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Wednesday, October 28, 2009

दरअसल: फिल्म की खसियत बने लुक और स्टाइल


-अजय ब्रह्मात्‍मज

हाल ही में रिलीज हुई एसिड फैक्ट्री के मुख्य किरदारों की जबरदस्त स्टाइलिंग की गई थी। डैनी डेंजोग्पा, डिनो मोरिया, दीया मिर्जा, फरदीन खान, मनोज बाजपेयी, इरफान खान और आफताब शिवदासानी के लुक और स्टाइल पर मेहनत की गई थी। आपने अगर फिल्म देखी हो, तो गौर किया होगा कि कैमरा उनके कपड़ों, जूतों, बालों और एक्सेसरीज पर बार-बार रुक रहा था। निर्देशक और कैमरामैन उन्हें रेखांकित करना चाह रहे थे। एसिड फैक्ट्री रिलीज होने के पहले से फिल्म के स्टार रैंप पर दिख रहे थे। डेढ़ साल पहले बैंकॉक में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में पहली बार फिल्म के कुछ किरदार रैंप पर चले थे। तब निर्देशक सुपर्ण वर्मा और निर्माता संजय गुप्ता की चाल में भी दर्प दिखा था। लेकिन, फिल्म का क्या हुआ? सारी स्टाइलिंग और उसके रेखांकन एवं प्रचार के बावजूद एसिड फैक्ट्री औंधे मुंह गिरी है, क्योंकि किरदारों पर ध्यान नहीं दिया गया।

लुक और स्टाइल पर इन दिनों ज्यादा जोर दिया जाने लगा है और उन्हें प्रचारित भी किया जाता है। फिल्म की खासियत के तौर पर उन्हें गिनाया जाता है। इन दिनों फिल्म के लेखकों और अन्य तकनीशियनों से ज्यादा महत्व ड्रेस डिजाइनर और लुक एवं स्टाइल डिजाइनर को दिया जाने लगा है। फिल्म स्टार भी उन्हें खास महत्व देते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी स्टाइलिश इमेज बनाने में डिजाइनरों का बड़ा योगदान रहता है। दिल चाहता है के बाद निर्माता-निर्देशक लुक और स्टाइल के पीछे ही पड़ गए हैं। उस फिल्म की कामयाबी से सभी को भ्रम हो गया कि फिल्म के किरदारों को स्टाइलिश तरीके से पेश कर दिया जाए, तो दर्शकों की रुचि और जिज्ञासा बढ़ जाती है। कुछ फिल्मों के मामले में ऐसा हुआ भी, तो उनका विश्वास और बढ़ गया। अभी किसी भी फिल्म की शूटिंग आरंभ होने के पहले लुक और स्टाइल पर जमकर समय और पैसे खर्च किए जाते हैं।

लुक और स्टाइल पर पहले भी ध्यान दिया जाता था, लेकिन उन्हें फिल्म का हाइलाइट या यूएसपी नहीं बनाया जाता था। मदर इंडिया, गंगा जमुना, आवारा और गाइड ही देख लें, तो इन फिल्मों के लुक और स्टाइल पर पूरी किताबें लिखी जा सकती हैं। लेकिन नरगिस, दिलीप कुमार, राज कपूर या देव आनंद को कभी यह बोलते नहीं सुना गया कि उन्होंने फलां-फलां डिजाइनर के कपड़े पहने हैं। उन दिनों फिल्मों के किरदार पर डायरेक्टर और एक्टर मेहनत करते थे। चरित्र चित्रण और चरित्र निर्वाह पर उनका ध्यान रहता था, क्योंकि लुक और स्टाइल तो उस चरित्र में निहित रहता था। फिर एक ऐसा दौर आया, जब हमारे एक्टर चौबीस घंटों में तीन-चार शिफ्टों में तीन-चार फिल्मों की रोजाना शूटिंग करने लगे। न तो एक्टर के पास फुरसत रहती थी और न डायरेक्टर इसकी जरूरत समझता था। सभी एक्टर हर फिल्म में एक ही लुक में दिखते थे। कभी-कभी दो फिल्मों में एक ही ड्रेस दिखे। यह सिलसिला लंबा चला।

बाद में फरहान अख्तर ने दिल चाहता है में आमिर खान, सैफ अली खान और अक्षय खन्ना को खास लुक्सदिए। उनके बाल कटवाए। उन्हें डिजाइनर कपड़े पहनाए। तीनों अभिनेताओं ने फरहान को पूरा सहयोग दिया। इस फिल्म के प्रचार में तीनों एक्टरों को विभिन्न मुद्राओं में दिखाया गया। पब्लिसिटी की तस्वीरों में फिल्म की वर्किंग स्टिल्स नहीं दी गई। यही वह दौर था, जब एक्टर भी महसूस कर रहे थे कि एक समय में एक ही फिल्म करनी चाहिए। आमिर खान की लगान आ चुकी थी। उस फिल्म में आमिर खान के विशेष लुक पर सभी का ध्यान गया था। फिर तो लुक और स्टाइल चरित्र चित्रण (कैरेक्टराइजेशन) में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया। इस महत्व की अति तब हो गई, जब निर्माता, निर्देशक और एक्टरों ने सिर्फ लुक्स और स्टाइल पर ही मेहनत करनी शुरू कर दी। किरदारों के कैरेक्टराइजेशन को नजरअंदाज किया गया। नतीजा एसिड फैक्ट्री जैसी फिल्में हैं, जिसमें स्टाइल तो है, लेकिन किरदार खोखले हैं।


Tuesday, October 27, 2009

हिंदी टाकीज: मायके से फिल्‍में देख कर ही लौटती हूं-मीना श्रीवास्‍तव

हिंदी टाकीज-50

चवन्‍नी ने हिंदी टाकीज की यात्रा आरंभ की थी तो सोचा था कि लगे हाथ 50 कडि़यां पूरी हो जाएंगी। ऐसा नहीं हो सका। थोड़ा वक्‍त लगा,लेकिन आज 50 वें पड़ाव पर आ गए। यह सिलसिला चलता रहेगा। दोस्‍तों की सलाह से योजना बन रही है कि हिंदी टाकीज के संस्‍मरणों को पुस्‍तक का रूप दिया जाए। आप क्‍या सलाह देते हैं

50 वीं कड़ी में हैं मीना श्रीवास्‍तव। उनका यह संस्‍मरण कुछ नयी तस्‍वीरें दिखाता है। उनका परिचय है...

मीना ग्राम माधवपुर, ज़िला मोतिहारी, बिहार के एक संभ्रांत परिवार की अनुज पुत्री हैं - शादी होने तक गाँव-घर में प्यार से 'मेमसाहब' नाम से पुकारी जाने जाने वाली मीना, गाँव की पहली महिला स्नातक भी थी। विवाह, वो भी एक लेखक से, और वो भी पसंदीदा पत्रिका सारिका मे छपने वाले अपने चहेते लेखक से, होने के उपरांत पटना आना हुआ - पर क्योंकि मामला मेमसाहब का था, भारत सरकार ने उनके विवाह के उपलक्ष्य में गाँधी सेतु बनवा डाला और मीना जी गाँधी सेतु पार कर के जो पटना आईं, तो अबतक बस वहीं हैं - २५ साल की पारी। जोक्स अपार्ट, मीनाजी बहुप्रतिभासंपन्न विदुषी और हिन्दी साहित्य की सजग पाठिका हैं। इनकी जीवन यात्रा ने आमतौर पर एक दूसरे से दूर रहने वाले पहलुओं को उतनी ही गहराई से छुआ है - पारंपरिक जमींदार मायका बनाम प्रगतिशील साहित्यिक ससुराल। उनके घर जाने पर आप दो चीजों के लिये आश्व्स्त रहियेगा - बढिया खाना, और बढिया साहित्य!

सिनेमा के प्रति मेरी रुचि बचपन से ही थी। तब फिल्मी दुनियानाम से एक पत्रिका निकलती थी जिसे बड़े भैया हर महीने लाते थे। वे जैसे ही कालेज जाते मैं उनके कमरे में जाती और पत्रिका में छपी हीरो-हीरोइनों की रंगीन तस्वीरें देखती और उनके नाम और चेहरे याद रखती। उन दिनों बाबूजी की पोस्टिंग बेतिया में थी। हमलोग तीन लालटेन चौकके पास स्टेट बैंक के पीछे रहते थे।

आज की तरह उस समय भी शुक्रवार को फिल्में रिलीज होती थीं। उन दिनों फिल्मों का प्रचार बैंड-बाजे के साथ होता था। एक ताँगे पर दोनों तरफ़ फिल्म के पोस्टर और दूसरी तरफ़ उस पर बैठकर उसी फिल्म के गाने की धुन बजाते बैंडवाले। पीछे चलते दूसरे ताँगे पर उसी फिल्म के गाने का ग्रामोफोन रिकार्ड बजता हुआ और हाथ में माइक्रोफोन लिये बीच-बीच में बोलता हुआ एक आदमी पूरे शहर में घूमता था। जैसे ही बैंड की आवाज़ सुनाई पड़ती, मैं दौड़कर गली के मुहाने पर खड़ी हो जाती। फिल्म का नाम पढ़ती और घर आकर फौरन माँ को, दीदी को बताती।

