
हिन्दी टाकीज-4०
अंजलि कुजूर स्कूल में पढ़ाती हैं। अखबारों में लिखती हैं और भरपूर जिंदगी जीती हैं। उनसे बहस करने के किसी को भी बाद अपने आप शक हो सकता है। उनके छात्र उनसे डरते हैं, मगर unhen अफसोस है कि उनका इकलौता बेटा हर्ष उनसे बिल्कुल नहीं डरता।
बचपन में कितनी फिल्में देखी याद नहीं लेकिन कॉलेज में अपनी दोस्त के साथ जो फिल्म देखी, उसे आज तक नहीं भूल पायी। मेरी वह प्यारी दोस्त नेपाल की रहने वाली थी। कॉलेज में मैं और मेरी दोस्त अपनी दोस्ती के लिए सभी के बीच जाने जाते थे।
हमारी रुचि और रहन-सहन को देखकर हमारे प्रोफेसर हमेशा कहा करते थे -'यह जोड़ी गजब की है, एक पूरी तरह देशी और एक बॉर्डर पर की, फिर भी क्या दोस्ती है। हम साथ-साथ क्लास करते घूमते, चाट और गोलगप्पे खाते। सचमुच वह बहुत प्यारे दिन थे। खैर, बात फिल्म की। एक दिन हमने तय किया कि क्लास बंद करके फिल्म देखी जाये। उस समय मैं किसी खास हीरो-हीरोइन के फैन नहीं थी। पर मेरी दोस्त जूही चावला की बहुत बड़ी फैन थे। उसके पास जूही चावला के ढेरों फोटोग्राफ्स थे, जिसे वो सारे दोस्तों को दिखाया करती थी। तो तय हुआ। ' हम हैं राही प्यार के' देखी जाये। फिल्म में जूही के पिताजी उसकी शादी अपनी जाति के (मद्रासी) लड़के से तय कर देते हैं। जूही को लड़का पसंद नहीं आने के कारण वो भाग कर मेले में चली जाती है। वहां से उसे तीन बच्चे अपने मामा (आमिर खान) के घर ले आते हैं। तब शुरू होती है फिल्म की असली कहानी। साथ रहते हुए जूही और आमिर खान एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं। पर आमिर की कंपनी एक सेठ के हाथें गिरवी है, जिसकी बेटी आमिर को पसंद करती है और उससे शादी करना चाहती है। मुझे वह सीन अब भी याद है जब जूही परेशान होती है। उसकी परेशानी देखकर मेरी दोस्त भी रो पड़ी थी। बड़ी मुश्किल से मैंने उसे चुप कराया था। यह क्रम सिनेमा हॉल में कई बार दोहराया गया। कहा जा सकता है कि मेरा समय फिल्म देखने में कम और उसे चुप कराने में ज्यादा बीता था। हाल यह था कि फिल्म के खत्म होते-होते मेरी दोस्त की आंखें रोते-रोते पूरी तरह से लाल हो चुकी थीं। हालांकि वह कामेडी फिल्म थी। मुझे यह सोचकर और हंसी आ रही थी कि यह लड़की उदास कर देने वाली ट्रेजेडी फिल्में कैसे देखती होगी।
दूसरे दिन कॉलेज पहुंचकर इस किस्से को दोस्तों के सामने बयां की तो सभी खूब हंसे। पर हमारी मस्ती की यह कहानी तब क्लाइमेक्स पर पहुंची जब प्रोफेसर ने हम दोनों से पिछले क्लास से संबंधित प्रश्न पूछे। जवाब नहीं मिलने पर बुरी तरह डांटा। हमें डांट सुनते देख सभी के चेहरों पर हंसी आ रही थी। हमें बाद में पता चला कि प्रोफेसर ने हमें कॉलेज के गेट से बाहर जाते पहले ही देख लिया था। बहरहाल इस डांट का असर ये हुआ कि हमने दोबारा क्लास मिस कर कभी फिल्म न देखने की कसम खायी। लेकिन उन दिनों फिल्मों का मोह ऐसा था कि जल्दी ही यह कसम टूट गयी।
उन दिनों मैं हजारीबाग के एक हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही थी। हॉस्टल की हेड एक सिस्टर थी। हास्टल की लड़कियों पर कड़ी नजर रखी जाती थी। किससे मिलना है, कब मिलना है, यह सब सिस्टर तय करती थी। कहीं आने-जाने का समय निश्चित था। अनुशासन तोड़ने का मतलब था कड़ी सजा की भागीदार बनना।
