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Monday, March 30, 2009

जमीन का टुकड़ा मात्र नहीं है देश-महेश भट्ट


देशभक्ति क्या है? अपनी जन्मभूमि, बचपन की उम्मीदों, आकांक्षाओं और सपनों का प्रेम है या उस भूमि से प्रेम है, जहां अपनी मां के घुटनों के पास बैठ कर हमने देश के लिए स्वतंत्रता की लडाई लडने वाले महान नेताओं गांधी, नेहरू और तिलक के महान कार्यो के किस्से सुने या झांसी की रानी और मंगल पांडे के साहसी कारनामे सुने, जिन्होंने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों को आडे हाथों लिया था? संक्षेप में, क्या देशभक्ति एक खास जगह से प्रेम है, जहां की हर इंच जमीन आनंद और खुशी से भरपूर बचपन की प्रिय और कीमती यादों से भरी होती है?
मां सुनाओ मुझे वो कहानी
अगर यही देशभक्ति है तो ग्लोबलाइजेशन और शहरीकरण के इस दौर में चंद भारतीयों को ही यह तमगा मिलेगा, क्योंकि उनके खेल के मैदान अब हाइवे, फैक्ट्री और शॉपिंग मॉल में तब्दील हो गए हैं। चिडियों की चहचहाहट को गाडियों और मशीनों के शोर ने दबा दिया है। अब हमें महान कार्यो के किस्से भी नहीं सुनाए जाते। आज की मां अगर किस्से सुनाने बैठे तो उसे अमीर और गरीब के बीच की बढती खाई, शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच न पटने वाली दूरी और गांधी की भूमि में भडकी सांप्रदायिक हिंसा के न सुनाने लायक किस्से सुनाने होंगे।
ऐ मेरे वतन के लोगों
तो फिर देशभक्ति क्या है? बट्र्रेड रसेल के मुताबिक, देशभक्ति छोटी वजह के लिए मरने-मारने की इच्छा है।
लियो तोलस्तोय ने कहा है, देशभक्ति वह सिद्धांत है, जो थोक हत्याओं को उचित ठहराता है। यह ऐसा व्यापार है, जिसमें मनुष्य की हत्या के लिए बेहतर हथियारों की जरूरत होती है। इस व्यापार में जूते, कपडे और मकान जैसी जिंदगी की जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। इसमें लिप्त व्यक्तियों को आम आदमी से अधिक फायदे और बडी ख्याति मिलती है।
लेकिन हिंदी सिनेमा में देशभक्ति को किस तरह परिभाषित और चित्रित किया गया है? पीछे पलट कर देखता हूं तो मुझे अपने कानों में बजते देशभक्ति के गीत सुनाई पडते हैं। हिंदी फिल्मों ने ऐसे अनगिनत गीतों की रचना की। ये गीत करोडों भारतीय गुनगुनाते रहे। इन गीतों ने हमें जोडे रखा और देशप्रेम की भावना के लिए एकत्रित किया। मेरी उम्र उस समय मुश्किल से 13 साल होगी, जब मैंने पहली बार कवि प्रदीप का लिखा गीत ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी.. सुना। इसे स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने गाया था। यह गीत पहली बार देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सामने 1964 में गाया गया था, जिसे सुन कर उनकी आंखों में आंसू आ गए थे। 21वीं सदी में भी टीवी या रेडियो से आती इस गीत की आवाज को सुन कर हर भारतीय की आंखें भीग जाती हैं।
हम उस देश के वासी हैं
किसी भी प्रभुतासंपन्न और आत्मसम्मान के धनी राष्ट्र के लिए देशभक्ति उसके नागरिकों के दिलों की धडकन है। देशभक्ति की भावना से ही सदियों-सहस्त्राब्दियों के बाद भी राष्ट्र बने रहे और उनके विकास की प्रक्रिया सुनिश्चित हुई। देशभक्ति के अभाव में देशों का पतन होता है और वे दुनिया के नक्शे से गायब हो जाते हैं। लंबे समय के बाद देश के राजनीतिज्ञों और समाजशास्त्रियों ने महसूस किया कि हिंदी सिनेमा राष्ट्र की छवि को सबसे ज्यादा कारगर तरीके से पेश करता है। हिमालय की चोटियों से लेकर तीन तरफ से समुद्र से घिरे इस देश में बहती गंगा, यमुना और गोदावरी जैसी पवित्र नदियों और प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्ध स्त्रोतों से संपन्न भूमि का फिल्मों में बहुत सुंदर बखान किया गया है।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
देश के आम नागरिकों के लिए राष्ट्रनायकों, शहीदों, पूर्वजों के संघर्ष और कुर्बानियों, समाज सुधारकों के कार्यो, आजादी के पहले और बाद की लडाइयों, सीमा पार के आतंकवाद से चल रहे हाल के युद्धों और स्वतंत्र एवं लोकतांत्रिक देश की प्रगति और उपलब्धियों के बारे में हर प्रकार की जानकारी हासिल करने का पहला प्रभावशाली स्त्रोत फिल्में हैं।
शायद ही कोई इस तथ्य से इंकार करे कि भारतीय सिनेमा और खासकर हिंदी सिनेमा ने राष्ट्रीय एकता की भावना को सबसे जोरदार तरीके से पेश किया है। अलगाववादी शक्तियों की आलोचना की है और देश के इतिहास से दर्शकों का परिचय कराया है। इन जानकारियों के साथ फिल्मों ने हमारे अंदर मातृभूमि के प्रति प्रेम और गर्व की भावना भरी है।
हिंदी फिल्मों में देशभक्ति के विषय पर आरंभिक दिनों से ही फिल्में बन रही हैं। अंग्रेजों के शासन के समय फिल्मों ने देशभक्ति की भावना जगाने का कार्य किया। 1941 में आई सोहराब मोदी की सिकंदर में सबसे पहले अप्रत्यक्ष तरीके से देशभक्तिकी भावना का चित्रण किया गया था। आक्रामक सिकंदर के खिलाफ भारतीय राजा पोरस की साहसिक लडाई के बहाने देशभक्ति का संदेश दिया गया था। उन दिनों हमारे फिल्मकारों ने स्वतंत्रता सेनानियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद करने की लडाई लडी थी।
शस्य श्यामलां मातरम
और फिर जब 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र हुआ तो फिल्म इंडस्ट्री ने उन ऐतिहासिक क्षणों को फिल्मों में चित्रित किया। उन दिनों नए भारत के सपनों और आकांक्षाओं को फिल्मों का विषय बनाया गया। प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दिखाए सपनों और राहों पर आधारित नया दौर (1957), हम हिंदुस्तानी (1960), आनंद मठ (1952), जागृति (1954) और लीडर (1964) जैसी फिल्में बनीं, जिनमें सपनों, संघर्षो और आजाद भारत के बढते कदमों का चित्रण किया गया था। स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों के जीवन पर भी इस दौर में फिल्में बनीं। सिकंदर-ए-आजम (1965) और जिस देश में गंगा बहती है (1960) के गीतों में भारत की महानता का उल्लेख किया गया। फिर देश की सीमाओं को पार करने की दुश्मनों की कोशिशों पर भी फिल्में बनीं। 1962 के भारत-चीन युद्ध पर चेतन आनंद की फिल्म हकीकत आई थी। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हकीकत इस विधा की श्रेष्ठ फिल्म मानी जाती है।
रंग दे बसंती चोला
सातवें, आठवें और नौवें दशक की देशभक्ति वाली फिल्मों का जिक्र आने पर स्वाभाविक रूप से मनोज कुमार याद आते हैं। मनोज कुमार को भारतीय सिनेमा का देशभक्त चेहरा माना जाता है। यहां तक कि उन्हें भारत कुमार नाम भी दे दिया गया। इस स्थान से उन्हें कोई नहीं हटा सकता। सन 1965 में पहली बार हमने मनोज कुमार को फिल्म शहीद में मेरा रंग दे बसंती चोला गाते देखा था। इस फिल्म में उन्होंने भगत सिंह की भूमिका निभाई थी और कहते हैं कि उन्होंने इसका परोक्ष निर्देशन भी किया था। मेरे खयाल में देशभक्ति की भावना मुख्यधारा की बनी फिल्मों में श्रेष्ठ फिल्म शहीद है। मुझे याद है कि जब मैं अठारह का हुआ था तो मेरे दोस्तों ने मनोज कुमार की पहली फिल्म उपकार देखकर मेरे जन्मदिन का जश्न मनाया था। पर्दे पर जब मेरे देश की धरती गीत आया तो पूरा थिएटर उठ कर नाचने लगा था। मनोज कुमार ने बाद में पूरब और पश्चिम (1970) और क्रांति (1981) भी निर्देशित की। इन फिल्मों में उनकी पहली फिल्म की ईमानदारी और एकाग्रता नहीं दिखी।
चक दे इंडिया
हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों ने बहुत पहले समझ लिया था कि देशभक्ति की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा व्यवसाय करती हैं। पिछले साल आजादी की साठवीं वर्षगांठ के मौके पर आई शाहरुख खान की फिल्म चक दे इंडिया में देशभक्ति को नए अंदाज में पेश किया गया था। शाहरुख खान की चक दे इंडिया हमारी आम हिंदी फिल्मों से अलग थी। हिंदी फिल्मों में आम तौर पर महिलाओं की भूमिका गौण होती है, ज्यादातर पुरुष ही नेतृत्व करते हैं और देश के सम्मान की रक्षा करते हैं। चक दे इंडिया में 17 लडकियां यह काम करती हैं और हाकी का व‌र्ल्ड कप जीतकर लौटती हैं।
आमिर खान ने भी रंग दे बसंती से दर्शकों को सम्मोहित किया। इस फिल्म में युवकों का एक समूह क्रांतिकारियों से प्रेरित होकर देश को भ्रष्ट नेताओं से मुक्त कराने के लिए हिंसा का मार्ग चुनता है। आमिर खान ने पहली बार इस फिल्म में देशभक्त का रोल नहीं निभाया था। उन्होंने लगान में एक ग्रामीण किसान की भूमिका निभाई थी, जो अंग्रेजों को क्रिकेट में हराता है। उन्होंने सरफरोश में भी देशभक्त पुलिस अधिकारी को पर्दे पर जीवंत किया था।
ये जो देश है तेरा
हाल की फिल्मों में मेरी व्यक्तिगत पसंद आशुतोष गोवारिकर की स्वदेस है। यह फिल्म देश की कडवी सच्चाई को सामने ले आती है। शहरों की आर्थिक प्रगति, तकनीकी छलांग और सॉफ्टवेयर की धूम तो हम सभी देख रहे हैं, लेकिन देश के ग्रामीण इलाके आज भी जिंदगी की बुनियादी जरूरतों पानी और बिजली के लिए जूझ रहे हैं। गांव से शहरों में ग्रामीणों के पलायन के ज्वलंत मुद्दे पर बनी इस फिल्म में अच्छे भविष्य की उम्मीद में देश से विदेश पलायन कर रहे प्रतिभाशाली युवकों का भी उल्लेख किया गया है। दोनों तरह के पलायनों का एक ही जवाब मिलता है कि यहां रोजगार की संभावनाएं कम हैं।
स्वदेस में संदेश दिया गया है कि स्थानीय स्तर पर अवसर जुटाए जा सकते हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों में इस पर ध्यान देना चाहिए। इस फिल्म का नायक नासा में वैज्ञानिक है, लेकिन वह भारत लौटने का फैसला लेता है। आदर्शवादी शहरी युवक के रूप में सामाजिक मुद्दों पर उसके विचारों में हम अपनी निराशा और जिज्ञासा की झलक देख सकते हैं।
इस लेख को पाकिस्तान विरोधी फिल्मों का जिक्र किए बिना पूरा नहीं किया जा सकता। एक दौर में पाकिस्तान के खिलाफ बन रही फिल्मों को ही देशभक्त की फिल्म माना जाता था। सन 2003 में बनी सनी देओल की द हीरो पाकिस्तान के खिलाफ बोले गए संवादों के बावजूद सिनेमाघरों में नहीं चल सकी। गदर से आरंभ हुई पाकिस्तान विरोध की देशभक्ति की भावना द हीरो के फ्लॉप होने के बाद खत्म हुई। इस बीच पाकिस्तान हिंदी फिल्मों का प्रमुख खलनायक बना रहा।
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों
देशभक्ति की भावना को हिंदी फिल्मों में देखें तो पाएंगे कि आरंभिक फिल्मों से लेकर मनोज कुमार, सनी देओल और चक दे इंडिया की 17 लडकियों के जरिये बदलती हुई देशभक्ति की भावना व्यक्त की जाती रही है। कभी साम्राज्यवादियों के खिलाफ लडाई देशभक्ति रही तो कभी सीमा पार के दुश्मनों से चल रही जंग देशभक्ति का पर्याय बनी। देश के भीतर के दुश्मनों के खिलाफ लिया गया मोर्चा भी देशभक्ति माना गया तो विश्वशक्ति के तौर पर उभरे भारत को अब विभिन्न तरीकों से फिल्मों में पेश किया जा रहा है। यह भी देशभक्ति है।
हमें यह सबक लेने की जरूरत है कि भावनाओं का तात्कालिक विस्फोट देशभक्ति नहीं है, जिसमें हम पडोसियों के खून के प्यासे हो जाते हैं। जिन मूल्यों के आधार पर आजादी हासिल की गई, उन मूल्यों के प्रति ईमानदार और आजीवन समर्पण ही देशभक्ति है। किसी भी व्यक्ति के लिए देश जमीन का टुकडा मात्र नहीं होता, जहां नदियां पहाड और जंगल होते हैं। देश के कुछ आधारभूत सिद्धांत होते हैं और उन सिद्धांतों के प्रति समर्पण ही असल देशभक्ति है।

Sunday, March 29, 2009

हिन्दी टाकीज: वो दिन याद करो-विपिन चौधरी



हिन्दी टाकीज -३०


हिन्दी टाकीज का सफर तीसवें पड़ाव तक पहुँच गया.इस बार विपिन चौधरी के संस्मरण पढ़ें.विपिन अपने बारे में लिखती हैं, मैं मुख्यतः कवियत्री हूँ। मेरा ब्लाग है http://vipin-choudhary.blogspot.com के अलावा मेरी कहानियाँ और लेख भी विभिन्न पत्रिकाओं प्रकाशित हुयें हैं कविताओं के दो संग्रह प्रकाशित।फिलहाल मीडिया से सम्बंधित हूँ।


