Search This Blog

Sunday, September 27, 2009

दरअसल: पॉपुलर नामों के गेम हैं टीवी शो

-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों तेजी से ऊपर आए मनोरंजन चैनल कलर्स ने अमिताभ बच्चन के साथ बिग बॉस के अगले सीजन की घोषणा की है। शो के लिए अमिताभ बच्चन की रजामंदी को कलर्स की बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि बिग बॉस आरंभ होने के बाद टीवी के पॉप फिलास्फर बने बिग-बी को सुनने और देखने के लिए इस चैनल पर दर्शक टूट पड़ेंगे। यह भी उम्मीद की जा रही है कि उनकी वजह से इस शो में थोड़े ज्यादा पॉपुलर सेलिब्रिटी हिस्सा लेंगे। वैसे अभी तक किसी प्रतिभागी की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

कौन बनेगा करोड़पति-2 के बाद अमिताभ बच्चन फिर से टीवी पर लौटे हैं। उनके इस वापसी को एक चक्र के पूर्ण होने के रूप में देखा जा रहा है। बाजार और टीवी अधिकारियों को ऐसा लगता है कि इस बार वे अपनी मौजूदगी से टीवी शो को नई ऊंचाई पर ले जाएंगे। कालांतर में वह ऊंचाई नया मानदंड स्थापित करेगी। टीआरपी और लोकप्रियता की इस होड़ का कोई अंत नहीं दिखता। चैनलों की तरफ से कोशिश जारी है कि वे होड़ में आगे रहें। इसके लिए वे ज्यादा से ज्यादा फिल्मी सेलिब्रिटी का इस्तेमाल कर रहे हैं। टीवी के पुराने दर्शकों को याद होगा। वर्षो पहले दूरदर्शन पर हमलोग आरंभ हुआ था, तब उसे पेश करने के लिए अशोक कुमार आते थे। टीवी पर फिल्म स्टार की लोकप्रियता और छवि का वह पहला इस्तेमाल था। अशोक कुमार दादा मुनि के नाम से विख्यात थे। उनकी छवि एक संतुलित और समझदार बुजुर्ग की थी। उसके बाद जी टीवी के साथ सैटेलाइट चैनलों की शुरुआत हुई, तो फिल्मों के सेलिब्रिटी को टीवी शो का हिस्सा बनाकर पेश करने के नए प्रयोग आरंभ हुए। उन दिनों मोहन कपूर सांप और सीढ़ी नाम के शो करते थे। उसमें वे फिल्मी हस्तियों को ले आते थे। बाद में शेखर सुमन मूवर्स और शेकर्स लेकर आए। फिल्म कलाकारों में शेखर ने सबसे पहले टीवी शो को अपनाया। कहा जा सकता है कि उस समय उनके पास फिल्में नहीं थीं और उन्होंने करियर के विकल्प के रूप में टीवी को चुना, लेकिन उसके बाद किरण खेर, शत्रुघ्न सिन्हा और महेश भट्ट सरीखे लोग बेहिचक टीवी से जुड़े। कौन बनेगा करोड़पति के लिए अमिताभ बच्चन ने जब पहली बार हामी भरी थी, तब वे भी लगभग बेरोजगार थे। एबीसीएल के गलत फैसलों से उन्हें नुकसान हुआ था और उन पर कर्ज चढ़ गए थे। फिल्मी करियर में ठहराव आ चुका था। लंबे समय तक पशोपेश में रहने के बाद वे टीवी शो के लिए तैयार हुए थे। सच कहें, तो उन्हें भी उम्मीद नहीं थी कि टीवी पर अवतरित होने के बाद उनकी लोकप्रियता में उछाल आएगा। राकेश मेहरा की फिल्म अक्स के लिए उन्होंने फ्रेंच दाढ़ी का गेटअप लिया था। कंटीन्यूटी की समस्या और नई इमेज की जरूरत के बीच मेल बिठाते हुए कौन बनेगा करोड़पति में वे उसी गेटअप में आए और संयोग देखिए कि स्टाइल आइकॉन बन गए।

अमिताभ बच्चन के बाद टीवी शो में फिल्मों के सक्रिय कलाकारों के आने का तांता लग गया। दर्शकों ने शाहरुख खान और सलमान खान छोटे-बड़े कलाकार, निर्देशक और संगीत निर्देशकों को विभिन्न टीवी शो की मेजबानी करते देखा है। पिछले साल अक्षय कुमार खतरों से खेलने आए और इस साल ज्यादा खतरनाक स्टंट के साथ लौटे। अभी अमृता राव परफेक्ट ब्राइड में आ रही हैं। चर्चा है कि सोनी टीवी के एक शो के लिए माधुरी दीक्षित ने भी हां कर दी है। विदेश की तरह भारत में टीवी शो के अपने स्टार नहीं बन सके हैं। ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है, जो टीवी से ही आकर सेलिब्रिटी बन गया हो। अभी हम फिल्मों के पॉपुलर स्टार पर ही निर्भर हैं और अगले कुछ वर्षो तक इसमें फेरबदल की संभावना नहीं दिखती।


Saturday, September 26, 2009

फ़िल्म समीक्षा: ह्वाट्स योर राशि?

-अजय ब्रह्मात्मज
***
आशुतोष गोवारिकर की फिल्म सामान्य नहीं हो सकती। असमान्य फिल्मों के साथ यह जोखिम रहता है कि वह या तो खूब पसंद आती हैं या बिल्कुल नहीं। इसके अलावा लगान के बाद आशुतोष लंबी फिल्म बनाने के लिए भी मशहूर हो गए। वह हर बार एक नए विषय के साथ फिल्म लेकर आते हैं। उनकी ह्वाट्स योर राशि? रोमांटिक कामेडी है। गंभीर और पीरियड फिल्मों के बाद आशुतोष की यह कोशिश सराहनीय है। उन्होंने मूल लेखक की मदद से समाज में विवाह संबंधी प्रचलित मान्यताओं व मूल्यों को छूने और अप्रत्यक्ष रूप से सवाल खड़े करने की कोशिश की है।

मध्यवर्गीय परिवार का योगेश पटेल एमबीए की पढ़ाई के लिए अमेरिका के शिकागो चला गया है। वह नफा-नुकसान की मानसिकता से बाहर निकलना चाहता है। इधर उसका परिवार कई मायनों में पारंपरिक और रूढि़वादी है। परिवार पर एक आर्थिक मुसीबत आ खड़ी हुई है। उससे निजात पाने का एक ही तरीका है कि आकस्मिक धन आए। कुछ ऐसा संयोग बनता है कि अगर योगेश की शादी एक निश्चित तारीख तक कर दी जाए तो आवश्यक धन मिल जाएगा। योगेश को झूठ बताकर भारत बुलाया जाता है। यहां आने के बाद उस पर भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक दबाव डाला जाता है। उसे दस दिनों के अंदर शादी करनी है। प्रेम विवाह की ख्वाहिश रखने वाला योगेश आखिरकार झटपट शादी के लिए तैयार हो जाता है। वह छह दिनों में शादी के लिए चुनी गई लड़कियों में बारह से मिलना तय करता है। वह सभी राशियों की एक-एक लड़की से मिलता है।

