हो तो इसको भी इस्तेमाल करो। जैसे कहते हैं कि पीएचडी कर रहे हो ऐसा समझ कर चुपचाप अपना काम करो। यह करते रहो और दूसरी दिशा में अग्रसर रहो। उन लोगों का काफी सपोर्ट रहा।

- इंदौर मुंबई से ज्यादा नजदीक है। वाया दिल्ली आने की क्या जरूरत थी?

0 इंदौर से मुंबई नजदीक हैं, लेकिन वाया दिल्ली आने के दो-तीन कारण हैं। एक कारण ये है कि मैं नाटक करता था। मेरे पिता कुमार गंधर्व जी के शिष्य रहे हैं। मेरा पूरा बचपन उनके साथ गुजरा। एक बात हमेशा से पता थी कि जितना इंदौर में होता है, उतना ही सब कुछ नहीं है। मतलब ही इंदौर ही दुनिया नहीं है। और भी बहुत कुछ होता है, और भी बहुत कुछ किया जाता है। बहुत तरीके होते हैं करने के। उन तरीकों को जानने के लिए और मध्यवर्गीय मानसिकता होती है कि जो कुछ भी काम करना है, उसे सीख कर करो। कुछ भी करना है तो उसे जान कर करो और अच्छी तरह समझ कर करो। हमलोग प्रभावित भी थे। कहीं सुधीर मिश्रा की फिल्मों से, उस जमाने में पैरेलल सिनेमा का दौर चला हुआ था। नसीरूद्दीन शाह की एक्टिंग के गुण गाया करता था। उस समय बहस होती थी अमिताभ बच्चन और नसीरूद्दीन शाह में कौन श्रेष्ठ है। उस तरह का एक रूझान था। दूसरी बात आर्थिक स्थिति की थी। मेरी कोई दूसरी पढ़ाई-लिखाई नहीं थी। मैं सिर्फ कॉमर्स ग्रेजुएट रहा हूं। मुंबई आने का कांफिडेंस भी नहीं था। तो जरूरी था कि कोई एक ऐसा चैनल बने कि जिसकी थ्रू मैं जा सकूं। तब वही काम आया... घर वालों के लिए था कि अच्छी स्कॉलरशिप मिलती है। और सरकार पढ़ा रही है और पढ़ रहा है। घरवालों को मैंने बताया था कि इसके बाद मैं लेक्चरर भी बन सकता हूं। पीएचडी भी कर सकता हूं।

- मध्यवर्गीय चिंता रही होगी कि डिग्री होगी तो आजीविका के रास्ते निकलेंगे?

0 हां, यही सोचा गया कि फिल्मों में न चलेगा तो भी कुछ कर लेगा। मेरी मां भी यूनिवर्सिटी में थीं तो उन्होंने कहा कि यहीं एम फिल के लिए अप्लाई कर दो। ड्रामा डिपार्टमेंट शुरू हो रहा है। पोस्ट के लिए के लिए अप्लाई कर दो... वो सब कुछ हो रहा था, इसलिए दिल्ली जाना जरूरी था। दिल्ली जाना बहुत महत्वपूर्ण था। अगर नहीं जाता तो मैं बहुत सारी चीजों का एक्सपोजर नहीं हो पाता। आधा कच्चा, आधा पक्का यहां आता।

- ज्ञान की कमी रहती या अनुभव की कमी रहती?

0 अनुभव की कमी रहती और ज्ञान की भी कमी रहती। क्योंकि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का माहौल ऐसा है कि वहां पर बहुत तरह की चीजें सिखाई जाती है। इंदौर में जो नाटक करते हैं या करते थे। वो तो बहुत ही सीमित तरीके का था। किसी का देख कर कोई कर रहा है। वहां पर अलग-अलग तरीके का नाटक करने को मिला। अलग-अलग तरीके की किताबें पढऩे को मिलीं। जैसे एक्ट वन में था मैं उन दिनों,वहां एन के शर्मा थे। वहां मुझे देखकर अच्छा लगता था कि अपनी स्क्रिप्ट लिखते हैं, अपने गाने लिखते हैं। पियुष मिश्रा अपने गाने लिख रहे थे। एक दिन पियुष मिश्रा नहीं थे तो एन के ने मुझे बोला कि तू ये गाना लिख दे। मैंने कहा कि मैं तो लिख नहीं पाता। उन्होंने डांटा कि लिख नहीं पाता का क्या मतलब है? बोले कल सुबह गाना लेकर आ जाना। रात को हाथ चलाया। हाथ चलाया तो गाना लिख गया। तारीफ भी हो गई। बड़ा अच्छा लिखा। तो लगा कि यह स्किल भी मेरे अंदर है। अगर चाहूं तो कर सकता हूं।

