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Sunday, August 30, 2009

दरअसल:फिल्में देखने के लिए जरूरत है तैयारी की


-अजय ब्रह्मात्मज


दोष दर्शकों का नहीं है। हम अपने स्वाद के मुताबिक भोजन, वस्त्र, साहित्य, कला और मनोरंजन की सामग्रियां पसंद करते हैं। बचपन से बड़े होने तक परिवार और समाज के प्रभाव और संस्कार से हमारी रुचियां बनती हैं। फिल्मों के मामले में हम रुचियों के इस भेद को बार-बार देखते हैं। कुछ फिल्में किसी एक समूह द्वारा सराही जाती है और दूसरे समूह द्वारा नकार दी जाती हैं। ताजा उदाहरण कमीने का है। इस फिल्म के प्रति दर्शक और समीक्षकों का स्पष्ट विभाजन है। जो इसे पसंद कर रहे हैं, वे बहुत पसंद कर रहे हैं, लेकिन नापसंद करने वाले भी कम नहीं हैं। कमीने इस मायने में अलग है कि इसके बारे में ठीक है टिप्पणी से काम नहीं चल सकता!
भारतीय और खासकर हिंदी फिल्मों के संदर्भ में मेरा मानना है कि दर्शकों के बीच विधिवत सिने संस्कार नहीं हैं। हमें न तो परिवार में और न स्कूल में कभी अच्छी फिल्मों के गुणों के बारे में बताया गया और न कभी समझाया गया कि फिल्में कैसे देखते हैं? हम फिल्में देखते हैं। जाति और राष्ट्र के रूप में हम सबसे ज्यादा फिल्में देखते हैं, लेकिन अभी तक फिल्में हमारे पाठ्यक्रम में नहीं आ पाई हैं। जिंदगी की ज्यादातर व्यावहारिक विषयों की पढ़ाई नहीं होती। हम अपने अध्यवसाय से उन्हें सीखते हैं। सिनेमा एक ऐसा ही विषय है।
कमीने एक ऐसी फिल्म है, जिसके लिए दर्शकों की अपनी तैयारी और चेतना जरूरी है। कुछ लोग कह सकते हैं कि तो अब फिल्में देखने की भी तैयारी करनी होगी? निश्चित रूप से भरपूर और सटीक आनंद के लिए तैयारी करनी होगी। अपनी संवेदना जगानी होगी और समझ बढ़ानी होगी। संस्कृति के वैश्विक समागम के इस दौर में अज्ञान को हम अपना गुण बताना छोड़ें। यह कहने से काम नहीं चलेगा कि हमें यही पसंद है। चूंकि साहित्य, संस्कृति और सिनेमा परस्पर प्रभाव से नित नए रूप और अंदाज में सामने आ रहे हैं, इसलिए किसी भी सजग दर्शक के लिए आवश्यक है कि वह सावधान रहे। वह नई फिल्मों को ध्यान से देखे। फिल्में भी व्यंजन की तरह होती हैं, अगर उनका स्वाद मन को नहीं भाता है, तो हम बिदक जाते हैं। मजा तभी है, जब हम नए स्वाद विकसित करें और नए काम को सराहना सीखें।
यहां विशाल भारद्वाज जैसे निर्देशकों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। सिर्फ फिल्म बना लेने से सृजनात्मकता की इतिश्री नहीं हो जाती। मुझे लगता है कि अगर विशाल ने विस्तृत इंटरव्यू के जरिए अपनी शैली और फिल्म की खासियत के बारे में बताया होता, तो उन्हें ज्यादा दर्शक सराहते। अभी जो लोग असंतुष्ट हैं, वे आनंदित होते। हर प्रयोगशील फिल्मकार को अपनी फिल्म के बारे में खुलकर बातें करनी चाहिए। दर्शकों को उन सूत्रों से परिचित कराना चाहिए, जिनसे वे उनकी फिल्मों का सृजनात्मक समाधान कर सकें। हिंदी फिल्मों में विशाल भारद्वाज के आगे-पीछे युवा निर्देशकों की जमात आई है। गौर करें कि ये सभी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के स्थापित परिवारों के बच्चे नहीं हैं। कोई बनारस से आया है, तो कोई मेरठ से, कोई नागपुर से आया है, तो कोई जमशेदपुर से..।
अपनी मेहनत और एकाग्रता से पिछले दस वर्षो में इन सबने हिंदी सिनेमा की नई जमीन तैयार की है। अभी इस जमीन को जोतने का काम चल रहा है। इस बंजर में हरियाली या फसल की उम्मीद कुछ साल बाद की जा सकती है। फिलहाल यही खुशी की बात है कि अब बाजार उनके समर्थन में आ रहा है। उनकी फिल्में चल रही हैं। देव डी, लव आज कल और कमीने की कामयाबी ऐतिहासिक है। यह 2009 की बड़ी घटना है।

Sunday, August 23, 2009

यूजी मेरे गुरुदेव: महेश भट्ट



मैं यूजी से अपने रिश्ते को परिभाषित नहीं कर सकता। क्या हमारे बीच गुरु-शिष्य का रिश्ता था? हाँ था, लेकिन यूजी खुद को गुरु नहीं मानते थे और न मुझे शिष्य समझते थे। कुछ था उनके अंदर, जो उनके सत्संग और संस्पर्श से मेरे अंदर जागृत हो उठता था। उनके स्पर्श ने मुझे झंकृत कर दिया था, मानो मेरे तन-मन के सारे तार बज उठे हों। उन पर लिखी अपनी पुस्तक ए टेस्ट ऑफ लाइफ की पिछले दिनों मुंबई में रिलीज के मौके पर मैं इतना द्रवित हो उठा था कि खुद को रोकने के लिए मुझे अपनी उंगली दांतों से काटनी पड़ी। अनुपम खेर को मेरा उंगली काटना हास्यास्पद लगा, लेकिन मुझे कोई और उपाय नहीं सूझा। मैंने इंगमार बर्गमैन की फिल्मों में देखा था कि उनके किरदार गहरे दर्द से निकलने के लिए खुद को जिस्मानी तकलीफ पहुंचाते थे, ताकि दर्द कहीं शिफ्ट हो जाए। मैं वही कर रहा था। मेरे अंदर उनकी यादों का ऐसा समंदर है, जो बहना शुरू हो जाए तो रूकेगा ही नहीं। उस दिन जो सभी ने देखा, वह तो एक कतरा था।
यूजी से अपने रिश्ते पर मैं घंटों बात कर सकता हूं। मेरी बातचीत में शिद्दत ऊंची होगी और समुद्री ज्वार की तरह मेरे शब्द उछाल मारेंगे। उनकी बातें करते हुए मेरी हड्डियों से एहसास का लावा निकलता है। ए टेस्ट ऑफ लाइफ मैंने उनके अंतिम दिनों पर लिखी है। अब मेरी समझ में आ रहा है कि क्यों हर संस्कृति में लोग अपने गुरु और उस्ताद की बातें करते हुए कभी नहीं थकते। स्वामी विवेकानंद क्यों हमेशा रामकृष्ण परमहंस का उल्लेख करते थे? क्यों जलालुद्दीन रूमी सिर्फ शम्स की बातें करता है? एक अजीब सा रिश्ता होता है वह। वह रिश्ता माता-पिता के वात्सल्य और प्रेमिका के प्रेम से भी अलग और बड़ा होता है। उस रिश्ते की गर्मी के बराबर का ताप कोई और रिश्ता नहीं दे सकता। जिस तरह मेरी मां ने अपने शरीर से मुझे जन्म दिया, वैसे ही यूजी ने मुझे तराशा और नया जन्म दिया। महेश भट्ट अगर कुछ है। उसकी कोई आवाज है। तो उस आवाज में यूजी का जादू है।
मैं विद्रोही और अराजक किस्म का व्यक्ति था। जीवन में कहीं बंध कर नहीं रहा। स्वच्छंद विचार और व्यवहार आकर्षित करते थे। जवानी में एलएसडी के सेवन के बाद रहस्यात्मक आध्यात्मिक एहसास हुआ। वह दौर ही ऐसा था। हम सभी छटपटा रहे थे। सांस्कृतिक कैद से निकलना चाह रहे थे। हर तरफ झूठ का ढांचा हावी था। वह हमें अपनी गिरफ्त में लेना चाहता था। हम उस ढांचे से निकलना चाहते थे। मेरे स्वभाव में आध्यात्मिकता थी। मैं बचपन से ही योगी की मुद्रा में बैठ जाता था। मेरी मां पूछती थी, 'तू फकीर है क्या? ऐसे योगियों की तरह पालथी क्यों मारता है? चुप बैठा रहता है। श्मशान घाट में जाकर बैठता है।' मैं शिवाजी पार्क में भटकता रहता था। मां मुझे जबरदस्ती खेलने के लिए भेजती थी। मां का झूठ, पड़ोसियों से मिला अपमान और उस अपमान का रिसता घाव ़ ़ ़ चीखने-चिल्लाने का मन करता था।
16-17 की उम्र में इश्क किया। छोटी उम्र में शादी कर ली। बीस की उम्र में तो पूजा का बाप बन गया था मैं।
मुश्किलों और उलझनों से भरी जिंदगी रही। फिर रजनीश, जे. कृष्णमूर्ति और उनके प्रवचन ़ ़ ़ तोते की तरह उनके शब्दों को दोहराना, मगर एक गहरा एहसास कि उन शब्दों से जख्मी जिस्म ढंका जा सकता है। घाव तो फिर भी रिसता रहेगा। पोशाक से घाव नहीं रुकते। जिस लड़की से शादी की थी। उससे विश्वासघात किया। परवीन बाबी से इश्क किया। ढाई साल तक मेरी समझ में नहीं आया कि जीवन की नाव किधर जा रही है? उसी दरम्यान यूजी से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा कि अपने जीवन और तकलीफों से मुक्ति नहीं पा सकते। यहीं जीना और यहीं मरना है। तुम अगर किसी सत्य की खोज में हो तो वह किसी के यहां नहीं मिलेगा। अपने ढंग से जियो और लड़ो। उनकी इन बातों ने मेरी दिशा बदल दी। फिर अर्थ और सारांश बनी। जिंदगी की नयी शुरुआत हुई।
33 की उम्र में मैं मशहूर हो गया था। फिर लगा कि क्या जिंदगी भर यही करते रहेंगे? सिर्फ फिल्में बनाते रहेंगे? मन में सवाल उठे। उनके जवाब नहीं मिले। यूजी के पास पहुंचे। उनकी बातों में जवाब मिला। उन्होंने बताया कि जीना ही जिंदगी का अर्थ है। उसे भरपूर जियो। जिंदा आदमी जीता है। देखें तो वास्तव में हमारे पास अपने सवाल नहीं होते। हम अपने पूर्वजों के दिए जवाबों को ही सवाल बना देते हैं और नए जवाब खोजते हैं। उनसे सीखा कि अपनी औकात समझो। हमें भ्रम रहता है कि हम बहुत कुछ जानते हैं, जबकि हम कुछ खास नहीं जानते हैं। यूजी के साथ के बावजूद क्या मैं जिंदगी के रहस्य समझ पाया हूं? नहीं, बिल्कुल नहीं। दर्द क्या होता है? तकलीफ क्यों होती है? प्यार क्यों होता है? प्यार क्यों खत्म हो जाता है?
हमारे रिश्ते को गुरु-शिष्य संबंध कहना ही ठीक रहेगा। मां और यूजी से ही मेरा संपूर्ण रिश्ता हो पाया। यूजी का दर्जा थोड़ा ऊंचा ही रहेगा। हम दोनों दुनियावी व्यक्ति थे। पैसे कमाने की बात करते थे। उन्होंने मुझे लिखना सिखाया और कहा कि अपनी आवाज लोगों तक पहुंचाओ। उन्होंने कहा कि अगर तुम्हें लगता है कि मैंने तुम्हारे लिए कुछ किया तो वही लोगों के साथ करो। उन्हें बताओ, संभालो, तराशो और उनकी क्षमताओं से उन्हें परिचित कराओ। उनसे मेरा रिश्ता भावनात्मक ही रहा। मैं बौद्धिक और आध्यात्मिक नहीं हूं। वे भी नहीं थे। उनकी खुशबू मेरी रूह में उतर गयी है। मेरे अंदर उनकी ही महक है। मैं जो भी हूं, वह यूजी का रचा है। मैं पूरी तरह जिंदगी में डूबा हुआ हूं, लेकिन मेरा दम नहीं घुट रहा है। मेरी सांसें चलती रहती हैं। मैं पूरी शिद्दत से हर काम करता हूं, लेकिन उस काम की नश्वरता भी समझता हूं। मैं आईना हो गया हूं। मैं जहां रहता हूं, वही दिखता है मुझ में!''

