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Sunday, November 30, 2008

रंग रसिया:दो तस्वीरें


केतन मेहता की फ़िल्म 'रंग रसिया' की दो तस्वीरें देखें.यह १९ वीं सदी के मशहूर पेंटर राज रवि वर्मा के जीवन से प्रेरित है.इस फ़िल्म में रणदीप हुडा ने राज रवि वर्मा की भूमिका निभाई है तो नंदना सेन उनकी प्रेमिका सुगुना बाई बनी हैं.यह फ़िल्म विदेशों में दिखाई जा चुकी है.भारत में इसका प्रदर्शन अगले साल होगा .इसे A प्रमाण पत्र मिला है.

Saturday, November 29, 2008

फ़िल्म समीक्षा:ओए लकी! लकी ओए!

हंसी तो आती है
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-अजय ब्रह्मात्मज
सब से पहले इस फिल्म के संगीत का उल्लेख जरूरी है। स्नेहा खानवलकर ने फिल्म की कहानी और निर्देशक की चाहत के हिसाब से संगीत रचा है। इधर की फिल्मों में संगीत का पैकेज रहता है। निर्माता, निर्देशक और संगीत निर्देशक की कोशिश रहती है कि उनकी फिल्मों का संगीत अलग से पॉपुलर हो जाए। इस कोशिश में संगीत का फिल्म से संबंध टूट जाता है। स्नेहा खानवलकर पर ऐसा कोई दबाव नहीं था। उनकी मेहनत झलकती है। उन्होंने फिल्म में लोकसंगीत और लोक स्वर का मधुर उपयोग किया है। मांगेराम और अनाम बच्चों की आवाज में गाए गीत फिल्म का हिस्सा बन गए हैं। बधाई स्नेहा और बधाई दिबाकर बनर्जी।
दिबाकर बनर्जी की पिछली फिल्म 'खोसला का घोसलाÓ की तरह 'ओए लकी।़ लकी ओए।़Ó भी दिल्ली की पृष्ठभूमि पर बनी है। पिछली बार मध्यवर्गीय विसंगति और त्रासदी के बीच हास्य था। इस बार निम्नमध्यवर्गीय विसंगति है। उस परविार का एक होशियार बच्चा लकी (अभय देओल)दुनिया की बेहतरीन चीजें और सुविधाएं देखकर लालयित होता है और उन्हें हासिल करने का आसान तरीका अपनाता है। वह चोर बन जाता है। चोरी में उसकी चतुराई देख कर हंसी आती है। फिल्म के नायक लकी को रत्ती भर भी अफसोस या अपराध बोध नहीं है कि वह चोर क्यों बना? समाज के निचले तबके की विषम परिस्थितियां ऐसे भटकाव को सहज बना देती हैं। चोर की प्रेमिका सोनल (नीतू चंद्रा) भले ही उसके हाथ से पैसे न ले, लेकिन उसे चोर की प्रेमिका होने में शर्म महसूस नहीं होती। संभव है, उसके पास तर्क हो कि बड़ी बहन की तरह देह का धंधा करने से तो यह बेहतर स्थिति है। अगर आप संवेदनशील हैं तो निम्नमध्यवर्गीय परिवार के विषाद से दुखी हो सकते हैं। अन्यथा यह फिल्म हंसने को भरपूर प्रसंग देती है। आप इसे एक कामेडी फिल्म की तरह भी देख सकते हैं।
अभय देओल गैरपारंपरिक फिल्में अवश्य चुनते हैं, लेकिन अभिनेता के तौर पर वे अभी तक उच्चवर्गीय संस्कारों और व्यवहारों से जकड़े हुए हैं। अभिनय अनुभव और जीवन को करीब से देखने से समृद्ध होता है। अभय मानसिक तौर पर तो लकी को जी लेते हैं, लेकिन उनका बॉडी लैंग्वेज कई बार धोखा देता है। जैसे गांव-देहात और गरीब परिवेश से आए एक्टर संभ्रांत और राजसी भूमिकाओं में उपयुक्त नहीं लगते, वैसे ही निचले तबके के किरदारों को निभाने में हाई सोसायटी से आए एक्टर नकली लगने लगते हैं। अभय की तारीफ करनी होगी कि वे कोशिश करते हैं। इस कोशिश में उनका विश्वास की भी झलक आनी चाहिए। सोनल के किरदार को नीतू चंद्रा परिवेश की इसी पूंजी की वजह से सहजता से निभा ले जाती हैं। नयी अभिनेत्रियों में नीतू चंद्रा का आत्मविश्वास उल्लेखनीय है। यह फिल्म परेश रावल की तिहरी भूमिका के लिए भी याद रखी जाएगी। परेश ने तीनों भूमिकाओं को अलग रूप और स्वर दिया है।
दिबाकर बनर्जी नयी पीढ़ी के सशक्त निर्देशक के तौर पर उभर रहे हैं। उम्मीद रहेगी कि वे हिंदी फिल्मों की लोकप्रिय शैली के चपेट में नहीं आएंगे और अपनी विशिष्टता बनाए रखेंगे।

फ़िल्म समीक्षा:सॉरी भाई

नयी सोच की फिल्म
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-अजय ब्रह्मात्मज
युवा ओर प्रयोगशील निर्देशक ओनिर की 'सॉरी भाई' रिश्तों में पैदा हुए प्रेम और मोह को व्यक्त करती है। हिंदी फिल्मों में ऐसे रिश्ते को लेकर बनी यह पहली फिल्म है। एक ही लडक़ी से दो भाइयों के प्रेम की फिल्में हम ने देखी है, लेकिन बड़े भाई की मंगेतर से छोटे भाई की शादी का अनोखा संबंध 'सॉरी भाई' में दिखा है। रिश्ते के इस बदलाव के प्रति आम दर्शकों की प्रतिक्रिया सहज नहीं होगी।
हर्ष (संजय सूरी)और आलिया (चित्रांगदा सिंह)की शादी होने वाली है। दोनों मारीशस में रहते हैं। हर्ष अपने परिवार को भारत से बुलाता है। छोटा भाई सिद्धार्थ, मां और पिता आते हैं। मां अनिच्छा से आई है, क्योंकि वह अपने बेटे से नाराज है। बहरहाल, मारीशस पहुंचने पर सिद्धार्थ अपनी भाभी आलिया के प्रति आकर्षित होता है। आलिया को भी लगता है कि सिद्धार्थ ज्यादा अच्छा पति होगा। दोनों की शादी में मां एक अड़चन हैं। नयी सोच की इस कहानी में 'मां कसम' का पुराना फार्मूला घुसाकर ओनिर ने अपनी ही फिल्म कमजोर कर दी है।
शरमन जोशी और चित्रांगदा सिंह ने अपने किरदारों को सही तरीके से मूत्र्त किया है। प्रेम के एहसास, आरंभिक झिझक और फिर उस प्रेम के स्वीकार को शरमन जोशी ने बारीकी से निभाया है। चित्रांगदा एक साथ मैच्योर और चुलबुली दिखती है। हिंदी फिल्मों में बदल रही औरत की एक छवि आलिया में नजर आती है। संजय सूरी ऐसी भूमिकाओं में टाइप होते जा रहे हैं। बोमन ईरानी और शबाना आजमी को अधिक मेहनत नहीं करनी थी। शबाना आजमी और चित्रांगदा सिंह के बीच के दृश्य अंतरंग और मर्मस्पर्शी हैं।
ओनिर ने पटकथा चुस्त रखी होती और अनावश्यक भावुक प्रसंग नहीं रखे होते तो फिल्म अधिक मार्मिक और प्रभावशाली होती। कुछ कमियों के बावजूद ओनिर की सोच प्रशंसनीय है। उन्होंने कुछ तो नया किया।

Tuesday, November 25, 2008

करीना कपूर:एक तस्वीर

इस बार सिर्फ़ एक तस्वीर करीना कपूर की.आप की टिप्पणियों का स्वागत है.क्या सोचते हैं आप? कुछ तो लिखें!

Sunday, November 23, 2008

आदित्य चोपड़ा लेकर आ रहे हैं'रब ने बना दी जोड़ी'


-अजय ब्रह्मात्मज

लगभग बीस साल पहले यश चोपड़ा के बड़े बेटे आदित्य चोपड़ा ने तय किया कि वे अपने पिता की तरह ही फिल्म निर्देशन में कदम रखेंगे। यश चोपड़ा 'चांदनी' के निर्देशन की तैयारी में थे। आदित्य के उत्साह को देखते हुए यश चोपड़ा ने उन्हें फिल्म कंटीन्यूटी, कॉस्ट्यूम और कलाकारों को बुलाने की जिम्मेदारी दे दी। शूटिंग में शामिल होने के पहले आदित्य चोपड़ा ने भारतीय फिल्मकारों में राज कपूर, विजय आनंद, राज खोसला, मनोज कुमार, बिमल राय, बी आर चोपड़ा और अपने पिता यश चोपड़ा की सारी फिल्में सिलसिलेवार तरीके से देख ली थीं। उन दिनों वे सिनेमाघरों में जाकर फस्र्ट डे फस्र्ट शो देखने के अलावा नोट्स भी लेते थे और बाद में वास्तविक स्थिति से उनकी तुलना करते थे। आदित्य की इन गतिविधियों पर यश चोपड़ा की नजर रहती थी और उन्हें अपने परिवार में एक और निर्देशक की संभावना दिखने लगी थी। उन्होंने आदित्य की राय को तरजीह देना शुरू किया था, लेकिन अभी उन्हें इतना भरोसा नहीं हुआ था कि स्वतंत्र रूप से फिल्म का निर्देशन सौंप दें।
1989 से लेकर 1995 में 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' के प्रदर्शन तक आदित्य चोपड़ा अभ्यास करते रहे। स्टोरी सीटिंग, म्यूजिक सीटिंग और शेष चयन और छंटाई के समय वे पिता के साथ बैठने लगे थे। हिंदी फिल्मों के दर्शकों के निजी अनुभवों के आधार पर उन्होंने कहा था कि 'चांदनी' सुपर हिट होगी, जबकि 'लम्हे' की सफलता के प्रति आशंका प्रकट की थी। बेटे के अनुमान को सही होता देख यश चोपड़ा ने आदित्य चोपड़ा की राय को महत्व देना शुरू कर दिया था। खास कर 'डर' की शूटिंग के समय उन्होंने आदित्य को बड़ी जिम्मेदारियां दीं। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान ही शाहरुख खान और आदित्य चोपड़ा करीब आए। दोनों ने मिलकर कुछ योजनाएं बनायीं और फिल्मों की शैली और शिल्प को लेकर भी कई बातें कीं।
कह सकते हैं कि सारी सुविधाओं और साधनों के बावजूद बीस सालों में केवल तीन फिल्मों के निर्देशन से आदित्य चोपड़ा ने सृजनात्मक आत्मसंयम का परिचय दिया है। पिता के असिस्टैंट के रूप में निर्देशन और प्रोडक्शन की बारीकियां को समझने के बाद 1995 में उन्होंने 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' का निर्देशन किया। होनहार के लक्षण तो बचपन में ही नजर आने लगते हैं। बचपन में आदित्य चोपड़ा को कहानियां सुनाने में मजा आता था। 'सिलसिला' की शूटिंग के समय उन्होंने शबाना आजमी को एक कहानी सुना कर प्रभावित किया था। तभी शबाना आजमी ने जावेद अख्तर से कहा था, 'एक दिन यह लडक़ा बहुत बड़ा निर्देशक बनेगा।' शबाना की भविष्यवाणी सच निकली। 1995 में रिलीज हुई 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' हिंदी फिल्मों के इतिहास में सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म है। यह अभी तक मुंबई के मराठा मंदिर में चल रही है। यह दुनिया का अनोखा रिकार्ड है। अतीत में कभी ऐसा नहीं हुआ और भविष्य में ऐसी संभावना नहीं दिखती।
1995 में 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की सफलता के बाद आदित्य चोपड़ा ने यशराज फिल्म्स को आर्थिक दृढ़ता दी। उसके बाद अपनी फिल्मों के निर्माण के लिए यशराज फिल्म्स को किसी फायनेंसर के पास नहीं जाना पड़ा। उस समय तय किया गया कि पिता और पुत्र बारी-बारी से फिल्मों के निर्माण और निर्देशन की जिम्मेदारी संभालेंगे। पिता-पुत्र की टीम ने इस दरम्यान युवा निर्देशकों को मौका दिया। मुंबई में आधुनिक तकनीक और सुविधाओं से संपन्न यशराज स्टूडियो की स्थापना की। इस वजह से आदित्य चोपड़ा ने सन् 2000 में आई 'मोहब्बतें' के बाद किसी फिल्म का निर्देशन नहीं किया। इधर उनके इस विराम को लेकर सवाल उठने लगे। एक तो उनकी देखरेख में आई इधर की फिल्मों ने अच्छा व्यापार नहीं किया और दूसरे उनकी कोई फिल्म नहीं आई तो उनकी सूझ-बूझ और निर्देशन प्रतिभा पर आलोचकों ने प्रश्न चिह्न लगा दिए।
'मोहब्बतें' के आठ सालों के बाद आदित्य चोपड़ा 'रब ने बना दी जोड़ी' लेकर आ रहे हैं। इस बार फिर उनके साथ शाहरुख खान हैं। शाहरुख खान को स्टारडम का दर्जा दिलाने में आदित्य चोपड़ा की भूमिका रही है। 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' के समय ही उन्होंने शाहरुख से कहा था कि तुम अभी स्टार हो। मेरी फिल्म के बाद तुम सुपर स्टार बन जाओगे। वही हुआ भी। 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की कामयाबी ने शाहरुख खान को लोकप्रियता की ऊंचाई पर पहुंचा दिया। आदित्य चोपड़ा की दूसरी फिल्म 'मोहब्बतें' पहली फिल्म की तरह कामयाब नहीं रही, लेकिन उस फिल्म से अमिताभ बच्चन की दूसरी सफल पारी का आरंभ हुआ। शाहरुख खान भी थोड़े नए रोमांटिक अंदाज में दिखे। आदित्य चोपड़ा ने इस बार अपनी पिछली फिल्मों से अलग जाने की हिम्मत की है। उन्होंने पहली बार मिडिल क्लास किरदार सुरेन्द्र साहनी और तानी को अपनी फिल्म में जगह दी है। इस बार उनकी शूटिंग का अंदाज बदला हुआ है। सुरेन्द्र साहनी और तानी मध्यवर्गीय दंपति हैं। तानी उम्र में जवान और जिंदगी की रंगीनियों और सपनों में यकीन रखती है, जबकि सुरेन्द्र साहनी का सादा जीवन मध्यवर्गीय दबाव का नतीजा है। सुरेन्द्र साहनी से हुई शादी के बाद तानी को अपने सपने बिखरते नजर आते हैं। सुरेन्द्र साहनी अपनी पत्नी की मनोव्यथा समझते हैं और उसे खुशी एवं संतुष्टि देने के लिए कुछ करते हैं। इस फिल्म का एक संदेश है कि हर साधारण जोड़ी की प्रेमकहानी असाधारण होती है।
आदित्य चोपड़ा की शैली पर अपने पिता के साथ ही राज कपूर, राज खोसला और विजय आनंद का जबरदस्त प्रभाव है। यश चोपड़ा की फिल्मों में क्लोज शॉट का खास महत्व होता है, इसके विपरीत आदित्य चोपड़ा ट्राली शॉट ज्यादा पसंद करते हैं। यह उम्र का असर हो सकता है, जहां गति, स्पीड और मूवमेंट में ही रोमांच और आनंद मिलता है। आदित्य चोपड़ा के शिल्प में तकनीक और एहसास का सुंदर मेल है। उनके विषय के चुनाव और उसके निर्वाह से कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है, लेकिन सिनेमा के तकनीकी पक्ष पर आदित्य चोपड़ा की पकड़ को स्वीकार करना ही होगा। उनकी फिल्मों में किरदारों के बीच क्रियात्मक संवाद रहते हैं। उनके किरदार भिड़ते हैं, संवाद करते हैं और फिर नए दृश्य की ओर बढ़ते हैं। आदित्य चोपड़ा की फिल्में मॉडर्न होती हैं। लुक,कॉस्ट्यूम, व्यवहार आदि में उन्होंने सुसंस्कृत शहरी चरित्रों की रचना की है। कॉस्मोपोलिटन किरदारों को लेकर आदि ही आए। इन चरित्रों को आप बाहरी तौर पर पश्चिमी समाज से प्रभावित कह सकते हैं, लेकिन अंदरूनी स्तर पर उनमें भारतीयता रहती है। हिंदी फिल्मों की प्रेमकहानी में प्रेमी-प्रेमिका के घर से भाग जाने की घटना आम है। दर्शक भी इसे मंजूर करते हैं। लेकिन 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' का नायक ऐसा नहीं करता है। वह नायिका के साथ भागता नहीं है। वह उसके पिता की अनुमति लेता है। यह अलग बात है कि वह फिर से अमेरिका लौट जाता है। भारतीय मूल्यों में उसका यकीन पक्का है, लेकिन भारतीय परिवेश उसे अपने अनुकूल नहीं लगा। यह अंतर्विरोध आदित्य चोपड़ा और उनके समकालीन फिल्मकारों में नजर आता है।
आदित्य चोपड़ा संपूर्ण नियंत्रण के पक्ष में रहते हैं। उनके सहयोगी बताते हैं कि वे सूनते तो सबकी हैं,लेकिन फिल्म वैसी ही बनाते हैं,जैसी उनके दिमाग में रहती है। पुरानी और नयी सोच की नोंक-झोंक तब साफ दिखती है,जब पिता-पुत्र दोनों सेट पर मौजूद हों। आदि फिल्म निर्माण के सभी तमनीकी पक्षों में पारंगत हैं,इसलिए वे उनमें हस्तक्षेप करते हैं और अपने तकनीशिनों को मजबूर करत हैं कि वे वही प्रभाव लाएं,जो वे चाहते हैं। आदित्य चोपड़ा सेट पर किसी प्रकार की फेरबदल में यकीन नहीं रखते। वे स्टारों की भी एक नहीं सुनते। 'रब ने बना दी जोड़ी' के लिए हां कहने में शाहरूख खान देरी लगा रहे थे तो आदि ने चेतावनी के अंदाज में कहा कि अगर तुम्हें दिक्कत है तो मैं सलमान या आमिर से बात करता हूं।
'रब ने बना दी जोड़ी' ने दर्शकों की आरंभिक जिज्ञासा बढ़ा दी है। शाहरुख खान के दीवाने उन्हें आदित्य चोपड़ा के निर्देशन में देखने के लिए उतावले हैं। देखना है कि आदित्य चोपड़ा कामयाबी की हैटट्रिक लगाते है या नहीं? आरंभिक रूझान तो उनके पक्ष में है।

Friday, November 21, 2008

फ़िल्म समीक्षा:युवराज

पुरानी शैली की भावनात्मक कहानी

युवराज देखते हुए महसूस होता रहा कि मशहूर डायरेक्टर अपनी शैली से अलग नहीं हो पाते। हर किसी का अपना अंदाज होता है। उसमें वह सफल होता है और फिर यही सफलता उसकी सीमा बन जाती है। बहुत कम डायरेक्टर समय के साथ बढ़ते जाते हैं और सफल होते हैं।
सुभाष घई की कथन शैली, दृश्य संरचना, भव्यता का मोह, सुंदर नायिका और चरित्रों का नाटकीय टकराव हम पहले से देखते आ रहे हैं। युवराज उसी परंपरा की फिल्म है। अपनी शैली और नाटकीयता में पुरानी। लेकिन सिर्फ इसी के लिए सुभाष घई को नकारा नहीं जा सकता। एक बड़ा दर्शक वर्ग आज भी इस अंदाज की फिल्में पसंद करता है।

युवराज तीन भाइयों की कहानी है। वे सहोदर नहीं हैं। उनमें सबसे बड़ा ज्ञानेश (अनिल कपूर) सीधा और अल्पविकसित दिमाग का है। पिता उसे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। देवेन (सलमान खान) हठीला और बदमाश है। उसे अनुशासित करने की कोशिश की जाती है, तो वह और अडि़यल हो जाता है। पिता उसे घर से निकाल देते हैं। सबसे छोटा डैनी (जाएद खान) को हवाबाजी अच्छी लगती है। देवेन और डैनी पिता की संपत्ति हथियाने में लगे हैं। ज्ञानेश रुपये-पैसों से अनजान होने के बावजूद पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी बन चुका है। ज्ञानेश के संरक्षक पारिवारिक मित्र और वकील सिंकदर मिर्जा (मिथुन चक्रवर्ती) हैं। वह चाहते हैं कि तीनों भाई मिलकर रहें, लेकिन मामा (अंजन श्रीवास्तव) की ख्वाहिशें और साजिशें कुछ और हैं। फिल्म का भावनात्मक अंत होता है। अंतिम दृश्यों में सुभाष घई की पकड़ नजर आती है। उन्होंने तीनों भाइयों के मिलने के प्रसंग को भावपूर्ण और नाटकीय बना दिया है। फिल्म का संदेश है कि हम निजी ढंग से जिएं, लेकिन मिल कर रहें तभी खुशहाल परिवार बनता है।
फिल्म के आरंभिक दृश्यों को सलमान खान के जीवन के प्रचलित धारणाओं से मिला दिया गया है। हम देवेन में सलमान को पाते हैं। सलमान और कैटरीना का प्रेम प्रसंग लंबा हो गया है। उसमें प्रेम का उद्दाम रूप भी नहीं दिखता। वास्तविक जिंदगी के प्रेमी-प्रेमिका पर्दे पर वही केमिस्ट्री क्यों नहीं पैदा कर पाते? सलमान नेचुरल हैं, लेकिन उन पर निर्देशक का अंकुश नहीं है। इस वजह से उनका किरदार कभी विनोदशील तो कभी भावुक नजर आता है। कैटरीना कैफ हमेशा की तरह सुंदर लगी है। भव्य सेट की पृष्ठभूमि में आकर्षक परिधान पहने जब सेलो बजाती हैं, तो किसी स्वप्नसुंदरी की तरह प्रतीत होती हैं। जाएद खान ने अपने किरदार पर मेहनत की है। युवराज में अनिल कपूर की भूमिका उल्लेखनीय है। इस फिल्म को देखते हुए उनकी ही फिल्म ईश्वर और राज कपूर की कई ख्यात छवियां कौंधती हैं। अनिल कपूर ने कुछ दृश्यों को यादगार बना दिया है।
फिल्म का गीत-संगीत मधुर और प्रशंसनीय है। एआर रहमान और गुलजार ने फिल्म के भाव को शब्द, स्वर और ध्वनि से उचित संगत दी है। गानों का फिल्मांकन सुभाष घई की विशिष्टता है। वह इस फिल्म में भी नजर आती है।

Thursday, November 20, 2008

दरअसल:फिल्मों के प्रोडक्शन डिजाइनर

-अजय ब्रह्मात्मज


हॉलीवुड की तर्ज पर अब उन्हें प्रोडक्शन डिजाइनर कहा जाने लगा है। फिल्म की प्रचार सामग्रियों में उनका नाम प्रमुखता से छापा जाता है। माना यह जा रहा है कि फिल्म के निर्देशक, लेखक, गीतकार और संगीतकार की तरह प्रोडक्शन डिजाइनर भी महत्वपूर्ण होते हैं। वे फिल्मों को डिजाइन करते हैं। फिल्म की कहानी के आधार पर वे परिवेश, काल और वेशभूषा की कल्पना करते हैं। किसी भी फिल्म का लुक इन तीन कारकों से ही निर्धारित होता है। इसी कारण उन्हें प्रोडक्शन डिजाइनर का नाम दिया गया है। दरअसल, नितिन देसाई देश के प्रमुख प्रोडक्शन डिजाइनर हैं। हिंदी की ज्यादातर बड़ी फिल्में उन्होंने ही डिजाइन किए हैं। उनके अलावा, समीर चंदा, संजय दभाड़े और मुनीश सप्पल आदि के नाम भी लिए जा सकते हैं। एक समय में नितिश राय काफी सक्रिय थे। रामोजी राव स्टूडियो की स्थापना और सज्जा की व्यस्तता के कारण उन्होंने फिल्मों को डिजाइन करने का काम लगभग बंद कर दिया है। वैसे, एक सच यह भी है कि नितिश राय ने ही हिंदी फिल्मों की डिजाइन में विश्वसनीयता का रंग भरा। श्याम बेनेगल के साथ डिस्कवरी ऑफ इंडिया करते समय उन्होंने सेट डिजाइन की अवधारणा बदली। उसे जिंदगी के करीब ले आए। उनके प्रभाव से बाद के डिजाइनरों ने इस बात का खयाल रखा कि उनके सेट अलग न दिखाई पड़ें। वे परिवेश का हिस्सा बन जाएं। ऐसा लगे कि वास्तविक लोकेशन पर ही शूटिंग की गई है। दर्शकों के ऊपर फिल्म का प्रभाव बढ़ाने में सेट का खास महत्व होता है। आप पिछली सदी के नौवें और अंतिम दशक की फिल्में याद करें। डीवीडी पर उन्हें देखते समय कई बार लोगों को लगता होगा कि दरवाजा खोलते समय पूरी दीवार क्यों हिलने लगती है! उसकी वजह यही होती है कि दीवाल प्लाइवुड की बनी होती है और उसे मजबूत और ठोस रूप नहीं दिया जाता है। थोड़ा और पीछे जाएं, तो कई फिल्मों में साफ दिखता है कि बैकग्राउंड को पर्दे पर पेंट कर दिया गया है। कई बार पर्दे की सिलवटें या किसी कारण से उनमें उठी लहर से भेद खुल जाता है। पुरानी फिल्मों में जंगल, पहाड़ और शहर के बैकड्राप भी पर्दे पर बना दिए जाते थे। समुद्र का किनारा दिखाने के लिए पांच फीट रेत, दस फीट पानी और उसके पीछे नीले पानी को दिखाता पर्दा लगा दिया जाता था। निर्देशकों की यह धोखेबाजी कम दर्शक ही पकड़ पाते हैं। तकनीकी विकास के बाद स्टॉक शॉट से यह जरूरत पूरी की जाती थी। अब तो कंप्यूटरजनित छवियां स्टूडियो में तैयार कर ली जाती हैं।
स्पेशल इफेक्ट और कंप्यूटरजनित छवियों से चरित्रों को किसी भी बैकड्रॉप में दिखाया जा सकता है। इसके लिए खास तकनीक इस्तेमाल की जाती है। यह तकनीक कई बार सेट लगाने से भी महंगी होती है। इस तकनीकी सुविधा के बावजूद फिल्मों के सेट का अपना स्थान है और प्रोडक्शन डिजाइनर की भूमिका बढ़ती ही जा रही है। ताजा उदाहरण रब ने बना दी जोड़ी का लें। इसके दो पोस्टर सिनेमाघरों में लगे हैं। दोनों ही पोस्टरों में शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा डांसिंग पोज में हैं। एक में शाहरुख प्रौढ़ हैं और उनकी बांहों में धनुष बनी अनुष्का पारंपरिक सलवार-कमीज में हैं। बैकड्रॉप में एक स्कूटर खड़ा है। पीछे रिक्शा भी है। लगता है कि पंजाब के किसी शहर की कोई गली है। पोस्टर पर परिवेश की ऐसी झलक कम मिलती है। दूसरे पोस्टर में जवान शाहरुख हैं। वहां मॉडर्न बेब अनुष्का उनकी बांहों में हैं। पीछे ऊंची इमारतों की खिड़कियों से झांकती झिलमिलाती रोशनी है। किसी महानगर का बैकड्रॉप है। दोनों ही तस्वीरें स्थिर हैं, लेकिन बहुत कुछ बता जाती हैं। यह प्रोडक्शन डिजाइनर मुनीश सप्पल का कमाल है। उन्होंने परिवेश को ऐसी बारीकी से गढ़ा है कि बगैर शब्द और ध्वनि के ही दृश्य दिखाई पड़ने के साथ ही सुनाई भी पड़ रहे हैं। वास्तव में प्रोडक्शन डिजाइनर के बारे में अभी आम दर्शकों को अधिक जानकारी नहीं है।
देश के विभिन्न भागों से लेखक, निर्देशक, अभिनेता, गायक, संगीतकार बनने की लालसा में मुंबई आ रहे युवा इस क्षेत्र को भी अपना करियर बना सकते हैं। हां, इसके लिए कला मर्मज्ञ और कलाकार होना जरूरी है। आप चित्रकला, आर्किटेक्ट, डिजाइन आदि की पढ़ाई कर रहे हों, तो इस क्षेत्र में अपना करियर बना सकते हैं। आरंभ में किसी प्रोडक्शन डिजाइनर के असिस्टेंट के रूप में ही काम मिलेगा, लेकिन अपनी प्रतिभा के दम पर वे शीघ्र ही स्वतंत्र रूप से फिल्में हासिल कर सकते हैं और प्रोडक्शन डिजाइनर बन कर नाम कमा सकते हैं।



