
maza aayega...padhte rahen
Tuesday, June 30, 2009
दो तस्वीरें:माई नेम इज खान में काजोल और शाहरुख़
Monday, June 29, 2009
हिन्दी टाकीज:तीन घंटे की फ़िल्म का नशा तीस दिनों तक रहता था-दुर्गेश उपाध्याय

Saturday, June 27, 2009
फ़िल्म समीक्षा:न्यूयार्क
-अजय ब्रह्मात्मज Friday, June 26, 2009
दरअसल:कई परतें थीं बाबू मोशाय संबोधन में
अपने अभिभाषण में उन्होंने एक बार भी अमिताभ बच्चन के नाम से संबोधित नहीं किया। बाबू मोशाय ही कहते रहे। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना की फिल्म आनंद देख चुके दर्शकों को अच्छी तरह याद होगा कि इस फिल्म में अमिताभ बच्चन को राजेश खन्ना बाबू मोशाय ही कहते हैं। मकाऊ में मंच पर राजेश खन्ना के बाबू मोशाय संबोधन में लाड़, प्यार, दुलार, शिकायत, आशंका, प्रशंसा, मनमुटाव, अपेक्षा, उपेक्षा आदि भाव थे।
हर दो पंक्ति के बाद बाबू मोशाय को अलग अंदाज में उच्चरित कर राजेश खन्ना कुछ नया जोड़ते रहे। थोड़ा पीछे हटकर उनकी तरफ देखते हुए अमिताभ बच्चन के चेहरे पर हर बाबू मोशाय उच्चारण के बाद एक नए रंग की लहर दौड़ जाती थी। जो सभी ने सुना और समझा, राजेश खन्ना उससे कुछ ज्यादा कह रहे थे और पूरा यकीन है कि अमिताभ बच्चन उनके हर शब्द और उच्चारण के भेद और मर्म को समझ रहे थे। राजेश खन्ना ने स्पष्ट कहा कि वह भी एक दौर था, यह भी एक दौर है। पहले कोई और था, आज कोई और है..। राजेश खन्ना जिस तरफ इशारा कर रहे थे या मुट्ठी से फिसल चुकी लोकप्रियता को याद कर कसमसा रहे थे, उसे सभी ने देखा और समझा। ऐसे द्वंद्व और दंश से अधिक सहानुभूति नहीं हो पाती, क्योंकि बदलते वक्त के साथ हर शय बदलती है। हालांकि अमिताभ बच्चन ने अपने परिचय में राजेश खन्ना की अप्रतिम लोकप्रियता का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कैसे उनकी कार के टायर की धूल को लड़कियां अपनी मांगों में भरती थीं.., राजेश खन्ना जैसी लोकप्रियता कभी देव आनंद ने भी देखी थी। कहते हैं राजेश खन्ना की पलकें झपकती थीं, तो लड़कियां सिनेमाघरों में सीटों पर उछल पड़ती थीं। समय ने वह लोकप्रियता किसी और को दे दी है। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना ने दो फिल्मों आनंद और नमक हराम में साथ काम किया। यह वही दौर था, जब एक स्टार का अस्त हो रहा था और दूसरे का उदय..।
आईफा अवार्ड में हर साल इस विशेष पुरस्कार से अपनी बिरादरी के किसी समकालीन या सीनियर कलाकार को सम्मानित करने के बाद अमिताभ बच्चन को ताने सुनने पड़ते हैं। फिरोज खान और धर्मेद्र ने भी अपने संबोधनों में शिकायतें रखी थीं। शायद यह अमिताभ बच्चन की लंबी पारी का साइड इफेक्ट हो! दूसरों को अपनी असफलता खलती है, लेकिन उसकी वजह जरूरी तो नहीं कि अमिताभ बच्चन ही हों। राजेश खन्ना ने अपने संबोधन में अमिताभ बच्चन से इशारे में कई सवाल किए। जाहिर है, हमें उम्मीद होगी ही कि वे अपने ब्लॉग पर इस प्रसंग और राजेश खन्ना के संबोधन के बारे में कुछ लिखें! तब शायद कुछ नए भेद खुलें। परतों से धूल छंटे और हम सब स्टारों के संबंधों को नए सिरे से समझें!
Wednesday, June 24, 2009
दर्शनीय फ़िल्म:झनक झनक पायल बाजे
वी शांताराम भारत के उन फिल्मकारों की श्रेणी में हैं, जिनकी फिल्मों ने हमेशा सामाजिक संदेश दिए। वह चाहे 'आदमी' हो या 'पड़ोसी', 'दहेज' हो या 'दुनिया न माने' या फिर 'अमृत मंथन' हो या 'अमर ज्योति' और 'नवरंग'। उनकी फिल्मों में अपराधियों का हृदय परिवर्तन होता है, वेश्याओं का पुनर्वसन होता है, सांप्रदायिक सद्भाव का माहौल तैयार होता है, दहेज-प्रथा बेनकाब होती है। वी शांताराम वैसे भाग्यशाली फिल्मकार रहे, जिन्होंने जीते जी अपनी अमरता का स्वाद चख लिया। उनकी सारी फिल्में हिट रहीं और हर फिल्म को मील का पत्थर माना जाता है।
ऐसी ही फिल्मों में एक फिल्म थी 'झनक झनक पायल बाजे'। 1955 में बनी यह फिल्म हालांकि कहानी की दृष्टि से कुछ कमजोर थी, मगर संगीत-नृत्य इसकी जान थी। सुप्रसिद्ध र्नतक गोपीकृष्ण के जीवन की यह एक अद्भुत फिल्म बन गई। वह प्रमुख भूमिका में थे। इस फिल्म को न केवल सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वोत्तम निर्देशन तथा सर्वोत्तम कला निर्देशन का फिल्मफेयर अवार्ड मिला, बल्कि राष्ट्रपति का रजत पुरस्कार भी हासिल हुआ।
शांताराम की
