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Tuesday, June 30, 2009

दो तस्वीरें:माई नेम इज खान में काजोल और शाहरुख़




यह फ़िल्म अभी बन रही है.करण जौहर अपने कलाकारों के साथ अमेरिका में इस फ़िल्म की शूटिंग कर रहे हैं.मन जा रहा है की करण पहली बार अपनी ज़मीन से अलग जाकर कुछ कर रहे हैं.हमें उम्मीद है कि काजोल और शाहरुख़ के साथ वे कुछ नया करेंगे...

Monday, June 29, 2009

हिन्दी टाकीज:तीन घंटे की फ़िल्म का नशा तीस दिनों तक रहता था-दुर्गेश उपाध्याय


हिन्दी टाकीज-४१

दुर्गेश में गंवई सहजता है। मालूम नहीं उन्होंने कैसे इसे बचा लिया है? बातचीत में हमेशा हँसी की चाशनी रहती है और चवन्नी ने कभी किसी की बुराई नहीं सुनी उनसे.ईर्ष्या होती है उनकी सादगी से...उनका परिचय उनके ही शब्दों में...नाम दुर्गेश उपाध्याय, पेशा- बीबीसी पत्रकार,मुंबई में कार्यरत..पढ़ाई लिखाई कुछ गांव में बाकी की लखनऊ में..लखनऊ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में मास्टर्स ..कैरिएर की शुरुआत मुंबई में की और पिछले कुछ सालों से फिल्मी और राजनैतिक पत्रकारिता में सक्रिय हैं..अच्छा खाना,बौद्दिक लोगों के साथ उठना बैठना,फिल्में देखना और पढ़ना खास शौक हैं..व्यक्तिगत तौर पर काफी भावुक हैं और गूढ विषयों जैसे ईश्वर का अस्तित्व,मानव विकास का इतिहास में गहरी दिलचस्पी,ओशो को पढ़ना पसंद है...
मेरा मानना है कि अपनी कहानी कहना हमेशा थोड़ा कठिन काम होता है।आपको लगता है कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया॥फिल्मी दुनिया में रिपोर्टिंग का मेरा अनुभव भले ही ज्यादा ना हो लेकिन इस दौरान काफी दिलचस्प अनुभव हुए हैं..मसलन अमिताभ बच्चन के साथ इंटरव्यू और बिना चिप लगी मशीन से प्रीति जिंटा का आधा इंटरव्यू करना और बाद में शर्मिंदगी झेलना..चलिए एक छोटी कोशिश करता हूं याद करने की...फिल्मों में अपने शौक की बात करुं तो ठीक से याद तो नहीं है लेकिन इतना कह सकता हूं कि जब से खुद को जाना है तब से फिल्मों की तरफ जबरदस्त रुझान है..मुझे अभी भी याद है कि किस तरह से पहली बार मैंने वीडियो पर नगीना फिल्म देखी थी और उसमें श्रीदेवी का वो नागिन बनना,आज भी जब वो दृश्य याद आता है तो मन में विचित्र तरह का भाव उभरता है..हम उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले से आते हैं.वहां पर एक गांव है शेरपुर कलां.काफी नामी गांव है,इलाके में ही नहीं पूरे जिले में लोग इस गांव से परिचित हैं.वहीं पर मेरा जन्म हुआ..मेरे बाबा (दादा जी) और आजी ( दादी) वहीं पर रहते थे.मेरे पिता जी की नौकरी लखनऊ में होने की वजह से हमें गर्मियों की छुट्टियों में शहर आने का मौका मिलता था.
नब्बे के दशक की शुरुआत में टीवी ने गांवों की तरफ भी रुख करना शुरु कर दिया था।हमारे मोहल्ले में भी टीवी आया.उन दिनों टीवी के साथ एंटिना लगाने अनिवार्य होता था ताकि पिक्चर साफ आए.मुझे याद है कि किस तरह से हमारे एक पड़ोसी के घर जब बुश का छोटा टीवी सेट आया था और हम बांस की लंबी बल्ली में एंटिना टांगने के लिए मार पसीने से लथपथ हो गए थे.आखिरकार हम लंबी बल्ली में एंटिना टांगने में कामयाब रहे ये अलग बात है कि पिक्चर फिर भी साफ नहीं हो पायी॥
उन दिनों एक ही चैनल दूरदर्शन आया करता था और रविवार के दिन शाम को एक फिल्म आती थी॥हम सारे मोहल्ले के बच्चे जिनमें मेरे भाई बहन भी शामिल थे पूरे हफ्ते उस फिल्म का इंतजार करते थे..और आपको तो पता ही है गांवों में बिजली का हाल..फिल्म के बीच में जैसे ही लाइट जाती थी तो लगता था मानो किसी ने प्राण हर लिए हों..मैं तब छोटा था और सोचता था ये कौन है जो लाइट काटता है,अगर मुझे मिल जाए तो साले की गर्दन मरोड़ दूं।हमारे मोहल्ले में एक नंद कुमार नाम के व्यक्ति थे,बड़े ही बातूनी..हांलाकि पढ़े लिखे सज्जन थे लेकिन अगर एक बार बोलना शुरु कर दें तो अच्छे अच्छों को पानी पिला दें..उन्होंने अपनी पढ़ाई बीएचयू यानि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से की थी और जनाब ने पढ़ाई के दौरान काफी फिल्में देखीं हुईं थी,वो अक्सर उन फिल्मों का जिक्र किया करते थे..उनमें से प्रमुख थी नील कमल और गाइड,,उन्हें इन फिल्मों के एक एक सीन बखूबी याद थे..जब वो वहीदा रहमान और देवानंद के बारे में चर्चा करना शुरु करते थे तो यकीन जानिए हमें भी लगता था कि कौन सा ऐसा दिन होगा जब हमें सितारों के दर्शन होंगे..नंद कुमार जी गाते भी थे,अब कैसा गाते थे ये नाही पूछिए तो बेहतर है..खैर,फिल्मों में मेरी दिलचस्पी वहीं से होनी शुरु हुई थी..
टीवी पर हमने काफी फिल्में देखीं।फिल्म देखने के लिए हमें जमीन पर और कई बार तो गंदगी के बीच बैठने में भी कोई ऐतराज नहीं होता था॥जब भी कोई हीरो या हिरोईन फिल्मों में गाना गाते थै तो हमें लगता था कि मैं भी बिल्कुल उसी अंदाज में कुछ कर रहा हूं.तीन घंटे की फिल्म देखने के बाद नशा तीस दिन तक रहता था..सन 1987 में मेरे लखनऊ वाले सरकारी मकान में पिता जी छोटा टीवी का सेट खरीद कर लाए थे उनदिनों रामायण आया करती थी,रविवार की सुबह नौ बजे ही हम नहा धोकर पूरा परिवार ये सीरियल देखता था,और बीच में मेरी मां खाने का भी इंतजाम कर देतीं थीं..वैसे यहां ये भी बता दूं कि फिल्मों में मेरी रूचि के पीछे मूल कारण मेरी मां ही रही हैं,उन्हें फिल्मों का जबरदस्त शौक रहा है और आज भी वो कोई भी फिल्म बड़े चाव से देखती हैं,हां ये बात अलग है कि बाद में इन फिल्मों में दिखाई जा रहे अंग प्रदर्शन को लेकर अपने गुस्से का इज़हार भी करती हैं
बचपन में ही मुझे मेरा दोस्त मिला॥हमारे गांव के बाहर एक स्कूल है जिसका नाम है निराला विद्या मंदिर..कक्षा 8 तक की पढ़ाई वहीं पर हुई..वहीं कक्षा 2 में मेरी दोस्ती उपेंद्र नाम के एक लड़के से हुई..वो भी अपने तरह का बिंदास लड़का था जिस पर क्लास की कुछ लड़कियां लट्टू थीं और गाना भी बेहतरीन गाता था..खूबसूरत था उसके होंठ बिल्कुल लाल थे,और पढ़ने में भी अच्छा था..उपेंद्र से मेरी जल्दी ही बनने लगी और मुझे याद है पहली बार वो मेरे घर बेर खाने के लिए आया था..मेरे घर के पिछवाड़े बेर का पेड़ था और उसे मैंने घर पर इसीलिए बुलाया था..फिर धीरे धीरे हमारी दोस्ती काफी गहरी होती गई..हम दोनों की दोस्ती के गहराने के पीछे एक मजबूत वजह जो बनी वो था मेरा फिल्मी ज्ञान..गर्मी की छुट्टियों में जब मैं लखनऊ जाता था और ढेर सारी फिल्में देखकर आता था तो क्लास के दौरान ही मैँ अपने कुछ दोस्तों का फिल्मों की कहानियां और डॉयलाग्स सुनाता था और वो मुझसे काफी प्रभावित रहते थे..वैसे मेरी क्लास में कुछ ऐसे भी लड़के थे जिन्हें फिल्मों में इतनी दिलचस्पी थी कि आसपास के इलाके में कहीं भी वीडियो आ जाए वो वहां पहुंचते ही पहुंचते थे..संदीप और लक्ष्मण का नाम मैं यहां लेना चाहूंगा..दोनों का ही जवाब नहीं था..वैसे उपेंद्र भी इसमें पीछे नहीं रहता था और कई बार तो मैं भी रात के अंधेरे में वीडियो देखने जाता था..मैं आपको बता नहीं सकता उस एहसास के बारे में जब वीडियो शुरु होता था और उसमें झिलमिल आवाजें आनी शुरु होंती थीं हम उत्साह से भर जाते थे..उपेंद्र की चर्चा थोड़ी और..उन दिनों फिल्मों के डॉयलाग्स की किताबें भी खूब बिकती थीं..उपेंद्र के पास इन किताबों का पिटारा था..उसका एक चेला था जिसका नाम था पेठा..जैसा नाम वैसा काम..पेठा जी,उपेंद्र के भक्त थे और उनके इशारे पर किताबों को इधर से उधर पहुंचाते थे..और कई बार लड़कियों की चिट्ठियां भी..हम क्लास में लड़कियों पर रुआब झाड़ने के लिए फिल्मी गाने भी खूब गाते थे..लेकिन मेरी छवि थोड़ी सी अलग थी और दुर्भाग्य से किसी लड़की का दिल मुझपे नहीं आ सका...लेकिन मेरा दोस्त लकी रहा...खैर,मुझे ये सौभाग्य हासिल था कि मैं इन किताबों को घर भी पढ़ने के लिए ले जाता था..क्लास में भी सबको पता था कि दुर्गेश और उपेंद्र की जमती है इसीलिए सब मेरी इज्जत भी करते थे क्यों कि उपेंद्र किसी को पीटने में जरा भी वक्त नहीं लगाता था और अकेला मैं ही था जिसकी किसी बात का वो बुरा नहीं मानता था..उसने मेरा हमेशा ख्याल रखा...और मेरे लिए भी वो हमेशा खास रहा..और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हमने कक्षा 2 से ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई एक साथ की और आज भी तमाम थपेड़ों को सहते हुए हमारा रिश्ता बदस्तूर जारी है..हां इतना जरूर है कि समय के साथ साथ इसमें परिपक्वता जरुर आ गई है..लेकिन एक दूसरे से दोस्ती और लगाव उतना ही है...
नब्बे का दशक ऐसा रहा है जिसमें कई ऐसी फिल्में आईं जिनका संगीत लाजववाब था।खासकर ऐसी फिल्में जिनमें नदीम श्रवण का संगीत हो॥आशिकी,साजन वगैरह और कई नाम हैं लेकिन अभी ज़ेहन में नाम नहीं आरहा है.हमने ये सारी फिल्में वीडियो पर देखीं और आज भी जब ये फिल्में या इनका कोई गाना कहीं सुनाई देता है तो पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं...संजय दत्त को मैं उन्हीं दिनों से काफी पसंद करता हूं..उनकी फिल्में साजन,आतिश,खलनायक वगैरह ने दिमाग पर काफी असर छोड़ा..आज जब इन सितारों को नजदीक से मिलने और जानने का मौका मिला तो हंसी आती है अपनी उन दिनों के सोच पर..
वक्त के साथ सिनेमा बदल गया है॥लोगों का नजरिया बदल गया है,लेकिन एक बात जो नहीं बदली है वो फिल्मों की तरफ मेरा रुझान..बढ़ते हुए दिनों की तरह ही फिल्मों की तरफ मेरा झुकाव भी बढ़ता ही जा रहा है..
पसंदीदा फिल्में 11
1.नगीना
२.साजन
३.आशिकी
४.खलनायक
५.राम लखन
६.तारे ज़मीन पर
७.जो जीता वो ही सिकंदर
८.बाजीगर
९.दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे
१०.हम आपके हैं कौन
5