Tuesday, November 18, 2008

युवराज भव्य सिनेमाई अनुभव देगा: सुभाष घई


सुभाष घई का अंदाज सबसे जुदा होता है। इसी अंदाज का एक नजारा युवराज में दर्शकों को मिलेगा। युवराज के साथ अन्य पहलुओं पर प्रस्तुत है बातचात-
आपकी युवराज आ रही है। इस फिल्म की झलकियां देख कर कहा जा रहा है कि यह सुभाष घई की वापसी होगी?
मैं तो यही कहूंगा कि कहीं गया ही नहीं था तो वापसी कैसी? सुभाष घई का जन्म इस फिल्म इंडस्ट्री में हुआ है। उसका मरण भी यहीं होगा। हां, बीच के कुछ समय में मैं आने वाली पीढ़ी और देश के लिए कुछ करने के मकसद से फिल्म स्कूल की स्थापना में लगा था। पंद्रह साल पहले मैंने यह सपना देखा था। वह अभी पूरा हुआ। ह्विस्लिंग वुड्स की स्थापना में चार साल लग गए। पचहत्तर करोड़ की लागत से यह इंस्टीट्यूट बना है। मैं अपना ध्यान नहीं भटकाना चाहता था, इसलिए मैंने फिल्म निर्देशन से अवकाश ले लिया था। पिछले साल मैंने दो फिल्मों की योजना बनायी। एक का नाम ब्लैक एंड ह्वाइट था और दूसरी युवराज थी। पहली सीरियस लुक की फिल्म थी। युवराज कमर्शियल फिल्म है। मेरी ऐसी फिल्म का दर्शकों को इंतजार रहा है, इसलिए युवराज के प्रोमो देखने के बाद से ही सुभाष घई की वापसी की बात चल रही है।
सुभाष घई देश के प्रमुख एंटरटेनर रहे हैं, क्या इसलिए दर्शकों को आपकी शैली की फिल्म का इंतजार रहता है?
लोग जब पूछते हैं कि मेरी अगली फिल्म कौन सी होगी, तो खुशी होती है, लेकिन साथ ही चिंता बढ़ जाती है। ब्लैक एंड ह्वाइट के निर्देशन के समय मैं आश्वस्त था कि मुझे सीरियस फिल्म बनानी है। टेररिज्म पर वह फिल्म थी। मैंने तय कर लिया था कि उसमें कोई भी कमर्शियल मसाला नहीं होगा। युवराज पूरी तरह से कमर्शियल फिल्म है। इसका म्यूजिक रिलीज हो चुका है और वह लोगों को पसंद आ रहा है। यह हमारी पहली सफलता है। दूसरी सफलता 21 नवंबर को रिलीज पर निर्भर करती है। मुझे उम्मीद है कि दर्शकों को उनके इंतजार का मनोरंजक फल मिलेगा।
युवराज के बारे में बताएं? यह किस रूप में विशेष फिल्म है?
युवराज म्यूजिकल फिल्म है। मेरी फिल्मों में लोगों को भव्यता के साथ मधुर संगीत की अपेक्षा रहती है। इस फिल्म में दोनों चीजें हैं। फिल्म की कहानी सिंपल है, लेकिन उसके मूवमेंट्स और रिश्ते बहुत मजबूत हैं। आशा करता हूं कि यह फिल्म दर्शकों को पसंद आएगी। फिल्म में बताया गया है कि पैसों की वजह से परिवार में कैसे हमारे संबंध बदल जाते हैं। हम ऊपर से प्यार जतलाते हैं, लेकिन अंदर से पैसों के बारे में सोचते रहते हैं। परिवार का मुखिया पूरे परिवार के लिए पैसे बनाता और जोड़ता है, लेकिन पैसा आते ही परिवार टूटना शुरू हो जाता है। यह आज की बड़ी समस्या है, मैंने इसी को संगीत और चरित्रों के माध्यम से मनोरंजक रूप में पेश किया है। इसमें एक संदेश भी मिलेगा।
सुभाष घई कई स्तरों पर काम करते हैं। उन कामों की जिम्मेदारी निभाते समय अलग व्यक्तित्व रहता होगा आपका, उनमें कैसे सामंजस्य बिठाते हैं?
सुभाष घई लेखक और निर्देशक हैं। वे एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी के चेयरमैन हैं। उन्हें अपने निवेशकों की लाभ-हानि के बारे में सोचना पड़ता है। तीसरा रूप शिक्षक का है। मुझे इस बात की खुशी है कि मैं ऐसा इंस्टीट्यूट खोल सका, जो आज दूसरे या तीसरे नंबर पर है। आप भारतीय इतिहास को देखें तो पाएंगे कि अनेक व्यक्तियों ने कई काम एक साथ किए हैं। मैं तो तीन ही कर पा रहा हूं। जमाना बहुआयामी व्यक्तित्व का है। मैं एक साथ व्यापारी, रचनाकार और शिक्षक हूं। काम में मन लगे तो सामंजस्य बिठाना मुश्किल नहीं होता। हां, मैं राजनीति में नहीं जा सकता। मैं खेल जगत में नहीं जा सकता।
सुभाष घई एक्टर बनने की इच्छा से फिल्म इंडस्ट्री में आए थे। आज सुभाष घई की अनेक पहचानों में एक्टर कहां है?
जो एक्टर सुभाष घई है, उसी ने सब कुछ बनाया है। फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखना। संजय दत्त, शाहरुख खान और अनिल कपूर से एक्टिंग करवाना। इन सभी के चरित्रों को लिखना और उनसे परफॉर्म करवा लेना वास्तव में मेरी अभिनय क्षमता से ही संभव हुआ। मेरे किरदार बड़े चटपटे और मजेदार होते हैं। वे एक आयामी और नीरस नहीं होते। आप युवराज में सलमान खान, जाएद खान, अनिल कपूर और कैटरीना कैफ के अभिनय में सुभाष घई को पा सकते हैं।
अपने कॅरियर का टर्निग पाइंट किसे मानते हैं?
दूसरे निर्माताओं के लिए फिल्में बनाते हुए मुझे कई तरह के समझौते करने पड़ते थे। बहुत तकलीफ होती थी। फिर एक मित्र आए। उन्होंने सपोर्ट किया। मुझे निर्माता बनने में डर लगता था। उस मित्र की मदद से मैंने कर्ज बनायी। वह मेरे हिसाब से बनी। कर्ज की बहुत सराहना हुई। उसकी रीमेक अभी आयी है। वह पहला टर्निग पाइंट रहा। फिर एक टर्निग पाइंट हीरो से आया। वह फिल्म मैंने स्टार सिस्टम के विरोध में की थी। मैंने एक नए लड़के-लड़की को लेकर हीरो फिल्म बनायी। वह उस समय की मल्टीस्टारर फिल्मों से बड़ी हिट साबित हुई। उस फिल्म ने मुझे नया मोड़ और मान दिया। उसके बाद दिलीप कुमार के साथ बनी कर्मा और सौदागर को भी मोड़ मानता हूं। मुक्ता आटर््स के तौर पर मैंने सबसे पहली पब्लिक लिमिटेड कंपनी स्थापित की। फिर ह्विस्लिंग वुड इंस्टीट्यूट की स्थापना भी बड़ी घटना है। अपनी इच्छाशक्ति और ऊर्जा के दम पर यहां तक पहुंचा।
युवराज के प्रचार से ताल की याद आ रही है?
ताल से तुलना स्वाभाविक है। इस फिल्म के बारे में सोचते समय भी ताल हमारे दिमाग में थी। मैंने रहमान साहब से बात भी की थी। इसका संगीत सुनते समय ऐसा लग सकता है कि ताल जैसी फिल्म होगी। फिल्म रिलीज होने के बाद यह धारणा बदल जाएगी। ताल एक लड़की की कहानी थी। यह तीन भाइयों की मसालेदार कहानी है। फिल्म देखते समय पृथकता महसूस होगी। वैसे दोनों ही सुभाष घई की फिल्में हैं तो समानता स्वाभाविक है। एम एफ हुसैन की रेखाएं उनकी कृतियों में आती रहेंगी।
युवराज के कलाकारों के चुनाव के बारे में क्या कहेंगे?
कहानी लिखते समय मेरे दिमाग में किरदार रहते हैं। फिर उन किरदारों के लिहाज से एक्टर चुनता हूं। उनकी सहूलियत देखता हूं। उनकी उपलब्धता और सहूलियत देख कर ही चुनता हूं। इस फिल्म के लिए सलमान खान राजी हो गए। अनिल कपूर मुझ पर पूरा विश्वास करते हैं। जाएद खान मेरे साथ काम करना चाहते थे। इस तरह मेरी टीम पूरी हो गयी। फिल्म में तीनों एकदम उपयुक्त लगेंगे। आप तय नहीं कर पाएंगे कि किस ने सबसे अच्छा परफॉर्म किया है।
कैटरीना कैफ को चुनने की वजह क्या रही?
कैटरीना को इसलिए चुना कि उन्हें म्यूजिसियन का रोल करना था। मुझे ऐसी एक्ट्रेस चाहिए थी, जो देखने में योरोपीयन लगे। मेरी फिल्म योरोप में है। कैटरीना वेस्टर्न आर्केस्ट्रा में काम करती हैं। इस फिल्म में वह बहुत खूबसूरत लगी हैं। उन्होंने अपने किरदार को अच्छी तरह निभाया है।

Monday, November 17, 2008

हिन्दी टाकीज:जूते पहन कर जा सकते थे उस मन्दिर में-मुन्ना पांडे (कुणाल)



हिन्दी टाकीज-१७


इस बार मुन्ना पाण्डेय(कुणाल).कुणाल के ब्लॉग मुसाफिर से इसे लिया गया है.वहां मुन्ना पाण्डेय ने बहुत खूबसूरती के साथ श्याम चित्र मन्दिर की झांकी पेश की है। यह झांकी किसी भी छोटे शहर की हो सकती है.मुन्ना पाण्डेय का परिचय उनके ही शब्दों में लिखें तो,'तब जिंदगी मजाक बन गयी थी,दिल्ली आया था घर छोड़कर कि कुछ काम-धंधा करुं और मजाक बनी जिंदगी को कुछ मतलब दूं। लेकिन यहां आकर मजाक-मजाक में पढ़ने लग गया। रामजस कॉलेज से बीए करने के बाद एमए करने का मूड हो आया. तब तक किताबों का चस्का लग गया था और इसी ने मुझे एमए में गोल्ड मेडल तक दिला दिया। एम.फिल् करने लग गया। अब हंसिए मत, सच है कि मजाक-मजाक में ही जेआरएफ भी हो गया औऱ अब॥अब क्या। हबीब तनवीर के नाटक पर डीयू से रिसर्च कर रहा हूं। जिस मजाक ने मुझे नक्कारा करार देने की कोशिश की आज भी उसी मजाक के लिए भटकता-फिरता हूं। पेशे से रिसर्चर होते हुए भी मिजाज से घुमक्कड़ हूं। फिल्में खूब देखता हूं,बतगुज्जन पर भरोसा है और पार्थसारथी पर बार-बार रात बिताने भागता रहता हूं। अब तो जिंदगी और मजाक दोनों से प्यार-सा हो गया है।'
gopalganj


अग्निपथ से मन्दिर पहुंचना


घर से तक़रीबन १०-१२ साल हो गए हैं बाहर रहते मगर आज भी जब कभी वहां जाना होता है तो शहर के सिनेमा रोड पर पहुँचते ही दिल की धड़कने अचानक ही बढ़ जाती हैं।ये वह सड़क है जहाँ मैं और मेरे साथ के और कई लड़के बड़े हुए ,समय -असमय ये बाद की बात है। श्याम चित्र मन्दिर हमेशा से ही हम सभी के आकर्षण का केन्द्र बिन्दु रहा था,चाहे कोई भी फ़िल्म लगी हो श्याम चित्र मन्दिर जिंदाबाद। बगल में डी।ऐ।वी।हाई स्कूल है जहाँ से मैंने दसवीं पास की थी। स्कूल में हमेशा ही विज्ञान और मैथ पहली पाली में पढाये जाते थे,मगर मैं ठहरा मूढ़ उस वक्त भी खाम-ख्याली में डूबा रहता था। कभी पास ही के रेलवे स्टेशन पर जाकर स्टीम इंजिन के गाड़ी पर लोगों के जत्थे को चढ़ते उतरते देखता ,तो कभी स्टेशन के पटरी के उस पार के जलेबी के पेडों से जलेबियाँ तोड़ना यही लगभग पहले हाफ का काम था । इस बीच महेश ने मुझे श्याम चित्र मन्दिर का रास्ता सूझा दिया ,फ़िल्म थी -अग्निपथ। भाईसाब तब अमिताभ का नशा जितना मत्थे पे सवार था उतना तो शायद अब किसी और के लिए कभी नहीं होगा। अमिताभ जी की इस फ़िल्म ने पूरी दिनचर्या ही बदल दी। अब शुरू हो गया श्याम सिनेमा के बाबु क्लास (माने २ रूपया वाला दर्जा जो बिल्कुल ही परदे के पास होता था )में ३ घंटे बैठ कर गर्दन को उचका कर फ़िल्म देखना जिसमे हीरो के सुखो-दुखों में हम उसके साथ-साथ होते थे। कई बार तो हीरो और उसके ग़मों का इतना गहरा प्रभाव होता था की आंखों के किनारे सबसे बचा कर पोंछ लेना पड़ता था ताकि अगले दिन महेश मजाक ना बनाये -"ससुर तू उ नाही ....लड़की कही का रोअनिया स्साले ...फिलिम देख के रोता है हीहीही "।




हमारा दूसरा स्कूल श्याम चित्र मन्दिर माने हमारा दूसरा स्कूल ।यहाँ हमने रिश्ते जाने ,प्यार सीखा ,दुश्मनी सीखी, दोस्ती सीखा,बवाल काटना सीखा ......मतलब की अब हमारी दैनिक रूटीन में कुछेक संवाद आ गए the मसलन -"रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं...,जानी जिनके खुदके घर शीशे के हो वो॥,अब तेरा क्या होगा..,इत्यादि। ये वो समय था जब अमिताभ जैसों का जादू ख़त्म हो चला था और नए चेहरे फिल्ड में आ गए थे। फ़िर भी हमारे इस सिनेमा घर में पुरानी फिल्में ही अधिकाँश लगती थी आज भी अभी नई फिल्में वहां जल्दी नहीं पहुँचती । "सत्या"ने पूरे भारत में धूम मचाई थी मगर श्याम सिनेमा में दूसरे दिन ही उतर गई थी। गंगा भगत ,जो बाबु क्लास के गेटकीपर थे ने उस रोज़ उदास होकर बताया था कि'अरे बाबु पता न कईसन फिलिम बा की सब कौनो अन्तिम में मरिये जातारे सन । अब तू ही बतावा अईसन फिलिम के देख के आपन पीसा बरबाद करी?"(पता नहीं कैसी फ़िल्म है जिसमे सब मर ही जाते हैं ,अब तुम ही बताओ ऐसी फ़िल्म देख कर कौन अपना पैसा बरबाद करेगा)।- गेटकीपर तक से अपना याराना हो गया था। एक और ख़ास बात इस चित्र मन्दिर की थी कि जब कभी हमारे पास हॉल में भीड़ की वजह और उस भीड़ में हमारे साइज़ की वजह से टिकट नहीं मिल पाता तब हम डाईरेक्ट गेटकीपर को ही पईसा देकर अपनी सीट पकड़ लेते थे। सीट मिलते ही विजेता की तरह आगे पीछे देखकर अपनी सेटिंग पर मन-ही-मन प्रफुल्लित होते रहते थे। "लिप्टन चाय'और 'पनामा सिगरेट' के विज्ञापन आते ही सभी दर्शक खामोश हो जाते और जैसे ही फ़िल्म शुरू होने के पहले बैनर पर किसी देवी-देवता की मूरत आती कुछ जोश में ताली बजाते,कुछ सीटी या फ़िर कुछ भक्त स्टुडेंट नमस्ते कर लेते..जय हो थावे भवानी की जय। मेरी परेशानी थोड़े दुसरे किस्म की थी जैसे फ़िल्म शुरू होने पर मैं पहले ये देखता था कि कितने रील की है(१५-१६ रील का होने पर कोफ्त भी होती थी कि ढाई घंटे का ही है बस...वैसे पोस्टर पढने का भी बड़ा शौकीन था और इसी शौक में काफ़ी समय तक फ़िल्म में "अभिनीत"नाम के एक्टर को ढूंढता रहा था कि आख़िर ये कौन अभिनीत नाम का एक्टर है जिसका नाम सभी फिल्मों की पोस्टरों पर होता है मगर मुझे ही नहीं दीखता ,पहचान में आता । वैसे थोड़े ऊँचे क्लास में पहुँचने पर जान गया "अभिनीत" का राज।




लगाना जुगाड़ पैसों का


रोज़-रोज़ फ़िल्म देखना सम्भव नहीं था ,मगर श्याम चित्र मन्दिर वाले शायद हमारी इस दिक्कत को समझते थे । यहाँ आज भी कोई फ़िल्म शुक्रवार की मोहताज़ नहीं होती ,जब तक चली चलाया नहीं चली अगले कोई दूसरी लग गई। स्कूल में हमारे महेश भी बड़े फिलिम्बाज़ थे। एक दिन पैसों की दिक्कत का दुखडा हमने रोकर कहा -'यार बाबूजी रोज़-रोज़ पैसा देते नहीं हैं इसलिए मैं फिलिम देखने नहीं जाऊंगा तू चला जा'। बस फ़िर क्या था महेश ने टीम लीडर होने का पूरा फ़र्ज़ निभाया ,उसने एक ऐसी तरकीब हमें सुझाई जिससे आगे हमें कभी पैसों की दिक्कत नहीं हुई। अब हम महेश के प्लान के अकोर्डिंग सायकिल से आने वाले छात्रों के सीट कवर ,घंटी (घंटियाँ पीतल की होती थी और स्कूल के बाहर बैठने वाला मिस्त्री हमें प्रति घंटी २ रूपया भुगतान करता था,सीट कवर ४ से ५ रूपया में बिक जाता था।)निकालने लगे और पकड़े जाने पर दादागिरी जिंदाबाद क्योंकि महेश स्कूल में अपने कमर में कभी सायकिल की चेन तो कभी छोटा चाकू ले आता था जिससे हम उसकी बहादुरी के कायल थे। अगर कभी किसी एक के पास पैसा नहीं जुगाड़ हो पाता तो गेटकीपर गंगा भगत की जेब से २-३ दिनों में या अगली फ़िल्म में दे देने के शर्त पर ले लिया जाता । श्याम चित्र मन्दिर कितना अपना था।




जिंदगी से बड़ी तस्वीर


"लार्ज़र देन लाईफ" के मायने और श्याम सिनेमा का परदा (सिल्वर स्क्रीन)। चूँकि हम तो बाबु क्लास के दर्जे वाले दर्शक थे इसलिए बैठते हमेशा सबसे आगे ही थे।मानो सिनेमा का पहला मज़ा हम लेते थे फ़िर हमसे पास होकर पीछे वालों को जाता था। हम सभी उन दिनों में पता नहीं किस साइज़ के थे कि परदा काफ़ी विशाल लगता था । परदे पर जैसे ही किसी जीप या अन्य किसी दृश्य जिसमे भगदड़ का सीन आता तो ऐसा लगता मानो वह जीप या भीड़ हमी पर चढ़ गई और हम सभी थोडी देर को ख़ुद को पीछे सीट पर धकेल लेते और बाद में राहत-सा अनुभव करते। फ़िल्म के सारे क्रियाव्यापार इतने बड़े से लगते की पूछिए मत । और परदे के दोनों तरफ़ बने दो फन निकले नाग ऐसा प्रतीत कराते जैसे वे ही इस विशाल परदे की रक्षा कर रहे हैं। काफ़ी समय तक ये मेरे मन में परदे के रक्षक नाग छाये रहे थे।बाद के समय में जब सिनेमा पर मैंने पढ़ना शुरू किया और 'लार्ज़र देन लाइफ ' वर्ड पढ़ा तो श्याम चित्र मन्दिर का विशाल परदा और उसपर घटते बड़े-बड़े क्रियाव्यापार ही आंखों के आगे घूम गए।




गमछा होता था कूलर अपना ख़ुद का कूलर हॉल में । श्याम चित्र मन्दिर के बाबु क्लास में ना केवल हम जैसे भारत के भविष्य बल्कि रिक्शा वाले ,मजदूर किस्म के लोग भी आते थे। अब चूँकि छोटे शहर का हाल था और लोग भी वही के तो झिझक ना के बराबर थी। फ़िल्म शुरू होते ही सब अपना अपना गमछा उतार कर सीट पर दोनों पाँव रख कर फ़िल्म में डूब जाते थे। इधर शरीर से पसीना बहता था उधर सीन तेज़ी से बदलता था और हाथों में पकड़ा हुआ गमछा भी उतनी ही शिद्दत से घूमता रहता था। बाद में थोड़े झिझक के बाद हम भी इसी जमात के हो लिए। ऐसे वातानुकूलन मशीन कि क्या आज जरुरत नही है?ये विशुद्ध हमारा कूलर था।




प्रचार का पारसी अंदाज़ पारसी थिएटर याद है....?- बस,ऐसा ही कुछ था श्याम चित्र मन्दिर के प्रचार का ढंग ।मसलन जैसे ही कोई नई फ़िल्म आती थी तो उसका बड़े जोर-शोर से जुलूस निकाला जाता था.२-३ तीन पहिये वाले रिक्शे पूरे दिन के लिए किराए पर लाये जाते थे फ़िर उनपर तीन तरफ़ से फ़िल्म के रंग-बिरंगे पोस्टर लकड़ी के फ्रेमों में बाँधकर लटका दिए जाते थे और एक भाईसाब उस रिक्शे में चमकीला कुर्ता पहनकर माइक हाथो में लेकर बैठ जाते थे और रिक्शे के पीछे-पीछे ७-८ सदस्यीय बैंड-बाजे वालो का गैंग चलता था जो मशहूर धुनें बजा-बजाकर लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा करते थे.वैसे ये परम्परा अब भी बरक़रार है मगर बैंड-बाजो की जगह रिकॉर्डर ने ले ली है.पीछे-पीछे बैंडबाजे और रिक्शे में सवार हमारे स्टार कैम्पैनर माइक पर गला फाड़-फाड़कर सिनेमा का विज्ञापन करते रहते.इसकी एक झलक आपको भी दिखता हूँ,-


"फ़र्ज़ कीजिये फ़िल्म लगी है -'मर्डर'।तो हमारे प्रचारक महोदय कुछ यूँ कहेंगे -'आ गया, आ गया, आ गया,जी हाँ भाइयों और बहनों आपके शहर गोपालगंज में श्याम चित्र मन्दिर के विशाल परदे पर महान सामाजिक और पारिवारिक संगीतमय फ़िल्म 'मर्डर'(वैसे भोजपुरी प्रदेश होने की वजह से 'मडर'शब्द ही चलता था)।पीछे से बैंडबाजों का तूर्यनाद होने लगता था-'तूंतूं पींपीं ढम ढम' जैसा कुछ-कुछ.फ़िर गले को और पतला और पता नही कैसा बनाकर आवाज़ निकालता (रेलवे स्टेशनों पर 'ले चाई गरम की आवाज़ जैसा कुछ-कुछ)-जिसके चमकते,दमकते,दिल धड़काने वाले सितारे हैं-मल्लिका शेहरावत,इमरान हाशमी,इत्यादि.फ़िर से बैंड-बाजों का समर्थन.कुछ 'अ' श्रेणी के प्रचारक तो बाकायदा उस फ़िल्म के गीत गाकर भी सुनाते थे,और साथ ही ,उस फ़िल्म के नायक-नायिका का विशेष परिचय भी देते थे,जैसे-सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के बेटे की पहली फ़िल्म.आदि.बस इतना जानिए की फ़िल्म पूरे जीवंत माहौल में लगायी,दिखाई और प्रचारित की जाती थी क्या मल्टीप्लेक्स में वो मज़ा है?