Friday, August 21, 2009

फ़िल्म समीक्षा:सिकंदर

आतंकवाद के साए में तबाह बचपन
-अजय ब्रह्मात्मज

निर्देशक पीयूष झा ने आतंकवाद के साए में जी रहे दो मासूम बच्चों की कहानी के मार्फत बड़ी सच्चाई पर अंगुली रखी है। आम जनता ने नुमाइंदे बने लोग कैसे निजी स्वार्थ के लिए किसी का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। सिकंदर मुश्किल स्थितियों में फंसे बच्चे तक ही सीमित नहीं रहती। कश्मीर की बदल रही परिस्थिति में राजनीति के नए चेहरों को भी फिल्म बेनकाब करती है।
सिकंदर के मां-बाप को जिहादियों ने मार डाला है। अभी वह अपने चाचा के साथ रहता है। स्कूल में उसके सहपाठी उसे डपटते रहते हैं। फुटबाल के शौकीन सिकंदर की इच्छा है कि वह अपने स्कूल की टीम के लिए चुन लिया जाए। स्कूल में नई आई लड़की नसरीन उसकी दोस्त बनती है। कहानी टर्न लेती है। सिकंदर के हाथ रिवाल्वर लग जाता है। वह अपने सहपाठियों को डरा देता है। रिवाल्वर की वजह से जिहादियों का सरगना उससे संपर्क करता है। वह वाशिंग मशीन खरीदने की उसकी छोटी ख्वाहिश पूरी करने का दिलासा देता है और एक खतरनाक जिम्मेदारी सौंपता है। दिए गए काम के अंजाम से नावाकिफ सिकंदर गफलत में जिहादी सरगना का ही खून कर बैठता है। एक मासूम जिंदगी तबाह होती है और फिर हम अमन की पालिटिक्स करने वालों के खूनी इरादों से परिचित होते हैं।
फिल्म में सिर्फ सिकंदर पर फोकस रहता तो यह फिल्म बहुत ही प्रभावशाली बन पाती। थरथराते मासूम बच्चों की जिंदगी में मची हलचल से हमें आतंकवाद का भारी खतरा नजदीक से महसूस होता। ऐसा लगता है कि कश्मीर में किसी को बच्चों की परवाह नहीं है। अमनपसंद नेता, आतंकवादी और फौज सभी अपने हित के लिए सिकंदर का इस्तेमाल करते हैं। इस्तेमाल की वजह और तरीकों के चित्रण में फिल्म की मूल कथा कमजोर पड़ जाती है। हमारा ध्यान भटकता है। बड़ों की राजनीति बच्चों की मासूमियत उलझ जाती है।
फरजान दस्तूर ने सिकंदर की भूमिका शानदार तरीके से निभाई है। वे उसकी निरीहता और दुविधा को अभिव्यक्त कर सके हैं। आयशा कपूर के अभिनय में स्वाभाविकता नहीं है। वह नसरीन की भूमिका में ढल नहीं पाई हैं। फौज के अधिकारी के रूप में आर माधवन, अमन पसंद नेता के रूप में संजय सूरी और जिहादी सरगना के रूप में अरुणोदय सिंह निराश नहीं करते। फिल्म का आखिरी गीत में बच्चों की संवेदना अच्छी तरह प्रकट हुई है।

Thursday, August 20, 2009

निगाह है इंटरनेशनल मार्केट पर

-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों शाहरुख खान और करण जौहर की कामयाब जोड़ी ने अमेरिका की मशहूर फिल्म कंपनी ट्वेंटीएथ सेंचुरी फॉक्स की एशिया में कार्यरत कंपनी फॉक्स स्टार स्टूडियो से समझौता किया। इस समझौते के तहत फॉक्स उनकी आगामी फिल्म माई नेम इज खान का विश्वव्यापी वितरण करेगी। इस समझौते की रकम नहीं बताई जा रही है, लेकिन ट्रेड पंडित शाहरुख और काजोल की इस फिल्म को 80 से 100 करोड़ के बीच आंक रहे हैं।
करण जौहर की फिल्में पहले यशराज फिल्म्स द्वारा वितरित होती थीं। उन्होंने अपने प्रोडक्शन की अयान मुखर्जी निर्देशित वेकअप सिड और रेंजिल डी-सिल्वा निर्देशित कुर्बान के वितरण अधिकार यूटीवी को दिए। तभी लग गया था कि करण अपनी फिल्मों के लिए यशराज के भरोसे नहीं रहना चाहते। दोस्ती और संबंध जरूरी हैं, लेकिन फिल्मों का बिजनेस अगर नए पार्टनर की मांग करता है, तो नए रिश्ते बनाए जा सकते हैं। अपनी फिल्म के लिए एक कदम आगे जाकर उन्होंने फॉक्स से हाथ मिलाया। उन्हें ऐसा लगता है कि फॉक्स उनकी फिल्म माई नेम इज खान को इंटरनेशनल स्तर पर नए दर्शकों तक ले जाएगी। हम सभी जानते हैं कि करण हिंदी फिल्मों के ओवरसीज मार्केट में बहुत पॉपुलर हैं। अमेरिका और इंग्लैंड के भारतवंशी तक ही वे सीमित नहीं हैं। उन्होंने फ्रांस, जर्मनी और मध्य एशिया के बाजार में भी अपनी फिल्मों के लिए जगह बनाई है। उनकी फिल्मों की इस लोकप्रियता का फायदा बाकी फिल्म और निर्माता-निर्देशकों को भी हुआ है। उन्होंने हिंदी फिल्मों में विदेशी पृष्ठभूमि, आप्रवासी किरदार और संबंध-रिश्तों की भारतीयता के जरिए हिंदी फिल्मों में नया ट्रेंड आरंभ किया। दूसरे मेकर उनकी नकल करने में उतने सफल नहीं रहे, लेकिन निश्चित ही देश के विषय और किरदारों से वे विमुख हुए। उनका ध्यान भी विदेशी बाजार और मुनाफे की तरफ गया है। इन दिनों हिंदी फिल्मों की आमदनी का एक बड़ा स्रोत ओवरसीज मार्केट है। निस्संदेह इस मार्केट की संभावना को करण ने पहली बार एक्सप्लोर किया।
फॉक्स के साथ हुए समझौते के बाद बातचीत करते हुए करण ने स्पष्ट बताया, हम अपनी सोच, योग्यता और दृष्टि जैसे पार्टनर की तलाश में थे। ऐसा पार्टनर ही माई नेम इज खान जैसी मानवीय भावना की फिल्म की सही मार्केटिंग कर सकता है। ये भावनाएं पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक हैं। फॉक्स की मदद से हम दुनिया के दर्शक को बता सकेंगे कि उनके लिए भारतीय सिनेमा के पास क्या है? हम मानवीय रिश्ते और भावनाओं की ऐसी कहानी कहने में सक्षम हैं, जो पूरे विश्व को प्रभावित कर सके।
करण जौहर अपनी फिल्म का बाजार विदेश में बढ़ाना चाहते हैं। दरअसल, उनके लिए यह स्वाभाविक है। वे जिस देश-दुनिया में रहते हैं और जिसे वे अपने हिसाब से समझते हैं, उनके लिए ही वे फिल्में बना सकते हैं। जाहिर है कि उन्हें अपनी फिल्मों के दर्शक विदेश में ही मिलेंगे। भारतीय दर्शक उनकी फिल्मों के प्रति आकृष्ट होते हैं, लेकिन गौर करें, तो उनकी कोई भी फिल्म महानगर की सीमा के बाहर के दर्शकों को नहीं लुभा सकी है। छोटे शहर, कस्बे और गांव में उनकी फिल्में शहरों जैसा व्यवसाय नहीं करतीं। करण की यह सीमा ही उनकी विशेषता बन गई है। इसी से उन्हें सफलता मिली है। उनकी इस सफलता का दुष्प्रभाव यह है कि दूसरे निर्देशक भी ओवरसीज और इंटरनेशनल मार्केट की चाहत में करण की असफल नकल करते हैं। इस प्रक्रिया में ज्यादातर हिंदी फिल्में अपनी जमीन छोड़ रही हैं और कथ्य के स्तर पर विदेश की तरफ मुड़ रही हैं। सभी इंटरनेशनल मार्केट में अपनी दुकान चाहते हैं।

एक तस्वीर:अजब प्रेम की गजब कहानी


रणबीर कपूर और कैटरिना कैफ के इस इस अजब प्रेम की गजब कहानी राज कुमार संतोषी लेकर आ रहे है। यह पहली तस्वीर है। आप बताएं कि इस गजब कहनी की फ़िल्म को देखने के लिए कितने उत्सुक हैं।

Tuesday, August 18, 2009

सुनहरे दिनों की सुनहरी नायिका लीला नायडू-विपिन चौधरी


सुन्दरता सच में बेहद मासूम होती है। मासूम के साथ-साथ सहज भी। खूबसूरती, मासूमयिता और नफासत देखनी हो कई नामों की भीड से गुजरते हुये हिंदी फिल्मों में अपनी छोटी लेकिन मजबूत उपस्तिथी दर्ज करवाने वाली नायिका लीला नायडू का नाम हमारे सामने आता है। उन दिनों जब जीवन बेहद सरल होता था और लोग भी सीधे-साधे।
उन सुनहरे दिनों की बात की जाये जब सोना सौ प्रतिशित खरा सोना होता था। उनही दिनों के आगे पीछे की बात है जब हरिकेश मुखजी की' अनुराधा' फिल्म आई थी। नायक थे बलराज साहनी और नायिका थी लीला नायडू। जिस सहजता, सरलता का ताना बाना ले कर मुखर्जी फिल्में बनाते है उसी का एक और उदाहरण है उनकी यह फिल्म। उनकी फिल्मों में आपसी रिश्तों की बारीकियों सहज ही दिखाई देती थी।
अनुराधा,फिल्म की नायिका लीला नायडू का मासुम सौन्दर्य देखते ही बनता था और उससे भी मधुर था उनके संवादों की अदायगी। सहअभिनेता भी वो जो सहज अभिनय के लिये विख्यात हो और अभिनेत्री की सहजता भी काबिले दाद। महीन मानवीय सम्बंधों पर पैनी पकड वाले निदेशक ऋषिकेश मुखर्जी ने १९८० में फिल्म बनाई थी अनुराधा। दांपत्य जीवन के सम्बंधो में तमाम तरह के उतार चढाव का लेखा जोखा लिये है यह फिल्म। फिल्म का संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ था। जाने कैसे सपनों में खो गई अँखियाँ, मैं तो हुँ जागी मेरी सो गई अखियाँ, कैसे दिन बीते, कैसे बीती रतिया जैसे गीत आज भी सुनते ही एक मनोरम दुनिया में ले जाते हैं। बाक्स आफिस में इस फिल्म में भले ही सफलता ना पायी हो पर इसकी गुणवता के लिये इसे राष्टीय पुरूस्कार मिला था।
एक सीधे साधे डाक्टर निर्मल चौधरी के जीवन की कहानी है 'अनुराधा'। जिसके लिये पूरा जीवन दूसरों की हारी बिमारी से लडते ही बीतता है। वह यह भूल जाता है कि घर में एक स्त्री भी है जो केवल उसी के लिये ही बैठी है जिसका सारा जीवन अपने पति की सेवा-टहल में ही बीतता जाता है। वह देर रात तक अपने पति का इंतजार करती है पर उसका इंतजार कडी प्रतीक्षा वाला है। जो बेहद लम्बा होता ही चला जाता है इस बीच वह तमाम तरह के विचारों में खोई रहती है। जिस प्यार के संग साथ रहने के लिये वह अपने पिता का घर छोड कर चली आयी थी उनके बताये रिश्ते को ठुकरा कर, वह प्यार तो अब कहीं नहीं है। अब तो केवल इंतजार है जो दिन की तरह सूखा, शाम की तरह उदास और रात की तरह बेहद सुनसान है। यहाँ तक की अपने संगीत के शौक को जो उसके व्यक्तित्व का ही सबसे प्रबल अंग था को भूल चुकी है। अब पति के सेवा ही उसके लिये सब कुछ है।
अनुराधा की लडकी रानू अपने पिता से कहती है की माँ का नाम तो अनुराधा राय है। तो उसक पिता उसे सुधारते हुये कहता है की नहीं तुम्हारी माँ का नाम अनुराधा नहीं अनुराधा चौधरी है तो साफ है की तुम्हारी माँ का पुरा अस्तितव केवल मुझ से जुडा है। १९६० के आसपास कामकाजी महिलाओं के सख्या ज्यादा नहीं थी। महिलायें केवल चुल्हें चौके तक ही सीमित थी। पति, बच्चों के चले जाने पर वे अकेलेपन से ही लडती रहती थी।
जीवन इसी तरह धीमी रफतार से चल रहा था कि अचानक उसमें हलचल हुई। हुआ यह की जिस व्यक्ति( दीपक, अभी भटा) से अनुराधा के पिता अनुराधा की शादी करवाना चाहते थे वो अपनी दोस्त के साथ कहीं जा रहे थे कि उनकी गाडी दुर्घटना का शिकार हो गई और वे उसी गावँ में उसी डाक्टर यानि बलराज साहनी, निमल चौधरी के मेहमान बने। वहाँ दीपक ने अनुराधा की व्यथा-गाथा भाँप ली। तब उसने अनुराधा को अपने संगीतमयी दिनों की ओर लौटने को कहा। एक बार अनुराधा ने बेहद दुखी मन से अपने उनहीं पुराने दिनों की ओर लौटने का मन बनाया पर अंत में उसने अपना इरादा बदल लिया। अनुराधा का पति प्रेम इतना गहरा और परिपक्व था जो अपने को दूर जाने से रोकता रहा। यह उस समय के प्रेम का गाढापन था जो बलिदान, प्रतीक्षा, प्रेम, धैर्य माँगता था। आखिर का वह सीन जिस में लीला नायडू झाडू लगा रही है और बलराज सहानी उसे घर में देख कर हैरान रह जाते है, जो शायद यह सोचते हैं कि अनुराधा अपने पिता के घर चली गयी है। वे पुकारते है अनु, और अनुराधा दौड कर उनके गले लग जाती है। बेहद मार्मिक सीन है।
अनुराधा के बाद लीला नायडू, उम्मीद, ये रास्ते हैं प्यार के, त्रिकाल और हालीवुड की चंद फिल्मों में अपने मासूम सौन्दर्य की छटा बिखेर कर एक व्यवसायी से शादी कर लेती है। उनकी सुन्दरता देश में ही नहीं विदेश तक में ही मशहूर हो गई थी। संसार की दस सबसे खूबसूरत महिलाओं में शामिल करते हुये उन्हें "वोग' पत्रिका में स्थान दिया गया । वे फ्रेंच माँ और भारतीय पिता की संतान थी। सुन्दरता अपने साथ अलग तरह की योग्यता माँगती है जो लीला नायडू में बखूबी थी।
फिल्मों से दूर जा कर लीला नायडू अपनी गृहस्थी में रम गयी। उसके बाद वे धीरे धीरे फिल्मों से किनारा करती चली गई।
लम्बी बिमारी के बाद उनका २७ जुलाई २००८ में उनका देहांत हो गया। पर उनकी खूबसूरती और फिल्मों में उनका सहज अभिनय के अलग अंदाज के कारण लीला नायडू हमेशा याद की जायेगीं।

Sunday, August 16, 2009

दरअसल:आशुतोष की युक्ति, प्रियंका की चुनौती

-अजय ब्रह्मात्मज

आशुतोष गोवारीकर ने अपनी नई फिल्म ह्वाट्स योर राशि? के लिए अपनी गंभीर मुद्रा छोड़ी है। लगान के बाद वे लंबी और गंभीर फिल्में ही निर्देशित करते रहे। आशुतोष को करीब से जो लोग जानते हैं, वे उनके विनोदी स्वभाव से परिचित हैं। ऐसा लगता है कि हरमन बवेजा और प्रियंका चोपड़ा की इस फिल्म में लोग आशुतोष के इस रूप से परिचित होंगे।

फिल्म ह्वाट्स योर राशि? गुजराती के उपन्यासकार मधु राय की कृति किंबाल रैवेंसवुड पर आधारित है। मधु वामपंथी सोच के लेखक हैं। उन्होंने इस कृति में भारतीयता की खोज में भारत लौट रहे आप्रवासी भारतीयों की समझ का मखौल उड़ाया है। वे भारत के मध्यवर्गीय परिवारों पर भी चोट करते हैं। उपन्यास के मुताबिक योगेश ईश्वर पटेल पर दबाव है कि वह भारत की ऐसी लड़की से शादी करे, जो सुसंस्कृत और भारतीय परंपरा में पली हो। भारत आने के बाद योगेश को अहसास होता है कि भारत की लड़कियों का नजरिया और रहन-सहन बदल चुका है। योगेश की इन मुठभेड़ों पर ही कहानी रची गई है।

