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Tuesday, June 30, 2009

दो तस्वीरें:माई नेम इज खान में काजोल और शाहरुख़




यह फ़िल्म अभी बन रही है.करण जौहर अपने कलाकारों के साथ अमेरिका में इस फ़िल्म की शूटिंग कर रहे हैं.मन जा रहा है की करण पहली बार अपनी ज़मीन से अलग जाकर कुछ कर रहे हैं.हमें उम्मीद है कि काजोल और शाहरुख़ के साथ वे कुछ नया करेंगे...

Monday, June 29, 2009

हिन्दी टाकीज:तीन घंटे की फ़िल्म का नशा तीस दिनों तक रहता था-दुर्गेश उपाध्याय


हिन्दी टाकीज-४१

दुर्गेश में गंवई सहजता है। मालूम नहीं उन्होंने कैसे इसे बचा लिया है? बातचीत में हमेशा हँसी की चाशनी रहती है और चवन्नी ने कभी किसी की बुराई नहीं सुनी उनसे.ईर्ष्या होती है उनकी सादगी से...उनका परिचय उनके ही शब्दों में...नाम दुर्गेश उपाध्याय, पेशा- बीबीसी पत्रकार,मुंबई में कार्यरत..पढ़ाई लिखाई कुछ गांव में बाकी की लखनऊ में..लखनऊ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में मास्टर्स ..कैरिएर की शुरुआत मुंबई में की और पिछले कुछ सालों से फिल्मी और राजनैतिक पत्रकारिता में सक्रिय हैं..अच्छा खाना,बौद्दिक लोगों के साथ उठना बैठना,फिल्में देखना और पढ़ना खास शौक हैं..व्यक्तिगत तौर पर काफी भावुक हैं और गूढ विषयों जैसे ईश्वर का अस्तित्व,मानव विकास का इतिहास में गहरी दिलचस्पी,ओशो को पढ़ना पसंद है...
मेरा मानना है कि अपनी कहानी कहना हमेशा थोड़ा कठिन काम होता है।आपको लगता है कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया॥फिल्मी दुनिया में रिपोर्टिंग का मेरा अनुभव भले ही ज्यादा ना हो लेकिन इस दौरान काफी दिलचस्प अनुभव हुए हैं..मसलन अमिताभ बच्चन के साथ इंटरव्यू और बिना चिप लगी मशीन से प्रीति जिंटा का आधा इंटरव्यू करना और बाद में शर्मिंदगी झेलना..चलिए एक छोटी कोशिश करता हूं याद करने की...फिल्मों में अपने शौक की बात करुं तो ठीक से याद तो नहीं है लेकिन इतना कह सकता हूं कि जब से खुद को जाना है तब से फिल्मों की तरफ जबरदस्त रुझान है..मुझे अभी भी याद है कि किस तरह से पहली बार मैंने वीडियो पर नगीना फिल्म देखी थी और उसमें श्रीदेवी का वो नागिन बनना,आज भी जब वो दृश्य याद आता है तो मन में विचित्र तरह का भाव उभरता है..हम उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले से आते हैं.वहां पर एक गांव है शेरपुर कलां.काफी नामी गांव है,इलाके में ही नहीं पूरे जिले में लोग इस गांव से परिचित हैं.वहीं पर मेरा जन्म हुआ..मेरे बाबा (दादा जी) और आजी ( दादी) वहीं पर रहते थे.मेरे पिता जी की नौकरी लखनऊ में होने की वजह से हमें गर्मियों की छुट्टियों में शहर आने का मौका मिलता था.
नब्बे के दशक की शुरुआत में टीवी ने गांवों की तरफ भी रुख करना शुरु कर दिया था।हमारे मोहल्ले में भी टीवी आया.उन दिनों टीवी के साथ एंटिना लगाने अनिवार्य होता था ताकि पिक्चर साफ आए.मुझे याद है कि किस तरह से हमारे एक पड़ोसी के घर जब बुश का छोटा टीवी सेट आया था और हम बांस की लंबी बल्ली में एंटिना टांगने के लिए मार पसीने से लथपथ हो गए थे.आखिरकार हम लंबी बल्ली में एंटिना टांगने में कामयाब रहे ये अलग बात है कि पिक्चर फिर भी साफ नहीं हो पायी॥