- क्या गीत था याद है

0 रोज ही तो

रोज ही तो

रोज ही तो

होता है वही वो सवेरा

वही वो सिरहाना है

वही वो चादर

वैसे ही घूमे पंखा

वही तो है बिस्तर

रोज ही तो

थोड़ा लेफ्ट, थोड़ा पॉलिटिक्स की जानकारी हुई। थोड़ा कहानी-कविता पढऩे का अवसर मिला। उर्दू शायरी से पहचान हुई दिल्ली में। एक नजरिया बदला। एक परिपक्वता आई। जब मुंबई आया था तो किसी किस्म की घबराहट नहीं थी । यह डर नहीं था कि अगर डेली सोप नहीं लिख पाऊंगा तो क्या होगा? कम से कम कुछ खास तरह की काम इच्छा है। वो काम करने को मिल जाए, ये स्ट्रगल रही।

- थोड़ा पीछे चलें इंदौर का माहौल, कौन दोस्त लोग थे, शागिर्द कह लें या गुरु कह लें, ऐसे कौन लोग थे जिनसे एक डायरेक्शन भी मिला और सोच की दिशा...

0 निश्चित रूप से इंदौर का माहौल जो था... बाकी छोटे शहरों से भी अलग किस्म का माहौल था। जैसे भोपाल, उज्जैन, ग्वालियर या कोई और शहर हुआ। इंदौर थोड़ा बनिए का शहर है। इंदौर में उसी तरह के नाटक होते थे। कुछ लोग मराठी नाटक करते थे, बाबा गोरे जैसे लोग थे। उन लोगों के साथ मैं सिर्फ मराठी कम्पिटीशन में हिस्सा लेने के लिए नाटक किया करता था। वे मुंबई में देखे हुए मराठी नाटक लाकर इंदौर में मंचन करते थे। शुरूआत उन्हीं लोगों के साथ हुई। हमलोग दिशाहीन थे। कुछ भी पता नहीं था। पूरा का पूरा तीस लोगों का एक ग्रुप था। मेरा मानना है कि वे टैलेंटेड थे और है। लेकिन अधिकांश कुंए में तड़प कर मर गए, क्योंकि कुछ करने को नहीं था। दिशा नहीं थी कि उस एनर्जी का उपयोग हो सके। सुबह से लेकर रात तक कॉफी हाउस में बैठे रहने वाले और बकवास करने वाले 30-35 लडक़ों के बीच में मैं भी था। उसमें जो सबसे बड़ी चीज थी, वो कुमार गंधर्व थे। मेरे पास उनकी खिडक़ी खुली हुई थी। वहां से मुझे कला की पूरी दुनिया दिखाई दे रही थी। जो मैं देख रहा था, उसमें अशोक बाजपेयी से लेकर बाबा कारंथ तक थे। मराठी के पुल देशपांडे सब का आना-जाना... माधवी मुद्गल, शुभा मुद्गल आकर सीखती थीं कभी-कभार। मुझे पूरी दुनिया कुछ अलग दिखाई दे रही थी कि लोग कुछ और कर रहे हैं, लोग कुछ और करना चाह रहे हैं। इंदौर में कई लोगों का नाम लेना चाहूंगा। इंदौर में 'फनकार' नाम का एक ग्रुप था। उन लोगों ने एक कार्यशाला की थी। मेरे मित्र जो गुजर गए शाहिद मिर्जा, बाबा गोरे, आदिल कुरैशी थे और राकेश जोशी मेरे मित्र रहे हैं, वो भी हिंदी का थिएटर करते थे। मोहन राकेश से पहचान हुई। शंकर शेष के नाटकों से परिचय हुआ। राकेश जोशी का काफी योगदान रहा मेरे आरंभिक दिनों में, कुछ भी पढऩे को देते थे, यार ये पढ़ ले, वो पढ़ ले। मोहन राकेश की डायरी उन्होंने ही दी थी पढऩे के लिए। कुछ बड़े टैलेंटेड लडक़े थे इंदौर में। हमारा दोस्त था सूर्यकांत भोजने, वह शराब पी-पी के गुजर गया। बैंक क्लर्क था। हिंदी साहित्य के नाटकों की इतनी किताबें उसके पास होती थी। वो रोज अपनी नौकरी खत्म कर के नाटक करने आता था। थोड़ी घुटन के बीच में कुछ लोग थे जो किसी तड़प के साथ कुछ करना चाह रहे थे। भोपाल, उज्जैन में ज्यादा काम हो रहा था थिएटर के लिहाज से। और इंदौर में नहीं हो पा रहा था। इंदौर में उस तरह से एक्सपोजर नहीं था। मैं पहला ही लडक़ा था इंदौर से जो एनएसडी गया। मेरे पहले कुमद चासकर और विनायक चासकर एनएसडी की पहली बैच 1956-1957 में गए थे। उनके बाद मैं गया था। जबकि उज्जैन से नौ लोग जा चुके थे। भोपाल के कम से कम दस-बारह लोग जा चुके थे।

- एनएसडी में जाने की बात किस ने कही थी?

