हिन्दी टाकीज-३८
गीताश्री विलक्षण हैं.कैसे?यह आप उनसे मिल कर ही समझ सकते हैं.मूल रूप से रोमांटिक और भाव प्रवीण.वे इच्छाओं,भावनाओं,कुंठाओं और उत्कंठाओं को भांप लेती हैं.यह गुण विस्तृत अनुभव से आता है.चवन्नी ने महसूस किया कि गीताश्री के निंदकों और प्रशंसकों की कमी नहीं है...उन्होंने अपने बारे में लिखा है...हिंदी आउटलुक (दिल्ली) में फीचर एडीटर हूं. यहां काम करते हुए यह सातवां साल है। मस्तमौला हूं..जमाने की परवाह नहीं करती। सिर्फ उनकी करती हूं जो मेरे लिए मायने रखते है। मुंहफट हूं, इसीलिए सबको नहीं सुहाती. पत्रकारिता में यह 17वां साल है...। पत्रकारिता में आने से पहले सोचती थी सिनेमा मनोरंजन का माध्यम है। मैं इसीमें अपने सुख दुख की दवा तलाशती और अपने सवालो के जबाव भी..अब थोड़ा बदली है सोच. सिनेमा मनोरंजन से बहुत आगे की चीज है। इसे सामाजिक दायित्व और सरोकार से भी जोड़ कर देखने लगी हूं. करियर की शुरुआत हुई राजनीतिक रिपोर्टिंग से...इन दिनों फिल्म पेज का जिम्मा संभाल रही हूं.जब यह जिम्मा मिला था तब मैं खुश हुई कि मेरा सिनेमा प्रेम अब आफिशियल हो गया और दुख हुआ कि मैं मेनस्ट्रीम की पत्रकारिता से कट जाऊंगी. तब तक मैं सिर्फ सिनेमा से प्रेम करती थी, उसका ज्ञान नहीं था। काम करते करते कुछ कुछ ज्ञान भी हो चला है। जब भीतर घुस कर जाना तब पाया ये ज्ञान का अथाह समंदर है जो गहराई में जाने पर ही खुलता है। इसकी पत्रकारिता करने के लिए उथला ज्ञान नहीं चलेगा। पैशन के साथ ज्ञान भी जरुरी..अभी बटोर रही हूं॥
धुंधली-सी याद है, मेरी जिंदगी की सबसे पहली फिल्म धार्मिक थी। मेरी मां सिर्फ धार्मिक फिल्में देखा करती थीं। मैंने बचपन में जितनी फिल्में देखीं, किशोरावस्था तक वे सारी धार्मिक थीं। जैसे ही मेरी दीदीया (दीदीया) थोड़ी बड़ी हुई, उन्होंने धार्मिक सिनेमा से विद्रोह कर दिया। मां और दीदीया की बहस मैं टुकुर-टुकुर सुनु-देखूं। एक दिन दीदीया मां से उलझी हुई थीं, हमें भक्त प्रहलाद नहीं देखना, हमें राजेश खन्ना की कोई फिल्म देखनी है। इस बहस में बाहर का शोर सुनाई नहीं देता था। मैं जानती थीं, मां ही जीतेंगी और हमें एक और धार्मिक फिल्म देखकर रोना पड़ेगा।
मुझे थोड़ा थोड़ा याद है, बाद में मां ने बताया कि जब हरीशचंद्र तारामती फिल्म में रोहिताश्व की मौत हुई तो मैं सुबकने लगी। मां ने मुझे हैरानी से देखा फिर सिनेमा में डूब गई। बीच-बीच में वे परदे के भगवान को प्रणाम कर लेतीं और मेरा भी हाथ उठा देती। किसी एक धार्मिक फिल्म में एक देवता राक्षस के हाथों मारे गए-मां के मुंह से चीख निकली और मैं फूट-फूट कर रोने लगी। छोटा भाई राजू भी साथ में था। मैंने तब ये समझा कि ये देवता सचमुच का मरा। फिर कभी जीवित नहीं होगा। मेरे लिए, फिल्मों में जो दृश्य दिखाए जाते थे, उनका मतलब सच था। जैसे उडऩ खटौला, जादू की छड़ी, गायब हो जाना...मौत का दृश्य...आदि-आदि। उस देवतानुमा नायक की मौत से परदे पर जो खून पसरा-वो आज तक मेरे जेहन में चिपका हुआ है। मैं आज भी खून की एक बूँद भी देख लूं तो वह दृश्य याद आता है और मेरे मुंह से चीख निकल जाती है। ये बात मेरे सभी करीबी जानते हैं।
