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Monday, January 12, 2009

मासूम प्रेम की फिल्में अब नहीं बनतीं-महेश भट्ट

सन् 1973 हिंदी सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण है और मेरे लिए भी। उसी साल मैंने अपनी पहली विवादास्पद फिल्म मंजिलें और भी हैं के निर्देशन के साथ हिंदी फिल्मों का अपना सफर आरंभ किया था। उसी वर्ष हिंदी फिल्मों के महान शोमैन राज कपूर ने मेरा नाम जोकर से हुए भारी नुकसान की भरपाई के लिए किशोर उम्र की प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म बॉबी बनाई। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बनी टीनएज प्रेम कहानियों में अभी तक इस फिल्म का कोई सानी नहीं है। 35 सालों के बाद मैं आज इसी फिल्म से अपने लेख की शुरुआत कर रहा हूं। समय की धुंध को हटाकर पीछे देखता हूं तो पाता हूं कि किसी और फिल्म निर्माता ने राज कपूर की तरह किशोरों के मासूम प्रेम को सेल्यूलाइड पर नहीं उकेरा।
स्वीट सिक्सटीन वाले रोल
बॉबी के पहले उम्रदराज हीरो और हीरोइन हिंदी फिल्मों में किशोर उम्र के प्रेमियों की भूमिकाएं निभाया करते थे। हम ऐसी फिल्में देखकर खूब हंसते थे। मैंने 1970 में राज खोसला के सहायक के रूप में फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा। उन दिनों वे दो रास्ते का निर्देशन कर रहे थे। इसमें राजेश खन्ना और मुमताज की रोमांटिक जोडी थी। उनकी उम्र बीस के आसपास रही होगी। उन्हें कॉलेज में पढने वाले प्रेमियों के तौर पर दिखाया जा रहा था। इस फिल्म के एक गाने के फिल्मांकन के समय मैं राज खोसला के पास गया और हिम्मत बटोरकर उनसे कहा, सर, ये दोनों किशोर की तरह नहीं लडते। इन्हें इन भूमिकाओं में दर्शक कैसे पसंद करेंगे? मेरे बॉस ने मेरे सर पर थपकी दी और कहा, बेटे, जाकर चाय ले आओ। यह हॉलीवुड नहीं है। लेकिन बॉबी ने टीनएज लव स्टोरी की धारणा हमेशा के लिए बदल दी। फिल्म रिलीज हुई तो पहली बार लगा कि पर्दे पर दिख रहे किरदार हमारी तरह के ही किशोर हैं। यही कारण है कि बॉबी ने हिंदी फिल्मों में एक ट्रेंड आरंभ किया। इस फिल्म ने न केवल ऋषि कपूर और डिंपल कपाडिया जैसे कलाकार दिए, बल्कि टीनएज रोमांस की नई विधा भी दी। बॉबी के बाद निर्माता-निर्देशकों ने कॉलेज स्टूडेंट की भूमिकाओं में उम्रदराज कलाकारों को लेना बंद किया।
ताजा हवा का झोंका
दिल्ली के एक वरिष्ठ डिस्ट्रीब्यूटर ने मुझे एक बार बताया था कि बॉबी इस कदर लोकप्रिय हुई थी कि इसके बाद आने वाले कई वर्षो में जन्मे बच्चों के नाम बॉबी रखे गए। इतना ही नहीं बॉबी फिल्म से फैशन का ट्रेंड चला और उत्तर भारत के अनेक परिवारों में किशोर उम्र के दर्शकों ने अपने अभिभावकों से बगावत कर यह फिल्म देखी। उन्हें ऋषि कपूर और डिंपल कपाडिया के रोमांस में अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दिखी। हिंदी फिल्मों की श्रेष्ठ पच्चीस दर्शनीय फिल्मों में बॉबी शामिल है।
बॉबी की अपार सफलता के बाद उसकी नकल में अनेक फिल्में बनीं, लेकिन उनमें से कोई भी बॉबी की तरह सफल नहीं रही। किसी भी फिल्म में बॉबी की लव स्टोरी की ऊर्जा और मासूमियत नहीं दिखी। तो बॉबी में ऐसी क्या खासियत थी?
मासूम प्रेम और नए चेहरे
बॉबी मुंबई के दो वर्गो के किशोरों की प्रेम कहानी थी। ऋषि कपूर ने अमीर बिजनेसमैन नाथ के बेटे राजनाथ की भूमिका निभाई थी। बिजनेसमैन की भूमिका में प्राण थे। बॉबी ब्रिगेंजा के रूप में दर्शकों ने डिंपल कपाडिया को देखा। वह ईसाई मल्लाह जैक ब्रिगेंजा की बेटी थी। जैक की भूमिका में प्रेमनाथ ने जान डाल दी थी।
राज यानी ऋषि कपूर और बॉबी यानी डिंपल की पहली मुलाकात होती है, राज की आया मिसेज ब्रिगेंजा के घर। राज आया से मिलने आता है, वहीं आया की पोती बॉबी को पहली बार देखता है। पहली ही मुलाकात में दोनों के बीच प्यार हो जाता है। राज को एहसास होता है कि गरीब मल्लाह की बेटी बॉबी से उसके प्रेम को पिता स्वीकार नहीं करेंगे। राज के मनाने पर बॉबी के पिता जैक मिलने आते हैं। वे राज के पिता से शादी की बात करते हैं। राज के पिता उन पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने बेटी की सुंदरता का इस्तेमाल उनके बेटे को फंसाने में किया है। उनकी नजर पैसे पर है। वे बेटे को छोडने के लिए पैसों की पेशकश करते हैं। दोनों पिताओं की भिडंत का दृश्य खूबसूरत तरीके से कैमरे में कैद किया गया है। इस दृश्य की खासियत है कि राज कपूर ने दोनों बुजुर्गो की झडप की पृष्ठभूमि में चल रहे संगीत के बीच पिताओं के क्लोजअप केसाथ प्रेम में डूबी जोडी के क्लोजअप भी बारी-बारी से दिखाए हैं। प्रेम में डूबी यह जोडी कांच के शीशे के भीतर नाचती जोडी को गौर से देखती है।