0 मेरी माता जी ने एक बार इब्राहिम अलका जी का इंटरव्यू पढ़वाया था, जो इलस्ट्रेटेड वीकली में आया था। उन्होंने मुझे बताया था कि ये नसीरूद्दीन शाह के गुरु हैं। उस इंटरव्यू में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का जिक्र आया था। तब से मेरे जहन में था कि मुझे यहां जाना है। मुझे नहीं पता था कि मैं जा पाऊंगा या नहीं जा पाऊंगा। छोटे शहर में ऐसा लगता है, ये सब चीजें हमारे लिए नहीं है। ये सब चीजें दूसरों के लिए हैं। कला और लिखने का काम बाहर होता है। हमलोग उतने योग्य नहीं हैं। फिर कुछ लोग इंदौर से भी गए थे वहां कभी-कभार, उन लोगों ने बताया था कि एनएसडी में ये है, वो है। मैंने रोजगार समाचार लेना शुरू कर दिया। मुझे बताया गया कि उसमें एनएसडी का फार्म आता है। पहले साल आया तो उसमें लिखा हुआ था कि दस नाटको का अनुभव होना चाहिए किसी भी संस्था के साथ में और ग्रेजुएट होना जरूरी था। मैं ग्रेजुएट हो गया था उस समय। लेकिन मैंने दस नाटक नहीं किए थे। मैंने बस दो-तीन नाटक किए थे। मैंने कहा दस नाटक कैसे होंगे? इंदौर में हर साल एक नाटक होता है तो दस साल लग जाएंगे। उन्हीं दिनों 'फनकार' ने पहली बार एक वर्कशॉप किया था। एनएसडी के कुछ लोग आए थे वहां पर सिखाने के लिए। उसमें सुधा शिवपुरी थीं, गोविंद नामदेव थे, आशीष विद्यार्थी थे, आलोक चटर्जी थे। तो उन लोगों से बातचीत हुई फिर आशीष ने सुझाव दिया था कि दिल्ली चले आओ। मैंने उस साल एनएसडी का फार्म भरा । दस नाटक करवाने के लिए वे मुझे दिल्ली ले गए थे। उस साल मेरा चुनाव नहीं हो पाया। फिर 'एक्ट वन' में गया। अजीब सी बेचैनी थी। लोग कह रहे थे कि तू क्यों जाएगा एनएसडी में? इंदौर के कुछ नाट्यकर्मी डरा रहे थे कि वहां जाकर सभी चरसी हो जाते हैं। वहां शराबी हो जाओगे। एक बार चला गया तो धीरे-धीरे चीजें खुलने लगीं। मेरे बाद कम से कम सात लोग एनएसडी जा चुके हैं। यह एक अच्छा एहसास है कि आपने एक शुरूआत की। दूसरे लोगों को लगा कि यह किया जा सकता है। कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। वह एक संस्था है,जहां पर नाटक सिखाया जाता है। और क्या है?

- इंदौर में रहते हुए कभी आपने फिल्म के बारे में सोचा था कि मुझे फिल्मों में जाना है

0 हां, मैंने सोचा था। मन में तो था, लेकिन जाऊंगा कैसे यह नहीं पता था। अगर आपको याद हो तो एक जमाने में फिल्म समारोह के इंडियन पैनोरमा की फिल्मों का छोटे सभी शहरों में फेस्टिवल होता था। वहां पर जो फिल्में देखने को मिली। उससे एक माहौल बना था फिल्म के बारे में बातचीत करने का। एक अच्छी फिल्म देख कर उसके बारे में चर्चाएं करना का। समझने का, कुछ पढऩे-लिखने का माहौल उसकी वजह से बना था। मैंने उस जमाने की... सारी इंडियन पैनोरमा की सारी फिल्में देखीं। जो आम थिएटर में किसी को देखने के लिए नहीं मिलीं वो सारी देखी हुई है। गोविंद निहलानी की और सईद मिर्जा की फिल्में थी। वहां से यह शुरू हुआ था। वहां से पता चला था कि थिएटर करने वाले लोगों का कोई वास्ता होता है फिल्मों से। ये लोग थिएटर के ही लोग हैं जो फिल्मों में काम कर रहे हैं। एक्टिंग कर रहे हैं। वहां से मन बना। और कुछ लोग इंदौर से भी मुंबई आ रहे थे। मेरे पहले एक सीनियर इंदौर से बंबई आ गए थे। चंदू पारखी नाम था उनका, जो गुजर गए। और भी कई सारे लोग आए हुए थे। हिंदी में भी कई सारे लोग आए हुए थे। लेकिन बड़ा डर लगता था। मेरे चाचा खुद इंदौर छोड़ हिंदी फिल्मों के लिए मुंबई आ चुके थे।

