Search This Blog

Friday, October 31, 2008

दरअसल:छोटी सफलता को बड़ी कामयाबी न समझें


-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले दिनों सीमित बजट की कुछ फिल्मों को अच्छी सराहना मिली। संयोग से वे महानगरों के मल्टीप्लेक्स थिएटरों में सप्ताहांत के तीन दिनों से ज्यादा टिकीं और उनका कुल व्यवसाय लागत से ज्यादा रहा। तीन-चार फिल्मों की इस सफलता को अब नया ट्रेंड बताने वाले पंडित बड़ी भविष्यवाणियां कर रहे हैं। वे बता रहे हैं कि अब छोटी फिल्मों का जमाना आ गया है। इन भविष्य वक्ताओं में एक निर्माता भी हैं। चूंकि वे कवि, पेंटर और पत्रकार भी हैं, इसलिए अपनी धारणा को तार्किक बना देते हैं। उन्होंने इस लेख में अपनी जिन फिल्मों के नाम गिनाए हैं, उनकी न तो सराहना हुई थी और न ही उन्हें कामयाब माना गया। आमिर से लेकर ए वेडनेसडे की सराहना और कामयाबी के बीच हल्ला और अगली और पगली जैसी असफल फिल्में भी आई हैं। हां, चूंकि इन फिल्मों की लागत कम थी, इसलिए नुकसान ज्यादा नहीं हुआ। आमिर, मुंबई मेरी जान और ए वेडनेसडे जैसी फिल्मों का उदाहरण देते समय हमें यह भी देखने की जरूरत है कि इनके निर्माता कौन हैं? लोग गौर करें कि बड़ी फिल्मों के निर्माताओं और निर्माण कंपनियों ने ही छोटी फिल्मों के लिए एक शाखा खोल ली है। वे कुछ फिल्में इस श्रेणी की बनाते हैं। असल मुद्दा यह है कि क्या इन छोटी फिल्मों से बिजनेस मोड्यूल बदल रहा है? बड़ी कारपोरेट कंपनियां खास मिजाज, विषय और अंदाज की ही फिल्में चुन रही हैं। वे मल्टीप्लेक्स थिएटरों के दर्शकों की रुचि को ध्यान में रख कर फिल्में बना रही हैं। इन फिल्मों के निर्देशकों को भी अलग से देखें। ज्यादातर विज्ञापन फिल्मों की दुनिया से आए हैं। पहली फिल्म के लिए उन्हें बड़ा बजट नहीं मिल पाता, इसलिए छोटी फिल्म का ताना-बाना रचते हैं। छोटी फिल्म से क्वालिफाई करने के बाद वे बड़ी फिल्म के लिए हाथ-पांव मारते हैं।
इम्तियाज अली ने सोचा न था के बाद जब वी मेट बनाई और अब वे सैफ अली खान के प्रोडक्शन की फिल्म निर्देशित कर रहे हैं। छोटी फिल्मों का बाजार हमेशा रहा है और उसके दर्शक भी रहे हैं। कभी श्याम बेनेगल, कभी गुलजार, कभी बासु चटर्जी, तो कभी सईद मिर्जा की फिल्मों के रूप में हम उन्हें देखते रहे हैं। हिंदी फिल्मों के हाल-फिलहाल का इतिहास बताता है कि ऐसी फिल्मों की संभावनाएं सिमट गई हैं। स्वतंत्र निर्माता धीरे-धीरे खत्म होते गए हैं। फिल्म इंडस्ट्री चंद बड़े बैनर, प्रोडक्शन हाउस और कारपोरेट कंपनियों की मुट्ठी में आ चुकी हैं। इस माहौल में स्वतंत्र निर्माता और स्वतंत्र सोच के निर्देशकों के लिए कोई जगह नहीं है। साबुन और तेल की कंपनियों की तरह फिल्मों की कंपनियां भी प्रीमियम प्रोडक्ट्स और ब्लॉक बस्टर के साथ कम लागत की फिल्में बना रही हैं। ग्राहक बने दर्शक को तो सिनेमाघरों में बड़ी और छोटी दोनों फिल्मों के लिए एक ही राशि के टिकट खरीदने पड़ते हैं। इस तरह जो भी फायदा है, वह निर्माता का है। हिंदी फिल्मों का संसार बाकी भाषाओं और खासकर हॉलीवुड की फिल्मों से अलग नहीं है। बड़ी और भव्य फिल्में अधिक दर्शकों को आकर्षित करती हैं। लोकप्रिय स्टार दर्शकों को थिएटरों में ले आते हैं। आम दर्शकों का मनोरंजन इन फिल्मों से होता है और नतीजतन दर्शक ऐसी फिल्मों को बड़ी हिट बना देते हैं। विषय, शिल्प और शैली के लिहाज से ओम शांति ओम भले ही साधारण फिल्म रही हो, लेकिन उसका बिजनेस ए वेडनेसडे और आमिर के बराबर है, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री अंतत: ओम शांति ओम जैसी फिल्मों से ही चलती है। यह क्रूर विडंबना है, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री का यही सच है।
हां, छोटी फिल्मों की संभावना है, लेकिन उस संभावना को मूर्त रूप देने के लिए कारपोरेट कंपनियों के चंगुल से फिल्म इंडस्ट्री को बाहर आना होगा। नई सोच के युवा निर्देशकों को मौका देना होगा और मल्टीप्लेक्स और मेट्रो के बाहर के दर्शकों को भी ध्यान में रखना होगा। छोटे दर्शक समूहों को ध्यान में रखकर भी छोटी फिल्मों को बनाया जा सकता है, लेकिन उसके लिए कारपोरेट कंपनियों को एमबीए ऑफिसर के बजाए साहित्य, संस्कृति और इतिहास के जानकारों को बहाल करना होगा!

फ़िल्म समीक्षा:गोलमाल रिट‌र्न्स


पिछली फिल्म की कामयाबी को रिपीट करने के लोभ से कम ही डायरेक्टर व प्रोड्यूसर बच पाते हैं। रोहित शेट्टी और अष्ट विनायक इस कोशिश में पिछली कामयाबी को बॉक्स ऑफिस पर भले ही दोहरा लें लेकिन फिल्म के तौर पर गोलमाल रिट‌र्न्स पहली गोलमाल से कमजोर है।
ऐसी फिल्मों की कोई कहानी नहीं होती। एक शक्की बीवी है और उसका शक दूर करने के लिए पति एक झूठ बोलता है। उस झूठ को लेकर प्रसंग जुड़ते हैं और कहानी आगे बढ़ती है। कहानी बढ़ने के साथ किरदार जुड़ते हैं और फिर फिल्म में लतीफे शामिल किए जाते हैं। कुछ दर्शकों को बेसिर-पैर की ऐसी फिल्म अच्छी लग सकती है लेकिन हिंदी की अच्छी कॉमेडी देखने वाले दर्शकों को गोलमाल रिट‌र्न्स खास नहीं लगेगी।
अजय देवगन संवादों के माध्यम से अपना ही मजाक उड़ाते हैं। तुषार कपूर गूंगे की भूमिका में दक्ष होते जा रहे हैं। मालूम नहीं एक कलाकार के तौर पर यह उनकी खूबी मानी जाएगी या कमी? फिल्म में अरशद वारसी की एनर्जी प्रभावित करती है। श्रेयस तलपड़े हर फिल्म में यह जरूर बता देते हैं कि वे अच्छे मिमिक्री आर्टिस्ट हैं। उन्हें इस लोभ से बचने की जरूरत है।
गानों के फिल्मांकन में रोहित ने अवश्य भव्यता रखी है और फैंटेसी का सुंदर इस्तेमाल किया है। कंप्यूटरजनित छवियां उनकी कल्पना को साकार करती हैं। रोहित को अगली बार समर्थ लेखकों के साथ काम करना चाहिए। उम्मीद है कि वे भविष्य में अपनी तकनीकी दक्षता का बेहतरीन इस्तेमाल करेंगे और बेहतरीन फिल्में देंगे।

मुख्य कलाकार : अजय देवगन, अरशद वारसी, सेलिना जेटली, अमृता अरोरा, तुषार कपूर, श्रेयश तलपड़े, करीना कपूर, अंजना सुखानी।
निर्देशक : रोहित शेट्टी
तकनीकी टीम : निर्माता- ढिलिन मेहता

फ़िल्म समीक्षा:फैशन


प्रियंका की फिल्म है फैशन

-अजय ब्रह्मात्मज

हाई सोसायटी के बारे में जानने की ललक सभी को रहती है। यही कारण है कि इस सोसायटी की खबरें चाव से पढ़ी और देखी जाती हैं। फैशन जगत की चकाचौंध के पीछे की रहस्यमय दुनिया खबरों में छिटपुट तरीके से उजागर होती रही है। मधुर भंडारकर ने उन सभी खबरों को समेटते हुए यह फिल्म बनाई है। चूंकि फैशन फीचर फिल्म है इसलिए कुछ किरदारों के इर्द-गिई उन घटनाओं को बुन दिया गया है। फैशन मधुर भंडारकर की बेहतरीन फिल्म है। सिनेमाई भाषा और तकनीक के लिहाज से उनका कौशल परिष्कृत हुआ है।
फिल्म फैशन जगत की साजिशों, बंदिशों और हादसों को छूती भर है। मधुर कहीं भी रुक कर उन साजिशों, बंदिशों और हादसों की पृष्ठभूमि की पड़ताल नहीं करते। हिंदी फिल्मकार पापुलर फिल्मों में गहराई में उतरने से बचते हैं और कहीं न कहीं ठोस बाते कहने से घबराते हैं। उन्हें डर रहता है कि दर्शक भाग जाएगा। यही वजह है कि मधुर की फिल्म विशेष होने के बावजूद साधारण ही रह जाती है। हां, प्रतिनिधि के तौर पर चुनी गई तीन माडलों की कहानी दिल को छूती है। मेघना माथुर, सोनाली राजपाल और जेनेट के नाम भले ही अलग हों लेकिन उनकी पृष्ठभूमि एक सी है। मधुर इन किरदारों के जरिए दर्शकों को भावविह्वल करने में सफल रहे।
यह पूरी तरह से प्रियंका चोपड़ा की फिल्म है। उन्होंने मध्यवर्गीय मेघना के भाव के क्रमिक उतार-चढ़ाव को अच्छी तरह व्यक्त किया है। अगर वह पापुलर हीरोइन होने के दबाव से निकल पातीं और आरंभिक दृश्यों में मध्यवर्गीय परिवार की लड़की का गेटअप ले पातीं तो उनका किरदार और ज्यादा प्रभावशाली हो जाता। इस कमी के बावजूद प्रियंका की चंद अच्छी फिल्मों में फैशन की गिनती होगी। ऐतराज के बाद फैशन में प्रियंका ने साबित किया है कि उन्हें जटिल चरित्र मिले और निर्देशक उन पर ध्यान दे तो वह बेहतरीन प्रदर्शन कर सकती हैं।
कंगना रानाउत गैंगस्टर और वो लमहे में इस तरह के किरदार निभा चुकी हैं। कंगना की क्षमताओं का सही इस्तेमाल नहीं हो पाया है। नई अभिनेत्री मुग्धा गोडसे का आत्मविश्वास झलकता है। अर्जुन बाजवा का चरित्र आधा-अधूरा लगता है। हां, अरबाज खान की क्रूरता दृश्यों के माध्यम से उभरती है। वे कहीं भी अतिनाटकीय नहीं हुए।
फिल्म का गीत-संगीत सामान्य है। यह अच्छी बात है कि मधुर किसी प्रकार के आइटम या फिल्म पर हावी होते संगीत से बचे हैं। फिल्म के संवाद और चुटीले व मार्मिक हो सकते थे।

मुख्य कलाकार : अरबाज खान, प्रियंका चोपड़ा, कंगना रानावत, मुग्धा गोडसे, हर्ष छाया।
निर्देशक : मधुर भंडारकर
तकनीकी टीम : निर्माता- रॉनी स्क्रूवाला