Saturday, June 27, 2009

फ़िल्म समीक्षा:न्यूयार्क

-अजय ब्रह्मात्मज
कबीर खान सजग फिल्मकार हैं। पहले काबुल एक्सप्रेस और अब न्यूयार्क में उन्होंने आतंकवाद के प्रभाव और पृष्ठभूमि में कुछ व्यक्तियों की कथा बुनी है। हर बड़ी घटना-दुर्घटना कुछ व्यक्तियों की जिंदगी को गहरे रूप में प्रभावित करती है। न्यूयार्क में 9/11 की पृष्ठभूमि और घटना है। इस हादसे की पृष्ठभूमि में हम कुछ किरदारों की बदलती जिंदगी की मुश्किलों को देखते हैं।
उमर (नील नितिन मुकेश) पहली बार न्यूयार्क पहुंचता है। वहां उसकी मुलाकात पहले माया (कैटरीना कैफ) और फिर सैम (जान अब्राहम) से होती है। तीनों की दोस्ती में दो प्रेम कहानियां चलती हैं। उमर को लगता है कि माया उससे प्रेम करती है, जबकि माया का प्रेम सैम के प्रति जाहिर होता है। हिंदी फिल्मों की ऐसी स्थितियों में दूसरा हीरो त्याग की मूर्ति बन जाता है। यहां भी वही होता है, लेकिन बीच में थोड़ा एक्शन और आतंकवाद आता है। आतंकवाद की वजह से फिल्म का निर्वाह बदल जाता है। स्पष्ट है कि उमर और सैम यानी समीर मजहब से मुसलमान हैं। उन पर अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफबीआई को शक होता है। कहते हैं 9/11 के बाद अमेरिका में 1,200 मुसलमानों को शक के घेरे में लिया गया। समीर उनमें से एक है। नौ महीने की हिरासत में पुलिस यातना सहने के बाद वह मुक्त होता है तो उसके दिल में एफबीआई के लिए घोर नफरत है। एफबीआई को उस पर फिर से शक है, लेकिन इस बार वह समीर के दोस्त उमर को अपना एजेंट बना लेती है। पक्के सुबूत के लिए उमर का इस्तेमाल किया जाता है। एफबीआई में मुसलमान अधिकारी रोशन है, जो 9/11 के बाद मुसलमानों के प्रति फैले रोष और संदेह को मिटाना चाहता है। उसका मानना है कि इसके लिए मुसलमानों को आगे आना होगा।
दोस्ती, प्यार, रिश्ते और इज्जत जैसी भावनाओं को घोल कर न्यूयार्क तैयार की गई है। ऊपरी तौर पर रियलिस्टक और हार्ड हिटिंग लग रही यह फिल्म हिंदी फिल्मों के फार्मूले से बाहर नहीं निकल पाती। कबीर खान कहीं न कहीं यशराज फिल्म्स के प्रचलित ढांचे में खुद को ढालते नजर आते हैं। प्रसंग और स्थितियां वास्तविक होने के बावजूद गहराई से इसलिए नहीं छू पातीं क्योंकि उनमें बनावटीपन दिखाई पड़ता है। कबीर की छटपटाहट दिखाई पड़ती है। वह प्रचलित ढांचे से बार-बार निकलने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी कोशिशों को कतर दिया जा रहा है।
कबीर खान ने अमेरिकी समाज के सोच और राजनीति की आलोचना की है, लेकिन उस धारणा को ही रेखांकित किया है कि अमेरिकी समाज में हर नागरिक को मौलिक स्वतंत्रता हासिल है। 9/11 के बाद भी आतंकवाद के संदेह में आए मुसलमान व्यक्तियों का मामला एक मुसलमान अधिकारी को सौंपा जाता है। एक मुसलमान, आतंकवादी के बेटे को अमेरिकी समाज अपना हीरो बनाने को तैयार है। अमेरिका के इस स्वच्छ, लोकतांत्रिक और आदर्शवादी सोच को लेकर कई सवाल मन में उठते हैं। न्यूयार्क अमेरिका के प्रति भरोसा रखने और जगाने का प्रयास करती है।
कलाकारों की बात करें तो पहली बार ग्लैमरहीन भूमिका में कैटरीना कैफ दिखी हैं। कुछ दृश्यों में वे जंचती हैं तो कुछ में संघर्ष करती नजर आती हैं। कबीर खान ने माया की भूमिका सिर्फ उत्प्रेरक की रखी है। वह कारक नहीं है। फिल्म मुख्य रूप से नील नितिन मुकेश, जान अब्राहम और इरफान खान की है। इरफान दिए गए दृश्यों में ही अभिनय के पल चुरा लेते हैं। हां, नील नितिन मुकेश फिर से साबित करते हैं कि अगर उन्हें सही चरित्र मिले तो वह निराश नहीं करेंगे। जान अब्राहम के अभिनय में अपेक्षाकृत विकास है। यातना और रोष के दृश्यों में वे अपनी सीमित भंगिमाओं से बाहर आते हैं। फिल्म में गीत-संगीत लगभग अप्रासंगिक है। न्यूयार्क को फिल्माने में निर्देशक ने कैमरामैन का सही उपयोग किया है। फिल्म इस लिहाज से उल्लेखनीय है कि यह हिंदी फिल्मों के प्रचलित ढांचे में रहते हुए इश्क-मुहब्बत से परे जाकर रिश्तों और राजनीति की बात करती है।
रेटिंग : ***

Friday, June 26, 2009

दरअसल:कई परतें थीं बाबू मोशाय संबोधन में

-अजय ब्रह्मात्मज
अमिताभ बच्चन के सुपर स्टार बनने से पहले के सुपर स्टार भी मकाऊ में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में उपस्थित थे। फिल्म इंडस्ट्री में उनके योगदान को रेखांकित करते हुए सम्मानित किया गया। उन्होंने भगवा रंग के कपड़े पहन रखे थे। चाल में पहले जैसी चपलता नहीं थी, लेकिन कदम डगमगा भी नहीं रहे थे। वे बड़े आराम और सधे पांव से मंच पर चढ़े। सम्मान में मिली ट्राफी ग्रहण की, फिर अमिताभ बच्चन को बाबू मोशाय संबोधित करते हुए अपनी बात कही। मकाऊ में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में हम सुपर स्टार राजेश खन्ना को सुन रहे थे।
अपने अभिभाषण में उन्होंने एक बार भी अमिताभ बच्चन के नाम से संबोधित नहीं किया। बाबू मोशाय ही कहते रहे। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना की फिल्म आनंद देख चुके दर्शकों को अच्छी तरह याद होगा कि इस फिल्म में अमिताभ बच्चन को राजेश खन्ना बाबू मोशाय ही कहते हैं। मकाऊ में मंच पर राजेश खन्ना के बाबू मोशाय संबोधन में लाड़, प्यार, दुलार, शिकायत, आशंका, प्रशंसा, मनमुटाव, अपेक्षा, उपेक्षा आदि भाव थे।
हर दो पंक्ति के बाद बाबू मोशाय को अलग अंदाज में उच्चरित कर राजेश खन्ना कुछ नया जोड़ते रहे। थोड़ा पीछे हटकर उनकी तरफ देखते हुए अमिताभ बच्चन के चेहरे पर हर बाबू मोशाय उच्चारण के बाद एक नए रंग की लहर दौड़ जाती थी। जो सभी ने सुना और समझा, राजेश खन्ना उससे कुछ ज्यादा कह रहे थे और पूरा यकीन है कि अमिताभ बच्चन उनके हर शब्द और उच्चारण के भेद और मर्म को समझ रहे थे। राजेश खन्ना ने स्पष्ट कहा कि वह भी एक दौर था, यह भी एक दौर है। पहले कोई और था, आज कोई और है..। राजेश खन्ना जिस तरफ इशारा कर रहे थे या मुट्ठी से फिसल चुकी लोकप्रियता को याद कर कसमसा रहे थे, उसे सभी ने देखा और समझा। ऐसे द्वंद्व और दंश से अधिक सहानुभूति नहीं हो पाती, क्योंकि बदलते वक्त के साथ हर शय बदलती है। हालांकि अमिताभ बच्चन ने अपने परिचय में राजेश खन्ना की अप्रतिम लोकप्रियता का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कैसे उनकी कार के टायर की धूल को लड़कियां अपनी मांगों में भरती थीं.., राजेश खन्ना जैसी लोकप्रियता कभी देव आनंद ने भी देखी थी। कहते हैं राजेश खन्ना की पलकें झपकती थीं, तो लड़कियां सिनेमाघरों में सीटों पर उछल पड़ती थीं। समय ने वह लोकप्रियता किसी और को दे दी है। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना ने दो फिल्मों आनंद और नमक हराम में साथ काम किया। यह वही दौर था, जब एक स्टार का अस्त हो रहा था और दूसरे का उदय..।
आईफा अवार्ड में हर साल इस विशेष पुरस्कार से अपनी बिरादरी के किसी समकालीन या सीनियर कलाकार को सम्मानित करने के बाद अमिताभ बच्चन को ताने सुनने पड़ते हैं। फिरोज खान और धर्मेद्र ने भी अपने संबोधनों में शिकायतें रखी थीं। शायद यह अमिताभ बच्चन की लंबी पारी का साइड इफेक्ट हो! दूसरों को अपनी असफलता खलती है, लेकिन उसकी वजह जरूरी तो नहीं कि अमिताभ बच्चन ही हों। राजेश खन्ना ने अपने संबोधन में अमिताभ बच्चन से इशारे में कई सवाल किए। जाहिर है, हमें उम्मीद होगी ही कि वे अपने ब्लॉग पर इस प्रसंग और राजेश खन्ना के संबोधन के बारे में कुछ लिखें! तब शायद कुछ नए भेद खुलें। परतों से धूल छंटे और हम सब स्टारों के संबंधों को नए सिरे से समझें!

