आरिफ शेख की फिल्म लेट अस डांस इस मायने में प्रशंसनीय है कि पहली फिल्म होने के बावजूद उन्होंने घिसी-पिटी प्रेम कहानी नहीं चुनी। उन्होंने डांसर सुहानी के माध्यम से कुछ कर गुजरने की जिद को अच्छी तरह चित्रित किया है। फिल्म की कमजोरियां पटकथा, सेट और निर्माण में दिखती हैं। अगर निर्देशक को मजबूत समर्थन मिलता और वह पटकथा पर थोड़ा ध्यान देते तो लेट अस डांस खूबसूरत म्यूजिकल बन जाती।
सुहानी डांसर है। वह डांस स्कूल भी चलाती है। वहां वह समाज के वंचित, सड़क छाप बच्चों को डांस की ट्रेनिंग देती है। उसकी एक ही इच्छा है कि ये बच्चे डांस करें और अपनी कला का प्रदर्शन सही मंच से करें। उसका अपना भी संघर्ष है। दोनों संघर्ष विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। सुहानी किसी तरह अपने सपने साकार करने के करीब पहुंचती है तो उसे गहरा भावनात्मक और पेशागत झटका लगता है। आभास होता है कि सब कुछ बिखर गया। फिर भी वह हिम्मत नहीं हारती। नए सिरे से कोशिश करती है और आखिरकार कामयाब होती है।
सुहानी की भूमिका में गायत्री पटेल जंचती हैं। वह अच्छी डांसर हैं। नृत्य में उनकी भाव मुद्राएं और गति आकर्षित करती हैं। समान्य कद-काठी की गायत्री का सौंदर्य उनके डांसिंग स्टेप्स में दिखता है। नाटकीय और भावनात्मक दृश्यों को वह निभा ले जाती हैं। पटकथा की कमजोरी से बाकी चरित्रों का गठन नहीं हो पाया है। इस वजह से वे किरदार और उन्हें निभा रहे कलाकार कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते। किशोर उम्र के टपोरी की भूमिका निभा रहे बाल कलाकार के अभिनय में सहजता है। प्रेम कहानी पर फोकस नहीं था तो उसके ट्रैक की क्या जरूरत थी?
इस फिल्म में गीत, संगीत और कोरियोग्राफी महत्वपूर्ण है। कोरियोग्राफर ने नए स्टेप्स दिए हैं, लेकिन गीत-संगीत प्रभावशाली नहीं है। फिल्म की धुनें और बोल याद नहीं रह पाते। अंत में इतना कहा जा सकता है कि आरिफ शेख अपनी पहली फिल्म में अनेक सीमाओं के बावजूद संभावनाएं जाहिर करते हैं।
रेटिंग : **
कामेडी कम, कंफ्यूजन ज्यादा- पेइंग गेस्ट
बड़ा नाम सुना था परितोष पेंटर का। मुंबई के रंगमंच के चिर-परिचित परितोष की फिल्म पेइंग गेस्ट से उस नाम के अनुरूप ही उम्मीद थी। उम्मीद तो टूटी ही, फिल्म देखकर घोर निराशा हुई और अफसोस हुआ कि सुभाष घई की प्रोडक्शन टीम को क्या हो गया है? उनकी टीम अच्छी स्क्रिप्ट क्यों नहीं चुन पा रही है?
आवास की समस्या से परेशान युवकों में से दो लड़की का रूप धारण कर दंपती बन जाते हैं और एक मकान में रहने लगते हैं। आवास की यह समस्या हम गोलमाल और गोलमाल रिटर्न्स में ज्यादा मनोरंजक अंदाज में देख चुके हैं। और फिर नए लड़कों के बीच जावेद जाफरी पूरी तरह मिसफिट लगते हैं। हंसाने का जानी लीवर का घिसा-पिटा तरीका अब ऊब पैदा करता है। असरानी और पेंटल को हमारे निर्देशक कुछ नया दे ही नहीं पाते। गौरतलब है कि पेंटल एफटीआईआई में अभिनय के शिक्षक हैं।
पूरी फिल्म बैंकाक में शूट की गई है। पृष्ठभूमि की आधुनिक भव्यता तभी सुंदर लगती है, जब सामने चल रहा ड्रामा दर्शनीय हो। पेइंग गेस्ट में कामेडी कम, कंफ्यूजन ज्यादा है।
रेटिंग :*






2 comments:
thanx for saving money. i wanted to watch 'paying guest' but now i have dropped idea.
Maza aa gaya ji
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