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Friday, July 31, 2009

फ़िल्म समीक्षा:लव आज कल

शाश्वत प्यार का अहसास
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-अजय ब्रह्मात्मज
इम्तियाज अली निर्देशित लव आज कल बीते कल और आज की प्रेम कहानी है। 1965 और 2009 के किरदारों के जरिए इम्तियाज अली एक बार फिर साबित करते हैं कि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है। प्रेम ज्ञान है, आख्यान है, व्याख्यान है। यही हिंदी फिल्मों का दर्शन है।
रोमांटिक हिंदी फिल्मों में हमेशा से पटकथा प्यार और उसके विशुद्ध अहसास पर केंद्रित रहती है। हर पीढ़ी का निर्देशक अपने नजरिए से प्यार को परिभाषित करने का प्रयास करता है। इम्तियाज अली ने 2009 के जय और मीरा के माध्यम से यह प्रेम कहानी कही है, जिसमें 1965 के वीर और हरलीन की प्रेम कहानी एक रेफरेंस की तरह है। इम्तियाज अली नई पीढ़ी के निर्देशक हैं। उनके पास सुघढ़ भाषा और संवेदना है। अपनी पिछली फिल्मों सोचा न था और जब वी मेट से दमदार दस्तक देने के बाद लव आज कल के दृश्यों और प्रसंगों में इम्तियाज के कार्य कुशलता की छाप स्पष्ट नजर आती है। हिंदी फिल्मों में हम फ्लैशबैक देखते रहे हैं। लव आज कल में फ्लैशबैक और आज की कहानी साथ-साथ चलती है, कहीं कोई कंफ्यूजन नहीं होता। न सीन डिजाल्व करने की जरूरत पड़ती है और न कहीं सीन खोलने की। इम्तियाज अली का दूसरा सफल प्रयोग ऋषि कपूर की जवानी के दृश्यों में सैफ अली खान को दिखाना है। एकबारगी यह प्रयोग चौंकाता है, लेकिन चंद मिनटों बाद सब कुछ स्वाभाविक लगने लगता है।
सैफ अली खान ने दोनों किरदारों को मैनरिज्म और उच्चारण से अलग करने की अच्छी कोशिश की है। अगर पंजाबी के उच्चारण पर उन्होंने थोड़ी और मेहनत की होती तो फिल्म निखर जाती। भाषा की जानकारी ज्यादा नहीं होने पर संवाद अदायगी और भाव अभिव्यक्ति में अंतर आ जाता है। दीपिका पादुकोण के साथ कुछ यही हुआ। उनके उच्चारण साफ है, लेकिन शब्दों के सही अर्थ नहीं समझने से असली भाव उनके चेहरे पर नहीं आ पाया है। आंखें धोखा दे जाती है। इस कारण किरदार कमजोर हो जाता है। फिर भी मीरा का किरदार उनके करिअर में उल्लेखनीय रहेगा।
इम्तियाज अली की फिल्मों में किरदारों की अंतर्यात्रा और बाह्ययात्रा होती है। वे एक जगह नहीं टिकते। कहीं से चलते हैं और कहीं पहुंचते हैं। कई बार वे पुराने ठिकानों पर लौटते हैं। लव आज कल में जय-मीरा एवं वीर-हरलीन को हम विभिन्न शहरों में आते-जाते देखते हैं। उनकी ये यात्राएं खुद की खोज के लिए होती हैं। इम्तियाज की यह खूबी है कि उनके किरदार हिंदी फिल्मों के आम दर्शकों की तरह आसपास के प्रतीत होते हैं। बातचीत और लहजे से अपने से लगते हैं।
अभिनय के लिहाज से सैफ अली खान ने काफी मेहनत की है। 21वीं सदी के युवक के गुण और कंफ्यूजन को वे बेहतरीन तरीके से व्यक्त करते हैं। वहीं दीपिका पादुकोण अपने किरदार के साथ पूरा न्याय नहीं कर सकीं हैं। किरदार में गहराई आते ही उनकी अभिनय क्षमता डगमगाने लगती है। इंटरवल के बाद के नाटकीय दृश्यों में वे कमजोर पड़ जाती हैं। ऋषि कपूर अपने निराले अंदाज में प्रभावित करते हैं। नीतू सिंह की जवानी की भूमिका निभा रही अभिनेत्री लिसेल ने अपनी स्वाभाविकता से हरलीन के किरदार को विश्वसनीय बना दिया है। पहली फिल्म होने पर भी वह कैमरे के सामने सहमी नजर नहीं आती।
फिल्म का गीत-संगीत, स्क्रिप्ट के अनुरूप है। भाव पैदा करने में दोनों अहम भूमिका निभाते हैं। फिल्म का संपादन खासतौर पर सराहनीय है। आरती बजाज ने स्क्रिप्ट और दृश्य की बारीकियों को समझते हुए उन्हें अच्छी तरह जोड़ा है। लव आज कल प्यार की तरह ही एक खूबसूरत अहसास है, जिसे देखते हुए आपको बोरियत नहीं होगी।

Thursday, July 30, 2009

दरअसल:नौ साल की बच्ची के ख्वाब


-अजय ब्रह्मात्मज


रुबीना अली ज्यादा परिचित नाम नहीं लगता, लेकिन स्लमडॉग मिलेनियर के साथ इस नाम को जोड़ दें, तो कम से कम शहर के लोग इस नाम और चेहरे को जरूर पहचान जाएंगे। रुबीना मुंबई के बांद्रा इलाके में स्थित गरीब नगर झोंपड़पट्टी की बच्ची है। उसने स्लमडॉग मिलेनियर में काम किया था और इसी के सिलसिले में वह ऑस्कर के रेड कार्पेट पर घूम आई। तब से वह और उसका साथी कलाकार अजहर सुर्खियों में है। कभी उनके झोंपड़े गिराए जाते हैं, तो कभी उन्हें फ्लैट मिल जाते हैं। कभी कोई उनकी पढ़ाई का खर्चा उठाने को तैयार मिलता है, तो कभी कुछ और कभी कुछ और। हाल ही में रुबीना अली की आत्मकथा प्रकाशित हुई है। रुबीना अभी ठीक से लिखना-पढ़ना नहीं जानती.., वह ठीक से बोल भी नहीं पाती है, लेकिन उसकी आत्मकथा छपकर आ गई है। मालूम नहीं कि अपनी आत्मकथा में लिखे शब्द और वाक्यों का वह सही मतलब समझती भी है या नहीं? आत्मकथा के आखिरी अध्याय में रुबीना ने बताया है कि एक फ्रांसीसी प्रकाशक ने मेरी जीवनी में रुचि दिखाई। मुझे भी अच्छा लगा, क्योंकि मैं अपनी जिंदगी के बारे में लोगों को बता सकूंगी कि मैं क्या हूं?
झोंपड़पट्टी की बच्ची रुबीना की यह कहानी स्पष्ट रूप पर भारतीय पाठकों को ध्यान में रखकर नहीं लिखी गई है। एन बर्थोड और दिव्या डुगर ने मिलकर इसे फ्रांस और दूसरे देशों के पाठकों के लिए लिखा है। आत्मकथा में कई जगह भारत में प्रचलित चीजों को इस तरह समझाया गया है, जैसे किसी विदेशी को बता रहे हों कि हमारे देश में ऐसा होता है। यह अंतर्पाठ रुबीना के जीवनीकारों ने किया है। उन्होंने रुबीना की कही बातों को विदेशी पाठकों को समझाने की गरज से ही लिखा है।
स्लमगर्ल ड्रीमिंग नाम की यह पुस्तक बांद्रा के गरीब नगर इलाके में रह रही रुबीना की जिंदगी में गहराई से नहीं उतरती। जीवनीकारों का वह मकसद भी नहीं रहा होगा। उन्हें ऑस्कर के लिए सम्मानित हो चुकी फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर की बाल कलाकार रुबीना की जीवनी जल्दी से प्रकाशित कर फिल्म की मची गूंज के बीच ही कुछ कर लेना था। रुबीना ने बताया है कि इस पुस्तक से होने वाली आय का आधा हिस्सा चैरिटी में और आधा हिस्सा उसकी पढ़ाई-लिखाई और करियर के आवश्यक प्रशिक्षण में खर्च किया जाएगा। रुबीना की आत्मकथा एक उद्देश्य तो पूरा करती है। इस पुस्तक की आय से उसका भविष्य सुनिश्चित हो जाएगा।
गरीब नगर झोंपड़पट्टी की विस्मित बच्ची रुबीना के अनुभव और संस्मरण में लक-दक दुनिया से परिचित होने का कौतूहल है। वह अभी चमकदार क्षणिक दुनिया और अपनी वास्तविक जिंदगी के ऊहापोह में फंसी हुई है। गरीब नगर के पास बहते नाले के पास दौड़ती-फिरती उसकी जिंदगी उसके कमरे से कई गुना बड़े होटल के आलीशान कमरे में पहुंच कर बेचैन नहीं होती है। उसे इस फर्क का एहसास नहीं है। वह तो ख्वाबों में डोल रही है। खुली आंखों से इस सपनीली दुनिया में विचर रही है। उसकी आत्मकथा में कोई पीड़ा नहीं है। वह अपने अतीत और वर्तमान को लेकर लज्जित नहीं है। हां, उसके सपने मजबूत हो गए हैं। अब उसे लगने लगा है कि बड़ी होकर वह भी प्रीति जिंटा बन सकती है। अनिल कपूर उसके लिए पर्दे पर चलते-फिरते अभिनेता मात्र नहीं हैं। वह उनसे हाथ मिला चुकी है। बातें कर चुकी है। ऑस्कर के रेड कार्पेट पर उनके साथ चल चुकी है।
स्लमगर्ल ड्रीमिंग चूंकि सुनकर लिखी गई आत्मकथा है, इसलिए इसमें नौ साल की उम्र की मासूमियत शब्दों में ढलते समय सांचे में नहीं आ पाई है। विवरणात्मक शैली में लिखी गई आत्मकथा द्रवित और प्रभावित नहीं करती।रुबीना बड़ी होने पर शायद अपनी आत्मकथा दोबारा लिखे, तो हम उसके एहसास को सही तरीके से समझ पाएंगे।

