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Saturday, May 30, 2009

दीवानगी ऐसी कि परदे पर भगवान देख रहे हों

चेन्नई में रह रहे प्रशांत प्रियदर्शी से आग्रह था कि वि वहां के सिनेमाई अनुभव के बारे में लिखें.लम्बी प्रतीक्षा के बाद उन्होंने यह अनुभव भेजा है.चवन्नी चाहता है कि दूसरे शहरों के अनुभव से भी उसके मित्र और पाठक गुजरें.प्रशांत ने वादा किया है कि वे जल्दी ही हिन्दी टाकीज की कड़ी भी भेज देंगे।
-प्रशांत प्रियदर्शी
यूं तो तमिलनाडु जुलाई सन 2004 में आया था.. मन में कई बातें लेकर जैसे वहां तमिल वालों के बीच रहने में दिक्कत होगी, भाषाओं के बीच के अंतर्द्वंद को झेलना होगा.. मगर यहां आकर ऐसा कुछ नहीं लगा क्योंकि सभी मित्र उत्तर भारत के ही थे.. इसका एक तरफ फायदा हुआ तो वहीं दूसरी ओर घाटा भी हुआ.. यहां की संस्कॄति को भी ठीक से समझ नहीं पाया..

सिनेमा के मामले में भी कुछ हद तक यही हाल रहा.. दक्षिण में होते हुए भी यहां के सिनेमा कल्चर से कोसों दूर रहा.. बस गीत संगीत सुनता था, वो भी इसलिये क्योंकि होस्टल में रहते हुए कभी-कभार यहां के गीत किसी कमरे से पूरी आवाज में सुनाई दे जाता था.. शुरूआत में कुछ तमिल गाने भी खूब सुने,जिनमें अधिकतर तमिल से हिंदी में डब किये हुए गीतों के ओरिजिनल साउंड ट्रैक होते थे या फिर धूम-धड़ाके वाले गीत.. अब चूंकि तमिल समझ में आती तो थी नहीं सो संगीत पर ही सब कुछ टिका हुआ था.. ये कुछ ऐसा ही है जैसे अधिकतर छोटे शहरों में रहने वाले भारतीय वेंगाब्वाज को सुनना पसंद करते हैं, मैं भी अपवाद नहीं हूं इनमें.. यहां आकर ये भी जाना कि हिमेश रेशमिया यहां के लोगों का सबसे प्रिय संगीतकार है, कुछ-कुछ उसकी वजह भी वही धूम धड़ाका है..

फिर जनवरी 2007 में चेन्नई आ गया अपने अंतिम सेमेस्टर के प्रोजेक्ट के लिये.. मेरे साथ मेरा मित्र शिवेन्द्र भी था.. यहां आकर भी यहां हम नहीं होते थे.. क्योंकि लगभग हर साप्ताहांत पर हम वापस वेल्लोर, अपने कॉलेज को निकल लेते थे और पूरे सप्ताह भर घर से ऑफिस और ऑफिस से घर मे ही निकल जाता था.. छः महीने फिर से ऐसे ही निकल गये, मगर इस बार के छः महीने में कुछ तमिल मित्र बनाने का मौका मिला.. वे लोग भी अपना अंतिम सेमेस्टर का प्रोजेक्ट पूरा करने के लिये यहां आये थे.. उनसे कुछ तमिल सिनेमा की जानकारी भी मिली.. मगर कुछ ऐसा नहीं जिसका उल्लेख किया जा सके..

दोबारा चेन्नई आना हुआ 2007 जून में, जब नौकरी ज्वाइन करने के लिये बुलाया गया.. संयोग कुछ ऐसा कि जिस दिन मुझे ज्वाइन करना था उसी दिन रजनीकांत का "शिवाजी द बॉस" रिलीज हो रही थी.. सुबह-सुबह जल्दी जाना था सो कुछ पता नहीं चला, मगर जहां हमारा स्वागत समारोह रखा गया था वहीं एक मित्र ने बताया कि वो इस सिनेमा को किसी भी हालत में जल्दी देखना चाहता था मगर अगले एक महीने तक की सभी टिकटें बुक हो चुकी है.. सो वो रात के 1 से 4 का शो देखकर सुबह सात बजे यहां पहुंच रहा है.. वो तारीख कभी नहीं भूल सकता हूं, आखिर पहली नौकरी का पहला दिन जो था.. :) वो 15 जून था.. उस दिन शाम में घर लौटते समय देखा कि घर के पास बहुत भीड़ थी, लोग लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े थे.. थोड़ी देर बाद समझ में आया कि मेरे घर के ही पास में एक सिनेमा हॉल है और वहां शिवाजी द बॉस देखने के लिये इतनी भीड़ है.. मैंने सोचा कि ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ते रहेगी ये भीड़, मगर नहीं बिलकुल उतनी ही भीड़ अगले दो महीने से भी ज्यादा दिनों तक रही.. तब जाकर समझ में आया कि रजनीकांत क्या चीज है तमिलनाडु के लिये..

चेन्नई में रहते हुए कुछ दिन होने के बाद मुझे पता चला कि मेरे घर के पास ही एक फिल्म स्टूडियो भी है, जिसका नाम ए.वी.एम. स्टूडियो है.. अब जबकि चेन्नई में ही हूं तो एक बार मुझे शिवाजी द बॉस भी देखने का मौका मिला और तब जाकर पता चला कि ये सिनेमा भी ए.वी.एम. स्टूडियो में ही बना है.. कुछ तमिल मित्रों से छानबीन की तो ये भी पता चला कि दूर-दराज के देहाती इलाकों से आने वाले लोगो चेन्नई आते हैं वो एक बार जरूर ए.वी.एम. स्टूडियो देखने की चाहत रखते हैं..

यहां दक्षिण भारत आकर मैंने जो सबसे पहला सिनेमा देखा उसका नाम था "अनियन", जिसे बहुत बाद में हिंदी में भी डब करके लाया गया था "अपरिचित" के नाम से.. उस समय के मुताबिक मुझे वह एक अच्छी एक्शन फिल्‍म लगी थी.. मगर वही बाद में जब हिंदी में आया तब वही सिनेमा मैं हिंदी में एक बार भी पूरा नहीं देख पाया था.. दूसरी तमिल फिल्‍म जो मैंने देखी थी उसकी छाप मेरे मन पर अभी तक है.. उसका नाम था "गिली".. किसी भी फार्मूला सिनेमा में जो कुछ भी हो सकता है, वह सभी कुछ उसमें था.. एक अच्छी और मशालेदार कहानी.. शानदार एक्शन, जिसके अंत में तमिल स्टाइल का एक्शन भी देखने को मिला(अरे वही, एक घूसा लगने पर हवा में चार-पांच बार गोते खाना.. :)) शानदार गाने(उत्तर भारतियों को गिली के गाने अच्छे लगने के पीछे इसका तेज म्यूजिक है और साथ ही एक और कारण होता है वह है उदित नारायण की आवाज..) यहां तक कि अभी भी कोई मुझे कोई तमिल गाना गाने को कहता है तो इसी सिनेमा का एक गीत "अप्पड़ी पोड़े, पोड़े" ही मुंह से निकलता है.. मुझसे मेरे कई तमिल मित्र यह भी शिकायत कर चुके हैं कि तुम सभी उत्तर भारतीयों से कोई भी तमिल गीत गाने को कहो तो यही गीत गाते हो.. :) "गिली" की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसमें तेजी बहुत अधिक थी और डायरेक्शन पर बहुत अच्छे से काम किया गया था..

यहां लोगों कि दीवानगी सिनेमा के प्रति कुछ ऐसी है जैसे वे भगवान का ही एक रूप हों.. जैसा वो परदे पर अपने भगवान को ही देख रहें हों.. ऐसी दीवानगी हमें उत्तर भारत में शायद ही देखने को मिले..

Friday, May 29, 2009

दर्शनीय फिल्म : संगम

आज से चवन्नी के पाठकों के लिए एक नई सीरिज़.क्लासिक,महान या श्रेष्ठ विशेषणों से बचते हुए चवन्नी पर कुस्छ दर्शनीय फिल्मों की चर्चा होगी.इसकी शुरूआत वरिष्ठ मित्र आनंद भारती कर रहे हैं.आप को भी चर्चित फिल्म से सम्बंधित कोई लिंक,लेख या संस्मरण मिलें तो उसे इसमें जोडें।चवन्नी की कोशिश है कि हिन्दी सिनेमा पर हिन्दी में सामग्रियां उपलब्ध हों.उम्मीद है कि चवन्नी की नई कोशिश को पुराना समर्थन और सहयोग मिलेगा.बेहिचक बताएं कि इस सीरिज़ में और क्या जोड़ा जाना चाहिए?

दर्शनीय फिल्‍म
१.संगम

अवधि 238 मिनट
विधा म्‍यूजिकल रोमांस
लोकप्रियता की ऐसी कोई ऊंचाई नहीं रही, जिसे राज कपूर के साथ जोड़ा जाए। राज कपूर हिंदी फिल्‍म उद्योग के पहले और सबसे बड़े शो मैन आज भी माने जाते हैं। उन्‍होंने सेक्‍स के साथ संगीत का जो रिश्‍ता बनाया, उसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्‍होंने फिल्‍म उद्योग में बने फार्मूले का कभी इस्‍तेमाल नहीं किया। अपनी लीक खुद बनाई और दूसरों के लिए प्रेरक बने। 'संगम' (1964) उस कड़ी का एक ठोस नाम है।
'संगम राज कपूर के जीवन का एक टर्निंग पाइंट था। यहां से उन्‍होंने 'बरसात' के बाद प्रेम को मुक्‍म्‍मल तौर पर अपना विषय बनाया। अब तक वह सामाजिक विषयों पर फिल्‍में बनाते रहे थे। हालांकि प्रेमत्रिकोण पर अनगिनत फिल्‍में बन चुकी थीं और बन भी रही थीं, लेकिन 'संगम' ने जो धूम मचाई, उसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। यह भी सही है कि 'संगम' की प्रेरणा 'अंदाज' से मिली थी। 'अंदाज' में दिलीप कुमार, नरगिस तथा राज कपूर थे। उस कहानी का असर राज कपूर के दिमाग में इस कदर सवार था कि उन्‍होंने इसका रीमेक बनाने का फैसला कर लिया, जो 'संगम' के रूप में सबके सामने आई। दरअसल 'संगम' में 'अंदाज' की कास्‍ट को ही दोहराना चाहते थे, मगर नरगिस की शादी हो जाने तथा दिलीप कुमार की कुछ शर्तें इसमें आड़े आ गईं। तब इसमें राज कपूर ने अपने अतिरिक्‍त वैजयंती माला तथा राजेन्‍द्र कुमार को साइन किया।
कहते हैं, पहले इस फिल्‍म का नाम 'घरौंदा' रखा गया था, मगर जब वैजयंती माला ने इसकी कहानी सुनी तो राज साहब को डरते-डरते एक सुझाव दिया। कहा, 'क्‍यों नहीं इस फिल्‍म का नाम 'संगम' रख दिया जाए।' राज कपूर को यह नाम बिल्‍कुल सटीक लगा और वही फाइनल हुआ। इसके चर्चित गीत 'बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं ...' के बारे में भी एक किस्‍सा है। वैजयंती माला मद्रास गई हुई थीं। 'संगम' की शूटिंग प्रारंभ होनी थी। राज कपूर ने उन्‍हें टेलीग्राम भेजा। उसमें लिखा, 'बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं? जवाब में टेलीग्राम आया, उसमें लिख था, 'संगम होगा, होगा, क्‍यों सताते हो।' राज कपूर को इन दोनों पंक्तियों में एक गीत नजर आ गया और वह गाना बन गया। उस गाने ने रिकॉर्ड कायम कर दिया।
राज कपूर जब 'संगम' बना रहे थे, तब भी उनके दिमाग में नरगिस ही छाया की तरह मंडरा रही थीं। मगर वैजयंती माला ने अपने व्‍यवहार से राज कपूर पर इतना जादू कर दिया कि दोनों के नाम भी एक बार उभर कर सबके सामने आ गए। इसके पहले वैजयंती माला 'नजराना' में काम कर चुकी थीं, मगर राज कपूर की उनसे दूरी बनी रही। 'संगम' में दोनों के रिश्‍ते परवान चढ़े। जिन दिनों 'संगम' बन रही थी, तब और भी फिल्‍में वैजयंती माला के पास थीं, मगर 'संगम' को लेकर वह ज्‍यादा सम्‍मोहित और उत्‍साहित थीं। लोग बताते हैं कि वैजयंती माला अन्‍य फिल्‍म निर्माताओं के सेट से अचानक भाग खड़ी होती थीं और हर बार मिलती थीं, वह आर. के. स्‍टूडियो में।
'संगम' राज कपूर की पहली रंगीन फिल्‍म थी और इसकी शूटिंग रोम, पेरिस, लंदन, हैम्‍बर्ग आदि जगहों में की गयी थी। कहते हैं विदेशों में शूटिंग करने का सिलसिला राज कपूर ने इसी फिल्‍म से शुरू किया था। विदेशों में शूटिंग के दौरान राज कपूर हर रोज अपनी दादी यदुगिरी देवी, अपनी मौसी, फिल्‍म की हीरोइन वैजयंती माला, अलाउद्दीन, राजू कर्माकर, राजेंद्र कुमार, जे के नंदा, सरोस मोदी, सी एल बाली आदि को किसी न किसी नाइट क्‍लब में पार्टी दिया करते थे। जहां-जहां इस फिल्‍म का प्रीमियर हुआ, उस-उस शहर में वे अपनी पूरी यूनिट को ले गए। इस कारण जमकर फिल्‍म की एडवांस ओपनिंग हुई।
फिल्‍म में मुख्‍य तीन पात्र हैं - सुंदर (राज कपूर), गोपाल (राजेंद्र कुमार) तथा राधा (वैजयंती माला)। ये तीनों इलाहाबाद के संगम के प्र‍तीक जैसे हैं - गंगा, जमुना और सरस्‍वती। सुंदर, गोपाल और राधा बचपन के दोस्‍त हैं। सुंदर और गोपाल दोनों राधा के प्‍यार में पड़ जाते हैं, लेकिन राधा प्‍यार करती है गोपाल से। सुंदर गरीब है, जबकि गोपाल पैसे वाला। एक दिन सुंदर अपने दोस्‍त गोपाल को मजबूर करता है कि वह राधा के मां-बाप से मिलकर उसकी (सुंदर) शादी की बात करे। दोस्‍ती की वजह से कशमकश के बावजूद गोपाल उसके माता-पिता से मिलता है और सुंदर का प्रस्‍ताव रखता है। चूंकि सुंदर साधारण नौजवान है, इसलिए राधा के मां-बाप उससे आनाकानी कर जाते हैं। तब आहत सुंदर सेना में भर्ती होने का फैसला करता है, ताकि वह राधा का हाथ मांग सके। इसी बीच खबर मिलती है कि सुंदर की मौत हो गई। गोपाल और राधा का प्‍यार परवान चढ़ने लगता है। लेकिन दो साल बाद सुंदर के जिंदा रहने की बात सामने आती है। गोपाल के सामने संकट पैदा हो जाता है। राधा के मां-बाप उसकी शादी सुंदर से करा देते हैं।
सुंदर को एक दिन राधा के ज्‍वैलरी बॉक्‍स में एक प्रेम पत्र मिलता है। सुंदर परेशान हो जाता है और गुस्‍से में आकर पत्र लिखने वाले का नाम पूछता है। सुंदर उसकी जान लेने पर उतारू है। मगर राधा उसका नाम नहीं लेती है। सुंदर और राधा के घरेलू जीवन में उथल-पुथल शुरू हो जाती है। हालांकि शादी के बाद राधा पूरी तरह सुंदर के प्रति समर्पित हो जाती है, लेकिन प्रेम पत्र ने दोनों के विश्‍वास को हिलाकर रख दिया।
यह जो संबंध है, दरअसल वह राज कपूर के निजी संबंधों की तरह है। यानी लव एंड हेट का। प्‍यार भी नफरत थी। सुंदर जब अपनी पत्‍नी राधा को यातना देता है तो वह खुद को भी उत्पीड़ित करता है। मगर जब राधा उसे अपनी आंखों में झांकने के लिए कहती है तो वह उसमें वही प्‍यार और सच्‍चाई देखता है। और जब राधा घर छोड़ने के लिए तैयार होती है तो सुंदर कहता है, 'मत जाओ राधा, अपना घर छोड़कर मत जाओ।' राज कपूर ने प्‍यार और नफरत के इन क्षणों को जिस तरह फिल्‍माया था, वह हर दर्शक को भाव विहवल कर देता है। जब सुंदर अपने आप से लड़ते हुए परेशान हो जाता है तो वह राधा से कहता है, 'बोलो मैं क्‍या करूं? तो राधा जवाब देती है, 'मुझसे तुम्‍हारा दुख बरदाश्‍त नहीं होता।'
उधर गोपाल भी उनके बारे में सोच-सोचकर परेशान है। दोनों के रास्‍ते से हटने के लिए खुद को गोली मार लेता है। गोपाल का अंतिम डायलाग काफी लोकप्रिय हुआ था -'गंगा और जमुना का मिलन होने के लिए सरस्‍वती को लुप्‍त होना ही पड़ता है।' यह फिल्‍म पूरी तरह सुंदर और राधा की थी, मगर गोपाल अपना अंत जिस खयाल के साथ करता है, दर्शकों की सहानुभूति उसे ही मिल जाती है।
अभिनय, निर्देशन, छायांकन तथा गीत-संगीत की दृष्टि से यह फिल्‍म आज भी भीड़ बटोरती है। लोग भूल गए कि यह 'अंदाज' को ध्‍यान में रखकर बनाई गई थी। इस फिल्‍म ने यह भी साबित कर दिया कि कहानी भले कहीं से प्रेरित हो, मगर उसे पेश करने का जो अंदाज राज कपूर में है, वह और किसी में नहीं। सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशन का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार राज कपूर को मिला था। सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेत्री का वैजयंती माला को प्राप्‍त हुआ।
फिल्‍म का संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था। गीत शैलेन्‍द्र के थे। 'बोल राधा बोल...', 'मुझे बुड्ढा मिल गया...', 'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर...' आज भी हिट गानों में शामिल हैं। इसके अतिरिक्‍त कलाकार थे - नाना पलसीकर, अचला सचदेव, ललिता पवार, इफ्तेखार, राज मेहरा आदि।


वर्ष 1964
निर्माता और निर्देशक राज कपूर
गीत शैलेन्‍द्र
संगीत शंकर जयकिशन
छायांकन राधू कर्माकर
संपादन राज कपूर

फिल्‍मफेअर पुरस्‍कार
श्रेष्‍ठ अभिनेत्री वैजयंतीमाला
श्रेष्‍ठ संपादन राज कपूर
श्रेष्‍ठ निर्देशन राज कपूर
श्रेष्‍ठ साउंड रिकार्डिंग अलाउदीन खान कुरेशी


