लेकिन कॉलेज के दिनों में घर से बाहर यदि लड़कियां एक साथ रहें तो शैतानियां और बदमाशी न हो, यह नामुमकिन जैसा है। ऐसे में हमारा मन सिनेमा देखना किसी बड़े युद्ध को जीतने के बराबर था। लेकिन उन दिनों भागकर सिनेमा देखने का रोमांच ही अलग था। बल्कि सिनेमा देखने का कम और किसी की नजरों से बचने का रोमांच ही अलग था। बल्कि सिनेमा देखने का कम और किसी की नजरों से बचने का आनंद अधिक आता था। हम लड़कियां अक्सर भागकर फिल्म देखने चली जातीं और चुपचाप चली आतीं। सिस्टर को किसी ने इसके बारे में बता दिया था। लेकिन रंगे हाथों नहीं पकड़ पाने के कारण वह काई कार्यवाही नहीं कर पाती थी। कई तरह की वार्निंग दी जाती पर हम लड़कियां आदत से बाज नहीं आतीं। एक दिन तय हुआ कि शाहरुख खान की सुपरहिट फिल्म देखी जाए। हम तय समय पर एक-दो, एक-दो करके निकले ताकि किसी को खबर न हो। रात में ही बीस लड़कियों के पैसे जमा कर लिये गये। तय यह हुआ कि एक लड़की टिकट कटा लेगी और बाकी हम सब तय समय और स्थान पर मिलेंगे। सब कुछ योजनानुसार हो रहा था। हम सब निश्चित जगह जमा हो कर फिल्म हॉल में घुस भी गये। लड़कियां हल्ला करने, कमेंट करने में लड़कों से पीछे नहीं थीं। तीन घंटे खूब मस्ती में बीते। फिल्म खत्म होने पर हम लड़कियों का झुंड हंसते-खिलखिलाते बाहर निकलने लगा। उस हॉल में अंदर जाने का एक दरवाजा था और बाहर निकलने का एक। उस दरवाजे से बाहर आने पर हमारे होश उड़ गये। हेड सिस्टर वहां हमारे स्वागत में पहले से खड़ी थी।
हम सब की हालत खराब। मुंह लटकाये हम एक-एक कर बाहर निकलते जाते और सिस्टर हमारा नाम नोट करती जाती। शायद सिस्टर को गुप्त सूत्रों से हमारे फिल्मी कार्यक्रम के बारे में पता चल गया था। आखिर उस दिन हम रंगे हाथों पकड़े गये। उसके बाद सिस्टर ने हमारी क्या दुर्गति की, उसे यहां नहीं किया जा सकता।
पसंद की दस फिल्में -
1.मैं हूं ना
2.कहो ना प्यार है
3.गाइड
4.कुछ कुछ होता है
5.शोले
6.बागबान
7.जब वी मेट
8.शूट आउट एट लोखंडवाला
9.ओंकारा
10.चक दे इंडिया
1.मैं हूं ना
2.कहो ना प्यार है
3.गाइड
4.कुछ कुछ होता है
5.शोले
6.बागबान
7.जब वी मेट
8.शूट आउट एट लोखंडवाला
9.ओंकारा
10.चक दे इंडिया





5 comments:
भाग कर फ़िल्म देखने का जो मज़ा उस्का कोई मुकाबला नही है।
बहुत उम्दा लेख....पुरानी यादें ताज़ा कर दी।
स्कूल से भागकर फिल्म देखने तो सभी जाते होंगे ...लेकिन हर किसी के साथ कोई न कोई घटना जरूर ऎसी हो जाती है जिसे वह ताउम्र याद रखता है .अंजली जी ने बहुत बढिया तरीके से फिल्म और टाकीज से जुड़े अपने अनुभवों को कलमबद्ध किया है .उन्हें मेरी हार्दिक बधाई पहुंचाएं.
हेमंत कुमार
सुन्दर संस्मरण!
अंजलि जी, आपने तो 'हम हैं राही प्यार के' और हमारे हजारीबाग का जिक्र करके एकदम से हमें नोस्टाल्जिक कर दिया। जिन दिनों आप हॉस्टल से भागकर फिल्में देखा करती थी लगभग उसी कालखंड में हम भी संत कोलम्बा कॉलेज में छात्र हुआ करते थे। हमें भी एक वाक्या याद आ रहा है... लगे हाथों साझा कर लेते हैं - बॉबी देओल, काजोल और मनीषा कोइराला की सस्पेंस, थ्रिलर फिल्म 'गुप्त' रीलिज हुई थी लक्ष्मी टॉकीज में। सौभाग्य से हम कुछ दोस्तों ने पहले ही दिन वो फिल्म देख ली और कॉलेज आकर नोटिस बोर्ड पर लिख दिया कि फिल्म में मर्डर्र "काजोल" है। फिल्म देखने से पहले ही जिन दोस्तों ने य नोटिस देखी उनकी हालत देखकर हमने खूब मजे लिये थे।
Hazaribag se khud bhi jude hone ke karan kuch purani yaadein mere bhi saamne aa gai hain. Anjali ji ko mera namaskar bhi pahunchane ka kasht karein.
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