-अजय ब्रह्मात्मज
यह एक निर्देशक की सच्ची कहानी है। सच्ची कहानियों में नाम नहीं देने का रिवाज है। नाम आ जाए, तो कलई खुल जाती है। एक लिहाज से ऐसा होना ही चाहिए। कई बार नाम देने से कहानी के नायक का नुकसान होता है। उसके बनते काम बिगड़ने लगते हैं। हम भी यहां निर्देशक, स्टार और प्रोडक्शन हाउस के नाम नहीं देंगे।
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित युवा निर्देशक को एक धांसू स्क्रिप्ट मिली। उसने लेखक के साथ बैठकर उसे अंतिम रूप दिया। फिल्म बाप-बेटे की कहानी थी। लिहाजा बाप के रोल के लिए आजकल कैरेक्टर रोल कर रहे पुराने जमाने के एक हीरो से बातचीत हुई। वे राजी हो गए। उनके साथ पिछली कुछ फिल्मों में सेकेंड-थर्ड लीड से खुद को साबित कर चुके हीरो को लिया गया। एक नई प्रोडक्शन कंपनी आ गई। तय हुआ कि सीमित बजट यानी चार करोड़ में फिल्म पूरी कर ली जाएगी। फिल्म की घोषणा हो गई। अखबार और टीवी चैनलों पर खबरें आ गई। निर्देशक खुश कि उसकी फिल्म बन रही है। बाप का रोल निभा रहे पुराने हीरो ने निर्देशक को घर पर बुलाया। खानपान के शौकीन हीरो ने निर्देशक को सलाह दी कि क्यों न वह यह स्टोरी उनके बेटे को सुनाता है! उनके बेटे ने हालांकि ज्यादा फिल्में नहीं की हैं, लेकिन माना जा रहा है कि वह भविष्य का सुपर स्टार है। निर्देशक ने गुरेज नहीं किया। इस बार उसने बाप-बेटे को एक साथ कहानी सुनाई। स्टोरी सीटिंग तीन घंटे चली। बेटा तो उछल पड़ा। उसने कहा, सर जी, यह फिल्म तो करनी है। उसने अपने बाप को कहा, डैड, प्लीज इनसे कहो कि हम दोनों के साथ ही यह फिल्म बनाएं। बाप ने दबाव डाला और एक फिल्मी चारा फेंका। देखो, हम बाप-बेटे एक साथ पर्दे पर बाप-बेटे के रोल में आएंगे, तो फिल्म को लेकर लोगों में बहुत ज्यादा क्योरीसिटी होगी। निर्देशक का मन डोल गया। उसकी पिछली दो फिल्में फ्लॉप रही थीं। उसने सोचा, अगर बाप-बेटे को लेकर यह फिल्म बन जाती है, तो वह बड़े डायरेक्टर में शुमार हो जाएगा।
उसने पहले हीरो से बात की। उसे किसी तरह फिल्म छोड़ देने के लिए राजी किया। उसने वादा किया कि इस फिल्म की कामयाबी के बाद वह उसे लेकर सोलो हीरो लेकर फिल्म बनाएगा। पहला हीरो राजी हो गया। वह कर भी क्या सकता था! बाप-बेटे की फिल्म की बात आगे बढ़ी। बाप ने निर्देशक से कहा कि देखो, यह फिल्म सालों बाद हमारे प्रोडक्शन हाउस से आएगी। चूंकि प्रोडक्शन के काम में मेरे भाइयों की सहमति आवश्यक है, इसलिए एक बार मेरे भाइयों को कहानी सुना दो। निर्देशक को कोई दिक्कत नहीं हुई। उसने चटपट हां कर दी। दिन सुनिश्चित हुआ। प्रोडक्शन हाउस के रुतबे के मुताबिक स्वादिष्ट लंच के साथ स्टोरी सेशन चला। बाकी भाइयों को भी कहानी पसंद आई। उन्होंने कहा कि हमलोग यह फिल्म बनाएंगे।
अगले दिन बाप का रोल निभा रहे पुराने हीरो का फोन आया। उन्होंने कहा कि मेरे भाइयों को तुम्हारी कहानी बहुत पसंद है। वे चाहते हैं कि हम बाप-बेटे की फिल्म के लिए दूसरा बड़ा डायरेक्टर सही रहेगा। तुम्हारे नाम पर फिल्म नहीं बिक पाएगी। तुम ऐसा करो कि कहानी दे दो। तुम्हारे साथ कोई और फिल्म कर लेंगे। निर्देशक ने तुरंत मना कर दिया। वह उस कहानी के दम पर बड़े निर्देशकों की जमात में आना चाहता था। उसकी जिद देखकर पुराना हीरो फिल्म के लिए राजी रहे, लेकिन उन्होंने साफ कह दिया कि फिर मेरा बेटा काम नहीं करेगा। अब निर्देशक फिर से पहले हीरो के पास लौटा। इस बार उसने मना कर दिया और ताना मारा कि जाओ भविष्य के सुपर स्टार के साथ काम करो। मजबूरन निर्देशक को एक नया संजीदा हीरो चुनना पड़ा।
