Search This Blog

Monday, May 18, 2009

हिन्दी टाकीज:मेरा फ़िल्म प्रेम-अनुज खरे



हिन्दी टाकीज-३६

अनुज खरे फिल्मों के भारी शौकीन हैं.चवन्नी को लगता है की अगर वे फिल्मों पर लिखें तो बहुत अच्छा रहे.उनसे यही आग्रह है की समय-समय पर अपनी प्रतिक्रियाएं ही लिख दिया करें.आजकल इतने मध्यम और साधन हैं अभिव्यक्ति के.बहरहाल अनुज अपने बारे में लिखते हैं...बुंदेलखंड के छतरपुर में जन्म। पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर। घाट-घाट का पानी पीया। समस्त स्थलों से ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान देने का मौका आने पर मनुष्य प्रजाति ने लेने से इनकार किया खूब लिखकर कसर निकाली।
पत्रकारिता जीविका, अध्यापन शौकिया तो लेखन प्रारब्ध के वशीभूत लोगों को जबर्दस्ती ज्ञान देने का जरिया। अपने बल्ले के बल पर जबर्दस्ती टीम में घुसकर क्रिकेट खेलने के शौकीन। फिल्मी क्षेत्र की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने की गलतफहमी। कुल मिलाकर जो हैं वो नहीं होते तो अद्भुत प्रतिभाशाली होने का दावा।जनसंचार, इतिहास-पुरातत्व में स्नातकोत्तर। शुरुआत में कुछ अखबारों में सेवाएं। प्रतियोगी परीक्षाओं के सरकारी-प्राइवेट संस्थानों में अध्यापन। यूजीसी की जूनियर रिसर्च फैलोशिप।पत्रकारिता की विशिष्ठ सेवा के लिए सरस्वती-पुत्र सम्मान। व्यंज्य पर एक पुस्तक प्र्काशित। मप्र की संस्कृति-जनजीवन पर पूर्व में किताब का प्रकाशन। विभिन्न समाचार पत्रों में दर्जनों लेखों का प्रकाशित। विगत दस वर्षो से दैनिक भास्कर पत्र समूह में, भास्कर पत्रकारिता अकादमी में उपनिदेशक रहने के पश्चात कई स्थानों पर कार्य किया। संप्रति-भास्कर डॉट कॉम पोर्टल में संपादक।
अपने फिल्म प्रेम की कहानी पूरी फिल्मी अंदाजे की ही है। पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर होता रहता था। बाद में खुद भी ट्रांसफर को प्राप्त होते रहे सो, पूरा फिल्म प्रेम बुंदेलखंड से लेकर जयपुर, भोपाल और ना जाने कितने शहरों की विस्तृत लोकेशनों पर शूट हुआ है। कई बार तो मुझे ऐसा लगता था कि एक साथ दो फिल्में चल रही हैं। एक मेरे जीवन की रीयल लाइफ फिल्म। जिसमें मुख्य पात्रों में मैं खुद हूं, सपोर्टिग एक्टर देशकाल के हिसाब से दोस्तों, सहकर्मियों सेलेकर श्रीमती जी तक रहे हैं। जबकि दूसरी रील लाइफ में चलती फिल्म है जिसमें मुख्य पात्रों में अधिकतर अमिताभ बच्चन और उनके सहयोगी कलाकार ही रहे। क भी कभार धर्मेद्र से लेकर जीतेंद्र तक, सहूलियत से जिनकी भी फिल्में हमारे शहर में उपलब्ध हो गईं वे मुख्य पात्र बन जाते थे। बचपन में देखी गईं इन फिल्मों का मेरे जीवन पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ा। चूंकि सेल्यूलाइड हमेशा आपको आकर्षित करता रहता है। हमेशा आपको चमत्कृत करता है। सो बहुत आश्चर्य नहीं कि फिल्में किसी भी भारतीय के अंतस में गहरे धंसी रहती हैं। गाहेबगाहे वे उसे प्रेरणा देती हैं। तो अपने अंतर्मन में खास तौर पर फिट कर दी गईं इन फिल्मों ने बाद में मेरी बड़ी मदद की। खूब जमकर इन फिल्मों पर लिखा।
खैर मेरी कहानी की शुरूआत बुंदेलखंड के एक छोटे से शहर छतरपुर से होती है। जहां कि मेरा बचपन बीता, कुछ नाले -नालियों के बैकग्राउंड में कुछ दोस्त थे। सारे के सारे फिल्मों के विकट प्रेमी। इन्हीं नाले-नालियों पर रखे बड़े-बड़े सीमेंट के पाइपों पर बैठकर सभी का फिल्म प्रेम एक साथ परवान चढ़ा। इन्हीं पर बैठकर सभी एक दूसरे को अपनी देखी गई फिल्मों की कहानियां एक खास ध्वनि ट्रेक ढेन॥र्ट्रेन ड्रैन..को बार-बार निकालते हुए सुनाते थे। मूलत: यह ध्वनि यह बताने के लिए निकाली जाती थी कि हीरो कहीं विलेनों में घिर गया है या उस पर कोई मुसीबत आ गई है। यानि कुल मिलाकर बताया जाता था कि मुकाम गंभीर है। इसी ध्वनि के माध्यम से पूरे मित्रों को सिनेमा हाल का मजा दिया जाता था। बुंदेलखंड में लगभग प्रत्येक शहर में तब मेरा मानना है कि फि ल्म देखकर आने के बाद मित्रों की उसका सस्वर बैकग्राउंड म्यूजिक सहित स्टोरी सुनाने की बड़ी विशिष्ट परंपरा पाई जाती थी। तब अमिताभ अद्भुत रूप से फेमस थे। उनकी हर फिल्म को तब जोरदार शुरूआत मिलती थी । मुझे उनकी एक फिल्म की याद है। मुकद्दर का सिकंदर। शायद अस्सी के दशक का कोई वर्ष रहा होगा। फिल्म लगी थी महेश टॉकीज में। क्या भीड़ थी। क्या लोग उमड़े थे। वो नजारा आज भी आंखों में जवां है। पहली-पहली बार टिकट ब्लैक कैसे होते हैं वहीं देखा था। कैसे रिक्शेवाले धीरे से टिकट निकाल कर साइड में ले जाकर धीरे से तौलमोल करके टिकट खिसकाते।
एक बात भी अक्सर याद आती है। तब हम सुबह से ही टॉकीज में फिल्म की पब्लिसिटी देखने पहुंच जाया करते थे। फिर धीरे से माहौल बनाया जाता था कि फिल्म कैसे देखें। हालांकि फिल्म देखने पर कोई ज्यादा प्रतिबंध नहीं था। फिर भी फिल्म बड़ों के साथ ही देखी जाती थी। वे ही तय करते थे कि किसफिल्म को देखा जाना है। फिल्म देखने के सामूहिक आयोजन अकसर ही होते थे। फिल्म देखने तब एक उत्सव बन जाता था। अड़ोस-पड़ोस के कई परिवार से कुछ दीदीयां, हम लोग। जिस दिन फिल्म जाना होता था। दोस्तों को पूरे जोर-शोर से बताया जाता था कि हम आज फिल्म देखने जा रहे हैं। सुबह से ही नए कपड़े पहनकर घूमना शुरू कर दिया जाता था। कुल मिलाकर मोहल्ले में शायद ही कोई बचता हो जिसे पता न चल जाता हो कि हम फिल्म देखने जा रहे हैं। फिल्म देखने के दौरान तब अमिताभ के आने पर कैसे चीख-पुकार मचती थी वो अपने आप में अलग ही अनुभूति थी। आज सोचते हैं तो लगता है कि इस कलाकार में क्या रहा होगा जिसने पूरा एक जमाना प्रभावित रहा। फिरअमिताभ का अभिनय, अत्यंत अतार्किक पात्र भी कितनी गंभीरता और शिद्दत से निभाते थे वे कि महसूस ही नहीं होता था। हालांकि एक बात है हिरोइनें तब हमारी श्रृद्धा का उतना पात्र नहीं होती थीं। रेखा की बात की जाती थी, जया बच्चन की मजबूरी पर कई बार कोई ज्ञानी मित्र प्रकाश डाल देता था बस। हिरोइनों से ज्यादा चर्चा खलनायकों की होती थी। अमजद खान को जितना कोसा जा सकता था कोसा जाता था। सारी मित्र मंडली इस बात पर सहमत थी कि अमिताभ की सारी मुसीबतों की जड़ यही दुष्ट है। बरसात की एक रात, सत्ते पे सत्ता और शोले की नफरत का विस्तार तब याराना की दोस्ती देखकर कम हुआ था। जिस पर इतना चिंतन जरूर किया गया था कि यार, अमिताभ को इसका दोस्त नहीं बनना था।
एक्टिंग से ज्यादा चर्चा का केंद्र फाइटिंग होती थी। चूंकि उसी से हम अपने लड़ने के तरीकों में नवाचार करते थे, तो अमिताभ या धर्मेंद्र ने किस तरह से बदमाशों को कूटा, कैसी गाली दी या कैसे बदमाशों को ललकारा कि जिसके बाप में दम हो चाबी मुझसे छीनकर दरवाजा खोल लो। हमारी आपसी लड़ाइयों में भी तेरे बाप में दम हो तो छूकर दिखाओ जैसे डॉयलाग सहजता से निकलते थे। जिस पर तटस्थ दोस्त दूसरे दोस्त को भी बढ़ावा देते थे कि तू भी कुछ बोल कि बेटा डर गया। जिस पर उसे भी कोई मौलिक किस्म का डॉयलाग लाना पड़ता था। यानी फिल्मों का कुछ यूं भी होता था वास्तविक जीवन में भरपूर इस्तेमाल। जितनी उत्सुकता से फिल्म देखी जाती थी उसी उत्साह से फिर फिल्म देखकर लौटने पर दोस्तों से कहानी शेयर की जाती थी। दोस्त भी पट्ठे नाली वाली जगह पर जमे मिलते थे। कोई औपचारिकता नहीं सीधे कहानी सुनाओ। बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं निकाला तो नाराजगी जताई जाती थी कि -क्यों बे जल्दी भगना चाहता है, पूरी सुना, ढंग से सुना। अबे, अमिताभ ने डांस किया था कि नहीं। वोई पुराना वाला डांस किया होगा। फिर एक हाथ कमर पर रखकर दूसरा हाथ हवा में लहराते हुए अमिताभ का ट्रेडमार्का डांस भी थोड़ बहुत करके दिखाना होता था। अमिताभ तब की पीढ़ी के सबकुछ होते थे। स्टाइल उन्हीं से सीखी जाती थी। अमिताभ की देखा-देखी कुछ दोस्त तो बाएं हाथ से लिखने या खेलने तक लगे थे। कुली के दौरान तो पुनीत इस्सर हम सबके गुस्से के एकमात्र पात्र थे। रोज कोई न कोई अमिताभ की दुर्घटना की किसी अलग ही एंगल से कहानी ले आता था। सब रस लेकर उसे सुनते। तब उसमें बहुत कुछ हमारी कल्पना का मिश्रण भी होता था लेकिन सुनाने का ढंग इतना जोरदार होता था कि उसे सही माना जाता था। फिर किसी भी तथ्य को सही माने जाने का तब एक ही पैमाना होता था कि उसे दो -तीन दोस्तों का समर्थन प्राप्त हो जाए। तो कहानियां ऐसे गढ़ी जाती थीं कि बहुमत उस पर विश्वास कर ले। तब मनोरंजन के ज्यादा साधन नहीं थे मुझे लगता है कि तब शायद ऐसे ही स्टोरी टेलिंग से लोगों की रचनात्मकता बढ़ती होगी।
तब शहर में तीन टॉकीजें थीं। महेश, गोवर्धन, छत्रसाल। इनमें से छत्रसाल टॉकीज तालाब के किनारे थी। उसकी छत नहीं थी। एकदम ओपनएयर थियेटर था वो। फिल्म चलती तो हवाएं भी साथ चलतीं। कभी तालाब भर जाता तो टॉकीज बंद हो जाती। फिल्में वहां हमेशा अच्छी ही लगती थी। गोवर्धन और महेश टॉकीज वैसी थीं जब कि किसी कस्बे में तब टॉकीजों को होना चाहिए था। लाल-पीली पतंगी कागजों वाली टिकटें। गेटकीपरनुमा कुछ लोग। कुछ चौथी-पांचवीं बार फिल्म देखने वाले भयंकर फिल्म प्रेमी, जो पूरी फिल्म की कहानी लगातार अपने दोस्तों को सुनाते रहने का पुनीत कत्र्तव्य भी निरंतर निभाते थे। पटिये वाली कुर्सियां। टॉर्च लेकर पूरी फिल्म के दौरान लोगों को बैठाने वाले गेटकीपर। गाने के दौरान बाहर निकलने वाले कुछ व्यक्तित्व। छोटे बच्चों को लगातार बाहर खिलाने वाले कुछ पति। ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ दर्शक। जबर्दस्त सीटियां। फिल्म की रील कटने पर भारी पैमाने पर होने वाला गाली-गलौज से भरपूर आग्रह। इंटरवल में समोसे-मूंगफली। फिल्म खत्म होने पर रिक्शे के लिए की जाने वाली भागदौड़। ये वो यादें हैं जिन्हें आज ढूंढ़ों तो कहीं नहीं दिखेंगी। मल्टी प्लेक्स के शानदार संसार में इनकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। एक फिल्म की याद है मुझे तब गोवर्धन टॉकीज में लगी थी सरगम। ऋषि कपूर और जयाप्रदा। शायद जयाप्रदा की पहली हिन्दी फिल्म थी। गोवर्धन टॉकीज बाजार और मंडी के पास थी। लाइनें इतनी लंबी लगीं थी कि बाजार तक पहुंच रही थीं। आज इस दृश्य की कल्पना कठिन है।
फिल्मों से जुड़ा मेरा एक बड़ा रोचक अनुभव है। फिल्म थी काला पत्थर। तब मुझे फिल्म जाना था और घर से अनुमति नहीं मिल रही थी। मेरी मां तब आकाशवाणी में सिंगर थीं। एक बार वे गईं गाना गाने के लिए , पिताजी तब शहर से बाहर पोस्टेड थे,सो अपनी निकल पड़ी। धीरे से दोपहर घर से ऊपर छत से कूदे, फिर कुछ दोस्तों के साथ निकल लिए महेश टॉकीज। फिल्म देखी। बीच-बीच में घर पर पड़ने वाली डांट के डर से कुछ मजा भी खराब हुआ। फिल्म खत्म हुई बाद में डरते-डरते घर पहुंचा। दोस्त तो बाहर से ही खिसक लिए कि बेटा झेलो तुम क्यों गए थे बिना बताए फिल्म। अंदर पहुंचा तो मां ने कुछ नहीं कहा। फिर पूछा कुछ खालो। मैं भूखा तो था ही फटाफट खाने लगा। धीरे से मां ने बात शुरू की केैसी थी फिल्म। इधर मैेने स्टोरी बताना चालू कर दी। उन्होंने धीरे-धीरे समझाना शुरू कर दिया। अपन ने भी उस दिन के बाद हाथ जोड़े कि कोई कितना भी कहे अकेले तो नहीं ही जाएंगे। फिल्मों के साथ तब फिल्मी गाने बेहद प्रभावित करते थे। दोस्तों में से तब अधिकतर लोग किशोर कुमार के फैन थे। उनकी क मेडी और गायन पर अकसर चर्चा छिड़ती थी। पड़ोसन एक ऐसी फिल्म थी जिसे कई बार देखने के बाद भी उसका जादू कम नहीं हुआ। अमिताभ और राजेश खन्ना के लिए किशोर कुमार ने जो गाने गाए हैं उन्हें हम अकसर ही लाइट जाने या गमियों की दोपहर खेली जाने वाली में अंत्यक्षरी चीख-चीख कर गाते थे। चू्ंकि मम्मी सिंगर थीं तो बाद में कुछ गाने की तमीज भी आ गई तब गाने के म ौके नहीं रहे। इस तरह आज सोचता हूं तो लगता है कि वे भी क्या दिन रहे होंगे। एकदम निश्चिंत-बेपरवाही से भरपूर। हालांकि अकसर इस बात पर सोचता हूं कैसे अभी तक देश में लोगों के जीवन को इतना प्रभावित करने वाली फिल्मों के अध्ययन का कोई पाठ्यक्रम शुरू नहीं किया जा सका है। खैर, बचपन की गलियों से गुजरकर अपना फिल्म प्रेम बड़े शहरों में भी उसी शिद्दत से बना रहा। लेकिन एक बात जो हमेशा लगती रही कि फिल्मों ने भले ही तकनीकी तौर पर बेहद तरक्की कर ली हो लेकिन लोगों का वैसा जुड़ाव कम हुआ है जैसा हमारे बचपन में पाया जाता था।
दस पसंदीदा फिल्में
1। सत्ते पे सत्ता
2। शोले
३. हाफ टिकट
४. पड़ोसन
५. दीवार
६.रंग दे बसंती
७. गजनी
८. अंदाज अपना-अपना
९. हेराफेरी
१०. हीरो न. वन