Tuesday, October 28, 2008

लोगों को 'एक विवाह ऐसा भी' वास्तविक लगेगी-कौशिक घटक


राजश्री की फिल्म एक विवाह ऐसा भी के निर्देशक हैं कौशिक घटक। उन्होंने अनुराग बसु के सहायक के रूप में निर्देशन यात्रा आरंभ की। उनकी तरह ही कौशिक ने भी पहले टीवी सीरियलों का निर्देशन किया। उन्हें जब एक विवाह ऐसा भी के निर्देशन की जिम्मेदारी दी गई, तब वे राजश्री के ही एक सीरियल का निर्देशन कर रहे थे। बातचीत कौशिक घटक से..
सबसे पहले यह बताएं कि फिल्म के नाम में ऐसा भी लगाने की क्या वजह है? क्या आप किसी नए प्रकार के विवाह की बात कर रहे हैं?
देश में हर समुदाय और समाज में विवाह की अपनी-अपनी पद्धतियां होती हैं। हम इसमें एक खास किस्म के रिश्ते की बात कर रहे हैं, जो बाद में विवाह में बदलता है। न मिलने की कसमें, न साथ का वादा, न कोई बंधन.., बंधन तो है ही नहीं! हम इस प्रकार के एक विवाह की बात कर रहे हैं। इसमें लिव इन रिलेशनशिप भी नहीं है। यह लड़का-लड़की की एक कहानी है, जिनकी जिंदगी में ऐसा कुछ होता है कि वे साथ नहीं हो पाते। एक-दूसरे को छूना तो दूर, उनकी नजरें तक नहीं मिलती हैं। शारीरिक संबंध का तो सवाल ही नहीं उठता! इस रिश्ते में वे बारह सालों तक रहते हैं। उस रिश्ते की गहराई को व्यक्त करने के लिए ऐसा भी इस्तेमाल किया गया है।
पहली फिल्म के रूप में आपने ऐसी फिल्म क्यों स्वीकार की और क्या अभी के माहौल में दर्शक इस कहानी को स्वीकारेंगे? दरअसल, मैं इस तरह की कहानी और पृष्ठभूमि में ही पला-बढ़ा हूं। मैं अपनी फिल्म में किरदारों को बहुत अच्छी तरह जानता हूं। इन किरदारों के सुख-दुख को मैंने जिया है। यह कहानी उन गलियों की है, जिन गलियों से मेरी जिंदगी का सफर शुरू हुआ। इस कहानी के आंगन में मैं खेल चुका हूं। इस कहानी के साथ अपने निजी संबंधों के कारण ही पहली फिल्म के रूप में मैंने इसे स्वीकार किया। दर्शकों के बीच एक समूह ऐसा भी है, जो कि इस तरह की फिल्में चाहता है। पारिवारिक मूल्यों की फिल्मों को पसंद करता है। आप महानगरों की सीमाओं से बाहर निकलें, तो ऐसे दर्शक जरूर मिलेंगे और मैंने तो महानगरों में भी ऐसे दर्शक देखे हैं। चूंकि उन्हें अपनी पसंद की फिल्में नहीं मिलतीं, इसलिए वे मन मारकर रह जाते हैं। एक विवाह ऐसा भी उन दर्शकों की जरूरत पूरी करेगी। इसमें जिन भावनाओं की बात है, वे दर्शकों को छूएंगी।
आपकी फिल्म की पृष्ठभूमि भोपाल की है?
बिल्कुल, लेकिन यह सभी शहरों के दर्शकों की है! इसीलिए उन्हें भोपाल से अपनापन महसूस होगा। पहले प्रेम की गुदगुदी और उसे व्यक्त न कर पाने की छटपटाहट एक जैसी होती है। आप भले ही आज के क्षणभंगुर रिश्तों को जी रहे हों, लेकिन जब प्यार जागता है, तो आप ठहर जाते हैं। महानगरों में प्यार की तलाश में ही रिश्ते बदलते रहते हैं। यहां समय की कमी, दूसरी जरूरतें और मन की बेचैनी से रिश्तों को पनपने में समय लगता है। वैसे भी छोटे शहरों, कस्बों और गांव में यह प्यार थोड़े अलग अंदाज में नजर आता है। माना जा रहा है कि इन दिनों किशोरावस्था में ही शारीरिक संबंध बन जाते हैं। इस माहौल में बारह सालों का इंतजार कितना वास्तविक लगेगा? आप शहरी किशोरों की बातें कर रहे हैं। देश की अस्सी प्रतिशत आबादी शहरों के बाहर रहती है। वहां आज भी शादी के पहले लड़के-लड़कियों के बीच शारीरिक संबंध नहीं बन पाते। उन सभी को मेरी फिल्म वास्तविक लगेगी और महानगरों के दर्शक अपने ही देश में प्रचलित रिश्तों की अलग स्थिति से परिचित होंगे। वे प्यार की भावनाओं को समझेंगे।
राजश्री के साथ मिले इस अवसर पर अपनी खुशी किस रूप में जाहिर करेंगे?
राजश्री से अच्छा मंच क्या हो सकता था? सिर्फ इसलिए ऐसा नहीं कह रहा हूं कि राजश्री बड़ा प्रोडक्शन हाउस है। मैं उन्हीं मूल्यों में विश्वास करता हूं, जो राजश्री के हैं। मुझे यहां काम करने के लिए अपने आप को किसी भी रूप में बदलना नहीं पड़ा। यहां के लोगों से पूरा सहयोग और मार्गदर्शन मिला।
भोपाल में शूटिंग का अनुभव कैसा रहा?
आम धारणा है कि इन शहरों में शूटिंग देखने आई भीड़ काम में बाधा डालती है। मेरा अनुभव इसके विपरीत रहा। फिल्मी कलाकारों को देखने की इच्छा स्वाभाविक है। भीड़ होती थी, लेकिन जब हम उनसे आग्रह करते थे कि थोड़ा पीछे हट जाएं, तो वे सहयोग करते थे। हमने वहां गली, बाजार, बस वगैरह यानी हर जगह शूटिंग की। वहां के लोग बहुत प्यारे हैं। हमें भी शुरू में घबराहट थी, लेकिन कहीं पुलिस बुलाने की जरूरत नहीं पड़ी। हां, ठंड की वजह से थोड़ी दिक्कत जरूर हुई, लेकिन उसमें भोपाल के लोगों का कोई दोष नहीं है।
खल्लास गर्ल यानी ईशा कोप्पिकर को चांदनी बनाने में कितना वक्त लगा?
कोई वक्त नहीं लगा। मानसिक रूप से मैं तैयार था कि चांदनी में ढलने में ईशा को थोड़ा समय लग सकता है। यकीन मानिए, कहानी सुनने के बाद से ही ईशा ने चांदनी की तैयारी शुरू कर दी थी। उन्होंने जिस तरह से फिल्म के बारे में जिज्ञासाएं रखीं, उससे लगा कि मुझे पूरी सहूलियत मिलेगी। मैं प्रेम के बारे में भी यही कहूंगा। सोनू सूद ने इस किरदार को सही तरीके से निभाया है।

Sunday, October 26, 2008

हिन्दी टाकीज:स से सिनेमा-निधि सक्सेना



हिन्दी टाकीज-१४


इस बार निधि सक्सेना की यादें...निधि जयपुर की हैं। फिल्में देखने का उन्हें जुनून है... बनाने का भी। तमाम एनजीओ के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाती हैं। खासकर कुदरत (पानी, जंगल, परिंदों, मिट्टी) पर. दूरदर्शन के लिए भी काम कर चुकी हैं।पढ़ने की आदत जबर्दस्त है और घूमने की भी . स्कल्पचर बनाने के हुनर पर खुद यकीन है और पेंटिंग्स बनाने के कौशल पर बाकियों को. उनका एक सीधा-सादा सा ब्लॉग भी है http://ismodhse.blogspot.com निधि को गाने सुनना भी अच्छा लगता है. नए-पुराने हर तरह के. उन्होंने निराले अंदाज़ में अपने अनुभव रखे हैं।

स से सिनेमा
क़र्ज़ अदा करूं पहले
इस लेख के बहाने मैं बचपन का एक क़र्ज़ अदा कर दूँ। सबसे पहले मेरा धन्यवाद एन। चंद्रा को। अगर वो न होते तो जो भी एक-डेढ़ डिग्री मेरे पास है, अच्छे बुरे अंकों के साथ, वो कभी ना होती। तेजाब वो पहली फ़िल्म हैं, जो मैंने देखी। इससे पहले टीवी या और कुछ देखा हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। तेजाब को मेरी देखी पहली फ़िल्म होने के लिए धन्यवाद नहीं, बल्कि उस गाने के कारण धन्यवाद। जिसमे गुलाबी माधुरी थिरकते हुए गाती है...एक दो तीन चार.... स्कूल मैंने जाना शुरू ही किया था। ढेरों कवितायें और इंशा जी के शेर भी याद थे, लेकिन कोई माई का लाल गिनतियाँ नहीं याद करवा पा रहा था। पापा की गोद में बैठकर जयपुर के अंकुर सिनेमा में जब ये गाना सुना, गिनतियाँ याद हो गयीं। सुबह उठने से पहले और रात को सोने से पहले यही गाना गाती थी और बीच के दिन भर भी। और काम ही क्या था। सब खुश थे-मुझे गिनतियाँ याद हो गयीं। उसके बाद बारी थी महीनों के नाम की। पहाड़ की तरह साल लगता था, जनवरी से दिसम्बर तक। बहुत लंबा। फिर आखिरकार वो गाना आ ही गया...रेखा थी शायद उस फ़िल्म की हिरोइन। गाना था...जनवरी फ़रवरी मार्च एप्रिल सासू सारा काम करें। घर में माँ को महीनो के नाम सुनाते हुए पूरा गाना बड़े आराम से गाती थी पर माऊ जब कहती, बिना गाना गाये सिर्फ़ जनवरी फ़रवरी सुनाओ तब बड़ी मुश्किल होती थी। फिर जनवरी फ़रवरी जोर से गाती और बाकी गाना मुंह ढक के।शुक्र है कि यह गाने बने और मैंने सुने। नहीं तो मैं दिन में पचीस बार ऐलान किया करती थी पढ़ाई छोड़ देने का।


राजमंदिर का शहर


ऐसा होना ही था क्योंकि मैं जिस शहर की हूँ, वो राजमंदिर वाला शहर है। यह जानने के बाद की मैं जयपुर की हूँ, लोग हवामहल का ज़िक्र नहीं करते, बल्कि उत्तेजित होकर पूछते हैं---वही, जहाँ राजमंदिर है? राजमंदिर में मैंने देखी थी...राम लखन। जितनी फिल्में जहाँ भी देखीं, उनमे सबसे ज्यादा याद रहा राजमंदिर का नीला-काला जादू। किसी राजा के महल जैसा राजमंदिर। जयपुर का राजा ही है राजमंदिर। लोग राजमंदिर देखने दूर-दूर से इस तरह से आया करते हैं जैसे किसी धर्मस्थल पर जाते हैं। राजमंदिर की तरह ही याद रह गए जादुई जादूगर अनिल कपूर। मैं कहने लगी थी की दुनिया में सिर्फ़ दो लोगों की मूंछें अच्छी हैं...एक तो पापा की और दूसरी अनिल कपूर की। घर की इलमारियों पर तीन फीट की ऊंचाई पर पोस्टकार्ड साइज़ फोटोग्रैफ और एक बड़ा पोस्टर अनिल कपूर का लगा रखा था। जिसके चेहरे से चेहरा सटाकर मैंने कई तस्वीरें खिंचवाईं।
यूं तो जयपुर सिनेमाहॉलों का ही शहर है। जयपुर में घुसते ही सबसे पहले जलमहल आता है, फिर आमेर और फिर अंबर सिनेमा. एक टाकीज है मानप्रकाश, किसी राजस्थानी राजा जैसा नाम है न...इसके परिसर में किताबघर और दारू की एक दुकान थी. ये दुकान उस शख्स की थी, जिन्होंने शैलेंद्र को आखिरी दारू देने से मना कर दिया था, क्योंकि उनकी परमिट खलास हो चुकी थी. उसी रात शैलेन्द्र नहीं रहे।जब दूकान मालिक को अखबार पढ़कर पता चला किया कि वो शख्स शैलेंद्र थे, तो वे दुकान बंद करके जयपुर चले आए. अब इस बात पर कन्फ्यूजन है कि दुकान दारू की थी या चाय की. जो लोग शैलेंद्र को नजदीक से जानते होंगे, वे समझ लें कि शैलेंद्र को ज्यादा प्रिय क्या रहा होगा, दारू या चाय। वैसे, ये पता लगाना अब और भी मुश्किल है क्योंकि मानप्रकाश बंद हो चुका है और अब वहां मॉल है...पता नहीं कुछ लोगों को अब भी वहां जिंदगी नजर आती हो

तिरछी आंखों से सिनेमाहॉल पर लगे पोस्टर की झलक
जयपुर का लंबाई-चौड़ाई में सबसे बड़ा हॉल था मानप्रकाश का बड़ा भाई प्रेमप्रकाश। जब खलनायक लगी थी, तो फिल्मोनिया के मरीजों की भीड़ इतनी बढ़ी कि मानप्रकाश को गिरा ही देती, इससे पहले उन पर पुलिसवालों के डंडे पड़ गए। एक डंडा हमने भी खाया था। प्रेमप्रकाश अब गोलचा में बदल चुका है और उसका बड़ा स्क्रीन तीन छोटे-छोटे स्क्रीन में बदल चुका है. एक और उल्लेखनीय सिनेमाहॉल है. नाम है पोलोविक्ट्री. इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के बीच चौराहे पर है. आप तो जानते ही होंगे कि बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन कोई अच्छी जगह नहीं होतीं. पोलोविक्ट्री ऐसा सिनेमाहॉल है, जिसके सामने शरीफ लड़कियां नजरें झुकाकर गुजरती थीं. उसके करीब वाले बस स्टैंड के पास से बस नहीं पकड़ती थीं. लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि तिरछी आंखों से सिनेमाहॉल पर लगे पोस्टर की झलक सब देखती होंगी (मैं तो देखती ही थी). मैं घर जाकर अखबार में ढूंढ़कर ये भी देखती थी कि उस फिल्म का नाम क्या है? वैसे, ये सुबह का शुरुआती काम था, जैसे कुछ लोग राशिफल देखते हैं, मैं उसकी जगह सिनेमाहॉल्स के छोटे-छोटे पब्लिसिटी एड देखा करती.