Tuesday, July 28, 2009

डेली रूटीन से ऊब जाता हूं: सैफ अली खान

-अजय ब्रह्मात्मज
छोटे नवाब के नाम से मशहूर सैफ अली खान अब निर्माता बन गए हैं। उनके प्रोडक्शन हाउस इलुमिनाती फिल्म्स की पहली फिल्म लव आज कल इस शुक्रवार को रिलीज हो रही है। फिल्म के निर्देशक इम्तियाज अली हैं और हीरोइन दीपिका पादुकोण हैं। लव आज कल की रिलीज के पहले खास बातचीत।
आप उन खास और दुर्लभ बेटों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी मां के प्रोफेशन को अपनाया। ज्यादातर बेटे पिता के प्रोफेशन को अपनाते हैं?
मेरी मां भी दुर्लभ एवं खास हैं। इस देश में कितनी मां हैं, जो किसी प्रोफेशन में हैं। मैं तो कहूंगा कि मेरी मां खास और दुर्लभ हैं। एक सुपर स्टार और मां ... ऐसा रोज नहीं होता। मेरी मां निश्चित ही खास हैं। उन्होंने दोनो जिम्मेदारियां बखूबी निभाई।
मां के प्रोफेशन में आने की क्या वजह है?
बचपन में मुझे क्रिकेट का शौक था। कुछ समय खेलने के बाद मुझे लग गया था कि मैं देश का कैप्टन नहीं बन सकता। इतना टैलेंट भी नहीं था। पढ़ाई में मेरी रुचि नहीं थी। कोई भी चीज अच्छी नहीं लगती थी। फिल्मों के बारे में सोचा तो यह बहुत ही एक्साइटिंग लगा। फिल्मों में नियमित बदलाव होता रहता है। रोल बदलते हैं, लोकेशन बदलते हैं, साथ के लोग बदलते हैं ... यह बदलाव मेरी पर्सनैलिटी को बहुत जंचता है।
फिल्म निर्माण के साथ जुड़ा एडवेंचर और बदलाव ...
जी कभी रात में काम कर रहे हैं, कभी दिन में ... कभी पनवेल में तो कभी लंदन में। कभी इनके साथ तो कभी उनके साथ। यह सब अच्छा लगता है। डेली रूटीन मुझे बचपन से बहुत पकाता था।
मतलब दस से पांच की नौकरी और पांच दिनों के टेस्ट मैच जैसे रूटीन में आप की रुचि नहीं थी?
टेस्ट मैच को इसमें शामिल न करें। मैं क्रिकेट बहुत पसंद करता हूं। वह तो मेरे खून में है। नौकरी मैं नहीं कर सकता था। लोखंडवाला से रोज वर्ली जाना और आना ... नहीं यार, मेरे बस का नहीं था। मेरी रुचि नहीं थी।
कुछ मकसद रहा होगा फिल्मों में आने का?
मैं इस प्रोसेस का आनंद लेना चाहता था। बचपन से फिल्में देखता रहा हूं। मैं फिल्ममेकिंग के प्रोसेस का हिस्सा बनना चाहता था। क्लिंट इस्टवुड की फिल्में देख कर बड़ा हुआ हूं।
बचपन में कितनी हिंदी फिल्में देखते थे?
ज्यादा नहीं। मां की फिल्में देख कर बहुत दुखी हो जाता था, क्योंकि बहुत रोना-धोना होता था उनकी फिल्मों में।
आप जो सोच कर फिल्मों में आए थे, वह सब अचीव कर लिया।
नहीं, अभी नहीं किया है। थोड़ा-बहुत किया है। बाकी अब प्रोडक्शन में आने के बाद कर रहा हूं। एजेंट विनोद के साथ उसे अचीव करना चाहता हूं।
कोई भी एक्टर जब डायरेक्टर या प्रोड्यूसर बनता है तो उसके दिमाग में रहता है कि मुझे अभी तक जो मौके नहीं मिले, उन्हें हासिल करूंगा। या फिर उनकी कुछ खास करने की इच्छा रहती है। आप क्यों निर्माता बने?
निर्माता बनने की यही वजह है। क्रिएटिव कंट्रोल मेरा रहे। कैसी फिल्म बनानी है। पोस्टर कैसा होगा? और ऐसे रोल जो हमें नहीं मिल पा रहे हैं, उन्हें हम खुद बनाएंगे। जैसे एजेंट विनोद, जैसे लव आज कल ...
आप कैसे तय करते हैं कि मुझे यह रोल करना चाहिए या वह रोल करना चाहिए? अपनी बनी हुई छवि से प्रभावित होता है यह फैसला या फिर दर्शकों ने जिसमें पसंद कर लिया ...
मेरी छवि क्या है? सलाम नमस्ते और हम तुम के चॉकलेट हीरो की छवि ़ ़ ़ लेकिन मैंने ओमकारा किया और लोगों ने मुझे पसंद किया। रेस अलग फिल्म थी। दोनों ही फिल्मों में मेरे रफ रोल थे, लेकिन दर्शकों ने पसंद किया। मुझे लगता है कि मैं दोनों कर सकता हूं।
एक विकासशील देश में एक्टर होना कितनी बड़ी बात है और इस के क्या सुख हैं?
बहुत बड़ी बात है। कितने लोग एक्टर बन पाते हैं इस देश में। कितनी समस्याएं हैं। बिजली नहीं है। म्युनिसिपल ऑफिस जाओ। हम बहुत ही भाग्यशाली हैं। हम किसी लाइन में खड़े नहीं होते। दर्शक हम से ज्यादा मांग नहीं करते। आप अच्छे लगो ... तो आधी लड़ाई खत्म। अच्छे लगने के लिए जिम जाना और कसरत करना जरूरी हो जाता है।
एक्टर होने के लिए और क्या चीजें जरूरी हैं?
बहुत चीजें जरूरी हैं। लुक और शरीर तो अच्छा होना ही चाहिए। साफ दिमाग हो, जो आंखों में नजर आता है। आप साफ दिल हों। दुनिया और जिंदगी की समझदारी होनी चाहिए। मेरे हिसाब से कैरेक्टर और पर्सनैलिटी अच्छी होनी चाहिए। भारत में बच्चे सब सुनते, देखते और पढ़ते हैं कि सैफ ने ऐसे किया ... हम लोग रोल मॉडल बन जाते हैं। हमें सावधान रहना चाहिए। एक जिम्मेदारी होती है।
इस जिम्मेदारी से आप कितना बंधते या खुलते हैं?
एक्टर के तौर पर फर्क नहीं पड़ता। मैंने निगेटिव रोल भी किए हैं। हमारा ऑन स्क्रीन और ऑफ स्क्रीन इमेज होता है। हमें दोनों का ख्याल रखना चाहिए। मुझे अपने बारे में छपी-दिखाई सारी बातें पता चलती हैं। अभी मैं जिंदगी में च्यादा स्थिर हूं। पहले इतना नहीं था।
आप छोटे नवाब कहे जाते रहे हैं। उसके साथ कहीं न कहीं यह जुड़ा रहा कि देखें छोटे नवाब क्या कर लेते हैं? क्या आपको लगता है कि अपने परिवार की वजह से आप निशाने पर रहें?
परिवार की वजह से हमारा स्पेक्ट्रम बड़ा हो जाता है। इसके फायदे भी होते हैं, लेकिन परेशानियां भी होती हैं। अगर असफल रहे तो कहा जाता है कि देखो क्या किया? मां-बाप इतने काबिल और मशहूर, लेकिन बेटे को देखो। अगर सुपरस्टार बन गए तो कहा जाता है कि यह तो होना ही था। आखिर बेटा किस का है?
बीच में आप ने बुरा दौर भी देखा। किस वजह से इंडस्ट्री में बने और टिके रहे?
मेरे पास विकल्प नहीं थे। मैंने तय कर लिया था कि हिलना नहीं है। मैंने यहां आने के बाद अपने पुल जला दिए थे। लौटने का रास्ता नहीं बचा था।
पहली फिल्म के लिए इम्तियाज अली को चुनने की कोई खास वजह थी क्या?
बहुत सी बातें थी। उनके पास नया आइडिया था। मुझे वही पुरानी चीज नहीं बनानी थी। मुझे वह परफेक्ट लगे। मुझे लव स्टोरी फिल्म ही बनानी थी, लेकिन थोड़ी बोल्ड स्टोरी बनानी थी। देखें क्या होता है? फिल्म की कहानी इम्तियाज लेकर आए थे।
आपकी पहली डबल रोल फिल्म है। कितना मुश्किल या आसान रहा इसे निभाना?
यों समझें कि दो फिल्में एक साथ कर लीं। इसमें एक रोल में सरदार हूं। मुझे इस रोल में देखकर सरदार खुश होंगे। हम ने उसे बहुत आंथेटिक रखा है। इतना मुश्किल नहीं होता है डबल रोल करना। मैनरिच्म अलग रखना पड़ता है। दूसरे रोल में सरदार होने की वजह से मैनरिच्म खुद ही अलग हो गया।
क्या है लव आज कल?
यह रिलेशनशिप की कहानी है। आज के जमाने में संबंधों को निभाने में कितनी समस्याएं हैं। सातवें दशक का प्यार थोड़ा अलग था। लंबे समय के बाद मिलते थे। इंतजार रहता था। पहले शादी करते थे, फिर प्यार के बारे में सोचते थे। उस समय के प्यार को देख कर आज के लड़के-लड़की रश्क करेंगे। आज की प्रेम कहानी में करियर बहुत खास हो गया है। लड़कियों का रोल और समाज में स्थान बदल गया है। मां के जेनरेशन और हमारे जेनरेशन में फर्क आ गया है। आज ऐसा लगता है कि दो व्यक्ति एक साथ रहते हैं। दोनों की वैयक्तिकता बनी रहती है।
आप को खुद लव स्टोरी कितनी अच्छी लगती है?
मैं एक्शन, एक्शन कॉमेडी और थ्रिलर फिल्में च्यादा पसंद करता हूं। मुझे लव स्टोरी च्यादा अच्छी नहीं लगती। लव स्टोरी में काम करता हूं। मैं बनाना भी चाहता हूं, क्योंकि देश देखना चाहता है। मुझे व्यक्तिगत रूप से ओमकारा और रेस जैसी फिल्में पसंद हैं।
फिर भी हिंदी फिल्मों की कौन सी लव स्टोरी आप को अच्छी लगी है?
दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कयामत से कयामत तक, मैंने प्यार किया, दिल, ... आमिर खान की काफी फिल्में ... मां के समय की बात करूं तो आराधना और अमर प्रेम ...
प्यार में सबसे जरूरी क्या है?
सम्मान ... और भरोसा।
सचमुच प्यार बदल गया है?
प्यार का एहसास नहीं बदला है। प्यार दिखाने का तरीका बदल गया है। दबाव बदल गए हैं। पहले टीवी का एक ही चैनल था। अभी इतने चैनल आ गए हैं। आप एक चैनल से ऊबते ही दूसरे चैनल पर चले जाते हैं। प्यार भी ऐसा ही हो गया है। थोड़ी मुश्किल आती है तो भूल जाते हैं। दिलासा दिलाने के लिए काम का बहाना है।
क्या यह पश्चिमी प्रभाव की वजह से हो रहा है?
नहीं, यह अंदरूनी मामला है। हम कहते रहते हैं कि गोरे लोग बड़े खराब होते हैं और हम अच्छे हैं। वास्तव में हम भी उतने ही खराब हैं। हम भारतीय क्या हैं? मौका मिले तो अम‌र्त्य सेन की किताब पढें़। उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से विश्लेषित किया है। हम इटली के माफिया की तरह हैं। हम मुंह पर कुछ और, पीठ पीछे कुछ और बोलते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में भी सामने बोलेंगे कि क्या फिल्म बनाई है और पीठ पीछे बोलेंगे कि क्या बकवास बनाई है? अगर बेटी किसी लड़के से मिलवा कर कहे कि इस से शादी करनी है तो उस लड़के से कहेंगे कि वाह तुम बहुत अच्छे हो। उसके जाते ही बेटी से कहेंगे कि खबरदार उससे दोबारा मिली। बहुत घटिया इंसान लगता है।
आप आम इंसान की तरह जी पाते हैं क्या? आप तो सुपर स्टार सैफ अली खान हैं?
मैं बहुत ही नार्मल हूं। चाट खना, पानी पुरी खाना ... कहीं भी जाओ। जिम पैदल जाता हूं। शुरू में लोग चौंकते हैं, फिर उन्हें आदत पड़ जाती है। मुंबई में दिक्कत नहीं है। दूसरे शहरों में कभी-कभी लोगों की वजह से दिक्कत होती है। लेकिन आप पैसे कमा रहे हो, तरक्की कर रहे हो तो लंदन चले जाओ। आप चाहते हो कि कोई न पहचाने तो वैसे शहर में जाकर घूमो, जहां कोई नहीं जानता।
क्या ऐसा लगता है कि आप समाज को जितना देते हैं, उतना ही समाज भी आपको देता है?ज्यादा ही देता है। हम तो आज के राजा-महाराजा हैं। हमें नेताओं से ज्यादा इज्जत मिलती है। एक फोन करने पर सब कुछ मिल जाता है।
अपनी तीन फिल्में मुझे गिफ्ट करनी हो तो कौन-कौन सी देंगे?
ओमकारा, हम तुम और परिणीता।
फिल्म इंडस्ट्री के किन लोगों से आप मुझे मिलवाना चाहेंगे। वैसे लोग, जिनकी आप इज्जत करते हों और जो सचमुच आप को इंडस्ट्री के प्रतिनिधि लगते हैं?
डायरेक्टर में करण जौहर ... करण ने दुनिया को देखा और समझा है। एक वजह है कि वे ऐसी फिल्में बनाते हैं। वे लंदन देख चुके हैं। पेरिस उनका देखा हुआ है। फ्रेंच बोलते हैं। अमेरिका में रह चुके हैं। वे भारतीय दर्शकों को समझते हैं। उन्हें मालूम है कि यह फिल्म बनाऊंगा तो सबसे ज्यादा पैसा मिलेगा। इम्तियाज अली ... इम्तियाज आर्टिस्ट मिजाज के हैं। घूमंतू किस्म के हैं। काफी कूल और तेज है। श्री राम राघवन ... इतने अच्छे इंसान हैं और सिनेमा की बहुत अच्छी समझ रखते हैं। अनुराग बसु और विशाल भारद्वाज भी हैं। शाहरुख खान से मिलवाऊंगा। उनका दिमाग बहुत तेज चलता है और वे बहुत इंटरेस्टिंग बात करते हैं फिल्मों और दुनिया के बारे में। शायद आमिर से मिलवाऊंगा। लड़कियों में करीना से ... और भी बताऊं।
फिल्म इंडस्ट्री की सबसे अच्छी बात क्या लगती है?
डेमोक्रेसी ... आप यहां बुरी फिल्म नहीं चला सकते। यहां जो लोगों को पसंद है वही चलेगा। बाकी फील्ड में आप कुछ भी थोप सकते हैं, यहां नहीं। किसी का नियंत्रण नहीं है इंडस्ट्री पर। थिएटर में दर्शक आएं और तीन बार देखें तो फिल्म हिट होती है।
इस फिल्म की रिलीज के पहले आप की कैसी फीलिंग है?
यह फिल्म मेरे लिए बहुत जरूरी है। तनाव तो है। 31 जुलाई तक मैं बीमार न पड़ जाऊं? यह बच्चे के जन्म की तरह है। एक तो सुरक्षित डिलिवरी हो और बच्चा सही-सलामत हो। कुछ चीजें तो जन्म के बाद तय होती है?
लव आज कल को क्यों देखें?
इसमें नयापन है। इम्तियाज से संवाद ऐसे हैं, जो दो असली लोग बात कर रहे हों। एक लव स्टोरी है। आज के दबाव और कमिटमेंट के बारे में ... एक संदेश भी देती है फिल्म। हमेशा दिमाग की न सुनें, दिल की भी सुनें। इसमें कोई विलेन नहीं है। दिमाग ही विलेन है।

Saturday, July 25, 2009

फ़िल्म समीक्षा:लक

-अजय ब्रह्मात्मज
माना जाता है कि हिंदी फिल्मों के गाने सिर्फ 200 शब्दों को उलट-पुलट कर लिखे जाते हैं। लक देखने के बाद फिल्म के संवादों के लिए भी आप यही बात कह सकते हैं। सोहम शाह ने सिर्फ 20 शब्दों में हेर-फेर कर पूरी फिल्म के संवाद लिख दिए हैं। किस्मत, फितरत, तकदीर, गोली, मौत और जिंदगी इस फिल्म के बीज शब्द हैं। इनमें कुछ संज्ञाएं और क्रियाएं जोड़ कर प्रसंग के अनुसार संबोधन बदलते रहते हैं। यूं कहें कि सीमित शब्दों के संवाद ही इस ढीली और लोचदार स्कि्रप्ट के लिए आवश्यक थे। अगर दमदार डायलाग होते तो फिल्म के एक्शन से ध्यान बंट जाता। सोहम की लक वास्तव में एक टीवी रियलिटी शो की तरह ही है। बस, फर्क इतना है कि इसे बड़े पर्दे पर दिखाया जा गया है। इसमें टीवी जैसा रोमांच नहीं है, क्योंकि हमें मालूम है कि अंत में जीत हीरो की ही होनी है और उसकी हीरोइन किसी भी सूरत में मर नहीं सकती। वह बदकिस्मत भी हुई तो हीरो का लक उसकी रक्षा करता रहेगा। रियलिटी शो के सारे प्रतियोगी एक ही स्तर के होते हैं। समान परिस्थितियों से गुजरते हुए वे जीत की ओर बढ़ते हैं। इसलिए उनके साथ जिज्ञासा जुड़ी रहती है। बड़े पर्दे पर के इस रियलिटी शो लक में पहले ही पता चल जाता है कि बुरे दिल का राघव (रवि किशन) आउट हो जाएगा। इंटरवल तक तो इस रियलिटी शो के प्रतियोगी जमा किए जाते हैं। उनकी जिंदगी के उदास किस्से सुनाए जाते हैं। निराशा में भी किस्मत के धनी किरदार जिंदादिल और जोशीले नजर आते हैं। अपनी-अपनी मजबूरियों से वे इकट्ठे होते हैं और फिर मूसा (संजय दत्त) उन पर भारी रकम के दांव पर लगाता है। मूसा और उसका सहयोगी तामांग (डैनी डेंजोग्पा) रियलिटो शो के संचालक हैं। लक में तर्क न लगाएं तो ही बेहतर होगा। सारे किरदार नकली और फिल्मी हैं। चूंकि लेखक और निर्देशक सोहम शाह खुद हैं, इसलिए फिल्म के बुरी होने का पूरा श्रेय उन्हें ही मिलना चाहिए। हां, कलाकारों ने उनकी इस कोशिश को बढ़ाया है। खासकर इमरान खान और श्रुति हासन ने। इमरान खान को मान लेना चाहिए कि सिर्फ इंस्टिक्ट से फिल्म चुनना सही नहीं है। देखना चाहिए कि आप फिल्म के किरदार में जंचते भी हैं या नहीं? एक्शन फिल्मों में हीरो का कांफीडेंस उसकी बाडी लैंग्वेज में नजर आता है। इमरान में एक्शन स्टार का कंफीडेंस नहीं है। वे एक्शन करते समय कांपते से नजर आते हैं। श्रुति हासन लक से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत कर रही हैं। अब श्रुति का कमल हासन और सारिका की बेटी होना संयोग है या लक? निर्देशक का ध्यान केवल एक्शन पर रहा है। दो-तीन एक्शन सीक्वेंस बेहतर बन पड़े हैं, लेकिन स्पेशल इफेक्ट से रूबरू दर्शक ऐसे दृश्यों की सच्चाई जानते हैं। फिल्म में इमोशन और ड्रामा रहे तो एक्शन का प्रभाव बढ़ जाता है, लेकिन लक इन दोनों ही मामलों में कमजोर है। फिल्म के अंत में एक डायलाग है - लक उन्हीं का साथ देता है जिनमें जीतने का जच्बा हो। काश, फिल्म बनाने के जज्बे से भी लक को जोड़ा जा सकता।
रेटिंग-*

Friday, July 24, 2009

आत्मकथा नहीं लिखना चाहते सलीम खान


-अजय ब्रह्मात्मज


सलीम खान के साथ घंटों बिताने के बाद चलते वक्त नंबर लेने के बाद जब मैंने पूछा कि क्या कभी उनसे फोन पर बातें की जा सकती हैं? उनका सीधा जवाब था, भाई, मैं तो रॉन्ग नंबर से आए कॉल पर भी आधे घंटे बात करता हूं। आप तो परिचित हैं और पत्रकार हैं। सलीम खान के व्यक्तित्व का अनुमान बगैर उनकी संगत के नहीं हो सकता। वे मीडिया से बातें नहीं करते और न अपने जोड़ीदार जावेद अख्तर की तरह बयान और भाषणों के लिए उपलब्ध रहते हैं। उनका अपना एक रुटीन है। वे उसमें व्यस्त रहते हैं। आज जिस उदारता, मेहमाननवाजी और फराक दिल के लिए सलमान खान की तारीफ की जाती है, वह सब उन्हें सलीम खान से विरासत में मिली है। सलीम खान इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन साथ में यह बताना नहीं भूलते कि सलमान की अपनी खासियतें हैं। वह अपने ढंग का वाहिद लड़का है। मेरा बेटा है, इसलिए नहीं.., वह सचमुच टैलेंटेड आर्टिस्ट है।
सलीम खान कमरे में टंगी पेंटिंग्स की तरफ इशारा करते हैं। उसे नींद नहीं आती। वह बेचैन रहता है। मैं उसकी क्रिएटिव छटपटाहट को समझ सकता हूं। कभी मैं भी उसकी तरह बेचैन रहता था। वे यादों की गलियों में लौटते हुए बताते हैं कि इंदौर में मेरी प्रेमिका की शादी कहीं और हो रही थी। उसके घर वालों ने मुझे इसलिए नकार दिया था कि मेरे पास एक मोटर साइकिल और कुछ ख्वाब थे। उन्होंने दुनियावी नजरिए से ठीक ही सोचा था कि ख्वाब से खाना नहीं मिलता। मैं इंदौर के एक टीले पर उदास और हारे हुए प्रेमी की तरह दुनिया को गाली देता बिसूर रहा था, तो किसी ने कंधे पर हाथ रखा और कहा, कुछ ऐसा करो कि तुम्हारी प्रेमिका और उसके घरवालों को अफसोस हो कि उन्होंने तुम्हें क्यों नकारा! सलीम खान को सलाह अच्छी लगी और वे मुंबई आ गए। दिल में फिल्मों में काम करने का जज्बा था। तब दिलीप कुमार का जमाना था। उनके पोस्टर और होर्डिग नुक्कड़ों पर लगे रहते थे। सलीम खान ने सोचा कि एक दिन अपना भी पोस्टर लगेगा। पोस्टर लगे, लेकिन ऐक्टर के रूप में नहीं। सलीम खान बहुत बड़े रायटर के रूप में मशहूर हुए। पहली बार तब लोगों ने पोस्टर पर लेखकों के नाम बडे़ और बोल्ड अक्षरों में देखे। सलीम-जावेद की जोड़ी हिट फिल्मों का पर्याय बन चुकी थी। उन दिनों वे फिल्म स्टारों की किस्मत पलट रहे थे। कई स्टार हैं, जिनमें से कुछ आज भी दोस्त हैं और कुछ समय के साथ छिटककर दूर चले गए हैं। दूर जाने वालों में अमिताभ बच्चन भी हैं। सलीम खान की लिखी अनेक फिल्मों के हीरो रहे अमिताभ से उनकी कोई बातचीत नहीं है। इस प्रसंग पर फिर कभी..
फिलहाल उनके निष्क्रिय होने की बात चली, तो सलीम खान स्पष्ट करते हैं कि मेरा बेटा तब तक स्टार बन चुका था। मुझे लगा कि अगर मैं अपनी कहानी किसी और के पास लेकर जाऊंगा, तो वह सोचेगा कि सलीम साहब सलमान के साथ क्यों काम नहीं करते? अगर कभी उसने बिठा दिया, तो मुझे और बेटों को तकलीफ होगी। बेटे के साथ फिल्म करूं, तो दूसरी दिक्कतें हैं। फिल्म हिट हो गई, तो सेहरा बेटे के नाम और अगर कहीं फिल्म पिट गई, तो झूठ का मैं बदनाम। लिहाजा मैंने लिखना बंद कर दिया। अचानक घर में बैठना तो भारी रहा होगा। कोई रोशनी से बाहर आ जाए, तो घुप्प अंधेरा मिलता है। कुछ भी नहीं सूझता। सलीम खान के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। वे बेटों की देखभाल में लग गए। अपनी मसरूफियत के बारे में वे बताते हैं कि जिंदगी में जो गलतियां मैं कर चुका था, वैसी गलतियां मेरे बेटे न करें, इस खयाल से मैंने उनकी देखभाल की। मैंने उनके कमाए धन का सही निवेश किया। आज मेरे सभी बच्चे इस स्थिति में हैं कि उन्हें भविष्य की चिंता नहीं है। सभी अपने ढंग से कमा रहे हैं और बाकी देखभाल के लिए मैं हूं। यहां कई तरह के जरूरतमंद आते हैं। उनकी मदद करने से सुकून मिलता है।
क्या कभी आत्मकथा लिखने का विचार नहीं आया। उनके अनुभव और जीवन के प्रसंग दूसरों के लिए प्रेरणादायी हो सकते हैं। सलीम खान आत्मकथा के महत्व को समझते हैं और इसी वजह से वे अपनी आत्मकथा नहीं लिखना चाहते। उनका मानना है कि आत्मकथा में साफगोई होनी चाहिए। मैं अगर सब कुछ साफ-साफ लिखूंगा, तो कई लोगों के चेहरों पर चढ़े नकाब उतर जाएंगे। इसके अलावा जीवन के अंतरंग प्रसंग हैं। उन्हें दुनिया के साथ शेयर नहीं किया जा सकता। कुछ कहानियां कहने-सुनने के लिए नहीं होतीं।
फिलहाल सलीम खान अपने बेटे सोहेल खान की फिल्म किसान को लेकर बहुत उत्साहित हैं। वे कहते हैं कि इस दौर में सोहेल ने ऐसी फिल्म बनाने की जरूरत समझी। मुझे फिल्म की थीम अच्छी लगी। मैंने उसे कहा कि इसे खुद ही वितरित करो।

