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Saturday, February 28, 2009

दरअसल:बन रही हैं डरावनी फिल्में

-अजय ब्रह्मात्मज

हालिया रिलीज भट्ट कैंप की मोहित सूरी निर्देशित फिल्म राज-द मिस्ट्री कंटीन्यूज को 2009 की पहली हिट फिल्म कही जा रही है। इस फिल्म ने इमरान हाशमी और कंगना रानावत के बाजार भाव बढ़ा दिए। भट्ट कैंप में खुशी की लहर है और सोनी बीएमजी भी मुनाफे में रही।
उल्लेखनीय है कि सांवरिया और चांदनी चौक टू चाइना में विदेशी प्रोडक्शन कंपनियों को नुकसान हुआ था। ट्रेड पंडित राज-द मिस्ट्री कंटीन्यूज की सफलता का श्रेय पुरानी राज को देते हैं। इसके अलावा, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यह धारणा काफी मजबूत हो रही है कि डरावनी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा बिजनेस करती हैं।
सन 2008 में रामगोपाल वर्मा की फिल्म फूंक और विक्रम भट्ट की 1920 ने ठीकठाक कारोबार किया। इसके पहले रामू की भूत भी सफल रही, लेकिन उसकी कामयाबी से प्रेरित होकर बनी दूसरी डरावनी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर लुढ़क गई। पिछले साल फूंक को पसंद करने के बाद विक्रम भट्ट आशंकित थे कि शायद दर्शकों को 1920 पसंद न आए। दरअसल, उन्हें यह लग रहा था कि कुछ ही हफ्तों के अंतराल पर आ रही 1920 को दर्शक नहीं मिलेंगे, लेकिन उनकी आशंका निराधार निकली। रजनीश दुग्गल और अदा शर्मा जैसे नए कलाकारों के बावजूद 1920 चली। इसकी सफलता ने विक्रम भट्ट से चिपकी फ्लॉप डायरेक्टर की बदनामी दूर की। इस फिल्म की सफलता से जोश में आए विक्रम भट्ट ने तत्काल नई फिल्म शापित की घोषणा कर दी। शापित के जरिए वे गायक उदित नारायण के बेटे आदित्य नारायण और नई अभिनेत्री श्वेता को लॉन्च कर रहे हैं।
विक्रम भट्ट ने शापित की शूटिंग आरंभ कर दी है। इन दिनों फिल्मिस्तान में एक बंगले का सेट लगा कर वे आदित्य और श्वेता के साथ इसकी शूटिंग कर रहे हैं। डरावनी फिल्मों के प्रति अपने आकर्षण और उसके बाजार के संदर्भ में विक्रम कहते हैं, मैं स्वयं डरपोक किस्म का व्यक्ति हूं, इसलिए मुझे बहुत डर लगता है। मैं अकेले में डरावने विचारों से घिरा रहता हूं और डरावनी कहानियां बुनता रहता हूं। फिल्में बना कर मैं अपने डर को अभिव्यक्ति देता हूं। रही दर्शकों की बात, तो मुझे लगता है कि डर के साथ जुड़ा रोमांच दर्शकों को आकर्षित करता है। डरने में भी एक आनंद है। बचपन में डरावनी कहानियां पढ़ते या सुनते समय आप दादी-नानी या मां-पिता को भींच लेते हैं, लेकिन पूरी कहानी सुने बगैर नहीं सोते! फिल्म देखते समय कुछ वैसा ही रोमांच होता है। शापित विक्रम की डरावनी फिल्मों की ट्रायलॉजी की तीसरी और आखिरी फिल्म होगी। उसके बाद वे नए सिरे से डरावनी फिल्में निर्देशित करेंगे।
डरावनी फिल्मों के प्रति दर्शकों के रुझान को देखते हुए परसेप्ट पिक्चर कंपनी ने डरावनी फिल्मों के निर्माण में एकमुश्त राशि निवेश करने का फैसला किया है। फिलहाल उन्होंने पांच फिल्मों की घोषणा की है। प्रियदर्शन के निर्देशन में गर्रर.. इस सीरीज की पहली फिल्म होगी। इसमें प्रियदर्शन एक शेर और उसके शिकार की खौफनाक कहानी चित्रित करेंगे। परसेप्ट पिक्चर कंपनी जल्दी ही 888, 13, मुंबई और वहम का निर्माण करेगी। शैलेन्द्र सिंह मानते हैं कि डरावनी फिल्मों का बाजार है। कम्प्यूटर तकनीक के विकास और स्पेशल इफेक्ट की संभावना से डरावनी फिल्मों में डर पैदा करना ज्यादा आसान हुआ है। उदाहरण के लिए प्रियदर्शन की फिल्म में शेर को एनिमेशन के जरिए तैयार किया जाएगा। फिल्मों के ट्रेड पंडित मानते हैं कि अगर आने वाली डरावनी फिल्में सफल हुई, तो हिंदी फिल्मों में फिर से सातवें दशक का वह दौर आ सकता है, जब बड़े फिल्मकार और स्टार्स भी डरावनी फिल्मों का हिस्सा बनते थे। डरावनी फिल्में मुख्यधारा की मनोरंजक फिल्में मानी जाती थीं।
याद करें, तो वो कौन थी, मेरा साया और मधुमती जैसी फिल्मों में हमने दिलीप कुमार, मनोज कुमार, साधना और वैजयंतीमाला जैसे सितारों को देखा है। मुमकिन है कि आज के पॉपुलर सितारे भी डरावनी फिल्मों की तरफ रुख करें!

Thursday, February 26, 2009

एक तस्वीर:दिल्ली ६,अभिषेक बच्चन और...

इस तस्वीर के बारे में आप की टिप्पणी,राय,विचार,प्रतिक्रिया का स्वागत है.यह तस्वीर पीवीआर,जुहू,मुंबई में २२ फरवरी को एक खास अवसर पर ली गई है.बीच में घड़ी के साथ मैं हूँ आप सभी का अजय ब्रह्मात्मज.



Wednesday, February 25, 2009

दरअसल: अभिनेत्रियों का राजनीति में आना

-अजय ब्रह्मात्मज
लोकसभा चुनाव में अभी देर है, फिर भी सभी पार्टियों में उम्मीदवारों को लेकर बैठकें चल रही हैं। जीत और सीट निश्चित और सुरक्षित करने के लिए ऐसे उम्मीदवारों को तैयार किया जा रहा है, जो अधिकाधिक मतदाताओं की पसंद बन सकें।
भोपाल का उदाहरण लें। बीच में खबर आई कि यहां से नगमा चुनाव लड़ सकती हैं। अभी पार्टी निश्चित नहीं है। नगमा के करीबी कहते हैं कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां उन्हें टिकट देने को राजी हैं। संभव है, यह मात्र शगूफा हो। दूसरी तरफ भोपाल से जया भादुड़ी को टिकट देने की बात भी चल रही है। वे सपा की उम्मीदवार होंगी। उन्हें भोपाल की बेटी के रूप में पेश किया जा सकता है। अगर नगमा और जया भादुड़ी की तुलना करें, तो जया ज्यादा मजबूत उम्मीदवार दिख रही हैं।
अभिनेत्रियों को राजनीति में जगह दी जाती रही है। इसकी शुरुआत नरगिस से हो गई थी। वैसे देविका रानी भी राजनीतिक गलियारे में नजर आती थीं और जवाहरलाल नेहरू की प्रिय थीं, लेकिन उन्होंने राजनीति में खास रुचि नहीं ली। नरगिस ने अवश्य संसद की मानद सदस्यता स्वीकार की थी। वे भी नेहरू परिवार की करीबी थीं। नेहरू उन्हें बहुत पसंद करते थे। नरगिस संसद में भले ही पहुंच गई, लेकिन एक राजनीतिज्ञ या सजग सदस्य के रूप में उन्हें नहीं याद किया जाता। उन्होंने संसद की बहसों में अधिक हिस्सा नहीं लिया। कहते हैं, एक बार सत्यजित राय के खिलाफ उन्होंने यह बोल दिया था कि उन्होंने अपनी फिल्मों में भारत की गरीबी दिखाकर इंटरनेशनल ख्याति हासिल की है।
जयललिता तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय रहीं। एम.जी. रामचंद्रन के निर्देश पर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचीं। दक्षिण भारत के फिल्म अभिनेता-अभिनेत्रियों का राजनीतिक महत्व और योगदान रहा है। हिंदी फिल्मों के कलाकारों की तुलना में उनकी राजनीतिक और सामाजिक स्वीकृति भी अधिक रही है। दक्षिण भारत से हिंदी फिल्मों में आई वैजयंतीमाला भी संसद में पहुंचीं, लेकिन कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं कर सकीं। ऐसा लगता है कि संसद में उनकी उपयोगिता केवल शोभा बढ़ाने तक ही सीमित रही।
पिछले दस सालों में भाजपा और सपा ने अभिनेत्रियों को अवश्य संसद में भेजा है। आज भी ये दोनों पार्टियां ही फिल्म कलाकारों के राजनीतिक उपयोग में आगे हैं। सपा के उम्मीदवार के रूप में रामपुर से चुनाव जीत कर संसद में पहुंचीं जयाप्रदा के राजनीतिक महत्व पर सवाल उठते रहे हैं। हां, जया बच्चन अपनी मुखरता के कारण गाहे-बगाहे चर्चा में जरूर रही हैं। बच्चन परिवार के सदस्य बताते हैं कि जया बच्चन संसद की कार्यवाहियों के प्रति सजग और सचेत रहती हैं। हेमा मालिनी भाजपा की सांसद हैं। संसद के हर सत्र में और कुछ हो या न हो, उनकी तस्वीर जरूर अखबारों में छप जाती है। इन तस्वीरों में वे दो-तीन सांसदों के बीच ड्रीम गर्ल वाली मुस्कान फेंकती नजर आती हैं। पार्टी के अंदर हेमा का राजनीतिक कद बहुत बड़ा नहीं है। भाजपा ने रामायण सीरियल की लोकप्रियता के बाद सीता बनी दीपिका चिखलिया को भी अपनी पार्टी की सदस्यता दी थी। इधर क्योंकि सास भी कभी बहू थी की तुलसी की भूमिका से मशहूर हुई स्मृति ईरानी भी भाजपा से चुनाव लड़ चुकी हैं। मुमकिन है कि इस बार भी वे कहीं से संसद की उम्मीदवार बनें!
फिल्मों से राजनीति में आए कलाकारों की बात करें, तो शत्रुघ्न सिन्हा और राज बब्बर जागरूक रहे हैं। उन्होंने अपनी पार्टियों के लिए बहुत कुछ किया। शत्रुघ्न सिन्हा की तो मंशा ही रही है कि वे बिहार के मुख्यमंत्री बनें, लेकिन धुरंधर राजनीतिज्ञों ने उन्हें इस लायक नहीं समझा। राज बब्बर सपा से निकलने के बाद राजनीतिक दृष्टि से थोड़े कमजोर हुए हैं। विनोद खन्ना और धर्मेन्द्र नाम के ही सांसद हैं। अभी तक केवल सुनील दत्त ने राजनीति में अपनी पहचान छोड़ी और अपने काम से दूसरों को प्रभावित भी किया। इस लिहाज से राजनीति में गई अभिनेत्रियां संयोग या दुर्भाग्य से अधिक योगदान नहीं कर सकी हैं। राजनीतिक पार्टियां उनका इस्तेमाल तो करती हैं, लेकिन उन्हें जिम्मेदारी देने से बचती भी हैं। ऐसा क्यों है..?

Tuesday, February 24, 2009

एक आगाज है आस्कर

81वें अकादमी अवार्ड यानी आस्कर में स्लमडाग मिलिनेयर को नौ श्रेणियों में दस नामंाकन मिले थे। इस फिल्म ने आठ श्रेणियों में पुरस्कार हासिल कर इतिहास रच दिया। स्लमडाग मिलिनेयर को मिले आस्कर पुरस्कारों से कुछ लोग आह्लादित हैं तो एक समूह ऐसा भी है जो भारतीय खुशी को 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' समझ रहा है। उनका कहना है कि यह भारतीय फिल्म नहीं है, इसलिए हमारी खुशी निराधार है। तर्क के लिहाज से वे सही हैं, लेकिन प्रभाव, भावना और उत्साह की बात करें तो स्लमडाग मिलिनेयर की उपलब्धियों पर खुश होना किसी और के दरवाजे पर दीपक जलाना नहीं है। गीत, संगीत और ध्वनि मिश्रण के लिए भारतीयों को मिले पुरस्कारों से यह साबित होता है कि भारतीय प्रतिभाएं अंतरराष्ट्रीय मानदंड के समकक्ष हैं। जरूरत है कि विभिन्न प्रतियोगिताओं और समारोहों में उन्हें एंट्री मिले और उससे भी पहले जरूरी है कि देश में मौजूद प्रतिभाओं को नई चुनौतियां और अवसर मिलें ताकि वे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें। स्लमडाग मिलिनेयर के माध्यम से भारतीय प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय पहचान और सम्मान का अवसर मिला। आस्कर पुरस्कार श्रेष्ठता का अकेला मानदंड नहीं है। दुनिया में और भी मंच, फेस्टिवल, समारोह और आयोजन हैं, जहां मिली पहचान से हम गौरवान्वित होते रहे हैं। आस्कर के प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना पालने के पहले हमें यह समझना चाहिए कि वहां की सामान्य श्रेणियों में भारत में बनी भारतीय भाषाओं की फिल्में शामिल नहीं हो सकतीं। पहले गांधी और फिर स्लमडाग मिलिनेयर मूल रूप से अंग्रेजी में बनी फिल्में हैं। आस्कर के लिए आवश्यक है कि फिल्म की भाषा अंग्रेजी हो और वह अमेरिका में भी रिलीज हुई हो। बहुत संभव है कि स्लमडाग मिलिनेयर की कामयाबी से प्ररित होकर शीघ्र ही कोई भारतीय निर्माता या निर्देशक इस तरह का प्रयास करे और आस्कर पुरस्कारों की दौड़ में शामिल हो जाए। फिलहाल हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में बनी फिल्में आस्कर की 'विदेशी भाषा की फिल्म' की श्रेणी में ही शामिल हो सकती हैं। इस वर्ग में आशुतोष गोवारिकर की लगान कुछ वर्ष पूर्व नामांकन सूची तक पहुंच सकी थी।
स्लमडाग मिलिनेयर भारतीय फिल्मकारों के लिए इस संदर्भ में प्रेरणा बन सकती है कि वे वास्तविक किस्म की फिल्मों के लिए प्रेरित हों। पुरस्कारों के लिए फिल्म के महंगा होने से ज्यादा जरूरी है कि वह मानवीय संवेदनाओं को छूती हो। उसका विषय गहरा और व्यापक हो। इस पर बहस चलती रहेगी कि स्लमडाग मिलिनेयर भारत की गरीबी का प्रदर्शन कर पुरस्कार बटोर रही है या मामला कुछ और है। इस फिल्म का बारीकी से अध्ययन करें तो यह भारतीय मानस की फिल्म है, जिसमें आस-विश्वास, भाग्य और कर्म का अनोखा मेल है। निश्चित ही स्लमडाग मिलिनेयर पश्चिमी नजरिए से बनी फिल्म है, लेकिन इसमें भारतीय मूल्यों और भावनाओं को समेटने और रेखांकित करने की कोशिश है। फिल्म अपने निहितार्थ में उम्मीद, जीत और प्रेम पर टिकी है। हां, पश्चिमी उदारता और वर्चस्व की अंतर्धारा भी फिल्म में मौजूद है, जो ढेर सारे राष्ट्रवादी दर्शकों को खल सकती है। पश्चिम की वर्चस्व ग्रंथि उनकी फिल्मों, साहित्य, संभाषण और नीतियों में साफ झलकती है। स्लमडाग मिलिनेयर में भी वर्चस्व ग्रंथि है।
इंटरनेशनल मार्केट, अवार्ड या दर्शकों को थोड़ी देर के लिए दरकिनार कर हम आत्मावलोकन करें। क्या हमारे फिल्मकार विकास स्वरूप के इस उपन्यास पर फिल्म बनाने की हिम्मत करते? अगर कोई निर्देशक साहस दिखाता तो क्या उसे किसी प्रोडक्शन हाउस से सहयोग मिलता? उत्तार होगा, नहीं। हमारे निर्माता और प्रोडक्शन हाउस दकियानूस और लकीर के फकीर हैं। यही कारण है कि कोई भारतीय निर्देशक 'क्यू एंड ए' पर फिल्म बनाने की पहल नहीं करता। हमारे बहुविध समाज में अनेक विषय हैं, जिन्हें तराश कर सेल्युलाइड पर उतारा जा सकता है। स्लमडाग मिलिनेयर जैसी अनेक कहानियां रूपहले पर्दे पर आ सकती हैं, लेकिन हम अपनी पारंपरिक सोच और लाभ-हानि की चिंता के कारण इस दिशा में पहल नहीं कर पाते। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री चंद लोभी और मुनाफाखोर निर्माताओं के चंगुल में फंसी है। फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे निर्माताओं और संबंधित व्यक्तियों का एक वर्ग नए प्रयोग की सफलता को अपवाद, आर्ट या आकस्मिक घटना बताकर ट्रेंड बनने से रोकता है। उसकी बड़ी वजह यह है कि अगर अपारंपरिक विषयों के नए प्रयोग ट्रेंड बन गए तो कल्पनाहीन निर्देशकों का वर्चस्व टूटेगा और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री उनके हाथों से निकल जाएगी। स्लमडाग मिलिनेयर भारतीय फिल्मों के लिए एक प्रस्थान बिंदु हो सकता है। हम युवा निर्देशकों, लेखकों और तकनीशियनों को सृजनात्मक आजादी देकर इसकी सफलता भारतीय फिल्मों में दोहरा सकते हैं।