उस वक्त फिल्में को देखा नहीं बल्कि जिया जाता था। बात इतनी पुरानी भी नहीं की समय की धूल उसे अपनी ओट में ले लें। टिक्टों के बैल्क का अच्छा खासा व्यापार चलता था उन दिनों। उन्हीं दिनों कुछ अच्छें सपनों के साथ अच्छी फिल्में भी देखी। तब मनोरंजन इतना मंहगा नहीं हुआ करता था, थोडे खर्च में बडा मनोरंजन हो जाया करता था। उस वक्त सिनेमा देखना अच्छा अनुभव हुआ करता था तब फिल्में इतनी समझ में नहीं आती थी और अब फिल्में देखना बखूबी समझ आता है तब सिनेमा देखना कोई दिल को छूने वाला अनुभव नहीं रह गया है। मलटीप्लैक्स सिनेमा वह जादू नहीं पैदा करता जो हमारे छोटे शहर का छोटा सा सिनेमा हाल पैदा किया करता था। इस भडकीलें समय ने सहजता की जो साधारण खूबसूरती होती है वह हमसें छीन ली हैं।


कोई लौटा दे मेरे वे बीते हुये दिन


झूले, फूल तितलियाँ, रंग, दोस्ती, मस्ती इन्हीं के आस पास ही घुमती थी हमारी दुनिया उन दिनों। मम्मी के कालेज में जो सिनेमाघर था उसमें पास से प्रवेश मिलता था। सो हमें कोई दिक्कत नहीं थी। पर लाईन इतनी लम्बी होती थी की हमारी बारी आते आते टाँगें जवाब दे जाती थी। उन दिनों पिताजी के घर आने का कोई अता पता नहीं होता था तो अक्सर हम पडोस वाली दो दीदीओं को अपने साथ ले लेते। मम्मी, छोटा भाई, मैं और दोनों दीदी लोगो का टोला साथ चलता। जाते वक्त तो दुनिया जहान की दूसरी बातें चलती पर फिल्म देखकर लौटतें वक्त सिर्फ उसी फिल्म का चर्चा रहता। वहाँ तक जानें का रास्ता बेहद लम्बा होता था। उस आने जानें के लम्बें रास्तें में आधा सफर पैदल ही तय करना पडता। हम फिल्म देखनें के चक्कर में बडी मस्ती के कुदते फाँदते पैदल चलते पर लौटते वक्त हमारी चलने की बिलकुल हिम्मत नहीं होती थी पर फिर भी जैसे तैसे मूवी की बातें करते करते रास्ता कट जाता था। हीरों की बहादुरी, हीरोईन की खूबसूरती और विलेन की बदतमीजी के अनेक किस्से हम आपस में बतातें हुये चलते। उन दिनों महिलाओं का स्कूटर चलाना अचंभे की बात थी, उन्हीं दिनों की बात है, एक बार फिल्म देखनें जाते वक्त, हम दोनों बहन भाई मम्मी के पीछे बैढे थे, तभी राह चलते एक बदमाश ने कुछ कुछ अश्लील सा फिकरा कसा तब मम्मी ने स्कुटर साइड में कर उसे तब तक झाड पिलायी जब तक उसने पैर पकड कर माफी नहीं माँग ली।सिनेमा हाल का बडा सा परदा हम बच्चों को दो ढाई घँटें तक अपनें सम्मोहन में ले लेता। बचपन में जिन फिल्मों ने सबसे ज्यादा आकर्षित किया उन्में से एक " बूट पालिश" जिसमें डेविड चाचा नन्हें मुन्नें बच्चों से पुछते हैं," नन्हें मुन्नें बच्चें तेरी मुटठी में क्या है" और बच्चें पूरे उत्साह से बोल उठतें हैं "मुठठी में है तकदीर हमारी, किस्मत को हमनें अपनें बस में किया है"। इसके साथ ही बैल्क एंड वाईट ईरा की फिल्म "दोस्ती" जब जब भी देखी आँखों से आँसुओं का लगातार बहना नहीं रुका। परदें का जादू इतना गहरा होता था जो हमें आसानी से अपने काबू में कर लेता था। उस वक्त हम किताबों से दूर भागते थे और फिल्मी परदे पर मधुमखियों की तरह चिपक जाते थे। हरियाणा कृषि विश्विद्यालय,हिसार के उस सिनेमा हाल में सप्ताह के पाँचों दिन केवल स्टूडेंट्स ही फिल्म देख सकते थे और बाकि के दो दिन स्टाफ के लिये मुक़र्रर थे। ऐसे में हमारे लिये दो दिन बचते ही थे और उन दोनों दिन में से किसी एक दिन हमें वहाँ जाना होता था। वो सिनेमाहाल हमारे लिये वरदान बन गया था सो हमने भी उस वरदान का पूरा फायदा ऊठाते हुये लगभग हर शनिवार या फिर रविवार को ढेरों फिल्में देखी और अपने सिनेमा ज्ञान को सम्रद्ध किया।एक बार ऐसा हुआ की सिनेमा हाल की बडी सी खिडकी में एक छोटे से छेद का हमें पता चल गया फिर तो होता यह की हम अपनें शो से काफि पहले ही आ जाते और मैं और मेरा भाई उस छेद से से फिल्म देखकर बाईसकोप जैसा आन्नद उठाते और बडे गर्व से देखी हुई फिल्म के आखिरी हिस्से की कमेंट्री करते रहते, हमारी इस चक्क चक्क से अडोस पडोस के लोग परेशान हो उठते और फिर हमें मम्मी से डाँट पडती। ऐसी छोटी छोटी शरारतों को केवल बचपन ही अपने में समेट सकता है। बाकि के जो सिनेमा घर थे वहाँ हम तब ही जाते थे जब कोई बेहतरीन फिल्म वहाँ लगती। पर मम्मी की युनिवरसिटी के उस सिनेमाघर का कई सालों तक भरपूर फायदा ऊठाया। हमारे हिसार शहर में तब पाँच सिनेमाघर थे नीलम, पुष्पा, ईलाइट, सोहन और पारिजात। 'नीलम' सिनेमा हाल शहर के दूसरे कोने में था पर जब उस हाल में जब "मदर इंडिया" लगी तो पूरा का पूरा शहर फिल्म देखने टूट पडा। ऐसा क्रेज था फिल्मों का उन दिनों जो देखने वालों के सर पर चढ कर बोलता था।उन्हीं दिनों देखी फिल्मों में "नमक हलाल" का असर तो काफी दिनों तक रहा, उसमें अमिताभ की अठखेलियाँ बेहद पसंद आई। घर आकर अपनी सहेलियों के बीच ऐलान कर दिया यदि मेरी सहेली बने रहना है तो पहले नमक हलाल मूवी देख कर आओं। इसी तरह 'शोले' का बुखार जो उसे देखने के बाद चढा वो आज तक नहीं उतर सका है। एक बार की बात है,जब मैं चिकन पोकस के पीडित थी उसी वक्त पता चला कि तलत साहब की बहुत पुरानी फिल्म सिनेमा हाल में लगी है तो बिमारी की हालात में भी गिरते पडते फिल्म देखने गये। वो टीन एज के जल्दी जल्दी फिदा होनें वाले दिन थे, सो हम भी फिदा हो गये तलत की आवाज और उनकें खूबसूरत व्यक्तित्व पर। हिंदी फिल्मों को देख कर कुछ पकड ना आता हो पर प्यार को महसुस करने का जज्बा जरूर पकड में आ गया था। जब देखी "देवदास" तो पूरी दुनिया बदली बदली सी लगने लगी थी। उस पर दिलीप कुमार का लाजवाब अभिनय और सुचित्रा सेन की खूबसूरती ने कमाल ढाया था। "दिल दिया दर्द लिया" और "पाकीजा" देखी तो तो दिलीप साहब और मीना कुमारी के अभिनय के दीवानेपन ने बुरी तरह जकड लिया।उन्हीं दिनों संजीव कुमार, प्रिषित सहनी, उत्तम कुमार के अभिनय और उनके सहज, सरल वयक्तित्व से प्यार हो गया था जो आज भी कायम है। पंजाबी फिल्म "उडीका" और हरियाणवी फिल्म "चंद्रावल", "गुलाबो" देखी उन्हीं दिनों।एक बार ऐसा भी हुआ की हमनें "दिल एक मंदिर" फिल्म देखने का कार्यक्रम बनाया पर किसी कारण से वह रद्द हो गया तो मूड खराब हो गया और इतफाकन उसी वक्त उसी फिल्म का गाना रेडियो पर बजनें लगा तब मेरे आँसू बह निकले। बचपन की ये छोटी मजबूरियाँ तब बेहद बडी और बेहद बुरी लगती थी। ऐसा नहीं था कि हर बार ही हम मजबुर होते, एक बार तो भूगोल के पेपर से पहले दिन मजें से मैं "अनपढ" फिल्म देखने गई और फिर पूरी रात जैसे तैसे थोडी बहुत इम्तेहान की तैयारी की। उस वक्त जब दूर के सिनेमाहाल में जाना होता था तो अपने भाई के रिक्शा वाले को बुला लिया जाता था, कई सालों तक इसी तरह चलता रहा फिर पढाई की व्यस्तता और दुसरे कई कारणों से यह सिलसिला लगातार छुटता चला गया।
सीने में जलन, आँखों में तुफान सा क्यों है
पहला मल्टीप्लेक्स सिनेमा भारत में १९९७ में आया पर उससे पहले टी वी ने सिनेमा हाल को पीछे छोड दिया था पर जिस तरह भूले बिसरे गीत वाकई में वे गीत होते है जो कभी भूलाये नहीं जा सकते उसी तरह हिंदी टाकीज की जो यादें पुरानी होते हुये भी हमारे भीतर सदा ताजी रहेगी।अपने देश में फिल्मों की खुमारी इतनी जबरदस्त है कि आप चाहे किसी भी वर्ग, किसी भी जाति के हों फिल्मों से बच कर नहीं निकल सकते।हिंदी फिल्मों टाकिस ने जो गहरा रंग हम सभी के जीवन में भरा था, वो जीवन भर आसानी से छुटनें वाला नहीं है। रंग अब की फिल्में भी भरती हैं पर पहले जैसी बात अब क्हाँ। अब हमारे शहर के वो सभी पुराने सिनेमा हाल टूट चुके हैं, उन्की जगह बडे बडे मॉल ने ले ली है। पर जब कभी भी वहाँ से गुजरते हैं तो वहाँ की हवा हमें यह जरुर याद दिला देती है कि हमारे कुछ रुपहले सपनों की नींव यहीं पर पडी थी।

Saturday, March 28, 2009

फ़िल्म समीक्षा:विदेश, आ देखें ज़रा और एक

दीपा मेहता की साधारण फिल्म 'विदेश '

दीपा मेहता ख्यातिलब्ध निर्देशक हैं। उनकी फिल्मों से भारतीय दर्शक परिचित हैं। भारतीय परिवेश में सामाजिक मुद्दों और महिलाओं पर केंद्रित उनकी फिल्मों पर विवाद भी हुए हैं। वह संवेदनशील फिल्मकार हैं, लेकिन विदेश में उनसे चूक हो गई है। फिल्म का विषय उनकी सोच और शैली का है पर चित्रण कमजोर है। लुधियाना की लड़की चांद (प्रिटी जिंटा) की शादी राकी (वंश भारद्वाज) से हो जाती है। अपनी आंखों में सपने लिए वह कनाडा पहुंचती है। वहां शुरू से ही उसे पति के हाथों प्रताडि़त होना पड़ता है। विदेशी भूमि में लाचार और विवश चांद की मदद जमाइका की रोजा करती है। रोजा उसे एक बूटी देती है और बताती है कि यदि वह इसे पति को पिला दे तो वह उस पर आसक्त हो जाएगा। चांद कोशिश करती है, लेकिन घोल का रंग लाल होता देख उसे बाहर फेंक आती है। संयोग से उसे नाग पी लेता है। वह इछाधारी नाग है। नाग उसके पति के रूप में आकर उसे भरपूर प्रेम देता है। असली और मायावी पति के बीच चांद की दुविधा और बढ़ती है..। दीपा मेहता ने रियल कहानी में एक फैंटेसी जोड़ी है। लेकिन फैंटेसी फिल्म का प्रभाव बढ़ाने के बजाए घटा देता है। गिरीश कर्नाड के नाटक नाग मंडल की कथा को फिल्म में डालकर उन्होंने अपनी फिल्म ही कमजोर कर दी है। लोककथा का आधुनिक चित्रण हास्यास्पद लगता है। कहते हैं कि इस फिल्म को विदेशों में काफी सराहना मिली है और प्रिटी जिंटा को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के दो पुरस्कार भी मिले हैं। पहले भी बगैर मेकअप के प्रताडि़त महिला की भूमिका निभाने से कई अभिनेत्रियों को श्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार मिले हैं। कभी इस पर गौर करना चाहिए कि वे पुरस्कार कितने सही और उचित रहे हैं? हां, वंश भारद्वाज ने प्रशंसनीय अभिनय किया है। ऐसा नहीं लगता कि यह उनकी पहली फिल्म है। विदेश दीपा मेहता की साधारण फिल्म है। यह परिवेश के बजाए परिवार की कहानी बन गई है। ससुराल में चांद की प्रताड़ना की वजह समझ में नहीं आती। संकेत रूप में कुछ संवाद हैं और स्थितियां हैं, लेकिन दीपा उन्हें ठोस तरीके से स्थापित नहीं करतीं।
रेटिंग :*1/2

नहीं है दम 'आ देखें जरा'