ऐसे ही परवान चढ़ती रही फिल्मों से मोहब्बत
साहित्य से रिश्तों पर बात फिर कभी पर एक वाकया इन दोनों से जुड़ा याद आता है। पापा-मम्मी को तोहफे में देने के लिए एक किताब लाई थी. नाम तो याद नहीं पर कवर पेज पर अनिल कपूर और श्रीदेवी की तस्वीर छपी थी। दोनों बाग में लेटे हुए थे (घर में जगह नहीं मिली होगी बेचारों को), सफेद पैंट और पीली टी-शर्ट पहने हुए. किताब के अंदर बड़े अच्छे गाने थे, वह भी था जो मेरी शुरुआती तालीम (एक-दो-तीन चार वाला गाना) के काम आया. लेकिन किताब लाने पर बड़ी डांट पड़ी. डांट खिलाने वालों को पता नहीं था कि आठ साल की उम्र में साइकिल पर पांच किलोमीटर दूर जाकर किताब लाई थी. सस्ती, सुंदर और टिकाऊ किताब थी, इसमें बुराई क्या थी, ये आज तक समझ में नहीं आया. फिल्मों से मोहब्बत ऐसे ही परवान चढ़ती रही. जयपुर में फिल्मों की शूटिंग होती ही रहती थी. फैंसी ड्रेस का भी जबरदस्त शौक था. दोनों का जिक्र बारी-बारी. पहले फैंसी ड्रेस की बात. जयपुर में बहुत-सी ऐसी दुकानें हैं, जिनमें बड़े-बड़े बोर्ड लगे रहते हैं-यहां से फलां फिल्म के लिए कपड़े ले जाए गए थे. जिस दुकान ने मुगल-ए-आजम के लिए ड्रेस सप्लाई करने का दावा किया था, उससे तो हम कई बार ड्रेस किराए पर लेकर आए. घर पर पहने, खुद को मधुबाला समझा और घर पर यूं तैयार हुई मुगल-ए-आजम.


पहले प्रेमपत्र सा ऑटोग्राफ
बहुत-सारी शूटिंग्स देखी हैं। अक्षय कुमार और ममता कुलकर्णी बिरला मंदिर में शूटिंग करने आए। लाल बादशाह की शूटिंग करने अमिताभ बच्चन आए थे। लेकिन सबसे बेहतरीन पर्सनेलिटी संजय खान की देखी अब तक आमने-सामने। वो टीपू सुल्तान की शूटिंग के लिए सामोद किले में आए थे। टॉम अल्टर, गूफी पेंटल और कितने ही सितारे आए पर संजय जितने गजब लगे, उतना कोई नहीं. मैं सीधे संजय खान के पास पहुंच गई. अब आटोग्राफ किस पर लिया जाए, ये तो पता नहीं था, इसलिए एक रुपये का नोट उनकी ओर बढ़ा दिए. छह रुपये हर हफ्ते पॉकेटमनी के लिए मिलते थे। उसका ही एक रुपया बचा था पास में। यकीन मानिए, पहले प्रेमपत्र की तरह ही वो नोट संभालकर रखा है, खर्च नहीं किया अब तक

अकेली लड़की और सिनेमा

वैसे, फ़िल्म तक जाने वाला रास्ता टेढा-मेढा ऊँचा नीचा न हो तो मजा कहाँआएगा चलने में .....लेकिन इंसानों में भी स्त्री होने पर धचके कुछ ज्यादामिल सकते हैं । इति : ज्यादा मजा । तीसरी कक्षा में होने पर ही जब खानेके समय, सब घर वालो के सामने ऐलान किया, `मैं फिल्मों में हिरोइन बनजाऊं, सोचती हूँ। तब आधे लोगो का तो खाना गले और भोजन नली के बीच ही मेंरुक गया... फिर बताया गया (चूँकि समझा तो सकते नहीं थे ) की हिरोइन बननेके लिए तो बड़ा गोरा होना होता है, तो हमने कहा--ठीक, तो कुछ और काम करलेंगे, कुछ न कुछ तो होता होगा फ़िल्म में करने को । (इस बार उनके खानेके साथ क्या हुआ ओ ही जाने)फिर मैंने सहेलियों की टोली के साथ फ़िल्म देखना जाना शुरू किया, छठीमें ॥बल्कि छठी में ही । लेकिन सब ही लोग सब ही फिल्म देखने के लिए तयारही नहीं होते थे तो एक दिन मैंने सोचा ,"अकेले ही फ़िल्म देखी जाए।सहेलियां पानी पीने भी अकेले नही जाती थी । मै फ़िल्म देखने चली गई ।फ़िल्म थी--हसीना मान जायेगी। बहुत भीड़ थी ... और मुझे अहसास हुआ, मैंसच में अकेली हूँ । कम से कम मेरे शहर में ये क्रांति ही मानी गई और हरक्रांति में डंडे पड़ते होंगे मैंने कुछ (या ज्यादा ) फब्तिया खाईं । देशकी वो जगह भी घूम आई हूँ (अकेले), जो नक्शे में नही मिलती लेकिन अब तकफिर से अकेले फ़िल्म देखने जाने की हिम्मत नही जुटा पायी। ये दिल्ली हैऔर समय १५ साल आगे।लेकिन अब तक और अब के बाद भी नही जुटा पाऊंगी । वोफ़िल्म सब आंखों और फब्तियों के साथ बल्कि उन्हीं की वजह से मुझे भीअच्छी लग गई और अब भी अच्छी लग रही है।

एक और किस्सा...
एक और किस्सा याद आता है। आठ बजे कॉलेज में क्लास लगती थीं. मेरा कॉलेज जिस जगह पर है, वहां से दस मिनट की दूरी किसी भी दिशा में पैदल चल लेने पर एक सिनेमाहॉल आ जाता है...इनमें राजमंदिर, सम्राट, प्रेमप्रकाश, पोलोविक्ट्री, प्रेमप्रकाश, मानप्रकाश सब शामिल हैं। शुक्रवार को नई फिल्म लगती और नौ बजे पहला शो शुरू होता था। (ये रात वाला नौ से बारह नहीं है). सो सुबह आठ-साढ़े आठ बजे हम लोग कॉलेज पहुंचते और फिर फिल्म देखने निकल पड़ते। पूरी की पूरी क्लास गायब हो जाती और गुरुजी खाली दीवारों से बात किया करते। इस हर शुक्रवार को भागकर फिल्में देखने के जुनून में ऐसी-ऐसी फिल्में याद देख डालीं, जिनके नाम-कलाकार-कहानी कुछ भी याद नहीं हैं। हां, कुछ के तो नाम लेने लायक भी नहीं हैं। शुक्रवार को फिल्म देखने के अलावा एक और शगल था. रेडियो पर बाईस्कोप की बातें एक प्रोग्राम आता था. हां, अब भी आता है शाम को चार बजे. उसे सुनने का ऐसा चस्का था कि कई बार थिएटर की रिहर्सल्स छोड़ीं, क्लास ड्रॉप करने का तो मर्ज था ही. बहुत बार फिल्में बाद में देखीं और बाइस्कोप की बातें पहले सुनीं. फिर जो फिल्म देखी, तो वो फीकी-फीकी ही लगी। कितनी बातें लिखूं। मैं बहुत फिल्मी रही हूं. शायद हर फिलमची इतना ही फिल्मी होती है. ये बात सच है कि मैंने बहुत टीवी देखा, बहुत-से नाटक देखे पर फिल्म वाला परदा, अंधेरा हॉल और एक्शन-रोमांस-इमोशन का जादू मुझ पर बाकी सबसे ज्यादा रहा. बाकी सिनेमाई कथा, फिर कभी. पिक्चर सच में अभी बहुत सारी बाकी है मेरे दोस्त.






Saturday, October 25, 2008

फ़िल्म समीक्षा:हीरोज


विषय और भाव से भटकी फिल्म

फौज के चार जवानों और उनके परिवार के सदस्यों की भावनाओं के जरिए समीर कर्णिक ने आज के संदर्भ में देशभक्ति और देश सेवा की याद दिलाई है। इसके लिए उन्होंने कुछ पापुलर स्टार चुने और वे स्टार ही फिल्म के विषय पर भारी पड़ गए। समीर सितारों की लोकप्रियता भुनाने के चक्कर में मूल भाव से भटक गए। दुर्भाग्य की बात है कि हीरोज समेत अपनी तीनों फिल्मों में समीर से समान भूलें हुई हैं।
मोटर साइकिल और हजार किलो मीटर के सफर से माना जा रहा था कि हीरोज चेग्वेरा के जीवन को लेकर बनी मोटरसाइकिल डायरी से प्रभावित होगी। लेकिन, समीर ने बिल्कुल अलग फिल्म बनाई है। विचार नया और अद्भुत है लेकिन उसके फिल्मांकन में उन्होंने सलमान खान और सनी देओल पर कुछ ज्यादा ही ध्यान दे दिया है। अगर वे स्टार के बजाए किरदार पर ध्यान केंद्रित कर चलते तो फिल्म ज्यादा प्रभावकारी होती और अपने विषय व भाव के साथ न्याय कर पाती। सलमान का प्रसंग बेवजह लंबा खींचा गया है। सनी देओल के मुक्के और बहादुरी को दिखाने के लिए भी सीन ठूंसे गए हैं। नतीजा यह हुआ कि हीरोज न तो मसाला फिल्म बन पाई और न ही अपना संदेश ढंग से रख पाई।
समीर और अली लापरवाह व उदंड किस्म के युवक हैं। पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मौज-मस्ती में उनका वक्त गुजरता है। दोनों फिल्म स्कूल के छात्र हैं। उन्हें स्नातक होने के लिए एक फिल्म बनानी है। उन्हें विषय सूझता है - क्यों फौज में भर्ती नहीं हों? उनके पास तर्क है कि फौजी की जिंदगी में सिर्फ मौत और फिर परिजनों की परेशानी होती है। अपने रिसर्च के सिलसिले में वे तीन फौजियों के परिवारों से मिलते हैं तो पाते हैं कि देश के लिए मर-मिटने का जज्बा ही अलग होता है। उनकी समझ में यह भी आता है कि देश सेवा के लिए कंधे पर किसी मेडल की जरूरत नहीं होती। फिल्म के अंत में यही पंक्ति संदेश के तौर पर उभरती है। शायद समीर अपने रिसर्च में यह नहीं समझ पाए कि मेडल कंधे पर नहीं सीने पर लगाए जाते हैं।
कलाकारों की बात करें तो सलमान अलग अंदाज में अच्छे लगे हैं और प्रीटी जिंटा घरेलू महिला की जीवट भूमिका में जंची हैं। दोनों फिल्म का एक तिहाई हिस्सा भर हैं। सनी देओल संयमित भूमिका में ठीक लग रहे थे लेकिन फिर मुक्का चलाने से बाज नहीं आए। डिनो मोरिया और मिथुन चक्रवर्ती का ट्रैक उभर नहीं पाया। फिल्म के नायक सोहेल खान और वत्सल सेठ सामान्य हैं।

Friday, October 24, 2008

दरअसल:क्यों धीरे चलें बच्चन?


-अजय ब्रह्मात्मज

बहुत पहले की बात न करें। पिछले छह महीनों की दिनचर्या ही देख लें, तो अमिताभ बच्चन की व्यस्तता और सक्रियता का अनुमान हो जाएगा। सबूत के लिए उनके ब्लॉग पर जाएं। वहां दिखेगा कि पिछले छह महीनों में ही उन्होंने इस पृथ्वी पर पूर्व से पश्चिम और पश्चिम से पूर्व की कई यात्राएं कीं। कई देशों में गए और अनेक कार्यक्रमों में भी शामिल हुए। अपने परिजन और अन्य स्टारों के साथ अनफारगेटेबल टुअॅर पूरा किया। नई फिल्मों के लिए बैठकें कीं। प्रतिकूल परिस्थितियों और मौसम में फिल्मों की शूटिंग की। 66-67 की उम्र में उनकी यह सक्रियता अचंभित करती है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में देव आनंद को सदाबहार अभिनेता कहा जाता है। ऐसे में अमिताभ बच्चन को सदासक्रिय अभिनेता कहना गलत नहीं होगा।


सारी सुविधाओं और साधन के बावजूद अमिताभ बच्चन नहीं चाहते कि उनकी वजह से किसी और को परेशानी या तकलीफ हो। यही वजह रही होगी कि इस बार जन्मदिन से पहले वाली रात को पेट दर्द होने पर भी वे बर्दाश्त करते रहे। शायद उन्होंने सोचा हो कि दर्द खुद ही कम हो जाएगा और उनके जन्मदिन के अवसर पर एकत्रित हुए परिचितों और शुभचिंतकों की खुशी में खलल नहीं पड़ेगी। जन्मदिन के दिन भी सामान्य दिनचर्या आरंभ हुई। वे अपने प्रशंसकों के अभिवादन के लिए बाहर आने वाले थे, लेकिन पेट का दर्द असहनीय हो गया और आखिरकार उन्हें मेडिकल सहायता भी लेनी पड़ी। पहले नानावटी और फिर लीलावती अस्पताल जाना पड़ा। निश्चित ही इन पंक्तियों के छपने तक वे सकुशल घर लौट आएंगे, लेकिन उपचार के बाद उन्हें विश्राम की आवश्यकता भी होगी। उनके सारे शुभचिंतक मानते हैं कि उन्हें अपनी उम्र का लिहाज करते हुए थोड़ा धीरे चलना चाहिए। उन्हें अपनी सक्रियता कम करनी चाहिए। उन्हें अहसास होना चाहिए कि अब उनमें युवावस्था वाली ऊर्जा नहीं है!


