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Thursday, April 30, 2009

दरअसल:दक्षिण अफ्रीका और मिस बॉलीवुड


-अजय ब्रह्मात्मज

यह आईपीएल के संयोजक और द्रष्टा ललित मोदी के दिमाग की उपज हो सकती है। साउथ अफ्रीका में चल रहे आईपीएल-2 के लीग मैचों में स्टेडियम के अंदर दर्शकों को बुलाने और बिठाने की उन्होंने आकर्षक तरकीब सोची। उन्होंने विभिन्न टीमों के मालिकों के साथ मिल कर मिस बॉलीवुड के चुनाव की घोषणा कर दी।
ऐसा माना जा रहा है कि मिस बॉलीवुड चुने जाने की आकांक्षा से कई लड़कियां मैच देखने आ रही हैं और वे अपने साथ मित्र और परिजनों को भी 20-20 का रोमांचक क्रिकेट मैच देखने के लिए बाध्य कर रही हैं। आंकड़ों और आमदनी के ब्यौरों में 5 से 10 प्रतिशत के फर्क से संख्या और राशि बढ़ जाती है।
चूंकि आईपीएल में शाहरुख खान, प्रीति जिंटा और शिल्पा शेट्टी की भागीदारी है, इसलिए उनकी मौजूदगी से मिस बॉलीवुड के प्रति विश्वसनीयता बढ़ जाती है। मित्र और परिजनों के साथ आईपीएल देखने आ रहीं लड़कियां उम्मीद कर सकती हैं कि अगर वे कैमरे की गिरफ्त में आ गई, तो मिस बॉलीवुड बन सकती हैं। मिस बॉलीवुड की विजेता को मिलने वाली राशि से अधिक महत्वपूर्ण फिल्म में काम मिलना है। हिंदी फिल्मों में काम पाने के लिए आतुर लड़कियों को आईपीएल-2 ने एक सपना दिया है। यह सपना आईपीएल के 56 मैचों में तैरता रहेगा। केवल आठ भाग्यशाली लड़कियों को अंतिम प्रतियोगिता में शामिल होने का मौका मिलेगा और उनमें से एक बनेगी मिस बॉलीवुड।
समाजशास्त्री और अध्येता भले ही फिल्मों को हेय दृष्टि से देखते रहें और समाज के अध्ययन में उसकी उपयोगिता को नजरंदाज करते रहें, किंतु इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि फिल्में हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। कस्बों और शहरों में हम फिल्मों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते ही हैं। हिंदी फिल्मों के अभिनेता-अभिनेत्री हमारे आदर्श होते हैं। कभी वे स्वयं, तो कभी उनके निभाए किरदार हमारी एकरस जिंदगी को सरस बनाते हैं। अगर हिंदी फिल्मों की बात करें, तो तमाम आलोचनाओं और कमियों के बावजूद इसका प्रसार हुआ है। विदेशों में जहां भी भारतीय बसे हैं, वहां भारतीय व्यंजनों की तरह भारतीय मनोरंजन पहुंचा है और मनोरंजन का ऐसा सस्ता और सुलभ माध्यम कोई और नहीं है! डिजिटल क्रांति के बाद फिल्में तेजी से मूल रूप में दूर-दराज के इलाकों में पहुंच रही हैं। दक्षिण अफ्रीका में भारतवंशियों की अच्छी संख्या है। वे अपने मनोरंजन के लिए हिंदी फिल्में देखते हैं। हिंदी फिल्मों की गतिविधियों और खबरों से वाकिफ लोग जानते होंगे कि इधर साउथ अफ्रीका में ढेर सारी फिल्मों की शूटिंग हुई है। सितारों के दक्षिण अफ्रीका आने-जाने का सिलसिला बना हुआ है। वहां से लौटे स्टार और तकनीशियन बताते हैं कि स्थानीय भारतवंशी हिंदी फिल्मों के दीवाने हैं। नौ साल पहले साउथ अफ्रीका में ही आाईफा अवार्ड समारोह में आमिर खान की लगान का भव्य व‌र्ल्ड प्रीमियर हुआ था। उसके बाद ही दक्षिण अफ्रीका में हिंदी फिल्मों का प्रदर्शन तेज हुआ। हिंदी फिल्मों के प्रति स्थानीय नागरिकों के लगाव और आईपीएल से जुड़े फिल्म स्टारों को ध्यान में रख कर ही मिस बॉलीवुड की योजना रची गई है।
कहना मुश्किल है कि मिस बॉलीवुड के रूप में चुनी गई लड़की हिंदी फिल्मों के लिए काम की साबित होगी या नहीं? निश्चित ही उसे एक फिल्म मिल जाएगी और उसमें दम-खम हुआ, तो वह ग्लैमर व‌र्ल्ड में सफल पारी भी खेलेगी। आईपीएल-2 के साइड इफेक्ट के रूप में मिस बॉलीवुड का चुना जाना अच्छा ही है, क्योंकि ऐसा होने से हिंदी फिल्मों को एक और अभिनेत्री मिल जाएगी!

Tuesday, April 28, 2009

बेखौफ और स्टाइलिश फिरोज खान



जन्म- 25 सितंबर 1939
मृत्यु- 27 अप्रैल 2009
फिरोज खान का नाम सुनते ही एक आकर्षक, छरहरे और जांबाज जवान का चेहरा रूपहले पर्दे पर चलता-फिरता दिखाई पड़ने लगता है। बूट, हैट, हाथ में रिवॉल्वर, गले में लाकेट, कमीज के बटन खुले हुए,ऊपर से जैकेट और शब्दों को चबा-चबा कर संवाद बोलते फिरोज खान को हिंदी फिल्मों का काउब्वाय कहा जाता था। हालीवुड में क्लिंट ईस्टवुड की जो छवि थी, उसका देशी रूपांतरण थे फिरोज खान। नरेन्द्र बेदी की फिल्म खोटे सिक्के में बगैर नाम का किरदार निभाते हुए उन्होंने दर्शकों का दिल जीता। उसी फिल्म का गीत जीवन में डरना नहीं, सर नीचे कभी करना नहीं उनकी जीवन शैली का परिचायक गीत बन गया।
तीन साल पहले छोटे भाई अकबर खान की फिल्म ताजमहल के पाकिस्तान प्रीमियर के मौके पर वे हिंदी फिल्म बिरादरी की टीम के साथ पाकिस्तान गए थे। वहां एक प्रसंग में उन्होंने पुरजोर तरीके से ताकीद की कि भारत एक सेक्युलर देश है। वहां सिख प्रधानमंत्री और मुसलमान राष्ट्रपति हैं, जबकि पाकिस्तान मुसलमानों के नाम पर बना था और यहां मुसलमान ही मुसलमान को मार रहे हैं। मुझे अपने भारतीय होने पर गर्व है। उनकी मुखरता पाकिस्तान को रास नहीं आई थी और विावाद उठ खड़ा हुआ था।। फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे कई प्रसंग और किस्से हैं,जिन में फिरोज खान ने बेधड़क दिल की बात रखी। अपने इस बिंदास और बेखौफ मिजाज के कारण वे आलोचना के शिकार हुए और कई बेहतरीन फिल्में उनके हाथों से निकल गयीं। कहते हैं कि संगम के निर्माण के समय राज कपूर ने राजेंद्र कुमार के पहले उनके नाम पर विचार किया था।
अफगानी पिता और ईरानी मां के बेटे फिरोज खान बंगलुरू से हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे। दो-चार फिल्मों में छोटे-मोटे भूमिकाएं निभाने के बाद उन्हें 1962 में रिपोर्टर रिपोर्टर राजू फिल्म मिली। धीरे-धीरे हिंदी फिल्मों की पंरपरा में सीधे, भावुक और संवेदनशील भूमिकाओं में ढलते हुए सहज अभिनेता के तौर पर विकसित हो रहे थे। मेला, आदमी और इंसान, सफर आदि फिल्में देखते समय हम स्टाइलिश फिरोज खान की कल्पना नहीं कर सकते। उन्होंने खुद के लिए एक अलग शैली और बोली खोजी। हालीवुड की फिल्मों से प्रभावित होकर उन्होंने किरदार गढ़े और हिंदी फिल्मों के खांचे में ही उन्हें विकसित किया। पुरानी और नयी पीढ़ी के अभिनेताओं के बीच फिरोज खान एक योजक की तरह रहे। उन्हें अपने मुखर, खुले, आक्रामक और एक हद तक अहंकारी स्वभाव के कारण बदनामी झेलनी पड़ी। इसके बावजूद उन्होंने छवि सुधारने की कोशिश नहीं की। अपने लापरवाह अंदाज में जीते रहे। फिरोज खान की उस छवि का आधुनिक विस्तार विजय माल्या में दिखाई पड़ता है। बहरहाल, बाहर की फिल्मों से दरकिनार किए जाने पर फिरोज खान स्वयं निर्माता-निर्देशक बने। उन्होंने अपराध से शुरूआत की और जांनशीं तक आठ फिल्मों का निर्देशन किया। अपनी फिल्मों के जरिए उन्हीं हिंदी फिल्मों की नायिकाओं की घरेलू और छुई मुई छवि भी तोड़ी। उनकी सारी फिल्में स्टाइल, लोकेशन और भव्यता के लिए जानी जाती हैं।
शौकीन मिजाज फिरोज खान की आखिरी फिल्म वेलकम थी। वेलकम से उन्होंने अभिनय करिअर से विदाई ली। पिछले कुछ समय से वे कैंसर से पीडि़त थे। अभी कुछ दिनों पहले ही अस्पताल से डिस्चार्ज होकर वे बंगलुरू लौटे थे। लगता है मौत के समय उन्हें अपनी मिट्टी ने खींच लिया। सफर, खोटे सिक्के, अपराध, धर्मात्मा, दयावान, गीता मेरा नाम,कुर्बानी और नागिन उनकी उल्लेखनीय फिल्में हैं। कुर्बानी के रीमेक की उनकी आखिरी ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी।
- अजय ब्रह्मात्मज

Monday, April 27, 2009

हिन्दी टाकीज:वो ख्वाबों के दिन, वो फिल्मों के दिन-ज़ेब अख्तर


हिन्दी टाकीज-३३

ज़ेब अख्तर रांची में रहते हैं.वे पत्रकारिता से जुड़े हैं और फिलहाल प्रभात ख़बर में फीचर संपादक हैं। व्यवसाय छोड़ कर पत्रकारिता में आए ज़ेब अख्तर साफ़ दिल और सोच के लेखक हैं.चवन्नी ने इधर किसी पत्रकार की ऐसी खनकती हँसी नहीं सुनी। हिन्दी और उर्दू में सामान रूप से लिखते हैं.उनका एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुका है। एक शोध पुस्तक भी प्रकाशित है। ज़ेब अख्तर फिल्मों के लिए लिखना चाहते हैं। वे लीक से हट कर कुछ फिल्में लिखना चाहते हैं।
जब होश संभाला तब टीवी भी नहीं था, छोटे शहर में होने के कारण सिनेमा ही मनोरंजन का एक मात्र साधन हुआ करता था। पिताजी थे तो सख्त लेकिन इतना जानते थे कि जरूरत से ज्यादा कड़ा होना नुकसान पहुंचा सकता है। सो इस मामले में उन्होंने थोड़ी छूट दे रखी थी। गोया गीत गाता चल, हम किसी से कम नहीं, आलम आरा, नहले पे दहला, शोले, मुगल- ए- आजम जैसी फिल्में देखने के लिए हमें इजाजत मिल जाती थीं। लेकिन मन इतने से कहां मानने वाला था। हम तो सभी फिल्में देखना चाहते थे। इसलिए स्कूल से गैरहाजिर होना जरूरी था। क्योंकि रविवार के दिन हम उर्दू पढ़ने मदरसा जाते थे। वहां से गैरहाजिर होने का मतलब था मौलवी साहब जैसी कयामत का सामना। इस मामले में स्कूल के शिक्षक हमें कुछ उदार मालूम पड़ते थे जो कुछ दो- चार छड़ियां लगाकर ही मुक्ति दे दिया करते थे। स्कूल से गायब होकर सिनेमा देखने का रोमांच इस कदर हावी रहता कि यह सजा हमें बहुत मामूली लगती। और उन दिनों सिनेमा हॉल के दरबान की नौकरी हमें सबसे कीमती जान पड़ती थी। हम उसे लालायित होकर देखते। सोचा करते बड़े होने पर दरबान बनना है और सिनेमा हॉल का ही दरबान बनना है। भला ऐसा रोब और किस नौकरी में था। और गेट पर खड़ा रहने वाला टिकट चेकर तो हमारे लिए इतनी ॐची चीज था कि हम उसका स्थान लेने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। बस उसे देखते और उसकी किस्मत पर रश्क करते। हमें उन दिनों सबसे बुरा यह लगता था कि हमारे शहर में एक ही सिनेमा हॉल था। जब भी हमारे यहां कोई रिश्तेदार आते, हमारा पहला सवाल उनसे यही होता कि उनके शहर में कितने सिनेमा हॉल हैं।

खैर इस दौरान सिनेमा से जुड़े कई रोचक घटनाएं घटीं। दो का ही जिक्र करना चाहूंगा।

होता यह था कि एक तरफ हमारी दुकान और दूसरी तरफ स्कूल। जहां मैंने छठी तक की पढ़ाई की। यह तीनों चीजें अपनी- अपनी जगह पर आज भी मौजूद हैं। सिनेमा हॉल में दाखिल नहीं हो सकता। लेकिन हमने इसकी तरकीब निकाल रखी थी। सिनेमा हॉल से बाहर निकलने का दरवाजा पीछे था और वह शो खत्म होने के समय ही खुलता था। हम शो खत्म होने के समय ही उसी दरवाजे से सिनेमा हाल में दाखिल हो जाते थे। लेकिन एक दिन हम पकड़े गये। पिताजी ने मुझे पकड़ लिया। कान पकड़कर सीधे स्कूल। सभी के सामने मास्टर साहब ने पीटना शुरू किया। दरअसल उन्हें भी अपने अनुशासन प्रिय होने और अपनी छड़ी पर पूरा आत्मविश्वास था। पिटाई करते हुए वह पूछते भी जा रहे थे कि अभी कुछ मिनट पहले मैं क्लास में ही था। तो फिर सिनेमा हॉल में पहुंचा कैसे ... जबकि वह किसी शो मैटिनी या नून शो के शुरू होने का भी नहीं था। अब उन्हें क्या पता कि इस चक्कर से बचने के लिए भी हमने एक ऐसी तरकीब निकाल रखी थी। जिसकी कल्पना भी उन जैसे कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक के मस्तिष्क में नहीं आ सकती थी। दरअसल हम तीन यार थे। योजना यह बनती थी कि एक फिल्म को तीन लड़के तीन दिन में देखते थे। बारी- बारी से एक- एक घंटा। यानी एक फिल्म को हम तीन दिन में पूरी देख पाते थे, तीन किश्तों में। इस तरह क्लास में एक घंटे से अधिक की अनुपस्थिति से बचा जाता था। और किसी को शक भी नहीं होता था।

एक-एक टिकट तीन दिन ली जाती थी। यानी लागत भी उतना ही। सो मास्टर साहब हमें पीट कम और झुंझला अधिक रहे थे। लेकिन जब तक इस स्कूल में रहे यह राज, राज ही बना रहा। बता देने पर बाकी दोनों साथी भी फिल्म देखने से महरूम हो जाते। सो यह सजा मुझे उस दिन अकेले ही भुगतनी पड़ी। दूसरी घटना शोले फिल्म से जुड़ी है। हालांकि पिताजी के कोटे से यह फिल्म हम तीनों भाई पहले ही देख चुके थे। लेकिन एक वर्ष होली के मौके पर यह फिल्म हमारे शहर में आयी। हमने स्कूल की अनुपस्थिति से बचने का फैसला करते हुए शोले को होली के दिन देखने का प्रोग्राम बनाया। नून शो यानी 12 से तीन वाले शो में। लेकिन हम लोगों को इस दरम्यान होनेवाली दुगर्ति का जरा भी गुमान नहीं था। जितने बेतुके तरह से होली खेली जा सकती है, हमारे शहर में खेली जाती है। इसका हमें डर भी था। सो हमने सिनेमा हाल जाने के लिए मुख्य सड़क का रास्ता न चुनकर एक लंबा रास्ता चुना था। जिधर किसान रहते थे और वह गांव से होकर गुजरता था। हमने साफ सुथरे कपड़े पहने और चल पड़े शोले देखने। लेकिन गांव के मुहाने पर ही हम तीनों भाइयों को ग्वालों ने दबोच लिया। उनके होली खेलने का अंदाज बड़ा ही निराला था। उन्हों एक बड़े ड्रम में गोबर का घोल बना रखा था। वे हम तीनों को बारी-बारी से गोद में उठाकर ड्रम में डुबोते और निकालते। जब हमारे पूरे कपड़े और शरीर गोबरमय हो गये तो हमें छोड़। हमने पास के तालाब में स्नान किया और कपड़े किसी तरह सुखाये। लेकिन इतना होने पर भी शोले का नशा दिमाग से उतरा नहीं था। नून शो तो अभी भी नहीं देखा जा सकता था। हमने कहा चलो मैटिनी शो में देखेंगे। किसी तरह हम सिनेमा हॉल के निकट सड़क पर पहुंचे। अब सड़क पर होली खेलनेवालों की टोली ने हमें पकड़ लिया। वह लोग होली का आनंद नगरपालिका की नाली के साथ ले रहे थे। यानी एक दूसरे को नाली के कीचड़ में भिगोया जा रहा था। हमें भी नाली में डाला और फिर निकाला गया। हमें अपने आप से ही घिन आने लगी। लेकिन इसकी परवाह बिल्कुल न करते हुए हम सिनेमा हॉल की तरफ लपके। क्योंकि मैटिनी के शो समय पार हुआ जा रहा था। लेकिन हाय री किस्मत। वहां पहुंचने पर पता चला कि होली की वजह से आज का शो बंद है। हमारी जो हालत हुई उसका अंदाजा आज भी सिर्फ हम ही लगा सकते हैं। और इस घटना को याद करके जो ठहाके आते हैं, उसे भी सिर्फ हम ही लगा सकते हैं।




पसंद की दस फिल्में...