१.संगम

Thursday, May 28, 2009

दरअसल:मंदी का मारा निर्देशक

-अजय ब्रह्मात्मज
यह एक निर्देशक की सच्ची कहानी है। सच्ची कहानियों में नाम नहीं देने का रिवाज है। नाम आ जाए, तो कलई खुल जाती है। एक लिहाज से ऐसा होना ही चाहिए। कई बार नाम देने से कहानी के नायक का नुकसान होता है। उसके बनते काम बिगड़ने लगते हैं। हम भी यहां निर्देशक, स्टार और प्रोडक्शन हाउस के नाम नहीं देंगे।
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित युवा निर्देशक को एक धांसू स्क्रिप्ट मिली। उसने लेखक के साथ बैठकर उसे अंतिम रूप दिया। फिल्म बाप-बेटे की कहानी थी। लिहाजा बाप के रोल के लिए आजकल कैरेक्टर रोल कर रहे पुराने जमाने के एक हीरो से बातचीत हुई। वे राजी हो गए। उनके साथ पिछली कुछ फिल्मों में सेकेंड-थर्ड लीड से खुद को साबित कर चुके हीरो को लिया गया। एक नई प्रोडक्शन कंपनी आ गई। तय हुआ कि सीमित बजट यानी चार करोड़ में फिल्म पूरी कर ली जाएगी। फिल्म की घोषणा हो गई। अखबार और टीवी चैनलों पर खबरें आ गई। निर्देशक खुश कि उसकी फिल्म बन रही है। बाप का रोल निभा रहे पुराने हीरो ने निर्देशक को घर पर बुलाया। खानपान के शौकीन हीरो ने निर्देशक को सलाह दी कि क्यों न वह यह स्टोरी उनके बेटे को सुनाता है! उनके बेटे ने हालांकि ज्यादा फिल्में नहीं की हैं, लेकिन माना जा रहा है कि वह भविष्य का सुपर स्टार है। निर्देशक ने गुरेज नहीं किया। इस बार उसने बाप-बेटे को एक साथ कहानी सुनाई। स्टोरी सीटिंग तीन घंटे चली। बेटा तो उछल पड़ा। उसने कहा, सर जी, यह फिल्म तो करनी है। उसने अपने बाप को कहा, डैड, प्लीज इनसे कहो कि हम दोनों के साथ ही यह फिल्म बनाएं। बाप ने दबाव डाला और एक फिल्मी चारा फेंका। देखो, हम बाप-बेटे एक साथ पर्दे पर बाप-बेटे के रोल में आएंगे, तो फिल्म को लेकर लोगों में बहुत ज्यादा क्योरीसिटी होगी। निर्देशक का मन डोल गया। उसकी पिछली दो फिल्में फ्लॉप रही थीं। उसने सोचा, अगर बाप-बेटे को लेकर यह फिल्म बन जाती है, तो वह बड़े डायरेक्टर में शुमार हो जाएगा।
उसने पहले हीरो से बात की। उसे किसी तरह फिल्म छोड़ देने के लिए राजी किया। उसने वादा किया कि इस फिल्म की कामयाबी के बाद वह उसे लेकर सोलो हीरो लेकर फिल्म बनाएगा। पहला हीरो राजी हो गया। वह कर भी क्या सकता था! बाप-बेटे की फिल्म की बात आगे बढ़ी। बाप ने निर्देशक से कहा कि देखो, यह फिल्म सालों बाद हमारे प्रोडक्शन हाउस से आएगी। चूंकि प्रोडक्शन के काम में मेरे भाइयों की सहमति आवश्यक है, इसलिए एक बार मेरे भाइयों को कहानी सुना दो। निर्देशक को कोई दिक्कत नहीं हुई। उसने चटपट हां कर दी। दिन सुनिश्चित हुआ। प्रोडक्शन हाउस के रुतबे के मुताबिक स्वादिष्ट लंच के साथ स्टोरी सेशन चला। बाकी भाइयों को भी कहानी पसंद आई। उन्होंने कहा कि हमलोग यह फिल्म बनाएंगे।
अगले दिन बाप का रोल निभा रहे पुराने हीरो का फोन आया। उन्होंने कहा कि मेरे भाइयों को तुम्हारी कहानी बहुत पसंद है। वे चाहते हैं कि हम बाप-बेटे की फिल्म के लिए दूसरा बड़ा डायरेक्टर सही रहेगा। तुम्हारे नाम पर फिल्म नहीं बिक पाएगी। तुम ऐसा करो कि कहानी दे दो। तुम्हारे साथ कोई और फिल्म कर लेंगे। निर्देशक ने तुरंत मना कर दिया। वह उस कहानी के दम पर बड़े निर्देशकों की जमात में आना चाहता था। उसकी जिद देखकर पुराना हीरो फिल्म के लिए राजी रहे, लेकिन उन्होंने साफ कह दिया कि फिर मेरा बेटा काम नहीं करेगा। अब निर्देशक फिर से पहले हीरो के पास लौटा। इस बार उसने मना कर दिया और ताना मारा कि जाओ भविष्य के सुपर स्टार के साथ काम करो। मजबूरन निर्देशक को एक नया संजीदा हीरो चुनना पड़ा।
संजीदा हीरो को पिछली फिल्म में अभिनय के लिए तारीफ मिली थी, लेकिन अभी उसका मार्केट नहीं बना था। पुराने हीरो ने उसका नाम सुना, तो साफ मना कर दिया। शायद वे फिल्म से बाहर होना चाहते थे। उन्हें बहाना मिल गया। अब निर्देशक ने बाप के रोल के लिए अनुभवी और अनेक पुरस्कारों से सम्मानित बुजुर्ग अभिनेता से बात की। संजीदा अभिनेता और बुजुर्ग अभिनेता की पहली फिल्म खूब सराही गई थी। उन्हें लगा कि फिर से कुछ कमाल हो जाएगा। निर्देशक भी संतुष्ट था कि चलो बहुत बड़ी कॉमर्शियल नहीं, तो ठीक-ठाक-सी अच्छी फिल्म तो बन ही जाएगी! निर्देशक नई टीम के साथ निर्माता के पास पहुंचा। निर्माता ने निर्देशक की मेहनत की तारीफ की। कुछ देर तक बहलाने वाली बातें करने के बाद उसने अपनी बात रखी। उसने कहा, इन दोनों के साथ अच्छी फिल्म बनेगी। पुरस्कार और सम्मान मिलेंगे, जिन्हें तुम अपने घर में अच्छे से सजाओगे, लेकिन मेरा क्या होगा? इस फिल्म की कोई मार्केट वैल्यू नहीं होगी। मेरे लिए इन ऐक्टरों के साथ फिल्म रिलीज करना मुश्किल हो जाएगा। इसे फिलहाल रहने देते हैं। कुछ नया सोचो। इन ऐक्टरों के साथ ही नई फिल्म पर काम करो..। किस्सा यहीं खत्म नहीं होता.. और भी समीकरण बने-बिगड़े। निर्देशक आज भी अपनी स्क्रिप्ट लिए घूम रहे हैं। आठ बार उसकी फिल्म फ्लोर पर जाते-जाते रह गई है। तभी मंदी आ गई और फिल्मी कारोबार की सारी गतिविधियां ठंडी हो गई। यह एक निर्देशक की कहानी है। हमने किसी और निर्देशक को यह कहानी सुनाई, तो उसने कहा कि अरे, मेरे साथ भी लगभग ऐसा ही हुआ था। बाद में पता चला कि यह एक-दो नहीं, लगभग सभी संभावित निर्देशकों की कहानी है..!

Tuesday, May 26, 2009

हिन्दी टाकीज:नाम, फल, फूल, शहर और सिनेमा-गीताश्री


हिन्दी टाकीज-३८

गीताश्री विलक्षण हैं.कैसे?यह आप उनसे मिल कर ही समझ सकते हैं.मूल रूप से रोमांटिक और भाव प्रवीण.वे इच्छाओं,भावनाओं,कुंठाओं और उत्कंठाओं को भांप लेती हैं.यह गुण विस्तृत अनुभव से आता है.चवन्नी ने महसूस किया कि गीताश्री के निंदकों और प्रशंसकों की कमी नहीं है...उन्होंने अपने बारे में लिखा है...हिंदी आउटलुक (दिल्ली) में फीचर एडीटर हूं. यहां काम करते हुए यह सातवां साल है। मस्तमौला हूं..जमाने की परवाह नहीं करती। सिर्फ उनकी करती हूं जो मेरे लिए मायने रखते है। मुंहफट हूं, इसीलिए सबको नहीं सुहाती. पत्रकारिता में यह 17वां साल है...। पत्रकारिता में आने से पहले सोचती थी सिनेमा मनोरंजन का माध्यम है। मैं इसीमें अपने सुख दुख की दवा तलाशती और अपने सवालो के जबाव भी..अब थोड़ा बदली है सोच. सिनेमा मनोरंजन से बहुत आगे की चीज है। इसे सामाजिक दायित्व और सरोकार से भी जोड़ कर देखने लगी हूं. करियर की शुरुआत हुई राजनीतिक रिपोर्टिंग से...इन दिनों फिल्म पेज का जिम्मा संभाल रही हूं.जब यह जिम्मा मिला था तब मैं खुश हुई कि मेरा सिनेमा प्रेम अब आफिशियल हो गया और दुख हुआ कि मैं मेनस्ट्रीम की पत्रकारिता से कट जाऊंगी. तब तक मैं सिर्फ सिनेमा से प्रेम करती थी, उसका ज्ञान नहीं था। काम करते करते कुछ कुछ ज्ञान भी हो चला है। जब भीतर घुस कर जाना तब पाया ये ज्ञान का अथाह समंदर है जो गहराई में जाने पर ही खुलता है। इसकी पत्रकारिता करने के लिए उथला ज्ञान नहीं चलेगा। पैशन के साथ ज्ञान भी जरुरी..अभी बटोर रही हूं॥
धुंधली-सी याद है, मेरी जिंदगी की सबसे पहली फिल्म धार्मिक थी। मेरी मां सिर्फ धार्मिक फिल्में देखा करती थीं। मैंने बचपन में जितनी फिल्में देखीं, किशोरावस्था तक वे सारी धार्मिक थीं। जैसे ही मेरी दीदीया (दीदीया) थोड़ी बड़ी हुई, उन्होंने धार्मिक सिनेमा से विद्रोह कर दिया। मां और दीदीया की बहस मैं टुकुर-टुकुर सुनु-देखूं। एक दिन दीदीया मां से उलझी हुई थीं, हमें भक्त प्रहलाद नहीं देखना, हमें राजेश खन्ना की कोई फिल्म देखनी है। इस बहस में बाहर का शोर सुनाई नहीं देता था। मैं जानती थीं, मां ही जीतेंगी और हमें एक और धार्मिक फिल्म देखकर रोना पड़ेगा।

मुझे थोड़ा थोड़ा याद है, बाद में मां ने बताया कि जब हरीशचंद्र तारामती फिल्म में रोहिताश्व की मौत हुई तो मैं सुबकने लगी। मां ने मुझे हैरानी से देखा फिर सिनेमा में डूब गई। बीच-बीच में वे परदे के भगवान को प्रणाम कर लेतीं और मेरा भी हाथ उठा देती। किसी एक धार्मिक फिल्म में एक देवता राक्षस के हाथों मारे गए-मां के मुंह से चीख निकली और मैं फूट-फूट कर रोने लगी। छोटा भाई राजू भी साथ में था। मैंने तब ये समझा कि ये देवता सचमुच का मरा। फिर कभी जीवित नहीं होगा। मेरे लिए, फिल्मों में जो दृश्य दिखाए जाते थे, उनका मतलब सच था। जैसे उडऩ खटौला, जादू की छड़ी, गायब हो जाना...मौत का दृश्य...आदि-आदि। उस देवतानुमा नायक की मौत से परदे पर जो खून पसरा-वो आज तक मेरे जेहन में चिपका हुआ है। मैं आज भी खून की एक बूँद भी देख लूं तो वह दृश्य याद आता है और मेरे मुंह से चीख निकल जाती है। ये बात मेरे सभी करीबी जानते हैं।
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जैसे हर बच्चे के सपने में कुछ परियां रहती हैं, कुछ देवता बसते हैं-और एक राजकुमार होता है। वैसे ही शायद मेरे मन में भी कुछ था। मेरी दो बड़ी बहने राजेश खन्ना की फिल्मों के बारे में खूब चटखारे लेकर बात करती। उन्हीं दिनों मैंने सुना कि देवानंद पर काले कपड़े पहनकर बाहर निकलने पर पाबंदी लग गई है। कुछ लड़कियां उन्हें काले कपड़ों में देखकर सुधबुध खो बैठी और अपनी छतों से छलांग लगाकर जान दे दी। मां ने फरमान जारी किया- देवानंद की फिल्में देखना बंद। इधर बहनें-राजेश खन्ना की दीवानी हो रही थीं। बेलबॉटम पहनकर घूमने वाली मंझली दीदी ने एक दिन मुझे पटाया कि मैं बाहर गली में जाऊं और रिक्शे पर जो सिनेमा का प्रचार कर रहा है वो देख सुनकर आऊं।

हमारा डेरा (सरकारी मकान) किसी गली-मोहल्ले में नहीं, थाना के कैंपस में था। पिता पुलिस अधिकारी थे। कैंपस में चोर-सिपाही के अलावा ना कुछ दिखाई देता था, न सुनाई देता था।

बहनें किशोर थीं-वे इतनी आसानी से मां की चौकस निगाहें बचाकर गली-मोहल्ले में निकल नहीं सकती थीं। मेरे लिए आसान था। मेरी उम्र तब बमुश्किल सात-आठ साल की रही होगी। ये बात बनियापुर की है। मैं भागती हुई गली में पहुंची और रिक्शे वाले का इंतजार करने लगी। थोड़ी देर बाद उधर से गुजरा-लाउड-स्पीकर से उद्घोषणा करता हुआ-भाईयों एवं बहनों...देखिए फलां सिनेमाहाल, छपरा में एक इनसान और एक जानवर का मासूम प्रेम...एक हसीना की अदाएं...रोज चार शो....... देखिए-देखिए आज के दौर का सबसे कमाल हीरो-राजेश खन्ना का इश्टाइल...हाथी मेरे साथी...चल-चल मेरे हाथी, चल मेरे हाथी...चल ले चल खटारा खींच के...। रिक्शे के चारो तरफ बड़े-बड़े पोस्टर-राजेश खन्ना-तनूजा ओर हाथी की दिलकश तस्वीर...।
मन हुआ रिक्शे पर सवार होकर छपरा चली जाऊं। अचानक डर सा लगा और मैं भागकर घर आ गई। अब पूरा घर एक तरफ और मां एक तरफ। बमुश्किल मां को समझाया गया कि उसमें हाथी की कहानी है, बच्चों के देखने लायक । पिताजी थाने से तलब किए गए। वे आए और हमेशा की तरह मेरी जिद पूरी करने में खुद को धन्य समझने वाले पिता ने सारा इंतजाम कर दिया। छपरा जाने वाली लोकल पब्लिक ट्रांसपोर्ट थाने बुलाई गई-सवारी से भरी हुई। उसमें आगे की वीआईपी सीट खाली थी। हम सभी लदे और छपरा रवाना। वहां टिकट (पास) लेकर सिपाही खड़ा था, इंटरवल में खाने पीने का इंतजाम। यह सिलसिला चलता रहा।

कोई फिल्म क्या मजाल कि हमारी बिना देखें हॉल से उतर जाए। रिक्शे वाले को संदेश भिजवाया गया कि जैसे ही कोई नहीं फिल्म लगे, वो घर के पिछवाड़े से, कैंपस में बोलता हुआ निकले ताकि हमें पता चले। वो प्रति सप्ताह एक बार निकलता जब कोई फिल्म रिलीज होती, घर में सबके कान खड़े रहते। अब हमें धार्मिक फिल्मों से मुक्ति मिल चुकी थी।
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असली बहार तो हमने लूटी गोपालगंज में। शहर था, 70 का दशक । दो सिनेमा हॉल और बॉबी का जमाना। श्याम सिनेमा के मैनेजर हमारे पड़ोस में रहते थे और उनकी बेटी हनी (मधु) मेरी दोस्त। अंकल मैनेजर, तो फिर क्या सोचना। जनता टॉकीज में थाने का रुआब चलता था। दोनों जगह फर्स्ट शो-की पासेज घर आ जातीं और हमारा पूरा कुनबा फिल्म देखने जाता। जैसे हम किसी समारोह में शामिल होने जा रहे हों। इस दौरान धार्मिक फिल्में लगती तो सिर्फ आंटियां जाती और हम गच्चा दे देते। मुझे लगता था मां को सिर्फ धार्मिक फिल्में पसंद हैं। पिताजी के पास समय नहीं होता कि वे फिल्म देख पाएं। वे देर रात को मां को फिल्म देखने चलने को कहते कभी-कभार। मुझे इस संबंध में इतना याद है कि श्याम टॉकीज में फिल्म लगी थी 'गुप्त ज्ञान'। बहुत चर्चा थी दबी जुबान में। मां और आंटियां खुसुर-पुसुर करती। एक शाम मां बहुत हड़बड़ी में हम सबको खिला-पिलाकर सुलाने के चक्कर में दिखीं। गोपालगंज के उस डेरे में बड़ा-सा आंगन था। आंगन में नीम का पेड़। उसकी कोमल पत्तियां बहुत खानी पड़ती थी। मंझले भैया बहुत चाव से खाते थे तो हमें उसका पालन करना पड़ता था खैर...
गर्मी की शाम थी। आंगन में कई खाटें बिछी थी। छोटे शहरों-कस्बों और गांव में रात जल्दी आती है और जल्दी जाती भी है। लोग-बाग जल्दी सो जाते हैं। हम सब खटिया पर पसर गए। उस रात मां-पिताजी गुप्त ज्ञान देखने चले गए। लेकिन मेरी आंखों में नींद कहां। करवटें बदलते-बदलते अंधेरे में नीम की पत्तियां टटोलते वक्त कटा। जब वे लोग लौटे और मुझे जगा देखा तो मां सकपका गई। बाबूजी मुस्कुराते हुए कमरे में सोने चले गए। कई दिनों तक मैं गुप्त ज्ञान का ज्ञान लेने के लिए मां को कुरेदती रही और अंतत: पता चला कि उसमें आदमी-औरतों के गंदे-गंदे सीन थे। नंगे-नंगे जो बच्चों को नहीं देखना चाहिए। किशोर हो चुकी थी- मैं। वह फिल्म देखने की ऐसी ललक लगी कि सहेलियों को मैं राजी करने में जुट गई।

हम पहुंचे, मैनेजर चाचा की नजर बचाकर लाइन में लग गए। तीन सहेलियां थीं। खूब भीड़ थी-हमारा दिल धडक़ रहा था। नई किस्म की उत्तेजना से। हम एक नए अनुभव से गुजरने वाले थे। एक नया संसार खुलने वाला था। हम लाइन में थे-धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए-कि अचानक सिनेमा हाल के एक अधिकारी ने हम तीनों की कलाई पकड़ी और लगभग घसीटता हुआ रिक्शे पर बैठा आया। वह लगातार चीख रहा था- इस फिल्म में बच्चे एलाउड नहीं है। एडल्ट फिल्में हैं। किसने भेजा है तुम लोगों को। चलो अभी घर छोडक़र आता हूं...एक रिक्शे पर हमें ठूंस कर वो मेरे घर पटक गया। फिर तो पूछो मत-जीवन में पहली बार कैद मिली और सहेलियों का घर दूर था सो वो रिक्शा से उतरकर रफूचक्कर। बाद में मेरी मां ने उनकी पिटाई का भी बंदोबस्त किया। इस घटना से इतना हुआ कि उसके बाद मां-पिताजी ने देर रात की फिल्में देखना हमेशा के लिए बंद कर दिया।

इसी शहर में आकर मैंने एक नया गेम सीखा। जो क्लास के दौरान ही खेला जाता था। टीचर समझती कि हम पढाई में डूबे हैं और सवाल हल कर रहे हैं जबकि हम किसी और दुनिया में डूबे होते। कॉपी के पन्ने पर पांच खाने बनाए जाते। सबसे ऊपर लिखा जाता॥नाम, फल, फूल, शहर, सिनेमा। जो जीता वो एक अक्षर बोलता और गेम शुरु...जैसे अ बोला तो अ से किसी व्यक्ति का नाम, एक फल, एक फूल एक शहर और एक फिल्म का नाम लिखना होता था। जो जल्दी और सारे नाम सही सही लिखता वो विजेता घोषित..बाद में अपनी जेब खर्च से इनाम देना पड़ता।
मैं और नामों में जरुर चूक जाती मगर सिनेमा के नाम में कभी नहीं चूकी...उस दौर में बनने वाली सारी फिल्मों नाम जुबां पर थे, चाहे फिल्म देखूं या नहीं..वैसे फिल्में देखने का यह स्वर्ण काल था।
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मेरे ऊपर तो सिनेमा का ऐसा असर कि उसका असर गांव तक गया। गर्मियों की छुट्टी में हम गांव जाते थे आम-लीची खाने। घर के बाहर बड़ी-सी दालान थी। कई चौकियां एक साथ बिछी हुई। उस पर मर्द होते थे। बाहरी और घरवाले।

छुट्टियों में पूरा परिवार जुटता था। मेरी उम्र के चार-पांच भाई-बहन चचेरे थे। तीन भाई और तीन बहने एक जैसे। थोड़ी ऊपर-नीचे उमर रही होगी। शाम को घर में आदतन सब जल्दी सो गए और घर के पुरुष सदस्य टीवी पर कृषि दर्शन कार्यक्रम देखने गांव के स्कूल में गए थे। गांव का इकलौता टीवी सेट था-जहां गांव की धार्मिक बूढ़ी औरतें भी जमीन पर बैठ कर मजे से फिल्में देखती और आंचल से ढंक कर रामनाम की माला जपती।


