हिन्दी टाकीज-४७
पदने का शौक तो बचपन से ही था। कॉलेज तक का सफ़र तय करते करते लिखने का शौक भी हो गया ॥'धर्मयुग',' साप्ताहिक हिन्दुस्तान', 'मनोरमा ' वगैरह में रचनाएँ छपने भी लगीं .पर जल्द ही घर गृहस्थी में उलझ गयी और लिखना,पेंटिंग करना सब 'स्वान्तः सुखाय' ही रह गया . जिम्मेवारियों से थोडी राहत मिली तो फिर से लेखन की दुनिया में लौटने की ख्वाहिश जगी.मुंबई आकाशवाणी से कहानियां और वार्ताएं प्रसारित होती हैं..यही कहूँगी "मंजिल मिले ना मिले , ये ग़म नहीं मंजिल की जुस्तजू में, मेरा कारवां तो है"
फिल्मे आज भी मैं काफी देखती हूँ पर हमेशा लोगो को और शायद खुद को भी यही कैफियत देती हूँ --टाइम पास का अच्छा जरिया है.....आखिर रोज रोज कहाँ जाया जा सकता है...एक अच्छी आउटिंग हो जाती है ॥वगैरह वगैरह। पर हिंदी टाकिज में लोगो के संस्मरण पढ़ते पढ़ते मैंने भी अपनी यादों के गलियारे में झांक कर देखा तो पाया कि अरे! अपने मन में फ़िल्मी प्रेम के बीज तो मैं होश सँभालने से पहले ही बो चुकी थी और वक़्त के साथ उसकी शाखाएं ,प्रत्याशाखायें बस फैलती ही चली गयीं. यह सिर्फ टाइम पास नहीं फिल्मो के प्रति मेरी गहन आसक्ति ही है जो उम्र के हर दौर में, मेरे कदम थियेटर की तरफ मोड़ देती है .
यह फिल्म प्रेम शायद विरासत में मिला है क्यूंकि मेरे जन्म से पहले ही, मेरे घर में 'धर्मयुग' 'Illustrated Weekely ' और 'Blitz ' के साथ एक फ़िल्मी पत्रिका 'माधुरी ' भी आती थी। जिसे हमने देखा भर है पढ़ा नहीं क्यूंकि जब हम भाई बहन पढने लायक हुए तो 'नंदन' 'पराग' 'चंदा मामा' तो आने शुरू हो गए पर माधुरी बंद कर दी गयी. पापा ने पत्रिका तो बंद कर दी पर फिल्मे दिखाना नहीं बंद किया. पापा की पोस्टिंग पटना के पास एक छोटी सी जगह 'हरनौत' में थी. शायद वहां कोई पिक्चर हॉल नहीं था क्यूंकि पापा हमें फिल्मे दिखने 'बिहार शरीफ' ले जाते थे. वहां हमने 'अनमोल मोती' ' नन्हा फ़रिश्ता' 'जिगरी दोस्त' जैसी फिल्मे देखी थीं. फिल्म या फिल्म की कहानी तो नहीं याद पर हाँ, कुछ दृश्य जरूर याद हैं. औक्टोपस से लड़ते जितेन्द्र, एक प्यारी सी रोती नन्ही बच्ची और कई सारे खिलौनों से उसे बहलाने की कोशिश करते तीन डरावने लोग और पूरे कपड़ो में (शायद) नहाती एक लड़की . 'हरनौत' में हमारा घर पहली मंजिल पर था और गलीनुमा सड़क के पार ठीक हमारे घर के सामने एक अंकल रहते थे.पापा और वे अंकल अक्सर अपनी अपनी बालकनी में खड़े होकर बाते किया करते थे. उन अंकल के पास एक प्रोजेक्टर था. कभी कभी वे अपनी बालकनी में सफ़ेद चादर लगाते और प्रोजेक्टर से फिल्मे दिखाते थे.आस पड़ोस के लोग हमारी बालकनी में बैठकर उस फिल्म का आनंद लेते.पर कौन सी फिल्म होती थी क्या नाम थे ,मुझे कुछ याद नहीं ,बस परदे पर हिलती डुलती कुछ सफ़ेद काली मानव आकृतियाँ ही याद हैं .