फिल्म पहले भैया देखकर आते। उनकी रिपोर्ट के बाद बड़ी दीदी, जो बेतिया कान्वेन्ट स्कूल संत टेरेसा में पढ़ती थीं, माँ के साथ फिल्म देखने का प्रोग्राम बनातीं। उस समय बेतिया में दो सिनेमा हाल थे- जनताऔर लिबर्टी। हमलोग जहाँ रहते थे, वहाँ से जनता हाल बहुत क़रीब था और ज़्यादातर फिल्में उसी में देखी जातीं। उस समय मेरी रुचि सिर्फ फिल्मों के गाने और डांस में होती थी। मेरे लिए फिल्म देखने का सही सिलसिला तब शुरु हुआ, जब बाबूजी का तबादला मोतीहारी हो गया और हमलोग पूरी तरह गाँव रहने लगे।

हमारे गाँव से मोतीहारी की दूरी केवल बारह किलोमीटर है। तब कच्ची सड़क हुआ करती थी और सवारी के नाम पर बैलगाड़ी। उन दिनों फिल्म देखने जाना हमलोगों के लिए त्योहार जैसा होता था। शाम को जैसे ही बाबूजी या भैया मोतीहारी से लौटते, हमलोग यह ज़रूर पूछते कि कौन से सिनेमा हाल में कौन सी फिल्म लगी है? मोतीहारी में भी उस समय दो सिनेमा हाल थे- चित्रमंदिरऔर राक्सी। जिस दिन फिल्म देखने जाना होता, उसके दो दिन पहले से ही गाड़ीवान की ख़ुषामद करनी पड़ती क्योंकि जाने-आने में दिन भर का समय लगता था। जाने के दिन सुबह से ही तैयारी शुरु हो जाती। हमलोग कुछ कपड़े बैग में रख लेते। माँ, दीदी चैके (रसोईघर) में चली जातीं। दाल भरी पूरियाँ और आलू की सूखी सब्ज़ी रास्ते के लिए बनतीं। हमलोग सुबह नौ बजे बैलगाड़ी पर बैठकर सिनेमा देखने के लिए गाँव से मोतीहारी चल पड़ते। बैलगाड़ी पर बाँस की हरी-कच्ची कइन की छावनी बनी होती थी।

मोतीहारी से दो किलोमीटर पहले, जहाँ कच्ची सड़क पक्की सड़क से मिलती थी, वहाँ बैलगाड़ी रोक दी जाती। हमलोग वहाँ खाना खाते, फिर कपड़े बदलते क्योंकि बैलगाड़ी में बैठने से कपड़े मुड़-तुड़ जाते थे। फिर हमलोग मोतीहारी पहुँचते। मोतीहारी के बलुआ चौक से पहले एक पीपल का पेड़ था। वहीं बैलगाड़ी रोक दी जाती और हमलोग हाल की तरफ़ चल पड़ते। चूँकि चित्रमंदिर बलुआ चौक पर है, इसलिए हमलोग पैदल ही जाते। अगर राक्सी में जाना होता तो रिक्‍शा लेकर मीना बाज़ार होते हुए सिनेमा हाल पहुँचते।

दोनों हाल में महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था थी - लेडीज क्लास। हमलोग टिकट लेकर हाॅल में जा बैठते। मैं इन्टरवल में पापड़ और उस फिल्म के गाने की किताब जरूर खरीदती। फिल्म खत्म होते-होते शाम के पाँच बज जाते। घर पहुँचने की जल्दी होती। नाष्ते के लिए झालमूढ़ी और समोसे खरीदकर हमलोग गाड़ी में जा बैठते। बैलगाड़ी घर के लिए चल पड़ती। हमलोग थोड़ा सहज होते और फिर फिल्म के चर्चे के साथ नाष्ता शुरु हो जाता। सबसे पहले फिल्म की कहानी पर चर्चा होती। फिर म्युजिक, कैरेक्टर्स और अंत में बात कास्ट्यूम की आती। कास्ट्यूम पर सबसे लम्बी चर्चा होती क्योंकि कपड़ों का डिजायन, कलर, दुकान और टेलर सब वहीं रास्तें में ही तय होता था। सब तय करते हुए और अगली यात्रा का प्लान बनाते हुए हमलोग घर पहुँत्रते।

एक यात्रा बहुत रोमांचक रही। आषाढ़ का महीना था। खेतों में धान की रोपाई चल रही थी। चित्र मंदिर में परदेसीफिल्म लगी हुई थी। हमलोग फिल्म देखने जाने का कार्यक्रम अभी बना नहीं पाए थे कि मेरे भैया के साले साहब आए और उन्होंने बताया कि परसों फिल्म उतर जाएगी। दूसरे दिन अपने खेत में धान की रोपाई होनी थी। न तो बैल खाली थे और न ही गाड़ीवान। पहले खुषामद भैया की हुई और फिर गाड़ीवान की। दादाजी मोतीहारी जाने का नाम सुनते ही बौखला उठे। माँ के पेट में दर्द है और डाक्टर को दिखाना है, इस बहाने के साथ बड़ी मुष्किल से दूसरे दिन हमलोग मोतीहारी के लिए फिल्म देखने निकल पड़े। पीट-पीट कर वर्षा होने लगी। बैलगाड़ी में लगी तिरपाल की छावनी बौछारों को कितना रोक पाती! भींगते हुए हमलोग सिनेमा हाॅल पहुँचे। टिकट लेकर हाॅल के भीतर गए। फिल्म अभी शुरु नहीं हुई थी। पंखे की हवा में कपड़े सूखे। फिल्म देखकर शाम को लौटते समय एक तो कच्ची सड़क और ऊपर से धारासार वर्षा। पूरी की पूरी गाड़ी कीचड़ और पानी में चलती हुई। डर से आँखें बंद किए हुए जैसे-तैसे हमलोग घर पहुँचे।

उस समय की ज़्यादातर फिल्में ऐसी बनतीं, जिसे पूरे परिवार के साथ देखा जाता था। यूँ कह लीजिए कि ढाई घन्टे सारे दर्षक अपनी उम्र और अपने रिष्तों के अनुसार सिनेमा के चरित्रों में जी रहे होते थे। कभी-कभी पूरा हाल सिसकियों से भर जाता तो कभी ललिता पवार और शषिकला को दी जानेवाली गालियों से। समय बदला। हमारे गाँव से मोतीहारी के बीच पक्की सड़क बन गई। हमारे घर रिक्षा आ गया। अब गाड़ीवान काका की खुषामद नहीं करनी पड़ती। गाँँव के वे लड़के जो पहले दिल्ली जाकर रिक्षा चलाया करते थे, अब गाँँव से मोतीहारी की सवारी बड़े मज़े से ले जाते। अब हमलोग सिर्फ घन्टे भर पहले घर से निकलते और फिल्म देखकर शाम सात बजे तक घर वापस आ जाते। यह सन् सत्तर का दशक था।

युवा वर्ग के लाइफ-स्टाइल पर पूरी तरह फिल्मों का प्रभाव था। वैसे तो पहले भी देव आनंद के हेयर-स्टाइल, प्रदीप कुमार की मूंछों और राजकपूर की मुड़ी मोहरीवाली पैंटों ने बहुतों को अपना दीवाना बनाया था, पर इस दौर की बात ही कुछ और थी। प्रिन्टेड शर्ट, लम्बे बाल और छत्तीस इंच मोहरीवाला बेलबाॅटम गाँँवों तक में अपना जादू फैला रहा था। सन् 75 के बाद मैं अपनी दीदी के साथ मोतीहारी में रहने लगी। मेरी काॅलेज की पढ़ाई शुरु हो चुकी थी। दीदी के साथ फिल्में देखने में खूब मज़ा आता। उनके दोनों बच्चे थोड़े बड़े थे। उन्हें बहला-फुसला कर हमलोग सिनेमा चले जाते। अब घर से सिनेमा हाॅल का सफर छोटा हो गया था। सिर्फ 15 मिनट जाने में और 15 मिनट आने में लगते। वे मेरे जीवन के सुनहरे और मज़ेदार दिन थे। सन् 1982 में मेरी शादी हो गई। पति साहित्यकार के साथ-साथ सरकारी अधिकारी भी हैं। अपने छात्र-जीवन में वे भी खूब फिल्में देखते, लेकिन शादी के समय तक उनकी रुचि सामान्य फिल्मों में नहीं रही। आफिस से आते और सारिकाऔर धर्मयुगके पन्ने पलटने लगते। मैं तो फिल्मी मैगजिन पढ़ने तक को तरस गई। फिर सन् 84 में घर में टेलीविजन आया। सप्ताह में दो फिल्में दिखाई जातीं। मेंरी उन फिल्मों में कोई रुचि नहीं होती क्योंकि वे मेरी देखी हुई होतीं।

.........समय बीतता गया। घर में बच्चे आए। मेरी व्यस्तता बढ़ती गई। तब भी कहीं भीतर एक कसक, पटना में रहते हुए भी फिल्में नहीं देख पाने की, बनी रहती। अब फिल्म मैं तभी देखती हूँ, जब मायके जाने का अवसर मिलता है और वो अवसर बहुत कम मिलता है। यानी वर्ष में एक बार। फिर पति चाहे लाख छटपटाएँ, मैं दो दिन ज़्यादा रुकती हूँ और फिल्में देखकर ही लौटती हूँ। दीदी और भाभी के साथ फिल्में देखने का जो सिलसिला बना, वह बदस्तूर आज भी जारी है।