वर्षो पहले 1989 में केतन मेहता ने इसी उपन्यास पर मिस्टर योगी नाम का धारावाहिक बनाया था। धारावाहिक में मोहन गोखले ने योगेश की भूमिका निभाई थी। उसमें योगेश बारह राशियों की बारह लड़कियों से मिलता है। उनमें से कोई भी उसे पसंद नहीं आती। वह आखिरकार किसी और लड़की से शादी कर लेता है। केतन मेहता ने तब टीवी पर एक्टिव 14 लड़कियों को अलग-अलग भूमिकाएं सौंपी थीं।

पूरे बीस साल बाद आशुतोष ने उसी उपन्यास पर ह्वाट्स योर राशि? की स्क्रिप्ट लिखी है। इस बार उन्होंने थोड़ा परिवर्तन किया है। कास्टिंग में किया गया यह परिवर्तन कमाल कर सकता है। प्रियंका चोपड़ा को आशुतोष ने बड़ा मौका दिया है। उन्होंने इस फिल्म में बारह राशियों की बारह लड़कियों की भूमिका अकेले प्रियंका चोपड़ा को दे दी है। प्रियंका ने आशुतोष की दी गई चुनौती के अनुरूप मेहनत की है। वे काफी खुश हैं और ऐसी चुनौती की वजह से खुद को भाग्यशाली मानती हैं। लोगों को याद होगा कि इसी फिल्म के सेट पर मेहनत और थकान की वजह से प्रियंका अचेत हो गई थीं। पर्दे पर बारह किरदार को निभाने की चुनौती बड़ी है, क्योंकि हर किरदार को अलग रखना है। रूप-रंग और बात-व्यवहार के ढंग में कोई समानता नहीं होनी चाहिए। यह तो फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा कि प्रियंका इन किरदारों के साथ न्याय कर सकी हैं या नहीं? दरअसल, आशुतोष की भी मजबूरी रही होगी। उस मजबूरी के तहत ही उन्होंने कास्टिंग में यह प्रयोग किया होगा। एक फिल्म के लिए बारह हीराइनों को जुटा पाना फाइनेंशियली और क्रिएटिवली मुश्किल काम है। एक तो हर हीरोइन का इगो इतना बड़ा होता है कि वे दूसरे से कम फुटेज और लाइनों के लिए तैयार नहीं होतीं। दूसरे फिल्म की नायिका होने के लिए भी होड़ रहती है। लिहाजा इन सारी मुश्किलों से बचते हुए आशुतोष ने तरकीब निकाली। उन्होंने प्रियंका को एकमुश्त जिम्मेदारी दे दी। वैसे, कहा यह भी जा रहा है कि अभी के हालात में हरमन के लिए बारह हीरोइन खोज पाना मुमकिन ही नहीं था। चूंकि हरमन और प्रियंका ज्यादा करीब थे, इसलिए यह युक्तिपूर्ण समीकरण काम कर गया।

आशुतोष ने अपनी अगली फिल्म की घोषणा कर दी है। वे चिटगांव प्रसंग के एक क्रांतिकारी पर फिल्म बनाना चाहते हैं, जिसमें अभिषेक बच्चन की मुख्य भूमिका होगी। फिलहाल हमारी नजर ह्वाट्स योर राशि? पर टिकी है। देखें आशुतोष दर्शकों को किस हद तक संतुष्ट कर पाते हैं?


Saturday, August 15, 2009

फ़िल्म समीक्षा:कमीने

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बैड ब्वाय के एंगल से गुड ब्वाय की कहानी

-अजय ब्रह्मात्मज

वह चलता है, मैं भागता हूं-चार्ली
(लेकिन दोनों अंत में साथ-साथ एक ही जगह पहुंचते हैं। जिंदगी है ही ऐसी कमीनी।)
समकालीन युवा निर्देशकों में विशाल भारद्वाज महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। अगर आपने विशाल की पिछली फिल्में देखी हैं तो कमीने देखने का रोमांच ज्यादा होगा। अगर उनकी कोई फिल्म पहले नहीं देखी है तो शैली, शिल्प, संवाद, दृश्य, दृश्य संयोजन, संरचना, बुनावट, रंग, प्रकाश और टेकिंग सभी स्तरों पर नवीनता का एहसास होगा। एकरेखीय कहानी और पारंपरिक शिल्प के आदी दर्शकों को झटका भी लग सकता है। यह 21वीं सदी का हिंदी सिनेमा है, जो गढ़ा जा रहा है। इसका स्वाद और आनंद नया है।
विशाल भारद्वाज ने जुड़वां भाइयों की कहानी चुनी है। उनमें से एक बैड ब्वाय और दूसरा गुड ब्वाय है। बचपन की एक घटना की वजह से दोनों एक-दूसरे को नापसंद करते हैं। उनकी मंजिलें अलग हैं। बैड ब्वाय जिंदगी में कुछ भी हासिल करने के दो ही रास्ते जानता है-एक शार्टकट और दूसरा छोटा शार्टकट। जबकि गुड ब्वाय ने अपनी आलमारी के भीतरी पल्ले पर 2014 तक का अपना लाइफ ग्राफ बना रखा है। नएपन के लिए जुड़वां भाइयों की इस कहानी में एक तुतलाता और दूसरा हकलाता है। कमीने बैड ब्वाय चार्ली के नजरिए से पेश की गई है।
कमीने में विशाल भारद्वाज की शैली, संवाद और शिल्प में पहले की फिल्मों की अपेक्षा निखार है। कलात्मक सृजन के हर क्षेत्र में नए और युवा सर्जक को अपनी शैली साधने में वक्त लगता है। इस फिल्म में विशाल सिद्धहस्त होने के करीब पहुंचे हैं। उन्होंने कुछ दृश्यों को तीव्र अतिनाटकीयता और चुटीलेपन के साथ रचा है। इन दृश्यों में हम रमते हैं, जबकि ये दृश्य मुख्य कहानी का हिस्सा नहीं होते। विशाल की फिल्मों में अनेक किरदार होते हैं और उनकी सुनिश्चित भूमिकाएं होती हैं। गौर करें तो पाएंगे कि उनकी फिल्मों में एक्स्ट्रा या जूनियर आर्टिस्ट की जरूरत नहीं होती। उनकी फिल्मों पर टरनटिनो (रिजर्वायर डाग, पल्प फिक्शन और किल बिल के निर्देशक) की फिल्मों का स्पष्ट प्रभाव है। भारतीय फिल्मकारों में वे एक स्तर पर जेपी दत्ता के करीब लगते हैं।
विशाल कलाकारों से काम निकालने में माहिर हैं। उनकी फिल्मों में स्टार अपना चोगा उतार कर कलाकार बन जाते हैं और फिर पर्दे पर किरदार के रूप में नजर आते हैं। कमीने में शाहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा अपने करिअर की उत्कृष्ट एवं उल्लेखनीय भूमिकाओं में हैं। जुड़वा भाइयों चार्ली और गुड्डू का चरित्रांकन इतना अलग है कि शाहिद कपूर की मेहनत रंग लाती है। प्रियंका चोपड़ा मराठी मुलगी के रूप में प्रभावित करती हैं। लेकिन जब वह हिंदी बोलने लगती हैं तो संवाद अदायगी में मराठी असर खत्म हो जाता है। अमोल गुप्ते समेत छोटी-मोटी भूमिकाओं में आए सभी कलाकारों को निर्देशक ने पूरे मनोयोग से कहानी में गूंथा है। सभी कलाकारों ने अभिनय से अपने हिस्से आए दृश्यों को प्रभावशाली बना दिया है।
फिल्म में पुराने पापुलर गानों के रेफरेंस सार्थक एवं उपयोगी हैं। विशाल को सामान्य और पापुलर रेफरेंस से परहेज नहीं है। बल्कि यूं कहें कि इनके उपयोग से वह अपने कथ्य और भाव को अधिक सघन एवं संप्रेषणीय बना देते हैं। संगीत पर उनकी उम्दा पकड़ है। चूंकि गुलजार फिल्म में सक्रिय विशाल भारद्वाज के मनोभाव समझते हैं, इसलिए उन्हें सही शब्द दे देते हैं।
कमीने में अभिनय, दृश्य संयोजन, संवाद, लोकेशन, टेकिंग आदि उत्तम है, लेकिन फिल्म का समन्वित प्रभाव थोड़ा कमजोर है। फिल्म के क्लाइमेक्स में विशाल उलझ गए हैं। यह कमी उनकी पिछली फिल्मों में भी रही है।वे उम्दा किस्म के मजबूत और रंगीन धागों का इस्तेमाल करते हैं,डिजाईन भी आकर्षक चुनते हैं,किंतु बुनावट में कसार रह जाती है.