नातेदारी निभाना भी ज़रूरी था


फिल्मोत्सव मनाने जैसा कुछ-कुछ।-हमारा घर शहर के पास ही था और हमारे सभी रिश्तेदार गांवों से आते थे. पुरुषों का तो पता नहीं पर औरते जब भी आती थी तो अपने गांव के अपने पड़ोसियों को भी लेती आती थी.इसके पीछे भी दो मकसद होते थे,पहला तो ये कि इन लोगों की कुछ खरीददारी वगैरह भी हो जायेगी और दूसरा ये कि इसी बहाने एक सिनेमा भी देख लेंगी. अब चूँकि ये हमारी रिश्तेदार होतीं थी तो इन्हे कम्पनी ना देने पर नातेदारी में बेईज्ज़ती का खतरा कौन मोल ले.तो हमारा और उनका पूरा कुनबा सिनेमा हाल की तरफ़ प्रस्थान करता था.जिस समय-पाबन्दी की बात गाँधी जी कर गए थे उसकी जीती-जागती मिसाल ये महिलाएं और फैमिली होती थी.फ़िल्म शुरू होने से शार्प एक घंटा पहले इनकी रेलगाड़ी वहां पहुँच जाती और श्याम चित्र मन्दिर के स्टाफ इनके लिए सिनेमा हाल के कारीडोर में ही टेम्परेरी प्रतीक्षालय बना देते. सिनेमा में घुसकर ये फौज सिनेमा को अपने भीतर आत्मसात कर लेती थी.पूरा रसास्वादन.यानी हीरो-हिरोइन के साथ हँसना -रोना और विलेन या वैम्प को जी भर कोसना.कुल मिलाकर ये जानिए कि कई रिश्तेदारियां भी श्याम चित्र मन्दिर के बहाने बनी और टिकी रहीं.यहाँ जीजाजी लोग अपनी बीवी और सालियों के साथ आते थे पिताजी कि उम्र के लोग अपनी जमात के साथ और माता जी बहनों और छोटे बच्चों के साथ अब फ़िल्म चाहे हिट हो या सुपर-फ्लॉप इसका प्रभाव नही पड़ता था,सिर्फ़ एक हिट गाना या हिट सीन काफ़ी था देखने के लिए.अगर फ़िल्म ठीक ना भी रही हो तो अपने तर्क गढ़ लिए जाते ताकि पैसा बरबाद हुआ है ऐसा ना लगे.




रंगीन दुनिया


पोस्टरों में अपनी शक्ल तलाशना-पहले पोस्टर पर लिखा आता था -'ईस्टमैन कलर'इस ईस्टमैन तलाश भी काफ़ी बहसों में रही।महेश बाबु कहते थे (हमारे स्कूली जीवन के सिनेमा एक्सपर्ट )कि 'अजी कुछो नहीं ई जो कलर है ना ,सब बढ़िया प्रिंट वाला फिलिम के लिए लिखा जाता है समझे?'- अपनी बात और पुख्ता करने के लिए कहने लगते-'अमिताभ ,मिथुन,धरमेंदर चाहे सन्नी देवल के फिलिम का पोस्टर देखना सबमे ई लिख रहता है',-उनके इतना कहने के बाद शक की कोई गुंजाईश ना रहती थी. उन दिनों स्कूल से घर जाने का एक शोर्टकट रास्ता होता था जिसे हम शायद ही चुनते,इसका कारण था कि बड़े(थोड़ा ही)रास्ते पर श्याम सिनेमा का पोस्टर वाला पोर्शन पड़ता था ,पोस्टर में हीरो के आड़े-टेढे चेहरे के हिसाब से हम अपनी शक्लें बनाया करते,या हीरो ने जैसा एक्शन किया होता वैसा ही करने की कोशिश करते(वैसे ऐसी तलाश भी कभी ख़त्म हुई है क्या?)




छूट गया श्याम चित्र मन्दिर


शहर छूटने के साथ ही श्याम चित्र मन्दिर छूट गया इसकी भरपाई कभी भी ना हो सकेगी।जब भी यहाँ दिल्ली में मल्टीप्लेक्सों में जाता हूँ तो एक अजीब-सा बेगानापन घेर लेता है लगता है कि पता नहीं ये कौन-सी जगह है.वही फिल्मिस्तान(बर्फखाना)या अम्बा(मल्कागंज सब्जी मंडी)का माहौल थोड़ा-सा ही सही वैसा ही जीवंत लगता है.काफ़ी समय पहले दूरदर्शन ने 'नाइन गोल्ड' नाम से एक चैनल शुरू किया था जो मेट्रो चैनल के ऑप्शन में आया था शायद,उसी पर एक प्रोग्राम आता था-"directors cut special"-उसमे एक बार मिलिंद सोमन अभिनीत "जन्नत टाकीज" टेलीफिल्म देखि थी.बस तभी श्याम चित्र मन्दिर आंखों के सामने तैर गया.इससे जुड़ी यादें कभी ख़त्म ना होने वाली धरोहर के तौर पर हमेशा दिल में रहेगी कि कोई तो ऐसा हॉल था जो अपना-सा लगता था।


२००७ जून का समय- श्याम चित्र मन्दिर का विशाल परदा "वही लार्ज़र देन लाइफ" छोटा-सा लगने लगा है(शायद ७० एम्.एम् नहीं है).दीवारें गुटखे और पान चबाने वाले भाईयों ने रंग डाली हैं और आपके ना चाहते हुए भी इन सबकी गंध आपके नथुनों में घुसी आती है,चलते हुए रोमांटिक दृश्यों में लेज़र लाईटों से कुछ छिछोरें हिरोइन के अंगों पर उस लाइट से लोगों का ध्यान लाते हैं,इसके पुराने मालिक गुज़र गए हैं और नए पता नहीं कैसे हैं.पुराने गेटकीपर गंगा भगत नौकरी छोड़ चुके हैं और अपने पोतों में व्यस्त हैं. और हाँ अब वैसा पारिवारिक मिलन यहाँ देखने को नही मिलता,या सच कहूँ तो अब परिवार वाले फ़िल्म देखने आते ही नहीं.महेश बाबु दुबई में कमा रहे हैं और सिनेमा देखने चलने पर कह गए -'अरे छोया मुन्ना भाई,कौन स्साला तीन घंटा गर्मी,उमस और गंध में बितावेगा ?चल अ घरे चाय-चु पीते हैं.श्याम चित्र मन्दिर वाले रोड पर शाम को अब अँधेरा ही रहता है,लोग कहते हैं कि यहाँ नाईट शो देखना खतरे से खाली नहीं.मैन पिछली बातें याद करता हूँ जब हम बच्चे आपस में क्विज खेला करते कि -'बताओ कौन-सा मन्दिर ऐसा है जहाँ आप सभी जूते-चप्पल पहनकर भी जा सकते हैं?"-और एकमत से जवाब मिलता -"श्याम चित्र मन्दिर"............और अब...?













Sunday, November 16, 2008

रब ने बना दी जोड़ी में अलग लग रहे हैं शाहरूख खान



12 दिसंबर को रब ने बना दी जोड़ी रिलीज होगी। दरअसल, यह फिल्म शाहरुख खान से ज्यादा आदित्य चोपड़ा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मोहब्बतें के निर्देशन के आठ साल बाद वे रब.. लेकर आ रहे हैं। फिल्म के पोस्टर और पहले गाने को देखकर ऐसा लग रहा है कि यह फिल्म उनकी पहले की फिल्मों से अलग होगी। वैसे, यह शाहरुख के लिए इस लिहाज से भी खास हो जाती है कि ओम शांति ओम के बाद यह उनकी पहली कायदे की फिल्म होगी।
शाहरुख इस बार ओम शांति ओम की तरह आक्रामक जरूर नहीं दिख रहे हैं, लेकिन इस फिल्म को दर्शकों तक ले जाने और उन्हें इस फिल्म के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर भी है। इसी कारण उन्होंने अपने जन्मदिन के मौके पर मीडिया को मन्नत में बुलाया। कोशिश यह थी कि जन्मदिन के मौके पर रब.. की चर्चा आरंभ हो जाए। यशराज और शाहरुख इस रणनीति में सफल रहे। शाहरुख ने विस्तार से फिल्म के बारे में बताया। उन्होंने आदित्य के साथ हुई विमर्श की जानकारी भी दी। जैसे कि पहले पोस्टर में प्रौढ़ शाहरुख को पेश करना। पहले राय बनी थी कि इससे दर्शक निराश होंगे। उन्हें लगेगा कि शाहरुख बूढ़े हो गए हैं। शाहरुख की राय थी, हमें दर्शकों को सच बना देना चाहिए। फिल्म के पोस्टर और प्रचार में यह झलकना चाहिए कि वे फिल्म में क्या देखने जा रहे हैं? अगर इस फिल्म में मैं प्रौढ़ किरदार निभा रहा हूं, तो उसकी जानकारी लोगों को पहले से होनी ही चाहिए। ऐसा न हो कि दर्शकों को सिनेमाघरों जाकर झटका लगे। दर्शकों को नहीं लगना चाहिए कि उन्हें धोखे में रखा गया है। अगर मैं इस फिल्म में साधारण और मध्यवर्गीय बिजली कर्मचारी सुरेन्द्र साहनी की भूमिका निभा रहा हूं, तो यह लोगों को पहले से मालूम होना चाहिए!
शाहरुख ने आगे बताया, हालांकि हर फिल्म में मैं दर्शकों के बीच अपनी इमेज का खयाल रखता हूं, लेकिन इस फिल्म के लिए मैंने हिम्मत की है। फिल्म की कहानी मुझे पसंद आई और अपना किरदार दर्शकों के बीच का लगा। उन्होंने स्पष्ट कहा, अगर लोग मेरी इमेज और लोकप्रियता को किनारे कर दें, तो मैं मध्यवर्गीय साधारण चेहरे वाला लड़का ही हूं। आश्चर्य होता है कि गौरी (पत्नी) ने मुझमें क्या देखा! रब.. में खास संदेश है कि आप जिसके साथ हैं, उसी को प्यार करना सीखें। इससे जिंदगी खुशहाल होगी। पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिका के भावनात्मक रिश्ते में किसी तीसरे का खयाल आना ही नहीं चाहिए। फिल्म में शाहरुख की दो छवियां हैं। एक प्रौढ़ और दूसरे जवान। दोनों ही रूपों में वे फिल्म की नायिका अनुष्का शर्मा के साथ हैं। चूंकि फिल्म का यही खास ऐंगल है, इसलिए शाहरुख साफ-साफ बताने में हिचकिचाते रहे। हालांकि उन्होंने कहा, मैं कहानी बता देने में कोई बुराई नहीं समझता, लेकिन आजकल रिवाज है कि पहले ज्यादा जानकारी मत दो। चूंकि आदित्य रहस्य बनाए रखना चाहते हैं, इसलिए मैं उनके विरोध में जा भी नहीं सकता। एक तरह से यह अच्छा भी है कि दर्शक अनुमान लगाते रहें कि फिल्म में क्या है!
फिल्म की भूमिका के लिए शाहरुख खान को खास तैयारी करनी भी पड़ी। मध्यवर्गीय आचरण और व्यवहार भूल चुके शाहरुख ने अपने पिछले टीवी शो क्या आप पांचवीं पास से तेज हैं के लिए आए प्रतियोगियों के ऑडिशन के वीडियोज देखे और उनमें से दो प्रतियोगियों के हाव-भाव और अंदाज को अपने लिए पकड़ा। उन्होंने इस फिल्म में मूंछ भी लगाई है। पर्दे पर अपनी मूंछ को लेकर शंकालु शाहरुख को डर भी लग रहा है कि पता नहीं यह दर्शकों को पसंद आएगी भी या नहीं? फिल्म पहेली में उनका चरित्र यानी किशन मूंछ वाला था और उस फिल्म का हाल सभी जानते हैं। शाहरुख के शुभचिंतक मानते हैं कि उन्हें मूंछों को लेकर परेशान नहीं होना चाहिए। इस बार अमोल पालेकर ने नहीं, आदित्य चोपड़ा ने मूंछें लगवाई हैं, तो कोई बात जरूर होगी? वैसे भी, रब.. एक तरह से यशराज फिल्म्स, आदित्य चोपड़ा और शाहरुख खान की मूंछों का मामला है।

Saturday, November 15, 2008

फ़िल्म समीक्षा:दोस्ताना


भारतीय परिवेश की कहानी नहीं है

-अजय ब्रह्मात्मज


कल हो न हो में कांता बेन के मजाक की लोकप्रियता को करण जौहर ने गंभीरता से ले लिया है। अबकि उन्होंने इस मजाक को ही फिल्म की कहानी बना दिया।
दोस्ताना दो दोस्तों की कहानी है, जो किराए के मकान के लिए खुद को समलैंगिक घोषित कर देते हैं। उन्हें इस झूठ के नतीजे भी भुगतने पड़ते हैं। संबंधों की इस विषम स्थिति-परिस्थिति में फिल्म के हास्य दृश्य रचे गए हैं। आशचर्य नहीं की इसे शहरों के युवा दर्शक पसंद करें। देश के स्वस्थ्य मंत्री ने भी सुझाव दिया है कि समलैंगिक संबंधों को कानूनी स्वीकृति मिल जानी चाहिए। सम्भव है कि कारन कि अगली फ़िल्म समलैंगिक संबंधो पर हो।

करण की दूसरी फिल्मों की तरह इस फिल्म की शूटिंग भी विदेश में हुई है। इस बार अमेरिका का मियामी शहर है। वहां भारतीय मूल के दो युवकों को मकान नहीं मिल पा रहा है। एक मकान मिलता भी है तो मकान मालकिन अपनी भतीजी की सुरक्षा के लिए उसे लड़कों को किराए पर नहीं देना चाहती। मकान लेने के लिए दोनों खुद को समलैंगिक घोषित कर देते हैं। फिल्म को देखते समय याद रखना होगा कि यह भारतीय परिवेश की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे देश की कहानी है, जहां का कानून समलैंगिक दंपति को रेसिडेंट परमिट देने में प्राथमिकता देता है। भारत में समलैंगिक संबंधों को अभी सामाजिकस्वीकृति नहीं मिली है।

हास्य फिल्मों में हमेशा अप्राकृतिक विषयों और कमियों को मजाक का विषय बनाया जाता है.समलैंगिकता पर बनी यह फ़िल्म ऐसे संबंधों के प्रति संवेदनशील होने के बजाय हंसाने कि वजह देती है.हिन्दी फिल्मों के इतिहास में यह फ़िल्म पुरूष अंग प्रदर्शन के लिए याद रखी जायेगी। निर्देशक तरूण मनसुखानी ने जॉन अब्राहम की सुडौल देहयष्टि का जमकर प्रदर्शन किया है। जॉन अब्राहम अपनी देह को लेकर बेफिक्र दिखते हैं। उन्हें कुछ दृश्यों में चड्ढी खिसकाने में शर्म नहीं आई है। इस देह दर्शन का उद्देश्य निश्चित रूप से वैसे दर्शकों को रिझाना है,जो पुरुषों के शरीर सौष्ठव में रूचि लेते हैं.यह हिन्दी का बदलता सिनेमा है.इस पर गौर करने की ज़रूरत है।

अभिनय के लिहाज से अभिषेक और जॉन अब्राहम ने अपने किरदारों को सहजता से निभाया है। दोनों के बीच के सामंजस्य से फ़िल्म रोचक बनी रहती है। अभिषेक बच्चन खिलंदडे किरदारों में अच्छे लगते हैं.जॉन अब्राहम भी इस बार किरदार में घुसते नज़र आए.प्रियंका चोपड़ा अभिनय के प्रति गंभीर हो गई हैं। फैशन के बाद दोस्ताना में भी वह जंचती है। इस फिल्म में बॉबी देओल सरप्राइज करते हैं। बाकी कलाकार सामान्य हैं।

फ़िल्म समीक्षा:दसविदानिया

अवसाद में छिपा हास्य
-अजय ब्रह्मात्मज
अलग मिजाज की फिल्म को पसंद करने वालों के लिए दसविदानिया उपहार है। चालू फार्मूले और स्टार के दबाव से बाहर निकल कर कुछ निर्देशक ऐसी फिल्में बना रहे हैं। शशांत शाह को ऐसे निर्देशकों में शामिल किया जा सकता है। फिल्म का नायक 37 साल का है। शादी तो क्या उसकी जिंदगी में रोमांस तकनहीं है। चेखव की कहानियों और हिंदी में नई कहानी के दौर में ऐसे चरित्र दिखाई पड़ते थे। चालू फिल्मों में इसे डाउन मार्केट मान कर नजरअंदाज किया जाता है।
अमर कौल एक सामान्य कर्मचारी है। काम के बोझ से लदा और मां की जिम्मेदारी संभालता अपनी साधारण जिंदगी में व्यस्त अमर। उसे एहसास ही नहीं है कि जिंदगी के और भी रंग होते हैं। हां, निश्चित मौत की जानकारी मिलने पर उसका दबा अहं जागता है। मरने से पहले वह अपनी दस ख्वाहिशें पूरी करता है। हालांकि इन्हें पूरा करने के लिए वह कोई चालाकी नहीं करता। वह सहज और सीधा ही बना रहता है।
अमर कौल की तकलीफ रूलाती नहीं है। वह उदास करती हैं। सहानुभूति जगाती हैं। चार्ली चैप्लिन ने अवसाद से हास्य पैदा करने में सफलता पाई थी। दसविदानिया उसी श्रेणी की फिल्म है। कमी यही है कि इसमें अवसाद ज्यादा गहरा नहीं हो पाता। विसंगतियां अधिक तकलीफदेह नहीं हैं। फिर भी विनय पाठक ने अपने अभिनय के दम पर बांधे रखा है।
दसविदानिया संबंध और एहसास की फिल्म है जो सामान्य व्यक्ति के छोटे इरादों की भावनात्मक गहराई को व्यक्त करती है।
मुख्य कलाकार : विनय पाठक, नेहा धूपिया, सरिता जोशी, रजत कपूर, सौरभ शुक्ला आदि।
निर्देशक : शशांत शाह
तकनीकी टीम : निर्माता- आजम खान और विनय पाठक, कथा-पटकथा- अरशद सैयद, गीत - कैलाश खेर, संगीत - कैलाश, परेश, नरेश

Friday, November 14, 2008

दोस्ती का मतलब वफादारी है: अभिषेक बच्चन

अभिषेक बच्चन की नई फिल्म दोस्ताना दोस्ती पर आधारित है। आज रिलीज हो रही इस फिल्म के बारे में पेश है अभिषेक बच्चन से खास बातचीत-
दोस्ती क्या है आप के लिए?
मेरे लिए दोस्ती का मतलब वफादारी है। दोस्त आसपास हों, तो हम सुरक्षा और संबल महसूस करते हैं।
क्या दोस्त अपने पेशे के ही होते हैं?
दोस्त तो दोस्त होते हैं। जरूरी नहीं है कि वे आप के पेशे में ही हों। मेरे कई दोस्त ऐसे हैं,जिनका फिल्मों से कोई नाता नहीं है।
दोस्त बनते हैं या बनाए जाते है?
दोस्त बनाए जाते हैं। दोस्ती खुद-ब-खुद नहीं होती। दोस्ती की जाती है। उसके लिए कोशिश करनी पड़ती है।
कौन सा रिश्ता ज्यादा मजबूत होता है? दोस्ती या खून का रिश्ता?
यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। मेरे और आपके या किसी और के अनुभव में फर्क हो सकता है। मैं रिश्तों को अलग-अलग करके नहीं देखता।
दोस्त और दोस्ती को लेकर आप के अनुभव कैसे रहे हैं?
मेरे ज्यादातर दोस्त बचपन के ही हैं। गोल्डी बहल,सिकंदर खेर,उदय चोपड़ा और रितिक रोशन सभी मेरे बचपन के दोस्त हैं। हम सभी एक ही स्कूल में पढ़ते थे। मैंने दोस्ती निभाई है और वे सभी दोस्त बने रहे हैं।
कोई गैरफिल्मी दोस्त भी है?
बिल्कुल। अभी दो के नाम लूंगा। गौरव चेन्नई में रहते हैं और रियल एस्टेट के धंधे से जुड़े हैं। कॉलेज के दिनों में गौरव से दोस्ती हुई थी। विनय लंदन में रहते हैं और मार्केटिंग से जुड़े हैं। वह मेरे बचपन के दोस्त हैं। हम पड़ोसी थे।
आप ने हमेशा कहा है कि पापा आप के सबसे अच्छे दोस्त हैं। अमित जी भी अपने ब्लॉग में उल्लेख करते हैं कि आप उनके दोस्त हैं। क्या इस दोस्ती को परिभाषित करेंगे?
पापा के साथ मेरी दोस्ती को परिभाषित नहीं किया जा सकता। इस रिश्ते की यही खासियत है। वह मेरे सबसे घनिष्ठ दोस्त हैं। हम दोनों एक-दूसरे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। दोस्ती की शुरुआत डैड ने की थी। उनका मानना था कि जिस दिन बेटे के पांव में मेरा जूता आ गया उस दिन से वह मेरा दोस्त हो गया। मैं उनसे किसी भी मुद्दे पर बात कर सकता हूं। इस दोस्ती में मैं अपनी मर्यादा नहीं भूलता कि वह मेरे पिता हैं। एक हद है,जो मैं पार नहीं कर सकता।
आप ऐश्वर्या को भी दोस्त कहते हैं?
ऐश्वर्या से मेरी दोस्ती अलग किस्म की है। वह मेरी पत्‍‌नी हैं। ऐश्वर्या हमउम्र और हमपेशा भी हैं। वह मुझे अच्छी तरह समझती हैं।
जॉन अब्राहम आपके दोस्त हैं और अभी उनके साथ दोस्ताना आ रही है।
जॉन की दोस्ती की वजह से ही हम फिल्म में बेहतर काम कर सके। हमारे बीच किसी प्रकार की होड़ नहीं रही। सीन चुराने या छा जाने वाली बात हमारे दिमाग में नहीं आई। आाप फिल्म देखेंगे, तो पता चलेगा। इस फिल्म में एक ही लड़की से हम दोनों प्यार कर बैठते हैं।

Thursday, November 13, 2008

दरअसल:दीवाली पर हुए बॉक्स ऑफिस धमाके

-अजय ब्रह्मात्मज
इस साल दीवाली के मौके पर रिलीज हुई गोलमाल रिट‌र्न्स और फैशन का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन अच्छा रहा। दोनों फिल्मों को लेकर ट्रेड सर्किल में पहले से ही पॉजिटिव बातें चल रही थीं। कहा जा रहा था कि रिलीज के दिन गोलमाल रिट‌र्न्स का पलड़ा भारी होता दिखा। उसका कलेक्शन ज्यादा हुआ। फैशन भी बहुत पीछे नहीं रही। दोनों फिल्मों के धमाकों से बॉक्स ऑफिस पर छाई खामोशी टूटी है। हालांकि आने वाले हफ्तों में ही यह पता चलेगा कि दोनों की वास्तविक कमाई कितनी रही!
अगर सिर्फ लाभ के नजरिए से देखें, तो गोलमाल रिट‌र्न्स सभी के लिए फायदेमंद साबित होती दिख रही है। निर्माता, वितरक और प्रदर्शक सभी को फायदा हो रहा है। फिल्म बिजनेस में अब नए व्यापारी आ गए हैं। इरोज और इंडियन फिल्म्स जैसी कॉरपोरेट कंपनियां फिल्म निर्माण में शामिल नहीं होतीं। वे फिल्में पूरी होने के बाद खरीद लेती हैं। ऐसे में निर्माता भी एकमुश्त रकम पाने के बाद संतुष्ट हो जाता है। उसे फिल्म के चलने या न चलने की फिक्र ही नहीं सताती। गोलमाल रिट‌र्न्स और सिंह इज किंग के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। दोनों फिल्में पूरी होने के बाद इंडियन फिल्म्स ने खरीदी और उन्हें अपनी शर्तोपर रिलीज किया। सिंह इज किंग का जबरदस्त प्रचार होने के कारण उसके प्रति दर्शकों के बीच भारी उत्सुकता थी। इंडियन फिल्म्स ने उसे देखते हुए वितरकों से मीनिमम गारंटी में निश्चित रकम लेने के बाद फिल्म दे दी। इस तरह से रिलीज के पहले ही इंडियन फिल्म्स ने फिल्म की लागत से अधिक रकम एकत्रित कर खुद को सुरक्षित कर लिया। रिलीज होने के बाद सिंह इज किंग भी कामयाब कहलाई, लेकिन उतनी नहीं, जितनी रिलीज के पहले हाइप और प्रचार की वजह से लग रही थी। नतीजा यह हुआ कि मीनिमम गारंटी के रूप में भारी रकम दे चुके वितरकों को नुकसान हुआ।
गोलमाल रिट‌र्न्स में मामला उल्टा हो गया है। इस बार पिछले अनुभव से सबक लेकर वितरकों ने मीनिमम गारंटी नहीं दी। उन्होंने दूसरे समीकरणों के तहत फिल्म रिलीज की। इस बार वितरक फायदे में हैं। गोलमाल रिट‌र्न्स को जिस कीमत में इंडियन फिल्म्स ने खरीदा है, उस रकम को जुटाना और फिर मुनाफे की तरफ जाने में अभी कई अड़चनें हैं। फिल्म का ग्रॉस कलेक्शन पहले ही हफ्ते में 35 करोड़ से अधिक बताया जा रहा है, लेकिन सच तो यह है कि इसमें वितरकों और प्रदर्शकों के मुनाफे भी शामिल हैं। इंडियन फिल्म्स का मुनाफा तो फिल्म के सौ करोड़ के बिजनेस के बाद ही होगा। फिल्म व्यापार में कॉरपोरेट कंपनियों के आने के बाद से मुनाफा, लाभ और निवेश का आकलन बिल्कुल बदल गया है। सिर्फ बॉक्स ऑफिस कलेक्शन ही मुनाफे का आधार नहीं रह गया है। हां, उस कलेक्शन से आय के दूसरे स्रोत प्रभावित जरूर होते हैं। इसी वजह से निर्माता चाहता है कि फिल्म सप्ताहांत में अच्छा बिजनेस करे और फिल्म के हिट होने की खबर फैल जाए। दीवाली के दो धमाकों के बाद राजश्री की एक विवाह ऐसा भी बिल्कुल अलग रणनीति के साथ रिलीज की गई। वैसे, राजश्री की रणनीति के नतीजे कुछ दिनों में ही सामने आ जाएंगे। इस हफ्ते रिलीज हो रही दोस्ताना को लेकर भी काफी उम्मीदें हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री दीवाली की कामयाबी के बाद खुश नजर आ रही है। अगले दो महीनों में बिजनेस सुधरता नजर आ रहा है। खासकर दिसंबर में रिलीज हो रही शाहरुख खान की रब ने बना दी जोड़ी और आमिर खान की गजनी पर सारी उम्मीदें टिकी हैं, क्योंकि दोनों ही फिल्मों को अभी से हिट माना जा रहा है। रब ने बना दी जोड़ी आदित्य चोपड़ा की फिल्म है। वे मोहब्बतें के छह साल बाद शाहरुख के साथ लौट रहे हैं। उन्होंने इस बार साधारण प्रेम कहानी ली है। दूसरी तरफ गजनी तमिल में बन चुकी गजनी की रिमेक है, जिसके लिए आमिर ने खास मेहनत की है। ट्रेड सर्किल में इसे दोनों खानों के वर्चस्व की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है। किसका पलड़ा भारी रहेगा, यह कहना मुश्किल है! वैसे, पिछले साल शाहरुख और आमिर दोनों की फिल्मों ने कामयाबी हासिल की थी। कुछ लोग तो यही उम्मीद कर रहे हैं कि दोनों फिर कामयाब हों और फिल्म इंडस्ट्री को भी आगे बढ़ाएं।