Sunday, February 22, 2009

हिन्दी टाकीज:जैसे चॉकलेट के लिए पानी, जैसे केक पर आइसिंग- आर अनुराधा



हिन्दी टाकीज-२६


इस बार अनुराधा...जब चवन्नी ने अनुराधा से आग्रह किया तो विश्वास था की संस्मरण ज़रूर मिलेगा.क्यों होता है आस-विश्वास?मालूम नहीं...अनुराधा अपने बारे में लिखती हैं...मेरे बारे में कुछ खास कहने लायक नहीं है। बस, एक आत्मकथात्मक किताब - इंद्रधनुष के पीछे-पीछे: एक कैंसर विजेता की डायरी लिखी है जिसका रिस्पॉन्स काफी अच्छा रहा। किताब हिंदी के असाहित्यकारों की दुर्लभ बेस्टसेलर्स में गिनी जाती है। हां,मेरा जीवन लगातार सुखद संयोगों की श्रृंखला रहा है, ऐसा मुझे लगता है।
कैंसर जैसी बीमारी ने यह किताब लिखवा दी, और मशहूरी दे दी। जब किताब बाजार में आई, उसी हफ्ते दोबारा कैंसर होने का पता चला और पूरे इलाज के दौरान किताब की समीक्षाएं, मीडिया में चर्चा, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव और विष्णु नागर और.. जैसे साहित्यकारों द्वारा अपने कॉलमों में किताब का नोटिस लेना, किताब पर डॉक्युमेंटरी फिल्म की शूटिंग और उस फिल्म की सराहना, आउटलुक (अंग्रेजी) पत्रिका द्वारा 15 अगस्त के विशेषांक में वर्ष के 10 यंग हीरोज़ में शामिल किया जाना जैसे संयोग जुड़ते गए और मैं मुझे यह समझने का वक्त ही नहीं मिला कि उसे जीवन का तकलीफदेह वक्त मानूं या सुखद।
जबलपुर, (म. प्र) जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर में बचपन और कॉलेज, फिर भी वहां की हवा नहीं लग पाई। फिर नौकरी के लिए दिल्ली पहुंचने के बाद ही दिमाग की ज्ञान पाने की खिड़की खुली। फ्रोफेशन की कहूं तो भारतीय सूचना सेवा में हूं और फिलहाल प्रकाशन विभाग (सूचना और प्रसारण मंत्रालय) में संपादक।पिल्में देखना हमेशा अच्छा लगा, गाने सुनना और भी ज्यादा। काफी बड़े होने तक भी रेडियो या टीवी पर गाने सुनकर उनके बोल पास उपलब्ध किसी भी कागज पर झट से नोट कर लेने की आदत रही।
साथ में अपना ताजा फोटो भेज रही हूं। जब आप इस लेख को ब्लॉग पर डालें तो सूचना के लिए एक मेल मुझे भी भेज दें। कारण- मैं रेगुलर ब्लॉगर नहीं हूं।
जैसे चॉकलेट के लिए पानी, जैसे केक पर आइसिंग, वैसे ही है, हिंदुस्तानी फिल्मों में गाने। पानी में चॉकलेट की तरह गीत-संगीत हिंदुस्तानी फिल्मों में इस कदर मिला हुआ है कि उन्हें अलग करना मुश्किल है। यह आइसिंग की तरह फिल्मों में सजावट और उसका आकर्षण बढ़ाने का काम करता है तो साथ ही पानी मिले चॉकलेट की तरह कभी-कभी स्वाद बिगाड़ भी देता है, मजा किरकिरा कर देता है। फिर भी गानों के बिना फिल्म की कल्पना करना मुश्किल है। कई बार तो ऐसा होता है कि बस गाने ही रह जाते हैं, फिल्में जाने कब हमारी याद के दायरे से हमेशा के लिए गायब हो जाती हैं।
मैं शायद आठ बरस की रही होऊंगी, जब अपनी याद में पहली फिल्म देखी- घर-घर की कहानी। उस समय फिल्में देखने में मैं ऐसा डूबती थी कि उसमें की कहानी का तारतम्य बिठा पाना मेरे बस का नहीं होता था। फिर मेरी मित्र या कोई बड़ा उसी फिल्म की ‘स्टोरी’ बताता तो मैं ऐसी तल्लीनता से सुनती कि लगता कि मैंने ये फिल्म कभी देखी ही नहीं। हां, तो ‘घर-घर की कहानी’ की कहानी उस समय क्या ही समझ में आती, बस एक गाना- ‘ऐसा बनूंगा ऐक्टर मैं यारों रंग जमाके छोड़ूंगा, चूना लगाने वालों को मैं चूना लगाके छोड़ूंगा‘ दिमाग में दर्ज हो गया जो अब तक उसी गहराई से दर्ज है। गाते समय जूनियर महमूद का दाहिनी तर्जनी से बायीं हथेली को रगड़ना और फिर दोनों हाथों को हवा में उछालना- ‘चूना लगाके छोड़ूंगा‘। घर आने के बाद बहुत समय तक हमारा यह गाना गाते रहना और उसके साथ अपने खाली हाथों पर ‘चूना लगाना’ जारी रहा।
जिंदगी की दूसरी फिल्म थी- परिचय। हम तीन बहनें और दो पड़ोसी मित्र बहनें ‘अकेले-अकेले’ यह फिल्म देख आए। साथ में दीदी थी, फिर डर किस बात का? सिनेमा हॉल कॉलोनी के पास ही था, पैदल ही गए और एक रुपए साठ पैसे की ‘लेडीज’ (सेक्शन) की टिकट खरीदी। इस फिल्म को देखने के बाद भी फिल्म की कहानी तो कुछ याद न रही पर उन बच्चों का हाथ पकड़ कर बड़े से मैदान में दौड़ते हुए ‘सारे के सारे गामा को लेकर॥’ गाना सदियों तक दोहराते रहे, जब भी मौका मिला, जब भी किसी के साथ कॉलोनी के खुले मैदान में दौड़ने का मौका मिला।
उसके बाद याद नहीं बरसो तक कोई फिल्म देखी हो। लेकिन गाने कई याद आते हैं। भाभी की चूड़ियां फिल्म का बच्चा अपनी भाभी का पल्लू पकड़े पीछे-पीछे घर भर में घूमता है और भाभी बड़े प्यार से उसे लेकर तुलसी चौरे की परिक्रमा करते हुए गाती है- ज्योति कलश छलके...। फिर ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ उसी कॉलोनी के मैदान में बड़े प्रोजेक्टर पर देखी और ‘चुन चुन करती आई चिड़िया’ मन में बस गया। पास के बाजार से गुजरते हुए लाउडस्पीकरों पर गाने सुनाई पड़ जाते थे। तब अक्सर एक गाना ‘समझौता गमों से कर लो ‘ सुनाई तो ठीक ही पड़ता था, पर लगता था, यह गलत है। समोसे का मतलब तो समझ में आता है, ये गमोसे क्या होता है। सो गाना खुद ही सुधार कर गाने लगे- समझौता समोसे करलो...। उसके बाद शोर फिल्म का गाना याद आता है जिसे हीरो साइकिल लगातार चलाता हुआ गाता है- ‘जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबहो-शाम’। ‘एक प्यार का नगमा’ भी बड़ा मीठा गाना लगता।
उसके बाद राधा-कृष्ण थीम के कई गाने रट लिए जिन पर हम स्कूल में, मोहल्ले के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नाच भी करते। ‘नींद चुराए चैन चुराए डाका डाले तेरी बंसी’, ‘दरशन दो घनश्याम’, ‘वृंदावन का कृष्ण कन्हैया’, ‘जैसे राधा ने माला जपी श्याम की’.... । सूची अनंत है। फिर जाने किस फिल्म का एक गाना सीखा था- ‘बाय बाय मिस गुडनाइट, कल फिर मिलेंगे’। ये तो हमें ऐसा जंचा कि यही रोजाना शाम के खेल के बाद का विदा गीत हो गया, लंबे समय तक के लिए।
घर में पिताजी के अनुशासित जीवन में फिल्मों वगैरह के लिए शायद ही कोई जगह थी। सो हमें भी उनसे इजाजत लेने की कभी हिम्मत न पड़ी। नौवीं कक्षा तक हम साइकिल से स्कूल जाने लगे। स्कूल से छुट्टी होती डेढ़ बजे और साइकिल चलाकर घर पहुंचते कोई 2।10 तक। रास्ते में पड़ने वाले इलाके के एकमात्र सिनेमा हॉल का हाल मिल ही जाता- कौनसी फिल्म है, कितनी भीड़ है, टिकट मिल पाएगा या नहीं आदि। और सब उपयुक्त होता तो हम तीन परिवारों की पांच लड़कियां तय कर लेते कि 3 बजे का शो जाना है। हमारे घर से मैं और छोटी बहन गीता, कोई 300 मीटर दूर रहने वाली नताशा और उसकी छोटी बहन रश्मि और उसकी पड़ोसन दीप्ति। मैं, नताशा और दीप्ति एक ही कक्षा में थे।
शुरुआत मुझसे होती। मैं मां से कहती कि नताशा लोग फलां फिल्म देखने जा रहे हैं, उसकी मां ने उन्हें जाने की इजाजत दे दी है। हम भी जाएं क्या? उधर नताशा अपने घर में कहती कि अनुराधा लोग को उसकी मां ने फिल्म देखने की इजाजत दे दी है, हम भी जाएं? और इस तरह हम दोनों परिवारों की लड़कियों को इजाजत मिल जाती और हम दीप्ति के घर पहुंचतीं। पांच-सात मिनट की मशक्कत के बाद उसे भी इजाजत मिल ही जाती। सिनेमा हॉल तक पैदल ही जाते क्योंकि वहां अपनी प्यारी साइकिलों की सुरक्षा को लेकर हम कभी आश्वस्त नहीं हो पाए। फिल्म देखने वाले दिन हम खाना भले ही हड़बड़ी में खाते कि कहीं देर न हो जाए, पर घर में बना नमकीन और नताशा के घर से चने रखना न भूलते, क्योंकि पॉपकॉर्न खाने को अतिरिक्त पैसा कतई नहीं मिलता था। यहां तक कि कभी ‘लेडीज’ की 1।60 रुपए की टिकट न मिल पाए तो दो रुपए की बालकनी के पैसे नहीं जुटते थे। ऐसे में मन मसोस कर वापस आना पड़ता।
सामने आई हर किताब पढ़ जाने की तरह हर फिल्म देखने में रुचि दसवीं कक्षा के बाद खुद ही खत्म हो गई। दरअसल हुआ ये कि दसवीं की परीक्षा के बाद गर्मियों की लंबी दोपहरी की ऊब काटने का एक सुलभ जरिया दिखा- फिल्में। तो हर शुक्रवार की दोपहर नई लगी फिल्म को देखने जाने लगे। दुर्योग कहें कि उस डेढ़ेक महीने के शुक्रवारों में जो फिल्में मिलीं, सभी नापसंद गुजरीं- मिथुन की ‘सुरक्षा’, सुनील दत्त की ‘जियो और जीने दो’, ‘जानी दुश्मन’ और ‘चंबल की रानी’ वगैरह। और एक फिल्म ‘उपकार’ देखने गए तो टिकट ही नहीं मिली। उसके बाद से मेरा सिर्फ मनोरंजन के लिए फिल्म देखना छूट गया।
फिर ‘अनुराग’, ‘आनंद’, ‘श्री 420’ जैसी सुंदर फिल्में मिलीं तो ‘चेतना’, ‘दो आंखें बारह हाथ’ और ‘दो बीघा जमीन’ जैसी गंभीर फिल्में भी। दरअसल अब हम इतने बड़े हो गए थे कि साल में एकाध बार कॉलोनी से दूर शहर आकर फिल्में देख सकें। ऐसे मौके ज्यादातर तभी मिलते जब नताशा की मां को शहर में कोई काम होता और हम सब पूरे दिन का कार्यक्रम बनाकर निकलते। पहले खरीददारी या दूसरा जो भी काम नताशा की मां का होता, उसके बाद फिल्म और फिर वापस आने के पहले सिटी के कॉफी हाउस में वेज कटलेट या दोसा।
सभी गाने सबको अच्छे लगते हैं, ऐसा नहीं होता। शायद गानों की भी संवेदना-प्रीक्वेंसी होती है, इंसानों की तरह, जो मैच न करे तो पटना मुश्किल होता है। जैसे चॉकलेट के लिए पानी। उसी दौर में एक फिल्म देखी थी- कुदरत। एक तो इसका पुनर्जन्म का चीप-सा थीम, फिर हेमा के कराहते हुए से डायलॉग। उसकी शुरुआत में ही स्टेज पर पर्फॉर्म करते हुए बुजुर्ग-सी अरुणा इरानी गाती हैं- ‘हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते, मगर जी नहीं सकते, तुम्हारे बिना’। जाने क्यों, उस एक बार सुनने के बाद वह गीत कभी सुनने लायक भी नहीं लगा। शायद मेरी फ्रीक्वेंसी के उपयुक्त नहीं पड़ता।
काफी समय एक शुद्धतावादी सोच के साथ बीता कि फिल्म और गाने मर्म को छूने चाहिए, वरना बकवास है। अस्सी के दशक के वक्तव्यनुमा गाने काफी समय तक अनदेखे किए और उनकी पूर्ति के लिए पुराने से पुराने गाने और फिल्में देखने का जुगाड़ करती रही। ऐसे में विविध-भारती, आकाशवाणी का उर्दू चैनल और रेडियो सीलोन का पसंदीदा हो जाना स्वाभाविक ही था। हम स्कूल से लौटते तो सबसे पहले रेडियो चलाते। फिर दोपहर भर गाने सुनते रहते, जब तक प्रोफेसर पिताजी का कॉलेज से लौटने का वक्त न हो जाए। गानों के बीच ही खाना, पढ़ना, खेलना सब चलता।
फिर टेलीविजन पर पुरस्कृत और दूसरी नई-पुरानी नायाब फिल्में दिखाने का दौर चला जो सिनेमाहॉल में आम तौर पर नहीं देख पाते। मेरे लिए तो जैसे खजाना ही बरस पड़ा। दनादन वो खूबसूरत फिल्में देखते साल-दर-साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।
हाल के दिनों में कोई नौ माह लंबे एक बुरे वक्त में गानों और एफ एम ने गहरे मित्र की तरह फिर मेरा साथ दिया। मेरी सारी चिंताओं को दूर कर दिमाग को अपनी मिठास से भर दिया। हर गाना, लगता कि बस, मेरे लिए ही बना है, मैं यही तो सोचती या कहना चाहती थी!
फिर भी, वो पुराने गाने...। कोई शब्द नहीं हैं उनकी खूबसूरती और अपनी जिंदगी में उनके महत्व का बयान करने के लिए। शायद इसीलिए मेरा 12 साल का बेटा कहता है, - “अम्मा, पुराने गाने आपके कानों में पड़ गए तो फिर आपको कुछ सुनाई नहीं देता।”