जहांगीर सुरती का आइडिया रोचक है और उन्होंने पूरे स्टाइल से उसे शूट भी किया है, लेकिन फिल्म में प्रसंग और घटनाओं की कमी है। नतीजा यह होता है कि थोड़ी देर की उत्सुकता और जोश के बाद फिल्म ठंडी हो जाती है। थ्रिलर फिल्म की सफलता इसमें है कि दर्शक अपनी सीट पर बैठे पर्दे पर आंखें गड़ाए रहें। यह तभी मुमकिन है, जब लेखक कल्पनाशील हो और निर्देशक उसकी कल्पना साकार कर सके।
रे आचार्या (नील नितिन मुकेश) की फोटोग्राफी कुछ खास नहीं चल रही है। संयोग से उसे अपने नाना का एक कैमरा मिलता है, जो भविष्य की तस्वीरें ले सकता है। रे कैमरे की मदद से अपनी गरीबी दूर करता है। लेकिन इस चक्कर में वह रा और प्रशासन की निगाहों में आ जाता है। उसके पीछे अधिकारी लग जाते हैं। एक बार उसे अपनी खिंची तस्वीर के काले प्रिंट मिलते हैं। काला प्रिंट मतलब मौत..। उसकी निश्चित मौत में छह दिन बचे हैं? अब रे की कोशिश है कि वह अपनी मौत को रोके, कैमरा सही हाथों में पहुंचाए और इस बीच अपनी प्रेमिका सिमी का दिल भी जीत ले। चूंकि हिंदी फिल्म है, इसलिए रे की तीनों कोशिशें पूरी होती हैं। लेकिन इस कोशिश में धड़-पकड़, खून-खराबा और मुंबई से बैंकाक तक की भागदौड़ चलती है। अगर लेखक का सपोर्ट मिलता और घटनाएं रोचक होतीं तो यह फिल्म ज्यादा रोमांचित करती। आ देखें जरा की शुरुआत अच्छी है, लेकिन इंटरवल तक आते-आते फिल्म बैठ जाती है। नील की संभावनाएं खत्म नहीं हुई हैं। कुछ दृश्यों में वह प्रभावित करते हैं। उनका एक अलग लुक है। इस लिहाज से फिल्म का चुनाव सही था, किंतु उनके किरदार पर मेहनत नहीं की गई। बिपाशा बसु सिर्फ मादक भाव-भंगिमाओं में ही ठीक लगती हैं।
रेटिंग : *1/2



कहानी पुरानी, एक्शन पुराना 'एक'

संगीत सिवन कामेडी फिल्मों के बाद फिर से एक्शन फिल्म बनाने की कोशिश में लगभग 25 साल पीछे चले गए हैं। कहानी ट्रीटमेंट, एक्शन और एक हद तक एक्टिंग भी तीन दशक पुरानी लगती है। परिवार का प्यार पाकर अपराधी के नेकदिल बनते किरदारों की फिल्में हम देख चुके हैं। एक में नंदू संयोग से एक परिवार का सदस्य बन जाता है। वहां रहते हुए वह बदलता है। अपनी भावनाओं को पहचानता है और एक अच्छे इंसान में तब्दील हो जाता है। फिल्म में मुंबई से पंजाब तक की भागदौड़ और पृष्ठभूमि है। नंदू की तलाश में लगे सीबीआई अधिकारी की भूमिका में नाना पाटेकर को शौकीन और मसखरा मिजाज दिया गया है। बाबी देओल के लिए इस फिल्म में कुछ भी नया नहीं है। वह ऐसी घिसी-पिटी फिल्में कर चुके हैं। नाना पाटेकर अपनी भूमिका से संघर्ष करते दिखे। कई दृश्यों में उनका संघर्ष स्पष्ट हो जाता है। संगीत सिवन ने एक्शन दृश्यों में मुख्य रूप से पुरानी स्टंट शैली को रखते हुए कुछ प्रयोग किए हैं। फिर भी मारपीट और भागदौड़ की फिल्मों के शौकीन दर्शकों को एक एक हद तक ही संतुष्ट कर पाएगी।
रेटिंग : *

Friday, March 27, 2009

दरअसल:हिन्दी फिल्में और उनकी समीक्षा

पिछले दिनों एक युवा निर्देशक ने मुंबई के अंग्रेजी फिल्म समीक्षकों की समझदारी पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि उन्हें न तो भारतीय फिल्मों की समझ है और न भारतीय समाज की! उन्होंने यह भी बताया कि वे मुंबई में पले-बढ़े और अंग्रेजी फिल्में देखकर ही फिल्म क्रिटिक बने हैं। इतना ही नहीं, अभी सक्रिय फिल्म समीक्षकों में से अधिकांश गॉसिप लिखते रहे हैं। उनकी समीक्षाएं सितारों और निर्माता-निर्देशकों से उनके रिश्ते से भी प्रभावित होती हैं। कई समीक्षक वास्तव में लेखक और निर्देशक बनने का सपना पाले रहते हैं। उन्हें उम्मीद रहती है कि शायद किसी दिन मौका मिल जाए! उनके इन हितों, मंशाओं और अज्ञानता से फिल्म समीक्षा प्रभावित होती है। ट्रेड सर्किल और दर्शकों के बीच उनके लिखे शब्दों का असर होता है। कई बार फिल्मों के बारे में गलत धारणाएं बनने के कारण फिल्में ध्वस्त हो जाती हैं।
मुंबई के फिल्म समीक्षकों से इस शिकायत के बावजूद अधिकांश निर्माता-निर्देशक पत्र-पत्रिकाओं में छपी समीक्षाओं में दिए गए स्टार्स को लेकर व्याकुल रहते हैं। वे अपनी फिल्मों के प्रचार में फिल्म समीक्षाओं से ली गई पंक्तियां और स्टार्स छापते हैं। मकसद यही होता है कि दर्शक ज्यादा से ज्यादा आएं। कुछ दर्शक इस प्रभाव में आ भी जाते हैं कि फलां फिल्म को तीन-चार या पांच स्टार्स मिले हैं। एक तरफ फिल्म समीक्षाओं की निरर्थकता की बातें की जाती हैं, तो दूसरी तरफ समीक्षाओं में मिले स्टार का उपयोग फिल्म के दर्शक बढ़ाने के लिए किया जाता है। दरअसल, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ऐसी ही विडंबनाओं का केंद्र है।
रही बात मुंबई के फिल्म समीक्षकों के महत्व और प्रभाव की, तो उसके ठोस व्यावसायिक कारण हैं। चूंकि हिंदी फिल्मों का व्यवसाय मुख्य रूप से मुंबई से ही निर्देशित और नियमित होता है, इसलिए हर निर्माता-निर्देशक मुंबई के बॉक्स ऑफिस आंकड़ों पर ज्यादा ध्यान देता है। इस दौरान कोशिश यही होती है कि पहले सप्ताहांत में ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचा जाए। अमूमन शनिवार को फिल्म के विज्ञापनों के साथ स्टार टांक दिए जाते हैं और बताया जाता है कि फिल्म को अच्छी ओपनिंग मिली है। भारत में अभी इस प्रकार का कोई अध्ययन नहीं हुआ है कि फिल्म समीक्षाओं से कितने प्रतिशत दर्शक प्रभावित होते हैं! फिल्म समीक्षा वास्तव में लेखन और फिल्म अनुभव की वैयक्तिक सृजनात्मक प्रक्रिया है। फिल्म समीक्षक की परवरिश, पढ़ाई-लिखाई और ज्ञान से फिल्म की समझ प्रभावित होती है। कुछ फिल्म समीक्षक फिल्में देखते समय दर्शकों की रुचि, पसंद और समझ का खयाल रखते हैं। वे फिल्में देखते समय अपनी पसंद और रुचि को दरकिनार कर, दर्शकों के नजरिए से फिल्मों की समीक्षा करते हैं। इसके विपरीत कुछ समीक्षकों के लिए फिल्म समीक्षा व्यक्तिगत अभिरुचि की अभिव्यक्ति है। वे फिल्म की चीर-फाड़ करते समय अपना ज्ञान बिखेरते हैं। कुछ समीक्षक अपनी समीक्षा से निर्देशक और दर्शक दोनों को आतंकित करना चाहते हैं। अंग्रेजी समीक्षकों का एक समूह तो इसी फिराक में रहता है कि हर हिंदी फिल्म के मूल स्रोत (किसी अंग्रेजी फिल्म) का उल्लेख कर उसकी धज्जियां उड़ा दी जाएं। केवल यही नहीं, वे हिंदी फिल्मों के प्रति हीन भाव भी रखते हैं।
मुंबई के निर्माता-निर्देशक मुख्य रूप से अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं और ट्रेड मैग्जीन की समीक्षाओं की परवाह करते हैं। उनकी चिंता रहती है कि इन पत्र-पत्रिकाओं में क्या छपा है? अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में फिल्म समीक्षा और समीक्षकों को विशेष महत्व के साथ प्रमुख स्थान दिया जाता है। हिंदी और अन्य भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं में अभी तक फिल्म समीक्षा को सम्मानित स्थान और महत्व नहीं मिला है। कुछ पत्र-पत्रिका तो फिल्म समीक्षा छापना जरूरी भी नहीं मानते। छोटे और मझोले अखबार दूसरे अखबारों की समीक्षाओं को बेधड़क छाप लेते हैं। हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं में फिल्म समीक्षा की स्थिति का ही नतीजा है कि मुंबई के निर्माता-निर्देशक उन्हें नजरंदाज करते हैं। फिल्म समीक्षा दरअसल फिल्म और दर्शक के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। संतुलित समीक्षा से दर्शकों को फिल्म को समझने में मदद मिलती है। कई बार वे बुरी फिल्में देखने से बच जाते हैं। हिंदी में फिल्म समीक्षा धीरे-धीरे विकसित हो रही है। उम्मीद है, आने वाले समय में इसे विशेष महत्व और स्थान मिले!

Wednesday, March 25, 2009

दरअसल:महिलाएं जगह बना रही हैं!

-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं की सक्रियता बढ़ी है। समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह फिल्म इंडस्ट्री में विभिन्न स्तरों और विभागों में महिलाएं दिखने लगी हैं। किसी भी फिल्म की शूटिंग में आप महिला सहायकों को भागदौड़ करते देख सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि वे केवल निर्देशन में सहायता कर रही हों। कैमरा, साउंड और प्रोडक्शन की जिम्मेदारी निभाती सहायिकाओं से अमिताभ बच्चन तक प्रभावित हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग में कई बार इस तब्दीली का उल्लेख भी किया है। हम महिला निर्देशकों के नाम से परिचित हैं। बाकी विभागों के तकनीशियन चेहरे और नाम से नहीं जाने जाते हैं। हम लोग कितने कैमरामैन, साउंड इंजीनियर या एडीटर के बारे में विस्तृत जानकारी रखते हैं? फिल्म इंडस्ट्री के बीच कुशल और योग्य तकनीशियनों की मांग रहती है। फिर भी मीडिया और फिल्म के प्रचार में न तो इन तकनीशियनों के नाम का सहारा लिया जाता है और न ही ऐसी जरूरत समझी जाती है कि दर्शकों को उनके बारे में बताया जाए! परिणामस्वरूप वे सभी गुमनाम ही रह जाते हैं।
बहरहाल, इधर दो-चार साल की फिल्मों की तकनीकी टीम पर नजर डालें, तो हम पाएंगे कि महिलाओं की तादाद बढ़ी है। एफटीआईआई, जामिया मिल्लिया और दूसरे संस्थानों से डिग्री लेकर आई लड़कियां प्रोडक्शन के विभिन्न विभागों के लिए उपयोगी साबित हो रही हैं। इधर एक नया ट्रेंड दिख रहा है। हर निर्देशक अपने सहायक के रूप में लड़कियों को तरजीह देता है। इसके पीछे कोई यौन ग्रंथि या दूषित मानसिकता नहीं है। सामान्य धारणा है कि लड़कियां अच्छी सहयोगी होती हैं। सेट पर माहौल अच्छा रहता है और टीम में जान आ जाती है। सच तो यह है कि लड़कियों की मौजूदगी की वजह से अप्रत्यक्ष अनुशासन भी रहता है। भाषा संयमित रहती है। इसके अलावा, लड़कियां सौंपे गए काम को पूरे मनोयोग से समय पर खत्म भी कर देती हैं।
छोटे शहरों से फिल्मों में आने के लिए लालायित लड़कियों को समझना चाहिए कि फिल्म निर्माण में उनके लिए रोजगार के अवसर बढ़े हैं। अगर वे योग्य और समक्ष हैं, तो उन्हें काम अवश्य मिलेगा। प्रतिभा और अवसर का संयोग बैठ गया, तो वे अपने विभाग और क्षेत्र में स्वतंत्र पहचान भी बना सकती हैं।
हिंदी फिल्मों के दर्शक के रूप में हम हेमंती सरकार, आरती बजाज, दीपा भाटिया (सभी एडिटर), दीप्ति गुप्ता, सबिता सिंह, बकुल शर्मा (कैमरामैन), भवानी अय्यर, शगुफ्ता रफीक, अन्विता दत्त गुप्त, शिवानी कश्यप (रायटर) और नताशा निश्चल (मेकअप आर्टिस्ट) के नामों से परिचित नहीं हो पाते! इनके बारे में पत्र-पत्रिकाओं में लिखा नहीं जाता और न ही इन्हें फिल्म प्रचार के लिए उपयोगी समझा जाता है, लेकिन पिछले वर्षो में आया यह बहुत बड़ा बदलाव है। अब महिलाएं सिर्फ निर्देशन और संगीत निर्देशन तक सीमित नहीं रहीं।
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रचलित पुरुष साम्राज्य के संदर्भ में एक मजाक किया जाता है कि अगर पा‌र्श्वगायन में महिलाओं की आवाज में पुरुष गा सकते हैं, तो शायद सुरैया से लेकर श्रेया घोषाल तक को मौका नहीं मिलता! ऐसी इंडस्ट्री में अब महिलाओं ने भी स्पेस लेना शुरू कर दिया है! इस बदलते ट्रेंड के साथ यह भी सच है कि महिलाओं को किसी भी विभाग की स्वतंत्र जिम्मेदारी देने से पहले निर्माता हजार बार सोचता है। जैसे हम अपने परिवार और समाज में आसानी से महिलाओं को निर्णायक पद देने में हिचकते हैं, वैसे ही फिल्म निर्माण के निर्णायक पदों तक पहुंचने में महिलाओं को मुश्किल होती है। फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें सहायक का काम तो आसानी से मिल जाता है, लेकिन सहायक निर्देशक से निर्देशक बनने में उन्हें पुरुषों की तुलना में ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है। यही कारण है कि हर साल रिलीज हो रही सौ से अधिक फिल्मों में से केवल दो-चार फिल्मों की निर्देशक ही महिलाएं होती हैं। इस कड़वी सच्चाई के बावजूद फिल्म निर्माण में महिलाओं की तादाद बढ़ रही है। मुमकिन है, आगामी कुछ वर्षो में फिल्म निर्माण के निर्णायक पदों पर महिलाओं की बराबर की हिस्सेदारी हो।