Monday, October 26, 2009

DDLJ रोमैंटिंक प्रेम का नया आख्‍यान

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
यह एकदम नए परि‍प्रेक्ष्‍य की फि‍ल्‍म थी। यह ऐसे समय में आयी थी जब चारों ओर से रोमैंटि‍क प्रेम पर तरह-तरह के हमले हो रहे थे,रोमैंटि‍क प्रेम का समाज में एक सांस्‍थानि‍क स्‍थान है। गे और लेस्‍बि‍यन से लेकर फंडामेंटलि‍स्‍टों तक, कठमुल्‍ले वामपंथि‍यों से लेकर कठमुल्‍ला स्‍त्रीवादि‍नि‍यों तक सबमें रौमेंटिंक प्रेम के प्रति‍ घृणा देखी जा सकती है। ये सभी रोमैंटि‍क प्रेम को आए दि‍न नि‍शाना बनाते हैं। 'दि‍ल वाले दुल्‍हनि‍या ले जाएंगे' इस अर्थ में नए पैराडाइम की फि‍ल्‍म है क्‍योंकि‍ इसमें रोमैंटि‍क प्रेम का संस्‍थान के रूप में रूपायन कि‍या गया है। उसकी सफलता का रहस्‍य भी यही है। हमारे समाज में स्‍त्रीवादी आंदोलन ने भी रोमैंटि‍क प्रेम पर हमले कि‍ए हैं। जगह-जगह अनेक महि‍ला संगठनों का इस प्रसंग में हस्‍तक्षेप देखने में आया है। स्‍त्रीवादी संगठनों का मानना है रोमैंटि‍क प्रेम स्‍त्री की स्‍वायत्‍तता को छीन लेता है। उसे परनि‍र्भर बना देता है।
रोमैटिंक प्रेम का चि‍त्रण करते हुए फि‍ल्‍म के प्रमुख स्‍त्री पात्र कुछ इस तरह दि‍खाए गए हैं कि‍ वे स्‍त्री की शि‍रकत को बढावा देते हैं। समूची फि‍ल्‍म प्रेम पर नहीं है बल्‍कि‍ रोमैंटि‍क प्रेम के संस्‍थानगत स्‍वरूप के चि‍त्रण पर केन्‍द्रि‍त है। अमूमन हि‍न्‍दी सि‍नेमा में प्रेम कहानी का इस्‍तेमाल खूब होता रहा है,लेकि‍न इस फि‍ल्‍म में प्रेम कहानी नहीं रोमैंटि‍क प्रेम का आख्‍यान पेश कि‍या गया है। रोमैंटिक प्रेम को संस्‍थान के रूप में प्रस्‍तुत करने के कारण ही यह फि‍ल्‍म बार बार देखने को बाध्‍य करती है। फलत: रोमैटिंक प्रेम में युवाओं की शि‍रकत को बढावा देने वाली कल्‍ट फि‍ल्‍म बन गयी। यह ऐसी रोमैंटिंक प्रेम फि‍ल्‍म है जि‍समें हिंसा एकसि‍रे से गायब है। इस अर्थ में यह प्राचीनकालीन महाकाव्‍यात्‍मक रोमांस का भी अपने संचार में इस्‍तेमाल करने में सफल रही है। रोमैंटिंक प्रेम की ताकतवर फि‍ल्‍म होने के बावजूद इसमें कहीं पर भी कामुकता के मुहावरों और पद्धति‍यों का इस्‍तेमाल नहीं कि‍या गया है।
रोमैटिंक प्रेम में कामुकता अन्‍तनिर्हि‍त होती है,कामुकता के बाह्य प्रदर्शनात्‍मक हथकंडों की जरूरत नहीं होती। रोमैंटिंक प्रेम का ऐसा फार्मूला फि‍ल्‍म में इस्‍तेमाल कि‍या गया है जि‍समें स्‍त्री पात्र अपनी स्‍वायत्‍तता ,वि‍वेक , टेलेंट और चारि‍त्रि‍क गुणों की स्‍वायत्‍तता बनाए रखते हैं।
फि‍ल्‍मकार ने इसमें 'कंसर्न' और 'एडमि‍रेशन' पर ज्‍यादा जोर दि‍या है। ये दोनों तत्‍व इसके समूचे कथानक को बांधे रखते हैं। इन दो के अलावा एक्‍सक्‍लुसि‍वि‍टी पर भी जोर है।‍ एक्‍सक्‍लुसि‍वि‍टी के कारण ही नायक-नायि‍का एक-दूसरे के लि‍ए बने नजर आते हैं। कंसर्न का अर्थ है कि‍ आप जि‍से प्‍यार करते हैं उसके कल्‍याण के बारे में भी सोचें। कंसर्न के कारण ही प्‍यार समृद्ध होता है। अभी तक हि‍न्‍दी सि‍नेमा में कंसर्न का चरि‍त्र पि‍तृसत्‍तात्‍मक रहा है। जो संरक्षक हैं,अभि‍भावक हैं वे ही कल्‍याण के बारे में सोचते हैं। इस फि‍ल्‍म में पहलीबार ऐसा चि‍त्रण कि‍या गया है जि‍समें अभि‍भावकों का कंसर्न गौण है ,नायक-नायि‍का का कंसर्न प्रधान है।
कंसर्न या सरोकार प्रति‍स्‍पधी नहीं होते। पात्रों में जेनुइन कंसर्न नजर आता है। आमतौर पर हि‍न्‍दी सि‍नेमा में अभि‍भावकों के कंसर्न पर जोर रहता है यहां पर प्रेमीयुगल के कंसर्न पर जोर है। इस फि‍ल्‍म में नायक-नायि‍का एक -दूसरे से ही प्‍यार नहीं करते, बल्‍कि‍ नायि‍का का अपनी मॉं और पि‍ता से भी प्‍यार है इस अर्थ में प्‍यार की नायक-नायि‍का केन्‍द्रि‍त धारणा को यह फि‍ल्‍म चुनौती देती है । नायक-नायि‍का के प्‍यार के सामने अंत में नायि‍का के माता-पि‍ता समर्पण कर देते हैं। रोमैंटिंक प्रेम में 'प्रमुख' और 'नि‍र्णायक' का केन्‍द्रीय महत्‍व है। यह फि‍ल्‍म प्रेम की फि‍ल्म नहीं है अपि‍तु रोमैंटि‍क प्रेम की फि‍ल्‍म है।शाहरूख पूरी कहानी में प्रधान पात्र है किंतु प्रेम कहानी का वि‍कास कुछ इस तरह होता है कि‍ वह नि‍र्णायक नहीं रह जाता। रोमैंटि‍क प्रेम नि‍र्णायक बन जाता है। नायक अपनी प्रधानता या वि‍शि‍ष्‍टता का प्रच्‍छन्‍नत: इस्‍तेमाल करता है।वह सि‍मरन के घर में हमेशा गैर जरूरी कि‍स्‍म के कामों में उलझा रहता है। ये गैर जरूरी काम ही हैं जो उसकी गति‍वि‍धि‍यों को,उसके प्रेम को अनैति‍क नहीं बनने देते। वह जो काम करता है उन्‍हें लेकर कि‍सी को आपत्‍ति‍ नहीं है। क्‍योंकि‍ वह ऐसा कोई भी काम नहीं करता जो आपत्‍ति‍जनक हो। सि‍मरन के घर में वि‍भि‍न्‍न कि‍स्‍म के कार्यों में शाहरूख खान की सक्रि‍यता प्रेम की एक्‍सक्‍लुसि‍वि‍टी की धारणा को खंडि‍त करती है।
यह फि‍ल्‍म यह संदेश देती है कि‍ एक्‍सक्‍लुसि‍वि‍टी अग्राह्य चीज है। इस अर्थ में रोमैंटि‍क प्रेम में एक्‍सक्‍लुसि‍व प्रेम का आइडि‍या स्‍वास्‍थ्‍यप्रद नहीं है। इसके बारे में सवाल कि‍ए जाने चाहि‍ए। सि‍मरन (काजोल) के प्रति‍ राज (शाहरूख खान) का प्रेम एक-दूसरे के प्रति‍ प्रशंसा और कंसर्न से भरा है। प्रशंसा और कंसर्न के आधार पर ही वे दोनों करीब आते हैं। रोमैंटिंक प्रेम में प्रशंसा अनि‍वार्य तत्‍व है। इसके बि‍ना रोमैंटि‍क प्रेम का आख्‍यान नहीं बनता।
सन् 1995 में यह फि‍ल्‍म आती है। यही वह समय है जब भारत इंटरनेट और सैटेलाइट टीवी क्रांति‍ में व्‍यापक रूप में दाखि‍ल होता है। यह क्रांति‍ इस फि‍ल्‍म को भी प्रभावि‍त करती है। नायि‍का-नायक एक-दूसरे को चाहते हैं,प्‍यार करते हैं, लेकि‍न सि‍मरन की शादी कि‍सी और से तय हो जाती है,जि‍ससे शादी होती है वह भी सि‍मरन के घर आता है किंतु राज इस शादी से खुश नहीं है लेकि‍न यह बात वह छि‍पाता है और भागकर सि‍मरन के साथ शादी करने से इंकार करता है ,वह चाहता है उसके प्रेम को लोग जान जाएं ,खासकर सि‍मरन के पि‍ता (अमरीश पुरी) जान लें, वह उनकी ही अनुमति‍ से शादी करना चाहता है। अंत में कथानक का उसी दि‍शा में वि‍कास होता है। वे दोनों मि‍ल जाएं इसी दि‍शा में सि‍मरन भी प्रयास करती है। रोमैंटि‍क प्रेम में यह मि‍लन और एकीकरण सबसे महत्‍वपूर्ण तत्‍व है और यह तत्‍व तब सबसे ज्‍यादा नि‍खरकर सामने आता है जब सभी की सहमति‍ और स्‍वीकृति‍ हो। कथानक के प्रमुख दोनों पात्रों का मार्ग एक है और वे दोनों प्रेम में सफल होते हैं। रोमैंटिंक प्रेम में यदि‍ दोनों दो अलग रास्‍ते चुनते हैं तो प्रेम असफल होता है। 'दि‍ल वाले दुल्‍हनि‍या ले जाएंगे' का इस अर्थ में महत्‍व है कि‍ नायक-नायि‍का प्रेम का एक ही मार्ग चुनते हैं। हि‍न्‍दी सि‍नेमा में यह फि‍ल्‍म पैराडाइम परि‍वर्तन की सूचना है। रोमैटिंक प्रेम का नया कार्यव्‍यापार सामने आता है। इन दोनों को मि‍लाने में भगवान की मदद नहीं ली जाती।