Saturday, February 21, 2009

फ़िल्म समीक्षा:दिल्ली ६


हम सब के अन्दर है काला बन्दर

-अजय ब्रह्मात्मज
ममदू, जलेबी, बाबा बंदरमार, गोबर, हाजी सुलेमान, इंस्पेक्टर रणविजय, पागल फकीर, कुमार, राजेश, रज्जो और कुमार आदि 'दिल्ली ६' के जीवंत और सक्रिय किरदार हैं। उनकी भागीदारी से रोशन मेहरा (अभिषेक बच्चन) और बिट्टू (सोनम कपूर) की अनोखी प्रेम कहानी परवान चढ़ती है। इस प्रेमकहानी के सामाजिक और सामयिक संदर्भ हैं। रोशन और बिट्टू हिंदी फिल्मों के आम प्रेमी नही हैं। उनके प्रेम में नकली आकुलता नहीं है। परिस्थितियां दोनों को करीब लाती हैं, जहां दोनों के बीच प्यार पनपता है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने बिल्कुल नयी शैली और मुहावरे में यह प्रेमकहानी रची है।
न्यूयार्क में दादी (वहीदा रहमान) की बीमारी के बाद डाक्टर उनके बेटे राजन मेहरा और बहू फातिमा को सलाह देता है कि वे दादी को खुश रखने की कोशिश करें, क्योंकि अब उनके दिन गिनती के बचे हैं। दादी इच्छा जाहिर करती हैं कि वह दिल्ली लौट जाएंगी। वह दिल्ली में ही मरना चाहती हैं। बेटा उनके इस फैसले पर नाराजगी जाहिर करता है तो पोता रोशन उन्हें दिल्ली पहुंचाने की जिम्मेदारी लेता है। भारत और दिल्ली-6 यानी चांदनी चौक पहुंचाने पर रोशन की आंखें फटी रह जाती हैं। दादी के प्रति पड़ोसियों और गली के लोगों के प्रेम, आदर और सेवा भाव को देखकर वह दंग रह जाता है। यहीं उसकी मुलाकात यों कहें कि झड़प बिट्टू (सोनम कपूर) से होती है। बिट्टू मध्यवर्गीय परिवार की बेटी है। वह पिता और परिवार को उचित सम्मान देती है, लेकिन उसके अपने भी सपने हैं। वह कुछ करना चाहती है। अपनी पहचान बनाना चाहती है। एक सामान्य सी कहानी चल रही होती है, जिसमें हम रिश्तों की गर्माहट और चांदनी चौक की गर्मजोशी महसूस करते हैं। शहर में खबर फैली हुई है कि एक काला बंदर रात को उत्पात मचाता है। उस काले बंदर को किसी ने नहीं देखा है, लेकिन रात के अंधेरे में कुछ घटनाएं घटती रहती हैं। न्यूज चैनल ब्रेकिंग न्यूज में काले बंदर से संबंधित कयास लगाते रहते हैं। स्थितियां बदलती हैं और एक खास प्रसंग के बाद कहानी नाटकीय मोड़ लेती हैं। कुछ दिनों पहले तक जिस चांदनी चौक में हिंदू-मुसलमान में फर्क करना मुश्किल था। वहां दंगे शुरू हो जाते हैं और दोनों समुदायों की आक्रामकता से हिंसा भडक़ती है। सामाजिक और धार्मिक तनाव के इस मौहाल के बीच बिट्टू अपने सपनों के लिए दुस्साहसिक कदम उठाती है। रोशन उसे बचाने की कोशिश में दोनों समुदायों का कॉमन शिकार बन जाता है। बाद में भेद खुलता है तो पता चला हे कि काले बंदर का अस्तित्व बाहर नहीं है। वह तो हम सभी के अंदर कोने में बैठा रहता है, जिसे स्वार्थी तत्व अपने फायदे के लिए जगा और उकसा देते हैं।
राकेश ओमप्रकाश मेहरा अपनी पिछली फिल्म 'रंग दे बसंती' से कई कदम आगे आते हैं। वे सांप्रदायिकता के सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दे को नए नजरिए से पेश करते हैं। 'दिल्ली ६' सामयिक और महत्वपूर्ण फिल्म है। मजेदार तथ्य यह है कि यह मनोरंजन और मधुर संगीत की धुनों से सजा है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने फिल्म की कहानी को प्रसंगों और घटनाओं से जोड़ते हुए चांदनी चौक का सुंदर कोलाज तैयार किया है, जिसमें तमाम किरदार अपनी धडक़नों के साथ मौजूद हैं। 'दिल्ली ६' चांदनी चौक का सजीव चित्रण है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने फिल्म की जरूरत के मुताबिक फिल्मांकन की पारंपरिक शैली से अलग जाकर सफल प्रयोग किए हैं। उन्हें कैमरामैन विनोद प्रधान का सम्यक सहयोग मिला है। ए आर रहमान का संगीत फिल्म के भाव का प्रभाव बढ़ाता है। उन्होंने गीतों को धुनों से तराशा है।
कलाकारों में सोनम कपूर और अभिषेक बच्चन सहज एवं स्वाभाविक हैं। निर्देशक ने उन्हें नाटकीय नहीं होने दिया है। निर्देशक का अंकुश फिल्म के नायक-नायिका को बहकने नहीं देता है। फिल्म की खूबसूरती और ताकत सहयोगी चरित्रों से बढ़ी है। इन छोटे किरदारों को समर्थ कलाकारों ने निभाया है। सभी ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है और जरूरत से एक रत्ती ज्यादा या कम योगदान नहीं किया है। फिल्म के अंत में कसावट थोड़ी कम हुई है। कुछ दृश्य फिल्म के यथार्थ से मेल नहीं खाते। 'दिल्ली ६' हिंदी सिनेमा के बदलती छवि पेश करती है। युवा निर्देशक परंपरा को आत्मसात कर हिंदी फिल्मों की विशेषताओं को अपना कर सार्थक प्रयोग कर रहे हैं। 'दिल्ली ६' इसी दिशा में नयी पहल है।
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Wednesday, February 18, 2009

विश्वास और भावनाओं से मैं भारतीय हूं: अभिषेक बच्चन

-अजय ब्रह्मात्मज
अभिषेक बच्चन की फिल्म 'दिल्ली 6' शुक्रवार को रिलीज हो रही है। यह फिल्म दिल्ली 6 के नाम से मशहूर चांदनी चौक इलाके के जरिए उन मूल्यों और आदर्शो और सपनों की बात करती है, जो कहीं न कहीं भारतीयता की पहचान है। अभिषेक बच्चन से इसी भारतीयता के संदर्भ में हुई बात के कुछ अंश-

आप भारतीयता को कैसे डिफाइन करेंगे?
हमारा देश इतना विशाल और विविध है कि सिर्फ शारीरिक संरचना के आधार पर किसी भारतीय की पहचान नहीं की जा सकती। विश्वास और भावनाओं से हम भारतीय होते हैं। भारतीय अत्यंत भावुक होते हैं। उन्हें अपने राष्ट्र पर गर्व होता है। मुझमें भी ये बातें हैं।

क्या 'दिल्ली 6' के रोशन मेहरा और अभिषेक बच्चन में कोई समानता है?
रोशन मेहरा न्यूयार्क में पला-बढ़ा है। वह कभी भारत नहीं आया। इस फिल्म में वह पहली बार भारत आता है, तो किसी पर्यटक की नजर से ही भारत को देखता है। यहां बहुत सी चीजें वह समझ नहीं पाता, जो शायद आप्रवासी भारतीय या विदेशियों के साथ होता होगा। मैं अपने जीवन के आरंभिक सालों में विदेशों में रहा, इसलिए राकेश मेहरा ने मेरे परसेप्शन को भी फिल्म में डाला। इससे भारत को अलग अंदाज से देखने में मदद मिली।

पढ़ाई के बाद भारत लौटने पर आप की क्या धारणाएं बनी थीं?
मेरे लिए सब कुछ आसान रहा। मैंने कभी भी खुद को देश से अलग नहीं महसूस किया। मेरा दृष्टिकोण अलग था। अलग संस्कृति और माहौल में पलने से वह दृष्टिकोण बना था। पश्चिमी और भारतीय संस्कृति को एक साथ मैं समझ सकता था। मुझे भारत आने पर कभी झटका या बिस्मय नहीं हुआ। सड़क पर गाय बैठे देखना किसी विदेशी के लिए अजीब बात हो सकती है, लेकिन मेरे लिए यह सामान्य बात थी। मेरे मुंह से कभी नहीं निकला कि स्विट्जरलैंड में तो ऐसा नहीं होता।

आपकी पीढ़ी के युवक विदेश भागना चाहते हैं या विदेश में रहना चाहते हैं। आप क्या सोचते हैं?
बाहर रहते हुए तो हमें छुट्टियों का इंतजार रहता था कि घर कब जाएंगे? घर का खाना कब मिलेगा। अपने कमरे के पलंग पर कब सोएंगे। बोर्डिग स्कूल के बच्चे स्कूल पहुंचते ही लौटने के बारे में सोचने लगते हैं। मैं कोई अपवाद नहीं था। आज भी आउटडोर शूटिंग में कुछ दिन गुजरने पर मैं घर लौटना चाहता हूं। छुट्टी मिलने पर परिजनों के साथ घर पर समय बिताता हूं। बचपन से यही ख्वाहिश रही है। मुझे भारत में रहना अच्छा लगता है।
विदेश प्रवास में भारत की किन चीजों की कमी महसूस करते हैं?
घर का सपना, घर के लोग, दोस्त और यहां का माहौल, दुनिया के किसी और देश में ऐसी मेहमाननवाजी नहीं होती। किसी देश के लोगों में ऐसी गर्मजोशी नहीं मिलेगी। पश्चिम के लोग ठंडे और एक-दूसरे से कटे रहते हैं।

एक विकासशील देश में अभिनेता होना कैसी चुनौती या आनंद पेश करता है?
हम जो भी हैं, वह दर्शकों की वजह से हैं। इस दृष्टि से देखें, तो हम जमीन पर रहे। मुझे नहीं लगता कि सड़क पर चल रहे आदमी से मैं किसी मायने में अलग हूं। मैं सुविधा संपन्न या अलग नहीं हूं। मैं खुद को उनके जैसा ही पाता हूं। उन्होंने मुझे स्टार बनाया है। मैं जो हूं वही रहता हूं। लोगों से मिलने या बात करते समय मैं कोई और नहीं होता। लोगों को प्रभावित करने के लिए मुझे मेहनत नहीं करनी पड़ती।

कहते हैं आप अपनी छवि को लेकर आक्रामक नहीं हैं। आप अपने प्रचार में भी ज्यादा रुचि नहीं लेते?
मैं अपना प्रचार नहीं कर सकता। मैं इसे अच्छा भी नहीं मानता। दर्शक मुझे मेरी फिल्मों से जानते-पहचानते हैं। वे फैसला करते रहते हैं। मीडिया से बातें करते समय मैं बहुत खुश होता हूं। मुझे अपनी रोजमर्रा जिंदगी के बारे में बातें करना अच्छा नहीं लगता। दर्शकों से मेरा रिश्ता अभिनेता होने की वजह से है। उनकी रुचि मेरी फिल्मों में है। मैं अपना बिगुल नहीं बजा सकता। हां, फिल्म आती है, तो जरूर फिल्म के बारे में बातें करता हूं।

Tuesday, February 17, 2009

दिल्ली ६ के बारे में राकेश ओमप्रकश मेहरा

अभिषेक बच्चन और सोनम कपूर के साथ दिल्ली 6 में दिल्ली के चांदनी चौक इलाके की खास भूमिका है। चांदनी चौक का इलाका दिल्ली-6 के नाम से भी मशहूर है। राकेश कहते हैं, मुझे फिल्मों के कारण मुंबई में रहना पड़ता है। चूंकि मैं दिल्ली का रहने वाला हूं, इसलिए मुंबई में भी दिल्ली खोजता रहता हूं। नहीं मिलने पर क्रिएट करता हूं। आज भी लगता है कि घर तो जमीन पर ही होना चाहिए। अपार्टमेंट थोड़ा अजीब एहसास देते हैं।

क्या दिल्ली 6 दिल्ली को खोजने और पाने की कोशिश है?
हां, पुरानी दिल्ली को लोग प्यार से दिल्ली-6 बोलते हैं। मेरे नाना-नानी और दादा दादी वहीं के हैं। मां-पिता जी का भी घर वहीं है। मैं वहीं बड़ा हुआ। बाद में हमलोग नयी दिल्ली आ गए। मेरा ज्यादा समय वहीं बीता। बचपन की सारी यादें वहीं की हैं। उन यादों से ही दिल्ली-6 बनी है।

बचपन की यादों के सहारे फिल्म बुनने में कितनी आसानी या चुनौती रही?
दिल्ली 6 आज की कहानी है। आहिस्ता-आहिस्ता यह स्पष्ट हो रहा है कि मैं अपने अनुभवों को ही फिल्मों में ढाल सकता हूं। रंग दे बसंती आज की कहानी थी, लेकिन उसमें मेरे कालेज के दिनों के अनुभव थे। बचपन की यादों का मतलब यह कतई न लें कि यह पुरानी कहानी है। दिल्ली 6 आने वाले कल की कहानी है। फिल्म के अंशो को देख चुके लोगों ने बताया कि यह फिल्म अब ज्यादा प्रासंगिक हो गयी है। पूरी दुनिया में जो घटनाएं घट रही हैं, वे इस फिल्म को अधिक महत्वपूर्ण बना रही हैं। इसमें जिंदगी का हिस्सा बन रही घटनाओं का चित्रण है। फिल्म को भौगोलिक तौर पर दिल्ली में रखा है। मैं दिल्ली की गलियों, खुश्बू, तौर-तरीकों और लोगों से परिचित हूं। मुझे रिसर्च करने की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ी।

रंग दे बसंती में दिल्ली थी और दिल्ली 6 में तो दिल्ली नाम में ही है। आपकी फिल्मों में स्थान या देशकाल सुनिश्चित रहने का कोई खास कारण?
मैं दिल्ली का हूं। मैं इस देश की भाषा बोलता हूं। इसकी संस्कृति में पला हूं और यही देख-देख कर बड़ा हुआ हूं। मैंने बाहर की दुनिया भी देखी है। 19 साल की उम्र से घूम रहा हूं। विदेश में भी नौकरी की। बाहर के एक्सपोजर का मतलब यह नहीं होता कि हम नकलची बंदर बन जाएं। अपनी कहानियां सुनाने में मजा आता है। गांव-घर में आज भी किस्से सुनाए जाते हैं। हम वही काम कर रहे हैं। बस,माध्यम अलग और खर्चीला है।

दिल्ली 6 के बारे में बताएं?
दिल्ली से जुड़ा मेरा एक अनुभव था। उसी को मैंने कहानी का रूप दिया। कमलेश जी ने उसका विस्तार किया। फिर प्रसून जोशी आए और वे कहानी को दूसरे स्तर पर ले गए। इस फिल्म में 9 गाने हैं, लेकिन कोई भी गाना लिप सिंक में नहीं है। एक जागरण है, जिसे मैंने रघुवीर यादव, ओम पुरी और पवन मल्होत्रा की आवाज में रखा है। एक रैप अभिषेक ने गाया है।