Thursday, July 23, 2009

दरअसल:सोचें जरा इस संभावना पर

-अजय ब्रह्मात्मज
आए दिन देश के कोने-कोने से फिल्मों में जगह पाने की कोशिश में हजारों युवक मुंबई पहुंचते हैं। हिंदी फिल्मों का आकर्षण उन्हें खींच लाता है। इनमें से सैकड़ों सिनेमा की समझ रखते हैं। वे किसी उन्माद या भावातिरेक में नहीं, बल्कि फिल्मों के जरिए अपनी बात कहने की गरज से मुंबई आते हैं। फिल्मों में आने के लिए उत्सुक हर युवक पर्दे पर ही चमकना नहीं चाहता। कुछ पर्दे के पीछे हाथ आजमाना चाहते हैं। उनके पास अपनी कहानी है, अपना नजरिया है और वे कुछ कर दिखाना चाहते हैं।
मुंबई में सक्रिय हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे निश्चित समयावधि में अवसर और परिणाम हासिल किया जा सके। फिल्मी परिवार के बच्चों को इस विमर्श से अलग कर दें, तो भी कुछ उदाहरण मिल जाते हैं, जहां कुछ को तत्काल अवसर मिल जाते हैं। वे अपनी मेहनत, कोशिश और फिल्म से दर्शकों को पसंद आ जाते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मौजूद परिवारवाद, लॉबिंग और संकीर्णता के बावजूद हर साल 20 से 25 नए निर्देशक आ ही जाते हैं। पर्दे के पीछे और पर्दे के आगे भी हर साल नए तकनीशियन और कलाकार आते हैं। यह कहना अनुचित होगा कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नए लोगों को बिल्कुल जगह नहीं मिलती। जगह मिलती है, लेकिन उसके लिए संघर्ष, धैर्य, लगन और मुस्तैदी आवश्यक है।
बॉलीवुड में पूरे भारत, खासकर हिंदी प्रदेश से आए व्यक्तियों को अवसर नहीं मिलते। चूंकि फिल्म निर्माण एक व्यवसाय भी है। इसलिए नए व्यक्ति को अवसर देने से पहले कंपनियां अच्छी तरह सोच-विचार करती हैं। उन्हें ठोकने-बजाने के बाद ही फिल्मों में काम मिलता है। सिर्फ हिंदी प्रदेश की ही बात करें, तो उनकी कुल आबादी 60-65 करोड़ के आसपास होगी। हिंदी में इन दिनों 150 से 200 फिल्में बनती हैं। हर फिल्म के साथ कम से कम 500 से 750 व्यक्ति सक्रिय ढंग से जुड़े होते हैं। इन आंकड़ों के गुणनफल पर गौर करें, तो पाएंगे कि करोड़ों की आबादी में चंद लाख ही भाग्यशाली साबित होते हैं। हर पेशे में रोजगार का कमोवेश ऐसा ही दबाव है।
सही है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के विकेंद्रीकरण पर विचार-विमर्श आरंभ हो। आजादी से पहले कोलकाता, लाहौर और मुंबई में हिंदी फिल्में बनती थीं। उस दौर में मराठी, बंगाली और पंजाबी प्रतिभाओं ने हिंदी फिल्मों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आजादी के बाद मुंबई हिंदी फिल्मों का मुख्य निर्माण केन्द्र हो गई। बीच-बीच में चेन्नई और हैदराबाद में भी फिल्में बनती रहीं, लेकिन हिंदी प्रदेशों में फिल्म निर्माण पर जोर और ध्यान नहीं दिया गया। हिंदी प्रदेश की सरकारों ने कभी इस दिशा में प्रयास नहीं किया कि वे अपने प्रदेश की प्रतिभाओं को आमंत्रित करें और स्थानीय रचना, प्रतिभा और सुविधाओं का उपयोग करते हुए अपने प्रदेश के नागरिकों की रुचि की फिल्मों का निर्माण करें। नतीजा यह हुआ कि आजादी के 62 साल बाद भी इन प्रदेशों में फिल्म निर्माण की मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं।
अगर हिंदी प्रदेश की सरकारें आवश्यक सुविधाएं दें, तो वहां फिल्मों के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हो सकती है। इन दिनों हिंदी फिल्मों का कलेवर बदल चुका है। मुख्य रूप से मल्टीप्लेक्स के दर्शकों के लिए बन रही फिल्मों से देसी दर्शकों का मनोरंजन नहीं हो पा रहा है। बीच में भोजपुरी फिल्मों ने इस शून्य को भरा, लेकिन कुछ ही समय बाद सब खत्म हो गया। अब कोई ऐसी उम्मीद उसमें नजर नहीं आ रही है।
लखनऊ, पटना, भोपाल, जयपुर, शिमला, देहरादून जैसे शहरों को फिल्म निर्माण के केन्द्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। कम लागत में स्थानीय रुचि की फिल्में बनाकर लाभ भी कमाया जा सकता है। इन दिनों मुंबई में हिंदी प्रदेश से आई अनेक प्रतिभाएं सहयोग देने की स्थिति में हैं। बस जरूरत है कि एक अभियान के रूप में हिंदी प्रदेश की सरकारें पहल करें। अगर यह संभव हुआ, तो हिंदी फिल्मों का भला होगा और यह शिकायत भी दूर होगी कि पता नहीं हिंदी फिल्मों में कौन-सी दुनिया दिखाई जाती है। फिल्मों में अपनी दुनिया देखनी है, तो पहल करनी पड़ेगी। शुद्ध मुनाफे से प्रेरित निर्माताओं को आम दर्शकों की दुनिया की फिक्र क्यों हो?

Wednesday, July 22, 2009

इमरान खान से बातचीत

-अजय ब्रह्मात्मज
साल भर के स्टार हो गए हैं इमरान खान। उनकी फिल्म जाने तू या जाने ना पिछले साल 4 जुलाई को रिलीज हुई थी। संयोग से इमरान से यह बातचीत 4 जुलाई को ही हुई। उनसे उनकी ताजा फिल्म लक, स्टारडम और बाकी अनुभवों पर बातचीत हुई। प्रस्तुत हैं उसके अंश..
आपकी फिल्म लक आ रही है। खुद को कितना लकी मानते हैं आप?
तकनीकी रूप से बात करूं, तो मैं लक में यकीन नहीं करता। ऐसी कोई चीज नहीं होती है। तर्क के आधार पर इसे साबित नहीं किया जा सकता। मैं अपनी छोटी जिंदगी को पलटकर देखता हूं, तो पाता हूं कि मेरे साथ हमेशा अच्छा ही होता रहा है। आज सुबह ही मैं एक इंटरव्यू के लिए जा रहा था। जुहू गली से क्रॉस करते समय मेरी गाड़ी से दस फीट आगे एक टहनी गिरी। वह टहनी मेरी गाड़ी पर भी गिर सकती थी। इसी तरह पहले रेल और अब फ्लाइट नहीं छूटती है। मैं लेट भी रहूं, तो मिल जाती है। शायद यही लक है, लेकिन मेरा दिमाग कहता है कि लक जैसी कोई चीज होती ही नहीं है।
क्या हमारी सोच में ही लक और भाग्य पर भरोसा करने की बात शामिल है?
हमलोग आध्यात्मिक किस्म के हैं। हो सकता है उसी वजह से ऐसा हो, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री की बात करें, तो यहां इतना पैसा लगता है, मेहनत लगती है और उसके बाद भी फिल्म नहीं चलती, तो हम भाग्य को कोसकर संतोष कर लेते हैं। कामयाबी पर तो हर व्यक्ति का दावा होता है। असफलता किस्मत से जोड़ दी जाती है।
फिर क्या लक जैसी कोई चीज होती है?
जो यकीन करते हैं, उनके लिए होगी। मैं नहीं मानता कि भाग्य से मेरे करियर में कोई बदलाव आएगा। उसके लिए मुझे मेहनत करनी ही होगी।
आपने दीवाली पर ताश खेला होगा या फिर कैसिनो में दांव लगाए होंगे? कितने लकी रहे आप?
अगर जीतने से लक को जोड़ेंगे, तो मैं अनलकी हूं। वैसे भी मुझे ताश और कैसिनो आदि का शौक नहीं है। मैं दांव नहीं लगाता। मैंने कभी लाटरी का टिकट भी नहीं खरीदा है।
आप एक साल से स्टार हैं। इस एक साल में क्या बदला है आपके लिए?
ज्यादा कुछ नहीं, लेकिन फर्क मेरे जीवन में भी आया है। मेरे पास एक बड़ी और महंगी गाड़ी आ गई है। मेरा बैंक बैलेंस बढ़ गया है। मैं पहले की तरह ही कम खर्च करता हूं। मेरे वही दोस्त हैं। मैं उनके साथ ही समय बिताता हूं।
आप पहले से अधिक मैच्योर हो गए हैं। बात करने की कला आ गई है और प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों के जवाब देने में स्मार्ट हो गए हैं?
थैंक्स.., अगर पिछले प्रेस कॉन्फ्रेंस की बात कर रहे हैं, तो उसकी जिम्मेदारी अचानक मेरे कंधों पर आ गई थी। संजय दत्त किसी वजह से नहीं आ सके। अंतिम समय में उनका आना कैंसल हुआ, तो मुझ पर बोझ डाल दिया गया। मैंने कोशिश की कि प्रेस कॉन्फ्रेंस अच्छा और लाइव रहे। थैंक्स कि सब ठीक से हो गया।
क्या आप को नहीं लगता कि आमिर खान की वजह से आप आसानी से स्टार बन गए?
मैं आपसे थोड़ा सहमत और थोड़ा असहमत हूं। मामू से मुझे मदद मिली, लेकिन लोगों ने इमरान खान को स्वीकार किया। भारतीय परंपरा में हम परिवार के सदस्यों को.., उनकी विरासत को स्वीकार करते हैं। फिल्मों के मशहूर परिवारों को देख लें। राजनीति और इंडस्ट्री में भी ऐसा ही है। आरंभिक स्वीकृति मिल सकती है, लेकिन उसके बाद परफॉर्म करना होता है। अगर मेरी फिल्में लगातार फ्लॉप हों और काम भी लोगों को पसंद न आए, तो मुझे कोई भी नहीं बचा सकता।
क्या ऐसा इसलिए है कि हमारा समाज अभी तक सामंती मूल्यों में विश्वास करता है और हम अ‌र्द्ध शिक्षित हैं?
यह एक वजह हो सकती है, लेकिन परिवारों के प्रति हमारा भरोसा जागता है। पूंजीवादी समाज में विचार और राजनीति मूल्यों से लगाव रहता है। हम भारत में वंश, परिवार और विरासत पर जोर देते हैं।
लक की हीरोइन श्रुति हासन के बारे में बताएंगे?
वह मेरी बचपन की दोस्त है। हमलोग स्कूल में एक-दूसरे की मदद करते थे। एक-दूसरे के सहारे परिवार में झूठ बोलकर बच निकलते थे। श्रुति बेहद प्रतिभाशाली ऐक्ट्रेस और सिंगर हैं। उनकी गायन प्रतिभा से में पहले से परिचित हूं। एक्टिंग वे पहली बार कर रही हैं। उनमें कलाकार जैसा आत्मविश्वास है। नए कलाकार के लिए यह फिल्म उतनी आसान नहीं कही जाएगी। उन्होंने पूरे दिल से अपना काम किया है।
डैनी और संजय दत्त जैसे सीनियर कलाकारों के साथ काम करते समय थोड़ा सावधान रहना पड़ा होगा?
संजय दत्त के साथ तो काम कर चुका हूं। डैनी साहब के साथ पहली बार काम किया है। मैं उनका फैन हो गया। उनका व्यक्तित्व बहुत शानदार है। वे सेट पर एकदम सहज रहते हैं। उनके अनुभव और साथ से मैंने बहुत कुछ सीखा।
..और सोहम शाह?
सोहम तो मेरे हमउम्र हैं साथ हैं। उन्होंने जब इस फिल्म के बारे में विस्तार से बताया था, तब मैं सोच में पड़ गया था कि क्या वे यह सब सही-सही कर पाएंगे? फिल्म का तकनीकी पक्ष बहुत स्ट्रॉन्ग है। यह फिल्म किसी विदेशी फिल्म की नकल नहीं है।

Monday, July 20, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा से पहली मुलाकात-मंजीत ठाकुर

हिन्दी टाकीज-४४
मंजीत ठाकुर उत्साही व्यक्ति हैं.लेखक और पत्रकार होने के इस विशेष गुण के धनी मंजीत इन दिनों पूरे देश का भ्रमण कर रहे हैं.अच्छा ही है,दिल्ली की प्रदूषित हवा से जितना दूर रहें.अपने बारे में वे लिखते हैं...
मैं मजीत टाकुर.. वक्त ने बहुत कुछ सिखाया है। पढाई के चक्कर में पटना से रांची और दिल्ली तक घूमा.. बीएससी खेती-बाड़ी में किया। फिर आईआईएमसी में रेडियो-टीली पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा.. सिनेमा की सनक ने एफटीआईआई के चक्कर भी लगवा दिए। नवभारत टाइम्स में सात महीने की संक्षिप्त नौकरी के बाद से डीडी न्यूज़ का नमक खा रहा हूं। फिलवक्त सीनियर कॉरेस्पॉन्डेंट हूं। सिनेमा के साथ-साथ सोशल और पॉलिटिकल खबरें कवर करने का चस्का है। सिनेमा को साहित्य भी मानता हूं, बस माध्यम का फर्क है..एक जगह शब्द है तो दूसरी जगह पर चलती-फिरती तस्वीरें..। सिनेमा में गोविंदा से लेकर फैलिनी तक का फैन हूं..। दिलचस्पी पेंटिंग करने, कविताएं और नॉन-फिक्शन गद्य लिखने और कार्टून बनाने में है। निजी जिंदगी में हंसोड़ हूं, दूसरों का मज़ाक बनाने और खुद मज़ाक बनने में कोई गुरेज़ नहीं। अपने ब्लॉग गुस्ताख पर गैर-जरुरी बातें लिखता हूं.. हल्की-फुल्की तरल बातें..पिछले कुछ महीनों से भारत दर्शन पर हूं, लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल और फिर बजट के दौरान पूरे पूर्वी भारत की सड़क यात्रा ने बेहतरीन तजरबे दिए... फिल हाल गुजरात में हूं...इस उम्मीद में हूं कि सूरज की कोई खास किरण एक दिन मेरे सिर पर पड़ेगी। मानता हूं कि मैं दुनिया का सबसे ज़रुरी पत्रकार बस बनने ही वाला हूं, डीडी के लिए कई डॉक्युमेंट्रीज़ बनाई हैं। लेकिन मेरा सर्वश्रेष्ठ अभी आना बाकी है। आप उनसे sampark करना चाहते हैं to यहाँ likhen...manjit2007@gmail.com

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अपने स्कूली दिनों में कायदे से बेवकूफ़ ही था। पढ़ने-लिखने से लेकर सामाजिक गतिविधियों तक में पिछली पांत का खिलाड़ी। क्रिकेट को छोड़ दें, तो बाकी किसी चीज़ में मेरी दिलचस्पी थी ही नहीं। बात तब की है जब मैं महज सात-आठ साल का रहा होऊंगा।॥ मेरे छोटे-से शहर मधुपुर में तब, दो ही सिनेमा हॉल थे, वैसे आज भी वही दो हैं।





लेकिन सिनेमा से पहली मुलाकात, याद नहीं कि कौन सी फिल्म थी वह- मम्मी के साथ हुई थी। मम्मी और कई पड़ोसिनें, मैटिनी शो में फिल्में देखने जाया करतीं। हम इतने छोटे रहे होंगे कि घर पर छोड़ा नहीं जा सकता होगा। तभी हमें मम्मी के साथ लगा दिया जाता होगा। बहनें भी साथ होतीं॥ तो सिनेमा के बारे में जो पहली कच्ची याद है वह है हमारे शहर का मधुमिता सिनेमा..।





इस सिनेमाहॉल की इमारत पहले रेलवे का गोदाम थी। थोड़ा बहुत नक्शा बदल कर इसे सिनेमा हॉल में तब्दील कर दिया था। अब इस हॉल को पुरनका हॉल कहा जाता है। महिलाओं के लिए बैठने का अलग बंदोबस्त था। आगे से काला पर्दा लटका रहता॥ जो सिनेमा शुरु होने पर ही हटाया जाता। तो सिनेमा शुरु होने से पहले जो एँबियांस होता वह था औरतों के आपस में लड़ने, कचर-पचर करने, और बच्चों के रोने का समवेत स्वर।





लेडिज़ क्लास की गेटकीपर भी एक औरत ही थीं, मुझे याद है कुछ ललिता पवारनुमा थी। झगड़ालू॥किसी से भी ना दबने वाली..उसकी पटरी किसी से नहीं खाती। चूंकि हमारे मुह्ल्ले की औरतें प्रायः फिल्में देखनो को जाती तो उस ललिता पवार से उनकी गाढ़ी छनती थी और सीट ठीक-ठाक मिल जाती। शोहदे भी उस वक्त कम ही हुआ करते होंगे, ( अरे जनाब आखिरकार हम तब तक जवान जो नहीं हुए थे) तभी औरतों की भीड़ अच्छी हुआ करती थी।