फिल्म इसी युक्ति पर केंद्रित है। आशुतोष ने बारह लड़कियों के रूप में प्रियंका चोपड़ा को रखने का साहसिक निर्णय लिया है। प्रियंका निराश नहीं करतीं। उन्होंने सभी लड़कियों को मिले मिजाज के मुताबिक निभाने की पूरी कोशिश की है। एक ही फिल्म में बारह किरदारों को निभाने के लिए अभिनेत्री में आंतरिक विविधता अनिवार्य शर्त है। कुछ जगहों पर प्रियंका से चूक हुई है। मोटे तौर पर प्रियंका ने निर्देशक के चरित्रांकन को पकड़ने की कोशिश की है। अगर उन्होंने अपनी आवाज और संवाद अदायगी पर और मेहनत की होती एवं वैविध्य ला पातीं तो फिल्म अधिक प्रभावशाली हो जाती। बहस हो सकती है कि अगर आशुतोष बारह लड़कियों की भूमिकाओं के लिए बारह अभिनेत्रियों को चुनते तो फिल्म कैसी बनती? निश्चित ही तब विविधता अधिक स्पष्ट होती। यहां आशुतोष पर आए व्यवहारिक दबाव को ध्यान में रखना होगा। हिंदी फिल्मों में अभिनेत्रियों की लोकप्रियता और वरीयता का ऐसा क्रम बना हुआ है कि बारह अभिनेत्रियों को चुनने और फिर उनकी हैसियत के मुताबिक रोल छोटा-बड़ा करने में ही पूरा श्रम निकल जाता। आशुतोष ने पुरानी सफलता को दोहराने का सुरक्षित तरीका नहीं अपनाया है। उन्होंने रोमांटिक कामेडी में प्रयोग किया है। हमें यह भी नहंीं भूलना चाहिए कि कामेडी के नाम पर अभी जो फूहड़ता पड़ोसी जा रही है, उससे दर्शक कंडीशंड हो चुके हैं। आशुतोष ने हृषिकेष मुखर्जी और बासु चटर्जी की परंपरा को निभाने की कोशिश की है। इस साहस और कोशिश के लिए उनकी सराहना होनी चाहिए।

हरमन बावेजा के चरित्र की सीमाएं थीं। उन्हें एकरेखीय चरित्र निभाना था। पिछली दोनों फिल्मों से वह आगे आए हैं। अंजन श्रीवास्तव ने लोलुप पिता की भूमिका के साथ न्याय किया है। उनकी पत्नी के रूप में मंजू सिंह जंची हैं। आशुतोष को अपने प्रिय और भरोसेमंद अभिनेताओं को हर फिल्म में लेने के लोभ से बचना चाहिए। इस बार वे एक्टर निराश करते हैं।

संगीत के संदर्भ में भी आशुतोष का प्रयोग उल्लेखनीय है। उन्होंने नए संगीतकार और गायक सोहेल सेन का समुचित उपयोग किया है। फिल्म के लिए जरूरी गीत लिखे गए हैं। फिल्म के बाहर आइटम के रूप में वह लोकप्रिय नहीं हैं, लेकिन किरदारों के लिए उचित हैं। प्रचलित धुनों और स्वरों से अलग जाकर सोहेल सेन ने फिल्म की थीम में बहुत कुछ जोड़ा है।

Saturday, September 19, 2009

फिल्‍म समीक्षा:दिल बोले हडि़प्‍पा

यशराज फिल्म्स ने पंजाब का पर्दे पर इतना दोहन कर लिया है कि अब उनके सही इरादों के बावजूद फिल्म नकली और देखी हुई लगने लगी है। दिल बोले हडि़प्पा के प्रसंग और दृश्यों में बासीपन है। आम दर्शक इसके अगले दृश्य और संवाद बता और बोल सकते हैं।

वीरा (रानी मुखर्जी) का सपना है कि वह सचिन और धौनी के साथ क्रिकेट खेले। अपने इस सपने की शुरूआत वह पिंड (गांव) की टीम में शामिल होकर करती है। इसके लिए उसे वीरा से वीर बनना पड़ता है। लड़के के वेष में वह टीम में शामिल हो जाती है। निर्देशक अनुराग सिंह को लगता होगा कि दर्शक इसे स्वीकार भी कर लेंगे। 30 साल पहले की फिल्मों में लड़कियों के लड़के या लड़कों के लड़कियां बनने के दृश्यों में हंसी आती थी। अब ऐसे दृश्य फूहड़ लगते हैं। दिल बोले हडि़प्पा ऐसी ही चमकदार और रंगीन फूहड़ फिल्म है।

फिल्म में रानी मुखर्जी पर पूरा फोकस है। ऐसा लगता है कि उनकी अभिनय प्रतिभा को हर कोने से दिखाने की कोशिश हो रही है। करिअर के ढलान पर रानी की ये कोशिशें हास्यास्पद हो गई हैं। शाहिद कपूर फिल्म में बिल्कुल नहीं जंचे हैं। अनुपम खेर ऐसी भूमिकाओं में खुद को दोहराने-तिहराने के अलावा कुछ नहीं करते।


Friday, September 18, 2009

फिल्‍म समीक्षा:वांटेड


-अजय ब्रह्मात्‍मज

प्रभु देवा की वांटेड उस कैटगरी की फिल्म है, जो कुछ सही और ज्यादा गलत कारणों से हिंदी में बननी बंद हो चुकी है। इनके बारे में धारणा है कि केवल फ्रंट स्टाल के चवन्नी छाप दर्शक ही पसंद करते हैं। अब दर्शकों का प्रोफाइल बदल गया है। मल्टीप्लेक्स ने दर्शकों की जो आभिजात्य श्रेणी गढ़ी है, वह ऐसी फिल्मों को घटिया, असंवेदनशील और चालू कहती है। पिछले 15 वर्षो में हिंदी सिनेमा ने खुद को जाने-अनजाने ऐसी मनोरंजक फिल्मों से दूर कर लिया है। कभी ऐसी फिल्में बनती थीं और हमारे फिल्मी हीरो दर्शकों के दिलों पर राज करते थे। वांटेड उस नास्टेलजिया को जिंदा करती है। यह फिल्म हर किस्म के थिएटर के दर्शकों को पसंद आ सकती है, क्योंकि कुछ दर्शक इसे सालों से मिस कर रहे थे। नए शहरी दर्शकों ने तो ऐसी फिल्में देखी ही नहीं हैं।
राधे (सलमान खान) पैसों के लिए कोई भी काम कर सकता है। एक बार जिस काम या बात के लिए वह हां कर देता है, उससे कभी नहीं मुकरता। अपनी इस खूबी और निर्भीक एटीट्यूड से वह अपराध जगत में तेजी से चर्चित हो जाता है। उसकी मांग बढ़ती है। अपराध जगत का सरगना गनी भाई विदेश में कहीं रहता है। अपने दाहिने हाथ गोल्डन की हत्या के बाद वह स्वयं भारत आता है। भारत आकर वह राधे से मिलता है और एक काम सौंपता है। राधे जिसे पूरा करने से मना कर देता है, क्योंकि उसमें बच्चे भी मारे जाएंगे। राधे औरतों और बच्चों पर वार नहीं करता। गनी भाई की दुश्मनी राधे के लिए मुश्किल बन जाती है। दूसरी तरफ जाह्नवी उससे प्रेम करती है। इस प्रेम की वजह से उसकी मुश्किलें और बढ़ती हैं। फिल्म में इंटरवल के बाद एक ट्विस्ट है। उसके बाद राधे की सच्चाई मालूम होती है। गनी भाई और राधे सिर्फ दो व्यक्ति नहीं, वास्तव में कानून के आर-पार खड़े अच्छाई और बुराई के दो प्रतीक हैं। सभी फिल्मों की तरह यहां भी अच्छाई की जीत होती है।
पिछली सदी के नौवें दशक में ऐसी फिल्मों की अति हो गई थी। अंतिम दशक में हम आपके हैं कौन और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के बाद ताजगीपूर्ण बदलाव आया। लेकिन उस बदलाव ने हिंदी सिनेमा को अपनी परंपरा से अलग भी किया। मालूम हुआ कि शक्कर घोले गए मीठे चरित्रों की भरमार हो गई। फिल्में एक दूसरे अति के कुचक्र में फंस गईं। देसी मनोरंजन को घटिया मान लिया गया और देसी दर्शकों को अपेक्षित मनोरंजन से मरहूम कर दिया गया। देश में वांटेड को पसंद करने वाले दर्शकों की संख्या कम नहीं है। यह उनका भरपूर मनोरंजन करेगी। लंबे समय के बाद सलमान खान ने वांटेड में संजीदगी के साथ काम किया है। वह बेहतरीन एक्टर हो सकते हैं, बशर्ते अपने किरदार पर ध्यान दें। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस अद्भुत है। वह दर्शकों को अपनी हर अदा से मोह लेते हैं। इस फिल्म में अपने इस हुनर का जबरदस्त इस्तेमाल करते हैं। हालांकि अब उम्र उनके चेहरे पर झलकने लगी है। कह सकते हैं कि हीरो के रूप में उनकी आखिरी पारी की पहली फिल्म है वांटेड। वह एक्शन दृश्यों में जंचे और जमे हें। गनी भाई की भूमिका में अनुभवी अभिनेता प्रकाश राज अपने मसखरे अंदाज से हंसने का मौका देते हैं। विलेन के चरित्र में विविधता लाने में वह सफल रहे हैं। ईमानदार पुलिस अधिकारी की भूमिका में गोविंद नामदेव प्रभावित करते हैं। तो करप्ट और लीचड़ पुलिस अधिकार के रोल में महेश मांजरेकर निराश नहीं करते। फिल्म की हीरोइन जाह्नवी का चरित्र ठीक से नहीं गढ़ा गया है। उसे आयशा टाकिया ने बेमन से निभाकर और निष्प्रभावी कर दिया है।
फिल्म के एक्शन दृश्य प्रभावशाली हैं। फिल्म में दर्जनों हत्याएं होती हैं, लेकिन यह फिल्म हिंसक नहीं कही जा सकती। निर्देशक का ध्येय हिंसा दिखाने से अधिक हीरो की बहादुरी दिखाने पर है। फिर भी इस फिल्म को बच्चों से दूर ही रखें। वांटेड वाजिब तौर पर एडल्ट फिल्म है।