- क्या नाम हुआ उनका?

0 उनका नाम जितेन्द्र जेडकर। यहां पर आजकल डबिंग का काम करते हैं। मेरे अपने सगे चाचा हैं। लेकिन शुरूआती दिनों में उनकी हालत कहुत खराब थी। य भी डर था कि कहीं उनकी तरह मुझे भी दिक्कतें न हों। मुंबई में रहने की बड़ी समस्या होती है। इसलिए नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की तरफ गए। मन में था कि एक ट्रेनिंग ले लो तो माहौल बनेगा। मिडिल क्लास के लोग ऐसे ही सोचते हें कि ये नहीं होगा तो वो करेंगे। लेकिन फिर ड्रामा स्कूल में जाने के बाद सब चीजें बदल गई। दुनिया दूसरी तरह से दिखने लग गई थी। उसकी वजह से मैं मुंबई में अकेला नहीं आ रहा था। उस वक्त मेरे साथ ड्रामा स्कूल के और 15-20 लोग आ रहे थे। और उन दिनों लोग दिल्ली से आते ही रहते थे। डर भी नहीं था। हमने सोचा कि जो सब का होगा, वो हमारा भी होगा।

- दिल्ली से मुंबई आने की जो हिम्मत है, इसमें सीनियरों की उपलब्धियों से कितनी प्रेरणा मिलती है?

0 प्रेरणा मिलती है न। आशीष विद्यार्थी, आशुतोष राणा और इन लोगों की वजह से काफी हिम्मत बंधी। इन लोगों को वहां कैम्पस में देखा था। आशुतोष राणा और मुकेश तिवारी मेरे सीनियर थे। ऐसा लगता था कि उन्हें काम मिल सकता है तों हमें भी काम मिलेगा। साथ में ही दिखे हुए लोग कामयाब हों तो काफी फर्क पड़ता है। दिल्ली से मुंबई का एक अजीब सा नाता है। कई बार वहीं बैठे-बैठे कास्टिंग भी हो जाती है। मतलब सीमा विश्वास जैसे लोगों की कास्टिंग वहीं हो गई थी। कभी यह भी लगता था कि किस्मत का ताला खुलना हो तो शायद यहीं बैठे-बैठे खुल जाए। लेकिन फिर कुछ लोगों ने बोला कि जो भी करना है, वहीं जा कर करो। क्योंकि वहीं से शुरूआत होती सब चीजों की... और वही हुआ भी। हम भी कुछ चार-पांच लोग आए थे... राजपाल यादव और हम साथ में आए थे। मैंने मंजू सिंह की सीरियल में इन सब की कास्टिंग की थी। लगभग बारह-तेरह लडक़े आए थे। यहां म्हाडा में तीन-चार कमरे लेकर सब लोग रहते थे।

- आप किसके बैच में थे?

0 मैं राजपाल और अतुल कुलकर्णी के बीच की बैच हूं। राजपाल मेरे से एक साल जूनियर है। अतुल कुलकर्णी मुझ से एक साल सीनियर हैं। उनसे एक साल सीनियर आशुतोष राणा हैं। मेरे बैच में शायद मैं ही हूं, जिसका थोड़ा नाम है। थोड़ा बहुत जिसको पहचान मिली है, वो मैं हूं। लेकिन कुछ और अच्छे लोग भी हैं। नवाज खान, नवाज आजकल ट्रेनिंग देता है। एक सुब्रत दत्ता है वो मेरे बैचमेंट है और अतुल कुलकर्णी की पत्नी गीतांजलि है, निवेदिता भार्गव जो एफएम में थी। संजीव विलशन, चितरंजन त्रिपाठी हैं, उन्होंने थिएटर में काफी अच्छा काम किया। अभी मुंबई आए हुए हैं।

- अपने कैरियर को कैसे देख रहे हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि 'जाना था जापान पहुंच गए चीन' ...