बहरहाल, फिल्म के दौरान बच्चों की चिल्ल-पों, दूध की मांग, उल्टी और पैखाने के वातावरण में हमारे अंदर सिनेमा के वायरस घर करते गए। हमने मम्मी के साथ जय बाबा अमरनाथ, धर्मकांटा, संपूर्ण रामायण, जय बजरंगबली, मदर इंडिया जैसी फिल्में देखी। रामायण की एक फिल्म में रावण के गरज कर - मैं लंकेश हूं- कहने का अंदाज़ मुझे भा गया। और घर में अपने भाईयों और दोस्तों के बीच मैं खुद को लंकेश कहता था।





मेरे पुराने दोस्त और रिश्तेदार अब भी लंकेश कहते हैं। वैसे लंकेश का चरित्र अब भी मुझे मोहित करता है, और इसी चरित्र की तरह का दूसरा प्रभावी चरित्र मुझे गब्बर और फिर मोगंबो का लगा। लेकिन तब तक मैं थोड़ा बड़ा हो गया था। और मानने लगा था कि अच्छी नायिकाओं का साथ पाने के लिए या तो आपको अच्छा और मासूम दिखने वाला अनिल कपूर होना चाहिए या फिर गुस्सैल अमित।





जब हम थोड़े और बड़े हुए तो उस काले परदे के आगे की दुनिया की खबर लेने की इच्छा बलवती होती गई। तब कर एक और सिनेमाघर शहर में बन गया। सिनेमाघर की पहली फिल्म थी- याराना। सन बयासी का साल था शायद। हम छोटे ही थे, लेकिन भाई के साथ फिल्म देखने के साथ गया। अमिताभ से पहला परिचय याराना के जरिए हुआ।





उस समय तक हमारे क़स्बे में वीडियों का आगाज़ नहीं हुआ था। बड़े भाई आसनसोल से आते तो बताते टीवी और वीडियो के बारे में। हॉल जैसा दिखता है या नहीं?? पता चला बित्ते भर के आदमी दिखते हैं, छोटा सा परदा होता है। निराश हो गया मैं । लेकिन घर पर भी लगा सकते हैं यह अहसास खुश कर गया।





बहरहाल, हमारे शहर में एक राजबाड़ी नाम की जगह है, जहां लड़कों ने आसनसोल से वीडियो लाकर फिल्में दिखाने का फैसला किया था। टिकट था - एक रुपया। औरतो के लिए फिल्म दिखाई जा रही थी-मासूम और एक और फिल्म थी दीवार। मम्मी और उनकी सहेलियां मासूम देखने गईँ। शाम में दीवार दिखाई जानी थी, बाद में जब हम और रतन भैया फिल्म देखकर लौट रहे थे। हम दोनों में विजय बनने के लिए झगड़ा हो गया। वह कहते रहे कि तुम छोटे हो कायदे से रवि तुम बनोगे, लेकिन रवि जैसा ईमानदार बनना मुझे सुहा नहीं रहा था। विजय की आँखों की आग अच्छी लगी और उस दिन के बाद से लगती ही रही। खासकर, विजय के बचपन के किरदारने जूते साफ करते हुए जब डाबर के साथी से कहा- साहब पैसे हाथ में उठाकर दो॥ मैं फेंके हुए पैसे नहीं उठाता। सच कहूं तो उस वक्त मेरा गला रुंध गया था, वीडियो देखते हुए। आज लगता है कि सलीम-जावेद ने कितनी कुशलता से सामूहिक चेतना में आत्मसम्मान की बात पैबस्त कर दी थी।





उस दिन के बाद से फिल्मों का चस्का लग गया। लेकिन घर में एक बदलाव आ गया। आर्थिक कारणों से अब मेरा दाखिला सरकारी स्कूल में करवा दिया गया। वजह-पिताजी का देहांत हो गया था। घर में एक किस्म की संजीदगी आ गई थी। मम्मी, मां में बदल गई। उनके सरला, रानू और बाकी के उपन्यास पढ़ना छूट गया। अचानक मेरी मां मनोरमा और कांदबिनी, सरिता छोड़कर रामचरितमानस का पाठ करने लगा। एक बेहद संजीदा माहौल॥ भारी-भारी-सा। मुझे पिता के देहांत के साथ इस माहौल का भारीपन खलने लगा। बड़े भैया कमाने पर उतरे, मंझले भाई में पढाई का चस्का लगा। मुझे बेवजह ज्यादा प्यार मिलने लगा। घर के लोग सिनेमा से दूर होते गए। सबका बकाया मैं और बड़े भैया पूरा करने लगे। घर के भारीपन से दूर मैं सिनेमाहॉल में जगह तलाश करने लगा।





सरकारी स्कूल से बंक करना कोई मुस्कल काम नहीं था। मैं क्लास से भाग कर सिनेमा देखने जाने लगा। लेकिन तीन घंटे तक स्कूल और घर से दूर रहने की हिम्मत नहीं थी। उन दिनों -८६ का साल था- मधुपुर के सिनेमाघरों में जबरदस्ती इंटरवल के बाद घुस आने वालों को रोकने के लिए एक नई तरकीब अपनाई गई थी। इंटरवल में बाहर निकलते वक्त गेटकीपर एक ताश के पत्ते का टुकडा़ देता था। अब हमने एक और दोस्त के साथ इस तरकीब का फायदा उठाया। इस तरीके में हम इंटरवल के पहले की फिल्म एक दिन और बाद का हिस्सा दूसरे दिन देख लेते थे।





गिरिडीह में सवेरा सिनेमा हो, या देवघर में भगवान टॉकीज, मधुपुर में मधुमिता और सुमेर, आसनसोल में मनोज टॉकीज, हर सिनेमाहॉल का पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हमें पहचानने लगा। गेटकीपरों के साथ दोस्ती हो गई। फिल्म देखना एक जुनून बन गया। कई बार हमारे बड़े भाई ने सिनेमाहॉल में ही पकड़ कर दचककर कूटा। लेकिन हम पर असर पड़ा नहीं।





बाद में अपने अग्रीकल्चर कॉलेज के दिनों में या बाद में फिल्में पढाई के तनाव को दूर करने का साधन बन गईं। अमिताभ के तो हम दीवाने थे। शुरु में कोशिश भी की अंग्रेजी के उल्टे सात की तरह पट्टी बढा़ने की , लेकिन नाकामी ही हाथ लगी। बाद में शाहरुख ने अमिताभ को रिप्लेस करने की तरकीबें लगाईं, तो डीडीएलजे ने बहुत असर छोड़ा था हम पर। नकारात्मक भूमिकाओं को लेकर मै हमेशा से सकारात्मक रहा हूं। ऐसे में बाजीगर और डर वाले शाहरुख को हमने बहुत पसंद किया था। उसके हकलाने की कला, साजन में संजय के बैसाखी लेकर लंगड़ाने की अदा, अजय देवगन की तरह फूल और कांटे वाला सोशल एलियनेशन, ॥ सब पर हाथ आजमाया। वैसे, बाज़ीगर में शाहरुख जब शिल्पा की हत्या कर देते हैं, तो हमें बड़ा अफ़सोस हुआ था। यार, ऐसे नहीं मारना चाहिए था लड़की को..सुंदर थी।





लेकिन दूरदर्शन की मेहरबानी से फिल्मों से हमारा रिश्ता और मजबूत ही हुआ। दूरदर्शन पर मेरी पहली फिल्म याद नहीं आ रहा कि साल कौन-सा था, लेकिन फिल्म थी समझौता। गाना अब भी याद है समझौता गमो से कर लो॥। फिर अमृत मंथन, अवतार, मिर्च-मसाला, पेस्टेंजी, आसमान से गिरा, बेनेगल निहलाणी की फिल्में देखने का शौक चर्राया।





लगा कि लुटेरे, मरते दम तक, लोहा, एलान-ए-जंग, हिम्मतवाला और तोहफा ॥से इतर भी फिल्में हो सकती हैँ। तो हर तरह की फिल्में देखना शुरु से शौक में शामिल रहा। और दूरदर्शन की इसमें महती भूमिका रही। जिसने कला फिल्में देखने की आदत डाल दी। तो हर स्तर की हिंदी अंग्रेजी फिल्में देखते रहे। हां, डीडी की कृपा से ही ऋत्विक घटक और सत्यजित् रे की फिल्मों से परिचय हुआ। तो सिनेमा एक शगल न रह कर ज़रुरत में बदल गया।





बहुत बाद में २००७ में एफटीआईआई में फिल्म अप्रीशिएशन के लिए पहुंचा तो पता चला कि एक पढाई ऐसी भी होती है जिसमे पढाई के दौरान फिल्मे दिखाई जाती हैं। तो पूरे कोर्स को एंजाय किया। फिल्में देखने और फिल्मे पढ़ने की तमीज आई। विश्व सिनेमा से परिचय गाढा हुआ।





गोवा और ओसियान जैसे फिल्मोत्सवों में ईरानी, फ्रेंच और इस्रायली सिनेमा से दोस्ती हुई और सिनेमा का वायरस मुझे नई जिंदगी दे रहा हैं... मैं हर स्तर के फिल्मे जी रहा हूं, और गौरव है मुझे इस बात का कि दुनिया में सिनेमा एक कला और कारोबार के रुप में जिंदा है तो मेरे जैसे दर्शक की वजह से, जो एक ही साथ रेनुवां-फेलेनी और राय-घटक का मज़ा बी ले सकता है साथ ही गोविंदा के सुख, और रनबीर के सांवरिया भी झेल सकता है।





मेरी पसंद की फिल्में



१. शोले,


२. प्यासा,


३.स्वदेश,


४.काग़ज़ के फूल


५. दीवार


६.जाने भी दो यारों


७. दस्विदानिया ७. अंगूर


८. मौसम


९ गरम हवा


१०. जागते रहो

Saturday, July 18, 2009

फ़िल्म समीक्षा:जश्न


सपनों और रिश्तों के बीच

-अजय ब्रह्मात्मज


भट्ट कैंप की फिल्मों का अपना एक फार्मूला है। कम बजट, अपेक्षाकृत छोटे और मझोले स्टार, इमोशनल कहानी, म्यूजिकल सपोर्ट, गीतों व संवादों में अर्थपूर्ण शब्द। इस फार्मूले में ही विशेष फिल्म्स की फिल्में कभी कमाल कर जाती हैं और कभी-कभी औसत रह जाती हैं। जश्न कमाल कर सकती है। भट्ट बंधु ने सफलता के इस फार्मूले को साध लिया है। उनकी जश्न के निर्देशक रक्षा मिस्त्री और हसनैन हैदराबादवाला हैं।
जश्न सपनों और आकांक्षाओं की फिल्म है। इसे हर जवान के दिल में पल रहे नो बडी से सम बडी होने के सपने के तौर पर प्रचारित किया गया है। फिल्म का नायक आकाश वर्मा सपनों के लिए अपनों का सहारा लेता है। लेकिन असफल और अपमानित होने पर पहले टूटता, फिर जुड़ता और अंत में खड़ा होता है। सपनों और आकांक्षाओं के साथ ही यह शहरी रिश्तों की भी कहानी है। हिंदी फिल्म के पर्दे पर भाई-बहन का ऐसा रिश्ता पहली बार दिखाया गया है। बहन खुद के खर्चे और भाई के सपने के लिए एक अमीर की रखैल बन जाती है। भाई इस सच को जानता है। दोनों के बीच का अपनापा और समर्थन भाई-बहन के रिश्ते को नया आयाम देता है। सारा आज की बहन है और आकाश भी आज का भाई है। रिश्तों के नंगे सच को लेखक-निर्देशक ने कोमलता से उद्घाटित किया है।
पाकिस्तानी एक्टर हुमायूं सईद ने अमन बजाज के शातिर, स्वार्थी, अहंकारी और लंपट किरदार को प्रभावशाली तरीके से चित्रित किया है। सिर्फ आंखों, होठों और चेहरे के भाव से कैसे दृश्य को खास और अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है। हिंदी फिल्मों के ढेर सारे स्टार हुमायूं सईद के निरीक्षण से सीख सकते हैं। चूंकि वे किसी हिंदी फिल्म में पहली बार दिखे हैं, इसलिए किरदार के ज्यादा करीब लगते हैं। शहाना गोस्वामी दृश्य चुरा लेती हैं। सामान्य दृश्यों में भी उनका सहज अभिनय स्वाभाविक लगता है। हालांकि जश्न में सारा का किरदार जटिल नहीं था, पर साधारण किरदार को रोचक बना देना भी तो खासियत है। अध्ययन सुमन को नाटकीय और भावुक दृश्य मिले हैं। वे निराश नहीं करते। उन्हें अपने बालों को निखारने-संवारने पर ध्यान देना चाहिए। वह उनके अभिनय के आड़े आता है।
संगीत फिल्म के थीम के मुताबिक एक संगीतकार की भावनाओं को शब्दों और ध्वनि से व्यक्त करता है। गीतों पर आज की संगीत शैली का पूरा असर है। अध्ययन ने उन गीतों को पर्दे पर जोश और जरूरी एक्सप्रेशन के साथ परफार्म किया है। और अंत में पटकथा और संवाद के लिए शगुफ्ता रफीक की तारीफ करनी होगी। इन दिनों फिल्मों के संवाद दृश्यों को भरने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। उनमें न तो शब्दों की कारीगरी रह गई है और न भाव की गहराई। शगुफ्ता रफीक के संवादों में रवानी है। वे सटीक, चुस्त और दृश्यों के अनुकूल हैं।
रेटिंग : ***

Friday, July 17, 2009

दरअसल:फिसलन भी है कामयाबी

६०० वीं पोस्ट...आप सभी को धन्यवाद।

-अजय ब्रह्मात्मज


स्कूल के दिनों में कहीं पढ़ा था, मैं नियम पर चलता हूं, इसलिए रोज नियम बदलता हूं। जिस दिन जो करने का मन हो, वैसा ही नियम बना लो। कहने के लिए हो गया कि नियमनिष्ठ हैं और मन मर्जी भी पूरी हो गई। अपने फिल्म सितारों के लिए कुछ वैसी ही बात कही जा सकती है। कभी कोई फिल्म फ्लॉप होती है, तो सितारे कहते हैं, फिल्म नहीं चल पाई, लेकिन मेरे काम की सराहना हुई। फिर फिल्म बुरी होने के बावजूद हिट हो जाए, तो सितारों के चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है और उनका बयान होता है, समीक्षक कुछ भी लिखें, दर्शकों ने फिल्म पसंद की है न? हिट और फ्लॉप दोनों ही स्थितियों में खुद को संतुष्ट करते हुए दर्शकों को मुगालते में रखने की यह कोशिश स्टारडम का हिस्सा हो गया है। सितारे अपने इस अंतर्विरोध को समझते हैं, लेकिन यह स्वीकार नहीं कर पाते कि उनसे भूल हुई है।
अक्षय कुमार आज कल ऐसे ही अंतद्र्वद्व और संशय से गुजर रहे हैं। चांदनी चौक टू चाइना और 8-10 तस्वीर के फ्लॉप होने के बाद उनकी कमबख्त इश्क हिट हुई है। अगर तीनों फिल्मों की तुलना करें, तो किसी को भी श्रेष्ठ फिल्म की श्रेणी में नहीं डाल सकते, लेकिन कमबख्त इश्क का स्तर और नीचे है। इसमें स्त्री और पुरुषों को लेकर जिस प्रकार से गालियां दी गई हैं और संवाद में सीधे-सीधे अश्लील भावार्थ डाले गए हैं, उनकी वजह से यह फिल्म साधारण से भी नीचे चली गई है। यह अलग बात है कि फिल्म का हश्र अक्षय की पिछली दोनों फ्लॉप फिल्मों की तरह नहीं हुआ। फिल्म चली है। फिल्म के प्रमुख वितरक और ट्रेड विश्लेषकों की बात मानें, तो यह बड़ी हिट साबित होगी। फिल्म के कलेक्शन और आय पर अभी ट्रेड सर्किल एकमत नहीं हैं। तय नहीं है कि यह कितनी बड़ी हिट है। फिर भी अक्षय के फिसलते करियर को कमबख्त इश्क से एक जीवन मिल गया है।
जाहिर-सी बात है कि अक्षय उत्साह में हैं। वे और उनके करीबी फिल्म की खराबियों और कमजोरियों पर बिल्कुल गौर नहीं कर रहे हैं। उनकी नजर तो बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर लगी है। अक्षय ने बयान देना आरंभ कर दिया है, मेरे लिए बॉक्स ऑफिस और दर्शक खास महत्व रखते हैं। दर्शक मेरी जैसी फिल्मों से खुश होंगे, मैं वैसी ही फिल्में करता रहूंगा। ऐसी सोच और कामयाबी किसी भी स्टार को फिसलन ही देती है। यह लोकप्रियता आखिरकार गुमनामी की अंधेरी सुरंग में समाप्त होती है। याद करें, तो अमिताभ बच्चन, धर्मेद्र और विनोद खन्ना जैसे सितारों की लोकप्रियता के दौर में जीतेंद्र ने एक अलग छवि और फिल्मों से अपनी मजबूत जगह बना ली थी। अक्षय भी वैसी ही स्थिति में हैं। लोकप्रिय और प्रचलित हीरो से अलग किस्म की फिल्मों से उन्होंने यह लोकप्रियता हासिल की है। इसमें लंबा वक्त लगा है। अब वे अपनी कामयाबी को बनाए रखने के लिए आजमाए हुए टोटकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। फूहड़, अश्लील और निम्नस्तरीय फिल्मों से कामयाबी मिलती है, तो वही सही, लेकिन अक्षय को याद रखना चाहिए कि वर्तमान की कामयाबी और लोकप्रियता भविष्य में तभी ठोस छवि और पहचान देती है, जब कुछ उल्लेखनीय और सार्थक फिल्में करियर की झोली में हों। अन्यथा सितारा डूबते ही सब कुछ गुम हो जाता है।
मालूम नहीं कि अक्षय के मन में भविष्य का यह संशय कभी पैदा होता है या नहीं? हिंदी फिल्मों में सफलता एक दुर्ग का निर्माण करती है, जिसके चौकीदार चापलूस और मतलबी लोग होते हैं। वे अपने स्वार्थ में स्टार को यथार्थ की वास्तविक जानकारी नहीं देते। कमबख्त इश्क की ताजा कामयाबी के बावजूद फिल्म के कॉन्टेंट के कारण अक्षय के वफादार दर्शक निराश हैं। उन्हें डर है कि अक्षय ऐसे परिणामों से भटकते और फिसलते ही जाएंगे।