दरअसल:निराश न हों हिंदी फिल्मप्रेमी

-अजय ब्रह्मात्मज

फिल्मों के राष्ट्रीय पुरस्कारों को लेकर इस बार कोई घोषित विवाद नहीं है, लेकिन जानकार बताते हैं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री बनाम दक्षिण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के द्वंद्व के रूप में इसे देखा जा रहा है। ऐसी खबरें भी आई और सुर्खियां बनीं कि दक्षिण भारतीय फिल्मों ने हिंदी फिल्मों (बॉलीवुड) को पछाड़ा। किसी भी पुरस्कार और सम्मान को एक की जीत और दूसरे की हार के रूप में पेश करना सामान्य खबर में रोमांच पैदा करने की युक्ति हो सकती है, लेकिन सामान्य पाठकों के दिमाग में हारे हुए की कमतरी का एहसास भरता है। इस बार के पुरस्कारों की सूची देखकर ऐसा लग सकता है कि हिंदी फिल्में निकृष्ट कोटि की होती हैं, इसलिए उन्हें पुरस्कार नहीं मिल पाते।
अगर फिल्मों में राष्ट्रीय पुरस्कारों के इतिहास में जाएं, तो इसमें कॉमर्शिअॅल और मेनस्ट्रीम सिनेमा को पहले तरजीह नहीं दी जाती थी। एक पूर्वाग्रह था कि कथित कलात्मक फिल्मों पर ही विचार किया जाए। मेनस्ट्रीम फिल्मों के निर्माता सफलता और मुनाफे के अहंकार में राष्ट्रीय पुरस्कारों की परवाह भी नहीं करते थे। वे अपने पॉपुलर अवार्ड से ही संतुष्ट रहते थे और आज भी कमोवेश यही स्थिति है। पिछले कुछ वर्षो में फिल्मों की राष्ट्रीय पुरस्कार की ज्यूरी ने पॉपुलर हिंदी फिल्मों पर विचार करना आरंभ किया। उन फिल्मों के कलाकारों और तकनीशियनों को सम्मानित किया गया, तो ऐसा लगा कि कला और कॉमर्शिअॅल की निराधार दीवार हटाकर कलात्मक और तकनीकी श्रेष्ठता पर ध्यान दिया जा रहा है।
फिल्मों का कोई भी गंभीर अध्येता इस तथ्य से इंकार नहीं कर सकता कि हिंदी की ज्यादातर फिल्में बकवास, घटिया और साधारण होती हैं। शुद्ध कॉमर्शिअॅल फाूॅर्मले पर उन्हें मुनाफे के लिए बनाया जाता है। फिल्म बनाने के पहले निर्माता, कॉरपोरेट प्रोडक्शन हाउस और संबंधित सारे व्यक्ति फिल्म के बिजनेस पर विचार कर लेते हैं। कागज पर मुनाफा दिखने के बाद ही फिल्म फ्लोर पर जाती है। यह अलग बात है कि इस जोड़-घटाव के बावजूद अधिकांश फिल्में घाटे का सौदा साबित होती हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फिल्में उत्पाद बन चुकी हैं, निर्माता, निर्देशक, वितरक और प्रदर्शक उन्हें किसी प्रोडक्ट की तरह बाजार में लेकर आते हैं। वे दर्शकों को आकर्षित और अभिभूत करते हैं। चमकदार और आक्रामक प्रचार से भरपूर मनोरंजन का झांसा देते हैं और रिलीज के तीन दिनों में अपना उल्लू सीधा करने की हर कोशिश करते हैं। इस माहौल में गंभीर, उत्साही और प्रयोगशील निर्देशक भी लकीर के फकीर बन जाते हैं। अब राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम जैसी संस्था इतनी सक्रिय नहीं रही। दूसरे, तीस लाख का सरकारी आर्थिक सहयोग छोटी से छोटी फिल्म के लिए ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होता है। फिर भी कुछ फिल्में कलात्मक दृष्टि से संपन्न होती हैं। कॉमर्शिअॅल फॉर्मूले में दर्शकों के मनोरंजन का खयाल रखते हुए विषय और प्रस्तुति में प्रयोग किए जाते हैं। तारे जमीन पर और गांधी माई फादर 2007 में बनी उत्तम फिल्मों के नमूने हैं। इसी साल बनी, लेकिन अभी तक रिलीज नहीं हो सकी सुशील राजपाल की अंत‌र्द्वंद्व भी ऐसी ही एक फिल्म है। शिवाजी चंद्रभूषण की फ्रोजेन है। इन फिल्मों के मिले पुरस्कारों को कम कर के आंकना उचित नहीं होगा। ठीक है कि कांजीवरम के प्रकाश राज को श्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला, लेकिन भीतर की खबर रखने वाले जानते हैं कि गांधी माई फादर के अक्षय खन्ना प्रबल दावेदार और प्रतियोगी थे। इसी प्रकार फिरोज अब्बास खान श्रेष्ठ निर्देशक की श्रेणी में आगे थे।
चंद हिंदी फिल्में बाजार की जरूरतों, दर्शकों की रुचि और मौजूदा आर्थिक माहौल के बीच संतुलन बनाकर प्रयोग करती रहती हैं। हम उन कुछ फिल्मों को जरूर सराहें, जो मनोरंजन के कीचड़ में कमल की तरह खिलती हैं।

Wednesday, September 16, 2009

चवन्‍नी चैप के पाठकों की संख्‍या 50,000 से अधिक

दोस्‍तों आज खुशी का दिन है। चवन्‍नी चैप के पाठकों की संख्‍या 50,000 से अधिक हो गयी है। इंटरनेट और ब्‍लॉग के अध्‍येता बताएंगे क‍ि क्‍या चवन्‍नी लोकप्रियता के क्रम में कहीं है क्‍या ?