पिछले दिनों एक पत्रकार मित्र ने उन्हें सलाह दी कि उन्हें थोड़ा धीरे चलना चाहिए। उन्होंने पलटकर पूछा, क्यों धीरे चलूं मैं? उनका यह सवाल बताता है कि वे अपनी सक्रियता कम करने के मूड में नहीं हैं। उनके करीबी बताते हैं कि वे सुबह से देर रात तक व्यस्त रहते हैं। ऐसे में उन्हें खुद के साथ समय बिताने या अपने शरीर पर अतिरिक्त ध्यान देने का अवसर ही नहीं मिल पाता। वे इसकी अधिक परवाह नहीं करते। डॉक्टर की सलाह के मुताबिक आवश्यक एक्सरसाइज करने के अलावा, वे उम्र की जरूरत के हिसाब से विश्राम नहीं करते। करीबी बताते हैं कि इन दिनों फुर्सत मिलते ही वे लैपटॉप खोलकर बैठ जाते हैं और अपने ब्लॉग पर नई पोस्ट लिखने या ब्लॉगरों के पत्र पढ़ने और उन्हें जवाब देने में व्यस्त हो जाते हैं। उनकी दिनचर्या में से घंटे-दो घंटे का समय ब्लॉग लेखन और उसकी अपडेटिंग में निकल जाता है। इससे भी मानसिक थकान होती है।

अमिताभ बच्चन 1982 के बड़े आघात के बाद छिटपुट बीमारियों के शिकार होते रहे हैं। किसी आम इनसान की तरह ही उन्हें भी ज्वर, खांसी और अन्य आम बीमारियां होती हैं, फिर भी वे दवाइयों का उपयोग कर अपना काम जारी रखते हैं। अनफारगेटेबल टुअॅर के दौरान भी वे बीमार पड़े थे, लेकिन उन्होंने अपना शो रद्द नहीं किया। उन्होंने शो के टिकट खरीद चुके दर्शकों और प्रशंसकों को निराश नहीं किया, लेकिन उसका असर शरीर पर पड़ा। संभव है, उन दिनों की थकान और शारीरिक पीड़ाएं एकत्रित होकर इस असहनीय स्थिति में पहुंची हों। अभी उनकी तीन फिल्में फ्लोर पर हैं। अलादीन पूरी हो चुकी है, लेकिन जनवरी तक शूबाइट और तीन पत्ती की शूटिंग होनी है। अगले साल उन्होंने बड़े निर्देशकों की बड़ी फिल्मों के लिए हां कह रखा है। संजय लीला भंसाली, राकेश मेहरा, रवि चोपड़ा, प्रीतीश नंदी, डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी और बालाकृष्णन की फिल्में भी आरंभ होनी हैं। इन सभी फिल्मों में उन्हें अलग-अलग भूमिकाएं निभानी हैं। हमें लगता है कि ऐक्टिंग आनंददायक कार्य है, लेकिन ऐक्टिंग की तकलीफ को कोई ऐक्टर ही समझ सकता है। हर भूमिका की अलग डिमांड होती है और उसे पूरा करने में ऐक्टर निचुड़ता है। अमिताभ बच्चन के प्रशंसक के रूप में हम सभी चाहेंगे कि वे जीवनपर्यत सक्रिय रहें, फिल्मों में काम करते रहें, लेकिन वे खुद को भी थोड़ा समय दें। धीरे चलने में क्या बुराई है? पुरानी कहावत भी है कि लंबा चलना है, तो धीरे चलो..।

Thursday, October 23, 2008

हिन्दी टाकीज:सिनेमा देखने चलना है - श्याम दिवाकर

हिन्दी टाकीज-१३
इस बार श्याम दिवाकर ने हिन्दी टाकीज की अगली कड़ी लिखी है.चवन्नी के विशेष आग्रह को उन्होंने स्वीकार किया और बिल्कुल अलग अंदाज़ में यह संस्मरणात्मक लेख लिखा.श्याम दिवाकर पेशे से हिन्दी के प्रोफ़ेसर और स्वभाव से कवि हैं.'इस सदी का प्रेमपत्र' नाम से उनका काव्य संग्रह आ चुका है.उन्होंने छिटपुट कहानियाँ लिखी हैं और यदा-कदा समीक्षात्मक लेख लिखते हैं.उन्होंने ख़ुद जितना लिखा है,उस से ज्यादा लोगों को लिखने के लिए प्रेरित किया है.बिहार के जमालपुर निवासी श्याम दिवाकर फिलहाल आरडीएनडीजे कॉलेज ,मुंगेर में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं।

'सिनेमा' शब्द से मेरा पहला परिचय संभवत: 1958-59 के आसपास हुआ। अक्टूबर का महीना था। मां ने कहा - आज स्कूल नहीं जाना है। स्कूल जाने के लिए कमोबेश रोज डांट खाने वाले के लिए इससे बड़ी खुशी दूसरी हो ही नहींसकती थी। मैं अभी इस आश्चर्य से उबर भी नहीं पाया था कि घर से निकलने की मनाही करते हुए दीदी ने नहा-धोकर तैयार हो जाने का फरमान जारी कर दिया। पता चला आज घर के अधिकांश लोग सिनेमा देखने जाएंगे।
मैं बिहार के मुंगेर जनपद के हवेली खडग़पुर तहसील का निवासी हूं। इस तहसील के अंदर घनी आबादी वाला एक गांव है 'प्रसन्नडो'। ठाकुरों की इस बस्ती में अन्य जातियों के घर खुशियां दबे-छुपे ढंग से आती हैं। पिता की हिदायत के बावजूद कि शोर नहीं सलीके से चलना है, हम उछलते-कूदते घर से निकले थे। गांव से खडग़पुर तक की पांच किलोमीटर की दूरी कैसे तय हो गयी, पता ही नहीं चला। खेत की मेड़ पर चलते हुए हम बच्चों ने धान के दाने को दबा-दबा कर अपने माथे पर टीका लगा लिया था। बीच-बीच में खेत में जमे पानी में झांककर हम देख भी लेते थे कि किसके माथे पर टीका कैसा बना है। हमारी यह यात्रा दिन के तकरीबन दो बजे 'केशरी सिनेमा' के प्रांगण में समाप्त हुई थी।
पर यहां पहुंचकर हमारी खुशी मुरझा गई थी।पता चला कि केवल शनिवार और रविवार को ही तीन, छह एवं नौ - सिनेमा का तीन शो हुआ करता है। बाकी पांच दिनों में मैटिनी शो नहीं होता, सिर्फ इवनिंग और नाइट शो ही होता है। दुर्भाग्य से वह दिन बुधवार था। हम लोग निराश हो घर लौटने ही वाले थे कि माइक से घोषणा होने लगी कि आज मैटिनी का विशेष शो होगा। खबर थी कि सिनेमा मालिक की बेटी मैके आयी है और वह अभी ही सिनेमा देखना चाहती है।
हमारे मुरझाए चेहरे पर रौनक लौट भी नहीं पाई थी कि दूसरी समस्या आ खड़ी हुई - किस क्लास का टिकट लिया जाए। फोर्थ क्लास छह आना, थर्ड क्लास बारह आना, सेकंड क्लास अठारह आना, फस्र्ट क्लास डेढ़ रुपया, रिजर्व क्लास एक रुपया चौदह आना और डीसी दो रुपये चार आना। लेडीज के लिए एक अलग से क्लास था,जिसका टिकट था पांच आना। सेकंड और फस्र्ट क्लास के बीच एक तरफ घेर कर यह क्लास बनाया गया था। औरतें तो लेडीज का टिकट लेकर निश्चिंत हो गयी। पिताजी ने सेकंड क्लास का टिकट लिया। हम बच्चों ने फोर्थ क्लास में बैठने का निर्णय लिया ताकि सब कुछ नजदीक से साफ-साफ दिखे। भैया हमलोगों के साथ रहे। वे हमलोगों के बीच बैठे ताकि हमें बता सकें कि राष्ट्रगान के समय खड़ा होना है। उन्होंने हमें काफी डरा रखा था कि अभी सांप निकलेगा, पैर सीट पर ऊपर कर बैठना।
अंतत: तीन बजकर पन्द्रह मिनट पर लुई बुऩवेल का माया लोक शुरू हुआ। सिनेमा का नाम था 'नागपंचमीÓ। डर का यह आलम था कि हम बच्चे भैया को कसकर पकड़े हुए थे। सबके पैर सीट पर थे। लगता था परदे से निकलकर नाग गोद में आ गिरेगा। भैया ने कहा था, आस्तीक मुनि का नाम लेते रहो, कुछ नहीं होगा। इंटरवल में जब हॉल की बत्ती जली थी तो सबका चेहरा देखने लायक था। इंटरभ्वल में संभवत: सबों ने मूढ़ी मसाला (झाल मूढ़ी) खाया था। मैं इतना डर गया था कि बाकी समय पिता की गोद से उतरा ही नहीं। फिल्म की धुंधली सी तस्वीर आंखों के सामने है पर उसके गीतों की कुछ पंक्तियां आज भी मेरे मानस-पटल पर कौंधती रहती है - 'धरती से गगन तक धुंध उड़े, मेरे पिया गए तो कहां गए' और 'मेरे नाग कहीं जा बसियो रे, मेरे पिया को न डसियो रे'। यह सिनेमा ही मेरे जीवन का पहला सिनेमा क्यों हुआ? संभवत: कृषक सभ्यता और ग्राम्य जीवन का सांपों से अटूट संबंध ही इसका कारण रहा हो।
दूसरी फिल्म मैंने उसी सिनेमा हॉल में 1965 में देखी। अशोक कुमार, लीला चिटणीस की 'अछूत कन्या' । 'मैं बन कर पंछी वन-वन घूमूं रे' यह गीत उस समय बेकार लगा था, पर आज इसका दर्द मैं समझता हूं।
1967 का मार्च महीना, जब मैंने तीसरी फिल्म देखी। मैट्रिक बोर्ड की परीक्षा समाप्त हो चुकी थी। परीक्षा केन्द्र जिला मुख्यालय था। मुंगेर का 'नीलम टॉकीज' नामवर सिनेमा हॉल था। संभवत: वह इस जनपद का पहला हॉल था,जिसमें दो प्रोजेक्टर थे और रील बदलने के लिए बीच में फिल्म रोकनी नहीं पड़ती थी। यहां एक नये क्लास से मेरा साबका पड़ा था जिसे बी सी कहा जाता था। खडग़पुर के सिनेमा हॉल के सभी क्लास नीचे थे, पर यहां बीसी और डीसी दोनों ऊपर थे। बीसी तीन रुपये पच्चीस पैसे और डी सी तीन रुपये पचहत्तर पैसे। टिकट लेने की जिम्मेदारी मजबूत कद-काठी वाले शिवकुमार सिंह ने इस शत्र्त पर उठायी थी कि उसके टिकट का पैसा हमलोग देंगे। ( यदि जनपदीय सिनेमा से आपका साबका नहीं तो टिकट लेने के जद्दोजहद को आप नहीं समझ सकते।) फिल्म थी 'नया दौर'। दिलीप कुमार-वैजयंती माला अभिनीत इस फिल्म ने हमारे किशोर मन को प्रभावित किया था। 'रेशमी सलवार कुर्ता जाली का, रूप कहा न जाए नखरे वाली का', 'ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का, इस देश का यारों क्या कहना'। इन गीतों में बंधा मन बहुत दिनों तक भटका था।
1969 के बाद ग्रामीण परिवेश से नाता लगभग टूट सा गया। प्री बोर्ड में नामांकन के लिए रांची आया हुआ था। यहां मैंने एक ऐसी फिल्म देखी जिसकी याद आज भी ज्यों-की-त्यों है। बलराज साहनी-पांडरा बाई अभिनीत फिल्म थी 'भाभी'। 'चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना, यहां न तेरा संगी-साथी, यहां न तेरा ठिकाना' ये पंक्तियां मुझे आज भी बेचैन करती हैं। संयुक्त परिवार के तनाव और त्याग की कसमकस ने मुझे आज भी उलझाए रखा है।
पारिवारिक माहौल में देखी गयी मेरी अंतिम फिल्म है ' जय संतोषी मां'। अंतिम इसलिए कि इसके बाद नौकरी के साथ परिवार के सभी सदस्यों ने एक साथ कोई फिल्म नहीं देखी। जमालपुर के रेलवे सिनेमा का हॉल, हॉल के बाहर संतोषी माता की आदम कद प्रतिमा। प्रतिमा के पास बताये लड्डू की दुकान। सभी बच्चों को हिदायत थी कि एक-एक रुपये का प्रसाद इंटरवल में संतोषी मां को चढ़ाना है। पड़ोस का एक परिवार भी हमलोगों के साथ। उनके साथ उनका पांच-छह वर्षीय पुत्र पंकज भी था। सभी बच्चों ने प्रसाद चढ़ाया, पर वह अपना लोभ संवरण नहीं कर पाया। अपने दोने के बताशे को चढ़ाने के पहले ही उसने खा लिया। फलत: उसकी जमकर पिटायी हो गई। उसका रोदन और उसकी मां का गले में आंचल डाल संतोषी मां से बार-बार की गई क्षमा याचना, दोनों बिम्बों का अक्स आज भी ताजा है।
बाद के वर्षों में मैंने कितनी फिल्में देखी उसका लेखा-जोखा देना असंभव सा है। पर कुछ फिल्में कुछ खास कारणों से याद रह गयी हैं उसका जिक्र करना चाहूंगा। 'जिस देश में गंगा बहती है' (धुआंधार वाटरफॉल के कारण) 'आन' (प्रथम टेकनीकलर फिल्म), 'आर पार' (र्डेजी इरानी की पहली फिल्म), 'आलम आरा' (पहली बोलती फिल्म), 'हकीकत' (चीनी आक्रमण) जैसी फिल्में कोष्ठक में दिए गए कारणों से खास कर देखी गयीं। इसी तरह की एक और फिल्म 'दाग' जिसमें दिलीप कुमार और निम्मी को प्रथम फिल्मफेअर अवार्ड दिया गया था। 'महल' और 'गुमनाम' भी मेरी पसंदीदा फिल्म है। प्रेम-संबंधों पर आधारित 'मुगलेआजम', 'देवदास', 'मेला' और 'बॉबी' ऐसी फिल्में हैं,जो अलग-अलग कारणों से महत्वपूर्ण हैं। 'मेला' संभवत: पहली ऐसी फिल्म है,जिसमें समाज की बेरूखी से तंग आकर नायक-नायिका दोनों ने आत्महत्या कर ली थी। प्रेम के प्रति समाज की बेरूखी और बेरूखी के कारणों-स्तरों को समझना हो तो इन चारों फिल्मों को अवश्य देखना चाहिए।
सिनेमा ने आज काफी तरक्की कर लिया है। पर सिनेमा से मिलने वाला मजा कम हो गया है। वह मूंगफली, वह झाल-मूढ़ी, वह पापड़, वह आइसक्रीम, दोस्तों के साथ वह धौल-धप्पड़ कहां है आज। कहां है सिनेमा देखने की महीनों की वह तैयारी। प्रचार विभाग के परदे पर गांवों में दिखाए जाने से लेकर सिनेमा आज मल्टीप्लेक्स के रेड लाउंज तक आ पहुंचा है, पर कहां है वह उत्साह, जो 'सिनेमा देखने चलना है' से होता था।