उन दिनों एक ही चैनल दूरदर्शन आया करता था और रविवार के दिन शाम को एक फिल्म आती थी॥हम सारे मोहल्ले के बच्चे जिनमें मेरे भाई बहन भी शामिल थे पूरे हफ्ते उस फिल्म का इंतजार करते थे..और आपको तो पता ही है गांवों में बिजली का हाल..फिल्म के बीच में जैसे ही लाइट जाती थी तो लगता था मानो किसी ने प्राण हर लिए हों..मैं तब छोटा था और सोचता था ये कौन है जो लाइट काटता है,अगर मुझे मिल जाए तो साले की गर्दन मरोड़ दूं।हमारे मोहल्ले में एक नंद कुमार नाम के व्यक्ति थे,बड़े ही बातूनी..हांलाकि पढ़े लिखे सज्जन थे लेकिन अगर एक बार बोलना शुरु कर दें तो अच्छे अच्छों को पानी पिला दें..उन्होंने अपनी पढ़ाई बीएचयू यानि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से की थी और जनाब ने पढ़ाई के दौरान काफी फिल्में देखीं हुईं थी,वो अक्सर उन फिल्मों का जिक्र किया करते थे..उनमें से प्रमुख थी नील कमल और गाइड,,उन्हें इन फिल्मों के एक एक सीन बखूबी याद थे..जब वो वहीदा रहमान और देवानंद के बारे में चर्चा करना शुरु करते थे तो यकीन जानिए हमें भी लगता था कि कौन सा ऐसा दिन होगा जब हमें सितारों के दर्शन होंगे..नंद कुमार जी गाते भी थे,अब कैसा गाते थे ये नाही पूछिए तो बेहतर है..खैर,फिल्मों में मेरी दिलचस्पी वहीं से होनी शुरु हुई थी..
टीवी पर हमने काफी फिल्में देखीं।फिल्म देखने के लिए हमें जमीन पर और कई बार तो गंदगी के बीच बैठने में भी कोई ऐतराज नहीं होता था॥जब भी कोई हीरो या हिरोईन फिल्मों में गाना गाते थै तो हमें लगता था कि मैं भी बिल्कुल उसी अंदाज में कुछ कर रहा हूं.तीन घंटे की फिल्म देखने के बाद नशा तीस दिन तक रहता था..सन 1987 में मेरे लखनऊ वाले सरकारी मकान में पिता जी छोटा टीवी का सेट खरीद कर लाए थे उनदिनों रामायण आया करती थी,रविवार की सुबह नौ बजे ही हम नहा धोकर पूरा परिवार ये सीरियल देखता था,और बीच में मेरी मां खाने का भी इंतजाम कर देतीं थीं..वैसे यहां ये भी बता दूं कि फिल्मों में मेरी रूचि के पीछे मूल कारण मेरी मां ही रही हैं,उन्हें फिल्मों का जबरदस्त शौक रहा है और आज भी वो कोई भी फिल्म बड़े चाव से देखती हैं,हां ये बात अलग है कि बाद में इन फिल्मों में दिखाई जा रहे अंग प्रदर्शन को लेकर अपने गुस्से का इज़हार भी करती हैं
बचपन में ही मुझे मेरा दोस्त मिला॥हमारे गांव के बाहर एक स्कूल है जिसका नाम है निराला विद्या मंदिर..कक्षा 8 तक की पढ़ाई वहीं पर हुई..वहीं कक्षा 2 में मेरी दोस्ती उपेंद्र नाम के एक लड़के से हुई..वो भी अपने तरह का बिंदास लड़का था जिस पर क्लास की कुछ लड़कियां लट्टू थीं और गाना भी बेहतरीन गाता था..खूबसूरत था उसके होंठ बिल्कुल लाल थे,और पढ़ने में भी अच्छा था..उपेंद्र से मेरी जल्दी ही बनने लगी और मुझे याद है पहली बार वो मेरे घर बेर खाने के लिए आया था..मेरे घर के पिछवाड़े बेर का पेड़ था और उसे मैंने घर पर इसीलिए बुलाया था..फिर धीरे धीरे हमारी दोस्ती काफी गहरी होती गई..हम दोनों की दोस्ती के गहराने के पीछे एक मजबूत वजह जो बनी वो था मेरा फिल्मी ज्ञान..