संजीदा हीरो को पिछली फिल्म में अभिनय के लिए तारीफ मिली थी, लेकिन अभी उसका मार्केट नहीं बना था। पुराने हीरो ने उसका नाम सुना, तो साफ मना कर दिया। शायद वे फिल्म से बाहर होना चाहते थे। उन्हें बहाना मिल गया। अब निर्देशक ने बाप के रोल के लिए अनुभवी और अनेक पुरस्कारों से सम्मानित बुजुर्ग अभिनेता से बात की। संजीदा अभिनेता और बुजुर्ग अभिनेता की पहली फिल्म खूब सराही गई थी। उन्हें लगा कि फिर से कुछ कमाल हो जाएगा। निर्देशक भी संतुष्ट था कि चलो बहुत बड़ी कॉमर्शियल नहीं, तो ठीक-ठाक-सी अच्छी फिल्म तो बन ही जाएगी! निर्देशक नई टीम के साथ निर्माता के पास पहुंचा। निर्माता ने निर्देशक की मेहनत की तारीफ की। कुछ देर तक बहलाने वाली बातें करने के बाद उसने अपनी बात रखी। उसने कहा, इन दोनों के साथ अच्छी फिल्म बनेगी। पुरस्कार और सम्मान मिलेंगे, जिन्हें तुम अपने घर में अच्छे से सजाओगे, लेकिन मेरा क्या होगा? इस फिल्म की कोई मार्केट वैल्यू नहीं होगी। मेरे लिए इन ऐक्टरों के साथ फिल्म रिलीज करना मुश्किल हो जाएगा। इसे फिलहाल रहने देते हैं। कुछ नया सोचो। इन ऐक्टरों के साथ ही नई फिल्म पर काम करो..। किस्सा यहीं खत्म नहीं होता.. और भी समीकरण बने-बिगड़े। निर्देशक आज भी अपनी स्क्रिप्ट लिए घूम रहे हैं। आठ बार उसकी फिल्म फ्लोर पर जाते-जाते रह गई है। तभी मंदी आ गई और फिल्मी कारोबार की सारी गतिविधियां ठंडी हो गई। यह एक निर्देशक की कहानी है। हमने किसी और निर्देशक को यह कहानी सुनाई, तो उसने कहा कि अरे, मेरे साथ भी लगभग ऐसा ही हुआ था। बाद में पता चला कि यह एक-दो नहीं, लगभग सभी संभावित निर्देशकों की कहानी है..!
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित युवा निर्देशक को एक धांसू स्क्रिप्ट मिली। उसने लेखक के साथ बैठकर उसे अंतिम रूप दिया। फिल्म बाप-बेटे की कहानी थी। लिहाजा बाप के रोल के लिए आजकल कैरेक्टर रोल कर रहे पुराने जमाने के एक हीरो से बातचीत हुई। वे राजी हो गए। उनके साथ पिछली कुछ फिल्मों में सेकेंड-थर्ड लीड से खुद को साबित कर चुके हीरो को लिया गया। एक नई प्रोडक्शन कंपनी आ गई। तय हुआ कि सीमित बजट यानी चार करोड़ में फिल्म पूरी कर ली जाएगी। फिल्म की घोषणा हो गई। अखबार और टीवी चैनलों पर खबरें आ गई। निर्देशक खुश कि उसकी फिल्म बन रही है। बाप का रोल निभा रहे पुराने हीरो ने निर्देशक को घर पर बुलाया। खानपान के शौकीन हीरो ने निर्देशक को सलाह दी कि क्यों न वह यह स्टोरी उनके बेटे को सुनाता है! उनके बेटे ने हालांकि ज्यादा फिल्में नहीं की हैं, लेकिन माना जा रहा है कि वह भविष्य का सुपर स्टार है। निर्देशक ने गुरेज नहीं किया। इस बार उसने बाप-बेटे को एक साथ कहानी सुनाई। स्टोरी सीटिंग तीन घंटे चली। बेटा तो उछल पड़ा। उसने कहा, सर जी, यह फिल्म तो करनी है। उसने अपने बाप को कहा, डैड, प्लीज इनसे कहो कि हम दोनों के साथ ही यह फिल्म बनाएं। बाप ने दबाव डाला और एक फिल्मी चारा फेंका। देखो, हम बाप-बेटे एक साथ पर्दे पर बाप-बेटे के रोल में आएंगे, तो फिल्म को लेकर लोगों में बहुत ज्यादा क्योरीसिटी होगी। निर्देशक का मन डोल गया। उसकी पिछली दो फिल्में फ्लॉप रही थीं। उसने सोचा, अगर बाप-बेटे को लेकर यह फिल्म बन जाती है, तो वह बड़े डायरेक्टर में शुमार हो जाएगा।