Wednesday, October 22, 2008

गजनी में गजब ढाएंगे आमिर खान

-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले साल 'तारे जमीन पर' में दर्शकों ने आमिर खान को निकुंभ सर की सीधी-सादी भूमिका में देखा था। अब 'गजनी' में वे हैरतअंगेज एक्शन करते नजर आएंगे। गजनी के लिए उनके माथे पर कटे का निशान तो सभी ने देख रखा है। लेकिन, उनकी बाडी के बारे में किसी को पता नहीं था। 'गजनी' में आमिर उभरे 'बाइसेप्स' और 'शोल्डर्स' के साथ दर्शकों के सामने होंगे।
दैनिक जागरण से खास बातचीत में आमिर ने नए लुक और 'गजनी' के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा, 'मैं लंबे अंतराल के बाद एक्शन फिल्म कर रहा हूं। फिल्म के निर्देशक मुरुगदास ने मुझे सलाह दी थी कि एक्शन हीरो होने के नाते मैं अपनी बाडी बनाऊं। ऐसी बाडी बनाने में डेढ़-दो साल लगते हैं।' आमिर ने कहा, 'मैंने तारे जमीन पर के पोस्ट प्रोडक्शन के समय से ही अपने शरीर पर काम शुरू कर दिया था। उन दिनों रोजाना तीन-चार घंटे की एक्सरसाइज के बाद मैं थक कर चूर हो जाता था। लेकिन, फिल्म के लिए यह करना जरूरी था।'
आमिर ने कहा, 'फिर मुझे दुनिया की नजरों से भी इस बाडी को छिपा कर रखना था। मैं उन दिनों ऐसे कपड़े पहनता था कि कोई भांप न सके।' उल्लेखनीय है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आमिर ने ही फिल्म के किरदार के हिसाब से लुक तैयार करने की परंपरा डाली। 'लगान', 'दिल चाहता है', 'मंगल पांडे', 'रंग दे बसंती', 'फना', 'तारे जमीन पर' और अब 'गजनी' में दर्शक उन्हें अलग लुक में देखेंगे।
हर फिल्म के साथ लुक बदलने के बारे में आमिर ने कहा, 'मैं इसे बहुत जरूरी मानता हूं। मुझे लगता है कि लुक अपनाने के बाद आप किरदार को जीने लगते हैं। मैं अपनी फिल्मों में जो किरदार निभाता हूं, वैसा ही महसूस करने लगता हूं। हालांकि यह थकान और तकलीफ से भरी प्रक्रिया होती है। लेकिन, जब दर्शक मेरी फिल्मों की सराहना करते हैं तो सब वसूल हो जाता है।'
'गजनी' तमिल में इसी नाम से बनी फिल्म का रीमेक है। इसे तमिल फिल्म के निर्देशक ए आर मुरुगदास ने ही निर्देशित किया है। गजनी में आमिर के साथ दक्षिण की हाट अभिनेत्री आसिन और जिया खान हैं। 'तारे जमीन पर' की रिलीज के पूरे एक साल के बाद इस साल क्रिसमस के मौके पर 'गजनी' रिलीज होगी।

Monday, October 20, 2008

इंसानी वजूद का अर्थ तलाशती है ट्रेजडी-महेश भट्ट


ट्रेजडी इन दिनों फैशन में नहीं है। आप हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में किसी को दिल तोडने वाली और आत्मा को झिंझोड देने वाली दुख भरी कहानी सुनाएं तो वह हालिया बरसों में दर्शकों की बदल चुकी रुचि के संबंध में भाषण दे देगा। एक चैनल के सीनियर मार्केटिंग हेड पिछले दिनों मेरी नई फिल्म जन्नत की रिलीज की रणनीति तय करने आए। उन्होंने समझाया, हमारे दर्शकों में बडी संख्या युवकों की है और उनकी रुचि मस्ती में रहती है। कृपया उन्हें उदासी न परोसें। उनसे उम्मीद न करें कि वे ऐसी कहानियों को लपक लेंगे।
इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन दिनों मीडिया में हर कोई केवल फील गुड प्रोडक्ट के उत्पादन में लगा है। 2007 में पार्टनर, हे बेबी और वेलकम जैसी निरर्थक फिल्मों की कमाई ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड दिए। मुझे तो ट्रेजडी पर लिखने का यह भी एक बडा कारण लगता है।
ट्रेजडी की परिभाषा
मैंने 24 साल के अपने बेटे राहुल से सुबह वर्कआउट के समय पूछा, ट्रेजडी के बारे में सोचने पर तुम्हारे जहन में क्या खयाल आता है? मरने के लंबे आंसू भरे दृश्य, कानफाडू पा‌र्श्व संगीत और कभी-कभी घटिया एक्टिग. कुछ देर सोचकर उसने जवाब दिया। उसके जवाब ने मुझे सोचने पर मजबूर किया। सच यह है कि मैंने कभी अलग से ट्रेजडी पर नहीं सोचा। गंभीरता से सोचा तो पाया कि ट्रेजडी नाटक का वह रूप है, जिसमें सभी गंभीर मानवीय क्रियाओं और मुद्दों की बातें होती हैं। यह नैतिकता पर प्रश्न उठाती है, मानव अस्तित्व का अर्थ तलाशती है, आपसी रिश्तों एवं मनुष्य से ईश्वर के संबंध पर प्रश्न करती है। ट्रेजडी के अंत में या तो मुख्य पात्र की मृत्यु हो जाती है या उसका कोई प्रिय मर जाता है।
ट्रेजडी का प्रभाव
भारत के दोनों महाकाव्य रामायण-महाभारत ट्रेजडी हैं। इसलिए हम भारतीयों की चेतना में ट्रेजडी का गहरा असर है। चूंकि ज्यादातर कहानीकार मानते हैं कि अपने मिथकों की सीमा पार करना उनके लिए असंभव है, इसलिए यह मान लेना अनुचित नहीं होगा कि हिंदी फिल्मों की बडी ट्रेजडी फिल्में अचेतन रूप से लेखकों के दिमाग से रूपायित हुई हैं, संक्षेप में दोनों महाकाव्यों से प्रेरित और प्रभावित हैं। यादों के समंदर में गोते लगाने पर मैं पाता हूं कि मेरी जिंदगी की सबसे बडी ट्रेजडी फिल्म मदर इंडिया रही है। एक ग्रामीण औरत की असाधारण परीक्षा की असाधारण कहानी हमारे पूर्वज और देश की सांस्कृतिक आकांक्षा को व्यक्त करती है। आश्चर्य नहीं कि यह फिल्म गुजरात के नवसारी गांव से आए एक सरल व्यक्ति महबूब खान ने बनाई। उन्होंने न केवल देश के दिल-ओ-दिमाग को झिंझोडा, बल्कि एकेडमी एवार्ड के निर्णायकों को भी प्रभावित किया। एकेडमी अवार्ड के लिए विदेशी भाषा श्रेणी में नामांकित हुई भारत की पहली फिल्म थी मदर इंडिया। अंतिम दृश्यों में नरगिस दत्त गलत राह पर जा रहे अपने बेटे सुनील दत्त को गोली मारती है और फिर उसे सीने से लगाकर चीखती है। वह दृश्य मैं आज भी नहीं भूल पाया। फिल्म का संदेश था कि सामाजिक नियमों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता, जिगर के टुकडे ऐसा करें तो उन्हें समुचित सजा मिलनी चाहिए। मदर इंडिया में मां बेटे को यह सजा देती है। मैं इसे ट्रेजडी मानता हूं।
ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार
फिल्म गंगा जमुना में इसी फिल्म की नकल की गई। कहते हैं कि दिलीप कुमार ने ही इसका निर्देशन किया था। फिल्म ने कमाल दिखाया। अंतिम दृश्य में गंगा बने दिलीप कुमार कृष्ण भगवान की मूर्ति के सामने अंतिम सांस लेते हुए हे राम कह रहे हैं और पा‌र्श्व में अंतिम संस्कार के संस्कृत श्लोक पढे जा रहे हैं। इससे ज्यादा हृदयविदारक दृश्य नहीं हो सकता। इन दृश्यों की जडें भारतीय मानस में गहरे तक हैं। दिलीप कुमार भारत के सबसे बडे फिल्म आइकॉन अपनी दुखांत (ट्रैजिक) फिल्मों के कामयाबी से ही बने और संवरे। लगभग हर दूसरी फिल्म में या उनकी प्रेमिका या पत्नी मर जाती थी या वे मर जाते थे। फिल्मों में उनका प्यार कभी पूर्णता तक नहीं पहुंचता था। उन फिल्मों के कारण ही उन्हें ट्रेजडी किंग की उपाधि मिली। बाबुल में उनकी प्रेमिका (मुनव्वर सुल्ताना) की शादी किसी और से होती है और जो औरत (नरगिस) उन्हें प्यार करती है, उसे मौत छीन लेती है। जोगन में भी ऐसा ही है। दीदार में उन्होंने एक अंधे व्यक्ति का किरदार निभाया, जिसकी आंखों की रोशनी लौटती है तो वह अंधा होने का नाटक करता है, क्योंकि उसकी बचपन की प्रेमिका की शादी आंखों के डॉक्टर (अशोक कुमार) से हो चुकी है। दिलीप ऐसी भूमिकाएं पसंद करते थे, जो दर्शकों को भावनात्मक उद्वेलन दे। उनकी निजी जिंदगी पर इन भूमिकाओं का ऐसा असर पडा कि वास्तविक जिंदगी में भी वे दुखी रहने लगे। दो साल पहले ब्रैडफोर्ड के बाइट द मैंगो फिल्म फेस्टिवल के दौरान उन्होंने बताया कि आखिरकार मुझे लंदन के एक साइकेट्रिस्ट की मदद लेनी पडी। उसकी सलाह पर ही मैंने कोहिनूर जैसी हलकी-फुलकी फिल्म स्वीकार की। मैं दुख के जिस भंवर में फंसा था, उससे निकलने का यही एक रास्ता था।
बिग बी की ट्रैजिक भूमिकाएं
हृषिकेष मुखर्जी की सत्यकाम में बेईमान दुनिया में एक ईमानदार व्यक्ति का सही चित्रण किया गया था। फिल्म में धर्मेद्र का दर्दनाक अंत होता है। उन्हें गले का कैंसर हो जाता है और वे अपने दादा अशोक कुमार से कोई बात नहीं कर पा रहे हैं, जो उनसे अपनी गलती की माफी मांगने आए हैं। सातवें दशक के अंतिम वर्षो में बनी वह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली, लेकिन यह हृषि दा की श्रेष्ठ फिल्म है। आठवें दशक में यश चोपडा और सलीम-जावेद ने दीवार से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इसका ढांचा गंगा जमुना से लिया गया था। दीवार के अंतिम दृश्य में भी दर्शक रोते हैं और फिल्म के अभिनेता अमिताभ बच्चन को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का नया सुपर स्टार बना देते हैं। इस ट्रेजडी ने ही उन्हें बडे अभिनेताओं की श्रेणी में खडा किया। आप किसी से भी अमिताभ की श्रेष्ठ फिल्म के बारे में पूछें, उसमें इस ट्रेजडी को सबसे ऊपर पाएंगे। रमेश सिप्पी की शक्ति दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन साथ आए थे। इसका लेखन सलीम-जावेद ने किया था और फिल्म की कहानी में कमियां थीं। लेकिन फिल्म के ट्रैजिक दृश्य यादगार हैं। राखी (अमिताभ की मां) की मौत के बाद शोक मनाने आए बाप-बेटे के बीच का खामोश दृश्य आज भी बहुत कुछ कहता है।
दुख भरी कहानियां
अपनी फिल्मों में मुझे नाम और काश दो ट्रेजडी फिल्में लगती हैं। नाम मेरी पहली हिट फिल्म थी। इसमें एक ऐसे परिवार की दुख भरी कहानी थी, जो अपराध के रास्ते पर निकल चुके बेटे के साथ तालमेल बिठाने का चित्रण करती है। बेटा विदेश में एक दर्दनाक अंत का शिकार होता है। नौवें दशक के मध्य में बनी इस फिल्म का लेखन सलीम खान ने किया था। नाम से संजय दत्त का कैरियर चमका, जो नशामुक्ति का इलाज करवा कर अमेरिका से लौटे थे। इस फिल्म से वे रातोरात स्टार बन गए। लोगों को नाम इसी अंतिम दृश्य के कारण याद आती है। ट्रेजडी का आकर्षण ही ऐसा है। काश अच्छी फिल्म थी, लेकिन नहीं चली। उसकी वजह थी कि फिल्म की कहानी और ट्रीटमेंट को दर्शकों ने सच के करीब पाया। फिल्म में जैकी श्रॉफ, डिंपल कपाडिया, अनुपम खेर और बाल कलाकार मकरंद थे। काश एक बुझते सितारे की कहानी थी, जिसे उसकी बीवी ने छोड दिया और जो अपने मरते बच्चे की तीन ख्वाहिशें पूरी करना चाहता है। दो इच्छाएं तो पूरी कर देता है, लेकिन तीसरी इच्छा.. मरने के बजाय जीवित रहने की इच्छा वह पूरी नहीं कर पाता। जीवन, प्रेम और मृत्यु की इस फिल्म में जैकी को एक्टर के तौर पर पहचाना गया और डिंपल कपाडिया को योग्य अभिनेत्री समझा गया। फिल्म की विफलता से मैंने महसूस किया था कि दर्शकों की रुचि बदल रही है। उसी के बाद मैंने आशिकी, दिल है कि मानता नहीं और सडक जैसी फिल्में बनाई। इन फिल्मों के कथ्य के बारे में क्या कहूं?
जिन्हें लोकप्रिय बनाया ट्रेजडी ने
मनोरंजन जगत में आज का माहौल ट्रेजडी फिल्मों के अनुकूल नहीं है। लेकिन अगर आप फिल्म स्टारों और सफल फिल्मों को करीब से देखें तो पाएंगे कि उनके नाम और लोकप्रियता में ट्रेजडी का कितना बडा योगदान रहा है। देवदास के बगैर दिलीप कुमार कहां होते? दीवार और शक्ति के बगैर अमिताभ बच्चन की कल्पना कर सकते हैं क्या? नाम के बगैर मैं और संजय दत्त नहीं होते। अगर हिंदी फिल्मों ने ट्रेजडी से मुंह मोड लिया तो वह सबसे बडी ट्रेजडी होगी।

