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Saturday, January 31, 2009

दरअसल:मखौल बन गए हैं अवार्ड समारोह

-अजय ब्रह्मात्मज
पहली बार किसी ने सार्वजनिक मंच से अवार्ड समारोहों में चल रहे फूहड़ संचालन के खिलाफ आवाज उठाई है। आशुतोष गोवारीकर ने जोरदार तरीके से अपनी बात रखी और संजीदा फिल्मकारों के उड़ाए जा रहे मखौल का विरोध किया। साजिद खान और फराह खान को निश्चित ही इससे झटका लगा होगा। उम्मीद है कि भविष्य में उन्हें समारोहों के संचालन की जिम्मेदारी देने से पहले आयोजक सोचेंगे और जरूरी हिदायत भी देंगे।
पॉपुलर अवार्ड समारोहों में मखौल और मजाक के पीछे एक छिपी साजिश चलती रही है। इस साजिश का पर्दाफाश तभी हो गया था, जब शाहरुख खान और सैफ अली खान ने सबसे पहले एक अवार्ड समारोह में अपनी बिरादरी के सदस्यों का मखौल उड़ाया था। कुछ समय पहले सैफ ने स्पष्ट कहा था कि उस समारोह की स्क्रिप्ट में शाहरुख ने अपनी तरफ से कई चीजें जोड़ी थीं। मुझे बाद में समझ में आया कि वे उस समारोह के जरिए अपना हिसाब बराबर कर रहे थे। आशुतोष गोवारीकर और साजिद खान के बीच मंच पर हुए विवाद को आम दर्शक शायद ही कभी देख पाएं, लेकिन उस शाम के बाद अवश्य ही साजिद जैसे संचालकों के खिलाफ एक माहौल बना है।
गौर करें, तो साजिद और उन जैसे संचालक गंभीर और संवेदनशील फिल्मकारों को ही अपना निशाना बनाते रहे हैं। कभी उनकी फिल्मों के नाम से, तो कभी फिल्मों की थीम का उल्लेख कर हंसी-मजाक करते रहे हैं। इस हंसी-मजाक में उनके गंभीर प्रयासों का मखौल उड़ाया जाता है। कोशिश यही रहती है कि खास तरह के सिनेमा और खास समूह के फिल्मकारों की फिल्मों की धज्जियां उड़ाई जाएं और इस तरह साधारण और पॉपुलर किस्म की फिल्मों का माहौल तैयार किया जाए। दरअसल, यह बहुत ही खतरनाक साजिश है। मंच और समारोहों तक ही यह मखौल सीमित नहीं रहता। उनकी फिल्मों के अंदर भी ऐसे दृश्य और रेफरेंस रखे जाते हैं।
करण जौहर, शाहरुख खान और उनके आसपास के सितारे और डायरेक्टर इस मखौल से बचे रहते हैं। उन्हें कभी निशाना नहीं बनाया जाता। वास्तव में, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में समूहबाजी तेजी से बढ़ी है। पॉपुलर सितारों के आसपास मतलबी किस्म के लोगों की भीड़ लगी रहती है। इस भीड़ में छोटे स्टार, डायरेक्टर, निर्माता और यहां तक कि पत्रकार भी शामिल होते हैं। कहते हैं कि अपने अवार्ड समारोहों में सितारों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए मीडिया समूह भी इस गुटबाजी का हिस्सा बन जाते हैं। सभी अपने-अपने स्वार्थो के वशीभूत साजिश में शामिल होते हैं और एक घिनौना कुचक्र चलता रहता है। इस कुचक्र में विरोधी खेमों के स्टारों और फिल्मों पर छींटाकशी की जाती है। उन्हें आड़े हाथों लिया जाता है और बगैर संदर्भ के वनलाइनर के जरिए उन्हें हंसी का मसाला भी बना दिया जाता है। एक लॉजिक दिया जाता है कि चूंकि सारे अवार्ड समारोह और इवेंट टीवी चैनलों से प्रसारित होते हैं, इसलिए टीवी प्रसारण में दर्शकों को जोड़े रखने के लिए हंसी का माहौल रहना चाहिए। किसी भी अवार्ड समारोह में विजेताओं को फिल्म पर ज्यादा बोलने की अनुमति नहीं दी जाती। बहाना रहता है कि समय कम है। सब कुछ जल्दी-जल्दी समेटना है। ऐसी सूरत में हम क्रिएटिव लोगों के विचार और अनुभव नहीं सुन पाते। हां, परफॉर्मेस जरूर दिखाया जाता है, ताकि दर्शक टीवी से चिपके रहें और टीआरपी बढ़ती रहे।
धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है कि सारे अवार्ड समारोह सिर्फ टीवी इवेंट बन कर रह जाएंगे। उनमें न तो उल्लेखनीय फिल्मों की कद्र होगी और न किसी कलाकार के अभिनय को ही सराहा जाएगा! स्टारों को खुश करने और उन्हें समारोह में मौजूद रखने के लिए पुरस्कारों की झटपट कैटॅगरी तैयार कर ली जाएगी। देखा गया है कि समारोह में आए सभी स्टारों को किसी न किसी तरीके से मंच पर बुला ही लिया जाता है और कुछ नहीं, तो उन्हें पुरस्कार देने का काम सौंप दिया जाता है। पहले से न तो कोई सूची बनी रहती है और न ही ऐसी तैयारी होती है कि फिल्म बिरादरी से जुड़े सभी सदस्य आएं। अवार्ड समारोह और उसके संचालन को लॉफ्टर शो में तब्दील कर रही सोच पर आशुतोष गोवारीकर ने आपत्ति की है। उन्होंने जरूरी पहल तो कर दी है। अब इसे आगे ले जाने और मखौल को पूरी तरह से रोकने की जिम्मेदारी फिल्म बिरादरी पर है। अब देखते हैं कि आशुतोष गोवारीकर के समर्थन में फिल्म बिरादरी के लोग कदम आगे बढ़ाते हैं या नहीं?

फ़िल्म समीक्षा:लक बाई चांस


फिल्म इंडस्ट्री की एक झलक

-अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से हम सभी वाकिफ हैं। इस इंडस्ट्री के ग्लैमर, गॉसिप और किस्से हम देखते, सुनते और पढ़ते रहते हैं। ऐसा लगता है कि मीडिया सिर्फ सनसनी फैलाने के लिए मनगढंत घटनाओं को परोसता रहता है। 'लक बाई चांस' देखने के बाद दर्शक पाएंगे कि मीडिया सच से दूर नहीं है। यह किसी बाहरी व्यक्ति की लिखी और निर्देशित फिल्म नहीं है। यह जोया अख्तर की फिल्म है, जिनकी सारी उम्र इंडस्ट्री में ही गुजरी है। उन्होंने बगैर किसी दुराव, छिपाव या बचाव के इंडस्ट्री का बारीक चित्रण किया है। लेकिन उनके चत्रिण को ही फिल्म इंडस्ट्री की वास्तविकता न समझें। यह एक हिस्सा है, जो जोया अख्तर दिखाना और बताना चाहती हैं।

विक्रम (फरहान अख्तर) और सोना (कोंकणा सेन शर्मा) फिल्म इंडस्ट्री में पांव टिकाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दोनों की कोशिश और कामयाबी के अलग किस्से हैं। वे दोनों कहीं जुड़े हुए हैं तो कहीं अलहदा हैं। विक्रम चुस्त, चालाक और स्मार्ट स्ट्रगलर है। वह अपना हित समझता है और मिले हुए अवसर का सही उपयोग करता है। फिल्म में पुराने समय की अभिनेत्री नीना का संवाद है 'कोई भी किसी का कुछ नहीं होताÓ। फिल्म इंडस्ट्री में बनते-बिगड़ते रिश्तों पर इस से संक्षिप्त और सारगर्भित टिप्पणी नहीं हो सकती। सोना थोड़ी भावुक और रिश्तों पर भरोसा करने वाली लडक़ी है। इसी कारण इस निष्ठुर इडस्ट्री में वह बार-बार सदमों का शिकार होती है। आखिरकार उसकी समझ में आता है कि अपनी भलाई ही आखिरी भलाई है। विक्रम और सोना की इस यात्रा में हम फिल्म इंडस्ट्री के अन्य किरदारों से भी वाकिफ होते हैं। उनकी असुरक्षा ही मुख्य रूप से उभरती है। लेखक से लेकर फिल्म स्टार तक काम और कामयाबी के लिए कोई भी चाल चल सकते हैं।

जोया अख्तर ने उपयुक्त कास्टिंग की है। स्ट्रगलर विक्रम की भूमिका में फरहान अख्तर जंचते हैं। इस फिल्म में वे 'रॉक ऑन' से ज्यादा विश्वसनीय लगे हैं। उनका आत्मविश्वास और हर तरह के दृश्य में उनकी सहजता प्रभावित करती है। मुमकिन है कि वे अलग किस्म के अभिनेता के तौर पर दमदार तरीके से उभरें। कोंकणा सेना शर्मा एक बार फिर अपनी प्रतिभा की झलक देती हैं। भावुक और नाटकीय दृश्यों में उनके चेहरे के बदलते भाव दृश्यों को जोरदार बना देते हैं। यह फिल्म ऋषि कपूर और डिंपल कपाडिय़ा के लिए भी उल्लेखनीय होगी। 'बॉबी' की जोड़ी को उम्रदराज भूमिकाओं में एक साथ देखना रोचक रहा। अतिथि भूमिकाओं में शाहरुख खान को अच्छे तरीके से पेश किया गया है। बाकी अभिनेताओं का उपयोग स्क्रिप्ट के मुताबिक है। उनमें उनकी व्यक्तिगत खासियत दर्ज नहीं होती। हां, रितिक रोशन स्थापित स्टार जफर खान के अहं और अहंकार को भलीभांति निभाते हैं।

'लक बाई चांस' में फिल्म शुरू होने के साथ स्याह और उदास चेहरों के जो स्लाइड दिखाए जाते हैं, उनके विस्तार में जोया नहीं गयी हैं। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के अंदरूनी संघर्ष, निराशा और साजिशों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। उनकी स्क्रिप्ट मुख्य रूप से निर्माता, डायरेक्टर, स्टार और स्ट्रगलर के बीच ही घूमती रहती है। फिल्म के संवाद विशष तौर पर उल्लेखनीय हैं। जावेद अख्तर के शब्द कानों में गीत की तरह गूंजते हैं - मौके मिलते नहीं, बनाए जाते हैं ... कामयाबी आती नहीं, हमें कामयाबी तक जाना होता है ... अपने रास्ते चलते रहो, सब उस रास्ते पर चले आएंगे ...। 'लक बाई चांस' में फिल्म इंडस्ट्री की प्रचलित जानकारियों के कई रेफरेंस हैं। सिनेप्रेमी दर्शक उन्हें जानते हैं, इसलिए फिल्म कारगर तरीके से कम्युनिकेट करती है।

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Friday, January 30, 2009

फ़िल्म समीक्षा:विक्ट्री

पुरानी शैली में नई कोशिश
-अजय ब्रह्मात्मज

अजीतपाल मंगत ने क्रिकेट के बैकग्राउंड पर महेंद्र सिंह धौनी और युवराज सिंह जैसे क्रिकेटर विजय शेखावत की जिंदगी के जरिए एक सामान्य युवक के क्रिकेट स्टार बनने में आई मुश्किलों, अड़चनों, भटकावों और पश्चाताप के प्रसंग रखे हैं। विक्ट्री की पृष्ठभूमि नई है, लेकिन मुख्य किरदार, घटनाएं और निर्वाह पुराना और परिचित है। इसी कारण इरादों और मेकिंग में अच्छी होने के बावजूद फिल्म अंतिम प्रभाव में थोड़ी कमजोर पड़ जाती है।
विजय (हरमन बावेजा) की आंखों में एक सपना है। यह सपना उसके पिता ने बोया है। जैसलमेर जैसे छोटे शहर में रहने के बावजूद वह टीम इंडिया का खिलाड़ी बनना चाहता है। संयोग और कोशिश से वह स्टार बन जाता है, लेकिन स्टारडम का काकटेल उसे भटका देता है। अपनी गलती का एहसास होने पर उसे पश्चाताप होता है। वह फिर से कोशिश करता है और एक बार फिर बुलंदियों को छूता है।
विजय के संघर्ष, भटकाव और सुधार के प्रसंगों में नयापन नहीं है। अजीतपाल के दृश्य विधानों में मौलिकता की कमी हैं। नैरेशन की पुरानी शैली पर चलने के कारण वे अधिक प्रभावित नहीं कर पाते। अमृता राव का चरित्र अच्छी तरह से विकसित नहीं किया गया है। फिर भी उन्होंने निराश नहीं किया है। अनुपम खेर ने पिता की भूमिका में कस्बाई नैतिकता के गुणों को अच्छी तरह प्रदर्शित किया है। गुलशन ग्रोवर, अरुण बख्शी और दिलीप ताहिल सामान्य हैं। फिल्म में क्रिकेट खिलाडि़यों का सुंदर उपयोग किया गया है। चुस्त पटकथा में अजीतपाल सभी क्रिकेटरों को फिल्म का हिस्सा बना देते हैं। ब्रैट ली और हरभजन सिंह फिल्म के किरदार ही लगते हैं। हरमन बावेजा क्रिकेटर की भूमिका में पक्के खिलाड़ी लगते हैं। लेकिन नाटकीय दृश्यों में थोड़े कमजोर हैं।
फिल्म कस्बे, छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के दर्शकों को पंसद आ सकती है, क्योंकि उनकी आकांक्षाओं को समेटती यह फिल्म नैतिकता के सबक देती है।
रेटिंग : **1/2

