Thursday, June 18, 2009

रोचक:एक पोस्टर के सहारे बनाई थी रामू ने ' . . .आग'

-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म बनाने के अपने पैशन की ..आग में झुलसे राम गोपाल वर्मा अभी तक उबर नहीं पाए हैं। वे खुद ही अपना मजाक उड़ाते हैं और राम गोपाल वर्मा की आग को अपनी बड़ी भूल मानते हैं, लेकिन साथ में जोड़ते हें कि ..आग ने भी दर्शकों का मनोरंजन किया। फिल्म देखकर निकले दर्शकों ने गुस्सा निकाला और नाराजगी जाहिर की। वर्मा मानते हैं कि यह भी तो एक प्रकार का इमोशन है। फिल्म क्या करती है, वह आपके इमोशन को जगाती है। मैंने भी ..आग से एक इमोशन जगाया। बहरहाल, आप जानना चाहेंगे कि उस फिल्म की भूल कैसे कर बैठे रामू? रामू के शब्दों में ही पूरा किस्सा सुनें। कुछ सालों पहले मुझे जीपी सिप्पी के पोते साशा सिप्पी का फोन आया था। उन्होंने सबसे पहले पूछा कि क्या आप शोले को फिर से बनाना चाहेंगे? शोले मेरी पसंदीदा फिल्म है, इसलिए मैंने तुरंत हां कहा और उनसे मिलने शहर चला गया। साशा ने एक स्कि्रप्ट भी तैयार कर रखी थी। उन्होंने बताया कि महबूबा ़ ़ ़ गाने के बाद गब्बर सिंह उस जिप्सी लड़की के साथ हमबिस्तर होता है। उसके बेटे का जन्म होता है, जो जूनियर गब्बर बनता है। वीरू और बसंती की शादी हो जाती है। उनके जुड़वा बेटे होते हैं। ये जुड़वां बेटे ठाकुर की बहू राधा से मिलने जाते हैं। गांव में जूनियर गब्बर उनका अपहरण कर लेता है। इस कहानी के ढांचे पर साशा शोले को नए अंदाज में सोच रहे थे। मुझे उनकी कहानी ज्यादा पसंद नहीं आई। शहर से लौटते समय दो घंटों की ड्राइविंग में मैंने शोले के बारे में सोचना शुरू किया। मैंने सोचा कि अगर उसे शहर में फिल्मांकित किया जाए तो सारे कैरेक्टर कैसे बदल जाएंगे? शोले फिल्म के चिर-परिचित संवादों को पूरा बोलने के बजाए एक-दो शब्दों में ही कह दिया जाए तो क्या इंपैक्ट होगा? मैंने जिन लोगों से इसे शेयर किया, सभी ने मेरी सोच को माइंड ब्लोइंग और फैंटेस्टिक कहा। फिल्म की योजना बन गई। एक उत्साही डिजाइनर ने फिल्म का पोस्टर डिजाइन कर लिया। उसने गब्बर सिंह को नए अंदाज में पेश किया। उसका तर्क था कि मेरी फिल्म में लिजेंड बन चुके गब्बर सिंह का फंतासी रूप होना चाहिए। मुझे उसका पोस्टर अधिक पसंद नहीं आया। मगर पहली बार पोस्टर देख रहे वहां मौजूद सात व्यक्तियों ने पोस्टर की खूब तारीफ की। उसे माइंड ब्लोइंग कहा। मैंने अपनी मूल योजना छोड़ दी और उनके प्रभाव में पोस्टर के मोह में फंस गया। मैंने पोस्टर के गब्बर सिंह की छवि पर पूरी फिल्म केंद्रित कर दी। वह पोस्टर लेकर मैं अमिताभ बच्चन के पास गया। उनकी राय ली तो उन्होंने भी माइंड ब्लोइंग कहा। शायद वे मेरी कोशिश और सोच को माइंड ब्लोइंग कह रहे थे। वे इस गलतफहमी में थे कि मैंने फिल्म के बारे में सोच रखा होगा और उनके किरदार के प्रति मेरा अपना एक विजन होगा। ऐसी कोई बात नहीं थी। हम सभी को पोस्टर ने बहका रखा था.हम सभी अपनी मूल योजना और राह से भटक चुके थे.उसी पोस्टर के हिसाब से फ़िल्म बनी.फ़िल्म का जो हश्र हुआ,उस से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ.मुझे आश्चर्य इस बात पर हुआ की कैसे सभी पोस्टर के बहकावे में आ गए और किसी ने मुझे उस '...आग' में झुलसने से नहीं रोका।
'राम गोपाल वर्मा की आग' का यह रोचक किस्सा है,लेकिन वे सात व्यक्ति कौन थे? शायद रामू कभी उनके बारे में अपने ब्लॉग पर लिखें.

1 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

रामू में कुछ तो बात है, उसकी अपने सोच होती है, चाहे बात भूत की हो या commerciality की.