खैर। हम सब भाई-बहनों ने मीटिंग की और तय किया गया कि दालान की चौकी को मंच मानकर हम एक फिल्म-फिल्म खेलेंगे, पूरी तरह ड्रामा करेंगे। औरतें अंदर थी। हम बड़ी बहनों के दुपट्टे उठा लाए। एक फूल दो माली फिल्म बहुत पसंद आई थी हमें...। सबने देखी थी- बस। कोई संजय खान बना, कोई साधना, कोई विलेन, कोई कुछ कोई कुछ...। फिल्म हमें पूरी तरह याद थी। आज दृश्य याद नहीं। मैं नायिका थी और एक भाई हीरो और हम गा रहे थे...ये परदा हटा दो...जरा मुखड़ा दिखा दो...हम प्यार करने वाले हैं कोई गैर नहीं...। चचेरे भाई ने मेरे मुंह से परदा उठाया, तब मैंने गाना शुरू किया- शुकर करो कि पड़े नहीं है मेरी मां के डंडे.. एक हाथ में हो जाते...अरमान.. तुम्हारे ठंडे...और लाइन खत्म होते होते हम जमीन पर धाराशायी हो गए थे। सामने बडक़ी चाची खड़ी दहाड़ रही थीं। वे शायद हमें रोमांटिक सीन में देखकर हिल गई थी। उनकी नजर में भाई-बहन ऐसा सीन कैसे कर सकते थे। संजय खान और साधना गिर पड़े थे और चाची की दहाड़ रात के अंधेरे को देर रात तक चीरती रही।
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पिताजी का तबादला गोपालगंज से छोटे से कस्बे कुचाईकोट में हो गया। हमने सबसे पहले पता किया कि वहां कोई सिनेमा हॉल है या नहीं। सिनेमा हॉल तो दूर, उस बस्ती में मनोरंजन के नाम पर दिन दहाड़े सिर्फ लौंडा नाच ही होता था आर लौंडे एक ही गाना गाकर प्राण ले लेते थे...हाय-हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी...।


मुझे अपनी सहेलियों से दूरी उतनी नहीं खली जितनी सिनेमा से दूरी खल गई। फिर तो कई साल किसी अच्छे शहर में, सिनेमा हॉल वाले शहर में तबादले के इंतजार में कट गए। बॉबी फ्रॉक पहने-पहने मैं दसवीं कक्षा में पहुंच गई और जिस कस्बे में पहुंची, वहां एक सिनेमा हॉल का पता चला। वैशाली जिले का सरैया थाना इलाका। बिनाका गीत माला सुन-सुनकर बोर हो चुकी मंझली दीदी ने साथ दिया और हम सिनेमा हॉल का मुआयना करने पहुंचे। फिल्म लगी थी-हमारी याद आएगी।

रंगीन जमाने में हमने मन मार कर वो श्वेत-श्याम फिल्म खटमल वाली कुर्सी पर बैठकर देखी। हॉल में जो लोग थे-उनके बारे में कुछ भी कहना मेरी प्रगतिशील सोच के विरुद्ध है। मगर जब बाहर निकले तो ये तय हो चुका था कि नहीं-दुबारा नहीं। अब कभी मुजफ्फरपुर जाएंगे, तभी देखेंगे।

मौका जल्दी ही आया। रिश्तेदारी में बच्चा पैदा हुआ और उसकी छठी हॉस्पीटल में थी। वहां सपरिवार जाना था। कितना उत्साह-कितना उछाह, आह। जैसे पुरस्कार लेने जा रहे हों। छठी की रात सारे रिश्तेदार जुटे। हम बहनों ने एक चचेरे भाई को पटाया और लैला-मजनूं देखने पहुंच गए। उधर बच्चे की छठी में काजल सेंकने के लिए बुआओं की खोज होने लगी। उधर हम तो मजनूं के दर्द से कराह रहे थे, लैला के साथ गा रहे थे-कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को...। हम इस बात से बेपरवाह...कि वहां जाकर क्या भुगतना पड़ेगा॥किसकी छठी..कैसी छठी...जो है यही सुख है, आह सिनेमा। तब मोबाइल तो था नहीं कि वो हमे तलाश पाते या बुला लेते। हमें तो जैसे कुछ ध्यान नहीं था। फिल्म रोते-सुबकते देखी और जमाने को लानते भेजते हुए बाहर निकले। शहर पूरी तरह बारीश में नहाया हुआ । बूंदा-बांदी हो रही थी। रात के नौ बजे थे। रिक्शा दूर-दूर तक नहीं। वे लोग सौभाग्यशाली रहे होंगे जो सिनेमा के परदे पर दी एंड लिखने से पहले निकल गए। मुझे आज भी ऐसे लोगों पर गुस्सा आता है-तब भी आया था। उस रात समझ में आया कि रात में छोटे शहर में रिक्शे की मारामारी होती है। सो होशियार लोग अनुभव से जान जाते हैं, फिल्म कहां खत्म होने वाली है-वे निकल पड़ते हैं। हम चूक गए। फिर पैदल मार्च करते, भीगते-कांपते होस्पीटल पहुंचे। छठी के अवसर पर मिलने वाली खीर-पूरी के बारे में सोचते हुए। वहां पहुंचने पर हम मजनूं की गति को प्राप्त हुए।
सिनेमा-प्रेम में मेरी मंझली दीदी का साथ मुझे नियमित मिलता था। सो मैट्रिक का पूरक एक्जाम देने एक बार हम समस्तीपुर पहुंचे। दीदी-बाबूजी और मैं। 81 का जमाना था। उस समय वहां एक सिनेमा हॉल था। परीक्षा केंद्र से निकलते ही हम दोनों बहने सीधे सिनेमा हॉल में घुसे। बाबूजी गेस्ट हाऊस में हमारा इंतजार करते रहे। हमने फिल्म देखी- 'मांग भरो सजना' और उसके दर्द में डूबे गेस्ट हाऊस पहंचे तो देखा बाबूजी- कई जूनियर पुलिस अधिकारियों के साथ बैठे विचार-विमर्श कर रहे थे कि उन दोनों की खोज में कैसे लगा जाए। लडक़ी का मामला है। इज्जत का सवाल है। बात का बतंगड़ बन सकता है। बाबूजी, सोच भी नहीं सकते थे कि हम ऐसी हरकत भी कर सकते थे। परीक्षा से पहले की रात की उन्होंने मेरी बेचैनी देखी नहीं थी। मैंने मन लगाकर पढ़ाई की और पेपर देने में भी मजा आया था-क्योंकि उसके बाद सीधा सिनेमा हॉल का अंधेरा जो बुला रहा था। बाबूजी ने हमें देखकर राहत की सांस ली। ज्यादा डांटा नहीं-बस मामला ले जाकर मां की अदालत में रख दिया। फिर तो एक साल तक सिनेमा हॉल का मुंह तक नहीं देखा। होस्टल भेज दी गई। शहर में अपना घर होते हुए भी। लडक़ी का मामला था-वो भी इतनी बिंदास लडक़ी का घर से आना-जाना छोटे शहर में कहां रास आता था-तब।

मैं होस्टल में पहुंची और बाबूजी-रिटायर होकर मुजफ्फरपुर रहने लगे थे।

होस्टल में मैंने जल्दी ही सिनेमा का माहौल बना दिया। वार्डन भी फिल्मों की शौकीन निकली। होस्टल के तहत नियम बनाया गया कि महीने में एक फिल्म सिनेमाहॉल में ले जाकर दिखाई जाएगी। वो सिलसिला ज्यादा दिन चला नहीं। छेड़छाड़ के मामले बढ़े। लड़कियां भी शरारत करतीं और तंग आकर वार्डन ने रोक लगा दी। तीन होस्टल एक ही कैंपस में था। तीनों की लड़कियों ने मिलकर प्लान बनाया और हर रविवार फिल्मों की बहार आ गई। भाड़े पर वीडियो आता, तीन चुनिंदा फिल्में आतीं, और एक एक रुपया जमा करके जेनरेटर के लिए पेट्रोल आता। मौजा ही मौजां का दौर था वो। होस्टल में टीवी था लेकिन उस पर सिर्फ न्यूज ही देखना एलाउड था। मैं बना दी गई टीवीरुम इनचार्ज। उन्हीं दिनों चुनाव हुए और परिणाम टीवी पर आने थे। उन दिनों चुनाव परिणाम के दौरान फिल्में दिखाते थे। फिल्मों के दीवानी लड़कियों की एक टोली चुनाव परिणाम सिर्फ इसलिए झेलती थी कि ख्तम होते ही फिल्म का अगला हिस्सा शुरु हो जाएगा। वार्डन समझती, राजनीति शास्त्र पढने वाली लड़कियों के लिए चुनाव परिणाम देखना जरुरी है। फिल्मों के चक्कर में हमारा राजनीतिक ज्ञान सचमुच बढ गया था।
मैं गर्मी की छुट्टी में घर आई थी। बाबूजी रिटायरमेंट के बाद दिन भर दरवाजे पर पलथी मारकर डटे रहते। कोई घर से बाहर निकला नहीं कि उनका टोकना अनिवार्य। कहां चले-कहां जा रही हो? क्या काम है। आदि....। क्या किया जाए। दीदी नौकरी पर जा चुकी थी। भाभियां अनुशासित थीं। मां कुछ कर नहीं सकती। बाबूजी कड़क नहीं थे-पर खाली थे। पुलिसिया रोब कायम था। सो हमीं मिलते थे-जूझने के लिए। भाई लोग तो आजाद थे-खूब फिल्में देखकर आते और हमें जलाते। एकाध बार मैंने हंगामा कर दिया- फिर बाबूजी ने भाई की ड्यूटी लगाई-हमें फिल्म दिखाने की। भाई पहले ऐसी फिल्म चुनता जिसे वह हमारे साथ देख सके। सारी वेजीटेरियन टाइप फिल्म हमें देखनी पड़ती। भाई के अनुशासन में हॉल में जाते और आते। रिक्शेवाला पहले से तय होता जो बाहर इंतजार करता। इंटरवल में कोक आ जाता-बस। हॉल के बाहर भाई चौकन्ना रहता कि कोई छेड़ तो नहीं रहा, कोई कटाक्ष तो नहीं कर रहा। ऐसे में कई बार छोटी-मोटी झड़पें हुई। बाद में भाई ने मना कर दिया। फिर सिनेमा प्रेम पर संकट खड़ा हो गया।

क्या किया जाए। छुट्टियों के दौरान ट्यूशन की नौबत आई। टीचर का घर दूर था। दो किलोमीटर। मजबूरन अकेले जाना-आना शुरु हुआ। मेरी तो मौज हो गई। शहर की एक पंजाबी दोस्त कंवलजीत और मैं और नया-नया खुला सिनेमाहॉल जवाहर टॉकीज। तीन परदे एक साथ, आज की भाषा में मल्टीप्लेक्स। एक हॉल बड़ा और दो हॉल छोटे। शहर भर के लिए आकर्षण का केंद्र। बड़ी रौनक रहती वहां। खूब खाने-पीने की दूकानें खुल गई थीं। मेरा रास्ता उधर से ही जाता था। तीनों हॉल में बारी बारी फिल्में देखीं। हम दोनों सहेलियां लेडीज क्लास में बैठती थीं। वहां भाई के मिलने का कोई खतरा नहीं था। नीचे बैठने वाले लडक़ो-पुरुषों की टोली से खूब सीटियां, तालियां, किलकारियां सुनाई देती। लेडीज क्लास का हिस्सा शांत बैठा रहता जैसे सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने आए हों। मेरा मन मचलता और मैं लडक़ो की तरह तालियां बजाने और फिकरे कसने लगती। लेडीज मुझे यूं घूरतीं जैसे कोई अजूबा देख लिया हो। इस हरकत पर जली कटी सुनाई देती...बहकल लडक़ी...। तब मुझे रोमांटिक , थ्रीलर और कॉमेडी फिल्में खूब पसंद आती थी। अब ऐसी फिल्मों में वाह वाह कैसे ना करती। खैर..रिक्शा भाड़ा का जो पैसा मिलता-उससे देखते थे। पैदल चलकर जाते, भाड़ा बचा लेते और उसका सदुपयोग सिनेमा का टिकट खरीदने में करते थे। इसी दौरान मैंने घरवालों से झूठ बोलना शुरु कर दिया था। देर होने पर पूछाताछी होती तो टीचर ने रोक लिया, उनको कुछ काम था, कोर्स खत्म करना था...आदि आदि..। झूठ बोलने का भी अपना अलग आनंद होता है। वैसे भी लड़कियों के साथ झूठ या बहाना हमेशा एक छतरी की तरह साथ चलता है।
एक दिन 'लावारिस' (अमिताभ बच्चन) देखकर पैदल घर पहुंची तो देखा वहां बाहर बाबूजी बैठे हैं। मां अंदर थीं। बाबूजी के तेवर बदले हुए। मुझे अपने पास बुलाया बिठाया, भेदभरी मुस्कान चेहरे पर, पूछा,
'कैसी लगी फिल्म?'
मैं हड़बड़ा गई।
'फिल्म...? कौन-सी?'
'बनो मत...'
'लावारिस कैसी लगी?'
पलक झपकते समझ में आ गया
'इसका मतलब आप भी...।'
'हां मैं भी...। मगर मैंने तुम्हें नहीं देखा और न तुमने मुझे देखा-ठीक है?'
'क्या???' बाबूजी का नया रूप।
'मां को बताना मत। जाओ पढ़ाई करो।'
तब से आज तक बाबूजी मेरे हमराज साथी और सहयोगी बने हुए हैं। बुढ़ापे के कारण उनका सिनेमा प्रेम टीवी तक सिमट गया है-और मेरा खुदमुख्तार होने के कारण बदस्तूर जारी है...।

मेरी पसंद की १० फिल्में
१.गाइड
२.तीसरी कसम
३.मेरा नाम जोकर
४.आनंद
५.जागते रहो
६.आवारा
७लज्ज
८.ब्लैक
९.लगन
१०.दिल तो पागल है

Monday, May 25, 2009

श्रद्धांजलि:पॉपुलर भावनाओं के निराले निर्देशक प्रकाश मेहरा

-अजय ब्रह्मात्मज
बीस साल पहले जादूगर के विफल होने के बाद निर्देशन पर प्रकाश मेहरा की पूरानी पकड़ नहीं रह गई थी। 1989 में आई यह फिल्म अमिताभ बच्चन की पहली पारी की समाप्ति के दिनों में रिलीज हुई थी। अमिताभ बच्चन का पुराना जादू टूट रहा था, लिहाजा जादूगर दर्शकों को पसंद नहीं आई थी। इस फिल्म की रिलीज के बाद उन्होंने अमिताभ बच्चन को फोन पर कहा था, लाला, गड़बड़ हो गई है। अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर लिखा है कि प्रकाश मेहरा ने उनसे कहा था, जिस दिन मैं तुम्हारे साथ सफल फिल्म नहीं बना पाऊंगा, उस दिन से तुम्हारे साथ काम करना बंद कर दूंगा। उन्होंने उसके बाद अमिताभ बच्चन के साथ कोई फिल्म नहीं की। उस विफलता के असर में उनकी आखिरी दो फिल्मों जिंदगी एक जुआ और बाल ब्रह्मचारी में पुरानी बात नहीं दिखी थी।
प्रकाश मेहरा को अमिताभ बच्चन की एंग्री यंग मैन इमेज के लिए याद किया जाता है। जंजीर से अमिताभ बच्चन को यह इमेज मिली थी, लेकिन गौरतलब है कि उसके बाद की अपनी सफल फिल्मों में प्रकाश मेहरा ने कभी अमिताभ बच्चन की इस इमेज का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने अपनी हर फिल्म में उन्हें एक अलग अंदाज में पेश किया। यह निर्देशक-अभिनेता के बीच की केमिस्ट्री ही थी, जो फिल्म-दर-फिल्म सफल रही। हेराफेरी, खून पसीना, लावारिस, मुकद्दर का सिकंदर, शराबी और नमक हलाल में उन्होंने पॉपुलर ढांचे में अमिताभ बच्चन को अलग-अलग रूपों में पेश किया। दोनों की जोड़ी बाक्स आफिस पर सफलता की गारंटी मानी जाती थी।
आज के संदर्भ में प्रकाश मेहरा को देखें तो उनका कद्दावर व्यक्तित्व समझ में आएगा। जंजीर के ठीक पहले उन्होंने एक कुंआरी, एक कुंआरा जैसी साधारण फिल्म बनाई थी। उन्हें सलीम-जावेद की जंजीर की स्क्रिप्ट पसंद आ गई थी। यह सभी जानते हैं कि धर्मेद्र ने फिल्म में काम करने से इनकार कर दिया था। कहते हैं उनके पहले राजकुमार और देव आनंद ने भी जंजीर को अपने लायक नहीं समझा था। उल्लेखनीय है कि ये कलाकार उनके साथ काम करना चाहते थे, लेकिन उन्हें जंजीर की स्क्रिप्ट पसंद नहीं थी। आज के निर्देशकों की तरह प्रकाश मेहरा ने व्यावहारिक कदम उठाया होता और स्टारों के चक्कर में आ गए होते तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री जंजीर से वंचित हो गई होती। प्रकाश मेहरा किसी दबाव में नहीं आए। उन्होंने अपनी स्क्रिप्ट के लिए स्टार चुना। उन्होंने स्टार के लिए स्क्रिप्ट में कोई फेरबदल नहीं की और न उसे फेंक दिया। जंजीर निर्देशक के आत्मविश्वास और सोच का सक्षम उदाहरण है। उनकी नमक हलाल की ज्यादा चर्चा नहीं होती। अमिताभ बच्चन के बेहतरीन अभिनय और संवाद अदायगी के लिए यह फिल्म दोबारा देखें। नमक हलाल को कोई हिंदी भाषी दर्शक ही पूरी तरह से समझ सकता है। यह फिल्म मुहावरों और चुटीले संवादों से ऐसी गुंथी हुई है कि आप पंक्ति-दर पंक्ति आनंद उठाते हैं। अमिताभ बच्चन की कामेडी फिल्मों में यह श्रेष्ठ है। शराबी और लावारिस में भी प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन को कुछ नया करने का मौका दिया था।
प्रकाश मेहरा ने प्रोडक्शन कंट्रोलर के रूप में करिअर की शुरूआत की। वे कुछ समय तक मोहन सहगल और नरेंद्र सूरी के सहायक रहे। स्वतंत्र निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म हसीना मान जाएगी थी। फिर मेला आई। संजय खान और फिरोज खान की इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पंसद किया था। 1973 में जंजीर से वे निर्देशक के साथ निर्माता भी बने। उनके जीने और काम करने के राजसी अंदाज के किस्से फिल्म इंडस्ट्री में मशहूर हैं। कहते हैं कि उनकी किसी भी फिल्म की शूटिंग मार्निग शिफ्ट में नहीं हुई। वे आराम से दोपहर दो बजे के बाद शूटिंग करते थे। प्रकाश मेहरा बचपन में पिता के वात्सल्य से वंचित रहे थे। कुछ लोग बताते हैं कि उनके पिता साधु हो गए थे और उन्होंने परिवार से संन्यास ले लिया था। बेटे की इस तड़प और एकाकीपन को उन्होंने हर फिल्म में रखा। उनके ज्यादातर नायक यतीम, लावारिस या पिता के वात्सल्य से वंचित रहे। हालांकि अमिताभ बच्चन हमेशा इनकार करते रहे कि उनके और प्रकाश मेहरा के बीच कोई अनबन थी। करीबी बताते हैं कि मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा दोनों ही अमिताभ बच्चन पर अपना अधिकार समझते थे। दोनों के बीच अमिताभ बच्चन की वजह से ठनी रहती थी और इसी तनाव में कभी अमिताभ ने मनमोहन देसाई के प्रति झुकाव दिखा दिया था। वहीं से संबंध बिगड़े जो अंत तक नार्मल नहीं हुए।