फिर पापा का ट्रांसफ़र 'मोतीपुर' हो गया जो मुजफ्फरपुर के पास एक छोटा सा क़स्बा था।वहीँ पर मेरे 'फिल्म प्रेम' का बीज अनुकूल हवा,पानी,खाद,पाकर पल्लवित पुष्पित होने लगा.घर से दस कदम की दूरी पर एक छोटा सा थिएटर था.उस थिएटर में मम्मी,पापा तो नहीं जाते थे पर मुझे और मेरे दो छोटे भाइयों को कभी नौकर .कभी चपरासी तो कभी महल्ले के बाकी बच्चो के साथ फिल्म देखने की इजाजत थी.छोटा सा हॉल था जिसमे लेडीज़ क्लास अलग था और सारे बच्चे भी वहीँ बैठते थे. जैसा अमूमन उन दिनों छोटे शहरों में होता था, इस थिएटर में भी 'जेनरेटर' की व्यवस्था नहीं थी.यानी बिजली गयी तो फिल्म बंद.बिजली चले जाने पर हमारी पलटन शोर मचाती,दौड़कर घर आ जाया करती थी.पर हम घर के अन्दर नहीं आते ,बाहर ही उधम मचाया करते और जैसे ही बिजली आती,दौड़कर फिर हॉल की तरफ सरपट भागते. एक बार काफी देर तक बिजली नहीं आयी तो मम्मी ने घर के अन्दर आकर खाना खाने का आदेश दिया.अभी हमने खाना शुरू किया ही था कि बिजली आ गयी और हम थाली छोड़कर भागे.छोटे भाई ने तो जूठे हाथ तक नहीं धोये थे ,मम्मी ने जबरदस्ती पकड़कर धुलवाये . मेरे लाल,बैजू बावरा,धर्मपुत्र जैसी कई ब्लैक एन व्हाइट फिल्म देखी वहां . एक बार उस थिएटर में 'राजेश खन्ना' और वहीदा रहमान' अभिनीत 'खामोशी' फिल्म लगी. मम्मी को ये फिल्म देखनी थी सो उन्होंने पड़ोस में रहने वाली वीणा दी के साथ नाईट शो जाने का प्लान बनाया.मैंने और मेरे सबसे छोटे भाई ने भी बहुत जिद की. मम्मी ने छोटे भाई को तो मना कर दिया पर मुझे ले जाने को मान गयीं.भाई जोर जोर से रोने लगा तो फूलदेव उसे छत पर बहलाने ले गया.मैं जैसे ही उनलोगों के साथ जाने को निकली कि पापा ने कहा "ये क्यूँ जा रही हैं?इन्हें क्या समझ आएगा?" और मैं नहीं गयी.वो गर्मियों के दिन थे और हम छत पे सोया करते थे.आज भी याद है,कैसे हम दोनों भाई बहन एक दूसरे के गले में बाहें डाले,सुबकते सुबकते सो गए थे.
पहली पूरी फिल्म जो मुझे याद है वो थी 'उपहार' जो हमने अपने पुरे परिवार के साथ मुजफ्फरपुर के शेखर टाकीज में देखी थी।फिल्म बहुत ही अच्छी लगी थी और आज भी हमारी पसंदीदा फिल्मो में से एक है.अभी भी मुझे याद है जया भादुरी को स्लेट पर 'क ख 'लिखते देख मेरे छोटे भाई ने कैसे चिल्ला कर कहा था 'अरे!! इतनी बड़ी हो गयी है और इसे लिखना भी नहीं आता?' सब लोग मुड कर देखने लगे थे और मैं शर्म से पानी पानी हो गयी थी.मुजफ्फरपुर ले जाकर हमें चुनिन्दा बच्चों वाली फिल्मे ही दिखाई जाती.वहां के 'शेखर' 'दीपक' 'अमर' 'प्रभात' टाकिज में कई फिल्मे देखीं जैसे परिचय,बावर्ची अनुराग,सीता गीता ॥परिचय देखने के बाद तो मैं जया भादुरी की जबरदस्त फैन हो गयी.