Thursday, July 16, 2009

इम्तियाज ने मुझे हमेशा सरप्राइज किया है-अनुराग कश्यप

-अजय ब्रह्मात्मज

'लव आज कलÓ के निर्देशक और अनुराग कश्यप पुराने दोस्त हैं। फिल्ममेकिंग की में दोनों की शैली अलग है, लेकिन दोनों एक-दूसरे को पसंद करने के साथ निर्भर भी करते हैं। अनुराग कश्यप ने अपने दोस्त इम्तियाज अली के बारे में खास बात की-
इम्तियाज बहुत शांत आदमी है। उसको मैंने कभी घबराते हुए नहीं देखा है। कभी परेशान होते हुए नहीं देखा है। उसमें उत्सुकता बहुत है। अगर आप बताएं कि कल दुनिया खत्म होने वाली है तो पूछेगा कि कैसी बात कर रहे हो? अच्छा कैसे खत्म होगी? छोड़ो, बताओ कि शाम को क्या कर रहे हो? वह इस तरह का आदमी है। बड़े प्यार से लोगों को हैंडिल करता है। बहुत सारी खूबियां है। उसके साथ जो एक बार काम कर ले या उसे जान ले तो वो दूर नहीं जाना चाहेगा।
उसके चेहरे पर अजीब सी मुस्कराहट रहती है। हमलोग उसको शुरू से बोलते थे तू अंदर से कहीं न कहीं बहुत बड़ा शैतान है। वह मुस्कुरा कर... छुपा कर रखता है। उसके अंदर कुछ बहुत ही खास बात है। सेंसिटिव बहुत है। बहुत ही रोमांटिक आदमी है। बहुत स्थिर है। डिपेंडेबल है। मुझे मालूम है कल कोई हो ना हो मगर इम्तियाज अली है। काफी चीजों के लिए मैं उस पर निर्भर कर सकता हूं। सलाह के लिए खास कर... हर स्क्रिप्ट पढ़ाता हूं। हर फिल्म दिखाता हूं। वह मुझसे बोलता है कि तू सबसे लड़ाई-झगड़ा बंद कर के बस काम करो। वही एक आदमी है, जिससे मैं सलाह लेता हूं।
मुझे उसकी फिल्म बहुत अच्छी लगती है। हिंदी फिल्मों की प्रेमकहानियां मुझे अच्छी नहीं लगतीं। नकली प्रेम कहानियां बनाते हैं। पता नहीं क्यों मैं अजीब तरीके से चिढ़ता हूं और दूर भागता हूं। इम्तियाज की फिल्में कहीं न कही बहुत स्वाभाविक, बहुत ही रीयल होती है। उसमें गाने बहुत स्वाभाविक तरीके से आते हैं। कहीं न कहीं आप उसमें अपने आप को पाते हो। उसका कैरेक्टर भले ही बिजनेस मैन है। 'जब वी मेटÓ लार्जरदेन लाइफ नहीं है। फिल्म का हीरो बहुत बड़ा बिजनेसमैन है, लेकिन ह्यूमन है। वह आदमी है। वह लार्जर दैन लाइफ नहीं है। हेलीकॉप्टर में नहीं घूमता है। वह एक नार्मल इंसान है। उसकी लव स्टोरी बहुत ही अलग रहती है। कुछ लोग हैं जो इस तरह के रोमांटिक फिल्में बनाते हैं, जो बहुत रीयल स्वाभाविक एक वास्तविक दुनिया में आधारित होती हैं। जैसे एडवर्ड बर्न बनाया करता था पहले। कुछ फ्रेंच फिल्ममेकर हैं जो साधारण सी प्रेम कहानियां बनाते हैं। वह जिस तरह के सेंसिटिव मूवमेंट क्रिएट करता है,उस से फिल्में आसपास की लगती हैं। उसके कैरेक्टर कहीं न कहीं कंफ्यूज और कमजोर लोग होते हैं। उसके कैरेक्टर पहले अपने आपको खोते हैं,फिर पाते हैं। यह उसकी खास बात है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है।
हमारी दोस्ती बहुत पुरानी है। मुझे खुद नही मालूम था कि मैं फिल्ममेकर बनूंगा। हमलोग कॉलेज में थे। उसका पहला लक्ष्य यह था कि मैं 21 का होते ही पहले शादी कर लूंगा। 21 का होते ही उसने शादी कर ली। काम मिला नहीं और शादी कर ली। हम में से वह पहला आदमी था, जिसने पहले शादी की। वह सबसे ज्यादा ट्रैवल करता है और ट्रैवल करते समय लिखता है। सारी फिल्में वह ट्रैवल करते हुए लिखता है। वह यात्रा और जर्नी उसकी फिल्मों में आ जाती है। वह सही मायने में जीता है। 'सोचा न थाÓ की मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी थी। स्क्रिप्ट पढक़र मुझे नहीं लगा था कि वह फिल्म इतनी अच्छी बनेगी। वह मेरी फेवरिट फिल्म है और 'जब वी मेटÓ में भी वही हुआ। उसका नजरिया ऐसा है कि आप स्क्रिप्ट को पढक़र अंदाज नहीं लगा सकते कि वह क्या करने वाला है। ऑन स्क्रीन क्या होने वाला है और कैसे अनफोल्ड होगी फिल्म... इसका अंदाजा स्क्रिप्ट पढ़ कर नहीं लगा सकते। वह सालों-साल बैठा रहता है, लिखता रहता है। उसकी कहानियां चलती रहती है। मैंने उसकी सारी कहानियां पढ़ी हैं और स्क्रीन पर देख कर सरप्राइज हुआ हूं। खास कर 'लव आज कलÓ मैंने देखी है। सात-आठ मिनट तक आप फिल्म देखते हैं तो समझने की कोशिश करते हैं। आठवें मिनट के बाद आप हिलेंगे नहीं। खास बात है। कहीं न कहीं पकड़ लेती है फिल्म।
इम्तियाज की जो कहानियां है, उसने उन्हें जिया हैं। मेरा जो सिनैमैटिक अप्रोच है, उसमें बहुत सारे प्रभाव दिख सकते हैं। क्योंकि मैं बहुत सारी चीजों से एक्सपोज्ड हूं। लेकिन इम्तियाज जिंदगी से कहानियां ढूंढ कर ला रहा है। जिंदगी की कहानियों की अलग बात होती है।

Tuesday, July 14, 2009

रेड कार्पेट पर मटकते चहकते सितारे


-अजय ब्रह्मात्मज
आए दिन पत्र-पत्रिका और टीवी चैनलों पर स्टारों के रेड कार्पेट पर चलने की खबर और तस्वीरें आती रहती हैं। कान फिल्म समारोह में पहले सोनम कपूर के रेड कार्पेट पर चलने की खबर आई। फिर इंटरनेशनल सौंदर्य प्रसाधन कंपनी ने स्पष्टीकरण दिया कि रेड कार्पेट पर ऐश्वर्या राय ही चलेंगी। अंदरूनी कानाफूसी यह हुई कि ऐश्वर्या ने सोनम का पत्ता कटवा दिया। समझ सकते हैं कि रेड कार्पेट का क्या महत्व है? ऑस्कर के रेड कार्पेट पर स्लमडॉग मिलेनियर के लिए भारतीय एक्टर अनिल कपूर और इरफान खान चले। साथ में फिल्म के बाल कलाकार भी थे। भारत में ऑस्कर रेड कार्पेट की तस्वीरें प्रमुखता से छपीं। उन्हें पुरस्कार समारोह के समान ही महत्व दिया गया। कान फिल्म समारोह में काइट्स की जोड़ी रितिक रोशन और बारबरा मोरी ने रेड कार्पेट पर तस्वीरें खिंचवाई।
देखें तो रेड कार्पेट पिछले कुछ सालों में प्रकाश में आया है। पहले विदेश से आए प्रमुख राजनयिक मेहमानों के लिए रेड कार्पेट वेलकम का चलन था। बाद में विदेश के पुरस्कार समारोह और कार्यक्रमों की तर्ज पर भारत मेंभी रेड कार्पेट का चलन बढ़ा। मुख्य कार्यक्रम से पहले स्टार और सेलिब्रिटी की रेड कार्पेट तस्वीरें बड़ा आकर्षण बनती हैं। पुरस्कार समारोह हो या कोई और कार्यक्रम.., वहां कुछ चुनिंदा स्टारों को ही मंच पर आने का अवसर मिलता है। रेड कार्पेट पर कार्यक्रम में भाग लेने आए छोटे-बड़े हर कलाकार कुछ मिनट के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं। रेड कार्पेट स्टारों के लिए दिखावे की खास जगह है। इसके लिए वे विशेष पहनावे तैयार करते हैं। हीरोइनों की बात करें, तो उनकी पूरी सज-धज रेड कार्पेट पर दिखती है। अपने परिधान, ज्वेलरी और सैंडल तक पर वे पूरा ध्यान देती हैं। विदेश की तरह अपने देश में भी अब रेड कार्पेट वॉक स्टाइल स्टेटमेंट बन चुका है। हाल ही में मकाऊ में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में सभी हीरोइन और हीरोज ने ग्रीन कार्पेट पर जलवे बिखेरे। उसके पहले फिल्मफेअर अवार्ड, कान फिल्म समारोह, ऑस्कर और कुछ अन्य समारोहों में रेड कार्पेट पर मटकते और चहकते सितारों को हम देख चुके हैं। रेड कार्पेट की लाली परावर्तित होकर उनके चेहरों को लाल कर देती है या रेड कार्पेट पर चलने के गर्व से उनके चेहरे लाल हो उठते हैं? कहना मुश्किल है, लेकिन इसमें शक नहीं कि रेड कार्पेट पर स्टारों की चमक, दमक और ठसक देखते ही बनती है।
दर्शक और प्रशंसक अपने पसंदीदा स्टारों को आकर्षक परिधानों में रेड कार्पेट पर चलते देखकर विस्मित और आह्लादित होते हैं। उनके मन में निश्चित ही उनकी ड्रेसेज को लेकर सवाल उठते होंगे। जैसे हमारी हीरोइन या हीरो को कितने महंगे और भड़काऊ ड्रेसेज खरीदने होते होंगे? ऊपर से उन्हें यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि एक रेड कार्पेट पर पहने गए कपड़े दूसरे रेड कार्पेट पर न दिखे। सचमुच उनके कपड़े महंगे, आकर्षक और विशेष तौर पर समारोह के रेड कार्पेट के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन बड़े स्टारों को उन पर रत्ती भर भी खर्च नहीं करना पड़ता। डिजाइनर उनके लिए विशेष ड्रेसेज तैयार कराते हैं। बड़ी कंपनियां उनकी ड्रेसेज स्पॉन्सर करती हैं, तो ज्वेलरी कंपनियां उनके गहनों का खयाल रखती हैं। लोगों ने गौर किया होगा कि तस्वीरों के साथ यह हवाला दिया जाता है कि फलां कंपनी या फलां ड्रेस डिजाइनर के कपड़ों में सजी-धजी फलां अभिनेत्री रेड कार्पेट पर चली। इससे उन कंपनियों को प्रचार मिलता है। वास्तव में रेड कार्पेट जीवनशैली बेचने का नया माध्यम भी बन गया है। अक्सर देखने को मिलता है कि रेड कार्पेट में दिखे कपड़ों की खोज में अमीर परिवारों के बच्चे बड़ी दुकानों में आते हैं। वे इवेंट और कार्यक्रम का हवाला देकर या तस्वीरें दिखाकर वैसे कपड़ों की मांग करते हैं।
बिपाशा बसु रेड कार्पेट वॉक के पीछे के बिजनेस से अनभिज्ञता जाहिर करती हैं। उन्होंने अपने अनुभव बांटे, किसी समारोह में मेरी हिस्सेदारी और महत्व निर्भर करता है कि मैं उसमें कैसे कपड़े पहनूं। आईफा का वैसा ड्रेस मैंने इसलिए चुना था कि मुझे जल्दी-जल्दी तीन-चार बार मंच पर आना-जाना था। अगर साड़ी पहन लेती, तो थोड़ी मुश्किल होती। साड़ी पहनना मुझे अच्छा लगता है, लेकिन वह तभी संभव है, जब आप सीधे जाकर अपनी सीट पर बैठ जाएं। बिपाशा ने दूसरी हीरोइनों की तरफ से यह जोड़ा, हम सभी अपने प्रशंसकों के लिए सुंदर और आकर्षक दिखना चाहते हैं। हमें मालूम रहता है कि वे अपने घरों में बैठे हमें देख रहे होंगे। रेड कार्पेट और रैंप शो के एक फोटोग्राफर ने कहा, स्टार कुछ भी कहें। वे पहनावे में दिखावे पर ज्यादा जोर देते हैं। उनकी कोशिश होती है कि तस्वीर और फुटेज में उनके अंग दिखें। जब हम तस्वीरों के लिए उनसे रुकने का आग्रह करते हैं, तो वे स्किन शो करती हैं। हीरोइनें ऐसी तस्वीरों और फुटेज की वजह से चर्चा में रहती हैं। उक्त फोटोग्राफर ने इस बार आईफा समारोह के रोचक ट्रेंड का भेद बताया, सभी हीरोइनें पीछे से पोज दे रही थीं। उनकी पीठ खुली थी और एंगल ऐसा बनता था कि उनके अंग का उभार स्पष्ट दिखे। जाहिर है कि यह शो बिजनेस है। यहां कुछ दिखता है, तभी बिकता है।

Monday, July 13, 2009

हिन्दी टाकीज:जाने कहां गये वो सिनेमा के दिन ...-पूनम चौबे


हिन्दी टाकीज-४३

पूनम चौबे नयी पीढ़ी की पत्रकार हैं। अंग्रेजी की छात्रा हैं मगर लिखना-पढ़ना हिंदी में करती हैं। कुछ नया करने का जज्‍बा इन्‍हें पत्रकारिता में घसीट लाया है। कुछ कहानियां भी लिख चुकी हैं। मगर किसी एक विधा पर टिके रहना अपनी तौहीन समझती हैं। सो फिलहाल पहचान कहां और कैसे बनेगी, इसी में सर खपा रही हैं।

बचपन की यादों में शुमार मूवी देखने का खुमार। बरबस यह जुमला इसलिए याद आ रहा है क्‍योंकि आज भी पिक्‍चर हॉल में जाकर फिल्‍में देखने में वही मजा आता है, जो दस-बारह साल पहले था। आज भी वो यादें धुंधली नहीं पड़ीं जब मेरी जिद पर डैडी हम चारों भाई-बहनों को फिल्‍म दिखाने ले गये थे। 1996 की वह सुहानी शाम, शुक्रवार का दिन, फिल्‍म थी 'हम आपके हैं कौन' पिक्‍चर हॉल जाने के लिए डैडी से ढेरों मिन्‍नतें करनी पड़ती थीं। कारण था उनकी ऑफिस से छुट्टी न मिलना। फिर भी उस शुक्रवार की शाम को तो मैं अपनी जिद पर अड़ी रही। आखिरकार हम पिक्‍चर हॉल पहुंचे। टिकट लेने के बाद जैसे ही उस बड़े हॉल के कमरे में पहुंचे, लगा मानो, भूतों के महल में आ गये हों। ऐसा धुप अंधेरा। क्‍या ऐसा ही होता है सिनेमाघर? मुझे लगा यहां बिजली की कोई समस्‍या होगी। खैर, टिकट चेक करने वाले की टॉर्च की रोशनी ने मुझे और मेरे परिवार को हमारी सटी से मुखातिब कराया। फिल्‍म शुरू हुई पर ये क्‍या? आवाजें इतनी तेज कि कान मनो अभी फट पड़ेंगे। हर रोमांटिक सीन पर कुछ लड़कों की सीटी सुनायी देती। वैसे में भी इस कला में निपुण थी। मुझे लगा ये कोई परंपरा है। बस मैंने भी अपनी कला का एक नजारा दिखा ही दिया। लेकिन फिर पिताजी की डांट के बाद मैं दोबारा अपनी इस कला का प्रदर्शन नहीं कर पायी। मुझे दूसरी बार हैरत उस समय हुई जब इंटरवल होने के साथ ही रोशनी से पूरा सिनेमाहाल नहा गया। डैडी ने हम चारों भाई-बहनों को हॉल की कैंटीन में चलने को कहा ताकि हम कुछ खा-पी सकें। पर मुझे डर था कि कहीं कोई मेरी सीट पर बैठ गया तो क्‍या होगा। यह डर और ऊपर से सिनेमा का रोमांच, दोनों मेरे ऊपर इस तरह से हावी थे कि मैंने कैंटीन जाने का प्रस्‍ताव ठुकरा दिया और अपने भाई-बहनों को वहीं, मेरी सीट पर कुछ लाने के लिए कह दिया।