0 नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता है। अभी इंडस्ट्री का हाल काफी ठीक-ठाक है। सभी लोग आखिरकार फिल्म बनाना चाहते हैं। चाहे म्यूजिक डायरेक्टर हो, चाहे कोई हो। और विशाल भारद्वाज जैसे लोगों ने ये साबित कर दिया कि सिर्फ एक विधा से आपको पूरी संतुष्टि नहीं मिलती। हम न कोई शायरी के परंपरा से आते हैं, न कोई कविता की परंपरा से आते हैं, हम यही बन के खुश हैं। फिल्मी गाने लिखना और कविता करना ये दो अलग-अलग बातें हैं तो फिल्मी गाने लिखने का काम कर लेते हैं, जो बड़ा काम है, वो अभी करना है। इससे फायदा ही हुआ है। कुछ लोग इंट्रेस्टेड हैं। लोग सामने से आ रहे हैं, कहानी हो तो हमको बताइए। मगर गीत लिखने से नाम न होता तो शायद मैं कहीं स्क्रिप्ट ले कर घूम रहा होता।

- गीतकार के तौर पर कितने खुश हैं?

0 मैं खुश हूं। मैं खुश हूं, क्योंकि मैं सिर्फ गीतकार बन कर नहीं रह सकता। मेरा जीवनयापन गीतों पर निर्भर नहीं है। इस वक्त मैं मान रहा रहा हूं कि सारे पैसे, इन्हीं गीतों से नहीं कमा लेना है। अगर इस चक्कर में उलझ गया तो, फिर मैं आगे नहीं बढ़ पाऊंगा। इसलिए मैं उनके साथ ही काम करता हूं, जिनके साथ काम करने में मजा आता है। राजकुमार हिरानी हैं, सुधीर मिश्रा हैं, प्रदीप सरकार है और कुछ अन्य लोगों के भी काम कर रहा हूं। कोई अच्छी फिल्म, कोई अच्छा विषय मिल जाए तो कर लेता हूं।

- और कौन लोग हैं?


0 अभी मेरा एक दोस्त बना है। उसकी एक फिल्म का काम किया। विक्रम सिंह नाम है। मैंने श्याम बेनेगल साहब की फिल्म की। रेवती की एक फिल्म की बात चल रही है। राजीव मेनन की एक फिल्म करने वाला हूं मैं। तो उस तरह से जहां अच्छा काम करने को मिले। जहां पर ऐसा लगे कि हां, गीत लिखने का अपना मौका मिलेगा। जैसे सुधीर के साथ काम करना होता है। मालूम रहता है कि एक अलग तरीके का गीत लिखना पड़ेगा। सुधीर की फिल्म एक चैलेंज देती है, एक मजा आता है कि उनकी फिल्म के गीत सुने जाएंगे। 'खोया खोया चांद' का गीत लिखने के बाद संतुष्टि मिलती है।

- कितना बड़ा सुख होता है? छोटे शहरों में जिनक नाम कभी पर्दे पर देखते थे,उनके साथ बैठना, इसी जिंदगी में...? कई बार ऐसा होता है कि वे आपके अनुभवों से फायदा उठाना चाहते हैं। लेकिन हमें इस बात का सुख होता है कि हम जिनको आदर्श मानते हैं, वे हमारी बात सुन रहे हैं

0 बिल्कुल। बहुत ज्यादा सुख होता है उस बात का। शुरूआत में तो होता ही है। अब थोड़ा सा नहीं होता... फिर धीरे-धीरे आपको पता भी लगने लगता है कि... शायद आपके अनुभव खत्म होने लगते हैं। नयापन और उत्साह खत्म होने लगता है। वह एक जर्नी है। शुरूआत में इन लोगों के साथ में एक खतरा रहता है कि हमलोग इन लोगों से... हमलोग यानी छोटे शहरों से आए मध्यमवर्गीय लोग हमेशा यहां के लोगों से खुद को उन्नीस मान कर काम करते हैं। थोड़ा दब के रहते हैं। लगता है कि ये गुलजार साहब हैं और मैं कुछ नहीं हूं। अप्रोच तो यह होना चाहिए कि गुलजार साहब तो है, लेकिन हम भी कुछ हैं, तभी यहां हैं। ऐसा तो है नहीं कि सिर्फ वे ही है। इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि उनके प्रति मन में कोई आदर नहीं है। गुलजार साहब का काम और मुकाम है। उन्हें आपने इतने सालों से सुना है। उनकी वजह से आप गीत लिखने लगे हैं। गीत लिखने की आपकी इच्छा जिस वजह से हुई है, आप उसे नकार नहीं सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि आप पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर दें। यह मान कर चलें कि आदमी अंत में एक जैसा ही होता है।

- छोटे शहरों से आने वालों को और क्या दिक्कतें हैं?