Monday, January 26, 2009

हिन्दी टाकीज:पर्दे में खो जाने का आनंद अजीब होता है-गिरीन्द्र

हिन्दी टाकीज-२२
इस बार गिरीन्द्र ने अपने संस्मरण लिखे हैं.गिरीन्द्र का एक ब्लॉग है]जिसका नाम उन्होंने अनुभव रखा है। अपने बारे में वे लिखते मैथिली में कहूं तो- 'कहबाक कला सीखे छी'। वैसे हर पल सीखने की चाहत रखता हूं। गांव पसंद है और शहर में इंटरनेट से जुड़ा कंप्यूटर। किताबें,गजलें और गाड़ी के पीछे की सीट पर बैठकर सड़कों को देखना पसंद है। ईमेल है- girindranath@gmail।com और बात करने का नंबर- 09868086126
सिनेमा घर, टॉकिज और न जाने लोग इस लाजबाब घर को क्या से क्या कहते हैं, लेकिन हमारे शहर में लोग इसे कहते हैं- सिलेमा घर। मैं इससे दूर ही रहा, काफी कम जाना होत था। याद करने की कोशिश करता हूं तो शायद 1987 में पहली बार सिनेमा देखने हॉल गया था। उस समय किशनगंज के एक हॉस्टल में पढाई करता था। छुट्टी में अपने शहर पूर्णिया आया था और सिनेमा देखने हॉल गया,लेकिन छह वर्ष की अवस्था में सिनेमा को सिलेमा हॉल में समझ नहीं पा रहा था। फिर नंबे के दशक में फिल्मों से मोहब्बत शुरू हुई और फिल्म महबूबा बन गई। छु्ट्टी में शहर आने का मतलब एक-दो सिनेमा देखना था। दोस्तों के साथ हम सिनेमा हॉल पहुंचते थे। पहली बार ज्ञान से कयामत से कयामत तक फिल्म देखी। पापा कहते हैं, गीत का क्रेज था, हम तो जैसे खुद को ही पर्दे पर देखने लगे थे। पूर्णिया में एक हॉल है-फॉर स्टार। हम वहीं पहली बार सिनेमा के साथ जवान हुए थे।
पूर्णिया में कुळ तीन सिनेमा हॉल है। लेकिन सभी की दुनिया एक सी है। फोर स्टार तीनों में सीटों के एरेजमेंट को लेकर अव्वल है। यहां कभी कभार एसी भी चल उठता है। लेकिन अन्य दो चित्रवाणी और रुपवाणी एक आम सिनेमा हॉल है। आप इन हॉलों में सिनेमा को महसूस भी कर सकते हैं, जिसकी कमी महानगरों में खलती है। इन सिनेमघरों से अब हिंदी फिल्में दूर होती जा रही है। भोजपुरी फिल्मों ने यहां पैठ बना ली है।
वैसे सिनेमा हॉल जाकर सिनेमा देखना लगातार जारी नहीं रह सका। हम छुट्टियों में घर कम आने लगे थे। जब याद करता हूं कि कौन सी फिल्म अपने घर वालों के साथ देखी तो गदर की याद आती है। बहनों के साथ पहली बार सिनेमा हॉल जाकर मैंने फिल्म देखी थी। हालांकि सन्नी देओल के एक्शन पर हॉल में इतनी सीटियां बज रही थी कि मैं खुद को असहज महसूस करने लगा था। खैर, सिनेमा हॉल में सपरिवार फिल्म देखने का एक अलग ही आनंद होता है।
सिनेमा के साथ जवानी का रंग चढ़ा दिल्ली आकर। दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान हम मुखर्जी नगर में रहा करते थे। वहां है एक बतरा सिनेमा। हम उसे मक्का कहा करते थे। हर शुक्रवार नई फिल्मों को देखना, इसे हम अपना धर्म समझते थे। कोई भी फिल्म हो, उसे छोड़ेन का सवाल ही नहीं होता था। घर से आए पैसों को असल सदुपयोग हम बतरा के कॉउंटर पर ही करते थे। उत्तरी दिल्ली के अधिकतर सिनेमा हॉलों में आना-जाना लगा रहा। दिल्ली में सिनेमा हॉल को मल्टीप्लेक्स बनते हमने देखा है। सच कहूं, दिल्ली और एनसीआर के तकरीबन सभी मल्टीप्लेक्सों में फिल्में देखी है, लेकिन जो मजा मुझे बतरा में देखने में आता है वह कहीं नहीं है। बतरा का क्रेज यह था कि रोड जैसी फिल्म को भी हम छोड़ते नहीं थे। फिल्म देखना और वो भी सिनेमा घर में, इसका जो आनंद है न उसे आप या हम शब्दों में बयां नहीं कर सकते हैं।
घुप्प अंधेर में तीन घंटे सिनेमा घर में चुपचाप पर्दे में खो जाने का आनंद अजीब होता है, जिसे हम केवल महसूस कर सकते हैं। यह अहसास जगह बदलने से नहीं बदलता है। मुंबई हो या दिल्ली या फिर कानपुर या पूर्णिया। इन जगहों के अलग-अलग सिनेमा घरों में सिने प्रेमियों को सिनेमा देखना का एक ही आनंद प्राप्त होगा। भले ही कहीं सीट पतली हो तो कहीं मोटी लेकिन जनाब पर्दे पर सिनेमा तो वही रहेगा न।

Saturday, January 24, 2009

फ़िल्म समीक्षा-राज़

-अजय ब्रह्मात्मज
डर व सिहरन तो है लेकिन..
राज-द मिस्ट्री कंटीन्यूज में मोहित सूरी डर और सिहरन पैदा करने में सफल रहे हैं, लेकिन फिल्म क्लाइमेक्स में थोड़ी ढीली पड़ जाती है। इसके बावजूद फिल्म के अधिकांश हिस्सों में मन नहीं उचटता। एक जिज्ञासा बनी रहती है कि जानलेवा घटनाओं की वजह क्या है? अगर फिल्म के अंत में बताई गई वजह असरदार तरीके से क्लाइमेक्स में चित्रित होती तो यह फिल्म राज के समकक्ष आ सकती थी।
नंदिता (कंगना रानाउत) और यश (अध्ययन सुमन) एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं। नंदिता का सपना है कि उसका एक घर हो। यश उसे घर के साथ सुकून और भरोसा देता है, लेकिन तभी नंदिता के जीवन में हैरतअंग्रेज घटनाएं होने लगती हैं। हालांकि उसे इन घटनाओं के बारे में एक पेंटर पृथ्वी (इमरान हाशमी) ने पहले आगाह कर दिया था। आधुनिक सोच वाले यश को यकीन नहीं होता कि नंदिता किसी प्रेतात्मा की शिकार हो चुकी है। नंदिता अपनी मौत से बचने के लिए पृथ्वी का सहारा लेती है और कालिंदी नामक गांव में पहुंचती है। उसे पता चलता है कि एक आत्मा अपने अधूरे काम पूरे करने के लिए ही यह सब कर रही है। उसका मकसद गांव के पास स्थित कीटनाशक फैक्ट्री को बंद करवाना है, ताकि वार्षिक मेले में एकत्रित होने वाले श्रद्धालु कुंड के विषैल जल से बीमार न हों।
मोहित सूरी ने आस्तिक और नास्तिक दोनों तरह के दर्शकों को फिल्म से जोड़ने की कोशिश की है जिसके लिए कबीर के दोहों का सहारा लिया गया है, लेकिन क्लाइमेक्स में निर्देशन कमजोर पड़ जाने के कारण हॉरर फिल्म का रोमांच चला जाता है। कहीं-कहीं नकल भी की गई है। विक्रम भट्ट ने 1920 में भूत को भगाने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करवाया था, तो इस फिल्म में मोहित ने किरदारों के हाथ में गीता थमा दी है। शापित युवती की भूमिका के साथ कंगना ने न्याय किया है। सीरियल किसर इमेज से उबरे इमरान हाशमी अच्छे लगते हैं। फिल्म की उपलब्धि अध्ययन सुमन हैं। उनका आत्मविश्वास पर्दे पर दिखता है। मुश्किल दृश्यों में नए होने के कारण लड़खड़ाने के बावजूद पर्दे पर उनका आत्मविश्वास झलकता है।
**1/2

फ़िल्म समीक्षा:स्लमडाग करोड़पति

-अजय ब्रह्मात्मज

मुंबई की मलिन बस्ती में प्रेम

आस्कर के लिए दस श्रेणियों में नामांकित हो चुकी 'स्लमडाग मिलिनेयर' हिंदी में 'स्लमडाग करोड़पति' के नाम से रिलीज हुई है। अंग्रेजी और हिंदी में थोड़ा फर्क है। गालियों के इस्तेमाल के कारण 'स्लमडाग मिलिनेयर' को ए सर्टिफिकेट मिला है, जबकि 'स्लमडाग करोड़पति' को यू-ए सर्टिफिकेट के साथ रिलीज किया गया है। शायद निर्माता चाहते हों कि 'स्लमडाग करोड़पति' को ज्यादा से ज्यादा हिंदी दर्शक मिल सकें।
'स्लमडाग करोड़पति' विकास स्वरूप के उपन्यास 'क्यू एंड ए' पर आधारित है। फिल्म की स्क्रिप्ट के हिसाब से उपन्यास में कुछ जरूरी बदलाव किए गए हैं और कुछ प्रसंग छोड़ दिए गए हैं। उपन्यास का नायक राम मोहम्मद थामस है, जिसे फिल्म में सुविधा के लिए जमाल मलिक कर दिया गया है। उसकी प्रेमिका भी लतिका नहीं, नीता है। इसके अलावा उपन्यास में नायक के गिरफ्तार होने पर एक वकील स्मिता शाह उसका मामला अपने हाथ में लेती है। उपन्यास में राम मोहम्मद थामस धारावी में पला-बढ़ा है। फिल्म में उसे जुहू का बताया गया है। उपन्यास की शुरूआत में ही पता चलता है कि राम सभी सवालों के जवाब देकर एक अरब जीत चुका है। यह घटना शो आरंभ होने के कुछ हफ्तों के अंदर हो गयी है, जबकि शो के निर्माताओं ने सोचा था कि आठ महीनों के बाद कोई विजेता बनेगा। शो के निर्माताओं के पास विजेता को देने के लिए एक अरब रूपए नहीं है, इसलिए भी वे राम मोहम्मद थामस को धोखेबाज साबित करने में लगे हैं। यह एक बड़ी साजिश है,जो फिल्म से गायब है।
उपन्यास से इस फर्क के बावजूद जमाल मलिक (देव पटेल) की कहानी दिल को छूती है। मुंबई शहर की निचली बस्तियों का पुरजोश जीवन इस फिल्म का आधार है। विषम परिस्थितियों में भी इस बस्ती के लोगों की जिजीविषा प्रेरित करती है। इन मलिन बस्तियों में हर कदम उम्मीद धडक़ती रहती है और वही उन्हें जिंदा रखती है। जमाल मलिक और सलीम मलिक दोनों भाइयों की जिंदगी दो दिशाओं में मुड़ती है, फिर भी प्रेम, विश्वास और आशा से वे बंधे रहते हैं। जमाल मलिक के दिए सही जवाब वास्तव में सवालों के साथ उसकी जिंदगी की घटनाओं से जुड़ जाते हैं, जिसे फिल्म के नायक और निर्देशक नसीब की बात कहते हैं। जमाल की किस्मत में लिखा था कि वह करोड़पति बन जाएगा। चित्रण और फिल्मांकन की वास्तविकता के बावजूद यह सोच उन बस्तियों के बाशिंदों के जीवन संघर्ष को बेमानी ठहरा देती है। अगर नसीब और किस्मत का लिखा ही होता है तो फिर मनुष्य के सारे प्रयासों का कोई प्रयोजन नहीं बनता।
'स्लमडाग करोड़पति' पर आधारहीन विवाद हुए हैं। अमिताभ बच्चन के साथ जुड़े प्रसंग में तथ्यों की गलत व्याख्या की गयी। इस फिल्म में गरीबी, मुंबई की निचली बस्ती और निचली बस्तियों के सारे कुकर्म हैं। उन्हें निर्देशक डैनी बॉयल ने अपने नजरिए से पेश किया है। डैनी ने फिल्म के लिए इसी उपन्यास को चुना, इससे स्पष्ट हो जाता है कि वे किस उद्देश्य और मंशा के साथ
फिल्म बना रहे थे। 'स्लमडाग करोड़पति' एक विदेशी के नजर से चित्रित भारत है, जो एक भारतीय उपन्यासकार की कृति पर आधारित है।
'स्लमडाग करोड़पति' एक स्तर पर जमाल और लतिका की प्रेमकहानी भी है। दोनों का प्रेम कामयाब होता है और वे अंत में मिल जाते हैं। अवसाद का सुखद अंत होता है।

फिल्म में मलिक भाइयों की भूमिका में देव पटेल और मधुर मित्तल ने शानदार अभिनय किया है। लतिका की भूमिका में फ्रेइदा पिंटो स्वाभाविक हैं। क्विज शो के होस्ट के रूप में संवादों और मुद्राओं में अनिल कपूर 'कौन बनेगा करोड़पति' के पहले मेजबान अमिताभ बच्चन से प्रेरित हैं। इरफान खान छोटी भूमिका में प्रभाव पैदा करते हैं। वे दृश्य की बारीकियों को अच्छी तरह समझ लेते हैं। सौरभ शुक्ला और महेश मांजरेकर ने समुचित जिम्मेदारी निभायी है।
फिल्म का पाश्र्व संगीत और गीत-संगीत विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। ए आर रहमान ने ध्वनियों के सुनिश्चित क्रम एवं आरोह-अवरोह से दृश्यों का प्रभाव बढ़ा दिया है। फिल्म के अंत में टायटल के साथ आया गीत 'जय हो' खुशी और जोश का संचार करता है।