गर्मी की छुट्टियों में जब मैं लखनऊ जाता था और ढेर सारी फिल्में देखकर आता था तो क्लास के दौरान ही मैँ अपने कुछ दोस्तों का फिल्मों की कहानियां और डॉयलाग्स सुनाता था और वो मुझसे काफी प्रभावित रहते थे..वैसे मेरी क्लास में कुछ ऐसे भी लड़के थे जिन्हें फिल्मों में इतनी दिलचस्पी थी कि आसपास के इलाके में कहीं भी वीडियो आ जाए वो वहां पहुंचते ही पहुंचते थे..संदीप और लक्ष्मण का नाम मैं यहां लेना चाहूंगा..दोनों का ही जवाब नहीं था..वैसे उपेंद्र भी इसमें पीछे नहीं रहता था और कई बार तो मैं भी रात के अंधेरे में वीडियो देखने जाता था..मैं आपको बता नहीं सकता उस एहसास के बारे में जब वीडियो शुरु होता था और उसमें झिलमिल आवाजें आनी शुरु होंती थीं हम उत्साह से भर जाते थे..उपेंद्र की चर्चा थोड़ी और..उन दिनों फिल्मों के डॉयलाग्स की किताबें भी खूब बिकती थीं..उपेंद्र के पास इन किताबों का पिटारा था..उसका एक चेला था जिसका नाम था पेठा..जैसा नाम वैसा काम..पेठा जी,उपेंद्र के भक्त थे और उनके इशारे पर किताबों को इधर से उधर पहुंचाते थे..और कई बार लड़कियों की चिट्ठियां भी..हम क्लास में लड़कियों पर रुआब झाड़ने के लिए फिल्मी गाने भी खूब गाते थे..लेकिन मेरी छवि थोड़ी सी अलग थी और दुर्भाग्य से किसी लड़की का दिल मुझपे नहीं आ सका...लेकिन मेरा दोस्त लकी रहा...खैर,मुझे ये सौभाग्य हासिल था कि मैं इन किताबों को घर भी पढ़ने के लिए ले जाता था..क्लास में भी सबको पता था कि दुर्गेश और उपेंद्र की जमती है इसीलिए सब मेरी इज्जत भी करते थे क्यों कि उपेंद्र किसी को पीटने में जरा भी वक्त नहीं लगाता था और अकेला मैं ही था जिसकी किसी बात का वो बुरा नहीं मानता था..उसने मेरा हमेशा ख्याल रखा...और मेरे लिए भी वो हमेशा खास रहा..और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हमने कक्षा 2 से ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई एक साथ की और आज भी तमाम थपेड़ों को सहते हुए हमारा रिश्ता बदस्तूर जारी है..हां इतना जरूर है कि समय के साथ साथ इसमें परिपक्वता जरुर आ गई है..लेकिन एक दूसरे से दोस्ती और लगाव उतना ही है...
नब्बे का दशक ऐसा रहा है जिसमें कई ऐसी फिल्में आईं जिनका संगीत लाजववाब था।खासकर ऐसी फिल्में जिनमें नदीम श्रवण का संगीत हो॥आशिकी,साजन वगैरह और कई नाम हैं लेकिन अभी ज़ेहन में नाम नहीं आरहा है.हमने ये सारी फिल्में वीडियो पर देखीं और आज भी जब ये फिल्में या इनका कोई गाना कहीं सुनाई देता है तो पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं...संजय दत्त को मैं उन्हीं दिनों से काफी पसंद करता हूं..उनकी फिल्में साजन,आतिश,खलनायक वगैरह ने दिमाग पर काफी असर छोड़ा..आज जब इन सितारों को नजदीक से मिलने और जानने का मौका मिला तो हंसी आती है अपनी उन दिनों के सोच पर..
वक्त के साथ सिनेमा बदल गया है॥लोगों का नजरिया बदल गया है,लेकिन एक बात जो नहीं बदली है वो फिल्मों की तरफ मेरा रुझान..बढ़ते हुए दिनों की तरह ही फिल्मों की तरफ मेरा झुकाव भी बढ़ता ही जा रहा है..
पसंदीदा फिल्में 11
1.नगीना
२.साजन
३.आशिकी
४.खलनायक
५.राम लखन
६.तारे ज़मीन पर
७.जो जीता वो ही सिकंदर
८.बाजीगर
९.दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे
१०.हम आपके हैं कौन
5