अभिषेक बच्चन और सोनम कपूर को प्रमुख भूमिकाएं सौंपने की क्या वजह रही?
अभिषेक बच्चन और मैं एक साथ करियर शुरू करने वाले थे। हम लोग समझौता एक्सप्रेस पर काम कर रहे थे। वह फिल्म नहीं बन सकी। फिर रंग दे बसंती आ गयी। दिल्ली 6 भी थोड़ी पहले बन सकती थी, लेकिन अभिषेक के पास समय नहीं था। मैंने बाहर तलाश की। संतुष्ट नहीं हुआ तो फिर अभिषेक के पास लौटा। सोनम के बारे में सोचने के बावजूद मैं आशंकित था। मुझे लग रहा था कि दिल्ली के मध्यवर्गीय परिवार की सामान्य लड़की की भूमिका में वो जंचेगी या नहीं? मैं मिलने गया तो एक घंटे की मुलाकात दिन भर लंबी हो गयी। मुझे सोनम न केवल जंची, बल्कि मैं तो कहूंगा कि वह दमदार अभिनेत्री हैं। उनमें नर्गिस और वहीदा रहमान की झलक है।



Monday, February 16, 2009

हिन्दी टाकीज:फिल्में देखने का मज़ा तो दोस्तों के साथ ही आता है-निशांत मिश्रा


हिन्दी टाकीज-२५

इस बार निशांत मिश्रा के संस्मरण...निशांत ने बड़े प्यार से उन दिनों को याद किया है और हिन्दी टाकीज कि कड़ी को आगे बढाया है.उनके संस्मरण के साथ हिन्दी टाकीज २५ वें पड़ाव पर आ चुका है.योजना के मुताबिक अभी ७५ पड़ाव बाकी हैं.चवन्नी को उम्मीद है कि हु सब मंजिल तक अवश्य पहुंचेंगे।

निशांत अपने बारे में लिखते हैं...मूलतः भोपाल का रहने वाला हूँ, उम्र ३४ साल। पेशे से भारत सरकार के नई दिल्ली स्थित एक कार्यालय में अनुवादक हूँ। सैंकडों चीज़ों के बारे में जानता हूँ, माहिर किसी में नहीं हूँ। हिन्दी में अनुवाद करके एक ब्लॉग पर ज़ेन कथाएँ और अन्य नैतिक कथाएँ पोस्ट करता हूँ। एक ब्लॉग चित्रगीत पर पुराने फिल्मी गीतों के वीडियो गीतों के बोलों के साथ पोस्ट करता हूँ। मेरी पसंद की दूसरी बातों के बारे में मेरे ब्लौगर प्रोफाइल से जानकारी मिल सकती है। मेरा फ़ोन नम्बर है : 9868312120 और मेरा ई-मेल है :the.mishnish@gmail.com

लगभग ३4 साल का हो गया हूँ और सिनेमाहाल में सैंकडों फिल्में देख चुका हूँ। चवन्नी-चैप पर बहुतों की यादें पढ़कर मैंने भी सोचा कि फिल्मों के बारे में कुछ लिखा जाए।

मेमोरी मेरी पहले काफी अच्छी थी। अब पुराना तो याद रहता है लेकिन हाल का भूल जाता हूँ। याद आता है कि अंबिकापुर जिले के एक कस्बे मनेन्द्रगढ़ में खटारा सी एक टाकीज थी जिसका नाम 'खेडिया' था। मेरी समझ से यह 'केडिया' समूह की टाकीज थी। उसमें देखी एक फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' मुझे अभी तक याद है। यह १९८० की बात होगी। उस सिनेमाहाल के नीचे का तो मुझे कुछ याद नहीं। ऊपर बालकनी थी जिसमें लकडी की बेंचें थीं। अच्छे घरवालों के लिए २-३ सोफे रखे गए थे लेकिन उनमें बहुत खटमल थे। बाद में वहां एक और नई टाकीज खुली, जिसे लोग शायद 'नई खेडिया' कहते थे। वहां से निकले हुए २६-२७ साल हो चुके हैं। हर साल सोचता हूँ छूटी हुई जगहों को देखने जाऊं लेकिन सोचा हुआ कहाँ हो पाता है!

१९८२ में मैं भोपाल आ गया। मुझे अभी भी याद है जब मैं मम्मी-पापा के साथ रेलवे स्टेशन से बस से आ रहा था तब संगम टाकीज में 'गजब', लिली टाकीज में 'रेशमा और शेरा' लगी थी। मेरी पुरानी याददाश्त कमाल की है न! अरे हाँ, जब मैं तीसरी क्लास में नए स्कूल में दाखिला लेने गया तब सामनेवाली गूँजबहादुर टाकीज में 'दूल्हा बिकता है' लगी थी। मुझे याद आता है कि उस ज़माने में चवन्नी-क्लास का टिकट १ रूपये ६० पैसे का आता था। बालकनी का रेट लगभग ३ रूपये था। अपने स्कूल से लौटते समय हम पेंटरों को बड़े-बड़े होर्डिंग बनाते देखते थे। मेरे फुफेरे भाई का बिलासपुर में पोस्टर लगवाने का काम था। उसके घर की दुछत्ती पर पोस्टरों के बण्डल भरे रहते थे। कुछ पोस्टर ६ या ८ के टुकडों में होते थे, जिनको सफाई से चिपकाना पड़ता था। आज तो वे पोस्टर मिलते ही नहीं हैं, मिलते भी हैं तो उनको क्लासिक मानकर उनके ऊंचे दाम लगते हैं। पिछले दिनों भोपाल में किसी घर कि दीवार, जो कि दशकों से पुताई से बची रह गयी थी, मैं स्याही से लिखा बहु-बेगम फ़िल्म का इश्तेहार देखा, उसमें टिकटों के दाम २ से ४ आना लिखे हुए थे। उस दीवार को तो किसी म्यूज़ियम में होना चाहिए। पीवीसी में छपने वाले विज्ञापनों ने कारीगरों और कला दोनों का नुकसान किया।

वहां बिलासपुर में ठेले पर फिल्मों का इश्तेहार होता था। बाद में रिक्शा और ऑटो में भी होने लगा। उनके पीछे बच्चे भागते थे। अखबारों में दिया जाता था ' रोजाना चार खेल', तब मैं समझ नहीं पता था कि ये लोग इसे 'खेल' क्यों कहते है! विज्ञापनों में यह भी लिखा होता था की अमुक टाकीज एयरकूल्ड है। मेरे फुफेरे भाई और उनका एक दोस्त हर गुरूवार को ये शर्त लगाते थे कि किसने ज्यादा फिल्में देखीं हैं। कुछ विज्ञापनों में जनता से विनती करते थे कि 'कृपया इस फ़िल्म का अंत किसी को न बताएं'। लेकिन पहले दिन ही लोगों को पता चल जाता था की मर्डरर कौन है। ऐसे में फ़िल्म देखने का रोमांच कम नहीं हो जाता था। जिसको भी सिनेमाघर में फ़िल्म देखना है वो तो देखेगा ही।

सिनेमाघर में फिल्में देखने का मज़ा तो दोस्तों के साथ ही आता है। एक बार अकेले 'तेज़ाब' देखने गया था लेकिन मज़ा नहीं आने पर इंटरवल में ही वापस आ गया। जब बच्चा था तब इंटरवल का इंतज़ार रहता था। पापा समोसे और पेस्ट्री लेकर आते थे। अंधेरे में पोपकोर्न चबाते हुए फ़िल्म देखना बड़ा मजेदार था। एक अच्छी बात यह है की उन दिनों बेहद पुरानी फिल्में जैसे औरत, पड़ोसी, गुमराह, गुमनाम, नीलकमल आदि बार-बार सिनेमाहालों में लगा करती थीं। नई फिल्में भी कम-से-कम एक महीना चलती थीं। मुझे याद है कि भोपाल की लिली टाकीज में 'तवायफ' और 'निकाह' ६ महीनों तक लगी रहीं। 'प्यार झुकता नहीं' तो और लंबे समय तक चलती रही। उनकी सिल्वर जुबली में फ़िल्म में काम करनेवाला कोई छोटा-मोटा कलाकार आता था। भोपाल जैसे शहर के लिए यह उस समय बड़ी बात थी। सिनेमाघर में बात-बात पर होने वाली चवन्नियों की खनक को कौन भूल सकता है!? याद आता है कि घरवालों के साथ 'गंगा-जमुना' देखने गया था। जैसे ही परदे पर वैजयंतीमाला का गाना 'दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे' आया, पूरा हाल रसिक लोगों की कराहों और चवन्नियों की खनक से गूँज उठा।

भोपाल के कई सिनेमाघर जैसे 'नटराज', 'कृष्णा', 'पंचशील', 'किशोर' बाद में बंद हो गए। कुछ नई शानशौकत से दोबारा खुले पर चल नहीं पाए। अब 'लिली' और गूँजबहादुर' भी टूट चुके हैं। उनकी जमीन पर शायद बड़े माल या काम्प्लेक्स बनेंगे। भोपाल के ही सिनेमाघर' अप्सरा' के कई किस्से याद आते हैं जहाँ मैं अपने दोस्तों के साथ एडल्ट फिल्में कभी-कभार देखने चला जाता था। हमेशा यह धुकधुकी लगी रहती थी की कभी पुलिस का छापा न पड़ जाए। सिनेमाघर वाले घटिया हिन्दी एडल्ट फिल्मों के बीच में अंग्रेजी पॉर्न फिल्मों के सीन लगा देते थे। ज्यादातर मौकों पर यह पता नहीं चलता था कि हम देख क्या रहे हैं।

घरवालों के साथ फ़िल्म देखने जाना बहुत बड़ा रोमांच था। जब मैं छोटा था तब मार-धाड़ के सीन आने पर कुर्सी से उछल जाता था और ख़ुद हाथ-पैर चलाने लगता था। आजू-बाजूवाले मेरी मम्मी को मुझे बिठाने के लिए कहते थे। फिल्मों के पहले न्यूज़ रील चलाई जाती थी जिनमें भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं की जानकारी देते थे। कभी-कभी संगीत की कोई बड़ी शख्सियत पर फ़िल्म दिखाते थे। मुझे गंगूबाई हंगल पर देखी फ़िल्म याद है। जब न्यूज़ रील लम्बी हो जाती थी तब लोग चिल्लाने लगते थे। लाईट जाने पर भी सब चिल्लाने लगते थे। सिनेमाहाल में लोग सिगरेट पी सकते थे। सामनेवाली कुर्सी पर पैर रखकर बैठने के कारण बहुत गाली-गलौच हुआ करती थी। फ़िल्म के ख़तम होने पर राष्ट्रगीत होता था जिसके लिए कोई नहीं रुकता था। हम सुनते थे की भोपाल की 'लक्ष्मी' टाकीज बहुत बदनाम थी। हमें लगता था की वहां 'गन्दी' फिल्में लगती हैं। बाद में पता चला की पुराने ज़माने में वहां पर शायद कोठे हुआ करते थे इसीलिए उस जगह को लोग अच्छा नहीं मानते थे। वहां ऐसी फिल्में लगती थीं - 'दिलरुबा ', डाकूरानी तलवारवाली', 'नया गुप्तज्ञान', 'बदन', 'जियाला'। मैंने वहां एक ही फ़िल्म देखी - जियाला। इंटरवल होने पर देखा कि जो आदमी हमें बाहर टिकट बेच रहा था वही अब हाल के भीतर समोसे बेच रहा है। अपने दोस्त के साथ मैं इस फ़िल्म को देखने के बहने लक्ष्मी टाकीज देखने गया था। फ़िल्म देखने के दौरान पूरे समय हम फ़िल्म के घटियापन और साथ बैठे लोगों के कमेंट्स पर हँसते रहे।

इंटरवल होने पर लंबे-लंबे विज्ञापन भी दिखाए जाते थे। लिप्टन टाईगर के विज्ञापन में शेरदिल नौजवान शेर के सामने चाय बनाकर पीता था। एक आदिवासी को वह पेड़ के नीचे दबने से बचाता और उस गाँव की एक रूपसी उसे लिप्टन टाईगर चाय बनाकर पिलाती थी।

उन दिनों टिकट पाना भी बहुत मुश्किल था। भोपाल में 'राम-बलराम' की टिकट पाने के चक्कर में तीन बेचारे कुचलकर मारे जा चुके थे। मुझे आज भी यह समझ नहीं आता की फर्स्ट डे-फर्स्ट शो के लिए लोग इतने पागल क्यों रहते थे। अभी भी कुछ लोगों को यदि पहले दिन पहला शो देखने को न मिले तो वे फ़िल्म नहीं देखते लेकिन तब से अब तक बहुत बदलाव आ गया है। गिने-चुने सिनेमाघरों में सिर्फ़ नई फिल्में लगती हैं, वो भी २ या ३ हफ्तों के लिए। अगर पुराने दिनों में मेरे पिता फिल्में देखने को बुरी बात मानते तो मैं शायद बेहतरीन फिल्मे टाकीज में देखने से वंचित रह जाता। अपने पिता के साथ मैं 'राम तेरी गंगा मैली' भी देखने गया था जिसका मेरी माँ ने बहुत बुरा माना। मुझे लगता है की मेरी उम्र के हर सिनेमाप्रेमी व्यक्ति के पास 'राम तेरी गंगा मैली' फ़िल्म से जुड़ी कोई-न-कोई याद ज़रूर है। उन दिनों तो फिल्मों को लेकर होनेवाले हंगामे कुछ संयत हुआ करते थे। लिली टाकीज में मनोज कुमार की 'कलयुग की रामायण' पर बड़ा हंगामा हुआ था। तभी दादा कोंडके की फिल्मों के टाइटल पर भी लोग नाराज़ हुए। मैं तो उस समय ६-७ में पढता था और समझ नहीं पता था की टाइटल 'अँधेरी रात में दिया तेरे हाथ में' में प्रॉब्लम क्या है।

अब यहाँ दिल्ली में ५ सालों से पड़ा हुआ हूँ। पिछले सालों में मैंने कुल ५ फिल्में सिनेमाघर में देखीं, आखरी फ़िल्म थी 'सलाम-नमस्ते', वाहियात! दिल्ली में फ़िल्म देखना मुश्किल है, मंहगे टिकट के कारण वही फ़िल्म मैं भोपाल में ५० रूपये में देख सकता हूँ जो यहाँ २०० में मिलती है। फ़िल्म रिलीज होने के दूसरे दिन डीवीडी पर और तीसरे दिन केबल पर आ जाती है। फिल्में देखने में अब रस नहीं रह गया है। या फ़िर, अब कहाँ वो दोस्ती-यारी और पारिवारिक मेलमिलाप जो घटिया फ़िल्म देखने को भी बहुत मनोरंजक बना देता था।

आजकल तो मैं किसी फ़िल्म को इन्टरनेट से डाउनलोड कर सकता हूँ, क्वालिटी बेशक बेहतर नहीं होती पर बिना कोई दाम खर्च किए पुरानी-से-पुरानी और नई-से-नई फ़िल्म देखने को मिल जाती है। बहरहाल, सिनेमाघरों में फिल्में देखने से जुड़ी यादें इतनी हैं कि इस सीरीज़ का शायद दूसरा पार्ट लिखना पड़े। तब तक के लिए, पढ़ते रहें।