मदर इंडिया

पाथेर पांचाली

शोले

दीवार

उमराव जान(मुज़फ्फर अली)

कब्ज़ा(महेश भट्ट)

त्रिशूल(यश चोपड़ा)

पेज ३

ब्लैक

Saturday, April 25, 2009

जब वी वोट-इम्तियाज़ अली

मैं बिहार का रहने वाला हूं। राजनीति की समझ रखता हूं। मुझे देश-दुनिया की खबर रहती है। इस बार मुझे वोट को लेकर मतदाता में जागरूकता दिख रही है। यंग इंडिया का नारा मुझे अच्छा लगता है। चुनाव के समय एक जोशीला माहौल है। अलग-अलग माध्यमों से वोट और प्रत्याशियों के बारे में बताया जा रहा है। ऐसे ही एक माध्यम से मैंने अपना पंजीकरण किया है। मुझे खुशी है कि इस बार मैं मुंबई में वोट दूंगा। मुंबई और दिल्ली में रहते हुए मैंने महसूस किया है कि बड़े शहरों में युवकों को राजनीति की सही समझ नहीं है। वे इसके प्रति उदासीन रहते हैं। इस बार चल रहे विभिन्न संस्थाओं के अभियानों से उनके बीच थोड़ी सुगबुगाहट दिख रही है। वे सभी वोट देंगे तो देश की राजनीति बदलेगी। मुझे लगता है कि किसी एक पार्टी को बहुमत मिलना चाहिए। सरकार कोई भी बनाए लेकिन किसी एक पार्टी की बने ताकि वह कुछ काम कर सके। ऐसी सरकार से बाद में सवाल भी पूछे जा सकते हैं। इस चुनाव में कुछ पार्टियों में मुझे नेतृत्व संकट दिख रहा है। बड़े नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। नेतागण मुद्दों की बात छोड़ कर व्यक्तिगत आाक्षेप लगाने लगते हैं। लोकतंत्र के लिए यह अच्छा नहीं है। अगर फिल्म के लोग राजनीति में जा रहे हैं तो क्या बुराई है? जैसे कोई इंजीनियर, डॉक्टर या किसी और पेशे का व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है, वैसे ही फिल्मी हस्तियां भी राजनीति में जा सकती हैं। फिल्मों के लोग अपनी लोकप्रियता की वजह से जीत सकते हैं, लेकिन उन्हें पहले सोचना चाहिए कि क्या राजनीति में जाना उनके लिए आवश्यक है। यह नहीं हो कि चुनाव के बाद राजनीति में जाने को कोई भूल समझे।

Friday, April 24, 2009

प्रेम,अश्लीलता और युवा दर्शकों की पसंद-महेश भट्ट

बडे होने की उम्र में मैं अश्लील शब्द से अच्छी तरह परिचित था। अश्लील शब्द होते थे, अश्लील फिल्में होती थीं, लतीफे होते थे, गीत और नृत्य होते थे, अश्लील भाव मुद्राएं होती थीं और कपडे भी होते थे। उन दिनों हमारे शिक्षक स्कूल में तंग पैंट पहन कर आने पर डांटते थे और उन्हें बदलने के लिए वापस घर भेज देते थे। अगर आप स्कूल में कमीज के बटन खोलकर घूमते दिख गए तो प्रिंसिपल आपके मां-बाप को बुला कर बताते थे कि आप अनुशासित नहीं हैं। उन दिनों गुमनाम फिल्म में महमूद का गाया अति लोकप्रिय गीत हम काले हैं तो क्या हुआ अश्लील माना गया था, जबकि वह गीत युवकों के बीच बेहद प्रचलित था। यानी युवा वर्ग को जो भी पसंद हो, वह बुजुर्गो के हिसाब से अश्लील होता था।

बदलीं परिभाषाएं
अब मैं उम्र के छठे दशक में हूं। मैं बच्चों को उंगली दिखाते हुए डांटता हूं कि तुम्हें वह फिल्म कैसे पसंद आ गई? वह तो अश्लील है। मुझे याद आता है कि मेरे माता-पिता मुझे भी ऐसे ही उंगली दिखा कर डांटते थे।
क्या अश्लील है उसमें? कुछ भी तो नहीं? आजकल के बच्चे पलट कर जवाब देते हैं। हम लोग अपने समय में अभिभावकों की ऐसी डांट-फटकार सुनने के बाद चुप हो जाते थे। यह सच है कि हम जिसे अश्लील समझते हैं, उन्हें वे ऐसा नहीं मानते। मैं उन्हें एमटीवी पर चल रहे किसी म्यूजिक वीडियो के बारे में बताता हूं कि वह अश्लील है तो उनका जवाब होता है-बिल्कुल नहीं। वे मुसकरा कर कहते हैं, पापा, आप तो हर मजेदार चीज को अश्लील कहते हैं। मुझे लगता है कि वे सही कह रहे हैं। मुझे खुद में सुधार करना चाहिए। चीजों को देखने का अपना नजरिया बदलना चाहिए। आज देश की आबादी में 35 साल से कम उम्र के नागरिकों की संख्या 65 प्रतिशत है। भारत युवकों का देश है। वे तय कर रहे हैं कि क्या अश्लील है और क्या नहीं? पिछले दो दशकों में सौंदर्य बोध तेजी से बदला है। यह बदलाव पिछली सदी के बदलाव से अधिक नाटकीय है। आज की दुनिया में हम दिन-रात सिनेमा और टीवी पर दिख रही छवियों का उपभोग कर रहे हैं। उन छवियों का वास्तविक निर्धारण आज के युवक कर रहे हैं, क्योंकि वे ही इसके उपभोक्ता हैं। वे ही इन छवियों को खरीद रहे हैं। इन युवकों ने ही अश्लील समझे जाने वाले हिमेश रेशमिया, राखी सावंत और राजू श्रीवास्तव को 21वीं सदी में अपार सफलता दिला दी है।

युवाओं के लिए बन रहे हैं कार्यक्रम
चालीस से अधिक की उम्र के लोग शिकायत करते रहे हैं कि टीवी पर कुछ भी देखने लायक नहीं है और इसमें किसी परिवर्तन की उम्मीद भी नहीं दिखती। टीवी कार्यक्रमों की तैयारी ही तीस साल से कम उम्र के दर्शकों को ध्यान में रख कर की जा रही है। इन दिनों हर टीवी नेटवर्क इस बात पर जोर दे रहा है कि प्राइम टाइम के कार्यक्रमों में यूथ अपील हो। इसकी वजह यही है कि प्राइम टाइम के दर्शकों में सबसे ज्यादा युवक हैं और इन युवकों को अपने चैनलों से जोडकर वे टीआरपी बढाना चाहते हैं। अगर आप टीवी के नियमित दर्शक हैं तो आपने महसूस किया होगा कि सारी विज्ञापन फिल्में युवकों को आकर्षित करने की कोशिश कर रही हैं। डेली सोप में मां और दादी-नानी की भूमिकाओं में युवा अभिनेत्रियों को ही चुना जाता है। सिर्फ उनके बालों पर सफेद धारी लगा दी जाती है। एक टीवी प्रोड्यूसर ने स्वीकार किया कि युवा दर्शक चाहते हैं कि टीवी सीरियलों में बुजुर्गो की भूमिकाएं भी जवान हों। 35 साल से कम उम्र की पीढी बाजार के लिए सोने की खान हो गई है। मुझे नहीं लगता कि मेरी बेटी को यह एहसास होगा कि लालची उद्यमी उसकी निजी जिंदगी और मिथकों को ढाल रहे हैं ताकि पैसे कमा सकें। मुझे नहीं लगता कि विज्ञापनों में झूठ को वह पकड पाती होगी। मुझे नहीं लगता कि उसे इसका रत्ती भर भी एहसास होगा कि वह बाजार बन चुकी है, जिसका कुछ लालची उद्यमी इस्तेमाल कर रहे हैं।

नए मूल्यों का आरंभ
फिल्म और टीवी के जरिये दिखाई जा रही युवकों की छवि से देश के एटीट्यूड और मूल्यों का उद्घाटन होता है। हमें उस संस्कृति की भी जानकारी मिलती है, जिसमें ऐसी छवियां गढी जा रही हैं। आप अंतरराष्ट्रीय ख्याति के सिरीज हैरी पॉटर की बात करें। इस सिरीज से युवकों की मनोभावना और जादुई सच के प्रति आज के दर्शकों की भूख को समझा जा सकता है। गुरिंदर चड्ढा की फिल्म बेंड इट लाइक बेकहम में ब्रिटेन में बसे एशियाइयों के आंतरिक सांस्कृतिक संघर्ष को समझा जा सकता है। जाने तू या जाने ना युवा पीढी के एटीट्यूड, स्टाइल, मनोविज्ञान, सेक्स की समझ और विचारों के चित्रण के कारण हिट हुई। हमारी फिल्मों में जिस रूप में युवकों का चित्रण होता है, उससे अपनी संस्कृति में युवकों के प्रति बनी धारणा भी व्यक्त होती है।
सिनेमा में विपरीत सेक्स के प्रति दुनिया भर के युवाओं की जिज्ञासा और समझ को चित्रित किया जाता है। अपनी युवावस्था में हमने जो फिल्में देखीं और बाद में जो फिल्में बनाते रहे, उन सभी में जीवन के इसी दौर का चित्रण रहा है। फिल्मकारों को युवाओं की कहानी हमेशा आकर्षित करती रही है। जवान हो रही पीढी की भावनाएं और जिज्ञासाएं सभी देशों और संस्कृतियों में लगभग एक सी रहती हैं। हमारे आरंभिक जीवन में ज्यादातर फिल्मों का विषय स्त्री या पुरुष द्वारा प्रेमी या प्रेमिका की खोज और फिर सभी प्रतिकूल स्थितियों का सामना करते हुए अपनी इच्छाओं की पूर्ति रहा है। इसकी एक साफ वजह यही हो सकती है कि सिनेमा देखने वाले युवकों के लिए प्रेम ही जिंदगी की पहली और आखिरी चाहत होती है। यहां तक कि बुजुर्ग भी ऐसी फिल्में देखना पसंद करते हैं, क्योंकि उन्हें मां-बाप के संघर्ष में अपनी झलक दिखती है या फिर हीरो-हीरोइन के प्रेम में उन्हें निजी रोमांस की परछाइयां नजर आती हैं। छठे और सातवें दशक के हमारे श्रेष्ठ फिल्मकारों ने इस प्रेम कहानी में वर्ग संघर्ष को भी जोड दिया था।

प्रेम की प्रधानता वाली फिल्में
मुगले आजम उल्लेखनीय प्रेम कहानी है। इसमें राजकुमार और सामान्य नाचने वाली लडकी के प्रेम का चित्रण किया गया था। सदाबहार गीत प्यार किया तो डरना क्या उस समय के युवकों के विद्रोह और मां-पिता की राह पर चलने से इंकार करने की मनोदशा को खूबसूरत तरीके से रेखांकित करती है। संक्षेप में इस फिल्म ने जाहिर किया था कि कैसे युवा भारत अपने पूर्वजों के मूल्यों को छोडकर आगे बढ रहा है।
उन दिनों रॉक एन रोल बहुत लोकप्रिय था। छठे दशक की पीढी रॉक एन रोल को अपने मां-पिता के खिलाफ विद्रोह के रूप में लेती थी। रॉक एन रोल छठे दशक के अंत में भारत आया और सातवें दशक के आरंभ में बहुत लोकप्रिय हुआ।
संगीत-नृत्य की इस शैली का ही असर था कि मजरूह सुल्तानपुरी जैसे गंभीर गीतकार भी सी ए टी कैट, कैट माने बिल्ली, आर ए टी रैट, रैट माने चूहा लिखने से खुद को नहीं रोक सके। लिखने की जरूरत नहीं कि यह गीत युवकों के बीच काफी मशहूर हुआ। दूसरी तरफ शुद्धतावादियों ने बांहें चढा लीं और गंभीर गीतकार के पतन पर विलाप करते रहे। विडंबना देखिए कि उसी गंभीर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने सालों बाद मेरी फिल्म गुलाम के गीत आती क्या खंडाला की निंदा की। उसे भद्दा और अश्लील कहा।
रॉक एन रोल के बाद बीटल्स का दौर आया। उन्होंने दुनिया के संगीत परिदृश्य में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। हिंदी फिल्मों की बात करें तो सातवें दशक में विद्रोही स्टार शम्मी कपूर का आगमन हुआ। जंगली के एक गीत में कश्मीर की बर्फीली वादियों के बीच पहाड से फिसलते हुए शम्मी कपूर की याहू की पुकार ने भारतीय फिल्मों के हीरो की छवि बदल दी। जंगली के पहले फिल्मों के हीरो बडे ही सभ्य और शालीन तरीके से प्रेम का इजहार करते थे। हीरोइनें नाचती थीं, लेकिन हीरो शायद ही कभी कमर मटकाते थे। उनके नृत्य में वैसा खुलापन और कामोद्दीपन नहीं होता था।
भारतीय सिनेमा में शम्मी कपूर का आगमन एक विभाजक रेखा है। कह सकते हैं कि वे उस पीढी के युवकों के प्रवक्ता थे। जिन्न बोतल से बाहर आ गया और फिर कभी युवकों ने बुजुर्गो की पसंद को अपनी पसंद के तौर पर स्वीकार नहीं किया।

हिंदी फिल्मों में समस्याएं गायब
21वीं सदी में हम जो देख रहे हैं, वह और कुछ नहीं केवल शम्मी कपूर द्वारा लाए परिवर्तन का ही नया रूप है। इतना ही अंतर है कि जिन्हें शम्मी कपूर पसंद आए थे, उन्हें ही गोविंदा, सलमान खान और शाहरुख खान के नृत्य अश्लील लगने लगे, जबकि देश के युवक उनके दीवाने बन गए। हिंदी फिल्में इन दिनों सिर्फ और सिर्फ युवा दर्शकों का ही खयाल रख रही है। बहरहाल, हिंदी फिल्मों में नए भारत की आत्मा और चेहरे के दर्शन नहीं होते। अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में जिस तरह युवकों को प्रभावित कर रही राजनीति, धार्मिकता और सांस्कृतिक तनाव के विषयों का चित्रण किया जा रहा है या राष्ट्रीय अस्मिता का सवाल उठाया जा रहा है, वह हिंदी फिल्मों में नदारद है। भारत के युवा जोश को व्यक्त करने वाली फिल्म रंग दे बसंती एक अपवाद है। राकेश मेहरा ने इस फिल्म में युवकों की मनोदशा को दिखाने की हिम्मत की।
मुझे नहीं मालूम कि हम कब इतने साहसी होंगे कि युवकों को ज्यादा इज्जत दे पाएंगे। रंग दे बसंती जैसी कुछ और साहसी फिल्में बना पाएंगे। मल्टीप्लेक्स के अंधेरे हॉल में देश के युवक अपनी जिंदगी की समस्याओं के हल देखने के लिए बेचैन हैं। आज के युवक मनोरंजन के साथ आवश्यक ज्ञान भी चाहते हैं। अगर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को इस पर यकीन नहीं है तो उन्हें आज के बदलते भारत के युवा नेता राहुल गांधी और उमर अब्दुल्ला के भाषण सुनने चाहिए। हमारे युवा राजनीतिज्ञों को एहसास हो गया है कि भारत बदल रहा है। यह एहसास हम फिल्मकारों में भी पैदा होना चाहिए। हम पर्दे पर युवकों के चित्रण की कहानी लडका-लडकी के मिलन से आगे ले जाएं। यानी प्रेम कहानियों से इतर जिंदगी की आम समस्याओं को चित्रित करें। यही पर्दे पर देखना चाहते हैं आज के युवा। हमें जितनी जल्दी इस सच का एहसास होगा, फिल्म इंडस्ट्री और देश के लिए वह उतना ही बेहतर और लाभकारी होगा।