Friday, January 23, 2009

दरअसल:जल्दी ही टूटेगा गजनी का रिकार्ड

-अजय ब्रह्मात्मज

मंदी के इस दौर में गजनी के रिकार्ड तोड़ कलेक्शन से कुछ संकेत लिए जा सकते हैं। गजनी की मार्केटिंग, पॉपुलैरिटी और स्वीकृति से निस्संदेह इसके निर्माताओं को फायदा हुआ। साथ ही देश के वितरक और प्रदर्शकों को भी लाभ हुआ। गजनी ने हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या बढ़ा दी है। यह संख्या घटने पर भी अंतिम प्रभाव में हिंदी फिल्मों के व्यवसाय का विस्तार करेगी। यकीन करें, गजनी के कलेक्शन के रिकार्ड को टूटने में अब आठ या पंद्रह साल का वक्त नहीं लगेगा। बमुश्किल दो सालों में ही कोई फिल्म तीन अरब का कलेक्शन कर सकती है।
अपनी लोकप्रियता के कारण गजनी इवेंट फिल्म बन गई है। कुछ दिनों पहले तक यह आम सवाल था कि आपने गजनी देखी क्या? ऐसी फिल्में अपनी प्रतिष्ठा (लोग इसे पॉपुलैरिटी या ब्रैंडिंग भी कह सकते हैं) से नए दर्शक तैयार करती हैं। नए दर्शकों का एक हिस्सा कालांतर में फिल्मों का स्थायी दर्शक बनता है। हर दशक में अभी तक एक-दो फिल्में ही इस स्तर तक पहुंच सकी हैं। आने वाले सालों में ऐसी इवेंट फिल्मों की संख्या में वृद्धि होगी, क्योंकि उन्हें दर्शकों का समर्थन मिलेगा। हिंदी फिल्मों का आम दर्शक एक भावनात्मक कहानी चाहता है। प्रेम, परिवार और संबंध वाली इमोशनल फिल्में ही सर्वाधिक लोकप्रिय होती रही हैं। गजनी में भी इमोशन है। एकसामान्य-सी लड़की ढोंग करती है कि उसे एक अमीर लड़का प्यार करता है। वह अमीर लड़का उससे मिलता है, तो उसकी सादगी और संस्कारों का दीवाना बन जाता है। वह अभी अपना भेद खोले, इसके पहले ही लड़की की हत्या हो जाती है और फिर लड़का अल्पावधि स्मृतिलोप का शिकार हो जाता है। वह आखिरकार खलनायक से बदला लेने में सफल होता है। ऐसी कहानियों को अगर सधे कलाकारों का साथ मिल जाए, तो दर्शक उन्हें अपना लेते हैं।
गजनी का कलेक्शन 2008-09 का मानदंड है। संभव है, इसी दशक में यह मानदंड टूट जाए। इस संभावना के ठोस आधार हैं। इंटरनेशनल बाजार पर छाई मंदी से विश्व देर-सबेर बाहर निकला। आवश्यक आर्थिक संतुलन के बाद फिर से बाजार में पैसा आएगा। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री इसी बाजार में है। उत्तर भारत में इन दिनों मल्टीप्लेक्स में क्रमश: बढ़ोत्तरी हो रही है। सभी प्रांतों की राजधानियों में मल्टीप्लेक्स का निर्माण हो रहा है। यहां तक कि हिंदी प्रदेशों के जिला शहरों में भी मॉल और मल्टीप्लेक्स तैयार हो रहे हैं। जाहिर है कि मल्टीप्लेक्स चालू होंगे, तो दर्शक मोटी रकम देकर टिकट खरीदेंगे ही। यह मोटी रकम कलेक्शन को बढ़ाने का काम करेगी। जैसे-जैसे सिनेमाघरों की स्थिति अच्छी होगी, वैसे-वैसे सिनेमाघरों में दर्शकों की तादाद बढ़ेगी। अभी उत्तर भारत में ज्यादातर दर्शक डीवीडी-वीसीडी के जरिए ही फिल्में देखते हैं। इसमें पैसों की बचत के साथ ही उनकी मजबूरी भी है। उत्तर भारत के अधिकांश सिनेमाघरों में पारंपरिक और महिला दर्शकों की संख्या 15-20 प्रतिशत से अधिक नहीं रहती। सिनेमाघरों के बेहतर होने और सुरक्षित माहौल मिलने पर महिला दर्शक भी सिनेमाघरों में जाने के लिए उत्सुक होंगी।
गजनी के 1450 प्रिंट जारी हुए थे, जिन्हें 1700 पर्दो पर दिखाया गया। मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन की संख्या बढ़ेगी, तो प्रिंट की संख्या भी बढ़ेगी। सन 2009 में ही 2000 पर्दो तक फिल्मों का प्रदर्शन बढ़ जाएगा। डिजिटल प्रदर्शन की सुविधाओं की वजह से देश के दूर-दराज के इलाकों के सिनेमाघर भी मुंबई और दूसरे केंद्रों से जुड़ जाएंगे। छोटे शहरों और कस्बों के दर्शकों के लिए भी संभव होगा कि वे उसी शुक्रवार को हर फिल्म का आनंद उठा सकें। ऐसी सहूलियत होने पर उन्हें पैसे खर्च करने में दिक्कत नहीं होगी। गजनी के कलेक्शन ने इस तरह के संकेत दिए हैं।
कह सकते हैं कि आने वाला समय हिंदी फिल्मों के व्यवसाय और दर्शकों के मनोरंजन के लिए सुनहरा समय होगा। दर्शकों को तत्काल भरपूर मनोरंजन मिलेगा और फिल्म निर्माताओं को व्यवसाय। ..और जब दोनों की जरूरतें पूरी होंगी, तब आखिरकार हिंदी फिल्में जरूर समृद्ध होंगी।

Wednesday, January 21, 2009

हिन्दी टाकीज:मन के अवसाद को कम करता है सिनेमा-डॉ मंजु गुप्ता

हिन्दी टाकीज-२१
हिन्दी टाकीज में इस बार डॉ मंजु गुप्ता के संस्मरण..डॉ गुप्ता दर्शन शास्त्र की प्राध्यापिका हैं.वे मुंगेर के आरडी एंड डीजे कॉलेज में पढ़ाती है। सिनेमा और साहित्य में उनकी रुचि है.चवन्नी के आग्रह को उन्होंने स्वीकार किया और यह संस्मरण भेजा.उनकी कहानियो का संग्रह मुठभेड़ नाम से प्रकाशित हो चुका है.उन्होंने भरोसा दिया है कि वे भविष्य में भी सिनेमा पर कुछ लिखेंगीं चवन्नी के लिए।
जीवन की एकरसता जीवन को नीरस बना देती है। न उसमें आनंद होता हे और न कोई उल्लास। नित्य एक जैसे कार्यकलापों से मन उंचाट सा हो जाता है, हृदय की प्रसन्नता मानो खो सी जाती है। परंतु सुंदर दृश्यों एवं मनोरम वस्तुओं को देखने से हमारा हृदय कमल खिल उठता है, मन गुनगुनाने लगता है। अपने कमरे की खिडक़ी के पास बैठी मैं बाहर गिरती हुई वर्षा की रिमझिम बूंदों को देख रही थी। जिसे देखकर मन को बड़ा सकून मिल रहा था। बारिश की वे बूंदें अनायास मुझे कहीं दूर स्मृति में ले जातीं। कहते हैं न कि अतीत की यादें यदि सुनहरी हो तो हमेशा वह तरोताजा ही लगती है। बाहर हो रही वर्षा को देख बार-बार मन में यह विचार आता 'काश! कालिदास के मेघदूत की तरह ये भी उनकी खबर लाते तो कितना अच्छा होता।' पुरानी यादें चित्त को चंचल भर उसकी बेचैनी बढ़ा देती हैं। मुझे इसका अहसास हो रहा था। अपनी यादों में मैं इस तरह खोई थी कि मुझे पता ही नहीं चला कि कब भाभी मेरे पास आकर खड़ी हो गई थी। उनकी आवाज से मैं वर्तमान में लौट आई। 'चलो, तुम्हें आज पीवीआर में शाहरुख की 'डॉन' दिखा लाते हैं। लौटते वक्त सहारा मॉल घूम लेंगे और वहीं डिनर भी ले लेंगे।' संभवत: भाभी मेरी मनोदशा समझ रही थीं। करीब पन्द्रह दिनों से में अपने भैया के यहां लखनऊ में थी। जीवन की एकरसता से बचने के लिए मैं अपने शहर से दूर यहां चली आई थी।
झटपट तैयार होकर हमलोग पीवीआर पहुंचे थे। किसी मल्टीप्लेक्स में बैठकर फिल्म देखने का यह मेरा पहला अनुभव था। न कहीं अत्यधिक भीड़, न टिकट के लिए आपाधापी। एक ही हॉल में तीन-तीन फिल्म चल रहे थे फिर भी कहीं कोई हंगामा नहीं। sअब कुछ व्यवस्थित था। जगह-जगह सुरक्षाकर्मी तैनात थे। पूरी तरह साफ-सुथरा सिनेमा हॉल कोई महल प्रतीत हो रहा था। टिकट लेकर हमलोग अन्दर गए। अपनी सीट देखकर भैया के साथ हमलोग बैठ गए। एक-एक कर लोग अन्दर आ रहे थे और अपनी-अपनी सीट पर शांति से बैठ जा रहे थे। कहीं कोई शोर-गुल नहीं। आरामदेह कुर्सी, बड़े पर्दे पर मध्यम आवाज - सब मिला कर फिल्म की अहमियत और बढ़ा रहा था। तीन घंटे का समय कैसे बीता, पता ही नहीं चला। मुझे लगता है विज्ञान ने अभी तक जितने भी आविष्कारों को जन्म दिया है संभवत: सिनेमा उनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। सिनेमाघर ही एक ऐसी जगह है जिसमें हृदय में किसी के लिए भिन्नता नहीं है बल्कि साम्य ही साम्य है। चाहे वह निर्धन हो या धनवान, पिता हो या पुत्र, मित्र हो या शत्रु सभी का समान रूप से स्वागत करने के लिए अपनी बांहें फैलाए रहता है। यों तो आज के समय के मनोविनोद में साधनों की कोई कमी नहीं परन्तु सिनेमा ही एक ऐसा साधन है जिसे देखने के लिए हम कम व्यय में ही सिनेमा घर में जा बैठते हैं और अपने जीवन के संघर्षमय क्षणों में से कुछ क्षण कभी हंसते हुए तो कभी रो कर बिता देते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पर्दे पर हो रही घटनाओं को हम आत्म अनुभूति में ले आते हैं। इसीलिए सिनेमा आज सभी वर्गों के लिए मनोरंजन का साधन बन गया है। इसमें आप हम ऐसी चीजों के बारे में जान जाते हैं जिसे हमने न कभी पढ़ा हो और न सुना हो। 'गांधी' पिक्चर देखकर हम कई ऐसी चीजों को देखने और जानने को मिला, जिन घटनाओं के बारे में हमें पता तक नहीं था। गांधीजी के हाथ किए गए कार्यों, जो हमारी आजादी के लिए था, उनके बारे में जान पाए। साथ ही अंग्रेजों के कुकृत्यों का भी पता चला। पढऩे से जल्दी देखकर ज्ञान हासिल होता है - यह बिल्कुल सच है।
घर लौटकर जब मैं सोने के लिए बिस्तर पर गई तो बार-बार मन सिनेमा की ओर ही चला जाता। कितना अन्तर आ गया है आज के सिनेमा के साथ सिनेमाघरों में? पहले भी पिक्चरें काफी अच्छी बनती थी परंतु हर जगह सिनेमाघर अच्छे नहीं होते थे। कुछ शहरों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी जगहों के सिनेमाघर का कमोबेश हाल बुरा ही रहता था। बचपन में देख गए सिनेमा तथा उस सिनेमाघर की विस्मृतियां एक-एक कर आंखों के सामने से गुजरने लगीं।
एक छोटा सा गांव जहां मैं पली और बड़ी हुई थी। एक ही सिनेमा हॉल था। घर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर। रिक्शे पर सिनेमा के प्रचार की आवाज घर के आंगन तक सुनाई पड़ती थी। हम सभी भाई-बहनें चुपचाप आपस में बातें करते। उस वक्त सिनेमा के बारे में खुले रूप से बातें करने का मतलब बुजुर्ग यह लगाते थे कि बच्चों का पढ़ाई से ध्यान उचट गया है। कभी कोई फिल्म देखने की इच्छा होती तो पहले मां को मनाना होता फिर दादी को। जब दादी मान जातीं तो वो पापा को मनातीं - 'ले जाओ, बच्चे हैं, कभी-कभी इनकी मर्जी भी सुना करो।' दादी के कहने पर पापा मान तो जाते परंतु हमें यह कैफियत दे देते -'पहले अपना होमवर्क व पढ़ाई पूरा करो, वर्ना पिक्चर जाना कैंसिल।' किस शो में चलना है यह तो पूछना ही नहीं था क्योंकि पापा को शाम पांच बजे के बाद ही फुर्सत होती थी। अकेले जाने की अनुमति तो थी ही नहीं। पिक्चर देखने की लोभ भला कौन सा -- करता, झटपट हमलोग अपनी पढ़ाई पूरी कर पांच बजे से पहले तैयार हो जाते। सिनेमा घर पहुंचने तक पापा का मूड ठीक रहता परंतु जैसे ही टिकट कटाने के लिए भीड़ में घुसना पड़ता, उनका मूड ही बिगड़ जाता। सिनेमा हॉल के बाहर चारों तरफ चाट, पकौड़ी घुघनी-मूढी, लिट्टी तथा भुंजावाले की दुकान लगी रहती थीं जिसमें भीड़ इतनी रहती मानो सब घर से भूखे ही आए हों। किसी तरह टिकट लेकर पापा जब वापस आते तो उनका क्रीजदार सिल्क का कुरता चूर-चूर होकर ऐसा दिखता मानो गंदे कपड़े की गठरी से निकाल कर पहन लिया गया हो। उनका गुस्सा फूट पड़ता -'आज के बाद में तुम लोगों के ससाथ नहीं आने वाला।' मां किसी तरह पापा को शांत कर हॉल के अंदर चलने को कहतीं ताकि उस भीड़ से छुटकारा मिले। परंतु हॉल के अन्दर का नजारा तो बाहर से कुछ कम नहीं होता था। टिकट वाले को टिकट देकर अपनी सीट पर बैठना कोई आसान काम नहीं था। लोग अपनी सीट छोड़ दूसरे की सीट पर ही बैठे रहते जिन्हें समझा-बुझा कर उठाने में काफी समय लग जाता। तब तक ट्रेलर शुरू हो चुका होता और पीछे बैठे लोग 'सामने से हटो, सामने से हटो' की रट लगा देते। ऊपर से खोमचे वाले, बादाम वाले और चने वाले अपने-अपने सामानों को बेचने हेतु धमा-चौकड़ी मचाए रहते। यह सब तब तक चलता रहता जब तक फिल्म न शुरू हो जाती। फिल्म शुरू होने पर थोड़ी देर शांति जरूर रहती परंतु जैसे ही कोई प्रणय दृश्य आता, सीटियों और फूहड़ संवादों की बौछार कर दी जाती और यदि कहीं थोड़ी देर के लिए बिजली चली जाती तब तो पूछिए मत। मिनट भर के अंदर कई कुर्सियां पटक-पटक कर तोड़ दी जाती। चिल्ला-चिल्ला कर लोग सिनेमाघर को सिर पर उठा लेते। भला उस असभ्य भीड़ को कौन यह समझाए कि जेनरेटर चलाने में मिनट-दो मिनट का समय तो जरूर लगेगा। इतना सबकुछ पापा का मूड खराब करने के लिए काफी होता था। घर लौटते ही वो अपना गुस्सा यह कहकर उतार देते कि 'अब सिनेमा हॉल जाने की कोई जरूरत नहीं, घर में टीवी है उसे ही देखो।' मुझे याद है फिल्म 'नदिया के पार' के बाद हमलोग कभी उस हॉल में पिक्चर देखने नहीं गए।
आज जिस गति से सिनेमा का प्रचार और प्रसार हो रहा है उससे उसकी सर्वप्रियता स्पष्ट है कि ब्रह्मा के चार मुख थे और प्रत्येक मुख से उन्होंने एक-एक वेद की रचना की। ठीक उसी तरह मुझे लगता है कि सिनेमा की चार कलाओं का सम्मिश्रण है और वे हैं - पटकथा, चित्र, संगीत और अभिनय। सैकड़ों लोगों के मेहनत और लगन से कोई फिल्म तैयार होती है। एक फिल्म को पूरा करने में पहले तो कई वर्ष लग जाते थे परन्तु आधुनिक तकनीकों ने समय को कम कर दिया है। करोड़ों की लागत से बनने वाले ये फिल्म, फिल्म निर्माताओं की बुद्धि और सफल निर्देशन का कमाल होती है। यो तो किसी भी चीज में खूबियां और खामियां दोनों होती हैं परंतु यह हमारी सोच पर निर्भर है कि हम क्या ग्रहण करना चाहते हैं। यदि हम अच्छाई ढूंढऩा चाहें तो सिनेमा में हमें वो सब मिलेगा इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि फिल्म निर्माताओं के प्रयास से आज देश में नवीन चेतना और नवीन जागृति पैदा हो रही है। सिनेमा न केवल हमारा मनोरंजन करती है बल्कि हमारे मन के अवसाद को कम करने का भी प्रयास करती है।