करें...anuj.khr@gmail.com" onclick="return top.js.OpenExtLink(window,event,this)" href="mailto:mailto:करें...anuj.khr@gmail.com

Saturday, May 16, 2009

दरअसल:फिल्म बिरादरी के बोल-वचन

-अजय ब्रह्मात्मज
चुनाव समाप्त होने को आए। अगले हफ्तों में नई सरकार चुन ली जाएगी। सत्ता के समीकरण से अभी हम वाकिफ नहीं हैं, लेकिन यकीन रखें, देश का लोकतंत्र डावांडोल नहीं होगा। जो भी सरकार बनेगी, वह चलेगी। फिल्मों के स्तंभ में राजनीति की बात अजीब-सी लग सकती है। दरअसल, चुनाव की घोषणा के बाद फिल्मी हस्तियों ने वोट के लिए मतदाताओं को जागरूक करने के अभियान में आगे बढ़ कर हिस्सा लिया। आमिर खान ने कहा, अच्छे को चुनें, सच्चे को चुनें। दूसरी तरफ करण जौहर के नेतृत्व में अभिषेक बच्चन, करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा, रितेश देशमुख, रणवीर कपूर, असिन, इमरान खान, शाहिद कपूर, सोनम कपूर, जेनिलिया और फरहान अख्तर यह बताते नजर आए कि देश का बदलाव जनता के हाथ में है।
करण जौहर का अभियान फिल्म स्टारों के उदास चेहरों से आरंभ होता है। सभी कह रहे हैं कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता। देश का कुछ क्यों नहीं हो सकता, क्योंकि सड़कों पर कचरा है, देश में प्रदूषण है, पुलिस रिश्वत लेती है और राजनीतिज्ञ अपराधी हैं। देश में आतंकवादी आकर हंगामा मचा देते हैं। इन सभी से निराश हमारे फिल्म स्टारों को लगता है कि कुछ नहीं हो सकता इस देश का.., फिर खुद ही कहते हैं कि हो सकता है, अगर हम वोट दें। यहीं एक फिल्मी संवाद आता है, शायद यह सभी समस्याओं का हल नहीं है, लेकिन एक शुरुआत है। शुरुआत क्या है, वोट देना। इस अभियान में निराशा के जो संदर्भ दिए गए हैं, वे देश की मूलभूत समस्याएं नहीं हैं। वास्तव में इस अभियान के स्क्रिप्ट लेखक और निर्देशक मूलभूत समस्याओं से परिचित ही नहीं हैं। बीच में एक उदाहरण दिया जाता है कि फिल्म और खेल बिरादरी में जात-पात या धर्म का भेदभाव नहीं है। फिल्म इंडस्ट्री और खेल जगत पर नजर रखनेवाले आसानी से बता सकते हैं कि यहां किस प्रकार का भेदभाव जारी है।
रोचक तथ्य यह है कि इस अभियान फिल्म में शामिल फिल्म कलाकारों में से अधिकांश ने वोट ही नहीं दिया। मुंबई में एक शब्द प्रचारित है बोल-वचन। बोलने और करने में अंतर दिखे, तो इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। ज्यादातर फिल्म स्टारों की चिंता और चुनाव की जागरूकता में उनकी भागीदारी बोल-वचन ही रही। उन्होंने जागरूकता अभियान को भी फिल्म प्रचार या उत्पादों के एंडोर्समेंट के रूप में लिया। खुद उपयोग करें या न करें, लेकिन यह बोलते नजर आएंगे कि फलां उत्पाद कैसे बेहतर, उपयोगी और जरूरी है। वोट देने के लिए प्रेरित करने तक ही बात सीमित नहीं थी। वे यह भी बता रहे थे किप्रत्याशियों के चुनाव में सावधानी बरतें। सावधानी सिर्फ इस बात की रखें कि प्रत्याशी अपराधी नहीं हो। यह महज अराजनीतिक सावधानी है। कुछ मामलों में ही चंद राजनीतिज्ञों के अपराधी होने की बात सही हो सकती है। अपराध के आरोप राजनीति से प्रेरित भी तो हो सकते हैं। मतदाताओं ने फिल्म स्टारों की एक नहीं सुनी। मुंबई और देश में फिल्म स्टारों की संलग्नता और हिस्सेदारी के बावजूद मतदान का प्रतिशत नहीं बढ़ा। नतीजे आने पर पता चलेगा कि अपराधियों को न चुनने की उनकी सलाह पर मतदाताओं ने कितना अमल किया। वास्तव में इन अभियानों में किसी स्टार की राजनीति स्पष्ट नहीं हुई। विशेष समस्याओं की बात तो दूर उनके बयानों और बातों से यह भी नहीं पता चलता कि वे राजनीति के किस पक्ष में यकीन करते हैं। राजनीति से परहेज करते हुए मतदान की अपील करना वैसा ही है, जैसा फिल्म में किसी किरदार को निभाना। एक तरह से हमारी फिल्मी हस्तियां इस अभियान में अभिनय ही कर रही थीं। उन्होंने इसे अभिनय और विज्ञापन बना दिया। अब उनकी समझ में आ रहा होगा कि उनका प्रयास निष्फल रहा। या फिर जैसा कि फिल्म फ्लॉप होने पर होता है। हमेशा की तरह वे जनता को कोस रहे होंगे कि इनका कुछ नहीं हो सकता, इस देश का कुछ नहीं हो सकता।

फ़िल्म समीक्षा:९९


-अजय ब्रह्मात्मज

कहते हैं देश का हर आदमी 99 के फेर में पड़ा है। बस, एक और मिल जाए, हो जाए या पा जाए तो सभी की सेंचुरी लग जाए। आम जीवन के इसी थीम को निर्देशकद्वय राज और डीके ने अपनी फिल्म का विषय बनाया है। उन्होंने मशहूर कामिक किरदार लारेल और हार्डी की तर्ज पर एक मोटा और एक दुबला-पतला किरदार चुना है। यहां सायरस भरूचा और कुणाल खेमू इन भूमिकाओं में हैं।
मुंबई के दो छोटे जालसाज डुप्लीकेट सिम के धंधे में पकड़े जाने से बचने के लिए भागते हैं तो अपराध के दूसरे कुचक्र में शामिल हो जाते हैं। वे बुकी एजीएम का काम करने लगते हैं। उसी के पैसों की वसूली के लिए वे दिल्ली पहुंचते हैं। दिल्ली में उनका सामना विचित्र किरदारों से होता है। 99 नए किस्म की कामेडी है। पिछले कुछ समय से दर्शक एक ही किस्म की कामेडी देख कर ऊब चुके हैं, वैसे में 99 राहत की तरह है।
निर्देशकद्वय ब्लैक कामेडी और ह्यूमर के बीच में अपने किरदारों को रख पाए हैं। इस फिल्म में मजेदार ब्लैक कामेडी की संभावना थी। फिल्म बीच में स्लो हो जाती है। कामेडी फिल्मों में घटनाएं तेजी से नहीं घटे तो कोफ्त होने लगती है। मुख्य किरदार सचिन [कुणाल खेमू] और जरामुड़ [सायरस भरूचा] के बीच अच्छी केमिस्ट्री है, लेकिन लेखक और निर्देश्क ने जरामुड़ पर विशेष काम नहीं किया है। सायरस नेचुरल किस्म के एक्टर हैं, उन्हें कुछ और दृश्य एवं संवाद मिले होते तो फिल्म की रोचकता बढ़ती। कुणाल निराश तो नहीं करते, लेकिन उन्हें और अभ्यास की जरूरत है।
यह फिल्म बोमन ईरानी और राज मिस्त्री के लिए देखी जा सकती है। राज मिस्त्री के रूप में हिंदी फिल्मों को एक नया एक्टर मिला है। उनकी कामिक टाइमिंग और अभिव्यक्ति फिल्म के दृश्यों के लिए सटीक है। बोमन ऐसी फिल्मों में लाजवाब होते हैं। उनकी पत्नी के रूप में सिमोन सिंह ने किरदार के भाव को अच्छी तरह समझा और व्यक्त किया है।
भोजपुरी फिल्म के माहौल को लेकर किए गए कटाक्ष भोजपुरीभाषी दर्शकों को चुभ सकते हैं। लेखकों को ऐसे मजाक से बचना चाहिए, जो किसी भाषा विशेष को निशाना बना कर हंसाने की कोशिश करता हो। फिल्म के संवाद चुटीले और प्रासंगिक हैं। छोटे ओर सहयोगी किरदारों को गढ़ने में निर्देशक ने मेहनत की है। उनकी मौजूदगी से स्क्रिप्ट में आई फांक भरती है। पहली फिल्म के संदर्भ में निर्देशकद्वय राज निदिमोरू और कृष्णा डीके उम्मीद जगाते हैं।