किसी भी पत्रिका में उनकी छपी फोटो या आर्टिकल देखती तो तुंरत काटकर जमा कर लेती.हाल में ही मैंने 'सुकेतु मेहता' की लिखी किताब 'Maximum City 'पढ़ी.उसमे उन्होंने अमिताभ बच्चन के ड्राईंग रूम में लगी एक पेंटिंग का जिक्र किया है जिसमे कुछ बच्चे बायस्कोप देख रहे हैं.शायद सुकेतु मेहता को भी ये नहीं पता (वरना अपनी किताब में इसका जिक्र वो जरूर करते) कि दरअसल वो पेंटिंग नहीं है बल्कि सत्यजित राय की फिल्म महानगर के एक दृश्य की तस्वीर है जिसमे उन बच्चों में फ्रॉक पहने जया भादुरी भी हैं. ये फोटो भी मैंने किसी पत्रिका से काटकर अपने संकलन में शामिल कर ली थी और काफी दिनों तक मेरे पास थी. जया, भादुरी से बच्चन बन गईं,फिल्मो में काम करना छोड़ दिया पर मेरी loyaltyवैसी ही बनी रही.जब एक फिल्म फेयर अवार्ड में उन्होंने मंच पर से कड़क आवाज में सारे करेंट अभिनेता,अभिनेत्रियों को उनकी अनभिज्ञता पर जोरदार शब्दों में डांट पिलाई (क्यूंकि किसी अभिनेत्री ने सुरैया के निधन की खबर सुनकर बड़ी अदा से यह पूछा था "वाज सुरैया मेल औ फिमेल?")तो उनके प्रति आदर और बढ़ गया .ऐसे ही एक बार सिमी गरेवाल के टॉक शो में जया कुछ बता रही थीं और अमिताभ ने बार बार 'अ..अ' कहते हुए उन्हें टोकने की कोशिश तो की पर पूरी तरह टोकने की हिम्मत नहीं जुटा पाए तो बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ,इतना बड़ा सुपरस्टार जिसे हिंदुस्तान में तो क्या विश्व में भी कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता पर हमारी आइडल ने कोई भाव ही नहीं दिया .खैर ये लिबर्टी जया ने शायद उनकी पत्नी होने के नाते ली थी.लेकिन उनका प्रखर व्यक्तित्व समय के साथ कभी धूमिल नहीं हुआ.
देख ली न आपलोगों ने बानगी, जया की बात निकली तो फिर दूर तलक गयी।लौटते हैं अपने हिंदी टाकिज की ओर.फिर मैं मुजफ्फरपुर के चैपमन गर्ल्स स्कूल के हॉस्टल में रहने चली गयी.फिल्म देखना करीब,करीब बंद.पर हॉस्टल में मेरे फ़िल्मी ज्ञान का सिक्का जम गया क्यूंकि मैं जब छुट्टियों में घर जाती तो 'धर्मयुग' में नयी नयी फिल्मों की समीक्षाएं पढ़कर अपनी उर्वर कल्पनाशक्ति से ऐसा खाका खींचती कि सब समझते ,मैं वह फिल्म देखकर आयी हूँ जबकि मैंने कोई ब्लैक एन व्हाइट या कोई सुपर फ्लॉप रंगीन फिल्म देखी होती,एक हमारी सिनियर थीं ,चंद्रा दी, वो भी फिल्मो की शौकीन थीं और सचमुच में फिल्मे देखा करती थीं.एक बार उन्होंने किसी फिल्म के एक दृश्य की चर्चा की और मैं इधर उधर देखते हुए बात बदलने की कोशिश करने लगी.वो समझ गईं ,मैंने वो फिल्म नहीं देखी है ,पर शुक्रगुजार हूँ उनकी,उन्होंने मेरी पोल नहीं खोली.