Saturday, February 14, 2009

फ़िल्म समीक्षा:बिल्लू


मार्मिक और मनोरंजक
-अजय ब्रह्मात्मज
शाहरुख खान की कंपनी रेड चिलीज ने प्रियदर्शन की प्रतिभा का सही उपयोग करते हुए बिल्लू के रूप में मार्मिक और मनोरंजक फिल्म पेश की है। विश्वनाथन की मूल कहानी लेकर मुश्ताक शेख और प्रियदर्शन ने पटकथा विकसित की है और मनीषा कोराडे ने चुटीले और सारगर्भित संवाद लिखे हैं। लंबे समय के बाद किसी फिल्म में ऐसे प्रासंगिक और दृश्य के अनुकूल संवाद सुनाई पड़े हैं।
बिल्लू सच और सपने को मिलाती भावनात्मक कहानी है, जो एक स्तर पर दिल को छूती और आंखों को नम करती है। इस फिल्म का सच है बिल्लू, जिसे इरफान खान ने पूरे संयम से निभाया है। फिल्म का सपना साहिर खान है, जो शाहरुख खान की तरह ही अतिनाटकीय है। सच, सपना और कल्पना का घालमेल भी किया गया है। साहिर खान के रोल में शाहरुख खान को लेना और शाहरुख खान की अपनी फिल्मों को साहिर खान की फिल्मों के तौर पर दिखाना एक स्तर पर उलझन और भ्रम पैदा करता है। बिल्लू में ऐसी उलझन अन्य स्तरों पर भी होती है। फिल्म की कहानी उत्तरप्रदेश के बुदबुदा गांव में घटित होती है।
उत्तर प्रदेश के गांव में नारियल के पेड़, बांध और पहाड़ एक साथ देखकर हैरानी होती है। बिल्लू का घर भी दक्षिण भारतीय शैली में बना हुआ है। खेत में काम करती महिलाएं, खेती के औजार और पहनावे में भी दक्षिण भारतीय झलक है। बिल्लू की बेटी गुंजा की वेशभूषा दक्षिण भारत की लड़कियों जैसी है। प्रोडक्शन डिजाइनर साबू सिरिल से ऐसी चूक कैसे हो गई? या फिर प्रियदर्शन ने मान लिया है कि फिल्में तो काल्पनिक होती हैं। उनका कोई देश काल या व‌र्त्तमान नहीं होता तो पृष्ठभूमि और परिवेश पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। उनकी पिछली फिल्मों में भी उत्तर भारत के गांव दक्षिण भारत की शैली के दिखाए जाते रहे हैं।
इस चूक और व्यवधान को नजरअंदाज कर दें तो फिल्म असर करती है। बिल्लू की सादगी, ईमानदारी और ठस में भारत के आम आदमी की बानगी है। सुपर स्टार साहिर खान के बचपन के दोस्त बिल्लू का आत्मसंयम रूलाता है। उसकी ईमानदारी कचोटती है। इरफान खान ने बिल्लू को उसी सहजता से निभाया भी है। लारा दत्ता ने बिल्लू की बीवी की भूमिका में बराबर का साथ दिया है। ग्लैमरहीन घरेलू औरत के रोल में वह अपनी प्रतिभा का परिचय देती हैं।
फिल्म में पर्याप्त मसाले और आयटम गीत हैं। शाहरुख खान जिस गति, ऊर्जा और जोश के लिए मशहूर हैं, वह सब इस फिल्म में है। फराह खान के निर्देशन में उनके नृत्य का जादुई असर होता है। दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा और करीना कपूर की मौजूदगी का मादक प्रभाव है। फिल्म के अंतिम दृश्य से पहले यानी प्री-क्लाइमेक्स में दिया गया शाहरुख खान का मौलिक संदेश उदासी और हंसी के बीच चल रही फिल्म को इमोशनल बना देता है। तब तक हम फिल्म में इस तरह शामिल हो चुके होते हैं कि शाहरुख खान के संवाद सीधे दिल को छूते हैं और आंखें स्वाभाविक तौर पर नम होती हैं।
बिल्लू इरफान खान के अभिनय और शाहरुख खान के स्टारडम के सुंदर मेल की वजह से भी देखी जा सकती है।

Friday, February 13, 2009

फ़िल्म समीक्षा:जुगाड़

-अजय ब्रह्मात्मज

निर्माता संदीप कपूर ने चाहा होगा कि उनकी जिंदगी के प्रसंग को फिल्म का रूप देकर सच, नैतिकता और समाज में प्रचलित हो रहे जुगाड़ को मिलाकर दर्शकों को मनोरंजन के साथ संदेश दिया जाए। जुगाड़ देखते हुए निर्माता की यह मंशा झलकती है। उन्होंने एक्टर भी सही चुने हैं। सिर्फ लेखक और निर्देशक चुनने में उनसे चूक हो गई। इरादे और प्रस्तुति के बीच चुस्त स्क्रिप्ट की जरूरत पड़ती है। उसी से फिल्म का ढांचा तैयार होता है। ढांचा कमजोर हो तो रंग-रोगन भी टिक नहीं पाते।
जुगाड़ दिल्ली की सीलिंग की घटनाओं से प्रेरित है। संदीप कपूर की एक विज्ञापन कंपनी है,जो बस ऊंची छलांग लगाने वाली है। सुबह होने के पहले विज्ञापन कंपनी के आफिस पर सीलिंग नियमों के तहत ताला लग जाता है। अचानक विज्ञापन कंपनी सड़क पर आ जाती हैं और फिर अस्तित्व रक्षा के लिए जुगाड़ आरंभ होता है। इस प्रक्रिया में दिल्ली के मिजाज, नौकरशाही और बाकी प्रपंच की झलकियां दिखती है। विज्ञापन कंपनी के मालिक संदीप और उनके दोस्त आखिरकार सच की वजह से जीत जाते हैं।
रोजमर्रा की समस्याओं को लेकर रोचक, व्यंग्यात्मक और मनोरंजक फिल्में बन सकती हैं। जुगाड़ में भी संभावना थी, लेकिन लेखक और निर्देशक ने ज्यादा रिसर्च नहीं किया। सिर्फ एक विचार को लेकर वे फिल्म बनाने निकल पड़े। इस विचार का ताना-बाना इतना कमजोर है कि समर्थ अभिनेताओं के बावजूद कहानी चारों खाने चित्त हो जाती है। दृश्यों की परिकल्पना सुसंगत नहीं है। संवादों में दोहराव है। एक प्रसंग में फिल्म का नायक पांच पंक्तियों में तीन बार जरूरत शब्द का बेजरूरत इस्तेमाल करता है। संवाद सपाट हों तो दृश्य में निहित भाव प्रभाव नहीं पैदा कर पाते। आश्चर्य होता है कि मनोज बाजपेयी जैसे सशक्त और समर्थ अभिनेता फिल्में चुनने में ऐसी गलती कैसे कर रहे हैं। अपनी संजीदगी और प्रतिभा के दम पर वे किसी कमजोर और ढीली फिल्म से दर्शकों को नहीं बांध सकते। इस फिल्म में मनोज बाजपेयी के साथ विजय राज, गोविंद नामदेव और संजय मिश्र जैसे अभिनेता भी थे, लेकिन निर्देशक ने किसी का उचित उपयोग नहीं किया है। जुगाड़ अच्छे इरादों को लेकर बनी साधारण फिल्म है।

दरअसल:मनोरंजन जगत में कहां है मंदी?

-अजय ब्रह्मात्मज
एक तरफ से देखें, तो मनोरंजन जगत भी मंदी की मार से नहीं बच सका है। कई फिल्मों का निर्माण रुक गया है। प्रोडक्शन कंपनियां निर्माणाधीन फिल्मों पर पुनर्विचार कर रही हैं। बजट कम किया जा रहा है। फिल्म स्टारों के पारिश्रमिक कतरे जा रहे हैं। मोटे तौर पर कहा जा रहा है कि फिल्म इंडस्ट्री सावधान हो गई है। मंदी की मार से खुद को बचाने के लिए सुरक्षा इंतजाम शुरू हो गए हैं। उसी के तहत सब कुछ दुरुस्त किया जा रहा है।
अब दूसरी तरफ से देखें, तो कोई मंदी नहीं दिखाई पड़ती। फिल्म इंडस्ट्री का कारोबार बढ़ा है। पिछले तीन-चार महीनों में हिंदी फिल्मों का कलेक्शन ज्यादा हो गया है। इन महीनों में ही गजनी जैसी फिल्म आई, जिसने लगभग 240 करोड़ के कुल आय से नया रिकार्ड स्थापित कर दिया। मंदी के इस दौर में आय के रिकार्ड बन रहे हैं।
आंकड़े बताते हैं कि 2008 के आखिरी तीन महीनों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने 680 करोड़ रुपयों का बिजनेस किया। पिछले साल के पहले नौ महीनों में अधिकांश फिल्मों के फ्लॉप होने के कारण इंडस्ट्री में उदासी का माहौल था।
अक्टूबर से दिसंबर के बीच की कामयाब फिल्मों ने इंडस्ट्री की उदासी को खुशी में बदल दिया। फैशन, गोलमाल रिट‌र्न्स, रब ने बना दी जोड़ी, दोस्ताना और गजनी देखने के लिए उमड़ी दर्शकों की भीड़ से प्रसन्नता लौटी। 2009 के जनवरी महीने में हालांकि राज ही अकेली सफल फिल्म रही, लेकिन पहले महीने में 50-55 करोड़ के बिजनेस से यह उम्मीद बंधी है कि यह साल अच्छा गुजरेगा। उम्मीद की जा रही है कि फरवरी में रिलीज हो रही फिल्मों, खासकर दिल्ली 6 को देखने दर्शक आएंगे। अगर पिछले साल के जनवरी महीने के बिजनेस से तुलना करें, तो इस साल अच्छी बढ़ोतरी दिख रही है।
इंटरनेशनल आर्थिक मंदी से वित्त जगत में आए भूकंप के झटके महसूस होने के पहले से ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री सावधान हो गई थी। ऐसा लग रहा था कि उस मंदी का असर भारत तक पहुंच चुका है, जिसकी वजह से दर्शकों ने अपनी जेबें सिल ली हैं। फिल्म प्रोडक्शन में तेजी से उभरे कॉरपोरेट हाउस के मार्केटिंग अधिकारियों ने असर के पहले ही बजट को कम करने की कवायद शुरू कर दी थी। फिल्म स्टारों, डायरेक्टर और कार्यकारी निर्माताओं के साथ बैठकें की जाने लगी थीं कि संभावित मंदी को देखते हुए कटौती करनी होगी। एक घबराहट इंडस्ट्री में फैल गई थी। फिल्मों के अच्छे बिजनेस के बावजूद यह घबराहट कम नहीं हुई है। ऐसा कहा जा रहा है कि प्रोडक्शन कंपनियां मंदी के बहाने फिल्मों की लागत को कम कर देने में फायदा देख रही हैं। फिल्में छूट जाने या बंद हो जाने के डर से स्टार और डायरेक्टर दबाव में आकर अपने पैसे कम कर रहे हैं।
दरअसल, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मंदी का सीधा असर प्रोडक्शन कंपनियों की योजनाओं पर पड़ा है। आमदनी और कलेक्शन की बात करें, तो उसमें बढ़ोतरी ही हुई है। फिर भी, मंदी का बहाना है और इंडस्ट्री में घबराहट है, लिहाजा प्रोडक्शन कंपनियों को अच्छा अवसर मिल गया है। इस अवसर का लाभ उठाते हुए वे लाभ की संभावना बरकरार रखते हुए निवेश और लागत कम करने में सफल हो रहे हैं। वास्तव में मंदी के बहाने अपना मुनाफा बढ़ाने की युक्ति में लगे हैं। अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि मनोरंजन में मंदी नहीं है। उदासी और हताशा के खौफनाक दौर में मनोरंजन की मांग बढ़ जाती है। पिछले चार महीनों में कामयाब हुई फिल्मों का कलेक्शन भी इस धारणा को मजबूत करते हैं। जो फिल्में फ्लॉप हुई, वे वास्तव में बुरी थीं। अगर मंदी का ही असर होता, तो बाकी फिल्में भी प्रभावित होतीं और कम से कम गजनी 240 करोड़ का रिकार्ड बनाने में सफल नहीं होती। वास्तव में मंदी के झूठ और डर को समझने की जरूरत है। कहीं ऐसा तो नहीं कि संभावित खौफ में निवेशकों, पूंजीपतियों और प्रोडक्शन कंपनियों ने मुट्ठियां बांध ली हैं और अपने लाभ को शेयर करने से बच रही हैं!

Monday, February 9, 2009

हिन्दी टाकीज:तब मां भी साथ होती और सिनेमा भी-विनीत कुमार

हिन्दी टाकीज-२४
विनीत कुमार मीडिया खासकर टीवी पर सम्यक और संयत भाव से लिख रहे हैं। समझने-समझाने के उद्देश्य से सकारात्मक सोच के साथ मीडिया के प्रभाव पर हिन्दी में कम लोग लिख रहे हैं.विनीत की यात्रा लम्बी है.चवन्नी की उम्मीद है कि वे भटकेंगे नहीं.विनीत के ब्लॉग का नाम गाहे-बगाहे है,लेकिन वे नियमित पोस्ट करते हैं.उनके ब्लॉग पर जो परिचय लिखा है,वह महत्वपूर्ण है...टेलीविजन का एक कट्टर दर्शक, कुछ भी दिखाओगे जरुर देखेंगे। इस कट्टरता को मजबूत करने के लिए इसके उपर डीयू से पीएच।डी कर रहा हूं। एम.फिल् में एफएम चैनलों की भाषा पर काम करने पर लोगों ने मुझे ससुरा बाजेवाला कहना शुरु कर दिया था,इस प्रसंग की नोटिस इंडियन एक्सप्रेस ने ली और इसके पीछे का तर्क भी प्रकाशित किया। मुझे लगता है कि रेडियो हो या फिर टीवी सिर्फ सूचना,मनोरंजन औऱ टाइमपास की चीज नहीं है,ये हमारे फैसले को बार-बार बदलने की कोशिश करते हैं,हमारी-आपकी निजी जिंदगी में इसकी खास दख़ल है। एक नयी संस्कृति रचते हैं जो न तो परंपरा का हिस्सा है और न ही विरासत में हासिल नजरियों का। आए दिन बदल जानेवाली एक सोच। इस सोच को समझने के लिए जरुरी है लगातार टेलीविजन देखना। इसलिए अखबारों के एडीटोरियल पन्ने पर टीवी नहीं देखने वाले इंटल बाबाओं के टीवी औऱ मीडिया पर लेख पढ़ने के बजाय जमकर टीवी देखना ज्यादा जरुरी समझता हूं। फिर कच्चे-पक्के ही सही अपनी राय बनाता हूं। बाबाओं की तरह टीवी को संस्कृति का शाश्वत दुश्मन मानने के बजाय एक कल्चरल टेक्टस् के तौर पर समेटने,सहेजने और उस पर सोचने की कोशिश करता हूं।

तब आज के बच्चों की तरह हमारा बचपन इतना पर्सनल, डिफाइन्ड और वर्सटाइल नहीं था। सबों को डॉक्टर, इंजीनियर,आइएस में से कोई एक बनना था। ये नहीं कि एक घंटे के लिए सचिन,दूसरे घंटे के लिए शान, तीसरे घंटे के लिए प्रभु देवा और चौथे घंटे के लिए सतीश गुजराल। इसलिए पढ़ने के अलावे हमारे पास भसोड़ी करने का खूब वक्त होता। छोटी से छोटी चीजों पर घंटों भसोड़ी करते। शहर में कोई एक सिनेमा लग गया तो हरे,पीले पोस्टर लूटने से लेकर सिनेमा देखने के बाद कल्लू चचा के यहां घुघनी और कचड़ी खाने तक की चर्चा झाल-माल(जो नहीं घटित हुआ है, उसे भी अपनी तरफ से जोड़कर कहते) लगाकर करते।

इसी क्रम में मोहल्ले का कोई लौंडा पूछ बैठता-तुमने ड्रिम गर्ल देख ली। मैं कहता- मां के साथ। सारे बच्चे एक साथ ठहाके लगाते- ये लो, मां के साथ देख आए। सिनेमा मां के साथ देखने की चीज है,हम तो अंकल के साथ गए थे, कोई बताता जूली बुआ के साथ गए थे। हैप किस्म के लौंड़ो के लिए मां के साथ सिनेमा देखना मजाक भर से ज्यादा कुछ नहीं था। उनके शब्दों में मां के साथ सिनेमा देखने का मतलब है, बोर होना, कुछ मत बोलो,चुपचाप देखते रहो,सीटी भी नहीं मार सकते। लगता है सिनेमा,सिनेमा हॉल में नहीं,क्लास रुम में देख रहे हैं। लड़की लोग जाए, मां के साथ कोई प्रॉब्लम नहीं,लेकिन हमलोग.......।