Wednesday, November 12, 2008

बॉक्स ऑफिस:१४.११.२००८

ईएमआई को लगा झटका
राजश्री प्रोडक्शन ने एक विवाह ऐसा भी को पुराने तरीके से रिलीज किया। मुंबई के चंद थिएटरों में यह फिल्म लगी है। देश के दूसरे शहरों का भी यही हाल है। राजश्री टीम का मानना है कि उनकी फिल्म के दर्शक धीरे-धीरे बढ़ेंगे। पहले हफ्ते में इस फिल्म का कलेक्शन औसत रहा। देखना है कि अगले हफ्तों में क्या स्थिति रहती है? थिएटरों से इस फिल्म के उतरने की संभावना नहीं है, क्योंकि राजश्री ने सभी शहरों में ऐसे थिएटर चुने हैं जहां फिल्म लंबे समय तक दिखायी जा सके। ईएमआई को अवश्य झटका लगा है। सोचा नहीं जा सकता था कि संजय दत्त की फिल्म की ओपनिंग 15-20 प्रतिशत होगी। इस फिल्म के दर्शकों के बढ़ने की उम्मीद भी नहीं है।
पुरानी फिल्मों में गोलमाल रिट‌र्न्स हिट होने की तरफ बढ़ चुकी है। निर्माता, निर्देशक और कलाकार सभी खुश हैं। अब तो गोलमाल-3 की बात चल रही है। मधुर भंडारकर की फैशन महानगरों में अच्छी चल रही है। फैशन को शहरी दर्शकों ने पसंद किया है। यह फिल्म औसत व्यापार कर लेगी।
इस हफ्ते तरूण मनसुखानी की दोस्ताना और शशांत सिंह की दसविदानिया रिलीज हो रही है।
फ्लॉप के अंधेरे से निकली फिल्म इंडस्ट्री ०७.११.२००८
आखिरकार बाक्स आफिस पर धमाका हुआ। हाल-फिलहाल में रिलीज हो रही फिल्मों के चारों खाने चित्त होने से फिल्म इंडस्ट्री में घबराहट फैल गयी थी। गोलमाल रिट‌र्न्स और फैशन की रोशन कामयाबी ने फिल्म इंडस्ट्री को फ्लॉप के अंधेरे से निकाला। दोनों ही फिल्मों के आरंभिककलेक्शन से खुशी की लहर आ चुकी है।
दीवाली के मौके पर दोनों ही फिल्मों को दो दिनों पहले बुधवार को रिलीज किया गया था। निर्माताओं की यह रणनीति काम आयी। लंबे समय से मनोरंजक फिल्मों के भूखे दर्शक टूट पड़े। पहले ही दिन से दोनों फिल्मों को दर्शक मिले, जो पांच दिनों के लंबे सप्ताहांत में टिके रहे। एक अर्से केबाद मुंबई और दूसरे शहरों में बॉक्स ऑफिस पर हाउस फुल के बोर्ड लटक दिखे।
गोलमाल रिट‌र्न्स का आरंभिक कलेक्शन 90 प्रतिशत रहा। कहा जा रहा है कि कुछ केंद्रों पर इस फिल्म की ओपनिंग सिंह इज किंग से ज्यादा रही। ऐसा लग रहा है कि साल की बड़ी हिट में गोलमाल रिट‌र्न्स शुमार हो जाएगी। फैशन को भी आरंभिक दर्शक मिले, लेकिन दिन बीतने के साथ दर्शक कम होते गए। फिर भी फैशन का बिजनेस औसत से बेहतर रहा। यूटीवी और मधुर भंडारकर निर्माता के तौर पर फायदे में रहेंगे।
हीरोज को हिट बताया जा रहा है। यह फिल्म मुंबई में अधिक नहीं चली। हां, उत्तर भारतीय दर्शकों ने इसे अवश्य पसंद किया। रोडसाइड रोमियो किसी भी उम्र के दर्शक को नहीं रिझा सकी।
इस हफ्ते राजश्री प्रोडक्शन की एक विवाह ऐसा भी और बालाजी मोशन पिक्चर्स व पापकार्न मोशन पिक्चर्स की ईएमआई रिलीज हो रही है।
सितारों से हुआ नुकसान ३१.१०.२००८
सलमान खान और सनी देओल नहीं होते तो समीर कर्णिक की हीरोज को देखने दर्शक जाते ही नहीं। सोहेल खान और वत्सल सेठ का आकर्षण अभी इतना दमदार नहीं है कि दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचा जा सके। वैसे यह अलग बात है कि ये सितारे ही फिल्म पर भारी पड़ गए और फिल्म संवर नहीं पायी। यशराज फिल्म्स की एनीमेशन फिल्म रोडसाइड रोमियो का हाल भी बुरा रहा।
हीरोज के निर्माताओं का दावा है कि फिल्म सफल रही है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का यह नया चलन है। फिल्म के निर्माता कुछ और दावा करते हैं, जबकि बॉक्स ऑफिस कुछ और बयान कर रहा होता है। दोनों ही फिल्मों को आरंभिक दर्शकनहीं मिले। शनिवार और रविवार को होने वाली बढ़ोत्तरी भी इन दोनों फिल्मों के मामले में नहीं दिखी। आगे कोई संभावना भी नहीं है, क्योंकि दीवाली के मौके पर गोलमाल रिट‌र्न्स और फैशन दो दिन पहले बुधवार को ही रिलीज हो रही है।
कर्ज का बिजनेस लगातार कम होता गया है। हालांकि छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन के दर्शकों ने हिमेश रेशमिया को पसंद किया, लेकिन मल्टीप्लेक्स के दर्शकों ने उन्हें तरजीह नहीं दी।
बिहार और राजस्थान में चल रही है कर्ज २४.१०.२००८
कहा जाता है कि आम दर्शकों के बीच हिमेश रेशमिया का क्रेज बरकरार है। कर्ज में भी वह क्रेज दिखा। सिंगल स्क्रीन और मुंबई से बाहर के सिनेमाघरों में कर्ज को संतोषजनक दर्शक मिले हैं। मुंबई और दूसरे बड़े शहरों के मल्टीप्लेक्स के दर्शकों ने कर्ज को नकार दिया है। इस फिल्म का आरंभिक कलेक्शन पचास प्रतिशत रहा, जो शनिवार-रविवार को थोड़ा बढ़ा, लेकिन सोमवार से बहुत नीचे आ गया।
फिल्म की लागत और स्टार वैल्यू के हिसाब से यह फिल्म औसत व्यापार कर लेगी। हिमेश के कट्टर प्रशंसकों ने इस फिल्म को बचा लिया। उन्होंने अपने सिंगर-एक्टर की प्रतिष्ठा रख ली। रिपोर्ट के मुताबिक कर्ज राजस्थान और बिहार में औसत से बेहतर बिजनेस कर रही है। कर्ज के साथ आई शूट ऑन साइट और चींटी चींटी बैंग बैंग को दर्शक नहीं मिले। पिछली फिल्मों में हैलो को उसके निर्माता हिट बता रहे हैं, लेकिन थिएटर खाली हैं। फिल्म इंडस्ट्री में अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने का रिवाज बढ़ता ही जा रहा है।

Monday, November 10, 2008

हिन्दी टाकीज:चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों..-जी के संतोष



हिन्दी टाकीज-१६


हिदी टाकीज में इस बार जी के संतोष .संतोष जी बनारस के हैं.क्रिकेट खेलते थे और फोटोग्राफी और फिल्मों का शौक था.फोटो जर्नलिज्म से आरम्भ किया और फिर खेल पत्रकार बन गए.इन दिनों दैनिक जागरण में कार्यरत हैं.मन हुआ तो साइकिल से काठमांडू और चम्बल की भी सैर कर आए.चवन्नी के आग्रह को संतोष ने स्वीकार किया और अपने अंदाज में सिनेमा से जुड़े संस्मरण लिखे.


बहुत दिनों बाद एक ऐसी फिल्म देखी जिसने पूरे शो के दौरान हिलने तक हीं दिया। नीरज पांडेय ने कमाल की फिल्म बनाई है-ए वेन्सडे। इस फिल्म में इंटरवल की भी कोई जरूरत नहीं थी। तेजी से भागती इस फिल्म में भारतीय सिनेमा के दो बेहतरीन अदाकार अनुपम खेर और नसीरूद्दीन शाह अपने बेहतरीन रंग में दिखाई दिए-जवाबी कव्वाली सुनाते हुए। कहानी दर्शकों को अच्छी तरह बांधे रखती है क्योंकि आज लगभग आधी दुनिया आतंकवाद से प्रभावित है। आज के बाजारवाद के दौर से परहेज रखते हुए इस तरह की फिल्म बनाकर नीरज पांडेय ने जोखिम उठाया है।

महानगरों में इन दिनों फिल्में बहुधा मल्टीप्लेक्सेज में लगती है। यहां फिल्में देखना ज्यादा मजेदार होता हैं। एक तो फिल्में वैसे भी तकनीक में हालीवुड को टक्कर देने वाली होती हैं, दूसरे आधुनिक साज-सज्जा वाले थिएटर में उन्हें देखना सोने में सुहागा है।

-----पर हमें तो याद है अपना ज़माना! यों तो फिल्मों से हमारा रोमांस लगभग चार दशक पुराना है पर उससे पहले की भी एक घटना हमें आज भी याद है। मुझे ठीक-ठीक तो नहीं याद पर शायद तब मैं सात-आठ साल बच्चा था। उस शाम मैं अपनी बुआजी के पास खाना खाकर सोने की तैयारी कर रहा था जब मां ने बुआ से कहा कि वो मुझे तैयार कर दें। पापा -मम्मी के साथ नाइट शो देखने जाना है। नियत समय से जब घर से निकले तो फिल्म देखने जाने से ज्यादा खुशी मुझे पहनाए गए नये कपड़ों से हो रही थी।

हमारा घर बनारस की परम्परागत गलियों में था, जहां रिक्शा नहीं पहुंचता था। रिक्शा पकड़ने के लिए हमें लगभग चार सौ मीटर दूर पैदल चलना पड़ता था। घर से निकलने के बाद रास्ते में हम कल्लन की दुकान पर पान लेने के लिए रूके। हमारे घर पर इसी पान वाले से पान आता था। कल्लन ने मुस्कराकर पापा का स्वागत किया और खिलाने के साथ ही पान का एक ठोंगा भी पकड़ा दिया।

भैरोनाथ चौराहे पर पहुंचते ही एक रिक्शे वाले ने पापा को दूर से ही देखकर सलाम ठोका और गमछे से सीट पोंछकर हमें बिठाया। मैं मां की गोद में बैठ गया। रिक्शे वाला अभी हमें लेकर थोड़ी दूर ही आगे बढ़ा था, तभी पापा ने देखा कि रिक्शे की बत्ती नहीं जल रही है। उन्होंने रिक्शे वाले को डांट लगाई। यह देख कई रिक्शे वाले वहां पहुंच गए। फिर हम दूसरे रिक्शे पर सवार होकर चौक स्थित चित्रा सिनेमा पहुंचे।

जब हॉल पर पहुंचे तो सिनेमा शुरू हो चुका था जिससे पापा का मूड खराब हो गया। उन्होंने मां को डांट लगाई। हालांकि हमारा एक नौकर हॉल के बाहर टिकट लेकर पापा का इंतजार कर रहा था पर तीसरी मंजिल पर जब हम ने गेट से अंदर जाने कोशिश की तो गेट कीपर ने हमें रोक दिया। मुझे कुछ खास मालूम नहीं पर मुझे मैनेजर के कमरे में ले जाया गया। वहां पापा से गर्मागर्म बहस के बाद मुझे एक स्केल से नापा गया। बाद में मुझे मैनेजर ने इस शर्त के साथ सिनेमा देखने की अनुमति दी कि आगे से मेरे लिए भी हॉफ टिकट लेना पड़ेगा।

अंत में हम हॉल के अंदर गए तो गाना चल रहा था-‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों---- ----‘। गाना समाप्त होने के बाद कब मेरी आंख लगी, मुझे याद नहीं। पर यह जरूर याद है कि इस घटना के बाद पापा ने मुझे अपने साथ ले जाना बंद कर दिया था।

कायदे से मेरी पहली फिल्म थी बादल जो बुलानाला स्थित गणेश टाकीज़ में लगी थी। बात 1970 की है जब मैं छठवीं दर्जे में पढ़ता था और अपनी क्लास का मॉनीटर था। मेरे सहपाठी ने मेरे सामने फिल्म देखने का प्रस्ताव रखा। मुझे पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया कि वो क्या कह रहा है। मेरे सामने कई मुश्किलें थीं-उसमें एक टिकट के लिए पैसे थे। उन दिनों दूसरे दर्जे की टिकट भी दस आने की होती थी। हालांकि मेरे पापा एक बिजनेसमैन थे पर मेरे पास तो पैसे बिल्कुल नहीं होते। फिर क्लास से भाग कर चोरी से फिल्म जाने का साहस कतई नहीं था। मुझे सबसे ज्यादा डर अपने स्कूल के वाइस प्रिंसिपल से था नाटे कद के परशुराम जी बड़े मरकहा थे, पर सहपाठी अपनी धुन का पक्का था। वह मेरा टिकट भी खरीदने को राजी था फिर भी मेरी हिम्मत नहीं हुई। वो रोज-रोज मुझे साथ चलने के लिए पटाता और एक दिन वह अपने इरादे में सफल भी हो गया।

तयशुदा दिन हमें दो पीरियड पढने के बाद चुपके से निकल पड़ना था। उस रोज हाजिरी होने के बाद ही साथी क्लास से खिसक गया। मेरे दिल की धड़कन सुबह से ही तेज हो रही थी। दूसरी घंटी बजते ही मेरे मन में अज्ञात डर और कहरा गया। यह अंग्रेजी की क्लास थी। टीचर ने थोड़ी देर पढ़ाने के बाद ही आगे आकर जोर-जोर से लेसन पढ़ने की जिम्मेदारी मेरे उपर सौंप दी और खुद धूप में शर्मा जी के पास जा पहुचे गप्पे मारने। मैं क्लास का सबसे अच्छा स्टूडेंट था लेकिन उस दिन मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। पढ़ने में भी गलतियां हो रहीं थीं। आवाज भी नहीं निकल रही थी। किसी ने मेरी शिकायत की तो टीचर ने आकर मुझसे पूछताझ की। मेरा सफेद पड़ता चेहरा देखकर वह घबरा गए। सिर पर हाथ रखा और कहा कि मुझे तो बुखार है। उन्होंने मुझसे घर जाने को कहा।

बस्ता लेकर मैं स्कूल से निकला और बाहर आते ही मेरे कदम तेजी से सिनेमा हॉल की तरफ बढ़ते चले गए। लगभग आधा किलोमीटर दूर गणेश टाकीज पहुंचने से पहले ही साथी मिल गया। वो छिपकर मेरी राह देख रहा था। दूसरे दर्जे की टिकट खिड़की सड़क से लगी थी जहां से ट्राफिक गुजरता था। मैंने खिड़की पर लगी लाइन में खड़े होने से मना कर दिया क्योंकि वहां पर पहचाने जाने का डर था। मैं दूसरी ओर पीपल के पेड़ के पीछे छुप कर खड़ा हो गया।

मैं चाह रहा था कि जल्दी से टिकट लेकर हम सिनेमा के अंदर चले जाएं जिससे हमें कोई जान पहचान वाला न देख ले। पर उस समय तो दर्शकों को आकर्षित करने वाला लाउडस्पीकर भी बजना शुरू नहीं हुआ था। इधर, खिड़की पर भीड़ बढ़ती जा रही थी। थोड़ी देर में पहले दर्जे और बालकनी की टिकट खिड़की खुल गयी और लाउडस्पीकर भी बजने लगा। लोग हॉल के अंदर भी जाने लगे पर हमारी खिड़की फिर भी नहीं खुली। हमारा डर बढ़ता ही जा रहा था। मैंने मन ही मन गणेश जी को प्रणाम किया और वर मांगा कि फिल्म देखने का हमारा संकल्प आसान करे। साथ ही वादा किया कि हम फिर कभी चोरी से फिल्म नहीं देखेंगे।

काफी देर के बाद टिकट खिड़की खुली और दोस्त ने काफी जद्दोजहद कर दो टिकटें निकाली। हम तुरंत अपने बस्तों के साथ पर्दे के सामने वाली क्लास में खाली पड़ी कुर्सियों में दुबक गए। यह श्वेत -श्याम फिल्म थी-बादल जिसके हीरो थे अजित। वही अजित, जिन्हें बाद में शहर लायन के नाम से जानता है।

क्लास बंक कर फिल्म देखने में सहपाठी उस्ताद था। उसने सिनेमा शुरू होने से पहले ही बताया कि उसने मेरा टिकट इसलिए कटाया है ताकि पूछताछ हो तो मैं उसका बचाव करूं। उसके पिता पहले भी कई मौकों पर मुझसे उसके स्कूल में उपस्थिति की जानकारी ले चुके थे। फिर उसने खुद ही मियां मिट्‌ठू बनते हुए बताया कि वह अपने पापा की पान की दुकान पर बैठता है जब वे खाना खाने के लिए आधे घंटे के लिए घर जाते हैं। उसी दौरान चवन्नी-अठन्नी चुराते हुए उसने दो रूपये इकट्‌ठा किए थे।

सिनेमा खत्म होने पर जब हम चोरी छिपे हॉल से बाहर निकले और वापस गलियों में सुरक्षित पहुंच गए तो सिनेमा का गीत बरबस जुबान पर आ गया-‘अपने लिए जीयें, जीयें तो क्या जीयें--- ----।‘ उसके बाद हम दोनों ने पास के गणेश मंदिर में जाकर सिर नवाया।

थोड़ी देर तक गलियों में इधर-उधर घूमने के बाद जब छुट्‌टी का टाइम हुआ तो हम अलग हुए। घर पहुंचने के एकाध घंटे बाद ही जाकर मैं आवस्त हुआ। रात को दादी से मैंने पूछा कि क्या भगवान की पूजा करने से सभी मुश्किल आसान होती है तो दादी ने हां कहा और इसके लिए एक कथा भी सुनाई। मैंने उन्हें बताया कि मैं आज पूजा करने के लिए गणेश मंदिर गया था। उस दिन मैं बहुत खुश था। उस रात मैंने सपने में भी बादल देखी।

अगले दिन स्कूल में भी सब कुछ सामान्य था। इंटरवल में मैंने साथी को बताया कि जो लोग भगवान की पूजा करते हैं उनका ख्याल भगवान भी रखते हैं तो उसने भी सिर हिलाया।

दो दिन बाद प्रेयर के तुरंत बाद चपरासी मुझे बुलाने आ पहुंचा। जब मैं चपरासी के साथ वाइस प्रिसिपल के कमरे में पहुंचा तो सहपाठी और उसके पिता पहले से ही वहां थे। एक ग्राहक सहपाठी के पिता को ‘बादल की कहानी‘ बता चुका था। दो बेंत पड़ते ही सहपाठी ने मेरा नाम भी उगल दिया था।

मुझे पड़ी बेंत की मार का गम नहीं, पर मुझे कई सालों तक यह बात नहीं समझ आयी कि हमारी गणेश पूजा में कहां विघ्न पड़ गई थी!

Sunday, November 9, 2008

सिद्धांतों और सामाजिक जिम्मेदारी को न भुलाएं-महेश भट्ट

समारोह में चर्चा का विषय था-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी। वक्ताओं ने परस्पर विरोधी विचार रखे। हम वाणिज्य एवं उद्योग संगठन फिक्की के वार्षिक समारोह फ्रेम्स में शामिल होने आए थे। इसमें हिस्सा लेने के लिए विश्व मनोरंजन उद्योग से जुडे लोग आते हैं, ताकि वैचारिक साझा कर सकें, एक-दूसरे को समझें और उन चुनौतियों का जवाब तलाशें, जिनका सामना मनोरंजन उद्योग से जुडे लोगों को करना पड रहा है।
पत्रकार और मीडिया से जुडे प्रीतिश नंदी ने कहा-आजादी उस कुंवारेपन की तरह है जो या तो है या फिर नहीं है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टीफिकेशन की अध्यक्षा शर्मिला टैगोर ने कहा-बतौर एक अभिनेत्री मैं स्वतंत्रता की पक्षधर हूं, लेकिन यह भी मानती हूं कि सांस्कृतिक एवं भावनात्मक विविधता वाले देश भारत में अभिव्यक्ति की आजादी पर नजर रखना भी आवश्यक है। राज्यसभा के सदस्य, दादा साहब फालके पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले श्याम बेनेगल ने कहा कि इस मुद्दे पर मेरे सामने कोई समस्या नहीं आई, लेकिन पिछले कुछ वर्षो में एक नई बात हुई है कि जब भी बडे सितारों को लेकर कोई फिल्म रिलीज होती है, कुछ लोग निजी स्वार्थ के लिए ग्रुप बना कर समस्या खडी करने लगते हैं।
सैद्धांतिक आदर्शो से जुडें
मैंने कहा-सांस्कृतिक जागरण की आवश्यकता तो है, लेकिन उन सैद्धांतिक आदर्शो से जुडने की जरूरत पहले है, जिनको नए भारत की नींव रखते समय संस्थापकों ने आधार बनाया था। आजादी, आजादी और पूर्ण आजादी की इच्छा हमें जरूर रखनी चाहिए। यह जानते हुए भी कि जीवन में चंद सुधार ही कर सकेंगे, वे भी ऐसे, मानो जेल की सींकचों के भीतर हों।
आशुतोष गोवारीकर ने जोधा अकबर जैसी प्रभावशाली फिल्म बनाई, जिसे देश में दिखाने के लिए अंतत: सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पडा। वरिष्ठ एवं अनुभवी फिल्म निर्माता यश चोपडा को आजा नच ले में राजनीतिक शक्तियों के निजी स्वार्थ के कारण होने वाले विरोधों का सामना करना पडा।
सत्तानशीनों से करें सवाल
सेंसर सर्टीफिकेट लेने के बाद भी फिल्म निर्माताओं को कुछ लोगों या वर्गो का विरोध झेलना पडता है, लेकिन प्रशासन मूक दर्शक बनकर सब देखता रहता है। मैं कहना चाहूंगा कि हमारी जिम्मेदारी है कि कहानी सुनाने वालों को सुरक्षित रखें, अन्यथा जिस तरह शेरों का अस्तित्व खतरे में पड गया है, उसी तरह सी कहानियां सुनाने वाले भी लुप्त हो जाएंगे। जरूरी है कि मनोरंजन क्षेत्र से जुडे लोग अपनी जिम्मेदारी निभाएं। वे सत्तानशीनों को कटघरे में खडा करें।
समाज हित सर्वोपरि
मैंने सिनेमा हॉल की अंधियारी दुनिया में आंख खोली। फिल्म मदर इंडिया को मैं उस रूप में याद करता हूं, जिसने भारत की नैतिक सच्चाई को पेश किया था। दिल छू लेने वाली इस फिल्म के क्लाइमेक्स में नर्गिस ने ऐसी ग्रामीण घरेलू स्त्री का किरदार निभाया, जो अपने बेटे को गोली मार कर सामाजिक जिम्मेदारी का प्रमाण देती है। बेटा बिरजू (सुनील दत्त) सूदखोर साहूकार से बदला लेने के लिए उसकी हत्या करता है और वासना के वशीभूत बेटी को शादी के मंडप से उठाकर ले जाने लगता है। मां द्वारा बेटे की हत्या करने का यही संदेश था कि व्यापक हित के लिए निजी सुख की तिलांजलि देनी पडती है।
सुपरहिट फिल्म जिस देश में गंगा बहती है में कवि शैलेंद्र ने गीत लिखा था-मेहमां जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता है, ज्यादा की नहीं लालच हमको, थोडे में गुजारा होता है। इसमें युवाओं को एक संदेश दिया गया। कितना दुखद है कि ऋषि-मुनियों की इस धरती के बाशिंदों ने अपने ही आदर्शो को कचरे में फेंक दिया है। हाल ही में गोवा में जिस तरह 16-17 वर्षीय विदेशी लडकी स्कारलेट की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई, दिल्ली-राजस्थान में विदेशी लोग अपराधियों का निशाना बन रहे हैं, क्या ऐसे जघन्य और दुखद अपराधों के प्रति राष्ट्र की कोई जिम्मेदारी नहीं!
जिम्मेदारी को दर्शाती फिल्में
1969 में 19 वर्ष की आयु में जब मैं फिल्म क्षेत्र में आया तो मेरा सौभाग्य था कि मुझे देश के विचारशील निर्देशक राज खोसला के साथ काम करने का मौका मिला। फिल्म दो रास्ते में मैं उनका असिस्टेंट था। इस पारिवारिक फिल्म का कथानक मराठी के जाने-माने कथाकार चंद्रकांत काकोडकर की एक रचना से प्रेरित था। राजेश खन्ना की इस फिल्म का तानाबाना भाई-बहन के संबंधों के इर्द-गिर्द बुना गया था। बलराज साहनी ने इसमें बडे भाई की भूमिका निभाई थी, जो संयुक्त परिवार को बनाए रखने के लिए कष्टदायक परिस्थितियां झेलता है। फिल्म का संदेश था-हर स्थिति में परिवार को सुरक्षित और एकजुट रखा जाए। यह वह दौर था, जब शहरीकरण समाज की मूल्य प्रणाली को बदल रहा था और युवा पीढी में पश्चिमी जीवन शैली के प्रति आग्रह बढ रहा था। ऐसे दौर में युवाओं को अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का एहसास दिलाने के लिए मैंने 1986 में फिल्म नाम बनाई। यह मेरे करियर के लिहाज से हिट फिल्म साबित हुई। फिल्म में कुमार गौरव ने नूतन के सौतेले बेटे की भूमिका निभाई थी, जो अपराधी सौतेले भाई संजय दत्त को सही रास्ते पर लाने के लिए बलिदान देता है। सौतेली मां की अच्छाइयों के प्रति कृतज्ञता जताने का उसे यही रास्ता दिखता है। फिल्म अर्थ में, जिसे क्लासिक कहा गया, एक स्त्री दूसरी स्त्री के प्रति अपनी जिम्मेदारी पति से अलग होकर नौकरानी की बेटी को अपनाकर निभाती है।
दर्शकों पर सकारात्मक प्रभाव
अंतरराष्ट्रीय सम्मान जीतने वाली सारांश में अनुपम खेर ने रिटायर्ड अध्यापक का किरदार निभाया था, जो अपनी पेइंग गेस्ट की सहायता करना कर्तव्य समझता है। पेइंग गेस्ट की भूमिका सोनी राजदान ने निभाई थी। खैर सत्ता के मद में डूबे राजनेता से लडाई मोल लेते हैं। इससे उनके उदास दिल को शांति मिलती है और उन्हें जिंदगी का मकसद मिलता है।
फिल्म डैडी भी हिट रही, जिससे मेरी बेटी पूजा ने करियर शुरू किया था। इसमें एक सत्रह वर्षीय युवती की उन मुश्किलों को संवेदनशील तरीके से दिखाया गया था, जो अपने शराबी पिता को संभालने की जिम्मेदारी उठाती है। अनुपम खेर ने इसमें पिता का किरदार निभाया था। फिल्म इतनी असरदार थी कि आज भी ऐसे कई लोग मिल जाते हैं, जिन्होंने फिल्म देखने के बाद शराब से तौबा कर ली।
कन्या भ्रूण हत्या पर बनी फिल्म तमन्ना पूजा द्वारा निर्मित पहली फिल्म थी। इसने सामाजिक समस्या विषय पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता था। रमजान के महीने में मुंबई के गटर से एक हिजडा नन्ही मासूम बच्ची को उठा कर घर लाता है, उसे पालता है। जिम्मेदारी लेने का यह संदेश मेरी ज्यादातर फिल्मों की जान है। अधिकतर साहित्यिक कृतियों का यही भाव रहा है, फिर भी इस दौर में जब हम आर्थिक उन्नति के शिखर को छूने तक की बात कर रहे हैं, जरूरी है कि दूसरों के प्रति जिम्मेदारी निभाने हेतु वचनबद्ध हों, क्योंकि यदि हम उन पिछडों और कमजोरों को भुला बैठेंगे जो दो जून की रोटी पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो आत्मघात के बीज बो बैठेंगे। जिम्मेदारी निभाना मानव प्रगति की ऊर्जा है। इसे भुलाते ही हम विफल हो जाएंगे और बिखर भी जाएंगे।