Wednesday, June 24, 2009

दर्शनीय फ़िल्म:झनक झनक पायल बाजे

दर्शनीय फ़िल्म-२
-आनंद भारती
झनक झनक पायल बाजे
अवधी-१४३ मिनट
विधा-म्यूजिकल ड्रामा

वी शांताराम भारत के उन फिल्‍मकारों की श्रेणी में हैं, जिनकी फिल्‍मों ने हमेशा सामाजिक संदेश दिए। वह चाहे 'आदमी' हो या 'पड़ोसी', 'दहेज' हो या 'दु‍निया न माने' या फिर 'अमृत मंथन' हो या 'अमर ज्‍योति' और 'नवरंग'। उनकी फिल्‍मों में अप‍राधियों का हृदय परिवर्तन होता है, वेश्‍याओं का पुनर्वसन होता है, सांप्रदायिक सद्भाव का माहौल तैयार होता है, दहेज-प्रथा बेनकाब होती है। वी शांताराम वैसे भाग्‍यशाली फिल्‍मकार रहे, जिन्‍होंने जीते जी अपनी अमरता का स्‍वाद चख लिया। उनकी सारी फिल्‍में हिट रहीं और हर फिल्‍म को मील का पत्‍थर माना जाता है।
ऐसी ही फिल्‍मों में एक फिल्‍म थी 'झनक झनक पायल बाजे'। 1955 में बनी यह फिल्‍म हालांकि कहानी की दृष्टि से कुछ कमजोर थी, मगर संगीत-नृत्‍य इसकी जान थी। सुप्रसिद्ध र्नतक गोपीकृष्‍ण के जीवन की यह एक अद्भुत फिल्‍म बन गई। वह प्रमुख भूमिका में थे। इस फिल्‍म को न केवल सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म, सर्वोत्तम निर्देशन तथा सर्वोत्तम कला निर्देशन का फिल्‍मफेयर अवार्ड मिला, बल्कि राष्‍ट्रपति का रजत पुरस्‍कार भी हासिल हुआ।
शांताराम की हर फिल्‍म उनकी ड्रीम प्रोजेक्‍ट होती थी, मगर 'झनक झनक पायल बाजे' के निर्माण के समय सफलता, विफलता का जो भय मन में सवार हो गया था, वह रिलीज होने के बाद ही दूर हुआ। तब उन्‍होंने कहा था, 'इस फिल्‍म का निमार्ण मेरा स्‍वप्‍न था, जिसे मैंने तन, मन, धन को पूरी तरह दांव पर लगाकर पूरा किया। अगर यह दर्शकों को पसंद नहीं आती तो मैं पूरी तरह बर्बाद हो गया होता।' इसकी सफलता को इस रूप में भी आंका जा सकता है कि मुंबई के मेट्रो सिनेमाघर में लगने वाली यह पहली हिंदी फिल्‍म थी।
इस फिल्‍म को शांताराम ने टेक्‍नीकलर में बनाने की योजना पहले ही तैयार कर ली थी। लेकिन इसके लिए काफी पैसे चाहिए थे। उस चुनौती को उन्‍होंने स्‍वीकार किया तथा इसके लिए पूरे उपकरण विदेशों से मंगवाकर अपने स्‍टूडियो में लगवाए थे। मगर तकनीशियन सभी भारतीय ही थे, जिन्‍होंने अपने परिश्रम और प्रतिभा से इस फिल्‍म को आश्‍चर्यजनक बना दिया। इसी फिल्‍म से नृत्‍य निर्देशक नामक तत्‍व का भी जन्‍म हुआ। इसके पहले उनकी कोई पहचान नहीं बनी थी। जी बालकृष्‍ण ने अपने कैमरे के सारे प्रयोग कर दिखाए। नृत्‍य निर्देशक स्‍वयं गोपीकृष्‍ण थे। पटकथा और संवाद दीवान शरर ने लिखे थे। गीत हसरत जयपुरी के थे तथा संगीत दिया था वसंत देसाई ने। कला निर्देशन किया था कनु देसाई ने। संपादक थे चिंतामन बोरकर, कलाकार थे - गोपीकृष्‍ण, संध्‍या, के दाते, मदन पुरी, मनोरमा, चंद्रकांत, मुमताज बेगम, चौबे महाराज, नाना पलसीकर, निवालकर, चमन पुरी और भगवान। राजकमल कला मंदिर की इस फिल्‍म के निर्देशक वी शांताराम थे।
इस फिल्‍म को आज भी भारतीय कला और संस्‍कृति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसकी कहानी भगवान शंकर के दरबार से शुरू होती है, जहां 'भरत नटराज' की सर्वोच्‍च उपाधि के प्रयास होते हैं। इसलिए कि शंकर को नृत्‍य कला का अधिष्‍ठाता माना गया है। यानी नटेश्‍वर हैं वह। मंगल महारा (के दाते) को 'भरत नटराज' की उपाधि हासिल है। यह उनके वंश की परंपरा बन गई है कि भारत के इस शीर्ष पुरस्‍कार को प्राप्‍त करें। चूंकि वह बूढ़े हो गए हैं, इसलिए उनकी इच्‍छा और सपना है कि इस उपाधि को उनका लड़का गिरधर (गोपीकृष्‍ण) धारण करे। वह अपने बेटे को उस योग्‍य बनाने लगते हैं। लेकिन मंगल महाराज की यह समस्‍या है कि वह कठोर अनुशासन में विश्‍वास करते हैं तथा विचार के स्‍तर पर पुरातनपंथी हैं। कला-साधना के बीच न तो हल्‍केपन को बर्दाश्‍त करते हैं और न ही गलतियों को।
गिरधर भी पिता की तरह तेजस्‍वी नर्तक हैं। एक दिन वह भी नीला (संध्‍या) नामक युवती को सस्‍ते और उत्तेजक नृत्‍य करते हुए देख लेते हैं। गिरधर इसके लिए नीला को डांटते भी हैं। मगर नीला बहुत अहंकारी लड़की है। वह गिरधर से नृत्‍य पर बहस कर बैठती हैं। गिरधर उन्‍हें जब नृत्‍य के कुछ भाव दिखाते हैं तो नीला को मान होता है कि उन्‍हें तो बहुत कुछ सीखना बाकी है। यहीं गिरधर की योग्‍यता में नीला की जिज्ञासा का प्रवेश हो जाता है। यानी एक रोमांटिक ट्रैक तैयार हो जाता है। नीला तब मंगल महाराज से प्रार्थना करती है कि वे उन्‍हें अपनी शिष्‍या बना लें। मंगल महाराज की साधना और साधक की कठोरता संबंधी सारी शर्तों को वह मान लेती हैं। मंगल महाराज उनके समर्पण और दृढ़ता को देखकर 'भरत नटराज' की प्रतियोगिता में गिरधर की नृत्‍य-सहयोगी बनने की स्‍वीकृति भी दे देते हैं।
गिरधर और नीला-दोनों की साधना के बीच प्रेम पनपने लगता है, जबकि मंगल महाराज के वंश में साधना के दौरान प्रेम के प्रवेश को हमेशा वर्जित माना जाता रहा है। भरत नटराज की उपाधि के बाद ही विवाह का अधिकार दिया जाता है। गिरधर उस मान्‍य परंपरा के खिलाफ खड़े होते दिख रहे हैं। इस बीच उस कहानी में मनी बाबू (मदन पूरी) यानी खलनायक का प्रवेश होता है। मनी बाबू काफी पैसे वाला है, जो नीला को मन ही मन प्‍यार करता है। नीला और गिरधर का साथ उसे परेशान करता रहता है। वह मंगल महाराज के कान भरने में सफल हो जाता है। मंगल महाराज छड़ी फेंकते हैं, जिससे गिरधर जख्‍मी हो जाते हैं। गिरधर के चेहरे पर दुख और पीड़ा के भाव उभरते हें, जिसे मंगल महाराज देखकर द्रवित हो जाते हैं। वह ईश्‍वर से अपने लिए क्षमा तथा गिरधर के लिए कला के प्रति सच्‍ची लगन पैदा करने का वरदान मांगते हैं। लेकिन गिरधर धीरे-धीरे नीला के मोहजाल में धंसते चले जाते हैं। इससे उनकी साधना में गतिरोध आने लग जाता है।
इस बीच मंगल महाराज महाशिव रात्रि के उत्‍सव में भाग लेने वाराणसी चले जाते हैं। लौटने पर पाते हैं कि दोनों साधना की बजाए प्रेमालाप में लीन हो गए हैं। तब वह वाराणसी से लाए घुंघरू और परंपरा से मौजूद वस्‍त्र को देकर गिरधर को वंश के सम्‍मान की रक्षा की याद दिलाते हैं। वह आग्रह करते हैं कि एक लड़की के प्‍यार के चक्‍कर में पड़कर अपने कर्तव्‍य को भूलने की कोशिश मत करो। उनके समझाने का कोई असर नहीं होता है। वह एक दिन दोनों को रोमांटिक मूड में देख लेते हैं। तब मंगल महाराज चतुराई से काम लेते हुए विश्‍वामित्र और मेनका प्रसंग पर नृत्‍य की तैयारी कराते हैं कि किस तरह मेनका ने विश्‍वामित्र की वर्षों की तपस्‍या को भंग कर दी थी। तब नीला को समझ में आता है कि उन्‍हें इंगित करके ही यह नाट्य तैयार कराया गया है। गिरधर पिता की इस रणनीति का विरोध करते हैं, जबकि नीला सोचने लगती है कि उनके कारण ही गिरधर की साधना भंग हो रही है। गिरधर के मन में नफरत पैदा करने के लिए नीला अचानक मनी बाबू के साथ चली जाती हैं। फिर वह उन्‍हें छोड़कर नदी में कूद जाती हैं। लेकिन भाग्‍य से एक साधु (नाना पलसीकर) बचा लेते हैं। मंगल महाराज, गिरधर को लेकर कहीं और चले जाते हैं। वह अपनी भूतपूर्व शिष्‍या रूपकला (चंद्रकला) को उत्‍सव में साथ नृत्‍य करने के लिए तैयार करते हैं। इस बीच नीला को उनकी नौकारानी देख लेती है। मनी बाबू भी उन्‍हें ढूंढ़ लेते हैं। मगर नीला का प्रण है कि जब तक गिरधर 'भरत महाराज' की उपाधि नहीं पा जाते, तब तक कोई भी फैसला अपने बारे में नहीं कर सकतीं। मनी बाबू भी कसम लेता है कि गिरधर को कभी भी वह उपाधि नहीं लेने देगा।
समय का चक्र ऐसा चलता है कि गिरधर की मुलाकात नीला से हो जाती है। वह नीला को साथ चलने के लिए कहते हैं। जब वह तैयार नहीं होतीं तो गिरधर उनकी हत्‍या पर उतर आते हैं। तभी मंगल महाराज वहां पहुंच जाते हैं। नीला वहां से चली जाती हैं।
काफी समय बाद 'भरत नटराज' उत्‍सव का दृश्‍य आता है। एकल नृत्‍य में गिरधर सबको पराजित कर देते हैं। लेकिन अंतिम दिन गिरधर को रूपकला के साथ तांडव नृत्‍य करना है। मनी बाबू अपनी चाल के तहत रूपकला को लालच देकर फोड़ लेता है। वह भाग जाती हैं। गिरधर परेशान हो जाते हैं। तभी नीला मंच पर उपस्थित होती हैं। गिरधर का क्रोध और बढ़ जाता है। वह त्रिशूल से उन पर हमला कर देते हैं। त्रिशूल को मंगल महाराज अपने हाथ पर झेल लेते हैं। हाथ लहूलुहान हो जाता है। नीला पर आया गुस्‍सा, तांडव में बदल जाता है। गिरधर 'भरत महाराज' की उपाधि के हकदार बन जाते हैं। मनी बाबू अपनी हार स्‍वीकार कर लेता है तथा मंगल महाराज नीला का हाथ मांगकर गिरधर के हाथों में पकड़ा देते हैं। फिल्‍म यहीं खत्‍म हो जाती है। भारत की कलात्‍मक फिल्‍मों में इसकी गिनती शीर्ष पर की जाती है।
गोपीकृष्‍ण ने अपनी वास्‍तविक नृत्‍य-प्रतिभा का जमकर प्रदर्शन किया, जो दर्शकों को आज भी याद है। नृत्‍य की अधिकांश शूटिंग मैसूर के वृंदावन गार्डन में की गई थी। जी बालकृष्‍ण की फोटोग्राफी ने प्रकृति और नृत्‍य के सौंदर्य को बखूबी कैद किया था। बालकृष्‍ण भारत के पहले सिनेमेटोग्राफर हैं, जिन्‍हें टेक्‍नीकलर में छायांकन करने का गौरव प्राप्‍त हुआ।
फिल्‍म में ग्‍यारह गीत हैं। सात गीत हसरत जयपुरी के हैं, जबकि दो गीत दीवान शरर ने लिखे हैं। एक गीत के रचियता सरस्‍वती कुमार दीपक हैं, जबकि एक मीराबाई का गीत लिया गया है। सच तो यह है कि इस फिल्‍म को सुपरहिट करने में गीत-संगीत ने जबर्दस्‍त भूमिका निभाई थी। 'नैन सो नैन नाहि मिलाओ...' और 'सैयां जाओ जाओ मोसे ना बोलो...' अमर गीतों में शामिल हो चुके हैं।
वर्ष -१९५५
निर्माण-राज कला मन्दिर
निर्देशक-वी शांताराम
कथा -संवाद-दीवान शरण
गीत-हसरत जयपुरी
संगीत-वसंत देसाई
नृत्य निर्देशक-गोपी कृष्ण
कलाकार-गोपी कृष्ण,संध्या,मदन पुरी,भगवान,मनोरमा,मुमताज़ बेगम, नाना पलसीकर
पुरस्कार
श्रेष्ठ निर्देशक-वी शांताराम
श्रेष्ठ कला निर्देशक-कानू देसाई
श्रेष्ठ फ़िल्म-वी शांताराम
श्रेष्ठ साउंड recordist -a k parmar