Thursday, April 23, 2009

दरअसल:देसी दर्शकों से बेपरवाह फिल्म इंडस्ट्री

-अजय ब्रह्मात्मज
मल्टीप्लेक्स मालिकों और निर्माता-वितरकों के बीच फिलहाल कोई समझौता होता नहीं दिख रहा है। अपवाद के तौर पर 8 बाई 10 तस्वीर रिलीज हुई, क्योंकि उसकी रिलीज तारीख पूर्वनिश्चित थी और उसके निर्माता ने फिल्म के प्रचार में काफी पैसे खर्च किए थे। पिछले दिनों जब निर्माता और वितरकों की तरफ से आमिर और शाहरुख खान मीडिया से मिलने आए थे, तब यही तर्क दिया गया था। उस समय न तो किसी ने पूछा और न ही किसी ने अपनी तरफ से बताया कि आ देखें जरा क्यों मल्टीप्लेक्स में नहीं पहुंच सकी! एक आशंका जरूर व्यक्त की गई कि अगर शाहरुख, आमिर, यश चोपड़ा या यूटीवी की फिल्म अभी रिलीज पर रहती, तो क्या तब भी इतना ही सख्त रवैया होता?
इस आशंका में ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की दोहरी नीति का सच छिपा है। आमिर खान ने चलते-फिरते अंदाज में बताया कि लाभांश शेयरिंग का मामला गजनी के समय ही तूल पकड़ चुका था, लेकिन तब उन्होंने इसे टाला। वे नहीं चाहते थे कि कोई यह कहे कि आमिर अपनी फिल्म के लिए यह सब कर रहे हैं! दोनों पक्षों की ढील और जिद में तीन महीने गुजर गए। इन तीन महीनों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने हर तरह से दबाव बनाया, लेकिन फिर भी मल्टीप्लेक्स मालिकों की एकजुटता बढ़ती गई! फिलहाल देश भर के 240 मल्टीप्लेक्स के 750 स्क्रीन की कमाई की हिस्सेदारी के लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने 11,000 सिंगल स्क्रीन थिएटरों के दर्शकों को नई फिल्मों से वंचित कर दिया है।
कथित मल्टीप्लेक्स संस्कृति के प्रसार के बाद से ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पर यह आरोप लगता रहा है कि वह देसी दर्शकों से बेपरवाह हो चुकी है। चूंकि हिंदी फिल्मों को प्रमुख रूप से महानगरों के मल्टीप्लेक्स और ओवरसीज से आमदनी हो रही है, इसलिए कंटेंट भी मुख्य रूप से शहरी हो गया है। कुछ निर्देशकों की फिल्में विदेश्ी लोकेशन और पृष्ठभूमि की होने लगी हैं।
ऐसी फिल्मों के किरदार आप्रवासी भारतीय या भारतवंशी होते हैं। नतीजा यह है कि हाल-फिलहाल की हिंदी फिल्मों से देहात गायब हो गए हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की इसी सेच के विस्तार के रूप में हम सिंगल स्क्रीन थिएटर के दर्शकों के प्रति उनकी उदासीनता को देख सकते हैं। निर्माता और वितरकों ने सिंगल स्क्रीन के पारंपरिक दर्शकों की कोई चिंता नहीं की। उन्होंने एक झटके में बेकसूर देसी दर्शकों और सिंगल स्क्रीन थिएटरों के मालिकों को मनोरंजन और रेगुलर व्यवसाय से वंचित कर दिया। वंचित तो शहर के दर्शक भी हुए हैं, लेकिन उनके पास मनोरंजन के और भी साधन हैं। शहरी दर्शकों का आंशिक हिस्सा अंग्रेजी फिल्मों से काम चला रहा है। वर्तमान स्थिति में सबसे ज्यादा घाटे में देसी दर्शक ही हैं।
हालांकि निर्माताओं की तरफ से मुकेश भट्ट ने आश्वस्त किया था कि गतिरोध लंबा खिंचा, तो वे कोई और रास्ता खोजेंगे। उन्होंने सिंगल स्क्रीन थिएटरों के मालिकों को इंडस्ट्री का दोस्त बता कर फिलहाल साथ देने का आग्रह किया है। सवाल है कि जिसका कोई कसूर नहीं, उसे क्यों सजा दी जा रही है? स्पष्ट रूप से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की मुख्य चिंता मल्टीप्लेक्स से होने वाली आमदनी है। अपने लाभ के लिए देसी दर्शकों की बलि चढ़ाने में वह नहीं झिझकी।
दरअसल, फिल्में एक प्रोडक्ट बन चुकी हैं और फिल्म वितरण और प्रदर्शन अब शुद्ध व्यवसाय बन चुका है। नई परिस्थिति में दर्शक ग्राहक हैं। जाहिर-सी बात है कि जो ग्राहक ज्यादा पैसे खर्च करता है, फिल्म इंडस्ट्री उसकी परवाह करती है। देसी दर्शक आज भी 20 रुपए में फिल्में देखते हैं, जबकि शहरी दर्शक औसतन 200 रुपए खर्च करने में भी नहीं कतराते!

Tuesday, April 21, 2009

बाजपेयी और सोनिया जी प्रिय हैं:शाहरुख़ खान

बाजपेयी जी
बाजपेयी जी से मेरे पुराने संबंध हैं। उनकी बेटी नमिता से पुराना परिचय है। पहले हम दिल्ली लाकर फिल्में दिखाते थे तो उनके लिए विशेष शो रखते थे। उन्हें फिल्मों का बहुत शौक है। कई बार पता चल जाता था कि उन्हें फिल्म अच्छी नहीं लगी। फिर भी वे कहते थे बेटा, बहुत अच्छा है। एक बार मिले तो बोले कि बहुत दिनों से तुम्हारी कोई फिल्म नहीं देखी। पिछले दिनों उनकी तबियत खराब हुई थी तो मैं चिंतित था। मैंने नमिता से पूछा कि बाप जी कैसे हैं। हम उन्हें बाप जी कहते हैं। मेरी तबियत खुद खराब थी, इसलिए मिलने नहीं जा सका। फिर भी मैं नमिता से हालचाल लेता रहा। वे बहुत स्वीट व्यक्ति हैं। मैं छोटा था तो मेरे पिताजी मुझे आईएनए मार्केट ले जाते थे कि अटल बिहारी बाजपेयी जी की स्पीच सुनो। बहुत खूबसूरत बोलते हैं वे। उनका हिंदी पर अधिकार है। मैं उनको और इंदिरा जी को सुन कर बड़ा हुआ हूं। मेरे पिता जी कांग्रेस में थे। मेरी मां कांग्रेस में थीं। गांधी परिवार को मैं बचपन से जानता हूं। राबर्ट से भी मेरा पुराना परिचय है। हमने कभी पालिटिकल बात नहीं की। वे हमारे घर आते हैं। हम भी उनसे मिलने जाते हैं।

राजनीति से रिश्ता
राजनीति हमारा धंधा नहीं है तो इस सिलसिले में कोई बात नहीं होती। एक-दो बार आए तो शूटिंग देखने की इच्छा जाहिर की। हर आदमी शूटिंग देखना चाहता है। उनका दोस्त एक्टर है तो उनकी भी इच्छा हुई। मैं कभी कह दूं कि पार्लियामेंट सेशन नहीं देखा है, अगर गैरकानूनी न हो तो मुझे भी दिखा दो। तो वे मना नहीं करेंगे। इसके आगे कभी कोई बात नहीं हुई। उन्होंने मुझसे कभी कुछ बोला भी नहीं है। उन्हें मालूम है कि मैं अराजनीतिक व्यक्ति हूं। मेरा झुकाव किसी पार्टी की तरफ नहीं है। मेरी मम्मी पालिटिक्स में थीं। मैंने उन्हें करीब से देखा है। मैंने देखा है कि कई बार नेताओं को झुकना पड़ता है। वे दबाव में आ जाते हैं। कई बार वैसी नीतियां बनानी पड़ती है। जैसे कई बार हम छिछोरा काम करते हैं। एक्टर हैं तो करना पड़ता है। मार्केटिंग और पब्लिसिटी के लिए करना होता है। कई बार हाथ बंधे होते हैं। हमें नेताओं पर भरोसा करना चाहिए, लेकिन भरोसेमंद नेता भी तो हों।

सोनिया जी
सोनिया जी की बात करूं तो वो अकेली औरत हैं। यह सब बकवास और छिछोरी बात है कि वो बाहर की हैं या इटली की हैं। आप अपनी मां की तरह उनके बारे में सोचें। उनकी पूरी दुनिया तहस-नहस हो गयी। उनके देवर मर गए। सास मर गई। शौहर मर गए। दूसरे देश में वह अकेली हो गयीं। हमें लंदन में कोई पांच मिनट के लिए अकेला छोड़ दे तो हालत खराब हो जाती है। वह एक नए देश में थे और उनके परिवार के सभी सदस्य मारे गए। बच्चे छोटे थे। लोग विरोध में थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने लड़ाई लड़ी। एक नेता ना सही, एक इंसान के तौर पर तो उनकी इज्जत करें। हमारी मां-बहन ऐसा करतीं तो हम उनकी तारीफ करते या नहीं। उनकी राजनीति को एक तरफ रहने दें।

Monday, April 20, 2009

शास्त्री और इंदिरा जी जैसा नेतृत्व चाहिए: अजय देवगन

लीजेंड आफ भगत सिंह, गंगाजल और अपहरण जैसी राजनीतिक फिल्में कर चुके अजय देवगन स्वयं को देश का जागरूक नागरिक मानते हैं, लेकिन रोजमर्रा की राजनीति में उनकी खास रुचि नहीं है। वे कहते हैं, ''मैं अभिनेता हूं। मेरा मुख्य कार्य अभिनय है। राजनीति के दाव-पेंच मैं अधिक नहीं समझता। अपने पेशे और सार्वजनिक जीवन में रहने के कारण विभिन्न पार्टियों के नेताओं से मेरे संपर्क और संबंध हैं। व्यक्तिगत तौर पर मैं उनकी इज्जत करता हूं। राजनीति के गलियारे में टहलना मुझे पसंद नहीं है। अभी तक मैं किसी पार्टी विशेष के प्रचार अभियान में शामिल नहीं हुआ हूं। हां, अगर फिल्म बिरादरी से कोई चुनाव लड़ता है और वह मुझे बुलाता है तो मैं जा सकता हूं। वहां मैं व्यक्तिगत रिश्ते को महत्व दूंगा। मेरी राय में फिल्म बिरादरी के सदस्य राजनीति में जाने पर औरों की तुलना में देश की सेवा ज्यादा बेहतर और ईमानदार तरीके से कर सकते हैं। सुनील दत्त जी का उदाहरण हमारे सामने हैं।''

भारत का सम्मान रखा शास्त्री जी ने

आदर्श नेताओं के बारे में पूछने पर अजय देवगन जिन दो नेताओं के नाम लेते हैं, वे दोनों देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। वे कहते हैं, ''मुझे लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी पसंद हैं। आप देखें कि लाल बहादुर शास्त्री बहुत कम समय के लिए देश के प्रधानमंत्री रहे, लेकिन उन्होंने भारत का सम्मान रखा। देश पर हुए हमले को उन्होंने बड़ी चुनौती के रूप में लिया और बगैर इंटरनेशनल दबाव में आए हुए उन्होंने भारतीय पक्ष को निर्भीक भाव से रखा। अगर वे कुछ और सालों तक देश के प्रधानमंत्री रहते तो देश का भविष्य किसी और रास्ते पर चलता। उन्होंने देश के लिए जय जवान और जय किसान का नारा दिया था।''

दूरगामी थे इंदिरा जी के फैसले

इंदिरा गांधी की प्रशंसा करते हुए अजय देवगन का कहना है, ''इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने नेतृत्व से सभी को चौंका दिया। कुछ लोगों को आशंका थी कि वह महिला हैं। इतने बड़े देश का नेतृत्व कैसे कर पाएंगी? सभी को लग रहा था कि पंडित नेहरू की बेटी होने के कारण उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी मिल गयी। दो-तीन सालों के अंदर ही उन्होंने अपने फैसलों और नीतियों से साबित कर दिया था कि वह देश का कुशल नेतृत्व कर सकती हैं। वह आयरन लेडी के रूप में उभरी थीं। इंदिरा गांधी के लिए गए फैसलों के परिणाम बाद में दिखे। उन्होंने देश के भविष्य और विकास के लिए दूरगामी प्रभाव की नीतियां तय की। उनकी आर्थिक नीतियों की वजह से देश मंदी के दौर में संभल सका।''

सक्षम एवं सबल हो प्रधानमंत्री

इस आम चुनाव के संदर्भ में अजय देवगन की अपील है, ''मैं चाहता हूं कि देश के सभी वयस्क नागरिक वोट दें और अपने इलाके के प्रतिनिधि के तौर पर योग्य और कुशल नेता को चुनें। हमें देश का नेतृत्व लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी जैसे नेताओं के हाथ में सौंपना चाहिए। चाहे जिस भ पार्टी की सरकार बने, कोशिश यही रहे कि देश का प्रधानमंत्री राजनीतिक और मानसिक तौर पर सक्षम एवं सबल हो।'' 

Sunday, April 19, 2009

अपराधी को नेता न चुनें: आमिर खान

जरूरी है कि हम सभी वोट दें। अपनी बात करूं तो मैं बच्चों के साथ छुट्टियों पर जा रहा हूं, लेकिन मैं मुंबई की वोटिंग के दिन आऊंगा। अपना वोट डालूंगा और फिर बच्चों के पास लौट जाऊंगा। मैं इतना महत्व दे रहा हूं वोटिंग को। मेरे खयाल में आप भी इसका महत्व और जरूरत समझेंगे।
जरूरी है उम्मीदवार को जानना
वोट देना तो सबसे जरूरी है, लेकिन उसके साथ ही जरूरी है कि हम अपने चुनाव क्षेत्र में खड़े सभी उम्मीदवारों के बारे में तफसील से जानें। आप को मालूम होगा कि हर उम्मीदवार अपना फार्म भरते समय सारी जानकारियां देता है। ये जानकारियां आप समाचार पत्रों या अन्य माध्यमों से हासिल कर सकते हैं। मैं एडीआर संस्था के एक अभियान में शामिल हूं। हम सभी की कोशिश है कि देश का हर मतदाता अपने चुनाव क्षेत्र के सभी उम्मीदवारों के बारे में जानने के बाद ही अपने वोट के बारे में फैसला करे।
मेरी पसंद थे सुनील दत्त
अपनी बात कहूं तो मैं आंख मूंद कर सुनील दत्त साहब को वोट दे देता था। मैंने कभी किसी और उम्मीदवार के बारे में जानने की कोशिश ही नहीं की। वोट देने का मेरा वह तरीका ठीक नहीं था। यह अलग बात है कि मेरी पसंद सुनील दत्त साहब थे।
किसी बहकावे में न आएं
मुझे लगता है कि हर हिंदुस्तानी दिल से अच्छा है। वह देश की भलाई सबसे पहले चाहता है। हर हिंदुस्तानी जानता है कि किसे वोट देने में उसका फायदा है। हम देखते हैं कि कई बार वह बहकावे में आ जाता है। मेरा यही कहना है किसी बहकावे में न आएं। अपना वोट कतई न बेचें और किसी अपराधी को अपना नेता न चुनें। आप सभी खुद समझदार हैं। आप ने देखा कि जो जाति और धर्म के नाम पर लोगों को बांटते हैं, वे सभी का नुकसान करते हैं। जो एकता की बात करता है, वही देश की प्रगति के बारे में सोचता है।
बदला है वोटर का मिजाज
इस बार मुंबई में जो हमला हुआ, उसकी वजह से हर हिंदुस्तानी जागरूक हुआ है। 26 नवंबर 2008 के बाद वोटर का मिजाज बदल गया है। उसकी समझ में आ गया है कि उसे कैसे नेताओं की जरूरत है? मैं अपनी बात करूं तो मैं अपने चुनाव क्षेत्र के नेता में उसका चरित्र देखूंगा। उसका चरित्र कितना मजबूत है? उसकी ईमानदारी कितने ऊंचे स्तर की है? उसके चरित्र के आधार पर अपना वोट तय करूंगा। चरित्र ठीक होगा तो उसके विचार भी सही होंगे। उसकी राजनीति अच्छी होगी और देश के भले के लिए होगी!