चवन्‍नी को यही खुशी है कि उसे 50,000 से अधिक पाठकों ने पढ़ा। उन्‍होंने इसके 1,00,000 से अधिक पृष्‍ठ पढ़े हैं। आरंभ में केवल मुंबई के पाठक थे। अब दिल्‍ली,जयपुर,लखनऊ,भोपाल और कानपुर के पाठक नियमित तौर पर आते हैं। चवन्‍नी को पॉपुलर करने में ब्‍लॉगवाणी की बड़ी भूमिका है। और भी एग्रीगेटर का सहयोग मिला। आजकल सीधे ब्‍लॉग पर आने वाले पाठक भी कम नहीं हैं। खुशी की बात है कि 10 से 15 प्रतिशत पाठक विदेशों से आते हैं। कुछ पाठक दूसरे ब्‍लॉग के जरिए आते हैं। चवन्‍नी को पसंद करनवाले मित्रों ने इसका लिंक अपने ब्‍लॉग पर डाल रखा है। उनसे भी पाठक मिलते रहे हैं।

आप सभी पाठकों से गुजारिश है कि इसे अगले लेवल तक ले जाने की सलाह दें। चवन्‍नी को क्‍या करना चाहिए? आप के मार्गदर्शन से ही चवन्‍नी की खनक बढ़ेगी। इसकी खनक मुंबई के फिल्‍मकारों के बीच भी सुनी जाने लगी है। यह सब आप के प्रेम सं संभव हुआ है। बेहिचक अपनी राय दें।

Saturday, September 12, 2009

फ़िल्म समीक्षा:बाबर

-अजय ब्रह्मात्मज

उत्तर भारत के अमनगंज जैसे मोहल्ले की हवा में हिंसा तैरती है और अपराध कुलांचे भरता है। बाबर इसी हवा में सांसें लेता है। किशोर होने के पहले ही उसके हाथ पिस्तौल लग जाती है। अपने भाईयों को बचाने के लिए उसकी अंगुलियां ट्रिगर पर चली जाती हैं और जुर्म की दुनिया में एक बालक का प्रवेश हो जाता है। चूंकि इस माहौल में जी रहे परिवारों के लिए हिंसा, गोलीबारी और मारपीट अस्तित्व की रक्षा के लिए आवश्यक है, इसलिए खतरनाक मुजरिम बच्चों के आदर्श बन जाते हैं। राजनीतिक स्वार्थ, कानूनी की कमजोरी, भ्रष्ट पुलिस अधिकारी और अपराध का रोमांच इस माहौल की सच्चाई है। बाबर इसी माहौल को पर्दे पर पेश करती है।
आशु त्रिखा ने अपराध की दुनिया की खुरदुरी सच्चाई को ईमानदारी से पेश किया है। उन्हें लेखक इकराम अख्तर का भरपूर सहयोग मिला है। लेखक और निर्देशक फिल्म के नायक के अपराधी बनने की प्रक्रिया का चित्रण करते हैं। वे उसके फैसले को गलत या सही ठहराने की कोशिश नहीं करते। छोटे शहरों और कस्बों के आपराधिक माहौल से अपरिचित दर्शकों को आश्चर्य हो सकता है कि क्या बारह साल का लड़का पिस्तौल दाग सकता है? और अगर वह ऐसा करता है तो उसके परिजन उसे क्यों नहीं रोकते? इसके अलावा हिंदी फिल्मों ने मुंबई के अंडरव‌र्ल्ड को अपराध जगत का ऐसा पर्याय बना दिया है कि आम दर्शकों को किसी और माहौल से आए अपराधी विश्वसनीय नहीं लगते। सच तो यही है कि अब डकैतों पर फिल्में नहीं बनतीं, लेकिन उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार में आज भी डकैतियां हो रही हैं।
आशु त्रिखा ने मुंबई से बाहर जाकर अपराध की प्रवृत्ति को समझने की कोशिश की है। इस माहौल में सभी अपराधी हैं। उनके बीच वर्चस्व का संघर्ष है और राजनेता अपने हितों के लिए उनका इस्तेमाल करते हैं। इन अपराधियों के समर्थन में एक भ्रष्ट तंत्र खड़ा हो चुका है। जिसमें दारोगा चतुर्वेदी जैसे भ्रष्टाचारी चालाकी से ईमानदार पुलिस अधिकारी और मुजरिम दोनों की हत्या कर पदोन्नति हासिल कर लेते हैं। बाबर उस भ्रष्ट तंत्र और विजेता बन रहे भ्रष्टाचारियों का किस्सा भी बयान करती है।
बाबर की खूबी लोकेशन, भाषा और वेशभूषा है। इस फिल्म में सब कुछ वास्तविक के बेहद करीब है। आशु त्रिखा ने फिल्म के विषय और माहौल के हिसाब से नीम रोशनी और अंधेरे के बीच फिल्म की शूटिंग की है। फिल्म का हीरो बाबर है, लेकिन कभी भी उसके हीरोइज्म को स्थापित करने या उसे आदर्श बताने का प्रयास नहीं किया गया। लखनऊ की गलियों में शूट की गई यह फिल्म लंबे समय के बाद पर्दे पर छोटे शहर को उसकी धड़कन के साथ पेश करती है।
अभिनेताओं में नायक सोहम पहली फिल्म के लिहाज से निराश नहीं करते। उनकी घबराहट और रा एनर्जी फिल्म के किरदार को ताकत देती है। अन्य कलाकारों में मिथुन चक्रवर्ती, मुकेश तिवारी, गोविंद नामदेव सामान्य तरीके से अपने चरित्रों को निभाते हैं। चंद दृश्यों में भी सुशांत सिंह प्रभावित करते हैं। ओम पुरी ने भ्रष्ट दारोगा की भूमिका को बारीकी से निभाया है। चापलूस, मतलबी और भ्रष्ट दारोगा ऐसे ही होते हैं। बाबर सच को छूती ऐसी फिल्म है, जो जुर्म और अपराध की दुनिया को ग्लोरीफाई किए बगैर उसका चित्रण करती है।

Friday, September 11, 2009

दरअसल:विदेशी लोकेशन का आकर्षण

-अजय ब्रह्मात्मज

आए दिन हिंदी फिल्मों के जरिए हम किसी न किसी देश की यात्रा करते हैं। अमेरिका और इंग्लैंड के शहर और ऐतिहासिक स्थापत्य की झलक हम वर्षो से फिल्मों में देखते आ रहे हैं। एक दौर ऐसा आया था, जब किसी न किसी बहाने मुख्य किरदार यानी नायक-नायिका विदेश पहुंच जाते थे और फिर हिंदी के गरीब दर्शक अपने गांव-कस्बे और शहरों के सिनेमाघरों में उन विदेशी शहरों को देखकर खुश होते थे। एक टिकट में दो फायदे हो जाते थे, यानी मनोरंजन के साथ पर्यटन भी होता था। गौर करें, तो उस दौर में विदेशी लोकेशनों को फिल्मकार कहानी में अच्छी तरह पिरोकर पेश करते थे। फिर एक दौर ऐसा आया कि कहानी देश में चलती रहती थी और गाने आते ही नायक-नायिका विदेशी लोकेशनों में पहुंच जाते थे। यश चोपड़ा की फिल्मों में सुंदर और रोमांटिक तरीके से स्विट्जरलैंड की वादियां दिखती रहीं। उसके बाद करण जौहर जैसे निर्देशक अपनी फिल्म को लेकर विदेश चले गए। कभी खुशी कभी गम में उन्होंने जो विदेश प्रवास किया, वह अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। उनके बैनर की फिल्में अभी तक भारत नहीं लौटी हैं। उनकी अगली फिल्म माई नेम इज खान भी अमेरिका में शूट हुई है। पिछले दिनों अक्षय कुमार से एक इंटरव्यू करने के सिलसिले में इटली जाना हुआ। इटली के नेपल्स (नैपोली) शहर से लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर फियागो कस्बा है। हरी-भरी पहाड़ी और नीले लहराते समुद्र का अद्भुत मिलन है यहां। समुद्र की लहरें पहाड़ी से टकराती हैं और मधुर धुन पैदा करती हैं। फियागो के समुद्रतट की खूबी यही है कि यहां समुद्र के किनारे रेत नहीं है। गोल, चौकोर और विभिन्न आकारों के चिकने-खुरदुरे पत्थरों से अटे पड़े समुद्रतट पर नंगे पांव चलने में कठिनाई होती है, लेकिन एक बार समुद्र में घुस गए, तो फिर निकलने का मन नहीं करता। समुद्र की फेनिल लहरें अपने आगोश में ले लेती हैं और पानी इतना साफ कि आप पांच-दस फीट गहरे उतरने पर भी समुद्रतल देख लें। अपने देश में ऐसा समुद्रतट दुर्लभ है। बहरहाल, इसी कस्बे के पुग्नोच्युसो रिसोर्ट में अक्षय कुमार ठहरे थे। वे साजिद नाडियाडवाला की फिल्म हाउसफुल की शूटिंग के लिए गए थे। इस फिल्म के निर्देशक साजिद खान हैं।