हर फिल्म उनकी ड्रीम प्रोजेक्ट होती थी, मगर 'झनक झनक पायल बाजे' के निर्माण के समय सफलता, विफलता का जो भय मन में सवार हो गया था, वह रिलीज होने के बाद ही दूर हुआ। तब उन्होंने कहा था, 'इस फिल्म का निमार्ण मेरा स्वप्न था, जिसे मैंने तन, मन, धन को पूरी तरह दांव पर लगाकर पूरा किया। अगर यह दर्शकों को पसंद नहीं आती तो मैं पूरी तरह बर्बाद हो गया होता।' इसकी सफलता को इस रूप में भी आंका जा सकता है कि मुंबई के मेट्रो सिनेमाघर में लगने वाली यह पहली हिंदी फिल्म थी।इस फिल्म को शांताराम ने टेक्नीकलर में बनाने की योजना पहले ही तैयार कर ली थी। लेकिन इसके लिए काफी पैसे चाहिए थे। उस चुनौती को उन्होंने स्वीकार किया तथा इसके लिए पूरे उपकरण विदेशों से मंगवाकर अपने स्टूडियो में लगवाए थे। मगर तकनीशियन सभी भारतीय ही थे, जिन्होंने अपने परिश्रम और प्रतिभा से इस फिल्म को आश्चर्यजनक बना दिया। इसी फिल्म से नृत्य निर्देशक नामक तत्व का भी जन्म हुआ। इसके पहले उनकी कोई पहचान नहीं बनी थी। जी बालकृष्ण ने अपने कैमरे के सारे प्रयोग कर दिखाए। नृत्य निर्देशक स्वयं गोपीकृष्ण थे। पटकथा और संवाद दीवान शरर ने लिखे थे। गीत हसरत जयपुरी के थे तथा संगीत दिया था वसंत देसाई ने। कला निर्देशन किया था कनु देसाई ने। संपादक थे चिंतामन बोरकर, कलाकार थे - गोपीकृष्ण, संध्या, के दाते, मदन पुरी, मनोरमा, चंद्रकांत, मुमताज बेगम, चौबे महाराज, नाना पलसीकर, निवालकर, चमन पुरी और भगवान। राजकमल कला मंदिर की इस फिल्म के निर्देशक वी शांताराम थे।
इस फिल्म को आज भी भारतीय कला और संस्कृति के प्रतीक के रूप में देखा जा
ता है। इसकी कहानी भगवान शंकर के दरबार से शुरू होती है, जहां 'भरत नटराज' की सर्वोच्च उपाधि के प्रयास होते हैं। इसलिए कि शंकर को नृत्य कला का अधिष्ठाता माना गया है। यानी नटेश्वर हैं वह। मंगल महारा (के दाते) को 'भरत नटराज' की उपाधि हासिल है। यह उनके वंश की परंपरा बन गई है कि भारत के इस शीर्ष पुरस्कार को प्राप्त करें। चूंकि वह बूढ़े हो गए हैं, इसलिए उनकी इच्छा और सपना है कि इस उपाधि को उनका लड़का गिरधर (गोपीकृष्ण) धारण करे। वह अपने बेटे को उस योग्य बनाने लगते हैं। लेकिन मंगल महाराज की यह समस्या है कि वह कठोर अनुशासन में विश्वास करते हैं तथा विचार के स्तर पर पुरातनपंथी हैं। कला-साधना के बीच न तो हल्केपन को बर्दाश्त करते हैं और न ही गलतियों को।गिरधर भी पिता की तरह तेजस्वी नर्तक हैं। एक दिन वह भी नीला (संध्या) नामक युवती को सस्ते और उत्तेजक नृत्य करते हुए देख लेते हैं। गिरधर इसके लिए नीला को डांटते भी हैं। मगर नीला बहुत अहंकारी लड़की है। वह गिरधर से नृत्य पर बहस कर बैठती हैं। गिरधर उन्हें जब नृत्य के कुछ भाव दिखाते हैं तो नीला को मान होता है कि उन्हें तो बहुत कुछ सीखना बाकी है। यहीं गिरधर की योग्यता में नीला की जिज्ञासा का प्रवेश हो जाता है। यानी एक रोमांटिक ट्रैक तैयार हो जाता है। नीला तब मंगल महाराज से प्रार्थना करती है कि वे उन्हें अपनी शिष्या बना लें। मंगल महाराज की साधना और साधक की कठोरता संबंधी सारी शर्तों को वह मान लेती हैं। मंगल महाराज उनके समर्पण और दृढ़ता को देखकर 'भरत नटराज' की प्रतियोगिता में गिरधर की नृत्य-सहयोगी बनने की स्वीकृति भी दे देते हैं।
गिरधर और नीला-दोनों की साधना के बीच प्रेम पनपने लगता है, जबकि मंगल महाराज के वंश में साधना के दौरान प्रेम के प्रवेश को हमेशा वर्जित माना जाता रहा है। भरत नटराज की उपाधि के बाद ही विवाह का अधिकार दिया जाता है। गिरधर उस मान्य परंपरा के खिलाफ खड़े होते दिख रहे हैं। इस बीच उस कहानी में मनी बाबू (मदन पूरी) यानी खलनायक का प्रवेश होता है। मनी बाबू काफी पैसे वाला है, जो नीला को मन ही मन प्यार करता है। नीला और गिरधर का साथ उसे परेशान करता रहता है। वह मंगल महाराज के कान भरने में सफल हो जाता है। मंगल महाराज छड़ी फेंकते हैं, जिससे गिरधर जख्मी हो जाते हैं। गिरधर के चेहरे पर दुख और पीड़ा के भाव उभरते हें, जिसे मंगल महाराज देखकर द्रवित हो जाते हैं। वह ईश्वर से अपने लिए क्षमा तथा गिरधर के लिए कला के प्रति सच्ची लगन पैदा करने का वरदान मांगते हैं। लेकिन गिरधर धीरे-धीरे नीला के मोहजाल में धंसते चले जाते हैं। इससे उनकी साधना में गतिरोध आने लग जाता है।
इस बीच मंगल महाराज महाशिव रात्रि के उत्सव में भाग लेने वाराणसी चले जाते हैं। लौटने पर पाते हैं कि दोनों साधना की बजाए प्रेमालाप में लीन हो गए हैं। तब वह वाराणसी से लाए घुंघरू और परंपरा से मौजूद वस्त्र को देकर गिरधर को वंश के सम्मान की रक्षा की याद दिलाते हैं। वह आग्रह करते हैं कि एक लड़की के प्यार के चक्कर में पड़कर अपने कर्तव्य को भूलने की कोशिश मत करो। उनके समझाने का कोई असर नहीं होता है। वह एक दिन दोनों को रोमांटिक मूड में देख लेते हैं। तब मंगल महाराज चतुराई से