Saturday, May 23, 2009

फ़िल्म समीक्षा:डिटेक्टिव नानी

रोमांचित करती है डिटेक्टिव नानी
हिंदी में ऐसी फिल्में नहीं बनतीं। फिल्म के मुख्य किरदार में बुजुर्ग नानी को लेकर रोमिला मुखर्जी ने साहस का परिचय दिया है। यह नानी कहानियों और पुरानी फिल्मों की नानी नहीं है। यहां नानी शरीर और दिमाग से स्वस्थ हैं। वह अकेली रहती हैं, लेकिन बेटी-बेटे की मदद से नहीं हिचकतीं। उनकी जिंदगी में बूढ़ी औरतों के साथ चिपक जाने वाली उदासी नहीं है। डिटेक्टिव नानी सरल और रोचक फिल्म है। सुबह की सैर से लौटती नानी को अपनी बिल्डिंग में कुछ असहज चीजें दिखती हैं। खिड़की से झांकती डरी हुई बच्ची को देख कर वह सचेत हो जाती हैं। सबसे पहले वह पुलिस को सूचना देती हैं, लेकिन उनकी लापरवाही देख खुद सक्रिय हो जाती हैं। वह अपने कामन सेंस और बच्चों की मदद से तहकीकात शुरू करती हैं। आखिरकार भेद खुलता है और सभी नानी की तारीफ करते हैं। निर्देशक रोमिला मुखर्जी की पहली कोशिश चंद सीमाओं के बावजूद सुंदर है। स्कि्रप्ट थोड़ी कसी हुई होती और अनावश्यक प्रेम का एंगल नहीं डाला गया होता तो फिल्म ज्यादा चुस्त होती। जरूरत नहीं होने पर जबरन गाने ठूंसने से फिल्म की लय टूटती है। डिटेक्टिव नानी के प्रेम प्रसंग अवांछनीय हैं। नानी की भूमिका में अवा मुखर्जी सहज हैं। उनके व्यक्तित्व में जोश और गति दिखाई पड़ती है। हिंदी फिल्मों के पर्दे पर ऐसे महिला किरदार कम दिखते हैं, जो परस्पर रिश्तों के आधुनिक तनाव और यथार्थ के प्रति संगत दृष्टिकोण रखें। नानी की बेटी तलाकशुदा है और उनकी बहू उन्हें पसंद नहीं करती, लेकिन नानी को कोई परेशानी नहीं है। वह बेटे और बेटी के बच्चों को अपने पास रखने और संभालने के लिए तैयार रहती हैं। वह सजग और अपने समाज के प्रति जागरूक हैं। इस उम्र में भी निडर और सक्रिय हैं। डिटेक्टिव नानी वयस्क दर्शकों को शायद उतनी अच्छी न लगे, लेकिन बच्चे इसे पसंद कर सकते हैं। इस फिल्म का थ्रिल बाल मन के समझने लायक है। बाल दर्शक देखना चाहेंगे कि नानी रहस्य सुलझा पाती हैं कि नहीं? फिल्म में रहस्य और रोमांच बना रहता है। रोमिला ने सीमित किरदारों के साथ सीमित बजट में दिलचस्प फिल्म रची है।

Friday, May 22, 2009

दरअसल:हास्यास्पद हो गए रामू




-अजय ब्रह्मात्मज



रामगोपाल वर्मा उर्फ रामू को उम्मीद रही होगी कि उनके जन गण मन.. के शिगूफे से विवाद होगा। विवाद होगा, तो फिल्म गर्म होगी। फिल्म गर्म होगी, तो फिल्म के दर्शक बढ़ेंगे। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का हर फिल्मकार अपनी नई फिल्म को गर्म और चर्चित करने के आसान आइडिया अपनाता है। यह कोई नई बात नहीं है। राजेश खन्ना और उनके पहले के जमाने से यह चला आ रहा है, लेकिन अब ऐसी मीडियागीरी नहीं थी, इसलिए दर्शक उन आइडिए में फंस जाते थे। अभी दर्शक होशियार हो गए हैं और मीडिया सचेत है।
रामू लंबे समय से मीडिया पर केंद्रित फिल्म बनाना चाहते थे। उन्होंने दो-तीन बार पहले भी कोशिश की। मीडिया के बारे में उनकी पहली धारणा है कि यह माफिया की तरह काम करता है। मीडिया अपने विषय (नेता, अभिनेता और दूसरे चर्चित व्यक्तियों को) को आतंकित करता है और फिर उस आतंक को सुर्खियों में बदलकर बेचता है। मीडिया के बदलते स्वरूप से रामू समेत सभी भौचक्के हैं। उन्हें लग रहा है कि मीडिया अब वही नहीं रह गया, जो पहले था। ऐसे लोग भूल जाते हैं कि समाज में आए बदलाव के कारण ही मीडिया के कंसर्न बदले हैं और मीडिया की कार्य-नीति और ध्येय में भी बदलाव आया है। इस बदलाव के प्रति मीडिया से संबंध रखने वाले बाहरी लोग सहज नहीं हैं। उन्हें अपना बदलाव सही और मीडिया का बदलाव अनुचित लगता है। मीडिया से जब तक लाभ हो रहा हो, तब तक वह उपयोगी और आवश्यक समझा जाता है, लेकिन जैसे ही मीडिया सामाजिक सरोकार के तहत भीतर झांकने की कोशिश करता है, तो उसे हस्तक्षेप कहा जाता है। मीडिया को दुत्कारा जाता है। रामू की सोच मोटे तौर पर ऐसी धारणा से प्रभावित है। कहा जा रहा है कि अपनी फिल्म रण में वे मीडिया का अंदरूनी चित्रण कर रहे हैं। मालूम नहीं उन्होंने कितना और कैसा रिसर्च किया है। उनकी फिल्म रण मुख्य रूप से न्यूज चैनल की बात करती है। हम सभी जानते हैं कि मीडिया का मतलब सिर्फ टीवी न्यूज नहीं है। अगर समाचार की ही बात करें, तो अखबार, इंटरनेट और ऑन लाइन सेवाएं भी आ गई हैं। हां, न्यूज चैनल की भूमिका बड़ी प्रतीत होती है। खासकर शहरी दर्शकों के लिए न्यूज चैनल ही मीडिया के पर्याय बन गए हैं। उन्हें प्रिंट मीडिया की भूमिका सेकेंडरी और पूरक लगती है, जबकि भारतीय समाज का यह सच नहीं है।
रण के प्रचार अभियान में रामू ने जन गण मन॥ के साथ कुछ साधारण पंक्तियां और उक्तियां जोड़ीं और उसके साथ फिल्म के फुटेज चिपकाकर पेश कर दिया। जाहिर-सी बात है कि राष्ट्रगान के शब्दों से कोई भी खिलवाड़ देश के नागरिकों को नागवार गुजरेगी। अभिव्यक्ति का अधिकार देश के हर नागरिक को मिला है, लेकिन उस अधिकार का मतलब यह कतई नहीं होता कि आप अपनी फिल्म के प्रचार के लिए नागरिकों की भावनाओं को आहत करने का रास्ता चुनें। रामू ने यही किया है। देश की वर्तमान स्थिति और दुर्दशा का चित्रण दूसरे शब्दों में भी किया जा सकता है। दूर क्यों जाएं। रामू चाहें, तो गुलाल फिल्म के गीत सुन लें। पीयूष मिश्रा ने देश की हालत को शब्दों में ढाल दिया है। साहित्य की बात करें, तो धूमिल ने संसद से सड़क तक में देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर सवाल खड़े किए थे। दरअसल, इस बार विवादास्पद होने की कोशिश में रामू हास्यास्पद हो गए। सभी हंस रहे हैं। मीडिया के जरिए चर्चा में आने की रामू की नादानी समझ में आ गई है। इस बार उनकी कोशिश की कलई खुल गई है। रामू हास्यास्पद स्थिति में पहुंचने के बावजूद उम्मीद है कि उनकी फिल्म दर्शकों को सार्थक मनोरंजन देगी। पता नहीं, सच क्या है?

Thursday, May 21, 2009

हिन्दी टाकीज:सत्तर का ज़माना और एक साठ-आकांक्षा पारे


हिन्दी टाकीज-३७

हिन्दी टाकीज की इस कड़ी में आकांक्षा पारे हैं.गीताश्री ने चवन्नी की तरफ़ से आकांक्षा से कहा और आकांक्षा ने कोई देरी नहीं की.चवन्नी की नादानी से आकांक्षा का लेख inbox से मिट गया था.चवन्नी ने दोबारा आकांक्षा को परेशान किया,बहरहाल आकांक्षा ने बुरा नहीं माना और फिर से लेख भेज कर हम सभी का भला किया...आकांक्षा अपने बारे में लिखती हैं...18 दिसंबर 1976 में जबलपुर मध्य प्रदेश में जन्म। बीएससी के बाद पत्रकारिता में डिग्री। सबसे पहले भोपाल से प्रकाशित समरलोक में दो कविताएं प्रकाशित। फिर सिलसिला वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथाचक्र इंद्रप्रस्थ भारती, जनसत्ता, दैनिक भास्कर में कविताएं-कहानी प्रकाशित। विश्व के प्रथम हिंदी पोर्टल वेबदुनिया से नौकरी शुरू कर दैनिक भास्कर भोपाल से होते हुए दिल्ली में मलयाला मनोरमा की पत्रिका वनिता से गुजर कर फिलवक्त आउटलुक दिल्ली में कॉपी संपादक-सहसंवाददाता। फिल्मों का शौक नहीं नशा। --


फिल्मों के मामले में घर का माहौल बिलकुल अलग था। पापा आज भी सिर्फ एक ही नायिका को पहचानते हैं, हेमा मालिनी! उनके लिए गोया दूसरी कोई नायिका है ही नहीं। उन्हें हर फिल्म की कहानी एक सी लगती थी। एक अमीर नायिका और एक गरीब नायक, एक अदद खलनायक, थोड़ी ढिशुम-ढिशुम और खुशहाल अंत। और मां ऐसी कि सिर्फ कहानी सुन कर बता दें कि फिल्म कौन सी है। टीवी नया-नया अवतरित हुआ था। उस जमाने में यदि कोई फिल्म का नाम चूक जाता था, तो तुरंत मां की सेवाएं ली जाती थीं। आज भी डिश टीवी के जमाने में जब हर चैनल पर पुरानी फिल्मों की बहार होती है, वे नजर भर किसी पुरानी फिल्म का शॉट देखती हैं और बस उस फिल्म का नाम हाजिर। बहरहाल फिल्मों को याद करने के लिए इतनी लंबी भूमिका इसलिए क्योंकि पापा ने बहुत चाहा कि मेरे तीनों भाई और मुझमें 'सिर्फ हेमा मालिनी को पहचानने' के गुण विकसित हो सकें। लेकिन अफसोस इस मामले में हम पर मां के 'जीन' भारी रहे। वैसे ये फिल्मी किटाणु मां को नानी से मिले हैं। अस्सी की उम्र में आज भी नानी फिल्में बड़े चाव से देखती हैं। अब उन्हें सुनाई नहीं देता और फिल्मों के बारे में समझाना भी पड़ता है, लेकिन शौक बदस्तूर जारी है। पहले गोविंदा उनकी खास पसंद में शामिल थे आजकल 'सुंदर लडक़ा' यानी शाहिद उनकी पहली पसंद है! आज भी जब हम चारों मिलते हैं, तो एक खेल खेलते हैं, चैनल को तेजी से बदलना और फिल्म को कम से कम समय में पहचान लेना। और सबसे सुखद है कि हमें उन सभी फिल्मों की कहानियां अलग-अलग लगती हैं!

पापा के इतने उदासीन होने के बाद भी मां की जिद या कभी-कभी उनके पापा से रूठ जाने की वजह से (मां को साड़ी या जेवर से नहीं मनाया जा सकता) फिल्में देखने को खूब मिल जाती थीं। कभी-कभी मां आस-पड़ोस में रहने वाली सहेलियों के साथ फिल्म देखने का कार्यक्रम बना लेती थीं। काला धुंआ छोड़ते टेम्पो या हरे रंग में पुती सरकारी बसों में सवार हो कर हम टॉकिज पहुंचते और महिलाओं की अलग लगने वाली कतारों में आंटियां धंस जातीं और जब टिकट लेकर वह किसी विजेता की तरह निकलती थीं। सरस्वती चंद्र ऐसी ही फिल्म थी, जिसे हम मां के साथ देखने गए थे। हमें उसका टिकट नहीं मिला था। फिर दूसरी कोशिश पापा के साथ हुई। तेज बारिश में ऑटो में भीगते हुए वहां पहुंचे थे। उस फिल्म के लिए उत्साह नहीं उन्माद था। पता नहीं क्यों, क्योंकि आज तक हम वह फिल्म नहीं देख पाए हैं। धीरे-धीरे हम बड़े हुए या नहीं यह तो मालूम नहीं लेकिन फिल्मों के मामले में स्वावलंबी जरूर हो गए। बड़े भाई अपने दोस्तों के साथ फिल्में देखने चले जाते और कभी-कभी मां से जिद करके हमें भी वह मौका मिल जाता। जिस जमाने में बच्चों को पार्क में अकेले जाने की मनाही थी उस वक्त दो साइकिलों पर हम भाई-बहन मधुमिलन, यशवंत या प्रकाश टाकिज चले जाया करते थे। अब इन टॉकिजों की सिर्फ यादें हैं। सब शॉपिंग मॉल में तब्दील हो गई हैं। उन फिल्मों की खास बात होती थी, एक रुपये साठ पैसे का टिकट। साधना और राजेन्द्र कुमार की आरजू 'एक साठ' की मेरी याददाश्त की पहली फिल्म है। आज भी किसी पक्के इंदौरी को यदि कमतरी का अहसास दिलाना हो तो हम 'एक साठ' का जुमला ही इस्तेमाल करते हैं। वक्त बदला और हमारी तरह संभ्रात वर्ग दो रुपये पच्चीस पैसे का टिकट खरीदने लगा। लेकिन फिल्म की शान एक साठ वाले ही हुआ करते थे। फिल्मों की समीक्षा में भी लिखा जाता था, 'एक साठ वालों की फिल्म!' वो लोग जो रौनक लगाते थे, उसका कोई सानी नहीं। शोले के डायलॉग पर पांच-दस या चवन्नियां उछालना, लाल, पीली, हरी कमीजों को हवा में लहरा देना। उस वक्त यह भी फिक्र न करना कि उनकी काली जालीदार बनियान से कुपोषण का जिस्म झांक रहा है। एक साठ की महिला दर्शक भी कमाल की होती थीं। अगर नायक या नायिका के परलोक सिधार जाने के दृश्यों पर वे ऐसा बुक्का फाड़ कर रोती थीं कि लगता अब यहां से तेरहवीं कर के ही उठेंगी। यह फिल्मों का एतिहासिक दौर था। पूरे देश में जब फिल्में शुक्रवार को रीलिज हुआ करती थीं, अकेला इंदौर ऐसा शहर था, जहां फिल्में गुरुवार को लगती थीं। अगर फिल्म इंदौर में हिट तो समझो नैया पार।

फिल्में जब समझ आना शुरू हुईं तब पढ़ाई का भी बोझ आ गया। टॉकिज में जाना कम होने लगा। लेकिन दस दिन चलने वाले गणेश उत्सव में फिल्मों की पूरी होती थी। मुंबई की तर्ज पर यहां भी पहले खूब धूम-धाम से दस दिनों तक गणेश उत्सव मनाया जाता था। इस उत्सव की खास बात होती थी, दस दिन में कम से कम तीन फिल्मों का प्रदर्शन। यह प्रदर्शन जहन में आज भी ऐसा ताजा है, जैसे कल ही की बात हो। उत्सव शुरू होने से पहले चंदा इकट्ठा करने से ले कर विसर्जन तक उत्साह रहता ही इसलिए था कि तीन फिल्में देखने को मिलेंगी। निश्चित समय पर कार्यक्रमों के परचे बांटे जाते, इसमें बस तारीख या दिन की घोषणा होती कि किस दिन फिल्म दिखाई जाएगी। फिर फिल्म का नाम ले कर कयास लगने लगते। कोई कहता फलां गणेश समीति एक नई फिल्म भी दिखा रही है। मन में एक अजीब हलचल रहती पता नहीं कौन सी फिल्म देखने को मिले। फिर शाम होते-होते फिल्म का नाम भी पता चल जाता। उस दिन न खाने में मन लगता न खेलने में। पढऩे में तो खैर लग ही नहीं सकता था! पहले फिल्म शुरू करने का वक्त आठ बजे तय होता। लेकिन गृहस्थी की बोझ से दबी चाचियां, बुआ या ताई की पूरी फौज समीति के अध्यक्ष को खूब खरी-खोटी सुनाती कि वे लोग चौका-बासन कर नौ के पहले फुर्सत नहीं पाएंगी। सो अंतत: फिल्म नौ बजे शुरू होती। मांओं के लिए अच्छी जगह रखने की जिम्मेदारी निभाना हर बच्चे का कर्तव्य होता। शाम सात से हम लोग जैसे-तैसे खाना खा कर अपनी दरी, बोरी या टाटपट्टी ले कर उस विशाल मैदान में पहुंच जाते। अच्छी जगह पर उसे बिछाते और शॉल या चादर (इंदौर में तब सितंबर में रात को गुलाबी ठंडक हो जाती थी।) निशानी के तौर पर रख देते। कसौटी, नसीब, सीता और गीता, वारिस उसी दौर की फिल्में हैं, जिन्हें प्रोजेक्टर पर रात में खुले मैदान में हल्की ठंडक के बीच देखा है। हर साल हर समीति चंदा लेते वक्त यह बताना नहीं भूलती थी कि इस बार फिल्मों के प्रदर्शन बढ़ाने पर जोर है। किसी भी फिल्म की सफलता उस समीति की सफलता होती थी। फिर धीरे-धीरे वह दौर चला गया और प्रोजेक्टर की जगह वीडियो ने ले ली। वीडियो के आने से यह हो गया कि गणेश उत्सव का इंतजार नहीं करना पड़ता था। चार परिवार पैसे मिला कर किराए पर रात भर के लिए वीडियो ले आए, जिसका घर बड़ा वहां किराए का रंगीन टीवी, वीसीआर और चार-छह कैसेट। पूरी रात चाय और फिल्मों का दौर चलता रहता। वीडियो क्रांति ने हरतालिका तीज के व्रत में भी अजीब रौनक घोल दी थी। दिन भर भूखी-प्यासी औरतें रात भर जागरण करने के लिए वीसीआर का सहारा लेतीं और चार पहर की आरती के लिए जैसे-तैसे समय निकाला जाता। अब यह सारी बातें किसी और जन्म की बातें लगती हैं। एक साठ से चल कर तीन सौ रुपये के टिकट की फिल्में भी वह मजा नहीं देतीं। फिल्मों के प्रति नास्टेल्जिया इतना गहरा है कि टीवी पर उन फिल्मों का आज भी इंतजार रहता है।
मेरी पसंद की फिल्में
1. खूश्बू
2. मिली
3. शोले
4. लक्ष्य
5. जॉनी गद्दार
6. आनंद
7. पार
8. दास्तान
9. तीसरी कसम
10. अर्थ

Tuesday, May 19, 2009

साधारण लोगों की पसंद ही मेरी पसंद है-इम्तियाज़ अली


जब वी मेट के निर्देशक इम्तियाज अली की नयी फिल्म लव आज कल शीघ्र ही प्रदर्शित होगी। सैफ अली खान की प्रोडक्शन कंपनी इनामाती फिल्म्स की यह पहली फिल्म है। इसमें सैफ के साथ दीपिका पादुकोन मुख्य भूमिका में हैं-

ऐसा कहा जा रहा है कि जब वी मेट के बाद सभी आप के साथ काम करना चाहते हैं?


ऐसा कोई भागता हुआ तो मुझे नहीं दिखा। सोचा न था के बाद और जब वी मेट के पहले कुछ लोगों ने साथ काम करने की इच्छा जगजाहिर की थी।

सैफ अली खान के साथ फिल्म की योजना कैसे बनी?

जब वी मेट की रिलीज के पहले से सैफ से मेरी बात हो रही थी। मैंने उन्हें कई कहानियां सुनायी थीं। मैंने उन्हें जब वी मेट की कहानी भी सुनायी थी। बातें चलती रहीं। जब वी मेट के पोस्ट प्रोडक्शन के समय फिर से सैफ से बात हुई। फिर मैंने लव आज कल का आइडिया सुनाया। सैफ को पसंद आया। उन्होंने कहा कि इसे बनाओ, मैं काम करूंगा।

क्या है फिल्म?

लंदन में एक कैफेटेरिया है। जहां युवक-युवती मिलने के लिए आया करते हैं। उनमें जय और मीरा भी हैं। दोनों का आधुनिक रिश्ता है। कैफेटेरिया के मालिक वीर सिंह हैं। उनकी जवानी दिल्ली में बीती है। अब ये लंदन में रहते हैं। वे जय और मीरा के रिश्ते को देखते हैं। उन्हें ताज्जुब होता है कि कैसे पैसों की लेन-देन की तरह आज के लोग मोहब्बत करते हैं। हमारे जमाने में तो यह दिल की बात हुआ करती थी। दोनों की बात होती है। जय और मीरा की कहानी आगे बढ़ती है। दूसरी तरफ वीर सिंह और हरलीन की कहानी आती रहती है। पता चलता है कि वक्त जो भी हो, तरीका बदल जाए, लेकिन प्यार का एक्सपीरिएंस तो एक ही होता है।

जब वी मेट की गति, किरदार और उनके बीच बढ़ते रिश्ते की कहानी लोगों को खूब पसंद आयी थी। क्या लव आज कल भी उसी पैटर्न पर है?
यह जब वी मेट नहीं है। अगर कोई जब वी मेट की खोज में आएगा तो निराश होगा। मेरे खयाल से जय, मीरा, वीर सिंह या हरलीन.. ये लोग उतने ही करीबी हैं, जितने जब वी मेट के गीत और आदित्य थे। या सोचा न था के वीरेन और अदिति थे। समझ में आती है बात। फिल्म देखते समय आपको लग सकता है कि मेरे साथ भी ऐसी बात हो सकती हैं। मेरे खयाल से यह कहानी ज्यादा टच करती है। इस फिल्म में हंसी कम आएगी और लगाव ज्यादा होगा।

आपकी सारी फिल्मों में रिश्तों की अकुलाहट है। सभी फिल्में लड़के-लड़की के रिश्तों पर क्यों हैं?