Sunday, October 19, 2008

अहंकार नहीं है सनी में -संजय चौहान


फिल्म धूप से मशहूर हुए संजय चौहान ने सनी देओल के लिए कई फिल्में लिखी हैं। सनी के जन्मदिन (19 अक्टूबर) पर संजय बता रहे हैं उनके बारे में॥

सनी देओल से मिलने के पहले उनके बारे में मेरे मन में अनेक बातें थीं। दरअसल, मीडिया और लोगों की बातों से ऐसा लगा था। उनसे मेरी पहली मुलाकात बिग ब्रदर के समय हुई। फिल्म के निर्देशक गुड्डू धनोवा के साथ मैं उनसे मिलने गया था। पुरानी बातों की वजह से सनी केबारे में मैंने धारणाएं बना ली थीं। औरों की तरह मैं भी मानता था कि वे गुस्सैल और तुनकमिजाज होंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पहली मुलाकात में ही वे मुझे बहुत मृदु स्वभाव के लगे। यह सच है कि वे बहुत मिलनसार नहीं हैं, क्योंकि वे शर्मीले स्वभाव के हैं। दूसरे, उनके बारे में मशहूर है कि वे सेट पर समय से नहीं आते हैं। मैंने बिग ब्रदर की शूटिंग के दौरान पाया कि वे हर स्थिति में बिल्कुल समय से सेट पर आ जाते थे। फिल्म की शूटिंग के दौरान मैंने पाया कि वे काम के समय ज्यादा लोगों से नहीं मिलते। अपना काम किया, शॉट दिया और अपने स्थान पर चले गए। वैसे, मैंने यह भी कभी नहीं देखा कि उन्होंने सेट पर आए किसी मेहमान को झिड़क दिया हो या किसी ने ऑटोग्राफ या फोटोग्राफ के लिए रिक्वेस्ट की हो, तो उसे नखरे दिखाए हों। उनकी प्यारी मुस्कराहट सिर्फ पर्दे पर ही नहीं, वास्तविक जिंदगी में भी आपका दिल जीत लेती है।
बाद में गुलाबी और गुरुदक्षिणा लिखते समय उन्हें और करीब से देखने-समझने का मौका मुझे मिला। ये दोनों फिल्में अभी नहीं बनी हैं। मैं बताना चाहूंगा कि वे सिर्फ अपने किरदार या भूमिका के बारे में ही नहीं सोचते हैं, बल्कि वे दूसरे किरदारों में भी दिलचस्पी उतनी ही लेते हैं। फिल्म के खलनायक या दूसरे चरित्रों के प्रति भी वे उतने ही शिद्दत से सोचते हैं। गुरुदक्षिणा के एक लंबे दृश्य के अंत में उन्हें केवल दो संवाद बोलने हैं। उन्होंने यह पूछा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं कम बोल रहा हूं। जैसे ही उन्हें उनके दो संवाद के महत्व के बारे में बताया गया, उन्होंने थोड़ी देर सोचा और कहा दैट्स कैरेक्ट। ज्यादातर ऐक्टर में यह गुण नहीं पाया जाता, क्योंकि ज्यादातर ऐक्टर अपने रोल और सीन को लेकर परेशान रहते हैं। मैं कहूंगा कि उन्हें स्क्रिप्ट की अच्छी समझ है। सच तो यह है कि वे उसे डिटेल में समझते हैं। हालांकि उनकी फिल्में देखते समय इसका अहसास नहीं होता है। उनके बारे में यह गलत धारणा बन गई है कि वे अपने रोल पर अधिक ध्यान नहीं देते, लेकिन मेरा मानना है कि रोल को लेकर उनकी समझ जबरदस्त है। फिल्म करते समय अगर आप उनकी समझ या सोच से सहमत नहीं हैं और तार्किक तरीके से उन्हें बताते हैं, तो वे अपनी सोच और राय बदलने के लिए तैयार जो जाते हैं। यह बड़ी बात है। उनमें रत्ती भर भी अहंकार नहीं है। वे पूरी फिल्म के बारे में सोचते हैं।
शायद कम लोग ही जानते हैं कि सनी बहुत ही टेक्नोसेवी भी हैं। घड़ी, कंप्यूटर और कार के बारे में उन्हें नई जानकारी रहती है। वे लोगों से इस बारे में घंटों बातें कर सकते हैं। उनके लैपटॉप में सारे नए सॉफ्टवेयर और प्रोग्राम मौजूद मिलेंगे और वे उनका इस्तेमाल किसी सिद्धहस्त जानकार की तरह करते हैं। मैं उनके व्यक्तित्व के एक पहलू के बारे में बताना चाहूंगा। लोगों ने कुछ फिल्मों में उन्हें दाढ़ी के साथ देखा होगा। क्या लोगों को मालूम है कि उन सभी फिल्मों में उनकी असली दाढ़ी थी। उन फिल्मों के लिए वे दाढ़ी बढ़ाते हैं। वे कभी नकली दाढ़ी नहीं लगाते। उनका मानना है कि चाहे जितने अच्छे तरीके से दाढ़ी चिपकाई जाए, वे दिख जाती हैं और फिर आपकी दाढ़ी नहीं है, तो उसका असर चेहरे के एक्सप्रेशन पर पड़ता है। सच तो यह है कि अपने रोल के प्रति ऐसा समर्पण कम कलाकारों में दिखता है। हां, सनी में एक कमी है। वे मीडिया प्रेमी नहीं माने जाते। शायद यह देओल परिवार में है। इन दिनों ऐक्टर जिस प्रकार मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, वैसा सनी नहीं करते। उनमें बेसिक ईमानदारी है। वे कहते हैं कि हमें काम करना चाहिए, क्योंकि काम बोलता है। मुझे लगता है कि उन्हें इस तरफ ध्यान देना चाहिए। चूंकि वे अपनी तरफ से कोई सफाई नहीं देते और न ही खुद के बारे में आक्रामक तरीके से बताते हैं, इसलिए उनके बारे में बन चुकी धारणाएं खत्म नहीं हो पातीं!
काम में उनकी संलग्नता ऐसी रहती है कि वे सुबह छह बजे भी आपको तरोताजा मिलेंगे और पूरी भागीदारी के साथ बातचीत करेंगे। मैंने अभी उनके लिए राइट या रॉन्ग लिखी है। इसमें सनी बिल्कुल नए अंदाज में दिखेंगे। ऐसे रोल में लोगों ने उन्हें पहले कभी नहीं देखा है।

Saturday, October 18, 2008

फ़िल्म समीक्षा:कर्ज्ज्ज्ज़


पुरानी कर्ज से कमतर

-अजय ब्रह्मात्मज

सतीश कौशिक रीमेक फिल्मों के उस्ताद हैं। ताजा कोशिश में उन्होंने सुभाष घई की कर्ज को हिमेश रेशमिया के साथ पेश किया है। कहानी के क्लाइमेक्स से पहले के ड्रामा में कुछ बदलाव है। 28 साल के बाद बनी फिल्म के किरदारों में केवल बाहरी परिवर्तन किए गए हैं उनके स्वभाव और कहानी के सार में कोई बदलाव नहीं है।
सतीश कौशिक और हिमेश ने हमेशा विनम्रता से स्वीकार किया है कि दोनों ही सुभाष घई व ऋषि कपूर की तुलना में कमतर हैं। पुनर्जन्म की इस कहानी में छल, कपट, प्रेम, विद्वेष और बदले की भावना पर जोर दिया गया है। यह शुद्ध मसाला फिल्म है। 25-30 वर्ष पहले ऐसी फिल्में दर्शक खूब पसंद करते थे। ऐसे दर्शक आज भी हैं। निश्चित ही उनके बीच कर्ज पसंद की जाएगी। फिल्म का संगीत, हिमेश की एनर्जी और उर्मिला मातोंडकर का सधा निगेटिव अंदाज इसे रोचक बनाए रखता है। यह हिंसात्मक बदले से अधिक भावनात्मक बदले की कहानी है।
पुरानी कर्ज की तरह यह कर्ज भी संगीत प्रधान है। हिमेश ने पुराने संगीत को रखते हुए अपनी तरफ से नई धुनें जोड़ी हैं। धुनें मधुर लगती हैं लेकिन उनके साथ पिरोए शब्द चुभते हैं। तंदूरी नाइट्स जैसे गीत में गीतकार की सीमा नजर आती है। पुरानी कर्ज में शब्दों और धुन का मधुर गठजोड़ था। हां, हिमेश के अभिनय पर बात नहीं की जा सकती। वे अपनी फिल्मों में किरदार को खूबसूरती से परफार्मर के रूप में पेश करते हैं। गाने और उनकी परफार्मेस से दर्शक मुग्ध रहते हैं। लेकिन, फिल्म के नाटकीय दृश्यों में अभिनेता हिमेश की कलई खुलने लगती है। सतीश कौशिक ने उन्हें बचाने की भरसक कोशिश की है और हिमेश की सीमाओं का खयाल रखते हुए कैमरा एंगल व सीन तैयार किए हैं। हमेशा की तरह डैनी छोटी भूमिका में भी प्रभावित करते हैं। साधारण किरदारों को भी पहचान देना उनकी खासियत है। नई अभिनेत्री श्वेता कुमार की एंट्री आकर्षक है। उन्हें काजोल का लुक देने का प्रयास किया गया है। बाद में उस किरदार को सही तरीके से विकसित नहीं किया गया। हां, उर्मिला मातोंडकर कामिनी की निगेटिव भूमिका में जंचती हैं। अन्य कलाकारों में राज बब्बर और हिमानी शिवपुरी साधारण हैं। मां की भूमिका में रोहिणी हटंगड़ी के हिस्से ज्यादा कुछ था ही नहीं।