इस फि‍ल्‍म में जो रोमैंटि‍क प्रेम है वह अपना लक्ष्‍य जानता है,रोमैंटिंक प्रेम के लक्ष्‍यहीन अंत को यह फि‍ल्‍म ठुकराती है। यह ऐसे प्रेम पर बल देती है जि‍समें प्रेमी युगल का प्‍यार एक-दूसरे को प्रसन्‍न रखने पर जोर देता है। यहां भावों के बंधन पर जोर है।संवेदनाओं के बंधन पर जोर है। कामुक बंधन पर जोर नहीं है।
प्‍यार को पुख्‍ता करने का फार्मूला क्‍या है ? इसका कोई फार्मूला नहीं हैं। सि‍मरन जब राज को मि‍लती है तो वह परायी थी। उसके बारे में राज नहीं जानता था। राज की केयरिंग और अच्‍छे व्‍यवहार ने सि‍मरन का दि‍ल जीत लि‍या। संदेश है कि‍ प्रेम के लि‍ए अन्‍य के साथ अच्‍छा व्‍यवहार करना चाहि‍ए। मन से अच्‍छा व्‍यवहार करना बेहद जरूरी है। आप अन्‍य के साथ अच्‍छा व्‍यवहार करेंगे तब ही अपनी प्रेमि‍का के साथ भी अच्‍छा व्‍यवहार करेंगे। राज जि‍न लोगों के बीच रहता है वे सब उसके लि‍ए अन्‍य हैं लेकि‍न उसके अच्‍छे व्‍यवहार में कहीं अंतर नहीं आता यही वजह है कि‍ वह सि‍मरन का दि‍ल जीतता है, उसके परि‍वारवालों का दि‍ल जीतता है। दर्शकों का भी दि‍ल जीतता है। अंत में रोमैटिंक प्रेम का कल्‍ट नायक बन जाता है। और इसी शाहरूख खान ने दि‍लीपकुमार की प्रेमी नायक की छवि‍ का अति‍क्रमण कि‍या है। कुछ हद तक वह संजीवकुमार के प्रेमी नायक के करीब आता है।
रोमैंटिंक प्रेम का अर्थ है आनंद। प्रेमी युगल जब मि‍लें तो एक-दूसरे को आनंदि‍त करें। आंतरि‍क संवेदनात्‍मक आनंद की सृष्‍टि‍ ही रोमैंटि‍क प्रेम की धुरी है। रोमैंटि‍क प्रेम को इस फि‍ल्‍म ने इतना महान इसलि‍ए भी बनाया क्‍योंकि‍ यह फि‍ल्‍म इंटरयुगीन नारे का प्रत्‍युत्‍तर एडवांस में देती है। इंटरयुगीन प्रेम में सेक्‍स ही महान है। आंतरि‍क संवेदनात्‍मक आनंद मि‍ले या न मि‍ले, लगाव हो या न हो, सेक्‍स होना चाहि‍ए। प्रेम की इस थ्‍योरी को यह फि‍ल्‍म अस्‍वीकार करती है। प्रेम के मूलाधार के रूप में सेक्‍स को नहीं आनंद,संवेदनात्‍मक आनंद को महत्‍ता प्रदान करती है। जाहि‍र है ऐसी स्‍थि‍ति‍ में उन औरतों को यह फि‍ल्‍म चि‍ढ़ पैदा करती है जो प्रेम में सेक्‍स खोजती रहती हैं,आकर्षित करके या फुसलाकर पटाकर प्‍यार करती हैं, उन्‍हें यह फि‍ल्‍म गले नहीं उतरती। सेक्‍स नहीं आनंद प्रेम का मूलाधार है।यही मूल संदेश है जो फि‍ल्‍ममेकर देना चाहता है। दूसरा संदेश यह भी है कि‍ यदि‍ प्रेम करना है तो अन्‍य को देखो,अन्‍य को जानने की कोशि‍श करो,अन्‍य की स्‍वीकृति‍ ,अन्‍य का प्‍यार पाने की कोशि‍श करो,अन्‍य को खुश करके आनंद अर्जित करो। हम जानते हैं कि‍ सन् 1990 के बाद से अन्‍य के प्रति‍ अलगाव बढा है। अन्‍य के प्रति‍ बढते बेगानेपन को भोगवाद और उपभोक्‍तावाद ने हवा दी है।‍ इस हवा के खि‍लाफ यह सार्थक हस्‍तक्षेप है।
शाहरूख खान और काजोल ऐसे नायक-नायि‍का के रूप में सामने आते हैं जि‍नके लि‍ए इमोशन्‍स ही तर्क है। इमोशंस ही उनके सार्वजनि‍क तर्क का आधार हैं। ये दोनों नैति‍कता और परंपरा के तर्क से संचालि‍त नहीं होते,जैसा आमतौर पर हम सभी संचालि‍त होते हैं। इमोशन्‍स को अपने तर्क का आधार बनाते ही अथवा इमोशन्‍स के तर्कों का इस्‍तेमाल करते हुए ये दोनों परंपरा,नैति‍कता,मर्यादा आदि‍ के समूचे तर्कशास्‍त्र को चुनौती देते हैं। यह कार्य वे वि‍चारधारात्‍मक तौर पर करते हैं। इसके कारण यह फि‍ल्‍म सबसे ज्‍यादा ध्‍यान खींचने में सफल रही है।
संजीवकुमार, दि‍लीपकुमार, राजकपूर,देवानन्‍द आदि‍ की प्रेम फि‍ल्‍मों में एथॉस हावी रहता है,इसका देरि‍दि‍यन वि‍लोम है पेथॉस जि‍सका बडी खूबी के साथ फि‍ल्‍ममेकर ने इस्‍तेमाल कि‍या है। पहलीबार फि‍ल्‍म में राजनीति‍क सौंदर्य, शहरी सौन्‍दर्य, परंपरागत सौन्‍दर्य सबको एक ही साथ चुनौती मि‍लती है। मि‍श्रि‍त संस्‍कृति‍ का नया सौन्‍दर्यशास्‍त्र इमोशन्‍स के तर्क के आधार पर रचा जाता है।
परंपरा,संस्‍कृति‍, महानगर,अमीर,शि‍क्षि‍त,अशि‍क्षि‍त,जाति‍भेद आदि‍ की दीवारें पंजाब के गांव में जाकर टूटती हैं। भेद की दीवारें गांव में टूटेंगी। यह एकदम नयी धारणा है और अभी तक इस पर कि‍सी ने इतनी ताकतवर फि‍ल्‍म नहीं बनायी थी। नयी आधुनि‍क मि‍श्रि‍त संस्‍कृति‍ की रौमैंटिंक प्रेम कि‍स तरह सृष्‍टि‍ कर सकती है उसे साधारणजन की फैंटेसी बना सकता है,भेद को वि‍रोध करने वाली इतनी ताकतवर अभि‍व्‍यक्‍ति‍ तो सि‍र्फ इस फि‍ल्‍म में ही संभव थी। चूंकि‍ यह समूची फि‍ल्‍म वि‍चारधारात्‍मक और दार्शनि‍क तौर पर पेथॉस के फ्रेमवर्क में बनी है अत: यह हमारी सहानुभूति‍ सहज ही अर्जित कर लेती है। यह सुचि‍न्‍ति‍त भाव से पुराने सौन्‍दर्यबोध को भी नष्‍ट करती है।
यह ग्‍लोबलाईजेशन के आरंभ की फि‍ल्‍म है इसमें सहजभाव से 'अमेरि‍की संवेदनात्‍मकता' अन्‍तर्ग्रथि‍त है। अमेरि‍की टीवी संचार की मूल दि‍शा सेंटीमेंटल इमेजों पर केन्‍द्रि‍त रही है। फि‍ल्‍म के नायक-नायि‍का रोमैंटि‍क प्रेम की सेंटीमेंटल इमेज का एकदम नया रूप तैयार करते हैं। यह उस 'अंतराष्‍ट्रीय संचार फ्लो' का अभि‍न्‍न हि‍स्‍सा है जि‍सने सारी दुनि‍या में सद्दाम के खि‍लाफ सेंटीमेंटल इमेजों को प्रक्षेपि‍त कि‍या ,समाजवाद के खि‍लाफ सेंटीमेंटल टीवी इमेजों को प्रक्षेपि‍त कि‍या। सेंटीमेंटल इमेजों के इस अंतर्राष्‍ट्रीय संचार फ्लो को बडी ही सुंदरता के साथ रोमैंटि‍क आख्‍यान में पि‍राने में फि‍ल्‍ममेकर को सफलता मि‍ली। ये ऐसी इमेजें हैं जो सहानुभूति‍ नहीं चाहतीं बल्‍कि‍ अपने इमेजों के प्रवाह में बहाए लि‍ए चली जाती हैं। अंतर्राष्‍ट्रीय मीडि‍या ने सेंटीमेंटल इमेजों को राजनीति‍क संचार के लि‍ए इस्‍तेमाल कि‍या , सेंटीमेंटल इमेजों को दर्शकों की राष्‍ट्रवादी भावनाओं को भडकाने के लि‍ए इस्‍तेमाल कि‍या।
इसके वि‍परीत 'दि‍लवाले दुल्‍हनि‍या ले जाएंगे' के फि‍ल्‍ममेकर प्रेम के संदेश के संचार और भेद की दीवार के लि‍ए सेंटीमेंटल इमेजों का इस्‍तेमाल कि‍या। इस तरह वह अंतराष्‍ट्रीय संचार फ्लो का हि‍स्‍सा बन गया और यह फि‍ल्‍म देश-वि‍देश सब जगह हि‍ट हो गयी।
आज के युग में फि‍ल्‍म या संचार की सफलता के लि‍ए इमेजों के अंतर्राष्‍ट्रीय फलो के साथ संगति‍ का होना बेहद जरूरी है। यह फि‍ल्‍म अंतर्राष्‍ट्रीय फ्लो की एक अन्‍य चीज को आत्‍मसात करती है। वह है फीलिंग ही सूचना,सूचना ही फीलिंग है। राज और सि‍मरन की फीलिंग ही सूचनाएं पैदा करती हैं। इस फि‍ल्‍म में वि‍भि‍न्‍न पात्रों की फीलिंग के माध्‍यम से ही सूचनाएं संप्रेषि‍त होती हैं। फीलिंग के आधार पर ही सूचनाओं की शक्‍ति‍ का अंदाजा लगाया जाता है। सैटेलाईट टीवी के आने बाद से यही बुनि‍यादी नीति‍ रही है वि‍श्‍व संचार की। सार्वजनि‍क परि‍दृश्‍य हो,सार्वजनि‍क वि‍वाद हों,राजनीति‍क वि‍वाद हों, घरेलू वि‍वाद हों, इत्‍यादि‍ सभी चीजों की प्रस्‍तुति‍ का मूल मंत्र है फीलिंग ही सूचना है,सूचना ही फीलिंग है। इस प्रक्रि‍या में जब आप शामि‍ल हो जाते हैं तो अवि‍वेकवाद के सामने नि‍हत्‍थे होते हैं। यही ग्‍लोबलाईजेशन का लक्ष्‍य भी है, वह चाहता है कि‍ हम अवि‍ववेकवाद के सामने वि‍वेकवाद के अस्‍त्रों से लैस नजर नहीं आएं।
DDLJ पर बारहवां लेख