यह जान बूझ कर नहीं है। मेरी समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों है, लेकिन आप का कहना सही है। ऐसा नहीं है कि मेरी जिंदगी के रिश्ते बड़े उलझे हुए हैं। मैंने जिन रिश्तों को देखा है, उनमें अलग से कुछ दिखा हो। ऐसा भी मुझे कुछ नजर नहीं आता। पता नहीं किस वजह से मेरी दिलचस्पी ऐसे किरदारों में रहती है। तभी तो हर पिक्चर में वैसे किरदार आ जाते हैं।

क्या शुरू से ही ऐसे किरदारों और लेखन की तरफ झुकाव रहा?

ऐसा नहीं कह सकता। थिएटर, सीरियल और उसके बाद फिल्म की कोशिश में जो कहानियां लिखीं, वे सभी दूसरी थीं। वे भारी और सामाजिक थी। अचानक कुछ ऐसा हुआ कि एक हल्की-फुल्की कहानी दो रातों में लिखी वह सोचा न था थी। इसके बाद जब वी मेट आ गयी। अब लव आज कल आने वाली है। मुझे ऐसा लगता है कि मेरी जिंदगी और कहानियों में नया ट्रेंड आ गया। मैं ऐसा समझता था कि मैं बहुत गंभीर फिल्मकार हूं। दरअसल, पता चला कि मैं कॉमन टेस्ट का इंसान हूं। मुझे जो पसंद है, वह साधारण लोगों को पसंद है या यों कहें कि साधारण लोगों की पसंद ही मेरी पसंद है।

रोमांस और रिलेशनशिप की साधारण कहानियां दर्शकों की तरह आपको भी अच्छी लगती हैं?

मेरा ख्याल है कि इसमें सभी को इंटरेस्ट है। एक उम्र में रोमांस में लड़के-लड़कियों का इंटरेस्ट होता है। मेरा भी है। शायद इस वजह से ये चीजें आती हैं। मैं चाहता हूं कि ऐसी फिल्म बनाऊं, जिसे देखने में मुझे मजा आए। मैं फिल्में अपने टेस्ट से बनाता हूं। मेरा इतना ही ध्यान रहता है कि फिल्म के पैसे वापस आ जाएं। अगर कोई बात कहनी होगी, तो इसी में कहूंगा। मेरा मानना है कि अपनी बात इस तरह से कही जाए कि लोगों की समझ में आए। लोगों को गीत क्यों पसंद आई? क्योंकि उसकी बातें अच्छी लगी लोगों को।

फिल्म में सैफ के होने की क्या वजह हो सकती है?


मुझे कगार की जिंदगी जी रहा आज का लड़का चाहिए था। जो माडर्न है। लंदन में रहता है। जिसका दिमाग तेज चलता है। अक्सर बेवकूफी करता है और सॉरी भी बोलता है। मतलब एक तेज दिमाग का समकालीन युवक है। इसलिए सैफ उपयुक्त थे। दीपिका इसलिए कि मीरा अपने दोस्त जय से ज्यादा जहीन और खामोश दिल है। वह ज्यादा देखती-समझती है। चार्मिग लड़की है, इसलिए कम बोलने पर भी ज्यादा देर तक याद रहती है। मुझे लगा कि दीपिका में ये गुण है। मीरा में गहराई है। जय हल्का है।

बाकी कलाकार कौन हैं?

ऋषि कपूर कैफेटेरिया चलाते हैं। उनके फ्लैशबैक में हमने सैफ को ही रखा है। माडर्न लवर और पुराने जमाने का लवर सैफ ही प्ले कर रहे हैं। सैफ ही सरदार हैं। राहुल खन्ना भी हैं एक छोटे रोल में।

Monday, May 18, 2009

हिन्दी टाकीज:मेरा फ़िल्म प्रेम-अनुज खरे



हिन्दी टाकीज-३६

अनुज खरे फिल्मों के भारी शौकीन हैं.चवन्नी को लगता है की अगर वे फिल्मों पर लिखें तो बहुत अच्छा रहे.उनसे यही आग्रह है की समय-समय पर अपनी प्रतिक्रियाएं ही लिख दिया करें.आजकल इतने मध्यम और साधन हैं अभिव्यक्ति के.बहरहाल अनुज अपने बारे में लिखते हैं...बुंदेलखंड के छतरपुर में जन्म। पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर। घाट-घाट का पानी पीया। समस्त स्थलों से ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान देने का मौका आने पर मनुष्य प्रजाति ने लेने से इनकार किया खूब लिखकर कसर निकाली।
पत्रकारिता जीविका, अध्यापन शौकिया तो लेखन प्रारब्ध के वशीभूत लोगों को जबर्दस्ती ज्ञान देने का जरिया। अपने बल्ले के बल पर जबर्दस्ती टीम में घुसकर क्रिकेट खेलने के शौकीन। फिल्मी क्षेत्र की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने की गलतफहमी। कुल मिलाकर जो हैं वो नहीं होते तो अद्भुत प्रतिभाशाली होने का दावा।जनसंचार, इतिहास-पुरातत्व में स्नातकोत्तर। शुरुआत में कुछ अखबारों में सेवाएं। प्रतियोगी परीक्षाओं के सरकारी-प्राइवेट संस्थानों में अध्यापन। यूजीसी की जूनियर रिसर्च फैलोशिप।पत्रकारिता की विशिष्ठ सेवा के लिए सरस्वती-पुत्र सम्मान। व्यंज्य पर एक पुस्तक प्र्काशित। मप्र की संस्कृति-जनजीवन पर पूर्व में किताब का प्रकाशन। विभिन्न समाचार पत्रों में दर्जनों लेखों का प्रकाशित। विगत दस वर्षो से दैनिक भास्कर पत्र समूह में, भास्कर पत्रकारिता अकादमी में उपनिदेशक रहने के पश्चात कई स्थानों पर कार्य किया। संप्रति-भास्कर डॉट कॉम पोर्टल में संपादक।
अपने फिल्म प्रेम की कहानी पूरी फिल्मी अंदाजे की ही है। पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर होता रहता था। बाद में खुद भी ट्रांसफर को प्राप्त होते रहे सो, पूरा फिल्म प्रेम बुंदेलखंड से लेकर जयपुर, भोपाल और ना जाने कितने शहरों की विस्तृत लोकेशनों पर शूट हुआ है। कई बार तो मुझे ऐसा लगता था कि एक साथ दो फिल्में चल रही हैं। एक मेरे जीवन की रीयल लाइफ फिल्म। जिसमें मुख्य पात्रों में मैं खुद हूं, सपोर्टिग एक्टर देशकाल के हिसाब से दोस्तों, सहकर्मियों सेलेकर श्रीमती जी तक रहे हैं। जबकि दूसरी रील लाइफ में चलती फिल्म है जिसमें मुख्य पात्रों में अधिकतर अमिताभ बच्चन और उनके सहयोगी कलाकार ही रहे। क भी कभार धर्मेद्र से लेकर जीतेंद्र तक, सहूलियत से जिनकी भी फिल्में हमारे शहर में उपलब्ध हो गईं वे मुख्य पात्र बन जाते थे। बचपन में देखी गईं इन फिल्मों का मेरे जीवन पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ा। चूंकि सेल्यूलाइड हमेशा आपको आकर्षित करता रहता है। हमेशा आपको चमत्कृत करता है। सो बहुत आश्चर्य नहीं कि फिल्में किसी भी भारतीय के अंतस में गहरे धंसी रहती हैं। गाहेबगाहे वे उसे प्रेरणा देती हैं। तो अपने अंतर्मन में खास तौर पर फिट कर दी गईं इन फिल्मों ने बाद में मेरी बड़ी मदद की। खूब जमकर इन फिल्मों पर लिखा।
खैर मेरी कहानी की शुरूआत बुंदेलखंड के एक छोटे से शहर छतरपुर से होती है। जहां कि मेरा बचपन बीता, कुछ नाले -नालियों के बैकग्राउंड में कुछ दोस्त थे। सारे के सारे फिल्मों के विकट प्रेमी। इन्हीं नाले-नालियों पर रखे बड़े-बड़े सीमेंट के पाइपों पर बैठकर सभी का फिल्म प्रेम एक साथ परवान चढ़ा। इन्हीं पर बैठकर सभी एक दूसरे को अपनी देखी गई फिल्मों की कहानियां एक खास ध्वनि ट्रेक ढेन॥र्ट्रेन ड्रैन..को बार-बार निकालते हुए सुनाते थे। मूलत: यह ध्वनि यह बताने के लिए निकाली जाती थी कि हीरो कहीं विलेनों में घिर गया है या उस पर कोई मुसीबत आ गई है। यानि कुल मिलाकर बताया जाता था कि मुकाम गंभीर है। इसी ध्वनि के माध्यम से पूरे मित्रों को सिनेमा हाल का मजा दिया जाता था। बुंदेलखंड में लगभग प्रत्येक शहर में तब मेरा मानना है कि फि ल्म देखकर आने के बाद मित्रों की उसका सस्वर बैकग्राउंड म्यूजिक सहित स्टोरी सुनाने की बड़ी विशिष्ट परंपरा पाई जाती थी। तब अमिताभ अद्भुत रूप से फेमस थे। उनकी हर फिल्म को तब जोरदार शुरूआत मिलती थी । मुझे उनकी एक फिल्म की याद है। मुकद्दर का सिकंदर। शायद अस्सी के दशक का कोई वर्ष रहा होगा। फिल्म लगी थी महेश टॉकीज में। क्या भीड़ थी। क्या लोग उमड़े थे। वो नजारा आज भी आंखों में जवां है। पहली-पहली बार टिकट ब्लैक कैसे होते हैं वहीं देखा था। कैसे रिक्शेवाले धीरे से टिकट निकाल कर साइड में ले जाकर धीरे से तौलमोल करके टिकट खिसकाते।
एक बात भी अक्सर याद आती है। तब हम सुबह से ही टॉकीज में फिल्म की पब्लिसिटी देखने पहुंच जाया करते थे। फिर धीरे से माहौल बनाया जाता था कि फिल्म कैसे देखें। हालांकि फिल्म देखने पर कोई ज्यादा प्रतिबंध नहीं था। फिर भी फिल्म बड़ों के साथ ही देखी जाती थी। वे ही तय करते थे कि किसफिल्म को देखा जाना है। फिल्म देखने के सामूहिक आयोजन अकसर ही होते थे। फिल्म देखने तब एक उत्सव बन जाता था। अड़ोस-पड़ोस के कई परिवार से कुछ दीदीयां, हम लोग। जिस दिन फिल्म जाना होता था। दोस्तों को पूरे जोर-शोर से बताया जाता था कि हम आज फिल्म देखने जा रहे हैं। सुबह से ही नए कपड़े पहनकर घूमना शुरू कर दिया जाता था। कुल मिलाकर मोहल्ले में शायद ही कोई बचता हो जिसे पता न चल जाता हो कि हम फिल्म देखने जा रहे हैं। फिल्म देखने के दौरान तब अमिताभ के आने पर कैसे चीख-पुकार मचती थी वो अपने आप में अलग ही अनुभूति थी। आज सोचते हैं तो लगता है कि इस कलाकार में क्या रहा होगा जिसने पूरा एक जमाना प्रभावित रहा। फिरअमिताभ का अभिनय, अत्यंत अतार्किक पात्र भी कितनी गंभीरता और शिद्दत से निभाते थे वे कि महसूस ही नहीं होता था। हालांकि एक बात है हिरोइनें तब हमारी श्रृद्धा का उतना पात्र नहीं होती थीं। रेखा की बात की जाती थी, जया बच्चन की मजबूरी पर कई बार कोई ज्ञानी मित्र प्रकाश डाल देता था बस। हिरोइनों से ज्यादा चर्चा खलनायकों की होती थी। अमजद खान को जितना कोसा जा सकता था कोसा जाता था। सारी मित्र मंडली इस बात पर सहमत थी कि अमिताभ की सारी मुसीबतों की जड़ यही दुष्ट है। बरसात की एक रात, सत्ते पे सत्ता और शोले की नफरत का विस्तार तब याराना की दोस्ती देखकर कम हुआ था। जिस पर इतना चिंतन जरूर किया गया था कि यार, अमिताभ को इसका दोस्त नहीं बनना था।
एक्टिंग से ज्यादा चर्चा का केंद्र फाइटिंग होती थी। चूंकि उसी से हम अपने लड़ने के तरीकों में नवाचार करते थे, तो अमिताभ या धर्मेंद्र ने किस तरह से बदमाशों को कूटा, कैसी गाली दी या कैसे बदमाशों को ललकारा कि जिसके बाप में दम हो चाबी मुझसे छीनकर दरवाजा खोल लो। हमारी आपसी लड़ाइयों में भी तेरे बाप में दम हो तो छूकर दिखाओ जैसे डॉयलाग सहजता से निकलते थे। जिस पर तटस्थ दोस्त दूसरे दोस्त को भी बढ़ावा देते थे कि तू भी कुछ बोल कि बेटा डर गया। जिस पर उसे भी कोई मौलिक किस्म का डॉयलाग लाना पड़ता था। यानी फिल्मों का कुछ यूं भी होता था वास्तविक जीवन में भरपूर इस्तेमाल। जितनी उत्सुकता से फिल्म देखी जाती थी उसी उत्साह से फिर फिल्म देखकर लौटने पर दोस्तों से कहानी शेयर की जाती थी। दोस्त भी पट्ठे नाली वाली जगह पर जमे मिलते थे। कोई औपचारिकता नहीं सीधे कहानी सुनाओ। बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं निकाला तो नाराजगी जताई जाती थी कि -क्यों बे जल्दी भगना चाहता है, पूरी सुना, ढंग से सुना। अबे, अमिताभ ने डांस किया था कि नहीं। वोई पुराना वाला डांस किया होगा। फिर एक हाथ कमर पर रखकर दूसरा हाथ हवा में लहराते हुए अमिताभ का ट्रेडमार्का डांस भी थोड़ बहुत करके दिखाना होता था। अमिताभ तब की पीढ़ी के सबकुछ होते थे। स्टाइल उन्हीं से सीखी जाती थी। अमिताभ की देखा-देखी कुछ दोस्त तो बाएं हाथ से लिखने या खेलने तक लगे थे। कुली के दौरान तो पुनीत इस्सर हम सबके गुस्से के एकमात्र पात्र थे। रोज कोई न कोई अमिताभ की दुर्घटना की किसी अलग ही एंगल से कहानी ले आता था। सब रस लेकर उसे सुनते। तब उसमें बहुत कुछ हमारी कल्पना का मिश्रण भी होता था लेकिन सुनाने का ढंग इतना जोरदार होता था कि उसे सही माना जाता था। फिर किसी भी तथ्य को सही माने जाने का तब एक ही पैमाना होता था कि उसे दो -तीन दोस्तों का समर्थन प्राप्त हो जाए। तो कहानियां ऐसे गढ़ी जाती थीं कि बहुमत उस पर विश्वास कर ले। तब मनोरंजन के ज्यादा साधन नहीं थे मुझे लगता है कि तब शायद ऐसे ही स्टोरी टेलिंग से लोगों की रचनात्मकता बढ़ती होगी।
तब शहर में तीन टॉकीजें थीं। महेश, गोवर्धन, छत्रसाल। इनमें से छत्रसाल टॉकीज तालाब के किनारे थी। उसकी छत नहीं थी। एकदम ओपनएयर थियेटर था वो। फिल्म चलती तो हवाएं भी साथ चलतीं। कभी तालाब भर जाता तो टॉकीज बंद हो जाती। फिल्में वहां हमेशा अच्छी ही लगती थी। गोवर्धन और महेश टॉकीज वैसी थीं जब कि किसी कस्बे में तब टॉकीजों को होना चाहिए था। लाल-पीली पतंगी कागजों वाली टिकटें। गेटकीपरनुमा कुछ लोग। कुछ चौथी-पांचवीं बार फिल्म देखने वाले भयंकर फिल्म प्रेमी, जो पूरी फिल्म की कहानी लगातार अपने दोस्तों को सुनाते रहने का पुनीत कत्र्तव्य भी निरंतर निभाते थे। पटिये वाली कुर्सियां। टॉर्च लेकर पूरी फिल्म के दौरान लोगों को बैठाने वाले गेटकीपर। गाने के दौरान बाहर निकलने वाले कुछ व्यक्तित्व। छोटे बच्चों को लगातार बाहर खिलाने वाले कुछ पति। ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ दर्शक। जबर्दस्त सीटियां। फिल्म की रील कटने पर भारी पैमाने पर होने वाला गाली-गलौज से भरपूर आग्रह। इंटरवल में समोसे-मूंगफली। फिल्म खत्म होने पर रिक्शे के लिए की जाने वाली भागदौड़। ये वो यादें हैं जिन्हें आज ढूंढ़ों तो कहीं नहीं दिखेंगी। मल्टी प्लेक्स के शानदार संसार में इनकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। एक फिल्म की याद है मुझे तब गोवर्धन टॉकीज में लगी थी सरगम। ऋषि कपूर और जयाप्रदा। शायद जयाप्रदा की पहली हिन्दी फिल्म थी। गोवर्धन टॉकीज बाजार और मंडी के पास थी। लाइनें इतनी लंबी लगीं थी कि बाजार तक पहुंच रही थीं। आज इस दृश्य की कल्पना कठिन है।
फिल्मों से जुड़ा मेरा एक बड़ा रोचक अनुभव है। फिल्म थी काला पत्थर। तब मुझे फिल्म जाना था और घर से अनुमति नहीं मिल रही थी। मेरी मां तब आकाशवाणी में सिंगर थीं। एक बार वे गईं गाना गाने के लिए , पिताजी तब शहर से बाहर पोस्टेड थे,सो अपनी निकल पड़ी। धीरे से दोपहर घर से ऊपर छत से कूदे, फिर कुछ दोस्तों के साथ निकल लिए महेश टॉकीज। फिल्म देखी। बीच-बीच में घर पर पड़ने वाली डांट के डर से कुछ मजा भी खराब हुआ। फिल्म खत्म हुई बाद में डरते-डरते घर पहुंचा। दोस्त तो बाहर से ही खिसक लिए कि बेटा झेलो तुम क्यों गए थे बिना बताए फिल्म। अंदर पहुंचा तो मां ने कुछ नहीं कहा। फिर पूछा कुछ खालो। मैं भूखा तो था ही फटाफट खाने लगा। धीरे से मां ने बात शुरू की केैसी थी फिल्म। इधर मैेने स्टोरी बताना चालू कर दी। उन्होंने धीरे-धीरे समझाना शुरू कर दिया। अपन ने भी उस दिन के बाद हाथ जोड़े कि कोई कितना भी कहे अकेले तो नहीं ही जाएंगे। फिल्मों के साथ तब फिल्मी गाने बेहद प्रभावित करते थे। दोस्तों में से तब अधिकतर लोग किशोर कुमार के फैन थे। उनकी क मेडी और गायन पर अकसर चर्चा छिड़ती थी। पड़ोसन एक ऐसी फिल्म थी जिसे कई बार देखने के बाद भी उसका जादू कम नहीं हुआ। अमिताभ और राजेश खन्ना के लिए किशोर कुमार ने जो गाने गाए हैं उन्हें हम अकसर ही लाइट जाने या गमियों की दोपहर खेली जाने वाली में अंत्यक्षरी चीख-चीख कर गाते थे। चू्ंकि मम्मी सिंगर थीं तो बाद में कुछ गाने की तमीज भी आ गई तब गाने के म ौके नहीं रहे। इस तरह आज सोचता हूं तो लगता है कि वे भी क्या दिन रहे होंगे। एकदम निश्चिंत-बेपरवाही से भरपूर। हालांकि अकसर इस बात पर सोचता हूं कैसे अभी तक देश में लोगों के जीवन को इतना प्रभावित करने वाली फिल्मों के अध्ययन का कोई पाठ्यक्रम शुरू नहीं किया जा सका है। खैर, बचपन की गलियों से गुजरकर अपना फिल्म प्रेम बड़े शहरों में भी उसी शिद्दत से बना रहा। लेकिन एक बात जो हमेशा लगती रही कि फिल्मों ने भले ही तकनीकी तौर पर बेहद तरक्की कर ली हो लेकिन लोगों का वैसा जुड़ाव कम हुआ है जैसा हमारे बचपन में पाया जाता था।
दस पसंदीदा फिल्में
1। सत्ते पे सत्ता
2। शोले
३. हाफ टिकट
४. पड़ोसन
५. दीवार
६.रंग दे बसंती
७. गजनी
८. अंदाज अपना-अपना
९. हेराफेरी
१०. हीरो न. वन