Tuesday, March 24, 2009

फ़िल्म समीक्षा:फ़िराक

अस्मिता व विश्वाद्य से टकराती सच्चाइयां
थिएटर और अलग किस्म की फिल्मों से पहचान बना चुकी नंदिता दास ने निर्देशन में कदम रखा तो स्वभाव के मुताबिक गंभीर सामाजिक मुद्दा चुना। फिराक का विचार उनके व्यक्तित्व से मेल खाता है। फिराक में मनोरंजन से अधिक मुद्दे पर ध्यान दिया गया है।
गुजरात के दंगों के तत्काल बाद के अहमदाबाद में छह कथा प्रसंगों को साथ लेकर चलती पटकथा एक-दूसरे का प्रभाव बढ़ाती है। नंदिता ने मुश्किल नैरेटिव चुना है, लेकिन कैमरामैन रवि चंद्रन और अपने संपादक के सहयोग से वह धार्मिक अस्मिता, दोस्ती, अपराध बोध, खोए बचपन व विश्वास को ऐसे टटोलती हैं कि फिल्म खत्म होने के बाद सभी किरदारों के लिए हमें परेशानी महसूस होती है। यह फिल्म तकनीशियनों के सामूहिक प्रयास का सुंदर उदाहरण है। नंदिता दास ने फिल्म शुरू होने पर तकनीशियनों की नामावली पहले देकर उन्हें यथोचित सम्मान दिया है। नीम रोशनी और अंधेरे के बीच चलती फिल्म के कई दृश्य पारभासी और धूमिल हैं। रवि चंद्रन ने फिल्म में प्रकाश संयोजन से कथा के मर्म को बढ़ाया है। फिल्म में कुछ भी लकदक और चमकदार नहीं है। दंगे के बाद की उदासी महसूस होती है। सांप्रदायिकता का डर उभरता है और अस्मिता के प्रश्न से किरदार टकराते हैं। फिल्म का पाश्‌र्र्व संगीत भी उल्लेखनीय है।
फिल्म में नसीरुद्दीन शाह और रघुवीर यादव की मौजूदगी आनंदित करती है। मामूली दृश्यों को भी उत्तम अभिनेता कारगर व प्रभावी बना देते हैं। शहाना गोस्वामी व संजय सूरी अपनी भूमिकाओं में जंचते हैं।

Monday, March 23, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा बचपन में 'अद्भुत' लगता था-सुयश सुप्रभ

हिन्दी टाकीज-२९
सुयश सुप्रभ ...ऐसा लगता है की दो नाम हैं.हिन्दी फिल्मों का सन्दर्भ लें तो कोई जोड़ी लगती है,जैसे सलीम-जावेद,कल्याणजी-आनंदजी.सुयश सुप्रभ एक ही व्यक्ति हैं.दिल्ली में रहते हैं और स्वतंत्र रूप से कई काम करते हैं,जिनमें अनुवाद खास है,क्योंकि वह आजीविका से जुड़ा है.पिछले दिनों चवन्नी दिल्ली गया था तो सुयश से मुलाक़ात हुई.यह संस्मरण सुयश उस मुलाक़ात से पहले चवन्नी के आग्रह पर भेज चुके थे.सुयश अपनी दुनिया या अपनी देखि दुनिया की बातें बातें दुनिया की ब्लॉग में लिखते हैं.उनका एक ब्लॉग अनुवाद से सम्बंधित है.उसका नाम अनुवाद की दुनिया है। सुयश को दुनिया शब्द से लगाव है।सुयश ने सिनेमा की अपनी दुनिया में झाँकने का मौका दिया है. हिन्दी टाकीज का सिलसिला चल रहा है.रफ्तार थोड़ी धीमी है।

सिनेमा बचपन में 'अद्भुत' लगता था और आज भी लगता है। दूरदर्शन के ज़माने में रविवार की फ़िल्मों को देखकर जितना मज़ा आता था, उतना मज़ा आज मल्टीप्लेक्स में भी नहीं आता है। उस वक्त वीसीआर पर फ़िल्म देखना किसी उत्सव की तरह होता था। मोहल्ले के लोग एक-साथ बैठकर वीसीआर पर फ़िल्म देखते थे। कुछ 'अक्खड़' किस्म के लोगों के यहाँ जाने में संकोच भी होता था, लेकिन फ़िल्म देखने की ललक के आगे यह संकोच टिकता नहीं था। बचपन में एक बार मेरी तबियत खराब होने पर मेरे घरवालों ने मुझे पड़ोसी के घर में रंगीन टीवी पर फ़िल्म दिखाने की व्यवस्था की थी। जहाँ तक मुझे याद है, इसके बाद मेरी तबियत ठीक हो गई थी!
मेरे शहर दरभंगा में उस वक्त कुल मिलाकर छह सिनेमा घर थे - पूनम, उमा, नेशनल, लाइट हाउस, कल्पना और सोसाइटी। इन सिनेमा घरों की सबसे ख़ास बात यह थी कि इनमें हर वर्ग के लोग फ़िल्म देखने जाते थे। आज मल्टीप्लेक्सों में जाने वाले दर्शकों में अधिकतर लोग मध्य या उच्च वर्ग के होते हैं। टिकटों की कीमत आज की तुलना में बहुत कम थी। वैसे इन सिनेमा घरों में कुछ कमियाँ भी थीं। हिट फ़िल्मों की टिकटें प्राय: ब्लैक में मिलती थीं। लोग सीट या सीढ़ियों पर पान की पीक फेंकते और यह सब बिल्कुल सामान्य माना जाता था।
इन सिनेमा घरों में अपनी सीट खोजना आसान नहीं होता था। सीट दिखाने वाला आदमी अंधेरे में टॉर्च से सीट पर लाइट मारता और हमारे पास उसका निर्देश समझने के लिए सिर्फ़ कुछ सेकंड होते। भीड़ अधिक होने पर वह टॉर्च और सीट के बीच कोई-न-कोई आ जाता। दूसरी बार पूछने पर टॉर्च वाले से डाँट सुनने को मिलती। "एक बार में समझ में नहीं आता है", "दिमाग कहाँ रहता है", "जब बता रहे थे तो कहाँ देख रहे थे"...। अंधेरे में अगर गलती से भी 'लेडीज़' से टकरा जाता तो गाली सुनने के लिए मानसिक तौर पर तैयार रहना पड़ता।
टिकट के लिए अकसर मारपीट हो जाती थी। कुछ लोग अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन करते। जब भीड़ बहुत अधिक होती तो ये लोगों के कंधों पर इस तरह 'तैरते' चले जाते कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब उनके ऊपर से एक इंसान आगे चला गया और टिकट लेने में कामयाब भी हो गया। लाइन में लगना मेरे जैसे कमज़ोर लोगों का काम था।
मैंने बचपन में माँ के साथ बहुत सारी फ़िल्में देखी हैं। मेरी माँ को विजया शांति की तेजस्विनी फ़िल्म बहुत अच्छी लगती है। इसमें एक औरत के संघर्ष और विजय की कहानी है। आज भी माँ इस फ़िल्म को फ़िर से देखना चाहती हैं।
पहले किसी एक फ़िल्म को देखने के बाद कई दिनों तक उसका असर दिलोदिमाग पर छाया रहता था। उस वक्त अनिल कपूर की फ़िल्में हिट हो रही थीं। बच्चों के रखवाले के रूप में अनिल कपूर की कुछ फ़िल्में आई थी, जिनमें मि. इंडिया, रखवाला आदि मुझे आज भी याद हैं। मैं बहुत दिनों तक अनिल कपूर के इन चरित्रों से प्रभावित रहा।
अमिताभ बच्चन की गंगा जमुना सरस्वती सरस्वती, शंहशाह आदि फ़िल्में फ़्लॉप हो रही थीं। लेकिन उनकी पुरानी हिट फ़िल्मों का नशा लोगों के सिर से उतरा नहीं था। मैं दीवार, जंजीर आदि फ़िल्मों में उनके अभिनय से बहुत प्रभावित था और आज भी मेरी नज़र में उनसे बड़ा स्टार भारत में नहीं है।
बड़े होने पर मॉर्निंग शो के बारे में पता चला। इसका रहस्य दोस्तों से मालूम हुआ था। इसकी टिकट लेने वाले अपना मुँह छिपाने की नाकाम कोशिश करते थे। उन्हें यह डर लगता था कि जान-पहचान का आदमी उनके घरवालों को यह न बता दे कि उनका सुपुत्र मॉर्निंग शो देखने जैसी 'गिरी हरकत' कर रहा है। कभी-कभी दिलचस्प नज़ारा देखने को मिलता। मॉर्निंग शो देखकर निकलने वाले लोग इतनी तेज़ी से निकलते कि उनका चेहरा तक नहीं दिखता। कम उम्र के लड़के सहमे हुए निकलते। कुछ लोग लंबे कद के लोगों के पीछे छिपने की नाकाम कोशिश करते दिखते।
'दीवार' में अमिताभ बच्चन के मरने पर मुझे इतना दुख हुआ था कि कई दिनों तक किसी काम में मेरा मन नहीं लगा। मेरी माँ को ऐसी फ़िल्में बिल्कुल पसंद नहीं हैं जिनमें हीरो मर जाता है। उन्हें महमूद, असरानी जैसे हास्य अभिनेताओं की फ़िल्में बहुत अच्छी लगती हैं। मैं आज तक उन्हें आनंद फ़िल्म देखने के लिए राजी नहीं कर पाया हूँ।
कभी-कभी फ़िल्म देखते वक्क्त कुछ दर्शक चिल्लाते, "जियो जवानी", "टंच माल है" ...। परिवार के साथ फ़िल्म देखते वक्त उनकी ये बातें बुरी लगतीं। फ़िल्म में प्रणय या अंग प्रदर्शन के दृश्यों के दौरान परिवार के सभी लोग सिनेमा घर की छत, जमीन, सीट आदि देखने लगते और मेरी तो यह हालत होती थी कि मैं जमीन के फटने और उसमें समा जाने की कामना करने लगता था। एक बार हमारे शहर में मैथिली फ़िल्म लगी थी। इस फ़िल्म को देखने के लिए लोग गाँवों से ट्रैक्टर पर चढ़कर आते थे। कुछ सदाबहार फ़िल्में हर साल सिनेमाघरों में लगती थीं। इन फ़िल्मों में मदर इंडिया, शोले, दो बदन, नदिया के पार आदि शामिल हैं।
वक्त बीता और केबल का ज़माना आया। लेकिन सिनेमा घरों का आकर्षण अभी बरकरार था और आज भी यही स्थिति है। बड़े पर्दे पर फ़िल्म देखने का मज़ा ही कुछ और है।
आज इंटरनेट व पत्र-पत्रिकाओं से विश्व सिनेमा के बारे में अच्छी जानकारी मिल जाती है। ईरान, इटली आदि की फ़िल्मों को देखने के बाद मैंने यह जाना कि सिनेमा सिर्फ़ बॉलीवुड या हॉलीवुड तक सीमित नहीं है। विदेशी भाषा की फ़िल्मों से हम दूसरे देश की संस्कृति, रहन-सहन आदि के बारे में जानते हैं।

Thursday, March 19, 2009

सही बदलाव दर्शक ही लाएंगे: इरफान खान


-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले दिनों फो‌र्ब्स पत्रिका ने भारत के छह सुपरिचित फिल्म स्टारों की सूची और छवि प्रकाशित की। उनमें से एक इरफान खान थे। हाल ही में ऑस्कर के रेड कार्पेट समारोह और बाद की पार्टी में उन्हें पहचानने वालों में हालीवुड के बड़े सितारे भी थे। इरफान इस पहचान और प्रतिष्ठा से खुश हैं। लंबे संघर्ष के बाद मिली प्रतिष्ठा ने उन्हें संयमित रहना सिखा दिया है। अपने ऑस्कर अनुभव और अन्य विषयों पर उन्होंने खास बातचीत की-


ऑस्कर के रेड कार्पेट पर चलने को किस रूप में महत्वपूर्ण मानते हैं?
ऑस्कर ने ऐसी प्रतिष्ठा अर्जित की है कि अकादमी के लिए नामांकित होना भी बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। ऑस्कर के साथ सराहना और लोकप्रियता दोनों जुड़ी हुई है। हॉलीवुड की फिल्मों के साथ सराहना और लोकप्रियता दोनों जुड़ी हुई है। ऑस्कर से पुरस्कृत फिल्मों को आप खारिज नहीं कर सकते। अपने यहां फिल्मों की तरह अवार्ड विभाजित हैं। माना जाता है कि नेशनल अवार्ड सीरियस फिल्मों के लिए है तो पॉपुलर अवार्ड कमर्शियल फिल्मों के लिए । हालांकि इधर कुछ बदलाव नजर आ रहा है। उदाहरण के लिए मुंबई मेरी जान को पापुलर अवार्ड में जगह नहीं मिली है, जबकि पिछले साल की वह एक अच्छी फिल्म है। ऑस्कर पुरस्कारों के लिए फिल्में अपनी मेरिट पर नामांकित होती हैं। रेड कार्पेट पर चलते हुए यह एहसास गर्व देता है कि आप एक अच्छी फिल्म का हिस्सा हैं।


आपका अनुभव कैसा रहा?
फिल्मों के लिए इससे बड़ा समारोह नहीं है। पूरी दुनिया में लोग इसे देखते हैं। इसमें चमक-दमक और टैलेंट दोनों का मेल है। बहुत ही व्यवस्थित समारोह था। मुझे लगता है कि एक-एक सेकेंड का हिसाब लगा कर रखा गया था। सभी की जगहें सुनिश्चित थीं। रास्ता और सीटें भी सुरक्षित थीं। मुझे किसी भी प्रकार की गड़बड़ी नहीं दिखायी दी। मीडिया भी अनुशासित थी। वे अपनी जगह से एक कदम भी आगे-पीछे नहीं हुए। मेरे लिए यह इस हिसाब से खास रहा है कि जिनकी फिल्में देखकर मैंने अभिनय की बारीकियां सीखीं और जिन से प्रभावित रहा, उन्हें सामने देख रहा था। रॉबर्ट डिनेरो को देखने के बाद मेरी भी चिल्लाने की इच्छा हुई।


इस अनुभव से आप कितने उत्साहित हैं? आपके करिअर में फर्क पड़ेगा?
अभी कुछ भी कह पाना मुश्किल है। नेमसेक के समय जब मीरा नायर अपने साथ तब्बू को लेकर घूम रही थीं तो मुझे लगा कि मेरा काम उभर कर नहीं आया होगा। बाद में मुझे पुरस्कार मिले और तारीफें मिलीं तो लगा कि कुछ हो गया। फिल्में करते समय यह नहीं मालूम रहता कि दर्शकों की क्या प्रतिक्रिया होगी? मुझे लगता है कि कुछ और फिल्में मिलेंगी। मेरी कोशिश होगी कि बाहर और देश की फिल्मों के बीच संतुलन बना कर चलता रहूं। फिल्मों की एक्टिंग में आप प्लानिंग नहीं कर सकते, क्योंकि आपको नहीं मालूम कि दुनिया में कौन कहां आप के बारे में क्या प्लानिंग कर रहा है?