Thursday, May 14, 2009

एहसास:समाज को जरूरत है गांधीगिरी की -महेश भट्ट


देवताओं के देखने लायक था वह नजसरा। किसी ने उम्मीद नहीं की होगी कि न्यूयार्क में स्थित संयुक्त राष्ट्र की खामोश इमारत तालियों और हंसी से इस कदर गुंजायमान हो उठेगी। संयुक्त राष्ट्र केडैग हैम्सर्क गोल्ड ऑडिटोरियम में राज कुमार हिरानी की लगे रहो मुन्ना भाई देखने के बाद पूरा हॉल खिलखिलाहट और तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा।
फिल्म के निर्देशक राज कुमार हिरानी और इस शो के लिए विशेष तौर पर गए फिल्म के स्टार यकीन नहीं कर पा रहे थे कि मुन्ना और सर्किट के कारनामों को देख कर दर्शकों के रूप में मौजूद गंभीर स्वभाव के राजनयिक इस प्रकार दिल खोल कर हंसेंगे और तालियां बजाएंगे। इस फिल्म में संजय दत्त और अरशद वारसी ने मुन्ना और सर्किट के रोल में अपने खास अंदाज में गांधीगिरी की थी। तालियों की गूंज थमने का नाम नहीं ले रही थी। ऐसी प्रतिक्रिया से फिल्म के निर्देशक का खुश होना स्वाभाविक और वाजिब है। इस सिनेमाई कौशल के लिए वाहवाही लूटने का उन्हें पूरा हक है, लेकिन उनके साथ हमारे लिए भी यह सोचना-समझना ज्यादा जरूरी है कि इस फिल्म को कुलीन और आम दर्शकों की ऐसी प्रतिक्रिया क्यों मिली? क्या यह गांधी का प्रभाव है, जिनकी शब्दावली को लेकर संयुक्त राष्ट्र का घोषणापत्र तैयार किया गया है या मनुष्य की चेतना में बसे किसी मूलभूत गुण के प्रति दर्शक अपना भाव प्रकट कर रहे थे। हिंदू, बौद्ध और जैन दर्शन में समान रूप से महत्वपूर्ण यह मूलभूत गुण अहिंसा है।
अहिंसा परमो धर्म:
अहिंसा का सीधा अर्थ है हिंसारहित। अहिंसा का पाठ सदियों से ऋषि, मुनि और महात्मा बताते-पढाते रहे हैं। स्कूल की किताबों और शिक्षकों ने सालों की मेहनत के बाद भी जो सफलता हासिल नहीं की होगी, उससे अधिक प्रभावी तरीके से इस फिल्म ने अहिंसा का पाठ पढा दिया। अपना देश अभी ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति की गिरफ्त में है, जिसमें गांधी देश के नागरिकों की चेतना से गायब हो रहे हैं। ऐसे माहौल में मुन्ना भाई ने विचारों की सामाजिक-राजनीतिक शून्यता को भर दिया और सभी उम्र के लोगों के लिए गांधी को फैशन में ला दिया। गांधी के करिश्माई नेतृत्व में जिनकी रुचि नहीं के बराबर थी, उन्होंने भी गांधी के बारे में सोचना आरंभ कर दिया। इस फिल्म की रिलीज के बाद बापू की जीवनी की बिक्री बढ गई। गौर करें तो हर देश को आदर्श और प्रेरणा के लिए एक विभूति की जरूरत होती है। निश्चित रूप से गांधी भारतीय जीवन मूल्यों के श्रेष्ठ प्रतीक हैं। गांधी जी इस कारण भी विलक्षण हैं कि वे कम से कम शब्दों में ज्ञान की बातें करते थे। गांधी को फिर से खोजने की कोशिश में मुन्ना भाई ने भी यही किया। उसने गांधी को नए अंदाज में दुनिया के सामने रखा।
फिल्मों में गांधी दर्शन
अहिंसा और गांधी हिंदी फिल्मों के लिए नए विषय नहीं हैं। राज कपूर की फिल्म जिस देश में गंगा बहती है से मेरा परिचय गांधी दर्शन से हुआ था। राज कपूर की इस फिल्म का नायक एक साधारण व्यक्ति है। वह अहिंसा के विचार में ऐसा डूबा हुआ है कि किसी के चपत लगाने पर दूसरा गाल आगे कर देता है। इस फिल्म ने हम बचों का मनोरंजन तो किया ही था, साथ ही गांधी का संदेश भी दिया था कि जो गोलियों से जिंदा रहता है, वह गोलियों से ही मरता है। इस फिल्म की यही कहानी थी कि कैसे एक साधारण व्यक्ति खूंखार डाकुओं को हथियार फेंकने के लिए प्रेरित करता है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोडता है। राज कपूर की इस फिल्म का विषय आज भी कितना प्रासंगिक है? इस फिल्म का एक संवाद मुझे आज भी याद है। डाकुओं के सरदार राका की भूमिका निभा रहे प्राण से राज कपूर कहते हैं, फेंक दे, ये दोनाली राका.. इसने गांधी को नहीं पहचाना, ये तुझे क्या पहचानेगी?
इस फिल्म का प्रभाव इतना जबरदस्त था कि सालों बाद जिस देश में गंगा बहती है से प्रेरित होकर मैंने सर का निर्माण और निर्देशन किया। सर मेरी उन फिल्मों में से है, जिन पर मैं गर्व करता हूं। इसमें नसीरुद्दीन शाह ने एक सामान्य प्रोफेसर की भूमिका निभाई थी। प्रोफेसर खतरनाक गैंगस्टर वेलजीभाई को प्रेरित करते हैं कि हथियार फेंक कर अहिंसा का मार्ग अपना लो। वेलजी की भूमिका परेश रावल ने निभाई थी। यह फिल्म भी कामयाब रही थी। सचमुच, अगर अहिंसा के विषय को नाटकीय ढंग से चित्रित किया जाए तो उसे दर्शक हर समय स्वीकार करेंगे।
अहिंसा बनाम हिंसा
हिंदी फिल्मों में एक दौर ऐसा भी आया था, जब हिंदी फिल्मों में हिंसा पर बहुत ज्यादा जोर दिया जाने लगा था। समस्या सुलझाने का एक ही तरीका था-बदला और प्रतिशोध। इस दौर में फालतू किस्म की एक्शन फिल्में बनीं और सिनेमा का रुपहला पर्दा खून के छींटों से लाल होता गया। ये फिल्में शायद भारतीय समाज में गहराई से कुछ गलत लक्षणों के तौर पर उभरी थीं। भारत ने गांधीवादी मूल्यों को छोड दिया था। इसी वजह से एंग्री यंग मैन और ताकतवर हीरो का जन्म हुआ, जो अपने हाथों से दुश्मनों की लुगदी बना देता था। इस तरह के सिनेमा के हीरो धर्मेद्र, अमिताभ बचन, विनोद खन्ना और सनी देओल जैसे कलाकार थे। इस खूनी दौर में सुनील दत्त ने रेशमा और शेरा जैसी अहिंसावादी फिल्म बनाने का साहस किया था, क्योंकि वे भीतर से गांधीवादी थे। सुनील दत्त को अपने प्रयास की भारी कीमत चुकानी पडी थी। उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ। बतौर निर्माता उनके करियर पर लगभग पूर्णविराम लग गया था। उन्हें लंबी लडाई लडनी पडी। खुद को जिंदा रखने के लिए उन्हें हिंसात्मक और एक्शन फिल्मों का सहारा लेना पडा।
गांधी के प्रतीक नेल्सन मंडेला
डायरेक्टर के तौर पर मेरी अंतिम फिल्मों में से एक कारतूस थी। यह फिल्म एक खास वजह से मुझे याद है। कारतूस की शूटिंग के लिए मैं दक्षिण अफ्रीका गया था। वहां मुझे गांधी की साक्षात प्रतिमूर्ति नेल्सन मंडेला से मिलने का अवसर मिला। मंडेला जैसी जीवित किंवदंती से मुलाकात की हर बात मुझे याद है। मेरे खयाल में वे अकेले ऐसे नेता हैं, जो दुनिया को इस भयानक दौर से सुरक्षित निकलने का उपाय बता सकते हैं। संजय दत्त, मनीषा कोइराला और अपनी टीम के कुछ तकनीशियन सदस्यों के साथ मैं उनसे मिलने गया था। वे गर्मजोशी के साथ हमसे मिले। उन दिनों भारत अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा था। इंद्र कुमार गुजराल देश के प्रधानमंत्री थे। भारतीय राजनीति और समाज की बुरी हालत थी। मैंने मंडेला से पूछा, भारत की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं का क्या समाधान हो सकता है? उनका जवाब मुझे आज तक याद है। उन्होंने कहा, लगता है भारत ने अपने गौरवशाली सपूत गांधी को भुला दिया है, जिसने बगैर खून बहाए आपके देश को आजादी दिलाई थी। जरूरत है कि आप लोग गांधी और अहिंसा के उनके संदेश को अपने जीवन के केंद्र में ले आएं। गांधी के विचारों के बिना आज दुनिया की शक्ल कुछ और होती। वे बोल रहे थे और हम सुन रहे थे।
मुन्ना भाई की गांधीगिरी
लगे रहो मुन्ना भाई जैसी पॉपुलर फिल्म से गांधी फिर जीवित हुए हैं, लेकिन गांधीवाद या गांधी का दर्शन गहन विषय है। गांधी के दर्शन, विचारों या अहिंसा के पाठ को किसी पॉपुलर फिल्म के जरिये याद करने में बुराई नहीं है, लेकिन उस पाठ को दैनिक जीवन में उतार पाना असल चुनौती है। कांग्रेस दल ने गांधी को हर सडक-चौराहे में मूर्ति के रूप में स्थापित किया है, लेकिन गांधी को लेकर कांग्रेस में पुनर्जागरण की जरूरत है। देश के लिए जानना जरूरी है कि गांधी किन विचारों के लिए जिंदा रहे और मरे। सरल शब्दों में कहूं तो आज देशभक्त या शुद्ध गांधीवादी या अहिंसा का समर्थक होने के लिए जरूरी है कि हम अपने पडोसियों से खुद की तरह प्यार करें। भारत ने ऐसा नहीं करने का अपराध किया है। अगर हमने ऐसा किया होता तो सुविधाप्राप्त और सुविधाहीन लोगों के बीच इतनी बडी खाई नहीं होती।

Wednesday, May 13, 2009

हिन्दी टाकीज:काश! हकीकत बन सकता गुजरा जमाना-विजय कुमार झा


हिन्दी टाकीज-३५

हिन्दी टाकीज कोशिश है अपने बचपन और कैशोर्य की गलियों में लौटने की.इन गलियों में भटकते हर हम सभी ने सिनेमा के संस्कार हासिल किए.जीवन में ज़रूरी तमाम विषयों की शिक्षा दी जाती है,लेकिन फ़िल्म देखना हमें कोई नहीं सिखाता.हम ख़ुद सीखते हैं और सिनेमा के प्रति सहृदय और सुसंस्कृत होते हैं.अगर आप अपने संस्मरण से इस कड़ी को मजबूत करें तो खुशी होगी.अपने संस्मरण पोस्ट करें ...chavannichap@gmail.com


इस बार युवा पत्रकार विजय कुमार झा। विजय से चवन्नी की संक्षिप्त मुलाक़ात है.हाँ,बातें कई बार हुई हैं.कभी फ़ोन पर तो कभी चैट पर। विजय कम बोलते हैं,लेकिन संतुलित और सारगर्भित बोलते हैं.सचेत किस्म के नौजवान हैं। अपनी व्यस्तता से समय निकाल कर उन्होंने लिखा.इस संस्मरण के सन्दर्भ में उन्होंने लिखा है...यादें हसीन हों तो उनमें जीना अच्‍छा लगता है, पर उस पेशे में हूं जहां कल की बात आज बासी हो जाती है। सो आज में ही जीने वाला पत्रकार वि‍जय बन कर रह गया हूं। हिन्दी टाकीज का शुक्रि‍या कि‍ उसने अतीत में झांकने को प्रेरि‍त कि‍या और मैं कुछ देर के लि‍ए बीते जमाने में लौट गया। मुश्‍कि‍ल तो हुई, पर मजा भी खूब आया। जो समेट पाया, वह लेकर एक बार फि‍र आज में लौट आया हूं।
आप उनसे vijay.bgp@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

जब से महानगर (दि‍ल्‍ली) में मशीनी जिंदगी जीने के लि‍ए मजबूर हुआ और टीवी, कंप्‍यूटर, इंटरनेट आदि‍ की सुवि‍धा सुलभ हो गई, बड़े पर्दे पर सि‍नेमा देखने के कम ही मौके मि‍लते हैं। महीनों बाद, कभी-कभार। वैसे, सच कहें तो अब देखने लायक फि‍ल्‍में भी तो कभी-कभार ही बनती हैं। शायद महीनों नहीं, बल्‍कि‍ सालों बाद। बहरहाल, जब कभी भी मल्‍टीप्‍लेक्‍स की लि‍फ्ट चढ़ने का मौका मि‍लता है, गुजरा जमाना याद आता है। स्‍कूल-कालेज वाले दि‍न।