काम लेते हुए विश्वामित्र और मेनका प्रसंग पर नृत्य की तैयारी कराते हैं कि किस तरह मेनका ने विश्वामित्र की वर्षों की तपस्या को भंग कर दी थी। तब नीला को समझ में आता है कि उन्हें इंगित करके ही यह नाट्य तैयार कराया गया है। गिरधर पिता की इस रणनीति का विरोध करते हैं, जबकि नीला सोचने लगती है कि उनके कारण ही गिरधर की साधना भंग हो रही है। गिरधर के मन में नफरत पैदा करने के लिए नीला अचानक मनी बाबू के साथ चली जाती हैं। फिर वह उन्हें छोड़कर नदी में कूद जाती हैं। लेकिन भाग्य से एक साधु (नाना पलसीकर) बचा लेते हैं। मंगल महाराज, गिरधर को लेकर कहीं और चले जाते हैं। वह अपनी भूतपूर्व शिष्या रूपकला (चंद्रकला) को उत्सव में साथ नृत्य करने के लिए तैयार करते हैं। इस बीच नीला को उनकी नौकारानी देख लेती है। मनी बाबू भी उन्हें ढूंढ़ लेते हैं। मगर नीला का प्रण है कि जब तक गिरधर 'भरत महाराज' की उपाधि नहीं पा जाते, तब तक कोई भी फैसला अपने बारे में नहीं कर सकतीं। मनी बाबू भी कसम लेता है कि गिरधर को कभी भी वह उपाधि नहीं लेने देगा।समय का चक्र ऐसा चलता है कि गिरधर की मुलाकात नीला से हो जाती है। वह नीला को साथ चलने के लिए कहते हैं। जब वह तैयार नहीं होतीं तो गिरधर उनकी हत्या पर उतर आते हैं। तभी मंगल महाराज वहां पहुंच जाते हैं। नीला वहां से चली जाती हैं।
काफी समय बाद 'भरत नटराज' उत्सव का दृश्य आता है। एकल नृत्य में गिरधर सबको पराजित कर देते हैं। लेकिन अंतिम दिन गिरधर को रूपकला के साथ तांडव नृत्य करना है। मनी बाबू अपनी चाल के तहत रूपकला को लालच देकर फोड़ लेता है। वह भाग जाती हैं। गिरधर परेशान हो जाते हैं। तभी नीला मंच पर उपस्थित होती हैं। गिरधर का क्रोध और बढ़ जाता है। वह त्रिशूल से उन पर हमला कर देते हैं। त्रिशूल को मंगल महाराज अपने हाथ पर झेल लेते हैं। हाथ लहूलुहान हो जाता है। नीला पर आया गुस्सा, तांडव में बदल जाता है। गिरधर 'भरत महाराज' की उपाधि के हकदार बन जाते हैं। मनी बाबू अपनी हार स्वीकार कर लेता है तथा मंगल महाराज नीला का हाथ मांगकर गिरधर के हाथों में पकड़ा देते हैं। फिल्म यहीं खत्म हो जाती है। भारत की कलात्मक फिल्मों में इसकी गिनती शीर्ष पर की जाती है।
गोपीकृष्ण ने अपनी वास्तविक नृत्य-प्रतिभा का जमकर प्रदर्शन किया, जो दर्शकों को आज भी याद है। नृत्य की अधिकांश शूटिंग मैसूर के वृंदावन गार्डन में की गई थी। जी बालकृष्ण की फोटोग्राफी ने प्रकृति और नृत्य के सौंदर्य को बखूबी कैद किया था। बालकृष्ण भारत के पहले सिनेमेटोग्राफर हैं, जिन्हें टेक्नीकलर में छायांकन करने का गौरव प्राप्त हुआ।
फिल्म में ग्यारह गीत हैं। सात गीत हसरत जयपुरी के हैं, जबकि दो गीत दीवान शरर ने लिखे हैं। एक गीत के रचियता सरस्वती कुमार दीपक हैं, जबकि एक मीराबाई का गीत लिया गया है। सच तो यह है कि इस फिल्म को सुपरहिट करने में गीत-संगीत ने जबर्दस्त भूमिका निभाई थी। 'नैन सो नैन नाहि मिलाओ...' और 'सैयां जाओ जाओ मोसे ना बोलो...' अमर गीतों में शामिल हो चुके हैं।
Monday, June 22, 2009
फिल्म समीक्षा:लेट अस डांस और पेइंग गेस्ट
आरिफ शेख की फिल्म लेट अस डांस इस मायने में प्रशंसनीय है कि पहली फिल्म होने के बावजूद उन्होंने घिसी-पिटी प्रेम कहानी नहीं चुनी। उन्होंने डांसर सुहानी के माध्यम से कुछ कर गुजरने की जिद को अच्छी तरह चित्रित किया है। फिल्म की कमजोरियां पटकथा, सेट और निर्माण में दिखती हैं। अगर निर्देशक को मजबूत समर्थन मिलता और वह पटकथा पर थोड़ा ध्यान देते तो लेट अस डांस खूबसूरत म्यूजिकल बन जाती।
सुहानी डांसर है। वह डांस स्कूल भी चलाती है। वहां वह समाज के वंचित, सड़क छाप बच्चों को डांस की ट्रेनिंग देती है। उसकी एक ही इच्छा है कि ये बच्चे डांस करें और अपनी कला का प्रदर्शन सही मंच से करें। उसका अपना भी संघर्ष है। दोनों संघर्ष विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। सुहानी किसी तरह अपने सपने साकार करने के करीब पहुंचती है तो उसे गहरा भावनात्मक और पेशागत झटका लगता है। आभास होता है कि सब कुछ बिखर गया। फिर भी वह हिम्मत नहीं हारती। नए सिरे से कोशिश करती है और आखिरकार कामयाब होती है।
सुहानी की भूमिका में गायत्री पटेल जंचती हैं। वह अच्छी डांसर हैं। नृत्य में उनकी भाव मुद्राएं और गति आकर्षित करती हैं। समान्य कद-काठी की गायत्री का सौंदर्य उनके डांसिंग स्टेप्स में दिखता है। नाटकीय और भावनात्मक दृश्यों को वह निभा ले जाती हैं। पटकथा की कमजोरी से बाकी चरित्रों का गठन नहीं हो पाया है। इस वजह से वे किरदार और उन्हें निभा रहे कलाकार कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते। किशोर उम्र के टपोरी की भूमिका निभा रहे बाल कलाकार के अभिनय में सहजता है। प्रेम कहानी पर फोकस नहीं था तो उसके ट्रैक की क्या जरूरत थी?