DDLJ किसी को आहत नहीं करती

- मृणाल वल्लरी

डीडीएलजे की चर्चा पढ़के मन थोड़ा रूमानी हो गया। यकीन नहीं होता कि डीडीएलजे चैदह साल पहले की बात है। वह साल स्कूल में मेरा आखिरी साल था। यानी अगले साल से कॉलेज में जाना था। पटना जैसे शहर में आज से चैदह साल पहले हमें अपनी सहेलियों के साथ सिनेमा हॉल जाकर फिल्म देखने की इजाजत नहीं थी। लेकिन डीडीएलजे देखने की हमारी हसरत लोकल केबल वाले ने पूरी कर दी। मंैने मोहल्ले की सभी दोस्तों के साथ बैठ कर फिल्म देखी। पिक्चर क्वालिटी थोड़ी खराब जरूर थी और संवादों के साथ घर्र-घर्र की आवाज भी आ रही थी। लेकिन ये बात अब समझ में आती है। उस वक्त तो उसी पिक्चर क्वालिटी में राज हमारे दिलों पर राज कर रहा था। कहीं एक लेख में मैंने पढ़ा था कि पायरेसी आपका दोस्त है। सच है, अगर पायरेटेड सीडियां नहीं रहतीं तो...।


स्कूल के खाली पीरियड में जिनका गला अच्छा था, वह गाने लग जातीं- मेरे ख्वाबो में जो आए... और हम सभी ब्लैक बोर्ड के पास डांस करना शुरू कर देतीं। हर ग्रुप में चर्चा के केंद्र में थे सिमरन और राज। किसी के साथ कुछ भी हुआ तो डायलॉग निकलता- बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें हो जाया करती हैं। हद तो तब हो गई जब टीचर्स डे पर सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान हमने स्कूली परंपरा के उलट पारंपरिक वेशभूषा में भोजपुरी और देशभक्ति गीतों को छोड़ कर छोटे स्कर्ट पहन कर- मेरे ख्वाबों में आए...और मेहंदी लगा के रखना.. पेश किया। लेकिन इस खता के लिए हमें इतनी मामूली डांट मिली जिसे आसानी से भुलाया जा सकता था।

हां, इन्हीं दिनों लड़कियों को एक नया नाम मिला- सिमरन। हमारी पीढ़ी की श्वेता, एकता, संगीता, प्रियंका खुद में एक सिमरन को ढूंढ़ रही थी। फिल्म के रिलीज होते ही बाजार में काजोल का पहना ट्यूनिक स्कर्ट और पैरलल सूट भी आ गया था। काजोल ने नेक्स्ट डोर गर्ल वाले लुक को फैशन बनाया। खास था काजोल का चश्मा पहनना। अब ड्रीमगर्ल बनने के लिए अपने चश्मे पर शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं थी। भई सिमरन ने जो पहना था। हम स्कूल ड्रेस के अलावा जो पहनते उस पर सिमरन की छाप थी।

हमारे फ्रेंड सर्किल में कोई लड़की अगर अपने ब्यॉयफ्रेंड-नुमा लड़के को कुछ खत-वत भेजती तो अपना छद्म नाम सिमरन ही रखती। छोटे शहरों की लड़कियों के लिए सिमरन एक आइकन थी। उस दौर में हम टीनएजर्स लड़कियां अपने ख्वाबों में सिमरन थीं। अपने बाबूजी और भैया से डरते हुए भी...। सबसे मजेदार था पलट...। स्कूल से लेकर कॉलेज तक डीडीएलजे का पलट... वाला फार्मूला साथ था। एक हिप्पोक्रेसी की तरह हम पलट... वाला शगुन मानते थे। इस खुशनुमा मौसम में डीडीएलजे की याद सचमुच खुश कर गई...।

और जब शगुन का वह “सिक्का” पलटता है...

यह तो थी स्कूल के दिनों की बात। लेकिन आज चौदह साल बाद क्या मैं डीडीएलजे को उसी तरह देख पाती हूं। आखिर डीडीएलजे की याद आते ही फिल्म का पहला हिस्सा ही क्यों याद आया। फिल्म की शुरुआत होती है यूरोप के टूर से। एक बंद परिवेश की लड़की को यूरोप घूमने का मौका मिलता है। फिल्म के पहले हिस्से के सामंती सोच का बाबूजी उसे जाने की इजाजत नहीं देते हैं। बाबूजी ने सब कुछ अपनी मेहनत से अर्जित किया है। दो बेटियों के बाप हैं। घर में तीन स्त्री चरित्र हैं, जिन पर बाबूजी हावी हैं। उन्हें पता है इन लड़कियों को दुनियादारी की समझ नहीं है। लेकिन उसी बंद परिवेश में रहने वाली मां अपनी बेटी की मदद करती है। घर के सामंती चरित्र की पीड़ा उसके चेहरे पर भी दिखती है। वह चाहती है कि उसकी बेटी अपने पंख फैलाए। मुझे लगता है कि एक छोटे शहर की स्कूल जाने वाली लड़की इसी सिमरन से खुद को एसोसिएट कर रही थी।

फिल्म आगे चलती है। फिल्म में आगे भी एक सिमरन है। अब वह चश्मा नहीं पहनती है। अब उसकी जिंदगी का लक्ष्य शादी है। अब कॉलेज, करियर जैसी चीज नहीं है। पंजाब में सिमरन का मेकअप भी पारंपरिक हिंदी सिनेमा की अभिनेत्रियों-सा है। वह करवा चौथ का व्रत रख रही है। व्रत तोड़ने के बाद पानी पिएगी तो उसी के हाथ से, जिसे अपने मन में पति-परमेश्वर मान चुकी है। इस प्री-पतिव्रता सिमरन के प्री-पतिवर्त धर्म की रक्षा के लिए भी स्पेस मौजूद है। सिमरन का बेहोश होना और राज का पानी पिलाना...।

पंजाब के गांव में आया राज भी बदल गया है। यूरोप वाले राज को किसी की नाक अच्छी लगती थी तो किसी के बाल। वह सोचता है कि कैसे किसी एक के साथ जिंदगी बिताई जा सकती है। इस सोच वाले राज का चरित्र कमिटमेंट वाले राज में बदलता है। अब वह किसी एक को पाने की ही लड़ाई लड़ रहा है। वह कहता है कि भगा के नहीं ले जाऊंगा। "दिल जीत के" ले जाऊंगा। आखिर अब सबका दिल जीतना जरूरी क्यों है। सामंती व्यवस्था में अपने प्यार को खोता हुआ राज अपने प्यार को पाने के लिए उसी सामंती व्यवस्था का हिस्सा बनता है। सबका दिल जीतने की कोशिश करता है।

इसके साथ ही फिल्म के आखिरी हिस्से में पिता का "हृदय परिवर्तन" होता है। वह इसलिए कि उसे इस बात का अहसास होता है कि "यही वह लड़का है" जिसके हाथों में उसकी बेटी की जिंदगी सुरक्षित रहेगी। "यही वह मर्द है" जिसके हाथों में बाबूजी अपनी "इज्जत," यानी अपनी सिमरन को दे सकते हैं। जिस राज के हाथ में सिमरन का हाथ सौंपा गया है, वह यूरोप टूर वाला राज नहीं है। वह एक ऐसा "मर्द" है जो सामंती व्यवस्था में शादी के लायक लड़का होने की काबिलियत रखता है। यानी गुड हसबैंड मटीरियल। राज की यह काबिलियत साबित होते ही बाबूजी के सामंती चरित्र "लोकतांत्रिक"-सा दिखता है। यानी अपनी बेटी की पसंद पर अपनी पसंद की मुहर लगाना।