Saturday, April 18, 2009

फ़िल्म समीक्षा:दशावतार


एक नहीं, दस कमल हासन


अगर आप कमल हासन के प्रशंसक हैं तो भी इस फिल्म को देखने जाने से पहले एक बार सोच लें। कमल हासन आत्ममुग्ध अभिनेता हैं। कुछ समय पहले तक उनकी इसी आत्ममुग्धता के कारण हमने कई प्रयोगात्मक और रोचक फिल्में देखीं। लेकिन इधर उनकी और दर्शकों की टयूनिंग नहीं बन पा रही है। वह आज भी प्रयोग कर रहे हैं। ताजा उदाहरण दशावतार है। हालांकि तमिल और हिंदी में बनी फिल्म के निर्देशक रवि कुमार है, लेकिन यह फिल्म कमल हासन का क्रिएटिव विलास है।
यह अमेरिका में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिक गोविंद सोमाया की कहानी है। गोविंद सिंथेटिक जैविक हथियार बनाने की प्रयोगशाला में काम करता है। एक छोटी घटना में हम उस जैविक हथियार का प्रभाव एक बंदर पर देखते हैं। गोविंद उस जैविक हथियार को सुरक्षित हाथों में पहुंचाना चाहता है।
संयोग से बैक्टीरिया जिस डिब्बे में बंद हैं वह भारत चला जाता है। गोविंद उसकी खोज में भारत आता है। यहां से नायक और खलनायक की बचने-पकड़ने के रोमांचक दृश्य शुरू होते हैं। इन दृश्यों में जो दूसरे किरदार आते हैं, उनमें से नौ भूमिकाएं कमल हासन ने ही निभाई है। एक सहज जिज्ञासा होती है कि अगर इन्हें अलग-अलग कलाकारों ने निभाया होता तो क्या फिल्म प्रभावशाली नहीं हो पाती? निश्चित ही कमल हासन ने अपनी सभी भूमिकाओं को मेकअप और मैनरिज्म से अलग करने की कोशिश की है। लेकिन उनकी जबरदस्त प्रतिभा के बावजूद कहीं न कहीं एकरूपता बनी रहती है। हालांकि कुछ दृश्यों में कमल हासन का निजी मैनरिज्म दिख ही जाता है।
रंगराजा नांबी ने कहानी, दृश्य, परिवेश और प्रस्तुति में प्रभावित किया है। ऐसा लगता है जैसे पर्दे पर हम कोई एपिक देख रहे हैं। सभी तकनीशियनों का सहयोग फिल्म के इस हिस्से को गत्यात्मक और विशाल बनाता है। लेकिन फिल्म की गति बनी नहीं रह पाती। कहीं न कहीं एक ही कलाकार द्वारा निभाए जा रहे नौ किरदारों की भिन्नता दिखाने में कहानी छूट गई है।
कमल हासन टुकड़ों-टुकड़ों में अच्छे लगते हैं। उनकी प्रतिभा के बारे में दो राय नहीं, लेकिन उसका दुरुपयोग उचित नहीं कहा जा सकता। असिन और मल्लिका शेरावत अपनी भूमिकाओं को निभा ले जाती हैं। असिन और कमल हासन की जोड़ी में उम्र का अंतराल साफ नजर आता है। फिल्म के विशेष प्रभाव अच्छे हैं। खासकर सुनामी के दृश्यों में तकनीकी दक्षता झलकती है।

Friday, April 17, 2009

दरअसल:पॉलिटिक्स और पॉपुलर कल्चर का रिश्ता

-अजय ब्रह्मात्मज

एक मशहूर अभिनेता ने अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि अगर आप फिल्म स्टार हैं, तो अंडरव‌र्ल्ड और पॉलिटिक्स से नहीं बच सकते।
माफिया डॉन और पॉलिटिशियन आपसे संपर्क करते हैं और संबंध बनाने की कोशिश करते हैं। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप उनके साथ कैसे पेश आते हैं या कैसे इस्तेमाल होते हैं? अंडरव‌र्ल्ड और फिल्म स्टारों की नजदीकियों के बारे में हमेशा कुछ न कुछ लिखा जाता रहा है। उस संदर्भ में एक ही चीज महत्वपूर्ण है कि मुंबई दंगों के बाद अंडरव‌र्ल्ड से किसी प्रकार का संबंध राष्ट्रविरोधी माना गया। उसके पहले अंडरव‌र्ल्ड सरगनाओं की पार्टियों में जाने में किसी स्टार को परहेज नहीं होता था और न ही उनके संबंध पर कोई आपत्ति की जाती थी। रही बात पॉलिटिक्स की, तो फिल्मी हस्तियों और राजनीतिक पार्टियों के अधिकांश संबंध परस्पर लाभ से निर्देशित होते हैं। फिल्मी हस्तियों और उनकी राजनीतिक सक्रियता को तीन चरणों में देखा जा सकता है। हालांकि दक्षिण भारत की स्थिति अलग रही है।
आजादी के बाद से राजनीतिक गलियारे में फिल्मी हस्तियों की पूछ बढ़ी। नेहरू फिल्म कलाकारों से मिलने में रुचि दिखाते थे। उसकी एक वजह यह भी कही जाती है कि नरगिस से उनके करीबी संबंध थे। उन्होंने नरगिस को राज्य सभा का सदस्य बनाया था। वैसे, नरगिस से पहले पृथ्वीराज कपूर को यह सम्मान मिला था। दिल्ली की राजनयिक और राजनीतिक बैठकों और पार्टियों में फिल्मी हस्तियों की मौजूदगी से रौनक बढ़ जाती थी। यह सिलसिला लगभग दो दशकों तक चलता रहा। तब तक नेताओं को प्रचार के लिए फिल्मी कलाकारों की जरूरत नहीं पड़ती थी। राजनीतिक पार्टियों के पास इतने सामाजिक मुद्दे रहते थे कि वे मतदाताओं से सीधे संपर्क बना लेते थे। चीन और पाकिस्तान से हुए युद्ध के समय अवश्य फिल्म इंडस्ट्री ने वक्त की जरूरत को समझते हुए सक्रियता दिखाई। पॉपुलर कल्चर और पॉलिटिक्स का यह पहला उपयोगी मिलन था। सुनील दत्त अपने ग्रुप के कलाकारों को लेकर सीमांत क्षेत्रों में जाते थे और मोर्चे पर तैनात सैनिकों का मनोरंजन भी करते थे। इस दौर में पॉपुलर कल्चर और राजनीति की परस्पर सहायक भूमिका सामने आई।
देश में इमरजेंसी की घोषणा हुई, तो समाज के दूसरे क्षेत्रों की तरह ही फिल्म इंडस्ट्री में भी कुछ जागरूक व्यक्तियों ने रोष दिखाया। उनमें देव आनंद सबसे आगे रहे। उन्होंने नेशनल पार्टी तक की स्थापना कर ली और फिल्म इंडस्ट्री को लामबंद करने की कोशिश की। इसी दौर में राज बब्बर और शत्रुघ्न सिन्हा राजनीति में सक्रिय हुए। देव आनंद तो फिर से अपनी ठहरी दुनिया में मशगूल हो गए, लेकिन शत्रुध्न सिन्हा और राज बब्बर फुलटाइम राजनीतिज्ञ के रूप में सामने आए। इस बार फिर से दोनों चुनाव के मैदान में खड़े हैं। उनके साथ कई और फिल्मी हस्तियां चुनावी दंगल में शामिल हैं। कृपया उन्हें किसी पार्टी विशेष के साथ जोड़ कर न देखें। दो साल पहले ही हमने उन्हें किसी और पार्टी के मंच पर देखा था। मुमकिन है, चुनाव में हार या जीत के बाद वे फिर से किसी अन्य मंच पर दिखें!
तीसरा दौर अत्यंत अलग है। भगवा राजनीति के उभार और उत्कर्ष के दिनों में भाजपा ने रावण, सीता और कृष्ण समेत पॉपुलर भूमिकाओं में आ चुके अनेक कलाकारों को चुनाव के टिकट दिए और उनके जरिए लोकसभा में अपनी संख्या भी बढ़ाई। कहना मुश्किल है कि उन कलाकारों में से कितने भाजपा की विचारधारा से सहमत थे, क्योंकि उनमें से अधिकांश अभी परिदृश्य से गायब हैं। इसी दौर में महसूस किया गया कि पॉपुलर स्टार और कलाकार मतदाताओं को लुभाने के काम आ सकते हैं। चुनावी सभाओं में अपनी उपस्थिति से समां बांध सकते हैं। लगभग सभी पार्टियों ने अपनी पहुंच और रसूख के मुताबिक फिल्मी हस्तियों को अपने साथ जोड़ा।
उल्लेखनीय है कि पॉपुलर स्टार अपनी लोकप्रियता से चुनावी सभा में भीड़ बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं है कि उनकी अपील का असर जनता पर होता है! मतदाता आखिरकार अपने विवेक से ही वोट देता है, इसीलिए कई पॉपुलर स्टार चुनाव हार जाते हैं। देखना है कि इस चुनाव में पॉलिटिक्स और पॉपुलर कल्चर का कौन-सा रूप नजर आता है!

Thursday, April 16, 2009

मीडिया ने मुझे बिग बना दिया -अमिताभ बच्चन

-अजय ब्रह्मात्मज

अपने बिग ब्लॉग की पहली वर्षगांठ (16 अप्रैल) पर अमिताभ बच्चन ने खास तौर से दैनिक जागरण से अपने मन की बातें बांटीं।

आपने अपने ब्लॉग का नाम बिग बी क्यों पसंद किया? बिग बी, एंग्री यंग मैन, मिलेनियम स्टार जैसे विशेषणों को आप ज्यादा तरजीह नहीं देते। फिर बिग बी की पसंदगी की कोई खास वजह?
मैंने यह नाम नहीं चुना है। बिग अड्डा सर्वर ने यह नाम रखा है। मुख्य पृष्ठ पर इसकी प्रस्तुति ऐसी है कि यह बिगब्लॉग डॉट कॉम पढ़ा जाता है। बिग और ब्लॉग को एक साथ हाइलाइट करें, तो बिग बी लॉग पढ़ते हैं। यह मेरा नहीं, उनका रचनात्मक फैसला है। उनकी अन्य गतिविधियों में भी बिग नाम आता है, जैसे बिग पिक्चर्स, बिग फिल्म आदि। यह महज संयोग ही है कि मेरे ब्लॉग की डिजाइन मीडिया रचित विशेषण से मिल गई। ऐसा नहीं है कि मैं इन विशेषणों में विश्वास करता हूं या उन्हें प्रोत्साहित और स्वीकार करता हूं!

ब्लॉग लेखन क्या है आपके लिए?
संक्षेप में, यह अनुभव आह्लादक रहा है। अपने प्रशंसकों और शुभेच्छुओं से जुड़ पाना उद्घाटन रहा। इस माध्यम ने बगैर किसी बिचौलिए के मुझे स्वतंत्र संबंध दिया है। इसमें मीडिया से होने वाली भ्रष्ट प्रस्तुति की संभावना नहीं है। इस संबंध से मैंने बहुत कुछ सीखा है। मेरे ब्लॉग पर आने वाले हमारे बीच विकसित हुए व्यक्तिगत समीकरण को महसूस करते हैं और वह बहुत प्रीतिकर है।

आरंभ से ही आपने ब्लॉग का उपयोग खुद पर उठे सवालों के उत्तर देने के लिए किया? क्या कहीं यह मनोभाव रहा कि आपके प्रशंसकों तक आपका मंतव्य दूसरे साधनों से नहीं पहुंच पा रहा है?
दूसरे माध्यम मुझे वह अनन्यता नहीं देते, जो कई बार मैं चाहता हूं। लोगों तक पहुंचने के लिए मैंने उनका इस्तेमाल किया है, लेकिन उन पर मेरी निर्भरता सीमित है। ब्लॉग पर कोई अड़चन नहीं है।

आपने पत्र-पत्रिकाओं को हमेशा उद्धृत किया। कभी किसी की तारीफ की, तो कभी आलोचना भी.. या फिर उन्हें कठघरे में खड़ा किया। क्या कभी हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में ऐसा कुछ नहीं छपा, जो आपको उद्वेलित या प्रसन्न कर पाता?
करता है। मैं उन पर ध्यान देता हूं और सराहना भी करता हूं। मेरे खयाल में आपका सवाल यह इंगित करता है कि मैं अपने ब्लॉग पर हिंदी प्रेस का उल्लेख क्यों नहीं करता! मैं करूंगा, एक बार हिंदी ब्लॉग आकार ले ले। हम लोग अपने ब्लॉग के विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद की प्रक्रिया में हैं। हिंदी मैं स्वयं लिखूंगा। जब वह हो जाएगा, तो मैं हिंदी प्रेस को उद्धृत करूंगा, बशर्ते कुछ उद्धृत करने लायक हो!

आपने वादा किया था कि हिंदी में ब्लॉग लिखेंगे, लेकिन साल पूरे होने को आए और अभी तक यह वादा पूरा नहीं हुआ। हां, हिंदी पाठकों का मन रखने के लिए आपने चंद पोस्ट हिंदी में अवश्य लिखी, लेकिन वह पर्याप्त नहीं कहा जा सकता?
जैसा कि मैंने पहले कहा, मैं प्रतीक्षा में हूं कि अनूदित ब्लॉग की प्रक्रिया पूरी हो जाए। उसके बाद हिंदी ब्लॉग भी होगा।

ब्लॉग के माध्यम से हम आपके भाव, व्यथा, प्रसन्नता, व्याकुलता और सोच से परिचित होते रहे हैं। कभी-कभी व्यक्ति अमिताभ बच्चन की मानवीय छटपटाहट का भी अहसास होता है। ऐसा लगता है कि आप देश, समाज और निजी माहौल में संतुष्ट नहीं हैं?
आप बिल्कुल गलत हैं। मैं अपने देश, समाज और निजी माहौल में बहुत संतुष्ट व्यक्ति हूं। परेशान होने वाले मुद्दों पर लिखने का यह मतलब नहीं है कि मैं असंतुष्ट हूं। मैं तो भारतीय होने के नाते अभिव्यक्ति के अपने अधिकार का उपयोग करता हूं और इससे मुझे कोई रोक नहीं सकता।

ब्लॉग के पाठकों को आप अपना विस्तारित परिवार कहते हैं। इस परिवार की बातों और सुझावों पर कितना गौर कर पाते हैं?
मैं उनके व्यक्त विचार और राय पर बहुत गौर करता हूं और उनका आदर भी करता हूं। कई बार मैंने उनके सुझावों को स्वीकार किया है और उन पर अमल भी किया है।

ब्लॉग लेखन में आपकी नियमितता अनुकरणीय है। किसी भी पोस्ट का विषय लैपटॉप खोलने के बाद निश्चित होता है या कोई विषय आपको मथता रहता है और आप उस पर लिखते हैं?
कुछ भी पहले से तय नहीं रहता। लैपटॉप खोलने के बाद लिखता हूं। अगर कोई प्रकाशित इंटरव्यू हो या किसी पर मेरी प्रतिक्रिया हो, तो ब्लॉग से अलग उन्हें लिखता हूं। जैसे कि अभी जो आप को उत्तर दे रहा हूं॥, यह पता चलते ही कि आपने इसे प्रकाशित कर दिया है, मैं इसे अपने ब्लॉग पर डालूंगा।

आपको 144वीं पोस्ट पर सबसे ज्यादा कमेंट्स मिले हैं। यह पोस्ट आपने 9 सितंबर, 2008 को लिखी थी। जया जी की टिप्पणी से उठे विवाद पर आपके स्पष्टीकरण से संबंधित उस पोस्ट का स्थायी महत्व है। छह महीने गुजरने के बाद अब क्या आप उस विवाद के बारे में कुछ नया कहना चाहेंगे?
उस मामले में और कुछ नहीं कहना है। जब मैं बीमार पड़ा था, तो सब से ज्यादा टिप्पणियां आई थीं। वह बहुत प्रीतिकर था। प्रशंसकों का प्यार गहरे छूता है।

आपके ब्लॉग लेखन में किन व्यक्तियों की खास भूमिका रही?
आपके सवाल को मैं समझ नहीं सका। अगर आपका सवाल यह है कि किसने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया, तो मेरा जवाब होगा, कोई नहीं। आप पूछेंगे कि लिखते समय मैं किसे सबसे ज्यादा महत्व देता हूं, तो मैं कहूंगा कि अपने ब्लॉग पर आने वालों को या अपने विस्तारित परिवार को। मैं अपने पिता के लिखे शब्दों और लेखन से प्रेरणा लेता हूं। अगर आपको ऐसा लगता है कि मैं राष्ट्रीय भाषा को पर्याप्त महत्व नहीं देता, तो आप ध्यान दें कि मेरे ब्लॉग पर आने वाला कोई भी पाठक सबसे पहले मेरे पिता की हिंदी कृतियों से लिया गया मूल्यवान उद्धरण पढ़ता है।

आपके ब्लॉग लेखन से अभिव्यक्ति के इस आधुनिक माध्यम के प्रति जागरूकता बढ़ी है। आप ब्लॉग लेखन के भविष्य पर क्या कहेंगे?
मैं विश्लेषक नहीं हूं। ब्लॉगिंग के भविष्य पर मैं कुछ नहीं कह सकता।

ब्लॉग पर लिखी आपकी पंक्तियां जब टीवी और अखबार में सुर्खियों के रूप में इस्तेमाल होती हैं, तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
संतुष्टि और विनम्रता का अहसास होता है। मेरी विदग्धता और साहित्यिक गुणवत्ता की तुलना ताकतवर मीडिया से नहीं की जा सकती। अगर मेरा पाठ उन्हें उपयोगी लगता है, तो यह सम्मानसूचक है और उनकी उदारता है।

क्या आपको यह नहीं लगता कि अभिव्यक्ति की इस स्वैच्छिक माध्यम ने आपको मीडिया से दूर किया है?
उल्टा यह मुझे ज्यादा करीब ले आया है। वैसे, मीडिया से दूर रहना पूरी तरह से बुरा सुझाव नहीं है। उनसे न ज्यादा दोस्ती अच्छी, न दुश्मनी!