क्या स्लमडॉग मिलियनेयर को आठ पुरस्कार मिलने से भारतीय और विशेषकर हिंदी फिल्मों के प्रति कोई जिज्ञासा बढ़ी है?
बहुत जिज्ञासा बढ़ी है। फिल्मों के साथ ही भारत के प्रति उत्साह बना है। स्लमडॉग मिलियनेयर के बिजनेस ने बहुत सारे बांध तोड़ दिए हैं। लोग हिंदुस्तानी प्रतिभाओं से काम लेना चाहते हैं। हिंदुस्तानी कहानियां सुनाना चाहते हैं। भारत में आकर शूटिंग करना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि कई सारे सहयोग और अनुबंध होंगे। मुझे नहीं मालूम कि हमारी इंडस्ट्री और सिस्टम इसके लिए तैयार हैं कि नहीं। मुझे कई भारतीय मिले। उनमें से कुछ ने कहा कि उन्हें गर्व का एहसास हो रहा है। ऑस्कर पुरस्कार के मायने हैं। लोग इस वजह से रहमान, रसूल और भारतीय फिल्मों के प्रति गर्व महसूस कर रहे हैं।


ऐसा कहा जा रहा है कि इससे युवा फिल्मकारों को बल मिला है कि मंहगे और बिकाऊ स्टारों के बिना भी वे फिल्में बना सकते हैं।
ऐसा हो जाए तो बहुत अच्छा होगा। होना तो यही चाहिए कि फिल्म की कहानी महत्वपूर्ण हो। इस तरह के बदलाव डायरेक्टर के साथ ही एक्टर और टेक्नीशियन के लिए भी फायदेमंद साबित होंगे।


यह विवाद कितना उचित है कि स्लमडाग मिलियनेयर भारतीय फिल्म नहीं है, इसलिए हमें खुश होने की जरूरत नहीं है?
कहना मुश्किल है कि यह भारत की फिल्म है या ब्रिटेन की या अमेरिका की, गौर करें तो कंटेंट और क्रिएटिव टीम भारत की है। डायरेक्टर ब्रिटेन का है और इसकी मार्केटिंग अमेरिकी कंपनी ने की है। अगर फाक्स सर्चलाइट ने इसका वितरण नहीं किया होता तो फिल्म का पता भी नहीं चलता। डैनी बाएल तो डीवीडी रिलीज के लिए तैयार हो गए थे। इस फिल्म से पता चला कि डिस्ट्रीब्यूटर का कितना बड़ा रोल हो सकता है। जो लोग अभी तक विवाद कर रहे हैं, मैं उनसे इतना ही कहना चाहूंगा कि इस फिल्म के जरिए भारतीयों को भी पहचान मिली है। कम से कम उनका सम्मान करें।


इरफान का अगला कदम क्या होगा?
लोग कहते हैं कि मुझे देर से कामयाबी मिली। मैं कहता हूं कि सही समय पर मिली है। इस उम्र में मैं छोटी-बड़ी कामयाबी की वजह से अपने विश्वास से नहीं हिल सकता। एक स्तर पर कामयाबी की बहुत बड़ी भूमिका नहीं होती। मेरी कोशिश यही रहेगी कि मैं दर्शकों को एंटरटेन करने के साथ कोई बात भी कह सकूं। नए डायरेक्टर एंटरटेनमेंट को रिडिफाइन कर रहे हैं। इस माहौल में मैं बड़ा रोल निभाना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि लाग मेरा उपयोग करें। मुझे संडे या क्रेजी 4 करने में भी दिक्कत नहीं है। मैं वैसी फिल्मों की पहुंच जानता हूं।


आप की अगली फिल्म पान सिंह तोमर है। कब शुरू हो रही है?
बस, मैं उसकी शूटिंग के लिए धौलपुर जा रहा हूं। सुना है कि वहां जबरदस्त गर्मी है। बहुत ही चैलेंजिंग रोल है। सीमित बजट में फिल्म बन रही है। ढेर सारे नए कलाकार हैं। रियल कहानी है, इसलिए मजेदार है।


आप किन युवा निर्देशकों का नाम लेंगे, जो मौका मिले तो इंटरनेशनल स्तर की फिल्में बना सकते हैं?
अनुराग बसु, अनुराग कश्यप, दिबाकर बनर्जी, शिमित अमीन, श्रीराम राघवन, तिग्मांसु धूलिया, निशिकांत कामथ आदि कितने नाम हैं। इन सभी को मौका और बजट मिले तो ये कमाल कर सकते हैं। भारतीय संदर्भ में मुझे लगता है कि दर्शक धीरे-धीरे बदल रहे हैं। सही बदलाव दर्शक ही लाएंगे। वे ऐसी फिल्में पसंद करेंगे तभी वैसी फिल्में बनेंगी।

Tuesday, March 17, 2009

बॉलीवुड में हिन्दी सिर्फ़ बोली जाती है..

-अजय ब्रह्मात्मज
अगर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री भी सरकारी या अ‌र्द्धसरकारी संस्थान होता और भारतीय संविधान के राजभाषा अधिनियम के अंतर्गत आता तो शायद झूठे आंकड़ों से ही कम से कम यह पता चलता कि रोजमर्रा के कार्य व्यापार में यहां हिंदी का कितना प्रयोग होता है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कोई हिंदी अधिकारी नहीं है और न ही यह संसदीय राजभाषा समिति के पर्यवेक्षण में है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ऐसी इकाई भी नहीं है कि हिंदी के क्रियान्वयन की वार्षिक रिपोर्ट पेश करे। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के हिंदी परहेज का सबसे बड़ा सबूत है कि इसे बॉलीवुड कहलाने में गर्व महसूस होता है। जी हां, यह सच है कि बॉलीवुड में हिंदी सिर्फ बोली जाती है, लिखी-पढ़ी नहीं जाती। बॉलीवुड में कोई भी काम हिंदी में नहीं होता। आश्चर्य न करे फिल्मों के संवादों के रूप में हम जो हिंदी सुनते है, वह भी इन दिनों देवनागरी में नहीं लिखी जाती। वह रोमन में लिखी जाती है ताकि आज के फिल्म स्टार उसे पढ़कर बोल सकें। अमिताभ बच्चन का ही कथन है कि अभिषेक बच्चन समेत आज के सभी युवा स्टारों की हिंदी कमजोर है। कुछ कलाकार, निर्देशक और तकनीशियन अपवाद हो सकते है, लेकिन अपवाद ही नियमों की पुष्टि करते है।
'द्रोण' फिल्म की म्यूजिक रिलीज के समय जया बच्चन के हिंदी बोलने पर हुए हंगामे से सारा देश वाकिफ है। लेकिन फिल्म के निर्देशक इसे 'द्रोणा' ही कहते रहे। उनका तर्क था कि मूल शब्द 'द्रोण' होगा, लेकिन फिल्म में हम अभिषेक बच्चन को 'द्रोणा' ही बुलाते है। डी आर ओ एन ए.. अब आप हिंदी में चाहे जैसे लिख लें, पिछले साल पॉपुलर हुई फिल्म 'सिंह इज किंग' की रिलीज के 15 दिन पहले फिल्म के निर्माता विपुल शाह की जिज्ञासा थी कि पोस्टर पर हिंदी में इसे कैसे लिखा जाए। एस आई एन जी एच बोलने में तो सिंघ सुनाई पड़ता है। सिंघ या सिंग का तुक किंग से मिलता है। बहरहाल, विपुल शाह ने सलाह मानी और एसआईएनडीएच को 'सिंह' ही लिखा। अन्यथा हम पोस्टर पर 'सिंग इज किंग' देखते। दारा सिंह की फिल्मों के पोस्टर पर हिंदी प्रदेशों के दर्शक उनका नाम दारा सिंग ही पढ़ते रहे है। फिल्म के शीर्षकों में मात्राओं की गलतियां आम है। इन पर कोई ध्यान नहीं देता। वैसे भी अधिकांश पोस्टरों से हिंदी नाम गायब हो गए है। 'पिंजर' शब्द से अपरिचित दर्शक उसे 'पिंजार' पढ़ेगा तो किसकी गलती होगी? यशराज फिल्म्स की 'बचना ऐ हसीनों' में 'हसीनों' की बिंदी गायब हो जाती है और किसी हिंदी भाषी की भृकुटि नहीं तनती। श्याम बेनेगल की फिल्म 'वेलकम टू सज्जानपुर' के पोस्टर में एक मील का पत्थर दिखता है, जिस पर 'सज्जानपूर' लिखा हुआ है। हिंदी के लिए सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर 'भाषा संरक्षण' या 'भाषा बचाओ' संस्था नहीं है, जो फिल्मों में हिंदी के गलत प्रयोग पर आपत्ति दर्ज करे या उन्हे सुधरवाने की कोशिश करे।
माना जाता है कि हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी फिल्मों का बड़ा योगदान है। वास्तव में यह एक धारणा है, जिसका कोई आधार नहीं है। ना ही कभी कोई सर्वेक्षण हुआ है और ना कभी यह जानने की कोशिश की गयी है कि हिंदी फिल्मों ने हिंदी भाषा का किस रूप, अर्थ और ढंग से प्रसार किया? हां, हिंदी फिल्मों ने एक ऐसी सार्वजनिक सिनेमाई भाषा विकसित कर ली है, जो संवादों का मर्म समझे बगैर भी मनोरंजन प्रदान करती है। पिछले कुछ दशकों में इसने नए बाजार में प्रवेश किया है, इसलिए सहज निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि जो हिंदी फिल्में देख रहे है, वे हिंदी सीख भी रहे है। विदेशों में बसे भारतवंशियों की संतानों को हिंदी नहीं आती। वे हिंदी फिल्मों का आम के अचार की तरह चटखारा लेते है। पिछले पंद्रह-बीस सालों में बनी लोकप्रिय हिंदी फिल्मों के संवादों का अध्ययन करे तो उनमें अंग्रेजी शब्दों की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। इन दिनों कुछ पात्र सिर्फ अंग्रेजी ही बोलते नजर आते है या बीच-बीच में बोले गए अंग्रेजी वाक्यों को किसी और तरीके से हिंदी में समझाने की जरूरत नहीं समझी जाती। हिंदी फिल्मों के दर्शकों का प्रोफाइल बदल गया है। निर्माता और निर्देशक के आग्रह पर लेखक एक ऐसी भाषा विकसित करने में कामयाब हुए है, जिसे महानगरों और बड़े शहरों में स्थित मल्टीप्लेक्स के दर्शक आसानी से समझ सकते है। चूंकि हिंदी फिल्मों की आय और कलेक्शन का मुख्य स्त्रोत मल्टीप्लेक्स और विदेशी बाजार हो गए है, इसलिए विषय, प्रस्तुति और भाषा का शहरीकरण तेजी से हो रहा है। 'रॉक ऑन' ताजा उदाहरण है। रॉक म्यूजिक से देश के अधिकांश दर्शक अपरिचित है, लेकिन इस फिल्म का क्रेज देखते ही बन रहा है। फरहान अख्तर की बहन को यह बताने में झेंप नहीं आती कि उन्हे हिंदी नहीं आती। हिंदी लिखने के लिए तो हम किसी को हायर कर सकते है। मैं अंग्रेजी में पढ़ी-लिखी हूं। उसी भाषा में सोचती और लिखती हूं। आश्चर्य नहीं कि उनकी फिल्म का नाम 'लक बाई चांस' है।
पॉपुलर सितारों में अकेले अमिताभ बच्चन है, जो हिंदी में पूछे गए सवालों के जवाब हिंदी में देते है। उनसे बातचीत करते समय यह ख्याल नहीं रखना पड़ता कि सरल हिंदी या अंग्रेजी शब्दों के पर्याय का इस्तेमाल करे। इसे शर्म कहे या हिंदी फिल्मों के सितारों का धर्म कहे.. सचमुच उन्हे हिंदी नहीं आती। फिल्मों के प्रचार में कैमरे के सामने वे टूटी-फूटी हिंदी से काम चलाते है। शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान भले ही बेहतर हिंदी बोलते नजर आएं, लेकिन अगर उन्हे हिंदी पाठ दे दिया जाए तो उनका पठन चौथी-पांचवी कक्षा के हिंदी विद्यार्थियों जैसा हो जाता है। जी हां, उन्हे अक्षरों को जोड़कर या शब्दों के बीच ठहरकर पढ़ना चाहिए है। 'क्या आप पांचवी पास से तेज है?' के प्रचार में शाहरुख खान जब लंबे अभ्यास के बाद हिंदी में लिखते है तो 'पढ़ो' लिखते समय 'ढ' के नीचे बिंदी लगाना भूल जाते है। उनकी लोकप्रियता की चकाचौंध में खो रही बिंदी पर किसी का ध्यान नहीं जाता। यह वास्तविकता है कि ज्यादातर सितारे सिर्फ हिंदी बोल पाते है। उनकी हिंदी पर गौर करने पर हम पाते है कि वे पांच सौ से अधिक शब्दों का उपयोग नहीं करते। यह उनकी सीमा और मजबूरी है। एक बार सोहा अली खान ने बताया था कि अपने ड्राइवर और ब्वॉय से बात करने से उनकी हिंदी का अभ्यास हो जाता है। हिंदी के प्रति उनके इस रवैए का नतीजा हम 'खोया खोया चांद' में उनकी संवाद अदायगी में देख चुके है। सोहा अली खान तो फिर भी हिंदी में बात कर लेती है और अपने संवाद खुद डब करती है। काटरीना कैफ के बारे में क्या कहेगे? लगातार छह हिट फिल्मों की हीरोइन कैटरीना कैफ को हिंदी नहीं आती। इतने सालों के अभ्यास के बाद वह बमुश्किल से हिंदी के दस-बीस शब्द और वाक्य बोल पाती है, जिनमें 'नमस्ते' और 'धन्यवाद' शामिल है। अभी तक उनके संवाद डब किए जाते है। इसके पहले श्रीदेवी भी अपनी फिल्मों में लगातार दूसरों की आवाज में बोलती रहीं। हिंदी फिल्मों में सिर्फ पा‌र्श्व गायन ही नहीं होता, पा‌र्श्व संवाद अदायगी भी होती है। काश, हम उन बेनाम कलाकारों के बारे में जान पाते जो पॉपुलर सितारों की आवाज बनते है।
हिंदी फिल्मों के सार्वजनिक समारोहों में अंग्रेजी का चलन है। फिल्मों की प्रचार सामग्री अंग्रेजी में ही छपती और वितरित की जाती है। ऑडियो सीडी में हिंदी गाने रोमन में छपे होते है। ज्यादातर डीवीडी में फिल्मों के साथ दी गयी अतिरिक्त सामग्री अंग्रेजी में रहती है। 'जोधा अकबर' की डीवीडी में आशुतोष गोवारीकर का इंटरव्यू अंग्रेजी में है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की संपर्क भाषा अंग्रेजी है। सारे अनुबंध और पत्र अंग्रेजी में तैयार किए जाते है। विडंबना है कि हिंदी के पत्रकारों को हिंदी फिल्मों के सितारों से बातचीत करने के लिए अंग्रेजी सीखनी पड़ती है। ये कड़वी सच्चाइयां है, जिन्हे हिंदी भाषी दर्शक सहज स्वीकार नहीं करेगे। हिंदी प्रदेशों में अधिकांश व्यक्तियों को यह भ्रम है कि हिंदी फिल्में उनके दम पर चलती है। यह भी एक निर्मूल धारणा ही है। सच तो यह है कि हिंदी फिल्मों का व्यापार हिंदी प्रदेशों पर निर्भर ही नहीं करता। यही कारण है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी व्यवहार की भाषा नहीं रह गयी है। तभी तो हिंदी कवि हरिवंशराय बच्चन के बेटे अमिताभ बच्चन ने अपने वायदे के बावजूद 270 से अधिक दिन बीत जाने के बाद भी अपना ब्लॉग पूरी तरह से हिंदी में लिखना आरंभ नहीं किया है। किसे परवाह है हिंदी भाषा और हिंदी दर्शकों की है। मनोज बाजपेयी अपना ब्लॉग हिंदी में लिख रहे है। उन्हे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने हाशिए पर डाल रखा है।