अचानक फि‍ल्‍म देखने का प्रोगाम बनता तो चौकड़ी में पहला सवाल यही उठता था- टि‍कट मि‍ल जाएगा? मैं जि‍स शहर (भागलपुर) में पला-बढ़ा, वहां अभी भी फोन या इंटरनेट से बुकिंग की सुवि‍धा नहीं है। बॉक्‍स ऑफि‍स पर चमकी हुई फि‍ल्‍म के शो के टि‍कट लेना फल पाने (फि‍ल्‍म देखने) से पहले तपस्‍या करने के बराबर था। यह बात अलग थी कि‍ अक्‍सर यह तपस्‍या मेरा कोई दोस्‍त कि‍या करता था और पूरे तीन घंटे ‘फल’ का आनंद हम सब मि‍ल कर लेते थे।

हमारे लि‍ए उन दि‍नों फि‍ल्‍म देखना एक गोपनीय अभि‍यान हुआ करता था। सि‍नेमा हॉल जाने और वहां से नि‍कलने तक इस बात की पूरी कोशि‍श की जाती थी कि‍ कहीं कोई जान-पहचान वाला नहीं दि‍ख जाए, जो घर तक खबर पहुंचा दे। दरअसल, पि‍‍ताजी फि‍ल्‍मों के प्रति‍ दीवानगी को सीधे बच्‍चे की बर्बादी से जोड़ कर देखते थे। यह फि‍ल्‍मों के प्रति‍ समाज के एक तबके में प्रचलि‍त हेय दृष्‍टि‍कोण का नतीजा था। यह तबका फि‍ल्‍म कलाकारों को नाचने-गाने वाले और फि‍ल्‍म को समाज को गलत दि‍शा दि‍खाने वाले माध्‍यम के रूप में लेता था। ऐसी धारणा फि‍ल्‍मों और फि‍ल्‍मी दुनि‍या को देखे-जाने-समझे बि‍ना ही बनी हुई थी कि‍ फि‍ल्‍में भावी पीढ़ी को बि‍गाड़ने का सबसे अच्‍छा जरि‍या हैं। लगभग सभी दोस्‍तों की यही समस्‍या थी, सो सामूहि‍क प्रयास से हम अपने ‘अभि‍यान’ को गोपनीय रखने में अक्‍सर कामयाब हो जाते थे। बहरहाल, आज जब इसका सकारात्‍मक पहलू ढूंढता हूं तो यही लगता है कि‍ चोरी चुपके फि‍ल्‍म देखने का हमारा अभि‍यान कहीं न कहीं हम दोस्‍तों की दोस्‍ती के बंधन को मजबूती ही देता था। स्‍कूल में प्रेमरंजन से मेरी और रूपेश की दोस्‍ती ही फि‍ल्‍म देखने के क्रम में हुई थी। उन लोगों ने क्‍लास बंक कर फि‍ल्‍म देखने का प्रोग्राम बनाया था और उसमें हम दोनों को भी शामि‍ल कर लि‍या था। वहीं से हमारी दोस्‍ती की शुरुआत हुई थी।

उन दि‍नों सि‍नेमा को लेकर समाज का नजरि‍या, समाज को लेकर सि‍नेमा जगत की सोच और बनने वाली फि‍ल्‍में ही अलग नहीं थीं, बल्‍कि‍ फि‍ल्‍में देखने का अंदाज भी अलग था। तीन घंटे की फि‍ल्‍म देखने का मतलब पूरे तीन घंटे मनोरंजन, मनोरंजन और केवल मनोरंजन। हर कोई अपने-अपने अंदाज में ‘पैसा वसूल’ मनोरंजन करता था। कोई सीटी बजा कर, कोई नायकों के कारनामे देखकर, कोई हीरो-हीरोइन का रोमांस देख कर तो कोई कहानी और कि‍रदारों में डूब कर। दर्शक पर्दे पर नायकों के कारनामे से उत्‍साहि‍त होते और खलनायकों पर गुस्‍सा भी करते थे। फि‍ल्‍मों को वास्‍तवि‍कता के काफी करीब रख कर देखा जाता था। फि‍ल्‍में बनाने वाले शायद उसे हकीकत के इतना करीब लाने की कोशि‍श नहीं करते थे, पर दर्शक उसे वास्‍तवि‍कता से जोड़ लेते थे। आज फि‍ल्‍मकार अपनी तरफ से कोशि‍श कर भी दर्शकों को वास्‍तवि‍कता के करीब ले जाने में सफल नहीं हो पाते। शायद इसलि‍ए कि‍ फि‍ल्‍में तकनीकी रूप से वास्‍तवि‍कता के करीब आई हैं, पर कहानी और कि‍रदारों के मोर्चे पर यह करीबी नहीं आई है। यही वजह है कि‍ आज फि‍ल्‍म बनाने वालों को प्रचार पर भारी-भरकम रकम खर्च करनी पड़ रही है और प्रचार के नए-नए तरीके भी खोजने पड़ रहे हैं। इस दौरान फि‍ल्‍मों का व्‍यावसायीकरण (कॉरपोरेटाइजेशन ऑफ फि‍ल्‍म्‍स) जि‍तना बढ़ा है, उतना कुछ नहीं। इसलि‍ए रील लाइफ की सभी रि‍यल चीजें बनावटी लगती हैं।

‘हि‍न्‍दी टाकीज’ की बात गानों की चर्चा के बि‍ना अधूरी रहेगी। यह इसलि‍ए भी क्‍योंकि‍ फि‍ल्‍मों के प्रति‍ मेरी रुचि‍ वि‍कसि‍त होने में गानों की अहम भूमि‍का रही। गाने सुनने के लि‍ए रेडि‍यो एक मात्र सर्वाधि‍क लोकप्रि‍य और सस्‍ता साधन था। घर में ‘डेक’ (आडि‍यो प्‍लेयर) और टीवी आ जाने के बाद भी मैं रेडि‍यो पर ही गाने सुनने का मजा लेता था। वजह यह थी कि‍ हर दौर और मूड के गाने आसानी से सुनने को मि‍ल जाते थे। सुरैया से लेकर यशुदास तक और पंकज उधास से कुमार शानू तक। सुबह बीबीसी सुनने के बाद पि‍ताजी रामचरि‍त मानस का पाठ सुना करते थे। उसके बाद श्रीलंका ब्राडकास्‍टिंग कारपोरेशन के वि‍देश वि‍भाग (सीलोन) से फि‍ल्‍मी गाने सुनने का मेरा दौर शुरू होता था। आठ से नौ तक हर मूड के गाने सुनने के बाद नौ बजे से आधे घंटे तक स्‍थानीय भागलपुर रेडि‍यो स्‍टेशन से ‘गीत र्नि‍झर’ बहा करता था। पौने दस से सवा दस बजे तक पटना स्‍टेशन से गाने आते थे। सुबह के इस सत्र का जहां तक संभव हो सके, मैं पूरा लाभ उठाता था। फि‍र रात को रेडि‍यो नेपाल। इनसे इतर, बेवक्‍त गाने सुनना हो तो वि‍वि‍ध भारती था ही। अब ये सोचने में पसीना मत बहाइए कि‍ मैं पढ़ाई कब करता था। वह मैं कर लि‍या करता था। बहरहाल, गाने सुन कर मैं बालीवुड की वि‍वि‍धता के बारे में सोचने लगता था और मेरा दि‍माग चकरा जाता था। असल जिंदगी की कि‍सी भी स्‍थि‍ति‍ (सि‍चुएशन) की कल्‍पना कीजि‍ए और उससे संबंधि‍त गाना सोचि‍ए, मि‍ल जाएगा। हालांकि‍ अगर सिर्फ बीते दस-बीस साल के गाने तलाशे जाएं तो संभवत: ऐसा नहीं हो, पर पुराने जमाने के गाने वि‍वि‍धता और वास्‍तवि‍कता की इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं। बालीवुड के प्रति‍ मेरी सकारात्‍मक सोच वि‍कसि‍त होने में इस सच्‍चाई का काफी योगदान रहा। फि‍र नई आने वाली फि‍ल्‍मों के गाने सुन कर ही हम प्रथमदृष्‍टया यह तय करते थे कि‍ फि‍ल्‍म देखने चलना है या नहीं। अगर चलना है तो मंडली में वि‍चार होता था और फि‍र कार्यक्रम बन जाता था। उन दि‍नों गाने नई फि‍ल्‍मों के प्रचार का भी बड़ा हथि‍यार होते थे। प्रचार मुख्‍य रूप से गली-मोहल्‍लों में लाउडस्‍पीकरों से अनाउंस करवा कर और पोस्‍टर चि‍पका कर कि‍ए जाते थे। लाउडस्‍पीकरों से फि‍ल्‍म के गाने सुनाए जाते थे और बीच-बीच में प्रचार करने वाला शख्‍स फि‍ल्‍म के कलाकारों के बारे में बताता था। पता नहीं, मेरे शहर में अब भी फि‍ल्‍मों का प्रचार ऐसे ही होता है या इसकी जरूरत ही नहीं रह गई है। अब तो साल या दो साल में एक बार जाना होता है और वह भी कुछ दि‍नों के लि‍ए। काश! बीते जमाने को यादों से इतर, हकीकत में जीना मुमकि‍न हो पाता।

दस पसंदीदा फि‍ल्‍में

बातों बातों में

बावर्ची

तीसरी कसम

गाइड

मेरा नाम जोकर

श्री ४२०

दोस्ती

उमराव जान

लगान

तारे ज़मीन पर

Saturday, May 9, 2009

फ़िल्म समीक्षा:फ्रोजेन


-अजय ब्रह्मात्मज

शिवाजी चंद्रभूषण की पहली फिल्म फ्रोजेन की ख्याति इतनी फैल चुकी है कि इसके बारे में संतुलित और वस्तुनिष्ठ राय व्यक्त करना मुश्किल है। कहते हैं कि तीस फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जा चुकी इस फिल्म को 18 पुरस्कार मिल चुके हैं। इस फिल्म के प्रचार में पुरस्कारों का निरंतर उल्लेख किया जा रहा है। कहीं न कहीं दर्शकों पर दबाव डाला जा रहा है कि आप इसे देखें या न देखें, इसकी महत्ता स्वीकार कर लें। शिवाजी चंद्रभूषण की फ्रोजेन की कई विशेषताएं हैं,
मसलन:-चालीस सालों के अंतराल के बाद कोई ब्लैक एंड ह्वाइट हिंदी फिल्म रिलीज हो रही है। शिवाजी के इस क्रिएटिव साहस और उसके सुंदर परिणाम की तारीफ उचित है।
समुद्र तल से 12,000 से 20,000 फीट की ऊंचाई पर इस फिल्म की शूटिंग हुई। यह मुश्किल काम था।
-लंबे समय के बाद डैनी शीर्ष भूमिका में दिखे। उनकी योग्यता और क्षमता का शिवाजी ने सही इस्तेमाल किया।
-फ्रोजेन में हिमालय की वादियों की एकांत खूबसूरती छलकती है।
कहना मुश्किल है कि विदेशी फिल्म फेस्टिवल में फ्रोजेन को किस आधार पर पुरस्कार दिए गए हैं। सवाल पूछने का मतलब यह कतई नहीं निकालें कि फिल्म इन पुरस्कारों के योग्य नहीं है। फ्रोजेन हिंदी के फार्मूला फिल्मों से अलग है। इसकी कहानी कई स्तरों पर चलती है। हिंदी फि ल्मों में कथा निर्वाह की एकरेखीय पद्धति होती है। उसकी आदत पड़ जाने के कारण जटिल कहानी एकबारगी समझ में नहीं आती। लास्या का काल्पनिक भाई, लास्या का एकाकीपन, लास्या के पिता कर्मा का संघर्ष, कर्मा का शोक और संताप, विस्थापन की समस्या, शांत माहौल में खंजर की तरह चुभती सड़कें, दैत्यों की तरह गुजरते वाहन, निष्कपट लोगों के बीच सक्रिय कपटी शहरी, उपभोक्तावाद का प्रभाव..जाने-अनजाने शिवाजी चंद्रभूषण ने भावनाओं और कथ्यों का अंतरजाल बुना है। फिल्म में एक उदासी है, जो श्वेत-श्याम फिल्मांकन से और गहरी हो जाती है। कभी-कभी बोझिल भी महसूस होती है।
नियमित फिल्मों के जरिये मनोरंजन के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म काफी अलग अनुभव देगी। इस नए और अलग स्वाद के लिए उन्हें तैयार रहना होगा। डैनी और आनचुक का अभिनय सधा और किरदार के अनुरूप है। लास्या की भूमिका में गौरी खरी नहीं उतर पातीं। छोटी भूमिकाओं में यशपाल शर्मा और राज जुत्शी फिल्म को रोचक बनाते हैं।
रेटिंग ***