Friday, November 7, 2008

फ़िल्म समीक्षा:एक विवाह ऐसा भी

परिवार और रिश्तों की कहानी
-अजय ब्रह्मात्मज

राजश्री प्रोडक्शन की एक विवाह ऐसा भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का देसी सिनेमा है। पश्चिमी प्रभाव, तकनीकी विकास और आप्रवासी एवं विदेशी दर्शकों को लुभाने की कोशिश में अपने ही दर्शकों को नजरअंदाज करते हिंदी सिनेमा में ऐसे विषयों को इन दिनों पिछड़ा मान लिया गया है।
महानगरों की गलाकाट प्रतियोगिता, होड़ और आपाधापी के बावजूद आप के दिल में संबंधों की गर्माहट बची है तो संभव है कि फिल्म को देखते हुए छिपी और दबी भावनाएं आपकी आंखे नम कर दें। कौशिक घटक और फिल्म के लेखक ने ऐसे कोमल और हृदयस्पर्शी दृश्यों को रचा है जो हमारी स्मृतियों में कहीं सोए पड़े हैं। वास्तव में एक विवाह ऐसा भी देशज सिनेमा है। यह परिवार और रिश्तों की कहानी है। यह त्याग और समर्पण की कहानी है। यह प्रेम के स्थायी राग की कहानी है। यह परस्पर विश्वास और संयम की कहानी है। मुमकिन है महानगरों और मल्टीप्लेक्स के दर्शक इस कहानी की विश्वसनीयता पर ही शक करें।
सूरज बड़जात्या की देखरेख में कौशिक घटक ने किसी प्रादेशिक शहर का मोहल्ले के मध्यवर्गीय परिवार को चुना है। यहां भव्य सेट और आलीशान मकान नहीं है। पीछे दीवार ही नजर आती है, किसी मध्यवर्गीय घर की तरह। यह वह परिवार है, जिसके घर में आज भी आंगन और तुलसी का चौबारा है। धार्मिक चिन्ह, रीति और प्रतीक दिनचर्या के हिस्से हैं। भारतीय समाज से ये चिन्ह अभी विलुप्त नहीं हुए हैं, लेकिन आज के निर्देशक इन्हें डाउन मार्केट की चीज समझ कर प्रस्तुत नहीं करते। यही वह समाज है, जहां भारतीयता सांसें ले रही है। कौशिक घटक ने उस समाज को चित्रित करने का जोखिम लिया है।
किरदार गहरा और ठोस हो तो कलाकार की क्षमता निखरती है। ईशा कोप्पिकर ने चांदनी के मनोभावों और उसकी जिंदगी के उतार-चढ़ाव को खूबसूरती से व्यक्त किया है। सोनू सूद प्रेम की भूमिका में जंचे हैं। उन्होंने संयमित अभिनय किया है। अन्य कलाकार अपनी छोटी भूमिकाओं से फिल्म को मजबूत ही करते हैं।
फिल्म का गीत-संगीत विशेष रूप से उल्लेखनीय है। रवींद्र जैन ने संवादों, दृश्यों और नाटकीय प्रसंगों को उपयुक्त बोल देकर गीतों में गूंथा है। चूंकि फिल्म के नायक-नायिका गायक हैं, इसलिए रवींद्र जैन को अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर अवसर मिला।

दरअसल:आमिर खान की पहली ऐक्शन फिल्म गजनी

-अजय ब्रह्मात्मज

आमिर खान की इमेज ऐक्शन ऐक्टर की नहीं रही है। वैसे, एक सच यह भी है कि खान त्रयी में से कोई भी ऐक्शन स्टार की प्रचलित श्रेणी में नहीं आता। ऐक्शन के लिए सनी देओल, अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी मशहूर रहे हैं। जख्म के बाद अजय देवगन ने ऐक्शन ऐक्टर की अपनी इमेज बदली। अब वे कॉमेडी फिल्मों में हंसाने के लिए ऐक्शन करते नजर आते हैं। बात शुरू हुई थी आमिर से। वे अपनी आने वाली नई फिल्म गजनी में भरपूर ऐक्शन करते नजर आएंगे। यह फिल्म तमिल में बनी गजनी की रिमेक है और इसे मूल फिल्म के निर्देशक ए.आर मुर्गदास ही निर्देशित कर रहे हैं।
अपनी हर फिल्म की तरह आमिर इसे भी खास फिल्म मान रहे हैं। दरअसल, लगान के समय से वे अपनी फिल्मों पर पूरा ध्यान देने लगे हैं। कहानी सुनने से लेकर फिल्म की रिलीज और उसके प्रचार और पुरस्कार आदि के प्रति भी उनकी सक्रियता बनी रहती है। अपनी फिल्मों को लेकर स्टारों का यह समर्पण कम ही लोगों में देखने को मिलता है। हां, अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म हो, तो अलग बात है। बाकी स्टारों और आमिर में एक फर्क साफ-साफ नजर आता है किवे पहले दिन से ही अपनी फिल्म के लिए उत्साहित रहते हैं। किसी भी फिल्म के लिए हां कहने के पहले वे थोड़ा वक्त जरूर लेते हैं, लेकिन फिल्म शुरू हो जाने के बाद उसे पूरा वक्त देते हैं। उनसे यह बात सीखी जा सकती है कि कलाकार जब जो काम कर रहे हैं, उसी पर सौ फीसदी अपना ध्यान लगाएं।
गजनी में आमिर का लुक इन दिनों चर्चा में है। फिल्म की सिर्फ दो तस्वीरें सामने आई हैं। दोनों में ही वे सिर झुकाए बैठे हैं। एक तस्वीर में उनकी नजरें देखने वालों से मिल रही हैं। तस्वीर में मुख्य रूप से उनके कंधों और बाजुओं की मांसपेशियां दिखाई गई हैं। वे इस तस्वीर में कसरती व्यक्ति लगते हैं। उन्होंने ऐसा दिखने के लिए खास अभ्यास किया। रोजाना तीन घंटों के कसरत के साथ ही उन्होंने प्रोटीनयुक्त विशेष खानपान भी अपनाया। एक निजी बातचीत में उन्होंने बताया, इस तरह के शरीर के लिए पहले दिमागी रूप से तैयार होना होता है। अनुशासन भी जरूरी है। यह कभी नहीं कह सकते कि आज थकावट महसूस हो रही है या मन नहीं कर रहा है। उन दिनों मैंने यह तय कर लिया था कि कसरत किए बगैर घर से निकलूंगा ही नहीं। हालांकि तारे जमीन पर की रिलीज के समय कुछ मुश्किलें आई और उससे शरीर में वह निखार और उभार नहीं ला सका, जो मैं चाहता था। गजनी में दर्शक मुझे एट पैक एब्स में देखेंगे। मेरे जैसी कदकाठी के व्यक्ति के लिए यह कम नहीं है।
आमिर मानते हैं कि गजनी उनकी रिअॅल में पहली ऐक्शन फिल्म है। इसके पहले उन्होंने कुछ फिल्मों में ऐक्शन दृश्य अवश्य किए हैं, लेकिन उन्हें सही मायने में ऐक्शन फिल्म नहीं कहा जा सकता। गजनी एक ऐसे युवक की कहानी है, जो विस्मृति के रोग से पीडि़त है। उसके सामने ही गुंडों ने उसकी प्रेमिका की हत्या कर दी थी, लेकिन वह उन्हें ठीक से नहीं पहचानता। उसे जब भी कुछ याद आता है, वह हत्यारे तक पहुंचने की कोशिश करता है। गजनी ऐक्शन के साथ रोमांटिक फिल्म भी है। इसमें आमिर दक्षिण की अभिनेत्री असिन के साथ नामीबिया की वादियों में गीत गाते नजर आएंगे। जिया खान भी हैं इसमें। फिल्म के खलनायक प्रदीप रावत हैं। उन्होंने ही तमिल में इस फिल्म को करने के बाद आमिर को सुझाव दिया था कि वे इसे एक बार देख लें। आमिर को फिल्म इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इसे हिंदी में बनाने का फैसला किया और तमिल के डायरेक्टर मुर्गदास को ही जिम्मेदारी सौंप दी।
पहले योजना थी कि गजनी दीपावली के मौके पर रिलीज होगी, लेकिन ऐक्शन दृश्य में आमिर को लगी चोट के कारण ऐसा होने में विलंब हुआ। दीपावली के अपने वादे को याद रखते हुए आमिर ने फिल्म की पहली झलक दीपावली के दिन मीडिया को दिखाई। अब यह फिल्म क्रिसमस के मौके पर 25 दिसंबर को रिलीज हो रही है। आमिर इसे शुभ सप्ताह मानते हैं। उनकी पिछली फिल्म तारे जमीन पर पिछले साल इसी हफ्ते में रिलीज हुई थी, जो कामयाब हुई और फिलहाल ऑस्कर अवार्ड की होड़ में है। अभी आमिर तारे जमीन पर के सिलसिले में अमेरिका पहुंच चुके हैं।

Thursday, November 6, 2008

सजग पत्रकार की चेतना के फिल्मकार बीआर चोपड़ा

-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले कुछ सालों से वह स्वस्थ नहीं थे। ह्वील चेयर पर ही कार्यक्रमों में आते-जाते थे। लोगों से बात न कर पाने की बेबसी उनके चेहरे पर झलकती थी। लेकिन दूसरों की बातें सुन कर उनकी आंखों में चमक आ जाती थी। वे आंखें बहुत कुछ बयां कर देती थीं। बेटे रवि चोपड़ा उनकी भावनाओं को शब्द देते थे।
मुझे याद है बीआर फिल्म्स के 50 साल पूरे होने पर उन्होंने अपनी फिल्मों की खास स्क्रीनिंग रखी थी। चार दिनों तक चली उस स्क्रीनिंग में दिलीप कुमार से लेकर उनके साथ जुड़े कई कलाकार आए थे। सभी ने उस दौर की फिल्म मेकिंग, डायरेक्टर के साथ रिश्तों और काम के माहौल पर अपने संस्मरण सुनाए। बीआर यानी बलदेव राज को करीब से समझने का वह पहला मौका था।
'सिने हेराल्ड जर्नल' के लिए फिल्म पत्रकार के तौर पर करियर शुरू करने वाले बलदेवराज चोपड़ा आजादी के पहले लाहौर की फिल्म सर्किल में काफी सक्रिय थे। उन्होंने गोवर्धन दास अग्रवाल की फिल्म 'डाक बंगला' की समीक्षा में फिल्म की धज्जियां उड़ा दी थीं। फिल्म फ्लाप हो गई तो अग्रवाल ने कहा कि बीआर ने बदले की भावना से समीक्षा लिखी थी। स्थितियां जो भी रही हों, आजादी के बाद मुंबई में गोवर्धन दास अग्रवाल ने ही बीआर चोपड़ा को फाइनेंस किया। बीआर तो पहली फिल्म 'करवट' के असफल हो जाने के बाद फिर से पत्रकारिता में लौट जाना चाहते थे। तब उनके मित्र महबूब खान ने समझाया था, 'फिल्में असफल हो सकती हैं, लेकिन तुम्हें कोशिश करते रहनी चाहिए।' लाहौर के दोस्त आईएस जौहर ने बीआर को एक कहानी सुनाई। वह कहानी मैरी कोरेली की 'वेंडेटा' से प्रेरित थी। उन्होंने तुरंत वह कहानी 500 रुपए में खरीद ली। वह निर्माता की तलाश में थे तभी ोवर्धन दास अग्रवाल उनसे मिले। उन्होंने फौरन बीआर को इस शर्त पर 50 हजार का चेक दे दिया कि फिल्म का निर्देशन उन्हें ही करना होगा।
बीआर ने निर्देशन में उतरने का साहस किया और फिल्म के लिए अशोक कुमार से संपर्क किया। अशोक कुमार का पहला सवाल था, 'आप कैसे फिल्म निर्देशित कर सकते हो? अनुभवहीन निर्देशक के साथ काम करने का जोखिम मैं नहीं उठा सकता।' बीआर ने हार नहीं मानी। उन्होंने दबाव डाला तो अशोक कुमार ने उन्हें मुंबई टाकीज में कहानी सुनाने के लिए बुला लिया। कहानी सुनने के बाद अशोक कुमार का जवाब था, 'मैं प्रभावित हुआ। तुमने जैसे कहानी सुनाई है, वैसी फिल्म बना दो तो सफल होगी।' अशोक कुमार का अनुमान सही निकला। 'अफसाना' चली और खूब चली। इसके बाद बीआर ने 'शोले' और 'चांदनी चौक' फिल्में निर्देशित कीं।
आरंभिक सफलता के बाद ही उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी स्थापित कर ली। उन्होंने 'एक ही रास्ता', 'नया दौर' और 'साधना' का निर्माण और निर्देशन किया। इन फिल्मों की कामयाबी ने बीआर बैनर को स्थापित कर दिया।
बीआर की खासियत रही है कि वह सुनिश्चित टीम के साथ ही काम करते थे। उनके प्रिय गीतकार साहिर लुधियानवी और गायक महेंद्र कपूर थे। बीआर फिल्म्स में लेखकों की एक टीम हाल-फिलहाल तक रोज मिलती थी। स्क्रिप्ट लेवल पर लंबी बहस और विमर्श के बाद ही आखिरी ड्राफ्ट तैयार किया जाता था। बीआर की फिल्मों में मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश भी रहता था। चूंकि मूलत: वह सजग पत्रकार थे, इसलिए समाज के प्रति सचेत थे। लेखकों की उनकी टीम में कामिल राशिद, एफए मिर्जा, सीजे पावरी, अख्तर-उल-ईमान, डाक्टर राही मासूम रजा, सतीश भटनागर, राम गोविंद और अचला नागर आदि शुमार रहे हैं।
बीआर की फिल्मों में हमेशा क्राफ्ट से अधिक कथ्य पर ध्यान दिया जाता था। लेकिन प्रयोग करने में भी वह पीछे नहीं हटते थे। उन्होंने 'कानून' जैसी फिल्म बनाने का साहस किया, जिसमें कोई गाना नहीं था। यह हिम्मत उन्होंने गीत-संगीत के स्वर्ण काल में की थी। उन्होंने छोटे भाई यश चोपड़ा को भी फिल्मों की सामाजिकता से जोड़े रखा। बड़े भाई से अलग होने के बाद यश चोपड़ा प्रेम के रोमानी संसार में उतरे और कामयाबी की नई इबारत लिखी। कई बार आश्चर्य होता है कि बड़े भाई के बैनर के लिए 'धूल का फूल' और 'वक्त' जैसी फिल्में बनाने वाले यश चोपड़ा के विकास का रास्ता अलग कैसे हो गया? बीआर के बेटे रवि चोपड़ा ने जरूर 'बागवान' और 'बाबूल' में पिता के स्थापित मूल्यों और परंपरा को निभाया। संयोग है कि दोनों फिल्मों की कहानी बीआर चोपड़ा की थी। कैसे हो सकता है कि हम बीआर चोपड़ा को याद करें और 'महाभारत' का उल्लेख न हो। दूरदर्शन के इस धारावाहिक ने लोकप्रियता को ऐसा रिकार्ड स्थापित बनाया, जो आज तक नहीं टूटा है। कहते हैं इस धारावाहिक की टीआरपी 96 प्रतिशत थी। इसके प्रसारण के समय शहर-देहातों की गलियां सूनी हो जाती थीं। लोकप्रियता का यह गौरव किसी और को नहीं मिल सका।
पुराने पत्रकार बताते हैं कि बीआर पत्रकारों का कितना सम्मान करते थे। शाहरुख खान के जन्मदिन पर पकौड़ा-पाव खाकर संतुष्ट हो जाने वाले पत्रकारों को इल्म भी नहीं होगा कि बीआर की पार्टियों में पत्रकारों का विशेष खयाल रखा जाता था। खाना बाहर से नहीं आता था और वह स्वयं सबके खानपान का खयाल रखते थे।
बीआर चोपड़ा
जन्मतिथि - 22 अप्रैल 1914
मृत्यु- 5 नवंबर 2008
पहली फिल्म - 'करवट'
पहला निर्देशन - 'अफसाना'
पहला निर्माण - 'एक ही रास्ता'
पहला धारावाहिक - 'महाभारत'
निर्माता-निर्देशक के तौर पर प्रमुख फिल्में -'नया दौर', 'साधना', 'गुमराह', 'हमराज', 'इत्तेफाक', 'निकाह', 'वक्त', 'धूल का फूल', 'बागवान', 'बाबूल', 'दोस्ताना', 'इंसाफ का तराजू','पति पत्नी और वो' आदि।

Tuesday, November 4, 2008

अनुराग कश्‍यप से अंतरंग बातचीत



'सत्या' मैंने रिलीज के चंद दिनों पहले देखी थी। मनोज बाजपेयी के सौजन्य से यह संभव हुआ था। फिल्म देखने के बाद 'संझा जनसता' में मैंने 'सत्या' पर एक लेख लिखा था। मुझे किसी ने बताया था कि फिल्म के लेखक अनुराग कश्यप ने वह लेख राम गोपाल वर्मा को पढ़ कर सुनाया था और फिर उन्होंने मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया था। अनुराग कश्यप से मेरी मुलाकात तब तक नहीं हुई थी। 'शूल' की रिलीज के समय मनोज बाजपेयी और अनीस रंजन के साथ मैं लखनऊ और कानपुर जा रहा था। हिंदी फिल्मों और मीडिया ग्रुप के साथ आज फैशन बन चुके मीडिया टाईअप की वह पहली घटना थी। हमलोग दिल्ली में रूके थे। वहां 'शूल' से संबंधित एक प्रेस क्रांफ्रेंस आयोजित किया गया था। वहीं अनुराग कश्यप से पहली मुलाकात हुई और उसके बाद मुलाकात का सिलसिला चलता रहा। परस्पर आदर और प्रेम का भाव हम दोनों के बीच रहा है। एक-दूसरे के काम में बगैर हस्तक्षेप किए हमलोग जरूरत के समय मिलते रहे हैं। धीरे-धीरे अनुराग कश्यप ने अपनी स्पष्टता, पारदर्शिता और कस्बाई होशियारी से फिल्म इंडस्ट्री में खास जगह बना ली है। वह प्रयोगशील युवा पीढ़ी के अगुवा भी बन चुके हैं । समय-समय पर अपनी टिप्पणियों की वजह से फिल्म इंडस्ट्री के नामवर और धुरंधर व्यक्तियों के लिए आंख की किरकिरी बने रहते हैं।
'पहली सीढ़ी' की बातचीत के लिए वे सहज तैयार हो गए। इस बातचीत में प्रश्न पूछने की मुख्य जिम्मेदारी प्रवेश भारद्वाज ने निभायी। इसे दो निर्देशकों की बातचीत भी कहा जा सकता है। मैंने इस इंटरव्यू में मुश्किल से एक चौथाई सवाल पूछे। अनुराग जितना तेज बोलते हैं, उससे ज्यादा तेज सोचते हैं, इसलिए कई बार मूल वाक्य और विचार खत्म किए बिना वे कुछ और बताने लगते हैं। इस अनौपचारिक और मुक्त बातचीत को क्रम देना मुश्किल काम था। क्रम और तारतम्य बिठाने में कुछ शब्द, वाक्य और विचारांश भी काटने पड़े। अमूमन मेरी कोशिश रहती है कि हर बातचीत इंटरव्यू देने वाले की भाषा में जस की तस ही प्रस्तुत हो … उसमें मौलिकता के साथ भिन्नता भी बनी रहती है। मैं इंटरव्यू लेनेवाले की भाषा में बातचीत पेश करने का पक्षधर नहीं हूं। ऐसे इंटरव्यू में एकरसता और दोहराव की संभावना बढ़ जाती है।
बहरहाल, अनुराग कश्यप से हुई बातचीत के कई रोचक पहलू हैं। हम यहां पूरी बातचीत नहीं दे रहे हैं। पूरी बातचीत आप अंतिका प्रकाशन की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक 'मेरी पहली फिल्म' में पढ़ सकेंगे।