Saturday, June 27, 2009

फ़िल्म समीक्षा:न्यूयार्क

-अजय ब्रह्मात्मज
कबीर खान सजग फिल्मकार हैं। पहले काबुल एक्सप्रेस और अब न्यूयार्क में उन्होंने आतंकवाद के प्रभाव और पृष्ठभूमि में कुछ व्यक्तियों की कथा बुनी है। हर बड़ी घटना-दुर्घटना कुछ व्यक्तियों की जिंदगी को गहरे रूप में प्रभावित करती है। न्यूयार्क में 9/11 की पृष्ठभूमि और घटना है। इस हादसे की पृष्ठभूमि में हम कुछ किरदारों की बदलती जिंदगी की मुश्किलों को देखते हैं।
उमर (नील नितिन मुकेश) पहली बार न्यूयार्क पहुंचता है। वहां उसकी मुलाकात पहले माया (कैटरीना कैफ) और फिर सैम (जान अब्राहम) से होती है। तीनों की दोस्ती में दो प्रेम कहानियां चलती हैं। उमर को लगता है कि माया उससे प्रेम करती है, जबकि माया का प्रेम सैम के प्रति जाहिर होता है। हिंदी फिल्मों की ऐसी स्थितियों में दूसरा हीरो त्याग की मूर्ति बन जाता है। यहां भी वही होता है, लेकिन बीच में थोड़ा एक्शन और आतंकवाद आता है। आतंकवाद की वजह से फिल्म का निर्वाह बदल जाता है। स्पष्ट है कि उमर और सैम यानी समीर मजहब से मुसलमान हैं। उन पर अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफबीआई को शक होता है। कहते हैं 9/11 के बाद अमेरिका में 1,200 मुसलमानों को शक के घेरे में लिया गया। समीर उनमें से एक है। नौ महीने की हिरासत में पुलिस यातना सहने के बाद वह मुक्त होता है तो उसके दिल में एफबीआई के लिए घोर नफरत है। एफबीआई को उस पर फिर से शक है, लेकिन इस बार वह समीर के दोस्त उमर को अपना एजेंट बना लेती है। पक्के सुबूत के लिए उमर का इस्तेमाल किया जाता है। एफबीआई में मुसलमान अधिकारी रोशन है, जो 9/11 के बाद मुसलमानों के प्रति फैले रोष और संदेह को मिटाना चाहता है। उसका मानना है कि इसके लिए मुसलमानों को आगे आना होगा।
दोस्ती, प्यार, रिश्ते और इज्जत जैसी भावनाओं को घोल कर न्यूयार्क तैयार की गई है। ऊपरी तौर पर रियलिस्टक और हार्ड हिटिंग लग रही यह फिल्म हिंदी फिल्मों के फार्मूले से बाहर नहीं निकल पाती। कबीर खान कहीं न कहीं यशराज फिल्म्स के प्रचलित ढांचे में खुद को ढालते नजर आते हैं। प्रसंग और स्थितियां वास्तविक होने के बावजूद गहराई से इसलिए नहीं छू पातीं क्योंकि उनमें बनावटीपन दिखाई पड़ता है। कबीर की छटपटाहट दिखाई पड़ती है। वह प्रचलित ढांचे से बार-बार निकलने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी कोशिशों को कतर दिया जा रहा है।
कबीर खान ने अमेरिकी समाज के सोच और राजनीति की आलोचना की है, लेकिन उस धारणा को ही रेखांकित किया है कि अमेरिकी समाज में हर नागरिक को मौलिक स्वतंत्रता हासिल है। 9/11 के बाद भी आतंकवाद के संदेह में आए मुसलमान व्यक्तियों का मामला एक मुसलमान अधिकारी को सौंपा जाता है। एक मुसलमान, आतंकवादी के बेटे को अमेरिकी समाज अपना हीरो बनाने को तैयार है। अमेरिका के इस स्वच्छ, लोकतांत्रिक और आदर्शवादी सोच को लेकर कई सवाल मन में उठते हैं। न्यूयार्क अमेरिका के प्रति भरोसा रखने और जगाने का प्रयास करती है।
कलाकारों की बात करें तो पहली बार ग्लैमरहीन भूमिका में कैटरीना कैफ दिखी हैं। कुछ दृश्यों में वे जंचती हैं तो कुछ में संघर्ष करती नजर आती हैं। कबीर खान ने माया की भूमिका सिर्फ उत्प्रेरक की रखी है। वह कारक नहीं है। फिल्म मुख्य रूप से नील नितिन मुकेश, जान अब्राहम और इरफान खान की है। इरफान दिए गए दृश्यों में ही अभिनय के पल चुरा लेते हैं। हां, नील नितिन मुकेश फिर से साबित करते हैं कि अगर उन्हें सही चरित्र मिले तो वह निराश नहीं करेंगे। जान अब्राहम के अभिनय में अपेक्षाकृत विकास है। यातना और रोष के दृश्यों में वे अपनी सीमित भंगिमाओं से बाहर आते हैं। फिल्म में गीत-संगीत लगभग अप्रासंगिक है। न्यूयार्क को फिल्माने में निर्देशक ने कैमरामैन का सही उपयोग किया है। फिल्म इस लिहाज से उल्लेखनीय है कि यह हिंदी फिल्मों के प्रचलित ढांचे में रहते हुए इश्क-मुहब्बत से परे जाकर रिश्तों और राजनीति की बात करती है।
रेटिंग : ***