Monday, June 22, 2009

फिल्म समीक्षा:लेट अस डांस और पेइंग गेस्ट


-अजय ब्रह्मात्मज

सीमाओं में भी दिखती है संभावना- लेट अस डांस

आरिफ शेख की फिल्म लेट अस डांस इस मायने में प्रशंसनीय है कि पहली फिल्म होने के बावजूद उन्होंने घिसी-पिटी प्रेम कहानी नहीं चुनी। उन्होंने डांसर सुहानी के माध्यम से कुछ कर गुजरने की जिद को अच्छी तरह चित्रित किया है। फिल्म की कमजोरियां पटकथा, सेट और निर्माण में दिखती हैं। अगर निर्देशक को मजबूत समर्थन मिलता और वह पटकथा पर थोड़ा ध्यान देते तो लेट अस डांस खूबसूरत म्यूजिकल बन जाती।
सुहानी डांसर है। वह डांस स्कूल भी चलाती है। वहां वह समाज के वंचित, सड़क छाप बच्चों को डांस की ट्रेनिंग देती है। उसकी एक ही इच्छा है कि ये बच्चे डांस करें और अपनी कला का प्रदर्शन सही मंच से करें। उसका अपना भी संघर्ष है। दोनों संघर्ष विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। सुहानी किसी तरह अपने सपने साकार करने के करीब पहुंचती है तो उसे गहरा भावनात्मक और पेशागत झटका लगता है। आभास होता है कि सब कुछ बिखर गया। फिर भी वह हिम्मत नहीं हारती। नए सिरे से कोशिश करती है और आखिरकार कामयाब होती है।
सुहानी की भूमिका में गायत्री पटेल जंचती हैं। वह अच्छी डांसर हैं। नृत्य में उनकी भाव मुद्राएं और गति आकर्षित करती हैं। समान्य कद-काठी की गायत्री का सौंदर्य उनके डांसिंग स्टेप्स में दिखता है। नाटकीय और भावनात्मक दृश्यों को वह निभा ले जाती हैं। पटकथा की कमजोरी से बाकी चरित्रों का गठन नहीं हो पाया है। इस वजह से वे किरदार और उन्हें निभा रहे कलाकार कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते। किशोर उम्र के टपोरी की भूमिका निभा रहे बाल कलाकार के अभिनय में सहजता है। प्रेम कहानी पर फोकस नहीं था तो उसके ट्रैक की क्या जरूरत थी?
इस फिल्म में गीत, संगीत और कोरियोग्राफी महत्वपूर्ण है। कोरियोग्राफर ने नए स्टेप्स दिए हैं, लेकिन गीत-संगीत प्रभावशाली नहीं है। फिल्म की धुनें और बोल याद नहीं रह पाते। अंत में इतना कहा जा सकता है कि आरिफ शेख अपनी पहली फिल्म में अनेक सीमाओं के बावजूद संभावनाएं जाहिर करते हैं।
रेटिंग : **

कामेडी कम, कंफ्यूजन ज्यादा- पेइंग गेस्ट

बड़ा नाम सुना था परितोष पेंटर का। मुंबई के रंगमंच के चिर-परिचित परितोष की फिल्म पेइंग गेस्ट से उस नाम के अनुरूप ही उम्मीद थी। उम्मीद तो टूटी ही, फिल्म देखकर घोर निराशा हुई और अफसोस हुआ कि सुभाष घई की प्रोडक्शन टीम को क्या हो गया है? उनकी टीम अच्छी स्क्रिप्ट क्यों नहीं चुन पा रही है?
आवास की समस्या से परेशान युवकों में से दो लड़की का रूप धारण कर दंपती बन जाते हैं और एक मकान में रहने लगते हैं। आवास की यह समस्या हम गोलमाल और गोलमाल रिट‌र्न्स में ज्यादा मनोरंजक अंदाज में देख चुके हैं। और फिर नए लड़कों के बीच जावेद जाफरी पूरी तरह मिसफिट लगते हैं। हंसाने का जानी लीवर का घिसा-पिटा तरीका अब ऊब पैदा करता है। असरानी और पेंटल को हमारे निर्देशक कुछ नया दे ही नहीं पाते। गौरतलब है कि पेंटल एफटीआईआई में अभिनय के शिक्षक हैं।
पूरी फिल्म बैंकाक में शूट की गई है। पृष्ठभूमि की आधुनिक भव्यता तभी सुंदर लगती है, जब सामने चल रहा ड्रामा दर्शनीय हो। पेइंग गेस्ट में कामेडी कम, कंफ्यूजन ज्यादा है।
रेटिंग :*

Saturday, June 20, 2009

हिन्दी टाकीज:भागकर फिल्‍म देखने का मजा कुछ और था-अंजलि कुजूर


हिन्दी टाकीज-4

अंजलि कुजूर स्‍कूल में पढ़ाती हैं। अखबारों में लिखती हैं और भरपूर जिंदगी जीती हैं। उनसे बहस करने के किसी को भी बाद अपने आप शक हो सकता है। उनके छात्र उनसे डरते हैं, मगर unhen अफसोस है कि उनका इकलौता बेटा हर्ष उनसे बिल्‍कुल नहीं डरता।



बचपन में कितनी फिल्‍में देखी याद नहीं लेकिन कॉलेज में अपनी दोस्‍त के साथ जो फिल्‍म देखी, उसे आज तक नहीं भूल पायी। मेरी वह प्‍यारी दोस्‍त नेपाल की रहने वाली थी। कॉलेज में मैं और मेरी दोस्‍त अपनी दोस्‍ती के लिए सभी के बीच जाने जाते थे।
हमारी रुचि और रहन-सहन को देखकर हमारे प्रोफेसर हमेशा कहा करते थे -'यह जोड़ी गजब की है, एक पूरी तरह देशी और एक बॉर्डर पर की, फिर भी क्‍या दोस्‍ती है। हम साथ-साथ क्‍लास करते घूमते, चाट और गोलगप्‍पे खाते। सचमुच वह बहुत प्‍यारे दिन थे। खैर, बात फिल्‍म की। एक दिन हमने तय किया कि क्‍लास बंद करके फिल्‍म देखी जाये। उस समय मैं किसी खास हीरो-हीरोइन के फैन नहीं थी। पर मेरी दोस्‍त जूही चावला की बहुत बड़ी फैन थे। उसके पास जूही चावला के ढेरों फोटोग्राफ्स थे, जिसे वो सारे दोस्‍तों को दिखाया करती थी। तो तय हुआ। ' हम हैं राही प्‍यार के' देखी जाये। फिल्‍म में जूही के पिताजी उसकी शादी अपनी जाति के (मद्रासी) लड़के से तय कर देते हैं। जूही को लड़का पसंद नहीं आने के कारण वो भाग कर मेले में चली जाती है। वहां से उसे तीन बच्‍चे अपने मामा (आमिर खान) के घर ले आते हैं। तब शुरू होती है फिल्‍म की असली कहानी। साथ रहते हुए जूही और आमिर खान एक-दूसरे से प्‍यार करने लगते हैं। पर आमिर की कंपनी एक सेठ के हाथें गिरवी है, जिसकी बेटी आमिर को पसंद करती है और उससे शादी करना चाहती है। मुझे वह सीन अब भी याद है जब जूही परेशान होती है। उसकी परेशानी देखकर मेरी दोस्‍त भी रो पड़ी थी। बड़ी मुश्किल से मैंने उसे चुप कराया था। यह क्रम सिनेमा हॉल में कई बार दोहराया गया। कहा जा सकता है कि मेरा समय फिल्‍म देखने में कम और उसे चुप कराने में ज्‍यादा बीता था। हाल यह था कि फिल्‍म के खत्‍म होते-होते मेरी दोस्‍त की आंखें रोते-रोते पूरी तरह से लाल हो चुकी थीं। हालांकि वह कामेडी फिल्‍म थी। मुझे यह सोचकर और हंसी आ रही थी कि यह लड़की उदास कर देने वाली ट्रेजेडी फिल्‍में कैसे देखती होगी।
दूसरे दिन कॉलेज पहुंचकर इस किस्‍से को दोस्‍तों के सामने बयां की तो सभी खूब हंसे। पर हमारी मस्‍ती की यह कहानी तब क्‍लाइमेक्‍स पर पहुंची जब प्रोफेसर ने हम दोनों से पिछले क्‍लास से संबंधित प्रश्‍न पूछे। जवाब नहीं मिलने पर बुरी तरह डांटा। हमें डांट सुनते देख सभी के चेहरों पर हंसी आ रही थी। हमें बाद में पता चला कि प्रोफेसर ने हमें कॉलेज के गेट से बाहर जाते पहले ही देख लिया था। बहरहाल इस डांट का असर ये हुआ कि हमने दोबारा क्‍लास मिस कर कभी फिल्‍म न देखने की कसम खायी। लेकिन उन दिनों फिल्‍मों का मोह ऐसा था कि जल्‍दी ही यह कसम टूट गयी।
उन दिनों मैं हजारीबाग के एक हॉस्‍टल में रहकर पढ़ाई कर रही थी। हॉस्‍टल की हेड एक सिस्‍टर थी। हास्‍टल की लड़कियों पर कड़ी नजर रखी जाती थी। किससे मिलना है, कब मिलना है, यह सब सिस्‍टर तय करती थी। कहीं आने-जाने का समय निश्चित था। अनुशासन तोड़ने का मतलब था कड़ी सजा की भागीदार बनना।
लेकिन कॉलेज के दिनों में घर से बाहर यदि लड़कियां एक साथ रहें तो शैतानियां और बदमाशी न हो, यह नामुमकिन जैसा है। ऐसे में हमारा मन सिनेमा देखना किसी बड़े युद्ध को जीतने के बराबर था। लेकिन उन दिनों भागकर सिनेमा देखने का रोमांच ही अलग था। बल्कि सिनेमा देखने का कम और किसी की नजरों से बचने का रोमांच ही अलग था। बल्कि सिनेमा देखने का कम और किसी की नजरों से बचने का आनंद अधिक आता था। हम लड़कियां अक्‍सर भागकर फिल्‍म देखने चली जातीं और चुपचाप चली आतीं। सिस्‍टर को किसी ने इसके बारे में बता दिया था। लेकिन रंगे हाथों नहीं पकड़ पाने के कारण वह काई कार्यवाही नहीं कर पाती थी। कई तरह की वार्निंग दी जाती पर हम लड़कियां आदत से बाज नहीं आतीं। एक दिन तय हुआ कि शाहरुख खान की सुपरहिट फिल्‍म देखी जाए। हम तय समय पर एक-दो, एक-दो करके निकले ताकि किसी को खबर न हो। रात में ही बीस लड़कियों के पैसे जमा कर लिये गये। तय यह हुआ कि एक लड़की टिकट कटा लेगी और बाकी हम सब तय समय और स्‍थान पर मिलेंगे। सब कुछ योजनानुसार हो रहा था। हम सब निश्चित जगह जमा हो कर फिल्‍म हॉल में घुस भी गये। लड़कियां हल्‍ला करने, कमेंट करने में लड़कों से पीछे नहीं थीं। तीन घंटे खूब मस्‍ती में बीते। फिल्‍म खत्‍म होने पर हम लड़कियों का झुंड हंसते-खिलखिलाते बाहर निकलने लगा। उस हॉल में अंदर जाने का एक दरवाजा था और बाहर निकलने का एक। उस दरवाजे से बाहर आने पर हमारे होश उड़ गये। हेड सिस्‍टर वहां हमारे स्‍वागत में पहले से खड़ी थी।
हम सब की हालत खराब। मुंह लटकाये हम एक-एक कर बाहर निकलते जाते और सिस्‍टर हमारा नाम नोट करती जाती। शायद सिस्‍टर को गुप्‍त सूत्रों से हमारे फिल्‍मी कार्यक्रम के बारे में पता चल गया था। आखिर उस दिन हम रंगे हाथों पकड़े गये। उसके बाद सिस्‍टर ने हमारी क्‍या दुर्गति की, उसे यहां नहीं किया जा सकता।