Friday, March 13, 2009

फ़िल्म समीक्षा:गुलाल

-अजय ब्रह्मात्मज
इस दशक में आए युवा निर्देशकों में अनुराग कश्यप ने अपनी नयी शैली, आक्रामक रूझान, सशक्त कथ्य और नयी भाषा से दर्शकों के बीच पैठ बना ली है। अपनी हर फिल्म में वे किसी नए विषय से जूझते दिखाई पड़ते हैं। गुलाल राजस्थान की पृष्ठभूमि पर बनी राजनीतिक फिल्म है। यह परतदार फिल्म है। इसकी कुछ परतें उजागर होती है और कुछ का आभास होता है। गुलाल हिंदी समाज की फिल्म है।
किरदारों और कहानी की बात करें तो यह दिलीप (राजा सिंह चौधरी) से आरंभ होकर उसी पर खत्म होती है। दिलीप के संसर्ग में आए चरित्रों के माध्यम से हम विकट राजनीतिक सच का साक्षात्कार करते हैं। दुकी बना (के। के। मेनन) अतीत के गौरव को लौटाने का झांसा देकर आजादी के बाद लोकतंत्र की राह पर चल रहे देश में फासीवाद के खतरनाक नमूने के तौर पर उभरता है। दुकी बना और उसका राजनीतिक अभियान वास्तव में देश की व‌र्त्तमान राजनीति का ऐसा नासूर है, जो लगातार बढ़ता ही जा रहा है। अनुराग कश्यप ने किसी व्यक्ति, जाति,, समुदाय या धर्म पर सीधा कटाक्ष नहीं किया है। समझदार के लिए इशारा ही काफी है। दर्शक समझ जाते हैं कि क्या बातें हो रही हैं और किरदारों के बीच के संघर्ष की वजह क्या है? इस फिल्म के किरदारों के साक्ष्य देश में उपलब्ध हैं।
अनुराग कश्यप की फिल्मों में आए प्रतीक और बिंब गहरे सामाजिक संदर्भ से युक्त होते हैं। अगर समाज, राजनीति, साहित्य और आंदोलनों की सामान्य समझ नहीं हो तो अनुराग की फिल्म के विषय और कथ्य का निर्वाह दुरूह लगने लगता है। गुलाल इस मायने में उनकी पिछली फिल्मों से थोड़ी सरल है। फिर भी फिल्म का कथा विन्यास पारंपरिक नहीं है, इसलिए कहानी समझने में कुछ वक्त लगता है। इस फिल्म के संवाद महत्वपूर्ण है। अगर संवादों में प्रयुक्त शब्द सुनने से रह गए तो दृश्य का मर्म समझने में चूक हो सकती है। गुलाल ऐसी फिल्म है, जिसे अच्छी तरह समझने के लिए जरूरी है कि सिनेमाघरों में आंख और कान खुले हों और दिमाग के दरवाजे बंद न हों। यह आम हिंदी फिल्म नहीं है, इसलिए खास तवज्जो चाहती है। अनुराग के कथ्य को पियूष मिश्रा ने गीतों से मजबूत किया है। लंबे समय के बाद फिल्म के कथ्य के मेल में भावपूर्ण और गहरे अर्थो के शब्दों से रचे गीत सुनाई पड़े हैं। निर्देशक के भाव को गीतकार ने यथायोग्य अभिव्यक्ति दी है।
पियूष मिश्रा का गीत-संगीत गुलाल को उचित ढंग से प्रभावशाली बनाता है। फिल्म का पालिटिकल मोजरा (जैसे दूर देश के टावर में घुस गयो रे ऐरोप्लेन), रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां , प्यासा की ये दुनिया से प्रेरित गीत और शहर ़ ़ ़ जैसी अभिव्यक्ति उल्लेखनीय है। अनुराग कश्यप की गुलाल समूह के सामाजिक संदर्भ से आरंभ होकर व्यक्ति की वैयक्तिक ईष्र्या पर खत्म होती है। समाज के स्वार्थी तत्वों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा व्यक्ति सही समझ के अभाव में खुद ही खुद के विनाश का कारण बन जाता है। फिल्म का नायक दिलीप इस समाज में लाचार, विवश और पंगु हो रहे व्यक्ति का प्रतिनिधि है। वह नपुंसक नहीं है, लेकिन अपने सामाजिक परिवेश से कटे होने के कारण सच से टकराने पर खौफजदा रहता है। परिस्थितियों में फंसने पर वह डरपोक, कायर और भ्रमित दिखता है। अनुराग कश्यप ने गुलाल में राजा सिंह चौधरी, दीपक डोबरियाल,आयशा मोहन और अभिमन्यु सिंह जैसे नए कलाकारों से सुंदर काम लिया है। दृश्यों की तीव्रता इन कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का पर्याप्त अवसर देती है। पियूष मिश्रा के योगदान के बगैर गुलाल इस रूप और प्रभाव में सामने नहीं आ पाती। उन्होंने अपने अभिनय, स्वर और गीत से फिल्म को उठा दिया है। के के मेनन और आदित्य श्रीवास्तव जैसे सधे अभिनेताओं की अलग से तारीफ लिखने की जरूरत नहीं है। दोनों ही अनुराग कश्यप के भरोसेमंद और मददगार अभिनेता हैं।

***1/2

Tuesday, March 10, 2009

फ़िल्म समीक्षा:१३ बी,ढूंढते रह जाओगे,कर्मा और होली



-अजय ब्रह्मात्मज

ठहरता नहीं है डर 13 बी

डरावनी फिल्मों के लिए जरूरी है कि वे दर्शकों को जिज्ञासु बना दें। अब क्या होगा? यह सवाल दर्शकों के दिमाग में मंडराने लगे तो रोमांच पैदा होता है। फिर जब अगला दृश्य आए तो वह अपने प्रभाव से सिहरन और डर पैदा करे। यह प्रभाव दृश्य विधान, पाश्‌र्र्व संगीत और अभिनय से पैदा किया जाता है। 13बी देखते हुए जिज्ञासा तो बढ़ती है, लेकिन डर नहीं लगता।
फिल्म का नायक मनोहर (आर माधवन) कर्ज लेकर नया अपार्टमेंट खरीदता है और पूरे परिवार के साथ वहां शिफ्ट करता है। मनोहर का हंसता-खेलता परिवार है। इसमें उसकी बीवी के साथ बड़े भाई, भाभी, भतीजे और मां हैं। शिफ्ट होने के दिन से ही कुछ गड़बड़ शुरू हो जाती है। मनोहर पढ़ा-लिखा और तार्किक व्यक्ति है। वह संभावित दुर्घटना से परिवार को बचाने की युक्ति में ऐसे सच को छू लेता है, जो पारलौकिक शक्तियों से संचालित है। लेखक और निर्देशक विक्रम के कुमार ने हारर फिल्म में नए तत्व इस्तेमाल किए हैं। उन्होंने अनोखे ढंग से हैरतअंगेज घटनाओं को कहानी का रूप दिया है। आरंभ के कुछ मिनटों की शिथिलता के बाद फिल्म के नायक मनोहर की तरह यह जिज्ञासा बढ़ने लगती है कि आगे क्या होगा? या फिर वे संभावित दुर्घटनाओं से कैसे बचेंगे? अगर विक्रम स्क्रिप्ट को चुस्त व कसा रख पाते और डर के दृश्यों को प्रभावशाली बनाया होता तो फिल्म अधिक डरावनी होती। लंबे दृश्यों और धीमी गति की वजह से डर जगता तो है, लेकिन ठहर नहीं पाता।
फिल्म मुख्य रूप से माधवन पर केंद्रित है। उन्होंने अपनी भूमिका जिम्मेदारी के साथ निभाई है। उनके पुलिस इंस्पेक्टर दोस्त की भूमिका में मुरली शर्मा ने राहत के क्षण दिए हैं और रोमांच भी बढ़ाया है। नीतू चंद्रा घरेलू बीवी के रूप में जंचती हैं। बाकी कलाकारों का उपयोग दृश्य भरने के लिए है। तमिल और हिंदी में एक साथ बनी इस फिल्म पर द्विभाषी दबाव दिखता है।

**


सुस्त पटकथा की फिल्म ढूंढते रह जाओगे


शीर्षक में ही निर्माता-निर्देशक ने सचेत कर दिया है। फिर भी परेश रावल और कुणाल केमू की जोड़ी को पर्दे पर देखना रोचक लगता है। यह कॉमेडी फिल्म है। लेखक और निर्देशक ने खुद ही अपने किरदारों को कार्टून कह दिया है, इसलिए शिकायत की संभावना खत्म हो जाती है।
किस्मत के मारे फिल्म निर्माता राज और चार्टर्ड एकाउंटेंट आनंद अपनी बदहाल स्थितियों से बाहर निकलने के लिए एक ऐसी फिल्म बनाना चाहते हैं, जो सबसे घटिया और फ्लाप हो। चार फिल्मों के प्रसंगों को जोड़कर वे कहानी तैयार करते हैं और फिर शूटिंग शुरू होती है। इंटरवल के बाद का हिस्सा इसी में निकलता है। आखिर में ट्विस्ट यह आता है कि उनकी फिल्म हिट हो जाती है। वे अपने इरादों में नाकाम होते हैं। उन्हें जेल भी जाना पड़ता है। घटिया और फ्लाप फिल्म बनाने की अवधारणा ही हास्यास्पद हैं। फिर लेखक-निर्देशक अपनी अवधारणा को सही ढंग से विकसित भी नहीं कर पाए हैं। परेश रावल, कुणाल केमू और दिलीप जोशी की कोशिशों के बावजूद फिल्म संभल नहीं पाती। इन्हें पटकथा का ठोस सहारा नहीं मिल पाया। सोहा अली खान और सोनू सूद का औसत अभिनय भी फिल्म को कमजोर करता है।
*१/२
पश्चिमी शैली में बनी कर्मा और होली
देश-विदेश के कलाकारों और हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा में बनी होली एंड कर्मा एक मायने में अनोखी फिल्म है। विभिन्न देशों और संस्कृतियों की पृष्ठभूमि के व्यक्तियों के सम्मिलन में हम उनके पूर्वाग्रहों, संस्कारों और मान्यताओं से परिचित होते हैं। वे एक रोचक खेल खेलते हैं, जिसमें सभी अपनी जिंदगी की कोई घटना बताते हैं। इस क्रम में उनके व्यक्तित्व के दूसरे पहलू सामने आते हैं। फिल्म का नैरेटिव पश्चिमी शैली का है। ट्रीटमेंट में भी हिंदी फिल्मों का असर नहीं है।
*

Sunday, March 8, 2009

हिन्दी टाकीज:फिल्मी गानों की किताब ने खोली पोल-ममता श्रीवास्तव

हिन्दी टाकीज-२८

इस बार ममता श्रीवास्तव.ममता गोवा में रहती हैं और ममता टीवी नाम से ब्लॉग लिखती हैं.चवन्नी इनका नियमित पाठक है.ममता की आत्मीय शैली पाठकों से सहज रिश्ता बनती हैं और उनकी बातें किसी कहानी सी महसूस होती हैं.चवन्नी ने उनसे आग्रह किया था इस सीरिज के लिए.ममता ने लेख बहुत पहले भेज दिया था,लेकिन तकनीकी भूलों की वजह से यह लेख पहले पोस्ट नहीं हो सका.उम्मीद है ममता माफ़ करेंगीं और आगे भी अपने संस्मरणों को पढने का मौका देंगीं।

चवन्नी ने कई महीनों पहले जब हिन्दी टाकीज नाम से ब्लॉग शुरू किया था तब उन्होंने हमसे भी इस ब्लॉग पर सिनेमा से जुड़े अपने अनुभव लिखने के लिए कहा था पर उसके बाद कुछ महीनों तक तो हमने ब्लॉग वगैरा लिखना-पढ़ना छोड़ दिया था इस वजह से हमने हिन्दी टाकीज पर भी कुछ नही लिखा ।इतने सारे अनुभव और यादें है कि समझ नही आ रहा है कहाँ से शुरू करुँ । पर खैर आज हम cinema से जुड़े अपने अनुभव आप लोगों से बाँटने जा रहे है ।


सिनेमा या फ़िल्म इस शब्द का ऐसा नशा था क्या अभी भी है कि कुछ पूछिए मत ।वैसे भी ६०-७० के दशक मे film देखने के अलावा मनोरंजन का कोई और ख़ास साधन भी तो नही था । बचपन मे भी कभी पापा या मम्मी ने film देखने पर रोका नही मतलब हम लोगों के घर मे फ़िल्म देखने पर कभी भी कोई भी रोक- टोक नही थी ।बल्कि अच्छी इंग्लिश फ़िल्म तो पापा हम लोगों को ख़ुद ही दिखाने ले जाते थे .