- कहां से फिल्म बनाना चाहता हूं की यात्रा शुरू हुई?
0
1993 में दिल्ली के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से यह यात्रा शुरू होती है। उसमें मैंने विटोरियो डिसिका जैसे फिल्मकारों की फिल्में देखी थीं। चिल्ड्रेन्स आर वाचिंग,बाइसिकल थीफ और दूसरी कई फिल्में दिखाई गई थीं। उनका रेट्रोस्पेक्टिव रखा गया था। उन फिल्मों ने बहुत प्रभावित किया था। उसी साल 'मैच फैक्ट्री गर्ल' भी आई थी। इन फिल्मों को देखने का बहुत असर हुआ था।
-दिल्ली में आप क्या कर रहे थे?0 मैं जन नाटय मंच में था। स्ट्रीट थिएटर करता था। कंफ्यूज था उस समय… हद से ज्यादा कंफ्यूज था। गंजेरी था और मुझे पता नहीं था कि क्या करना है। कह लें कि दिशाहीन था। मुझे लगा कि फिल्म में ही कुछ करना चाहिए। जूलोजी की पढ़ाई कर रहा था। जो प्लान थे, उन्हें थर्ड इयर तक आते-आते धरासायी कर चुका था। पिताजी से बात हुई। उनसे मैंने कहा कि बंबई जाकर कुछ करना चाहता हूं। पिता जी भी बेहद नाराज… वे बोले बंबई जाकर क्या करोगे? मैं बहाना बना कर, लड़ाई-झगड़ा कर… घर से पांच हजार रूपया लेकर मुंबई भाग कर आ गया। यह सोच रखा था कि फिल्म में ही कुछ करना है, लेकिन क्या करना है? कुछ पता नहीं था कि क्या करना है? पिक्चर कैसे बनती है, क्या प्रोसेस है, कुछ नहीं मालूम था। सिर्फ डिसिका देखा था। उसके अलावा मेरा एक्सपोजर नहीं था। उसके पहले सिनेमा का मेरा एक्सपोजर बहुत लिमिटेड था। बचपन में जो था, हमारे कल्ब में हफ्ते में दो बार फिल्में दिखाते थे। छह साल की उम्र तक वह देखता था भाग-भागकर।
- कौन सा क्लब है?
0 मैं ओबरा में रहता था, ओबरा है यू पी में रेणूपुर में… रेणुसागर तालाब के पास, बिजली का जो गढ़ है। वहां मेरा बचपन गुजरा। वहां पर एक थिएटर था। वह भी मेरे सामने बना था। चलचित्र… ग़र्वमेंट का सरकारी थिएटर चालू हुआ था चलचित्र। उसके अलावा क्लब में ओपन एयर में फिल्में दिखाते थे। मैं बचपन में वहां जाकर 'आंधी' और 'कोरा कागज' देखता था। चार-पांच साल की उम्र रही होगी। मुझे खुद नहीं मालूम क्यों देखता था? मैं आंख खोले, मुंह बाए चुपचाप देखता रहता था। पिता जी भगाते थे और बोलते थे कि क्या है? यहां क्यों आते हो ? ये बड़ों की पिक्चर है। लेकिन मैं देखता रहा। क्यों, यह मेरी समझ में नहीं आता था। लेकिन उन फिल्मों की इमेजेज आज भी दिमाग में है। उसके बाद फिल्में देखने का सिलसिला टूट गया। मैं जब हॉस्टल में पहुंचा तो शनिवार को एक फिल्म दिखाते थे। कोई पुरानी हिंदी फिल्म कभी-कभार। ज्यादातर 'दो बदन' दिखाया करते थे। स्कूल में लगभग दस बार 'दो बदन' दिखाई है। स्क्रीन पर प्रोजेक्ट कर के दिखाते थे। प्रिंसिपल की फेवरिट फिल्म थी 'दो बदन' … वही दिखाते थे।
-मुंबई के आरंभिक जीवन के बारे में बताएं,कैसे शुरूआत हुई?
0 सिंधिया स्कूल ग्वालियर में था। उसके पहले देहरादून में पढ़ा। बिखरी हुई सी जर्नी रही है। बीच में बारह-तेरह साल फिल्मों से नाता टूट गया। फिर दिल्ली आए तो बदले की भावना के साथ फिल्म देखना चालू किया। वो भी मल्कागंज इलाके में… यूनिवर्सिटी के आस-पास के अंबा, कल्पना, बत्रा… वहां हिंदी फिल्में जो लगती थीं, बस वही देख पाता था। फिर एक अनटचेबल देखी थी तो इंग्लिश फिल्मों का शौक चर्राया तो 'डाय हार्ड' आदि देखी। तीन साल वैसी फिल्में देखीं। फिर 1993 के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सिनेमा से सही परिचय हुआ। सिनेमा एक्सपोजर वहां से चालू हुआ। लेकिन सिनेमा में एक्सेस नहीं था । उसके बाद मैं मुंबई आ गया । मुंबई में मेरी असली जर्नी शुरू हुई है। बाकी सब करता रहता था। थिएटर करता था , एक्टिंग करता था… समझ में नहीं आ रहा था कि एक्टिंग कर रहा हूं कि क्या कर रहा हूं। कंफ्यूजन तो था ही, दिशाहीन भी था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि किसके पास जाऊं? किसी-किसी के पास काम कर रहा था। सडक़ पर रह रहा था। मैंने एक दिन फ्रस्ट्रेशन में नाटक लिखा 'मैं … तो वह नाटक गोविंद जी निहलानी और सईद साहब मिर्जा जैसे लोगों को पसंद आया। उन सब से मिला लेकिन मुझे कुछ समझ में नहीं आया। मुझे लगा कि गोविंद जी मुझे बहुत ज्यादा क्रेडिट दे रहे हैं। मैंने सोचा कि मुझे मालूम है मेरी कितनी औकात और काबिलियत है और हम में कितनी समझ है। उन्होंने मुझे इब्सन का नाटक थमा दिया। उन्होंने मुझे काफ्का का ट्रायल पकड़ा दिया। वे सीरिज कर रहे थे। इसको तुम एडैप्ट करो। तुम कर सकते हो। मैंने पढ़ा, ट्रायल पढ़ा तो और कंफ्यूज हो गया। नहीं ये कैसे बन सकती है फिल्म। इस पर तो एनीमेशन फिल्म बन सकती है। मैंने कहा कि इस पर फिल्म नहीं बन सकती। उन्होंने कहा तुम सोचो। मैं इतना ज्यादा ग्रंथियों का शिकार हो गया कि खोल में चला गया। गोवंद जी के फोन आते थे केअर ऑफ नंबर पर… उनका फोन लेना बंद कर दिया। उनसे मिलना बंद कर दिया। उस समय क्या हुआ कि मैं एक आदमी से बाइचांस मिला,जिसका नाम था पंकज टिटोरिया… वे थिएटर कर रहे थे। पंकज टिटोरिया लेकर गया एक आदमी के पास उनका नाम था शिवम नायर। वहां से मेरी एक अलग जर्नी शुरू हुई। शिवम नायर के यहां मैं जिस दिन मिलने के लिए गया तो वहां कोई आदमी 'टैक्सी ड्राइवर' टेप लेकर आया था। वह बहुत एक्साइटेड था। गंदा वीसीआर था, म्युटलेटेड टेप था। मैंने वहां पर मार्टिन स्कारसिस की 'टैक्सी ड्रायवर' देखी… क़ुछ अजीब सा फैसीनेशन हो गया 'टैक्सी ड्राइवर' से। उनके यहां जाकर मैंने बोला कि मुझे लिखना है। दो-तीन दिन मैं कोने में बैठा रहता था और उनकी बातें सुनता था। श्रीराम राघवन, श्रीधर राघवन, शिव सुब्रमण्यम सब थे। शिवम चुप रहता था, श्रीराम जब बोलना चालू करता था तो अटक जाता था… श्रीराम को कुछ प्रोबलम था बोलने का। श्रीधर लगातार बोलता था। मैं सुनने लगा, मैं एक्साइटेड था श्रीधर राघवन से। उसकी एनर्जी से। श्रीधर जो-जो नाम लेता था मैं चुपचाप लिख लेता था। फिर मैं किताबे ढूंढने जाता था। मुझे मिलती नहीं थी। एक दिन मैंने श्रीधर से पूछा कि सर आप ये किताबें कहां से लेकर आते हैं? वह मुझे सांताक्रुज स्टेशन लेकर गया। सांताक्रुज इस्ट में स्टेशन के पास किताबों की दुकानें हैं।। वहीं एक किताब के एक लेखक के जरिए दूसरे लेखक को पाया। फिर तीसरे लेखक को खोजा। जेम्स एम केम को पढऩे के बाद मैं थोड़ा बेचैन होने लगा। यहां पर मुझे एक काम मिल गया। उन्होंने मुझे बोला कि एक फिल्म लिखनी है नागराजन के ऊपर। डाउन साउथ जो है, वो बंगलोर के थे। मैंने लिखना चालू किया। मैं स्ट्रकचरली अपने-आप ऑटोमेटिक हिलने लग गया। फिर वो सारा सब कुछ … ओमा स्वरूप डायरेक्ट करने वाले थे। उनको बहुत अच्छा लगा।मैंने कहा नागराजन बनाते हैं। मेरे मन में था कि मैंने स्क्रिप्ट तो लिख ली, लेकिन फिल्म कब बनेगी? क्योंकि उसके बनने से पहले एक और फिल्म बननी थी 'ऑटो शंकर'। मैंने कहा कि उसे बनाओ। उसमें वे लोग स्क्रिप्ट को शॉर्ट आउट नहीं कर पा रहे थे। बाकी शूटिंग डेट तय थी। मैं जब शूटिंग के दो दिन पहले ऑफिस में पहुंचा तो बहस चल रही थी कि शूटिंग रोक दें। स्क्रिप्ट नहीं थी। मैंने सोचा कि ये शूटिंग रूक गई तो मेरी नागराजन की शूटिंग रूक जाएगी। मैंने कहा कि सर ऐसा क्या है? इसको मत रोको या तो फिर नागराजन बना लो। उन्हें लगा कि इक्कीस साल का लौंडा है। चाहता है कि डेस्परेशन में फिल्म बन जाए। उन्होंने समझाया कि नहीं यार ऐसा नहीं है। ऐसे नहीं होता। पहले हमको ऑटो शंकर बनानी है। सब कुछ क्लियर है। मैंने कहा प्रोबलम क्या है। उन्होंने कहा स्क्रिप्ट नहीं वर्क कर रही है। मैंने कहा मैं पढ़ता हूं। स्क्रिप्ट मैं करूं? सब हैरानी से मुझे देखने लगे। सब ने शिव से कहा कि ट्राय कर लेने दो क्या जाता है? उन्होंने हिदायत दी कि लेकिन परसों शूटिंग है। मैंने कहा सर अभी करता हूं रात को और सुबह होने तक में आप को स्क्रिप्ट दे दूंगा। मैंने जोश में बोल दिया। उस समय एनर्जी बहुत थी। मैंने रातो-रात बैठकर स्क्रिप्ट लिखी और ऑफिस में स्क्रिप्ट रख कर मैं सो गया। सुबह जब उठा, डेढ़ बजे दिन में नींद खुली तो श्रीराम और बाकी सब लोग पढ़ रहे थे। मैंने रातो-रात लिखी थी स्क्रिप्ट। सब लोग पढ़ रहे थे। एक व्यू फॉर्म होता है न? सब के अंदर कुछ हुआ। वे एक नई नजर से मुझे देख रहे थे। तो मुझे कंप्लीट एक्सेस मिल गया। शूटिंग शुरू हुई। उस स्क्रिप्ट के हिसाब से शूट किया गया। मैंने वैसे ही लिख दी थी। शिव सुव्रमण्यम ने बोला कि स्क्रिप्ट अनुराग ने लिखी है तो उसे क्रेडिट तो मिलना चाहिए। उन लोगों ने मुझे एक तरह से विकसित किया। उसके बाद शिव सुव्रमण्यम, शिवम नायर, श्रीराम राघवन इन लोगों ने मुझे बढ़ाया। हमको वीसीआर और टीवी का एक्सेस मिल गया। मैं आकर पिक्चर देख सकता था। मैं टेप लाकर देखना चालू किया। नागराजन बन नहीं पा रही थी। मनोज बाजपेयी ने उसी दौरान 'दौड़' की । 'दौड़' में राम गोपाल वर्मा ने उसको देखा और उनके दिमाग में एक आयडिया आया। उन्होंने उसको कहा कि तुम्हारे साथ एक फिल्म बनानी है। एक नया रायटर लाकर दो। मनोज ने कहा कि एक आदमी फिट है, वो है अनुराग। उसने मुझे कहा कि राम गोपाल वर्मा मिलना चाहते हैं। मैंने कहा - हां? मैं तो चौंक गया। दो-तीन दिन पहले श्रीराम राघवन और हमलोग 'रंगीला' साथ में देख कर आए थे गोरेगांव के किसी थिएटर में। हमने कहा चलो। फिर वहां से 'सत्या' शुरू हुई। मैंने बहुत सारे चीजें और बातें यहां छोड़ दी हैं, जो मुझे नहीं लगता कि उन्होंने कुछ कंट्रीब्यूट किया। यही मेरी मुख्य जर्नी है। उसके अलावा और सारी चीजें थीं। महेश भट्ट का भी प्रसंग हैï,लेकिन वह मेरे लिए इतना आवश्यक नहीं है।
- वो क्या चीजें और बातें हैं?
0 मैंने लिखना चालू किया था। मैंने पांच लिखना शुरू किया था। तब पांच का नाम पांच नहीं था। मिराज नाम से मैंने स्क्रिप्ट चालू की थी। 1995 में 'सत्या' के पहले नागराजन और ऑटो नारायण के फेज में। मैंने एक फिल्म लिखी थी 'मिराज'। फिल्म क्या लिखी थी, चालीस पन्ने लिखे थे। मैंने ल्यूक केमी को जाकर सुनाया। ल्यूक केमी एक्टर था। उसको मैंने विक्रम कपाडिय़ा के एक नाटक में देखा था। एक फिल्म थी 'फन'… जो आज है मेरे पास। मैंने उसे बहुत सालों तक ढूंढा । क्या था इस फिल्म में जिसने मुझे प्रेरित किया मुझे? 'फन' में एक स्ट्रकचरिंग थी। जिसको आप पांच के पास जाओगे तो एक जैसी दिखेगी। 'फन' में कुछ ऐसा था। मैंने जब ट्रेस करना चालू किया था कि कहां है? हमको एक पैटर्न दिखा था 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' में। मेरी खुद की फिल्में हैं, 'पांच' में। और 'ऑटो शंकर' जो मैंने ड्राफ्ट लिखा था। एक फोर्मुलेशन था उसमें। तीनों में एक सिमलर फार्मूला था। मैं एनालाइज कर सकता हूं क्योंकि मैंने खुद किया है।

- अनुराग कश्यप का हस्ताक्षर यहां से गढ़ा गया?
0 वहां से गढ़ा गया। वहां से मेरी नयी जर्नी आरंभ हुई। यह रियलाइजेशन हुआ कि मेरे तीनों लेखन में एक समानता है। एक पैटर्न है।

- जब आप के अंदर का लेखक जागा तो वे क्या एहसास थे, जिनसे लगा कि आप सही दिशा में हैं?
0 अंदर से एहसास हुआ। जब पहली बार लिखा था 'मिराज' तो उस समय फर्स्ट हॉफ ही लिखा था। कोई मर्डर और किलिंग नहीं था। एक जर्नी थी एक आदमी की, जिसके पास पैसा नहीं है। सडक़ छाप है। गांजा के चक्कर में घूमता रहता है। बस वाला सीन लिखा था। सारी चीजें लिखी थी। कई कैरेक्टर थे। मैं उस समय कुछ उस तरह की जिंदगी जी रहा था।

- कहीं कुछ ऐसा तो नहीं था कि मेरी आवाज कुछ अलग हो, इसलिए सचेत रूप से कुछ अलग करने की कोशिश रही हो?0 नहीं, जो चीज थी वो ये थी कि जब मैंने 'टैक्सी ड्रायवर' देखी,जब मैंने 'फन' देखी, जब डिसिका की फिल्में देखी तो मुझे आयडेंटीफिकेशन मिला अंदर से। बाकी हिंदी फिल्में जब देखता था तो मुझे लगता था कि कोई ऐसी कहानी कही जा रही है,जो किसी और के बारे में है। शायद सिनेमा यही होता है। डिसिका ने, 'फन' ने, स्कॉरसेस ने एक चीज मेरे साथ की वो यह कि सिनेमा मेरे बारे में भी है। मुझे जो कांफीडेंस आया। न्वॉयर से जो मेरा आकर्षण हुआ वो इसलिए कि वह मेरे बारे में भी है। लोगों के हिसाब से न्वॉयर बहुत कुछ होता होगा। मेरे लिए मेरा अपना खुद का मिनिंग है। मेरे लिए वह एक ऐसा माहौल है। मेरे लिए वह अंडरडॉग की कहानी है। मेरे लिए वहे गोल है। जिंदगी में हम सडक़ पर आते-जाते देखते हैं लेकिन गौर नहीं करते हैं। सब की अपनी-अपनी कहानियां है। मुझे लगा कि सिनेमा उसके बारे में भी हो सकता है। जब यह लगा मुझे तो मेरे अंदर कांफीडेंस आ गया कि हां यही मेरा सिनेमा है। मुझे यही कहना है। मुझे यही करना है। फिर जो मैं खुद को असहज महसूस करता था। उस एहसास के बाद वह खत्म हो गया। मुझे पहले लगता था कि मैं कुछ नहीं कर सकता हूं। मुझे लगता था कि मैं जो सोचता हूं वो बेवकूफी है, अगर किसी को बोलूं तो वह हंस न पड़े। मुझे उर्दू नहीं आती थी। हिंदी सिनेमा लेखन वास्तव में उर्दू है। मेरी हिंदी अच्छी थी, तब जब मैं लिखता था। लेकिन मैं बोल नहीं पाता था।
- बोलते अंग्रेजी में थे?
0 नहीं अंग्रेजी भी नहीं बोलता था। खिचड़ी भाषा थी। मतलब, आप बोर्डिंग स्कूल में पढ़े हुए हैं, जहां पर सब अंग्रेजी बोलते हैं और आपको अंग्रेजी नहीं आती है। आप हिंदी बोलते हैं। आपकी खासियत क्या है कि आप हिंदी में निबंध प्रतियोगिता जीत जाते हैं। नौवीं में आप बारहवीं के लडक़े को हिंदी में पछाड़ देते हो। हिंदी में आपका कोई सानी नहीं है और जब हिस्ट्री में आप लिखते हैं तो अपनी कहानियां बना-बनाकर लिखते हैं। टीचर पास कर देता है, तब पता चलता है कि टीचर कितना उल्लू का पट्ठा है। मेरा खेल सिर्फ वहां था। मैं अच्छा लिखता था, लेकिन मैं पब्लिक स्पीकर नहीं था।

- एक लडका अनुराग कश्यप… उसमें अपना कंफीडेंस नहीं था। उस लडक़े में आत्मविश्वास कैसे आया? उसे यहां तक लाने की यात्रा किस तरह से आरंभ हुई?0 उसके लिए एक चीज बताना चाहूंगा । बचपन से मुझे कहानियां बनाने की आदत रही है। मेरे भाई-बहनों को ज्यादा याद है। मुझ से ज्यादा याद है। वे बताते हैं कि आप हर फिल्म की कहानी जानते थे। सरिता नाम की एक पत्रिका आती है। सरिता में चंचल छाया छपता है। चंचल छाया में एक लिस्ट आती थी, जिसमें सर्वोत्तम आदि श्रेणियों में फिल्मों की सूची होती थी। मेरी एक आदत थी कि मैं फिल्म के नाम से कहानियां बनाता था और अपने भाइयों-बहनों को सुनाता था। ये पिक्चर मैंने देखी है, इसमें ऐसा होता है, ऐसा होता है, इससे उनको लगता था कि मेरा भाई कितना बड़ा ज्ञानी है। सारी फिल्में देखता है। देखता कुछ नहीं था मैं। टीवी के अलावा कुछ नहीं था। एक वीडियो थिएटर था। उसमें 'नदिया के पार' ही देखता था। वहां से कहानियां बनाने की आदत पड़ी। मनोहर कहानियां, सत्यकथा जैसी पत्रिकाएं मैं छुप-छुप के पढ़ता था। यह सब था। अंदर से एक एक्साइटमेंट था।
- अपराध की कहानियां पढ़ते थे। आप ने जिन पत्रिकाओं के नाम लिए, उनसे लगता है कि क्राइम और सेक्स की कहानियों से आप का लगाव थ। उधर झुकाव था।0 हां क्राइम के साथ था। मैं आ रहा हूं उस बात पर। मेरा जर्नी का जो सबसे बड़ा महत्वपूर्ण पाइंट है। मेरी जिंदगी में सबसे बड़ी चीज जो रही, वह आज समझ में आता है कि क्यों है? मेरे अंदर काम्पलेक्स कब आया था? सीनियर स्कूल से पहले छुट्टियों में गांव जाता था या लखनऊ जाता था या अपने ननिहाल बलिया जाता था तो वहां पर एक किताब की दुकान थी मैं वहां पर जाकर बैठता था। मैं वहां वेद प्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक, रानू आदि के हिंदी उपन्यास पढ़ता था। पिता जी को देखता था तो हार्डी ब्वॉयज उठा लेता था। उन्हें लगता था कि बेटा इंग्लिश पढ़ रहा है। उनके इधर-उधर होते ही उसे बंद कर सीधा वहां पहुंच जाता था। मेरी एक मौसी की लडक़ी थी हैदराबाद की,जो इस तरह के उपन्यास पढ़ती थी। वह मुझे पढऩे के लिए देती थी। बेबी दीदी। उन उपन्यासों को मैं पढ़ता था और कोने में घुसा रहता था। पढऩे का शौक था, लेकिन मेरे अंदर कहीं अपराध बोध पलने लगा। छुट्टियों के बाद जब स्कूल पहुंचा तो स्कूल की मैग्जीन देख कर वहां लिखने का मन किया। स्कूल में साहित्य सभा नाम की सोसायटी थी। मैं सोसायटी का मेम्बर बनने के लिए गया। मैंने कहानी लिखी। मैंने सातवीं क्लास में कहानी लिखी। लडक़ा है जो उत्पीड़ित ग्रंथि में जी रहा है और एक लड़का उसको बहुत तंग कर रहा है। कहानी का नाम था बिग शिफ्ट। जो मैं फील करता था स्कूल में,वही मैंने लिख दिया था। सिंधिया स्कूल बड़े लोगों का स्कूल था। जहां पर मैं एक ऐसा स्टूडेंट था जो दिवाली के दिन भी जब सभी रंगीन कपड़े पहनते थे तो मैं स्कूल का ड्रेस पहनता था। मेरे पास स्कूल के दिए हुए बाटा के जूते होते थे। एकमे का जूता था ब्लैक कलर का। स्कूल का जो सबसे गरीब तबका हो सकता था, मैं उसमें था। लिखा रहता था चेहरे पर। घड़ी तक नहीं थी। तो बहुत कॉम्पलेक्स फील करता था। सब अंग्रेजी में बात करते थे। मैं तड़ातड़ हिंदी में बात करता था। पिताजी कहते थे पढ़ाई करनी है तो उन्होंने सिंधिया स्कूल भेज दिया। उस कॉम्पलेक्स पर मैंने एक कहानी लिखी थी। मेरे एक टीचर थे पंडित आत्माराम शर्मा। उन्होंने मुझ से पूछा कि बेटा कहानी कहां से चुराई है? मैंने कहा कि कहीं से नहीं चुराई है। उन्होंने मुझे इतना लताड़ा। सच्चे नहीं हो। तुम लोग सच्चा होना सीखो। उन्होंने अंग्रेजी में जेन्युन शब्द कहा था। मुझे जेन्युन का मतलब नहीं मालूम था। उस रात डिक्शनरी में जेन्युन मतलब ढूंढ़ा। फिर मैंने कविता लिखी। मुझे अभी भी याद है। बहुत ही अजीब सी कविता थी। एक होता है न शायरी करें । कविता में एक लडक़ा आत्महत्या करना चाहता है। मैंने ऐसी कविता लिख दी आठवीं कक्षा में। एक लडक़ा जो आत्महत्या करना चाहता है। टीचर उसे देख के परेशान हो गए। पिताजी को फोन चला गया। यह लड़का ऐसा क्यों लिख रहा है। मैंने कहा कि मैंने लिखी है। शायरी की ऐसी फीलिंग आती है मेरे अंदर, ये लोग हमें ऐसा फील कराते हैं और मैं लिखना चाहता हूं। तो उन्होंने मेरा ट्रीटमेंट चालू कर दिया। काउंसलिंग करना चालू कर दिया। मैं कह रहा था मुझे लिखना है। पिताजी परेशान हो गए। प्रिंसिपल ने स्पेशल अटेंशन देना शुरू कर दिया। और फिर मेरा लिखा उन्होंने कुछ छापा ही नहीं। उन्होंने मुझे बोला कि तुम्हें लिखना नहीं आता है। गुस्से में मैंने नौवीं कक्षा में निबंध प्रतियोगिता में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। वहां लगातार जीतता था। उन्होंने कहा कि किसी भी टॉपिक को लिखो। मैंने बाद में जब ध्यान दिया तो समझ में आया कि मेरी सोचने की प्रक्रिया चलती रहती थी। चीजें पढऩे पर अंदर जमा हो जाती थीं, लेकिन याद नहीं रहता था कि कहां पढ़ी थी, कब पढ़ी थी? 1982 में एशियाड हुआ था। उसके ऊपर एक निबंध प्रतियोगिता थी। मैंने इतना लंबा-चौड़ा लिख दिया। पता नहीं कहां से क्या-क्या लिख दिया? कहीं न कहीं जानकारी रहती थी, वह सब स्टोर हो जाता है, फिर एक बार निकलता है तो उमड़ कर निकलता था। जैसे आप ने उल्टी कर दी है। उस तरह की लेखन प्रक्रिया का एहसास हुआ। इतना कॉम्पलेक्स आ गया था अंदर… टीचरों ने बोल-बोल कर भर दिया था कि तुम्हें नहीं लिखना चाहिए। तुम क्या लिखते हो सारा सब कुछ। इस माहौल में आप अलग हो जाते हैं। इसके अलावा भी आप हंसी-मजाक के पात्र बन जाते हैं सब लोगों के लिए, इसको इंग्लिश नहीं आती। पिताजी ने नौवीं कक्षा में पहली बार टाइटन की घड़ी दी। उस समय टाइटन नई-नई आई थी। स्कूल में सब पूछते किसकी घड़ी है? मैं कहता था टाइटन। वे लोग चिढ़ाते थे टिटन बोलो तुम तो। ये सारी चीजें घर कर गई थीं। इन वजहों से मैं मिलता नहीं था किसी से और लाइब्रेरी में घुसा रहता था। सीनियर स्कूल में सबसे बड़ी चीज थी लाइब्रेरी। सीनियर स्कूल से अच्छी लाइब्रेरी मैंने कहीं नहीं देखी। मैंने उस समय लाइब्रेरी में छुप-छुप कर लोगों से बचने के लिए … मैंने मानसरोवर से शुरूआत की थी। सबसे आसान वही होता है। छोटी-छोटी कहानियां … पूरा मानसरोवर पढ़ा। फिर जीप में सवार इल्लियां पढ़ी। वहां से एक नयी जर्नी चालू हुई। मेरे लाइब्रेरी से अधिक प्रिय कोई जगह ही नहीं थी। फिर मैंने पल्प लिटरेचर पढऩा आरंभ किया। फिर यहां पहुंचा और मैंने डिस्कवर करना चालू किया। कैसे गुलशन नंदा, कर्नल रणजीत आदि कहानियां चुराया करते थे। कैसे सुरेन्द्र मोहन पाठक चुराया करते थे। मैंने उनकी कहानियां पढ़ रखी थी। मैंने बाद में ओरिजनल पढऩा चालू किया। पता चलना चालू हो गया कि सब चोरी से भरे परे हैं और लोग मुझे बोलते हैं कि मैं जेन्युन नहीं हूं।
- वह लडक़ा है, जो कहीं अपना जगह बनाना चाहता था या प्रोग्रेस करना चाहता था। उसके अंदर वह चाहत अभी तक है या… ?0 है, कहीं न कहीं है।
- आपने पहली एक स्क्रिप्ट लिखी और फिर तय किया कि मैं इसे डायरेक्ट करूंगा?
0 वो एक प्रोसेस में इवाल्व हुआ। मतलब स्क्रिप्ट कुछ छह साल में इवॉल्व हुआ है। आयडिया कुछ चेंज हुआ है। मतलब पांच वही फिल्म नहीं है, जो मैं बनाने निकला था, जब लिखना चालू किया था। वह अधूरी फिल्म थी, जिसे मैं कभी पूरा नहीं कर पाया। जब मैंने स्क्रिप्ट पूरी कर ली और लोगों के पास ले गया तो लोगों ने कहा यार ऐसी फिल्म बनेगी नहीं। मैंने बहुत कोशिश की। मैंने कहा भांड़ में जाए। नहीं बनेगी तो मैं भी कुछ और नहीं बनाऊंगा। बनाऊंगा तो यही बनाऊंगा। पहली बार जब मेरे हाथ में कैमरा दिया गया 'सत्या' के टाइम पर। राम गोपाल वर्मा ने मुझे कैमरा दिया और बोला कि सत्या जब बंबई आता है तो वह हिस्सा मुंबई के माहौल में लो। मैं एक्साइटमेंट में था कि मैं डायरेक्टर हो गया। मैं वहां जाकर बोल रहा हूं कि अच्छा क्या करना है। एक्टर कैमरामैन को बता रहा है कि ये शॉट लो। वो कर रहा है। मेरे दिमाग में आयडिया आ रहा है, लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हो रही है एक्सप्रेस करने की। मैं एक्सप्रेस कर नहीं पा रहा था। फिर मैंने कहा ये शॉट लेते हैं। ऐसे लेते हैं-वैसे लेते हैं। जब सारा टेप गया राम गोपाल वर्मा के सामने। राम गोपाल वर्मा ने सुनाना चालू किया। क्या बकबास है? यह किसने शूट किया है? मैंने तुम्हें शूट करने के लिए बोला था। मैंने कहा हां सर,लेकिन वो मुझे करने नहीं दे रहे थे। ये था और वो था… इस तरह तुम पिक्चर बनाओगे? तुम क्या करोगे? उन्होंने कहा कि करने नहीं दे रहे थे क्या होता है? उन्होंने बताया कि मैंने ऐसा कुछ बोला था। मैंने बोलना चालू किया। मैंने बताया कि मैंने सोचा था ये करेंगे-वो करेंगे। उन्होंने पूछा कि जो तुमने सोचा था वो क्यों नहीं हुआ। मैंने कहा कि सब लोग बड़े हैं। मुझ से ज्यादा जानते हैं। उन्होंने कहा कि कोई ज्यादा नहीं जानता। वहां से मुझे पहली बार थोड़ा सा कांफीडेंस आया। फिर जो कैमरामैन था जैरी हूपर, उसके साथ मैं निकल जाया करता था। फिर जो सारा आयडिया आ जाए, ये जो गणपति हुआ, मैंने कहा कैमरा लेकर निकलते हैं। गणपति शूट करते हैं। उस समय बोला गया हमें कि पागल हो गए हो, ऐसा कैसे हो जाएगा। मैंने बोला कि मैं कर के लाता हूं। मैं और जैरी कैमरा लेकर गए। कोई नहीं था हमारे साथ। गणपति हमने असली शूट किया। पूरा माहौल शूट किया। धीरे-धीरे मुझे समझ में आ रहा था। मुझे लग रहा था कि मेरे अंदर कोई प्रोबलम नहीं है। मैं बोल सकता हूं। कैमरामैन की तरह भी बोल सकता हूं। पहले लेखक होने का विश्वास जगा था। मैंने कहा जो अंदर फील करता हूं वो बोलना चाहिए। तो मैंने कहानी डेवलप करनी चालू की थी 'शूल' की। कहानी मुझे सुनाई थी राम गोपाल वर्मा ने कि एक कस्टम ऑफिसर ने किस तरह अमिताभ बच्चन को भी नहीं छोड़ा। वह अपनी ड्यूटी कर रहा था। वो जो एटीट्यूटड था उसको लेकर मैंने बनारस पर आधारित बीएचयू को लेकर उस माहौल की कहानी लिखी थी 'शूल' की। पहले मुझे बताया गया कि तुम्हें डायरेक्ट करना है। फिर वहां कुछ हुआ। फिल्म मुझे अपनी तरह से बनानी थी। फिर सेकेंड हाफ में कुछ चेंज करने का सुझाव आया। तो मैंने कहा लिखूंगा नहीं,लेकिन मैं साथ में रहूंगा।। मैं साथ में रहा। 'शूल' आई-गई खत्म हो गई। 'कौन' में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। जो स्क्रिप्ट मैंने लिखी थी, वो बनी नहीं। जो बनी थी, वो उसी में से था जो मैंने लिखी थी। कुछ इम्प्रूवाइजेशन भी थे। लेकिन क्या था कि मैंने राम गोपाल वर्मा को स्क्रिप्ट दिए, उसके छह पन्ने शुरू के पता नहीं कहा चले गए? उन्होंने सातवें से पढ़ी और फिल्म सातवें से शुरू हुई। मेरे लिए वो पहले छह पन्ने महत्वपूर्ण थे। और फिर उन्होंने पूरा पढ़ा नहीं, एक पाइंट तक इंट्रेस्ट था उसके बाद उन्होंने खुद ही इवॉल्व कर लिया। तो मैंने जो लिखा था। मुझे उस स्क्रिप्ट के साथ बहुत लगाव था। ये दो-तीन अनुभव हुए। फिर मिशन कश्मीर हुआ। जहां से मैं छोडक़र आ गया। एक होता है न कि कहानी आपने ये कही, जिससे मैं एक्साइटेड हो गया, मैं कश्मीर गया, मैंने रिसर्च की। मैंने काम किया, हमने फिल्म बनाई। ऑपरेशन टोपाज क्या था जिया उल हक का, उसे ढूंढ कर ले आए। उसको लेकर मिशन कश्मीर बनाया। जब पिक्चर बननी शुरू हुई तो पहली चीज आपने वही निकाल दिया जो मिशन कश्मीर था। जो कारण बताए गए थे वो अलग थे। हमें फ्री में रहने को जगह मिल रही थी श्रीनगर में। हमें फारूख अबदुल्ला मदद कर रहे थे। पुलिस वाले मदद कर रहे थे। वहां के एसटीएफ वाले मदद कर रहे थे। हमने बोला ये सब क्यों डाल रहे हो? मेरा लिख हटा दिया गया बिना किसी कारण के। तो मैं बहुत अपसेट था, विधु विनोद चोपड़ा के एटीट्यूटड से। ये सारी चीजें जमा होती गईं। फिर मैंने फैसला लिया कि मैं खुद डायरेक्ट करूंगा।