दरअसल:डीवीडी का बदलता स्वरूप


-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले कुछ समय से डीवीडी बाजार में तेजी से बदलाव आया है। नई कंपनियों ने दर्शकों की जरूरतों को समझते हुए मार्केटिंग में सुधार के साथ प्रोडक्ट को भी नया रूप दिया है। अब व‌र्ल्ड और इंडियन क्लासिक फिल्मों के सस्ते और महंगे डीवीडी आ गए हैं। कई कंपनियां बाजार में सक्रिय हैं और दर्शकों के विशेष समूह को अपना खरीददार बना रही हैं। हर डिर्पाटमेंटल और रिटेल स्टोर में डीवीडी और वीसीडी मिल रहे हैं। महानगरों में मल्टीप्लेक्स में नई फिल्मों की रिलीज रुकने से अचानक डीवीडी की मांग बढ़ी है। मुंबई के रिटेल स्टोर में डीवीडी की बिक्री में 10 से 25 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। दरअसल, मल्टीप्लेक्स संस्कृति ने नए दर्शक बनाए हैं। शहरों में पांच-छह दिनों की मशक्कत के बाद वीकएंड में मनोरंजन का सिलसिला बढ़ा है। वीकएंड में हर मल्टीप्लेक्स में ऐसे दर्शकों की तादाद बढ़ जाती है। इन दर्शकों ने ही फिल्म बिजनेस का गणित बदला है। फिल्म इंडस्ट्री धीरे-धीरे वीकएंड बिजनेस पर निर्भर होती गई है। बड़े निर्माता और प्रोडक्शन हाउस नई फिल्मों के वीकएंड बिजनेस को सुनिश्चित करने के लिए दमदार और धुआंधार प्रचार करते हैं। कहा जाता है कि फिल्मों की लागत का बड़ा हिस्सा पहले तीन दिनों में ही वसूल हो जाता है। फिल्मों के इस वीक एंड बिजनेस के मुख्य कारक दर्शक हैं। मल्टीपलेक्स मालिकों और निर्माता-वितरकों के बीच लाभांश के सवाल पर आए गतिरोध से मल्टीप्लेक्स के नए दर्शक मनोरंजन से वंचित हो गए हैं। इसीलिए उन्होंने डीवीडी का सहारा लिया है। इसीलिए डीवीडी मार्केट में उछाल आया है।
दर्शकों की जरूरत और मांग को देखते हुए देव डी जैसी नई फिल्म की डीवीडी भी मार्केट में डाल दी गई है। अभी गजनी, रब ने बना दी जोड़ी और अ वेडनेसडे सबसे ज्यादा बिक रही हैं। डीवीडी में फिल्मों से इतर चीजें भी देखने को मिलती हैं। रब ने.. का उदाहरण लें, तो गानों के फिल्मांकन के साथ फिल्म के मुख्य स्टारों शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा से भी दर्शक मुखातिब होते हैं। सिनेमा को समझने का नया एक्सपीरिएंस होता है। फिल्म बनने की प्रक्रिया और सोच से परिचित होने पर फिल्म देखने का आनंद बढ़ जाता है। मुमकिन है इस प्रक्रिया में धीरे-धीरे दर्शकों का सजग समूह विकसित हो।
पहले डीवीडी और वीसीडी में सिर्फ फिल्में ही रहती थीं। डिजिटल तकनीक की मदद से अब डीवीडी को इस रूप में तैयार करना संभव हो गया है कि हम फिल्मों के दृश्य या गाने या मेकिंग अलग से देख सकें। डीवीडी के नए स्वरूप की बात करें, तो जोधा अकबर और तारे जमीन पर अभी तक के सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं। जोधा अकबर में आशुतोष ने फिल्म के कटे दृश्य रखे। साथ ही उन्होंने पत्रकार राजीव मसंद के साथ अपनी बातचीत भी इस डीवीडी में डाली है। इससे फिल्म की बारीकियों को समझने में मदद मिलती है। इसी प्रकार आमिर खान ने तीन डिस्क का डीवीडी पैकेट तैयार किया। तारे जमीन पर से संबंधित हर तरह की जानकारी इस डीवीडी से मिलती है। आमिर ने दृश्यों की भी बात की है।
उम्मीद है, होम एंटरटेनमेंट में हो रही बढ़ोत्तरी के साथ डीवीडी का स्वरूप और निखरेगा।