Friday, October 17, 2008

दरअसल: नया आइटम है अंडरवाटर शूटिंग

-अजय ब्रह्मात्मज
नवीनता के लिए तरस रही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को अंडरवाटर शूटिंग का नया आइटम मिल गया है। दरअसल, फिल्मों का आकर्षण बढ़ाने और दर्शकों को नए तरीकों से लुभाने की कोशिश में लगे निर्देशक इन दिनों अंडरवाटर शूटिंग पर जोर दे रहे हैं। दो हफ्ते पहले रिलीज हुई दोनों ही फिल्मों द्रोण और किडनैप में अंडरवाटर दृश्य थे। इसीलिए अब ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले समय में फिल्मों में अंडरवाटर दृश्यों की अवधि बढ़ेगी। सूचना मिली है कि अष्टविनायक की एंथनी डी-सूजा निर्देशित फिल्म ब्लू में भी एक गाने की अंडरवाटर शूटिंग की जा रही है। इस गाने में संजय दत्त, अक्षय कुमार, जाएद खान, लारा दत्ता और कैटरीना कैफ पानी में नृत्य करते नजर आएंगे। निश्चित ही निर्देशक ने खुद के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर ली है, लेकिन यकीन मानें ब्लू का अंडरवाटर गीत फिल्म का मुख्य आकर्षण होगा। सिर्फ अंडरवाटर गीत देखने के लिए ही दर्शक फिल्म देख सकते हैं।
पानी से निर्देशकों का पुराना लगाव रहा है। झरना, झील, तालाब, नदी और समुद्र जैसे प्राकृतिक जल स्रोतों का उपयोग लंबे समय से होता रहा है। वास्तव में, मनुष्य के जीवन की कल्पना पानी के बगैर नहीं की जा सकती! अगर निर्देशक जीवन दिखाएंगे, तो जल स्रोतों का चित्रण लाजिमी है। राज कपूर जैसे निर्देशक के बारे में कहा जाता है कि वे झरने, झील या किसी और तरीके से हीरोइन को भिगोए बिना अपनी फिल्म पूरी नहीं करते थे। चूंकि हिंदी फिल्मों में उन दिनों अंग प्रदर्शन को सेंसर और समाज की खुली स्वीकृति नहीं मिली थी, इसलिए निर्माता-निर्देशक हीरोइनों को भिगोकर उनकी देहयष्टि दिखाते थे। दर्शकों की उत्तेजना के लिए तब वैसे दृश्य भी काफी होते थे। फिर एक दौर आया, जब स्विमिंग पुल में हीरोइनों की डुबकी आवश्यक हो गई थी। पंचसितारा होटल में हीरोइन स्विमिंग पुल में छलांग लगाती थी और तैरते हुए दूसरे किनारे पर आ जाती थी। ऐसे दृश्यों में कभी-कभी निर्देशक हीरोइन के तैरने का अंडरवाटर सीन भी लेते थे। फिर हीरोइन बाहर निकलकर बाल झटकती थी और रोएंदार तौलिए में बदन को लपेट रही होती थी, तो हीरो आ जाता था। आम दर्शकों के दिमाग में ये दृश्य ऐसे बैठे हुए हैं कि कभी कोई लड़की स्विमिंग पुल से निकल कर बाल न झटके, तो अजीब-सा लग सकता है!
हाल में अनुराग बसु की फिल्म गैंगस्टर इस वजह से भी चर्चित हुई थी कि उसमें इमरान हाशमी और कंगना राणावत के अंडरवाटर किसिंग सीन थे। इसी प्रकार थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक में अमीषा पटेल के अंडरवाटर दृश्यों को खबरों में रखा गया। अंडरवाटर दृश्यों के पीछे निर्देशकों का एकमात्र उद्देश्य हीरोइन की काया को स्लो मोशन में दिखाना रहता है। पानी के अंदर की झिलमिलाहट ऐसे दृश्यों में विशेष आकर्षण पैदा करती है। इसके अलावा, अंडरवाटर ऐक्शन दृश्यों से भी निर्देशक दर्शकों को लुभाते रहे हैं। नमक हलाल में एक सिक्वेंस ही अंडरवाटर था, जहां अमिताभ बच्चन पानी के अंदर जाकर शशि कपूर के दुश्मनों को मारते हैं। शान के अंडरवाटर ऐक्शन दृश्य भी याद किए जा सकते हैं। इससे पहले की फिल्म फकीरा का क्लाइमेक्स सीन भी याद करने लायक है, जिसमें फकीरा यानी शशि कपूर सांस रोके पानी में बैठा है, जिसे उसकेभाई तूफान यानी डैनी ने बड़े पत्थर से बांधकर पानी में फेंक दिया है। बाद में तूफान ही फकीरा को पानी से निकालता है।
कहते हैं अनमोल मोती में जीतेन्द्र और बबीता के ऊपर अंडरवाटर दृश्य पहली बार फिल्माए गए थे। उसके बाद यह सिलसिला जोर तो नहीं पकड़ सका, लेकिन निर्देशक स्विमिंग पुल और स्विमिंग कॉस्ट्यूम का उपयोग करते रहे। अब बिकनी आम हो रही है। हिंदी फिल्मों की शायद ही कोई हीरोइन बची होगी, जिसने किसी न किसी फिल्म में स्विमिंग कॉस्ट्यूम नहीं पहना हो! वे इसे जरूरी भी मानती हैं, क्योंकि इससे उनकी सेक्स अपील बढ़ती है। ना-ना करने के बावजूद प्रियंका चोपड़ा ने दोस्ताना में बिकनी पहन ही ली है। अंडरवाटर दृश्यों को आइटम के रूप में इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं है। अगर वह फिल्म का हिस्सा बन जाए, तो बहुत अच्छा। कुछ भी थोपा हुआ या जबरदस्ती पिरोया गया हो, तो आंखों को खटकता है। उम्मीद है कि हमारे निर्देशक ऐसे जबरन प्रयासों से बचेंगे। फिलहाल हमें फिल्म ब्लू की रिलीज का इंतजार है। यदि इस फिल्म के अंडरवाटर गीत ने दर्शकों को लुभाया, तो आगे अंडरवाटर फिल्म के बारे में भी सोचा जा सकता है।

Wednesday, October 15, 2008

पटना के रिजेंट सिनेमाघर में दो दिनों में तीन फिल्में

रिजेंट सिनेमाघर का टिकट (अगला-पिछला)


पटना का गांधी मैदान … कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। गांधी मैदान के ही एक किनारे बना है कारगिल चौक। कारगिल में शहीद हुए सैनिकों की याद दिलाते इस चौराहे के पास एलफिंस्टन, मोना और रिजेंट सिनेमाघर हैं। मोना का पुनरूद्धार चल रहा है। कहा जा रहा है कि इसे मल्टीप्लेक्स का रूप दिया जा रहा है। अगर जल्दी बन गया तो यह पटना का पहला मल्टीप्लेक्स होगा। वैसे प्रकाश झा भी एक मल्टीप्लेक्स पटना में बनवा रहे हैं। पटना के अलावा बिहार और झारखंड के दूसरे जिला शहरों में भी मल्टीप्लेक्स की योजनाएं चल रही हैं। पूरी उम्मीद है कि अगले एक-दो सालों में बिहार और झारखंड के दर्शकों का प्रोफाइल बदल जाएगा। सिनेमाघरों में भीड़ बढ़ेगी और उसके बाद उनकी जरूरतों का खयाल रखते हुए हिंदी सिनेमा भी बदलेगा।
फिलहाल, 1 अक्टूबर की बात है। भोजपुरी फिल्म 'हम बाहुबली' का प्रीमियर रिजेंट सिनेमाघर में रखा गया है। रिजेंट में आमतौर पर हिंदी फिल्में दिखाई जाती हैं। उस लिहाज से यह बड़ी घटना है। यहां यह बताना जरूरी होगा कि बिहार से हिंदी फिल्में लगभग बहिष्कृत हो चुकी हैं। ताजा उदाहरण 'हम बाहुबली' का ही लें। 2 अक्टूबर को यह फिल्म 35 प्रिंट्स के साथ रिलीज हुई, जबकि 'द्रोण' और 'किडनैप' को कुल 20 स्क्रीन ही मिल सके। मुंबई में बैठे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पंडितों, ट्रेड विशेषज्ञों और निर्माता-निर्देशकों के कानों पर अभी जूं नहीं रेंग रही है, लेकिन यह आगामी खतरे का संकेत है। हिंदी फिल्मों का साम्रा'य डांवाडोल स्थिति में है। इस साम्रा'य से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे क्षेत्र निकल रहे हैं। इन इलाकों में भोजपुरी फिल्में ही चलती हैं। जब से हिंदी सिनेमा ने विदेशों का रुख किया है, तब से उसके अपने दर्शक बिसूर रहे हैं। उन्हें हिंदी फिल्मों में अपनी धडक़न नहीं सुनाई पड़ती, इसलिए वे सिनेमाघरों में ही नहीं जाते। इन इलाकों में सफल रही पिछली हिंदी फिल्म 'विवाह' थी। हां, 'आपका सुरुर', 'जन्नत' और 'जाने तू या जाने ना' बिहार में पटना समेत अन्य शहरों में चलीं, लेकिन शहरी मिजाज की फिल्मों को दर्शकों ने देखना जरूरी नहीं समझा।
पटना के दर्शक बदल रहे हैं। पहले सिनेमाघरों में लड़कियां नाम मात्र की दिखती थीं। माना जाता था कि शरीफ घरों की लड़कियां अकेले सिनेमा देखने नहीं जातीं। इस बार लड़कियों के ग्रुप दिखे तो जवान जोड़े भी थे। जाहिर सी बात है कि वे कॉलेज से क्लास छोड़ कर आए होंगे। सिनेमाघरों में लड़कियों की बढ़ती तादाद सुखद ही कही जा सकती है। पटना जैसे शहरों में मध्यवर्ग और उ'चमध्वर्गीय परिवार के सदस्य सिनेमाघरों में नहीं जाते। वे घर पर ही पायरेटेड डीवीडी देख लेते हैं। घर पर डीवीडी देखना सस्ता, सुरक्षित और सुविधाजनक होता है। फिल्म की क्वालिटी से आम दर्शकों का अधिक मतलब नहीं रहता। पर्दे पर चल रही झिर-झिर तस्वीर काफी होती है। आवाज यानी कि साउंड गड़बड़ हो तो भी क्या फर्क पड़ता है …
ऐसा लगता है कि हिंदी प्रदेशों में लगभग एक सी हालत है। 'यादातर दर्शक सिनेमाघरों में नहीं जाते। सिनेमा देखने का संस्कार बदला है। इस बदलाव की एक वजह कानून-व्यवस्था भी है। चूंकि अधिकांश शहरों में महिलाओं की असुरक्षा बढ़ी है और सिनेमाघरों के दर्शकों का प्रोफाइल उजड्ड, बबदमाश और आवारा नौजवानों का हो गया है, इसलिए मध्यवर्गीय परिवार सिनेमाघरों से परहेज करने लगे हैं। बड़े शहरों और महानगरों के दर्शकों को छोटे शहरों के दर्शकों का डर समझ में नहीं आएगा। बात थोड़ी पुरानी हो गयी, लेकिन इवनिंग शो के बाद लड़कियों के अपहरण के किस्से तो पटना में सुनाए-बताए जाते रहे हैं। और फिर सिनेमाघरों की जो स्थिति है, उसमें जाने की हिम्मत कौन करे?
वैसे पिछले दिनों चवन्नी ने पटला के रिजेंट सिनेमाघर में दो दिनों में तीन फिल्में देखीं। पहली फिल्म 'हम बाहुबली' थी। प्रीमियर शो था। उस शो में फिल्म के निर्देशक अनिल अजिताभ के साथ मुख्य कलाकार रवि किशन,दिनेश लान निरहुआ,रिंकू घोष और मोनालिसा भी थे। प्रीमियर शो में बिहार के गर्वनर भी आए थे। अगले दिन चवन्नी ने रिजेंट में ही 'द्रोण' और 'किडनैप' देखी। एक ही सीट पर बैठ कर दो शो की दो फिल्मों का मजा ही कुछ और था। फिल्म के साथ चल रही दर्शकों की विशेष टिप्पणियों और सुझाव से फिल्म देखने का मजा बढ़ गया। चवन्नी को आश्चर्य नहीं हुआ कि दर्शक आने वाले दूश्य के साथ संवादो का भी सही अनुमान लगा रहे थे। क्या करें हिंदी फिल्मों का यही हाल है। दर्शकों के लिए कुछ भी अनजाना या नया नहीं रह गया है। अरे हां, चवन्नी यह बताना भूल रहा था कि 40 रूपए के टिकट में दो गर्मागर्म समोसे भी शामिल थे,जो ठीक इंटरवल के दस मिनट पहले सीट पर मिल गए थे। आप कोल्ट ड्रिंक लेना चाहते हों तो वह भी सीट पर मिल जाता है,लेकिन उसके लिए 14 रूपए देने पड़ते हैं। एक बात चवन्नी की समझ में नहीं आई कि सिनेमाघर का गेट सिफग् पांच मिनट पहले क्यों खुलता है? जब तक आप अपनी सीछ पर पहुचें और आंखें अंधेरे से एडजस्ट करें कि फिल्म शुरू हो जाती है।
यह तो हुई पटना में फिल्म देखने का ताजा अनुभव। चवन्नी चाहेगा कि आप भी अपने शहरों के सिनेमाघरों की स्थिति और दर्शकों के बदलते प्रोफाइल पर लिखें। पता तो चले कि फिल्मों के प्रति हिंदी समाज का क्या रवैया है?