और हम लोग अक्सर सपरिवार film देखने जाया करते थे ।और वो भी शाम यानी ६-९ का शो ।और फ़िल्म देखने के लिए स्कूल से आते ही फटाफट पढ़ाई करके बस तैयार होने लग जाते थे । पर हाँ पापा इस बात का जरुर ध्यान रखते थे कि film अच्छे हॉल मे लगी हो । इलाहाबाद मे उस ज़माने में सिविल लाईन्स का पैलेस और प्लाजा और चौक मे निरंजन सिनेमा हॉल हम लोगों का प्रिय हॉल था । वैसे अगर पिक्चर अच्छी हो तो कभी-कभी चौक मे बने विशम्भर और पुष्पराज हॉल मे भी देख लेते थे ।

उस समय film लगी नही कि film देखने का प्लान बनना शुरू हो जाता था । रेडियो पर बिनाका गीत सुन-सुनकर film देखने का तै होता था । और घर मे चूँकि हम ५ भाई-बहन थे तो उस ज़माने का कोई न कोई हीरो या हेरोईन हम पांचों मे किसी न किसी को ख़ास तौर पर पसंद होता था । इसलिए film देखने के लिए बहाने की ज्यादा जरुरत ही नही थी ।पर फ़िर भी हमें कभी-कभी छोटे होने का नुकसान भुगतना पड़ता था ।


इसी बात पर एक वाकया सुनाते है । अपने भाई-बहनों मे चूँकि हम सबसे छोटे है और हम film देखते हुए बहुत रोते थे जैसे मझली दीदी film को देखते हुए हमने रो-रोकर अपनी आँखें सुजा ली थी । :) वैसे अब भी रोते है :)

उस ज़माने मे मीना कुमारी की film देख कर अधिकतर महिलायें रोती ही थी क्योंकि उनकी एक्टिंग इतनी लाजवाब होती थी । और फ़िर हम तो बच्चे ही थे ।

खैर ये बात उन्ही दिनों की है हमें अच्छे से याद है वो गर्मियों के दिन थे जब काजल film आई थी तो सभी लोगों ने सोचा की ममता तो film मे बहुत रोती है तो इसे काजल film न दिखाई जाए और इसलिए पापा और दीदी लोगों ने रात
का शो ९-१२ का देखने का प्रोग्राम बनाया । और बस फ़िर क्या था सारे लोग यानी हमारी दीदी लोग हमसे कुछ ज्यादा ही प्यार से बात करने लगी थी । पर हम भी कुछ कम नही थे हमें लग रहा था की जरुर कुछ माजरा है पर कुछ समझ नही पा रहे थे ।

खैर शाम को मम्मी ने सबको फटाफट खाना खिलाया और आँगन मे हमें लेकर लेट गई और दीदी लोगों को बोला कि तुम लोग जाओ और पढ़ाई करो । आम तौर पर हम जल्दी सोने वालों मे से थे पर उस दिन हमें नींद ही नही आ रही थी । और हम आँगन में लेटे-लेटे देख रहे थे कि दीदी लोग धीरे-धीरे तैयार भी हो रही थी । हम जब भी उठने कि सोचते मम्मी कहती कि बेटा सो जाओ । तभी हमें कार कि आवाज सुनाई पड़ी तो हमने मम्मी से पूछ कि पापा कहाँ गए है तो मम्मी ने कहा कि दीदी लोग पढ़ाई नही कर रही थी इसलिए पापा उन्हें डॉक्टर से इंजेक्शन लगवाने गए है । (उस जमाने का ये बहुत ही आम सा बच्चों को फुसलाने का बहाना था ) :)वो तो अगले दिन पता चला कि कौन सा इंजेक्शन लगवाने गई थी हमारी दीदी लोग क्योंकि अगले दिन घर मे गाने की किताब मिली ।

आपको याद है की नही । उस ज़माने सिनेमा हॉल के बाहर गाने कीकिताब भी खूब बिका करती थी जिसमे ५-६ film के पूरे-पूरे गाने हुआ करते थे और उन गाने की किताबों को खरीदे बिना तो पिक्चर देखना पूरा ही नही होताथा । :)वो दिन और आज का दिन हमने काजल फ़िल्म नही देखी है । क्योंकि उसके बाद कभी काजल फ़िल्म हॉल मे देखने गए नही और t.v पर कभी देखी नही ।बाकी फिल्मों से जुड़ी यादें फ़िर कभी बाटेंगे।

Saturday, March 7, 2009

बिट्टू के बंधन

-अजय ब्रह्मात्मज
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म 'दिल्ली 6' में सपनों के पीछे भाग रही बिट्टू बहकावे में आकर घर छोड़ देती है। संयोग से रोशन उसे बचा लेता है। अगर बिट्टू चांदनी चौक के फोटोग्राफर के साथ भाग गयी होती हो कहानी कुछ और हो जाती।
हम आए दिन ऐसी बिट्टुओं के किस्से पढ़ते रहते हैं। उजाले की तलाश में वर्तमान जिंदगी के अंधेरे से निकलते समय सही दिशा-निर्देश के अभाव में गांव, कस्बे, छोटे शहरों और महानगरों की बिट्टुएं अंतहीन सुरंगों में प्रवेश कर जाती हैं। उनके अपने छूट जाते हैं और सपने पूरे नहीं होते। घर-समाज में हमारे आस पास ऐसी बिट्टुओं की भरमार है। अगर समाज उन्हें बंधनों से मुक्त करे, उन्हें आजादी दे, उन्हें साधिकार निर्भीक ढंग से घूमने-फिरने और अपना कॅरियर चुनने की स्वतंत्रता दे, तो अपना देश विकास की राह पर छलांगें लगाता हुआ काफी आगे बढ़ सकता है।
शर्म की बात है कि आजादी के साठ सालों के बाद भी देश की बिट्टुएं बंधन में हैं। शिक्षा और कथित स्वतंत्रता के बावजूद वे दिन-रात सहमी सी रहती हैं। बगैर बीमारी के उनकी सांसें घुटती रहती हैं। उत्तर भारत के किसी भी शहर के मध्यवर्गीय परिवार का उदाहरण ले लें। उस परिवार की बिट्टू दस-बारह की उम्र तक आते-आते अपने भाइयों से अलग कर दी जाती है। सबसे पहले मां कहती है, 'अब तू बच्ची नहीं रही।' आशय यह होता है कि अब तू समाज के बनाए अघोषित नियमों का पालन शुरू कर दे। पहनने, खाने, खेलने-कूदने और कई बार पढ़ने तक पर पाबंदियां लगने लगती हैं। बस एक ही तर्क होता है कि तू लड़की है। तू बिट्टू है।
बिट्टू घर से निकलती है। सबसे पहले घर के बड़े-बूढ़े उसे निहारते हैं। चाचा, मामा, भईया या कोई और पुरुष सदस्य बिट्टू का निरीक्षण करता है। उनकी नजर बुरी नहीं होती। वे जाच रहे होते हैं कि बिट्टू सड़क पर चलते हुए अनावश्यक ध्यान तो नहीं खींचेगी। वे आगामी असुरक्षा या खतरे को लेकर सशंकित रहते हैं। उन्हें मालूम नहीं रहता कि इस आशंका में वे खुद शामिल होते हैं। वे अपने घर की बिट्टू का लिहाज कर लें, लेकिन दूसरे परिवारों की बिट्टुओं को मापने से नहीं चूकते। बिट्टू घर से बाहर निकलती है। चौराहे तक जाने और रिक्शा पकड़ने के लिए उसे कुछ दूरी पैदल ही तय करनी होती है। बिट्टू को लगता है कि उसकी पीठ पर कुछ रेंग रहा है। लड़कियां अपनी पीठ पर पुरुषों की नजरों का रेंगना महसूस कर लेती हैं। उनका बदन सिकुड़ जाता है। बिट्टू सहम जाती है। वह कोशिश करती है कि कपड़ों और दुपट्टे के बीच उसका शरीर ढक जाए। बिट्टू की आधी ऊर्जा खुद को दबाने, छिपाने और संभालने में निकल जाती है। बिट्टू थोड़ी और बड़ी होती है, तो उसका अकेले बाहर निकलना बंद होने लगता है। उसे हमेशा परिवार के पुरुष सदस्य के साथ या मां-दीदी के साथ या सहेलियों के साथ झुंड में ही निकलने की इजाजत मिलती है। उसे बताना पड़ता है कि वह कहा-कहां जाएगी और उन जगहों पर जाना क्यों जरूरी है? अगर घर से बाहर निकलने पर कार्यक्रम परिवर्तन हुआ या देर हुई, तो वह स्वाभाविक रूप से शक के घेरे में आ जाती है। परिवार के पुरुष सदस्य और मां को डर सताने लगता है कि कहीं किसी लड़के से तो दोस्ती नहीं हो गयी। बिट्टू बदचलन तो नहीं हो रही है। चौदह से अठारह साल की लड़की का किसी लड़के से बात करना तो चाल-चलन खराब होना ही है।
बिट्टू कालेज जाने की उम्र तक आ जाती है। तब सबसे पहली कोशिश होती है कि किसी महिला कालेज में एडमिशन मिल जाए। अगर शहर से बाहर भेजना हो, तो लड़कियों का बोर्डिग कालेज मिले। पढ़ाई के विषय भी ऐसे चुने जाएं कि नौकरी की इच्छा होने पर वह सुरक्षित पेशे में जाए। सुरक्षित पेशों से मतलब ऐसी नौकरियों से होता है, जहां पुरुषों के साथ लंबा समय न बिताना पड़े। ज्यादातर परिवारों में कोशिश रहती है कि ग्रेजुएट होने के बाद बिट्टू पापा या परिवार की पसंद के किसी लड़के से शादी कर ले। शादी के बाद ससुराल वाले या जमाई राजा जानें। बिट्टू अब उनके घर की इज्जत है। बिट्टू का ससुराल बिट्टू के मायके से बहुत अलग नहीं होता। बहू के दायित्व और कर्तव्य का बोध कराने के साथ यही कोशिश रहती है कि बिट्टू घर की दहलीज न पार कर सके। उसे यह एहसास दिलाया जाता है कि वह घर की दहलीज के अंदर ही महफूज है। घर के बाहर खतरा है।
दबी-सहमी बिट्टू की घबराहट शादी के बाद भी कम नहीं होती। इसके अलावा पिता और पति की इज्जत का ठेका भी उसके हाथों में रहता है। उसे कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए कि परिवार की इज्जत को बट्टा लगे। बिट्टू को पता चलता है कि उसके पंख कतरे जा रहे हैं, लेकिन वह खामोश रहती है। बिट्टू के अरमान और सपने तिल-तिल कर बुझ जाते हैं। वह अनजाने ही एक ऐसी मां बन जाती है, जो अपनी बेटी बिट्टू को बताती है, 'बिट्टू , तू अब बच्ची नहीं रही।'

Thursday, March 5, 2009

दरअसल:ऑस्कर अवार्ड से आगे का जहां..

-अजय ब्रह्मात्मज
हम सभी खुश हैं। एक साथ तीन ऑस्कर पाने की खुशी स्वाभाविक है। मौलिक गीत और संगीत के लिए रहमान को दो और ध्वनि मिश्रण के लिए रेसूल पुकुट्टी को मिले एक पुरस्कार से भारतीय प्रतिभाओं को नई प्रतिष्ठा और पहचान मिली है। इसके पहले भानु अथैया को रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी के लिए कास्ट्यूम डिजाइनर का ऑस्कर अवार्ड मिला था।
सत्यजित राय के सिनेमाई योगदान के लिए ऑस्कर ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया था। इस तरह कुल पांच पुरस्कारों के साथ भारत ने अपनी मौजूदगी तो दर्ज कर दी है, लेकिन दरअसल, यहां एक प्रश्न यह उठता है कि क्या ऑस्कर पुरस्कार पाने के बाद भारतीय फिल्मों की तस्वीर बदलेगी?
भारतीय फिल्में पिछले पचास सालों से इंटरनेशनल फेस्टिवल में पुरस्कार बटोरती रही हैं। हर साल दो-चार पुरस्कार किसी न किसी फिल्म के लिए मिल ही जाते हैं। अनेक फिल्मों को सराहना मिलती है और देश-विदेश में उनके प्रदर्शन भी किए जाते हैं, लेकिन एक सच यह भी है कि इन पुरस्कृत और सम्मानित फिल्मों में से अनेक फिल्में भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शित ही नहीं हो पाती हैं! गौर करें, तो हम पाएंगे कि वितरकों और प्रदर्शकों के समूह पुरस्कृत फिल्मों पर अधिक ध्यान नहीं देते। उन्हें फेस्टिवल फिल्म कहा जाता है और माना जाता है कि ऐसी फिल्मों को आम दर्शक नहीं देखता! गंभीर और संवेदनशील फिल्मों को अपवाद और आर्ट फिल्म के दर्जे में डाल कर किनारे कर देने का सिलसिला दशकों से चल रहा है। यही वजह है कि पुरस्कारों से फिल्मों के प्रति दर्शकों का नजरिया नहीं मिलता।
आठ ऑस्कर पुरस्कार जीतने के बाद भले ही तीन राज्यों की सरकारों ने स्लमडॉग मिलिनेयर को टैक्स फ्री कर दिया हो, लेकिन दर्शकों में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी आज भी नजर नहीं आ रही है! हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में युवा निर्देशकों का एक समूह मान रहा है कि ऑस्कर में भारतीय तकनीशियनों को अवार्ड मिलने से निर्माताओं और प्रोडक्शन हाउस की सोच में बदलाव आएगा। वे किसी फिल्म की योजना बनाते समय तकनीशियन पर ध्यान देंगे। कहने का आशय यही है कि अब तकनीशियन फिल्म के स्टार होंगे। उनका महत्व बढ़ेगा। फिलहाल यह खयाली पुलाव ही लगता है, क्योंकि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री मुख्य रूप से स्टार केंद्रित है। यहां कोई भी फिल्म तभी फ्लोर पर जाती है, जब उस फिल्म के लिए कोई स्टार हां करता है। यही सच्चाई है। बड़े प्रोडक्शन हाउस और नामी डायरेक्टर की वजह से फिल्में नहीं बनतीं। आज भी स्टार की हां या ना पर फिल्म की योजनाओं का भविष्य निर्भर है। ऐसा नहीं लगता कि ऑस्कर मिल जाने से फिल्म इंडस्ट्री के रवैए में कोई फर्क आएगा!
हां, स्लमडॉग मिलिनेयर को मिले ऑस्कर पुरस्कारों से यह स्पष्ट जरूर हो गया है कि भारत में फिल्मों के न केवल विषय हैं, बल्कि उन्हें संगत तरीके से सेल्यूलाइड पर उतारने के लिए सक्षम और योग्य तकनीशियन भी हैं। जरूरत है कि उन्हें मौका दिया जाए और फिल्मों के विषयों के चुनाव में नवीनता और मौलिकता को महत्व दिया जाए। लंबे समय से हम काल्पनिक, वायवीय और पलायनवादी फिल्में दिखाकर दर्शकों को बहकाते रहे हैं। इसलिए अब हमें यह समझने की जरूरत है कि वास्तविक और सामाजिक विषयों की फिल्मों से सराहना और प्रशंसा हासिल की जा सकती है और व्यवसाय भी किया जा सकता है। हिंदी फिल्मों पर ध्यान दें, तो पिछले वर्षो में बड़े स्टारों के बावजूद फिल्में नहीं चली हैं, जबकि नए विषयों की छोटी फिल्मों को भी दर्शकों ने पसंद किया है। दर्शक नई फिल्मों के लिए तैयार हैं। वे देव डी से लेकर मुंबई मेरी जान तक देखना चाहते हैं। उन्हें गजनी पसंद है, तो आमिर भी प्रिय है। फिल्म बुरी हो, तो वे अक्षय कुमार और दीपिका पादुकोण के होने के बावजूद चांदनी चौक टू चाइना को रिजेक्ट कर देते हैं। दरअसल.., यह सोच लेना जल्दबाजी ही होगी कि ऑस्कर मिल जाने से हिंदी फिल्मों की मेकिंग, प्लानिंग और मार्केटिंग में आकस्मिक बदलाव आ जाएगा। फिलहाल हमारे निर्माता, निर्देशक और स्टार बदलाव की जरूरत भी महसूस कर लें, तो काफी होगा।