Friday, June 26, 2009

दरअसल:कई परतें थीं बाबू मोशाय संबोधन में

-अजय ब्रह्मात्मज
अमिताभ बच्चन के सुपर स्टार बनने से पहले के सुपर स्टार भी मकाऊ में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में उपस्थित थे। फिल्म इंडस्ट्री में उनके योगदान को रेखांकित करते हुए सम्मानित किया गया। उन्होंने भगवा रंग के कपड़े पहन रखे थे। चाल में पहले जैसी चपलता नहीं थी, लेकिन कदम डगमगा भी नहीं रहे थे। वे बड़े आराम और सधे पांव से मंच पर चढ़े। सम्मान में मिली ट्राफी ग्रहण की, फिर अमिताभ बच्चन को बाबू मोशाय संबोधित करते हुए अपनी बात कही। मकाऊ में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में हम सुपर स्टार राजेश खन्ना को सुन रहे थे।
अपने अभिभाषण में उन्होंने एक बार भी अमिताभ बच्चन के नाम से संबोधित नहीं किया। बाबू मोशाय ही कहते रहे। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना की फिल्म आनंद देख चुके दर्शकों को अच्छी तरह याद होगा कि इस फिल्म में अमिताभ बच्चन को राजेश खन्ना बाबू मोशाय ही कहते हैं। मकाऊ में मंच पर राजेश खन्ना के बाबू मोशाय संबोधन में लाड़, प्यार, दुलार, शिकायत, आशंका, प्रशंसा, मनमुटाव, अपेक्षा, उपेक्षा आदि भाव थे।
हर दो पंक्ति के बाद बाबू मोशाय को अलग अंदाज में उच्चरित कर राजेश खन्ना कुछ नया जोड़ते रहे। थोड़ा पीछे हटकर उनकी तरफ देखते हुए अमिताभ बच्चन के चेहरे पर हर बाबू मोशाय उच्चारण के बाद एक नए रंग की लहर दौड़ जाती थी। जो सभी ने सुना और समझा, राजेश खन्ना उससे कुछ ज्यादा कह रहे थे और पूरा यकीन है कि अमिताभ बच्चन उनके हर शब्द और उच्चारण के भेद और मर्म को समझ रहे थे। राजेश खन्ना ने स्पष्ट कहा कि वह भी एक दौर था, यह भी एक दौर है। पहले कोई और था, आज कोई और है..। राजेश खन्ना जिस तरफ इशारा कर रहे थे या मुट्ठी से फिसल चुकी लोकप्रियता को याद कर कसमसा रहे थे, उसे सभी ने देखा और समझा। ऐसे द्वंद्व और दंश से अधिक सहानुभूति नहीं हो पाती, क्योंकि बदलते वक्त के साथ हर शय बदलती है। हालांकि अमिताभ बच्चन ने अपने परिचय में राजेश खन्ना की अप्रतिम लोकप्रियता का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कैसे उनकी कार के टायर की धूल को लड़कियां अपनी मांगों में भरती थीं.., राजेश खन्ना जैसी लोकप्रियता कभी देव आनंद ने भी देखी थी। कहते हैं राजेश खन्ना की पलकें झपकती थीं, तो लड़कियां सिनेमाघरों में सीटों पर उछल पड़ती थीं। समय ने वह लोकप्रियता किसी और को दे दी है। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना ने दो फिल्मों आनंद और नमक हराम में साथ काम किया। यह वही दौर था, जब एक स्टार का अस्त हो रहा था और दूसरे का उदय..।
आईफा अवार्ड में हर साल इस विशेष पुरस्कार से अपनी बिरादरी के किसी समकालीन या सीनियर कलाकार को सम्मानित करने के बाद अमिताभ बच्चन को ताने सुनने पड़ते हैं। फिरोज खान और धर्मेद्र ने भी अपने संबोधनों में शिकायतें रखी थीं। शायद यह अमिताभ बच्चन की लंबी पारी का साइड इफेक्ट हो! दूसरों को अपनी असफलता खलती है, लेकिन उसकी वजह जरूरी तो नहीं कि अमिताभ बच्चन ही हों। राजेश खन्ना ने अपने संबोधन में अमिताभ बच्चन से इशारे में कई सवाल किए। जाहिर है, हमें उम्मीद होगी ही कि वे अपने ब्लॉग पर इस प्रसंग और राजेश खन्ना के संबोधन के बारे में कुछ लिखें! तब शायद कुछ नए भेद खुलें। परतों से धूल छंटे और हम सब स्टारों के संबंधों को नए सिरे से समझें!