साजिद नाडियाडवाला अपनी फिल्मों के लिए विदेशी लोकेशन ही चुनते हैं। हाउसफुल की शूटिंग लंदन और इटली में हो रही है। उसके पहले कमबख्त इश्क और हे बेबी हमने देखी है। बातचीत चलने पर साजिद नाडियाडवाला ने साफ कहा, मैं अपनी फिल्मों के जरिए दर्शकों को खूबसूरत लोकेशन और शहर दिखाना चाहता हूं। मेरी फिल्मों में सपनों की दुनिया होती है। इस दुनिया के शहर और लोकेशन के लिए मुझे विदेश जाना पड़ता है। भारत में भी मनोरम स्थल हैं, लेकिन वहां आबादी नहीं है। विदेशी शहरों की साफ-सफाई, करीने से बसे शहर और अप्रदूषित वातावरण से फिल्म चटकदार और बहुरंगी दिखती है। आखिर कितने दर्शकों को इन लोकेशन और शहरों को देखने का सौभाग्य मिलता है?

साजिद नाडियाडवाला के कथन में सच्चाई तो है। हिंदी फिल्मों के दर्शकों का एक समूह खालिस मनोरंजन और आनंद के लिए फिल्में देखता है। विदेशी लोकेशनों में शूट की गई फिल्में अमूमन औसत से बेहतर व्यापार कर रही हैं। लगता है दर्शक मनोरंजन के साथ पर्यटन का लाभ उठाने के लिए ऐसी फिल्मों को प्रश्रय दे रहे हैं।

Thursday, September 10, 2009

पुरस्कृत हुई हैं पहली फिल्में

-अजय ब्रह्मात्मज

फिल्मों के 55वें राष्ट्रीय पुरस्कार में हिंदी की किसी फिल्म को मुख्य श्रेणी में श्रेष्ठ फिल्म, श्रेष्ठ अभिनेता, श्रेष्ठ अभिनेत्री और श्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार नहीं मिलने से हिंदी फिल्म प्रेमी थोड़े उदास हैं। उनकी उदासी को समाचार चैनलों और अखबारों की सुर्खियों की प्रस्तुति ने और बढ़ा दिया है। खबरें चलीं कि बॉलीवुड को कांजीवरम ने पछाड़ा या आमिर-शाहरुख पर भारी पड़े प्रकाश राज। दरअसल, पुरस्कारों में प्रतिद्वंद्विता नहीं होती है। निर्णायक मंडल के सदस्य व्यक्तिगत रुचि और पसंद के आधार पर कलाकार, तकनीशियन और फिल्मों को पुरस्कार के लिए चुनते हैं। निर्णायक मंडल के सदस्यों की अभिरुचि से पुरस्कार तय होते हैं। बहरहाल, उदासी के इस वातावरण में उल्लेखनीय तथ्य है कि जिन हिंदी फिल्मों को विभिन्न श्रेणियों में पुरस्कार मिले हैं, वे सभी फिल्में निर्देशक की पहली फिल्में हैं। तारे जमीं पर को तीन पुरस्कार मिले। इस फिल्म के निर्देशक आमिर खान हैं और तारे जमीं पर उनकी पहली फिल्म है। इसी प्रकार गांधी माय फादर भी फिरोज अब्बास खान की पहली फिल्म है। इस फिल्म को भी तीन पुरस्कार मिले हैं। किसी निर्देशक की पहली फिल्म को इंदिरा गांधी पुरस्कार। शिवाजी चंद्रभूषण को फ्रोजेन के लिए मिला है। जाहिर तौर पर यह उनकी पहली फिल्म है। सुशील राजपाल की पहली फिल्म अंतद्र्वद्व को सामाजिक विषयों की फिल्म का पुरस्कार मिला है। हिंदी की श्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार 1971 को मिला है। यह भी अमृत सागर की पहली फिल्म है। पहली या दूसरी फिल्मों के लिए पुरस्कारों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि युवा निर्देशक क्रिएटिव जोखिम लेने को तैयार रहते हैं। वे अपनी पहली फिल्म में प्रयोग करते हैं और नई सोच व समझ के तहत फिल्म निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों में कुछ नया करने की कोशिश करते हैं। सफल और अनुभवी फिल्मकार घिसे-पिटे फार्मूले से खुद को सुरक्षित रखते हैं। उनकी फिल्मों में लेशमात्र नवीनता रहती है। राष्ट्रीय पुरस्कार पहली बार निर्देशक बने फिल्मकारों की फिल्मों को पुरस्कार मिलने से नए और युवा निर्देशकों को प्रोत्साहन मिलता है। फिल्मों को मुनाफे की फार्मूलेबाजी समझ बैठे आलोचकों को राष्ट्रीय पुरस्कारों के इस इशारे को समझना चाहिए। सच यही है कि पहली फिल्म के निर्देशक अपनी मेधा से फिल्म इंडस्ट्री में योगदान करते हैं। वे नया विषय, नई सोच, नया शिल्प लेकर आते हैं। 55वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पुन: इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि प्रतिभा का प्रस्फुटन जारी है। फिल्में हर लिहाज से विकसित हो रही हैं।