Tuesday, August 11, 2009

हिन्दी टाकीज:काश, लौटा दे मुझे कोई वो सिनेमाघर ........ -सुदीप्ति

हिन्दी टाकीज-४५
चवन्नी को यह पोस्ट अचानक अपने मेल में मानसून की फुहार की तरह मिला.सुदीप्ति से तस्वीर और पसंद की १० फिल्मों की सूची मांगी है चवन्नी ने.कायदे से इंतज़ार करना चाहिए था,लेकिन इस खूबसूरत और धड़कते संस्मरण को मेल में रखना सही नहीं लगा.सुदीप्ति जब तस्वीर भेजेंगी तब आप उन्हें देख सकेंगे.फिलहाल हिन्दी टाकीज में उनके साथ चलते हैं पटना और सिवान...
bबिहार के एक छोटे से गाँव से निकलकर सुदीप्ति ने पटना वूमेन'स कॉलेज और जे एन यू में अपनी पढ़ाई की है। छोटी-छोटी चीजों से अक्सरहां खुश हो जाने वाली, छोटी-छोटी बातों से कई बार आहत हो जाने वाली, बड़े-बड़े सपनों को बुनने वाली सुदीप्ति की खुशियों की चौहद्दी में आज भी सिनेमा का एक बहुत बड़ा हिस्सा मौजूद है।जितनी ख़ुशी उनको इतिहास,कहानियों,फिल्मों और मानव-स्वभाव के बारे में बात करके मिलती है, उससे कहीं ज्यादा खुश वो पटनहिया सिनेमाघरों के किस्सों को सुनाते हुए होती हैं. झूठ बोलकर या छुपाकर ही सही, खुद सिनेमा देखने बिहार में सिनेमाघर में चले जाना, बगैर किसी पुरुष रिश्तेदार/साथी के, साहस और खुदमुख्तारी को महसूस करने का इससे बड़ा जरिया भला और क्या हो सकता था उनके लिए तब...
बढ़ती उम्र, बदलते सिनेमाघर
हम दो छोटे-छोटे शब्दों का इस्तेमाल अक्सर करते हैं--एक शब्द है मज़ा और दूसरा मस्ती। मेरे लिए अगर इनका कोई मायने है तो वह सिनेमा से अभिन्न रूप से जुडा हुआ है।
ज़िन्दगी में मैंने चाहे जितने 'मज़े' किये, उनमें से नब्बे फीसदी फिल्मों की वजह से किये। आज अगर मैं किसी को कहती हूँ कि एक ज़माने में हमने भी खूब 'मस्ती' की है तो उस वक़्त कहीं न कहीं दिमाग में वो ही दौर रहता है जो ग्रेजुएशन के समय में हमारे छोटे से 'गैंग' ने फिल्में देखते हुए गुजारा।
सिनेमा मेरे लिए पैशन है....था भी...और शायद रह भी जाये...., पर वो बात अलग थी; कैसे?
चलिए बात शुरू से ही बताती हूँ।
मेरा पहला सिनेमाघर
चलती हुई कहानी देखने का मेरा सबसे पहला अनुभव तब का है, जब मैं अपने माँ-पापा के साथ एक बार सिवान के मशहूर सिनेमाघर 'दरबार हॉल' में फिल्म देखने गयी थी। जिस पहली फिल्म की धुंधली-सी छाया आज तक बनी हुई है, वो है 'राम तेरी गंगा मैली'। माशाअल्लाह...! शुरुआत ही ऐसी थी; पर मैं सिनेमा के शौकीन अपने माँ-पापा के पास से पढ़ाई के लिए अपनी नानी के घर चली आई। सिवान जिले के महाराजगंज प्रमंडल के पकवलिया नामक गाँव में।वहां से फिल्म देखने तो किसी के 'ले जाने' पर ही जाया जा सकता था. दिक्कत यह कि मामा लोग तो बाहर रह कर पढाई करते थे, अब हमें फिल्म कौन ले जाये? तभी घर में टी. वी. का दाखिला हुआ. वो रामायण-महाभारत का ज़माना था. सिनेमा न सही, टी. वी. ही सही- की तर्ज पर बचपन में टी. वी. से चिपकने की मेरी आदत हजारों लानतें सुनकर भी नहीं सुधरी.
***
जब मैं आठवीं में आई तो मेरे फ्रेंड्स महाराजगंज के ही छोटे से हॉल में जा कर फिल्मे देखते थे, पर प्रोफेसर साहब की नातिन के रूप में शहर भर में मेरी जो पहचान हो गयी थी (जिसके चलते उस छोटे से शहर में दूर से ही मेरी साईकिल तक पहचान ली जाती थी) उसे देखते हुए कभी मैंने 'रिस्क' नहीं लिया!दूरदर्शन पर जिन सैकड़ों फीचर फिल्मों को देख-देख मैंने खुद को दिलासा दिए रखा,उनमें बावर्ची ,कटी पतंग,अराधना,अभिमान जैसी फिल्में भी होती थीं,जो आस-पड़ोस के लोगों के साथ हॉउसफुल जाती थीं और सूरज का सातवाँ घोड़ा जैसी फिल्म भी होती थी, जिसे देखने बैठे घर के लोग भी एक-एक कर उठ जाते और मौसी बार-बार कहने लगती कि- "टी।वी. बंद कर दो, बैटरी बचेगी तो कल 'रिपोर्टर' (धारावाहिक) देखा जायेगा". मैं रुआंसी हो उसकी तरफ देखती और जब विज्ञापन (उस समय हम प्रचार कहते थे) आता तो बंद कर देती, पर प्राण तो उस बुद्धू बक्से में ही कैद रहते! सो मिन्नतें करती कि बीच-बीच में देख सकूँ. आज तक सूरज का सातवाँ घोड़ा उन्हीं छोटे-छोटे टुकडों में ही दिमाग में कैद है; जबकि अच्छे से देखी हुईं कई फिल्में गायब हो चुकी है. इसे अच्छे सिनेमा का प्रभाव भी कह सकते हैं या मेरे सिनेमा-प्रेम का जिद्दी रूप भी. खैर,मेरा पहला सिनेमाघर टी.वी. ही था, जिसने सिनेमा के प्रति मेरे लगाव को जिलाए रखा.
किशोर उम्र और असली सिनेमाघर की डगर
अपनी मुकम्मल याददाश्त में हॉल में देखी पहली फिल्म है- बंजारन, जो पटना के चाणक्या या एलिफिस्टन सिनेमा हॉल में मेरी पसंद से प्रकाश आचार्य जी ने दिखाया और संजीव-संदीप को मन मार कर देखना पड़ा। दरअसल हम तीनों अपने स्कूल की क्वीज़ टीम में पटना गए थे और पहला स्थान हासिल किया.क्वीज़ के दौरान नब्बे फीसदी जबाब मैंने दिए तो मेरी पसंद की फिल्म देखना तय हुआ. उन्हें तो फिल्म में क्या मज़ा आया होगा! अच्छा तो प्रकाश आचार्य जी को भी क्या खाक़ लगा होगा!! पर मेरी खातिर सबने देखी. और मुझे बंजारन ही इसलिए देखनी थी, क्योंकि उसमें मेरी फेवरिट हिरोइन श्रीदेवी थी. चाँदनी और चालबाज़ से लेकर नगीना तक सारी फिल्में मैं दशहरे के दौरान और शादियों के सीज़न में चलने वाले विडियो पर देख चुकी थी.
***
थोडा अवांतर तो है,पर एक मजेदार बात बताने से मैं अपने को रोक नहीं पा रही हूँ। उन दिनों किसी की बारात में या तो 'नाच' होता था (बिहार का खास लौंडा नाच) या किसी पैसे वाले शौकीन के यहाँ 'बाई जी का नाच'. नये-नए पर विडियो का चलन बढ़ रहा था.नाच में मुझे कुछ खास मज़ा नहीं आता था. वो मेरी परिष्कृत हो चुकी रूचि को थोड़ा भोंडा प्रतीत होता, पर विडियो देखने तो गर्मियों की दुपहर में सबके सो जाने पर झूना (जो गोली के खेल में मेरा गेम पार्टनर हुआ करता था ) के साथ खूब गयी हूँ. बचपन में मेरे लिए अच्छी बारात वही होती थी, जिसमे विडियो आए और शादी का बेस्ट समय वह,जब गर्मी की छुट्टियों में स्कूल बंद हो.मेरे लिए उस समय वीडियो सिनेमाघर से कमतर के बदले बढ़कर था.जा कर देख लेने की सहूलियत तो उसमें थी ही,नई-नई फिल्में भी देखने को मिलतीं थीं.ये दोनों सहूलियतें मेरे शहर के सिनेमाघर से जुडी हुई नहीं थीं. उन दिनों को याद कर मैं भी सिनेमा देखने की अपनी ललक के लिए रेणु जी के इन शब्दों को दुहरा भर सकती हूँ......
'तेरे लिए लाखों के बोल सहे' ;-)
***
वो मेरे बोर्ड एक्जाम के दिन थे, जब हमारे शहर में हम आपके हैं कौन फिल्म लगी थी।उन दिनों वहां फिल्में रिलीज होने के साथ नहीं,बाद में लगा करती थीं. परीक्षा के ही दौरान मैंने पापा से जिद्द शुरू कर दी.वो मेरी चचेरी बहन (जिसका एक्जामिनेशन सेंटर भी महाराजगंज ही था) को सेंटर ले जाने-घर लाने के लिए मेरी नानी के यहाँ ही रह रहे थे.पापा ने टालते हुए कहा- अच्छा पहले परीक्षा दे लो. परीक्षा ख़त्म हुई तो वे चले गए, पर 'हम आपके हैं कौन' तो सुपर-डुपर हिट फिल्म थी और दरबार में आधी सीटें लेडिज थीं और यह फिल्म पूरी तरह पारिवारिक-सामाजिक थी; सो लोग अपने परिवार की औरतों को खूब दिखा रहे थे. इसलिए भी अगले कुछ महीनों तक यह लगी ही रही और जब एक-आध माह के अंतराल पर मेरे पापा आये तो मैंने उन्हें इमोशनली ब्लेकमेल करना शुरू किया.पापा सोच रहे होंगे कि कहाँ इसे ले जाऊँ और कहाँ बिठाऊंगा.लेडिज सीट पर भी अकेले बिठाने का ख्याल उन्हें तब आ भी कैसे सकता था? तो उन्होंने कहा कि अगर तुम्हारी मौसी चलेंगी तो तुम्हें ले चलेंगे. अब मौसी को मनाने का काम था जो ज्यादा मुश्किल नहीं पड़ा, क्योंकि वो भी सिनेमा की शौकीन थी. इस तरह सिवान के दरबार सिनेमा हॉल में हम आपके हैं कौन वह दूसरी फिल्म रही, जिसे मैंने दसवीं (के इम्तहान के समय) की उम्र में हॉल में देखा और जाहिर सी बात है कि सलमान को देखना अच्छा लगने लगा. आज उम्र के दरिया से काफी पानी बह जाने के बाद (और बौद्धिक स्तर पर समझदार कहलाने के बाद भी) किसी भी बहस में ये साबित कर सकती हूँ कि सलमान को क्यों देखा जाना चाहिए तो कच्ची उम्र के उस लगाव के कारण ही. कुछ नहीं है उसमें तो कम से कम दर्शनीय चेहरा और सुन्दर शरीर तो है. आखिर हमारी अधिकांश हीरोइनें भी तो इनमें से एक भी होने पर सालों-साल चल जाती हैं. इस फिल्म ने और एक कमाल किया. इसे देखने से पहले तक मैं माधुरी दीक्षित को बहुत नापसंद करती थी.सिर्फ इसलिए कि मेरी फेवरिट श्रीदेवी थी,जिसे मैं पागलों की तरह पसंद करती थी... तो ज़ाहिर सी बात है की माधुरी मुझे कैसे पसंद हो? आज मैं भी अपनी वैसी पसंद पर हँस सकती हूँ /हंसती हूँ, पर तब हालत ये थी कि जैसे स्टेफी ग्राफ के किसी प्रशंसक ने मोनिका सेलेस को चलते मैच में छुरे से घायल कर दिया था, वैसे ही मैं माधुरी दीक्षित को चलती फिल्म में मार डालने का हिंसक भाव रखती थी. खैर, इस फिल्म ने मुझे माधुरी को पसंद करना तो नहीं, पर स्वीकार करना सिखा दिया.
असली सिनेमाघरों वाला मेरा हसीन शहर
१०वीं के बाद की पढ़ाई के लिए मैं पटना आ गयी। उसी शहर में,जहाँ के सिनेमाघर की शक्ल मेरी यादों में बहुत लुभावनी थी. मेरा मौसेरा भाई पटना में कोचिंग करता था. एक दिन वो मेरे हॉस्टल आया और बोला,"चल,तुझे घुमा कर लाते है". मैंने आंटी से पूछा तो उन्होंने हाँ कह दिया. हम बाहर गए तो उसने पूछा, 'कहा चलेगी'? मैंने कहा, 'फिल्म'. उसने बताया कि रीजेंट यहाँ का सबसे अच्छा हॉल है और वहां DDLJ लगी है. हम वही देखने गए. ६ बजे का शो मिला और जब हम देखने लगे तो मेरे भाई ने बताया कि इस फिल्म में काजोल उसे अच्छी लगी है. थोडी देर में जब मेरे ख्वाबों में... गाना शुरू हुआ और काजोल छोटी-सी सफ़ेद ड्रेस में बारिश में भींग -भींग नाच रही थी तो उसने अपनी सीट पर पहलू बदलते हुए कहा कि, "यहाँ नहीं,सेकेंड हाफ में अच्छी लगती है". उस समय की उसकी लाचारी पर आज हंसी आती है. खैर,रीजेंट (सिनेमाघर) और DDLJ (सिनेमा) दोनों मुझे पसंद आये.साथ ही इस रहस्य का पता चला कि स्पेशल क्लास दरअसल सबसे सस्ता वाला क्लास होता है.भाई ने जैसे मेरा इम्तिहान लेते हुए पूछा था- किस में देखोगी? स्पेशल, बी.सी., डी.सी.- देख मैंने स्पेशल कहा था. तब उसने बताया कि वो सबसे बेकार होता है. इसी के साथ यह भी पता चला (और जान कर मेरा मुंह खुला रह गया) कि डी.सी. की कीमत मात्र १२.५०रु. है. अचानक मुझे लगने लगा कि तब तो ५००रु. की अपनी पॉकेट मनी में मैं चाहूँ तो सारी फिल्में देख सकती हूँ.
***
खैर, इंटर(11th-12th) में जिस हॉस्टल में थी,वो मेरी चाची के परिचितजन का था और वहां ज्यादातर स्कूली बच्चे रहते थे,सो उस दौरान मोना,अशोक,रीजेंट आदि में जो फिल्में मैंने देखीं,वो अपने पापा के पटना आने पर जिद्द करके या चाची की मेहरबानी से उनके परिवार के साथ। इस दौर की फिल्में हैं खामोशी- द म्यूजिकल, इश्क़, दिल तो पागल है आदि. खामोशी-द म्यूजिकल पापा ने दिखाई जो मेरे दिमाग पर लम्बे अरसे तक छाई रही. 'बांहों के दरमियाँ ... ' गाने से तो सलमान और अच्छा लगने ही लगा,साथ ही साथ मनीषा कोइराला मेरी नयी पसंद बनी.आज जब अपनी पसंद को एनालाइज करती हूँ तो लगता है कि मुझे पूरी तरह औरत दिखने वाली हिरोइनें पसंद आती थीं और हीरो...(?) ॥पहली शर्त तो गुडलुकिंग होना है ही. देवानंद, धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना, अमिताभ से लेकर हृतिक और इमरान खान तक मुझे अच्छी शक्ल वाले हीरो ही पसंद आते रहे है. जिंदगी में तो हम गुण देखते ही हैं, रुपहले परदे पर रूप ही क्यों न देखा जाये! हालाँकि इसकी एक गड़बडी है. सभी लड़कियों को पसन्द तो सलमान,आमिर,शाहरुख,हृतिक वगैरह हीरो ही आते हैं, पर रियल लाइफ में ऐसा भी होता है कि एक्स्ट्रा के रूप में भी नहीं चल पाने जैसे लड़के से तालमेल बिठानी पड़ती है. क्योंकि हमारे यहाँ शादियों में लड़के की शक्ल नहीं,अक्ल भी नहीं, आय देखी जाती है. जिसे अमिताभ जैसा छः फुट्टा पसंद हो, उसकी हालत सोचिये- जब उसे ५फ़ुट का दूल्हा मिले? खैर, अपना समाज तो विडंबनाओं से भरा समाज है ही!इस पर नया क्या रोना!!!
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हॉस्टल में रहने की असली आज़ादी मिली बी।ए. पार्ट-I में, जब मैं पटना विमेंस कॉलेज के पीछे के हॉस्टल पीटर विला में रहने लगी. यह अब भी नागेश्वर कालोनी में है.जो भी माँ-बाप अपनी व्यस्तता के चलते विमेंस कॉलेज हॉस्टल के सख्त नियम- कायदों का पालन नहीं कर सकते,पर अपनी लड़कियों को ज्यादा सुरक्षित और कड़े प्राइवेट हॉस्टल में रखना चाहते थे,उनके लिए पीटर विला से बेहतर कुछ नहीं होता था. इसी हॉस्टल में रिंकी और रश्मि के साथ मेरी जो तिकड़ी बनी,वो IIIrd year आते-आते फिल्म देखने में उस्ताद हो गयी.
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पहली फिल्म का दृश्य :
सिनेमा हॉल :अशोक
फ़िल्म : जब प्यार किया तो डरना क्या,
शो : दोपहर १२ से ०३ बजे यानी noon show।