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जैसे हर बच्चे के सपने में कुछ परियां रहती हैं, कुछ देवता बसते हैं-और एक राजकुमार होता है। वैसे ही शायद मेरे मन में भी कुछ था। मेरी दो बड़ी बहने राजेश खन्ना की फिल्मों के बारे में खूब चटखारे लेकर बात करती। उन्हीं दिनों मैंने सुना कि देवानंद पर काले कपड़े पहनकर बाहर निकलने पर पाबंदी लग गई है। कुछ लड़कियां उन्हें काले कपड़ों में देखकर सुधबुध खो बैठी और अपनी छतों से छलांग लगाकर जान दे दी। मां ने फरमान जारी किया- देवानंद की फिल्में देखना बंद। इधर बहनें-राजेश खन्ना की दीवानी हो रही थीं। बेलबॉटम पहनकर घूमने वाली मंझली दीदी ने एक दिन मुझे पटाया कि मैं बाहर गली में जाऊं और रिक्शे पर जो सिनेमा का प्रचार कर रहा है वो देख सुनकर आऊं।
हमारा डेरा (सरकारी मकान) किसी गली-मोहल्ले में नहीं, थाना के कैंपस में था। पिता पुलिस अधिकारी थे। कैंपस में चोर-सिपाही के अलावा ना कुछ दिखाई देता था, न सुनाई देता था।
बहनें किशोर थीं-वे इतनी आसानी से मां की चौकस निगाहें बचाकर गली-मोहल्ले में निकल नहीं सकती थीं। मेरे लिए आसान था। मेरी उम्र तब बमुश्किल सात-आठ साल की रही होगी। ये बात बनियापुर की है। मैं भागती हुई गली में पहुंची और रिक्शे वाले का इंतजार करने लगी। थोड़ी देर बाद उधर से गुजरा-लाउड-स्पीकर से उद्घोषणा करता हुआ-भाईयों एवं बहनों...देखिए फलां सिनेमाहाल, छपरा में एक इनसान और एक जानवर का मासूम प्रेम...एक हसीना की अदाएं...रोज चार शो....... देखिए-देखिए आज के दौर का सबसे कमाल हीरो-राजेश खन्ना का इश्टाइल...हाथी मेरे साथी...चल-चल मेरे हाथी, चल मेरे हाथी...चल ले चल खटारा खींच के...। रिक्शे के चारो तरफ बड़े-बड़े पोस्टर-राजेश खन्ना-तनूजा ओर हाथी की दिलकश तस्वीर...।
मन हुआ रिक्शे पर सवार होकर छपरा चली जाऊं। अचानक डर सा लगा और मैं भागकर घर आ गई। अब पूरा घर एक तरफ और मां एक तरफ। बमुश्किल मां को समझाया गया कि उसमें हाथी की कहानी है, बच्चों के देखने लायक । पिताजी थाने से तलब किए गए। वे आए और हमेशा की तरह मेरी जिद पूरी करने में खुद को धन्य समझने वाले पिता ने सारा इंतजाम कर दिया। छपरा जाने वाली लोकल पब्लिक ट्रांसपोर्ट थाने बुलाई गई-सवारी से भरी हुई। उसमें आगे की वीआईपी सीट खाली थी। हम सभी लदे और छपरा रवाना। वहां टिकट (पास) लेकर सिपाही खड़ा था, इंटरवल में खाने पीने का इंतजाम। यह सिलसिला चलता रहा।
कोई फिल्म क्या मजाल कि हमारी बिना देखें हॉल से उतर जाए। रिक्शे वाले को संदेश भिजवाया गया कि जैसे ही कोई नहीं फिल्म लगे, वो घर के पिछवाड़े से, कैंपस में बोलता हुआ निकले ताकि हमें पता चले। वो प्रति सप्ताह एक बार निकलता जब कोई फिल्म रिलीज होती, घर में सबके कान खड़े रहते। अब हमें धार्मिक फिल्मों से मुक्ति मिल चुकी थी।