आखिरकार मैंने अपने इस डर को छुपाकर बाकी लोगों को ही मेरे लिए कुछ लाने को कह दिया। तीन घंटे के बाद जब हॉल से बाहर निकली तो पूरे रास्‍ते बस फिल्‍म की ही चर्चा चलती रही। चाहे जो कुछ हो, पर मजा तो बहुत आया इस फिल्‍म में। इसके बाद दूसरी फिल्‍म 'साजन चले ससुराल' देखा। पिक्‍चर हॉल में अंधेरा होने की वजह से गलती से मम्‍मी की जगह किसी और आंटी को न जाने कितनी बार हर सीन पर कमेंट करने के नये-नये नुस्‍खे बताती रही। इंटरवल में पता चला कि मम्‍मी मेरे बाएं नहीं बल्कि दाएं साइड में बैठी थी। इसके बाद एक-दो मौके और भी आएं, जब फैमिली के साथ फिल्‍में देखने का मौका मिला। एक बार तो मेरी छोटी बहन ने हॉल में कॉकरोच को देख कर ऐसा तहलका मचाया कि उफ्फ, पूरी फिल्‍म मानों कॉकरोच बेस्‍ड फिल्‍म हो गयी थी। हर पांच मिनट पर कॉकरोच को देखने का आतंक पूरी फिल्‍म का मजा ही किरकिरा कर दिया। हां 'कुछ कुछ होता है' देखने के बाद कुछ दिनों तक काजोज जैसे बाल रखने का जो खुमार चढ़ा, वह ग्रेजुएशन तक उतरा ही नहीं। फिल्‍म भी काफी रोमांचक लगी और इसे देखने का नतीजा यह निकला कि इसे पूरे 25 बार देखने के बाद आज भी किसी फिल्‍म को देखते वक्‍त मेरे जेहन में आ जाती है। करीब चार साल पहले फिल्‍म 'बागवान' देखने का मौका मिला। चूंकि इस बार यह फिल्‍म देखना किसी करीबी दोस्‍त की तरफ से एक निमंत्रण था। हमलोग कुछ चार दोस्‍त इस आमंत्रण का हिस्‍सा बने थे। पूरी प्‍लानिंग के अनुसार यह तय हुआ कि सभी लोग ठीक पौने 12 बजे तक पिक्‍चर हॉल के बाहर मिलेंगे। मुझे थोड़ी देर हो गई। करीब बारह बज कर दस मिनट पर मैं जब हॉल पहुंची, तो मेरे बाकी दोस्‍त फिल्‍म के लुत्‍फ उठाने में मशगुल हो चुके थे। उन्‍हें यह ध्‍यान नहीं आया कि मैं उस पिक्‍चर हॉल के लिए नहीं नहीं, बल्कि उस शहर के लिए भी नयी थी। अब हॉल पहुंचने के बाद मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अब क्‍या करूं। किसी तरह हॉल के अंदर जाने का रास्‍त खोजा और अंदर पहुंच गई। मगर टिकट तो मेरे पास था ही नहीं। तब मेरे पास मोबाइल जैसी संचार सुविधा का भी अभाव था। इतनी भीड़ में दोस्‍तों को कैसे खोजूं। और जब तक टिकट पास नहीं होगा सीट मिलने का तो सवाल ही नहीं था। जब टिकट चेकर ने मेरे पास आकर मुझसे टिकट मांगा, तो मेरे दिमाग में भी एक नयी घंटी बजी। मैंने उसे थोड़े कड़े आवाज में यह कहते हुए डांट पिलायी कि एक तो मेरे दोस्‍त मुझसे बिछड़ गये हैं और उस पर आपको टिकट की पड़ी है। आपके हॉल का पूरा सिस्‍टम ही बेहद फालतू लगता है। अगर इस भीड़ में कोई खो जाये, तो शायद पूरी फिल्‍म खत्‍म हो जाये मगर वह आदमी न मिले। पहली बार इस शहर में आयी और ऐस देखने को मिला। इस शहर के ऊपर की गयी मेरी सारी रिसर्च बेकार जायेगी। कहां मैं इसके बारे में लंबी-लंबी तारीफों के पुल बांध रही थी और कहां ये... बस-बस पूनम, रहने दो। हमें मालूम हो चुका है कि तुम आ गयी हो। पीछे से मेरे दोस्‍त ने मेरी बात बीच में काटते हुए मुझे पुकारा। थैंक गॉड मेरी जान में जान आ गयी। वह टिकट चेकर तो बस मेरा मुंह देखे जा रहा था। कुछ लोग भी भौचक्‍के से मुझे और मेरे दोस्‍त को देखे जा रहे थे। आखिरकार किसी तरह उसने उनलोगों को शांत कराया और मुझे मेरी सीट तक लाकर अच्‍छी-खासी डांट भी मुफ्त में दे दी। पर मुझे तो इस बात की खुशी थी कि कुछ भी हो मैंने तो बाजी मार ली। दोस्‍त भी मिल गये और पिक्‍चर का मजा, भले ही इस हो-हल्‍ला के चक्‍कर में 20 मिनट की फिल्‍म से हाथ धोना पड़ा, पर मजा खूब आया। वेसे आज भी उन दिनों जैसी बदमाशियों का सिलसिला थमा नहीं। मौका मिला नहीं कि मैं फिर से वैसे कारनामे करने को तैयार हो जाती हूं।
मेरी पसंदीदा फिल्‍में :

१.मोहब्‍बतें

२.परदेस

३.वीर-जारा

४.बागवान

५.हम साथ-साथ हैं

६.विवाह

७.हेरा-फेरी।

८.वेलकम टू सज्‍जनपुर

९.जाने तू या जाने ना



Saturday, July 11, 2009

फ़िल्म समीक्षा:संकट सिटी



बड़े शहर की भूमिगत दुनिया

-अजय ब्रह्मात्मज


बड़े शहरों में एक भूमिगत दुनिया होती है। इस दुनिया में अपराधी पलते और रहते हैं। उनकी जिंदगी में भी छल, धोखा, प्रपंच और कपट है। उनके भी सपने होते हैं और उन सपनों को पाने की कोशिशें होती हैं। वहां हमदर्दी और मोहब्बत होती है तो बदले की भावना भी। पंकज आडवाणी ने संकट सिटी में इसी दुनिया के किरदारों को लिया है। इन किरदारों को हम कार चोर, मैकेनिक, फिल्म निर्माता, बिल्डर, होटल मालिक, वेश्या और चालबाज व्यक्तियों के रूप में देखते हैं।
सतह पर जी रहा आम आदमी सतह के नीचे की जिंदगी से नावाकिफ रहता है। कभी किसी दुर्घटना में भिड़ंत होने या किसी चक्कर में फंसने पर ही उस दुनिया की जानकारी मिलती है। गुरु की मुसीबत मर्सिडीज की चोरी और उसमें रखे एक करोड़ रुपए से शुरू होती है। एक के बाद दूसरी और दूसरी के बाद बाकी घटनाएं होती चली जाती हैं और बेचारा गुरु मुसीबतों के चक्रव्यूह में फंसता चला जाता है। निर्देशक पंकज आडवाणी ने गुरु के बहाने सड़ चुकी सामाजिक व्यवस्था में सक्रिय स्वार्थी और घटिया किस्म के पिस्सुओं (व्यक्तियों) का चेहरा दिखाया है। सभ्य समाज में हम उन्हें अपने आसपास विभिन्न पेशों (फिल्मकार, अध्यात्मिक गुरु, होटल और पब मालिक आदि) की शक्ल में देखते रहते हैं। इस फिल्म को देखते हुए हंसी आती है। उस हंसी के साथ एक टीस भी उठती है। निर्देशक ने बखूबी दृश्यों और प्रसंगों का व्यंग्यात्मक निर्वाह किया है। संकट सिटी हिंदी फिल्मों की प्रचलित कामेडी नहीं है। यह कामेडी से आगे जाती है। सिनेमा की भाषा में इसे ब्लैक कामेडी कहते है। यों समझें कि आप श्रीलाल शुक्ल, हरिशंकर परसाई या शरद जोशी को पढ़ रहे हैं। फिल्म व्यंग्य जैसा आनंद देती है। कुछ किरदार निरीह और बेचारे हैं तो कुछ धू‌र्त्त, कमीने और चालबाज। प्रासंगिक और चुटीले संवाद इन फिल्मों को खास बनाते हैं। इनके सोशल, पालिटिकल और हिस्टोरिकल रेफरेंस होते हैं। निर्देशक ने फिल्म की जरूरत और मकसद के मुताबिक के के मेनन, दिलीप प्रभावलकर, अनुपम खेर, वीरेंद्र सक्सेना, यशपाल शर्मा, हेमंत पांडे, मनोज पाहवा और चंकी पांडे को चुना और उनसे बेहतरीन काम लिया है।
रेटिंग : ***1/2

Friday, July 10, 2009

फ़िल्म समीक्षा: शार्टकट


-अजय ब्रह्मात्मज


शार्टकट की मूल मलयालम फिल्म बहुत अच्छी बनी थी। उस फिल्म में मोहन लाल को दर्शकों ने खूब पंसद किया था। लेकिन हिंदी में बनी शार्टकट उसके पासंग में भी नहीं ठहरती। सवाल उठता है कि मलयालम फिल्म पर आधारित फिल्म के लेखक के तौर पर अनीस बज्मी का नाम कैसे जा सकता है? क्यों नहीं जा सकता? उन्होंने मूल फिल्म देखकर उसे हिंदी में लिखा है। इस प्रक्रिया में भले ही मूल की चूल हिल गई हो।
इस फिल्म से यह भी पता चलता है कि फिल्मों की टाप हीरोइनें या तो आइटम सांग करती हैं या फिर गुंडों से जान बचाने की कोशिश करती हैं। फिल्म के हीरो निहायत मूर्ख होते हैं। किसी प्रकार पापुलर हो जाने के बाद वे अपनी मूर्खताओं को ही अपनी विशेषता समझ बैठते हैं। निर्देशक नीरज वोरा के पास फिल्म इंडस्ट्री की पृष्ठभूमि और उसके किरदार थे। वे इनके सही उपयोग से रोचक और हास्यपूर्ण फिल्म बना सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इस फिल्म को वे संभाल नहीं सके।
शार्टकट में अस्पष्टता है। फिल्म का प्रमुख किरदार शेखर है या राजू या अनवर? फिल्म की हीरोइन शेखर को मिलती है, इसलिए उसे हीरो समझ सकते हैं। लेकिन फिल्म की प्रमुख घटनाएं राजू और अनवर से जुड़ी हैं। निश्चित ही यह कंफ्यूजन शूटिंग शुरू होने के बाद का है, जो पर्दे पर आ गया है। यही वजह है कि अक्षय खन्ना, अरशद वारसी, अमृता राव और बकुल ठक्कर की कोशिशों के बावजूद फिल्म प्रभावित नहीं करती। हां, अमृता राव ने आयटम सांग और पहनावे से यह साबित किया कि आप उन्हें केवल छुईमुई और घरेलू किस्म की हीरोइन न समझें। फिर भी इन दृश्यों में उनकी झिझक चेहरे और बाडी लैंग्वेज में कई बार दिख जाती है।
रेटिंग : *1/2

Thursday, July 9, 2009

दरअसल:न्यूयॉर्क की कामयाबी के बावजूद

-अजय ब्रह्मात्मज

26 जून को रिलीज हुई न्यूयॉर्क को दर्शक मिले। जॉन अब्राहम, कैटरीना कैफ और नील नितिन मुकेश के साथ यशराज फिल्म्स के बैनर का आकर्षण उन्हें सिनेमाघरों में खींच कर ले गया। मल्टीप्लेक्स मालिक और निर्माता-वितरकों के मतभेद से पैदा हुआ मनोरंजन क्षेत्र का अकाल दर्शकों को फिल्मों के लिए तरसा रहा था। बीच में जो फिल्में रिलीज हुई, वे राहत सामग्री के रूप में बंटे घटिया अनाज के समान थीं। उनसे दर्शक जिंदा तो रहे, लेकिन भूख नहीं मिटी। ऐसे दौर में स्वाद की बात कोई सोच भी नहीं सकता था।
न्यूयॉर्क ने मनोरंजन के अकाल पीडि़त दर्शकों को सही राहत दी। भूख मिटी और थोड़ा स्वाद मिला। यही वजह है कि इसे देखने दर्शक टूट पड़े हैं। मुंबई में शनिवार-रविवार को करंट बुकिंग में टिकट मिलना मुश्किल हो गया था। साथ ही कुछ थिएटरों में टिकट दोगुने दाम में ब्लैक हो रहे थे।
ट्रेड सर्किल में न्यूयॉर्क की सफलता से उत्साह का संचार नहीं हुआ है। ट्रेड विशेषज्ञों के मुताबिक यशराज फिल्म्स को न्यूयॉर्क से अवश्य फायदा होगा, क्योंकि यह अपेक्षाकृत कम बजट की फिल्म है। अगले हफ्तों में आने वाली फिल्मों की लागत ज्यादा है और उन्हें ऊंचे मूल्यों पर बेचा गया है। कमबख्त इश्क और लव आज कल का उदाहरण लें, तो इसे वितरक कंपनी ने फिल्म इंडस्ट्री में आए उफान के दिनों में ऊंचे मूल्य देकर खरीदा था। चौतरफा मंदी के इस दौर में वितरक अभी मुनाफे की उम्मीद नहीं कर सकते। अगर लागत भी निकल आए, तो बड़ी बात होगी। वैसे खबर है कि दोनों ही फिल्मों के निर्माता ने तय रकम से कम राशि लेने में इस शर्त के साथ राजी हो गए हैं कि अगर फिल्में सफल हो गई, तो उन्हें तय रकम दे दी जाएगी। ट्रेड विशेषज्ञों की राय में मुनाफे की संभावना कम है।
सप्ताहांत के तीन दिनों में सिने प्रेमी और वीकएंड आउटिंग के शौकीन दर्शकों की भीड़ रहती है। महंगे टिकट से उन्हें दिक्कत नहीं होती। सप्ताहांत में पहले दिन फिल्म देखने का रोमांच खर्च पर हावी रहता है। ट्रेड सर्किल में माना जाता है कि किसी भी फिल्म के हिट या फ्लॉप की परीक्षा सोमवार से आरंभ होती है। अगर सोमवार को दर्शकों का प्रतिशत नहीं गिरा, तो फिल्म के हिट होने की संभावना रहती है। निर्माता, वितरक और अब प्रदर्शक भी सोमवार के बाद के दिनों में दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचने के प्रयास में रहते हैं। अगर सप्ताह के अंत में फिल्म हिट हो गई, तो सोमवार के बाद भी दर्शक मिलते हैं, अन्यथा दर्शकों की संख्या में अचानक गिरावट आती है। एक तरीका यह हो सकता है कि मल्टीप्लेक्स के टिकट दर सोमवार से गुरुवार के बीच कम कर दिए जाएं। अगर सप्ताहांत के तीन दिनों में टिकट दर सौ रुपए है, तो सोमवार से गुरुवार तक उसे घटा कर 60 से 75 रुपए के बीच रखा जाए। ऐसा सोचा और कहा जा रहा है कि घटे दर पर दर्शक आ सकते हैं।
फिल्मों के चलने या न चलने का समीकरण किसी की समझ में नहीं आता। पहले की तरह निर्माता-निर्देशकों की उंगलियां अब दर्शकों की नब्ज पर नहीं हैं, इसलिए वे दर्शकों का मिजाज नहीं समझ पाते। हालांकि प्रचार और अन्य तरीकों से दर्शकों को झांसा देने की कोशिश की जाती है, लेकिन दर्शक होशियार हो गए हैं। फिल्म इंडस्ट्री के लोग ही कहते हैं कि दर्शक फिल्मों को सूंघ लेते हैं। आप चाहे जितना प्रचार और विज्ञापन दे लें। दर्शक फिल्म रिलीज होने के पहले से मन बना चुका होता है। केवल पांच से दस प्रतिशत दर्शक ही फिल्म की समीक्षा या प्रदर्शन से प्रभावित होकर मन बदलते हैं। ऐसी स्थिति में निर्माता, वितरक और प्रदर्शक निश्चित हिट की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

Wednesday, July 8, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा के सम्मोहन से मुझे मुक्ति नहीं मिल सकी-विनोद अनुपम


हिन्दी टाकीज-४२

हिन्दी फिल्मों के सुधि लेखक विनोद अनुपम ने आखिरकार चवन्नी का आग्रह स्वीकार किया और यह पोस्ट भेजी । विनोद अनुपम उदहारण हैं कि फिल्मों पर बेहतर लिखने के लिए मुंबई या दिल्ली में रहना ज़रूरी नहीं है। वे लगातार लिख रहे हैं और आम दर्शकों और पाठकों के बीच सिनेमा की समझ बढ़ा रहे हैं। उन्होंने अपने परिचय में लिखा है...जब पहली ही कहानी सारिका में छपी तो सोचा भी नहीं था, कभी सिनेमा से इस कदर रिश्ता जुड़ सकेगा। हालांकि उस समय भी महत्वाकांक्षा प्रेमचंद बनने की नहीं थी, हां परसाई बनने की जरूर थी। इस क्रम में परसाई जी को खूब पढ़ा और खूब व्यंग्य भी लिखे। यदि मेरी भाषा में थोड़ी भी रवानी दिख रही हो तो निश्चय ही उसका श्रेय उन्हें ही जाता है। कहानियां काफी कम लिखीं, शायद साल में एक। शापितयक्ष (वर्तमान साहित्य), एक और अंगुलिमाल (इंडिया ठूडे) ट्यूलिप के फूल (उद्भावना), स्टेपनी (संडे इंडिया), आज भी अच्छी लग जाती है, लेकिन बाकी की दर्जन भर कहानियों के बारे में यही नहीं कह सकता। सिनेमा देखने की आदत ने, सिनेमा समझने की जिद दी, और इस जिद ने 85 से 90 के दौर में बिहार में काम कर रहे प्रकाश झा से जुड़ने का अवसर दिया। उन्हीं के सौजन्य से फिल्म अध्येता सतीश बहादुर से भी फिल्म ‘पढ़ने’ की शिक्षा ग्रहण की। और फिर प्रकाश जी ने ही फिल्म एप्रिशिएशन कोर्स के लिए पुणे भेजने की भी पहल की। सिनेमा के बारे में जितनी ही दृष्टि खुलती गई, उतनी ही मेरे लेखन को एक दिशा मिलती गई। ‘उदभावना’ के संपादक अजय कुमार ने सिनेमा अंक के अतिथि संपादक के लिए मुझसे जमालपुर में संपर्क किया तो वाकई चकित रह गया, लेकिन सही दिशा में बढ़ने का विश्वास मिला। बाद में 2002 में घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की घोषणा ने भी कुछ ऐसे ही आश्चर्य में डाल दिया था। पटना से प्रकाशित ‘आज’ और ‘हिन्दुस्तान’ में छपी ‘सामान्य’ सी समीक्षाओं पर मिले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार ने खुशी तो दी लेकिन सिनेमा पर लेखन के प्रति चिन्ता भी। तब से मौके मिलने पर ही नहीं, मौके ढ़ूंढकर और मांगकर लिखे मैंने सिनेमा पर। आज संतोष होता है जब लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में सिनेमा पर नियमित स्तंभ दिखाई देते हैं। शायद न भी हो, लेकिन इसके पीछे कहीं न कहीं अपनी भूमिका मान मैं खुश होता रहता हूँ।