करीब पच्चीस लड़कियाँ तरह-तरह से तैयार और फिल्म के बारे में बातें करते हुए... मैं सकपकाई हुई... चारों तरफ देखती हुई कि कहीं कोई मेरा परिचित तो नहीं है.... तब तक ढेर सारे लड़के देखने, समझने और टिकेट पा लेने की जुगत में! मुझे कभी इससे घबराहट नहीं हुई,पर उन लड़कों की हरकतों पर जब-तब गुस्सा जरुर आ रहा था और मैं अपने साथ खड़ी पूनम से कहने लगती- यार, सलमान की आँखें इतनी खूबसूरत हैं तो वह गोगल्स क्यों पहनता है?
दरअसल बी।ए।-पार्ट I (इको आनर्स) की लड़कियों ने तय किया कि जब प्यार किया तो डरना क्या लगी है और इसे ग्रुप में देखना है. डिपार्टमेन्ट की सबसे कम उम्र मैम को भी मनाया ,पर आखिर में उन्होंने दगा दे दिया.मैंने अपनी लोकल गार्जियन (चाची) से पूछा; क्योंकि तब डर बना रहता था कि पटना में रहने वाले दसियों रिश्तेदार देख कर चुगली मत खाएं . पर चाची ने चलताऊ ढंग से टाल दिया (भाई,दूसरे की लड़की!कुछ हो हवा गया तो रिस्क किसका?), पर उनके इसी ढंग ने मुझे शह्काया कि जब इन्हें मतलब ही नहीं तो पूछने से क्या फायदा ? और उस समय मोबाईल और फोन तो इतने थे नहीं कि हर बार पापा से पूछ सको! तो अब मैं बेखौफ तो नहीं,पर डर के बावजूद फिल्में देखने जाने लगी. इस तरह पहली फिल्म देखी 'जब प्यार किया तो डरना क्या'. बड़े-से परदे पर जब सलमान और अरबाज आते,हम सब जोर से चिल्लाते. इसी फिल्म और हॉल में मैंने पहली बार सीटी बजायी और चुपचाप देखने के बजाय हल्ला -गुल्ला करते हुए फिल्म देखने का मज़ा पाया.और फिर यह हॉल 'अशोक' अब मेरा पसंदीदा सिनेमाघर बन गया;क्योंकि यहाँ लड़कियों को स्पेशल प्रिविलेज मिलता था.कैसे? अभी बताती हूँ.
***
अशोक में डी।सी., बी.सी. में टिकट पहले लड़कियों को मिलता था. अगर बच जाये तो ही लड़कों को. अब होता ये था कि लड़के लाइन में खड़ी लड़कियों से खूब निहोरे (request) करते थे. उनमें से कोई -कोई दया दिखाते हुए उनका पैसा लेकर टिकट ले देती,पर मैंने कभी इसका समर्थन नहीं किया.एक तो ये गलत था,साथ ही अगर उनका टिकट हम लेंगे तो वो हमारे बगल में बैठ जायेंगे और फिल्म के बीच ऐसे अवांछित तत्वों को कौन झेले!...और हॉल के कर्मचारी भी मना करते थे कि यह ठीक नहीं है.बाद में आप लोगों को ही परेशानी होगी तो मत कहियेगा.अशोक के अलावा पटना के जिन सिनेमाघरों में हम खूब गए,वो हैं- उमा, रीजेंट, वीणा, रूपक, रीजेंट, मोना. एलिफिस्टन. यहाँ तक कि अप्सरा में भी एकाध बार चले गए.यही शुकर था कि हम हॉस्टल में रहते थे और हमारे वापस लौटने की अपर लिमिट ३.३०p.m. तय थी.इसी वजह से हम दानापुर और दीघा के हॉल से वंचित रह गए!
हमारी तिकड़ी और इन सिनेमाघरों के किस्से
सबसे पहले उमा।
इसमें हमारे गैंग (मैं,रश्मि और रिंकी तो 'आजीवन सदस्य' थे, बाकी घटते-बढ़ते रहे, 2 से 8-10 की संख्या तक) ने बंधन नामक फिल्म देखी। दो रिक्शों में लद के हम पहुंचे १०.३० बजे सुबह.यहाँ एक जरुरी बात बता दूँ- हम १२ से ३का noon show ही देख सकते थे.किसी कारण से क्लास कैंसिल हो जाये तब या उबाऊ पढ़ाने वाली मैम की क्लास बंक कर या अच्छी फिल्म हो तो यूँ भी क्लास छोड़कर फिल्म देख सकते थे पर हॉस्टल किसी कीमत पर ३.३० तक लौट कर खाना खा लेना होता था,वरना पेशी हो जाती. उमा कदमकुआँ में है जो बोरिंग रोड स्थित हमारे हॉस्टल से काफी दूर था.पर उस समय मैं दिल्ली से बंधन के रिलीज की खबरें दिल्ली टाईम्स में पढ़ के गयी थी और टीम लीडर थी तो ये फिल्म देखनी ही थी. १०बजे के करीब हम लोग उमा पहुँच चुके थे. दरअसल नून शो की टिकट तत्काल ही मिलती थी. मैटनी शो की तो एडवांस में मिलती,पर नून की नहीं. करेंट बुकिंग १०.३० से होता था और ५ मिनट में जितनी हो जाये,उसके बाद ब्लैक कर देते. तो हमें ठीक १०.३० बजे पहुचने से क्या फायदा,अगर हम लाइन के शुरू के ५-७ लोगों में नहीं हो!फिर तो ब्लैक से देखना ही पड़ता. अब १२.५० की टिकट ३० रुपये में कौन खरीदना चाहेगा? इसलिये हम ९ से १० के बीच हॉल जाकर टिकट खिड़की पर खड़े हो जाते. लगभग हर हॉल में हमें टिकट १०.३० से १०.४० के बीच मिल जाती. अब समस्या रहती कि बचा हुआ टाइम कैसे खपाया जाये, तो हमने पटना के मंदिर,दरगाह और म्युजियम की खाक़ खूब छानी.इसलिए भी हमें अशोक पसंद था कि वहां से हम बिना रिक्शा का पैसा खर्च किये हनुमान मंदिर में समय गुजार सकते थे.अशोक में फिल्म देखना सबसे सस्ता और सुविधाजनक था. इसलिए 3rd year में तो हमने शायद ही कोई फिल्म वहां छोड़ी होगी. १२.५० रुपये की टिकट+१० रुपये रिक्शा भाड़ा ( एक आदमी के आने-जाने का ) ,यानी कम-से-कम २२.५० में हम एक फिल्म देख सकते थे.
खैर,उमा भी इस मायने में अच्छा था कि दूर होने की वजह से यहाँ किसी परिचित के आने की सम्भावना कम थी और अन्दर में बैठ कर इंतज़ार करने के लिए काफी जगह थी।वहां हम टिकट लेने के साथ ही अन्दर जा सकते थे. इस फिल्म में भी हम १०.३० में अन्दर चले गए और गप्प हांकने लगे. उमा काफी बड़ा हॉल था.अशोक से डेढ़ गुना बड़ा तो होगा ही. इसलिए यहाँ पर दूसरी जगहों की अपेक्षा देर से आने पर भी टिकट मिल जाती थी.कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि दूसरी जगह टिकट नहीं मिलने पर हम यहाँ आने की सोचते थे और वहां जाने पर आसानी से टिकट मिल जाता था.उमा का स्क्रीन बहुत बड़ा था,लेकिन आवाज कुछ खरखराहट के साथ आती. फिर भी ये हमारा सेकेंड फेवरेट हॉल था.उमा में जाने की एक और वजह थी-सलमान की फिल्में ज्यादातर उसी हॉल में लगती थीं. उमा में देखी सबसे यादगार फिल्म है- तक्षक. गोविन्द निहलानी की इस फिल्म को समीक्षकों ने भलें ही उतना नहीं सराहा हो, पर हमारे लिए यह उत्कृष्ट फिल्म थी.राहुल बोस का अभिनय लाजवाब था. पर फिल्म आने से पहले ही रंग दे गाने पर रिंकी और रश्मि ने हमारे हॉस्टल डे पर जो डांस किया था,उसका मुकाबला फिल्म में स्टिफ तब्बू नहीं कर पाई.और उमा में ही देखी सबसे वाहियात फिल्म थी-हेल्लो ब्रदर जिसे देखते हुए हम बीच से ही उठ कर जाने को तैयार थे.
अशोक में एक से बढ़ कर एक अनगिनत फिल्में देखी हैं हमने। दिल तो पागल है और इश्क़ तो अपनी लोकल गार्जियन के साथ देखी,पर अपने गैंग के साथ हम दिल दे चुके सनम, ताल, गाडमदर , फायर, हे राम, जख्म जैसी यादगार फिल्में यहाँ देखीं और आज भी इस हॉल मुरीद हूँ. इसमें कुछ और भी फिल्में (जैसे फिर भी दिल है हिदुस्तानी भी ) देखीं, पर वो सब उल्लेखनीय नही हैं. अशोक की खासियत यही थी कि आज तक उसमें हमने ब्लैक से टिकट खरीद कर नहीं देखी.
एक बार हम जल्दी यानी ९ बजे पहुच गए। दो लाइनें देख यह सोचा कि एक तत्काल और दूसरी एडवांस बुकिंग की लाइन होगी. हमने टिकट लिया और चले अपने ठिकाने पर; मतलब हनुमान मंदिर.उस दिन तो एक फैमिली के साथ सत्यनारायण की पूजा में भी शामिल हुए. रस्ते में थे,जब मैंने टिकट देखा (टिकट, पैसा मेरे पास ही रहता था और लौट कर हिसाब भी मैं ही करती थी.सो एक दोस्त ने मेरा नाम ही मुनीम जी रख छोडा था).टिकट पर मैटनी प्रिंट था.मैंने रिंकी को दिखाया.उसने कहा कि-"चलो जो भी होगा ...ज्यादा से ज्यादा आज नहीं देख पाएंगे".हम जब हॉल पर पहुचे तो सच में गड़बड़ हो गयी थी,पर मैं कहाँ मानाने वाली थी? मैं हॉल के मैनेजर के पास गयी और अपनी समस्या सुनाई. उसने सुना और रहम खाते हुए तीन सीटों की व्यवस्था कर दी.
बाद के दिनों में बस हम तीन जने जाने लगे थे- मैं, रिंकी और रश्मि।तीनों अपना G.S. का क्लास कॉलेज के साइंस ब्लाक की जगह सिनेमा हॉल में करने लगे थे.हम तीनों रूममेट भी थे और बैचमेट भी,तो प्राइवेसी और यूनिटी खूब थी.बस एक-एक फिल्म मैंने और रिंकी ने और मैंने और रश्मि ने अकेले देखी थी. मैं कॉमन थी, मेठ जो थी! मुझे छोड़ वे जा ही नहीं सकते थे...आखिर टिकट कौन कटाता? ब्लैकेटियर से झगडा कौन करता??
अशोक की दूसरी यादगार घटना फायर फिल्म की है। यह माँर्निंग शो में लगी थी.जाना समस्या नहीं था. वह टिकट लेना और माँर्निंग शो के लोगों को झेलना हमारे हिम्मत का इम्तेहान था.जब हम नून शो के लिए खड़े होते थे,उस वक्त भी माँर्निंग का जो क्राउड निकलता था,वो वाहियात होता था.खैर, फिल्म तो देखनी ही थी. आज भी कोई मुझे देख मेरी उम्र के बारे में गफलत में आ सकता है.ये तो १० साल पहले की बात है.टिकट लेने को और कोई राजी नहीं था.हमारे बहुत प्रयत्नों के बाद भी हॉस्टल से और लड़कियों में सिर्फ ११वीं की एक बेवकूफ किस्म की लड़की तैयार हुई थी. कहाँ तो हम सोच रहे थे कि बड़े ग्रुप में आ कर हम शर्मिंदगी से बच सकेंगे, कहाँ सिर्फ चार लड़कियाँ!! हॉल पहुँच कर सुकून मिला कि इस माँर्निंग शो में ढेर सारे अंकल लोग आंटियों के साथ आये थे.टिकट खिड़की पर पहुँच मैं बहुत गंभीर बनते हुए और ये बोलते हुए आगे बढ़ी कि अगर टिकट नहीं देगा तो हम कालेज का आई कार्ड देंगे. कैसे नहीं देगा?जैसे ही अपनी बारी आई,मुंह से निकला-"अंकल प्लीज चार टिकट दे दो". उसने सर उठा ऊपर से नीचे तक देखा, दो सेकेंड सोचा फिर बोला, "ये अडवांस की लाइन नहीं है." मैंने झेपते हुए कहा, "हमें फायर देखनी है." उसे पता था कि यह प्रचलित अर्थों में 'मॉर्निंग शो' की फिल्म नहीं है और टिकट दे दिया. साथ साथ इस बात का ख्याल भी रखा कि हमारी सीट बुजुर्गों/सयाने लोगों के बीच में हो ...so nice of him :)
फायर मूवी में ऐसा कुछ नहीं था,जिसके लिए इतना हल्ला मचा हुआ था। हमारे लिए हताश होने जैसी बात तो नहीं थी,बस दिमाग में सवाल कुलबुला रहा था.सबसे मजेदार बात यह थी कि जब नंदिता दास और जावेद जाफरी के बीच कुछ होने की गुंजाइश बनती दिखी तो उसकी शुरुआत में जोर की सीटी बजी,पर उससे ज्यादा प्रगाढ़ दृश्यों में पूरा हॉल स्तब्ध रहा.आज तक मैं समझ नहीं पाई कि ऐसा क्यों हुआ?
अशोक ही वो हॉल था,जहाँ हमने 'फर्स्ट डे,फर्स्ट शो' देखने की हसरत भी पूरी की।फिल्म थी हे राम और हमें ये अंदाजा था कि पटना में इसके लिए मारामारी तो नहीं होगी. बस, अपन पहुँच गए 'फर्स्ट डे,फर्स्ट शो' की फैंटेसी पूरी करने. इसी फिल्म के बाद मैं रानी को पसंद करने लगी. इसमें गला काटने वाला दृश्य हमने आँखे खोल कर देखीं और लौट कर खाना नहीं खा पाए. इस फिल्म के प्रेम-दृश्य अद्भुत थे.बाद में जब नदी के द्वीप पढ़ा तो वे दृश्य बार बार स्मृति -पटल पर उभर रहे थे.प्रेम के क्षणों में कविता बुदबुदाना... , यह तो नदी के द्वीप में अद्भुत रूप में है.आज भी अशोक बहुत याद आता है.
***
रीजेंट वाकई अच्छा हॉल था।उसकी बुराई बस यही थी कि वहां टिकट ब्लैक कर देते थे. कभी लड़-झगड़ कर तो कभी ब्लैक में ही टिकट खरीद यहाँ भी हमने खूब मस्ती की. हम साथ साथ है - देखने तो लगभग पूरा होस्टल ही चला गया था. इसमें हमने हर टिकट पर बस दस रुपये ज्यादा दिए थे. फिल्म ख़त्म होने पर वो भी खल रहा था और हॉस्टल की एक लड़की ने ऐसी हरकत की कि कुछ लड़कों ने नागेश्वर कालोनी तक हमारा पीछा किया. इसी हॉल मे कुछ कुछ होता है देखने आठ लोग गए थे और ये पहली फिल्म थी,जिसे हमने ५० रुपये में और वो भी स्पेशल क्लास में बैठ कर देखा.टिकट नहीं मिल रहा था तो मेरी एक दोस्त ने कहा कि चलो दूसरी जगह छोटे मिया-बड़े मिया लगी है, वही देख लेते है.पर मैं गोविंदा की फिल्म नहीं देखना चाहती थी और पूजा कि छुट्टी में घर जाने से पहले सब ये फिल्म देख लेना चाहते थे.सो हमने ब्लैक में और स्पेशल क्लास में देखी ही. हमारी दो सीनियर लड़कियाँ जो आपस में गहरी दोस्त थीं , इस फिल्म को देखते हुए इतनी बुरी तरह रोने लगीं कि बगल में बैठा आदमी घबरा ही गया.इन अनुभवों के बाद हमने तय किया कि अब अपने छोटे ग्रुप में जाएँगे. बड़े ग्रुप में मज़ा और प्रॉब्लम दोनों ज्यादा है. कोई काम करने तो बढ़ता नहीं, बस फायदा सबको चाहिए.अब हम फिल्म का प्रोग्राम सोते समय बनाते और लौट कर बताते कि देख आये है.