Monday, January 19, 2009

गणेश क्यों सुपरस्टार हैं और कार्तिक क्यों नहीं?-राम गोपाल वर्मा

१६ जनवरी २००९ को राम गोपाल वर्मा ने यह पोस्ट अपने माई ब्लॉग पर लिखी है.यहाँ चवन्नी के पाठकों के लिए उसी पोस्ट को हिन्दी में पेश किया जा रहा है.उम्मीद है रामू की इस पोस्ट का मर्म समझा जा सकेगा.

मेरे लिए यह हमेशा रहस्य रहा है कि कोई क्यों जिंदगी में कामयाब हो जाता है और कोई क्यों नहीं हो पाता? यह सिर्फ प्रतिभा या भाग्य की बात नहीं है। मेरे खयाल में इसका संबंध अचेतन प्रोग्रामिंग से होता है, जरूरी नहीं है कि उसे डिजाइन किया गया हो या उसके बारे में सोचा गया हो।
बीते सालों में मैंने कई ऐसे अनेक एक्टर और टेक्नीशियन देखे, जिनके बारे में मेरी ऊंची राय थी, लेकिन वे कुछ नहीं कर सके और जिन्हें मैं औसत या मीडियाकर समझता रहा वे शिखर पर पहुंच गए। ऐसा नहीं है कि मैं इस विषय का अधिकारिक ज्ञाता हूं, लेकिन जिस समय मैं ऐसा सोच रहा था … मेरे आसपास के लोग भी वही राय रखते थे।
इसकी सबसे सरल व्याख्या है 'एस' यानी 'सफलता' । लेकिन सफलता का मतलब क्या है? सफलता वास्तव में प्राथमिक तौर पर ज्यादातर लोगों की स्वीकृति है कि फलां आदमी बहुत ही अच्छा है। लेकिन यह कैसे पता चले कि इतने सारे लोग क्या सोच रहे हैं? 'गदर' और 'लगान' का उदाहरण लें। दोनों फिल्में एक ही दिन रिलीज हुईं, लेकिन 'लगान' की तुलना में 'गदर' ज्यादा बड़ी हिट रही। दोनों फिल्मों की रिलीज के सालों बाद मुझे कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसकी पसंद 'गदर' हो। 'लगान' को पसंद करने वाले ढेर सारे मिल जाएंगे। तो 'गदर' को पसदं करनेवाले कौन थे? क्या वे चुपचाप मंगल ग्रह से आए थे और फिल्म देखकर वहीं चले गए?
मजाक एक तरफ, जिन्होंने 'गदर' पसंद की, वे कथित आम दर्शक होंगे, जिनकी परवाह हर चीज में नाम घुसेडऩे वाले समीक्षक और मीडिया नहीं करते। इसलिए जब वे लोगों की पसंद की फिल्मों की तारीफ में कुछ बोलते या लिखते नहीं है तो समय के साथ 'गदर' पसंद करने वाले भी धीरे-धीरे अपनी पसंद के प्रति आशंकित हो जाते हैं। उन्हें लगने लगता है कि 'गदर' पसंद करने से कोई गलती हो जाएगी।
मेरी एक चाची हैं। एक बार वह किसी के साथ सत्य साईं बाबा के दर्शन के लिए चली गयी थीं। वहां से लौटने के बाद अपने घर में उन्होंने उनकी एक बड़ी तस्वीर लगायी। उन्होंने दावा किया कि जब इतने हजारों लोग उनमें यकीन रखते हैं तो निश्चित ही वे दिव्य हैं। मैंने उनका प्रतिकार किया और कहा कि अगर वह सचमुच यकीन नहीं रखतीं, लेकिन हजारों लोगों के विश्वास के कारण खुद भी यकीन करने लगती हैं तो यही बात उन हजारों के साथ भी तो हो सकती है। इसका मतलब हुआ कि सभी एक सामूहिक झूठ में यकीन कर रहे हैं। मैं यहां सत्य साईं बाबा की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उनके प्रति लोगों के यकीन के आधार पर सवाल कर रहा हूं।
मैं यह भी नहीं समझ सका कि कार्तिक अपने भाई गणेश से छोटे भगवान क्यों हैं? मिथकों में कहीं नहीं कहा गया है कि कार्तिक कमतर हैं और न कहीं यह लिखा गया है कि गणेश असाधारण हैं। लेकिन किसी कारण से स्वर्ग के पीआर डिपार्टमेंट ने गणेश को आगे रखा और कार्तिक को पीछे कर दिया। उन्होंने बुलंद आवाज में गणेश का प्रोमोशन किया, यहां तक कि उनके जन्म की अतार्किक कहानी को भी श्रद्धालु (दर्शक) ध्यान से देखते-सुनते हैं (उन पर आधारित अतार्किक फिल्म भी सुपरहिट हो जाती है।)
अगर फिल्म इंडस्ट्री में कोई लेखक ऐसी कहानी सुनाए तो उसे हमेशा के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। 'बाल गणेश द्वार पर खड़े होकर पहरा दे रहे हैं। मां पार्वती अंदर नहा रही हैं। पिता शिव आते हैं तो गणेश उन्हें रोकते हैं। क्रोधित होकर शिव उनका सिर काट देते हैं (मेरे ख्याल में शिव की क्रूरता से दुनिया को सीखना चाहिए।) और जब पार्वती बताती हैं कि वह बच्चा कौन है। शिव बाहर जाते हैं और एक हाथी का सिर (क्या जंगली जीवों के पक्षधर पेटा वाले सुन रहे हैं) काट लाते हैं और बच्चे के सिर पर चिपका देते हैं।' इसके अलावा वे मां के प्रिय थे… बाकी मेरी समझ में नहीं आता कि उन्हें दिव्य प्रतिष्ठा क्यों मिली और निस्संदेह हमने कभी कार्तिक के बारे में जिज्ञासा नहीं की, क्योंकि उन्हें नजरअंदाज करने के लिए हमें तैयार कर दिया गया था।
हर तरह से और व्यावहारिक दृष्टिकोण से कार्तिक अधिक सुंदर हैं और स्मार्ट दिखते हैं। (कम से कम गणेश की तरह उनसे जुड़ी कोई अतार्किक कहानी नहीं है) और न ही मिथकों में कहीं यह उल्लेख है कि वे गणेश से कम शक्तिशाली हैं।
तो फिर गणेश क्यों सुपरस्टार हैं और कार्तिक क्यों नहीं?
अंत में इनता ही कहना चाहूंगा कि किसी के कामयाब होने या न होने का चमत्कार सिर्फ बालीवुड में ही नहीं होता, डिवाइनवुड में भी यही होता है।


Saturday, January 17, 2009

फ़िल्म समीक्षा:चांदनी चौक टू चायना



चूं चूं का मुरब्बा निकली 'चांदनी चौक टू चायना'

निखिल आडवाणी, रोहन सिप्पी और उनकी टीम को अंदाजा लग गया होगा कि 'चांदनी चौक टू चायना' का प्रचार भारत में गैरजरूरी है। यहां इस फिल्म को पसंद कर पाना मुश्किल होगा, लिहाजा वे अमेरिका, इंग्लैंड और कनाडा में अपनी फिल्म का प्रचार और प्रीमियर करते रहे। मालूम नहीं, उनकी मेहनत क्या रंग ले आयी? अक्षय कुमार का आकर्षण और दीपिका पादुकोण का सौंदर्य भी इस फिल्म से नहीं बांध सका। फिल्म की कहानी लचर थी और पटकथा इतनी ढीली कि गानों से उन्हें जोड़ा जाता रहा। 'चांदनी चौक टू चायना' में न तो चांदनी चौक की पुरजोश सरगर्मी दिखी और न चायना की चहल-पहल। साल के पहले बड़े तोहफे के रूप में आई 'चांदनी चौक टू चायना' चूं चूं का मुरब्बा निकली।
यह स्थापित होता है कि सिद्धू चांदनी चौक का है,लेकिन वह चायना में कहां और किस शहर या देहात में है ... यह लेखक और निर्देशक के जहन में रहा होगा। पर्दे पर हमें कभी शांगहाए दिखता है, तो कभी पेइचिंग की फॉरबिडेन सिटी तो कभी नकली चीनी गांव ... इस गांव में बांस की खपचियों से बने मकान हैं। मकान में दैनिक उपयोग के ऐसे सामान दिखाए गए हैं, जो चीन में इस्तेमाल नहीं होते। हां,हिंदी फिल्मों के गांव में हम उन्हें अक्सर देखते रहे हैं। इस गांव में एक भी पक्षी या जानवर नजर नहीं आता। सचमुच, हमारे फिल्मकार रिसर्च के मामले में फिसड्डी हैं। फिल्म में सिद्धू को जिस चायनीज मसीहा का अवतार बताया गया है, उसे कोई ल्यू शेंग कहता है तो कोई लू शिंग तो कोई लियु शंग। खलनायक का नाम होजो बताया गया है। ऐसा कोई नाम चीन में नहीं होता। काल्पनिक फिल्म को वास्तविकता से क्या मतलब? लेकिन कल्पना का भी एक लॉजिक होता है। 'चांदनी चौक टू चायनाÓ में उसकी परवाह नहीं की गयी है। निखिल आडवाणी निराश करते हैं।
ठीक इंटरवल के पहले फिल्म का दृश्य विधान 'शोले' से मेल खाने लगता है। गब्बर की तरह होजो गांव में आकर सभी को ललकारता है। किराए पर लाए गए जय और वीरू की तरह यहां सिद्धू का मखौल उड़ाते हुए थूकता है। गांव वाले बेबस होकर देखते रहते हैं। चीन का यह गांव भी रामगढ़ की तरह पहाड़ी टीलों से घिरा हुआ है। दूसरे स्तर पर अक्षय कुमार की ही फिल्म 'सिंह इज किंग' से समानता दिखती है। उसमें पंजाब से अक्षय कुमार आस्ट्रेलिया जाते हैं। यहां चांदनी चौक से चायना जाते हैं। दीपिका पादुकोण की दोहरी भूमिका में 'सीता और गीता' की झलक है। श्रीधर राघवन, रोहन सिप्पी और निखिल आडवाणी की मौलिकता कहां खो गयी? इतने प्रभावों और प्रेरणाओं के बावजूद फिल्म संवर नहीं पाती।
मुंबई में चीनी कलाकारों के बोले गए संवादों के अंगे्रजी सबटायटल्स दिए गए हैं। अगर देश के दूसरे हिस्सों में के प्रिंट में भी अंगे्रजी सबटाटल्स हैं तो देश के अस्सी प्रतिशत दर्शक फिल्म के कुछ जरूरी हिस्सों का मर्म नहीं समझ पाएंगे।
अक्षय कुमार ने बेवकूफ और नेकदिल किरदारों से दर्शकों को खूब हंसाया है। इस फिल्म में भी वे जी-तोड़ कोशिश करते हैं, लेकिन समान स्थितियों और प्रसंगों के कारण उनके अभिनय में दोहराव नजर आता है। साफ दिखने लगता है कि उन्हें इस तरह बिसूरते या झींकते हुए हम पहले देख चुके हैं। फिल्म का फोकस सिद्धू यानी अक्षय कुमार पर है, इसलिए दोहरी भूमिका में आयी दीपिका पादुकोण के हिस्से दृश्य और संवाद कम आए हैं। वे दृश्यों में मौजूद रहती हैं, लेकिन किसी चलती-फिरती मूक मूर्ति की तरह। 'चांदनी चौक टू चायना' दीपिका पादुकोण के करियर की कमजोर फिल्म है। उन्हें फिल्मों में आए अभी जुम्मा-जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुए हैं और फिल्मों के चुनाव में ऐसी लापरवाही? चीनी किरदारों की भूमिकाओं में गार्डन ल्यू और रोजर य्वान उपयुक्त हैं। उन्होंने अपनी काम संजीदगी से किया है। छोटी भूमिका में मिथुन चक्रवर्ती अपना योगदान करते हैं। रणवीर शौरी छोटी फिल्मों में ही जंचते हैं। यहां वे खो गए हैं।
कहानी और पटकथा से बेहतर फिल्म का गीत-संगीत है। खास कर कैलाश खेर में गायी जा रही सिद्धू की कहानी का प्रभावशाली उपयोग हुआ है। बोहेमिया और अक्षय कुमार की आवाज में गाया रैप सुनने में थोड़ा अलग और अच्छा लगता है। फिल्म के अंत में चल रहे क्रेडिट रोल के साथ उसे दिखाया गया है।
* १/२

