
जब वी मेट के निर्देशक इम्तियाज अली की नयी फिल्म लव आज कल शीघ्र ही प्रदर्शित होगी। सैफ अली खान की प्रोडक्शन कंपनी इनामाती फिल्म्स की यह पहली फिल्म है। इसमें सैफ के साथ दीपिका पादुकोन मुख्य भूमिका में हैं-
ऐसा कहा जा रहा है कि जब वी मेट के बाद सभी आप के साथ काम करना चाहते हैं?
ऐसा कोई भागता हुआ तो मुझे नहीं दिखा। सोचा न था के बाद और जब वी मेट के पहले कुछ लोगों ने साथ काम करने की इच्छा जगजाहिर की थी।
सैफ अली खान के साथ फिल्म की योजना कैसे बनी?
जब वी मेट की रिलीज के पहले से सैफ से मेरी बात हो रही थी। मैंने उन्हें कई कहानियां सुनायी थीं। मैंने उन्हें जब वी मेट की कहानी भी सुनायी थी। बातें चलती रहीं। जब वी मेट के पोस्ट प्रोडक्शन के समय फिर से सैफ से बात हुई। फिर मैंने लव आज कल का आइडिया सुनाया। सैफ को पसंद आया। उन्होंने कहा कि इसे बनाओ, मैं काम करूंगा।
क्या है फिल्म?
लंदन में एक कैफेटेरिया है। जहां युवक-युवती मिलने के लिए आया करते हैं। उनमें जय और मीरा भी हैं। दोनों का आधुनिक रिश्ता है। कैफेटेरिया के मालिक वीर सिंह हैं। उनकी जवानी दिल्ली में बीती है। अब ये लंदन में रहते हैं। वे जय और मीरा के रिश्ते को देखते हैं। उन्हें ताज्जुब होता है कि कैसे पैसों की लेन-देन की तरह आज के लोग मोहब्बत करते हैं। हमारे जमाने में तो यह दिल की बात हुआ करती थी। दोनों की बात होती है। जय और मीरा की कहानी आगे बढ़ती है। दूसरी तरफ वीर सिंह और हरलीन की कहानी आती रहती है। पता चलता है कि वक्त जो भी हो, तरीका बदल जाए, लेकिन प्यार का एक्सपीरिएंस तो एक ही होता है।
जब वी मेट की गति, किरदार और उनके बीच बढ़ते रिश्ते की कहानी लोगों को खूब पसंद आयी थी। क्या लव आज कल भी उसी पैटर्न पर है?
यह जब वी मेट नहीं है। अगर कोई जब वी मेट की खोज में आएगा तो निराश होगा। मेरे खयाल से जय, मीरा, वीर सिंह या हरलीन.. ये लोग उतने ही करीबी हैं, जितने जब वी मेट के गीत और आदित्य थे। या सोचा न था के वीरेन और अदिति थे। समझ में आती है बात। फिल्म देखते समय आपको लग सकता है कि मेरे साथ भी ऐसी बात हो सकती हैं। मेरे खयाल से यह कहानी ज्यादा टच करती है। इस फिल्म में हंसी कम आएगी और लगाव ज्यादा होगा।
आपकी सारी फिल्मों में रिश्तों की अकुलाहट है। सभी फिल्में लड़के-लड़की के रिश्तों पर क्यों हैं?
यह जान बूझ कर नहीं है। मेरी समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों है, लेकिन आप का कहना सही है। ऐसा नहीं है कि मेरी जिंदगी के रिश्ते बड़े उलझे हुए हैं। मैंने जिन रिश्तों को देखा है, उनमें अलग से कुछ दिखा हो। ऐसा भी मुझे कुछ नजर नहीं आता। पता नहीं किस वजह से मेरी दिलचस्पी ऐसे किरदारों में रहती है। तभी तो हर पिक्चर में वैसे किरदार आ जाते हैं।
क्या शुरू से ही ऐसे किरदारों और लेखन की तरफ झुकाव रहा?