कुच्छ सालों बाद,पापा का ट्रान्सफर समस्तीपुर हो गया।यहाँ पापा अपने काम में काफी व्यस्त हो गए और फिल्मों में उनकी दिलचस्पी ख़त्म सी हो गयी.हालाँकि समस्तीपुर में तीन अच्छे सिनेमा हॉल थे.सपरिवार फिल्म देखना तो बंद हो गया पर मम्मी कभी कभी फिल्म दिखाने ले जातीं.एक बार अचानक हमलोगों ने 'नूरी' फिल्म देखने का प्लान किया. झटपट रिक्शा लेकर भोला टाकिज पहुंचे और टिकट लेकर अन्दर चले गए.परदे पर 'पूनम ढिल्लों'के ताजे खिले मासूम चेहरे की जगह जब रेखा की तीखे नैन नक्श वाली सांवली सलोनी सूरत नज़र आयी तो तसल्ली हुई,चलो हमने फिल्म मिस नहीं की,ये तो ट्रेलर चल रहा है.पर जब काफी देर तक ट्रेलर ख़त्म नहीं हुआ तो हमें शक हुआ कि 'नूरी' फिल्म बदल चुकी है.हमने जल्दबाजी में सामने लगे पोस्टर पर नज़र ही नहीं डाली और अन्दर चले आये.अब बगलवाले से पूछें कैसे?कितना बेवकूफ समझेंगे हमें.तभी अमिताभ बच्चन ने 'खून पसीने की जो मिलेगी तो खायेंगे.....' गाना शुरू किया और हम समझ गए ये फिल्म है 'खून पसीना'समस्तीपुर में एक सहेली बनी सीमा प्रधान जो ठीक भोला टाकिज के सामने रहती थी.उसके साथ मैंने बहुत सारी फिल्मे देखीं.भोला टाकिज में रविवार को मार्निंग शो सिर्फ लड़कियों के लिए रिजर्व रहता था.उस शो में फिल्मे देखने का अपना ही मजा था.शोर मचाना,एक्सपर्ट कमेंट्स देना,जोर जोर से गाने गाना,कई लड़कियां तो सिटी भी बजाती थीं,यानी 'पूरा अपना राज़' एक बार पड़ोस में रहने वाली सुधा और बिंदिया को मार्निंग शो में एक फिल्म देखनी थी,वो लोग मुझसे भी जिद करने लगीं,चलने को.पर मैं सीमा को इत्तला नहीं कर पायी थी.मुझे याद है,सुबह सुबह मैं उसके घर जा धमकी.सीमा सो रही थी,उसे बिस्तर से उठाया,किसी तरह ५ मिनट में तैयार होकर,वह हमारे साथ फिल्म देखने आ गयी. ऐसा था उन दिनों फिल्मो का बुखार.पर हमलोग गिनी चुनी अच्छी फिल्मे ही देखते थे और परीक्षा के आस पास फिल्मों का नाम भी नहीं लेते थे,शायद इसीलिए हमारे अभिभावकों ने कभी मना भी नहीं किया.हाँ!अगर कभी पापा, घर में फिल्मो की चर्चा करते सुन लेते तो जरूर कहते "तीन घंटे हॉल में और तीस घंटे घर में,ये गलत बात है" और हम सब चुप हो जाते.
मैं स्कूल हॉस्टल से एम।डी.डी.एम कॉलेज हॉस्टल में आ गयी.पर वह हॉस्टल था या जेल?आज भी नहीं सोच पाती, कैसे हम महीनो उस चारदीवारी में कैद रहते थे? जहाँ कालेज गेट तक जाने कि इजाज़त नहीं थी,उन दिनों वार्डेन से छुट्टी लेकर बाहर जाने की भी अनुमति नहीं थी.पर हम उसी दुनिया में खुश रहते थे.कभी कभी मेरी लोकल गार्जियन बुआ अपने घर ले जाती और अपनी बेटी के साथ ले जाकर सिनेमा भी दिखा लातीं.
एक बार मुझे कालेज से भी फिल्म देखने जाने का मौका मिला था।जब मैं फाईनल इयर में थी.कालेज फेस्टिवल को सफल बनाने में हमने बहुत मेहनत की थी. रात दिन एक करके पोस्टर बनाए थे.स्टाल लगवाए थे॥एक लेक्चरार राधिका दी कि देखरेख में सारा इन्तजाम हम छह लड़कियों ने किया था.प्रिंसिपल बहुत खुश हुईं और हमें इनामस्वरूप राधिका दी के संरक्षण में एक फिल्म देखने कि अनुमति दी.राधिका दी को शायद ज्यादा रूचि नहीं थी.उन्होंने प्रिंसिपल से तो कुछ नहीं कहा पर हमलोगों से बोलीं 'तुमलोग चली जाना ,मुझे कुच्छ काम है' बाकी सारी लड़कियां ख़ुशी से उछल पड़ीं और कल नून शो में कौन सी फिल्म देखी जाए,इसका प्लान करने लगीं.पर मैं डर गयी क्यूंकि बाकी सब लड़कियां dayscholar थीं अकेली मैं ही हॉस्टल से थी.डर लगा अगर किसी जान पहचान वाले ने देख लिया तो सोचेंगे, मैं हॉस्टल से भागकर फिल्मे देखती हूँ.सहेलियों ने समझाया भी 'अगर पूछे तो सच बता देना, प्रिसिपल ने खुद परमिशन दी है'पर मुझे पता था,सामने से कोई नहीं पूछेगा,सब एक दुसरे को बताएँगे और सारे रिश्तेदारों में बात फ़ैल जायेगी और अगर मम्मी ,पापा तक बात पहुँच गयी तो समझो, शामत.