Thursday, January 15, 2009

दरअसल: स्लमडॉग मिलियनेयर बना स्लमडॉग करोड़पति

-अजय ब्रह्मात्मज
विदेशी दर्शकों को भारतीय कहानी से रिझा रही स्लमडॉग मिलियनेयर पुरस्कार भी बटोर रही है। इसे अभी तक मुख्य रूप से पश्चिमी देशों में स्थित फिल्म समीक्षकों की सोसाइटी के अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं। प्रसंगवश अपने देश में कभी दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता के फिल्म समीक्षकों के पुरस्कारों का बड़ा सम्मान था, लेकिन अब ज्यादातर पुरस्कार टीवी इवेंट बन गए हैं। दरअसल, अब उनमें ग्लैमर और स्टार पर अधिक जोर रहता है, इसलिए फिल्मों की क्वालिटी और कॉन्टेंट पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता!
बहरहाल, फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर हिंदी में स्लमडॉग करोड़पति के नाम से रिलीज हो रही है। उम्मीद की जा रही है कि भारतीय दर्शक इसे पसंद करेंगे। हालांकि यह डब फिल्म है, लेकिन निर्माताओं का दावा है कि इसे देखते हुए मूल फिल्म का ही आनंद आएगा, क्योंकि फिल्म के सभी कलाकारों ने ही डबिंग का काम किया है। मेरा संदेह तकनीकी है, अगर फिल्म हिंदी संवादों के साथ शूट नहीं की गई है, तो डबिंग में शब्द और होंठों के बीच मेल बिठाना मुश्किल काम होगा!
स्लमडॉग करोड़पति मुंबई के धारावी में रह रहे किशोर जमाल मलिक के जीवन पर आधारित है। यह सच्ची कहानी नहीं है, लेकिन फिल्म का परिवेश, घटनाएं और शूटिंग की स्टाइल की वजह से यह वास्तविकता का अहसास देगी। इसी वजह से इसकी तारीफ भी हो रही है। फिल्म के निर्देशक डैनी बॉयल हैं। फिल्म के प्रचार में उनकी इतनी ज्यादा चर्चा हो रही है कि दर्शक मूल लेखक विकास स्वरूप से नावाकिफ हो रहे हैं। यह उनके उपन्यास क्यू ऐंड ए पर आधारित फिल्म है। लोग व्यंग्य की मुद्रा में कहते हैं कि किसी भारतीय निर्देशक ने इस उपन्यास पर फिल्म बनाने की क्यों नहीं सोची! हालांकि डैनी बॉयल ने फिल्म की जरूरत के हिसाब से मूल कथा में थोड़ा-बहुत बदलाव जरूर किया है, लेकिन उससे उपन्यास का मर्म प्रभावित नहीं हुआ है।
कहा जा रहा है कि भारतीय विषय पर बनी किसी विदेशी निर्देशक द्वारा बनाई गई यह पहली फिल्म है, जिसमें भारत को नीची या विस्मित नजरों से नहीं देखा गया है। इसका श्रेय फिल्म की सहायक निर्देशक लवलीन टंडन ले रही हैं। वे कहती हैं कि भारतीय सोच और उसके चित्रण पर डैनी बॉयल से उनकी कई बार झड़प हुई। वे इस फिल्म की कास्टिंग डायरेक्टर होने के साथ ही हिंदी संवादों की लेखिका भी हैं। लवलीन जल्दी ही स्वतंत्र रूप से हिंदी फिल्म का निर्देशन करेंगी। उनका स्वागत है।
इधर इस फिल्म की खास चर्चा है। फिल्म के संगीतकार ए.आर. रहमान गोल्डन ग्लोब पुरस्कार के लिए नामांकित हो चुके हैं। वे वहां रवाना भी हो गए हैं। ११ जनवरी को उन्हें यह पुरस्कार मिल भी गया।इस बार गोल्डन ग्लोब में भारतीय मौजूदगी उल्लेखनीय है। खबर है कि शाहरुख खान इस अवार्ड समारोह में एक खास पुरस्कार देंगे और उनके साथ करण जौहर भी रहेंगे। गोल्डन ग्लोब के 66 सालों के इतिहास में यह पहला मौका है, जब कोई भारतीय स्टार मंच पर दिखेगा। निश्चित ही एंटरटेनमेंट की दुनिया की हम नई ताकत हैं। इसका अहसास पूरी दुनिया को हो चुका है।
स्लमडॉग मिलियनेयर के निर्माता भारतीय दर्शकों, खासकर हिंदी दर्शकों को रिझाने की कोशिश में हैं। इसी कारण उन्होंने मिलियनेयर शब्द को बदलकर करोड़पति कर दिया है। भारतीय जनमानस और दर्शकों के बीच करोड़पति सुपरिचित शब्द है। संयोग से फिल्म में चल रहे गेम शो का नाम भी कौन बनेगा करोड़पति रखा गया है। फर्क यह है कि होस्ट की कुर्सी पर अमिताभ बच्चन या शाहरुख खान के बजाय अनिल कपूर हैं। अनिल इसे अपने लिए बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं। चर्चा है कि इंटरनेशनल मंच के लिए उन्होंने अपना भाषण भी तैयार कर रखा है। इंटरनेशनल ख्याति और प्रशंसा बटोर चुकी स्लमडॉग मिलियनेयर क्या भारत में भी ख्याति और प्रशंसा बटोरेगी? यह भी एक सवाल है!

Wednesday, January 14, 2009

पटना के सिनेमाघरों में मैं फिल्म क्यों नहीं देखूंगी ... अंजलि सिंह

अंजलि सिंह का यह लेख मुंबई से प्रकाशित द फिल्म स्ट्रीट जर्नल के पेज - १३ पर 1-7 जुलाई, 2007 को प्रकाशित हुआ था.चूंकि इस लेख में पटना के सिनेमाघरों की वास्तविकता की एक झलक है,इसलिए इसे चवन्नी में पोस्ट किया जा रहा है.उम्मीद है कि इस पर ब्लॉगर दोस्तों का सुझाव मिलेगा। हम अंजलि सिंह के आभारी हैं कि उन्होंने इस तरफ़ इशारा किया.

आम तौर पर फिल्म देखने जाना एक खुशगवार अनुभव माना जाता है। लेकिन मेरे और मेरे शहर की दूसरी लड़कियों के लिए फिल्म देखने जाना ऐसा अनुभव है, जिसे हम बार-बार नहीं दोहराना चाहतीं। मैं पटना की बात कर रही हूं। पटना अपने पुरुषों की बदमाशी के लिए मशहूर है। जब भी मैंने पटना के सिनेमाघर में फिल्म देखने की हिम्मत की, हर बार यही कसम खाकर लौटी कि फिर से सिनेमाघर जाने से बेहतर है कि घर मैं बैठी रहूं।
आप सोच रहे होंगे कि सिनेमाघर जाने में ऐसी क्या खास बात है? लेकिन पटना की लड़कियों को सिनेमा जाने के पहले 'कुछ जरूरी तैयारियां' करनी पड़ती हैं। वह परेशानी सचमुच बड़ी बात है।
कालेज के दिनों की बात है, तब मनोरंजन के अधिक साधन नहीं थे। मैंने अपनी दोस्तों के साथ फिल्म देखने जाने की योजना बनायी। हम पांच-छह लड़कियां थीं, फिर भी योजना बनाते हुए डर लग रहा था। कुछ दिनों तक असमंजस में रहने के बाद हम सभी ने सोचा कि चलो चलकर देखते हैं। बताने की जरूरत नहीं है कि बड़ा ही बुरा अनुभव रहा।
हम सिनेमाघर पहुंचे ही थे कि सभी पुरुषों की नजरें पलटीं। वे हमें ऐसे घूर रहे थे, जैसे हम आयटम गर्ल हों, जो अभी-अभी 'जिस्म' के सेट से निकलकर उनके मनोरंजन के लिए आ गयी हों। कुछ मर्दों का व्यवहार ऐसा था, मानो उन्होंने सिनेमा के बजाए हमें देखने का टिकट खरीदा हो।
हम थोड़ा आगे बढ़े तो क्या चीज है, छमिया, मस्त माल, क्या सेक्सी फिगर है जैसी फब्तियों की बारिश होने लगी। कुछ हिम्मत कर पास में आ गए और यह कहने की हिम्मत की, 'मैडम, हमारे साथ बैठ कर फिल्म देखो, ज्यादा मजा आएगा।' कुछ ने कहा कि 'असली हीरोइन और असली मजा तो यहां है।'
मानो इतना ही काफी नहीं था। उनके गंदे हाथ हमारे जिस्मों को छूने के लिए बढ़े। उस भीड़ से निकलते हुए दम घुट रहा था। जहां ज्यादातर हाथ हमारे शरीर की ओर बढ़ रहे थे। हालांकि हम सभी ने सलवान कमीज पहन रखी थी और दुपट्टा भी सलीके से डाल रखा था, लेकिन उनकी गंदी निगाहें हम पर ही टिकी रहीं।
हर जवान और देखने-सुनने में थोड़ी खूबसूरत लड़कियों को कभी-कभार छेड़खानी का सामना करना पड़ता है, लेकिन पटना में ऐसी घटनाएं ज्यादा होती हैं। डर से रोएं सिहर जाते हैं। इतने सारे पुरुषों के बढ़े हाथ और हमें छूने की उनकी कोशिश ने फिल्म देखने की ललक ही खत्म कर दी थी। उन सभी पर चिल्लाने के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्हें डांटना जरूरी लगा। हालांकि कई बार इससे बात बिगड़ जाती है और वे आक्रामक हो जाते हैं, लेकिन उस दिन वे सभी थोड़े शांत हो गए।
जब हम अपनी सीट पर आ गए और सिनेमाघर में अंधेरा हुआ तो स्थिति बदली। इसके पहले कभी अंधेरा इतना फायदेमंद नहीं लगा था। आखिरकार हमें कोई घूर नहीं रहा था और कोई भी इतना पास नहीं था कि हमें छू सके या हम पर झुक सके।
फिल्म देखने के दौरान मैं उस डरावने अनुभव के बारे में सोचती रही। मन में यह घबराहट बढ़ती रही कि बाहर निकलते समय फिर से पुरुषों की भीड़ मिलेगी।
पटना में सिनेमाघर जाने के उस एक अनुभव ने मुझे लंबे समय तक सिनेमाघरों में फिल्में देखने से दूर रखा।
निस्संदेह पटना में लड़कियां फिल्में देखने सिनेमाघरों में जाती हैं। कुछ मामलों में वे अपनी सुरक्षा का इंतजाम कर जाती हैं। उस घटना के बाद हम सब भी तभी सिनेमाघर गए, जब हमारे साथ कोई न कोई पुरुष रहा। किसी बॉडी गार्ड के साथ फिल्म देखने जाने की बात अजीब लग सकती है, लेकिन सच्चाई यही है कि पटना में तीन घंटे के शांतिपूर्ण मनोरंजन के लिए यही एक तरीका है। सुरक्षा के लिए कोई रहे तो भी लड़कियां भीड़ की फब्तियों से नहीं बच सकतीं। हां, तब शारीरिक छेड़छाड़ नहीं होती।
निस्संदेह कुछ लड़कियां पटना में भी सिनेमाघरों में जाकर हर फिल्म देखती हैं। ऐसी लड़कियों को या तो बदतमीज भीड़ की आदत हो जाती है या वे उनकी परवाह नहीं करतीं।
अशोक और रिजेंट जैसे कुछ सिनेमाघर लड़कियों के लिए सुरक्षित है। क्योंकि उन थिएटरों के प्रबंधक लोगों को दुर्व्यवहार से रोकते हैं। चूंकि इन सिनेमाघरों में ज्यादातर बड़ी फिल्में रिलीज होती हैं और दर्शकों में ज्यादातर परिवार के साथ आए लोग या कालेज के छात्र रहते हैं, इसलिए लड़कियां छोटे समूह में जाकर भी फिल्म देख लेती हैं। लेकिन इन सिनेमाघरों में भी 'मर्डर' या 'वो लम्हे' जैसी बोल्ड फिल्में लग जाती हैं तो लड़कियों का सिनेमा घर आना मुहाल हो जाता है। मर्दों के मन में यह गलत धारणा है कि ऐसी फिल्म देखने के लिए आई लड़कियां तो छेड़खानी और परेशानी के लिए तैयार होकर आती हैं।
चूंकि पटना के सिनेमाघर लड़कियों के लिए 'यौन उत्पीडऩ केंद्र' बन गए हैं, इसलिए अगर अधिकांश लड़कियां घर में बैठ कर टीवी या वीसीडी/ डीवीडी के जरिए फिल्में देखती हैं तो कोई आश्चर्य नहीं।
सिनेमा स्थानीय प्रशासन के लिए परीक्षण की चीज है। अगर दिन की रोशनी में सिनेमाघरों में जाने पर ऐसी परेशानी और छेड़छाड़ हो सकते हैं तो सूर्यास्त के बाद सार्वजनिक जगहों पर लड़कियों को किस नरक से गुजरना पड़ता होगा?