राज कपूर ने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आनंद बख्शी के साथ मिलकर फिल्म के लिए सदाबहार गाने तैयार किए। मैं शायर तो नहीं, झूठ बोले कौआ काटे, हम तुम एक कमरे में बंद हों, मुझे कुछ कहना है, ना मांगू सोना चांदी, भारतीय फिल्मों के इतिहास में फिल्मांकित सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है। हम तुम ने किशोरों की कल्पना को पंख दिए। आज भी इसका प्रभाव कम नहीं हुआ है।
मैंने प्यार किया
सालों बाद राजश्री प्रोडक्शन में सेठ ताराचंद के पोते सूरज बडजात्या ने फिल्म मैंने प्यार किया से डायरेक्शन की दुनिया में धमाकेदार इंट्री की। इस फिल्म में बॉबी का ही फार्मूला आजमाया गया है। अमीर-गरीब के प्रेम पर आधारित यह फिल्म 1989 की बडी हिट साबित हुई। नौवें दशक की सबसे सफल फिल्म मैंने प्यार किया ने सलमान खान को स्टार बना दिया।
मेरी फिल्मों की लेखिका शगफ्ता रफीक कहती हैं, दोनों फिल्मों की कथात्मक संरचना देखें तो उनमें कई समानताएं मिलेंगी। दोनों में अमीर-गरीब का भेद रखा गया है और दोनों के क्लाइमेक्स तक में समानता है।
एक और समानता है कि बॉबी की तरह मैंने प्यार किया के गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए थे। इसकी फिल्मी अंत्याक्षरी ने तो सभी का दिल जीत लिया और यह एक पॉपुलर टाइमपास खेल बन गया था। बाद में सैटेलाइट चैनल आने पर अंत्याक्षरी गेम शो के तौर पर भी लोकप्रिय हुआ। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने बॉबी से एक फार्मूला लिया-एक आकर्षक जोडी लो, सामान्य प्रेम कहानी बुनो, मधुर धुनों पर आधारित गीत चुनो और फिर एक कामयाब फिल्म बना लो। लेकिन सच्चाई यही है कि अनेक निर्देशकों ने इस फार्मूले को विफल तरीके से अपनाया। हां सूरज बडजात्या की तरह मंसूर खान को जरूर कामयाबी मिली। उनकी पहली फिल्म कयामत से कयामत तक सफल रही।
किशोर प्रेम का हिट फार्मूला
कयामत से कयामत तक का लेखन नासिर हुसैन ने किया था। निर्देशन उनके बेटे मंसूर खान ने किया था। इस फिल्म से आमिर खान हिंदी फिल्मों में आए। उनके छोटे भाई फैसल खान भी इस फिल्म में एक छोटी भूमिका में थे। फिल्म ने गजब की सफलता हासिल की। आमिर खान रातों रात स्टार बन गए। इस फिल्म से जूही चावला का करियर भी संवर गया। यह जूही की पहली बडी हिट फिल्म थी। कम ही लोग जानते हैं कि इस फिल्म के पहले आमिर खान होली में और जूही चावला सल्तनत में आ चुके थे। फिर भी दोनों बेहद ताजा चेहरों की तरह दिखे थे। इनकी जोडी ने दर्शकों का दिल मोह लिया था। इस फिल्म का संगीत भी बहुत लोकप्रिय हुआ था। मजरूह सुल्तानपुरी के गीत पापा कहते हैं, ऐ मेरे हमसफर, गजब का है दिन और बाकी दूसरे गीतों को भी आनंद मिलिंद ने मोहक धुनें दी थीं।
हिंदी सिनेमाई इतिहास में यह फिल्म इसलिए उल्लेखनीय मानी जाती है कि इसकी रिलीज के समय एक्शन फिल्मों की धूम मची थी। कोई सोच भी नहीं सकता था कि कयामत से कयामत तक उस भीड में पसंद की जाएगी। ऐसी प्रेम कहानी दोबारा नहीं बनाई जा सकती। यह दो दुश्मन परिवारों की कहानी थी, जिनके जिद्दी अभिभावक हैं। इसके बावजूद उनके बच्चे आपस में प्रेम करने लगते हैं। फिल्म में सेक्स या हिंसा नहीं थी। फिर भी इसकी व्यापक अपील रही। वास्तव में इसकी सहजता और मासूमियत ने दर्शकों का दिल जीत लिया।
क्यों नहीं बनती अब ऐसी फिल्में
क्या मैंने कभी किशारों की प्रेम कहानी बनाई? मेरी फिल्मों आशिकी और दिल है कि मानता नहीं को टीनएज लव स्टोरी कह सकते हैं। आशिकी आत्मकथात्मक फिल्म थी। वह मेरे स्कूली दिनों की प्रेम कहानी थी। इसमें नदीम श्रवण का संगीत बहुत पॉपुलर हुआ था। आशिकी की गोल्डन जुबली में उसके संगीत की लोकप्रियता का बडा योगदान था। लोग पूछते हैं कि अब आप ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनाते? क्यों जिस्म और मर्डर बनाते हैं? इसका जवाब यही है कि टीनएज लव स्टोरी को पसंद करने वाला भारत अब नहीं रहा। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में एमटीवी देख कर बडे हो रहे बच्चों के लिए प्यार की मासूमियत खत्म हो गई है। वे इसमें यकीन भी नहीं रखते। इसलिए जरूरी है कि हम उनके मनोरंजन का सामान परोसें। ऐसा लगता है कि अब बॉबी जैसी फिल्में नहीं बन सकतीं, लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि मेरी धारणा गलत साबित हो।