सहेलियों ने इसका भी हल ढूंढ निकाला।किसी लड़की से चार घंटे के लिए बुरका उधार लेने की बात भी कर डाली.शायद फिल्म देखने से भी ज्यादा थ्रिल, बुरका पहनने का था ,मैं भी सहर्ष तैयार हो गयी.सब बहुत उत्साहित थे और तय किया, एक बार हॉस्टल चलकर बुर्के का ट्रायल कर लिया जाए ताकि सड़क पर चलने में कोई परेशानी न हो.सब सहेलिया भी एक एक बार पहन कर देखना चाहती थीं.हमारे कालेज के कॉमन रूम में एक रैक पर लड़कियां अपना बुरका रखती थीं.हमने उस लड़की से इजाज़त लेकर बुरका लिया और हॉस्टल कि तरफ प्रस्थान किया.पर जैसे ही मैंने बुरका पहनने का उपक्रम किया,पसीने और किसी सस्ते परफ्यूम की मिलीजुली गंध का ऐसा झोंका आया कि मेरी सांस रूकती सी लगी.फिर तो किसी ने भी बुरका पहन कर देखने का साहस नहीं किया.और मैंने जीवन में बुरका पहनने और कॉलेज से जाकर सिनेमा देखने का एकमात्र सुनहरा मौका खो दिया.
छुट्टियों में घर जाती तो टी।वी.पर भी फिल्म देखने का मौका मिलता पर मैं कभी आराम से बैठकर फिल्म नहीं देख पाती. वज़ह? सबके बैठने कि व्यवस्था करती,मुझे ही जगह नहीं मिलती.बीच की टेबल हटाकर दरी बिछाई जाती,जिसपर बच्चे बैठते,सोफे पर पापा के मित्र विराजमान रहते.दरवाजे के बहार कुछ कुर्सियां लगाईं जातीं जिसपर मम्मी और आस पड़ोस की लड़कियां बैठती,मैं कभी दरवाजे के बाईं तरफ से झांकती कभी दायीं तरफ से.तसल्ली से बैठकर देखना कभी मयस्सर नहीं हुआ.गर्मी की छुट्टियों में ननिहाल में हम सब भाई बहनों का कुनबा जुटता तो किराए पे वी.सी.आर.मंगवाई जाती.पूरी रात जागकर हम तीन तीन फिल्मे देखा करते.और सुबह बड़े लोगों से नज़रे बचाकर आपस में कहते,'किसी भी फिल्म का कुछ भी याद नहीं' लेकिन फिर कुछ ही दिनों बाद फिर से वी.सी.आर.मंगवाने की जिद करते.
समस्तीपुर से पापा का ट्रान्सफर 'गिरिडीह' हो गया।यहाँ बिलकुल पड़ोस में ही एक सहेली मिल गयी 'रूबी'.भगवान शायद पहले से ही इन्तजाम करके रखते थे या अगर स्पिरिचुअल गुरु 'दीपक चोपडा'या आजकल के युवाजनों की गीता 'The secret' के रचयीता 'Rhonda Byrne' के शब्दों में कहें तो शायद ये 'Law of Attraction ' था.उम्र के हर पड़ाव पे मुझे सामान रूचि वाले मित्र हमेशा मिलते रहे.गिरिडीह के सिनेमा हॉल ज्यादा ख़ूबसूरत,ज्यादा बड़े और साफ़ सुथरे थे.यहाँ के तीनो हॉल में रूबी के साथ नून शो में कई फिल्मे देखीं.पर डी.सी.में सिर्फ हम दो सहेलियां ही हुआ करती थीं.एक बार एक मजेदार वाकया हुआ. जूही चावला की कोई फिल्म थीं और वो हाथ में चाकू लिए विलेन से जूझ रही थीं.मैं सीन में एकदम इन्वॉल्व हो गयी थी कि अचानक एक छोटे से बच्चे ने पूछा 'कोल्ड ड्रिंक'लेंगी और मैं इतनी जोर से डर गयी कि आजतक सोचती हूँ, मैं चिल्लायी कैसे नहीं?