पिछले दिनों ब्लॉग लेखन पर कोर्ट के फैसले आए। एक ब्लॉग लेखक को अपनी पोस्ट हटानी पड़ी। क्या इस माध्यम पर किसी प्रकार का सरकारी अंकुश उचित है?
देश का नागरिक होने के नाते मैं कानून का पालन करूंगा। अगर कानून प्रतिबंध लगाता है, तो हमें उसका पालन करना चाहिए।

आपके ब्लॉग पर रिड ऐंड टेलर का नाम आता है। इस प्रकार आपकी अभिव्यक्ति व्यावसायिक हो गई। इस स्थिति के सही या गलत होने पर विचार न करें, तो भी इस कदम के बारे में क्या कहेंगे?
हां, रिड ऐंड टेलर का नाम आता है। वह इसलिए आता है, क्योंकि मुख्यपृष्ठ की तस्वीर उनकी है। मैं इसके व्यावसायिक पहलू से अनभिज्ञ हूं। इस सवाल का सही जवाब सर्वर दे सकता है। अगर यह व्यावसायिक है, तो क्या हानि है! ब्लॉग चलाने में सर्वर को कुछ खर्च करना पड़ता होगा। अगर उसे किसी स्रोत से इस मद में धन मिल जाता है, तो मैं कोई हानि नहीं समझता। मुझे अपने ब्लॉग लेखन के पैसे नहीं मिलते और यह जारी है। प्रिंट मीडिया में कई स्तंभ प्रायोजित होते हैं। आप उन पर क्यों नहीं सवाल उठाते? या फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से यह सवाल क्यों नहीं पूछते कि वे अपने सारे गेम और रिअॅलिटी शो क्यों प्रायोजित करवाते हैं? या समाचार चैनलों की बात करें, तो उनकी बहस और बातचीत पाठकों और दर्शकों की राय के बगैर पूरी नहीं होती! यह राय मोबाइल फोन से भेजी जाती है और इससे वे पैसे कमाते हैं।

क्या ब्लॉग लेखन को अभिव्यक्ति की साहित्यिक विधा माना जा सकता है? यह भी तो एक प्रकार की डायरी है?
ऐसा बिल्कुल नहीं है। मैं इस योग्य नहीं हूं कि मेरी टिप्पणियों को साहित्य के नजदीक भी समझा जाए और न ही मेरी टिप्पणियों में रोज का ब्यौरा रहता है। यह तो महज प्रशंसकों से मेरी बातचीत है। बस, इसे अतिरिक्त महत्व न दें।

Tuesday, April 14, 2009

स्टूडेंट एकेडमी अवार्ड की होड़ में भारतीय फ़िल्म

पूना फिल्म इंस्टीटयूट के स्नातक देबाशीष मेढेकर की फिल्म स्वयंभू सेन फोरसीज हिज एंड छात्रों के ऑस्कर पुरस्कार की होड़ में है। इस साल स्टूडेंट एकेडमी अवार्ड के लिए सबसे ज्यादा एंट्री मिली है।
एकेडमी से मिली सूचना के मुताबिक इस अवार्ड के लिए अमेरिका के 103 कॉलेज और विश्वविद्यालयों से 559 फिल्में भेजी गई हैं। रेग्युलर पुरस्कारों की तरह इस कैटेगरी में भी विदेशी भाषा की एक फिल्म को पुरस्कार दिया जाता है। इस पुरस्कार के लिए 39 देशों से 57 प्रविष्टियां प्राप्त हुई हैं। भारत से पूना फिल्म इंस्टीट्यूट के स्नातक देबाशीष मेढेकर की फिल्म सूची में आ चुकी है। इस फिल्म में 26 जुलाई 2005 को मुंबई में आई बाढ़ के बीच बस की छत पर फंसे लोगों को एक व्यक्ति ऐसे फिल्ममेकर की रोचक कहानी सुनाता है, जिसने अपनी फिल्म के निर्माण के लिए स्टाक से लेकर कैमरा तक चुराया था।
उल्लेखनीय है कि एकेडमी ने कॉलेज और विश्वविद्यालयों के सिनेमा के छात्रों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से इस पुरस्कार की शुरूआत की। भारत के विधु विनोद चोपड़ा इस पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं।

Monday, April 13, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा ने मुझे बहुत आकर्षित किया-तनु शर्मा

हिन्दी टाकीज-३२
तनु शर्मा ने यह पोस्ट अपने ब्लॉग महुआ पर लिखी थी.पिछले महीने २४ मार्च को आई यह पोस्ट चवन्नी को हिन्दी टाकीज सीरिज़ के लिए उपयुक्त लगी थी.चवन्नी ने उनसे अनुमति मांगी.तनु ने उदारता दिखाई और अनुमति दे दी। चवन्नी को उनकी तस्वीर चाहिए थी.संपर्क नहीं हो सका तो महुआ से ही यह तस्वीर ले ली.वहां तनु ने अपने बारे में लिखा है...अपने ख्वाबों को संवारती, अपने वजूद को तलाशती, अपने जन्म को सार्थक करने की कोशिश करती,मैं,सिर्फ मैं.......


कल रात ब्रजेश्वर मदान सर ने एक मैसेज भेजा था....सिनेमा पर....(वही मदान सर जिन्हें सिनेमा पर लिखने के लिए पहले नेशनल एवॉर्ड से नवाज़ा गया )उसमें लिखा था....शेक्सपियर ने दुनिया को रंगमंच की तरह देखा....जहां हर आदमी अपना पार्ट अदा करके चला जाता है...सिनेमा तब नहीं था...जहां आदमी नहीं उसकी परछाईं होती है.....बाल्कनी...,रियर-स्टॉल....,ड्रैस सर्कल....या फ्रन्ट बैंच पर बैठा वो...परछाईयों में ढूंढता हैं...अपनी परछाईं....कहीं मिल जाए तो उसके साथ हंसता है...रोता है...सिनेमा की इस दुनिया में अपना जिस्म भी पराया होता है....फिल्म खत्म होने के बाद जब....ढूंढता है अपनेआपको...तो अपनी परछाईं भी नहीं मिलती....फिल्म का पर्दा खाली होता है....लगता है....मेहनत बेकार गई...फिर कोशिश करुंगा.....
मैनें इसका जवाब भेजा था, और इस कन्वरसेशन के बाद मैं यही सोचती रही कि सिनेमा हमारी ज़िंदगी पर कितना असर डालता है...हम कई बार सिनेमाई चरित्रों को जीते हैं....औऱ कई बार सिनेमा हमारे जैसे लोगों के चरित्र उठाकर....कोई एक मास्टर पीस बना देता है....और रील और पर्दे की दुनिया में वो कैरेक्टर हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं.....मैनें भी अपनी पढ़ाई के दौरान कहीं पढ़ा था कि साहित्य समाज का दर्पण होता है.....लेकिन मुझे सिनेमा भी समाज का ही दर्पण लगता था.....हमेशा से ही....बचपन से अब तक सिनेमा ने मुझे बहुत आकर्षित किया अपनी तरफ.....मैं हमेशा से ही इसका एक हिस्सा बनना चाहती हूं.....हालांकि मुझे अब तक ये नहीं मालूम कि मैं इसमें सबसे अच्छा क्या कर सकती हूं....मैं एक एक्टर बन सकती हूं या फिर डाएरेक्टर...या स्क्रिप्ट राइटर.....मालूम नहीं...कुछ भी मालूम नहीं....मालूम है तो बस एक ही शब्द...सिनेमा....शायद सिनेमा मुझ पर बहुत ज्यादा हावी रहता है.....हर वक्त.....
लेकिन सिनेमा के साथ ही जुड़ी एक और हकीकत भी है कि सिनेमा मे काम करने को सिर्फ एक ही नज़रिए से देखा जाता है....वो ये कि फलां इंसान इसलिए बंबई गया क्योंकि उसे हीरो या हीरोइन बनना है......इससे ज्यादा हमारे जैसे कस्बों के लोग और कुछ सोच ही नही पाते हैं.....क्योंकि वो चीज़ों को एक ही तरीके से देखते हैं और हमेशा सिर्फ अपने ही लकीर के फकीर वाले तरीके से सोचते हैं...वो ये नहीं देखते कि अगर रजनीकांत बस की कंडक्टर की नौकरी छोड़कर मुंबई नहीं गया होता तो आज साउथ फिल्म इंडस्ट्री को इतना बड़ा स्टार नहीं मिला होता...इसके अलावा भी बलराज साहनी, देवआनंद, धर्मेंद्र...और एन टी रामाराव अगर अपनी मिट्टी छोड़कर बाहर नहीं गए होते...तो आज हम सब इतने महान अभिनेताओं से महरूम ही रह जाते...ये वो लोग है..जो मेरी तरह ही किसी छोटी जगह में पैदा हुए और वहीं पले बढ़े....मुझे नहीं मालूम कि मैं बचपन से ही इतनी समझदार कैसे थी कि अपने सपनों के बारे में किसी को भी नहीं बताया करती थी....औऱ सिनेमा तो बिल्कुल भी नहीं...क्यों कि सिर्फ यही सुनने को मिलता......कि ये बिगड़ गई है...या फिर हाथ से निकल गई है....क्योंकि मैंने जितनी भी हीरोइन्स के बारे में बातें सुनी....उसे हमारे जैसे छोटे शहर के लोग अच्छा नहीं मानते थे...उनकी निगाह मे फिल्मी लड़कियां अच्छी नहीं होतीं थी....नर्गिस...मधुबाला जैसी अभिनेत्रियों को लोग बहुत पसंद करते थे औऱ आज भी करते हैं....उस ज़माने में ये अभिनेत्रियां ड्रीमगर्ल तो बन सकती थीं....उन धड़कते दिलों पर राज कर सकतीं थी.....फैंटेसी का एक हिस्सा भी हो सकतीं थी लेकिन प्रैक्टिकल दुनिया में इनकी कोई जगह....या फिर अपने ही परिवार की किसी लड़की का फिल्मों में काम करना तो सोच भी नहीं सकते...।सिनेमा ने ही कहीं ना कहीं....शायद मुझे बड़ा बनने का सपना दिखाया....मैने उसमें आदमी और औरतो के संघर्षों को देखा....उन्हें जाना और महसूस किया....सिनेमा मेरे लिए सिर्फ मनोरंजन कभी नहीं रहा....सिनेमा शायद मेरे लिए हमेशा से एक किताब की तरह भी रहा......जिसके ज़रिए मैं बाहर की दुनिया को.....अपनी छोटी सी दुनिया में बैठे-बैठे जान जाती थी...पढ़ती थी... और महसूस भी किया करती थी........सिनेमा के अजब-गजब चरित्र मुझे आकर्षित करते थे......एक तरफ अगर मुझे बंदिनी जैसी फिल्मों के गाने अच्छे लगते तो उस ज़माने की वैम्प औऱ डांसर हेलन भी मुझे बहुत आकर्षित करती थी.....लेकिन मैं ये भी जानती थी कि लोग इस तरह की महिलाओं को पसंद नहीं करते इसलिए कभी किसी को बताती भी नहीं थी......इसके अलावा मुझे हर वो कैरेक्टर अच्छा लगता था......जो बहुत नीचे से ऊपर उठता था.......जो बहुत ग़रीब होता था.....जो समाज की ज्यादतियों के खिलाफ लड़ता था......ये भी हो सकता है कि शायद उस दौर में फिल्में ही ऐसी बनती थी...सिर्फ औऱ सिर्फ एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन ही छाया रहता था शायद इसीलिए वो मेरे से एक पीढ़ी ऊपर के लोगों का हीरो होने के बावजूद मेरा भी हीरो बना...अमिताभ की अग्निपथ,जंज़ीर,शक्ति...और शोले जैसी फिल्मों से मुझे अग्रेशन मिला तो...उसी दौर के बाकी सिनेमा ने भी मुझे कुछ न कुछ सिखाया.....वो फिल्में इसलिए भी अच्छी लगती थीं कि उनके छोटे से छोटे कैरेक्टर से भी आप खुद कहीं न कहीं रिलेट हो पाते थे....मुझे बड़ा फक्र होता है ये सुनकर कि उस टाइम में शहर में आने वाला सबसे पहला टेलीविज़न मेरे पापा लाए थे....और आज भी मेरे शहर के लोग मुझसे मिलने पर कहते हैं कि हम तुम्हारे घर आया करते थे....टीवी और फिल्में देखने......मेरे साथ सिनेमा काफी जुड़ा हुआ सा है....मुझे कभी भी फिल्में देखने का मन इसलिए नहीं किया कि टाइम पास करना है या बस कुछ करने के लिए नहीं बल्कि इसलिए...क्योकि उनसे कोई ना कोई संदेश भी मिलता था....मैं फिल्मों की शौकीन इसलिए भी बनीं क्योंकि मेरी ताईजी को इसका शौक था और उन्हीं की फरमाइश पर घर में फिल्मों के लिए वीसीआर आया करता था.....और हम लोग बाकायदा रात में आंगन में दरी-कालीन....तखत...कुर्सी लगाकर...बिल्कुल सिनेमा हॉल की तरह ही फिल्म देखा करते थे......हां बाकायदा फिल्मों पर डिस्कशन भी हुआ करता था.....इसलिए ऐसा ही कुछ अच्छा लगता था.....लेकिन जो कुछ भी था...मैं उन्ही जीती-जागती....और बड़े पर्द की दुनिया के साथ-साथ बड़ी हो रही थी.....औऱ हां खास बात ये रही कि.....बड़ा पर्दा अपनी ज़िदगी में मैने काफी बड़े होने के बाद ही देखा था....यानि जब मैं क्लास 12 में थी तब पहली बार सिनेमा हॉल में जाकर हम आपके है कौन... फिल्म देखी थी....और उसके बाद से आज तक वो बड़े पर्दे का मोह नहीं छूट पाया.....सिनेमा की दुनिया बड़ी अजीब दुनिया है....करन जौहर की फिल्में अगर आपको लार्जर दैन लाइफ दिखाती हैं तो अनुराग कश्यप अपने लीक से हटकर चलने के लिए ज्यादा जाने जाते हैं...देवडी बिल्कुल अलग और आज का सिनेमा है लेकिन हमसे हटकर नहीं....फर्क सिर्फ एक्सेप्टेंस का है....जितना जल्दी हम लोग स्वीकार कर लें....हमारे लिए ही बेहतर है....सिर्फ एक ही कमी लगती है....दुनिया को सिर्फ भारतीयों की निगाह से ही देखा है...अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जो सिनेमा ने हमें दिया है और हम तक पहुंचा नहीं....सिनेमा आज भी हमें बहुत कुछ दे सकता है......लेकिन बहुत से लोगों के लिए सिनेमा महज़ मनोरंजन का साधन मात्र है.....लोग कहते हैं कि फिल्म ही तो देखनी है....घर पर डीवीडी में देख लो लेकिन शायद वो ये नही जानते कि बड़ा पर्दा कितनी अहमियत रखता है मेरे लिए....वो महज़ एक टाईम पास नहीं है...वो भीड़ में बैठकर सिनेमा देखना नहीं है....वो पॉपकॉर्न खाते हुए वैसा कुछ नही है जिसे ज्यादातर लोग करते हैं.....वो एक अजब और अलग दुनिया है......जहां सिर्फ और सिर्फ अंधेरे के बीच बड़ा पर्दा और मैं होते हैं......अपने ही ताने बाने को बुनते सुलझाते लम्हों को साझा करते.....उस पर्दे के पार समझने की कवायद करते और एक दिन वैसा ही बड़ा पर्दा बनाने का जुनून पालते.....वो कुछ और ही एहसास है ....जिसे शायद वक्त के आने पर मैं कभी बयां कर पाऊं......सिनेमा के ही ज़रिए