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असली बहार तो हमने लूटी गोपालगंज में। शहर था, 70 का दशक । दो सिनेमा हॉल और बॉबी का जमाना। श्याम सिनेमा के मैनेजर हमारे पड़ोस में रहते थे और उनकी बेटी हनी (मधु) मेरी दोस्त। अंकल मैनेजर, तो फिर क्या सोचना। जनता टॉकीज में थाने का रुआब चलता था। दोनों जगह फर्स्ट शो-की पासेज घर आ जातीं और हमारा पूरा कुनबा फिल्म देखने जाता। जैसे हम किसी समारोह में शामिल होने जा रहे हों। इस दौरान धार्मिक फिल्में लगती तो सिर्फ आंटियां जाती और हम गच्चा दे देते। मुझे लगता था मां को सिर्फ धार्मिक फिल्में पसंद हैं। पिताजी के पास समय नहीं होता कि वे फिल्म देख पाएं। वे देर रात को मां को फिल्म देखने चलने को कहते कभी-कभार। मुझे इस संबंध में इतना याद है कि श्याम टॉकीज में फिल्म लगी थी 'गुप्त ज्ञान'। बहुत चर्चा थी दबी जुबान में। मां और आंटियां खुसुर-पुसुर करती। एक शाम मां बहुत हड़बड़ी में हम सबको खिला-पिलाकर सुलाने के चक्कर में दिखीं। गोपालगंज के उस डेरे में बड़ा-सा आंगन था। आंगन में नीम का पेड़। उसकी कोमल पत्तियां बहुत खानी पड़ती थी। मंझले भैया बहुत चाव से खाते थे तो हमें उसका पालन करना पड़ता था खैर...
गर्मी की शाम थी। आंगन में कई खाटें बिछी थी। छोटे शहरों-कस्बों और गांव में रात जल्दी आती है और जल्दी जाती भी है। लोग-बाग जल्दी सो जाते हैं। हम सब खटिया पर पसर गए। उस रात मां-पिताजी गुप्त ज्ञान देखने चले गए। लेकिन मेरी आंखों में नींद कहां। करवटें बदलते-बदलते अंधेरे में नीम की पत्तियां टटोलते वक्त कटा। जब वे लोग लौटे और मुझे जगा देखा तो मां सकपका गई। बाबूजी मुस्कुराते हुए कमरे में सोने चले गए। कई दिनों तक मैं गुप्त ज्ञान का ज्ञान लेने के लिए मां को कुरेदती रही और अंतत: पता चला कि उसमें आदमी-औरतों के गंदे-गंदे सीन थे। नंगे-नंगे जो बच्चों को नहीं देखना चाहिए। किशोर हो चुकी थी- मैं। वह फिल्म देखने की ऐसी ललक लगी कि सहेलियों को मैं राजी करने में जुट गई।
हम पहुंचे, मैनेजर चाचा की नजर बचाकर लाइन में लग गए। तीन सहेलियां थीं। खूब भीड़ थी-हमारा दिल धडक़ रहा था। नई किस्म की उत्तेजना से। हम एक नए अनुभव से गुजरने वाले थे। एक नया संसार खुलने वाला था। हम लाइन में थे-धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए-कि अचानक सिनेमा हाल के एक अधिकारी ने हम तीनों की कलाई पकड़ी और लगभग घसीटता हुआ रिक्शे पर बैठा आया। वह लगातार चीख रहा था- इस फिल्म में बच्चे एलाउड नहीं है। एडल्ट फिल्में हैं। किसने भेजा है तुम लोगों को। चलो अभी घर छोडक़र आता हूं...एक रिक्शे पर हमें ठूंस कर वो मेरे घर पटक गया। फिर तो पूछो मत-जीवन में पहली बार कैद मिली और सहेलियों का घर दूर था सो वो रिक्शा से उतरकर रफूचक्कर। बाद में मेरी मां ने उनकी पिटाई का भी बंदोबस्त किया। इस घटना से इतना हुआ कि उसके बाद मां-पिताजी ने देर रात की फिल्में देखना हमेशा के लिए बंद कर दिया।