- ये लगभग कुछ वैसी ही बात है, जैसे टीचर आपको जेन्युन होना सीखा रहे थे। हम थोड़ा आगे बढ़ें। आप के पास चालीस पेज की एक स्क्रिप्ट थी। उसके बाद आप ने तय किया कि मैं फिल्म बनाऊंगा। यह चाहे अपने-आप में एक लड़ाई थी। चाहे पूरा अपना इवोल्यूशन था। फिर भी फिल्म डायरेक्ट करना एक पहला कदम होता है। उस दिशा में कदम उठा तो फिर आपने किया क्या? अनुराग कश्यप जो खुद को एसर्ट नहीं कर पा रहा था,जब वो कहता है कि मैं डायरेक्ट हूं तो क्या बात हुई थी? क्यों कि पहले अपने-आप को आप डायरेक्टर नहीं मान पाए थे। फिर आप ने खुद को डायरेक्टर माना। अब बात ये है कि सिनेमा में किसी का धन लगता है। कुछ लोग जोड़े जाते हैं। आप में उनका विश्वास होना चाहिए। इस संबंध में बताएं?0 बहुत इंटरनल जर्नी रही है। मेरी बहुत सारी चीजें रही हैं, जो मेरे मोहभंग की वजह से आई हैं। अब जैसे कि जिस तरह के मेरे पिताजी थे, जब मैं बड़ा हो रहा था। तो मैं कुछ आदर्शवादी टाइप का था। वो अंदर आदर्शवाद है सिनेमा को लेकर । मैं जिंदगी कैसे जीता हूं या बाकी क्या करता हूं? उस पर कुछ नहीं कहूंगा। लेकिन सिनेमा को लेकर, लिटरेचर को लेकर के, जो चीजें पसंद हैं उनको लेकर के वह आइडिसलिज्म है। वो कहीं न कहीं है अभी भी है। थोड़ा -बहुत है अभी भी, कुछ साल में हो सकता है चला जाए। लेकिन अभी तक तो है। उस समय ये सारे मोहभंग चल रहे थे,लेकिन मुझे जो चीज ड्राइव करती थी, वो ये है कि मुझे अपने तरह से काम करना है। और लोग समझ क्यों नहीं रहे हैं कि मैं किस तरह का काम करना चाहता हूं। वह ड्राइव आज भी है। मुझे लगता है लोग अभी भी नहीं समझ पा रह हैं। फिल्में रूकी हुई हैं। फिल्में बाहर नहीं आईं। मुझे लगता है कि क्यों नहीं मुझे एक्सप्रेस करने दिया जा रहा है। देखता हूं तो लगता है कि जब-जब मेरी आवाज दबाई गई है, जब-जब ठुकराया गया है तब मैंने और ज्यादा आतरिक दृढ़ता के साथ काम किया है। मेरी शुरूआत हुई 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' से। 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' मैंने निराशा में बनायी। गुस्सा भी था कि यार मुझे कोई बनाने नहीं दे रहा है। एक बात मुझे समझ में आ गई थी कि यहां का जो निर्माता है, जो पैसे वाला आदमी है, जो पूंजीवादी है, उसको लगता है कि निर्देशक का काम है कैमरा लगाना। बाकी कोई इसका काम नहीं है। तो मैंने इसी चीज के लिए तय किया कि मैं कैमरा लगा कर दिखाऊंगा। मेरे पास कोई ज्ञान नहीं था। उस समय सबसे बड़ी मदद मिली स्टार बेस्ट सेलर से। स्टार टीवी पर तब यह सीरिज चल रहा था। उस समय मेरा भाई अभिनव 'डर' नाम का सीरियल बना रहा था। उसमें उसने मेरे नाम का इस्तेमाल किया था। जब उसने मेरा नाम का इस्तेमाल किया तो मुझे पता चला कि कुछ तो है स्टैंडिंग है मेरी। मैंने कहा था भाई से कि क्या जरूरत है? भाई ने बोला कि नहीं अपना नाम दे दो तो सीरियल हो जाएगा। मैंने बोला कि अच्छा… उसने बताया कि बदले में पैसे मिलेंगे। कितने चाहिए? मैंने बड़े जोश मे आकर दस हजार रुपए मांग लिए। उन्होंने बड़ी आसानी से दे दिए। जब सीरियल चालू हुआ तो उन्होंने सीरियल का प्रोमोशन चालू किया । 'सत्या', 'शूल' और 'कौन' के लेखक का सीरियल… मुझे बहुत तकलीफ होती थी। मैं भाई को डांटता था कि तुम मेरा नाम ऐसे क्यों डाल रहे हो। मेरा भाई बोलता था कि आपके अंदर कांफीडेंस नहीं है। मैंने खुद फोन कर-कर के स्टार बेस्ट सेलर को बोला कि मेरा नाम हटाओ। लेकिन उस प्रक्रिया में मुझे रियलाइज हुआ कि मैं कुछ हूं। सब हमको बोले तुम बेवकूफ है। तेरे नाम पर प्रोमोट हो रही है चीज। तू मना क्यों कर रहा है? मैंने बोला कि शर्म आती है। उन्होंने बोला कि चूतिया आदमी है। इससे तुम्हें मालूम है कि तुम्हारी कितनी स्टैंडिंग है। मैंने कहा अच्छा। उन्होंने समझाया कि तुम जाओ स्टार प्लस । तुम जो बोलेगे, वे करने के लिए दे देंगे। मैंने कहा अच्छा। उन्हें जाकर मैंने एक कहानी सुनाई। उन्होंने तुरंत स्वीकृत कर दिया। बिना जाने और देखे कि डायरेक्टर के तौर पर मेरे अंदर क्या संभावनाएं हैं? मैंने लिखी है तीन फिल्में। तब मुझे लगा यार किया जा सकता है। फिर मेरे समझ में आने लगा कि पूरा ध्यान लगा के कुछ किया जाए। इसमें कैमरा लगा के दिखाया। नटी का काम मुझे बहुत अच्छा लगा था। उसने 'अब के सावन झूम के बरसो… धूम पिचक वीडियो मैंने देखा। नटी से मेरी बात हुई दिल्ली में। नटी 'सत्या' का फैन था। नटी मुंबई आ गया। मैंने कहा करते हैं कुछ, लेकिन शूटिंग के एक दिन पहले मेरी जान निकल गई। मैंने कहा करूंगा कैसे? मैंने आज तक किया नहीं। मैंने शिवम को रात के बारह बजे फोन किया। मैंने कहा सर कल शूटिंग है। उन्होंने बोला कि हां कर। शिवम ने कहा कि पागल है, तेरा दिमाग खराब है। जो तुम ने तय किया वही जाकर कर। उन्होंने मुझे रात भर समझाया, जा कर, डर मत। तुमने हाथ डाल दिया। अगले दिन सेट पर गया तो, सुबह-सुबह शिवम ने कहा कि मैं भी आता हूं। मैं वेट कर रहा हूं कि शिवम कब आएंगे। नौ बजे का शिफ्ट था। राजेश टिबरीवाल मेरा दोस्त मेरे साथ था। डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सहयोगी यशवंत शेखावत मेरे साथ थे। यशवंत मेरे को बोल रहा है कि ऐसे करते हैं। राजेश ने भी एक सीरियल बनाया हुआ था। उसने भी कहा कि ऐसे करते हैं। मैं कंफ्यूज… मैं उन दोनों की तरह से नहीं सोच रहा था। फिर नटी ने पूछा कि करना क्या है। मैंने कहा,नटी सीन तो ये है। अब इसको कैसे करना है। मैंने बोला कि मैं इतना बता देता हूं कि कौन कहां बैठा है और क्या कर रहा है। मैंने सीन स्टेज करना चालू किया। नटी ने कहा कहां से शुरू करेंगे। पहला सीन था लडक़ी से बात हो रही है। उसको लेकर आया जा रहा है। मैंने कहा इसको लेकर आते हैं। मैंने कहा कि नटी ऐसा नहीं हो सकता है कि यहां से ये भी दिखे और वो भी दिखे। नटी ने कहा क्यों नहीं हो सकता है। तो नटी ने कैमरा लगाया। फिर धीरे-धीरे जो मेरा पहला सीन था… उसे शूट करने में मैंने फिगर आउट किया अपने-आप। पहला सीन करने में मुझे साढ़ सात घंटे लगे। उस समय मैंने फिगर आउट किया कि फिल्म बनाने का कोई मेथड नहीं है । जो मेथड है, वो आपका मेथड है। आप जैसे फिल्म को अपने दिमाग में देख रहे हो, वैसे ही बना दो। मेरा यह था कि मैं अपने-आप को एक्सप्रेस कर पाता हूं। मेरा विजुअल माइंड है। मैं विजुअली देखता हूं इन चीजों को। उसको आप कैसे एक्सप्रेस कर पाते हो अपनी टीम को।
- आप फिल्म निर्देशन में आना चाहते थे। जब निर्देशन की दिक्कतों का सामना कर रहे थे तो क्या कहीं ये लगा नहीं कि काश मैं फिल्म स्कूल गया होता। कम से कम शॉट लेने की तमीज तो होती। क्या उस समय आप के मन में यह सवाल उभरा था?
0 ये सवाल मेरे दिमाग में बहुत पहले आया था। मैंने शुरू में फिल्म स्कूल जाने की कोशिश की थी। हमेशा लेट हो गया मैं। हर जगह लेट हो जाता था। मैं जा नहीं पाया। लेकिन धीरे-धीरे जब फिल्म स्कूलवालों के साथ बैठना-उठना चालू किया, तो मुझे लगा कि फिल्म स्कूल आदमी को लिमिट कर देते हैं। मैंने अपने प्वाइंट ऑफ व्यू से यह सोच लिया था। जब मैंने डायरेक्ट करना शुरू किया तो उस समय लगता था कि काश किसी ने मुझे सिखाया होता। लेकिन करते-करते वह सब दिमाग से निकल गया। पहली चीज मेरे समझ में यही आई कि बतौर निर्देशक आपको अपने-आपको एक्सप्रेस करना है। पहले दिन मैं सीख गया कि सबसे बड़ा काम निर्देशक का ये है कि लोगों को मैनेज करना, और जो लोग अलग-अलग दिशा में सोचते हैं, उन सब की दिशा को मोड़ कर एक दिशा में लाना। सबसे बड़ा काम निर्देशक का वो मुझे पहले दिन समझ में आया। विजुअली या किसी एक चीज को जिस तरह देखते हो, मन में, मूड में, उसमें कोई गलत नहीं है, आप उसको एक्सप्रेस कितना कर पाते हो और कैमरा मैन कितना समझ पाता है। वो रिश्ता, वो रिलेशनशिप बहुत महत्वपूर्ण है। पहले दिन से ही मैंने कागज लेकर बैठना चालू किया। नटी को बोला ये फ्रेम है। उस फ्रेम में कुछ ठहरा हुआ दिखता था। फ्रेम में जब अपने माइंड में देखता हूं तो स्टैटिक देखता हूं। मूवमेंडट के साथ देखता ही नहीं। मेरा एक वो लिमिटेशन है। मूवमेंट जो आया वो नटी लेकर आया। मैं फ्रेम को हमेशा स्टैटिक देखता था। मूड में देखता था। मुझे लाइट दिखती थी। इस तरह की लाइट गिर रही है उसके चहरे पर। मुझे लगता था कि इस तरह का एक विजुअल होना चाहिए। मैं ढूंढता रहता था कि कहां पर कैमरा लगना चाहिए और मैं उसको बैठ कर स्केच करता था। मैं जो स्केच करता था, नटी वैसा लगाता था कैमरा। और नटी अपनी तरफ से मूवमेंट एड करता था। अनुराग मैं ऐसा कर रहा हूं, बोल कैसा है? और मुझे अच्छा लगता था। एक मेथड इवॉल्व हुआ। वासिक था, आरती थी… हमारी वो टीम है जो चलती आ रही है। तो हमलोगों का बेसिकली तीन या चार दिन का शूट था। फिर हमने कहा कि ये सब करना है। मेरे दिमाग में था कि अब ट्रेन के अंदर शूट करना है। सडक़ पर शूट करना है। कैसे करना है। फिर दिमाग काम करने लगा कि फिल्म ज्यादा इंपोर्टेंट है। फिल्म बनाने के लिए कुछ भी करना है। मेरा एक दोस्त था जो चैनल वी में काम करता था। चैनल वी में नया-नया डीवी कैमरा आया था। मैंने अपने दोस्त को रोल दिया। मैंने कहा तुमको रोल देता हूं। वो प्रोड्यूसर था चैनल वी में। मैंने कहा कि मुझे वह कैमरा चाहिए। रात को जब चैनल वी बंद होता था तो वह कैमरा उठाकर ले आता था। और डीवी कैमरा - मेरे दिमाग में डीवी कैमरा की यह समझ थी कि इसमें आप बिना लाइट के शूट कर सकते हो। आपको लाइट की जरूरत नहीं है। मैंने कहा कि अगर ऐसा कैमरा हाथ में आ जाए तो मैं ट्रेन में शूट कर सकता हूं। मैंने कहा ट्रेन में घूस कर शूट करूंगा। हम लोगों ने लास्ट ट्रेन पकड़ी और उसमें घुस कर के एक कंपाटमेंट हाईजैक किया। हमलोगों ने उसमें शूट किया। बैठे-बैठे यहां से विरार तक गए, विरार से बांद्रा तक की जर्नी में हमने ट्रेन का पूरा हिस्सा बिना लाइट के शूट किया। एडवांटेज मेरे साथ था कि एक कैमरा मैन ऐसा था जो रिस्क लेने को तैयार था। जिसके अंदर कीड़ा था। नटी का न्यूज रीडर बैकग्राउंड था। वो भी तैयार था एक्सपेरीमेंट करने को। हमलोग सब कुछ लगातार ऑन द स्पॉट करते रहे। यह सब करते-करते 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' खत्म होने और उसके टेलीकास्ट होने से पहले मैंने स्क्रिप्ट खतम कर दी 'पांच' की। तब उसका नाम 'मीराज' था। मैंने बीस पन्ने खतम किए, वो एक जर्नी अपने-आप हो गयी। चार दिन बैठा रहा। पांचवें दिन वो सीन दिमाग में आया किडनैपिंग वाला। और किडनैपिंग के बाद अपने-आप एक रास्ता पकड़ लिया। पांचवें दिन मैं सुबह बैठा शाम आठ बजे तक स्क्रिप्ट पूरी हो गयी। और ये नहीं था कि कुछ सोच कर बनाया था। एक दिशा में चली गई। उस समय जो स्क्रिप्ट थी उसमें पुलिस स्टेशन नहीं था। एक सीधी लीनियर कहानी इन लोगों की, जो खत्म होती थी ल्यूक के मर्डर से। स्क्रिप्ट लेकर जब मैंने लोगों सुनाना चालू किया, घूमना चालू किया… लोगों ने कहा कि कठोर अंत है, फिल्म नहीं बनेगी। उस समय फिल्म के फस्र्ट हाफ की वजह से फिल्म बनाने की इच्छा थी। ये था कि कहानी मेरी है। बनाने की इच्छा सिर्फ उसके लिए थी। अब मुझे डेस्परेशन आ गया था। उसी दौरान 'मिशन कश्मीर' का भी हादसा हुआ था। फिर 'वाटर' के लिए मैं चला गया। 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' एयर हो गया। बहुत तारीफ हुई उसकी। लोगों ने बात की । तारीफ भी उसी कारण से हुई, जिस कारण से बनाया था। लोगों ने कहा कि - क्या शूट करता है। कहानी लोगों को नहीं पसंद आई। कुछ नहीं, लोगों ने कहा कि क्या शूट करता है? मेरी ये जर्नी थी कि कभी इस स्टेज पर आऊंगा, जो कहानी कहनी है, वो कहानी भी कह सकूं। 'वाटर' रूक गई तो उस समय बहुत एंगर था , बहुत गुस्सा था। मैंने 'वाटर' लेकर जो प्रोटेस्ट हुआ था बनारस में, उस से फिल्म रूक गई थी, उसकी वजह से मेरे अंदर बहुत गुस्सा था। मैं लोगों से गुस्सा था, चीजों से गुस्सा था। उस समय मोहभंग हो गया था। विधु विनोद चोपड़ा से मोहभंग हो गया था, राम गोपाल वर्मा से मोहभंग हो गया था। 'वाटर' के पॉलिटिक्स से मेरा भ्रम टूटा था। अपने खुद के लोगों से मैं दुखी था। एक बात हमने तय की कि हमलोग प्रोटेस्ट करेंगे। हमने परचे बांटे। सबने एग्री किया। अगले दिन सब पलट गए। लोगों ने बोला कि आप कैसे बोल सकते हैं कि काशी में यह होता है। मैंने कहा कि शिल्पी थिएटर में ट्रिपल एक्स फिल्में मैंने देखी हैं। लोगों ने कहा कि झूठ बोल रहे हैं आप। मैंने कहा कि जो देखा है वह देखा है। सब मेरे खिलाफ हो गए। कहा गया कि तेरी वजह से फिल्म नहीं बनेगी। मुझे बंद कर दिया गया। शबाना आजमी से मेरा मोहभंग हो गया। यहां-वहां सब लोगों से मैं दुखी हो गया। मुझे लगा कि पिक्चर किसी को नहीं बनानी है, सब लोग खामखां हल्ला करना चाहते हैं। मेरे उपर अलग से नाराज थे सभी, क्योंकि कोई बोले नहीं अपने मन की बात। मैं जाकर बोल देता था। फिर क्या हुआ कि मीडिया वाले भी मुझे ढूंढने लग गए। सब लोग मुझे ढूंढने लगे। बहुत सालों के बाद मुझे धीरे-धीरे पता चला कि मैं एक माउथपीस बनता जा रहा था कि बाइट देना है तो बुलाओ। इसलिए मैं बचने लगा। इतना ज्यादा डिसइलूजन हो गया कि क्या कहूं? फिर मैंने कहा कि फिल्म बनाता हूं। मैंने 'शूल' में मनोज और रवीना के साथ काम किया था। जब 'पांच' की नींव गढ़ी गई तो उन दोनों को सुनाया था। मनोज को बोला था,ये करना है। कहानी सुनाई थी रवीना को और बोला था कि करना है। दोनों करने के लिए रेडी थे। 'शूल' में जब उधर से गया तो अचानक उन्हें लगने लगा कि मैं अभी काम का नहीं हूं। मनोज ने बोला कि 17 लाख रूपये चाहिए। रवीना बोला 17 लाख चाहिए। जामू जी तैयार थे फिल्म करने को। उन्होंने बोला कि 1 करोड़ 80 लाख के अंदर बना कर दो। बाद में जब फिल्म बनी तो 1 करोड़ 11 लाख में बनी थी। लेकिन 1 करोड़ 80 लाख में भी उस समय भारी लग रही थी। मैं इतना ज्यादा डिसइलूजन हो गया कि एक दिन गुस्से में मैंने तय किया कि मैं उनके साथ फिल्म बनाऊंगा, जिन्होंने कभी फिल्म नहीं की हो। हर नए आदमी के साथ फिल्म बनाऊंगा। जितने पैसे चालीस लाख-पचास लाख में फिल्म बनाऊंगा। और स्टार सिस्टम पर निर्भर नहीं रहूंगा। बड़े लोगों से दूर रहूंगा। मैंने अपने लिए नियम बनाया। सारे नियम गुस्से में बनाए थे। बहुत ज्यादा गुस्सा था। मुझे लग रहा था कि सब लोग यहां पर जो है, उनमें सिनेमा का पैशन नहीं है। सब लोग अलग कारणों से सिनेमा करना चाहते हैं। फिल्म बनाने के कारण से नहीं करना चाहते हैं। उस समय मेरे अंदर कूट-कूट कर आइडियलिज्म भरा था। उस एंगर में मैं सुधीर मिश्रा के पास गया। मैंने कहा सर ये फिल्म बनानी है। उन्होंने कहा कितने चाहिए। मैंने कहा जितने मिले, उतने में फिल्म बनानी है, मुझे नहीं मालूम मैं कैसे बनाऊंगा। हैंडीकैम पर शूट कर लूंगा मैं। 16 एम एम पर शूट कर लूंगा। तय हुआ चालीस-पचास लाख में फिल्म बनाओ। उस समय मैं सुधीर के लिए एक फिल्म लिख रहा था, जो टूटू शर्मा प्रोड्यूस करने वाले थे। उन्होंने पूछा कि कास्ट कौन है? मैंने कहा कि मुझे नहीं मालूम कौन-कौन रहेगा। के के के साथ मैंने 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' किया है तो के के रहेगा। बाकी नहीं मालूम। उन्होंने कहा कि अच्छा ठीक है। तुम कास्ट इकट्ठा करो। मैंने आदित्य श्रीवास्तव को फोन किया। स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए दी। आदित्य ने कहा कि ल्यूक कौन कर रहा है? मैंने उन्हें बताया कि ल्यूक के के कर रहा है। फिर उसने पूछा - मेरे लिए क्या सोचा है? मैंने कहा - मुर्गी। उसका जवाब था, मैं करूंगा। आदित्य श्रीवास्तव के आने से और कांफिडेंस आया। फिर विजय मौर्या दोस्त था। मैंने उस से कहा तू पोंडी कर। पोंडी वास्तव में लिखा था किसी और के लिए। मैंने टूटू को बताया कि ये कास्ट है। उनका कहना था कि यार इस कास्ट को बेचना मुश्किल है। क्या करेंगे? कोई तो लेकर आओ। मेरी एक दोस्त थी त्रिशीला पटेल। उसके घर की छत पर क्रिसमस के दिन पार्टी थी। मैंने वहां तेजस्विनी कोल्हापुरे को देखा डांस करते हुए। सत्यदेव दूबे जी के साथ वह थिएटर कर रही थी। नाटक मैंने देखा ही था। मुझे अपनी फिल्म के लिए वह ठीक लगी। मैंने उसे डांस करते हुए देखा। उसमें कुछ अजीब सी बात थी। एक अजीब सी सेक्सुवेलिटी थी। मैंने सोचा कि ये कैसी रहेगी। पूछा तेजू करेगी मेरी फिल्म। फिर मैंने सुधीर को तेजू के बारे में बताया। उसने भी कहा ठीक है। हमने तेजू से बात की। तेजू ने बताया कि मेरे लिए कुछ सोचा जा रहा है। हमलोग कुछ करनेवाले हैं। आपको टूटू जी से बात करनी पड़ेगी। सुधीर जी से बोला टूटू जी से बात करनी है। उन्होंने कहा चलो टूटू से बात करते हैं। हमने टूटू को स्क्रिप्ट सुनाई। टूटू ने कहा यार चालीस-पचास लाख में कहां फिल्म बनाओगे? कैसे बनाओगे? सुधीर मिश्रा और बृज राठी दो लोग थे। उन्होंने कहा कि मैं बनाता हूं। मैं प्रोड्यूस करता हूं। तेजू को ले रहे हो। सब लोगों को ले रहे हो तो मैं प्रोड्यूस करता हूं। उस तरह से टूटू शर्मा आए फिल्म में और फिल्म शुरू हो गई। जिस दिन टूटू शर्मा ने यह स्क्रिप्ट सुनी और यह डिसीजन लिया कि मैं प्रोड्यूस करता हूं। उसके बारह दिन के बाद शूटिंग शुरू हो गई। हुआ यों कि उन्होंने पूछा कि कब शुरू करना है? मैंने कहा , मैं रेडी हूं। मेरे लिए था कि जल्दी फिल्म शुरू हो। फिर मैं बैठा राजेश टिबरीवाल साथ। विजय मौर्या का उन्होंने एक नाटक देखा था, बोला अच्छा है। आदित्य श्रीवास्तव का काम देखा ही था टीवी में और 'सत्या' और 'बैंडिट क्वीन' में, कहा अच्छा है। के के पर सब को आपत्ति थी। इतना बढिय़ा रोल है। मैंने सोच लिया था कि मैं मनोज बाजपेयी को नहीं लाऊंगा। उस समय मेरी जिद्द थी कि मैं मनोज बाजपेयी के साथ काम ही नहीं करूंगा। मैंने कहा केके करेगा। उन्होंने कहा कि नहीं। मैंने कहा कि टेस्ट शूट करने दो। शूटिंग कैसे करोगे? मैंने सुना था… किसी एक इंटरव्यू में पढ़ा था या कहीं पढ़ा था मैंने कि किसी एक डायरेक्टर ने फिल्म बनाई थी, जबकि उसके पास पास पैसे नहीं थे। उसने ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट किए थे। मुझे वह फिल्म बहुत अच्छी लगी थी मैंने खुल्ला बोल दिया कि ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट करूंगा। बिना जाने-समझे कि उसके क्या परिणाम होते हैं, मैंने कहा ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट करूंगा। नटी ने मुझे घूम कर देखा- क्या हो गया? पागल हो गया है? दिमाग खराब है। मैंने कहा, हां हमलोग ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट करेंगे। नटी डर गया। नटी बोला कैसे करेंगे? मैंने कहा कि मैं दिखाता हूं। 