Tuesday, January 13, 2009

ऐक्शन-कॉमेडी दोनों हैं चांदनी चौक टू चाइना में : रोहन सिप्पी


कई फिल्में बना चुके रोहन सिप्पी की नई फिल्म है चांदनी चौक टू चाइना। अक्षय कुमार और दीपिका पादुकोण अभिनीत इस फिल्म को लेकर उनसे बातचीत हुई। प्रस्तुत हैं उसके अंश..
फिल्म का आइडिया कैसे आया?
श्रीधर राघवन ने यह फिल्म लिखी है। कहानी अक्षय कुमार को पसंद आ गई। दोनों उस पर काम कर रहे थे। पहले इसे श्रीराम राघवन डायरेक्ट करने वाले थे, लेकिन वे किसी और प्रोजेक्ट में व्यस्त हो गए। इस बीच सलाम-ए-इश्क रिलीज हुई। मेरी निखिल से बात हुई। उन्हें भी फिल्म की स्क्रिप्ट पसंद आई। इस तरह फिल्म शुरू हो गई।
अक्षय की निजी जिंदगी और फिल्म की कहानी में समानता है?
श्रीधर ने उनके साथ खाकी में काम किया था। उस फिल्म के समय ही इसका आइडिया आया था। फिल्म और उनकी निजी जिंदगी में कुछ बातें एक जैसी जरूर हैं, लेकिन दोनों में काफी अंतर भी है। सबसे बड़ा अंतर यही है कि फिल्म का अंत है, लेकिन अक्षय का करियर तो लगातार आगे बढ़ता जा रहा है! फिल्म में कुछ ऐसे तत्व हैं, जिनमें उनकी जिंदगी की झलक मिल सकती है। हम सभी जानते हैं कि वे इस फिल्म के पहले चीन नहीं गए थे। हमारी कहानी का एक हिस्सा चीन में ही है। यह एक आम लड़के की कहानी है, जो अपने बूते ही सब कुछ हासिल करता है। इस फिल्म इंडस्ट्री में उनका कोई गॉडफादर नहीं रहा। उन्होंने छोटी फिल्मों से शुरुआत की और मेहनत से मुकाम तक पहुंचे हैं।
फिल्म की घोषणा के समय कहा गया था कि इसमें अक्षय ऐक्शन करेंगे?
हां, ऐक्शन है, लेकिन साथ में कॉमेडी भी है। श्रीधर ने ऐक्शन के दृश्यों में भी कॉमेडी रखी है। ऐक्शन में केवल मारधाड़ नहीं है। फिल्म में अक्षय को कॉमिक कैरेक्टर दिया गया है। फिल्म में दिखाया गया है कि वे बाद में मार्शल आर्ट सीखते हैं। हमारी कोशिश है कि दर्शकों का भरपूर मनोरंजन हो।
यह जैकी चेन की फिल्मों जैसी है?
चार्ली चैप्लिन के समय से ही यह चला आ रहा है। कॉमेडी और ऐक्शन का अच्छा तालमेल हो, तो दर्शकों को मजा आता है। इसे देखते हुए लोग हंसने के साथ ही चौंकेंगे भी। फिल्म में कॉमेडी से ज्यादा ह्यूमर है। श्रीधर, निखिल और अक्षय ने मिलकर फिल्म को गजब की एनर्जी दी है।
आप निर्देशक हैं, लेकिन निर्माता के रोल में भी ऐक्टिव हैं। इसकी वजह?
अपने प्रोडक्शन हाउस की सारी फिल्में मैं अकेले डायरेक्ट नहीं कर सकता! कुछ प्रोजेक्ट्स दूसरे डायरेक्टर करेंगे और कुछ मैं करूंगा। हम लोग छोटी-बड़ी हर तरह की फिल्में बना रहे हैं। जब जो रोल मिलेगा, उसे अच्छी तरह निभाना है। हर फिल्म के लिए फ्रेश टैलेन्टेड टीम खड़ी करना भी एक चुनौती है।
फिल्म की क्या कहानी है?
दिल्ली के चांदनी चौक का एक लड़का कैसे चाइना पहुंच जाता है, यह कॉसेप्ट ही मजेदार है। अक्षय ही इस रोल को निभा सकते थे। फिल्म की कहानी और घटनाओं के बारे में बताना उचित नहीं होगा। चीन के प्रति दर्शकों की जिज्ञासा बनी हुई है। हमने पूरी दुनिया फिल्मों के जरिए देखी है, लेकिन चीन नहीं देखा था। चीन और वहां के मार्शल आर्ट को हमने इसमें समाहित किया है।
चीन में चांदनी.. रिलीज होगी?
कोशिश तो है, लेकिन चीन के अपने नियम-कानून हैं। अगर संभव हुआ, तो यह फिल्म वहां के दर्शक देख सकेंगे।
चीन में शूटिंग का अनुभव कैसा रहा?
अनोखा देश है चीन। यह विशाल, सुंदर और बड़ा है। चीन की लंबी दीवार पर शूटिंग करने में ज्यादा मजा आया। हर दिन हम लोग 500-600 सीढि़यां चढ़कर ऊपर जाते थे। वहां शूटिंग करते थे। हम लोगों ने shanghai में भी शूटिंग की है।

Monday, January 12, 2009

मासूम प्रेम की फिल्में अब नहीं बनतीं-महेश भट्ट

सन् 1973 हिंदी सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण है और मेरे लिए भी। उसी साल मैंने अपनी पहली विवादास्पद फिल्म मंजिलें और भी हैं के निर्देशन के साथ हिंदी फिल्मों का अपना सफर आरंभ किया था। उसी वर्ष हिंदी फिल्मों के महान शोमैन राज कपूर ने मेरा नाम जोकर से हुए भारी नुकसान की भरपाई के लिए किशोर उम्र की प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म बॉबी बनाई। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बनी टीनएज प्रेम कहानियों में अभी तक इस फिल्म का कोई सानी नहीं है। 35 सालों के बाद मैं आज इसी फिल्म से अपने लेख की शुरुआत कर रहा हूं। समय की धुंध को हटाकर पीछे देखता हूं तो पाता हूं कि किसी और फिल्म निर्माता ने राज कपूर की तरह किशोरों के मासूम प्रेम को सेल्यूलाइड पर नहीं उकेरा।
स्वीट सिक्सटीन वाले रोल
बॉबी के पहले उम्रदराज हीरो और हीरोइन हिंदी फिल्मों में किशोर उम्र के प्रेमियों की भूमिकाएं निभाया करते थे। हम ऐसी फिल्में देखकर खूब हंसते थे। मैंने 1970 में राज खोसला के सहायक के रूप में फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा। उन दिनों वे दो रास्ते का निर्देशन कर रहे थे। इसमें राजेश खन्ना और मुमताज की रोमांटिक जोडी थी। उनकी उम्र बीस के आसपास रही होगी। उन्हें कॉलेज में पढने वाले प्रेमियों के तौर पर दिखाया जा रहा था। इस फिल्म के एक गाने के फिल्मांकन के समय मैं राज खोसला के पास गया और हिम्मत बटोरकर उनसे कहा, सर, ये दोनों किशोर की तरह नहीं लडते। इन्हें इन भूमिकाओं में दर्शक कैसे पसंद करेंगे? मेरे बॉस ने मेरे सर पर थपकी दी और कहा, बेटे, जाकर चाय ले आओ। यह हॉलीवुड नहीं है। लेकिन बॉबी ने टीनएज लव स्टोरी की धारणा हमेशा के लिए बदल दी। फिल्म रिलीज हुई तो पहली बार लगा कि पर्दे पर दिख रहे किरदार हमारी तरह के ही किशोर हैं। यही कारण है कि बॉबी ने हिंदी फिल्मों में एक ट्रेंड आरंभ किया। इस फिल्म ने न केवल ऋषि कपूर और डिंपल कपाडिया जैसे कलाकार दिए, बल्कि टीनएज रोमांस की नई विधा भी दी। बॉबी के बाद निर्माता-निर्देशकों ने कॉलेज स्टूडेंट की भूमिकाओं में उम्रदराज कलाकारों को लेना बंद किया।
ताजा हवा का झोंका
दिल्ली के एक वरिष्ठ डिस्ट्रीब्यूटर ने मुझे एक बार बताया था कि बॉबी इस कदर लोकप्रिय हुई थी कि इसके बाद आने वाले कई वर्षो में जन्मे बच्चों के नाम बॉबी रखे गए। इतना ही नहीं बॉबी फिल्म से फैशन का ट्रेंड चला और उत्तर भारत के अनेक परिवारों में किशोर उम्र के दर्शकों ने अपने अभिभावकों से बगावत कर यह फिल्म देखी। उन्हें ऋषि कपूर और डिंपल कपाडिया के रोमांस में अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दिखी। हिंदी फिल्मों की श्रेष्ठ पच्चीस दर्शनीय फिल्मों में बॉबी शामिल है।
बॉबी की अपार सफलता के बाद उसकी नकल में अनेक फिल्में बनीं, लेकिन उनमें से कोई भी बॉबी की तरह सफल नहीं रही। किसी भी फिल्म में बॉबी की लव स्टोरी की ऊर्जा और मासूमियत नहीं दिखी। तो बॉबी में ऐसी क्या खासियत थी?
मासूम प्रेम और नए चेहरे
बॉबी मुंबई के दो वर्गो के किशोरों की प्रेम कहानी थी। ऋषि कपूर ने अमीर बिजनेसमैन नाथ के बेटे राजनाथ की भूमिका निभाई थी। बिजनेसमैन की भूमिका में प्राण थे। बॉबी ब्रिगेंजा के रूप में दर्शकों ने डिंपल कपाडिया को देखा। वह ईसाई मल्लाह जैक ब्रिगेंजा की बेटी थी। जैक की भूमिका में प्रेमनाथ ने जान डाल दी थी।
राज यानी ऋषि कपूर और बॉबी यानी डिंपल की पहली मुलाकात होती है, राज की आया मिसेज ब्रिगेंजा के घर। राज आया से मिलने आता है, वहीं आया की पोती बॉबी को पहली बार देखता है। पहली ही मुलाकात में दोनों के बीच प्यार हो जाता है। राज को एहसास होता है कि गरीब मल्लाह की बेटी बॉबी से उसके प्रेम को पिता स्वीकार नहीं करेंगे। राज के मनाने पर बॉबी के पिता जैक मिलने आते हैं। वे राज के पिता से शादी की बात करते हैं। राज के पिता उन पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने बेटी की सुंदरता का इस्तेमाल उनके बेटे को फंसाने में किया है। उनकी नजर पैसे पर है। वे बेटे को छोडने के लिए पैसों की पेशकश करते हैं। दोनों पिताओं की भिडंत का दृश्य खूबसूरत तरीके से कैमरे में कैद किया गया है। इस दृश्य की खासियत है कि राज कपूर ने दोनों बुजुर्गो की झडप की पृष्ठभूमि में चल रहे संगीत के बीच पिताओं के क्लोजअप केसाथ प्रेम में डूबी जोडी के क्लोजअप भी बारी-बारी से दिखाए हैं। प्रेम में डूबी यह जोडी कांच के शीशे के भीतर नाचती जोडी को गौर से देखती है।
राज कपूर ने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आनंद बख्शी के साथ मिलकर फिल्म के लिए सदाबहार गाने तैयार किए। मैं शायर तो नहीं, झूठ बोले कौआ काटे, हम तुम एक कमरे में बंद हों, मुझे कुछ कहना है, ना मांगू सोना चांदी, भारतीय फिल्मों के इतिहास में फिल्मांकित सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है। हम तुम ने किशोरों की कल्पना को पंख दिए। आज भी इसका प्रभाव कम नहीं हुआ है।
मैंने प्यार किया
सालों बाद राजश्री प्रोडक्शन में सेठ ताराचंद के पोते सूरज बडजात्या ने फिल्म मैंने प्यार किया से डायरेक्शन की दुनिया में धमाकेदार इंट्री की। इस फिल्म में बॉबी का ही फार्मूला आजमाया गया है। अमीर-गरीब के प्रेम पर आधारित यह फिल्म 1989 की बडी हिट साबित हुई। नौवें दशक की सबसे सफल फिल्म मैंने प्यार किया ने सलमान खान को स्टार बना दिया।
मेरी फिल्मों की लेखिका शगफ्ता रफीक कहती हैं, दोनों फिल्मों की कथात्मक संरचना देखें तो उनमें कई समानताएं मिलेंगी। दोनों में अमीर-गरीब का भेद रखा गया है और दोनों के क्लाइमेक्स तक में समानता है।
एक और समानता है कि बॉबी की तरह मैंने प्यार किया के गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए थे। इसकी फिल्मी अंत्याक्षरी ने तो सभी का दिल जीत लिया और यह एक पॉपुलर टाइमपास खेल बन गया था। बाद में सैटेलाइट चैनल आने पर अंत्याक्षरी गेम शो के तौर पर भी लोकप्रिय हुआ। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने बॉबी से एक फार्मूला लिया-एक आकर्षक जोडी लो, सामान्य प्रेम कहानी बुनो, मधुर धुनों पर आधारित गीत चुनो और फिर एक कामयाब फिल्म बना लो। लेकिन सच्चाई यही है कि अनेक निर्देशकों ने इस फार्मूले को विफल तरीके से अपनाया। हां सूरज बडजात्या की तरह मंसूर खान को जरूर कामयाबी मिली। उनकी पहली फिल्म कयामत से कयामत तक सफल रही।
किशोर प्रेम का हिट फार्मूला
कयामत से कयामत तक का लेखन नासिर हुसैन ने किया था। निर्देशन उनके बेटे मंसूर खान ने किया था। इस फिल्म से आमिर खान हिंदी फिल्मों में आए। उनके छोटे भाई फैसल खान भी इस फिल्म में एक छोटी भूमिका में थे। फिल्म ने गजब की सफलता हासिल की। आमिर खान रातों रात स्टार बन गए। इस फिल्म से जूही चावला का करियर भी संवर गया। यह जूही की पहली बडी हिट फिल्म थी। कम ही लोग जानते हैं कि इस फिल्म के पहले आमिर खान होली में और जूही चावला सल्तनत में आ चुके थे। फिर भी दोनों बेहद ताजा चेहरों की तरह दिखे थे। इनकी जोडी ने दर्शकों का दिल मोह लिया था। इस फिल्म का संगीत भी बहुत लोकप्रिय हुआ था। मजरूह सुल्तानपुरी के गीत पापा कहते हैं, ऐ मेरे हमसफर, गजब का है दिन और बाकी दूसरे गीतों को भी आनंद मिलिंद ने मोहक धुनें दी थीं।
हिंदी सिनेमाई इतिहास में यह फिल्म इसलिए उल्लेखनीय मानी जाती है कि इसकी रिलीज के समय एक्शन फिल्मों की धूम मची थी। कोई सोच भी नहीं सकता था कि कयामत से कयामत तक उस भीड में पसंद की जाएगी। ऐसी प्रेम कहानी दोबारा नहीं बनाई जा सकती। यह दो दुश्मन परिवारों की कहानी थी, जिनके जिद्दी अभिभावक हैं। इसके बावजूद उनके बच्चे आपस में प्रेम करने लगते हैं। फिल्म में सेक्स या हिंसा नहीं थी। फिर भी इसकी व्यापक अपील रही। वास्तव में इसकी सहजता और मासूमियत ने दर्शकों का दिल जीत लिया।
क्यों नहीं बनती अब ऐसी फिल्में
क्या मैंने कभी किशारों की प्रेम कहानी बनाई? मेरी फिल्मों आशिकी और दिल है कि मानता नहीं को टीनएज लव स्टोरी कह सकते हैं। आशिकी आत्मकथात्मक फिल्म थी। वह मेरे स्कूली दिनों की प्रेम कहानी थी। इसमें नदीम श्रवण का संगीत बहुत पॉपुलर हुआ था। आशिकी की गोल्डन जुबली में उसके संगीत की लोकप्रियता का बडा योगदान था। लोग पूछते हैं कि अब आप ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनाते? क्यों जिस्म और मर्डर बनाते हैं? इसका जवाब यही है कि टीनएज लव स्टोरी को पसंद करने वाला भारत अब नहीं रहा। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में एमटीवी देख कर बडे हो रहे बच्चों के लिए प्यार की मासूमियत खत्म हो गई है। वे इसमें यकीन भी नहीं रखते। इसलिए जरूरी है कि हम उनके मनोरंजन का सामान परोसें। ऐसा लगता है कि अब बॉबी जैसी फिल्में नहीं बन सकतीं, लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि मेरी धारणा गलत साबित हो।