इसी शहर में आकर मैंने एक नया गेम सीखा। जो क्लास के दौरान ही खेला जाता था। टीचर समझती कि हम पढाई में डूबे हैं और सवाल हल कर रहे हैं जबकि हम किसी और दुनिया में डूबे होते। कॉपी के पन्ने पर पांच खाने बनाए जाते। सबसे ऊपर लिखा जाता॥नाम, फल, फूल, शहर, सिनेमा। जो जीता वो एक अक्षर बोलता और गेम शुरु...जैसे अ बोला तो अ से किसी व्यक्ति का नाम, एक फल, एक फूल एक शहर और एक फिल्म का नाम लिखना होता था। जो जल्दी और सारे नाम सही सही लिखता वो विजेता घोषित..बाद में अपनी जेब खर्च से इनाम देना पड़ता।
मैं और नामों में जरुर चूक जाती मगर सिनेमा के नाम में कभी नहीं चूकी...उस दौर में बनने वाली सारी फिल्मों नाम जुबां पर थे, चाहे फिल्म देखूं या नहीं..वैसे फिल्में देखने का यह स्वर्ण काल था।
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मेरे ऊपर तो सिनेमा का ऐसा असर कि उसका असर गांव तक गया। गर्मियों की छुट्टी में हम गांव जाते थे आम-लीची खाने। घर के बाहर बड़ी-सी दालान थी। कई चौकियां एक साथ बिछी हुई। उस पर मर्द होते थे। बाहरी और घरवाले।
छुट्टियों में पूरा परिवार जुटता था। मेरी उम्र के चार-पांच भाई-बहन चचेरे थे। तीन भाई और तीन बहने एक जैसे। थोड़ी ऊपर-नीचे उमर रही होगी। शाम को घर में आदतन सब जल्दी सो गए और घर के पुरुष सदस्य टीवी पर कृषि दर्शन कार्यक्रम देखने गांव के स्कूल में गए थे। गांव का इकलौता टीवी सेट था-जहां गांव की धार्मिक बूढ़ी औरतें भी जमीन पर बैठ कर मजे से फिल्में देखती और आंचल से ढंक कर रामनाम की माला जपती।
खैर। हम सब भाई-बहनों ने मीटिंग की और तय किया गया कि दालान की चौकी को मंच मानकर हम एक फिल्म-फिल्म खेलेंगे, पूरी तरह ड्रामा करेंगे। औरतें अंदर थी। हम बड़ी बहनों के दुपट्टे उठा लाए। एक फूल दो माली फिल्म बहुत पसंद आई थी हमें...। सबने देखी थी- बस। कोई संजय खान बना, कोई साधना, कोई विलेन, कोई कुछ कोई कुछ...। फिल्म हमें पूरी तरह याद थी। आज दृश्य याद नहीं। मैं नायिका थी और एक भाई हीरो और हम गा रहे थे...ये परदा हटा दो...जरा मुखड़ा दिखा दो...हम प्यार करने वाले हैं कोई गैर नहीं...। चचेरे भाई ने मेरे मुंह से परदा उठाया, तब मैंने गाना शुरू किया- शुकर करो कि पड़े नहीं है मेरी मां के डंडे.. एक हाथ में हो जाते...अरमान.. तुम्हारे ठंडे...और लाइन खत्म होते होते हम जमीन पर धाराशायी हो गए थे। सामने बडक़ी चाची खड़ी दहाड़ रही थीं। वे शायद हमें रोमांटिक सीन में देखकर हिल गई थी। उनकी नजर में भाई-बहन ऐसा सीन कैसे कर सकते थे। संजय खान और साधना गिर पड़े थे और चाची की दहाड़ रात के अंधेरे को देर रात तक चीरती रही।