0 छोटे शहरों से आने वाले लोगों को दो दिक्कतें होती हैं। एक तो यह होता है कि वे हमेशा अपने आपको थोड़ा कम मानते और आंकते हैं। इसके विपरीत कई बार कुछ नहीं आता फिर भी अपने आपको बहुत बड़ा मानते हैं। दोनों मामलों में गलती उनकी नहीं होती। समस्या यह है कि व्यवस्था ही कुछ ऐसी बनी हुई है कि उनकी जर्नी लंबी हो जाती है। गांव,कस्बे या छोटे शहर से यहां तक आने में ही प्राइम वक्त निकल जाता है। हिंदी फिल्मों का सारा काम एक ही जगह पर होता है। मुंबई में ही होता है। कोई भी आदमी हो, वह सीधे मुंबई नहीं आ सकता है। एक पूरे पर्सनैलिटी को यहां आना पड़ेगा, यहां टिकना पड़ेगा। यहां जीना पड़ेगा। यहां रहना पड़ेगा। यहां खाना-पीना ढूंढना पड़ेगा। फिर उसके बाद बच गया तो कुछ होगा। इस जद्दोजहद में बहुत सारा टैलेंट कहीं-कहीं अटक जाता है। रास्ते में ही कहीं फंस जाता है। इस समस्या का समाधान मुझे नहीं मालूम है। जो यहां पर किसी बड़े घर में पैदा हुआ है, उसके लिए इतनी बड़ी दिक्कत नहीं है, क्योंकि एक तरह से उनके मोहल्ले में काम हो रहा है। वे अपने मोहल्ले में ही कुछ कर रहे हैं। कोई चाचा-मामा है, कोई मोहल्ला है, कोई दोस्त है। सारे दोस्त और रिश्तेदार हैं। तो उनके लिए वहीं का वहीं कुछ पनप जाता है। छोटे शहर से आए लोग उनकी तरह बनने की कोशिश में असफल होते हैं। सबसे बड़ी प्रोब्लम भाषा की होती है। अगर मैं हिंदी छोड़ दूं, तो मेरा क्या वजूद है इस शहर में बताइए? अगर मैं हिंदी लिखना छोड़ दूं तो मेरा कोई वजूद ही नहीं है। कई बार छोटे शहर के लोग सिर्फ उनके जैसा बनने के चक्कर में अपना वजूद छोड़ देते हैं। वे आपको इसीलिए अपना रहे हैं कि वे आप से अपनी कमी पूरी कर रहे होते हैं। मेरी हिंदी, मेरी भाषा ही मुझे यहां पर टिकाए हुए है। किसी ने कहा कि मुंबई में ढेर सारे लोगों को हिंदी नहीं आती। उसके बीच में आप कैसे टिकते हैं? तो मैंने कहा कि मुंबई में न सही हिंदुस्तान में इतने सारे लोगों को हिंदी आती है, इसलिए मैं टिका हुआ हूं। हिंदुस्तान में इतने लोग हिंदी जानते हैं। यहीं पर लोगों ने पूछा कि मिजाज में मजाज है का क्या मतलब होता है? लेकिन लखनऊ में सभी तुरंत समझ जाते हैं। उन्हें किसी से नहीं पूझना पड़ता।

- फिल्मों की गीत मुख्य रूप से सिचुएशन पर आधारित होते हैं, लेकिन उनमें भाव और एहसास तो रहता ही है। आप फिल्मी गीतों के बारे में किस तरह से सोचते हैं?