बात हाई स्कूल की है, पता नहीं क्लास कौन सा था, नौवां या दसवां। एक सहपाठी ने मेरे सिनेमा प्रेम पर मुझे काफी आत्मीयता से समझाते हुए कहा था, पता है ज्यादा सिनेमा देखने से आदमी सिनेमा में ही काम करने लगता है। मैंने कहा, ये तो अच्छी बात है भला कौन सिनेमा में काम नहीं करना चाहता? उसने मेरे उत्साह का शमन करते हुए समझाया, अरे बेवकूफ सिनेमा मतलब, सिनेमा हॉल, वो देखते हो न टार्च दिखाने वाला, गेट पर टिकट चेक करने वाला, वही सब। हालांकि उस समय मेरे लिए ये काम भी रश्क का विषय थे। हर घड़ी सिनेमा हॉल में रहने का उनका सुख सोचकर ही मैं गुदगुदा उठता था। फिर जिस तरह एक टिकट के लिए लोग गेट कीपर के पीछे आपाधापी मचाए रखते, मेरी नजर में उसका महत्ब बरकरार रखता। लेकिन उसके रहन-सहन से इतना अंदाजा तो हो ही जाता कि ये काम मजेदार जरूर है, बढ़िया नहीं। लेकिन जाहिर है सिनेमा में काम करने की बात से एक बार डर जरूर गया, लेकिन सिनेमा के सम्मोहन से मुझे मुक्ति नहीं मिल सकी। यह डर तब और घना हो गया जब मैट्रिक के इम्तेहान में उस मित्र को प्रथम श्रेणी मिली जबकि मैं चार नंबरों से रह गया। आज सोचता हूँ तो वाकई यह पागलपन ही लगता है कि अपने प्रथम श्रेणी की परम्परा वाले परिवार में आयी मेरी द्वितीय श्रेणी भी सिनेमा से मुझे दूर नहीं ले जा सकी। सिनेमा देखना जारी रहा और पढ़ाई भी। पता नहीं सिनेमा और पढ़ाई का मेरा संतुलन सायाश था अनायास, लेकिन यह जरूर हुआ कि एक प्रतियोगिता परीक्षा की सीढ़ी पार कर मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई में चला आया। फिर दूसरी प्रतियोगिता पार कर बिहार सरकार की नौकरी भी हासिल करली। साहित्य से शौक ने हिन्दी साहित्य से भी एम। ए. करवा दिया। सिनेमा देखने से अब इतना शउर आ गया था कि उस पर कुछ अपनी राय जाहिर कर सकता था, जिसे पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशन योग्य भी समझने लगी थी। एक दिन हतप्रभ रह गया जब दरवाजे पर मैंने उसी मित्र को खड़ा पाया, वर्षों बाद, मुझे क्षण भर लगा उसे पहचानने में। उसने बधाई दी। सिनेमा पर खूब लिख रहे हो, फिर कहा मैं भी कुछ करना चाहता हूँ, रास्ता बताओ। पता चला कई एक प्रतियोगिता परीक्षाओं में असफलता के बाद वह घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रहा है। सिनेमा वह अब भी नहीं देखता, लेकिन यह जरूर है कि अब अपने बच्चों को सिनेमा देखने से नहीं रोकता।

सिनेमा खूब देखे मैंने, और सिनेमा देखकर खूब पिटाई भी खायी। कई पिटाई तो ऐतिहासिक थी। राजकपूर की ‘बॉबी’ के साथ कई रिकार्ड जुड़े हों, लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा रिकार्ड तो यही है कि मेरे बड़े भाई साहब ने ‘बॉबी’ देखने के ‘अपराध’ में मुझे पहले कमरे में बंदकर अपने बेल्ट से पीटा, फिर बीच सड़क पर पीटते हुए स्कूल तक ले गये थे और उस लड़के को भी पीटा, जिसके साथ साईकिल पर सात किलोमीटर की सवारी कर मैं दूसरे शहर ‘बॉबी’ देखने गया था। उस समय मैं आठवीं में था, उम्र होगी बमुश्किल 14 साल। वास्तव में सिनेमा देखना उस समय भी मेरा सबसे बड़ा शगल था। दशहरा हो, दिवाली हो, रक्षा बंधन हो या सरस्वती पूजा’.... मेरे लिए इनका बड़ा महत्व यही था कि मैं सिनेमा देख सकता था। उस समय सिनेमा नून शो में चला नहीं करते थे। मैटनी शो में शाम छः बजे तक बाहर रहने की आजादी आम दिनों में मिलती नहीं थी। मिलती थी तो 4 बजे घर में हाजिरी देने के बाद। त्योहारों में घूमने के नाम पर यह छूट मिल जाती थी। ‘बॉबी’ भी सरस्वती पूजा विसर्जन के दिन देखी थी मैंने, और उसके ठीक एक दिन पहले ‘गद्दार’ भी देखली थी, प्राण, विनोद खन्ना और शायद पद्मा खन्ना....... लगातार दो दिन दो सिनेमा देखने का अक्षम्य अपराध में लगी उस पिटाई का विरोध सिर्फ मां ने किया था।

मां सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं, अच्छी खासी तनख्वाह। उनकी एक ही विलासिता थी, सिनेमा। होश आने के पहले भी और होश आने के बाद भी मां का सिनेमा देखना सदा मेरी याददाश्त से जुड़ा रहा। पिता जी सिनेमा नहीं देखते थे, बगैर किसी कारण। बस उन्हें सिनेमा हॉल का बंद वातावरण अच्छा नहीं लगता था। लेकिन मां के सिनेमा देखने का उन्हें कभी विरोध करते भी नहीं देखा हमने। बल्कि अक्सर ऐसा होता कि मां सिनेमा देखकर बाहर आती तो पिता जी आॅफिस से लौटते हुए उन्हें साथ लेते आते। उस समय लेडिज क्लास का चलन था, लेडिस के लिए अलग काउंटर होते थे और सबसे कमाल यह कि सबसे कम टिकट दर भी उन्हीं का रहता था। महिलाओं के लिए सिनेमा देखना सुखद भले न हो, सुरक्षित अवश्य था। यूं आज के मल्टीप्लेक्स और कल के बॉलकनी को देखें तो स्पष्ट लगता है यह सुखद की सीमा हमेशा बदलते रही है।

जमालपुर (बिहार) में शायद आज भी सिनेमा के प्रचार का वही परंपरागत साधन है, जो बचपन में याने लगभग 30 साल पहले था। रिक्शे पर एक लाउडस्पीकर और माईक के साथ बैठा गेटकीपर। रिक्शे के पीछे प्लाई बोर्ड के टूकड़े पर एक मध्यम आकार का रंगीन पोस्टर चिपका रहता। अमूमन रिक्शा आने का समय शुक्रवार को 9 से 10 बजे का होता। फिल्म कोई भी हो, एनाउंस एक ही सुर में होता, अवन्तिका सिनेमा के रूपहले परदे पर आज से देखें, चुपके-चुपके धुंआधार मारपीट, नाचगाने, हंसी मजाक और सीन सिनहरी से भरपूर ‘चुपके-चुपके’ फिल्म के सितारे हैं, धरमिन्दर, अमिताभ बच्चन, शर्मिला टाइगोर और जया भादुड़ी, पूरे परिवार के साथ देखें ‘चुपके-चुपके’। फिल्म का नाम बदलता जुमला जस का तस रहता, चाहे ‘दोराहा’ यदि मैं गलत नहीं तो राधा सलूजा इसकी नायिका थी और एडल्ट फिल्म होने के कारण एक तरह से बदनाम भी थी यह फिल्म, अफसोस यह फिल्म मैं आज तक नहीं देख सका हो या ‘कोशिश’ जिसमें संजीव कुमार और जया भादुड़ी दोनों ने गुंगे बहरे की भूमिका निभाई थी।

फिल्म और कलाकारों के प्रति उद्घोषक की उदासीनता रहती या सामाजिक पूर्वाग्रह का प्रभाव, अब याद करता हूँ तो आश्चर्य होता है कि कभी संयोग से भी नायिका का नाम वह पहले नहीं लेता। उस फिल्म में जया भादुड़ी किसी नवोदित के साथ थी, शायद विक्रम या विजय अरोड़ा। लेकिन उदघोषक विक्रम के मुकाबले भी जया भादुड़ी को आगे करने की कोशिश नहीं करता। पुरूष सत्ता का प्रभाव हमारे मन को किस तरह अवचेतन में प्रभावित रखता है इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता। यह बात आज मेरे समझ में आ रही है, लेकिन उस समय तो मेरे लिए यह उद्घोषणा इसलिए महत्वपूर्ण रहती कि मैं मां को फिल्म बदलने की सूचना सबसे पहले देने से अपने आपको वंचित नहीं करना चाहता। शायद कोई समझदारी मेरी नहीं थी उस समय, मेरे लिए यह बस इसी लिए महत्वपूर्ण था कि अच्छी फिल्म की सूचना से मां को खुशी मिलती और वे फिल्म देखने की योजना बना सकती थी।

उस समय फिल्मों के चार सौ प्रिन्ट एक साथ रिलीज नहीं होते थे, न ही डिजीटल रिलीज की सुविधा थी। बस बक्से में फिल्म की रील आती, निश्चय ही छोटे शहरों तक आते-आते यह अवधि साल भी हो जाती कभी-कभी। फिर भी फिल्म देखने का उत्साह कम नहीं होता। बड़े शहरों से जैसे-जैसे फिल्म की सिल्वर जुबली याने 25 हते की सूचना आती, छोटे शहरों में फिल्म का क्रेज बनता। लेकिन तब तक फिल्म की रील घिस चुकी होती और उसके पोस्टर खत्म हो चुके होते थे। उस समय नई फिल्म के अधिकांश पोस्टर ट्रेडिल मशीन पर डेढ़ फीट बाय डेढ़ फीट के आकार में स्थानीय प्रेस में सिनेमा मालिकों द्वारा ही छपवाये जाते, आशुद्धियों से भरे इन पोस्टरों पर सिनेमा हॉल, सिनेमा के नाम के साथ सिर्फ कलाकारों के नाम होते थे। तस्वीरों वाले बड़े पोस्टर सिनेमा हॉल के अलावा शहर में सिर्फ एक जगह लगा करता था। अमूमन जिसे देखने के लिए हमलोग पहुंच ही जाया करते थे। शुक्रवार की दोपहर हमें प्रतीक्षा रहती मुंगेर के सिनेमा घरों की प्रचार गाड़ी की। अमूमन मुंगेर की प्रचार गाड़ी जीप पर बनायी जाती। तख्ते के क्यूब पर रंगीन पोस्टर चिपका कर उसे जीप पर रख दिया जाता। और साथ ही साथ माईक से एलाउंस भी होता रहता। सिनेमा और सिनेमा हॉल के नाम का तुक बिठाने में हमें काफी मशक्कत करनी पड़ती। ‘हम किसी से कम नहीं’ सुनाई देता तो विजय टॉकीज गायब हो जात, विजय सुनाई देता तो ‘हम किसी से कम नहीं’। इस प्रचार गाड़ी का सबसे बड़ा आकर्षण इसके साथ उड़ने वाले रंगीन पर्चे होते थे। पतले रंगीन कागज पर छपे ये परचे मिल जाना हमारी एक उपलब्धि होती थी। आज सोचता हूँ वाकई मजेदार लगता है, अजूबा तो उस समय भी लगता था। मुंगेर के बैधनाथ सिनेमा ने एक घोड़ा गाड़ी रखी थी, मतलब बग्घी। आगे जुते घोड़े और पीछे बक्से पर सिनेमा पोस्टर के क्यूब। बैधनाथ की एक और विशेषता थी, अपनी बालकनी को उसने दो भागों में बांट लिया था, आधा डी।सी. कहा जाता था, आधे में लेडीज। डी.सी. में मात्र 8 तीन लंबे गद्देदार स्पिंग वाले सोफे थे, जिसपर सिनेमा देखना वाकई सुखद लगता था। लेकिन मुश्किल लेडीज के साथ थी, उसके ठीक पीछे प्रोजेक्शन रूम था। अक्सर ही ऐसा होता कि नायक-नायिका के बीच किसी तीसरी स्त्री का जूड़ा या फिर रोते हुए बच्चों को खड़े होकर चुप कराती किसी महिला की छवि परदे तक पहुंच जाती और दर्शकों की जबरदस्त हाजिर जवाब चुटकियों से हॉल गुंज उठता था।

मेरे होशोहवाश में आने तक देश में बिजली संकट शुरू हो गया था। बिजली जाने लगी थी, लेकिन सिनेमा घरों में जेनरेटर का प्रचलन शुरू नहीं हुआ था। बिजली जाती तो घंटे-आधे घंटे तक दर्शकों को इन्तजार करना पड़ता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि आधी फिल्म में बिजली चली जाती और घंटे भर बाद घोषणा होती कि कल इसी टिकट पर आकर सिनेमा देख सकते हैं। यदि फिल्म आधी से भी कम चली होती और बिजली अनंत काल तक के लिए चली गई होती तो टिकट के पैसे वापस कर दिये जाते। हमारे लिए दुख से अधिक खुशी का अवसर होता यह, एक टिकट में दो खेल।

जमालपुर में उस समय दो सिनेमा घर थे, एक अवन्तिका और एक रेलवें, जिसे रेलवे ने अपने कर्मचारियों के मनोरंजन के लिए बनवाया था। रेलवे में रेल कर्मचारियों को उस समय (1970-1980) मात्र 80 पैसे डी.सी. के लिए देने होते थे, जबकि आम दर्शकों को 1 रूपये 60 पैसे । बगल के जिला मुख्यालय मुंगेर में तीन सिनेमा घर थे। जब कोई बड़ी हिट या चर्चित फिल्म आती तो हमलोग मुंगेर जाते। याद है मुझे ‘जयसंतोषी मां’ देखने के लिए जाना था तो स्कूल से मुझे आधी छुटटी में बुला लिया गया था और स्कूल ड्रेस में ही मां के साथ सिनेमा देखने चला गया था। मुंगेर में सिनेमा देखने हमलोगों के लिए विलासिता ही थी, क्योंकि टैक्सी में बैठकर जाना होता और सिनेमा देखने के बाद रेस्टूरेंट में चाट और कुल्फी के लिए भी पिता जी ले जाते।

पता नहीं सिनेमा देखने की आदत की शुरूआत यहीं से हुई या इसकी नींव कहीं और पड़ी लेकिन इतना जरूर था कि सिनेमा मेरे परिवार में कभी त्याजय नहीं था, सिनेमा देखने - सिनेमा पर बातें करने पर कभी किसी को आपति नहीं होती, शर्त यह कि सिनेमा देखने की स्वीकृति घर में ले ली जाय। याद नहीं वह साल कौन सा था, लेकिन यह याद है कि वह फिल्म थी ‘गंगा तेरा पानी अमृत’, जिसे पहली बार अकेले देखने मैं गया था, मां से स्वीकृति और पैसे लेकर। लेकिन जैसे-जैसे मैं ऊपर के क्लास में चढ़ता गया, सिनेमा देखने की संख्या भी बढ़ती गई, जाहिर है उस अनुपात में घर से स्वीकृति संभव नहीं थी, सो चोरी-छिपे सिनेमा देखने की शुरूआत हुई। कुछ ऐसी भी फिल्में उस समय आने लगी, जिसके लिए घर से स्वीकृति मांगनी संभव भी नहीं थी, अब ‘गुप्तज्ञान’ देखने के लिए स्वीकृति मांगता भी कैसे? और नौवीं-दसवीं का समय ऐसा था, जब ऐसी फिल्में आकर्षित ज्यादा करती थी। जमालपुर में उस समय हरेक वर्ष नवम्बर-दिस्मबर में रामायण सम्मेलन आयोजित होते थे, देश भर से मानस विद्वान वहां उपस्थित होते थे और शाम 7 बजे से 12 रात्रि तक प्रत्येक दिन प्रवचन सुनने शहर के लोग इकट्ठा होते थे। हमे भी मानस सम्मेलन में जाने के लिए आसानी से स्वीकृति मिल जाती, जिसका उपयोग मैं अकसर अपने दोस्तों के साथ 9 से 12 बजे रात्रि शो में फिल्म देखने के लिए कर लेता। और तो याद नहीं लेकिन ‘तन्हाई’ मुझे अभी तक याद है जिसे मैंने 9 से 12 के ही शो में देखा था। शत्रुध्न सिन्हा और रेहाना सुल्तान के भी नाम याद हैं, और यह भी याद है कि उस फिल्म में कुछ ‘ऐसे’ दृश्य थे, जिसने मुझे कुछ गलत करने का अहसास दिलाया था, पता नहीं अब के बच्चों को सी-ग्रेड फिल्में देखकर भी अब यह अहसास होता है या नहीं?