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Saturday, May 16, 2009

दरअसल:फिल्म बिरादरी के बोल-वचन

-अजय ब्रह्मात्मज
चुनाव समाप्त होने को आए। अगले हफ्तों में नई सरकार चुन ली जाएगी। सत्ता के समीकरण से अभी हम वाकिफ नहीं हैं, लेकिन यकीन रखें, देश का लोकतंत्र डावांडोल नहीं होगा। जो भी सरकार बनेगी, वह चलेगी। फिल्मों के स्तंभ में राजनीति की बात अजीब-सी लग सकती है। दरअसल, चुनाव की घोषणा के बाद फिल्मी हस्तियों ने वोट के लिए मतदाताओं को जागरूक करने के अभियान में आगे बढ़ कर हिस्सा लिया। आमिर खान ने कहा, अच्छे को चुनें, सच्चे को चुनें। दूसरी तरफ करण जौहर के नेतृत्व में अभिषेक बच्चन, करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा, रितेश देशमुख, रणवीर कपूर, असिन, इमरान खान, शाहिद कपूर, सोनम कपूर, जेनिलिया और फरहान अख्तर यह बताते नजर आए कि देश का बदलाव जनता के हाथ में है।
करण जौहर का अभियान फिल्म स्टारों के उदास चेहरों से आरंभ होता है। सभी कह रहे हैं कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता। देश का कुछ क्यों नहीं हो सकता, क्योंकि सड़कों पर कचरा है, देश में प्रदूषण है, पुलिस रिश्वत लेती है और राजनीतिज्ञ अपराधी हैं। देश में आतंकवादी आकर हंगामा मचा देते हैं। इन सभी से निराश हमारे फिल्म स्टारों को लगता है कि कुछ नहीं हो सकता इस देश का.., फिर खुद ही कहते हैं कि हो सकता है, अगर हम वोट दें। यहीं एक फिल्मी संवाद आता है, शायद यह सभी समस्याओं का हल नहीं है, लेकिन एक शुरुआत है। शुरुआत क्या है, वोट देना। इस अभियान में निराशा के जो संदर्भ दिए गए हैं, वे देश की मूलभूत समस्याएं नहीं हैं। वास्तव में इस अभियान के स्क्रिप्ट लेखक और निर्देशक मूलभूत समस्याओं से परिचित ही नहीं हैं। बीच में एक उदाहरण दिया जाता है कि फिल्म और खेल बिरादरी में जात-पात या धर्म का भेदभाव नहीं है। फिल्म इंडस्ट्री और खेल जगत पर नजर रखनेवाले आसानी से बता सकते हैं कि यहां किस प्रकार का भेदभाव जारी है।
रोचक तथ्य यह है कि इस अभियान फिल्म में शामिल फिल्म कलाकारों में से अधिकांश ने वोट ही नहीं दिया। मुंबई में एक शब्द प्रचारित है बोल-वचन। बोलने और करने में अंतर दिखे, तो इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। ज्यादातर फिल्म स्टारों की चिंता और चुनाव की जागरूकता में उनकी भागीदारी बोल-वचन ही रही। उन्होंने जागरूकता अभियान को भी फिल्म प्रचार या उत्पादों के एंडोर्समेंट के रूप में लिया। खुद उपयोग करें या न करें, लेकिन यह बोलते नजर आएंगे कि फलां उत्पाद कैसे बेहतर, उपयोगी और जरूरी है। वोट देने के लिए प्रेरित करने तक ही बात सीमित नहीं थी। वे यह भी बता रहे थे किप्रत्याशियों के चुनाव में सावधानी बरतें। सावधानी सिर्फ इस बात की रखें कि प्रत्याशी अपराधी नहीं हो। यह महज अराजनीतिक सावधानी है। कुछ मामलों में ही चंद राजनीतिज्ञों के अपराधी होने की बात सही हो सकती है। अपराध के आरोप राजनीति से प्रेरित भी तो हो सकते हैं। मतदाताओं ने फिल्म स्टारों की एक नहीं सुनी। मुंबई और देश में फिल्म स्टारों की संलग्नता और हिस्सेदारी के बावजूद मतदान का प्रतिशत नहीं बढ़ा। नतीजे आने पर पता चलेगा कि अपराधियों को न चुनने की उनकी सलाह पर मतदाताओं ने कितना अमल किया। वास्तव में इन अभियानों में किसी स्टार की राजनीति स्पष्ट नहीं हुई। विशेष समस्याओं की बात तो दूर उनके बयानों और बातों से यह भी नहीं पता चलता कि वे राजनीति के किस पक्ष में यकीन करते हैं। राजनीति से परहेज करते हुए मतदान की अपील करना वैसा ही है, जैसा फिल्म में किसी किरदार को निभाना। एक तरह से हमारी फिल्मी हस्तियां इस अभियान में अभिनय ही कर रही थीं। उन्होंने इसे अभिनय और विज्ञापन बना दिया। अब उनकी समझ में आ रहा होगा कि उनका प्रयास निष्फल रहा। या फिर जैसा कि फिल्म फ्लॉप होने पर होता है। हमेशा की तरह वे जनता को कोस रहे होंगे कि इनका कुछ नहीं हो सकता, इस देश का कुछ नहीं हो सकता।

फ़िल्म समीक्षा:९९


-अजय ब्रह्मात्मज

कहते हैं देश का हर आदमी 99 के फेर में पड़ा है। बस, एक और मिल जाए, हो जाए या पा जाए तो सभी की सेंचुरी लग जाए। आम जीवन के इसी थीम को निर्देशकद्वय राज और डीके ने अपनी फिल्म का विषय बनाया है। उन्होंने मशहूर कामिक किरदार लारेल और हार्डी की तर्ज पर एक मोटा और एक दुबला-पतला किरदार चुना है। यहां सायरस भरूचा और कुणाल खेमू इन भूमिकाओं में हैं।
मुंबई के दो छोटे जालसाज डुप्लीकेट सिम के धंधे में पकड़े जाने से बचने के लिए भागते हैं तो अपराध के दूसरे कुचक्र में शामिल हो जाते हैं। वे बुकी एजीएम का काम करने लगते हैं। उसी के पैसों की वसूली के लिए वे दिल्ली पहुंचते हैं। दिल्ली में उनका सामना विचित्र किरदारों से होता है। 99 नए किस्म की कामेडी है। पिछले कुछ समय से दर्शक एक ही किस्म की कामेडी देख कर ऊब चुके हैं, वैसे में 99 राहत की तरह है।
निर्देशकद्वय ब्लैक कामेडी और ह्यूमर के बीच में अपने किरदारों को रख पाए हैं। इस फिल्म में मजेदार ब्लैक कामेडी की संभावना थी। फिल्म बीच में स्लो हो जाती है। कामेडी फिल्मों में घटनाएं तेजी से नहीं घटे तो कोफ्त होने लगती है। मुख्य किरदार सचिन [कुणाल खेमू] और जरामुड़ [सायरस भरूचा] के बीच अच्छी केमिस्ट्री है, लेकिन लेखक और निर्देश्क ने जरामुड़ पर विशेष काम नहीं किया है। सायरस नेचुरल किस्म के एक्टर हैं, उन्हें कुछ और दृश्य एवं संवाद मिले होते तो फिल्म की रोचकता बढ़ती। कुणाल निराश तो नहीं करते, लेकिन उन्हें और अभ्यास की जरूरत है।
यह फिल्म बोमन ईरानी और राज मिस्त्री के लिए देखी जा सकती है। राज मिस्त्री के रूप में हिंदी फिल्मों को एक नया एक्टर मिला है। उनकी कामिक टाइमिंग और अभिव्यक्ति फिल्म के दृश्यों के लिए सटीक है। बोमन ऐसी फिल्मों में लाजवाब होते हैं। उनकी पत्नी के रूप में सिमोन सिंह ने किरदार के भाव को अच्छी तरह समझा और व्यक्त किया है।
भोजपुरी फिल्म के माहौल को लेकर किए गए कटाक्ष भोजपुरीभाषी दर्शकों को चुभ सकते हैं। लेखकों को ऐसे मजाक से बचना चाहिए, जो किसी भाषा विशेष को निशाना बना कर हंसाने की कोशिश करता हो। फिल्म के संवाद चुटीले और प्रासंगिक हैं। छोटे ओर सहयोगी किरदारों को गढ़ने में निर्देशक ने मेहनत की है। उनकी मौजूदगी से स्क्रिप्ट में आई फांक भरती है। पहली फिल्म के संदर्भ में निर्देशकद्वय राज निदिमोरू और कृष्णा डीके उम्मीद जगाते हैं।

Thursday, May 14, 2009

एहसास:समाज को जरूरत है गांधीगिरी की -महेश भट्ट


देवताओं के देखने लायक था वह नजसरा। किसी ने उम्मीद नहीं की होगी कि न्यूयार्क में स्थित संयुक्त राष्ट्र की खामोश इमारत तालियों और हंसी से इस कदर गुंजायमान हो उठेगी। संयुक्त राष्ट्र केडैग हैम्सर्क गोल्ड ऑडिटोरियम में राज कुमार हिरानी की लगे रहो मुन्ना भाई देखने के बाद पूरा हॉल खिलखिलाहट और तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा।
फिल्म के निर्देशक राज कुमार हिरानी और इस शो के लिए विशेष तौर पर गए फिल्म के स्टार यकीन नहीं कर पा रहे थे कि मुन्ना और सर्किट के कारनामों को देख कर दर्शकों के रूप में मौजूद गंभीर स्वभाव के राजनयिक इस प्रकार दिल खोल कर हंसेंगे और तालियां बजाएंगे। इस फिल्म में संजय दत्त और अरशद वारसी ने मुन्ना और सर्किट के रोल में अपने खास अंदाज में गांधीगिरी की थी। तालियों की गूंज थमने का नाम नहीं ले रही थी। ऐसी प्रतिक्रिया से फिल्म के निर्देशक का खुश होना स्वाभाविक और वाजिब है। इस सिनेमाई कौशल के लिए वाहवाही लूटने का उन्हें पूरा हक है, लेकिन उनके साथ हमारे लिए भी यह सोचना-समझना ज्यादा जरूरी है कि इस फिल्म को कुलीन और आम दर्शकों की ऐसी प्रतिक्रिया क्यों मिली? क्या यह गांधी का प्रभाव है, जिनकी शब्दावली को लेकर संयुक्त राष्ट्र का घोषणापत्र तैयार किया गया है या मनुष्य की चेतना में बसे किसी मूलभूत गुण के प्रति दर्शक अपना भाव प्रकट कर रहे थे। हिंदू, बौद्ध और जैन दर्शन में समान रूप से महत्वपूर्ण यह मूलभूत गुण अहिंसा है।
अहिंसा परमो धर्म:
अहिंसा का सीधा अर्थ है हिंसारहित। अहिंसा का पाठ सदियों से ऋषि, मुनि और महात्मा बताते-पढाते रहे हैं। स्कूल की किताबों और शिक्षकों ने सालों की मेहनत के बाद भी जो सफलता हासिल नहीं की होगी, उससे अधिक प्रभावी तरीके से इस फिल्म ने अहिंसा का पाठ पढा दिया। अपना देश अभी ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति की गिरफ्त में है, जिसमें गांधी देश के नागरिकों की चेतना से गायब हो रहे हैं। ऐसे माहौल में मुन्ना भाई ने विचारों की सामाजिक-राजनीतिक शून्यता को भर दिया और सभी उम्र के लोगों के लिए गांधी को फैशन में ला दिया। गांधी के करिश्माई नेतृत्व में जिनकी रुचि नहीं के बराबर थी, उन्होंने भी गांधी के बारे में सोचना आरंभ कर दिया। इस फिल्म की रिलीज के बाद बापू की जीवनी की बिक्री बढ गई। गौर करें तो हर देश को आदर्श और प्रेरणा के लिए एक विभूति की जरूरत होती है। निश्चित रूप से गांधी भारतीय जीवन मूल्यों के श्रेष्ठ प्रतीक हैं। गांधी जी इस कारण भी विलक्षण हैं कि वे कम से कम शब्दों में ज्ञान की बातें करते थे। गांधी को फिर से खोजने की कोशिश में मुन्ना भाई ने भी यही किया। उसने गांधी को नए अंदाज में दुनिया के सामने रखा।
फिल्मों में गांधी दर्शन
अहिंसा और गांधी हिंदी फिल्मों के लिए नए विषय नहीं हैं। राज कपूर की फिल्म जिस देश में गंगा बहती है से मेरा परिचय गांधी दर्शन से हुआ था। राज कपूर की इस फिल्म का नायक एक साधारण व्यक्ति है। वह अहिंसा के विचार में ऐसा डूबा हुआ है कि किसी के चपत लगाने पर दूसरा गाल आगे कर देता है। इस फिल्म ने हम बचों का मनोरंजन तो किया ही था, साथ ही गांधी का संदेश भी दिया था कि जो गोलियों से जिंदा रहता है, वह गोलियों से ही मरता है। इस फिल्म की यही कहानी थी कि कैसे एक साधारण व्यक्ति खूंखार डाकुओं को हथियार फेंकने के लिए प्रेरित करता है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोडता है। राज कपूर की इस फिल्म का विषय आज भी कितना प्रासंगिक है? इस फिल्म का एक संवाद मुझे आज भी याद है। डाकुओं के सरदार राका की भूमिका निभा रहे प्राण से राज कपूर कहते हैं, फेंक दे, ये दोनाली राका.. इसने गांधी को नहीं पहचाना, ये तुझे क्या पहचानेगी?
इस फिल्म का प्रभाव इतना जबरदस्त था कि सालों बाद जिस देश में गंगा बहती है से प्रेरित होकर मैंने सर का निर्माण और निर्देशन किया। सर मेरी उन फिल्मों में से है, जिन पर मैं गर्व करता हूं। इसमें नसीरुद्दीन शाह ने एक सामान्य प्रोफेसर की भूमिका निभाई थी। प्रोफेसर खतरनाक गैंगस्टर वेलजीभाई को प्रेरित करते हैं कि हथियार फेंक कर अहिंसा का मार्ग अपना लो। वेलजी की भूमिका परेश रावल ने निभाई थी। यह फिल्म भी कामयाब रही थी। सचमुच, अगर अहिंसा के विषय को नाटकीय ढंग से चित्रित किया जाए तो उसे दर्शक हर समय स्वीकार करेंगे।
अहिंसा बनाम हिंसा
हिंदी फिल्मों में एक दौर ऐसा भी आया था, जब हिंदी फिल्मों में हिंसा पर बहुत ज्यादा जोर दिया जाने लगा था। समस्या सुलझाने का एक ही तरीका था-बदला और प्रतिशोध। इस दौर में फालतू किस्म की एक्शन फिल्में बनीं और सिनेमा का रुपहला पर्दा खून के छींटों से लाल होता गया। ये फिल्में शायद भारतीय समाज में गहराई से कुछ गलत लक्षणों के तौर पर उभरी थीं। भारत ने गांधीवादी मूल्यों को छोड दिया था। इसी वजह से एंग्री यंग मैन और ताकतवर हीरो का जन्म हुआ, जो अपने हाथों से दुश्मनों की लुगदी बना देता था। इस तरह के सिनेमा के हीरो धर्मेद्र, अमिताभ बचन, विनोद खन्ना और सनी देओल जैसे कलाकार थे। इस खूनी दौर में सुनील दत्त ने रेशमा और शेरा जैसी अहिंसावादी फिल्म बनाने का साहस किया था, क्योंकि वे भीतर से गांधीवादी थे। सुनील दत्त को अपने प्रयास की भारी कीमत चुकानी पडी थी। उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ। बतौर निर्माता उनके करियर पर लगभग पूर्णविराम लग गया था। उन्हें लंबी लडाई लडनी पडी। खुद को जिंदा रखने के लिए उन्हें हिंसात्मक और एक्शन फिल्मों का सहारा लेना पडा।
गांधी के प्रतीक नेल्सन मंडेला
डायरेक्टर के तौर पर मेरी अंतिम फिल्मों में से एक कारतूस थी। यह फिल्म एक खास वजह से मुझे याद है। कारतूस की शूटिंग के लिए मैं दक्षिण अफ्रीका गया था। वहां मुझे गांधी की साक्षात प्रतिमूर्ति नेल्सन मंडेला से मिलने का अवसर मिला। मंडेला जैसी जीवित किंवदंती से मुलाकात की हर बात मुझे याद है। मेरे खयाल में वे अकेले ऐसे नेता हैं, जो दुनिया को इस भयानक दौर से सुरक्षित निकलने का उपाय बता सकते हैं। संजय दत्त, मनीषा कोइराला और अपनी टीम के कुछ तकनीशियन सदस्यों के साथ मैं उनसे मिलने गया था। वे गर्मजोशी के साथ हमसे मिले। उन दिनों भारत अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा था। इंद्र कुमार गुजराल देश के प्रधानमंत्री थे। भारतीय राजनीति और समाज की बुरी हालत थी। मैंने मंडेला से पूछा, भारत की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं का क्या समाधान हो सकता है? उनका जवाब मुझे आज तक याद है। उन्होंने कहा, लगता है भारत ने अपने गौरवशाली सपूत गांधी को भुला दिया है, जिसने बगैर खून बहाए आपके देश को आजादी दिलाई थी। जरूरत है कि आप लोग गांधी और अहिंसा के उनके संदेश को अपने जीवन के केंद्र में ले आएं। गांधी के विचारों के बिना आज दुनिया की शक्ल कुछ और होती। वे बोल रहे थे और हम सुन रहे थे।
मुन्ना भाई की गांधीगिरी
लगे रहो मुन्ना भाई जैसी पॉपुलर फिल्म से गांधी फिर जीवित हुए हैं, लेकिन गांधीवाद या गांधी का दर्शन गहन विषय है। गांधी के दर्शन, विचारों या अहिंसा के पाठ को किसी पॉपुलर फिल्म के जरिये याद करने में बुराई नहीं है, लेकिन उस पाठ को दैनिक जीवन में उतार पाना असल चुनौती है। कांग्रेस दल ने गांधी को हर सडक-चौराहे में मूर्ति के रूप में स्थापित किया है, लेकिन गांधी को लेकर कांग्रेस में पुनर्जागरण की जरूरत है। देश के लिए जानना जरूरी है कि गांधी किन विचारों के लिए जिंदा रहे और मरे। सरल शब्दों में कहूं तो आज देशभक्त या शुद्ध गांधीवादी या अहिंसा का समर्थक होने के लिए जरूरी है कि हम अपने पडोसियों से खुद की तरह प्यार करें। भारत ने ऐसा नहीं करने का अपराध किया है। अगर हमने ऐसा किया होता तो सुविधाप्राप्त और सुविधाहीन लोगों के बीच इतनी बडी खाई नहीं होती।

Wednesday, May 13, 2009

हिन्दी टाकीज:काश! हकीकत बन सकता गुजरा जमाना-विजय कुमार झा


हिन्दी टाकीज-३५

हिन्दी टाकीज कोशिश है अपने बचपन और कैशोर्य की गलियों में लौटने की.इन गलियों में भटकते हर हम सभी ने सिनेमा के संस्कार हासिल किए.जीवन में ज़रूरी तमाम विषयों की शिक्षा दी जाती है,लेकिन फ़िल्म देखना हमें कोई नहीं सिखाता.हम ख़ुद सीखते हैं और सिनेमा के प्रति सहृदय और सुसंस्कृत होते हैं.अगर आप अपने संस्मरण से इस कड़ी को मजबूत करें तो खुशी होगी.अपने संस्मरण पोस्ट करें ...chavannichap@gmail.com


इस बार युवा पत्रकार विजय कुमार झा। विजय से चवन्नी की संक्षिप्त मुलाक़ात है.हाँ,बातें कई बार हुई हैं.कभी फ़ोन पर तो कभी चैट पर। विजय कम बोलते हैं,लेकिन संतुलित और सारगर्भित बोलते हैं.सचेत किस्म के नौजवान हैं। अपनी व्यस्तता से समय निकाल कर उन्होंने लिखा.इस संस्मरण के सन्दर्भ में उन्होंने लिखा है...यादें हसीन हों तो उनमें जीना अच्‍छा लगता है, पर उस पेशे में हूं जहां कल की बात आज बासी हो जाती है। सो आज में ही जीने वाला पत्रकार वि‍जय बन कर रह गया हूं। हिन्दी टाकीज का शुक्रि‍या कि‍ उसने अतीत में झांकने को प्रेरि‍त कि‍या और मैं कुछ देर के लि‍ए बीते जमाने में लौट गया। मुश्‍कि‍ल तो हुई, पर मजा भी खूब आया। जो समेट पाया, वह लेकर एक बार फि‍र आज में लौट आया हूं।
आप उनसे vijay.bgp@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