पसंद की दस फिल्‍में -
1.मैं हूं ना
2.कहो ना प्‍यार है
3.गाइड
4.कुछ कुछ होता है
5.शोले
6.बागबान
7.जब वी मेट
8.शूट आउट एट लोखंडवाला
9.ओंकारा
10.चक दे इंडिया

Friday, June 19, 2009

दरअसल:दर्शकों को क्या मिला?

-अजय ब्रह्मात्मज

मीडिया और फिल्म इंडस्ट्री में खुशी है कि मल्टीप्लेक्स और निर्माता-वितरकों के बीच लाभांश को लेकर चल रहा विवाद समाप्त हो गया। मल्टीप्लेक्स के मालिकों ने आखिर निर्माता-वितरकों की मांग मानी। ऊपरी तौर पर निर्माता और वितरक फायदे में रहे, क्योंकि उन्होंने अपने लाभांश के प्रतिशत बढ़वा लिए। मल्टीप्लेक्स के मालिकों को यही संतुष्टि है कि उन्होंने निर्माता-वितरकों की मांग को शत-प्रतिशत नहीं माना। उन्होंने अपनी तरफ से उसे कम किया। इस विवाद और लड़ाई में एक-दो बार दर्शकों से जुड़े मामले जरूर उठे, लेकिन अंतिम सहमति के समय उन मामलों पर कुछ नहीं कहा गया। विवाद के समय मल्टीप्लेक्स के मालिकों ने फिल्म की क्वालिटी पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि निर्माताओं को अच्छी फिल्मों के निर्माण पर जोर देना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा दर्शक फिल्मों को देखने आएं। दूसरी तरफ निर्माताओं ने सवाल उठाया था कि मल्टीप्लेक्स मालिकों को टिकट रेट कम करना चाहिए। टिकटों की कीमत कम होगी, तो मल्टीप्लेक्स में ज्यादा दर्शक आएंगे। दोनों ही तरफ से उठाए सवाल वास्तव में दर्शकों की संख्या और फिर बिजनेस बढ़ाने के मुतालिक थे, लेकिन वे दर्शकों के हित में थे। अच्छी क्वालिटी की फिल्में मिलें और टिकटों की कीमतें कम हो जाएं, तो दर्शकों को फायदा होगा। फिलहाल इस संदर्भ में दोनों पक्षों में किसी ने कोई संकेत नहीं दिया है। हां, अच्छी क्वालिटी की फिल्मों के बारे में आमिर खान और शाहरुख खान ने कहा था कि कोई भी निर्माता-निर्देशक जानबूझ कर बुरी फिल्में नहीं बनाता। कोई भी यह नहीं तय करता कि चलो एक बुरी फिल्म बनाते हैं। टिकटों की कीमत कम करने के मामले में मल्टीप्लेक्स मालिकों का कहना था कि उनके लिए सभी सुविधाओं के साथ फिल्में दिखाना महंगा व्यापार है। अगर वे टिकटों की कीमत कम करेंगे, तो उन्हें नुकसान होगा।
छोटे शहर और कस्बों के थिएटरों में टिकट की कीमत हर फिल्म के साथ नहीं बदलती। मल्टीप्लेक्स में फिल्म के प्रति दर्शकों की जिज्ञासा को देखकर मल्टीप्लेक्स मालिक कीमत बढ़ा देते हैं। गजनी और रब ने बना दी जोड़ी की टिकटें ऊंची कीमतों पर बेची गई। उसी तरह चांदनी चौक टू चाइना की भी कीमत बढ़ाई गई थी, लेकिन फिल्म के प्रति दर्शकों के उदासीन रवैए को देखते हुए फिर से कीमतें घटा दी गई। मल्टीप्लेक्स मालिकों ने दर्शकों के प्रोफाइल को अच्छी तरह समझ लिया है। वे महानगरों में कार्यरत युवा प्रोफेशनल के वीकएंड मनोरंजन की भूख को समझ चुके हैं। अगर आप मल्टीप्लेक्स में शनिवार-रविवार की भीड़ का मुआयना करें, तो समझ जाएंगे कि युवा दर्शकों की संख्या भरपूर रहती है। ऊंची कमाई और महानगरों की अकेली जिंदगी में मॉल और मल्टीप्लेक्स उनकी वीकएंड गतिविधि का अनिवार्य हिस्सा बन गए हैं। वे अब एक दिन पहले के प्रिव्यू शो के लिए भी मोटी रकम दे रहे हैं। गजनी ने अपने प्रिव्यू शो से ही आरंभिक कमाई कर ली थी।
65 दिनों के गतिरोध और मनोरंजन का कृत्रिम अकाल लाने के बाद भले ही निर्माता-वितरक और मल्टीप्लेक्स परस्पर सहमति से फिल्मों की रिलीज के लिए तैयार हो गए हों, लेकिन सच्चाई यह है कि इस विवाद और गतिरोध में दर्शकों का खयाल नहीं रखा गया। फिल्म इंडस्ट्री मल्टीप्लेक्स संस्कृति के प्रभाव में देसी दर्शकों से पहले ही बेपरवाह हो चुकी है। अब वे महानगरों के अमीर दर्शकों के साथ भी मनमाना व्यवहार कर रहे हैं। दर्शक अभी तक नुकसान में हैं। निर्माताओं को जरूर फायदा हुआ। उनके लाभांश के प्रतिशत बढ़ गए, लेकिन दर्शकों की जेब तो वैसे ही खाली होती रहेगी। क्या अब दर्शकों को अपनी मांग के लिए हड़ताल पर जाना पड़ेगा? मुमकिन है दर्शकों के बीच से ऐसा अभियान शुरू हो, वे मल्टीप्लेक्स के शो का बहिष्कार आरंभ करें। तभी मल्टीप्लेक्स के मालिक और निर्माता-वितरक उनकी सुधि लेंगे।

Thursday, June 18, 2009

रोचक:एक पोस्टर के सहारे बनाई थी रामू ने ' . . .आग'

-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म बनाने के अपने पैशन की ..आग में झुलसे राम गोपाल वर्मा अभी तक उबर नहीं पाए हैं। वे खुद ही अपना मजाक उड़ाते हैं और राम गोपाल वर्मा की आग को अपनी बड़ी भूल मानते हैं, लेकिन साथ में जोड़ते हें कि ..आग ने भी दर्शकों का मनोरंजन किया। फिल्म देखकर निकले दर्शकों ने गुस्सा निकाला और नाराजगी जाहिर की। वर्मा मानते हैं कि यह भी तो एक प्रकार का इमोशन है। फिल्म क्या करती है, वह आपके इमोशन को जगाती है। मैंने भी ..आग से एक इमोशन जगाया। बहरहाल, आप जानना चाहेंगे कि उस फिल्म की भूल कैसे कर बैठे रामू? रामू के शब्दों में ही पूरा किस्सा सुनें। कुछ सालों पहले मुझे जीपी सिप्पी के पोते साशा सिप्पी का फोन आया था। उन्होंने सबसे पहले पूछा कि क्या आप शोले को फिर से बनाना चाहेंगे? शोले मेरी पसंदीदा फिल्म है, इसलिए मैंने तुरंत हां कहा और उनसे मिलने शहर चला गया। साशा ने एक स्कि्रप्ट भी तैयार कर रखी थी। उन्होंने बताया कि महबूबा ़ ़ ़ गाने के बाद गब्बर सिंह उस जिप्सी लड़की के साथ हमबिस्तर होता है। उसके बेटे का जन्म होता है, जो जूनियर गब्बर बनता है। वीरू और बसंती की शादी हो जाती है। उनके जुड़वा बेटे होते हैं। ये जुड़वां बेटे ठाकुर की बहू राधा से मिलने जाते हैं। गांव में जूनियर गब्बर उनका अपहरण कर लेता है। इस कहानी के ढांचे पर साशा शोले को नए अंदाज में सोच रहे थे। मुझे उनकी कहानी ज्यादा पसंद नहीं आई। शहर से लौटते समय दो घंटों की ड्राइविंग में मैंने शोले के बारे में सोचना शुरू किया। मैंने सोचा कि अगर उसे शहर में फिल्मांकित किया जाए तो सारे कैरेक्टर कैसे बदल जाएंगे? शोले फिल्म के चिर-परिचित संवादों को पूरा बोलने के बजाए एक-दो शब्दों में ही कह दिया जाए तो क्या इंपैक्ट होगा? मैंने जिन लोगों से इसे शेयर किया, सभी ने मेरी सोच को माइंड ब्लोइंग और फैंटेस्टिक कहा। फिल्म की योजना बन गई। एक उत्साही डिजाइनर ने फिल्म का पोस्टर डिजाइन कर लिया। उसने गब्बर सिंह को नए अंदाज में पेश किया। उसका तर्क था कि मेरी फिल्म में लिजेंड बन चुके गब्बर सिंह का फंतासी रूप होना चाहिए। मुझे उसका पोस्टर अधिक पसंद नहीं आया। मगर पहली बार पोस्टर देख रहे वहां मौजूद सात व्यक्तियों ने पोस्टर की खूब तारीफ की। उसे माइंड ब्लोइंग कहा। मैंने अपनी मूल योजना छोड़ दी और उनके प्रभाव में पोस्टर के मोह में फंस गया। मैंने पोस्टर के गब्बर सिंह की छवि पर पूरी फिल्म केंद्रित कर दी। वह पोस्टर लेकर मैं अमिताभ बच्चन के पास गया। उनकी राय ली तो उन्होंने भी माइंड ब्लोइंग कहा। शायद वे मेरी कोशिश और सोच को माइंड ब्लोइंग कह रहे थे। वे इस गलतफहमी में थे कि मैंने फिल्म के बारे में सोच रखा होगा और उनके किरदार के प्रति मेरा अपना एक विजन होगा। ऐसी कोई बात नहीं थी। हम सभी को पोस्टर ने बहका रखा था.हम सभी अपनी मूल योजना और राह से भटक चुके थे.उसी पोस्टर के हिसाब से फ़िल्म बनी.फ़िल्म का जो हश्र हुआ,उस से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ.मुझे आश्चर्य इस बात पर हुआ की कैसे सभी पोस्टर के बहकावे में आ गए और किसी ने मुझे उस '...आग' में झुलसने से नहीं रोका।
'राम गोपाल वर्मा की आग' का यह रोचक किस्सा है,लेकिन वे सात व्यक्ति कौन थे? शायद रामू कभी उनके बारे में अपने ब्लॉग पर लिखें.