मैं थोड़ा झेंप जाता औऱ किताबी लड़कों से पूछता, तुम भी नहीं जाते मां के साथ फिल्म देखने। वो कहता-शिव महिमा,सती अनसुईया जैसी फिल्में तो मां ले जाती है दिखाने,साथ में पापा भी जाते हैं लेकिन ड्रिम गर्ल...मां कुछ बोले, इसके पहले पापा ही कह देते हैं, रहने दो। पढाई करो, ये सब तुम बच्चों के लिए नहीं है। फिल्म सेंसर बोर्ड के बाद एक और डॉमेस्टिक लेबल पर सेंसर बोर्ड। मैं तो नहीं जाता मां के साथ। लेकिन इन सबके वाबजूद सिनेमा के मामले में मेरा अनुभव इन सबसे अलग है। मैंने मां के साथ पचास फिल्में तो जरुर देखी होगी। आज भी गर्लफ्रैंड ( अगर हो या बने तो) के साथ देखते हुए अनुशासन में रह जा।उं तो इसे भी मां के साथ सिनेमा देखने का ही पुण्य-प्रताप या फुद्दूपना समझिये।

आदर्श सिनेमाघर किसे कहा जाए, मुझे नहीं पता। लेकिन हमारे शहर में चाहे वो बिहार शरीफ हो या फिर टाटानगर जिस सिनेमाघर में मां-बहन,बहू-बेटी सिनेमा देखने जा सके,लौटते समय मौके पर बाजिब दाम पर रिक्शा मिल जाए, इन्टर्वल में गरम पापड़ और ऑरिजिनल फंटा मिल जाए वो आदर्श सिनेमाघर की कैटेगरी में शामिल किया जाता। इस लिहाज से बिहार शरीफ का किसान सिनेमा एक मिसाल हुआ करता। मां अक्सर इसी सिनेमाघर में जाया करती। सिनेमा का मालिक शहर का नामी डॉक्टर था और बाकी के सिनेमाघरों के मुकाबले लेडिस की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देता। मनचले लौंडे इसे लेडिज सिनेमाघर भी कहते। लेकिन सच बात तो ये है कि वाकई परिवार के साथ सबसे ज्यादा सिनेमा लोग यहीं देखा करते। इस मामले में बाकी के सिनेमाघर बदनाम थे।

मुझे नहीं पता कि इससे पहले मां सिनेमा जाती थी भी या नहीं,तब दादी भी जिंदा थी,मां बताती थी, सिनेमा और शौक-मौज को लेकर सख्त भी। लेकिन जब से मैंने होश संभाला,दादी नहीं थी,पापा अपनी दूकान में व्यस्त रहते। मां नाश्ते के समय बता देती कि आज सिनेमा जाएगी और दिनभर के किसी भी शो में पड़ोस की चाचियों और भाभियों के साथ चली जाती। मां को पता होता कि अगर मुझे घर में छोड़ देगी तो घरेलू दंगे में बड़े भाइयों और बहनों से सबसे ज्यादा तबाही इसी की होगी, इसलिए हमेशा अपने साथ ले जाती। सिनेमाघर में लेडिज और जेन्ट्स की सीट अलग होती। मैं मां के साथ लेडिज सीट पर बैठता। टार्चवाले अंकल जैसे ही पास आते, मां,मुझे पैर के नीचे करके आंचल में छिपा लेती। मैं बच जाता लेकिन कई बार एक सीट खाली देखकर अंकल किसी लेडिस को बिठा देते और तब मुझे भारी मुसीबत झेलनी पड़ती। मां की सीट पर एक साथ बैठने पर पीछे की औरतें भुनभुनाने लगती,बताओ तो जरा, घोड़ा भर के लड़का को लेडिज सीट में बैठा रही है उसकी माय। मां कुछ नहीं बोलती, मैं पीछे मुड़ता और वो जोर से हाथ से मेरा माथा पर्दे की तरफ घुमा देती। बीस-पच्चीस मिनट बाद मामला ठंड़ा पड़ जाता।

लेडिज सीट पर फिल्म देखने का बिल्कुल अलग अनुभव होता। हीरोईन के सताए जाने पर औरतें पीछे से ची.ची.. करती, किसी बच्चे के पीटे जाने पर हाय रे बच्चा करती। हीरोईन के बाप से झूठ बोलकर इश्क लड़ाने पर छिनाल है,लड़की थोड़े है कहती, सन्नी देवल को देखकर महाभारत के भीम को याद करती, सचिन को देखकर श्रवण कुमार का ध्यान करती। सिनेमा में औरत की किरस्तानी को देखकर अचानक से चिल्लाती- बबलुआ के माय एकदम ऐसे ही चंडालिन है, पैसा के चक्कर में देवता जैसन पति को खा गयी। अब दिन में मिसरी कंद बेचती है और रात में घर से अलोप(गायब) रहती है। मेरे आगे पर्द पर एक सिनेमा चल रहा होता और पीछे से उस फिल्म के साथ कई घरों की कहानियां एक साथ चल रही होती। बैकग्राउंड में घरेलू कलहों और कथाओं का पैश्टिच प्रोजेक्टर चलता रहता। इसी महौल में मैंने फिल्म के शुरु होने पर मां के साथ हाथ जोड़कर कई फिल्में देखी।

राम तेरी गंगा मैली देखकर मां बगल की चाची से धीरे से कहती है- इसमें हीरोईन का गंजी भी दिख रहा है। मां के गंजी बोलते ही मेरे दिमाग में टीनोपाल दी हुई पापा सहित मुझे अपनी रुपा जूनियर गंजी याद आ जाती। मैं पूछ बैठता- कहां दिख रहा है गंजी मां। मां नेरा मुंह दबा देती। बाहर निकलने पर पड़ोस की भाभा कहती- मांजी अब इनको मत लाया कीजिए साथ में, बड़े हो रहे हैं। ठीक नहीं लगता है जब इस तरह के जबाब-सवाल करने लग जाते हैं। लेकिन मेरे बिना मां सिनेमा देखना नहीं चाहती। इसलिए कई बार वो इन भाभियों को मना कर देती कि आप सब देख लीजिए, हम एक-दो दिन बाद जाएंगे। फिर बाद में मीरा दीदी की मां के साथ ले जाती जो अक्सर कहा करती-साथ में एक-दो लड़कन-बुतरु रहता है, तो कहीं आने-जाने में अच्छा लगता है। मैं बोर्ड तक यानि दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे तक शहर बदल जाने पर भी मां के साथ फिल्में देखता रहा। सब तरह की फिल्में। प्रेम,रोमांस,धार्मिक, सामाजिक,घरेलू या फिर देशभक्ति की फिल्में।

बोर्ड के बाद मैं अपनी पढ़ाई करने घर से बाहर चला आया। सिनेमा का तो साथ रहा लेकिन मां का साथ छूट गया. इसे यों कहें सिनेमा और मां दो अलग-अलग संदर्भ हो गए। रांची आने पर भी फिल्में देखता रहा। उसकी अपनी यादें हैं,अपने अनुभव हैं। लेकिन बाद में जब तब छुट्टियों में घर जाता, पड़ोस की भाभियां मजे लेने के अंदाज में कहती- विनीत तो अब आ गए हैं मांजी,देख आइए दो-चार सिनेमा और तब की लगी फिल्मों के नाम लेने लग जाती। मैं भाभी से सिर्फ इतना कह पाता- मां अब फिल्में नहीं देखती है, अब की हीरोइनों के गंजी तक नहीं दिखते। भाभियां ठहाके लगातीं और मां कहती- माय,बाप का साथ छूटने से तू लखैरा हो गया है, बड़ा-छोटा का एकदम से लिहाज नहीं है।

मां अब मेरे साथ फिल्में देखने नहीं जाती। एक तो अब बहुत रुचि भी नहीं रह गयी लेकिन उससे भी बड़ी बात है कि उसे पता है कि अब मैं खालिस लव स्टोरी वाली फिल्मों में भी सिर्फ कबूतर,झील और फूल देखकर खुश नहीं हो जाउंगा। उसे पता है कि अब मैंने फिल्मों में कुछ भी देखने के बजाय निहारना शुरु कर दिया है। एक अनुभव के बाद मां को पता है कि अब ये धार्मिक फिल्मों में भी सीता,रुक्मिणी बनी स्त्रियों को एक रत्ती भी सीता औऱ रुक्मिणी के रुप में नहीं देखेगा। सबके सामने कुछ बक दिया तो....सबके सामने बेइज्जती। अब डरती है मां साथ सिनेमा जाने से।............


Friday, February 6, 2009

फ़िल्म समीक्षा:देव डी


आत्मलिप्त युवक की पतनगाथा
-अजय ब्रह्मात्मज

घिसे-पिटे फार्मूले और रंग-ढंग में एक जैसी लगने वाली हिंदी फिल्मों से उकता चुके दर्शकों को देव डी राहत दे सकती है। हिंदी फिल्मों में शिल्प और सजावट में आ चुके बदलाव का सबूत है देव डी। यह फिल्म आनंद और रसास्वादन की पारंपरिक प्रक्रिया को झकझोरती है। कुछ छवियां, दृश्य, बंध और चरित्रों की प्रतिक्रियाएं चौंका भी सकती हैं। अनुराग कश्यप ने बहाना शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के देवदास का लिया है, लेकिन उनकी फिल्म के किरदार आज के हैं। हम ऐसे किरदारों से अपरिचित नहीं हैं, लेकिन दिखावटी समाज में सतह से एक परत नीचे जी रहे इन किरदारों के बारे में हम बातें नहीं करते। चूंकि ये आदर्श नहीं हो सकते, इसलिए हम इनकी चर्चा नहीं करते। अनुराग कश्यप की फिल्म में देव, पारो, चंदा और चुन्नी के रूप में वे हमें दिखते हैं।
देव डी का ढांचा देवदास का ही है। बचपन की दोस्ती बड़े होने पर प्रेम में बदलती है। एक गलतफहमी से देव और पारो के रास्ते अलग होते हैं। अहंकारी और आत्मकेंद्रित देव बर्दाश्त नहीं कर पाता कि पारो उसे यों अपने जीवन से धकेल देगी। देव शराब, नशा, ड्रग्स, सेक्स वर्कर और दलाल के संसर्ग में आता है। वह चैन की तलाश में बेचैन है। उसकी मुलाकात चंदा से होती है तो उसे थोड़ा सुकून मिलता है। उसे लगता है कि कोई उसकी परवाह करता है। चंदा भी महसूस करती है कि देव खुद के अलावा किसी और से प्रेम नहीं करता। देव अमीर परिवार का बिगड़ैल बेटा है, जो भावनात्मक असुरक्षा के कारण भटकता हुआ पतन के गर्त में पहुंचता है। यही कारण है कि उसकी बेबसी और लाचारगी सहानुभूति नहीं पैदा करती। उसके जीवन में आए पारो, चंदा और रसिका रियल, स्मार्ट और आधुनिक हैं। वे भी उसकी हकीकत समझते हैं और दया नहीं दिखाते। देव डी का देव कमजोर, असुरक्षित, भावुक, आत्मलिप्त और अनिश्चित व्यक्ति है। बाह्य परिस्थितियों से ज्यादा वह खुद के अनिश्चय और भटकाव का शिकार है।
अनुराग कश्यप ने देव डी में चंदा की पृष्ठभूमि की खोज की है। सेक्स वर्कर बनने की विवशता की कहानी मार्मिक है। अनजाने में एमएमएस कांड में फंस गई लेनी परिवार और समाज से बहिष्कृत होने के बाद वह चुन्नी की मदद से दिल्ली के पहाड़गंज में शरण पाती है और अपना नाम चंद्रमुखी रखती है। कुल्टा समझी गई चंदा मानती है कि समाज का अधिक हिस्सा कुत्सित ओर गंदी चीजें देखने में रस लेता है। जिस समाज ने उसे बहिष्कृत किया, उसी समाज ने उसके एमएमएस को देखा। देव डी की पारो साहसी, आधुनिक और व्यावहारिक है। देव से अलग होने के बाद वह बिसूरती नहीं। दोबारा मिलने पर वह देव को अपनी अंतरंगता से तृप्त करती है, लेकिन देव के प्रति वह किसी किस्म की भावुकता नहीं दिखाती। वह अपने परिवार में रच-बस चुकी है। इस फिल्म को निर्देशित करते समय अनुराग के मानस में पुरानी देवदास मंडराती रही है। लेनी तो अपना नाम चंद्रमुखी देवदास की माधुरी दीक्षित के कारण रखती है। देव डी में चित्रित प्रेम, सेक्स, रिश्ते और भावनाओं को आज के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। देव डी एक प्रस्थान है, जो प्रेम के पारंपरिक चित्रण के बजाए 21वीं सदी के शहरी और समृद्ध भारत के युवा वर्ग के बदलते प्रेमबोध को प्रस्तुत करती है। अनुराग कश्यप ने क्रिएटिव साहस का परिचय दिया है। उन्होंने फिल्म के नए शिल्प के हिसाब से पटकथा लिखी है। पारो, देव और चंदा के चरित्रों को स्थापित करने के बाद वे इंटरवल के पश्चात रिश्तों की पेंचीदगियों में उतरते हैं। दृश्य, प्रसंग, बिंब और रंग में नवीनता है। फिल्मांकन की प्रचलित शैली से अलग जाकर अनुराग ने नए प्रयोग किए हैं। ये प्रयोग फिल्म के कथ्य और उद्देश्य के मेल में हैं। अनुराग के शिल्प पर समकालीन विदेशी प्रभाव दिख सकता है।
अभय देओल स्वाभाविक अभिनेता हैं। उन्होंने देव के जटिल चरित्र को सहजता से निभाया है। मुश्किल दृश्यों में उनकी अभिव्यक्ति, भाव मुद्राएं और आंगिक क्रियाएं किरदार के मनोभाव को प्रभावशाली तरीके से जाहिर करती हैं। अभय अपनी पीढ़ी के निर्भीक अभिनेता हैं। माही और कल्कि में माही ने अपने किरदार को समझा और बखूबी निभाया है। माही के अभिनय में सादगी है। कल्कि को दृश्य अच्छे मिले हैं, किंतु वह चरित्र की संश्लिष्टता को चेहरे पर नहीं ला पातीं। चुन्नी की भूमिका में दिब्येन्दु भट्टाचार्य ध्यान खींचते हैं। इस किरदार को अनावश्यक तरीके से सीमित कर दिया गया है।
देव डी की विशेषता इसका संगीत है। फिल्म में गीत-संगीत इस खूबसूरती से पिरोया गया है कि पता ही नहीं चलता कि फिल्म खत्म होने तक हम अठारह गाने सुन चुके हैं। गीतों का ऐसा फिल्मांकन रंग दे बसंती के बाद दिखा है। अमिताभ भट्टाचार्य, शैली और अमित त्रिवेदी की टीम ने मधुर और भावपूर्ण सुर, स्वर और शब्द रचे हैं।
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दरअसल:अक्षय, ऐश्वर्या और हेलन की सेवाएं