Thursday, April 9, 2009

दरअसल:नहीं दिखेंगी नई फिल्में


हिंदी फिल्मों के दर्शकों के लिए अगले दो महीने मुश्किल में गुजरेंगे। कोई नई या बड़ी फिल्म रिलीज नहीं होगी। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक मल्टीप्लेक्स मालिकों और निर्माताओं के बीच लाभांश को लेकर सहमति नहीं बन पाई है। अगर बात नहीं बनी, तो घोषणा के मुताबिक अप्रैल के अंत तक कोई नई फिल्म मल्टीप्लेक्स में नहीं लगेगी। फिलहाल 8बाई10 तस्वीर के बाद अक्षय कुमार की 29 मई को फिल्म कमबख्त इश्क का रिलीज होना तय है।
खास बात यह है कि अभी से लेकर 29 मई के बीच कोई भी बड़ी फिल्म रिलीज नहीं हो रही है। ज्यादातर निर्माता आईपीएल की वजह से अपनी फिल्मों की रिलीज आगे बढ़ा चुके थे। हालांकि आईपीएल अब भारत की भूमि से निकल चुका है, फिर भी निर्माता इस दरम्यान अपनी फिल्में रिलीज नहीं कर रहे हैं। माना जा रहा है कि आईपीएल दुनिया में कहीं भी आयोजित हो, उसका सीधा प्रसारण भारत में होगा ही।
पिछले साल का अनुभव बताता है कि दर्शक आईपीएल के सीजन में सिनेमाघरों का रुख नहीं करते। इसके अलावा, इस बार चुनाव भी है। अप्रैल के मध्य से चुनाव आरंभ होंगे और अलग-अलग तारीखों को विभिन्न प्रदेशों के मतदाता बॉक्स ऑफिस के बजाए पोलिंग बूथ पर नजर आएंगे।
राजनीति, क्रिकेट और फिल्म.., इन तीनों क्षेत्र में देश के तमाम नागरिकों की रुचि रहती है। जाहिर है कि अगर दो क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ेगी, तो तीसरे क्षेत्र पर नागरिकों का ध्यान कम ही जाएगा। इसलिए निर्माताओं ने चुनाव और क्रिकेट के सीजन में फिल्म रिलीज कर नुकसान उठाने से बेहतर समझा कि रिलीज की तारीखें आगे बढ़ा दी जाएं। पहले भी विशेष अवसरों पर फिल्मों की रिलीज आगे-पीछे की जाती रही हैं! पिछले साल आईपीएल की लोकप्रियता से फिल्म निर्माताओं को भारी झटका लगा था। चूंकि पिछला साल आईपीएल का पहला साल था, इसलिए नए प्रकार के क्रिकेट के प्रभाव से निर्माता अनभिज्ञ थे। कहते हैं कि दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है। इसलिए इस बार निर्माता और वितरक सावधान हैं। 0
अब अहम सवाल यह है कि क्या दर्शक लगभग दो महीनों तक बगैर नई फिल्में देखे रह पाएंगे? वे आईपीएल या चुनाव में कितने दिन तक उलझे रहेंगे? फुर्सत मिलते ही उन्हें मनोरंजन के पारंपरिक माध्यम सिनेमा का सहारा चाहिए। हर किसी की रुचि क्रिकेट में नहीं होती। ऐसे दर्शकों का काम कैसे चलेगा? समस्या सिनेमाघरों के मालिकों को भी झेलनी होगी। दो महीनों तक नई फिल्मों के अभाव में वे सिनेमाघर के आवश्यक खर्च कहां से निकालेंगे? अगर नियमित आमदनी नहीं हो रही हो, तो उन्हें कर्मचारियों को दो महीने का वेतन देना भारी पड़ेगा। क्या ऐसे में पुरानी फिल्मों के प्रदर्शन से काम चलाया जाएगा?
स्तंभ के आरंभ में मल्टीप्लेक्स मालिक और निर्माताओं के बीच पैदा हुए गतिरोध का उल्लेख हुआ है। यह एक बड़ा मुद्दा है। लाभांश के मामले में फिलहाल कोई झुकता नहीं दिख रहा है। हमने देखा कि पिछले दिनों आ देखें जरा इसी विवाद के कारण मल्टीप्लेक्स में रिलीज नहीं हो पाई। दोनों पक्षों के अपने तर्क और आग्रह हैं। फिल्म के ट्रेड पंडितों का एक समूह मानता है कि मल्टीप्लेक्स के मालिकों का स्टैंड गलत है। उन्हें लाभांश के मामले में निर्माताओं के 50-50 शेयरिंग का प्रस्ताव मान लेना चाहिए। यह दोनों के हित में है।
गौरतलब है कि अभी तक मल्टीप्लेक्स के मालिक हर फिल्म की रिलीज के समय निर्माताओं से लाभांश का सौदा करते हैं, लेकिन अब निर्माता चाहते हैं कि कोई सर्वमान्य फार्मूला तय हो जाए, ताकि हर हफ्ते की झंझट और अनिश्चितता से निजात मिले।
गतिरोध और नई फिल्मों के सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच पाने की स्थिति में नुकसान दर्शकों का ही होगा। दर्शक सिनेमाघरों में नहीं जा सकेंगे। इसका सीधा प्रभाव फिल्म बिजनेस पर पड़ेगा और ऐसी स्थिति में सिनेमाघरों के मालिकों और निर्माताओं पर भी इसका असर पड़ेगा। कुल मिलाकर सभी के लिए घाटे की स्थिति है, लेकिन कोई भी समझने को तैयार नहीं है।

Monday, April 6, 2009

हिन्दी टाकीज:ज़िन्दगी में लहर फिल्मों ने दी-दीपांकर गिरी



हिन्दी टाकीज-३१


इस बार हैं दीपांकर गिरी। दीपांकर इन दिनों फिल्मों के लेखक बनने की तैयारी में हैं। साहित्य और सिनेमा का समान अध्ययन किया है उन्होंने। अपने परिचय में लिखते हैं...झारखंड के छोटे से चिमनी वाले शहर के एक साधारण घर में जन्म । लिखने पढने की बीमारी विरासत में मिली,जिसके कारण अंत में जामिया मिलिया में जाकर मास मीडिया में एडमिट हो गया। साहित्य ,कविता,कहानियों की दवाइयां लेकर वहां से निकला और दैनिक भास्कर,प्रभात खबर होते हुए मुंबई की राह पकड़ ली। टीवी सीरियलों ने कुछ दिन रोजी-रोटी चलाई। फिलहाल अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट लेकर दफ्तर दर दफ्तर यायावरी,फिर भी बीमारी है कि कतमा होने का नाम नहीं लेती।


ज़िन्दगी में लहर फिल्मों ने दी
कल की ही बात है...
अधिक मौसम नहीं बीते हैं। लगता है जैसे कल की ही बात है और मैं झारखंड के एक छोटे से ऊंघते हुए शहर "चंदपुरा" के पपड़ियां उचटते सिनेमा हाल के बाहर लाइन में लगा हूं और डर इसका कि कहीं टिकट ख़त्म न हो जाए। तमाम धक्कामुक्की के बाद चार टिकट लेने की कामयाबी थोड़ी देर के लिए जिंदगी में खुशबू भर देती है। मल्टीप्लेक्स के कंप्यूटर से निकले टिकटों के इस दौर में भी आज गहरे गुलाबी रंग के उस पतले से टिकट की खुशबू उसी शिद्दत से सूंघ सकता हूं। वहां तब से लेकर आज तक सिर्फ एक ही हाल है और उसका नाम है विकास टाकीज। उसका विन्यास कुछ ऐसा है कि "वि" अलग लिखा है "का" अलग और "स" अलग। इस डिजाइन से अधिक नुकसान तो नहीं हुआ, बस "का" के मिट जाने पर अब वह दूर से "विस" लगता है। रोचक तथ्य यह है कि जब ये "विकास" दिखता था तब वह इस सिनेमा हाल के सुनहरे दिन थे। इसी सिनेमा हाल में मैने बचपन में "गंगा किनारे मोरा गांव" देखी थी और यहीं पर देखा था "पिया के गांव"। यहीं "दोस्ताना" देखी थी, "मर्द" देखी थी और यहीं पर "मिस्टर इंडिया" देखी थी। परिवार के साथ यहीं देखी थी "संयोग" और "बीस साल बाद" और भी न जाने कितनी जिनके नाम याद नहीं।तब सब जाते थे देखने और हम बच्चे भी खुशी में चहकते हुए।

पांच दिन लगातार 'दिलवाले दुलहनियां ले जाएंगे'
फिर हम बड़े हुए और परिवार के साथ जाने पर जैसे हमारा कद घट जाता था सो परिवार की जगह दोस्तों ने ले ली थी और जो पहली फिल्म दोस्तों के साथ देखी वो थी 'दिलवाले दुलहनियां ले जाएंगे'। ये वो दिन थे जब हम नये नये जवान हो रहे थे और अपनी जवानी पर बड़े इतराते थे पर इस फिल्म ने जिंदगी के आवारापने पर बड़ा कहर ढाया और हमें संजीदा बना दिया। इस फिल्म का ऐसा असर रहा कि रात भर सो न सके और अगले दिन फिर से जाकर काउंटर की लाइन में खड़े हो गए। टिकट के पैसे अगले हफ्ते लगने वाली फिल्म के लिए थी और एक ही फिल्म के लिए दो बार पैसे लुटाना बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं था,लेकिन मन कहां माने राज और सिमरन के लिए हमारे दिल धड़कने लगे थे। दूसरे दिन फिल्म देखने के बाद भी हमारा जी नहीं भरा तो हमलोगों ने अपने चाय और समोसे कुर्बान कर दिये और अगले दो दिन भी फिल्म देख ली। चार दिन लगातार फिल्म देखने के बाद पांचवे दिन के लिए हमारी जेब ने हाथ खड़े कर दिये। कोई उपाय न देख पांचवे दिन हम सभी दोस्तों ने एक उपाय निकाला और अगले दिन हम सभी अपने अपने पंचर सायकल सड़कों में घसीटते हुए आखिरकार सिनेमा हाल की दीवार से टिका दी। झूठ को जितने तरीके से मरोड़ा जा सकता था हमने मरोड़ दिया। पांच दिन एक फिल्म को देखने के बाद भी हमारा जी नहीं भरा था और कोई रास्ता नहीं था फिर भी हमने अपने सायकल उधर मोड़ दिया और उस दिन जैसे चमत्कार हुआ और टॉर्च वाले को हम पर दया आ गई और हमें आगे की सीट पर बिठा दिया। हमारे संकट के समय में टॉर्च वाला देवदूत बनकर अवतरित हुआ था। ये तो थी हम पगलों की बात पर इस फिल्म ने जैसे हमारे शहर को भी एक धागे में बांध दिया था। टाउनशिप के डॉक्टर,इंजीनियर,हमारे टीचर,पापा और उनके दोस्त. मां और दीदी की मंडली सब ने मिलकर एक सुर में इस फिल्म को देखा और विकास टाकीज के कैंपस में दिन चटाखेदार धूप की तरह चमकने लगी थी और रातें शंघाई की तरह सजती थी। टाकीज के बाहर बाजार थे। सारा शहर सिनेमा के रंग में डूबा हुआ था। ये विकास टाकीज के सुनहरे दिन थे,जिसके मैनेजर को स्टेशन मास्टर और टीटी साहेब से अधिक सम्मान दिया जाता था और जिनका कद एसबीआई के बैंक मैनेजर से ज्यादा था। ये सिनेमा हाल हमारे टाउनशिप की संस्कृति बन चुका था। खुशी के हर मौके पर लोग परिवार सहित इस हाल में आते थे। लोग अपने रिश्तेदारों को लेकर आते थे और गर्व से यहां फिल्म दिखाते थे।
ये सिलसिला आगे के कई सालों तक चलता रहा,मगर धीरे धीरे धूप ढलने लगी और इन्ही में से किसी दिन "विकास" "विस" में बदल गया। और तभी इनके पोस्टर बदलने लगे थे। अब उस पर लगे पोस्टर या तो "गुंडा" जैसी फिल्मों की होतीं थी या मिथुन दा की "जल्लाद" और कभी-कभार "सर कटी लाश" तक भी बात पहुंच जाती थी ।

कालोनी की ज़िन्दगी और 'मोहरा'
कालोनी लाइफ की अपनी मजबूरियां होती हैं। यहां पर बच्चों और बच्चों के मां-बाप को पढ़ने और पढ़ाने की एक बीमारी होती है।सुबह चार बजे सब एक-दूसरे के घरों की तरफ देखते हैं कि किन की लाइट जल रही है। लाइट जलने का मतलब ये है कि मिश्रा जी का बेटा या बेटी पढ़ाई कर रहें हैं तो जब वो पढ़ाई कर रहें हैं तो हमे भी पढ़ाई करनी चाहिए। इस लोकप्रिय सिद्धांत के फलस्वरूप हमें सुबह कड़कडाती ठंड में पढ़ाई करने को मजबूर किया जाता था। शाम के वक़्त घरों में कुछ शब्द रोज-रोज सुनाई देते थे मसलन आई आई टी,मेडिकल,कोचिंग, फिजिक्स, कैलकुलस, brillient tutorials ... फलाने जी के लड़के का आइआइटी में हो गया। फलाने जी की लड़की का एम्स में हो गया है। तो घरों पर,चाय की दुकान पर,राशन की दुकान पर,जहां देखो यही बातचीत। हर अभिभावक अपने बच्चों के लिए प्रभावी कोचिंग कराने की तैयारी में लगा हुआ है। और जब कालोनी के एकमात्र सिनेमा हाल में "गुंडा" जैसी फिल्में लगने लगें तो उधर का रुख करना आत्महत्या के बराबर था और अगर गलती से कोई फिल्म देख ली तो फिर खैर नहीं। अब "विकास" भरी दुपहरी में ऊंघता रहता और कोई भी उसके पास नहीं फटकता था। लेकिन मेरा मन नहीं मानता था। बचपन की आदत थी कैसे छूटे। एक घटना जो इस सिलसिले में याद आती है वो ये है कि एक साल जब छठ का आया तभी विकास टाकीज में "मोहरा" लगी हुई थी। उन दिनों हम अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी की एक्शन फिल्मों के दीवाने थे,लेकिन देखने का कोई सुनहरा मौका नजर नहीं आ रहा था। लेकिन "छठ" ने ये समस्या सुलझा दी थी इसलिए छठ के दिन जब सारा परिवार नदी किनारे छठ मनाने जा रहा था तो मैने तबियत खराब होने का दुनिया का सबसे पुराना बहाना बनाया,जिसमें पानी के पास फटकने से भी उस तबियत के लिए और भी खतरा उठाना था,इसलिए मुझे घर पर रहने की छूट मिल गई और मैने बड़े मिजाज से घर में ताला जड़ कर "मोहरा" देख डाली,लेकिन जब घर लौटा तो नजारा कुछ और ही था। ताजा खबर ये थी कि छठ के इस शुभावसर पर किसी नास्तिक चोर ने हमारे आंगन में सूख रहे कपड़े गायब कर दिए थे। मैने बहाना लगाने की कोशिश की कि मैं दरवाजे खिड़कियाँ बंद कर सोया था,लेकिन फिर भी अपने हिस्से की डांट सुन ही ली. लेकिन अगले दो दिन तक जो अपने दोस्तों के बीच हीरो बनकर रहा,उसके सामने ये डांट तो कब का काफुर हो गया पता ही नहीं चला।