रीजेंट से जुडी दो मधुर यादे भीं हैं---सरफ़रोश देखने मैं और रिंकी बस दो लोग गए थे। फिल्म जब रिलीज हुई थी तो हमारी छुट्टियाँ थीं और जब वापस आये तब तक हट चुकी थी, पर डिमांड इतनी कि दुबारा लगाना पड़ा. हमारी तो मुराद पूरी हो गयी मानों. लगभग सबने देख रखी थी, सो हम दो ही गए. आज तक इस एडवेंचर का अहसास बहुत मजेदार है कि बस दो लड़कियों ने जाकर फिल्म देख ली. इससे बड़ा फिल्म संबन्धी एडवेंचर मेरे पास यही है कि दिल्ली के पी.वी.आर.प्रिया हॉल में नाइट शो में बस एक लड़की के साथ कारपोरेट फिल्म देखी. पर तब तक मैं J.N.U. में शोध छात्रा थी और प्रिया कुछ ख़ास दूर भी नहीं है.बस १.४५में जब हॉल से बाहर सड़क पर थे, तो जल्दी से ऑटो मिल जाए- इसी की कोशिश में लगे थे. खैर,अभी रीजेंटकी बात. हम लोग अक्सर सेकेंड डे पहला शो देखा करते थे, क्योंकि G.S. की क्लास शनिवार को होती थी और उसमें अटेंडेंस नहीं होता. फिल्में शुक्रवार को रिलीज होतीं और हम शनिवार बिना नागा पहुँच जाते. एक ही शुक्रवार को रिलीज हुई फिर भी दिल है हिदुस्तानी और कहो ना प्यार है. दोस्तों ने हम........का मन बनाया,लेकिन मुझे तो शाहरुख पसंद नहीं. पहले उसे बन्दर कहती थी बाद में पता चला कि बन्दर कहना रेसिस्ट होना है,तब से छोड़ दिया. अब मैं अपनी पसंद के कारण नहीं जाने का तर्क नहीं दे सकती थी. क्यों??? दोस्त बड़े कमीनें थे,याद दिला देते कि कौन-कौन सी फिल्में उन्होंने सिर्फ मेरी पसंद से देखी थी,सो मैंने तर्क दिया- शाहरुख की फिल्म है तो पहले हफ्ते भीड़ होगी तो क्यों ना दूसरी वाली देख ली जाये? बात में दम था और हम रिक्शे पे सवार हो पहुँच गए रीजेंट. भीड़ थी, पर उतनी नहीं. लड़कियों की लाइन में हम ५वे नंबर पे थे. टिकट मिल गयी. बीच का टाइम बिताने के लिए हम पटना मार्केट गए. रीजेंट गांधी मैदान के पास है वहां से हम पटना मार्केट या रेस्टोरेंट ही जाते थे. जब हॉल में घुसे तो हमें फिल्म के बारे में कुछ पता नहीं था और ज्यादा उम्मीद भी नहीं थी,पर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ रही थी मज़ा आ रहा था.एक लड़का तो पागलों जैसा चिल्ला रहा था,"साला शहरुखवा अब गया". इंटरवल तक तो हम रोमांचित हो उठे कि वाह क्या फिल्म है! इंटरवल के बाद और मज़ा आया, यह देख कि अब क्यूट हृतिक की जगह हैण्डसम हृतिक है. और ढर्रे पर चली आती डबल रोल वाली बात भी नहीं है.ये फिल्म हमने दुबारा देखी थी,ठीक एक महीने बाद.रूपक पता नहीं, है कि बंद हो गया. इसका रास्ता किसी गली से होकर जाता था.यह रीजेंट से काफी अन्दर था. हॉल की अच्छाई और सुविधाओं को देखते हुए तो यह एकदम बेकार था.इतना बेकार कि हम कभी यहाँ १० बजे तक जाने का नहीं सोचते थे.ज्यादा जल्दी जाते तो ११.१५ तक और हमेशा ब्लैक में ही फिल्में देखी यहाँ. अंदर जाने पर पता चलता था कि हॉल तो बहुत खाली है, पर टिकट कभी खिड़की पर नहीं मिली. हम कभी समय से गए भी नहीं, क्योंकि वहां से लौट कर कहीं जाना और दुबारा टिकट लेने जाना बहुत महंगा पड़ता. तो हम पिक्चर के टाइम से जाते और २०/३०या ४० में टिकट खरीद लेते. वहां मोल-तोल भी खूब होता था. अब सवाल तो यह है कि हम वहां जाते ही क्यों थे? दरअसल उस समय की लगभग सारी क्रिटिकली एक्लेम्ड फिल्में वही लगती थी.
रूपक में देखी यादगार फिल्में हैं अर्थ-1947, हु-तु-तू ,संघर्ष आदि। अर्थ-1947 से जुडी मजेदार घटना है.हम देर से पहुचे और ब्लैकेटिएर से रिक्वेस्ट करने लगे कि भैया हमें अच्छी जगह पर सीट देना (पता था कि फिल्म में 'सीन' है). उसने मुस्कुराते हुए जिस तरह से 'हाँ' कहा, हमें थोड़ा शक हुआ, पर उस दिन हम छः थे. सोचा, कोई नहीं, देखा जायेगा. हमें सीट तो साइड से ही मिली. छः के बाद एक् कपल था. लड़की हमारी तरफ बैठ गयी...और भी अच्छा...लेकिन ये क्या? फिल्म शुरू होने के दो मिनट पहले हमारे आगे हमारी ही उम्र के ५-६ लड़के आ कर बैठ गए. अब तो जो टेंशन शुरू हुई....उन लड़कों की आँखों में भी हमें देख एक मुस्कराहट आ गयी. खैर इतना डरते हमलोग तो हॉल हमारा दूसरा कालेज क्यों होता? अर्थ-१९४७ में राहुल खन्ना की एक साईकिल है. जैसे ही उस पर नंदिता को आगे बिठा वो ले जाता है, वैसे ही सामने वालो में किसी ने कहा,"अरे यार!मेरे मामा जी के पास भी ऐसी साईकिल है.आज समझ में आया, क्यों वे उसे छूने भी नहीं देते." ना चाहते हुए भी हमारी हंसी फूट पड़ी. हम जानते थे कि हँसना इनको बढावा देना है, पर रोक नहीं सके.अब तो उन लड़कों ने पूरी फिल्म के दौरान इतने मजेदार कमेन्ट किये कि फिल्म का मज़ा दोगुना हो गया. एक बानगी- नंदिता और राहुल के बीच एक रोमांटिक सीन है, कुछ physical closeness लिए हुए. उस सीन के पहले नंदिता रो रही थी और उसके बाद मुस्कुराती है. हमारी धड़कने भी खामोश थीं.हम मानो उस सीन के बीच से गायब हो जाना चाहते थे. तभी एक लड़के ने बहुत innocently दूसरे से पूछा," इसीलिए रो रही थी क्या?" उस टोन में कोई कमेन्ट नहीं था. हमारी हंसी दबी-दबी सी ही सही,पर निकल ही गयी.
मोना में भी खूब फिल्में देखी।हॉल ठीक ठाक था,पर रीजेंट के पास होने के कारण उसकी तुलना में थोड़ा बुरा लगता था. रीजेंट, मोना, एलिफिस्टन- तीनों आस-पास थे. किसी-ना-किसी में टिकट तो मिल ही जाता था.हमारा उस एरिया में जाना कभी बेकार नहीं हुआ.किसी- किसी बार तो हम सोचते कि तीनों लोग तीनों हॉल के पास जाएँ,चाहे जिसे टिकट मिल जाये;पर तब मोबाईल का जमाना नहीं था. हम एक-दूसरे को बताते कैसे, सो यह प्लान कभी हकीकत में नहीं बदला.मोना में हमने ऐश्वर्या की एक तरह से पहली फिल्म आ अब लौट चले देखी और पाया कि सुमन रंगनाथन उससे हॉट है.वो मेरी रिंकी का बर्थडे था,जब यह फिल्म हमने देखी. 9th फरवरी- आज तक याद है. मोना में ही हमने लगातार दो शो देखने का रिकार्ड बनाया- सत्या मोर्निंग शो में और नून शो में दिल से. परदे पर पानी पीती हुई मनीषा के गले के भीतर से पानी उतरता दिखाई दे रहा था और हमने मान लिया कि मनीषा ही हमारे समय की सबसे सुन्दर और versatile ऐक्ट्रेस है.वीणा वो आखिरी हॉल था,जहाँ हम फिल्म देखने जाते थे; बहुत मजबूरी में,जब किसी और हॉल में कोई चांस न हो.एक तो ये हॉल गन्दा था,दूसरे क्राउड वाहियात होता था.एकदम स्टेशन के पास था और रुकने की कोई जगह नहीं थी. जहाँ वेट करते थे,वो जगह एकदम सड़क पर लगती थी.देखी तो कई फिल्में यहाँ, पर याद नहीं रखीं.इसकी वजह वहां से निकलने के बाद का आफ्टर इफेक्ट था. एक-दो मज़ेदार वाकये वहाँ जरुर हुए. तब की बात है जब मन फिल्म रिलीज हुई थी. एक दिन RJD का बिहार बंद था.कॉलेज भी बंद था, क्योंकि रूलिंग पार्टी के बंद में कुछ खोलने की हिम्मत तो होती नहीं. लाइब्रेरी खुली थी.सिस्टर को बाहर से आना तो था नहीं कि वो बंद रहे?हमने तय किया कि कोई एक जाकर टिकट लेगा और हॉस्टल फ़ोन कर देगा कि क्लास चल रही है.अब मुझ-सा वीर बहादुर कौन जो जाकर टिकट ले और बाहर का माहौल देखे. मैं ८.३० बजे ही निकली, पर आंटी ने देख लिया और पूछा, "आज तो बंद है,कहाँ जा रही हो?" मैंने कहा, "लाइब्रेरी जा रही हूँ, वो बंद नहीं होगा और जल्दी जा रही हूँ कि कोई दिक्कत न हो." आंटी ने कहा, "ठीक है पर ध्यान रखना. मत ही जाओ तो अच्छा." मैंने कहा, "नहीं आंटी!जरुरी नोट्स बनाना है."इस तरह से मैं निकल गयी. सड़क से रिक्शा ले सीधे वीणा पहुंची. मुश्किल से ९ ही बजे होंगे.मैंने देखा कि लड़कियों की कोई लाइन नहीं लगी थी. मैं गयी और तीन टिकट मांगे. टिकट खिड़की पर बैठे आदमी ने मेरी तरफ देखा भी नहीं और दूसरों को टिकट देता रहा. मैंने थोड़ी देर में गुस्से से कहा कि "मुझे तीन टिकट दे दीजिये पहले." उस आदमी ने और अधिक गुस्से से कहा, "मोर्निंग शो का टिकट मिल रहा है यहाँ." मैं इतना अधिक सकपका गयी कि आगे कुछ पूछ भी नहीं पाई; क्योंकि सामने ही मोर्निग की फिल्म का पोस्टर लगा था- प्यासी जवानी. उस दिन तो लौट के बुद्धू घर को आये की तर्ज पर हम हॉस्टल लौट आये.अगली बार जब मन देखने गए तो और मजेदार घटना हुई.हम सुबह जल्दी ही गए और.टिकट लेने के लिए खिड़की खुलने का इंतजार कर रहे थे. सामने में एक दक्षिण भारतीय युवक था.हमने सोचा कि वो क्या समझेगा और कारू-कारू कह मजाक बनाने लगे.हमारा मकसद उसका अपमान करना नहीं था, बल्कि अपना मनोरंजन करना था. हम लोग कोई गोरे नहीं थे, पर हमारी बनिस्पत वो काला था और हमेशा हमारा मन ऐसे ही तो लगता था- अपरिचितों का आपस में मजाक बना. लेकिन वो 'कारू' शब्द समझ गया. जरुर उसकी भाषा में कारू से मिलता-जुलता काले का कोई पर्याय होगा.उसने आगे बढ़ हमसे कहा, "this is very bad.this is really bad to comment on color." आज भी मैं उसकी हिम्मत कि दाद देती हूँ कि किसी और प्रदेश में तीन लड़कियों को उसने टोका. पर हमें तो काटो तो खून नहीं. हम सभी का चेहरा लाल! हिम्मत बटोर कर रश्मि ने ही पहले कहा,"we did not mean that.we are just talking." तब तक मैं थोडी संभल गयी थी और उसे समझाना चाहा , "no, in our language karu means something else." उसने कहा, "no, i can understand little Hindi and I can sense things." वो दिल्ली में software engineer था और पटना किसी काम के सिलसिले में आया था.काम पूरा हो गया और रात की ट्रेन से उसे जाना था सो फिल्म के लिए आ गया था. मिडिल क्लास गिल्टी महसूस करते हुए हमने उसका टिकट लिया.१०.३५ से १२ बजे का समय बिताने और उसे पटना घुमाने के लिए म्युजिअम ले गए. एक रिक्शे पर हम तीनों और एक पर वो गया और दोनों का पैसा हमने दिया. म्युजिअम में रश्मि ही उसे घुमाती रही और मैं-रिंकी आपस में बुदबुदाते रहे कि अगर किसी ने इसके साथ देख लिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे. अकेले फिल्म देखना तो समझ में आता है, पर इसको लेकर घुमाना? जैसे-तैसे फिल्म देखकर ख़त्म किया और इंटरवल में हमने कोल्ड ड्रिंक भी ख़रीदा,ताकि वो नहीं खरीद सके और हमें किसी और के पैसे का कुछ न लेना पड़े. फिल्म के अंत में उसने पूछा कि पूरे समय तो तुम्हीं लोगों ने खर्च किया, तो मेरे साथ लंच कर लो. हमने उसे बताया कि हमें ३.३० में हॉस्टल पहुँच जाना होता है. उसे लगा कि हम बहाना कर रहे हैं तो वो अपना शेयर देने लगा. मैं तो लेने ही वाली थी कि रश्मि की बच्ची ने मुस्कुरा कर मना कर दिया. पूरे टाइम मैं लड़ते आई कि हम उस कारू के ऊपर क्यों खर्च करें.हमारा बजट गड़बड़ा गया और उस महीने हमने एक फिल्म कम देखी.
इससे भी दिलचस्प बात हॉस्टल आकर पता चली कि उसने हमारा पता माँगा तो रश्मि ने दे दिया था।हमने उसे खूब डांटा...इतना कि वो डर गयी और कहने लगी,"मुझे लगा कि वो क्या लिखेगा? लेकिन अगर वो लिखता है तो मेरे नाम से ही लिखेगा. मुझसे ही तो बात हो रही थी सबसे ज्यादा". हमने चिढाया भी कि उस समय तो चिपक रही थी, अब क्या हुआ? जुलाई,१९९९ में ये घटना हुई थी.अगस्त तक हम डरे रहे, पर सितम्बर आते-आते भूल गए. अक्टूबर में पूजा की छुट्टियों में घर चले गए. एक दिन सुबह-सुबह जब मैं सो ही रही थी तो माँ ने पुकारा- "रूम में आओ".मैं अपनी कजिन के रूम में सोती थी. आते ही उसने उस लड़के/आदमी का नाम लेकर पूछा कि ये कौन? मुझे याद ही नहीं था.मैंने कहा- पता नहीं. माँ ने कहा तो तुम्हे चिट्ठी कैसे लिख दिया है? मैंने कहा- चिट्ठी?? माँ ने लिफाफा सामने कर दिया.ऊपर लिखा था- तो, Miss Rashmi,Rinki & Sudipti. अब तक मैंने हॉस्टल के अंकल को दसियों गालियाँ दी कि सबसे पहला नाम रश्मि का था,तो लेटर मुझे क्यों फारवर्ड किया? बाद में पता चला कि पोस्टल एड्रेस सिर्फ मेरा ही था उनके पास और रश्मि ने तो लाख-लाख शुकर मनाया; क्योंकि अगर उसके घर जाता तो उसके भैया उसे हॉस्टल से हटा ही लेते. लेकिन उस दिन मुझे अपनी माँ के सामने क्या-क्या झूठ नहीं बोलना पड़ा? कैसे मैं बची, मैं ही जानती हूँ. मेरे भोले पापा ही वो लेटर लाये थे, पर उन्होंने पढ़ा नहीं था.पढ़ा माँ ने था और फिल्म देखने की बात तो वो समझ ही गयी थी. मैंने कॉलेज फंक्शन में उसके गेस्ट होने की बात समझाई,जिसे पता नहीं माँ ने कितना सच माना, पर उसने देखा कि पत्र ज्यादातर रश्मि को ही संबोधित है.मेरा नाम बस संबोधन में ही है,तो वह थोडी निश्चिंत दिखी. लौट कर मैंने रश्मि को खूब हड़काया.दूसरी घटना: जब दिल क्या करे फिल्म रिलीज हुई,हम यह फिल्म अजय- काजोल की वजह से देखना चाह रहे थे. वीणा को नकारने के लिए हम अप्सरा में चले गए.अप्सरा गाँधी मैदान के दाहिनी तरफ है.कौटिल्य होटल के पीछे की एक गली से रास्ता जाता है.हम वहाँ पहली बार गए और पता चला कि शो आल रेडी हाउस फुल हो चुका था. जो शुद्ध झूठ था.खैर,मैंने कहा- चलो, वीणा चलते है.इससे तो बेहतर ही है.सबों ने कहा- छोड़ देते हैं आज, जब यहाँ नहीं मिल रहा तो अब वीणा पहुँच कर मिलेगा? मैंने कहा- चलो, देखते है.हम सब देर से गए और मैनेजेर से लड़ कर टिकट लिया.
पटना शहर के पटना विमेन'स कॉलेज में पढ़ते और पीटर विला में रहते हुए कमोबेश यही मेरी सिनेमाई दास्ताँ रही।आज भी संतोष इसी बात का है कि हमने कभी किसी लड़के या किसी सहेली के बॉयफ्रेंड से मदद नहीं ली, बल्कि अपने उद्यम से हर फिल्म देखी और किसी का पैसा भी अपने ऊपर नहीं खर्च करवाया, जिसके लिए लड़किया बदनाम रहती है :) !!!
आज भी इन यादों के साथ होठों पे मुस्कराहट इसलिए भी आ जाती है कि हम कभी बदनाम पटना शहर में भी छेड़खानी जैसी चीजों के शिकार नहीं हुए.उस दौर(१९९६-२०००) के पटना में कई दहशतनाक घटनाएं हुई थीं, जिससे हमारे माता-पिता डरे रहते थे,पर हम फिल्में देखने से कब बाज आने वालों में थे!!! और ऐसी कोई बुरी घटना भी नहीं घटी,जिससे आज भी हमारे मुंह का जायका बिगड़ जाये.... मुझे तो लगता है कि उन सिनेमाघरों की व्यवस्था ऐसी थी कि हम "लड़की होकर भी" वैसी-वैसी फिल्में और इतनी ढेर सारी (!) सम्मानजनक तरीके से देख सके.
पसंद की १० फिल्में-
१.कागज़ के फूल
२.सूरज का सातवां घोड़ा
३.मुगलेआज़म
४.खामोशी
खामोशी दी म्यूजिकल
६.अंगूर
७। सदमा
८.हम आपके हैं कौन
९.जब वी मेट
१०.अमिताभ बच्चन की लगभग हर फ़िल्म