Monday, September 7, 2009

फ़िल्म समीक्षा:मोहनदास

कहानी को फिल्म में ढालने की कोशिश
-अजय ब्रह्मात्मज
**1/2
उदय प्रकाश की कहानी मोहनदास पर आधारित मजहर कामरान की फिल्म देश की खुरदुरी सच्चाई को वास्तविक लोकेशन में पेश करने की कोशिश करती है। मजहर कामरान ने सिनेमाई छूट लेते हुए मूल कहानी में कुछ किरदार और प्रसंग जोड़े हैं। इससे फिल्म की नाटकीयता बढ़ी है, लेकिन सामाजिक विडंबना का मर्म हल्का हुआ है। कहानी के प्रभाव को मजहर कामरान फिल्म में पूरी तरह से नहीं उतार पाए हैं।
अनूपपुर के दस्तकार परिवार के मोहनदास की पहचान छिन जाती है। बचपन से पढ़ने-लिखने में होशियार मोहनदास बड़ा होकर ओरिएंटल कोल माइंस में नौकरी के लिए आवेदन करता है। उसका चुनाव हो जाता है, लेकिन उसकी जगह कोई और बहाल हो जाता है। वह खुद को मोहनदास बताता है, लेकिन नकली मोहनदास उसकी पहचान वापस पहीं करता। वास्तविक मोहनदास अपने नाम और पहचान की लड़ाई में थपेड़े खाता है। एक न्यूज चैनल की रिपोर्टर मेघना सेनगुप्ता उसकी मदद में आगे आती है, लेकिन भ्रष्ट व्यक्तियों के कुचक्र में कोई नतीजा नहीं निकलता। ढाक के वही तीन पात ़ ़ ़ मोहनदास सामाजिक विसंगति और पूर्वाग्रह से नहीं जीत पाता।
मजहर कामरान ने फिल्म का लोकेशन वास्तविक रखा है। कलाकारों के चुनाव में उनसे चूक हुई है। अगर असली और नकली मोहनदास के कलाकारों को वह परस्पर बदल देते तो दोनों चरित्र अधिक विश्वसनीय और प्रभावशाली हो जाते। नकुल वैद्य असली मेाहनदास की पीड़ा नहीं व्यक्त कर पाते। इसी प्रकार मेघना सेनगुप्ता का जोड़ा गया ट्रैक आधा-अधूरा लगता है। नाटकीयता बढ़ाने के लिए हर्षव‌र्द्धन सोनी के किरदार को विस्तार दिया जा सकता था। और जज के रूप में गजानन माधव मुक्तिबोध को रखना रचनात्मक युक्ति भर है। गजानन माधव मुक्तिबोध हिंदी के प्रतिष्ठित जन पक्षधर कवि हैं।
मोहनदास उदय प्रकाश की साहित्यिक कृति के सिनेमाई रूपांतरण में पूरी तरह से सफल नहीं हो सकी है। हां, जो पाठक कहानी से परिचित नहीं हैं, उन्हें मोहनदास फिल्म सारगर्भित और सम्यक लग सकती है। उदय प्रकाश के पाठकों को मजहर कामरान की मोहनदास संतुष्ट नहीं करती।

Saturday, September 5, 2009

फ़िल्म समीक्षा:चिंटू जी

-अजय ब्रह्मात्मज
****
रंजीत कपूर का सृजनात्मक साहस ही है कि उन्होंने ग्लैमरस, चकमक और तकनीकी विलक्षणता के इस दौर में चिंटू जी जैसी सामान्य और साधारण फिल्म की कल्पना की। उन्हें ऋषि कपूर ने पूरा सहयोग दिया। दोनों के प्रयास से यह अद्भुत फिल्म बनी है। यह महज कामेडी फिल्म नहीं है। हम हंसते हैं, लेकिन उसके साथ एक अवसाद भी गहरा होता जाता है। विकास, लोकप्रियता और ईमानदारी की कशमकश चलती रहती है। फिल्म में रखे गए प्रसंग लोकप्रिय व्यक्ति की विडंबनाओं को उद्घाटित करने के साथ विकास और समृद्धि के दबाव को भी जाहिर करते हैं।
यह दो पड़ोसी गांवों हड़बहेड़ी और त्रिफला की कहानी है। नाम से ही स्पष्ट है कि हड़बहेड़ी में सुविधाएं और संपन्नता नही है, जबकि त्रिफला के निवासी छल-प्रपंच और भ्रष्टाचार से कथित रूप से विकसित हो चुके हैं। तय होता है कि हड़बहेड़ी के विकास के लिए कुछ करना होगा। पता चलता है कि मशहूर एक्टर ऋषि का जन्म इसी गांव में हुआ था। उन्हें निमंत्रित किया जाता है। ऋषि कपूर की राजनीतिक ख्वाहिशें हैं। वह इसी इरादे से हड़बहेड़ी आने को तैयार हो जाते हैं। हड़बहेड़ी पहुंचने के बाद जब जमीनी सच्चाई से उनका सामना होता है तो उनके अहंकार, स्वार्थ और सोच को चोट लगती है। देश के सुदूर इलाके में बसे हड़बहेड़ी गांव के भोले लोग अपनी सादगी से अहंकारी, पाखंडी और स्वार्थी ऋषि कपूर के हृदय परिव‌र्त्तन कर देते हैं।
सच और कल्पना के ताने-बाने से तैयार की गई यह फिल्म नए शिल्प का इस्तेमाल करती है। अभिनेता ऋषि कपूर के जीवन के वास्तविक तथ्यों और प्रसंगों को काल्पनिक घटनाओं से जोड़ कर रंजीत कपूर ने रोचक पटकथा लिखी है। गांव के सीधे-सादे लोगों से लेकर मुंबई के चालाक फिल्म निर्माता मलकानी और राजनीतिक दलाल अमर संघवी तक इस फिल्म में हैं। फिल्म के कई रेफरेंस वास्तविक हैं और फिल्म देखते समय हम उनका आनंद भी उठाते हैं।
कामेडी के नाम पर हिंदी फिल्मों में चल रही भेड़चाल से इतर है चिंटू जी। रंजीत कपूर ने दर्शकों को हंसाने-रुलाने का सादा तरीका चुना है। इस फिल्म में कोई तकनीकी चमत्कार या सिनेमाई कौशल का इस्तेमाल नहीं किया गया है। फिल्म सीधे दिल में उतरती है और गुदगुदाती है। हां, फिल्म में रंगमंच का प्रभाव है। रंजीत कपूर का रंगमंच से लंबा संबंध रहा है, इसलिए यह प्रभाव स्वाभाविक है। चिंटू जी सामाजिक विडंबनाओं पर चोट करने के साथ मनोरंजन के चालू और स्वीकृत फार्मूले को भी निशाना बनाती है। रोमांटिक गीत, आयटम सांग और फिल्म की शूटिंग के दृश्यों में रंजीत कपूर ने प्रचलित लोकप्रिय शैली पर बारीकी से कटाक्ष किया है।
अभिनेताओं में यह फिल्म पूरी तरह से ऋषि कपूर पर निर्भर है। उन्होंने शिद्दत से अपनी जिम्मेदारी निभायी है। प्रियांशु चटर्जी, कुलराज रंधावा, सौरभ शुक्ला और ग्रुशा कपूर ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। बूढ़ी दाई की भूमिका में शबनम कपूर विशेष ध्यान खींचती हैं।