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पिताजी का तबादला गोपालगंज से छोटे से कस्बे कुचाईकोट में हो गया। हमने सबसे पहले पता किया कि वहां कोई सिनेमा हॉल है या नहीं। सिनेमा हॉल तो दूर, उस बस्ती में मनोरंजन के नाम पर दिन दहाड़े सिर्फ लौंडा नाच ही होता था आर लौंडे एक ही गाना गाकर प्राण ले लेते थे...हाय-हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी...।
मुझे अपनी सहेलियों से दूरी उतनी नहीं खली जितनी सिनेमा से दूरी खल गई। फिर तो कई साल किसी अच्छे शहर में, सिनेमा हॉल वाले शहर में तबादले के इंतजार में कट गए। बॉबी फ्रॉक पहने-पहने मैं दसवीं कक्षा में पहुंच गई और जिस कस्बे में पहुंची, वहां एक सिनेमा हॉल का पता चला। वैशाली जिले का सरैया थाना इलाका। बिनाका गीत माला सुन-सुनकर बोर हो चुकी मंझली दीदी ने साथ दिया और हम सिनेमा हॉल का मुआयना करने पहुंचे। फिल्म लगी थी-हमारी याद आएगी।
रंगीन जमाने में हमने मन मार कर वो श्वेत-श्याम फिल्म खटमल वाली कुर्सी पर बैठकर देखी। हॉल में जो लोग थे-उनके बारे में कुछ भी कहना मेरी प्रगतिशील सोच के विरुद्ध है। मगर जब बाहर निकले तो ये तय हो चुका था कि नहीं-दुबारा नहीं। अब कभी मुजफ्फरपुर जाएंगे, तभी देखेंगे।
मौका जल्दी ही आया। रिश्तेदारी में बच्चा पैदा हुआ और उसकी छठी हॉस्पीटल में थी। वहां सपरिवार जाना था। कितना उत्साह-कितना उछाह, आह। जैसे पुरस्कार लेने जा रहे हों। छठी की रात सारे रिश्तेदार जुटे। हम बहनों ने एक चचेरे भाई को पटाया और लैला-मजनूं देखने पहुंच गए। उधर बच्चे की छठी में काजल सेंकने के लिए बुआओं की खोज होने लगी। उधर हम तो मजनूं के दर्द से कराह रहे थे, लैला के साथ गा रहे थे-कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को...। हम इस बात से बेपरवाह...कि वहां जाकर क्या भुगतना पड़ेगा॥किसकी छठी..कैसी छठी...जो है यही सुख है, आह सिनेमा। तब मोबाइल तो था नहीं कि वो हमे तलाश पाते या बुला लेते। हमें तो जैसे कुछ ध्यान नहीं था। फिल्म रोते-सुबकते देखी और जमाने को लानते भेजते हुए बाहर निकले। शहर पूरी तरह बारीश में नहाया हुआ । बूंदा-बांदी हो रही थी। रात के नौ बजे थे। रिक्शा दूर-दूर तक नहीं। वे लोग सौभाग्यशाली रहे होंगे जो सिनेमा के परदे पर दी एंड लिखने से पहले निकल गए। मुझे आज भी ऐसे लोगों पर गुस्सा आता है-तब भी आया था। उस रात समझ में आया कि रात में छोटे शहर में रिक्शे की मारामारी होती है। सो होशियार लोग अनुभव से जान जाते हैं, फिल्म कहां खत्म होने वाली है-वे निकल पड़ते हैं। हम चूक गए। फिर पैदल मार्च करते, भीगते-कांपते होस्पीटल पहुंचे। छठी के अवसर पर मिलने वाली खीर-पूरी के बारे में सोचते हुए। वहां पहुंचने पर हम मजनूं की गति को प्राप्त हुए।