'चंकींग एक्सप्रेस' का वीसीडी था मेरे पास। उसका बिगनींग था। मैंने 'चंकींग एक्सप्रेस' का बिगनींग दिखाया उस। नटी को विश्वास नहीं हुआ। उसने फिर से पूछा कि ये ट्यूब लाइट में शूट हुआ है? मैंने कहा - हां ट्यूब लाइट में हुआ है। उसने कहा कि मुझे टेस्ट करना पड़ेगा। मैंने कहा कि केके को टेस्ट करते हैं। एक रूम बुक किया गया। पांच-छह ट्यूब लाइट मंगाया गया। नटी को डर था कि ट्यूब लाइट फ्लिकर आएगा। हमने बीच में ट्यूब लाइट रख दी। वह शॉट फिल्म में हमने डाला है। हमारा टेस्ट शूट है। उसमें चारो एक्टर को बैठाया। कुछ अजीब सा शूट कर रहे थे हमलोग। सभी को आशंका थी कि ट्यूब लाइट में क्या लाइट आएगी? कैसा ग्लो आएगा? नटी बहुत कांफीडेंट हो गया था। नटी ने बोला कि बाबू कुछ मैजिक हो जाएगा। मैंने कहा ठीक है। शूट दिखाया गया। केके फिर रिजेक्ट हो गया। हमलोगों ने शूटिंग प्लान कर लिया। लोकेशन जाकर ढूंढ लिया। लोकेशन क्या था कि किसी ने बोला कि वाटसन होटल है टाउन में। वाटसन में भारत में पहली बार सिनेमा का शो हुआ था। वह एक आकर्षण था कि यार वहां जाकर शूट करते हैं। लेकिन कैसे शूट करें, कहां शूट करें, वहां एक घर था जो बंद था। वह घर कुछ अठारह-बीस साल से बंद था। उसमें पुराने फर्नीचर पड़े थे। हमने घर खोला और टार्च की रोशनी में हमने लोकेशन देखी थी। मैंने कहा यहां आ जाते हैं और यहीं शूट करेंगे। उन लोगों ने बोला कि आप दिन में आकर देख लेना। मैंने कहा कि देखना नहीं है। जगह समझ में आ गई, यहीं शूट करेंगे। कैसे करेंगे? फिर आर्ट डायरेक्टर के साथ बैठा। कमरे में ऐसे करेंगे। ल्यूक का घर बनाना था। मेरी अपनी पुरानी तस्वीरें थीं, जो अभी भी है। मैंने अपने कमरे की फोटोग्राफ्स दिखाई। कैसे मैं दीवाल पर लिखता था? यहां आने के बाद मैंने अपनी पहली कविता दीवाल पर लिखी थी। पंखे पर लिखा रहता था, पंखा किसने बंद किया चूतिए? तो पंखा चलते ही रहता था। हम जमीन पर लेटते थे, पंखे पर, दीवाल पर लिखा रहता था सब कुछ। मैं ऐसे लिखता था। और पेंट करता था और स्केच करता था। मैंने अपनी सारी फोटोग्राफ दिखाई। मैंने कहा ये चाहिए मेरे को। उसने कुछ और जानना चाहा तो जिम मोरिशन की बायोग्राफी दी। मैंने कहा कि उसमें वो डॉल का फेस है। एक ऐसा डॉल का चेहरा दो। मुझे इस्तेमाल करना है। एक माहौल क्रिएट करना है। मूड क्रिएट करना है। ये पोएट्री लिखी होगी दीवाल पर ,जो वास्तव में मेरे रूम के दीवाल पर लिखी रहती थी। रिकॉगनाइज जीनियेसेस, रिकॉगनाइज मी । जवानी के दिनों में एक जोश रहता है न? आपको लगता है कि आप बहुत कुछ कर सकते हैं। दुनिया नहीं समझती है। इस तरह से सब लिखा हुआ था। वो सारी चीजें दिखाईं, इवॉल्व हुआ सारा सबकुछ। वहां लोकेशन पर काम चल रहा है और यहां बोल रहे हैं केके है ही नहीं। दो दिन बचे हैं शूटिंग के लिए। कल मुहूर्त है, अनिल कपूर आनेवाला है मुहूर्त करने के लिए। अनिल कपूर ने आकर फिल्म का मुहूर्त किया । अनिल कपूर ने भी देखा और कहा यार ये लड़का कौन है। किसको हीरो बना रहे हो? जब मैंने केके को अप्रोच किया था क्रिसमस के पहले। टूटू शर्मा से मिलने के पहले, तभी से केके ने वर्क आउट चालू किया। उसने अपना शरीर बदल लिया था। उसके बाल इतने लंबे-लंबे थे। हमने कहा कि क्या करें। उसमें हाकिम आलिम जो है वो सिर्फ आलिम था। हमने कहा आलिम कुछ कर। मैं आलिम के यहां जाता था बाल कटाने। आलिम के यहां मैं बैठकर फोटो लेना चालू किया। फोटोग्राफ क्लिक करना चालू किया। तो एक लुक आया उसने बोला कि गोल्डन हाई लाइट दे दूं। मैंने कहा, दे दे… देखते हैं। उसने बाल ऐसे स्पाईक कर दी। मैंने जिंदगी में ऐसी हेअर स्टाइल नहीं देखी। हेयर स्टाइल ने किरदार का मूड ही बदल दिया। फबीया ने बोला कि यार इसके हिसाब कॉस्टूयम में मिलेट्री पैंट दूं तो एक नाजी फील आ जाएगा। तो वो आया। चीजें अपने-आप जुड़ती गर्इं। सब करके मैं केके को लेकर गया। ये सब मुहूर्त के बाद हुआ । अगले दिन शूटिंग होने वाली है। सेट पर पहली बार लेकर गया। सब लोग केके को देखकर डर गए। वह बिल्कुल बदल गया था। फिल्म टेक ऑफ कर गई। शूटिंग का पहले दिन जाकर फाइनल हुआ केके। मैंने तब तक सेट नहीं देखा था कि वासिक ने क्या किया है? मैं सेट पर गया। वहां मैंने देखा कि वासिक सेट को अलग लेवल पर ले गया था। उसने पांच चेहरे बना दिया था दीवाल पर और एक म्यूरल बना दिया था। मैंने कहा वासिक भाई ये क्या कर दिया। वासिक भाई ने बोला कि क्यों सर अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा लिखा हुआ चाहिए था, ये चेहरे नहीं चाहिए। वासिक ने बोला कि एक घंटा दो, मैं हटवा देता हूं। मैंने कहा आप हटाइए। बैठा था, मैं चेहरा देखने लगा। मैं स्क्रिप्ट पढऩे लगा। एक पन्ना पढ़ा और बोला कि वासिक भाई आप रूको। मेरा यह डर था कि अवास्तविक लगेगा। मैंने स्क्रिप्ट का पन्ना खोला, वह सीन था जब इंस्पेक्टर पहली बार आता है। मैंने कहा सीन को रीयल बना दो। मुझे इसे फिल्म का हिस्सा बना लेने दो। मैंने फिर बैठे-बैठ पहले दिन शूट करने से पहले वह सीन लिखा। ये कौन है? ल्यूक है। ये कौन है? ल्यूक है। सब ल्यूक है? नहीं वो मैं हूं। कौन वो छोटा वाला? हां, अच्छा है, वैसा वो करने से मैं देखता हूं। उसको मैंने एक थॉट प्रोसेस दिया वहीं बैठे-बैठे। मैंने कहा अभी हो गया, छोड़ दो अच्छा लग रहा है। वो वासिक का आइडिया था।
- आप तीन फिल्मों में बतौर लेखक जुड़े हुए थे। एक टेली फिल्म बना चुके थे। स्टार बेस्ट सेलर के रूप में। उसको बाद इनाम भी मिला था। ये सारी चीजें करने के बाद भी आपको फिल्म मेकिंग का कह लें नटस एंड बोल्टस या क्रिएटिव एनर्जी ऑफ फिल्मस है… स्क्रिप्ट के बाद की जो फिल्ममेकिंग है, क्योंकि कागज पर तो फिल्म लिखी या सोची जा सकती है। बनती है वो ऐसे ही मौकों से है। इसका ज्ञान तब तक नहीं था इस पर मुझे ताज्जुब हो रहा है। इस संबंध में आप थोड़ा बताएंगे क्या?
0 मैं एक चीज मानता हूं। आज जब मैं पीछे देखता हूं न? मैं बीच में बहुत परेशान रहा हूं। पहली बार यह परेशानी तब हुई थी, जब 'पांच' रूक गई थी। कुछ आठ महीने मैंने शराब ही शराब पिया। बहत्तर किलो छरहरा था मैं, जो मोटा होकर नब्बे किलो का हो गया था। तब से आज तक वह वजन गया नहीं है। अपनी आठ महीने की उस जर्नी रही में मैंने बहुत चीजें सोची थीं। आप सफल होते हैं तो माइथोलोजी क्रिएट हो जाती। अपनी फिल्म के लिए ही नहीं ,मैं 'वाटर' के लिए भी लड़ा था। जिस चीज पर मुझे फेथ था, उसके लिए लड़ा था। मुझे लगता था जो सच है उसके लिए लडऩा है। लोगों ने मुझे एक स्थान दे दिया था। ऐसी फिल्में लिखता है। 'सत्या' के बाद कुछ नहीं मिला था। 'शूल' के बाद, राम गोपाल वर्मा को छोडऩे के बाद, 'मिशन कश्मीर' छोडऩे और 'वाटर' के लिए लडऩे के बाद लोगों मुझे एक नाम दे दिया था। एक आदमी है, जो ऐसा बोलता है,साफ बोलता है। लेकिन मैं वो चीज नहीं ढूंढ रहा था। 'पांच' के बाद भी क्या हुआ? लड़ाई के बाद लोगों ने मुझे पेडेस्टल पर चढ़ा दिया । मैं किसी से नार्मल बात नहीं करता था। मैं कहीं भी जाऊं, लोग एक्सपेक्ट करते थे कि मेरे मुंह से अभी कुछ ज्ञान निकलेगा। किसी से बात करने बैठूं तो ज्ञान निकलेगा। और मैं उस तरह आदमी हूं, जो आज तक बकचोदी करता है। मैं बैठूंगा बरिस्ता पर, सिनेमा पर बातें करूंगा और दोस्तों को डीवीडी दिखा कर जलाऊंगा। सिनेमा के बारे में बात करूंगा। ऐसी बहसों से सीखने को मिलता है। मुझे आधी फिल्में प्रवेश भारद्वाज ने बतायी हैं। मेरी जर्नी अभी तक चल रही है। मैं धीरे-धीरे डिस्कवर कर रहा हूं। 'मिल विल' मैंने 2005 में डिस्कवर किया है। नयी फिल्में देखता हूं। नए फिल्ममेकर मुझे वापस रीसेट कर रहे हैं। मेरी जर्नी चलती रहती है। लेकिन लोगों ने मुझे एक अजीब से पेडेस्टल पर बैठा रखा है। मैं विचारों से प्रेरित होकर बहस करता हूं। है। ये फिल्म इस तरह से बननी चाहिए। मेरी बातों में एक तरह का आइडियलिज्म आ जाता है । लोगों ने जब मुझे पेडेस्टलपर चढ़ाया। मैंने हर चीज निर्दोष भाव से किया। मेरी यही ताकत रही। इसका भी मुझे मुझे बाद में एहसास हुआ। क्योंकि मुझे नहीं मालूम, अगर मुझे मालूम होता तो शायद मैं नहीं करता। क्योंकि मुझे नहीं मालूम था, इसलिए मैं कर गया। मुझे पहली बार वर्कशॉप पर बुलाया गया तो मेरा रिएक्शन था, मैं क्या बताऊंगा किसी को, मुझे खुद नहीं लिखना आता। उनको मेरी यह बात अच्छी लगी। मैं जब वर्कशॉप के लिए गया तो उन्होंने कहा कि आपका क्या प्रोसेस है। मैंने कहा कि 'सत्या' मैंने नहीं लिखी, 'सत्या' लिख दी गई। 'सत्या' बन गई। 'सत्या' बनी तो मैंने उसमें सीखा। मैंने अपनी गलतियां बताना चालू कीं। उसका रिएक्शन क्या हुआ कि लोगों को वह बात पसंद आई। लोगों ने कहा कि इस तरह से कोई बात नहीं करता है। लोग आकर हमको सिखाते हैं ऐसे करो, वैसे करो। एक ईमानदारी होती है निर्दोषिता में, नहीं जानने में और मैं एडमिट करता रहा कि मुझे नहीं आता था, ये हो गया था। सबको लगा कि मैं बहुत विनम्र हूं। मैं विनम्र नहीं था। मैं सच बोल रहा हूं। हां, उसका रिजल्ट आया। रिजल्ट तब आया, जब मैं एफटीआई में वर्कशॉप करने गया और मैंने बोला, यार राइटिंग-वाइटिंग कुछ नहीं फिल्म देखते हैं साथ में। मैंने तीस फिल्में देखी साथ में। मैंने कहा लिखो, राइटिंग का प्रोसेस यही है, बस लिखते रहो। पहले जानो कि तुम क्या कहना चाह रहे हो। क्या कहानी है, कहानी के माध्यम से कहो। मैं बैठता था और कहता था कि लिख-लिख के दिखाओ। लिखते थे फिर बोलते थे, इसमें ऐसा कुछ हो सकता है? तो आयडिया लेवल पर वर्कशॉप की मैंने। अ'छा ये सीन ऐसा करें तो कैसा होगा? ऐसा करें तो कैसा होगा? उसका रिजल्ट यह हुआ कि उस वर्कशॉप में 17 स्क्रिप्ट सबमिट हुई। उसके पहले जो राइटिंग वकशॉप हर साल होती है, उसमें दो ही स्क्रिप्ट सबमिडट होती थी। मैंने दो का रिकार्ड 15 स्क्रिप्ट से तोड़ा था। हर आदमी ने स्क्रिप्ट लिखी थी। सोलह स्टूडेंट थे, एक ने दो स्क्रिप्ट लिख दी थी। मैं आधे लोगों से मिलता हूं, उन्होंने ना 'पांच' देखी है और ना 'ब्लैक फ्राइडे' देखी है। और वो मुझसे मिलना चाहते हैं। प्रोड्यूसर से मिलता हू तो वे कहते हैं कि आप से मिलने की बहुत इच्छा थी। लोग बात कर रहे थे कि स्क्रिप्ट आ गई है। यह गुलाब जामुन है, इसमें चाशनी की जरूरत है। अनुराग कश्यप को ले आओ। मैंने कहा आप जानते हैं मुझे? आपने मेरा काम देखा है? आपने कुछ देखा है? हवा पर हवा बनती गई और हवा किस बात पर बनी? मैंने महसूस किया कि मैं बहुत कुछ नहीं जानता हूं। बात ये है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लोगों को मालूम ही नहीं कि वे क्या कर रहे हैं?
- पांच पर वापस आते हैं।?
0 'पांच' बनाने के बाद मैंने ये सब महसूस किया। मुझे मालूम था कि मैं क्या कर रहा हूं। मुझे सिर्फ इतना मालूम था कि मैं क्या कर रहा हूं। ना मैं किसी ग्रेटनेस के लिए कर रहा था। ना कुछ और साबित कर रहा था 'पांच' से। मेरे सामने रोड़े आते गए और कहीं न कहीं होता है न कि आपके सामने दीवार आ गयी और दीवार तोडऩे में आपकी पर्सनालिटी थोड़ी बदल गयी। फिर दीवार आई, आज तक दीवार तोड़ रहा हूं। स्कूल से जो मेरा जर्नी चालू हुआ, वह अभी खम्त नहीं हुआ है। मेरा आत्माराम शर्मा आज भी है। या तो वह सेंसर बोर्ड के रूप में है या वह आत्माराम शर्मा सुप्रीम कोर्ट के रूप में है। और वही आत्माराम शर्मा 'पांच' बनाते समय इस रूप में था कि सीन कैसे शूट करूं? 'पांच' में जो मैंने पहला सीन शूट किया, उसे आज भी कोई फिल्ममेकर देख कर बता सकता है कि ये पहला है। क्योंकि वह इकलौता सीन है, जिसमें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? तो मैंने सबकुछ शूट किया। हर एंगल से शूट किया। हर कैरेक्टर के क्लोजअप भी लिए। दोनों एक्सेस से भी शूट किया, जो किडनैपिंग का प्लान हो रहा है। तो उसमें एक्सेस भी जम्प हो रहा है। उसमें पचास चीजें हो रही हैं। धीरे-धीरे जब वह सीन एंड हो रहा है, उसे एक फिल्ममेकर समझ सकता है। पहले दिन और पहले सीन में मेरी समझ में आ गया कि पिक्चर कैसे बननी चाहिए। सीन का आरंभ अनगढ़ है। और सीन खत्म होते-होते एक रीदम आ गया उसमें। वहां से मेरी जर्नी शुरू हो गई। मेरे सामने जब चैलेंज आता है तो मैं ज्यादा अच्छा काम करता हूं। शिवम नायर भी बोलते हैं कि लास्ट मिनट क्राइसिस होता है न कि दो दिन में स्क्रिप्ट चाहिए तो तू लिखता है। तेरे को दो साल दे दें तो तू कुछ भी नहीं लिखेगा। मैं अपने-आप को लगातार प्रेशर में रखता हूं। शूटिंग करने की जगह पर व्यावहारिक समस्याएं रहती हैं। लाइट कहां लगाएं? इतनी पुरानी बिल्डिंग है। आप बाहर लाइट लगा नहीं सकते। छज्जा गिर जाएगा। सेंटर में लाइट ले लो। क्योंकि समस्याएं थी, लाइट और कहीं लग नहीं सकती थी। सेंटर में लगी तो टॉप लाइट हो गयी। टॉप लाइट डिसाइड कर के नहीं गया था। उससे एक अलग मूड क्रिएट हुआ। बहुत ज्यादा ब्राइट हो गया। मुझे लगा ज्यादा ब्राइट है। मैंने कहा नटी बहुत रोशनी है। उसने पूछा कि कितनी चाहिए। मैंने कहा कि विजुअली स्क्रीन पर इतना दिखना चाहिए। तू कितनी इस्तेमाल करता है, वह तेरे ऊपर। उस तरह से अपने प्रोसेस इवॉल्व किया। फिल्म स्टॉक से पहली बार डील कर रहा था। बार-बार नटी डांटता था। मैं जिद्द करता था कि 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' में तो हो गया था। नटी समझाता था, बाबा ये फिल्म स्टॉक है। ये सब फर्क मुझे नहीं मालूम था। नटी संभावना बतलाता था और मैं प्रयोग करने घुस जाता था। लाइटिंग में हमलोगों ने कई प्रयोग किए। उस तरह से एक प्रोसेस इवॉल्व होता रहा और मैं सीखता रहा। हमलोग क्लाइमेक्स शूट कर रहे थे। किसी को स्विमिंग नहीं आती थी। मैंने कहा कि चलो मैं सिखाता हूं। अठारह घंटों तक मैं सभी को पुल में सबको स्विमिंग सिखा रहा हूं। आप यहां से यहां तक का शॉट दे दो, बाकी मैं मैनेज कर लूंगा। फिर केके डाइव नहीं कर रहा था। वह फिल्म का ऑपनिंग शॉट था। कैसे करूं? मैंने कहा सेट पर आओ, शॉट इवॉल्व हुए और मजबूरी में हमने प्रयोग किया। मैंने केके को कहा कि आप जरा सा झुकना। फिर कैमरा आपसे दूर चला जाएगा और मैं डाइव करूंगा। मैं आपके पीछे रेडी खड़ा हूं। कैमरा आया वहां। मैंने डाइव किया। मैं तो डाइव कर रहा हूं। मैं डुप्लीकेट हूं। किसी को नहीं मालूम कि मैं क्या शूट कर रहा हूं। मैंने अंडरवाटर कभी शूट नहीं किया। हर चीज को क्रॉस चेक भी कर रहा हूं। करते-करते हमलोगों ने कुल अड़तीस घंटे शूट किया। जॉय का भी प्रोब्लम था। उसने कहा कि मैं बहुत मोटा हूं, मैं शर्ट नहीं उतार सकता। तो मैं खुद जॉय की शर्ट पहन कर कैमरे के सामने चला गया। हमारे पास इतना वक्त नहीं था कि वहां क्लाइमेक्स शूट कर लें। क्लाइमेक्स पर जब हमलोग पहुंचे तो बीच पर गए। वहां पानी उतरते-उतरते तीन बजा। मुझे वही लोकेशन चाहिए था। बैकग्राऊंड में फोर्ट दिख रहा था। मुझे लोकेशन की समझ है। मुझे मालूम है कि यहां शूट करूंगा तो अच्छा दिखेगा। मैंने वह लोकेशन फोर्ट के लिए ही चुना था। पानी उतरेगा नहीं तो हमलोग लाइट आगे कैसे लाएंगे। लाइट आगे नहीं लाऐंगे तो फोर्ट दिखेगा नहीं। फोर्ट पर लाइट पडऩी चाहिए। तीन बजे के बाद थोड़ा सा पानी उतरा। पांच बजे सुबह के पहले खत्म करना था, क्योंकि उसके बाद की अनुमति नहीं है। दो घंटे में ही सब करना है। नटी ने कहा, बाबा अभी टाइम नहीं है। उसने छह एच एम आई खड़ा कर के लाइट मार दिया। वहां मेरा एक दोस्त विक्रम मोटवानी पोलराइड कैमरा लेकर आया था। उसले फोटो खींच कर दिखाया। ये देख मस्त फोटो आया। फोटो कैसा? बैकग्राउंड में छह लाइट है और लाइट पीछे आ रही पीठ पर, सामने तो आ नहीं रही है। मैंने पाया कि इधर से तो चेहरा दिखता ही नहीं है। मैंने कहा कि मैं ऐसे ही शूट करूंगा इसमें आधा चेहरा दिखे आधा न दिखे तो मैजिक हो जाएगा। नटी बोला चल शूट करते हैं। हो जाएगा सीन। उसके पहले हमलोग क्या-क्या ट्राय कर चुके थे। मैंने कहा कि बारह फ्रेम पर शूट करते हैं। बारह फ्रेम पर शूट करने का मतलब है कि थोड़ा ज्यादा रिजोल्यूशन होगा, फोर्ट दिखेगा। एक्टर को स्लो चलना पड़ेगा। हमने एक पूरा सीन किया, जिसमें केके और आदित्य श्रीवास्तव धीरे-धीरे चल रहे थे। डायलॉग बोल रहे हैं। हमनें एक पूरा टेक लिया था। बाद में फूटेज देखी तो उस टेक में से हमने सिर्फ दो शॉट रखे। पांच बजे तक हमलोगों ने शूटिंग खत्म की। वहां सुबह देखी तो लाश खींच कर ले जाने का सीन भी वहीं कर दिया। वैसे 'पांच' बनी।
(बहुत मुश्किल से यह अपलोड हो पाया है.)