इस फिल्म में गीत, संगीत और कोरियोग्राफी महत्वपूर्ण है। कोरियोग्राफर ने नए स्टेप्स दिए हैं, लेकिन गीत-संगीत प्रभावशाली नहीं है। फिल्म की धुनें और बोल याद नहीं रह पाते। अंत में इतना कहा जा सकता है कि आरिफ शेख अपनी पहली फिल्म में अनेक सीमाओं के बावजूद संभावनाएं जाहिर करते हैं।
रेटिंग : **
कामेडी कम, कंफ्यूजन ज्यादा- पेइंग गेस्ट
बड़ा नाम सुना था परितोष पेंटर का। मुंबई के रंगमंच के चिर-परिचित परितोष की फिल्म पेइंग गेस्ट से उस नाम के अनुरूप ही उम्मीद थी। उम्मीद तो टूटी ही, फिल्म देखकर घोर निराशा हुई और अफसोस हुआ कि सुभाष घई की प्रोडक्शन टीम को क्या हो गया है? उनकी टीम अच्छी स्क्रिप्ट क्यों नहीं चुन पा रही है?
आवास की समस्या से परेशान युवकों में से दो लड़की का रूप धारण कर दंपती बन जाते हैं और एक मकान में रहने लगते हैं। आवास की यह समस्या हम गोलमाल और गोलमाल रिटर्न्स में ज्यादा मनोरंजक अंदाज में देख चुके हैं। और फिर नए लड़कों के बीच जावेद जाफरी पूरी तरह मिसफिट लगते हैं। हंसाने का जानी लीवर का घिसा-पिटा तरीका अब ऊब पैदा करता है। असरानी और पेंटल को हमारे निर्देशक कुछ नया दे ही नहीं पाते। गौरतलब है कि पेंटल एफटीआईआई में अभिनय के शिक्षक हैं।
पूरी फिल्म बैंकाक में शूट की गई है। पृष्ठभूमि की आधुनिक भव्यता तभी सुंदर लगती है, जब सामने चल रहा ड्रामा दर्शनीय हो। पेइंग गेस्ट में कामेडी कम, कंफ्यूजन ज्यादा है।
रेटिंग :*
Saturday, June 20, 2009
हिन्दी टाकीज:भागकर फिल्म देखने का मजा कुछ और था-अंजलि कुजूर

बचपन में कितनी फिल्में देखी याद नहीं लेकिन कॉलेज में अपनी दोस्त के साथ जो फिल्म देखी, उसे आज तक नहीं भूल पायी। मेरी वह प्यारी दोस्त नेपाल की रहने वाली थी। कॉलेज में मैं और मेरी दोस्त अपनी दोस्ती के लिए सभी के बीच जाने जाते थे।
हमारी रुचि और रहन-सहन को देखकर हमारे प्रोफेसर हमेशा कहा करते थे -'यह जोड़ी गजब की है, एक पूरी तरह देशी और एक बॉर्डर पर की, फिर भी क्या दोस्ती है। हम साथ-साथ क्लास करते घूमते, चाट और गोलगप्पे खाते। सचमुच वह बहुत प्यारे दिन थे। खैर, बात फिल्म की। एक दिन हमने तय किया कि क्लास बंद करके फिल्म देखी जाये। उस समय मैं किसी खास हीरो-हीरोइन के फैन नहीं थी। पर मेरी दोस्त जूही चावला की बहुत बड़ी फैन थे। उसके पास जूही चावला के ढेरों फोटोग्राफ्स थे, जिसे वो सारे दोस्तों को दिखाया करती थी। तो तय हुआ। ' हम हैं राही प्यार के' देखी जाये। फिल्म में जूही के पिताजी उसकी शादी अपनी जाति के (मद्रासी) लड़के से तय कर देते हैं। जूही को लड़का पसंद नहीं आने के कारण वो भाग कर मेले में चली जाती है। वहां से उसे तीन बच्चे अपने मामा (आमिर खान) के घर ले आते हैं। तब शुरू होती है फिल्म की असली कहानी। साथ रहते हुए जूही और आमिर खान एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं। पर आमिर की कंपनी एक सेठ के हाथें गिरवी है, जिसकी बेटी आमिर को पसंद करती है और उससे शादी करना चाहती है। मुझे वह सीन अब भी याद है जब जूही परेशान होती है। उसकी परेशानी देखकर मेरी दोस्त भी रो पड़ी थी। बड़ी मुश्किल से मैंने उसे चुप कराया था। यह क्रम सिनेमा हॉल में कई बार दोहराया गया। कहा जा सकता है कि मेरा समय फिल्म देखने में कम और उसे चुप कराने में ज्यादा बीता था। हाल यह था कि फिल्म के खत्म होते-होते मेरी दोस्त की आंखें रोते-रोते पूरी तरह से लाल हो चुकी थीं। हालांकि वह कामेडी फिल्म थी। मुझे यह सोचकर और हंसी आ रही थी कि यह लड़की उदास कर देने वाली ट्रेजेडी फिल्में कैसे देखती होगी।