सिनेमा-प्रेम में मेरी मंझली दीदी का साथ मुझे नियमित मिलता था। सो मैट्रिक का पूरक एक्जाम देने एक बार हम समस्तीपुर पहुंचे। दीदी-बाबूजी और मैं। 81 का जमाना था। उस समय वहां एक सिनेमा हॉल था। परीक्षा केंद्र से निकलते ही हम दोनों बहने सीधे सिनेमा हॉल में घुसे। बाबूजी गेस्ट हाऊस में हमारा इंतजार करते रहे। हमने फिल्म देखी- 'मांग भरो सजना' और उसके दर्द में डूबे गेस्ट हाऊस पहंचे तो देखा बाबूजी- कई जूनियर पुलिस अधिकारियों के साथ बैठे विचार-विमर्श कर रहे थे कि उन दोनों की खोज में कैसे लगा जाए। लडक़ी का मामला है। इज्जत का सवाल है। बात का बतंगड़ बन सकता है। बाबूजी, सोच भी नहीं सकते थे कि हम ऐसी हरकत भी कर सकते थे। परीक्षा से पहले की रात की उन्होंने मेरी बेचैनी देखी नहीं थी। मैंने मन लगाकर पढ़ाई की और पेपर देने में भी मजा आया था-क्योंकि उसके बाद सीधा सिनेमा हॉल का अंधेरा जो बुला रहा था। बाबूजी ने हमें देखकर राहत की सांस ली। ज्यादा डांटा नहीं-बस मामला ले जाकर मां की अदालत में रख दिया। फिर तो एक साल तक सिनेमा हॉल का मुंह तक नहीं देखा। होस्टल भेज दी गई। शहर में अपना घर होते हुए भी। लडक़ी का मामला था-वो भी इतनी बिंदास लडक़ी का घर से आना-जाना छोटे शहर में कहां रास आता था-तब।
मैं होस्टल में पहुंची और बाबूजी-रिटायर होकर मुजफ्फरपुर रहने लगे थे।
होस्टल में मैंने जल्दी ही सिनेमा का माहौल बना दिया। वार्डन भी फिल्मों की शौकीन निकली। होस्टल के तहत नियम बनाया गया कि महीने में एक फिल्म सिनेमाहॉल में ले जाकर दिखाई जाएगी। वो सिलसिला ज्यादा दिन चला नहीं। छेड़छाड़ के मामले बढ़े। लड़कियां भी शरारत करतीं और तंग आकर वार्डन ने रोक लगा दी। तीन होस्टल एक ही कैंपस में था। तीनों की लड़कियों ने मिलकर प्लान बनाया और हर रविवार फिल्मों की बहार आ गई। भाड़े पर वीडियो आता, तीन चुनिंदा फिल्में आतीं, और एक एक रुपया जमा करके जेनरेटर के लिए पेट्रोल आता। मौजा ही मौजां का दौर था वो। होस्टल में टीवी था लेकिन उस पर सिर्फ न्यूज ही देखना एलाउड था। मैं बना दी गई टीवीरुम इनचार्ज। उन्हीं दिनों चुनाव हुए और परिणाम टीवी पर आने थे। उन दिनों चुनाव परिणाम के दौरान फिल्में दिखाते थे। फिल्मों के दीवानी लड़कियों की एक टोली चुनाव परिणाम सिर्फ इसलिए झेलती थी कि ख्तम होते ही फिल्म का अगला हिस्सा शुरु हो जाएगा। वार्डन समझती, राजनीति शास्त्र पढने वाली लड़कियों के लिए चुनाव परिणाम देखना जरुरी है। फिल्मों के चक्कर में हमारा राजनीतिक ज्ञान सचमुच बढ गया था।
मैं गर्मी की छुट्टी में घर आई थी। बाबूजी रिटायरमेंट के बाद दिन भर दरवाजे पर पलथी मारकर डटे रहते। कोई घर से बाहर निकला नहीं कि उनका टोकना अनिवार्य। कहां चले-कहां जा रही हो? क्या काम है। आदि....। क्या किया जाए। दीदी नौकरी पर जा चुकी थी। भाभियां अनुशासित थीं। मां कुछ कर नहीं सकती। बाबूजी कड़क नहीं थे-पर खाली थे। पुलिसिया रोब कायम था। सो हमीं मिलते थे-जूझने के लिए। भाई लोग तो आजाद थे-खूब फिल्में देखकर आते और हमें जलाते। एकाध बार मैंने हंगामा कर दिया- फिर बाबूजी ने भाई की ड्यूटी लगाई-हमें फिल्म दिखाने की। भाई पहले ऐसी फिल्म चुनता जिसे वह हमारे साथ देख सके। सारी वेजीटेरियन टाइप फिल्म हमें देखनी पड़ती। भाई के अनुशासन में हॉल में जाते और आते। रिक्शेवाला पहले से तय होता जो बाहर इंतजार करता। इंटरवल में कोक आ जाता-बस। हॉल के बाहर भाई चौकन्ना रहता कि कोई छेड़ तो नहीं रहा, कोई कटाक्ष तो नहीं कर रहा। ऐसे में कई बार छोटी-मोटी झड़पें हुई। बाद में भाई ने मना कर दिया। फिर सिनेमा प्रेम पर संकट खड़ा हो गया।