Friday, May 8, 2009

हिन्दी टाकीज:बार-बार याद आते हैं वे दिन-आनंद भारती

हिन्दी टाकीज-३४
पत्रकारों और लेखों के बीच सुपरिचित आनंद भारती ने चवन्नी का आग्रह स्वीकार किया.उन्होंने पूरे मनोयोग से यह संस्मरण लिखा है,जिसमें उनका जीवन भी आया है.हिन्दी टाकीज के सन्दर्भ में वे अपने बारे में लिखते हैं...बिहार के एक अविकसित गांव चोरहली (खगड़िया) में जन्‍म। यह गांव आज भी बिजली, पक्‍की सड़क की पहुंच से दूर है। गांव भी नहीं रहा, कोसी नदी के गर्भ में समा गया। बचपन से ही यायावरी प्रवृत्ति का था। जैसे पढ़ाई के लिए इस ठाम से उस ठाम भागते रहे,उसी तरह नौकरी में भी शहरों को लांघते रहे। हर मुश्किल दिनों में फिल्‍मों ने साथ निभाया, जीने की ताकत दी। कल्‍पना करने के गुर सिखाए और सृजन की वास्‍तविकता भी बताई। फिल्‍मों का जो नशा पहले था, आज भी है। मुंबई आया भी इसीलिए कि फिल्‍मों को ही कैरियर बनाना है, यह अलग बात है कि धक्‍के बहुत खाने पड़ रहे हैं। अगर कहूं कि जिस जिस पे भरोसा था वही साथ नहीं दे रहे, तो गलत नहीं होगा। फिर भी संकल्‍प और सपने जीवित हैं। जागते रहो का राज कपूर, गाईड का देव आनंद प्‍यासा का गुरुदत्‍त, आनंद का राजेश खन्‍ना और अमिताभ बच्‍चन,तीसरी कसम के निर्माता शैलेंद्र, अंकुर और निशांत के निर्देशक श्‍याम बेनेगल जैसे लोगों को हमेशा अपने भीतर महसूस करता रहता हूं। उनसे संपर्क करना चाहें तो लिखें ... anandbharti03@gmail.com
संभवत: 63 की बात है जब मैंने बिहार-नेपाल सीमा से सटे शहर फारबिसगंज में पहली फिल्‍म देखी थी 'ग्‍यारह हजार लड़कियां'। उसके एक सप्‍ताह बाद ही पूर्णिया में दूसरी मगर पुरानी फिल्‍म देखने का मौका मिला 'प्‍यार की जीत'। मेरी उम्र तब बहुत छोटी थी। मुझे अच्‍छी तरह याद है कि इसके कुछ समय बाद पूर्णिया के रूपवाणी टॉकीज में 'गंगा की लहरें' के पोस्‍टर को देखकर मैं खो गया था। पोस्‍टरों ने मुझे एक मायावी दुनिया में पहुंचा दिया था। उसी दिन पहली बार जेहन में आता था कि क्‍या मैं फिल्‍में नहीं बना सकता। जवाब खुद ही मिला कि 20-22 की उम्र हो जाए तब सोचना। कुछ भी करने के लिए बंबई जाना पड़ेगा, जो तब किसी भी रूप में संभव नहीं था। 'प्‍यार की जीत' के बाद कुछ फिल्‍में और भी देखीं,लेकिन पढ़ाई को लेकर दिमाग पर इतना दबाव था कि ज्‍यादा सोच ही नहीं पाता था। मगर फिल्‍मी खबरों से साबका रोज पड़ता था। बिनाका गीत माला ने पहली बार फिल्‍म का ज्ञान दिया था। उसके बाद घर में आने वाले अखबार, सा‍हित्यिक और फिल्‍मी मैगजीन ने उस ज्ञान को और समृद्ध किया। पिताजी की दिलचस्‍पी राजनीतिक खबरों और साहित्‍य में थी, वह अ‍सर हम तीनों भाइयों पर भी आ गया। छोटे चाचा सा‍हित्‍य-प्रेमी थे,मगर वह उससे ज्‍यादा फिल्‍मों में दिलचस्‍पी रखते थे इसलिए फिल्‍मी खबरें उनसे सुनने को मिलती रहती थीं। हमारे परिवार में देव आनंद सबकी पसंद थे इसलिए देव साहब की तस्‍वीरें घर की दीवारों पर सबसे ज्‍यादा सटी मिलती थीं।
हम बिहार के ऐसे गांव में थे, जहां की आबादी बहुत घनी थी। हिंदू और मुसलमान बराबर की संख्‍या में थे। समृद्ध लोगों की भरमार थी। सात-आठ घरों में तब रेडियो हुआ करता था, जिनकी आवाज हमेशा गूंजती रहती थी। अकेला मेरा घर था, जहां ग्रामोफोन भी था। उस गांव में तब भी बिजली और सड़क नहीं थी और आज भी नहीं है। अब तो वह गांव रहा ही नहीं। कोसी नदी के गर्भ में समा गया। लोग टोलों की शक्‍ल में जहां-तहां रह रहे हैं। तब हर साल मेरा गांव चोरहली ही क्‍यों पूरा इलाका तीन महीने तक बाढ़ के पानी से घिरा और डूबा रहता था। निचले इलाके के लोग हमारे जैसे लोगों के बड़े घरों में आ जाते थे। मिलकर रहते थे। कोई अमीरी-गरीबी का भाव ऐसे समय में नहीं आता था। जीवन ऐसे चलता था जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। मुसलमान परिवार बाकी लोगों के मुकाबले ज्‍यादा रूतबे वाले थे,क्‍योंकि उनके परिवारों के लोग कमाई के लिए कलकता, गौहाटी और बम्‍बई में जाते रहते थे। हम जैसे फिल्‍मी लोगों के लिए बंबई आने-जाने वाले ज्‍यादा महत्‍व रखते थे क्‍योंकि उनके पास दिलीप साहब, देव आनंद, राजकपूर, नरगिस, सुरैया, मीना कुमारी की मानो आंखों से देखी खबरें होती थीं। वे बखान इस कदर करते कि बंबई जाने की मेरी जिद को पंख लग जाते थे। उनके पहनने के कपड़े, बोलने की स्‍टाईल, हाव-भाव काफी आकर्षक होते थे। मैंने छठी-सातवीं में पढ़ते हुए कई बार उनके साथ भागने की बात सोच ली थी।
घर से भागा जरूर लेकिन घर में पढ़ाने वाले एक मास्‍टरजी के खिलाफ विद्रोह कर। चाहा था कि सीधे बंबई चला जाऊं। लेकिन मुझे उसका कोई अता-पता नहीं था। डेढ़ महीने तक बिहार, बंगाल के अपने रिश्‍तेदारों के यहां चक्‍कर काटता रहा। जब पैसे खत्‍म हो गए तब घर लौट आया। बंबई जाने का सपना अधूरा रह गया। सच कहूं तो भागने का रास्‍ता मुझे फिल्‍मों ने ही दिखाया था, लेकिन इस दौरान डेढ़-दो महीने में दो बड़ी उपलब्धियां हाथ लगीं। पहला यह कि गुरू रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर के शांतिनिकेतन देख आया और दूसरा, यह कि हिंदी फिल्‍मों के साथ-साथ बंगला फिल्‍मों को देखने का रेकार्ड कायम कर लिया। भागलपुर, साहेबगंज, कहलगांव, पीरपैंती, कटिहार, पूर्णिया, कलकता और खास कर बिहार में पूर्णिया और कटिहार तो पूरा पूरा बंगाल ही लगता था। मैंने बंगला फिल्‍मों का जो फ्रेम देखा था, वह मेरे किशोर मन पर गहरा असर छोड़ा था। तभी जाना था कि सत्‍यजीत राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, संध्‍या राय, छवि विश्‍वास आदि राजकपूर, नरगिस, दिलीप कुमार, देव आनंद आदि से भी बड़े नाम हैं। इसी लोभ में अपूर संसार, पथेर पांचाली, विराज बहू, अपराजितो, अजांतिक सहित कई फिल्‍में देख लीं। तब एक बड़ा फर्क देखता था। बंगला फिल्‍में हिंदी के मुकाबले ज्‍यादा सीरियस होती हैं। सीधी सादी ढंग से कहानी चलती हैं। बंगला फिल्‍मों ने जो मेरे मन पर असर छोड़ा वह आज भी बरकरार है। बंगला फिल्‍मों ने ही मुझे बंगला उपन्‍यासकारों की तरफ आकर्षित किया। शरतचंद्र मेरे प्रिय लेखक बन गए। वैसा ही जीवन जीने का सपना भी देखने लगा था। कुछ हद तक जीया भी। मगर जो जीया, वह मेरे अंदर का ही भाव था। शरतचंद्र ने उसमें आवारगी को एक हिस्‍सा बना दिया।
फिल्‍में देखने का सिलसिला बाद में और भी तेज हो गया, जब वनसठवा हाई स्‍कूल को छोड़कर जवाहर हाई स्‍कूल, महेशखूंट आ गया। बड़े व्‍यावसायिक परिवार से था इसलिए पैसे की कभी कमी महसूस नहीं हुई। हाई स्‍कूल में हॉस्‍टल में रहने लगा। हॉस्‍टल का अनुशासन था मगर आजादी का अहसास भी था। वहां पढ़ते हुए अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में चिट्ठयां छपने लगी थीं। छोटी-छोटी बाल कथाएं तथा मिनी कविताओं को भी जगह मिलने लगी थी। एक तो पैसे का दबदबा और दूसरे पत्र-पत्रिकाओं में नाम छपने से मिल रही लोकप्रियता ने मुझे अचानक स्‍टार बना दिया था। स्‍कूल के सारे शिक्षक भी मुझ पर गर्व करते थे। प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, दिनकर जी, जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री, कवि आरसी प्रसाद सिंह, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, पंत जी सहित उस समय के सारे साहित्‍यकारों पर लंबा-चौड़ा व्‍याख्‍यान देने की स्थिति में होता था। जरूरत पड़ने पर सिनेमा पर धाराप्रवाह बोलता था क्‍योंकि फिल्‍मी पत्रिकाएं हॉस्‍टल में छिप-छिप कर खूब पढ़ता था। इसी कारण लड़कियां मेरी दीवानी रहती थीं। वे मुझ में फिल्‍म एक्‍टर की छाया देखती थीं। लेकिन पढ़ने की आदत ने मेरे अंदर बैठे एक्‍टर को षडयंत्र के शिकंजे में ले लिया। वहां से एक्‍टर को हटाकर राइटर को बिठा लिया। गांव के नाटकों में की हुई अदाकारी पीछे घूटती चली गई। गांव में हर साल कानपुर से नौटंकी आती थी। लगभग 15-20 दिन तक चलती रहती थी। ऐसा कोई दिन नहीं जब नौटंकी में नहीं जाता था। नौटंकी के सारे आर्टिस्‍ट मुझे बहुत प्‍यार करते थे। उनके संवादों को नौटंकी से प्रेरित होकर मैंने पहले हाई स्‍कूल में और फिर कालेज में कई नाटक लिखे, जो खेले भी गए।
हाई स्‍कूल में आने के बाद शौक बदल गए। नाटक की जगह सिनेमा ने ले लिया। ट्रेन में विदआउट टिकट न जाने कितनी बार फिल्‍में देखने के लिए खगडिया, बेगूसराय, नौगछिया, गोगरी जमालपुर और कटिहार गया। यह साप्‍ताहिक कार्यक्रम बन गया। कभी-कभी सिनेमाघर में दो से तीन फिल्‍में भी देख लेता था। कोई-कोई सिनेमाघर ऐसा भी था जहां एक टिकट में दो फिल्‍में दिखाता था। वहीं से फिल्‍मों की कहानी के बारे में सोचने लगा। फिल्‍में देखना जुनून की तरह हो गया। 1971-72 में पूर्णिया कालेज में एडमिशन ले लिया। आरएसएस के बहुत सारे लड़के मेरे साथ पढ़ते थे। कालेज में मेरी अच्‍छी शक्‍ल-सूरत और साहित्यिक दिलचस्‍पी ने मुझे कालेज में सबका चहेता बना दिया था। मेरी यह छवि आरएसएस के लोगों को अच्‍छा नहीं लग रही थी। वे मुझे गंभीर बनाना चाहते थे तथा जिम्‍मेदार भी। इसलिए वे किसी भी तरह मुझे पकड़ना चाहते थे। मैं उनकी बातों में आ गया और खुद को अपने सांचे से अलग हटाकर उनके सांचे में डाल दिया। यह भी षडयंत्र ही था। मेरे दोनों बड़े भाई तब नाराज भी हुए थे। इसलिए कि बड़े भैया मार्क्‍सवादी थे और मंझले भाई लोहियावादी, इंटरमीडियट के बाद हिंदी ऑनर्स ले लिया। जितने भी लेक्‍चरर थे, सबने समझाया कि साहित्‍य तक ही रहो तो ज्‍यादा ठीक है। सिनेमा को उसी नजरिए से देखो मगर मैं संघ के जाल में फंस गया। विद्यार्थी परिषद का नाम संभाल लिया। आंदोलन स्‍वभाव बन गया। सिनेमा देखना हालांकि तब भी कम नहीं हुआ, मगर संघ के प्रचारकों से यह बार-बार तोहफा मिली कि नौजवानों बच्‍चों पर क्‍या यही छाप छोड़ोगे? जब 1974 का आंदोलन में 1975 की इमरजेंसी में राजगीर समांतर लेखक सम्‍मेलन से जिस दिन गुलाबबाग (पूर्णिया) लौटा, उसी दिन पुलिस ने मुझे रात में होटल में खाना खाते समय गिरफ्तार कर लिया।
काफी समय बाद जेल से छूटने पर मैंने सबसे पहला काम किया वह फिल्‍म देखना था। बहुत दनों बाद लगा कि अपनी पुरानी जगह पर वापसी कर रहा हूं। उस दौरान बार-बार सोचा कि इमरजेंसी पर फिल्‍म बनाने जैसी कोई कहानी अवश्‍य लिखूंगा। जेल में मेरे साथ ज्‍यादातर आरएसएस तथा सर्वोदयी लोग थे। कुछ मार्क्‍सवादी और नक्‍सलवादी समर्थक थे। इनके साथ घंटों बहस चलती रहती। हर रात जेल में सामूहिक बहस का कार्यक्रम रखा जाता था। जब बहस के लिए विषय कम पड़ने लगते तब मेरे सुझाव पर फिल्‍मों को बहस का केंद्र में ले आया गया। सारे क्रांतिकारी लोग ध्‍यान से फिल्‍मों के बारे में सुनते थे। तब देशभक्ति वाले गीतों में साथ-साथ फिल्‍मी गीत भी खूब गाए जाने लगे थे। फिल्‍मी बातों से हर आदमी का छुपा हुआ चेहरा परत-दर-परत खुलने लगा था। हर किसी के पास फिल्‍में देखने का अनुभव था। फिल्‍मों ने उन्‍हें प्रेम-मुहब्‍बत का मतलब और तरीका भी सिखाया था। तब मेरे गहरे मित्र बने चुके मार्क्‍सवादी नेता चंद्रकांत सरकार (जो अब इस दुनिया में नहीं हैं) ने शायद व्‍यंग्‍य में कहा था कि जीवन इतना रंगीन भी होता है, मुझे कभी पता ही नहीं चला।
बहरहाल जिस दिन मैं जेल से छूटा था, अपने दोस्‍तों, परिवारों से मिलने के बाद सीधे सिनेमाघर का रास्‍ता पकड़ा था। यह काम मैं अमूमन हर परीक्षा के दौरान पहले भी करता रहा था। पेपर देकर निकलता और सीधे सिनेमा देखने चला जाता। 1976 में बी. ए. का एग्‍जामिनेशन सेंटर कटिहार पड़ा था। हर दिन शाम को फिल्‍म देखने जाता था। साथी-संगी कहने लगे कि सिनेमा मेरी कमजोरी है जब कि मैं मानता था कि वही मेरी मजबूरी है। पटना विश्‍वविद्यालय से एम. ए. करने गया। पढ़ाई के समांतर सिनेमा को रखा। वह मेरे खाली समयों का ही नहीं, व्‍यस्‍त क्षणों का भी साथी बना रहा। तब तक दिल और दिमाग का भी दायरा बड़ा हो चुका था।
लेकिन एक बात मेरे अंदर आज भी बैठी हुई है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का नहीं, बदलाव का भी माध्‍यम है। यह बेचैनी मुझे मथ रही है कि सिनेमा को आज के फिल्‍मकार ही हल्‍के तौर पर लेते हैं जब कि समाज उसे गंभीरता से लेता रहा है। पहले वो खास तौर पर बंगाली फिल्‍मकारों ने सिनेमा को कथात्‍मक और सामाजिक ऊंचाइयां दीं, जबकि पंजाबी फिल्‍मकारों ने उसे सिर्फ व्‍यवसाय का साधन बना दिया। यही वजह है कि उनकी फिल्‍में मिक्‍स वेजिटेबल हो जाती है।
सिनेमा का असर क्‍या होता है, यह तमिलनाडु में मैंने खुद भी देखा था। हिंदी विरोध के नाम जो सबसे पहला कदम उठता गया वह हिंदी फिल्‍मों के प्रदर्शन पर रोक का था। वर्ष 1966-67 की बात है जब डा. लो‍हिया हिंदी की तरफदारी कर रहे थे और उधर बंगाल में किसी कारण हिंदी का विरोध हो रहा था। मेरे दादा जी के छोटे भाई कलकते में रहते थे। उनकी मृत्‍यु संभवत: 1966 में हो गई थी। मेरे दादाजी अपने साथ श्राद्ध कर्म में भाग लेने के लिए मुझे भी कलकता ले गए थे। वहां काफी दिनों तक रहने का मौका मिला। मगर ऊब इसलिए गया था कि थियेटरों में हिंदी फिल्‍मों के के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई थी। कुछ मामला ठंडा हुआ तो कुछ भोजपुरी फिल्‍मों को चलाने की इजाजत दे दी गई। मैं भोजपुरी नहीं जानता था लेकिन भोजपुरी फिल्‍मों को देखना भी मेरे लिए 'मदर इंडिया' और 'आन' देखने जैसा था। अपनी रिश्‍तेदारों के साथ कुछ बंगला फिल्‍में भी देखीं।
1981 में एम.ए. की परीक्षा देकर पटना से सीधे दिल्‍ली चला गया। यह एक बड़ी गलती थी। तब पटना से मेरे दो मित्र आलोक रंजन और सुमन सरीन बम्‍बई के लिए चल चुके थे। हम तीनों फिल्‍मों के शौकीन थे। लेकिन पढ़ाई के दौरान कई पत्रिकओं के लिए पालीटिकल रिपो‍र्टिंग करता था, उसी ने मुझे दिल्‍ली जाने के लिए बाध्‍य कर दिया था। कई छोटे-छोटे पत्रों में काम किया। मगर लक्ष्‍य था टाइम्‍स ग्रुप में जाने का। 1982 के शुरू में टाइम्‍स डेली के लिए फाइनेंस्‍ट इंटव्‍यू देने बंबई गया। सोचकर गया था कि बंबई में तय करूंगा कि फिल्‍म पत्रकारिता करती है या राजनीतिक। मगर सारी उम्‍मीदों पर झटका लग गया। इटरव्‍यू अच्‍छा हुआ लेकिन जनसंघी होने का आरोप तब के नभाटा के संपादक आनंद जैन ने इस तरह लगा दिया कि धर्मवीर भारती के बीच-बचाव के बावजूद मेरा चयन नहीं हुआ। हम दोनों दिल्‍ली लौट गए। लेकिन जब तक बंबई में रहे, थियेटरों के छक्‍के छुड़ा दिए। फिल्‍में नहीं देखी सिर्फ सिनेमाघरों के चेहरे देखे। इसलिए सपने अगर साकार होंगे तो उसके गवाह थियेटर ही बनेंगे। खुद में ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास, सलीम-जावेद, अली राज, नवेंदु घोष आदि को देखने लगा था।
एक जो अहम बात है, उसकी चर्चा के बिना सब कुछ अधूरा लगेगा। बचपन से लेकर हाई स्‍कूल तक जितनी भी फिल्‍में देखीं - वह यादगार इसलिए भी है क्‍योंकि कभी भी शांति से टिकट नहीं मिला। ग्रुप में जाता था और पूरी मस्‍ती लेता था। सीटों पर रूमाल या गमछा रखकर कब्‍जा करता था। सीटी भी बजाता था लेकिन जिम्‍मेदारी के साथ। आज वैसा दृश्‍य मुंबई में नवरंग जैसे थियेटर में देखने को मिलता है जहां भोजपुरी फिल्‍में दिखाई जाती हैं। लेकिन इस सीटी और उस सीटी में फर्क है।
पहले की वह युवा हूं कि देव आनंद मेरे प्रिय एक्‍टर रहे हैं। मुझे तब रोमांटिक एक्‍टर और रोमांटिक कहानियां बहुत पसंद थी। वैसे सबसे ज्‍यादा प्रभावित हुआ राज कपूर से और फिर गुरु दत्‍त से। दिलीप कुमार मेरी पहुंच से काफी दूर रहे। हां, राजेश खन्‍ना की अदा मुझे अच्‍छी लगती थी। इनकी 'आनंद' और 'आराधना' न जाने किती बार देखी होगीं। सबसे ज्‍यादा बार 'गाईड' देखी है। शायद 14-15 बार।द्य उसके बाद 'तीसरी कसम' को देखने का रिकार्ड तोड़ा। 'देवदास', 'आवारा', 'बरसात', 'याराना' , 'तेरे घर के सामने', 'राम और श्‍याम', 'हम दोनों', 'ज्‍वेल थीफ', 'मुगलेआजम', 'संगम', 'अंदाज', को भी बार-बार देखा।
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि तब छोटे शहरों में रिक्‍शा, घोड़ागाड़ी पर फिल्‍मों की पब्लिसिटी होती थी। हम उसके पीछे-पीछे भी दौड़ते रहते थे। गानों के बीच-बीच में एनाउंसर की आवाजें दूर-दूर तक गूंजती रहती थीं। पोस्‍टर देखना भी फिल्‍म देखने से कम नहीं लगता था। सिनेमा को लेकर मेरे घर में न जाने कितनी शिकायतें लोगों ने मेरे बड़ों में की होंगी, मगर मुझे परिवार से हल्‍की झिड़की के अलावा कभी बड़ी डांट नहीं मिली। इसलिए कि सिनेमा की समझ रखने वाले सारे लोग थे।
एक ऐसा दौर भी आया था जब व्‍यावसायिक सिनेमा के मुकाबले मुझे समांतर, प्रयोगधर्मी, कलात्‍मक फिल्‍में ज्‍यादा पसंद आने लगी थीं। वह पसंद आज ज्‍यादा मजबूती के साथ बरकरार है। सई परांजपे, श्‍याम बेनेगल, मुजफ्फर अली, सथ्‍यू की दृष्टि को सलाम करता था।
मगर सबसे ज्‍यादा सलाम तब के गीतकारों, संगीतकारों और गायकों को करता था जिनके गानों के कारण फिल्‍में हिट हुआ करती थीं। फिल्‍मों को लोग देखें, गाने सबसे ज्‍यादा प्रेरित करते थे।