दूसरे दिन कॉलेज पहुंचकर इस किस्से को दोस्तों के सामने बयां की तो सभी खूब हंसे। पर हमारी मस्ती की यह कहानी तब क्लाइमेक्स पर पहुंची जब प्रोफेसर ने हम दोनों से पिछले क्लास से संबंधित प्रश्न पूछे। जवाब नहीं मिलने पर बुरी तरह डांटा। हमें डांट सुनते देख सभी के चेहरों पर हंसी आ रही थी। हमें बाद में पता चला कि प्रोफेसर ने हमें कॉलेज के गेट से बाहर जाते पहले ही देख लिया था। बहरहाल इस डांट का असर ये हुआ कि हमने दोबारा क्लास मिस कर कभी फिल्म न देखने की कसम खायी। लेकिन उन दिनों फिल्मों का मोह ऐसा था कि जल्दी ही यह कसम टूट गयी।
उन दिनों मैं हजारीबाग के एक हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही थी। हॉस्टल की हेड एक सिस्टर थी। हास्टल की लड़कियों पर कड़ी नजर रखी जाती थी। किससे मिलना है, कब मिलना है, यह सब सिस्टर तय करती थी। कहीं आने-जाने का समय निश्चित था। अनुशासन तोड़ने का मतलब था कड़ी सजा की भागीदार बनना।
लेकिन कॉलेज के दिनों में घर से बाहर यदि लड़कियां एक साथ रहें तो शैतानियां और बदमाशी न हो, यह नामुमकिन जैसा है। ऐसे में हमारा मन सिनेमा देखना किसी बड़े युद्ध को जीतने के बराबर था। लेकिन उन दिनों भागकर सिनेमा देखने का रोमांच ही अलग था। बल्कि सिनेमा देखने का कम और किसी की नजरों से बचने का रोमांच ही अलग था। बल्कि सिनेमा देखने का कम और किसी की नजरों से बचने का आनंद अधिक आता था। हम लड़कियां अक्सर भागकर फिल्म देखने चली जातीं और चुपचाप चली आतीं। सिस्टर को किसी ने इसके बारे में बता दिया था। लेकिन रंगे हाथों नहीं पकड़ पाने के कारण वह काई कार्यवाही नहीं कर पाती थी। कई तरह की वार्निंग दी जाती पर हम लड़कियां आदत से बाज नहीं आतीं। एक दिन तय हुआ कि शाहरुख खान की सुपरहिट फिल्म देखी जाए। हम तय समय पर एक-दो, एक-दो करके निकले ताकि किसी को खबर न हो। रात में ही बीस लड़कियों के पैसे जमा कर लिये गये। तय यह हुआ कि एक लड़की टिकट कटा लेगी और बाकी हम सब तय समय और स्थान पर मिलेंगे। सब कुछ योजनानुसार हो रहा था। हम सब निश्चित जगह जमा हो कर फिल्म हॉल में घुस भी गये। लड़कियां हल्ला करने, कमेंट करने में लड़कों से पीछे नहीं थीं। तीन घंटे खूब मस्ती में बीते। फिल्म खत्म होने पर हम लड़कियों का झुंड हंसते-खिलखिलाते बाहर निकलने लगा। उस हॉल में अंदर जाने का एक दरवाजा था और बाहर निकलने का एक। उस दरवाजे से बाहर आने पर हमारे होश उड़ गये। हेड सिस्टर वहां हमारे स्वागत में पहले से खड़ी थी।
हम सब की हालत खराब। मुंह लटकाये हम एक-एक कर बाहर निकलते जाते और सिस्टर हमारा नाम नोट करती जाती। शायद सिस्टर को गुप्त सूत्रों से हमारे फिल्मी कार्यक्रम के बारे में पता चल गया था। आखिर उस दिन हम रंगे हाथों पकड़े गये। उसके बाद सिस्टर ने हमारी क्या दुर्गति की, उसे यहां नहीं किया जा सकता।
1.मैं हूं ना
2.कहो ना प्यार है
3.गाइड
4.कुछ कुछ होता है
5.शोले
6.बागबान
7.जब वी मेट
8.शूट आउट एट लोखंडवाला
9.ओंकारा
10.चक दे इंडिया
Friday, June 19, 2009
दरअसल:दर्शकों को क्या मिला?