आज भी सिनेमा देखने के लिए कोई आधार मैं नहीं मानता। काफी बाद में फिल्म भाषा और तकनीक पर आधारित एक कार्यशाला में वरिष्ठ फिल्म अध्येता गायत्री चटर्जी ने जब यह कहा कि यदि फिल्म के बारे में जानना हो तो खूब फिल्में देखनी चाहिए, तो मुझे समझ में आया कि शायद मैं गलत नहीं था। मैंने अच्छी-बुरी जब भी जैसी जो फिल्में मिली मैंने देखी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान दोस्तों के साथ कभी-कभी एक दिन में दो शो फिल्में भी देख डालीं।

सिनेमा आज भी देखता हूँ। लगातार, काफी कम फिल्में ऐसी होती है जिसे मैं नहीं देख पाता। सिनेमा हॉल में फिल्में देखना आज भी मेरी हॉबी है, 45 वर्ष की उम्र में। लेकिन सच कहूं वो उत्साह, वो सुख अब सिर्फ ख्यालों में ही आते हैं, जिसे हमने जमालपुर-मुंगेर के तंग से सिनेमा घरों में हासिल किया। क्यों? पता नहीं, शायद इसलिए कि वहां के गेटकीपर से लेकर सिनेमा की टूटी सीटों से एक अपनापन महसूस होता था, जो आतंकित करती मल्टीप्लेक्स की भव्यता से हासिल नहीं होती।

पसंद की फिल्में:-

1. मेरा नाम जोकर
2. ब्लैक
3. स्वदेश
4. आवारा
5. गाईड
6. वेलकम टू सजनपुर
7. लगे रहो मुन्ना भाई
8. दिलवाले दुल्हनियां ले जाऐंगे
9. गोलमान
10. विवाह
कृप्या क्रम पर गौर नहीं करें

विनोद अनुपम, बी-53, सचिवालय कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-20 मो. 9334406442


Tuesday, July 7, 2009

एक तस्वीर:पहचानें कौन?

आज के दो पॉपुलर स्टार हैं यहाँ.दोनों पुराने ज़माने के दो स्टार के प्रतिरूप छवि में हैं.क्या आप आज के स्टार और पुराने समय के स्टार को पहचान गए? चवन्नी को भी बताएं...

Saturday, July 4, 2009

दरअसल:दुविधा में संजय दत्त की आत्मकथा


-अजय ब्रह्मात्मज

चुनाव की सरगर्मी के बाद संजय दत्त ने नेता का चोला उतार दिया है। वे इन दिनों गोवा में अजय देवगन की फिल्म ऑल द बेस्ट की शूटिंग में बिजी हैं। इस दौरान उन्होंने खुद को आंका। कार्यो को निबटाया और दोस्तों के साथ बैठकें कीं। वे अजय को छोटे भाई मानते हैं। यही वजह है किफिल्म की योजना के मुताबिक उन्होंने एक शेड्यूल में शूटिंग खत्म की। सभी जानते हैं कि संजय की फिल्म उनकी उलझनों की वजह से खिंच जाती हैं।
संजय लगते एकाकी हैं, लेकिन उनका जीवन एकाकी हो ही नहीं सकता! उनके दोस्त उन्हें नहीं छोड़ते। शायद उन्हें भी दोस्तों की जरूरत रहती है। यह अलग बात है कि उनके दोस्त बदलते रहते हैं। उनके दोस्तों की सूची सीमित है। उनके कुछ स्थायी दोस्त हैं, जिनसे वे कभी-कभी ही मिलते हैं, लेकिन वे दोस्त ही उनके भावनात्मक संबल हैं। अपनी जिंदगी की उथल-पुथल में उन्होंने दोस्तों को परखा है। वे उन पर भरोसा करते हैं। संजय सरीखे व्यक्ति भावुक और अलग किस्म से संवेदनशील होने के कारण भरोसे में धोखा भी खाते हैं। वे ऐसे धोखों से कुछ नहीं सीखते। वे फिर भरोसा करते हैं। पिछले दिनों चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने देश के सुदूर इलाकों का दौरा किया। बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के पिछड़े क्षेत्रों में गए और वहां के लोगों की जिजीविषा से प्रभावित होकर लौटे। अपनी क्षणिक मुलाकातों में ही उन्हें लगा कि गांव के लोग छल-कपट नहीं जानते। वे सीधे और ईमानदार हैं। उन्होंने महसूस किया कि शहरों में रहते हुए हम देश की वास्तविकता से परिचित नहीं हो पाते। देश और समाज के बारे में उनके खयाल बदले हैं। वे देश की सेवा जिम्मेदारी के साथ करना चाहते हैं। गोवा में उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने कहा, मैं अपने जीवन के अनुभव और प्रसंग के बारे में लिखना चाहता हूं। लेखन में खुद की अक्षमता स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा, मैं किसी लेखकया पत्रकार के साथ मिलकर यह काम करना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि कोई मुझसे बात करे और मेरे शब्दों में सब कुछ लिखे। वे खुद से जुड़े प्रसंगों पर भी लिखना चाहते हैं, लेकिन मानते हैं कि दूसरों के बारे में साफ-साफ नहीं लिखा जा सकता, अगर पूरी तरह से सच्ची बात लिख दूंगा या बता दूंगा, तो दूसरों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। सवाल उठता है कि क्या ऐसा रक्षात्मक लेखन से उनके जीवन के बारे में लोग समझ पाएंगे?
संजय का जीवन सामान्य नहीं रहा है। उन्होंने कगार की जिंदगी जी है। अपनी भूल और नासमझ हरकतों से वे विवादों में उलझे। हालांकि उनका नाम बम कांड से अलग हो चुका है, लेकिन आ‌र्म्स एक्ट वाले मामले से वे मुक्त नहीं हुए हैं। निजी जिंदगी में उनके संबंध बनते-बिगड़ते रहे हैं। उनके प्रशंसक और फिल्म अध्येता उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते हैं। संजय पत्रकारों से खुलकर बात नहीं करते। अपने द्वंद्व और दुविधाओं की वजह से वे अपनी बातचीत में असहज और चौकस रहते हैं। कम बोलते हैं और उनकी बातें अस्पष्ट रहती हैं। ऐसे तिलिस्मी और रहस्यपूर्ण व्यक्ति की जीवनी या आत्मकथा निश्चित ही रोचक होगी। यदि वे ईमानदारी से अपनी मनोदशा, मानसिकता और अनुभव के बारे में विस्तार से लिखें, तो लोग उन्हें और उनके दौर को अच्छी तरह समझ पाएंगे।

Friday, July 3, 2009

फ़िल्म समीक्षा:कमबख्त इश्क




-अजय ब्रह्मात्मज

कोई शक नहीं कि निर्माता साजिद नाडियाडवाला पैसे खर्च करते हैं। वह अपने शौक और जुनून के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। कमबख्त इश्क की शूटिंग हालीवुड के स्टूडियो में करनी हो या फिल्म में हालीवुड के एक्टर रखने हों, वह रत्ती भर भी नहीं हिचकते। अब यह अलग बात है कि उनके लेखक और निर्देशक हिंदी फिल्म के चालू फार्मूले में हालीवुड-बालीवुड की संगति नहीं बिठा पाते। यही वजह है कि फिल्म सारी भव्यता, नवीनता और खर्च के बावजूद चूं-चूं का मुरब्बा साबित होती है। सब्बीर खान के निर्देशन में बनी कमबख्त इश्क ऊंची दुकान, फीका पकवान का ताजा उदाहरण है।
फिल्म में अक्षय कुमार और करीना कपूर की जोड़ी है। दोनों हाट हैं और दोनों के चहेते प्रशंसकों की कमी नहीं है। प्रशंसक सिनेमाघरों में आते हैं और अपने पसंदीदा सितारों को कमजोर और अनगढ़ किरदारों में देख कर निराश लौटते हैं तो अपनी शर्मिदगी में किसी और को फिल्म के बारे में कुछ नहीं बताते। नतीजतन ऐसी फिल्में आरंभिक उत्साह तो जगाती हैं, लेकिन उसे जारी नहीं रख पातीं।
कमबख्त इश्क अक्षय कुमार और करीना कपूर की पुरानी फिल्म टशन से कंपीटिशन करती नजर आती है। निर्माता-निर्देशकों को समझ लेना चाहिए कि दर्शक ऐसी फिल्में स्वीकार नहीं करते। फिल्म की बुनियाद में पुरुष जाति और स्त्री जाति के प्रति परस्पर नफरत और हिकारत है। विराज (अक्षय कुमार) और सिमरिता (करीना कपूर) विपरीत लिंग के प्रति कोई सम्मान नहीं रखते। अपने जीवन के अनुभव और विश्वास से वे एक-दूसरे को हेय दृष्टि से देखते हैं। उनके बीच इतनी नफरत है कि वह धीरे-धीरे मुहब्बत में तब्दील हो जाती है। मुहब्बत का कोई लाजिक नहीं होता। इस फिल्म में स्थितियों, घटनाओं और प्रसंगों के साथ भावनाओं का भी कोई तर्क नहीं है। टुकड़ों में सोची गई यह फिल्म अंतिम प्रभाव में निहायत कमजोर साबित होती है।
अक्षय कुमार को विदूषक की भूमिका में हम कई फिल्मों में देख चुके हैं। निर्देशक उन्हें नई भावस्थिति नहीं देते। चूंकि पापुलर एक्टर को अपने सेफ जोन में खेलना अच्छा लगता है, इसलिए अक्षय कुमार भी नहीं समझ पाते कि उनकी एक जैसी भूमिकाओं और अदाओं से दर्शक ऊबने लगे हैं। करीना कपूर भी कुछ गानों और दृश्यों में सेक्सी दिखने के अलावा कोई प्रभाव नहीं छोड़ पातीं । फिल्म के नायक-नायिका के साथ बाकी किरदार भी आधे-अधूरे तरीके से गढ़े गए हैं।
हिंदी फिल्मों में 25-30 प्रतिशत संवाद अब अंग्रेजी में होने लगे हैं। गालियों और फूहड़ दृश्यों के उपयोग और सृजन में लेखक और निर्देशक अपनी भोंडी कल्पना का उपयोग करने लगे हैं। कमबख्त इश्क उसी की बानगी है। दोहराव और नकल फिल्म के संगीत में भी है। गाने कमबख्त इश्क के चल रहे होते हैं और कानों में किसी और फिल्म का पापुलर गीत सुनाई देता रहता है। संगीतकार अनु मलिक कहां से कहां पहुंच गए हैं?
रेटिंग : *1/2

Thursday, July 2, 2009

तस्वीरों में 'कमीने'
















विशाल भारद्वाज की फ़िल्म 'कमीने' की चर्चा अभी से हो रही है.चवन्नी के पाठकों के लिए कुछ तस्वीरें.क्या ये तस्वीरें कुछ कहती हैं?

Wednesday, July 1, 2009

मैं खुद को जागरुक मानती हूं:कटरीना कैफ



मैं खुद को जागरुक मानती हूं: कैटरीना डांसिंग डॉल और ग्लैमर गर्ल के नाम से मशहूर कैटरीना कैफ कबीर खान निर्देशित न्यूयॉर्क में माया का किरदार निभा रही हैं। यह भूमिका उनकी अभी तक निभायी गयी भूमिकाओं से इस मायने में अलग है कि फिल्म की कहानी सच को छूती हुई गुजरती है। उनके किरदार में भी वास्तविकता की छुअन है। बूम से हिंदी फिल्मों में आई कैटरीना कैफ ने अनी सुंदरता और अदाओं से खास पहचान बनायी है। वे पॉपुलर स्टार हैं, लेकिन अभी तक गंभीर और संवेदनशील भूमिकाएं उनसे दूर रही हैं। ऐसा लग रहा है कि न्यूयार्क की शुरूआत उन्हें नयी पहचान देगी।
आप फिल्म के किरदार माया से किस रूप और अर्थ में जुड़ाव महसूस करती हैं?
इस फिल्म का ऑफर मुझे कबीर खान ने दिया। उन्होंने मुझसे कहा कि अभी तक मैंने सभी फिल्मों में ग्लैमरस रोल निभाए हैं। मेरे सारे किरदार आम दर्शकों की पहुंच से बाहर रहे हैं किसी सपने की तरह। मैं माया के रूप में आपको ऐसी भूमिका दे रहा हूं जो दर्शकों के अड़ोस-पड़ोस की लड़की हो सकती है। उससे सभी जुड़ाव महसूस करेंगे। हो सकता है कालेज में आप ऐसी लड़की से मिली हों। एक ऐसी लड़की, तो अपनी सी लगे।
क्या आपने निजी जीवन में कभी आतंकवाद के प्रभाव को महसूस किया है?
नहीं, सीधे तो नहीं। ऐसी बहसों में शामिल रही हूं, जहां आतंकवाद की चर्चा चल रही हो। मुसलमानों को लेकर बात चल रही हो। अमेरिका में 9/11 के बाद मुसलमानों को लेकर जो आम धारणा बन गयी है। मेरे लिए मुसलमानों के प्रति बनी यह धारणा 9/11 ट्रेजडी से कम नहीं है। सही जानकारी नहंीं होने से यह धारणा बनी है।
क्या आप 9/11 के पहले और बाद की दुनिया में फर्क महसूस करती हैं?
पूरी दुनिया में तो नहीं, लेकिन अमेरिका में फर्क दिखता है। मैं तो वहां के राष्ट्रपति के रूप में ओबामा के चुनाव को उस फर्क का ही परिणाम मानती हूं। अमेरिका में अश्वेत राष्ट्रपति का चुनाव बड़ी घटना है। मुझे लगता है कि अमेरिका के नागरिक आतंकवादियों या कथित आतंकवादियों के प्रति अमेरिकी रवैए को समझते हैं।
क्या अमेरिका की यात्राओं में आप ने कभी एशियाई मूल के लोगों के प्रति मौजूद भेदभाव महसूस किया है?
नहीं ़ ़ ़व्यक्तिगत तौर पर नहीं। इसकी वजह यह हो सकती हैं कि मैं जवान लड़की हूं। मैं सिक्यूरिटी गार्ड को किसी पुरूष की तरह संभावित खतरा नहीं लगती होऊं।
आप हांगकांग में पैदा हुई। अमेरिका और लंदन में पली-बढ़ीं और अब भारत में काम कर रही हैं। क्या आप स्वयं को किसी विश्व नागरिक के रूप में देखती हैं?
इसके अलावा काम के सिलसिले में मैंने बीस से अधिक देशों की यात्राएं की हैं। उन देशों में लंबे समय तक रही हूं। मैं खुद को विश्व नागरिक कह सकती हूं। लेकिन एक बात कहूंगी कि मैं भारत आने पर महसूस करती हूं कि मैं यहीं की हूं। मैं सच कहती हूं, ब्रिटेन में रहते हुए मैंने खुद को वहां का महसूस नहीं किया। मुझे एशियाई ही समझा जाता रहा। मुझे लंदन में सौ प्रतिशत स्वीकृति नहीं मिली।
क्या आपके पास भारत का पासपोर्ट है?
इस बातचीत में यह सवाल गैरजरूरी है।
कोई बात नहीं। आप न्यूयॉर्क के डायरेक्टर कबीर खान के बारे में बताएं?
उन्हें अपनी पहली फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड मिला। मैं उन्हें अत्यंत प्रतिभाशाली और संवेदनशील डायरेक्टर मानती हूं। वह मुसलमान समुदाय और इस्लाम के बारे में इतना जानते हैं। फिल्म शुरू करते समय मैंने उनसे पूछा था कि कहीं डाक्यूमेंट्री शैली में तो वे फिल्म नही बना रहे हैं। अगर ऐसा होगा तो मैं वैसी फिल्मों में यकीन नहीं करती। उन्होंने कहा कि इस फिल्म से सभी जुड़ाव महसूस करेंगे। इस फिल्म की प्रेम कहानी, इमोशन और ड्रामा में दर्शक रुचि लेंगे। इमोशन में हर जवान दर्शक को अपनी कहानी लगेगी, क्योंकि उनके भी दिल टूटे होंगे या उन्हें अपने प्यार का सिला नहीं मिला होगा। इंटरवल के बाद फिल्म की स्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन वहां भी व्यक्त भावनात्मक तनाव परिचित लगेगा।
क्या आपने पिछले साल बनी खुदा के लिए देखी थी? न्यूयॉर्क उसी लाइन की फिल्म लगती है।
हां, मैंने वह फिल्म देखी है। बहुत अच्छी फिल्म है। न्यूयार्क उससे अलग है। यह प्यार, रिश्ते और दोस्ती की फिल्म है। 9/11 इसकी पृष्ठभूमि में है।
आप प्रकाश झा की राजनीति भी कर रही हैं। लगता है कि आप सीरियस फिल्मों की तरफ मुड़ रहीं हैं?
राजनीति सीरियस फिल्म नहीं है। उसमें नाटकीयता है ़ ़ ़ड्रामा है। पूरा मनोरंजन है उसमें। वह आज का महाभारत है। रिश्ते और मूल्यों की बातें हैं। जरूरी तो नहीं कि हर फिल्म फन फिल्म हो।
उस फिल्म में आपका किरदार देश की मशहूर नेता से मिलता-जुलता है। पहली बार आप साड़ी में दिखीं और आप के बाल पीछे की तरफ कर के काढ़े गए हैं। अपनी पापुलर छवि से अलग दिखीं हैं आप?
फिल्म में और भी बहुत कुछ है। आपने जो तस्वीरें देखीं, वे कुछ खास प्रसंगों की हैं। उस समय मैं राजनीति में आ चुकी हूं। अभी उस फिल्म के बारे में ज्यादा बातें करना सही नहीं होगा।
अपने छोटे से करिअर में आपने हर तरह की फिल्म कर ली। कैटरीना को अधिक मजा किस तरह की फिल्म में आता है?
मुझे थीम अच्छी लगे और स्क्रिप्ट मजबूत हो तो मुझे हर तरह की फिल्म अच्छी लगती है। डायरेक्टर सही फिल्म बना रहा हो और आप फिल्म से सहमत हों।
क्या इस तरह की बातें आप न्यूयॉर्क की तैयारी की वजह से कर पा रहीं हैं? या सामान्य तौर पर आप इतनी जागरूक हैं?
फिल्म करने की वजह से जानकारी बढ़ी। मैं खुद को जागरूक मानती हूं।