पसंद की फिल्‍में
1 अंकुर
2 शोले
3 बाइड
4 प्‍यासा
5 मुगलेआजम
6 बरसात
7 आनंद
8 तीसरी कसम
9 लगान
10 कागज के फूल

Thursday, May 7, 2009

रामू के रण में जन गण मन

जन गण मन रण है
इस रण में ज़ख्मी हुआ है
भारत का भाग्यविधाता

पंजाब सिंध गुजरात मराठा

एक दूसरे से लड़कर मर रहे हैं
इस देश ने हमको एक किया
हम देश के टुकड़े कर रहे हैं
द्रविड़ उत्कल बंगा

खून बहा कर
एक रंग का कर दिया हमने तिरंगा

सरहदों पे ज़ंग और
गलियों में फसाद दंगा

विन्ध हिमाचल यमुना गंगा
में तेजाब उबल रहा है

मर गया सब का ज़मीर
जाने कब जिंदा हो आगे

फिर भी तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशीष मांगे

आग में जल कर चीख रहा है
फिर भी कोई सच को नहीं बचाता

गाहे तव जय गाथा

देश का ऐसा हाल है लेकिन
आपस में लड़ रहे नेता

जन गण मंगल दायक जय हे

भारत को बचा ले विधाता

जय है या यह मरण है
जन गण मन रण है


Monday, May 4, 2009

कुछ खास:देव डी की रूपांतर प्रक्रिया-अनुराग कश्यप

अनुराग कश्यप ने पिछले दिनों पुणे में देव डी की रूपांतर प्रक्रिया के बारे में बात की थी.यह पोस्ट उसी की प्रस्तुति है...
मसलन पारो के लौट के आने का सीन था। मैंने सीधा-सीधा पूछा उनसे कि ये लडक़ी लौट कर आती है, पारो, जो हुआ देव के साथ, देव ने उसे अपमानित किया और बाद में रियलाइज करता है, वो लौट कर आती है। देव जब बोलता है - यू मेक लव टू मी। सवाल था कि क्या वह उसके साथ सोएगी? लड़कियों ने कहा कि वह सोएगी और देव को ऐसा आनंद देगी कि वह जिंदगी भर याद रखे। फिर मैंने अपने दिमाग में सोचा कि उस सीन तक जाऊं की नहीं जाऊं? फिर मैंने मां से बात की।
देवदास के बारे मुझे ऐसा लगता रहा है कि यह शरत बाबू का सबसे कमजोर उपन्यास है। साहित्य के लिहाज से,लेकिन सबसे ज्यादा रॉ और सबसे ज्यादा ईमानदार भी है कहीं न कहीं। शायद वे तब तक परिपक्व नहीं हुए थे, जब उन्होंने देवदास लिखी थी। देवदास मैंने बहुत पहले पढ़ी थी, जब मैं कालेज में था। उसके बाद मैंने कभी देवदास नहीं पढ़ी। फिल्म बनाने से पहले भी नहीं पढ़ी। कई चीजें आपको याद रह जाती हैं। और कई चीजें उतनी याद नहीं रहतीं। मैं जानबूझ कर उनसे परे रहना चाहता था। अभय देओल ने एक बार फुटबॉल मैच देखते हुए मुझे एक अजीब सी कहानी सुनाई थी। एलए में एक स्ट्रिपर मूनलाइट बार है। मूनलाइट बार बोलते हुए उसने मेरी तरफ देखा … मुझे समझ में नहीं आया। स्टीफन नाम का एक लडक़ा है, आता है,ह उस बार में बैठता है, उसको देखता है … उसने मुझे कहानी सुनाई …उस समय तक हम ने थोड़ी पी रखी थी। मुझे इतना सा याद है कि उस ने पूछा,बता क्या है? मैंने कहा, नहीं मालूम। उसने कहा, मूनलाइट बार है। फिर भी मेरी समझ में नहीं आया। मैं उठ गया। लेकिन जैसे ही उस ने कहा चंद्रमुखी … तुरंत दिमाग में आया देवदास। उसके बाद आधे घंटे तक मैं कुछ बोल नहीं सका। अचानक ऐसा होता है न कि सारे दरवाजे खुल गए हों। हमेशा मेरे पिता जी को मेरी फिल्में पसंद नहीं आतीं। उनको मेरी अब तक कोई फिल्म पसंद नहीं,यहां तक कि देव डी भी। उन्होंने देव डी देखने के बाद भी तीन घंटे तक बात नहीं की। मैंने पूछा, आपने देखी, कैसी लगी? उन्होंने कहा, बेटा … सब लोग बोलते हैं अच्छी है तो अच्छी है।
मेरे पिता जी हमेशा से बोलते हैं कि पांच बैन हो गई, ब्लैक फ्रायडे बैन हो गई , गुलाल रूक गई, बेटा एक लव स्टोरी बना ले। मैं लव स्टोरी बनाऊंगा तो मैं वही बना सकता हूं जो मैं जानता हूं। जैसा मैंने एक्सपीरियेंस किया है। हिंदी सिनेमा में जब मैं पर्दे पर प्रेम कहानियां देखता हूं तो मैं रिलेट नहीं कर पाता हूं। मैं उन से एकदम से रिलेट नहीं कर पाता हूं। मुझे तो यह भी नहीं समझ में आता है कि हीरो-हीरोइन एक-दूसरे को छूते भी क्यों नहीं? एक-दूसरे से प्यार करते हैं और एक-दूसरे को छूते ही नहीं हैं। जब वो एक-दूसरे से गले मिलते हैं तो अचानक हीरोइन का हाथ अपने सीने पर आ जाता है। हिंदी सिनेमा का यह दृश्य मुझे हमेशा से अखड़ा है। मैं मजाक नहीं कर रहा हूं। बहुत सीरियस हूं मैं। जब दो लोगों को देख कर लगता नहीं है कि वे आपस में प्यार करते हैं तो प्रेम कहानी का क्या आनंद आएगा ? मैं हमेशा देखता हूं कि डायरेक्टर ने बोला कि यहां देखो, यहां पकड़ो। वो फीलिंग अंदर से नहीं आती है। कहीं न कहीं वो सेंस ऑफ रियलिज्म नहीं है।
मैं तो छोटे शहर में बड़ा हुआ हूं। हमलोग इस तरह से बात भी नहीं करते हैं। हमारे यहां तो ऐसा होता है अगर कोई लडक़ी पसंद आ जाती है, लडक़ी को शादी तक क्या आज तक भी पता नहीं होगा कि वो किसी को पसंद आई थी। दोस्त लडकियों को देख -देख कर ही बांट लेते थे कि वो तेरी है, ये मेरे लिए सही है। हमेशा से वो चलता था। जब उसकी शादी होती थी तो हमलोग उसके प्रेमी के साथ में बैठकर शराब पीते थे और रोते थे … वो गाना होता था, वही एक गाना दिमाग में रहता था। मुझे उस गाने से सख्त चिढ़ हो गई थी। घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूं मैं। जब भी वह गाना सुनते थे तो हम देवदास की स्थिति में चले जाते थे।
देवदास की बात करूं तो ये था कि विक्रम मोटवानी,जो संजय लीला भंसाली के 'देवदास' के एसोसिएट डायरेक्टर थे। वो देवदास का बहुत कट्टर फॉलोअर है। जब मैंने कहा कि मैं इस तरह से बनाना चाहता हूं। आज जो हो रहा है और आज जिस तरह से लोग प्यार को देखते हैं। आज जिस तरह … मुझे जो करना है वो मैं करूंगा। वह बहुत नाराज था। उसने कहा कि ऐसे नहीं कर सकते। मैंने कहा कि तू जैसे करना चाहता है वैसे लिख। उसके बाद मुझे दे दे। फिर मुझे जो करना होगा करूंगा। उसने शरत बाबू के उपन्यास का आधुनिक संदर्भों में रूपांतर किया। बहुत सारी चीजें वैसे ही हैं। मुझे बहुत सारी कहानियां कहनी थी। वो कहानियां जो मुझे कहीं न कहीं कचोटती थीं या परेशान करती थीं।
बाकी जो पहली चीज दिमाग में आई थी, वो थी कि शरत बाबू के 1917 का पतनशील कोलकाता आज दिखाना हो तो कहां दिखएंगे? कौन सी जगह हो सकती है। पहला ख्याल दिमाग में आया वो था गोवा, उसके बाद पहाडग़ंज। पहाडग़ंज से मैं वाकिफ था। जब मैं दिल्ली में हंसराज कॉलेज में पढ़ता था तो वहां पर अक्सर जाया करता था। हम सोलह-सत्रह साल के थे, वहां इसलिए जाते थे क्योंकि वहां गांजा मिलता था। दूसरा लड़कियों को देखने जाते थे । मैंने तब तक वैसी लड़कियां नहीं देखी थीं। सब कहते थे कि पहाडग़ंज चलो। वहां रूसी लड़कियां आती हैं। ये सारे कारण थे। हमार सेंसिबिलिटी वैसी थी। हम पहाडग़ंज जाते ही थे। पहाडग़ंज का माहौल तब से बहुत कुछ बदल चुका है। दो गलियां है। नियोन लिट गलियां हैं। वहां पर सारे होटल आज कल केवल विदेशियों को मिलते हैं। वहां ऐसा पतन है कि अंदर घुसेंगे तो फिर निकलना बहुत मुश्किल है। कहते हैं विदेशों से आए युवक वहां खुद की खोज करते हैं। भारतीय अध्यात्म की शुरूआत वहीं से होती है। वहां जाकर वो तय करते हैं कि उनको गोवा जाना है या कहां जाना है। ये सारी चीजें लिखते समय दिमाग में थीं । विजुअली वो गली मेरे दिमाग में थी। मुझे मालूम है, वहां जाकर मुझे कहना है। जो दूसरी बात थी, जो देवदास का सार है। देवदास अपनी चिंता और अपराधबोध से ही परेशान नहीं है, उसके अंदर कन्फ्यूजन भी है। वो बहुत सारे चीजों से लुढक़ रहा है। जिसका जवाब उसके खुद के पास नहीं है। उसे खुद नहीं मालूम कि वो क्या हो रहा है। कहीं न कहीं वो एक हद तक सुन्न हो चुका है, वो रिएक्ट नहीं कर पाता है, वो एक्सप्रेस नहीं कर पाता है। मैं नहीं चाहता था कि देवदास सारी बातें करे। मैं चाहता था कि उसकी पीडा आंतरिक हो। पहले ड्राफ्ट में बहुत बोलता था देवदास। मैंने पंक्तियां काटनी शुरू की। समस्या थी कि उसके अंदर की चिंता और अपराधबोध को कैसे व्यक्त किया जाए। उसके लिए हम ने हिंदी सिनेमा का वह टूल इस्तेमाल किया,जो बाहर का कोई और सिनेमा नहीं दे सकता। संगीत वह माध्यम बना। संगीत के जरिए ही उसकी चिंता और अपराधबोध और बाकी सब कुछ व्यक्त हुआ। और वो सारी कहानी तीन किरदारों की यात्रा है। देवदास की कमजोर कड़ी मुझ हमेशा पारो लगती है। देवदास पढ़े ते ऐसा लगेगा कि देवदास चंद्रमुखी के पास क्यों नहीं चला जाता? चंद्रमुखी और पारो कहानी को आगे बढ़ाती हैं। देवदास कहीं न कहीं स्थिर है। वो कहीं नहीं हिलता है, वो एक ही जगह अटका हुआ है। मैंने ये सारे कैरेक्टर को स्थापित किया। मुझे वो भी याद था कि… मैं रिसर्च कर रहा था तो पता चला था कि 'साहब बीवी और गुलाम' को जब ऑस्कर के लिए भेजा था इंडिया से तो ऑस्कर एकेडमी ने ये सोच कर रिजेक्ट किया था कि इसकी अवधारणा ही पश्चिम से मेल नहीं खाती । इस फिल्म का पूरा वजूद इसी पर है कि छोटी बहू शराब पीने लग जाती है और उसके बाद वो किस तरह से गिरती जाती है। हमारी सोसायटी में औरतें शराब पीती हैं । उसकी अनुमति भी है और आम बात है। आपके लिए यह बहुत बड़ा मुद्दा होगा। हमारे लिए खुद को इस से जोड़ पाना मुश्किल है।
मेरी चिंता यह भी थी कि आज खुद को बर्बाद करने के लिए कोई क्या करेगा? आज का सेल्फ डिस्ट्रक्शन यही हो सकता है कि वह ड्रग्स लेने लगे। वो कहीं जाने लगता है। वो रैंडम रिलेशनशिप में भी पड़ता है। वो कहीं भी आता है, किसी के साथ भी जाता है, उसको पता ही नहीं वो कर क्या रहा है। वो चले जा रहा है, वो चले जा रहा है, उसको नहीं मालूम है कि कहां है, दीवार आएगी तो वो रूक जाएगा। नहीं आएगी तो चलता रहेगा। कहीं भी भीड़ जाएगा। वो स्टेट ऑफ माइंड कैप्चर करने के लिए हमलोगों ने स्क्रिप्ट के साथ सीधा कम्पोज करना शुरू किया। लोकेशन भी साथ-साथ में, सारी चीजें साथ-साथ चल रही थीं। ये सारी कहानियां, सारे लोकेशन… लिखने के बाद जो इंडीविजुअल सीन थे… जहां पर सेक्सुअलिटी की बात आई। सबसे बड़ा सवाल ये था कि कितना बोलें और कितना न बोलें। सबको दिक्कत है कि ये सब क्यों है इस फिल्म में। ये सब क्या दिखा रहे हो। मुझे जो होता है वाकई, जिस तरह से बात करते हैं, वह लेकर आना है। कई बार ऐसा लगता है कि हमें मालूम है कि आज के बच्चे कैसे सोचते हैं, कैसे नहीं सोचते हैं। लेकिन हम हमेशा गलत होते हैं। मैंने क्या किया? मैंने पूरी टीम जो हायर की थी उस समय,उनसे बात की। फिल्म शुरू होने के पहले, हमारे प्रोडक्शन में काम करने वाली दो-तीन जो लड़कियां थीं, 21-22 साल की, मैंने उनके साथ बैठकर डिस्कश करना शुरू किया। बाकायदा इस लेवल पर किया था कि तुम्हारे साथ ऐसा होता तो तुम क्या करोगी। उनके ऐसे जवाब थे, जो सारे डाल देता तो लोग घबरा जाते। मसलन पारो के लौट के आने का सीन था। मैंने सीधा-सीधा पूछा उनसे कि ये लडक़ी लौट कर आती है, पारो, जो हुआ देव के साथ, देव ने उसे अपमानित किया और बाद में रियलाइज करता है, वो लौट कर आती है। देव जब बोलता है - यू मेक लव टू मी। सवाल था कि क्या वह उसके साथ सोएगी? लड़कियों ने कहा कि वह सोएगी और देव को ऐसा आनंद देगी कि वह जिंदगी भर याद रखे। फिर मैंने अपने दिमाग में सोचा कि उस सीन तक जाऊं की नहीं जाऊं? फिर मैंने मां से बात की। मेरी मां रूढिवादी महिला है। मैं एक दिन के लिए बनारस गया। मेरी मां छोटे शहर की औरत है। मैंने मां से पूछा कि पारो क्या करेगी? मां ने कहा, मैं नहीं जानती। फिर मैंने उनसे हां या ना में जवाब लिए। जैसे कि पूछा किस करेगी? नहीं करेगी। वो तो कभी नहीं करेगी। मां का जवाब था। उस तरह से यह फिल्म लिखी गई थी।
उसके बाद जो हमारा प्रोसेस है शूट करने का, हमलोग नैचुरली जैसा माहौल है वैसा ही रखेंगे और उसमें अपने पात्रों को डालेंगे। कैमरामैन से कहा कि कैमरा छिपा लो। पात्रों को डालो और शूट करना शुरू कर दो। बहुत ही कम लाइट और बिना किसी को पता चले हमलोग शूट कर रहे हैं। हमलोग उस तरह से कैमरा लेकर शूट करते हैं। बहुत सारे रिएक्शन वास्तविक हैं। कैमरा चलता रहा। चंद्रमुखी को वहीं की लडक़ी समझ कर लोग लुभा भी रहे थे। मैंने वो भी शूट किया था। एक शॉट है जिसमें पुलिस वाला हफ्ता ले रहा है। वह वास्तविक पुलिसवाला है, जो एक्टर लगता है। हमलोगों ने तय किया था कि जो चीजें जैसी हैं, वैसे ही एक्सपलोरर करें। माहौल को बिल्कुल टच न करे। जो माहौल है वह मिले और कहानी को उसकी जमीन मिल जाए। म्यूजिकल इसलिए है कि जो कुछ वह कहना चाहता है, वह कह नहीं पा रहा है। वो हमारे पास एक एडवांटेज होता है उपन्यास में, स्टेट ऑफ माइंड। जब सिनेमा में जाते हैं, तो उसकी डिटेलिंग मुश्किल काम होता है । स्टेट ऑफ माइंड को रख नहीं पाते। वह बहुत बड़ा लॉस होता है। उसके लिए म्यूजिक रखा। उसकी मानसिक अवस्था को संगीत से बताया। देव डी की यह प्रक्रिया रही।