बिहार में आपराधिक गतिविधियों और लड़कियों की असुरक्षा को लेकर हमेशा बातें की जाती हैं।पर मैंने बिहार के छोटे शहरों में सहेलियों के साथ बिना किसी एस्कॉर्ट के फिल्मे देखी हैं.और कभी किसी अशोभनीय घटना का सामना नहीं करना पड़ा.छेड़छाड़ तो दूर ,कभी फब्तियां तक नहीं कसी गईं.अब मैं plain lucky हूँ या फिर ये भी 'Law of Attraction ' का कमाल है, मुंबई में भी मेरी कुछ बहुत ही अच्छी सहेलियों का ग्रुप है जिनके साथ मैंने,'मीनाक्षी, खामोश पानी, चमेली ,मिस्ट्रेस ऑफ़ स्पाइसेज़,१५ पार्क एवेन्यू ,अनुरनन, रीडर जैसी कलात्मक देखी हैं.इन सारी सहेलियों के सरनेम 'मेनन' 'अय्यर', 'शेट्टी' , 'चाफेकर' हैं. जाहिर है,एक को छोड़कर बाकी सब दक्षिण भारतीय हैं पर हिंदी कला फिल्मो में इनकी रूचि देख सुखद आश्चर्य होता है.बस एक बार हद हो गयी जब ये लोग जबरदस्ती मुझे अपने साथ सुपरहिट तमिल फिल्म 'आर्यन' दिखाने ले गईं .उसके हीरो 'सूर्या' की सब जबरदस्त फैन हैं.मैंने भी कहा 'मेरे साथ अब तुमलोगों को एक भोजपुरी फिल्म देखनी पड़ेगी'.सबने समवेत स्वर में कहा 'वी वोंट माईंड' पर मेरी हिम्मत नहीं है इन्हें भोजपुरी फिल्म दिखाने की.कुछ राज़, राज़ ही रहें तो बेहतर.
१.प्यासा २.कागज़ के फूल ३.गाईड ४.अर्थ५.बेमिसाल६.चुपके चुपके ७.पिंजर ८.हैदराबाद ब्लूस ९.इकबाल १०.१५ पार्क एवेन्यू

21 comments:
रश्मि जी, आपने बहुत ही उम्दा तरीके से अपना बचपन और फिल्मी जानकारियों को शब्दों की शक्ल दी है. अच्छे लेखन के लिये बधाई.
bahut dino bad itni khubsurat yaad...wo bhi hindi spl.....
per ye sab to tum hin karsakti....
tabhi to tumhari alag pahchan hai hum sab me....main ye print bua phupha jee ko curiar kar rhi hun koi aitraj to nahin...main to thanks ajj ki tecnology ko karti hun jis ki wajah se ajj sab kuch apne wash ka hai...(apne app ko express karne bhi....)or hum sab tak apni baton ko khubsurati se pesh karne ka bhi....app ki kala ko baram bar..... dua haiii badh the hin jane kaaa........
tikku
bahut khuub, achha laga bihar ke cinema hall me flm dekhne ke anubhavon ko shabdon me pirokar logo ke samne banchne ka.
मैं तो मैडम की सरस और प्रवाहमय हिन्दी पर ही मुग्ध हुआ। संस्मरण भी बेहतरीन है।
good write up here....loved some brilliant hindi words used by you since we dont find them around much these days ....log toh matlab bhi nahi samajh paate ....jaanane ki toh baat dur ki kaudi hai ....maine bhi school days mein hindi saahitya ka kaafi manthan kiya hai fansihwar naath, premchand aur bhi pataa nahi kaun kaun se writer jinkaa naam toh yaad nahi per unki lekhni ne jeevan per amit chhaap chhoodi hai ...chawaanni chhaap is quite a name though....good that i found this one blog ....likhte rahiye
wowwww rashmi it was really well written, reading it i littrly went recolecting my younger days though wasnt as intresting as yours,as u cud see movies with ur frnds from whch i was restricted as my dad was real strict but inspite had seen movies with frnds once or twice wthout his knowledge hehehe.anyways continue writing and let your brighter part come out....ALL THE BEST...
beautifuly written, your experiance about hindi cinema - hats off, excellent use of hindi words -
Filmi safar pada...............achcha tha.
bahuut khuub!