Tuesday, June 16, 2009

दरअसल:हर भावना स्वार्थ से प्रेरित नहीं होती

-अजय ब्रह्मात्मज

पहले अमिताभ बच्चन, फिर आमिर खान और बाद में मधुर भंडारकर ने आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे नस्लवादी हमलों की निंदा की है। सभी ने अपने ब्लॉग और स्तंभ में कड़े शब्दों में विरोध दर्ज किया और अपनी भावनाएं व्यक्त करने में कोताही नहीं बरती। इसका असर हुआ। एक तो इन हस्तियों के उल्लेख के जरिए देश के नागरिक इसके प्रति जागरूक हुए। उन्होंने इस तरफ ध्यान दिया। इसके अलावा आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि नस्लवादी आक्रमणकारियों से निबटने के साथ भारतीय छात्रों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया जाएगा। आस्ट्रेलिया के क्रिकेटर ब्रेट ली ने अपने देशवासियों से अपील की है कि वे ऐसे नस्लवादी व्यवहार से बचें।
मीडिया में कुछ लोगों ने बिग-बी और आमिर की बातों का मखौल उड़ाते हुए लिखा है कि इन स्टारों ने चर्चा में बने रहने के लिए इस मुद्दे पर स्टैंड लिया। आमतौर पर सेलिब्रिटी की कोशिश, मंतव्य और इरादों के पीछे सबसे पहले हम उनके निहित स्वार्थ ही खोजते हैं। समाज में ऐसी धारणा बन गई है कि बगैर निजी स्वार्थ के फिल्मों से जुड़े लोग न मुंह खोलते हैं, न कदम बढ़ाते और न सक्रिय होते हैं। इस धारणा के पीछे उनका पिछला व्यवहार होता है। खासकर हमारे हिंदी फिल्मों के स्टार सामाजिक मुद्दों पर अपनी खामोशी को राजनीतिक दृष्टि से उपयुक्त मानते हैं। हां, कोई हादसा हो जाए, तो वे मुखर होते हैं, क्योंकि वहां व्यक्तिगत राजनीतिक सोच से अधिक व्यापक चिंताएं काम कर रही होती हैं और उन पर विवाद की संभावनाएं नहीं बनतीं। उन मुद्दों पर दुविधा या दो राय की संभावना नहीं रहती। आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे हमले की ही बात करें, तो हर भारतीय इसका विरोध करेगा। स्टारों को भी ऐसे मुद्दों पर बोलने में दिक्कत नहीं होती। हमारे फिल्म स्टार किसी विवादास्पद मुद्दे पर अपनी राय नहीं रखते। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, यहां तक कि इंडस्ट्री की समस्याओं पर भी अपनी बात कहने से वे हिचकते हैं। करीबी संपर्क होने पर अगर वे कुछ कहें भी, तो तुरंत यह बताना नहीं भूलते कि भाई, यहां ऑफ द रिकॉर्ड बोल रहा हूं। उनकी इसी सोच के कारण यह धारणा बन गई है कि बगैर स्वार्थ के वे कुछ नहीं बोलते।
ताजा संदर्भ में गौर करें, तो बिग-बी ने क्वींस्लैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी से मिल रही डॉक्टरेट की मानद उपाधि लेने से इनकार किया है। यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने उनकी भावनाओं की कद्र करते हुए दोहराया कि अभी नहीं, तो भविष्य में वे इस उपाधि को ग्रहण करें, क्योंकि इससे दोनों देशों के संबंध मजबूत होंगे। गौर करें, तो बिग-बी अपनी लोकप्रियता के कारण देश के ऐसे प्रतिनिधि हो गए हैं कि दूसरे देशों में भी लोग जानते-पहचानते हैं। उन्हें ऐसी उपाधियां देकर संस्थान, समूह और देश अमिताभ बच्चन के प्रशंसकों को संतुष्ट करते हैं। भारतवंशियों और आप्रवासियों को गर्व का अहसास होता है कि उनके देश के एक कलाकार को सम्मान मिल रहा है। यहीं अमिताभ बच्चन की अस्वीकृति और असहमति महत्वपूर्ण हो जाती है। उनकी अस्वीकृति ने आस्ट्रेलिया और भारत को जागरूक किया। हमें अपने फिल्म कलाकारों की इस भावना पर गर्व करने के साथ उन्हें अपना समर्थन भी देना चाहिए।

Saturday, June 6, 2009

फ़िल्म समीक्षा:अनुभव और मारुति मेरा दोस्त

-अजय ब्रह्मात्मज
कमजोर और सतही अनुभव
निर्देशक राजीव नाथ ने एक नए विषय पर फिल्म सोची, लेकिन पटकथा और निर्वाह में वे घिसे-पिटे तरीके से नहीं बच सके। अनुभव पुरुष यौनवृत्ति पर केंद्रित फिल्म है। महानगरों में असंतुष्ट और यौनपिपासु औरतें मोटी रकम देकर अपनी क्षुधा शांत करती हैं। बड़े शहरों में पुरुष यौनवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। कभी मजबूरी में तो कभी आसानी से धन कमाने की लालसा में युवक इस राह पर चल पड़ते हैं। ऐसे युवकों को जिगोलो कहा जाता है।
थिएटर आर्टिस्ट अनुभव फिल्मों में काम पाने की उम्मीद में संघर्ष कर रहा है। उसे शुरू में टीवी सीरियल में मौका मिलता है। वहां एक उम्रदराज अभिनेत्री उस पर डोरे डालती है। अनुभव उसका शिकार होने से बच जाता है, लेकिन कुछ समय बाद वह पारिवारिक मुसीबतों के कारण जिगोलो बनना स्वीकार करता है। इस द्वंद्व भरी जिंदगी में वह अपनी बीवी से कटा-कटा रहने लगता है। बीवी के सामने जब भेद खुलता है तो वह सन्नाटे में आ जाती है। बाद में दोनों की जिंदगी सुधर जाती है और बताया जाता है कि पांच साल बाद अनुभव हिंदी फिल्मों का सुपरस्टार बन गया।
फिल्म के अंत को लेकर एक सवाल उठता है कि अगर पत्नी ने ऐसी ही मजबूरी में वेश्यावृत्ति की होती तो क्या उसका पति उसे सहज ढंग से स्वीकार कर लेता? हिंदी फिल्म के पर्दे पर दर्शकों को ऐसी नायिका मजबूरी के बावजूद स्वीकार नहीं होती। जिगोलो बनने की मजबूरी और उनकी दुनिया को निर्देशक ने सतही अंदाज में चित्रित किया है। यह बात भी खलती है कि मशहूर उद्योगपति की बेटी एक संघर्षशील एक्टर से शादी कर सामान्य जिंदगी जीने लगती है, लेकिन उसके पिता उसकी कोई खैर-खबर नहीं लेते।
अनुभव के मित्र के रूप में आदि के किरदार को ढंग से विकसित नहीं किया गया है। वह अनुभव के विवेक के रूप में बार-बार सामने आता है। इन कमियों की वजह से फिल्म लचर हो जाती है। हां, संजय सूरी और गुल पनाग ने अंतिम दृश्य में अपनी मजबूरियों और असहायता के एहसास को प्रभावी तरीके से व्यक्त किया है। दोनों कलाकारों को बेहतर स्क्रिप्ट और डायरेक्टर मिले तो वे बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
थोड़ी श्रद्धा, थोड़ा स्पेशल इफेक्ट मारुति मेरा दोस्त
लाइव और एनीमेशन में श्रद्धा और आस्था को जोड़ कर मनोरंजन की चाशनी देने में निर्देशक माणिक्य राजू विफल रहे। उन्होंने मारुति यानी भगवान हनुमान के प्रति हिंदू श्रद्धालुओं में व्याप्त श्रद्धाभाव को फिल्म का विषय बनाया है। फिल्म में कंप्यूटरजनित विशेष प्रभाव का इस्तेमाल किया गया है। सारी कोशिशों के बावजूद बाल दर्शकों का मनोरंजन करने के उद्देश्य से बनी यह फिल्म निराश करती है।
गांव में पली-बढ़ी रामेश्वरी अपने जीवन के प्रसंग सुनाती है। वह बताती है कि कैसे भगवान हनुमान ने दोस्त बन कर उसकी रक्षा की। उन्होंने रामेश्वरी के परिवार को दुष्ट आत्माओं और दानवों से बचाया। एक स्तर पर भक्तों के प्रति भगवान हनुमान की सदाशयता दिल को छूती है, लेकिन निर्देशक ने बड़े ही फार्मूलाबद्ध तरीके से दुष्टों को खड़ा किया है। उनमें फिल्मी खलनायकों के सारे अवगुण हैं। बच्चों की फिल्म में अच्छे-बुरे के संघर्ष को बड़ों के नजरिए से पेश किया गया है। रामेश्वरी के दोस्त मारुति के रूप में हनुमान का मानवीकरण नए सोच को दर्शाता है, किंतु शेष चित्रण में निर्देशक लकीर के फकीर ही रहते हैं। इस फिल्म को यू-ए सर्टिफिकेट मिला है। ऐसी फिल्म बच्चों के निमित्त कैसे हो सकती है। विशेष प्रभाव और सीजी इफेक्ट की बात करें तो दानवों की कल्पना में एनीमेटर नए प्रयोग करते हैं, जबकि हनुमान आदि मिथकीय चरित्रों में वे अधिक फेरबदल नहीं कर सकते। इस वजह से दुष्ट दानव ज्यादा आधुनिक, तकनीकी रूप से दक्ष और आकृति-प्रकृति में भिन्न नजर आते हैं, जबकि देवी-देवता कैलेंडर आर्ट की वेशभूषा और भंगिमा से आगे नहीं बढ़ पाते।

Friday, June 5, 2009

हिंदुस्तान के लोगों अब तो मुझ को पहचानो..