उम्र बढ़ी और बोकारो पहुंचे
लेकिन इसके बाद चंदपुरा में फिल्म देखना नामुमकिन हो गया। चंदपुरा काफी छोटी जगह है और इस छोटे जगह की समस्या ये है कि इसके पास न तो शहर जैसी आवाजाही और न भीड़भाड़ है है न ही गांव वाला "गंवईपन"। और गांव और शहर के बीच लटके इस टाऊनाशिप में लगभग पांच हजार लोग काम करते हैं इसलिए तकरीबन लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं। इसलिए ये चोरी-छिपे फिल्म देखने का मतलब एक दिन घर में बात पहुंच जानी थी।इसलिए हम सब दोस्तों ने यह मशविरा किया कि फिल्में चंदपुरा को बजाए अपने नजदीकी शहर बोकारो में देखी जाए। लेकिन वहां जाएं कब क्योंकि हफ्ते में छह दिन तो इंटरमीडएट की कक्षा ये थी। काफी सोच-विचार कर इस नतीजे पर पहुंचे कि शनिवार को कलासेस बंक कर बोकारो निकल जाया जाए।बस फिर क्या था अगले ही शनिवार से हम पढ़ाई के नाम पर बैग में एक टी शर्ट ... कुछ नाम की किताबें और लंच बॉक्स लेकर अपनी सायकल में हम युनिफोर्म पहने घर से निकल जाते थे और जिस तरह से "राग दरबारी" में शक्कर की बोरियों से लदा टक कोआपरोटिव की तरफ न मुड़ कर शहर की तरफ सीधी निकल गयी थी और वहीं से कोआपरेटिव में गबन शुरु हो गया था,उसी तरह हमारी सायकलें स्कूल की तरफ न मुड़ कर बायें में नदी और जंगलों के बीच मुड़ जाती थी,जहां से बोकारो जाने का कच्चा रास्ता बना था। बोकारो जाने को लिए नदी का रास्ता काफी खराब था टेढ़े मेढ़े पथरीले पठारी। एक रस्ते में जितनी खराबियां हो सकती है वो सब उसमें मौजूद थी। तिस पर नदी में कोई स्थायी पुल भी नहीं था। नदी को किनारे वाले गांव के लोगो ने अपने आने-जाने के लिए बांस का एक पुल बनाया था,जिसे पैदल पार करने का भाड़ा आठ आना था और सायकल ले जाने का एक रुपया। हमलोगो में से हर एक के पास बमुश्किल १० या १२ रुपये होते थे,जिसमें एक रुपये उसमें चले जाते थे।हां इतनी मुरव्वत ठेकेदार ने हमारे लिए जरूर कर दी थी कि हमें आने के पैसे नहीं देने होते थे। और लगभग हर मौसम में हमने ये नदी पार की। कई बार गिरे बारिश में फंसे। कीचड़ में कपड़े भी गंदे हुए लेकिन सिनेमा घर में बड़े से परदे का मोह नहीं छोड़ पाते और इस तरह नदियों,पहाड़ों और जंगलों से होकर हम चांदी की तरह चमचमाते बोकरो स्टील सिटी में इंटर करते थे।साफ सुथरी चौड़ी सड़कें । दिन का पहला शो १२ बजे शुरु होता था। और हम वहां लगभग ११ बजे पहुंच जाते थे।वहां पहुंचकर एक अठन्नी सायकल पार्किंग वाले को देना पड़ता था और टिकट आती थी लगभग सात रुपए की। हालांकि आगे की टिकट पांच रुपए की ही आती थी,लेकिन आगे कौन बैठे। इतना पहाड़ पर्वत लांघने के बाद गरदन ऊंची करके देखने के लिए आए हैं क्या? इसलिए हम बालकनी में बैठते थे। बचते थे तीन या चार रुपए। उसमें भी अगर सायकल पंक्चर हो गया तो दो रुपये उस में चले जाते थे। इस एक घंटे के समय में हम घर से मिले अपने अपने लंच बॉक्स साफ कर देते थे।बोकारो में तीन सिनेमा हाल हैं देवी,जीतेन्द्र और पाली प्लाजा। देवी थोडा महंगा था इसलिए हम या तो जीतेन्द्र में देखते थे या पाली पर.ज्यादातर फिल्में हमने पाली मे हीं देखी। यहां देखी जो महत्त्वपूर्ण फिल्में याद हैं,वे सब ९० के मध्य दशक के बाद रीलिज हुई फिल्में थीं,जिनमे अजय देवगन की "जंग" थी।

सटीक गानों से मिलती थी मदद
ये वो वक़्त था जब हमारा अक्षय कुमार से मोहभंग हो चुका था और हमारा नया एक्शन हीरो था अजय देवगन। इसलिए "जंग" देखने के बाद हमने जीतेन्द्र सिनेमा घर में हमने अगले हफ्ते "दिलजले" देखी। उस उस फिल्म में एक गाना था जिसने हमारे ऊपर बडा एहसान किया था। एहसान इस तरह से कि इंटरमीडिएट में हमारे साथ बहुत सारी नयी लडकियां आयीं और उनको खुद की तरफ खींचने के लिए ये गाना एकदम सटीक था और वो गीत था "जिसके आने से रंगों मे डूब गई है शाम सोच रहा हूं उससे पूछूं उस लड़की का नाम। और अगली लाइन में बड़े अच्छे लफ्जों का प्रयोग किया गया था। कहना न होगा कि इस गीत ने हमारा कितना काम किया। अगली फिल्म जो पाली में लगायी गयी वह थी सुपरहिट फिल्म "राजा हिन्दुस्तानी"। इस फिल्म के गाने पहले ही हिट हो चुके थे "परदेसी परदेसी" ने जो धमाल मचाया था,उससे पूरा माहौल "परदेसी परदेसी" हो गया था। जिनकी प्रेमिकाएं एक दिन के लिए भी शहर से बाहर अपने रिश्तेदारों के पास चली जाती थी उनके आशिकों के मुंह से अचानक "परदेसी परदेसी जाना नहीं " निकल जाता था और मुझे याद है शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां उन दिनों "राजा हिन्दुस्तानी " का आडियो कैसेट न हो। कई बार तो एक ही मोहल्ले से एक ही साथ कई घरों से "परदेसी परदेसी" की आवाजें आती थी। खैर इस फिल्म ने इतना उत्पात मचाया कि लोग "दिलवाले दुलहनियां " और "हम आपके हैं कौन" की अगली कड़ी के रुप में इस फिल्म को देखने लगे।

सनी देओल का जादू
हमारे दूसरे सुपरस्टार थे "सनी देऒल"। उस समय अचानक पाली में एक के बाद एक सनी देऒल की फिल्में लगने लगी थी।पोस्टर देखकर हम इत्मीनान कर लेते थे कि उसमें कीमती इबारतें जैसे "रोमांस और मारधाड़ एकशन से भरपूर" और
ये पढ़ने के बाद जब तक फिल्म देख नहीं लेते थे तब तक हमें चैन नहीं मिलता था। सडकों पर जब सनी साहब हीरोइन के लिए मारपीट करते थे तो हमें अनिर्वचनीय खुशी मिलती थी। उन दिनों हमने उनकी जो जो फिल्में देखीं वे थीं सबसे पहले 'बॉर्डर' फिर जैकी सनी मनीषा की "दुश्मनी"। उसके बाद देखी थी "घातक" और फिर "अजय"। "अजय" हमें खास प्रिय था क्योंकि उसमें एक गीत था "छम्मकछल्लो जरा धीरे चलो वरना जाऒगी फिसल जो कि फिर से हमारे बड़े काम का था। इस फिल्म का नशा किसी ने तोड़ा तो वो थी सनी देओल ,करिश्मा कपूर,सलमान अभिनीत "जीत" ने। इस फिल्म के पोस्टर पर लिखा था "एक वायलेंट लव स्टोरी "। ये लाइन हमें आकर्षित कर गई क्योंकि हम उन दिनों ऐसी अवसथा में थे,जहां हम अपनी प्रेमिकाओं के लिए किसी भी तरह का "वायलेंस" कर सकते थे। ये अलग बात थी कि उसके बाद भी वे हमें घास नहीं डालती थीं। सनी देऒल का भी हमारे ऊपर काफी गहरा असर था जिसके फलस्वरूप हमने कई स्थानों पर कुछ हुड़दंग और मारपीट तक कर दी थी। इसके लिए दो फिल्में जो हमें याद हैं जो हमने केवल देखने को लिए देख ली थी वे थी "अग्निसाक्षी " और "बाल ब्रह्मचारी " । "अग्निसाक्षी' हम नाना पाटेकर के लिए गए थे और "बाल ब्रह्मचारी " हम राजकुमार साहब को सुपुत्र का अभिनय देखने के लिए गए थे। उन दिनों हमें अभिनय कितना समझ में आता था इसका तो हमें अंदाजा नहीं,लेकिन जितना आता था वो भी हम उस फिल्म के साथ भूल गए। फिर शाहरुख खान की "करण अजुन" कहीं से लौटकर फिर से पाली में लगी। बस फिर क्या था। हम ममता कुलकर्णी को दीवाने हो गए जो अक्षय कुमार की "सबसे बडा खिलाड़ी " में जाकर चरम सीमा में पहुँच गई। उन दिनों हमारे सुपरस्टार अलग-अलग अवतारों जैसे शाहरुख लौट रहे थे "चाहत" से। माधुरी अंखियां मिलाते हुए लौटीं "राजा" से और अक्षय "सबसे बडा खिलाड़ी" से। और ये सब फिल्में हमने पाली में देख लीं।

टीटी की वैकेंसी और 'डर '
उन्हीं दिनों किसी दोस्त ने बताया कि शाहरुख की चर्चित फिल्म "डर" फिर से कतरास के लक्ष्मी टाकीज मे आयी है। हमने "करण अर्जुन " देख ली थी और "डर" के बारे में इतना सुन रखा था कि हम इस मौके को हाथ से जाने देना नहीं चाहते थे। हमारा "अनुसंधान" कहता था कि "डर" का फिलहाल पाली क्या बोकारो के किसी भी सिनेमाघर में लगना संभव नहीं है इसलिए इस फिल्म को कतरास में ही देखा जा सकता था। तो इस विषय पर हमारी टोली की एमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई और "डर" देखने की योजना पर गंभीर विचार विमर्श हुआ। तमाम तरह की संभावनाऒं को टटोलने के बाद हमें कोई सालिड बहाना नहीं मिल रहा था। तभी एक ऐसे मित्र ने जो हमारे गैंग में शामिल नहीं था और जो "पढाकुऒं" की श्रेणी में आता था उसने आकर पूछा कि रेलवे ने टीटी की वैकेंसी निकाली है और क्या तुम लोगों में से कोई जाना चाहता है क्या । पहले तो हमने उसे भगा दिया,लेकिन हममे से एक का ध्यान उस पर अटका रहा और उसने बाद में हमें चेताया कि वह पढ़ाकू हमें काम की बात बता गया है।हम सब का माथा ठनका और फामॆ चूँकि चंदपुरा जैसे छोटे जगह में मिलना मुश्किल था इसलिए हमने अपने घरों में ये कहा कि हम टीटी के लिए एप्लाई करना चाहते थे,इसलिए फामॆ लाने धनबाद जाना होगा । घरवाले आशचयॆचकित लेकिन थोडे खुश भी हुए। उनहें लगा कि हम कैरियर के पति काफी सचेत हो रहें हैं। लेकिन घर के बड़ों ने कहा कि फामॆ हम ला देते हैं तुम क्यों जा रहे हो? हमने जिस तरह से इस बात का प्रतिवाद किया उतना कभी पढाई को लेकर नहीं किया। मैंने कहा कि अब हम बड़े हो गए हैं अभी दुनिया नहीं देखेंगे तो कब देखेंगे और इस तरह के तमाम वाहियात से तकॆ दे दे कर मैंने घर से छुट्टी ले ली । कमोबेश ऐसी ही स्थिति का सामना बाकी दोस्तों ने भी किया लेकिन अंतत: सभी दोस्त इतवार की सुबह सुबह स्टेशन पर मिल ही गए और हम धनबाद जाने वाली ट्रेन में बैठ गए लेकिन हम धनबाद जाने के बजाए चुपके से कतरास उतर गए और वहां से सीधो लक्ष्मी टाकीज पहुंच गए। सिनेमा हाल अभी खुला भी नहीं था और लगभग दो घंटे इधर-उधर भटकने के बाद हाल खुला और हमने सबसे पहले लाइन में खड़े होकर टिकट ले लिया। वो हाल क्या था ज्यादातर दर्शकों का अनुमान था कि ये हाल नहीं गोदाम है। चूहे हमारे शरीर के ऊपर दौड़ रहे थे. परदे नीचे से फटा हुआ था। कुर्सियों में गद्दी नाम की थी पर एक बार फिल्म शुरु हो जाने के बाद इन सब बातों का खयाल कहां रहता है। "डर" देखकर जो आत्मा को शांति मिली थी,वह हमारी आत्मा ही जानती थी। लेकिन घर लौटते वक़्त सबके जेहन में एक ही सवाल था कि फामॆ का क्या बहाना बनाएंगे। खैर इस मुश्किल सवाल का एक सीधा-साधा जवाब ढूढ लिया गया और जो होगा सो देखा जाएगा के तजॆ पर घर में एंट्री मार दी। घरवालों ने पूछा तो आत्मविश्वास से भरकर कह दिया कि फामॆ ख़त्म हो गया अगले हफ्ते आएगा। इस जवाब के तह में जाने की किसे फुसॆत थी सो उस दिन बडी अचछी नींद आयी।

और फिर मैं "परदेसी" हो गया
इतना सब कुछ करते हुए कब इंटरमीडिएट की परीक्षाएं आ गईं पता ही नहीं चला। रिजलट आते आते हम सब दोसत ये समझ चुके थे कि अब हमारा यहां से आगे की पढाई के लिए रूखसत का वक़्त है। वो नदी,पहाड़, जंगल,फिल्में सब कुछ हम से छूट रहे था और मैं दिल्ली जाने वाली गाड़ी में बैठ चुका था। दिल्ली जाते वक़्त सारे सिनेमाई परदे मेरी आंखों के सामने से गुजरने लगे। एक पल के लिए लगा जैसे शायद ही फिर कभी लौटना होगा। उस वक़्त सचमुच लगा कि मैं "परदेसी" हो गया।


मेरी पसंद की फिल्में


मकबूल,जागते रहो,बैंडिट क्वीन,एक रुका हुआ फ़ैसला,इजाज़त,आंधी,ब्लैक फ़्राइडे.हासिल,अर्धसत्य,मम्मो

Friday, April 3, 2009

फ़िल्म समीक्षा:8x10 तस्वीर

भेद खुलते ही सस्पेंस फिस्स
नागेश कुकुनूर ने कुछ अलग और बड़ी फिल्म बनाने की कोशिश में अक्षय कुमार के साथ आयशा टाकिया को जोड़ा और एक नई विधा में हाथ आजमाने की कोशिश की। इस कोशिश में वे औंधे मुंह तो नहीं गिरे, लेकिन उनकी ताजा पेशकश पिछली फिल्मों की तुलना में कमजोर रही। कहा जा सकता है कि कमर्शियल कोशिश में वे कामयाब होते नहीं दिखते। नागेश वैसे निर्देशकों के लिए केस स्टडी हो सकते हैं, जो अपनी नवीनता से चौंकाते हैं। उम्मीदें जगाते हैं, लेकिन आगे चलकर खुद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कोल्हू में जुतने को तैयार हो जाते हैं। अपनी पहली फिल्म हैदराबाद ब्लूज से उन्होंने प्रभावित किया था। डोर तक वह संभले दिखते हैं। उसके बाद से उनका भटकाव साफ नजर आ रहा है।
8/10 तस्वीर में नागेश ने सुपर नेचुरल शक्ति, सस्पेंस और एक्शन का घालमेल तैयार किया है। जय पुरी की अपनी पिता से नहीं निभती। वह उनके बिजनेश से खुश नहीं है। पिता-पुत्र के बीच सुलह होने के पहले ही पिता की मौत हो जाती है। जय को शक है कि उसके पिता की हत्या की गई है। जय अपनी सुपर नेचुरल शक्ति से हत्या का सुराग खोजता है। उसके पास अद्भुत शक्ति है। वह तस्वीर के जरिए बाद की घटनाओं को देख सकता है। नागेश ने जय की पिता की हत्या के पहले खींची तस्वीर में मौजूद चारों व्यक्तियों के जरिए घटनाओं को जोड़ते हुए सस्पेंस बढ़ाया है। जय को लगता है कि वह हत्यारे तक पहुंच रहा है, लेकिन जब हत्यारे का पता चलता है तो हंसी आती है। नागेश ने फिल्म में लंबे समय तक सस्पेंस बनाए रखा है। सस्पेंस खुलता है तो फिल्म अचानक लड़खड़ा जाती है। सस्पेंस फिल्मों के साथ दर्शकों की जिज्ञासा तभी जुड़ी रहती है, जब कातिल भी दृश्यों में मौजूद हो और उस पर शक नहीं कर पा रहे हों।
नागेश ने शिल्प में आधुनिक तकनीक व स्पेशल इफेक्ट का सुंदर उपयोग किया है। अक्षय के एक्शन दृश्य हैरतअंगेज तो नहीं हैं, लेकिन वे किरदार से मेल खाते हैं। फिल्म का लोकेशन कहानी के उपयुक्त है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी पटकथा है। चूंकि नागेश ने खुद फिल्म लिखी है, इसलिए कह सकते हैं कि लेखक नागेश ने निर्देशक नागेश का साथ नहीं दिया। अंतिम बीस मिनट में फिल्म सपाट हो जाती है। तब तक बना रोमांच काफूर हो जाता है। फिल्म में अक्षय कुमार निराश नहीं करते। वह एक्शन दृश्यों में सहज रहते हैं। आयशा टाकिया को दो दृश्य मिले हैं। उन दृश्यों को वह निभा ले जाती हैं। जावेद जाफरी ने जटिल किरदार निभाया है और उसे कामिकल नहीं होने दिया है। शर्मिला टैगोर समेत बाकी कलाकार सामान्य हैं।
रेटिंग : **

Thursday, April 2, 2009

दरअसल:क्या पटकथा साहित्य है?