इसी से इस सामंती पिता की एक "लोकतांत्रिक" छवि बनती है। ऐसे बाबूजी थिएटर में बैठे लड़की, उसके पिता सभी को प्रभावित करते हैं। हाल ही में इस फिल्म पर चर्चा करते हुए मेरे एक दोस्त ने कहा कि इस फिल्म की खासियत यही है कि यह किसी को आहत नहीं करती है। अपने-अपने खोल में छिपा दर्शक इसे देख खुश होता है। आज चौदह साल बाद मैं भी इस फिल्म की व्यावसायिक सफलता के पीछे इसे ही सबसे बड़ी वजह मानती हूं।

DDLJ पर ग्‍यारहवां लेख

Sunday, October 25, 2009

DDLJ के जादू का बाकी है असर

-प्रशांत प्रियदर्शी

आजकल जिसे देखो वही डीडीएलजे की बातें कर रहा है.. करे भी क्यों ना? आखिर इसने चौदह साल पूरा करने के साथ ही जाने कितने ही लोगों और लगभग दो पीढि़यों को प्यार करना सिखाया होगा.. चलिये सीधे आते हैं अपने अनुभव के ऊपर..

उस समय हमलोग आधा पटना और आधा बिक्रमगंज में रहते थे.. पापा बिक्रमगंज में पदस्थापित थे और हम बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के चलते एक घर हमें पटना में भी लेकर रखना पड़ा था, क्योंकि बिक्रमगंज में " केंद्रीय विद्यालय" नहीं था.. उस समय हमारे घर में सिनेमा हॉल जाकर फिल्म देखने का प्रचलन लगभग ना के बराबर ही था और डीडीएलजे से पहले हमने अंतिम बार किसी सिनेमा हॉल में जाकर सिनेमा कब देखा था यह भी मुझे याद नहीं है.. हमलोग नये-नये जवान होना शुरू हुये थे और इस सिनेमा के आने से घर में हमारी जिद शुरू हो चुकी थी कि इसे देखेंगे तो सिनेमा हॉल में ही..

स्कूल में कई लड़के स्कूल से भागकर यह सिनेमा देखने जाते थे.. जिस दिन उन्हें स्कूल से भागकर सिनेमा देखना होता था उससे एक दिन पहले ही सभी मिलकर प्लानिंग करते थे.. शायद 10 साल बाद आये रौबिन शर्मा के उपन्यास(द मौंक हू सोल्ड हिज फरारी) का एक पंच लाईन वे उसी समय समझ गये जिसे रौबिन शर्मा को समझने में 10 साल और खपाना पड़ा.. "If you fail to plan, means you are planning to fail.." और उनका प्लान कभी फेल होता भी नहीं था.. वे पैसे का इंतजाम कहां से करते थे, यह भी मुझे नहीं पता चलता था और ना ही इतनी हिम्मत थी की स्कूल से भागकर उनके साथ सिनेमा देखने जा सकूं.. उन दिनों हर दिन कोई ना कोई नया डायलौग हमारे सामने होता था और हर लड़की'सेनेरिटा' होती थी.. अगर कोई अच्छी लग रही है तो वह 'सेनेरिटा'.. अगर किसी का नाम नहीं जानते हैं तो वह'सेनेरिटा'.. राह चलते कोई दिख जाये तो वह 'सेनेरिटा'..

खैर घर में पापा को मनाया गया.. पापाजी मान भी गये.. संयोग से उस समय पापाजी पटना आये थे और हमारे जिद के आगे झुक कर रिजेंट सिनेमाहॉल की ओर भी बढ़े.. आज भी उस रोमांच की याद ताजा है, क्योंकि जाने कितने ही साल के बाद सिनेमाहॉल के दर्शन होने वाले थे.. ना हमे पता था और ना ही पापा जी को, कि पटना के सिनेमा हॉल के टिकट के लिये कैसी मारा-मारी होती है.. सो बिना अग्रिम बुकिंग किये ही हम वहां पहूंच गये थे, और टिकट वाली खिड़की पर हाउसफुल का बोर्ड हमारा मुंह चिढ़ा रहा था..

वहीं एक बच्चा मिला जो टिकट ब्लैक कर रहा था.. अधिक से अधिक 12-13 साल का होगा.. उसने बताया की उसके पास फर्स्ट क्लास का टिकट है.. हम सभी खुश, वाह जब नाम ही है फर्स्ट क्लास तो सीट भी आरामदायक होगा.. 15 रूपये प्रति टिकट ले कर हम सिनेमाहॉल के अंदर गये.. अंदर जाने पर पता चला की अच्छा फर्स्ट क्लास हॉल के सबसे आगे वाली सीट को कहते हैं.. बामुश्किल हम वहां 15-20 मिनट बैठे और उसके बाद वहां बैठे लोगों के हुल्लड़ हंगामे के चलते हमें बाहर का दरवाजा देखना पड़ा.. जब हम वहां से उठकर जा रहे थे तब वहां के सभी लोगों की नजर हम पर ही थी कि पूरा परिवार अचानक से क्यों जा रहा है..

घर में जाने कितने ही दिनों तक इसके गाने बजते रहे.. इसकी ऑडियो सीडी भी खरीदी गई जिसकी कीमत तब शायद 275 रूपये थी.. उन दिनों भैया को विडियो कैसेट खरीद कर जमा करने का नया-नया शौक जागा था.. वे इंतजार में थे कि कब इसका ओरिजिनल कैसेट बाजार में आये और इसे खरीदा जाये.. उन दिनों सिनेमा और संगीत के बाजार में गहरी हलचल मची हुई थी.. लोग वीसीपी और वीसीआर से वीसीडी प्लेयर की ओर जा रहे थे.. कैसेट की जगह सीडी ले रहा था.. इन्ही सबके बीच जाने कब डीडीएलजे का ओरिजिनल कैसेट बाजार में आया और गुम हो गया.. आज हाल यह है कि कम से कम बीस बार यह सिनेमा देखने के बाद भी जब कभी किसी चैनल पर यह आ रहा होता है वहां रिमोट कुछ क्षण के लिये ठिठकता जरूर है.. मगर यह सिनेमा इतनी आसानी से उपलब्ध होने के बाद भी आज मेरे एक्सटर्नल हार्ड डिस्क में नहीं है जिसमें कम से कम 250-300 सिनेमा पड़ी हुई है..

चाहे कुछ भी हो, मगर इस सिनेमा के जादू का असर अब भी कहीं ना कहीं बाकी जरूर है जिसने होश संभालने के बाद सिनेमा हॉल का दर्शन भी कराया और उसके बारे में जिज्ञास भी जगाई.. इसके जादू के असर कितना था यह आप इससे जान सकते हैं कि जब मैं तमिलनाडु आया तब किसी भी स्थानिय व्यक्ति से, जो हिंदी नहीं जानता था, आप हिंदी गाना गाने के लिये कहेंगे तब वह टूटी-फूटी हिंदी में "तुझे देखा तो ये जाना सनम" ही सुनायेगा..

DDLJ पर दसवां लेख,और भी हैं

DDLJ हम न थे ‘राज’ और और न वो थी ‘सिमरन’

-विनीत उत्‍पल

राष्ट्रीय सहारा में वरिष्ठ उपसंपादक विनीत उत्पल अपने नाम से ब्लॉग का संचालन करते हैं। राजनीति, सामाजिक, संस्कृतिक सहित विभिन्न विषयों पर लगातार लेखन करने वाले विनीत अनुवादक भी हैं। मैथिली और हिंदी में कविता भी लिखते हैं.