-अजय ब्रह्मात्मज

छियासठ साल पहले 1943 में गजाभाऊ नामक मराठी फिल्म आई थी। उसमें लता मंगेशकर ने पहला हिंदी गीत हिंदुस्तान के लोगों अब तो मुझ को पहचानो.. गाया था। गीत के शब्दों में लता की प्रतिभा की धमक थी। तब से उनकी गायकी का अनुसरण करें, तो हिंदी फिल्मों के पा‌र्श्व गायन के पचास वर्षो का स्वर्णिम इतिहास समझा जा सकता है। इन वर्षो की समयावधि के केंद्र में लता मंगेशकर रही हैं। लता मंगेशकर- इन हर ओन वॉयस में नसरीन मुन्नी कबीर ने उनसे बातचीत के जरिए इस समयावधि में सक्रिय संगीतकार, गीतकार, गायक, फिल्मकार के साथ अभिनेता-अभिनेत्रियों की भी झलक दी है। हां, हम लता मंगेशकर के दृष्टिकोण से ही उन्हें देखते और समझते हैं।
बातचीत के जरिए प्रसिद्ध हस्तियों के जीवन का साक्षात्कार मुश्किल और धैर्यपूर्ण काम है। नसरीन ने इसके पहले जावेद अख्तर से बातचीत कर टॉकिंग फिल्म्स और टॉकिंग सॉन्ग्स पुस्तकें प्रकाशित की हैं। ऐसी महत्वपूर्ण बातचीत बोझिल नहीं होती। लगता है कि बातचीत कर रहा व्यक्ति अपने साथ अतीत की गलियों में लोगों को घुमा रहा है और हम-आप उन कोनों, झरोखों, स्थानों और व्यक्तियों से परिचित हो रहे हैं, जिसने उन्हें गढ़ा। इस किताब में लता के उत्तरों में ही उनकी यात्रा और उपलब्धियों की सारी जानकारियां मिल जाती हैं। साथ ही उनसे जुड़ी भ्रांतियां भी स्पष्ट होती जाती हैं। लता के व्यक्तित्व और गायन को समझने के लिए यह जरूरी किताब है।
बातचीत के क्रम में लता मंगेशकर के अथक अध्यवसाय की सूचनाएं मिलती हैं। छोटा सा उदाहरण लें। दिलीप कुमार ने मराठी माणुस होने के कारण लता मंगेशकर के उर्दू उच्चारण के प्रति संशय व्यक्त किया था। लता को तकलीफ जरूर हुई थी, लेकिन बुरा मानने और दुखी होने के बजाए उन्होंने उस्ताद रखकर उर्दू सीखी और अपना उच्चारण ठीक किया। उन्होंने संगीतकारों की सिखाई-समझाई बातों पर अमल किया। लता मंगेशकर आज से पचास साल पहले ही श्रेष्ठ गायिका थीं। वे चाहतीं, तो इसके प्रभाव में रह सकती थीं। हम इस बातचीत में पाते हैं कि उन्होंने कभी रुकने का नाम नहीं लिया। विषम स्थितियों में भी वे सकारात्मक भाव से जूझती रहीं। सिर्फ उनके पहनावे में ही नहीं, विचार में भी सादगी है। वे सफेद साड़ी पहनती हैं और उनका मन भी सफेद है। उनमें किसी और के प्रति कोई दुराग्रह या नकारात्मक भाव नहीं है। कुछ भी काला नहीं है उनकी सोच में।
सामान्य तौर पर हिंदी फिल्मों के प्रेमियों और विशेषकर हिंदी फिल्म संगीत के प्रेमियों के लिए पुस्तक का अध्ययन रोचक और प्रेरक होगा। युवा गायक और संगीतकार प्रेरणा ले सकते हैं। गरीबी और जिम्मेदारी का जीवन जीते हुए लता कभी अपने ध्येय से विचलित नही हुई। यही कारण है कि वे लंबे समय तक शीर्ष पर विराजमान रहीं। उन्हें दुनिया भर के सम्मानों से सम्मानित किया गया। उनके विरोध में कुछ भी सुनाई नहीं पड़ता। कुछ लोग मानते हैं कि हर व्यक्ति की कामयाबी दांवपेंच होती है। वे सभी कामयाब व्यक्तियों की कमी, खामी और खराबियों की खोज में लगे रहते हैं। लोग ऐसा कहते हैं कि लता स्वयं अपनी बहन आशा भोंसले से प्रतिद्वंद्विता महसूस करती थीं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया है कि ऐसा कुछ भी नहीं था।
संगीत की विभूति लता जी नई प्रतिभाओं का उल्लेख करती हैं। वे आमिर खान को अपना मित्र मानती हैं, तो सुनिधि चौहान की प्रशंसा करती हैं। उनके शब्दों में नए संगीतकारों के प्रति सम्मान है, तो समकालीन लोग और गुरुओं के प्रति श्रद्धा। पुस्तक पढ़ने पर स्पष्ट हो जाता है कि वे सभी के प्रति कोमल और सुरीला भाव रखती हैं। निश्चित ही इस लंबी बातचीत के लिए नसरीन मुन्नी कबीर बधाई की पात्र हैं।

दो तस्वीरें:अमिताभ बच्चन




पिछली बार दो तस्वीरें चवन्नी के पाठकों को भा गयीं.लिहाजा फिर से दो तस्वीरें...इस बार अमिताभ बच्चन.उनकी ये तस्वीरें पा और अलादीन फिल्मों की हैं.इस उम्र में यह जोश..अमिताभ बच्चन बहुरुपिया हैं वास्तव में..और हाँ...आप की प्रतिक्रियाओं का स्वागत है...

Monday, June 1, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा ने बिगाड़ दिया - रघुवेन्द्र सिंह


हिन्दी टाकीज-३९

रघुवेंद्र के दोनों हाथ जेब में रहते हैं और आँखें बात करते समय चमकती रहती हैं.उनके व्यक्तित्व की कोमलता आकर्षित करती है.वे फिल्मों को अपनी प्रेयसी मानते हैं और उसकी मोहब्बत में मुंबई आ चुके हैं.वे पत्रकारिता से जुड़े हैं और फ़िल्म इंडस्ट्री की मेल-मुलाकातों में उनका मन खूब रमता है.अपने बारे में वे लिखते हैं...राहुल सांकृत्यायन एवं कैफी आजमी जैसी महान साहित्यिक हस्तियों की जन्मभूमि आजमगढ़ में पैदाइश। आधुनिक शिक्षा के लिए अम्मा-पापा ने इलाहाबाद भेजा और हम वहां सिनेमा से प्रेम कर बैठे। वे चाहते थे कि हम आईएएस अधिकारी बनें, लेकिन अपनी प्रेयसी से मिलने की जुगत में हम फिल्म पत्रकारिता में आ गए। आजकल हम बहुत खुश हैं। अपनी प्रेयसी के करीब रहकर भला कौन खुश नहीं होगा? उनका पता है raghuvendra.s@gmail.com
'बाइस्कोप देखकर बच्चे खराब हो जाते हैं।' मेरे कलकतिहवा बाबा (कलकत्ता रिटर्न) हमेशा यह बात कहा करते थे। उनकी यह बात छोटे बाबा, आजी, चाचा, पापा और आधुनिक सोच रखने वाली मेरी अम्मा के मस्तिष्क में भी बैठ चुकी थी। यह वजह है कि हमारे घर के किसी भी सदस्य, चाहे वह बच्चे हों या बड़े, को बाइस्कोप देखने की छूट नहीं थी। लड़कियों को तो बिल्कुल ही नहीं। मैं आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) के बगहीडाड़ गांव में पला-बढ़ा हूं। सन् 1991-92 की बात है। मुझे अच्छी तरह याद है, पूरे गांव में एकमात्र मेरे घर पर टीवी था। वह ब्लैक एन व्हाइट था। वह टीवी केवल उसी वक्त स्टार्ट किया जाता था, जब समाचार आ रहा होता था या फिर कोई धार्मिक या देशभक्ति सीरियल। टीवी घर से बाहर बैठक में लगाया गया था। ताकि घर की औरतें कोई कार्यक्रम न देख सकें। टीवी देखने से आंखें खराब हो जाती हैं और सबकी आदतें भी। समय की बर्बादी तो होती ही है। यह कलकतिहवा बाबा कहते थे। हां, कोई बढिय़ा बाइस्कोप आता था तो कलकतिहवा बाबा खुद ही घर की औरतों और बच्चों को बुलवा लेते थे। बढिय़ा बाइस्कोप से उनका तात्पर्य यह था जिसे सपरिवार देखा जा सके। उनमें धार्मिक एवं पारिवारिक बाइस्कोप के नाम आते थे। हीरो-हीरोइन के रोमांस एवं मार-धाड़ वाला बाइस्कोप देखने की इजाजत बिल्कुल नहीं थी।
मेरे मंझले चाचा की बेटी वंदना गोरखपुर में अपने मामा के यहां रहकर पढ़ाई करती थीं। वे मुझसे चार साल बड़ी हैं। उस वक्त मैं उनका सबसे प्यारा भाई और दोस्त हुआ करता था। दीदी के हिसाब से उनके मामा-मामी आधुनिक थे, क्योंकि वे लोग फिल्में देखना बुरी बात नहीं मानते थे। मैंने दीदी से अप्रत्यक्ष रूप से सीखा कि बाइस्कोप को फिल्में भी कहते हैं। अब मैं बाइस्कोप को फिल्म कहने लगा। दीदी माधुरी दीक्षित की बहुत बड़ी फैन थीं। वे माधुरी की प्रत्येक फिल्म रिलीज होते ही सिनेमाहाल में जाकर देख लेती थीं। फिल्म देखने के तुरंत बाद वे गोरखपुर से मुझे चिट्ठी लिखकर भेजतीं। उस चिट्ठी में वे अपना समाचार कम लिखतीं और माधुरी की फिल्मों के बारे में विस्तार से बताती थीं। माधुरी की 'साजन', 'बेटा', 'खलनायक' और 'दिल तो पागल है' फिल्में मैंने उनकी चिट्ठियों के जरिए देखी हैं। जिस चिट्ठी में वे लिखती कि मैं फलां तारीख को घर आ रही हूं तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहता था। मैं बेसब्री से उनका इंतजार करता था। जैसे ही वे घर आतीं, मैं उनके पीछे-पीछे लग जाता था। अमूमन वे गर्मियों की छुट्टी में घर आती थीं। हम सब गर्मी में घर की छत पर सोते थे। रात को जल्दी से खाना खाकर हम छत पर बिस्तर लगा लेते और दीदी जैसे ही छत पर आतीं, घर के सभी लडक़े-लड़कियां उन्हें घेरकर बैठ जाते। उसके बाद वे फिल्मों की कहानी विस्तार से बतातीं। फिल्म की कहानी बताते समय वे माधुरी के लटके झटकों, मुस्कुराहट और उसकी अदाओं को एक्ट करके बताती थीं। बड़ा मजा आता था।
अब मैं भी माधुरी दीक्षित का फैन बन चुका था। जिस अखबार या मैगजीन में माधुरी की तस्वीर दिख जाती, उसे काटकर रख लेता था। नए वर्ष पर भेजने वाले ग्रीटिंग कार्ड भी माधुरी की फिल्मों वाले खरीदता था। मेरे स्कूल की कॉपी और किताबों की जिल्द पर माधुरी की तस्वीर वाले कवर चढ़ चुके थे। मैं पढ़ाई शुरू करने से पहले किताबों को प्रणाम करता तो मेरी अम्मा पूछ देती थीं कि तुम विद्या मां के पैर छूते हो या माधुरी दीक्षित के? उन दिनों माधुरी का एक गाना दीदी तेरा देवर दीवाना खूब बज रहा था। हर तरफ उस गाने के बारे में लोग बात कर रहे थे। दीदी ने भी मुझे चिट्ठी लिखकर बता दिया था कि माधुरी की बेस्ट फिल्म है, हो सके तो इसे जरूर देखना। मैंने अम्मा से वह फिल्म देखने की गुजारिश की, लेकिन जवाब ना मिला।
गर्मी की छुट्टियां शुरू हो चुकी थीं। मुझे और छोटे भाई को लेकर अम्मा मामा के गांव कपरियाडीह गयी थीं। कपरियाडीह मऊ के घोसी जिले में पड़ता है। मामा के गांव पहुंचकर मैंने देखा कि वहां भी दीदी तेरा देवर दीवाना का शोर मचा हुआ है। मेरी दोनों मौसी, मामी और उनकी बेटी अम्मा से हम आपके हैं कौन फिल्म दिखाने की जिद करने लगीं। अम्मा ने पूछा कि हम आपके हैं कौन किसकी फिल्म है? उन्होंने बताया कि यह वही फिल्म है जिसका गाना दीदी तेरा देवर दीवाना आजकल खूब बज रहा है। उन लोगों ने अम्मा को बताया कि पड़ोस के कुछ लोग फिल्म देखकर आए हैं। वे बता रहे हैं कि पारिवारिक फिल्म है। इसे जरूर देखना चाहिए। मामा के यहां भी किसी को सिनेमाहाल में फिल्म देखने की इजाजत नहीं थी। अम्मा नाना-नानी की दुलारी बेटी हैं। सबको पता था कि यदि वे सबको फिल्म दिखाने ले जाएंगी तो कोई मना नहीं करेगा। अम्मा ने सबकी बात सुन ली और हम आपके हैं कौन देखने जाने के लिए हां कह दिया। अब समस्या यह थी कि सब लोग जाएंगे कैसे? अम्मा ने एक जीप बुक की। इस बात की जानकारी जब पड़ोस की औरतों को मिली तो वे भी फिल्म देखने जाने के लिए तैयार हो गयीं।
एक दिन पहले ही घर के सभी लोग फिल्म देखने की तैयारी में लग गए। सबने नए कपड़े निकालकर रख लिए। जिस कपड़े की क्लिच बिगड़ गयी थी, उसे प्रेस किया गया। ऐसा लग रहा था जैसे घर में शादी होने वाली है। दूसरे दिन सुबह उठकर फटाफट सब नहा धोकर तैयार हो गए। जीप आने में थोड़ी देर हुई तो लोग व्याकुल हो गए। नाना को भेजकर जीप को बुलाया गया। उसके बाद मामा, दोनों मामी, दोनों मौसी, अम्मा, पड़ोस की दो औरतें, उनके बच्चे, मैं और छोटा भाई जीप में ठूंसकर घोसी फिल्म देखने रवाना हुए। वहां पहुंचकर हमने देखा कि विजय सिनेमाहाल के बाहर भारी भीड़ लगी है। उस भीड़ में बच्चे, बड़े, बूढ़े, नौजवान, औरतें सब शामिल थे। भीड़ देखकर हम लोग घबरा गए कि पता नहीं टिकट मिलेगी या नहीं। मामा भागकर टिकट खिडक़ी पर गए। वे टिकट लेकर लौटे तो सबकी जान में जान आयी।
सिनेमा हाल में प्रवेश करते समय मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी जन्म जन्मांतर की मुराद पूरी हो रही हो। मन ही मन मैं सोच रहा था कि अब मैं दीदी को गर्व से बताऊंगा कि मैंने सिनेमाहाल में फिल्म देख ली। मन ही मन मैं मौसी और मामी को धन्यवाद कह रहा था। मैं पहली बार सिनेमाहाल में फिल्म देखने जा रहा था। हम आपके हैं कौन शुरू हुई। हम सब मजे से फिल्म देखने लगे। अचानक मुझे सिसकने की आवाज सुनायी दी। मैंने ध्यान से देखा तो पाया कि सब रो रहे थे। उस समय भाभी की मौत का दृश्य चल रहा था। मुझे रोना नहीं आया। हां, मुझे माधुरी और सलमान के बीच के दृश्य खूब भा रहे थे। फिल्म के अंतिम दृश्य में मुझे उस वक्त जरूर रोना आया था जब माधुरी की शादी मोहनीश बहल से होने जा रही थी। दरअसल, तब तक मैं खुद को प्रेम समझने लगा था। मुझे लग रहा था कि वह सब मेरे साथ हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि उस फिल्म की चर्चा अगले कुछ दिनों तक घर में लगातार होती रही। अम्मा दूसरे ही दिन दवाई का बहाना करके नानी के साथ दोबारा हम आपके हैं कौन देखकर आ गयीं। उसके बाद हर गर्मी की छुïट्टी में अम्मा हमें फिल्म दिखाने घोसी लेकर जाती थीं।