अजय ब्रह्मात्मज
हर फिल्म की एक पटकथा होती है, इसे ही स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले भी कहते हैं। पटकथा में दृश्य, संवाद, परिवेश और शूटिंग के निर्देश होते हैं। शूटिंग आरंभ करने से पहले निर्देशक अपनी स्क्रिप्ट पूरी करता है। अगर वह स्वयं लेखक नहीं हो, तो किसी दूसरे लेखक की मदद से यह काम संपन्न करता है। भारतीय परिवेश में कहानी, पटकथा और संवाद से स्क्रिप्ट पूरी होती है। केवल भारतीय फिल्मों में ही संवाद लेखक की अलग कैटगरी होती है। यहां कहानी के मूलाधार पर पटकथा लिखी जाती है। कहानी को दृश्यों में बांटकर ऐसा क्रम दिया जाता है कि कहानी आगे बढ़ती दिखे और कोई व्यक्तिक्रम न पैदा हो। शूटिंग के लिए आवश्यक नहीं है कि उसी क्रम को बरकरार रखा जाए, लेकिन एडीटिंग टेबल पर स्क्रिप्ट के मुताबिक ही फिर से क्रम दिया जाता है। उसके बाद उसमें ध्वनि, संगीत आदि जोड़कर दृश्यों के प्रभाव को बढ़ाया जाता है। पटकथा लेखन एक तरह से सृजनात्मक लेखन है, जो किसी भी फिल्म के लिए अति आवश्यक है। इस लेखन को साहित्य में शामिल नहीं किया जाता। ऐसी धारणा है कि पटकथा साहित्य नहीं है। हिंदी फिल्मों के सौ सालों के इतिहास में कुछ ही फिल्मों की पटकथा पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो सकी है। गुलजार, राजेन्द्र सिंह बेदी और कमलेश्वर की फिल्मों की पटकथाएं एक समय न केवल प्रकाशित हुई, बल्कि बिकीं भी, लेकिन फिर भी उन्हें साहित्य का दर्जा हासिल नहीं हुआ! साहित्य के पंडितों के मुताबिक पटकथा शुद्ध शुद्ध रूप से व्यावसायिक लेखन है और किसी फिल्म के लिए ही उसे लेखक लिखते हैं, इसलिए उसमें साहित्य की मौलिकता, पवित्रता और सृजनात्मकता नहीं रहती। साहित्य की सभी विधाओं की तरह पटकथा लेखक की स्वाभाविक और नैसर्गिक अभिव्यक्ति नहीं है, इसलिए उसे साहित्य नहीं माना जा सकता। फिल्मों के लेखक और साहित्यकारों के बीच इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाई है। दरअसल, फिल्मों के लेखक यह मानते हैं कि उनका लेखन किसी प्रकार से साहित्यिक लेखन से कम नहीं है। उसमें भी मौलिकता होती है और वह फिल्म के रूप में अपने दर्शकों को साहित्य के समान दृश्यात्मक आनंद देती है।
मशहूर फिल्म लेखक और शायर जावेद अख्तर कहते हैं कि पटकथा के प्रति प्रकाशकों और साहित्यकारों को अपना दुराग्रह छोड़ना चाहिए! उनकी राय में हिंदी में ऐसी कई फिल्में बनी हैं, जिनकी पटकथा में साहित्यिक संवेदनाएं हैं और इसीलिए उन्हें पुस्तक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। वे अपने तर्क का विस्तार नाटकों तक करते हैं। वे कहते हैं कि नाटकों का मंचन होता है। उसमें भी अभिनेता, संगीत और अन्य कला माध्यमों का उपयोग होता है। वह भी दर्शकों के मनोरंजन के लिए ही रचा जाता है। वे पूछते हैं कि अगर नाटक साहित्यिक विधा है, तो फिर पटकथा से परहेज क्यों है? जावेद अख्तर चाहते हैं कि श्रेष्ठ हिंदी फिल्मों की पटकथा प्रकाशित होनी चाहिए। मराठी के नाटककार और होली और पार्टी जैसी फिल्मों के लेखक महेश एलकुंचवार स्पष्ट कहते हैं कि पटकथा को साहित्यिक दर्जा नहीं दिया जा सकता। पटकथा स्वयं पूर्ण रचना नहीं होती। प्रकाश और ध्वनि के साथ मिलकर वह फिल्म का रूप लेती है। अगर पटकथा प्रकाशित की जाएगी, तो उसमें सहायक साधनों को नहीं रखा जा सकेगा। प्रकाश और ध्वनि के अभाव में पटकथा का वही प्रभाव नहीं रहेगा, जो फिल्म देखते समय रहा होगा। साहित्य के पंडित और आलोचकों के पास और भी तर्क हैं। पटकथा के प्रभाव को भारतीय दर्शक अच्छी तरह समझते हैं। फिल्म प्रभावशाली माध्यम है और इसका असर व्यापक होता है। कई बार फिल्मों के रूप में आने के बाद साहित्यिक विधाएं ज्यादा लोकप्रिय हुई हैं। ताजा उदाहरण फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर है। इसकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए प्रकाशक ने उपन्यास का मूल नाम क्यू एंड ए बदल दिया है। साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे, जिन्हें फिल्मों की वजह से ज्यादा पाठक मिले। इस लिहाज से अगर पटकथा को स्वतंत्र कृति के रूप में प्रकाशित किया जाए, तो निश्चित ही पाठक फिल्म का साहित्यिक आनंद उठा सकेंगे। मुमकिन है, कुछ दशक बाद उन्हें साहित्य का दर्जा भी हासिल हो जाए!

Wednesday, April 1, 2009

कुछ खास:पौधा माली के सामने इतराए भी तो कैसे-विशाल भारद्वाज

विशाल भारद्वाज ने पिछले दिनों पूना मे आयोजित सेमिनार में अपनी बातें कहीं। इन बातों मे उनकी ईमानदारी झलकती है। वे साहित्य और सिनेमा के रिश्ते और फिल्म में नाटक के रूपांतरण पर अपनी फिल्मों के संदर्भ में बोल रहे थे। वे पूना फ़िल्म इंस्टीट्यूट में आमंत्रित थे।


जो चाहते हो सो कहते हो, चुप रहने की लज्जत क्या जानो
ये राज-ए-मुहब्बत है प्यारे, तुम राज-ए-मुहब्बत क्या जानो
अल्फाज कहां से लाऊं मैं छाले की तपक समझाने को
इकरार-ए-मुहब्बत करते हो, इजहार-ए-मुहब्बत क्या जानो

कहना नहीं आता मुझे, बोलना आता है।
मेरी चुप से गलतफहमियां कुछ और भी बढ़ीं
वो भी सुना उसने, जो मैंने कहा नहीं

मुझे लगा कि चुप रहा तो बहुत कुछ सुन लिया जाएगा। तो अब जो कह रहा हूं, उसमें वह सुन लीजिए जो मैं नहीं कह पा रहा हूं।

साहित्य से मेरा रिश्ता कैसे बना? मैं उसकी बातें करूंगा। उन बातों में कोई मायने मिल जाए, अगर ये हो तो मुनासिब होगा। कल से मैं लोगों को सुन रहा हूं । ऐसा लग रहा है कि कितना कम देखा है, कितना कम सुना है और कितना कम आता है।

माली के सामने पौधा इतराए भी तो कैसे? (गुलजार साहब की तरफ इशारा)। मेरे माली बौठे हुए हैं। गुलजार साहब ने तो.. मैं देख भी नहीं रहा हूं उनकी तरफ।

मेरी ाारणा है कि आम दर्शक औसत काम की पूजा करते हैं। मैं उसी आम दर्शक का हिस्सा हूं। मैं उससे अलग नहीं हूं।

मैंने संगीत निर्देशक के तौर करिअर शुरू किया। "माचिस" के बाद मुझे सीरपसली लिया गयात्र "माचिस" से पहले मैं अपनी ाुनें सुनाता था तो लोग खरीदते नहीं थे। कुछ तो करना था। पौसे कमाने के लिए मैंने झूठ बोलना शुरू किया। मैं ाुनें सुनाता था और कहता था कि पाकिस्तान के एक ाुन से चोरी की है। फिर वह ाुन लोगों को पसंद आ जाती थी। इस तरह मेरा काम चलने लगा था। अपने मौलिक काम को चोरी कह के बेचना मुझे बहुत अच्छा लगा और मेरी समझ में भी आया कि ट्रेड के गुर सीख लेना जरूरी है। वहां से सफर आरंभ हुआ।

"माचिस" के वक्त में गुलजार साहब ने ऐसे ही एक दिन टिप्पणी की। उन्होंने कहा एक दिन तू एक दिन फिल्ममेकर बन जाओगे। मालूम नहीं उन्होंने मुझ में क्या देखा होगा। लेकिन उनकी बात मेरे अचेतन में रह गयी। "माचिस" के बाद कुछ सालों तक काम मिला और फिर करिअर खत्म होना शुरू हो गया। मुझे लगा कि अब काम मिलना बंद हो जाएगा। कुछ करना पड़ेगा। मुझे लगा कि फिल्में बनाना शुरू करते हैं। फिर अपनी ाुनें खुद ही ले लूंगा। इस तरह खुद को रोजगार देता रहूंगा। यही सोच कर "मकड़ी" बनायी। छोटी सी मौलिक कहानी थी। उस समय अनुराग कश्यप ने सुझाव दिया कि मुझे "थ्रोन ऑफ ब्लड" देखनी चाहिए। पहली बार मैंने कुरोसावा का नाम सुना। उस फिल्म की कहानी और फ्लेवर मेरे अचेतन में रह गए।

"मकड़ी" के बाद मेरा मन था कि अंडरवल्र्ड पर फिल्म बनाऊं। सच कहूं तो मुझे हिंसा, गोलीबारी, बंदूक, भागदौड़ की कहानियां अच्छी लगती हैं। तब सोचा कि राम गोपाल वर्मा ने अंडरवल्र्ड को इस तरह निचोड़ लिया है तो मैं क्या बनाऊं? गैंगस्टर फिल्में आम तौर पर गैंगवार में खत्म होती हैं। किस ने किस को पहले मारा, किस को बाद में मारा। मौत के साथ फिल्में खत्म होती है। दूसरी तरफ गुलजार साहब की "अंगूर" भी दिमाग में थी। वह मजेदार फिल्म थी। अपनी बात करूं तो साहित्य से मेरा कोई नाता नहीं था। "मर्चेंट ऑफ वेनिस" पढ़ी थी। किसी तरह याद कर पास हो गया था। शेक्सपियर से मेरा उतना ही वास्ता था। "अंगूर" की वजह से नाता बढा। साहित्य के संदर्भ में कह रहा हूं .. साहित्य का मतलब है कुछ सीरियस लोग गहरे में बौठकर ऐसी बात करेंगे जो बहुत ही बोरिंग होगी। साहित्य का यही इंप्रेशन था कि इसमें पल्प तो है ही नहीं। पल्प नहीं है तो एंटरटेनमेंट होगा नहीं। मुझे लगा है कि आम दर्शक आज भी ऐसे ही सोचता है। साहित्य का नाम आते ही वे थोड़ा पीछे हट जाते हैं कि एंटरटेनमेंट तो इसमें नहीं मिलने वाला है। लोग गहरी और सीरियस बातें करेंगे साहित्य में।

एक बार आलाप (बाला मांजगांवकर का बेटा) के साथ मैं देहरादून से दिल्ली आ रहा था। मैं सफर में बोर हो रहा था। मैंने उससे पूछा कि कोई किताब है तुम्हारे पास। उसने मुझे "शेक्सपियर टेल्स" दी। उसमें चार-चार पेज में शेक्सपीयर के नाटकों की कहानियां थीं। मैंने उस दिन "मौकबेथ" पढ़ी। चार पेज की कहानी थी। मैं अंडरवल्र्ड की कहानी खोज रहा था। मुझे लगा कि "मौकबेथ" की कहानी इतनी नाटकीय है।इतना ड्रामा है। ये बोरिंग है ही नहीं ज्यादा मजेदार कहानी है। मुंबई पहुंचते ही मैंने वह प्ले मंगाया। मुकश्कल है श्ेक्सपीरियन लैंग्वेज को समझना। मैंने ऐसी किताब ढूंढी,जिस में एक तरफ शेक्सपीरियन लैंग्वेज थी और एक तरफ इंकग्लश लैंग्वेज। फिर मैं फेस्टिवल में गया तो मैंने वो सब याद भी कर लिया था कि जवाब देना पड़ेगा तो शेक्सपीरियन लैंग्वेज बोल दूंगा। लिखने लगा म्तो उसी से चेक भी करता रहा कि बहुत ज्यादा गलत तो नहीं जा रहा। कहीं ऐसा न हो कि मैं कुछ अलग ही फिल्म बना लूं और कहता फिरूं की "मौकबेथ" है। मेरा अज्ञान मेरे काम आ गया। मुझे पता ही नहीं था कि मैं किस चीज पर हाथ रख रहा हूं। हाथ रखना कोई इग्नोरेंट आदमी ही कर सकता है। कहना कि हमने "मौकबेथ" बना ली। पर वहां दोस्त काम आए बहुत। गुलजार साहब तो थे ही। नसीर भाई, पंकज जी। नसीर भाई ने जब उस पर स्टैम्प लगाया कि यह बहुत अच्छी स्क्रिप्ट है। तुम बना लो इसे। मैं कोई सा भी रोल करूंगा। कॉप का प्वाइंट उनको अच्छा लगा। उन्होंने खुद ऑफर किया - उन्होंने कहा कि मैं और ओम कॉप का रोल करेंगे। तभी "मैकबेथ" में कैरेक्टर चैंज कर दिया। तो ये एक नादानी में हो गया। ठीक-ठाक हो गया। एक्टर भी बहुत अच्छे थे और स्क्रिप्ट ऐसी ही थी, सोर्स उसका "मकबेथ " रहा। मैंने उसकी स्पिरिट को कहीं से बरकरार रखा। उस समय अब्बास था मेरे साथ। हमलोगों ने उसकी स्पिरिट को पकड़ने की कोशिश की। हमलोगों ने कहा कि इसकी स्पिरिट को कैच करने की कोशिश करते हैं। इसके टेक्स्ट के पीछे नहीं भागेंगे। उस वजह से शायद एक रोल लिखा हुआ था। ये भी सोचा कि कर लेते हैं देखा जाएगा। मान लेते हैं कि हम ही यंक्सपीयर थे चार सौ साल पहले। उसके बाद रिकॉगनिशन मिला तो हिम्मत थोड़ी बढ़ गई - बशीर बद्र साहब का शेर -"अभी अपने इशारों पर हमें चलना नहीं आया। सड़क की लाल पीली बत्तियों को कौन देखेगा।" क्रॉस करो, दूसरा सिंग्नल भी तोड़ो। हिम्मत आ गई। "ओमकारा" में थोड़ी रेस्पॉकन्सबलिटी थी। लेकिन जावेद साहब ने पिछली बार कहा था और कि शायद सच कहा था कि - "मकबूल" में मैंने एक शेक्सपीयर को फेल किया और "ओमकारा" में शेक्सपीयर ने मुझे फेल किया । पता नहीं कौन किसका एग्जाम ले रहा था। पर जावेद साहब ने मेरा एग्जाम जरूर लिया है यहां पर। अब हिम्मत हो गई है और अब ये समझ में आया कि अब मैं चाह रहा हूं ओरिजनल करने की कोशिश करूं। मशहूर और ताकतवर होने का लोभ छोड कर मैं फिल्में बनाऊं। मणि कौल ने कल जो एक बात कही। मुझे लगता है कि मैं शायद उस लाइन के लिए पुणे आया था। स्ट्रक्चर और टेक्सचर लेखक के तौर पर मैं स्ट्रक्चर पर इतना घ्यान देता रहा। अब टेक्सचर पर यान दूंगा। एक्ट वन, एक्ट टू, एक्ट,बिगनींग, मिडिल एण्ड प्लॉट प्वाइंट वन। प्लॉट प्वाइंट टू लग-लग के उसमें कहीं टेक्सचर पर यान ही नहीं दे रहे थे। अगर मुझे स्ट्रक्चर पर काम करना हो तो लिखूं ना। टेक्सचर का जो खूबसूरत जुमला मैं वापस से लेकर जा रहा हूं। अब से मैं स्ट्रक्चर के बजाए अैक्सचर पर काम करूंगा। इसी के साथ अब मुझे जाना भी है। मेरी फ्लाइट है मुझे जाना भी है। अगर मेरे लिए कोई सवाल है तो गुलजार साहब जवाब देंगे।