उसने पहले हीरो से बात की। उसे किसी तरह फिल्म छोड़ देने के लिए राजी किया। उसने वादा किया कि इस फिल्म की कामयाबी के बाद वह उसे लेकर सोलो हीरो लेकर फिल्म बनाएगा। पहला हीरो राजी हो गया। वह कर भी क्या सकता था! बाप-बेटे की फिल्म की बात आगे बढ़ी। बाप ने निर्देशक से कहा कि देखो, यह फिल्म सालों बाद हमारे प्रोडक्शन हाउस से आएगी। चूंकि प्रोडक्शन के काम में मेरे भाइयों की सहमति आवश्यक है, इसलिए एक बार मेरे भाइयों को कहानी सुना दो। निर्देशक को कोई दिक्कत नहीं हुई। उसने चटपट हां कर दी। दिन सुनिश्चित हुआ। प्रोडक्शन हाउस के रुतबे के मुताबिक स्वादिष्ट लंच के साथ स्टोरी सेशन चला। बाकी भाइयों को भी कहानी पसंद आई। उन्होंने कहा कि हमलोग यह फिल्म बनाएंगे।
अगले दिन बाप का रोल निभा रहे पुराने हीरो का फोन आया। उन्होंने कहा कि मेरे भाइयों को तुम्हारी कहानी बहुत पसंद है। वे चाहते हैं कि हम बाप-बेटे की फिल्म के लिए दूसरा बड़ा डायरेक्टर सही रहेगा। तुम्हारे नाम पर फिल्म नहीं बिक पाएगी। तुम ऐसा करो कि कहानी दे दो। तुम्हारे साथ कोई और फिल्म कर लेंगे। निर्देशक ने तुरंत मना कर दिया। वह उस कहानी के दम पर बड़े निर्देशकों की जमात में आना चाहता था। उसकी जिद देखकर पुराना हीरो फिल्म के लिए राजी रहे, लेकिन उन्होंने साफ कह दिया कि फिर मेरा बेटा काम नहीं करेगा। अब निर्देशक फिर से पहले हीरो के पास लौटा। इस बार उसने मना कर दिया और ताना मारा कि जाओ भविष्य के सुपर स्टार के साथ काम करो। मजबूरन निर्देशक को एक नया संजीदा हीरो चुनना पड़ा।
संजीदा हीरो को पिछली फिल्म में अभिनय के लिए तारीफ मिली थी, लेकिन अभी उसका मार्केट नहीं बना था। पुराने हीरो ने उसका नाम सुना, तो साफ मना कर दिया। शायद वे फिल्म से बाहर होना चाहते थे। उन्हें बहाना मिल गया। अब निर्देशक ने बाप के रोल के लिए अनुभवी और अनेक पुरस्कारों से सम्मानित बुजुर्ग अभिनेता से बात की। संजीदा अभिनेता और बुजुर्ग अभिनेता की पहली फिल्म खूब सराही गई थी। उन्हें लगा कि फिर से कुछ कमाल हो जाएगा। निर्देशक भी संतुष्ट था कि चलो बहुत बड़ी कॉमर्शियल नहीं, तो ठीक-ठाक-सी अच्छी फिल्म तो बन ही जाएगी! निर्देशक नई टीम के साथ निर्माता के पास पहुंचा। निर्माता ने निर्देशक की मेहनत की तारीफ की। कुछ देर तक बहलाने वाली बातें करने के बाद उसने अपनी बात रखी। उसने कहा, इन दोनों के साथ अच्छी फिल्म बनेगी। पुरस्कार और सम्मान मिलेंगे, जिन्हें तुम अपने घर में अच्छे से सजाओगे, लेकिन मेरा क्या होगा? इस फिल्म की कोई मार्केट वैल्यू नहीं होगी। मेरे लिए इन ऐक्टरों के साथ फिल्म रिलीज करना मुश्किल हो जाएगा। इसे फिलहाल रहने देते हैं। कुछ नया सोचो। इन ऐक्टरों के साथ ही नई फिल्म पर काम करो..। किस्सा यहीं खत्म नहीं होता.. और भी समीकरण बने-बिगड़े। निर्देशक आज भी अपनी स्क्रिप्ट लिए घूम रहे हैं। आठ बार उसकी फिल्म फ्लोर पर जाते-जाते रह गई है। तभी मंदी आ गई और फिल्मी कारोबार की सारी गतिविधियां ठंडी हो गई। यह एक निर्देशक की कहानी है। हमने किसी और निर्देशक को यह कहानी सुनाई, तो उसने कहा कि अरे, मेरे साथ भी लगभग ऐसा ही हुआ था। बाद में पता चला कि यह एक-दो नहीं, लगभग सभी संभावित निर्देशकों की कहानी है..!





4 comments:
अजय जी, मै खुद अपने हाथ जलाकर बैठा हूं। लेकिन आपकी पोस्ट से थोड़ा दिलासा मिला कि चलों हमे ही नही हैं अकेले।
I thought of Tanha Tanha, and immidiaely Bhagat Singh, but till end it is written in such a manner that we are curious to know about the name of director.
It is your speciality.
Keep it up. Thanks for posting as I was getting bored from reading political discussions.
Naam Nahi DIya Aapne per Shayd Ham Samjh Gye
अच्छा लिखा है .. सचमुच यह सबकी कहानी लगती है।
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