Saturday, January 10, 2009

फ़िल्म समीक्षा:बैडलक गोबिंद, काश...मेरे होते और द प्रसिडेंट इज कमिंग की संयुक्त समीक्षा

प्रथमग्रासे मच्छिकापात
हिंदी फिल्मों में बुरी फिल्मों की संख्या बढ़ती जा रही है। फिर भी अगर दो-तीन फिल्में एक साथ रिलीज हो रही हों तो उम्मीद रहती है कि कम से कम एक थोड़ी ठीक होगी। इस बार वह उम्मीद भी टूट गई। इस हफ्ते दो हिंदी और एक अंग्रेजी फिल्म रिलीज हुई। तीनों साधारण निकलीं और तीनों ने मनोरंजन का स्वाद खराब किया। तीनों फिल्मों का अलग-अलग एक्सरे उचित नहीं होगा, इसलिए कुछ सामान्य बातें..
युवा फिल्मकार फिल्म के नैरेटिव पर विशेष ध्यान नहीं देते। सिर्फ एक विचार, व्यक्ति या विषय लेकर किसी तरह फिल्म लिखने की कोशिश में वे विफल होते हैं। बैडलक गोबिंद का आइडिया अच्छा है, लेकिन उस विचार को फिल्म के लेखक और निर्देशक कहानी में नहीं ढाल पाए। काश ़ ़ ़ मेरे होते का आइडिया नकली है। यश चोपड़ा की डर ने प्रेम की एकतरफा दीवानगी का फार्मूला दिया। इस फार्मूले के तहत कई फिल्में बनी हैं। इसमें शाहरुख खान वाली भूमिका सना खान ने की है। द प्रेसिडेंट इज कमिंग अंग्रेजी में बनी है और इसकी पटकथा भी ढीली है। ऐसा लगता है कि लेखक के दिमाग में जब जो बात आ गई, उसे उसने दृश्य में बदल दिया। इधर के लेखक-निर्देशक हिंदी फिल्मों की नैरेटिव परंपरा से कट रहे हैं। इससे दर्शकों को गहरे झटके लगते हैं। एक व्यक्ति (स्टार, नवोदित कलाकार या नायक) को लेकर जब फिल्म बुनी जाती है तो उसका हश्र बैडलक गोविंद (नायक), काश ़ ़ ़ मेरे होते (नवोदित कलाकार) या द प्रेसिडेंट इज कमिंग (स्टार कोंकणा सेना शर्मा) सा ही होता है। कुमार साहिल को लेकर बनाई गई इस फिल्म में निर्देशक की कोशिश थी कि एक स्टार के तौर पर उन्हें स्थापित किया जाए। लेकिन कैमरा उनके कच्चेपन को जाहिर कर देता है। सना खान ने अलबत्ता ध्यान खींच लिया। बैडलक गोबिंद में गोबिंद की बदकिस्मती उभर नहीं पाई। गौरव चोपड़ा भले ही अच्छे वीजे हों, लेकिन अभिनय के लिए उन्हें लंबा अभ्यास करना होगा। द प्रेसिडेंट इज कमिंग में कोंकणा सेन शर्मा पर निर्देशक का काबू ही नहीं रह गया।
कुछ नया करने की कोशिश की तभी सराहना की जा सकती है, जब वह सार्थक दिशा में हो। ऐसी फिल्मों से किसी का फायदा नहीं होता। काश ़ ़ ़मेरे होते में राजेश खन्ना का देख कर फिर से तकलीफ हुई। क्या जरूरत है उन्हें अपने प्रशंसकों को निराश करने की? 2009 के पहले हफ्ते में कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई थी। दूसरे हफ्ते की तीनों फिल्मों ने निराश किया है। प्रथमग्रासे मच्छिकापात (पहले कौर में ही मक्खी गिर जाना) की इस स्थिति में 2009 का पूरा साल जाने कैसा बीतेगा?

Thursday, January 8, 2009

दरअसल:इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल छोटे शहरों में


-अजय ब्रह्मात्मज
हरियाणा के यमुनानगर में 24 से 29 दिसंबर, 2008 के बीच इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स संपन्न हुआ। इस महत्वपूर्ण आयोजन में हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के 200 छात्रों ने भाग लिया। मुख्य रूप से लेखक-पत्रकार अजीत राय की अवधारणा से यह संभव हो सका। राय मानते हैं कि फिल्म फेस्टिवल का आयोजन देश के छोटे शहरों में भी हो, ताकि सिनेमा के प्रति युवा दर्शकों की सुरुचि का विकास हो। वे विश्व सिनेमा की समृद्ध सिनेमा से परिचित हों और अपने लिए उपलब्ध सिनेमा में अच्छे और बुरे का फर्क कर सकें। गौर करें, तो गोवा के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से लेकर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, तिरुअनंतपुरम, पूना आदि शहरों में होने वाले फिल्म फेस्टिवलों से शहरों के दर्शक ही लाभ उठा पाते हैं। इन सभी फेस्टिवल का एक तरीका बन गया है, जिसमें ऐसी गुंजाइश नहीं रखी जाती कि उनमें छोटे शहर, कस्बा और गांवों के दर्शकों की भागीदारी हो सके। लिहाजा फिल्म फेस्टिवल देश के संभ्रांत और संपन्न दर्शकों तक ही सीमित रह जाते हैं।
इधर एक सुगबुगाहट दिख रही है। तीन साल पहले बिहार सरकार के सहयोग से पटना में फिल्म फेस्टिवल का आयोजन हुआ। मालूम नहीं, कोसी की बाढ़ से उबर रही नीतिश कुमार की सरकार इस बार इस तरफ ध्यान दे पाती है या नहीं, लेकिन छोटे स्तर पर हुए पटना फिल्म फेस्टिवल का व्यापक प्रभाव पड़ा। हालांकि इस फेस्टिवल में बिहार से निकल कर आई फिल्मी हस्तियों का सहयोग नहीं के बराबर था। पिछले कुछ समय से गोरखपुर में निजी प्रयासों से फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होता है। इसी प्रकार अन्य शहरों में छोटे स्तर पर उल्लेखनीय प्रयास होते रहे हैं। यमुनानगर का फिल्म फेस्टिवल इस लिहाज से भी उल्लेखनीय है, क्योंकि इसमें मुख्य रूप से छात्रों ने भाग लिया।
सीमित बजट और संसाधनों के कारण छोटे स्तर पर आयोजित इस फेस्टिवल में फिल्मकार गौतम घोष, निर्देशक फिरोज अब्बास खान, पत्रकार विनोद भारद्वाज, कवि विमल कुमार और व्यंग्यकार अविनाश वाचस्पति ने हिस्सा लिया। गौतम घोष छात्रों का जोश और स्थानीय उत्साह देखकर दंग रह गए। उन्होंने वादा किया कि वे अगले साल पूरे फेस्टिवल के लिए समय निकालेंगे। फिरोज अब्बास खान ने अपनी फिल्म गांधी माई फादर से संबंधित सवालों के जवाब देने के बाद महसूस किया कि छोटे शहरों के दर्शक किसी भी फिल्म के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखते। वे निस्संकोच सवाल करते हैं और उनकी जिज्ञासाएं मौलिक होती हैं। देश-विदेश के अनेक फेस्टिवल में शामिल हो चुके फिल्म समीक्षक और विश्लेषक विनोद भारद्वाज फिल्म देखने के प्रति छात्रों की रुचि से विस्मित थे। उन्होंने बताया कि इन छात्रों ने भारी और बोझिल समझी जाने वाली फिल्मों को भी धैर्य से देखा। फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स के सूत्रधार संजय सहाय थे।
यह फिल्म फेस्टिवल का विशेष खंड हरियाणवी फिल्मों पर केंद्रित था। पहली हरियणवी फिल्म चंद्रावल के विशेष शो ने दर्शकों को भावुक करने के साथ ही साथ यह गर्वीला अहसास दिया कि हरियाणा में भी फिल्में बन सकती हैं। चंद्रावल के कलाकार अनूप लाठर और दरियाव सिंह मलिक इस शो में शामिल होकर गदगद थे। अनूप लाठर ने घोषणा कर दी कि वे जल्दी ही ऐसी फिल्म का निर्माण करेंगे।
इस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में फेलिनी, गोदार, स्पिलबर्ग, चार्ली चैप्लिन, वांग कार वाई, बर्गमैन, अनवर जमाल, फिरोज अब्बास खान, माजिद मजीदी, गौतम घोष और सुषेन भटनागर की फिल्में दिखाई गई। इसकी कामयाबी इस तथ्य का सबूत है कि देश के छोटे शहर ऐसे फेस्टिवल के लिए तैयार हैं। ऐसे आयोजन इसलिए भी जरूरी हैं कि फेस्टिवल से प्रेरित होकर स्थानीय प्रतिभाएं फिल्मों को करियर बनाने की दिशा में अग्रसर हों और मुंबई का एकाधिकार समाप्त हो..।

Wednesday, January 7, 2009

बॉक्स ऑफिस:०७.०१.२००९

गजनी की कमाई 100 करोड़ से ज्यादा
गजनी के निर्माताओं ने 170 करोड़ की सकल आय (ग्रौसर) का विज्ञापन चला रखा है। ट्रेड सर्किल में गजनी की कमाई को लेकर बहस चल रही है। हर मामले में असंतुष्ट रहने वाले विश्लेषक बता रहे हैं कि गजनी की वास्तविक आय ज्यादा नहीं होगी। तर्क यह है कि कारपोरेट हाउस के सक्रिय होने और मल्टीप्लेक्स संस्कृति आने के बाद कोई भी फिल्म जबरदस्त मुनाफे में नहीं आ सकी है। दूसरी तरफ कुछ ट्रेड विश्लेषकबता रहे हैं कि गजनी इस दशक में सौ करोड़ की कमाई करने वाली पहली फिल्म होगी। कमाई कम-ज्यादा हो सकती है, लेकिन इसमें अब दो राय नहीं रही कि गजनी पिछले साल की सबसे बड़ी हिट है। उसे एक हफ्ते का खाली मैदान मिला और इस हफ्ते भी उसके दर्शकों को अपनी तरफ खींचने वाली कोई फिल्म रिलीज नहीं हो रही है। अक्षय कुमार की चांदनी चौक टू चाइना आने के बाद ही गजनी के दर्शकों में उल्लेखनीय गिरावट आ सकती है।
आमिर खान की गजनी ने देश के अंदर और बाहर के दर्शकों को आकर्षित किया है। तात्पर्य यह कि गजनी छोटे शहरों से लेकर विदेशी शहरों तक में चल रही इस तरह आमिर खान के दर्शकों का विस्तार हुआ है। रब ने बना दी जोड़ी दूसरी हिट फिल्म है। दोनों फिल्में साथ-साथ चल रही हैं।
इस हफ्ते तीन छोटी फिल्में बैडलक गोविंद, काश.... मेरे होते और द प्रेसिडेंट इज कमिंग रिलीज हो रही है। इनमें से आखिरी फिल्म अंग्रेजी में है।