Monday, March 2, 2009

हिन्दी टाकीज: कोई भी फ़िल्म चुपचाप नहीं आती थी-विष्णु बैरागी


हिन्दी टाकीज-२७
विष्णु बैरागी रतलाम में रहते हैं.विष्णु बैरागी हों गए हैं और ब्लॉग की दुनिया में सक्रिय हैं.उनके दो ब्लॉग हैं-एकोऽहम् और मित्र-धन ,इसके अलावा विष्णु एजेंट हैं जीवन बीमा निगम के.अपने बारे में वे लिखते हैं....कुछ भी तो उल्लेखनीय नही । एक औसत आदमी जिसे अपने जैसे सड़कछापों की भीड़ में बड़ा आनन्‍द आता है । मैं अपने घर का स्वामी हूं लेकिन यह कहने के लिए मुझे मेरी पत्नी की अनुमति की आवश्यकता होती है पूरी तरह अपनी पत्नी पर निर्भर । दो बच्चों का बाप । भारतीय जीवन बीमा निगम का पूर्णकालकि एजेण्ट । इस एजेन्सी के कारण धनपतियों की दुनिया में घूमने के बाद का निष्कर्ष कि पैसे से अधिक गरीब कोई नहीं । पैसा, जो खुद अकेले रहने को अभिशप्त तथा दूसरों को अकेला बनाने में माहिर ।


ईशान अभी ग्यारह वर्ष का नहीं हुआ है। छठवीं कक्षा में पढ़ रहा है। चुप बिलकुल ही नहीं बैठ पाता। 'बाल बिच्छू' की तरह सक्रिय बना रहता है। उसे पूरे शहर की खबर रहती है। मैं उसके ठीक पड़ौस में रहता हूँ-एक दीवाल की दूरी पर। आज सवेरे उससे कहा - 'स्लमडाग करोड़पति लगे तो मुझे कहना। देखने चलेंगे।' सुनकर उसने मुझे आश्चर्य और मेरे प्रति दया भाव से देखा। बोला -' अरे ! दादाजी, वह तो आकर चली भी गई।'


धक्का लगा। इसलिए नहीं कि मैं वह फिल्म नहीं देख पाया। इसलिए कि जिस फिल्म का डंका पूरे देश में बज रहा है, जिसकी 'जय हो' से गली-गली गुंजायमान है, जिसे oscar मिलने की कल्पना मात्र से देश का आभिजात्य वर्ग ही नहीं, 'आॅस्कर' का अर्थ न समझने वाला मध्य वर्ग भी पुलकित हो रहा है, वह फिल्म मेरे कस्बे में कब आई और कब चली गई, पता ही नहीं लगा! हाथी गली मे होकर निकल गया और पत्ता भी नहीं खड़का? वह भी तब, जबकि (जिसमें लगी थी, वह) सिनेमा घर मेरे निवास से तीन सौ मीटर दूर भी नहीं? सूचना प्रौद्योगिकी के विस्फोट वाले इस समय का एक अर्थ कहीं 'सम्वादशून्यता' बनकर तो सामने नहीं आ रहा?


मुझे मेरे स्कूली दिनों वाला मेरा पैतृक गाँव मनासा और वहाँ का 'जगदीश टाकीज' याद आ गया। 'नगर सेठ भैया साहब झँवर' उसे चलाते थे। तब जनसंख्या यही कोई नौ-दस हजार रही होगी मेरे मनासा की। 'श्री बद्री विशाल मन्दिर' के बाद गाँव का सबसे बड़ा आकर्षण यह 'जगदीश टाकीज' ही था। अल्हेड़ दरवाजे और बस स्टैण्ड के बीचों-बीच। आस-पड़ौस के गाँवों के प्रवासी यात्री, अपना सामान अपने साथ वाले के जिम्मे कर, भरी-दोपहर में यह टाकीज देखने आते। सन्नाटा होता था उस समय टाकीज के प्रांगण में। और तो और, उसमें लगी होटल भी सुनसान रहती। फिर भी लोग आते, टाकीज के बरामदे में लगे, 'चालू फिल्म' के पोस्टर और 'स्टिल्स' देखते और अपने गाँव जाकर, 'अनूठी उपलब्धि' की तरह इस 'टाकीज-दर्शन' का बखान किसी परी कथा की तरह करते।

फिल्म का बदलना तब पूरे गाँव की बड़ी घटना होता था। तीन-चार दिन पहले ही पता हो जाता था कि फलाँ फिल्म लगने वाली है। 'नई' फिल्म के पोस्टर चिपकेे बोर्ड, गाँव की गली-गली में घुमाए जाते। लकड़ी की फ्रेम पर, जूते गाँठने वाली बारी किलों से ठुके टाट पर चूना पोतकर इबारत की जमीन बनाई जाती और उस पर नीले, लाल, काले रंगों से फिल्म के नाम तथा अन्य ब्यौरे लिखे जाते। बोर्ड का आकार सामान्यतः 4 गुणा 4 होता। उन दिनों कोई भी फिल्म, रीलीज होने के बरसों बाद ही मेरे गाँव जैसे 'सेण्टर' तक आ पाती थी (तब किसी फिल्म की की रीलीज के समय 10 प्रिण्ट जारी करना 'धमाका खबर' होता था)। सो, तब तक फिल्म की 'सफलता और हैसियत' सबको मालूम हो चुकी होती थी। बोर्डों की और इबारत के रंगों की संख्या का निर्धारण, फिल्म की इसी सफलता और हैसियत के अनुसार होता।


इन बोर्डों की संख्या सामान्यतः दो ही होती। प्रत्येक बोर्ड को दो बच्चे उठाए होते। मुफ्त में फिल्म देखना इन बच्चों का पारिश्रमिक होता। बोर्ड उठाने के लिए बच्चों में मानो होड़ लगी रहती। ऐसे बच्चे अगले दिन अतिरिक्त गौरव-भाव से फिल्म की 'स्टोरी' सुनाते। बोर्ड उठाने को 'गिरी हैसियत' का काम समझा जाता। मैंने एक-दो बार कोशिश की तो मुझे भगा दिया गया, यद्यपि हमारा परिवार रोटियाँ माँगता था।
फिल्म की हैसियत के अनुसार ही बोर्डों को गलियों में घुमाया जाता। सामान्यतः दो-दो बोर्ड चुपचाप घुमा दिए जाते। कोई ठीक-ठीक फिल्म होती तो बोर्डों के आगे 'मोहम्मद हुसैन बा साहब के बैण्ड' का एक ट्रम्पेट वादक और एक ड्रमर चल रहा होता। 'हिन्दुस्तान के शहरों में कामयाबी के झण्डे गाड़ने वाल' फिल्म होती तो बोर्डों की संख्या ही नहीं, बोर्डों का आकार भी बढ़ जाता और बैण्ड के सदस्यों की संख्या भी। लाउडस्पीकर का चलन उन दिनों नहीं था। बोर्डों के ठीक पीछे एक उद्घोषक चल रहा होता जिसके पास, टीन का बना भोंपू होता। वह अपनी पूरी ताकत से फिल्म की खूबियाँ बखान करता । जैसे कि 'हिमालय के सच्चे सीनों से भरपूर, महान् धार्मिक फिल्म.....' या 'मार-धाड़ से भरपूर, किंगकांग और दारासिंह की दिल हिला देने वाली कुश्तियाँ.....' या 'नाच-गाने से भरपूर, माँ-बहनों के साथ देखने वाली शानदार सामाजिक फिल्म.....' आदि-आदि। उन दिनों फिल्में 'श्वेत श्याम' ही हुआ करती थीं और 'रंगीन' की शुरुआत हुई ही थी। कुछ गीतों का फिल्मांकन रंगीन हुआ करता था। ऐसे 'रंगीन गीत' फिल्म का विशेष आकर्षण होता और उद्घोषक को याद रख कर अलग से कहना पड़ता - 'तीन रंगीन पार्ट सहित...'।


जिस दिन फिल्म बदलती उस दिन पहला शो, अपने निर्धारित समय शाम 6 बजे से कोई आधा घण्टा देर से शुरु होता। फिल्म का प्रिण्ट इन्दौर से आता। इन्दौर से चलकर रामपुरा जाने वाली बस शाम कोई 6 बजे मेरे गाँव पहुँचती। बस के आने से काफी पहले ही लोग बस स्टैण्ड पहुँच जाते। टाकीज का कर्मचारी सबसे बाद में पहुँचता। वह किसी नायक की तरह प्रकट होता और ऐसे व्यवहार करता मानो कोई चमत्कार करने वाला हो। फिल्म का प्रिण्ट, टीन के बक्से (पेटी) गोल डिब्बों में बन्द होता। जितने गोेल डिब्बे होते, फिल्म उतनी ही 'रीलों' वाली होती। फिल्म प्रिण्ट के आने को 'फिल्म की पेटी' आना कहा जाता।


बस आती। दूर से, बस की छत पर रखी 'फिल्म की पेटी' देखने की कोशिश शुरु हो जाती।बस आकर, स्टैण्ड पर व्यवस्थित खड़ी होने के लिए रिवर्स होती। बस का खलासी, चलती बस की पिछली फाटक खोल कर तेजी से उतरता और बस के पिछवाड़े, ड्रायवर साइड जाकर 'आने दो, आने दो' की आवाज लगा कर बस को खड़ी करवाता। खलासी जब अपना यह काम कर रहा होता तो बीसियों बच्चे उसकी आवाज में आवाज मिला रहे होते। उस समय लगता, 'आने दो, आने दो' की नारेबाजी हो रही हो।


बस रुकते ही खलासी छत पर चढ़ता। बाकी सवारियों के सामान की अनदेखी कर, सबसे पहले 'फिल्म की पेटी' ठेलता। तब तक टाकीज का कर्मचारी भी बस के पीछे, सीढ़ियों के ठीक नीचे आ खड़ा होता। लेकिन पेटी को झेलना उस अकेले की बस के बाहर होता। सो, कोई एम हम्माल उसकी मदद पर आ जाता। दोनों मिल कर पेटी उतारते। ठेला तैयार ही रहता। पेटी ठेले पर रखी जाती। टाकीज के कर्मचारी से पहले, वहाँ जुटे लोग उचक-उचक कर, पेटी पर चिपका लेबल देखते। जो सबसे पहले देख लेता, जोर से चिल्लाता - '16 रील की है।' पेटी को जुलूस की शकल में टाकीज तक लाया जाता। उसके बाद शो की तैयारी शुरु होती। लेकिन, बस स्टैण्ड से टाकीज तक की लगभग एक सौ कदमों की दूरी तय कर (वह भी ठेले के पहियों पर चलकर) पेटी टाकीज तक पहुँचती उससे पहले पूरे गाँव को मालूम हो चुका होता कि 'फिल्म 16 रील की है।'


मेरे गाँव के टाकीज में आने वाली प्रत्येक 'नई' फिल्म इसी तरह आती। यह क्रम मेरे गाँव की जिन्दगी का स्थायी हिस्सा बना रहा। कोई भी फिल्म, कभी भी चुपचाप नहीं आई। जो भी आई, अपनी हैसियत के मुताबिक धूम धड़ाके से आई। और केवल आने पर ही चर्चित नहीं रही। जाने के बद भी उसकी चर्चा होती रहती। तब मेरे गाँव में, सेठों के यहीं टेलफोन होता था। सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए हर कोई एक दूसरे पर निर्भर था। पोस्ट कार्ड तीसरे ही दिन अपने गन्तव्य पर पहुँच जाता था। तब भी पूरे गाँव को मालूम होता था कि 'नई फिल्म' कौन सी आ रही है और कब आ रही है।

आज दुनिया एक गाँव में बदल गई है। अंगुलियों की पोरों की एक हरकत सारी दुनिया की नवीनतम जानकारी, कम्प्यूटर के पर्दे के जरिए घर-घर में, एक पल में पहुँच रही है। अखबार छपने से पहले ही बासी होने लगे हैं। ऐसे 'जीवन्त समय' में, 'स्लगडाग करोड़पति' मेरे कस्बे में, मेरे घर से तीन सौ मीटर दूर स्थित सिनेमा घर में लग कर उतर गई और मुझे भनक तक नहीं पड़ी! यकीनन यह मेरी असावधानी तो है ही किन्तु फिल्मों के प्रति हमारे सार्वजनिक व्यवहार का परिचायक भी है।
bairagivishnu@gmail.com