Monday, August 10, 2009

शर्मीले, नुकीले और हठीले विशाल की कमीने

-अजय ब्रह्मात्मज
कम लोग जानते हैं कि विशाल भारद्वाज ने पहली फिल्म की प्लानिंग अजय देवगन के साथ की थी। शायद इसी वजह से अगला मौका मिलते ही अजय देवगन ने विशाल भारद्वाज के निर्देशन में ओमकारा की। विशाल ने मकड़ी और मकबूल बनायी। इस बार विशाल भारद्वाज ने फिल्म का शीर्षक ही कमीने रख दिया है।
कमीने विशाल भारद्वाज का ओरिजनल आइडिया नहीं है। उन्होंने नैरोबी के एक लेखक से इसे खरीदा है। उन्होंने अपने जीवन के अनुभव इसमें जोड़े हैं और इस समकालीन भारत की फिल्म बना दिया है। शहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा इसे अपने करिअर की श्रेष्ठ फिल्म कह रहे हैं। उम्मीद करें कि वे आदतन यह नहीं कह रहे हों। शर्मीले,नुकीले और हठीले विशाल भारद्वाज फिलहाल इस बात से दुखी हैं कि उनकी फिल्म को यूए सर्टिफिकेट नहीं मिला है। वे चाहते हैं कि उनकी फिल्म कमीने सभी देखें, लेकिन सेंसर से ए सर्टिफिकेट मिलने की वजह से उनके दर्शक कम हो जाएंगे। चाहे-अनचाहे वे विवादों में भी फंसे हैं। कहा जा रहा है कि यह फिल्म आमिर खान और सैफ अली खान ने रिजेक्ट कर दी थी। विशाल सफाई देते फिर रहे हैं। इतना ही नहीं पापुलर हुए गीत, धन दे तान.. की लोकप्रियता का श्रेय किसी ने शाहिद कपूर के नाम किया तो विशाल बिफर गए। उन्होंने बताया है कि धन दे तान.. उनके साथ सालों से रहा है। वे ही उसके सर्जक हैं। हम तो यही उम्मीद करेंगे कि कमीने बाक्स आफिस पर धन दे तान.. करे। हिन्दी प्रदेश का एक निर्देशक और मजबूत एवं कामयाब हो।
कमीने का बेसिक आइडिया कंपाला में विशाल को आया। युगांडा में रायटिंग लैबोरेटरी में कंपाला के बारे में रिसर्च किया गया। यह कहानी दो जुड़वा भाइयों की है जिनके चरित्र में काफी अंतर है। दोनों भाई एक दूसरे से एकदम विपरीत है। क्या होता है इनके जीवन में इसे ही कमीने में दिखाया जाएगा।
कवि और गीतकार राम भारद्वाज के बेटे विशाल भारद्वाज का बचपन फिल्मों से अपरिचित नहीं रहा। पिता चाहते थे कि वे संगीत सीखें। विशाल ने संगीत सीखा और उसके साथ क्रिकेट के गेंद और बल्ले से भी दोस्ती कर ली। उन्होंने राज्य स्तरीय क्रिकेट मैच खेले। क्रिकेट खेलने के सिलसिले में दिल्ली आना हुआ और वहां एक दोस्त ने संगीत के लिए प्रेरित किया। आरंभिक रुचि गंभीरता में बदली। नतीजा यह हुआ कि क्रिकेट के प्रति जो रूझान था,वह संगीत की तरफ मुड़ गया। संगीत के इस सफर में एक मोड़ पर गुलजार मिले और फिर विशाल भारद्वाज की दिशा बदल गयी। अब कमीने हाजिर है।

Sunday, August 9, 2009

पाकिस्तान से आए हुमायूँ सईद

-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले दिनों एक फिल्म आई जश्न। महेश भट्ट की इस फिल्म में शहाना गोस्वामी ने अपने अभिनय से एक बार फिर लोगों को लुभाया। उनके साथ अमन बजाज की भूमिका में लोगों ने एक नए ऐक्टर को देखा। उसने अपने अभिनय से अमन बजाज के निगेटिव रोल को रिअॅल बना दिया। उसका नाम है हुमायूं सईद। हुमायूं करांची के हैं। वे पाकिस्तान के निहायत पापुलर ऐक्टर हैं। एक्टिंग के साथ टीवी प्रोडक्शन में भी उनका बड़ा नाम है। जश्न की रिलीज के वक्त वे भारत आए थे। फिल्म के प्रस्तोता महेश भट्ट से उनकी जानकारी लेने के बाद जब मैंने उनसे संपर्क किया, तो उन्हें ताज्जुब हुआ कि भला उनमें किसी की रुचि क्यों होगी? बहरहाल वे अगले दिन मिले। अपनी बीवी के साथ मुंबई आए हुमायूं के लिए यह खास मौका था, जब भारतीय मीडिया ने उनके काम की तारीफ की। इस तारीफ से उनके हौसले बढ़े हैं। अगर फिल्मों के मौके मिले, तो दूसरी फिल्में भी करेंगे।
हुमायूं पाकिस्तान में बेहद पापुलर हैं। उन्होंने जब जश्न के लिए महेश भट्ट को हां कहा, तो पाकिस्तानी अखबारों में यह खबर फैल गई। कुछ आलोचकों ने लिखा कि देखें हुमायूं को कैसा रोल मिलता है? हुमायूं इस आशंका की पृष्ठभूमि उजागर करते हैं, पाकिस्तानी आर्टिस्ट हिंदुस्तान की फिल्मों से जुड़ना चाहते हैं। पिछले कुछ वर्षो में उन्हें विभिन्न फिल्मों में देखा गया, लेकिन देखकर पाकिस्तान के लोग खुश नहीं हुए, क्योंकि वे ज्यादातर छोटे-मोटे रोल में ही आए। इसी कारण जब भट्ट साहब ने मुझे ऑफर दिया, तो मैंने उनसे पूछा कि रोल अच्छा है न? मैं पाकिस्तानी प्रशंसकों को निराश नहीं कर सकता था। भट्ट साहब का सीधा सा जवाब था, मियां भरोसा रखो। आपको बुलाया है, तो रोल अच्छा ही होगा। फिल्म में अपने काम को मिली सराहना से हुमायूं खुश नजर आए। हालांकि फिल्म के प्रचार में कभी उनके नाम का उल्लेख नहीं किया गया। हुमायूं इस स्थिति से वाकिफ हैं। समझाने के अंदाज में वे कहते हैं, दोनों देशों के बीच अच्छे रिलेशन नहीं हैं। मैं समझ सकता हूं कि क्यों फिल्म के निर्माताओं ने मेरे नाम और काम का प्रचार नहीं किया! नार्मल स्थिति में फिल्म रिलीज हुई होती, तो कुछ और बात होती। हुमायूं चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच कलाकारों और फिल्मों का आना-जाना लगा रहे। वे इस मामले में महेश भट्ट की तारीफ करते हैं, भट्ट साहब कुछ वर्षो से पाकिस्तानी टैलेंट को अपनी फिल्मों में मौके दे रहे हैं। इसके अलावा वे खुद पाकिस्तान आते रहते हैं। उन्होंने फिल्मों के जरिए दोनों देशों को करीब लाने की सुंदर कोशिश की है। हम भी ऐसी कोशिश करते हैं। मैंने जब अना टीवी सीरियल बनाया था, तो यहां से राजीव खंडेलवाल और आमना शरीफ को ले गया था। अब दिसंबर में जाऊंगा, तो यहां के नए टीवी कलाकारों को ले जाऊंगा।
हुमायूं बताते हैं कि मैं बचपन से ही हिंदी फिल्में देखता रहा हूं। दोनों देशों के बीच कोई भी सूरत-ओ-हाल हो जाए, लेकिन हमारे मुल्क के लोग हिंदी फिल्में देखना नहीं छोड़ेंगे। उनके लिए हिंदुस्तान का मतलब ही बॉलीवुड है। मैं खुद अमिताभ बच्चन की फिल्में देख कर बड़ा हुआ हूं। उनकी फिल्मों के जरिए हिंदुस्तान से मेरा परिचय हुआ। बचपन की उन यादों को नहीं भूल सकता। हिंदुस्तान हमारे दिल-ओ-दिमाग में किसी ख्वाब की तरह तारी है। आप लोग अपने स्टारों के बार में जितना जानते हैं, किसी पाकिस्तानी की जानकारी उससे कतई कम नहीं होगी। हिंदी फिल्मों के असर का यह आलम है।

Saturday, August 8, 2009

फ़िल्म समीक्षा:तेरे संग;चल चलें;अज्ञात






सतीश कौशिक का बेहतर अभिनय तेरे संग



किशोरावस्था के प्रेम और गर्भ जैसी जरूरी सामाजिक समस्या पर केंद्रित सतीश कौशिक की तेरे संग कमजोर पटकथा और हीरो-हीरोइन के साधारण अभिनय के कारण आवश्यक प्रभाव नहीं डाल पाती। इस विषय पर विदेशों में सुंदर, मार्मिक और भावपूर्ण फिल्में बन चुकी हैं।
माही (15 वर्ष की लड़की) और कबीर (17 वर्ष का लड़का) की इस प्रेम कहानी में फिल्मी संयोग, घटनाओं और प्रसंगों की भरमार है। माही और कबीर डिफरेंट बैकग्राउंड के किशोर हैं। उनका मिलना-जुलना, दोस्ती होना और फिर शैंपेंन के नशे में हमबिस्तर होना..। ये सारे प्रसंग अतार्किक और शुद्ध फिल्मी हैं। सतीश कौशिक से ऐसी कमजोर कोशिश की अपेक्षा नहीं की जा सकती। रूसलान मुमताज और शीना शाहाबादी अभी अभिनय के ककहरे से अपरिचित हैं। उनमें बाल कलाकारों की मौलिक स्वाभाविकता भी नहीं बची है। वे सिर्फ सुंदर और मासूम दिखते हैं। तेरे संग सतीश कौशिक के लिए देखी जा सकती है। कबीर के निम्नमध्यवर्गीय पिता की भूमिका उन्होंने पुरअसर तरीके से निभाई है।