-अजय ब्रह्मात्मज


इस साल अक्षय कुमार, ऐश्वर्या राय बच्चन और हेलन को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। हर साल कुछ फिल्मकारों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया जाता है। अभी तक देश के 252 व्यक्तियों को पद्मविभूषण, 1033 व्यक्तियों को पद्मभूषण और 2188 व्यक्तियों को पद्मश्री से गौरवान्वित किया गया है। भारत रत्न के बाद केंद्र सरकार द्वारा दिया जाने वाला यह दूसरा बड़ा नागरिक सम्मान है। पद्म पुरस्कार से सम्मानित होने का मतलब है उक्त व्यक्ति ने अपने श्रेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया है और अपनी सेवाओं से समाज को लाभ पहुंचाया है।
शीर्षक में मैंने सिर्फ अभिनेता-अभिनेत्रियों के नाम लिखे हैं। इस साल के पद्म पुरस्कारों से गौरवान्वित होने वालों में कुमार सानू, उदित नारायण, पीनाज मसानी और हृदयनाथ मंगेशकर भी हैं। इन सभी का भी फिल्मों से संबंध रहा है। इन दिनों हर पुरस्कार और सम्मान की घोषणा के पहले कयास आरंभ हो जाता है और ऐसा माना जाता है कि सत्ता के गलियारे में कुछ जोड़-तोड़ भी चलता रहता है। सुपौल जिले के उदित नारायण के नाम पर आपत्ति प्रकट की जा रही थी कि वे तो मूल रूप से नेपाली हैं। मालूम नहीं, उनके जन्म-स्थान का संशय कैसे सुलझा? लेकिन उन्हें इस सूची में देखकर खुशी हुई।
अन्य क्षेत्रों के सम्मानित व्यक्तियों पर कभी संशय या आपत्ति नहीं जाहिर होती। केवल फिल्म सितारों की सेवाओं और योगदान पर प्रश्न-चिह्न लगाए जाते हैं। इस बार भी हेलन के नाम पर कोई विवाद नहीं है, लेकिन अक्षय कुमार और ऐश्वर्या राय के बारे में पूछा जा रहा है कि उनका क्या योगदान है या उनकी सेवाओं से देश का क्या फायदा हुआ। आमतौर पर फिल्म सितारों की लोकप्रियता और कामयाबी को हम उनकी निजी उपलब्धि मान लेते हैं। हम इस तथ्य पर गौर नहीं करते कि वे अपने क्षेत्रों में श्रेष्ठता हासिल करने के दरमियान आम दर्शकों का मनोरंजन भी करते रहे हैं। वे निराश, हताश और उदास दर्शकों के दिल-ओ-दिमाग में उजास भरते हैं। उनके सपनों को हरा करते हैं और जीवन और संघर्ष के लिए प्रेरित करते हैं।
दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन और उनके समकक्ष रहे दूसरी भाषाओं के कलाकारों को सबसे बड़े नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए। सभी कलाकारों ने अपनी भाव-भंगिमाओं, अदाओं और फिल्मों से सालों तक दर्शकों का मनोरंजन किया है। उन्हें हंसने और आनंदित होने के जो खूबसूरत पल दिए हैं, इन पलों की कीमत कोई नहीं लगा सकता। फिल्म कलाकार पर्दे और सार्वजनिक जीवन में अपनी मौजूदगी से हमारे जीवन में रस और आनंद का संचार करते हैं। उन्हें साक्षात देखकर हम रोमांचित हो उठते हैं। उन पर नजर पड़ते ही आनंद का स्फुरण होता है। आनंद के उस पल में हम सभी स्तंभित हो जाते हैं। दो-चार क्षणों के लिए ही सही, हम अपनी सारी तकलीफें भूल जाते हैं और उनकी उपस्थिति से बह रही सकारात्मक ऊर्जा महसूस करते हैं। यहां तक कि पर्दे पर अपने मनपसंद कलाकारों को गाते-नाचते, रोते-हंसते, लड़ते-झगड़ते, हारते-जीतते देखकर भी हम भाव-विह्वल होते हैं। इस विह्वलता में हमारा दुख कम होता है। फिल्मों के बढ़ते प्रसार और प्रभाव के इस दौर में कलाकार की सेवाओं का दायरा बढ़ गया है। हम उन्हें सिर्फ उपभोग योग्य उत्पादों के प्रचारक के रूप में ही देखते और समझते हैं, लेकिन वहां भी वे इसी कारण प्रभावशाली होते हैं कि हम उन्हें चाहते हैं, पसंद करते हैं और उनकी संस्तुतियों पर भरोसा करते हैं। हम उन्हें अपना समझते हैं। उनसे सीखते हैं और अपने अंदर बदलाव लाते हैं। यह सब अप्रत्यक्ष तरीके से होता है। समाजशास्त्री अध्ययन और शोधों से बता सकते हैं कि फिल्म स्टार आइकॉन के रूप में कैसे युवा पीढ़ी को प्रेरित और प्रभावित कर रहे हैं। पद्म पुरस्कार एक रूप में फिल्म कलाकारों से समाज को मिल रही प्रेरणा और प्रभाव का रेखांकन है। उनके सामाजिक योगदान को मापने का पैमाना अभी तक विकसित नहीं हुआ है। उनकी सेवाओं को आंकने का आधार क्या होगा..?

Thursday, February 5, 2009

देव डी की पारो पंजाब की है और माही भी

-अजय ब्रह्मात्मज

देवदास की पार्वती देव डी में परमिंदर बन गयी है। वह बंगाल के गांव से निकलकर पंजाब में आ गयी है। पंजाब आने के साथ ही उसमें हरे-भरे और खुशहाल प्रदेश की मस्ती आ गयी है। उसके व्यक्तित्व में ज्यादा बदलाव नहीं आया है, लेकिन समय बदल जाने के कारण परमिंदर अब ट्रैक्टर भी चलाने लगी।
संयोग से अभिनय में आ गयी माही ने अब एक्टिंग को ही अपना करियर बना लिया है। देव डी के पहले उन्होंने दो पंजाबी फिल्में कर ली हैं। उनकी ताजा पंजाबी फिल्म चक दे फट्टे अच्छा बिजनेस कर रही है।
एक्टिंग के खयाल से मुंबई पहुंची माही अपने दोस्त दिब्येन्दु भट्टाचार्य के बेटे शौर्य के जन्मदिन की पार्टी में बेपरवाह डांस कर रही थीं? संयोग से उनकी अल्हड़ मस्ती अनुराग कश्यप ने देखी और तत्काल अपनी फिल्म के लिए पसंद कर लिया। उन्हें अपनी पारो मिल गयी थी। माही को एकबारगी यकीन नहीं हुआ। वह कहती हैं, मैं तब तक अनुराग के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी। मैंने अपने दोस्तों से जानकारी ली। सभी ने कहा कि यह बेहतरीन लांचिंग है। ना मत कर देना।
माही ने सुचित्रा सेन वाली देवदास पहले देखी थी। दिलीप कुमार की फिल्में उन्हें पसंद हैं, इसलिए देख ली थी? तब कहां पता था कि भविष्य में पारो का रोल निभाना पड़ सकता है। फिल्म शुरू होने के बाद ऐश्वर्या राय की देवदास भी देख ली। माही कहती हैं, अनुराग की फिल्म की पारो उन फिल्मों से अलग है। वे थोड़ी सहमी और माता-पिता के अनुशासन में रहती थीं। यह पारो जिद्दी है। इस सदी की लड़की है पारो। उनकी तरह यह पारो भी अपने देव को प्यार करती है। उसके प्रेम में पैशन है, लेकिन मर-मिटने वाली बात नहीं है। वह खुद को समझा लेती है कि जिंदगी में एक रास्ता बंद हो गया तो दूसरा रास्ता भी है। पहले घबराहट महसूस होती है कि पता नहीं कर पाऊंगी या नहीं कर पाऊंगी? इस फिल्म में पहले दिन ही मैंने लगभग बारह घंटे शूटिंग की। हर तरह के एक्सप्रेशन दिए। अनुराग ने दिन भर कुछ नहीं बोला। बस शूट करते रहे। पैकअप के बाद उन्होंने कहा कि तुमने बहुत अच्छा काम किया। डायरेक्टर के मुंह से ये पांच शब्द सुनकर तसल्ली हुई और कंफीडेंस बढ़ गया। लगा कि अब मैं कर सकती हूं।
डांस और एक्टिंग के शौक के बारे में बात चलने पर माही कहती हैं, मेरी मां को एक पंजाबी फिल्म ऑफर हुई थी। तब वह फिल्मों में नहीं आ सकी थीं। मां की इच्छा थी कि मैं कुछ करूं। मां ने मुझे बचपन से ही डांस की ट्रेनिंग दिलवायी। रही बात एक्टिंग की तो एमए में एडमिशन के वक्त दोस्तों की सलाह पर मैंने अंग्रेजी और सोशियोलॉजी के साथ थिएटर का भी फार्म भर दिया था। संयोग से थिएटर में पहले एडमिशन मिल गया। हफ्ते-दस दिन क्लास भी हो गयी तो मुझे लगा कि यह अच्छी पढ़ाई है। मेरा मन लग गया। चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रही थी तभी फिल्म के ऑफर मिलने लगे थे। मैंने मनमोहन सिंह की पंजाबी फिल्म की थी। उन दिनों ही हवाएं में एक छोटा रोल किया था।
माही अपने प्रोफेसर मोहन महर्षि की कृतज्ञ हैं। उनका नाम आदर के साथ लेते हुए कहती हैं, मोहन महर्षि ने मुझे अहसास कराया कि तू कर सकती है। उन्होंने खूब प्रोत्साहित किया। मेरे दोस्तों ने हमेशा बढ़ावा दिया। फिल्म शुरू होने पर अनुराग ने भरोसा किया और मुझ में विश्वास दिखाया। मैं थोड़ी नर्वस एक्टर हूं, लेकिन कैमरे के सामने ठीक हो जाती हूं।
इस फिल्म के नायक अभय देओल हैं। अभय के साथ ही माही के दृश्य हैं। दोनों ने लंबा वक्त साथ बिताया। अभय के बारे में माही ऊंचे खयाल रखती हैं। वह बेहिचक बताती हैं, जब अनुराग ने अभय को मेरे बारे में बताया और मिलवाया था तो अभय ने तुरंत सहमति दे दी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि बाहर से आई लड़कियों की कामयाबी देखकर वे खुश होते हैं। उन्होंने मुझे पूरा समर्थन और सहयोग दिया। अभय अलहदा एक्टर और अच्छे इंसान हैं।
अपने निर्देशक अनुराग कश्यप के बारे में माही हंसते हुए बताती हैं, सच कहूं तो मैं यहां आयी थी तो अपने सर्किल में अनुराग-अनुराग सुना करती थी। मैं तो डायरेक्टर के तौर पर यश चोपड़ा और सुभाष घई को जानती थी। मुझे दिब्येन्दु ने ही उनके बारे में विस्तार से बताया। अपने अनुभव से कह सकती हूं कि वे बिल्कुल बच्चों की तरह रिएक्ट करते हैं। वैसे ही निश्छल हैं। खुश होने पर उसे जाहिर करते हैं। थोड़े मूडी हैं।
पारो का किरदार निभा कर इस कड़ी में आने की बात कहने पर माही झेंपने लगती हैं। अपनी घबराहट और खुशी छिपा नहीं पातीं। वह कहती हैं, वे सब बहुत खूबसूरत हैं। मैं तो उनके मुकाबले कुछ भी नहीं हूं। बस यही एहसास मुझे जोश देता है कि उनके निभाए किरदार को निभाने का मौका मुझे मिला। मैं दर्शकों से यही कहूंगी कि वे मेरी फिल्म के रेफरेंस में ही मुझे देखें।

Wednesday, February 4, 2009

Gr8 Marketing turns Worst Movies into HITs-goutam mishra

चवन्नी ने गौतम मिश्रा से आग्रह किया था की वोह हिन्दी फिल्मों पर मार्केटिंग के नज़रिए से कुछ लिखें। उन्होंने यह प्रासंगिक टिप्पणी भेजी है। इसे चवन्नी अंग्रेज़ी में ही पोस्ट कर रहा है...

Bollywood has produced some great flicks in recent past but at the same time it also witnessed movies which had great music, big stars, much needed action and a bit of comedy so that it attracts all age brackets but one of the most important ingredient for a successful movie – ‘A Good Story’ was completely missing. Here comes the role of marketers who still managed to create a pull and bring viewers to cinemas across country rather I must say globe at large and making it a highly fruitful venture for its producers.

2009
“Chandni Chowk 2 China” (CC2C) the first Warner Brothers’ bollywood venture is the latest example of this practice bollywood producers applied, though it could not turn up as a great hit but still marketers were able to bring people out of their homes for the much awaited and much hyped flick. The movie has cost its producers approximately Rs. 80 crores (including marketing) was complete disaster as country’s top film critics rated it poorly and so viewers did. The marketing efforts put in could only give it good opening. Movie’s cross promotions also helped meet its cost pre-release like CC2C has brand tie-ups with Coca Cola, Jet Airways and others.

2008
Let’s move lil more backward and we can find another movie - the King Khan starrer “Rab Ne Bana Di Jodi” in fact this Yash Chopra camp flick was also made on the lines of CC2C in terms of very good music, Stars (SRK), Comedy and emotions a perfect appetizer for Indian viewers at a whooping cost of Rs. 31 crores. Though this movie is a Hit but its storyline was really very weak as I read in many reviews Dainik Jagran, Times, Rediff etc and also had pathetic experience of watching the movie where a girl flies in the air on her bike and by simply changing his hairstyle SRK could not be recognized by the heroine ha...ha…ha…. But perhaps Khan and marketers were able to turn it into a great venture for producers.

2007
Dating back to year 2007 once again a SRK starrer – Om Shanti Om needs a mention here, the movie was also launch-pad for glamorous Deepika Padukone and yet another Directorial & Choreography venture of Farah Khan. The movie is based on reincarnation of SRK, (Om Prakash Makhija & Om Kapoor) in rebirth he finds his love and kills the killer of his love in previous life. In fact a lot of hype was created in the media prior to release of movie and huge money was spent on promotion and no media vehicle was left alone but it did not earn critics’ accolades at large.

2006
Dhoom 2 is the second installment in the Dhoom series directed by Sanjay Gadhvi (Dhoom 2). It stars Hrithik Roshan, Abhishek Bachchan, Aishwarya Rai, Uday Chopra and Bipasha Basu. The movie was a sequel to the 2004 hit, Dhoom. The film was released on November 24, 2006. The film was also released in Telugu and Tamil (dubbed).The film's score and soundtrack were composed by Pritam and lyrics were penned by Sameer. The film was shot partially in-studio, in India, and also on location in Rio de Janeiro, Brazil and Durban, South Africa. It was the first Bollywood movie to be filmed in Rio de Janeiro. Dhoom 2 received a mixed response from critics. While it was considered an entertaining action blockbuster, critics thrashed it for being excessively action oriented without much character development.

2004
Lets move on lil more backwards (2004) here is yet another example of the above trend - Industry’s so called Super Star/King Khan played lead role in the movie Main Hoon Naa. It was directorial debut of Farah Khan and perhaps that’s why she tried to put in every ingredient/emotion – Patriotism, Action, Love, Drama, and Comedy, to make it a success. In fact her endeavors actually worked and movie was a success at Box Office but could not win Critics’ numbers. SRK (RAM) flies in the air on a rickshaw, Jumps with a rope to save his brother after getting beaten badly stands firm and fights with villain. Marketers were able to pull people at least once to theaters watch all the shit thing, and that all if all movie lovers in India go and watch a movie once it will be a hit.