जब से महानगर (दि‍ल्‍ली) में मशीनी जिंदगी जीने के लि‍ए मजबूर हुआ और टीवी, कंप्‍यूटर, इंटरनेट आदि‍ की सुवि‍धा सुलभ हो गई, बड़े पर्दे पर सि‍नेमा देखने के कम ही मौके मि‍लते हैं। महीनों बाद, कभी-कभार। वैसे, सच कहें तो अब देखने लायक फि‍ल्‍में भी तो कभी-कभार ही बनती हैं। शायद महीनों नहीं, बल्‍कि‍ सालों बाद। बहरहाल, जब कभी भी मल्‍टीप्‍लेक्‍स की लि‍फ्ट चढ़ने का मौका मि‍लता है, गुजरा जमाना याद आता है। स्‍कूल-कालेज वाले दि‍न।

अचानक फि‍ल्‍म देखने का प्रोगाम बनता तो चौकड़ी में पहला सवाल यही उठता था- टि‍कट मि‍ल जाएगा? मैं जि‍स शहर (भागलपुर) में पला-बढ़ा, वहां अभी भी फोन या इंटरनेट से बुकिंग की सुवि‍धा नहीं है। बॉक्‍स ऑफि‍स पर चमकी हुई फि‍ल्‍म के शो के टि‍कट लेना फल पाने (फि‍ल्‍म देखने) से पहले तपस्‍या करने के बराबर था। यह बात अलग थी कि‍ अक्‍सर यह तपस्‍या मेरा कोई दोस्‍त कि‍या करता था और पूरे तीन घंटे ‘फल’ का आनंद हम सब मि‍ल कर लेते थे।

हमारे लि‍ए उन दि‍नों फि‍ल्‍म देखना एक गोपनीय अभि‍यान हुआ करता था। सि‍नेमा हॉल जाने और वहां से नि‍कलने तक इस बात की पूरी कोशि‍श की जाती थी कि‍ कहीं कोई जान-पहचान वाला नहीं दि‍ख जाए, जो घर तक खबर पहुंचा दे। दरअसल, पि‍‍ताजी फि‍ल्‍मों के प्रति‍ दीवानगी को सीधे बच्‍चे की बर्बादी से जोड़ कर देखते थे। यह फि‍ल्‍मों के प्रति‍ समाज के एक तबके में प्रचलि‍त हेय दृष्‍टि‍कोण का नतीजा था। यह तबका फि‍ल्‍म कलाकारों को नाचने-गाने वाले और फि‍ल्‍म को समाज को गलत दि‍शा दि‍खाने वाले माध्‍यम के रूप में लेता था। ऐसी धारणा फि‍ल्‍मों और फि‍ल्‍मी दुनि‍या को देखे-जाने-समझे बि‍ना ही बनी हुई थी कि‍ फि‍ल्‍में भावी पीढ़ी को बि‍गाड़ने का सबसे अच्‍छा जरि‍या हैं। लगभग सभी दोस्‍तों की यही समस्‍या थी, सो सामूहि‍क प्रयास से हम अपने ‘अभि‍यान’ को गोपनीय रखने में अक्‍सर कामयाब हो जाते थे। बहरहाल, आज जब इसका सकारात्‍मक पहलू ढूंढता हूं तो यही लगता है कि‍ चोरी चुपके फि‍ल्‍म देखने का हमारा अभि‍यान कहीं न कहीं हम दोस्‍तों की दोस्‍ती के बंधन को मजबूती ही देता था। स्‍कूल में प्रेमरंजन से मेरी और रूपेश की दोस्‍ती ही फि‍ल्‍म देखने के क्रम में हुई थी। उन लोगों ने क्‍लास बंक कर फि‍ल्‍म देखने का प्रोग्राम बनाया था और उसमें हम दोनों को भी शामि‍ल कर लि‍या था। वहीं से हमारी दोस्‍ती की शुरुआत हुई थी।

उन दि‍नों सि‍नेमा को लेकर समाज का नजरि‍या, समाज को लेकर सि‍नेमा जगत की सोच और बनने वाली फि‍ल्‍में ही अलग नहीं थीं, बल्‍कि‍ फि‍ल्‍में देखने का अंदाज भी अलग था। तीन घंटे की फि‍ल्‍म देखने का मतलब पूरे तीन घंटे मनोरंजन, मनोरंजन और केवल मनोरंजन। हर कोई अपने-अपने अंदाज में ‘पैसा वसूल’ मनोरंजन करता था। कोई सीटी बजा कर, कोई नायकों के कारनामे देखकर, कोई हीरो-हीरोइन का रोमांस देख कर तो कोई कहानी और कि‍रदारों में डूब कर। दर्शक पर्दे पर नायकों के कारनामे से उत्‍साहि‍त होते और खलनायकों पर गुस्‍सा भी करते थे। फि‍ल्‍मों को वास्‍तवि‍कता के काफी करीब रख कर देखा जाता था। फि‍ल्‍में बनाने वाले शायद उसे हकीकत के इतना करीब लाने की कोशि‍श नहीं करते थे, पर दर्शक उसे वास्‍तवि‍कता से जोड़ लेते थे। आज फि‍ल्‍मकार अपनी तरफ से कोशि‍श कर भी दर्शकों को वास्‍तवि‍कता के करीब ले जाने में सफल नहीं हो पाते। शायद इसलि‍ए कि‍ फि‍ल्‍में तकनीकी रूप से वास्‍तवि‍कता के करीब आई हैं, पर कहानी और कि‍रदारों के मोर्चे पर यह करीबी नहीं आई है। यही वजह है कि‍ आज फि‍ल्‍म बनाने वालों को प्रचार पर भारी-भरकम रकम खर्च करनी पड़ रही है और प्रचार के नए-नए तरीके भी खोजने पड़ रहे हैं। इस दौरान फि‍ल्‍मों का व्‍यावसायीकरण (कॉरपोरेटाइजेशन ऑफ फि‍ल्‍म्‍स) जि‍तना बढ़ा है, उतना कुछ नहीं। इसलि‍ए रील लाइफ की सभी रि‍यल चीजें बनावटी लगती हैं।

‘हि‍न्‍दी टाकीज’ की बात गानों की चर्चा के बि‍ना अधूरी रहेगी। यह इसलि‍ए भी क्‍योंकि‍ फि‍ल्‍मों के प्रति‍ मेरी रुचि‍ वि‍कसि‍त होने में गानों की अहम भूमि‍का रही। गाने सुनने के लि‍ए रेडि‍यो एक मात्र सर्वाधि‍क लोकप्रि‍य और सस्‍ता साधन था। घर में ‘डेक’ (आडि‍यो प्‍लेयर) और टीवी आ जाने के बाद भी मैं रेडि‍यो पर ही गाने सुनने का मजा लेता था। वजह यह थी कि‍ हर दौर और मूड के गाने आसानी से सुनने को मि‍ल जाते थे। सुरैया से लेकर यशुदास तक और पंकज उधास से कुमार शानू तक। सुबह बीबीसी सुनने के बाद पि‍ताजी रामचरि‍त मानस का पाठ सुना करते थे। उसके बाद श्रीलंका ब्राडकास्‍टिंग कारपोरेशन के वि‍देश वि‍भाग (सीलोन) से फि‍ल्‍मी गाने सुनने का मेरा दौर शुरू होता था। आठ से नौ तक हर मूड के गाने सुनने के बाद नौ बजे से आधे घंटे तक स्‍थानीय भागलपुर रेडि‍यो स्‍टेशन से ‘गीत र्नि‍झर’ बहा करता था। पौने दस से सवा दस बजे तक पटना स्‍टेशन से गाने आते थे। सुबह के इस सत्र का जहां तक संभव हो सके, मैं पूरा लाभ उठाता था। फि‍र रात को रेडि‍यो नेपाल। इनसे इतर, बेवक्‍त गाने सुनना हो तो वि‍वि‍ध भारती था ही। अब ये सोचने में पसीना मत बहाइए कि‍ मैं पढ़ाई कब करता था। वह मैं कर लि‍या करता था। बहरहाल, गाने सुन कर मैं बालीवुड की वि‍वि‍धता के बारे में सोचने लगता था और मेरा दि‍माग चकरा जाता था। असल जिंदगी की कि‍सी भी स्‍थि‍ति‍ (सि‍चुएशन) की कल्‍पना कीजि‍ए और उससे संबंधि‍त गाना सोचि‍ए, मि‍ल जाएगा। हालांकि‍ अगर सिर्फ बीते दस-बीस साल के गाने तलाशे जाएं तो संभवत: ऐसा नहीं हो, पर पुराने जमाने के गाने वि‍वि‍धता और वास्‍तवि‍कता की इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं। बालीवुड के प्रति‍ मेरी सकारात्‍मक सोच वि‍कसि‍त होने में इस सच्‍चाई का काफी योगदान रहा। फि‍र नई आने वाली फि‍ल्‍मों के गाने सुन कर ही हम प्रथमदृष्‍टया यह तय करते थे कि‍ फि‍ल्‍म देखने चलना है या नहीं। अगर चलना है तो मंडली में वि‍चार होता था और फि‍र कार्यक्रम बन जाता था। उन दि‍नों गाने नई फि‍ल्‍मों के प्रचार का भी बड़ा हथि‍यार होते थे। प्रचार मुख्‍य रूप से गली-मोहल्‍लों में लाउडस्‍पीकरों से अनाउंस करवा कर और पोस्‍टर चि‍पका कर कि‍ए जाते थे। लाउडस्‍पीकरों से फि‍ल्‍म के गाने सुनाए जाते थे और बीच-बीच में प्रचार करने वाला शख्‍स फि‍ल्‍म के कलाकारों के बारे में बताता था। पता नहीं, मेरे शहर में अब भी फि‍ल्‍मों का प्रचार ऐसे ही होता है या इसकी जरूरत ही नहीं रह गई है। अब तो साल या दो साल में एक बार जाना होता है और वह भी कुछ दि‍नों के लि‍ए। काश! बीते जमाने को यादों से इतर, हकीकत में जीना मुमकि‍न हो पाता।

दस पसंदीदा फि‍ल्‍में

बातों बातों में

बावर्ची

तीसरी कसम

गाइड

मेरा नाम जोकर

श्री ४२०

दोस्ती

उमराव जान

लगान

तारे ज़मीन पर

Saturday, May 9, 2009

फ़िल्म समीक्षा:फ्रोजेन


-अजय ब्रह्मात्मज

शिवाजी चंद्रभूषण की पहली फिल्म फ्रोजेन की ख्याति इतनी फैल चुकी है कि इसके बारे में संतुलित और वस्तुनिष्ठ राय व्यक्त करना मुश्किल है। कहते हैं कि तीस फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जा चुकी इस फिल्म को 18 पुरस्कार मिल चुके हैं। इस फिल्म के प्रचार में पुरस्कारों का निरंतर उल्लेख किया जा रहा है। कहीं न कहीं दर्शकों पर दबाव डाला जा रहा है कि आप इसे देखें या न देखें, इसकी महत्ता स्वीकार कर लें। शिवाजी चंद्रभूषण की फ्रोजेन की कई विशेषताएं हैं,
मसलन:-चालीस सालों के अंतराल के बाद कोई ब्लैक एंड ह्वाइट हिंदी फिल्म रिलीज हो रही है। शिवाजी के इस क्रिएटिव साहस और उसके सुंदर परिणाम की तारीफ उचित है।
समुद्र तल से 12,000 से 20,000 फीट की ऊंचाई पर इस फिल्म की शूटिंग हुई। यह मुश्किल काम था।
-लंबे समय के बाद डैनी शीर्ष भूमिका में दिखे। उनकी योग्यता और क्षमता का शिवाजी ने सही इस्तेमाल किया।
-फ्रोजेन में हिमालय की वादियों की एकांत खूबसूरती छलकती है।
कहना मुश्किल है कि विदेशी फिल्म फेस्टिवल में फ्रोजेन को किस आधार पर पुरस्कार दिए गए हैं। सवाल पूछने का मतलब यह कतई नहीं निकालें कि फिल्म इन पुरस्कारों के योग्य नहीं है। फ्रोजेन हिंदी के फार्मूला फिल्मों से अलग है। इसकी कहानी कई स्तरों पर चलती है। हिंदी फि ल्मों में कथा निर्वाह की एकरेखीय पद्धति होती है। उसकी आदत पड़ जाने के कारण जटिल कहानी एकबारगी समझ में नहीं आती। लास्या का काल्पनिक भाई, लास्या का एकाकीपन, लास्या के पिता कर्मा का संघर्ष, कर्मा का शोक और संताप, विस्थापन की समस्या, शांत माहौल में खंजर की तरह चुभती सड़कें, दैत्यों की तरह गुजरते वाहन, निष्कपट लोगों के बीच सक्रिय कपटी शहरी, उपभोक्तावाद का प्रभाव..जाने-अनजाने शिवाजी चंद्रभूषण ने भावनाओं और कथ्यों का अंतरजाल बुना है। फिल्म में एक उदासी है, जो श्वेत-श्याम फिल्मांकन से और गहरी हो जाती है। कभी-कभी बोझिल भी महसूस होती है।
नियमित फिल्मों के जरिये मनोरंजन के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म काफी अलग अनुभव देगी। इस नए और अलग स्वाद के लिए उन्हें तैयार रहना होगा। डैनी और आनचुक का अभिनय सधा और किरदार के अनुरूप है। लास्या की भूमिका में गौरी खरी नहीं उतर पातीं। छोटी भूमिकाओं में यशपाल शर्मा और राज जुत्शी फिल्म को रोचक बनाते हैं।
रेटिंग ***

दरअसल:डीवीडी का बदलता स्वरूप


-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले कुछ समय से डीवीडी बाजार में तेजी से बदलाव आया है। नई कंपनियों ने दर्शकों की जरूरतों को समझते हुए मार्केटिंग में सुधार के साथ प्रोडक्ट को भी नया रूप दिया है। अब व‌र्ल्ड और इंडियन क्लासिक फिल्मों के सस्ते और महंगे डीवीडी आ गए हैं। कई कंपनियां बाजार में सक्रिय हैं और दर्शकों के विशेष समूह को अपना खरीददार बना रही हैं। हर डिर्पाटमेंटल और रिटेल स्टोर में डीवीडी और वीसीडी मिल रहे हैं। महानगरों में मल्टीप्लेक्स में नई फिल्मों की रिलीज रुकने से अचानक डीवीडी की मांग बढ़ी है। मुंबई के रिटेल स्टोर में डीवीडी की बिक्री में 10 से 25 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। दरअसल, मल्टीप्लेक्स संस्कृति ने नए दर्शक बनाए हैं। शहरों में पांच-छह दिनों की मशक्कत के बाद वीकएंड में मनोरंजन का सिलसिला बढ़ा है। वीकएंड में हर मल्टीप्लेक्स में ऐसे दर्शकों की तादाद बढ़ जाती है। इन दर्शकों ने ही फिल्म बिजनेस का गणित बदला है। फिल्म इंडस्ट्री धीरे-धीरे वीकएंड बिजनेस पर निर्भर होती गई है। बड़े निर्माता और प्रोडक्शन हाउस नई फिल्मों के वीकएंड बिजनेस को सुनिश्चित करने के लिए दमदार और धुआंधार प्रचार करते हैं। कहा जाता है कि फिल्मों की लागत का बड़ा हिस्सा पहले तीन दिनों में ही वसूल हो जाता है। फिल्मों के इस वीक एंड बिजनेस के मुख्य कारक दर्शक हैं। मल्टीपलेक्स मालिकों और निर्माता-वितरकों के बीच लाभांश के सवाल पर आए गतिरोध से मल्टीप्लेक्स के नए दर्शक मनोरंजन से वंचित हो गए हैं। इसीलिए उन्होंने डीवीडी का सहारा लिया है। इसीलिए डीवीडी मार्केट में उछाल आया है।
दर्शकों की जरूरत और मांग को देखते हुए देव डी जैसी नई फिल्म की डीवीडी भी मार्केट में डाल दी गई है। अभी गजनी, रब ने बना दी जोड़ी और अ वेडनेसडे सबसे ज्यादा बिक रही हैं। डीवीडी में फिल्मों से इतर चीजें भी देखने को मिलती हैं। रब ने.. का उदाहरण लें, तो गानों के फिल्मांकन के साथ फिल्म के मुख्य स्टारों शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा से भी दर्शक मुखातिब होते हैं। सिनेमा को समझने का नया एक्सपीरिएंस होता है। फिल्म बनने की प्रक्रिया और सोच से परिचित होने पर फिल्म देखने का आनंद बढ़ जाता है। मुमकिन है इस प्रक्रिया में धीरे-धीरे दर्शकों का सजग समूह विकसित हो।
पहले डीवीडी और वीसीडी में सिर्फ फिल्में ही रहती थीं। डिजिटल तकनीक की मदद से अब डीवीडी को इस रूप में तैयार करना संभव हो गया है कि हम फिल्मों के दृश्य या गाने या मेकिंग अलग से देख सकें। डीवीडी के नए स्वरूप की बात करें, तो जोधा अकबर और तारे जमीन पर अभी तक के सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं। जोधा अकबर में आशुतोष ने फिल्म के कटे दृश्य रखे। साथ ही उन्होंने पत्रकार राजीव मसंद के साथ अपनी बातचीत भी इस डीवीडी में डाली है। इससे फिल्म की बारीकियों को समझने में मदद मिलती है। इसी प्रकार आमिर खान ने तीन डिस्क का डीवीडी पैकेट तैयार किया। तारे जमीन पर से संबंधित हर तरह की जानकारी इस डीवीडी से मिलती है। आमिर ने दृश्यों की भी बात की है।
उम्मीद है, होम एंटरटेनमेंट में हो रही बढ़ोत्तरी के साथ डीवीडी का स्वरूप और निखरेगा।