Monday, January 5, 2009

हरियाणा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल:झटपट सर्वेक्षण - १:पहली फिल्म


दिसंबर के अंत में हरियाणा के प्रथम इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के सिलसिले में यमुनानगर जाने का मौका मिला। इस अवसर का लाभ उठाते हुए इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हिस्सा ले रहे छात्रों के बीच हमने एक झटपट सर्वेक्षण किया। मुख्य रूप से 18 से 22 साल के छात्रों के बीच हमने दस सवाल बांटे। हमें 137 प्रविष्टियां वापस मिलीं।
एक सवाल था कि आपने पहली फिल्म कौन सी देखी? पहली फिल्म के तौर पर छात्रों ने 59 फिल्मों के नाम दिए। जाहिर सी बात है कि पहली फिल्म कोई भी हो सकती थी। साथ में हमने यह भी पूछा था कि पहली फिल्म कहां देखी? टीवी पर, वीडियो के जरिए या सिनेमाघरों में? लगभग 50 फीसदी ने पहली फिल्म टीवी या वीडियो के जरिए देखी। हां, 50 फीसदी से थोड़े कम सिनेमाघरों में गए। इससे पता चलता है कि हरियाणा में सिनेमाघरों में जानेवाले दर्शक पचास प्रतिशत से कम हैं। सिनेमा के विकास के लिहाज से यह संतोषजनक आंकड़ा नहीं कहा जा सकता। इन दिनों मुंबई के निर्माता उत्तर भारतीय समाज के विषयों पर फिल्मों नहीं बना रहे हैं। उसकी एक बड़ी वजह है कि उन्हें उत्तर भारत के सिनेमाघरों से रिटर्न नहीं मिलता। चूंकि मुख्य कमाई मुंबई, दूसरे महानगरों और विदेशों से होती है, इसलिए फिल्मों के विषय उन दर्शकों की रुचि के होते जा रहे हैं। अगर उत्तर भारतीय दर्शक चाहते हैं कि मुंबई के निर्माता उनके समाज पर भी ध्यान दें तो उन्हें सिनेमाघरों में जाकर देखने की आदत डालनी होगी।
137 प्रविष्टियों में से 125 प्रविष्टियां स्पष्ट थीं। इनमें से 40 छात्रों की पहली फिल्म 'हम आपके हैं कौनÓ थी। इसे 3125 प्रतिशत ने देखा। कोई भी पॉपुलर फिल्म ज्यादा से दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचती है। 'हम आपके हैं कौनÓ 1994 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म ने पूरे भारत के दर्शकों को सम्मोहित किया था। पापुलर फिल्म के दर्शक झुंड में सिनेमाघरों में जाते हैं। ऐसी फिल्मों को दर्शक सपरिवार भी देखते हैं। संभव है आज से 18-20 साल के बाद कोई सर्वेक्षण 18-20 साल के छात्रों के बीच किया जाए तो उनकी पहली फिल्म 'जोधा अकबर', 'रब ने बना दी जोड़ी', 'गजनी' या 'सिंह इज किंग' हो। बहरहाल, सूरज बडज़ात्या के लिए यह खुशी की बात होगी कि उनकी फिल्म ने एक पीढ़ी को सिनेमा से जोड़ा। अगली पोस्ट में हम बताएंगे कि उन्हें इस फिल्म में किस बात ने प्रभावित किया?

आइए, अब जरा उन फिल्मों की सूची देखें जो इस सर्वेक्षण में शामिल छात्रों की पहली फिल्म रहीं। विदेशी फिल्मों में केवल टाइटैनिक और जुरासिक पार्क पहली फिल्म रही।

बिच्छू, सफर, तिरंगा, स्वदेस, अंदाज अपना अपना, जुरासिक पार्क, बूट पालिश, रंगीला, आग का गोला, जैसी करनी वैसी भरनी, कहानी घर घर की, कायापलट, कयामत से कयामत तक, लहू के दो रंग, गाइड, कर्ज, शहीद, गोलमाल, गदर, लगे रहे मुन्ना भाई, अवतार, प्यार झुकता नहीं, राम लखन, आशिकी, टाइटैनिक, चाची 420, जंजीर, दीवार, कुछ तुम कहो कुछ हम कहें, बाजीगर, मैं हूं ना, दिल तो पागल है, अंगरक्षक, प्रेम दीवाने, एलओसी, डाकू हसीना, सीता और गीता, गांधी, जय संतोषी मां, मिस्टर इंडिया, आवारा, दूध का कर्ज, मृगया, मैंने प्यार किया और माचिस ... इन फिल्मों की अकेली प्रविष्ट रही।
दो प्रविष्टियों की फिल्मों में तेरी मेहरबानियां, राम तेरी गंगा मैली, मदर इंडिया, कुछ कुछ होता है, हम है राही प्यार के और चंद्रावल हरियाणवी रहीं।
तीन प्रविष्टयों की फिल्मों में क्रांति, राजा हिंदुस्तानी रहीं।
बॉर्डर और दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे को पांच प्रविष्टियां मिलीं।
हां, शोले को सात प्रविष्टयां मिलीं।
आप पहली फिल्म की सूची पर गौर करें तो शाहरुख खान की फिल्में ज्यादा छात्रों ने देखीं। सलमान खान हम आपके हैं कौन की वजह से नंबर वन पसंद कहे जा सकते हैं। आमिर खान तीसरी पसंद रहे।

Friday, January 2, 2009

गजनी,गुप्त ज्ञान,दीदी और दादी

एक दीदी हैं मेरी.दिल्ली में रहती हैं.अभी पिछले दिनों दिल्ली जाना हुआ तो उनसे मुलाक़ात हुई.मुलाक़ात के पहले ही उनके बेटे ने बता दिया था की माँ आमिर खान से बहुत नाराज़ हैं.मुझे लगा की गजनी देख कर आमिर खान से नाखुश हुए प्रशंसकों में से वह भी एक होंगी.बहरहाल.मिलने पर मैंने ही पूछा,कैसी लगी गजनी.उन्होंने भोजपुरी में प्रचलित सभी सभ्य गलिया दिन और कहा भला ऐसी फ़िल्म बनती है.नाम कुछ और रखा और फ़िल्म में कुछ और दिखा दिया.बात आगे बढ़ी तो उन्होंने बताया की वह तो गजनी देखने गई थीं.उन्हें लगा था की ऐतिहासिक फ़िल्म होगी और मुहम्मद गजनी के जीवन को लेकर फ़िल्म बनी होगी.लेकिन यहाँ तो आमिर खान था और वह गजनी को मार रहा था.गजनी भी कौन?एक विलेन.मेरा तो दिमाग ही ख़राब हो गया।
फिर उन्होंने एक दादी का किस्सा सुनाया.बचपन की बात थी.उनकी सहेली नियमित तौर पर फ़िल्म देखती थी.चूंकि परिवार से अकेले जाने की इजाज़त नहीं थी,इसलिए दादी को साथ में ले जाना पड़ता था.दादी के साथ जाने पर घर के बड़े-बूढ़े मना नहीं करते थे.एक बार शहर में गुप्त ज्ञान फ़िल्म लगी.दीदी की सहेली ने दादी को राजी किया और दादी-पोती फ़िल्म देखने चली गयीं.उन्हें भ्रम था की कोई ज्ञानवर्धक फ़िल्म होगी.फ़िल्म शुरू होते ही पता चल गया की यह तो वैसी फ़िल्म नहीं,जैसी वे सोच कर आई थीं.लेकिन अब वहां से निकलना मुश्किल था.भीड़ में ख़ुद को पाकर दादी की झेंप बढती जा रही थी.उन्होंने तत्काल तरकीब निकाली.दादी ने घूंघट काढ़ लिया,ताकि उनका झुर्रीदार चेहरा किसी को नहीं दिखे.उन्होंने पोती को सलाह दी की दुपट्टे से सर धक् लो और कान के ऊपर से ऐसे दुपट्टे को खोंसो जैसे मुस्लमान लड़कियां दुपट्टा लेती है.दादी और पोती ने ऐसा कर लिया की पहचान में न आयें सिनेमाघर से निकालने पर सीधे घर का रिक्शा लेने के बजाय दोनों कुछ देर बाज़ार में घूमती रहीं.फिर एक रेस्तरां में कुछ खाया.इस बीच दादी का घूंघट खुलता गया और पोती का दुपट्टा भी कानों के पीछे से निकल आया।
आज भी पोती दादी की होशियारी का गुणगान करती हैं.गुप्त ज्ञान नाम से उन्हें सालों पहले ज्ञानवर्धक फ़िल्म का भ्रम हुआ था.सालों बाद गजनी नाम के भ्रम दीदी आमिर खान की फ़िल्म देख आई.

Thursday, January 1, 2009

दरअसल:उमीदें कायम हैं...

-अजय ब्रह्मात्मज

मनोरंजन की दुनिया में 2009 के पहले दिन आप सभी का स्वागत है। मंदी के इस दौर में, जबकि सारी गतिविधियां ठंडी पड़ी हुई हैं, तब भी मनोरंजन की दुनिया में हलचल है। अर्थशास्त्री भी मानते हैं कि मंदी के किसी भी दौर में मनोरंजन की दुनिया सबसे कम प्रभावित होती है। पिछले साल रब ने बना दी जोड़ी और गजनी की प्रचारित सफलता में से झूठ और झांसे का प्रतिशत यदि निकाल दें, तो भी मानना पड़ेगा कि दर्शकों ने उत्साह दिखाया। उन्होंने शाहरुख खान और आमिर खान की फिल्मों को हिट की श्रेणी में पहुंचा कर फिल्म इंडस्ट्री को भरोसा दिया कि हमेशा की तरह उम्मीद कायम है।
साल के पहले दिन अगले 364 दिनों की भविष्यवाणी कर पाना पंडितों के लिए आसान होता होगा। ग्रहों की दिशा से वे भविष्य का अनुमान कर लेते हैं। हम फिल्मी सितारों की दशा और दिशा से भविष्य का अनुमान लगा सकते हैं, लेकिन भविष्यवाणी नहीं कर सकते, क्योंकि दर्शकों का मिजाज कब और क्यों बदलेगा, यह कोई नहीं जानता। सच तो यह है कि वे किसी बड़े सितारे की फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरा सकते हैं, तो किसी नए सितारे को लोकप्रियता के आकाश में चमका भी सकते हैं। ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कुछ भी हो सकता है, लेकिन यदि सफल फिल्मों का बारीकी से अध्ययन करें, तो दर्शकों की रुचि को रेखांकित किया जा सकता है। केवल यही नहीं, ऐसा करके कुछ सूत्र और समीकरण भी खोजे जा सकते हैं। गणित और हिंदी फिल्मों में एक फर्क है। गणित में एक समीकरण से कई सवाल हल किए जा सकते हैं। फिल्मों की सफलता का समीकरण हर फिल्म के साथ बदल जाता है।
पिछले साल के अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिंदी फिल्मों के दर्शकों में अब परिपक्वता आई है और इसीलिए वे नए और अपारंपरिक विषयों पर बनी फिल्मों को भी पसंद कर रहे हैं। उन्होंने अपने समर्थन में बड़े और छोटे का खयाल नहीं रखा। उन्हें एक तरफ सीमित बजट में नए चेहरे को लेकर बनी फिल्म पसंद आई, तो उन्होंने दूसरी तरफ बड़े सितारों की भव्य फिल्में भी दरकिनार कर दीं। उन्हें तो मनोरंजन चाहिए। मनोरंजन की दुनिया में वर्चस्व की राजनीति बदलती है। लोकप्रियता के क्षेत्र में आरक्षण नीति नहीं चलती। यहां सफलता हमेशा एक संभावना है, जिसके लिए जोखिम उठाना पड़ता है और अंधेरे में छलांग लगानी ही पड़ती है। कोई भी निर्देशक फिल्म के बारे में सोचते समय दर्शकों के संभावित समर्थन का अंदाजा नहीं लगा सकता। फिर भी एक तथ्य सामने आ रहा है कि फिल्म की रिलीज के पहले ही दर्शक मन बना चुके होते हैं। वे तय कर चुके होते हैं किआगामी फिल्म पर कितने पैसे खर्च करने हैं? अकेले देखना है, नहीं देखना है या सपरिवार देखना है। यह लगभग वैसी ही स्थिति और मानसिकता है, जैसे कि चुनाव की घोषणा से पहले समाज तय कर चुका होता है कि इस बार किसे वोट देना है? मतदान के पहले मतदाता फैसले ले चुके होते हैं।
दूसरों की कामयाबी और सफलता की संभावना ही फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को सक्रिय रखती है। इस संभावना के कारण ही वे नए विषयों के साथ प्रयोग करते हैं और कामयाबी मिलने पर उसे दोहरा कर ट्रेंड का रूप दे देते हैं। एक तरह से फिल्म व्यवसाय वास्तव में अध्यवसाय है। इसलिए यदि यहां लगन और भावावेश हो, तो मुश्किलें आसान होती चली जाती हैं। अन्यथा फिल्म बना सकना बच्चों का खेल नहीं है, क्योंकि इसमें कई जिंदगियां बर्बाद हो जाती हैं। फिल्म इंडस्ट्री की एक सफलता के पीछे अनगिनत असफलताएं रहती हैं, जिनके बारे में हम जान ही नहीं पाते! दरअसल.., पराजित और असफल व्यक्तियों की कहानी में किसी की रुचि नहीं रहती। यह मानवीय स्वभाव है। हम विजेताओं का ही इतिहास लिखते हैं। विजेता ही नायक बनते हैं। उनकी शौर्यगाथा ही पुस्तकों का रूप लेती हैं और आगामी पीढ़ी केअध्ययन का विषय बनती हैं।
नए साल में सफलता की नई कहानियां होंगी। तरंग में हम आपको उन कहानियों के नाटकीय मोड़ों से परिचित कराते रहेंगे। फिल्म इंडस्ट्री की चमक-दमक और कानाफूसी के साथ ही उन अंधेरे कोनों को भी प्रकाशित करेंगे, जहां कई आवाजें अवसर के अभाव में दम तोड़ देती हैं।