सराहनीय प्रयास चल चलें
युवा निर्देशक उज्जवल सिंह ने सीमित बजट में एक महत्वपूर्ण फिल्म बनाने की कोशिश की है। प्रतियोगिता और सफलता के इस दौर में स्कूली बच्चों पर बढ़ते दबाव और तनाव के विषय को उन्होंने इलाहाबाद की पृष्ठभूमि में रखा है। ऐसी फिल्म में ग्लैमर और चकाचौंध नहीं हो सकता।
इलाहाबाद के एक स्कूल में 11वीं के छात्रों का एक समूह है। उसमें लड़के-लड़कियां दोनों हैं। सभी अपने अभिभावकों से दुखी हैं, क्योंकि उन पर बेहतर प्रदर्शन का अनचाहा दबाव है। इनमें से एक इस दबाव को नहीं सह पाता और आत्महत्या कर लेता है। उसके सहपाठी मानते हैं कि अभिभावक की जोर-जबरदस्ती के कारण ही उसने अपनी जान ली है। वे शहर के एक वकील से मिल कर अपने अभिभावकों पर मुकदमा कर देते हैं। हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बहस चलती है। बच्चों के प्रति परिवार, समाज और सरकार के रवैए की परतें खुलती हैं। पता चलता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में ही खोट है। जो ज्ञानार्जन पर जोर देने के बजाए छात्रों को धनार्जन के लिए तैयार करती है। उज्जवल सिंह ने बच्चों से अच्छा काम लिया है। उनकी मासूमियत और सवाल दोनों आकृष्ट करते हैं। कोर्ट ड्रामा थोड़ा नकली लगता है। वकील बने मिथुन चक्रवर्ती और अनूप सोनी के लंबे बाल खटकते हैं। कोर्ट रूम ड्रामा में नाटकीयता नहीं उभर पाई है।
इलियाराजा के संगीत निर्देशन में पीयूष मिश्रा के गीत नए शब्द और भाव के साथ हैं। लोरीनुमा गीत में मैथिली लोकगीत की दो पंक्तियों का टच सुंदर है। निश्चित ही यह फिल्म और बेहतर हो सकती थी, फिर भी उज्जवल सिंह का प्रयास सराहनीय है।
हंसी आएगी रामू की अज्ञात पर
राम गोपाल वर्मा या तो कुंद हो चुके हैं या अपनी धार का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। अंडरव‌र्ल्ड, खौफनाक और प्रेमभाव की अनेक फिल्में निर्देर्शित कर चुके राम गोपाल वर्मा की अज्ञात भी उनकी ़ ़ ़ आग की तरह भविष्य में भूल के तौर पर गिनी जाएगी।
एक जंगल में शूटिंग करने गई फिल्म यूनिट के सदस्य एक-एक कर मारे जा रहे हैं। उन्हें कौन मार रहा है? कोई नहीं जानता। हत्यारा भयावह और क्रूर है। यह सिर्फ हत्या होने के बाद लाश को देख कर पता लगता है। राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म की शूटिंग श्रीलंका के जंगलों में की है। जंगल को खौफनाक किरदार बनाने में वे असफल रहे हैं। बैकग्राउंड साउंड से खौफ क्रिएट करने की हर कोशिश में वह दर्शकों को डराने के बजाए हंसा देते हैं। किसी खौफनाक फिल्म को देखते हुए हंसी आए तो क्या कहेंगे? एक सवाल है कि अज्ञात में पहले प्रोड्यूसर, फिर डायरेक्टर, उसके बाद कैमरा मैन और फिर एक्शन डायरेक्टर की हत्या क्यों होती है? क्या फिल्म इंडस्ट्री में प्रचलित स्टेटस के हिसाब से यह क्रम रखा गया है। पर्दे के पीछे काम करने वाले क्यों पहले मौत के शिकार होते हैं? फिल्म अचानक से खत्म होती है और पर्दे पर अज्ञात-2 के जल्दी आने की सूचना दी जाती है। मुमकिन है अज्ञात-2 में रामू डरा सकें, इस बार तो सिर्फ हंसी आई रामू की इस कोशिश पर..।

Friday, August 7, 2009

दरअसल:ब्लॉग से ट्विटर तक

-अजय ब्रह्मात्मज

अमिताभ बच्चन दुनिया में कहीं भी रहें, वे नियमित रूप से ब्लॉग लिखते हैं। बीमारी के चंद दिनों को छोड़ दें, तो वे रोजाना एक पोस्ट करते हैं। उनके पोस्ट में मुख्य रूप से घर-परिवार की बातें, शूटिंग चर्चा, मीडिया की आलोचना और दैनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विचार रहते हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग के पाठक को विस्तारित परिवार की संज्ञा दी है। वे उनकी राय, आलोचना और टिप्पणियों पर गौर करते हैं। अपने पाठकों के प्रति वे जितने मृदु हैं, मीडिया के प्रति उतने ही कटु। अगर किसी ने कुछ उल्टा-सीधा लिख दिया, तो वे ब्लॉग पर उसका जिक्र करते हैं। मीडिया के रवैये और व्यवहार पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। इसके बावजूद उनका ब्लॉग पठनीय होता है।
इधर रामगोपाल वर्मा नियमित हो गए हैं। उनकी फिल्में और व्यक्तित्व की तरह उनका ब्लॉग भी थोड़ा रहस्यपूर्ण और अनिश्चित है। उनके ब्लॉग की कोई निश्चित रूपरेखा नहीं है। अपने जीवन के अंश, अनुभव और फिल्मों के अलावा इन दिनों वे सिनेमा के तकनीकी पक्षों की भी बात कर रहे हैं। उनके ब्लॉग पर पाठकों के सवाल के दिए गए जवाब रूखे और बेलाग होते हैं। उन्हें पढ़ते हुए मजा आता है। साथ ही पता चलता है कि रामू वास्तव में विनोदी स्वभाव के व्यक्ति हैं। वे कठोर होने का दिखावा करते हैं।
शाहरुख खान पर टिप्पणी करने के बाद हुई आलोचना से आमिर खान संयमित हो गए हैं। वे चंद वाक्यों में तथ्यात्मक बातें करते हैं और पाठक से ज्यादा लाड़-प्यार नहीं दिखाते। वे अपने ब्लॉग पर नियमित नहीं हैं, लेकिन कई बार उनसे संबंधित ताजी जानकारियां उनके ब्लॉग से मिलती हैं। जैसे कि हाल ही में उन्होंने बताया कि किरण राव की फिल्म धोबी घाट में वे मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने हिलेरी से अपनी मुलाकात का भी जिक्र किया है। सलमान खान भी अनियमित हैं। उनकी बातों और लेखन में उनके व्यक्तित्व की तरह ही निरंतरता नहीं रहती। शाहरुख ने खुद को इन दुनियावी संप्रेषणों से ऊपर मान लिया है। वे इन दिनों इंटरव्यू भी देते हैं, तो किसी ऋषि की मुद्रा में रहते हैं, जिसने जीवन के सत्य को समझ लिया है।
हां, मनोज बाजपेयी लगातार लिख रहे हैं। अच्छी बात है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के वे ऐसे अकेले कलाकार हैं, जो हिंदी में अपना ब्लॉग लिखते हैं। उन्होंने पिछले दिनों जिक्र किया था कि वे सिर्फ लिखते ही नहीं, पढ़ते भी हैं। वे पाठक के सवाल और जिज्ञासाओं के जवाब भी देते हैं। अन्य स्टार नियमित नहीं हैं। शिल्पा शेट्टी, बिपाशा बसु, मल्लिका शेरावत, सेलिना जेटली और कंगना राणावत ने भी अपने वेबसाइट आरंभ किए हैं, लेकिन वही ढाक के तीन पात.., दो-चार पोस्ट लिखने के बाद उन्हें कुछ नया लिखने की फिक्र नहीं रहती।
इधर ट्विटर का चलन तेजी से बढ़ा है। ट्विटर भी सोशल नेटवर्किंग का अच्छा माध्यम है। इसमें सिर्फ 140 अक्षरों में व्यक्ति कुछ लिख सकता है। यह सुविधा फेसबुक से थोड़ी अलग है। अभी प्रियंका चोपड़ा, करण जौहर, गुल पनाग और मल्लिका शेरावत इस पर काफी एक्टिव हैं। वे अपनी गतिविधियों की ताजा जानकारी देते हैं और कभी-कभार किसी फालोअर की जिज्ञासा भी शांत करते हैं। अपनी व्यस्त जिंदगी के कुछ ऐसे क्षणों का इस्तेमाल वे इस कार्य में करते हैं, जिसका कोई दूसरा उपयोग वे नहीं कर सकते। अमूमन गाड़ी में बैठकर कहीं जाते समय वे मोबाइल से ट्विटर पर अपने संदेश भेजते हैं। दरअसल, ब्लॉग लेखन हो या ट्विटर पर 140 अक्षरों की पोस्ट.., फिल्म स्टारों के लिए यह आत्मरति और प्रगल्भता ही है। वे इतने अकेले और सब से कट जाते हैं कि उनके लिए अपने उद्गार और भाव व्यक्त करने का यह सुंदर एकतरफा माध्यम हो गया है। यहां उनसे कोई बहस नहीं कर सकता और न ही कोई टोक या रोक सकता है। अफसोस की बात है कि अभी कोई भी स्टार कला और फिल्म पर गंभीर बातें नहीं करता। वे तो अपने अनुभव शेयर करने में भी संकोच करते हैं। ज्यादातर लेखन में साफ झलकता है कि वे अपने पाठकों से श्रेष्ठ हैं। यही वजह है कि ब्लॉग और ट्विटर लेखन के बावजूद स्टार और प्रशंसकों के बीच आत्मीय रिश्ता नहीं बन पा रहा है।

Tuesday, August 4, 2009

पढ़े गए चवन्नी के एक लाख (१,००,०००) पृष्ठ

चवन्नी के पढ़े गए पृष्ठों की संख्या एक लाख से अधिक हो गई है.चवन्नी को नहीं मालूम कि इसका कोई महत्त्व है या नहीं? चवन्नी को यही खुशी है कि आप उसे पढ़ते हैं.ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत के सहयोग से यह सम्भव हुआ है.आजकल कुछ पाठक सीधे आते हैं.उन्होंने सीधी राह पकड़ ली है.कल तो घोर आश्चर्य हुआ.अचानक चवन्नी ने पाया कि उसके भारतीय पाठकों की संख्या अमेरिकी पाठकों से कम हो गई.अब आप की बधाई और सुझावों का इंतज़ार है.

Sunday, August 2, 2009

हिन्दी फिल्मों में मौके मिल रहे हैं-आर माधवन


-अजय ब्रह्मात्मज


आर माधवन का ज्यादातर समय इन दिनों मुंबई में गुजरता है। चेन्नई जाने और दक्षिण की फिल्मों में सफल होने के बावजूद उन्होंने मुंबई में अपना ठिकाना बनाए रखा। अगर रहना है तेरे दिल में कामयाब हो गयी रहती, तो बीच का समय कुछ अलग ढंग से गुजरा होता। बहरहाल, रंग दे बसंती के बाद आर माधवन ने मुंबई में सक्रियता बढ़ा दी है। फोटोग्राफर अतुल कसबेकर के स्टूडियो में आर माधवन से बातचीत हुई।


आपकी नयी फिल्म सिकंदर आ रही है। कश्मीर की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में क्या खास है?
सिकंदर दो बच्चों की कहानी है। कश्मीर के हालात से हम सभी वाकिफ हैं। वहां बच्चों के साथ जो हो रहा है, जिस तरीके से उनकी मासूमियत छिन रही है। इन सारी चीजों को थ्रिलर फार्मेट में पेश किया गया है। वहां जो वास्तविक स्थिति है, उसका नमूना आप इस फिल्म में देख सकेंगे।
क्या इसमें आतंकवाद का भी उल्लेख है?
हां, यह फिल्म आतंकवाद की पृष्ठभूमि में है। आतंकवाद से कैसे लोगों की जिंदगी तबाह हो रही है, लेकिन लंबे समय सेआतंकवाद के साए में जीने के कारण यह उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। उन्हें ऐसी आदत हो गयी है कि लाश, हत्या या हादसे देख कर भी वे उत्तेजित नहीं होते। वे इन घटनाक्रमों को देखने के आदी हो गए हैं।
कहा जा रहा है कि आर माधवन ने इधर हिंदी फिल्मों की तरफ ध्यान दिया है?
इधर छोटी फिल्में बन रही हैं और सफल भी हो रही हैं, तो मुझे मौके मिल रहे हैं। सच कहूं तो इधर अच्छी कहानियां मिल रही हैं। कहानियों पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है। नए किरदार गढ़े जाने लगे हैं। इसलिए एक्टरों को काम मिलने लगे हैं। सोलो हीरो फिल्मों की उम्मीद मैं नहीं कर सकता। अब हिंदी फिल्मों में मेरे लिए गुंजाइश बनी है।
आपकी दिलचस्पी क्यों बढ़ी है?
यकीन करें कि कहानियां मुझे खींचती हैं। मैं चाहूं तो आराम से चेन्नई में बैठा चार फिल्में कर सकता हूं। दो एक्शन और दो रोमांटिक कामेडी करते हुए जिंदगी गुजार दूंगा, लेकिन तब एक्सपेरिमेंट करने का मौका नहीं मिलेगा। मेरी दुकान दोनों जगह खुली है, तो उस लिहाज से मुझे डबल मौके मिल जाते हैं।
किस तरह की फिल्मों पर ध्यान दे रहे हैं?
मैं विभिन्न तरह की भूमिकाएं निभा रहा हूं। गुरु, मुंबई मेरी जान और 13बी तीनों अलग किस्म की फिल्में थीं। अभी आमिर खान के साथ थ्री इडियट्स की शूटिंग कर रहा हूं। सिकंदर रिलीज हो रही है। लिविंग लिजेंड अमिताभ बच्चन के साथ तीन पत्ती करते हुए नए अनुभव हुए। मेरी जिंदगी का यह खूबसूरत मोड़ है।
पुरानी कहावत है कि दो नावों पर सवार व्यक्ति की यात्रा मुश्किल होती है?
जी, मैं सहमत हूं। मेरी मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं। मुझसे बार-बार पूछा जाता है कि मैं मुंबई का हूं या चेन्नई का? मैं यह नहीं भूल सकता कि चेन्नई में मैं स्टार बना तो वहां की फिल्में करता रहूंगा। अभी हिंदी फिल्मों में मौकेमिल रहे हैं तो इसे भी नहीं छोड़ूंगा। मुझे फायदे भी हो रहे हैं।
ऐसा लगता है कि आपके मन में कोई कसक है। मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि आप किसी के सामने साबित करना चाह रहे हैं, लेकिन हिंदी फिल्मों में पहचान की ख्वाहिश अभी तक जिंदा है?
फिल्म इंडस्ट्री में वही चलता है,जिसे दर्शक पसंद करते हैं। स्पोर्ट्स या दूसरे कुछ क्षेत्रों में आपका परफार्मेस अच्छा है, तो आप स्कोर कर सकते हैं, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में तो दर्शक ही स्कोर देते हैं। दर्शक ही आपको विजेता घोषित करता है।
अभी किस तरह की चुनौतियां महसूस करते हैं?
अपने यहां धारणाएं बना दी गयी हैं और उन्हें इमेज से जोड़ दिया गया है। माना जाता है कि टीवी एक्टर फिल्मों के हीरो नहीं बन सकते। कहा जाता है कि साउथ के स्टार हिन्दी फिल्मों में कामयाब नहीं हो सकते। इस तरह से हमारी क्रिएटिविटी रोकी जाती है। अब जैसे मुझे हिंदी फिल्मों में दक्षिण के कैरेक्टर दिए जाते हैं, मैं तो साफ मना कर देता हूं। मैं ऐसी धारणाओं का उदाहरण नहीं बनना चाहता।