मीडिया और फिल्म इंडस्ट्री में खुशी है कि मल्टीप्लेक्स और निर्माता-वितरकों के बीच लाभांश को लेकर चल रहा विवाद समाप्त हो गया। मल्टीप्लेक्स के मालिकों ने आखिर निर्माता-वितरकों की मांग मानी। ऊपरी तौर पर निर्माता और वितरक फायदे में रहे, क्योंकि उन्होंने अपने लाभांश के प्रतिशत बढ़वा लिए। मल्टीप्लेक्स के मालिकों को यही संतुष्टि है कि उन्होंने निर्माता-वितरकों की मांग को शत-प्रतिशत नहीं माना। उन्होंने अपनी तरफ से उसे कम किया। इस विवाद और लड़ाई में एक-दो बार दर्शकों से जुड़े मामले जरूर उठे, लेकिन अंतिम सहमति के समय उन मामलों पर कुछ नहीं कहा गया। विवाद के समय मल्टीप्लेक्स के मालिकों ने फिल्म की क्वालिटी पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि निर्माताओं को अच्छी फिल्मों के निर्माण पर जोर देना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा दर्शक फिल्मों को देखने आएं। दूसरी तरफ निर्माताओं ने सवाल उठाया था कि मल्टीप्लेक्स मालिकों को टिकट रेट कम करना चाहिए। टिकटों की कीमत कम होगी, तो मल्टीप्लेक्स में ज्यादा दर्शक आएंगे। दोनों ही तरफ से उठाए सवाल वास्तव में दर्शकों की संख्या और फिर बिजनेस बढ़ाने के मुतालिक थे, लेकिन वे दर्शकों के हित में थे। अच्छी क्वालिटी की फिल्में मिलें और टिकटों की कीमतें कम हो जाएं, तो दर्शकों को फायदा होगा। फिलहाल इस संदर्भ में दोनों पक्षों में किसी ने कोई संकेत नहीं दिया है। हां, अच्छी क्वालिटी की फिल्मों के बारे में आमिर खान और शाहरुख खान ने कहा था कि कोई भी निर्माता-निर्देशक जानबूझ कर बुरी फिल्में नहीं बनाता। कोई भी यह नहीं तय करता कि चलो एक बुरी फिल्म बनाते हैं। टिकटों की कीमत कम करने के मामले में मल्टीप्लेक्स मालिकों का कहना था कि उनके लिए सभी सुविधाओं के साथ फिल्में दिखाना महंगा व्यापार है। अगर वे टिकटों की कीमत कम करेंगे, तो उन्हें नुकसान होगा।
छोटे शहर और कस्बों के थिएटरों में टिकट की कीमत हर फिल्म के साथ नहीं बदलती। मल्टीप्लेक्स में फिल्म के प्रति दर्शकों की जिज्ञासा को देखकर मल्टीप्लेक्स मालिक कीमत बढ़ा देते हैं। गजनी और रब ने बना दी जोड़ी की टिकटें ऊंची कीमतों पर बेची गई। उसी तरह चांदनी चौक टू चाइना की भी कीमत बढ़ाई गई थी, लेकिन फिल्म के प्रति दर्शकों के उदासीन रवैए को देखते हुए फिर से कीमतें घटा दी गई। मल्टीप्लेक्स मालिकों ने दर्शकों के प्रोफाइल को अच्छी तरह समझ लिया है। वे महानगरों में कार्यरत युवा प्रोफेशनल के वीकएंड मनोरंजन की भूख को समझ चुके हैं। अगर आप मल्टीप्लेक्स में शनिवार-रविवार की भीड़ का मुआयना करें, तो समझ जाएंगे कि युवा दर्शकों की संख्या भरपूर रहती है। ऊंची कमाई और महानगरों की अकेली जिंदगी में मॉल और मल्टीप्लेक्स उनकी वीकएंड गतिविधि का अनिवार्य हिस्सा बन गए हैं। वे अब एक दिन पहले के प्रिव्यू शो के लिए भी मोटी रकम दे रहे हैं। गजनी ने अपने प्रिव्यू शो से ही आरंभिक कमाई कर ली थी।
65 दिनों के गतिरोध और मनोरंजन का कृत्रिम अकाल लाने के बाद भले ही निर्माता-वितरक और मल्टीप्लेक्स परस्पर सहमति से फिल्मों की रिलीज के लिए तैयार हो गए हों, लेकिन सच्चाई यह है कि इस विवाद और गतिरोध में दर्शकों का खयाल नहीं रखा गया। फिल्म इंडस्ट्री मल्टीप्लेक्स संस्कृति के प्रभाव में देसी दर्शकों से पहले ही बेपरवाह हो चुकी है। अब वे महानगरों के अमीर दर्शकों के साथ भी मनमाना व्यवहार कर रहे हैं। दर्शक अभी तक नुकसान में हैं। निर्माताओं को जरूर फायदा हुआ। उनके लाभांश के प्रतिशत बढ़ गए, लेकिन दर्शकों की जेब तो वैसे ही खाली होती रहेगी। क्या अब दर्शकों को अपनी मांग के लिए हड़ताल पर जाना पड़ेगा? मुमकिन है दर्शकों के बीच से ऐसा अभियान शुरू हो, वे मल्टीप्लेक्स के शो का बहिष्कार आरंभ करें। तभी मल्टीप्लेक्स के मालिक और निर्माता-वितरक उनकी सुधि लेंगे।
Thursday, June 18, 2009
रोचक:एक पोस्टर के सहारे बनाई थी रामू ने ' . . .आग'
Tuesday, June 16, 2009
दरअसल:हर भावना स्वार्थ से प्रेरित नहीं होती
पहले अमिताभ बच्चन, फिर आमिर खान और बाद में मधुर भंडारकर ने आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे नस्लवादी हमलों की निंदा की है। सभी ने अपने ब्लॉग और स्तंभ में कड़े शब्दों में विरोध दर्ज किया और अपनी भावनाएं व्यक्त करने में कोताही नहीं बरती। इसका असर हुआ। एक तो इन हस्तियों के उल्लेख के जरिए देश के नागरिक इसके प्रति जागरूक हुए। उन्होंने इस तरफ ध्यान दिया। इसके अलावा आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि नस्लवादी आक्रमणकारियों से निबटने के साथ भारतीय छात्रों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया जाएगा। आस्ट्रेलिया के क्रिकेटर ब्रेट ली ने अपने देशवासियों से अपील की है कि वे ऐसे नस्लवादी व्यवहार से बचें।