अब जब फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाए जायेंगे’ की बात उठी है तो जिन्दगी के अतीत के झरोखे से रूबरू होना ही पड़ेगा। वरना इतने फिसले, इतने उठे, गिर-गिरकर उठे कि शाहरूख़ खान की जीभ भी उस कदर पूरी फिल्म में नहीं फिसली होगी।
साल था 1995, पर मुंगेर जिले के तारापुर कस्बे में यह फिल्म जब लगी तब 1996 आ चुका था। पोस्टर देखता तिरछी आँखों से, क्योंकि जिस कल्पना सिनेमा हाल में यह फिल्म लगी थी उसके मेन गेट के पास शहर की सबसे बड़ी कपड़े की दुकान ‘जियाजी शूटिंग’ थी, जहां हमेशा कोई न कोई परिचित बैठा रहता। यह वह दौर था जब छोटे शहरों में फिल्म देखना अच्छा नहीं माना जाता। हमारे उम्र का कोई फिल्म देखने जाता तो लोग कहते, ‘वह तो ‘लफुआ’ हो गया है। आखिर और लोगों की तरह काजोल और शाहरूख़ मुझे भी अच्छे लगते। यह वही समय था जब लोगों की जुबान पर छाया था, ‘बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं।’
फिर उसी साल तो इंटर पास किया था। पापा की सख्ती के कारण शायद ही कोई दोस्त था उस तारापुर में। हां, राजेंद्र तो इंटर की पढ़ाई के दौरान कब अच्छा दोस्त हो गया, पता ही नहीं चला। हमारी दोस्ती पढ़ाई और कॉलेज आने-जाने तक ही सीमित थी। वह हमेशा छाया की भांति हमारे साथ रहता। जिस कॉलेज में पापा टीचर थे वहीं से इंटर की पढ़ाई करने के कारण अनुशासन में रहना मजबूरी थी। सभी टीचर ‘चाचा’ होते और सभी स्टाफ ‘भैया’ और मैं सभी के लिए ‘बौआ’। फिर छोटे से शहर होने के कारण सभी पहचान के ही थे। ऐसे में ‘सिमरन’ को ढूंढ़ना और ‘राज’ बनना तो दूर की बात थी।
आखिरकार राजेंद्र के घर पर पायरेटेड सीडी के जरिए डीडीए लजे देखी। और इसके बाद तो हमारी दुनिया ही बदल गई। फिर क्या था, आवारा मन हर तरफ ‘सिमरन’ को गलियों, सड़कों, कॉलेजों सहित तमाम जगह ढूंढ़ता, लेकिन भागलपुर से लेकर दिल्ली तक में चाहे तिलकामांझी भागलपुर विश्वविघालय में पढ़ाई के दौरान की बात हो या दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया, भारतीय विघा भवन या गुरू जम्भेश्वर विवि में पढ़ाई के दौरान के पलों की कहानी हो, न ‘राज’ मैं बन सका और न ही कोई ‘सिमरन’ ही मिली।
उसी दौरान सुना कि बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को ‘मेरे ख्वाबों में जो आये...’ गाना काफी अच्छा लगता है। फिर क्या था, फिर से इस गाने को सुनने और विडियो देखने के लिए जी मचल उठा। अब काजोल मुझे और अच्छी लगने लगी और समझ में आ गया की लालू यादव को सपने में और कोई नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की कुर्सी आती है।
हालांकि मेरे मन में उस वक्त और तो कोई नहीं, वह लड़की जरूर आती जो मेरे साथ सातवीं से दसवीं तक पढ़ाई की थी। याद इसलिए आती कि वह और मैं हमेशा क्लास में अव्वल होते, याद इसलिए आती कि वह अपने में मस्त रहने वाली क्लास की सबसे सुन्दर लड़की थी, याद इसलिए आती कि क्लास में मैं ए कलौता लड़का था जो उसके घर जा सकता था, याद इसलिए आती क्योंकि भूख लगने पर पूरे स्कूल में मैं ही था जो उसके टिफिन का खाना खा सकता था।
याद इसलिए भी खासकर आती चार साल की आयु में उसे पोलियो हो गया था लेकिन दवा और अपनी जुझारूपन प्रवृति के कारण ऐसी चलती जैसे उसे कोई तकलीफ ही न हो। याद आती कि यदि उसने यह फिल्म देखी होगी तो कौन ‘राज’ आए गा उसकी जिंदगी में।
पिछले चौदह सालों में ना जाने कितनी बार अकेले या अपने परिवार के साथ यह फिल्म देखी और यह हर बार नया लगता है। फिल्म देखते वक्त सपनों में खो जाता कि ऐसा तो हमारा गांव भी है लेकिन हमारे गांव में तीज तो होता है लेकिन करवाचौथ नहीं होता। घर के लोगों से पूछता, आस-पड़ोस के लोगों से, चचेरी भाभियों से पूछता कि हमारे यहां करवाचौथ क्यों नहीं होती, लेकिन सटीक जवाब नहीं मिलता। तीनों बहनों की शादी हुई लेकिन डीडीए लजे फिल्म की तरह शादी में डांस नहीं हो सका और न ही किसी से आंखे लड़ सकी।
हां, यह पोलियो वाली लड़की उस वक्त तक भागलपुर में मेरे घर के पास ही आ गई थी, तो उससे बात होती रहती। लेकिन बस महज एक दोस्ती भर। कुछ साल पहले जब भागलपुर गया था तो मालूम चला कि उसके घर वालों ने उसकी शादी तय कर दी। संयोगवश, बाजार में मुलाकात हो गई तो उसने शादी का निमंत्रण दे डाला और कहा, ‘तुम मेरे अच्छे दोस्त बचपन से रहे हो,’ जरूर आना। मेरे ख्वाब मिट्टी में मिल गए और उसकी शादी हो गई लेकिन मैं दिल्ली से शादी में धनबाद नहीं सका।
उस वक्त तक मैं पढ़ाई पूरी कर ‘दैनिक भास्कर’ के इंदौर और रायपुर में नौकरी कर एक नए संघर्ष की इच्छा के साथ फिर वापस दिल्ली आ चुका था। रायपुर में रहते वक्त दिल्ली में रहने वाली एक लड़की का फोन अक्सर आता रहता। कभी किसी पल लगा कि मुझे मेरी ‘सिमरन’ मुझे दिल्ली पुकार रही है और फिर जो होना था वह हो ही गया। दिल्ली में कुछ दिनों तक फ्रीलांसिंग फिर नई नौकरी। अब हर शाम साथ में घर लौटते, सारा जहां की बातें होतीं। मुझे ‘सिमरन’ का सहारा मिल चुका था और मैं उसका ‘राज’ था।
अक्सर, उन पुरानी यादों में खो जाता हूं। एक साथ आंखों के सामने डीडीएलजे का सीन घूमता है तो दूसरी तरफ आती है ‘सिमरन’ की याद। क्योंकि उसकी कहानियों के साथ छपती थी मेरी कहानियां, छपते थे मेरे लेख। पहली बार किसी लड़की ने कहा था, ‘तुम कितने लकी हो जो हमेशा साथ रहती है तुम्हारी गर्ल फ्रेंड’। पहली बार किसी मॉल के मल्टीप्लेक्स में देखी थी लड़की के साथ हॉलिवुड की ए क फिल्म जिसे बाद में मिला उस साल की सबसे बकवास फिल्म का खिताब। अक्सर याद आते हैं वो शाम जब दोनों घर लौटते हुए कभी किसी कलाकार की पेंटिंग देखने जाते थे एक साथ, भूख लगने पर रेस्तरां में करते थे नास्ता और खाते थे खाना। याद आती है दिल्ली की वो सुहावनी शाम जब पैदल चलते हुए न जाने कहां से कहां पहुँच जाते थे, फिर हंसते थे अपनी वेवकूफी पर।
हालांकि अरसे बाद अब याद करता हूं तो लगता है तमाम बातें तो महज एक सपना था। आखिर हम न थे ‘राज’ और और न ही वह थी ‘सिमरन’। हम तो काफी पहले फिल्म देख चुके थे ‘तीसरी कसम’ जिसमें हीरामन से हीरोइन को बिछड़ना ही थी। उसी गंगा और कोशी का पानी हम दोनों ने पीया था, जिसकी पानी ‘रेणु’ ने भी पी थी और ‘गीतकार शैलेंद्र’ के पूर्वज भी तो उसी मिट्टी में पैदा हुए थे। लोगों की नजर लग गयी हमारी दोस्ती पर या फिर हमने लगातार गलती की थी।
हमारी राहें जुदा हो गईं, बातचीत बंद हो गई। आखिर बार किसी साल इसी अक्तूबर को फोन पर बात हुई, छोटी-सी बहस हुई और फिर ‘सिमरन’ और ‘राज’ के सपने मोबाइल फोन की तरंगों में उलझ कर कहीं खो गए , आसुओं से बिछावन भींग गए और मेरे साथ शायद उसके भी सपने चूर-चूर हो गए। हमारी फिल्म डीडीए लजे की स्क्रिप्ट के आखिर पन्ने या तो कहीं चोरी हो गए या समय के थपेड़ों के साथ हवाओं में गुम हो गए। वो सुनहरे पल महज रील में ही रह गई, रियल में नहीं बदल पाई।
वाकई, इस खुशनुमा मौसम में डीडीएलजे की याद सचमुच खुश कर गई लेकिन...।

Saturday, October 24, 2009

DDLJ लाइन मारना तो शाहरुख ने ही समझाया था....

-सुशांत झा
घर से नजदीकी शहर मधुबनी 35 किलोमीटर दूर था, अकेले जाने की इजाजत अक्सर नहीं मिलती थी जब डीडीएलजे का वक्त आया था। बिहार बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में जब फर्स्ट क्लास में पास हुआ तो अचानक इज्जत बढ गई, मधुबनी अकेले जाने का पासपोर्ट मिल गया-जो हमारे लिए उस वक्त कैलिफोर्नियां से कम नहीं था। उससे पहले सिनेमा का मतलब गांव का वीसीआर और दूरदर्शन पर आनेवाला सिनेमा था जो दरभंगा के कमजोर टावर की वजह से अक्सर डिस्टर्व आता था। हम कड़ियों को जोड़-जोड़ कर सिनेमा का अनुमान लगाते थे। गांव में छिटपुट घरो में टीवी आई था जो बिजली न होने की वजह से बैटरी से देखी जाती था और बैटरी चार्ज कराकर लानेवाले और टीवी चलाने वाले की इज्जत आईआईटी इंजिनियर से कम नहीं थी। हमें टीवी पर रंगोली, चित्रहार और सप्ताह में एक फिल्म देखने की इजाजत थी, इससे ज्यादा देखने पर आवारा का तमगा निश्चित था। रामायण के वक्त शायद 89 या 90 में जब मेरे बड़े चाचा जो स्कूल में मास्टर थे ने टीवी लाया था तो उनका दावा था कि उनका टीवी दुनिया का बेहतरीन ब्रांड है और मुजफ्फरपुर दुनिया का सबसे अच्छा शहर। वजह? उन्होने मुजफ्फरपुर से टीवी लाया था जहां उनके दामाद बैंक में मैनेजर थे। हमारे मनोरंजन की दुनिया में थोड़ी आफियत तब आई जब नेपाल दूरदर्शन से हर सप्ताह बेहतरीन फिल्मों का प्रसारण शुरु हुआ, उसका टावर मजबूत था और साफ दिखाई देता था। उस समय तक मैं तमाम कुमारों के साथ धर्मेंन्द्र, राजेश खन्ना और थोड़ा-2 अमिताभ बच्चन को ही हीरो मानता था। बाकी सब तो....जोकर जैसे लगते थे। मेरे फूफाजी राजेंद्र कुमार को देखकर सेंटी हो जाते॥मानो गांधी बाबा आ गए॥बोलते देखो हीरो तो ये है अकेले पूरा स्क्रीन छाप लेता है।

बहरहाल हम बोर्ड परीक्षा पास कर मधुबनी आए जहां मेरे एक चचेरे भाई ने जो आजकल एमपी पुलिस में पता नहीं क्या हैं लेकिन बहुत माल कमाए हैं(भोपाल में दो-दो मकान है) ने डीडीएलजे देखने का प्रस्ताव रखा। मैंने फौरन हामी भर दी। इससे पहले मैने शाहरुख खान को दीवाना में गांव के दुर्गापूजा में वीसीआर पर देखा था जो काफी शैतान जैसा दिखता था। मेरे गांव की एक लड़की ने उसे लुच्चा जैसा कहा था-ये बात तो बाद में समझ में आई कि लड़किया जब किसी को बहुत पसंद करती है तो ‘लुच्चा’ कहती है!