Thursday, September 3, 2009

दरअसल : सच को छूती कहानियां


-अजय ब्रह्मात्मज


हिंदी फिल्मों की एक समस्या रही है कि सच्ची कहानियों पर आधारित फिल्मों के निर्माता-निर्देशक भी फिल्म के आरंभ में डिस्क्लेमर लिख देते हैं कि फिल्म का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। अगर कोई समानता दिखती है, तो यह महज संयोग है। मजेदार तथ्य यह है कि ऐसे संयोगों पर ही हिंदी फिल्में टिकी हैं। समाज का सच बढ़ा-घटाकर फिल्मों में आता रहता है। चूंकि फिल्म लार्जर दैन लाइफ माध्यम है, इसलिए हमारे आसपास की छोटी-मोटी घटनाएं भी बड़े आकार में फिल्मों को देखने के बाद संबंधित व्यक्तियों की समझ में आता है कि लेखक और निर्देशक ने उसके जीवन के अंशों का फिल्मों में इस्तेमाल कर लिया। फिर शुरू होता है विवादों का सिलसिला।
कुछ फिल्मकार आत्मकथात्मक फिल्में बनाते हैं। उनकी फिल्मों का सच व्यक्तिगत और निजी अनुभवों पर आधारित होता है। महेश भट्ट इस श्रेणी के अग्रणी फिल्मकार हैं। अर्थ और जख्म उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं पर केंद्रित हैं। भट्ट ने कभी छिपाया नहीं। उल्टा जोर-शोर से बताया कि फिल्मों में उन्होंने अपने जीवन के अंधेरों और अनुभवों को उद्घाटित किया है। दूसरी तरफ ऐसे फिल्मकार भी हैं, जो अपनी या अपने आसपास की जिंदगियों पर फिल्म बनाते हैं, लेकिन किसी भी साक्ष्य से हमेशा नकारते रहते हैं।
समांतर फिल्मों के दौर में देश के गंभीर फिल्मकारों ने सामाजिक यथार्थ, विसंगति और शोषण के विषयों पर फिल्में बनाई। उन्होंने अपनी फिल्मों के लिए साहित्य और सामाजिक घटनाओं का सहारा लिया। हाल-फिलहाल में प्रकाश झा और विशाल भारद्वाज ने उत्तर भारत की पृष्ठभूमि पर फिल्में बनाई हैं। दोनों ही फिल्मकारों ने अपराध और राजनीति को छूती घटनाओं और प्रसंगों का वास्तविक चित्रण किया है। आशु त्रिखा की आगामी फिल्म बाबर भी उत्तर भारत की कहानी लग रही है। इसमें एक किशोर के अपराधी बनने और फिर उसके मुठभेड़ों को उत्तर भारतीय पृष्ठभूमि में चित्रित किया गया है। कहते हैं कि यह फिल्म भी किसी सच्ची घटना और व्यक्तियों पर आधारित है, लेकिन निर्देशक इंकार करते हैं। फिर भी उम्मीद है की जा सकती है कि हम उत्तर भारतीय समाज का सच देख पाएंगे।
दरअसल, किसी भी वास्तविक घटना और संदर्भ से प्रेरित या प्रभावित होने के इंकार करना निर्देशक की मजबूरी है। विदेशी फिल्मों के निर्देशक बड़े गर्व से बताते हैं कि उनकी फिल्म प्रमुख घटना से प्रेरित है। भारत में फीचर फिल्मों के निर्देशक ही नहीं, डाक्यूमेंट्री फिल्ममेकर भी सच को छूने की बात नहीं करते। वे अपनी फिल्मों को काल्पनिक घोषित करते हैं। समस्या यह है कि समाज में असहिष्णुता बढ़ने के साथ कला माध्यमों में सृजनकार किसी प्रकार की कंट्रोवर्सी और उससे पैदा होने वाली मुश्किलों से बचने के लिए सिरे से ही इंकार कर देते हैं। हमें पिछले दशक में विभिन्न फिल्मों से संबंधित आपत्तियों और विवादों को नजदीक से देखने और उसके बारे में सुनने को मिला है। कोई भी व्यक्ति, संस्था, समुदाय और समूह किसी छोटी बात से दुखी हो जाता है और फिल्म पर पाबंदी लगाने की बात करता है।
हम फिल्मकारों को इतनी छूट भी नहीं देते कि वे सच्ची घटनाओं को काल्पनिक रंग दे सकें। यही कारण है कि कई फिल्में वास्तविक होने पर भी सच से बचने के प्रयास में अलग धरातल पर चली जाती हैं। हमें फिल्मों और कलात्मक कृतियों के प्रति सहिष्णु होना चाहिए। कलाकारों और फिल्मकारों को आजादी देनी चाहिए कि वे सच और सच को छूती कहानियों पर बेधड़क फिल्में बनाएं। वे देश की धड़कन खुद सुनें और हमें भी सुनाएं।

चार तस्वीरें:आयशा


आयशा सोनम कपूर और अभय देओल की नई फ़िल्म है.इस फ़िल्म की शूटिंग चल रही है.दिल्ली की पृष्ठभूमि पर बन रही यह फ़िल्म जेन ऑस्टिन के उपन्यास एम्मा पर आधारित है।
राजश्री ओझा के निर्देशन में बन रही इस फ़िल्म के निर्माता सोनम कपूर के पिता अनिल कपूर हैं.







Tuesday, September 1, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा देखने का सुख - विपिन चन्द्र राय