मीडिया में कुछ लोगों ने बिग-बी और आमिर की बातों का मखौल उड़ाते हुए लिखा है कि इन स्टारों ने चर्चा में बने रहने के लिए इस मुद्दे पर स्टैंड लिया। आमतौर पर सेलिब्रिटी की कोशिश, मंतव्य और इरादों के पीछे सबसे पहले हम उनके निहित स्वार्थ ही खोजते हैं। समाज में ऐसी धारणा बन गई है कि बगैर निजी स्वार्थ के फिल्मों से जुड़े लोग न मुंह खोलते हैं, न कदम बढ़ाते और न सक्रिय होते हैं। इस धारणा के पीछे उनका पिछला व्यवहार होता है। खासकर हमारे हिंदी फिल्मों के स्टार सामाजिक मुद्दों पर अपनी खामोशी को राजनीतिक दृष्टि से उपयुक्त मानते हैं। हां, कोई हादसा हो जाए, तो वे मुखर होते हैं, क्योंकि वहां व्यक्तिगत राजनीतिक सोच से अधिक व्यापक चिंताएं काम कर रही होती हैं और उन पर विवाद की संभावनाएं नहीं बनतीं। उन मुद्दों पर दुविधा या दो राय की संभावना नहीं रहती। आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे हमले की ही बात करें, तो हर भारतीय इसका विरोध करेगा। स्टारों को भी ऐसे मुद्दों पर बोलने में दिक्कत नहीं होती। हमारे फिल्म स्टार किसी विवादास्पद मुद्दे पर अपनी राय नहीं रखते। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, यहां तक कि इंडस्ट्री की समस्याओं पर भी अपनी बात कहने से वे हिचकते हैं। करीबी संपर्क होने पर अगर वे कुछ कहें भी, तो तुरंत यह बताना नहीं भूलते कि भाई, यहां ऑफ द रिकॉर्ड बोल रहा हूं। उनकी इसी सोच के कारण यह धारणा बन गई है कि बगैर स्वार्थ के वे कुछ नहीं बोलते।
ताजा संदर्भ में गौर करें, तो बिग-बी ने क्वींस्लैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी से मिल रही डॉक्टरेट की मानद उपाधि लेने से इनकार किया है। यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने उनकी भावनाओं की कद्र करते हुए दोहराया कि अभी नहीं, तो भविष्य में वे इस उपाधि को ग्रहण करें, क्योंकि इससे दोनों देशों के संबंध मजबूत होंगे। गौर करें, तो बिग-बी अपनी लोकप्रियता के कारण देश के ऐसे प्रतिनिधि हो गए हैं कि दूसरे देशों में भी लोग जानते-पहचानते हैं। उन्हें ऐसी उपाधियां देकर संस्थान, समूह और देश अमिताभ बच्चन के प्रशंसकों को संतुष्ट करते हैं। भारतवंशियों और आप्रवासियों को गर्व का अहसास होता है कि उनके देश के एक कलाकार को सम्मान मिल रहा है। यहीं अमिताभ बच्चन की अस्वीकृति और असहमति महत्वपूर्ण हो जाती है। उनकी अस्वीकृति ने आस्ट्रेलिया और भारत को जागरूक किया। हमें अपने फिल्म कलाकारों की इस भावना पर गर्व करने के साथ उन्हें अपना समर्थन भी देना चाहिए।
Saturday, June 6, 2009
फ़िल्म समीक्षा:अनुभव और मारुति मेरा दोस्त
थिएटर आर्टिस्ट अनुभव फिल्मों में काम पाने की उम्मीद में संघर्ष कर रहा है। उसे शुरू में टीवी सीरियल में मौका मिलता है। वहां एक उम्रदराज अभिनेत्री उस पर डोरे डालती है। अनुभव उसका शिकार होने से बच जाता है, लेकिन कुछ समय बाद वह पारिवारिक मुसीबतों के कारण जिगोलो बनना स्वीकार करता है। इस द्वंद्व भरी जिंदगी में वह अपनी बीवी से कटा-कटा रहने लगता है। बीवी के सामने जब भेद खुलता है तो वह सन्नाटे में आ जाती है। बाद में दोनों की जिंदगी सुधर जाती है और बताया जाता है कि पांच साल बाद अनुभव हिंदी फिल्मों का सुपरस्टार बन गया।
फिल्म के अंत को लेकर एक सवाल उठता है कि अगर पत्नी ने ऐसी ही मजबूरी में वेश्यावृत्ति की होती तो क्या उसका पति उसे सहज ढंग से स्वीकार कर लेता? हिंदी फिल्म के पर्दे पर दर्शकों को ऐसी नायिका मजबूरी के बावजूद स्वीकार नहीं होती। जिगोलो बनने की मजबूरी और उनकी दुनिया को निर्देशक ने सतही अंदाज में चित्रित किया है। यह बात भी खलती है कि मशहूर उद्योगपति की बेटी एक संघर्षशील एक्टर से शादी कर सामान्य जिंदगी जीने लगती है, लेकिन उसके पिता उसकी कोई खैर-खबर नहीं लेते।
अनुभव के मित्र के रूप में आदि के किरदार को ढंग से विकसित नहीं किया गया है। वह अनुभव के विवेक के रूप में बार-बार सामने आता है। इन कमियों की वजह से फिल्म लचर हो जाती है। हां, संजय सूरी और गुल पनाग ने अंतिम दृश्य में अपनी मजबूरियों और असहायता के एहसास को प्रभावी तरीके से व्यक्त किया है। दोनों कलाकारों को बेहतर स्क्रिप्ट और डायरेक्टर मिले तो वे बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
गांव में पली-बढ़ी रामेश्वरी अपने जीवन के प्रसंग सुनाती है। वह बताती है कि कैसे भगवान हनुमान ने दोस्त बन कर उसकी रक्षा की। उन्होंने रामेश्वरी के परिवार को दुष्ट आत्माओं और दानवों से बचाया। एक स्तर पर भक्तों के प्रति भगवान हनुमान की सदाशयता दिल को छूती है, लेकिन निर्देशक ने बड़े ही फार्मूलाबद्ध तरीके से दुष्टों को खड़ा किया है। उनमें फिल्मी खलनायकों के सारे अवगुण हैं। बच्चों की फिल्म में अच्छे-बुरे के संघर्ष को बड़ों के नजरिए से पेश किया गया है। रामेश्वरी के दोस्त मारुति के रूप में हनुमान का मानवीकरण नए सोच को दर्शाता है, किंतु शेष चित्रण में निर्देशक लकीर के फकीर ही रहते हैं। इस फिल्म को यू-ए सर्टिफिकेट मिला है। ऐसी फिल्म बच्चों के निमित्त कैसे हो सकती है। विशेष प्रभाव और सीजी इफेक्ट की बात करें तो दानवों की कल्पना में एनीमेटर नए प्रयोग करते हैं, जबकि हनुमान आदि मिथकीय चरित्रों में वे अधिक फेरबदल नहीं कर सकते। इस वजह से दुष्ट दानव ज्यादा आधुनिक, तकनीकी रूप से दक्ष और आकृति-प्रकृति में भिन्न नजर आते हैं, जबकि देवी-देवता कैलेंडर आर्ट की वेशभूषा और भंगिमा से आगे नहीं बढ़ पाते।
Friday, June 5, 2009
हिंदुस्तान के लोगों अब तो मुझ को पहचानो..