मेरे घर में मायापुरी, फिल्मी कलियां और पता नहीं कौन- कौन सी पत्रिकाएं आती थी जिसमें एक बार शाहरुख ने हेमामिलिनी के निर्देशन कौशल पर अपनी पहली ही फिल्म में सवाल उठा दिया था। हम नाराज हुए थे कि ससुरा घमंडी लगता है।

लेकिन इमानदारी की बात यहीं है यारों कि डीडीएलजे ने पहली बार हमें जवान होने का एहसास कराया था। हमें लगा कि बिना मूंछ-दाढ़ी हुए भी प्यार किया जा सकता है...पढ़ाई में फेल होने के बावजूद ये पूण्य काम किया जा सकता है। हमने आते ही अपने पापा में अनुपम खेर की शक्ल तलाशी थी जिसमें कहना न होगा हमें सौ फीसदी निराशा हाथ लगी।

मेहरवानों...कदरदानों और टिप्पणीदानों...उसके बाद शाहरुख खान नामके आदमी का ऐसा शुरुर अपन पर छाया कि हम उसकी सारी फिल्में देखते गए सिर्फ अशोका के वक्त उसको गाली दी। ससुरा, हकलाकर राजमाता के साथ ऐसा बात करता था मानो सम्राट अशोक न होकर करोलबाग का राज मलहोत्रा हो। हमने उस जमाने में 25 रुपया ब्लैक में पटना के मोना सिनेमा में गांधी मैदान के किनारे सेकेंड हैंड उपन्यास खरीदने के बाद 9 वीं बार डीडीएलजे देखी जब एक अमेरिकन डालर 20 रुपये का आता था।

बादबाकी तो विनीत और चंडीदत्त शुक्ल ने इतना लिख दिया कि स्कोप खत्म है। सच में बहुत दिन जिएगा शाहरुखवा....बहुते दिन जिएगा।
DDLJ पर आठवां लेख

DDLJ चौदह साल बाद हॉल में देखनी

-रघुवेन्द्र सिंह

दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे हम पहिली बार कब देखनी? इ याद ना ह, लेकिन एतना पता ह कि जब ए फिलिम के हम पहिली बार देखनी तबसे इ हमार फेवरेट हो गइल। अब तक हम डीडीएलजे के टीवी पर अनगिनत बार देख भयल हंई, लेकिन हमरे मन में हमेसा अपने ए फेवरेट फिलिम के सिनेमा हॉल में न देख पउले क पछतावा अउर दुख रहे। डीडीएलजे जब रिलीज भइल रहे तब हम गांव में रहनीं। शहर में फिलिम देखे जाए क परमिशन हमहन के कब्बो ना मिले। सच कहीं त डीडीएलजे हमरे सहर में कब लगल रहे, हमके पते ना ह। काहें से कि तब हम छोट रहनीं। शुक्र हो, फिलिम रिपोर्टर के नौकरी के, जेकरे वजह से हमके इ फिलिम अब हॉल में देखले के सौभाग्य मिलल, और शुक्र हो मराठा मंदिर हॉल के करता-धरता लोगन के, जे चौदह साल बाद भी अपने इहां इ फिलिम के चलावत हवें।

पन्द्रह अक्टूबर दो हजार नौ के दिने ऑफिस से डीडीएलजे पर इस्पेसल इस्टोरी करे क जिम्मा दिहल गइल। हम और हमार सहकर्मी मिलके इ फैसला कइनी जा कि पहिले हॉल में चलके फिलिम देखल जाइ ओकरे बाद इस्टोरी लिखल जाइ। एही बहाने हॉल में डीडीएलजे देखले क हमार पेंडिंग ख्वाहिश भी पूरी हो जाई। मराठा मंदिर में डीडीएलजे चौदह साल से चलत हिय, इ त पता रहे, लेकिन केतनी बजे क शो रहेला, इ ना पता रहे। आजकल के फिलिम के विज्ञापन के तरह डीडीएलजे के अखबार में विज्ञापन भी ना छपेला कि देखके शो क टाइम पता क लिहल जा। सो, इ फैसला भइल कि अगले दिन हमहन सीधे हॉल पहुंच जाएके।

दूसरे दिन सुबह दस बजे के करीब हमरे सहकर्मी के फोन आइल कि साढ़े ग्यारह बजे क शो ह अउर रोज खाली एक्के शो होला। हमरे समझ में ना आइल कि अब का करीं? काहें से कि हमरे इहां से मुंबई सेन्ट्रल पहुंचले में कम से कम डेढ़ घंटा क समय लगेला। भागत-भागत कइसहूं हम मुंबई सेन्ट्रल स्टेशन पहुंचनीं और उहां से बहरे निकलनी त एगो बोर्ड पर मराठा मंदिर के ओर गइले क निसान बनल रहे। जल्दी-जल्दी हम ओ निसान के फालो करत गइनी त सामने मराठा मंदिर लउकल और ओपर दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के बडिय़ार क पोस्टर लउकल। ओ पोस्टर पर दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के पांच सौ सप्ताह पूरा कइले के बारे में बड़ा-बड़ा अक्षर में लिखल रहे। हम बहुत खुस भइनी, लेकिन जइसहीं गेट पर पहुंचनी, गेट वाला रोक देहल। उ कहलस कि अब गेट तीन बजे खुलेगा, तब आना। अभी अंदर नहीं आ सकते। जब हम ओसे कहनीं कि हम प्रेस वाला हईं त फटाक से गेट खोल दिहलस।

अंदर हमार सहकर्मी रहली, उ मैनेजर से बात क भइल रहली। हॉल में काम करे वाला एगो आदमी आइल। उ हमहन के सम्मान से हॉल में ले जाके बइठा दिहलस। परदा पर सिमरन के बियाह के तैयारी वाला सीन चलत रहे। राज सिमरन के घर में भाग भाग के सब कर मदद करत रहे। काफी फिलिम निकल चुकल रहे। खैर, सीट पर बइठले के बाद जब थोड़ा आंख के सामने क अंधेरा छंटल त अपने अगल-बगल इ देखके खातिर नजर दउड़वनी कि केतना लोग हॉल में हवं? हमके यकीन ना भइल लोगन के देखके। डीसी में कम से कम पचास लोग पिक्चर देखत रहने। बालकनी क पता न? एतना दर्शक तो आजकल के नई फिलिम के पहिला शो में भी ना मिलेलन। मजेदार बात इ रहल कि परदा पर राज के डायलॉग बोलले से पहिलहीं हॉल में कब्बो ए कोने से त कब्बो ओ कोने से डायलॉग सुनाई दे दे। सब लोग मजा लेके फिलिम के एंज्वॉय करत रहने। हमहूं के खूब मजा आवत रहे। डीडीएलजे के बड़ा परदा पर देखले के मजा कुछ अउर ही ह। परदा पर डीडीएलजे एकदम फ्रेस चलत रहे और भारी संख्या में दर्शक भी बइठल रहनें। एक्को बार ना लगल कि डीडीएलजे चौदह साल पुरानी पिक्चर हो गइल हिय। इहे कुल सोचत-सोचत फिलिम देखत रहनीं। अब मन के इहो कसक मिट गइल कि हॉल में डीडीएलजे ना देखले हईं।

पिक्चर खतम भइल त हमहन दर्शक लोगन से इ पूछे के कोसिस कइनी जा कि उ लोग डीडीएलजे देखे थिएटर में काहें आइल रहनअ हं? कम से कम अस्सी लोग डीडीएलजे देखके निकलन। सबकर जवाब लगभग इहे रहे कि डीडीएलजे उनकर फेवरेट फिलिम हिय, एही मारे उ एके देखे बार-बार मराठा मंदिर में आवें न। ए दर्शक लोगन में बुजुर्ग, प्रौढ़, युवा लडक़ा-लडक़ी सब लोग रहनें। सिनेमा हॉल के मैनेजर से इ जानके बड़ा सुखद आश्चर्य भइल कि अबहिन डीडीएलजे के पांच साल अउर मराठा मंदिर में उनकर चलउले क प्लानिंग ह। लागत ह कि मराठा मंदिर में चार पीढ़ी क मनोरंजन क भइल इ फिलिम अबहिन कुछ अउर पीढ़ी के सिनेमा हॉल में डीडीएलजे के देखले क ख्वाहिश पूरी करी।