हिन्दी टाकीज-४६
मुझे सिनेमची भी कह सकते हैं। सिनेमा देखने की लत उम्र के किस पड़ाव में लगी, याद नहीं, पर पचासवें पड़ाव तक कायम है और आगे भी कायम रहेगा। असल में मेरे पिताजी नगर दंडाधिकारी थे, सो उन्हें पास मिलता था। वे फिल्म नहीं देखते थे तो पास का सदुपयोग करना मेरा ही दायित्व बनता था। वैसा मैं करता भी था, शान से जाता था, गेटकीपर सलाम बजाता था और वीआइपी सीट पर मुझे बिठा देता था। यहां तक कि इंटरवल में मूंगफली भी ला देता था। मैं मूंगफली फोड़ता हुआ सिनेमा दर्शन का सुख उठाता था। क्या आंनद दायक दिन थे वे, बीते दिनो की याद जेहन में समायी हुई हैं।
मेरे छोटे से कस्बे जमालपुर में दो सिनेमा हाल अवंतिका और रेलवे था। उसमें प्रत्येक शनिवार को सिनेमा देखना मेरी दिनचर्या में शामिल था। सिनेमा बदले या वही हो, दोबारा देख लेता था। मुंगेर में तीन सिनेमा हाल था विजय, वैद्यनाथ और नीलम। उस जमाने में नीलम सबसे सुंदर हाल था। मुंगेर जाता तो बिना सिनेमा देखे वापस आने का सवाल नहीं था। पास जो उपलब्ध रहता था। उस जमाने में मनोरंजन का एकमात्र सर्वसुलभ साधन सिनेमा ही था। बस इसलिए वही देखता था। ढेर सारी फिल्में देखी हैं। नाम गिनाने लगूँ तो दो-चार पेज भर जायेगा। पूरे होशोहवास में बॉबी से याद आता है। फिर तो यह दौर लगातार जारी रहा। मेरा दुर्भाग्य कि बाबूजी का ट्रांसफर हो गया और फ्री सिनेमा देखना भी बंद हो गया।
संयोगवश मेरे घर के पास ही प्रकाश प्रेस था, वह अवंतिका का टिकट छापता था। प्रेस के मालिक का बेटे प्रभुनारायण से मेरी दोस्ती थी। बस उसके साथ प्रतिदिन नौ से बारह का रात वाला शो देखने जाने लगा। एक ही हाल, एक ही सिनेमा, रोज देखता, पर थकता नहीं था। असल में हमलोगों का अपना घर उस समय बन रहा था, इसकी रखवाली मैं अकेला ही करता था। मां और भाई अलग घर में,जो भाड़े का था, उसमें रहते थे। उस घर से आठ बजे तक खाना खाकर मैं बन रहे घर में आ जाता था। फिर प्रभु के साथ निकल जाता था, किसी को पता भी नहीं चलता था और मजे से सिनेमा देखने का सुख लाभ उठाता था।
क्या सुहाने दिन थे। सिनेमा हॉल में घुप्‍प अंधेरा और एकटक सबकी निगाह बड़े से परदे पर। हीरो के धांसू डायलाग पर तालियों की गड़गड़ाहट, सीटियों की गूंज, मस्ती का आलम। इन कार्यो में मेरा भी योगदान रहता था। कोई कोई दर्शक तो पैसे भी उछालते, पर मैं नहीं। क्योंकि देखता था कि गेटकीपर टार्च जलाकर पैसे चुन रहा है। मुझे यह मूर्खतापूर्ण काम लगता था, सो मैं कभी भी पैसे नहीं फेंकता था। इस नजारे का दर्शन टीवी पर दुलर्भ है, पूछिए उनसे जिन्होंने ऐसे क्षणों का प्रसन्नतापूर्वक सिनेमा हॉल में उपभोग किया है।
इंटरमीडिएट तक जमालपुर प्रवास रहा। आज एक गुप्त बात सरेआम कबूल रहा हूँ। कभी-कभार जमालपुर से भागलपुर और पटना तक की दौड़ लगा देता था। भागलपुर तक तो रेलवे टिकट भी नहीं कटाता, किसकी हिम्मत जो स्टूडेंट से टिकट मांगने की जुर्रत करता। हां,पटना के लिए टीटीई के हाथ में पांच का नोट थमा देता था, जाते वक्त और आते वक्त। अपर इंडिया एक्सप्रेस से पटना जाता था, वहां वीणा सिनेमा में फिल्म देखना और शाम सात बीस में उसी ट्रेन से वापस। किसी को पता भी नहीं चलता था। कभी मां ने पूछा कि खाने के लिए नहीं आया तो कहता कि भूख नहीं थी। बस बहाने बनाने में माहिर मैं और सिनेमा देखने में भी माहिर। काम बन जाता था। कभी भी मेरी यह चालबाजी पकड़ में नहीं आयी।
इंटर पास करने के बाद टाटा स्टील में अपरेंटिस में आ गया। जमशेदपुर में उस समय नटराज, वसंत, करीम, जमशेदपुर, जीटी और स्टार टॉकीज था। नटराज की शान ही निराली थी, एसी हॉल था। प्रत्येक बुधवार को जेटीआई जो आजकल एसएनटीआई कहलाता है, वहाँ थ्योरी क्लास होता था। हमलोगों का छह साथियों का ग्रुप था, हाफ डे क्लास से पंगा और चल देते थे सिनेमा हाल। यहां तो आजाद पंछी था, कोई रोकने-टोकने वाला भी नही। बस साइकिल उठाओ और सिनेमा हॉल की सैर करो। नटराज, वसंत, करीम, जमशेदपुर टॉकीज बंद हो गए। शहर की रौनक ही खतम हो गयी। बस ले देकर देखने लायक एक हॉल पायल बचा हुआ है, पर मेरी कॉलोनी से मानगो काफी दूर है, सो कभी-कभार ही मौका मिलता है, पर आज भी छोड़ता नहीं हूँ।
प्रसंगवश एक घटना बताता हूँ सिनेमा देखने की धुन का शिकार दो दिन के सस्पेंशन से झेलना पड़ा। आदत से लाचार स्टार टॉकीज में ढाई बजे के शो में हम छह जन थे। फिल्म खत्म होते ही बाहर निकले तो ट्रेनिंग मैनेजर से आमना-सामना हो गया। वे भी फिल्म देखने आये थे। दूसरे दिन आफिस में बुलाहट, डांट-फटकार और दो दिन का सस्पेशन आर्डर मिला। फिल्म थी गूंज उठी शहनाई। सजा भोगी पर फिल्म देखना बदस्तूर जारी रहा।
जिस समय मेरा सिनेमा देखना पूरे शबाब पर था। उस समय दर्शकों को में राजेश खन्ना की धूम थी, उसके हेयर स्टायल की नकल, आँख झपकाने की अदा के दीवाने थे। उसके बाद अभिताभ बच्चन की तूती बोलती थी। मैंने इन दोनों का कोई भी सिनेमा नहीं छोड़ा है। वैसे राजकपूर की श्री 420 और जिस देश में गंगा बहती है, दिलीप कुमार की गोपी और राम और श्याम, देवानन्द की गाइड और जानी मेरा नाम, धर्मेन्‍द्र की सीता और गीता और धर्मवीर, जीतेन्द्र की फर्ज और वारिस, राजेश खन्ना की दो रास्ते, नमकहराम, आनंद, अभिताभ बच्चन की दीवार, जंजीर, अदालत, मुकद्दर का सिंकदर, अनिल कपूर की मिस्टर इंडिया, नायक, सलमान की हम आपके है कौन, बीबी नं 1, अमिर खान की हम है राही प्यार के, सरफरोस, तारे जमीन पर शाहरूख खान की चक दे इंडिया, दिल वाले दुल्हनिया ले जायेगे, वीर जारा जैसी फिल्मों को हॉल में देखना अवर्णनीय अनुभव है। इसे शब्दाकिंत करना कठिन है, यह सुखकारी अनुभूति दिल में समायी हुई है। हीरोइनों में मेरी खास रुचि नहीं थी। वैसे हेमामालिनी, श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित का दीवाना हूँ। यह दीवानापन अभी भी कायम है। आजकल भी ढेर सारी फिल्में बनती है, पर मन की छूती नहीं है। लगता है कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा की तर्ज पर बनती है आज की फिल्में।
आजकल बनती है ढेरों फिल्में, अधिकांश फिल्में तो आकाशीय चैनलो की मेहरबानी से घर बैठे ही देखने को मिल जाता है। बाकी पायरेटड सीडी है ही। पर एक बात बताऊँ टीवी पर आँख गड़ाये, आँख दर्द करने लगता है। रही-सही कसर विज्ञापन पूरी कर देती है। हर दस मिनट बाद विज्ञापनों की भरमार, चिढ़ और ऊब पैदा कर देती है। एक तो छोटा स्क्रीन, फिर विज्ञापन, देखे क्या खाक।
बीते दिनो की कसक भी चुभती है, क्या उत्साह रहता था, भीड़भाड़ में धक्का-मुक्की करते हुए टिकट कटाना और बड़े परदे पर सिनेमा हॉल में सिनेमा देखना। कई बार तो ब्लैक में भी टिकट कटाता था, वापस आने का सवाल ही नहीं, चाहे जिस विधि हो, सिनेमा देखना ही था।
नौ आने से सिनेमा देखना शुरू किया था और तीस रूपये तक देखा। उसके बाद धीरे-धीरे हॉल भी बंद होने लगा। आजकल तो मल्टीप्लेक्स का जमाना है और टिकट दर हतोत्साहित करने का कारण है। आखिर जेब भी अलाऊ करें ना, लेकिन दो सौ रूपये खर्च करना अपने बूते से बाहर है। सारी सुख-सुविधा के बावजूद मल्टीप्लेक्स में दर्शकों का टोटा ही रहता है। वास्तव में सिनेमा हॉल का कोई विकल्प ही नहीं है। सरकार ने दुधारू गाय समझकर ऐसा दोहन किया कि सिनेमा के टिकट पर सिनेमा के दाम से अधिक मनोरंजन कर ही अंकित रहता है। बेचारे सिनेमा हॉल के मालिक के सामने एकमात्र चारा हॉल बंद करना ही रह गया सो बंद हो रहा है।
लेकिन मेरे जैसे अनगिनत दीवाने होंगे, जिन्हें बीते दिनो की याद सताती होगी। काश कि सरकार और सिनेमा हाल के मालिकों को सद् बुद्धि आए और सिनेमा हॉल खुल जाए। मेरी तो हार्दिक इच्छा है कि सिनेमा देखने का सुख सिनेमा हॉल में उठाऊँ। आज नहीं तो कल होगा जरूर, भले हम न होगें, पर सुहाने दिन अवश्‍य आएंगे। सयाने कहते भी हैं कि दुनिया गोल है, यानी कि घूम फिर कर सिनेमा हॉल के दिन भी बहुरेंगे। फिर मैं रहूंगा, सिनेमा होगा और सिनेमा हॉल रहेगा और मस्ती के दिन रहेंगे। इसी कामनारत मनोभावो के साथ, सिनेमा हॉल को भेरी शुभकामनाएँ।
मेरी पसंदीदा फिल्में:-
(1) जिस देश में गंगा बहती है।
(2) गाइड
(3) बाबी
(4) दो रास्ते
(5) दीवार
(6) दिल वाले दुल्हनिया ले जाएगें
(7) हम आपके हैं कौन
(8) मिस्टर इंडिया
(9) गदर
(10) तारे जमीन पर

विपिन चन्द्र राय
एफ - 12, टायो कॉलोनी
जमशेपुर - 832108.
e-mail : bipinchandraroy@yahoo.in