Sunday, May 3, 2009

लोकतंत्र का प्रचार

-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म स्टारों के इस भ्रम को बाजार अपने स्वार्थ की वजह से मजबूत करता है कि लोकप्रिय सितारों की संस्तुति से उत्पादों की बिक्री बढ़ती है। हालांकि अभी तक इस बात को लेकर कोई ठोस शोध और सर्वेक्षण उपलब्ध नहीं है कि फिल्म स्टारों के विज्ञापन किसी उत्पाद की बिक्री में कितने प्रतिशत का उछाल लाते हैं? सार्वजनिक जीवन में फिल्म स्टारों की उपयोगिता बढ़ी है। जनहित के कई विज्ञापनों में फिल्म स्टारों का उपयोग किया जा रहा है। सारे लोकप्रिय और बड़े स्टार ऐसे विज्ञापनों को अपना सामाजिक दायित्व मानते हैं। इस बार चुनाव की घोषणा के साथ ही आमिर खान समेत फिल्म बिरादरी के अनेक सदस्यों ने सक्रियता दिखाई। वे विभिन्न संस्थाओं के जागरूकता अभियानों से जुड़े। सभी इस बात को लेकर निश्चित थे कि मतदाताओं को जागरूक बनाने में फिल्म स्टार सफल रहेंगे। कुछ सिने स्टारों ने इस दिशा में काफी प्रयास भी किया। उन्होंने वोट देने से लेकर प्रत्याशियों के चुनाव तक में सावधानी बरतने तक की सलाह दी। एड व‌र्ल्ड के पंडितों की मदद से श्लोक गढ़े गए और विभिन्न माध्यमों से उनका गुणगान किया गया। रेडियो, टीवी, अखबार, बैनर और पोस्टर के जरिए जोरदार अभियान चलाया गया।
चूंकि अधिकांश फिल्म स्टार मुंबई में रहते हैं इसलिए उनकी गतिविधियों का केंद्र मुंबई ही रहता है। किसी भी सामाजिक कार्य, चैरिटी, जनहित और लोकोपकारी कार्य के लिए फिल्म स्टार अपने खाली समय के कुछ घंटों का ही अपनी सुविधा से इस्तेमाल करते हैं। हमेशा बताया जाता है कि समय की कमी और सुरक्षा की दिक्कतों के कारण वे सुदूर इलाकों में नहीं जा सकते। आप गौर करें तो मुंबई, दिल्ली और कभी-कभी कोलकाता में ही इनकी गतिविधियां संपन्न होती हैं। चेन्नई भी उनकी सक्रियता क्षेत्र में शामिल नहीं है। वास्तव में फिल्म स्टारों का सामाजिक दायित्व उनकी फिल्मों के दर्शकों तक ही सीमित रहता है। हिंदी फिल्म स्टारों का एक बड़ा दर्शक वर्ग इन महानगरों में ही है, खास कर उनका प्रभाव क्षेत्र मल्टीप्लेक्स के दर्शकों के दायरे से बाहर नहीं जाता। यही कारण है कि वे किसी भी प्रचार या अभियान के लिए महानगरों से बाहर नहीं निकलते। उन्हें मालूम है कि इलाहाबाद, पटना या जबलपुर जैसे शहरों के दर्शकों की जेबें खाली हैं, इसलिए वहां तक जाने की जहमत कोई क्यों करें? इस तरह देखा जाए तो चुनाव के बहाने अभिनेताओं ने अपनी मार्केटिंग भी की। फिल्म सितारे भूल गए कि मनोरंजन और मतदान, दो चीजें हैं। उन्हें यह गलतफहमी रही कि जैसे वे दर्शकों को सिनेमाघरों में खींच लाते हैं वैसे ही मतदाताओं को घरों से निकलने और वोट देने के लिए प्रेरित कर लेंगे। ऐसा होने की संभावना कम थी और मुंबई में मतदान के बाद जाहिर हो गया कि ऐसा हुआ भी नहीं। इस बार मुंबई में मतदान का प्रतिशत पिछले चुनाव से भी कम रहा। मीडिया विश्लेषक और इस क्षेत्र के दूसरे पंडित गर्मी, छुट्टी आदि को कारण बता रहे हैं। वास्तविकता यह है कि मतदाता लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया से विरक्त हो गए हैं। लांछन, आरोप-प्रत्यारोप और मौखिक वायदों ने उन्हें राजनीति से विमुख कर दिया है। मतदाता स्पष्ट नहीं कि राजनीतिक पार्टियां किन स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव लड़ रही हैं? मुद्दा एक ही है-सत्ता। मुंबई के मतदाताओं ने बहुमत से राजनीति और चुनाव प्रक्रिया के प्रति विरक्ति जाहिर की है। 58 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट नहीं किया। उन्होंने मीडिया के आकलन और निष्कर्षो को बेबुनियाद साबित कर दिया है। पिछले छह महीनों से मुंबई में पेज थ्री की सामाजिक हस्तियां दावा कर रही थीं कि मुंबई हमले के बाद मतदाताओं का मिजाज बदल गया है। वे इस बार राजनीतिक पार्टियों को सबक सिखाएंगे। क्या सबक सिखाया उन्होंने? यही कि चुनाव प्रक्रिया और लोकतंत्र में उनकी रुचि नहीं है।
गौर करें तो मुंबई हमले के बाद शहर के अभिजात और कुलीन वर्ग की मुखरता अराजनीतिक थी। उन्होंने तब प्रशासन, लोकतंत्र और सरकार पर उंगलियां उठाई थीं और देश को किसी तानाशाह के हाथों में सौंपने का नारा दिया था। मतदाताओं को जगाने का अभियान भी इसी प्रकार अराजनीतिक रहा। कोई भी अभियान वैचारिक पक्ष या राजनीतिक दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं कर रहा था और न ही उसे समझने पर जोर दे रहा था। सभी नैतिकता की दुहाई दे रहे थे। इन फिल्म स्टारों को कौन समझाए कि लोकतंत्र में राजनीति और विचार ही कारक तत्व होते हैं। निश्चित रूप से इस बार मतदान के संदर्भ में फिल्म स्टारों द्वारा की गई अपील निष्प्रभावी रही। उनके प्रभाव में आकर दिया जा रहा यंगिस्तान का नारा भी निराधार साबित हुआ। इसके साथ ही यह भी सिद्ध हो गया कि शहरी मतदाताओं की अपेक्षा ग्रामीण मतदाता राजनीतिक दृष्टि से अधिक जागरूक और सक्रिय हैं।