'हम आपके हैं कौन' फिल्म ने मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। अब मेरे अंदर हर फिल्म को देखने की चाह होने लगी, लेकिन अम्मा की इजाजत नहीं मिलती थी। शायद अम्मा के मन में अभी तक यह डर था कि फिल्में देखकर मैं बिगड़ जाऊंगा। अब चचेरे भाई बहनों के साथ मिलकर मैं चोरी-चोरी टीवी पर फिल्में देखने लगा। हम उस वक्त टीवी वाली कोठरी में चोरी से घुस जाते थे, जब दुआर पर कोई नहीं होता था। कभी-कभी पकड़े जाते तो डांट खानी पड़ती थी। उन दिनों वीसीआर का चलन था। किसी के यहां तिलक, शादी, गवना या अन्य कोई समारोह होता तो सभी बच्चों की मांग वीसीआर होती थी। ऐसे समारोहों में वीसीआर आने की खबर मिलते ही हम सब के बीच यह चर्चा शुरू हो जाती थी कि कौन-कौन सी फिल्में आ रही हैं। हम उस तारीख का बेसब्री से इंतजार करते थे। अफसोस की बात है कि मैं चर्चाओं में जरूर शामिल रहता था, लेकिन वीसीआर देखने कभी नहीं जा पाता था। मेरी अम्मा जाने ही नहीं देती थीं। दूसरे दिन मैं दोस्तों से उन फिल्मों की कहानी सुनकर अपनी प्यास बुझा लेता था। हां, हमारे घर के समारोह में वीसीआर लगता तो मैं जरूर फिल्म देखता था। अम्मा फिल्म देखने की इजाजत देने के साथ ही कह देती थीं कि एक फिल्म देखकर सोने आ जाना। दिसंबर की कडक़ती ठंड में हम सब रजाई लेकर पुआल पर बैठकर फिल्में देखा करते थे। 'राजा की आएगी बारात', 'तिरंगा', 'नागिन', 'नगीना', 'करण अर्जुन', 'शोला और शबनम', 'बोल राधा बोल, दूल्हे राजा, बीवी नंबर वन, कुली नंबर वन, राजा, बादल, राजा हिंदुस्तानी', 'मोहब्बतें', 'धडक़न', 'कुछ कुछ होता है' जैसी कई फिल्में मैंने सर्द रातों में खुले आसमान के नीचे बैठकर देखी हैं।
मैंने अपने शहर आजमगढ़ में आजतक मात्र एक फिल्म देखी है। उसमें भी धोखा हो गया। उस वक्त मैं कक्षा बारह में पढ़ रहा था। मैं दोस्तों के साथ अपने स्कूल के एक मास्टर जी के घर शादी में गया था। मास्टर जी ने लौटते समय हमें विदाई के तौर पर बीस-बीस रूपए दिए थे। दरअसल, वे हमसे बेहद खुश थे। हमने पूरी रात जागकर उनकी बेटी की शादी में काम किया था। वहां से लौटते समय हमने शहर के मुरली हाल में फिल्म देखने का फैसला किया। गोविंदा की फिल्म 'जंग' लगी थी। हम टिकट लेकर हाल में घुस गए। मन में डर भी था कि गांव या घर का कोई हमें देख न ले। हम बहुत बड़ा रिस्क ले रहे थे। जब फिल्म शुरू हुई तो पता चला कि वह पुरानी है। उसे हम दो बार टीवी पर देख चुके हैं। उसका वास्तविक नाम 'फर्ज की जंग' था। सिनेमाहाल वालों ने नाम बदल कर उसे लगाया था। हमें बड़ा गुस्सा आया। खैर, पंखा चल रहा था और हम सब रात भर के जगे थे, सो हम वहीं सो गए। फिल्म खत्म हुई तो किसी ने हमें जगाया और हम सिनेमाहाल वाले को गाली देते हुए घर चल पड़े। सारे दोस्त मुझे कोस रहे थे। मेरी वजह से उनका पंद्रह रूपया बर्बाद हो चुका था। आज भी हमारे शहर में नाम और पोस्टर बदलकर सिनेमाहाल वाले पुरानी फिल्में चलाते रहते हैं।
मैं ग्रेजुएशन के लिए इलाहाबाद आया। वहां सिनेमा से मेरी घनिष्ठता बढ़ी। शुरूआती दिनों में मैं इलाहाबाद के सिनेमाहाल में फिल्म देखने जाने से पहले घर पर अम्मा को फोन करके पूछता था। वे इजाजत देतीं, तभी मैं फिल्म देखने जाता। बाद में यह सिलसिला खत्म हो गया। शायद अब मैं बड़ा हो चुका था। इलाहाबाद में हमें महीने भर के खर्चे के लिए घर से गिनकर पैसे मिलते थे। प्रत्येक फिल्म हाल में देखना हम अफोर्ड नहीं कर सकते थे। सो, हम सभी दोस्त मिलकर पैसा इकट्ठा करते और हर दूसरे सप्ताह किराए पर सीडी लाते एवं बीते सप्ताह की नई फिल्मों की सीडी लाकर पूरी रात बैठकर देखते थे। यह सिलसिला तीन वर्ष तक अनवरत चलता रहा।

गांव में रहते हुए मैंने एक भी अंग्रेजी फिल्म नहीं देखी थी। वहां अंग्रेजी फिल्मों का मतलब ब्लू फिल्में होती थीं। इलाहाबाद में मामा के बेटे ने जब मुझे सिनेमाहाल में अंग्रेजी फिल्म देखने के लिए कहा तो मैं चौंक गया। मैंने कहा कि मैं अंग्रेजी फिल्म नहीं देखूंगा, और तुमको भी नहीं देखनी चाहिए। वह फिल्में बुरी होती हैं। उसने पूछा, किसने कहा कि अंग्रेजी फिल्में बुरी होती हैं। तुम एक बार चलकर देखो, फिर मान जाओगे कि उन फिल्मों के सामने हिंदी फिल्में कुछ नहीं हैं। मैंने जब अपनी सोच बतायी तो वह हंसने लगा। मैंने पहली अंग्रेजी फिल्म 'द मम्मी रिटर्न' इलाहाबाद के चन्द्रलोक सिनेमाहाल में देखी।
मैंने सपरिवार आखिरी फिल्म संजय दत्त की 'महानता' (वर्ष 1996) देखी थी। घोसी के विजय सिनेमाहाल में। आज मुंबई के मल्टीप्लेक्स में हर सप्ताह फिल्म देखता हूं, लेकिन यहां वह मजा नहीं मिलता, जो घोसी और इलाहाबाद में मिलता था। मैंने बचपन में कभी नहीं सोचा था कि एक दिन फिल्म इंडस्ट्री को करीब से देखने और जानने का मौका मिलेगा। मैं अब गांव जाता हूं तो एक बात मुझे हैरान करती है। गांव में कई औरतें ऐसी हैं जिन्होंने आजतक हाल में फिल्म देखी ही नहीं है। यह बात सोचने वाली है। मजे की बात यह है कि आजकल अम्मा सुबह नौ बजे या कभी देर रात फोन करके नाश्ते और डिनर के बारे में पूछती हैं और मैं कहता हूं कि अभी नहीं खाया है तो वे कहती हैं, सिनेमा के चक्कर में तुम बिगड़ गए। तुम्हारे कलकतिहवा बाबा सही कहते थे।
पसंदीदा फिल्में
1- आवारा
2- शोले
3- दीवाना
4- हम आपके हैं कौन
5- दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे
6- कुछ कुछ होता है
7- कभी खुशी कभी गम
8- हम दिल दे चुके सनम
9- कहो ना प्यार है
10- ओए लकी लकी ओए