Tuesday, February 3, 2009

21वीं सदी का देवदास है देव डी: अनुराग कश्यप

-अजय ब्रह्मात्मज

शरतचंद्र के उपन्यास देवदास पर हिंदी में तीन फिल्में बन चुकी हैं। इनके अलावा, कई फिल्में उससे प्रभावित रही हैं। युवा फिल्मकार अनुराग कश्यप की देव डी एक नई कोशिश है। इस फिल्म में अभय देओल, माही, कल्कि और दिब्येन्दु भट्टाचार्य मुख्य भूमिकाएं निभा रहे हैं। देव डी को लेकर बातचीत अनुराग कश्यप से..
देव डी का विचार कैसे आया?
सन 2006 में मैं अभय के साथ एक दिन फीफा व‌र्ल्ड कप देख रहा था। मैच में मजा नहीं आ रहा था। अभय ने समय काटने के लिए एक कहानी सुनाई। लॉस एंजिल्स के एक स्ट्रिपर की कहानी थी। एक लड़का उस पर आसक्त हो जाता है। उस लड़के की अपनी अधूरी प्रेम कहानी है। कहानी सुनाने के बाद अभय ने मुझसे पूछा कि क्या यह कहानी सुनी है? मेरे नहीं कहने पर अभय ने ही बताया कि यह देवदास है। मैं सोच भी नहीं सकता था कि देवदास की कहानी इस अंदाज में भी बताई जा सकती है!
अभय से आपकी पुरानी दोस्ती है?
देव डी में मेरे सहयोगी लेखक विक्रमादित्य मोटवाणे हैं। वे अभय के स्कूल के दिनों के दोस्त हैं। विक्रम से मेरी मुलाकात पहले हो चुकी थी, लेकिन वाटर के लेखन के दौरान हम करीब हुए। जब मैं पहली फिल्म पांच बना रहा था, तब विक्रमादित्य उसके गीतों के निर्देशन में मेरी सहायता कर रहे थे। उन्हीं दिनों अभय से मेरी मुलाकात हुई। तब वे स्केचिंग करते थे। बोस्टन से पढ़कर आए थे। मैं उन दिनों फिल्मी परिवारों के बच्चों को थोड़े संदेह और नाराजगी से देखता था। अभय में कुछ अलग बात थी। उन्होंने ब्लैकफ्राइडे के ब्लास्ट सीन के लिए स्टोरी बोर्ड भी तैयार किया था। बहरहाल, मैंने उन्हें अपने मित्र संजय राउत्रे से मिलवाया और संजय ने उनकी मुलाकात इम्तियाज अली से करवा दी। इस तरह एक ऐक्टर और एक डायरेक्टर प्रकाश में आए।
आपने अभय के साथ क्यों नहीं काम किया?
ऐसा संयोग नहीं बना। नो स्मोकिंग और गुलाल में अभय के लायक रोल नहीं थे। मैं उनका काम लगातार देख रहा था। सच कहूं, तो मुझे पहले यकीन नहीं था कि अभय ऐक्टिंग कर सकते हैं। एक चालीस की लास्ट लोकल देखने के बाद मैंने तय किया कि मुझे अभय के साथ काम करना है। संयोग देखें कि देव डी का आइडिया लेकर अभय ही आए। इस कहानी को दर्शक कई बार देख चुके हैं।
आपने इसके लिए निर्माता को कैसे तैयार किया?
कोई भी इस फिल्म में हाथ नहीं लगाना चाह रहा था। खासकर नो स्मोकिंग के फ्लॉप होने के बाद मेरे प्रति निर्माताओं का विश्वास हिल चुका था। यूटीवी के विकास बहल के पास मैं अपने मित्र राजकुमार गुप्ता की आमिर लेकर गया था। उस मीटिंग में मैंने आमिर के साथ देव डी की भी कहानी सुना दी। विकास बहल को आइडिया पसंद आया। इस तरह फिल्म की शुरुआत हुई।
कलाकारों के चयन के बारे में बताएंगे?
दोस्त दिब्येन्दु के बेटे के जन्मदिन की पार्टी में मैंने माही को पहली बार देखा था। माही उस शाम दुनिया से बेपरवाह डांस कर रही थी। मुझे उसका वह अंदाज पसंद आया। मुझे ऐसी ही पारो चाहिए थी। चूंकि देव डी की पृष्ठभूमि पंजाब की थी, इसलिए माही और ज्यादा सही लगी। मेरी फिल्म में पारो का नाम परमिंदर है। कल्कि का चुनाव काफी सोच-समझकर चंदा के रूप में किया। फिल्म देखने पर लोग उसका महत्व भी समझ जाएंगे।
21वीं सदी में देव डी के रूप में देवदास को आप कैसे परिभाषित करेंगे?
यह एक ऐसे युवक की कहानी है, जिसे समाज इसलिए बहिष्कृत कर देता है कि वह बने-बनाए नियमों का पालन नहीं करता। वह दुनिया की नहीं सुनता। सही और गलत का फैसला स्वयं करता है।
फिल्म में अठारह गाने रखने की वजह?
शुरू में ऐसा विचार नहीं था, लेकिन फिल्म के संगीतकार अमित त्रिवेदी ने जब गीत रचे और उन्हें सुरों से सजाया, तो मैं बहुत प्रभावित हुआ। यकीन करें, उनके संगीत के कारण मैंने स्क्रिप्ट में फेरबदल की। फिर मैंने देव डी को म्यूजिकल का रूप दिया। इस फिल्म के गीत बैकग्राउंड में चलते हैं। मुख्य कलाकारों ने गीतों पर होंठ नहीं हिलाए हैं।

हिन्दी टाकीज:फ़िल्म देखना आसान हो गया है-राजीव जैन


हिन्दी टाकीज-२३

जयपुर से प्रकाशित एक दैनिक समाचार पत्र में वरिष्ठ उपसंपादक, सात साल से में रहकर दुनिया के बारे में कुछ जानने का प्रयास कर रहा हूं। `शुरुआत´ नाम से ब्लॉग लिख रहा हूं। अपने परिचय में राजीव जैन ने इतना ही लिखा.लेकिन उनके ब्लॉग पर कुछ और जानकारियां हैं... पेशे से पत्रकार, वर्तमान में जयपुर के एक दैनिक समाचार पत्र में कार्यरत, उम्र 27 साल, कद 5 फुट 8।5 इंच, दूसरों की खबरों की चीरफाड का 6 साल से ज्‍यादा का अनुभव, शुरुआत से डेस्‍क पर ही था। रिपोर्टिंग शौकिया ही कि दस बीस बार, दो पांच बार दिल्‍ली में या फिर यूं किसी संपादक या डेस्‍क इंचार्ज ने किसी प्रेस कांफ्रेंस या खाने वाले प्रोग्राम में बैचलर होने के वास्‍ते कवरेज के लिए भेज दिया, लेकिन अपना कुछ लिखने का यह पहला ही प्रयास है। कोशिश कर रहा हूं कि इसे नियमित रख सकूं, सीधे यही लिखने से कुछ मानवीय त्रुटियां रह सकती हैं, एडिटिंग आप लोग पढते हुए कर लीजिएगा सुझाव सादर आमंत्रित हैं। अधिक जानकारी के लिए मेल करें mr.rajeevjain@gmail.com पर
राम तेरी गंगा मैली
मुझे अब याद नहीं कि इस फिल्‍म में क्‍या था, मैं शायद तब बमुश्किल छह-सात साल का रहा होगा। पर यह मेरी पहली फिल्‍म होने के साथ साथ ऐसी इकलौती फिल्‍म है जो मैंने अपने पूरे परिवार के साथ देखी हो। पापा, मां, दादी और हम दोनों भाइयों को लेकर शायद इसलिए यह फिल्‍म दिखाने ले गए हों कि फिल्‍म का टाइटल ‘राम तेरी गंगा मैली’ था। अगर फिल्‍म का पोस्‍टर न देखा हो तो फिल्‍म न देखने वाले को धार्मिक फिल्‍म जैसा अहसास देता है। खैर मुझे एक दो सीन याद आ जाते हैं और यह भी याद है कि हम फिल्‍म खत्‍म होने से थोडा पहले ही ही उठकर चले आए, ताकी फिल्‍म खत्‍म होने के बाद बाहर निकलने के लिए धक्‍का-मुक्‍की न करनी पडे।

मेरी पहली फिल्‍म
इसके बाद मैं शायद स्‍कूल से ही पहली बार फिल्‍म देखने गया था। शायद फिल्‍म का नाम छोटा जादूगर था। हमें सातवीं और आठवीं में साल में एक बार टॉकिज ले जाया जाता था। टैक्‍स फ्री फिल्‍म थी सो टिकट भी दो या तीन रुपए से ज्‍यादा नहीं होता था। क्‍यूंकि उस समय हमारे शहर में पांच रुपए के आसपास तो पूरा टिकट ही था।
इन दिनों वैसे मैं फिल्‍में भले ही न देखता रहा हों, लेकिन फिल्‍म के पोस्‍टर जरूर देखता था। क्‍यूंकि हमारी स्‍कूल बिल्डिंग के एक कॉर्नर में ही पोस्‍टर लगाए जाते थे।

प्रचार का अनोखा स्‍टाइल
उस समय फिल्‍म के प्रचार का स्‍टाइल भी अब के स्टाइल से थोडा अलग हुआ करता था। एक उदघोषक महोदय रिक्‍शे में बैठकर निकलते थे और एक फिल्‍मी गाने के साथ साथ बीच बीच में माइक पर चिल्‍लाते हुए जाते थे ‘आपके शहर के नवरंग टाकिज में लगातार दूसरे सप्‍ताह शान से चल रहा है आंखें। आप देखिए अपने परिवार यार दोस्‍तों को दिखाइये। फिल्‍म में हैं गोविंदा::, चंकी पांडेय।‘ इसी का असर था कि हम स्‍कूल से पैदल लौटते हुए भी इसी तरह चिल्‍लाते हुए अपने मौहल्‍ले तक पहुंचते थे।

एग्‍जाम के बाद फिल्‍म का साथ
नवीं क्‍लास के बाद हम लोग बडे बच्‍चों की गिनती में आ गए थे। वैसे टाकिज तक तो मैं रोज जाता था। मेरे शहर कि सार्वजनिक लाइब्रेरी भी उसी बि‍ल्डिंग में ही थी और मैं दसवीं तक रोज लाइब्रेरी रोज जाता था। दसवीं और उसके बाद तो एग्‍जाम के बाद पिक्‍चर देखना जाना बीएससी फाइनल ईयर के लास्‍ट एग्‍जाम तक उत्‍सव की तरह चला। यही वह दिन होता था जब मां को कहकर जाते कि खाना जल्‍दी बना दो पिक्‍चर देखने जाना है और छह से नौ बजे के शो के लिए भी वो कुछ न कहती थीं।

कोटा और हर टेस्‍ट
पीएमटी के लिए एक साल डॉप किया और कोचिंग करने हम कई दोस्‍त कोटा चले गए। कोचिंग में हर सात या चौदह दिन में रविवार को यूनिट के हिसाब से टेस्‍ट होता था। इसकी रैं‍किंग लिस्‍ट भी बनती थी। यानी टैस्‍ट होने तक मारकाट मची रहती थी। संडे को 3से 5 बजे तक टेस्‍ट हुआ करता था। और उसके बाद छह से नौ बजे तक के शो के लिए हम लोग ऑटो करके टॉकिज तक सबसे पहले पहुंचने की कोशिश करते। इस साल जितनी फिल्‍में मैंने टाकिज में देखीं उतनी एक साल में अभी तक कभी नहीं देखीं। घर से बाहर मनोरंजन का इकलौता साधन यही हुआ करता था। फिल्‍म के बाद लौटते और खाना खाकर सो जाते अगले दिन से पिफर वही भागदौड।
इस दौर में जुडवा जैसी हिट फिल्‍म भी देखी, तो जैकी श्राफ की भूला देनी वाली फिल्‍म ‘’ भी देख डाली। जुडवां की टिकट खिडकी पर मैंने पहली बार कोटा के टॉकिज में लोगों को डंडे खाते देखा।(मेरे अपने गांव राजगढ में टिकट जुगाडना मेरे लिए बडी बात नहीं थी। हमारे शहर का लाइब्रेरियन ही पार्ट टाइम टिकट कीपर हुआ करता था) बाद में इंतजार इतना करना पडा कि छह से नौ की टिकट नहीं‍ मिली तो जुडवा का नौ से बारह बजे का शो देखना पडा।

एक फिल्‍म और कई दिन की चुप्‍पी
फायर एक ऐसी फिल्‍म थी जिसने मेरे घर में काफी गफलत कराई। शायद बीएससी सैकंड ईयर की बात थी। मम्‍मी पापा शहर से बाहर थे। मैं और मेरा बडा भाई घर पर थे। भाई ने हम दोनों का खाना बनाया। मां घर पर नहीं होती तो हमेशा ऐसा ही होता था। इतने में मेरा एक दोस्‍त आया और बोला कि तगडी फिल्‍म लगी है फायर, देखने चलें क्‍या। मैंने उसके बारे में सुन रखा था, इसलिए मैंने उसे मना किया। मैंने कहा कि भाई को बोलकर चलेंगे क्‍या? पता नहीं कैसे हुए कि भाई के दोस्‍तों ने भी फिल्‍म का प्‍लान बना रखा था। मेरी तो अपने भाई से ज्‍यादा खुला हुआ नहीं था पर मेरे दोस्‍त ने उनसे कहा कि हम फिल्‍म देखने जा रहे हैं आप भी चलो। उन्‍होंने कहा कि हां मुझे भी जाना है। मेरे हिसाब से उन्‍हें तब तक फायर की स्‍टोरी लाइन का पता नहीं था। हम दोनों चले गए। छोटा शहर था एक ही हॉल था बॉक्‍स में 25 के आसपास ही सीट थी। हम दोनों भाई एक लाइन में ही आगे पीछे ही बैठे थे। फिल्‍म में जब शबाना आजमी और नंदिता दास के अंतरंग दृश्‍य आने लगे तो मैंने दोस्‍त से कहा यार चल यहां से भाई भी यही हैं, अच्‍छा नहीं लगता। दोस्‍त नहीं उठा, हम कुछ करते इससे पहले ही हमारे भाई की मित्र मंडली में से मेरे भाई सहित कुछ लोग बाहर चले गए। और मैं नौ बजे पूरी फिल्‍म देखकर ही घर लौटा। भाई ने लौटने के बाद कुछ नहीं पूछा, घर में शांति रही। और हम दोनों भाइयों ने शरमाशर्मी में कई दिन तक आपस में बात भी नहीं की।
मेरी दिल्‍ली
2002 से 2005 तक दिल्‍ली-नोएडा रहा। तीन साल में टॉकिज पर बमुश्किल आठ-दस फिल्‍में देखी होंगी, लेकिन अगर टीवी पर देखी गई फिल्‍में मिलाकर कहूं तो शायद अपने जीवन की सबसे ज्‍यादा फिल्‍में मैंने इन्‍हीं दिनों में देखीं।
दिल्‍ली में शुरुआती दिन थे, मैं दिल्‍ली के बारे में ज्‍यादा कुछ नहीं जानता था। ऑफ वाले दिन मयूर विहार से सीधी बस में बैठकर कनॉट प्‍लेस के लिए निकलता। रीगल में अगर कोई ठीकठाक फिल्‍म होती तो देख लेता, क्‍यूंकि अकेले या किसी एक और दोस्‍त के साथ कहीं और टॉकिज ढूंढने से अच्‍छा यही होता। अग्निवर्षा जैसी फिल्‍म मैंने इसी टाकिज में देखी। कोंडली से दरियागंज में गोलछा तक पहुंचना आसान हुआ करता था, देवदास इसी हॉल में देखी गई।
इन्‍हीं दिनों की बात है मुगल ए आजम कलर में दोबारा रिलीज हुई। अट़टा पर नोएडा में पहला म‍ल्‍टीप्‍लेक्‍स बनकर तैयार हुआ। बचपन से ही इस फिल्‍म को बडे पर्दे पर देखने की इच्‍छा थी। इसलिए री रिलीज के अगले दिन ही हम देखने पहुंच गए। फिल्‍म में मजा भी आया पर मेरे पीछे बैठे एक प्रेमी युगल की कलाकारी और फिल्‍म में उर्दू के डायलॉग का मजाक उडाना बीच बीच में परेशान करता रहा।

एमजेएमसी की मस्‍ती
सही मायनों में फिल्‍म को मस्‍ती करते हुए एंजाय करना मैंने इन्‍हीं दिनों में सीखा । सत्‍तर अस्‍सी रुपए से ज्‍यादा की टिकट खरीदकर ग्रुप में फिल्‍म देखने का मजा यहीं लिया। धूम और रंग दे बसंती जैसी फिल्‍में देखीं। सही मायनों में यही वही ऐज थी जब मैं नौकरी करते हुए फिर से कॉलेज लाइफ जी रहा था और हम एक साथ लडके, लडकियां यूनिवर्सिटी के बाद आमतौर पर बिना किसी को बताए हुए ही फिल्‍म चले जाते थे।
पीसी और फिल्‍में
2005 और उसके बाद सीडिज इतनी सुलभ हो गई कि कई सालों से जिन जिन फिल्‍मों का नाम सुना था, देख नहीं पाया। वे सभी कम्‍प्‍यूटर पर देखीं। वाटर, मैंने गांधी को नहीं मारा, निशब्‍द जैसे विवादास्‍पद फिल्‍में शामिल है। और अब लैपटॉप लेने के बाद तो फिल्‍म देखना और आसान हो गया है। मैंने जुरासिक पार्क से लेकर पुरानी देवदास तक जो मेरा मन करता है। कहीं से भी पैन डाइव सीडी, नेट या किसी की हार्ड डिस्‍क कॉपी करके देखीं। दो घंटे या उससे थोडे ज्‍यादा में फिल्‍म खत्‍म। यानी कुल मिलाकर अब फिल्‍म देखना आसान हो गया है।
:::और अब
टाकिज में अकेले जाने का मन नहीं करता और फिल्‍म देखना इतना महंगा हो गया है कि अब सावरिया, गजनी, वैलकम टू सज्‍जनपुर जैसे अच्‍छी और बडे बजट वाली फिल्‍में ही टॉकिज में देखता हूं। बाकी लैपटॉप पर देखकर ही काम चला लेता हूं।