बातचीत के जरिए प्रसिद्ध हस्तियों के जीवन का साक्षात्कार मुश्किल और धैर्यपूर्ण काम है। नसरीन ने इसके पहले जावेद अख्तर से बातचीत कर टॉकिंग फिल्म्स और टॉकिंग सॉन्ग्स पुस्तकें प्रकाशित की हैं। ऐसी महत्वपूर्ण बातचीत बोझिल नहीं होती। लगता है कि बातचीत कर रहा व्यक्ति अपने साथ अतीत की गलियों में लोगों को घुमा रहा है और हम-आप उन कोनों, झरोखों, स्थानों और व्यक्तियों से परिचित हो रहे हैं, जिसने उन्हें गढ़ा। इस किताब में लता के उत्तरों में ही उनकी यात्रा और उपलब्धियों की सारी जानकारियां मिल जाती हैं। साथ ही उनसे जुड़ी भ्रांतियां भी स्पष्ट होती जाती हैं। लता के व्यक्तित्व और गायन को समझने के लिए यह जरूरी किताब है।
बातचीत के क्रम में लता मंगेशकर के अथक अध्यवसाय की सूचनाएं मिलती हैं। छोटा सा उदाहरण लें। दिलीप कुमार ने मराठी माणुस होने के कारण लता मंगेशकर के उर्दू उच्चारण के प्रति संशय व्यक्त किया था। लता को तकलीफ जरूर हुई थी, लेकिन बुरा मानने और दुखी होने के बजाए उन्होंने उस्ताद रखकर उर्दू सीखी और अपना उच्चारण ठीक किया। उन्होंने संगीतकारों की सिखाई-समझाई बातों पर अमल किया। लता मंगेशकर आज से पचास साल पहले ही श्रेष्ठ गायिका थीं। वे चाहतीं, तो इसके प्रभाव में रह सकती थीं। हम इस बातचीत में पाते हैं कि उन्होंने कभी रुकने का नाम नहीं लिया। विषम स्थितियों में भी वे सकारात्मक भाव से जूझती रहीं। सिर्फ उनके पहनावे में ही नहीं, विचार में भी सादगी है। वे सफेद साड़ी पहनती हैं और उनका मन भी सफेद है। उनमें किसी और के प्रति कोई दुराग्रह या नकारात्मक भाव नहीं है। कुछ भी काला नहीं है उनकी सोच में।
सामान्य तौर पर हिंदी फिल्मों के प्रेमियों और विशेषकर हिंदी फिल्म संगीत के प्रेमियों के लिए पुस्तक का अध्ययन रोचक और प्रेरक होगा। युवा गायक और संगीतकार प्रेरणा ले सकते हैं। गरीबी और जिम्मेदारी का जीवन जीते हुए लता कभी अपने ध्येय से विचलित नही हुई। यही कारण है कि वे लंबे समय तक शीर्ष पर विराजमान रहीं। उन्हें दुनिया भर के सम्मानों से सम्मानित किया गया। उनके विरोध में कुछ भी सुनाई नहीं पड़ता। कुछ लोग मानते हैं कि हर व्यक्ति की कामयाबी दांवपेंच होती है। वे सभी कामयाब व्यक्तियों की कमी, खामी और खराबियों की खोज में लगे रहते हैं। लोग ऐसा कहते हैं कि लता स्वयं अपनी बहन आशा भोंसले से प्रतिद्वंद्विता महसूस करती थीं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया है कि ऐसा कुछ भी नहीं था।
संगीत की विभूति लता जी नई प्रतिभाओं का उल्लेख करती हैं। वे आमिर खान को अपना मित्र मानती हैं, तो सुनिधि चौहान की प्रशंसा करती हैं। उनके शब्दों में नए संगीतकारों के प्रति सम्मान है, तो समकालीन लोग और गुरुओं के प्रति श्रद्धा। पुस्तक पढ़ने पर स्पष्ट हो जाता है कि वे सभी के प्रति कोमल और सुरीला भाव रखती हैं। निश्चित ही इस लंबी बातचीत के लिए नसरीन मुन्नी कबीर बधाई की पात्र हैं।
Monday, June 1, 2009
हिन्दी टाकीज:सिनेमा ने बिगाड़ दिया - रघुवेन्द्र सिंह

गांव में रहते हुए मैंने एक भी अंग्रेजी फिल्म नहीं देखी थी। वहां अंग्रेजी फिल्मों का मतलब ब्लू फिल्में होती थीं। इलाहाबाद में मामा के बेटे ने जब मुझे सिनेमाहाल में अंग्रेजी फिल्म देखने के लिए कहा तो मैं चौंक गया। मैंने कहा कि मैं अंग्रेजी फिल्म नहीं देखूंगा, और तुमको भी नहीं देखनी चाहिए। वह फिल्में बुरी होती हैं। उसने पूछा, किसने कहा कि अंग्रेजी फिल्में बुरी होती हैं। तुम एक बार चलकर देखो, फिर मान जाओगे कि उन फिल्मों के सामने हिंदी फिल्में कुछ नहीं हैं। मैंने जब अपनी सोच बतायी तो वह हंसने लगा। मैंने पहली अंग्रेजी फिल्म 'द मम्मी रिटर्न' इलाहाबाद के चन्द्रलोक सिनेमाहाल में देखी।
1- आवारा
2- शोले
3- दीवाना
4- हम आपके हैं कौन
5- दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे
6- कुछ कुछ होता है
7- कभी खुशी कभी गम
8- हम दिल दे चुके सनम
9- कहो ना प्यार है
10- ओए लकी लकी ओए