Its really pleasure for me to read a blog which is written so astehtically and beautiful combination of hindi words. i am a hardcore beliver into Bhartendu harshchandra quote, ;Nij Bhasa unnati ahai,Sab Unnati ka mool". the write of this blog took me to my memories of college days which i spent in varansi , almost same environment as bihar. Although i was not so fond of watching movie, and i think it was due to my commitment towards my study.Lekin Iska matalab ye nahi nikanala chahie ki mujhe filme pasand nahi hai, maine khoob sari filmi magzine padhi jo mere filmi gyan ke neev hai. Mujhe BLOG ka wakya vinyas accha laga aur bhasa ka dharapravah bhi ullekhniy hai. Aisa lagta hai jaise lekhika me is vidha ki chupi hui janmjat pratibha hai, jise bahar aana hi chahiye, chahe wo unke apne swantah sukhay ke liye hi kyo na ho lekin hum jaise readers ke liye unka swantah sukhay humare liye nitant khushi pradatt karne wala hoga. Mujhe likhna to bahut kuch tha lekin itna kahte hue samapt karunga ki lekhika sadhuvad ki patra hai aur unhe apne lekhan se hum jaise unke Fans ko anugrihit karte rahna chahiye.
Ashish
amazing,never thought somebody could write about something as mundane as watching movies in such beautiful words.Left me spellbound and you with a new admirer.excellent.
Well written Rashmi Bihari.
JAI MAHARASHTRA.
Mr.Raj Thakarey
I agree with mamta. that something as mundane as movie viewing could take on such delicious hues. of course, we all knew you were an excellent writer. Now a lot more people know too. :) By the way, we mumbaikars also see a lot of good films. we are not all just the single dimensioned people you read about or may have come across!
its very rare now a days to read such a beautiful article which pulls us back to the younger dayz of our lives...the selection of words in our mother tongue makes it even more acceptable and mersmerising. through this write up one can easily draw an outline of the older days. its simply excellent!! congrats!! we r proud of u!!
poora poora eka saansa men padh gayi, kitana kuchh milata julta sa paya, apane anubhavon ke saath. eka lambe antraal ke anubhavon ko simit daayare men sameta kar prastut karana bahut achchha laga.
tumko aur isa shrankhala ko aage le jaane vaalon se anurodh hai ki isako isi tarah se aage badhate rahe. ham sabke anubhavon se vaakiph hote rahen.
Thanx friends..thanx allot..i am overwhelmed(n little embarrassed too:))...never expected such response..ur comments will b a catalyst to me n will encourage me to write more..
Khushi hui jaankar ki aaplogon ko meri yaadon ki galiyon me mere saath do pal chalna achha laga..bahut bahut shukriya.
hey very good bhut accha ha
wow its a wonderful write-up. I wish even i could write abt my memories........ from? nd i definitely dont know to place such words in meaningful sentences....other wise i would write abt my experience in Canada. anyways I am happy that some friend of mine has this god gift. I wish you keep writing......
रश्मि जी हमारे एक दोस्त कहते है की वे भी एक ब्लॉग बनाना चाहते है जिसका नाम कुछ यूँ हो .इन फिल्मो के देखे बगैर न मरे ....सच बतायूं बचपन से दो चीजो से मोहब्बत ज्यादा रही किताबो ओर फिल्मे ....यूँ भी हमारी एक तमन्ना रही है के एक ऐसा कमरा हो जसमे सिफर फर्श पे एक गद्दा हो .दीवार पे एक बड़ा स्क्रीन ....साड़ी पसंदीदा फिल्मो की डी वी डी...गुलज़ार के सारे नगमे....ढेरो किताबे ...उस कमरे पे घुसते ही मोबाइल स्विच ऑफ़ हो जाये .....वैसे कभी वर्ल्ड मूवी पे भी देखिएगा .कल ही रात एक अरब मूवी देखि थी अल्टीमेट .नाम था मिरर .एक छोटी बच्ची की कहानी है
आप पटना नहीं आई कभी ? यहाँ भी बहुत सारे सिनेमा हॉल हैं...
Bahut hi mazedar aur chatpati baaten padhne ko mili.Bihar ko dekhne samajhne ke behtar prasang shamil hain issme. filmen kya mahatwa rakhti hai jeevan me,yeh batane ke liye main inke likhe ko aage kar sakta hun. thanx.
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