6 comments:

PD said...

bahut badhiya laga bhatt ji ko padhna..

Irshad said...

bahut bahut sunder prastuti...irshad

Irshad said...

bahut bahut sunder prastuti...irshad

Ummed Singh Baid "Saadhak " said...

किशोर प्रेम की मासूमियत को मार डाला गया है.
मीडीया ने इतना नंगा बदन दिखा दिया,
इतनी चूमा-चाटी हो गई
कि इसका रोमाँच ही मर गया.
आपने ठीक ही कहा है....क्यों नहीं बनती अब ऐसी फिल्में
क्या मैंने कभी किशारों की प्रेम कहानी बनाई? मेरी फिल्मों आशिकी और दिल है कि मानता नहीं को टीनएज लव स्टोरी कह सकते हैं। आशिकी आत्मकथात्मक फिल्म थी। वह मेरे स्कूली दिनों की प्रेम कहानी थी। इसमें नदीम श्रवण का संगीत बहुत पॉपुलर हुआ था। आशिकी की गोल्डन जुबली में उसके संगीत की लोकप्रियता का बडा योगदान था। लोग पूछते हैं कि अब आप ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनाते? क्यों जिस्म और मर्डर बनाते हैं? इसका जवाब यही है कि टीनएज लव स्टोरी को पसंद करने वाला भारत अब नहीं रहा। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में एमटीवी देख कर बडे हो रहे बच्चों के लिए प्यार की मासूमियत खत्म हो गई है। वे इसमें यकीन भी नहीं रखते। इसलिए जरूरी है कि हम उनके मनोरंजन का सामान परोसें। ऐसा लगता है कि अब बॉबी जैसी फिल्में नहीं बन सकतीं, लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि मेरी धारणा गलत साबित हो.

अब मेरी भी सुन लें,

प्रकट करो मत सेक्स को,गुप्त ज्ञान् ही जान.
प्रकृति गोपन चाहती, रख इसका सम्मान.
रख इसका सम्मान, तो जीवन सुखी रहेगा.
ज्यादा छेङ-छाङ की तो तू दुखी रहेगा.
कह साधक कवि, ज्यादा सेक्स मत करो.
गुप्त ही रखो बात, इसे तुम प्रकट मत करो.

Amit said...

bahut accha likha hai..

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