0 कहानी की नब्ज पकड़ के गीत लिखता हूं। मेरे लिए यह बहुत जरूरी है कि किन लोगों के साथ काम कर रहा हूं। हिंदी फिल्मों के गीतों ने मुझ पर असर किया है। उनसे नयी शब्दावलियों का पता चला है। कितनी सारे नए एटीट्यूड की जानकारी मिली है। जिंदगी को देखने के कितने नजरियों का पता चला है। कितनी अच्छी-अच्छी बातें सुनने को मिली है। कोशिश रहती है कि गीतों में मानवीय सच्चाई पकड़ सकूं। चाहे आप फिल्मों के लिए लिख रहे हों या किसी और प्रकार का लेखन कर रहे हों, सबसे जरूरी है मानवीय सच्चाई को पकडऩा। अगर मैं कहानी के अंदर के संवाद को पकड़ पाता हूं। उसके अंदर जो भी टेढ़ा-मेढ़ापन है, उसे पकड़ पाता हूं तो गीत के शब्द सूझने लगते हैं। अगर मैं अपने-आप पर हंस सकता हूं, अपने आप पर थोड़ा सा तंज मार सकता हूं तो जरूर करता हूं। कला अंतत: मेरे लिए यही है। और फिल्मों में आया हूं तो सिर्फ पैसे कमाने के लिए नहीं आया हूं, क्योंकि पैसे कमाने होते तो मैं बीकॉम करने के बाद चार्टड एकाउंटेंसी कर रहा होता। मैंने बहुत लंबी जर्नी ले ली। सिर्फ इस चक्कर में कि मुझे कुछ और करना है। और पैसे जो हैं, वो आते हैं और आ भी रहे हैं। उतने आ रहे हैं, जितने से काम चलता है और वो कभी रूके नहीं। इसीलिए अपने-आप को जब मैं देखता हूं। तो मुझे हमेशा लगा है कि एक गाना साहिर साहब जैसा - एक गाना शैलेंद्र के जैसा निकल जाए, एक गाना गुलजार के जैसा निकल जाए। आपके पूरे कैरिअर में एक गाना ऐसा हो कि सालों तक वो सुबह तो कभी आएगी की तरह याद रह जाए। जब तक आदमी है तब तक वो गाना रहेगा।

- सही, उस गीत को आप भुला नहीं सकते

0 भुला ही नहीं सकते। अगर आपसे ऐसा कोई काम हो जाए तो और क्या चाहिए आपको? उस स्पर्श के लिए लिखते हैं। इस कोशिश में कुछ टेढ़ा-मेढ़ा भी हो जाता है। कुछ गलत फिल्में भी हो जाती हैं। लेकिन फिर एक तलाश शुरू हो जाती है। अभी फिल्मों में गीत के लिए बुरा समय है। बस, एक थोड़ी उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है। प्रसून जोशी और मुझ जैसे लोग कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं। फिर एक बार गीत को महत्व देने की कोशिश कर रहे हैं। काव्यात्मकता को महत्व देने की कोशिश कर रहे हैं। गीत मे अच्छे शब्दों का इस्तेमाल, हिंदी के शब्दों का इस्तेमाल बढ़ा है। गीतों में यह बिल्कुल ही खत्म हो गया था। उर्दू पोयट्री के कुछ लोग थे तो उर्दू आ जाता था। लेकिन हिंदी शब्दों को तो भुला ही दिया गया था। नीरज के बाद कोई नहीं था जो हिंदी को उस तरह से लिख रहा था। हमलोग कोशिश कर रहे हैं।

- निदा फाजली ने बहुत अच्छी बात कही थी कि फिल्मों में उर्दू के प्रोग्रेसिव रायटर आए। आजादी के बाद शायरों के लिए आजीविका की बहुत बड़ी समस्या थी और मुंबई इप्टा बहुत एक्टिव था। उन लोगों के लिए एक आसान रास्ता था कि फिल्मों के गीत लिखें। वे फिल्मों से पैसे कमाते थे और संगठन एवं पार्टी के लिए काम करते थे। उनकी वजह से एक अच्छा मजबूत ट्रेडिशन बना। चाहे वे कैफी साहब हों या जाफरी साहब हों या जांनिसार अख्तर हों या दूसरे लोग हों। इसमें निदा भी आते हैं। सभी बड़े शायर हैं। अभी ऐसी फिल्में नहीं बनतीं, जहां इमोशन से प्ले किया जाता हो, जहां वैसे गानों की जरूरत पड़ती हो। पहले थीम बढ़ाने के लिए या कहानी कहने के लिए गानों की जरूरत थी। एक तरह से देखें तो उस ट्रेडिशन की जिम्मेदारी अभी आप लोगों के ऊपर है। आप लोग अपने काम और अनुभवों से उसे सींच रहे हैं। क्या फिर से साहिर और शैलेन्द्र की स्थिति आएगी?