क्या किया जाए। छुट्टियों के दौरान ट्यूशन की नौबत आई। टीचर का घर दूर था। दो किलोमीटर। मजबूरन अकेले जाना-आना शुरु हुआ। मेरी तो मौज हो गई। शहर की एक पंजाबी दोस्त कंवलजीत और मैं और नया-नया खुला सिनेमाहॉल जवाहर टॉकीज। तीन परदे एक साथ, आज की भाषा में मल्टीप्लेक्स। एक हॉल बड़ा और दो हॉल छोटे। शहर भर के लिए आकर्षण का केंद्र। बड़ी रौनक रहती वहां। खूब खाने-पीने की दूकानें खुल गई थीं। मेरा रास्ता उधर से ही जाता था। तीनों हॉल में बारी बारी फिल्में देखीं। हम दोनों सहेलियां लेडीज क्लास में बैठती थीं। वहां भाई के मिलने का कोई खतरा नहीं था। नीचे बैठने वाले लडक़ो-पुरुषों की टोली से खूब सीटियां, तालियां, किलकारियां सुनाई देती। लेडीज क्लास का हिस्सा शांत बैठा रहता जैसे सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने आए हों। मेरा मन मचलता और मैं लडक़ो की तरह तालियां बजाने और फिकरे कसने लगती। लेडीज मुझे यूं घूरतीं जैसे कोई अजूबा देख लिया हो। इस हरकत पर जली कटी सुनाई देती...बहकल लडक़ी...। तब मुझे रोमांटिक , थ्रीलर और कॉमेडी फिल्में खूब पसंद आती थी। अब ऐसी फिल्मों में वाह वाह कैसे ना करती। खैर..रिक्शा भाड़ा का जो पैसा मिलता-उससे देखते थे। पैदल चलकर जाते, भाड़ा बचा लेते और उसका सदुपयोग सिनेमा का टिकट खरीदने में करते थे। इसी दौरान मैंने घरवालों से झूठ बोलना शुरु कर दिया था। देर होने पर पूछाताछी होती तो टीचर ने रोक लिया, उनको कुछ काम था, कोर्स खत्म करना था...आदि आदि..। झूठ बोलने का भी अपना अलग आनंद होता है। वैसे भी लड़कियों के साथ झूठ या बहाना हमेशा एक छतरी की तरह साथ चलता है।
एक दिन 'लावारिस' (अमिताभ बच्चन) देखकर पैदल घर पहुंची तो देखा वहां बाहर बाबूजी बैठे हैं। मां अंदर थीं। बाबूजी के तेवर बदले हुए। मुझे अपने पास बुलाया बिठाया, भेदभरी मुस्कान चेहरे पर, पूछा,
'कैसी लगी फिल्म?'
मैं हड़बड़ा गई।
'फिल्म...? कौन-सी?'
'बनो मत...'
'लावारिस कैसी लगी?'
पलक झपकते समझ में आ गया
'इसका मतलब आप भी...।'
'हां मैं भी...। मगर मैंने तुम्हें नहीं देखा और न तुमने मुझे देखा-ठीक है?'
'क्या???' बाबूजी का नया रूप।
'मां को बताना मत। जाओ पढ़ाई करो।'
तब से आज तक बाबूजी मेरे हमराज साथी और सहयोगी बने हुए हैं। बुढ़ापे के कारण उनका सिनेमा प्रेम टीवी तक सिमट गया है-और मेरा खुदमुख्तार होने के कारण बदस्तूर जारी है...।
मेरी पसंद की १० फिल्में
१.गाइड
२.तीसरी कसम
३.मेरा नाम जोकर
४.आनंद
५.जागते रहो
६.आवारा
७लज्ज
८.ब्लैक
९.लगन
१०.दिल तो पागल है