Friday, May 8, 2009

हिन्दी टाकीज:बार-बार याद आते हैं वे दिन-आनंद भारती

हिन्दी टाकीज-३४
पत्रकारों और लेखों के बीच सुपरिचित आनंद भारती ने चवन्नी का आग्रह स्वीकार किया.उन्होंने पूरे मनोयोग से यह संस्मरण लिखा है,जिसमें उनका जीवन भी आया है.हिन्दी टाकीज के सन्दर्भ में वे अपने बारे में लिखते हैं...बिहार के एक अविकसित गांव चोरहली (खगड़िया) में जन्‍म। यह गांव आज भी बिजली, पक्‍की सड़क की पहुंच से दूर है। गांव भी नहीं रहा, कोसी नदी के गर्भ में समा गया। बचपन से ही यायावरी प्रवृत्ति का था। जैसे पढ़ाई के लिए इस ठाम से उस ठाम भागते रहे,उसी तरह नौकरी में भी शहरों को लांघते रहे। हर मुश्किल दिनों में फिल्‍मों ने साथ निभाया, जीने की ताकत दी। कल्‍पना करने के गुर सिखाए और सृजन की वास्‍तविकता भी बताई। फिल्‍मों का जो नशा पहले था, आज भी है। मुंबई आया भी इसीलिए कि फिल्‍मों को ही कैरियर बनाना है, यह अलग बात है कि धक्‍के बहुत खाने पड़ रहे हैं। अगर कहूं कि जिस जिस पे भरोसा था वही साथ नहीं दे रहे, तो गलत नहीं होगा। फिर भी संकल्‍प और सपने जीवित हैं। जागते रहो का राज कपूर, गाईड का देव आनंद प्‍यासा का गुरुदत्‍त, आनंद का राजेश खन्‍ना और अमिताभ बच्‍चन,तीसरी कसम के निर्माता शैलेंद्र, अंकुर और निशांत के निर्देशक श्‍याम बेनेगल जैसे लोगों को हमेशा अपने भीतर महसूस करता रहता हूं। उनसे संपर्क करना चाहें तो लिखें ... anandbharti03@gmail.com
संभवत: 63 की बात है जब मैंने बिहार-नेपाल सीमा से सटे शहर फारबिसगंज में पहली फिल्‍म देखी थी 'ग्‍यारह हजार लड़कियां'। उसके एक सप्‍ताह बाद ही पूर्णिया में दूसरी मगर पुरानी फिल्‍म देखने का मौका मिला 'प्‍यार की जीत'। मेरी उम्र तब बहुत छोटी थी। मुझे अच्‍छी तरह याद है कि इसके कुछ समय बाद पूर्णिया के रूपवाणी टॉकीज में 'गंगा की लहरें' के पोस्‍टर को देखकर मैं खो गया था। पोस्‍टरों ने मुझे एक मायावी दुनिया में पहुंचा दिया था। उसी दिन पहली बार जेहन में आता था कि क्‍या मैं फिल्‍में नहीं बना सकता। जवाब खुद ही मिला कि 20-22 की उम्र हो जाए तब सोचना। कुछ भी करने के लिए बंबई जाना पड़ेगा, जो तब किसी भी रूप में संभव नहीं था। 'प्‍यार की जीत' के बाद कुछ फिल्‍में और भी देखीं,लेकिन पढ़ाई को लेकर दिमाग पर इतना दबाव था कि ज्‍यादा सोच ही नहीं पाता था। मगर फिल्‍मी खबरों से साबका रोज पड़ता था। बिनाका गीत माला ने पहली बार फिल्‍म का ज्ञान दिया था। उसके बाद घर में आने वाले अखबार, सा‍हित्यिक और फिल्‍मी मैगजीन ने उस ज्ञान को और समृद्ध किया। पिताजी की दिलचस्‍पी राजनीतिक खबरों और साहित्‍य में थी, वह अ‍सर हम तीनों भाइयों पर भी आ गया। छोटे चाचा सा‍हित्‍य-प्रेमी थे,मगर वह उससे ज्‍यादा फिल्‍मों में दिलचस्‍पी रखते थे इसलिए फिल्‍मी खबरें उनसे सुनने को मिलती रहती थीं। हमारे परिवार में देव आनंद सबकी पसंद थे इसलिए देव साहब की तस्‍वीरें घर की दीवारों पर सबसे ज्‍यादा सटी मिलती थीं।
हम बिहार के ऐसे गांव में थे, जहां की आबादी बहुत घनी थी। हिंदू और मुसलमान बराबर की संख्‍या में थे। समृद्ध लोगों की भरमार थी। सात-आठ घरों में तब रेडियो हुआ करता था, जिनकी आवाज हमेशा गूंजती रहती थी। अकेला मेरा घर था, जहां ग्रामोफोन भी था। उस गांव में तब भी बिजली और सड़क नहीं थी और आज भी नहीं है। अब तो वह गांव रहा ही नहीं। कोसी नदी के गर्भ में समा गया। लोग टोलों की शक्‍ल में जहां-तहां रह रहे हैं। तब हर साल मेरा गांव चोरहली ही क्‍यों पूरा इलाका तीन महीने तक बाढ़ के पानी से घिरा और डूबा रहता था। निचले इलाके के लोग हमारे जैसे लोगों के बड़े घरों में आ जाते थे। मिलकर रहते थे। कोई अमीरी-गरीबी का भाव ऐसे समय में नहीं आता था। जीवन ऐसे चलता था जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। मुसलमान परिवार बाकी लोगों के मुकाबले ज्‍यादा रूतबे वाले थे,क्‍योंकि उनके परिवारों के लोग कमाई के लिए कलकता, गौहाटी और बम्‍बई में जाते रहते थे। हम जैसे फिल्‍मी लोगों के लिए बंबई आने-जाने वाले ज्‍यादा महत्‍व रखते थे क्‍योंकि उनके पास दिलीप साहब, देव आनंद, राजकपूर, नरगिस, सुरैया, मीना कुमारी की मानो आंखों से देखी खबरें होती थीं। वे बखान इस कदर करते कि बंबई जाने की मेरी जिद को पंख लग जाते थे। उनके पहनने के कपड़े, बोलने की स्‍टाईल, हाव-भाव काफी आकर्षक होते थे। मैंने छठी-सातवीं में पढ़ते हुए कई बार उनके साथ भागने की बात सोच ली थी।
घर से भागा जरूर लेकिन घर में पढ़ाने वाले एक मास्‍टरजी के खिलाफ विद्रोह कर। चाहा था कि सीधे बंबई चला जाऊं। लेकिन मुझे उसका कोई अता-पता नहीं था। डेढ़ महीने तक बिहार, बंगाल के अपने रिश्‍तेदारों के यहां चक्‍कर काटता रहा। जब पैसे खत्‍म हो गए तब घर लौट आया। बंबई जाने का सपना अधूरा रह गया। सच कहूं तो भागने का रास्‍ता मुझे फिल्‍मों ने ही दिखाया था, लेकिन इस दौरान डेढ़-दो महीने में दो बड़ी उपलब्धियां हाथ लगीं। पहला यह कि गुरू रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर के शांतिनिकेतन देख आया और दूसरा, यह कि हिंदी फिल्‍मों के साथ-साथ बंगला फिल्‍मों को देखने का रेकार्ड कायम कर लिया। भागलपुर, साहेबगंज, कहलगांव, पीरपैंती, कटिहार, पूर्णिया, कलकता और खास कर बिहार में पूर्णिया और कटिहार तो पूरा पूरा बंगाल ही लगता था। मैंने बंगला फिल्‍मों का जो फ्रेम देखा था, वह मेरे किशोर मन पर गहरा असर छोड़ा था। तभी जाना था कि सत्‍यजीत राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, संध्‍या राय, छवि विश्‍वास आदि राजकपूर, नरगिस, दिलीप कुमार, देव आनंद आदि से भी बड़े नाम हैं। इसी लोभ में अपूर संसार, पथेर पांचाली, विराज बहू, अपराजितो, अजांतिक सहित कई फिल्‍में देख लीं। तब एक बड़ा फर्क देखता था। बंगला फिल्‍में हिंदी के मुकाबले ज्‍यादा सीरियस होती हैं। सीधी सादी ढंग से कहानी चलती हैं। बंगला फिल्‍मों ने जो मेरे मन पर असर छोड़ा वह आज भी बरकरार है। बंगला फिल्‍मों ने ही मुझे बंगला उपन्‍यासकारों की तरफ आकर्षित किया। शरतचंद्र मेरे प्रिय लेखक बन गए। वैसा ही जीवन जीने का सपना भी देखने लगा था। कुछ हद तक जीया भी। मगर जो जीया, वह मेरे अंदर का ही भाव था। शरतचंद्र ने उसमें आवारगी को एक हिस्‍सा बना दिया।
फिल्‍में देखने का सिलसिला बाद में और भी तेज हो गया, जब वनसठवा हाई स्‍कूल को छोड़कर जवाहर हाई स्‍कूल, महेशखूंट आ गया। बड़े व्‍यावसायिक परिवार से था इसलिए पैसे की कभी कमी महसूस नहीं हुई। हाई स्‍कूल में हॉस्‍टल में रहने लगा। हॉस्‍टल का अनुशासन था मगर आजादी का अहसास भी था। वहां पढ़ते हुए अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में चिट्ठयां छपने लगी थीं। छोटी-छोटी बाल कथाएं तथा मिनी कविताओं को भी जगह मिलने लगी थी। एक तो पैसे का दबदबा और दूसरे पत्र-पत्रिकाओं में नाम छपने से मिल रही लोकप्रियता ने मुझे अचानक स्‍टार बना दिया था। स्‍कूल के सारे शिक्षक भी मुझ पर गर्व करते थे। प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, दिनकर जी, जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री, कवि आरसी प्रसाद सिंह, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, पंत जी सहित उस समय के सारे साहित्‍यकारों पर लंबा-चौड़ा व्‍याख्‍यान देने की स्थिति में होता था। जरूरत पड़ने पर सिनेमा पर धाराप्रवाह बोलता था क्‍योंकि फिल्‍मी पत्रिकाएं हॉस्‍टल में छिप-छिप कर खूब पढ़ता था। इसी कारण लड़कियां मेरी दीवानी रहती थीं। वे मुझ में फिल्‍म एक्‍टर की छाया देखती थीं। लेकिन पढ़ने की आदत ने मेरे अंदर बैठे एक्‍टर को षडयंत्र के शिकंजे में ले लिया। वहां से एक्‍टर को हटाकर राइटर को बिठा लिया। गांव के नाटकों में की हुई अदाकारी पीछे घूटती चली गई। गांव में हर साल कानपुर से नौटंकी आती थी। लगभग 15-20 दिन तक चलती रहती थी। ऐसा कोई दिन नहीं जब नौटंकी में नहीं जाता था। नौटंकी के सारे आर्टिस्‍ट मुझे बहुत प्‍यार करते थे। उनके संवादों को नौटंकी से प्रेरित होकर मैंने पहले हाई स्‍कूल में और फिर कालेज में कई नाटक लिखे, जो खेले भी गए।
हाई स्‍कूल में आने के बाद शौक बदल गए। नाटक की जगह सिनेमा ने ले लिया। ट्रेन में विदआउट टिकट न जाने कितनी बार फिल्‍में देखने के लिए खगडिया, बेगूसराय, नौगछिया, गोगरी जमालपुर और कटिहार गया। यह साप्‍ताहिक कार्यक्रम बन गया। कभी-कभी सिनेमाघर में दो से तीन फिल्‍में भी देख लेता था। कोई-कोई सिनेमाघर ऐसा भी था जहां एक टिकट में दो फिल्‍में दिखाता था। वहीं से फिल्‍मों की कहानी के बारे में सोचने लगा। फिल्‍में देखना जुनून की तरह हो गया। 1971-72 में पूर्णिया कालेज में एडमिशन ले लिया। आरएसएस के बहुत सारे लड़के मेरे साथ पढ़ते थे। कालेज में मेरी अच्‍छी शक्‍ल-सूरत और साहित्यिक दिलचस्‍पी ने मुझे कालेज में सबका चहेता बना दिया था। मेरी यह छवि आरएसएस के लोगों को अच्‍छा नहीं लग रही थी। वे मुझे गंभीर बनाना चाहते थे तथा जिम्‍मेदार भी। इसलिए वे किसी भी तरह मुझे पकड़ना चाहते थे। मैं उनकी बातों में आ गया और खुद को अपने सांचे से अलग हटाकर उनके सांचे में डाल दिया। यह भी षडयंत्र ही था। मेरे दोनों बड़े भाई तब नाराज भी हुए थे। इसलिए कि बड़े भैया मार्क्‍सवादी थे और मंझले भाई लोहियावादी, इंटरमीडियट के बाद हिंदी ऑनर्स ले लिया। जितने भी लेक्‍चरर थे, सबने समझाया कि साहित्‍य तक ही रहो तो ज्‍यादा ठीक है। सिनेमा को उसी नजरिए से देखो मगर मैं संघ के जाल में फंस गया। विद्यार्थी परिषद का नाम संभाल लिया। आंदोलन स्‍वभाव बन गया। सिनेमा देखना हालांकि तब भी कम नहीं हुआ, मगर संघ के प्रचारकों से यह बार-बार तोहफा मिली कि नौजवानों बच्‍चों पर क्‍या यही छाप छोड़ोगे? जब 1974 का आंदोलन में 1975 की इमरजेंसी में राजगीर समांतर लेखक सम्‍मेलन से जिस दिन गुलाबबाग (पूर्णिया) लौटा, उसी दिन पुलिस ने मुझे रात में होटल में खाना खाते समय गिरफ्तार कर लिया।
काफी समय बाद जेल से छूटने पर मैंने सबसे पहला काम किया वह फिल्‍म देखना था। बहुत दनों बाद लगा कि अपनी पुरानी जगह पर वापसी कर रहा हूं। उस दौरान बार-बार सोचा कि इमरजेंसी पर फिल्‍म बनाने जैसी कोई कहानी अवश्‍य लिखूंगा। जेल में मेरे साथ ज्‍यादातर आरएसएस तथा सर्वोदयी लोग थे। कुछ मार्क्‍सवादी और नक्‍सलवादी समर्थक थे। इनके साथ घंटों बहस चलती रहती। हर रात जेल में सामूहिक बहस का कार्यक्रम रखा जाता था। जब बहस के लिए विषय कम पड़ने लगते तब मेरे सुझाव पर फिल्‍मों को बहस का केंद्र में ले आया गया। सारे क्रांतिकारी लोग ध्‍यान से फिल्‍मों के बारे में सुनते थे। तब देशभक्ति वाले गीतों में साथ-साथ फिल्‍मी गीत भी खूब गाए जाने लगे थे। फिल्‍मी बातों से हर आदमी का छुपा हुआ चेहरा परत-दर-परत खुलने लगा था। हर किसी के पास फिल्‍में देखने का अनुभव था। फिल्‍मों ने उन्‍हें प्रेम-मुहब्‍बत का मतलब और तरीका भी सिखाया था। तब मेरे गहरे मित्र बने चुके मार्क्‍सवादी नेता चंद्रकांत सरकार (जो अब इस दुनिया में नहीं हैं) ने शायद व्‍यंग्‍य में कहा था कि जीवन इतना रंगीन भी होता है, मुझे कभी पता ही नहीं चला।
बहरहाल जिस दिन मैं जेल से छूटा था, अपने दोस्‍तों, परिवारों से मिलने के बाद सीधे सिनेमाघर का रास्‍ता पकड़ा था। यह काम मैं अमूमन हर परीक्षा के दौरान पहले भी करता रहा था। पेपर देकर निकलता और सीधे सिनेमा देखने चला जाता। 1976 में बी. ए. का एग्‍जामिनेशन सेंटर कटिहार पड़ा था। हर दिन शाम को फिल्‍म देखने जाता था। साथी-संगी कहने लगे कि सिनेमा मेरी कमजोरी है जब कि मैं मानता था कि वही मेरी मजबूरी है। पटना विश्‍वविद्यालय से एम. ए. करने गया। पढ़ाई के समांतर सिनेमा को रखा। वह मेरे खाली समयों का ही नहीं, व्‍यस्‍त क्षणों का भी साथी बना रहा। तब तक दिल और दिमाग का भी दायरा बड़ा हो चुका था।
लेकिन एक बात मेरे अंदर आज भी बैठी हुई है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का नहीं, बदलाव का भी माध्‍यम है। यह बेचैनी मुझे मथ रही है कि सिनेमा को आज के फिल्‍मकार ही हल्‍के तौर पर लेते हैं जब कि समाज उसे गंभीरता से लेता रहा है। पहले वो खास तौर पर बंगाली फिल्‍मकारों ने सिनेमा को कथात्‍मक और सामाजिक ऊंचाइयां दीं, जबकि पंजाबी फिल्‍मकारों ने उसे सिर्फ व्‍यवसाय का साधन बना दिया। यही वजह है कि उनकी फिल्‍में मिक्‍स वेजिटेबल हो जाती है।
सिनेमा का असर क्‍या होता है, यह तमिलनाडु में मैंने खुद भी देखा था। हिंदी विरोध के नाम जो सबसे पहला कदम उठता गया वह हिंदी फिल्‍मों के प्रदर्शन पर रोक का था। वर्ष 1966-67 की बात है जब डा. लो‍हिया हिंदी की तरफदारी कर रहे थे और उधर बंगाल में किसी कारण हिंदी का विरोध हो रहा था। मेरे दादा जी के छोटे भाई कलकते में रहते थे। उनकी मृत्‍यु संभवत: 1966 में हो गई थी। मेरे दादाजी अपने साथ श्राद्ध कर्म में भाग लेने के लिए मुझे भी कलकता ले गए थे। वहां काफी दिनों तक रहने का मौका मिला। मगर ऊब इसलिए गया था कि थियेटरों में हिंदी फिल्‍मों के के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई थी। कुछ मामला ठंडा हुआ तो कुछ भोजपुरी फिल्‍मों को चलाने की इजाजत दे दी गई। मैं भोजपुरी नहीं जानता था लेकिन भोजपुरी फिल्‍मों को देखना भी मेरे लिए 'मदर इंडिया' और 'आन' देखने जैसा था। अपनी रिश्‍तेदारों के साथ कुछ बंगला फिल्‍में भी देखीं।
1981 में एम.ए. की परीक्षा देकर पटना से सीधे दिल्‍ली चला गया। यह एक बड़ी गलती थी। तब पटना से मेरे दो मित्र आलोक रंजन और सुमन सरीन बम्‍बई के लिए चल चुके थे। हम तीनों फिल्‍मों के शौकीन थे। लेकिन पढ़ाई के दौरान कई पत्रिकओं के लिए पालीटिकल रिपो‍र्टिंग करता था, उसी ने मुझे दिल्‍ली जाने के लिए बाध्‍य कर दिया था। कई छोटे-छोटे पत्रों में काम किया। मगर लक्ष्‍य था टाइम्‍स ग्रुप में जाने का। 1982 के शुरू में टाइम्‍स डेली के लिए फाइनेंस्‍ट इंटव्‍यू देने बंबई गया। सोचकर गया था कि बंबई में तय करूंगा कि फिल्‍म पत्रकारिता करती है या राजनीतिक। मगर सारी उम्‍मीदों पर झटका लग गया। इटरव्‍यू अच्‍छा हुआ लेकिन जनसंघी होने का आरोप तब के नभाटा के संपादक आनंद जैन ने इस तरह लगा दिया कि धर्मवीर भारती के बीच-बचाव के बावजूद मेरा चयन नहीं हुआ। हम दोनों दिल्‍ली लौट गए। लेकिन जब तक बंबई में रहे, थियेटरों के छक्‍के छुड़ा दिए। फिल्‍में नहीं देखी सिर्फ सिनेमाघरों के चेहरे देखे। इसलिए सपने अगर साकार होंगे तो उसके गवाह थियेटर ही बनेंगे। खुद में ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास, सलीम-जावेद, अली राज, नवेंदु घोष आदि को देखने लगा था।
एक जो अहम बात है, उसकी चर्चा के बिना सब कुछ अधूरा लगेगा। बचपन से लेकर हाई स्‍कूल तक जितनी भी फिल्‍में देखीं - वह यादगार इसलिए भी है क्‍योंकि कभी भी शांति से टिकट नहीं मिला। ग्रुप में जाता था और पूरी मस्‍ती लेता था। सीटों पर रूमाल या गमछा रखकर कब्‍जा करता था। सीटी भी बजाता था लेकिन जिम्‍मेदारी के साथ। आज वैसा दृश्‍य मुंबई में नवरंग जैसे थियेटर में देखने को मिलता है जहां भोजपुरी फिल्‍में दिखाई जाती हैं। लेकिन इस सीटी और उस सीटी में फर्क है।
पहले की वह युवा हूं कि देव आनंद मेरे प्रिय एक्‍टर रहे हैं। मुझे तब रोमांटिक एक्‍टर और रोमांटिक कहानियां बहुत पसंद थी। वैसे सबसे ज्‍यादा प्रभावित हुआ राज कपूर से और फिर गुरु दत्‍त से। दिलीप कुमार मेरी पहुंच से काफी दूर रहे। हां, राजेश खन्‍ना की अदा मुझे अच्‍छी लगती थी। इनकी 'आनंद' और 'आराधना' न जाने किती बार देखी होगीं। सबसे ज्‍यादा बार 'गाईड' देखी है। शायद 14-15 बार।द्य उसके बाद 'तीसरी कसम' को देखने का रिकार्ड तोड़ा। 'देवदास', 'आवारा', 'बरसात', 'याराना' , 'तेरे घर के सामने', 'राम और श्‍याम', 'हम दोनों', 'ज्‍वेल थीफ', 'मुगलेआजम', 'संगम', 'अंदाज', को भी बार-बार देखा।
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि तब छोटे शहरों में रिक्‍शा, घोड़ागाड़ी पर फिल्‍मों की पब्लिसिटी होती थी। हम उसके पीछे-पीछे भी दौड़ते रहते थे। गानों के बीच-बीच में एनाउंसर की आवाजें दूर-दूर तक गूंजती रहती थीं। पोस्‍टर देखना भी फिल्‍म देखने से कम नहीं लगता था। सिनेमा को लेकर मेरे घर में न जाने कितनी शिकायतें लोगों ने मेरे बड़ों में की होंगी, मगर मुझे परिवार से हल्‍की झिड़की के अलावा कभी बड़ी डांट नहीं मिली। इसलिए कि सिनेमा की समझ रखने वाले सारे लोग थे।
एक ऐसा दौर भी आया था जब व्‍यावसायिक सिनेमा के मुकाबले मुझे समांतर, प्रयोगधर्मी, कलात्‍मक फिल्‍में ज्‍यादा पसंद आने लगी थीं। वह पसंद आज ज्‍यादा मजबूती के साथ बरकरार है। सई परांजपे, श्‍याम बेनेगल, मुजफ्फर अली, सथ्‍यू की दृष्टि को सलाम करता था।
मगर सबसे ज्‍यादा सलाम तब के गीतकारों, संगीतकारों और गायकों को करता था जिनके गानों के कारण फिल्‍में हिट हुआ करती थीं। फिल्‍मों को लोग देखें, गाने सबसे ज्‍यादा प्रेरित करते थे।

पसंद की फिल्‍में
1 अंकुर
2 शोले
3 बाइड
4 प्‍यासा
5 मुगलेआजम
6 बरसात
7 आनंद
8 तीसरी कसम
9 लगान
10 कागज के फूल