0 आनी चाहिए।

Monday, December 28, 2009

दरअसल : म्यूजिकल फिल्म पंचम अनमिक्स्ड

-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्मों की पत्रकारिता ही नहीं, इतिहास, शोध और विश्लेषण में भी हम ज्यादातर हीरो-हीरोइनों पर ही फोकस करते हैं। कभी-कभी ही ऐसी कोशिश होती है, जिसमें निर्देशक और गायकों पर ध्यान दिया जाता है। इनके बाहर हम जा ही नहीं पाते। ऐसा माना जाता है कि पाठकों की रुचि तकनीकी विषय और तकनीशियनों में नहीं है। वे सिर्फ अपने स्टारों के बारे में ही पढ़ना चाहते हैं।

इस माहौल में ब्रह्मानंद सिंह की अपारंपरिक कोशिश सराहनीय है। उन्होंने आर डी बर्मन पर पंचम अनमिक्स्ड नाम की फिल्म बनाई है। लगभग दो घंटे की इस फिल्म में ब्रह्मानंद हमें आर डी बर्मन के सुरीले जादुई संसार में ले जाते हैं। हम संगीतकार आर डी बर्मन से परिचित होते हैं। उनके समकालीन गीतकार, संगीतकार, गायक और संगीतज्ञों की बातचीत और नजरिए को एक सोच के साथ संपादित कर ब्रह्मानंद सिंह ने इतनी सटीक फिल्म बनाई है कि हम आर डी बर्मन यानी पंचम दा की सांगीतिक प्रतिभा को समझ पाते हैं। यह फिल्म दूसरे वृत्तचित्रों की तरह श्रेष्ठ संगीतकार की रचनाओं का सामान्य आकलन भर नहीं करती। हम उनके सहकर्मी और शार्गिदों के सौजन्य से उनके संगीत की बारीकियों को भी सुनते-गुनते हैं।

ब्रह्मानंद सिंह ने छह साल की मेहनत से इसे तैयार किया है। हालांकि बीच में कई बार ऐसा लगा कि वे यह फिल्म पूरी नहीं कर पाएंगे, लेकिन परिजन और मित्रों ने उन्हें हमेशा ढाढ़स बंधाया और फिल्म पूरी करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने पंचम दा के परिचितों से घंटों बातें कीं। पूरी बातचीत रिकॉर्ड करने और सुनने के बाद उन्हें एक सूत्र में पिरोना शुरू किया, ताकि फिल्म देखते वक्त हम अवांतर प्रसंगों से बच सकें। ब्रह्मानंद सिंह ने निजी बातचीत में बताया कि यह काम सबसे मुश्किल रहा। लगभग 200 घंटों की रिकार्डिग को काट-छांटकर दो घंटे की फिल्म में रोचक ढंग से संपादित करने में धैर्य के साथ अटूट रुचि की जरूरत थी। एक ही बातचीत को बार-बार सुनने से कई बार मर्म खो जाता है। अगर कई लोगों की बातचीत को एक धरातल पर लाना हो, तो परस्पर उपयुक्त पंक्तियों को जोड़ना पड़ता है। इसमें सावधानी बरतनी पड़ती है कि संदर्भ भी न कटे।

ब्रह्मानंद सिंह की पंचम अनमिक्स्ड को विभिन्न फिल्म फेस्टिवलों में सराहा और पुरस्कृत किया जा चुका है। उनकी इच्छा है कि किसी दिन उनकी फिल्म सिनेमाघरों में रेगुलर शो के तौर पर प्रदर्शित की जाए। उनकी यह इच्छा किसी सपने की तरह है, क्योंकि भारत में अभी तक डाक्यूमेंट्री को एक शुष्क और उबाऊ विधा माना जाता है। फीचर फिल्मों के व्यापक प्रभाव में दर्शक हर फिल्म से मनोरंजन चाहते हैं। ब्रह्मानंद सिंह कहते हैं, मनोरंजन तो पंचम अनमिक्स्ड में भी है। इसे बगैर इंटरवल के लोग देखते हैं। उन्हें सुध नहीं रहती और फिल्म खत्म हो जाती है। पंचम दा के गीतों से दर्शकों को साहचर्य बना हुआ है। संयोग की बात है कि आज का युवा वर्ग उनके संगीत को पसंद करता है। आप देखें कि उनके ही गीत सबसे ज्यादा रीमिक्स के तौर पर सामने आए हैं।

इधर शेमारू की मदद से ब्रह्मानंद सिंह अपनी फिल्म की डीवीडी ले आए हैं। इस डीवीडी के साथ उन्होंने आर डी बर्मन के तीस मेलोडियस गीतों का एक अलग डीवीडी भी रखा है। साथ में शोध के दौरान मिली सामग्रियों को संकलित कर एक कॉफी टेबल बुक पंचम-स्ट्रिंग्स ऑफ इटरर्निटी भी तैयार किया है। आम संगीत प्रेमियों और आर डी बर्मन यानी पंचम दा के खास प्रशंसकों के लिए ब्रह्मानंद सिंह की यह फिल्म वास्तव में एक म्यूजिकल तोहफा है। यह लोगों को पसंद आएगी।