ऐसा नहीं कह सकता। थिएटर, सीरियल और उसके बाद फिल्म की कोशिश में जो कहानियां लिखीं, वे सभी दूसरी थीं। वे भारी और सामाजिक थी। अचानक कुछ ऐसा हुआ कि एक हल्की-फुल्की कहानी दो रातों में लिखी वह सोचा न था थी। इसके बाद जब वी मेट आ गयी। अब लव आज कल आने वाली है। मुझे ऐसा लगता है कि मेरी जिंदगी और कहानियों में नया ट्रेंड आ गया। मैं ऐसा समझता था कि मैं बहुत गंभीर फिल्मकार हूं। दरअसल, पता चला कि मैं कॉमन टेस्ट का इंसान हूं। मुझे जो पसंद है, वह साधारण लोगों को पसंद है या यों कहें कि साधारण लोगों की पसंद ही मेरी पसंद है।
रोमांस और रिलेशनशिप की साधारण कहानियां दर्शकों की तरह आपको भी अच्छी लगती हैं?
मेरा ख्याल है कि इसमें सभी को इंटरेस्ट है। एक उम्र में रोमांस में लड़के-लड़कियों का इंटरेस्ट होता है। मेरा भी है। शायद इस वजह से ये चीजें आती हैं। मैं चाहता हूं कि ऐसी फिल्म बनाऊं, जिसे देखने में मुझे मजा आए। मैं फिल्में अपने टेस्ट से बनाता हूं। मेरा इतना ही ध्यान रहता है कि फिल्म के पैसे वापस आ जाएं। अगर कोई बात कहनी होगी, तो इसी में कहूंगा। मेरा मानना है कि अपनी बात इस तरह से कही जाए कि लोगों की समझ में आए। लोगों को गीत क्यों पसंद आई? क्योंकि उसकी बातें अच्छी लगी लोगों को।
फिल्म में सैफ के होने की क्या वजह हो सकती है?
मुझे कगार की जिंदगी जी रहा आज का लड़का चाहिए था। जो माडर्न है। लंदन में रहता है। जिसका दिमाग तेज चलता है। अक्सर बेवकूफी करता है और सॉरी भी बोलता है। मतलब एक तेज दिमाग का समकालीन युवक है। इसलिए सैफ उपयुक्त थे। दीपिका इसलिए कि मीरा अपने दोस्त जय से ज्यादा जहीन और खामोश दिल है। वह ज्यादा देखती-समझती है। चार्मिग लड़की है, इसलिए कम बोलने पर भी ज्यादा देर तक याद रहती है। मुझे लगा कि दीपिका में ये गुण है। मीरा में गहराई है। जय हल्का है।
बाकी कलाकार कौन हैं?
ऋषि कपूर कैफेटेरिया चलाते हैं। उनके फ्लैशबैक में हमने सैफ को ही रखा है। माडर्न लवर और पुराने जमाने का लवर सैफ ही प्ले कर रहे हैं। सैफ ही सरदार हैं। राहुल खन्ना भी हैं एक छोटे रोल में।





1 comments:
To,
Ajay ji.
This interview did not impress at at all. Or I would say Did not express at all. It seems IMTIYAAZ ALI is not that humble and interestfully talkative to this interview.
People who belong to the cinema of the older times, people like PRAN are humblest the most. These people all old enough to die anytime in the near future. I want to go and take there interviews as soon as possible but I don't have the identitiy of a film journalist uptil now. I am coward enough to stay back and not drop into the film journalism, from the regular or business journalism.
I look up to you.
Hopefully you bring about some other entertaining and relevant interviews of people like Danny, Who's frozen made the news some time back now or the marathi directors who make movies like TINGYA AND SHWAS.
I DON'T KNOW WHETHER YOU READ WHAT I EXPRESS TO YOU.
I WOULD BE VERY HAPPY IF YOU RESPONDED.
THIS WILL ENCOURAGE ME TO HAVE COURAGE AND COMMENT NEXT TIME TOO.
Thanks.
Gajendra singh Bhati
IIMC 2008-09
(Unfortunately I am not writing my blog these days. Hopefully start soon.)
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