बॉक्स ऑफिस:१७.१०.२००८


सफल नही रही हैलो

मुंबई में हैलो की सक्सेस पार्टी हो चुकी है। निर्माता और निर्देशक इसे कामयाब घोषित करने में लगे हैं। दावा तो यह भी है कि इसकी ओपनिंग जब वी मेट से अच्छी थी। जब भी किसी नयी रिलीज की तुलना पुरानी कामयाब फिल्म से की जाती है तो शक बढ़ जाता है। फिल्म हिट हो चुकी हो तो बताने की क्या जरूरत है? वह तो सिनेमाघरों में दिखाई पड़ने लगता है और सिनेमाघरों को देख कर हैलो को सफल नहीं कहा जा सकता।
हैलो का आरंभिक कलेक्शन 30 से 40 प्रतिशत रहा। पिछले हफ्ते वह अकेले ही रिलीज हुई थी और उसके पहले रिलीज हुई द्रोण एवं किडनैप को दर्शकों ने नकार दिया था। फिर भी हैलो देखने दर्शक नहीं गए। लगता है चेतन भगत का उपन्यास वन नाइट एट कॉल सेंटर पढ़ चुके दर्शकों ने भी फिल्म में रुचि नहीं दिखाई। सलमान खान और कैटरीना कैफ आकर्षण नहीं बन सके।
पुरानी फिल्मों में द्रोण और किडनैप फ्लॉप हो चुकी हैं। इस हफ्ते हिमेश रेशमिया की कर्ज रिलीज हो रही है। उसके साथ एनीमेशन फिल्म चींटी चींटी बैंग बैंग और लंदन के बम धमाकों पर आधारित जगमोहन मूदंड़ा की शूट ऑन साइट भी आ रही है।

Monday, October 13, 2008

बारिश में भीगता हुआ पोस्टर-दिनेश श्रीनेत


हिन्दी टाकीज-१२

इस बार दिनेश श्रीनेत.दिनेश श्रीनेत इंडियन बाइस्कोप नाम से ब्लॉग लिखते हैं.हिन्दी में फिल्मों पर लिखनेवाले चंद गंभीर और महत्वपूर्ण में से एक हैं दिनेश श्रीनेत.इन दिनों वे एक हिन्दी पोर्टल की संपादन जिम्मेदारियों की वजह से बैंगलोर में रहते हैं.अपने बारे में उन्होंने लिखा है,बीते दस सालों से पत्रकारिता. फिलहाल बैंगलोर में. एक न्यूज़ पोर्टल में एडीटर. कुछ लेख, कुछ कहानियां प्रकाशित, सिनेमा तथा अन्य दृश्य विधाओं से गहरा लगाव. सिनेमा के प्रति सबसे पहले मन में कब अनुराग जन्मा यह तो नहीं कह सकता, पर इतना जरूर है कि जितनी स्मृतियां वास्तविक जीवन की हैं, उतनी ही सिनेमाई छवियों की भी.

अगर सिनेमा को याद करूं तो मैं उन तमाम पोस्टरों को नहीं भूल सकता, जिन्होंने सही मायनों में इस माध्यम के प्रति मेरे मन में गहरी उत्सुकता को जन्म दिया। जबसे मैंने थोड़ा होश संभाला तो सिनेमा के पोस्टरों ने मेरा ध्यान खींचना शुरु किया। मुझे यह पता होता था कि ये फिल्में मैं नहीं देख सकता मगर पोस्टर से मैं उनकी कहानियों के बारे में कयास लगाया करता था। बाद के दिनों में भी पोस्टरों से इतना ज्यादा जुडा़ रहा कि मेरे लिए फिल्म देखने की प्रक्रिया पोस्टर के साथ ही शुरु हो जाती थी। अक्सर मैं उन पोस्टरों के जरिए फिल्म के बारे में मन ही मन एक धारणा तय करता- अगर फिल्म उस धारणा पर खऱी नहीं उतरती थी तो मुझे निराशा होती। शायद यही वजह थी कि बाद में जब मैनें 'स्टारवार्स' के निर्देशक जार्ज लुकाच का यह कथन पढ़ा कि 'दर्शक एक सर्वथा नई अनुभूति की उम्मीद लेकर फिल्म देखने जाता है, यह अनुभूति जितनी गहरी होगी फिल्म उतनी ही सफल होगी', तो मुझे यह बिल्कुल सही लगा। अगर मैं अपनी जिंदगी की सबसे आरंभिक अनुभूतियों में उतरूं तो कुछ धुंधली यादों में किसी कसबे के छोटे से स्टेशन पर चिपका फिल्म 'हिन्दुस्तान की कसम' का पोस्टर और बनारस में आटो के भीतर से बाहर पानी में भीगते 'मिस्टर नटरवरलाल' के पोस्टर याद आते हैं। उन दिनों रेलवे स्टेशन पर आने वाली फिल्मों के पोस्टर काफी पहले लग जाया करते थे। तब राजेश खन्ना की फिल्म 'रेड रोज़' ने मेरा ध्यान खींचा था। काली पृष्ठभूमि वाले पोस्टर पर सफेद रंग का गुलाब, जिस पर खून टपक रहा था और उसकी वजह से गुलाब का रंग आधा सुर्ख हो चला था। एक और फिल्म 'चलते-चलते' का पोस्टर भी मुझे याद आता है। सिमी ग्रेवाल की इस फिल्म से मिलती-जुलती कहानी पर बाद में 'प्यार तूने क्या किया' बनी। ये वो दिन हैं जब रेडियो पर बजता 'कालीचरण' फिल्म का गीत 'छोटी-छोटी बातों में बंट गया संसार...' और 'गीत गाता चल' और 'जय संतोषी मां' के गीत घर-घर सुनाई देते थे।

बचपन में ही इलाहाबाद आकर सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा वहां के कुछ सिनेमाघरों में लगने वाली हॉलीवुड की फिल्मों के पोस्टरों ने। 'द लीगेसी' के पोस्टर में बिल्ली का चेहरा, 'नार्थ बाई नार्थ वेस्ट' में किसी शख्स का पीछा करती प्लेन, 'मैकेनाज़ गोल्ड' में आपस में भिड़ते ग्रेगरी पैक और उमर शरीफ शायद ही कभी भूलें। इसी तरह से 'डेडली बीज़' का वह पोस्टर भी कभी नहीं भूलेगा जिसमे एक औरत के आधे से ज्यादा चेहरे को मक्खियों ने ढक रखा था। उन दिनों अंग्रेजी फिल्में बनने के कई बरस बाद भारत में प्रदर्शित होती थीं। बचपन में देखी गई हॉलीवुड की फिल्मों में स्टीवेन स्पिलबर्ग की 'क्लोज एनकाउंटर्स आफ द थर्ड काइंड' ऐसी फिल्म थी, जिसके बारे में मैंने पत्रिकाओं में पढ़ा और जल्द ही वह देखने को भी मिल गई।

उन दिनों कुछ लोगों का बड़ा क्रेज था, यानी टेनिस स्टार ब्योन बोर्ग, क्रिकेटर सुनील गावस्कर, बॉक्सर मोहम्मद अली और मार्शल आर्ट के उस्ताद ब्रूस-ली। तो इन सबके साथ वेस्टर्न पॉप ग्रुप आबा और रोलिंग स्टोन के पोस्टर अक्सर इलाहाबाद के उन घरों में दिख जाया करते थे जहां पर किशोरवय के लड़के-लड़कियां होते। इस तरह के पोस्टरों को पॉपुलर बनाने में उस वक्त की एक मैगजीन सन का खासा योगदान था। उन्हीं दिनों इलाहाबाद में एक ऐसा अखबारवाला था जो हमारी कालोनी में शाम आठ-साढ़े आठ बजे आया करता था। वह पच्चीस से तीस पैसे प्रतिदिन पर पत्रिकाएं किराए पर दिया करता था। उस दौरान साप्ताहिक हिन्दुस्तान सिनेमा पर काफी दिलचस्प सामग्री दिया करता था। इसके अलावा टाइम्स ग्रुप की मैगजीन इलस्ट्रेटेड वीकली आफ इंडिया में भी सिनेमा पर काफी मौलिक और दिलचस्प सामग्री होती थी।

और एक्सप्रेस ग्रुप की स्क्रीन को मैं भला कैसे भूल सकता हूं। पोस्टर्स के प्रति मेरी संवेदनशीलता को बढ़ाने में इस अखबारनुमा साप्ताहिक पत्रिका का बड़ा योगदान था। इसमें पोस्टर की तरह फुल साइज के और स्प्रेडशीट पर फिल्मों के विज्ञापन छपा करते थे। खास तौर पर फिल्म 'शान' के विज्ञापन मुझे आज भी उतनी ही स्पष्टता के साथ याद हैं जिनमें ऊंची-ऊंची इमारतों के बैकग्राउंड में कलाकारों के चेहरे नजर आते थे। इनमें से बहुत सी फिल्मों की घोषणा होने के बाद अक्सर वे बनती नहीं थीं। मगर मेरे मन में उन तमाम खो-गई फिल्मों का खाका आज भी मौजूद है। इसमें सुनील दत्त के प्रोडक्शन की दो फिल्में हैं, पहली जिसे वे खुद निर्देशित करने वाले थे 'मसीहा'- इसमें संजय दत्त और कुमार गौरव की जोड़ी थी, दूसरी फिल्म थी '...और गंगा बहती रही' जिसमें संजय दत्त थे और जिसका निर्देशन जेपी दत्ता करने वाले थे, मुझे इस फिल्म के कांसेप्ट से आज भी लगाव है, पहला तो इसका शीर्षक जो मिखाइल शोलोखोव के उपन्यास 'क्विट फ्लोज द दोन' से मेल खाता है, जेपी दत्ता से उस दौर में यह उम्मीद की जा सकती थी, जब उन्होंने 'गुलामी' के नायक से मैक्सिम गोर्की का जिक्र करवाया था, और राजस्थान और उत्तर प्रदेश के परिवेश के प्रति उनका लगाव, यह सब कुछ एक बेहतर फिल्म की उम्मीद जगाता था। सुभाष घई की 'शिखर' और 'देवा' के अलावा रमेश सिप्पी की 'जमीन' भी इन फिल्मों की सूची में शामिल है। धीरे-धीरे मुझे स्क्रीन के विज्ञापन देखकर फिल्मों की स्तरीयता का अंदाजा हो जाता था।

हाईस्कूल पहुंचते-पहुंचते मैं क्लास से भागकर फिल्में देखने लगा। इनमें मार्निंग-शो में लगने वाली 'सहारा', 'द बुलेट ट्रेन', 'द प्रोटेक्टर' जैसी अंग्रेजी फिल्में खूब शामिल होती थीं। इस दौरान मैंने कई अंडररेटेड मगर उम्दा फिल्में देखीं। आज आईएमडीबी या विकीपीडिया पर उनके बारे में सर्च करना मेरे लिए काफी दिलचस्प होता है। इस श्रंखला में 'वाइल्ड बीस्ट्स', 'वेनजेंस', 'इमेक्यूलेट कांसेप्शंस', 'बॉर्न आफ फायर' और 'ब्ल्डी बर्ड' जैसी फिल्मे थीं जो कि मूलतः इटैलियन, लैटिन अमेरिकी अथवा पाकिस्तान के निर्देशकों द्वारा निर्देशित होती थीं मगर कुछ हॉट दृश्यों के चलते भारतीय बाजार में भी इन गंभीर फिल्मों का वितरण हो जाता था।

आज भी मुझे सिनेमा के पोस्टर देखना पहले की तरह भाता है। अक्सर वे मन के किन्ही गुमसुम कोनों में कोई अनकही सी कहानी रचने लगते हैं। तस्वीरें देखकर कहानियां गढ़ने का मेरा पुराना शगल है। वैसे शायद यह रचनात्मकता का सबसे बेहतर स्रोत है। गैब्रियल गारसिया मार्क्वेज़ ने कभी अपने एक साक्षात्कार में बताया था कि किस तरह से उनके उपन्यास 'वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सालिट्यूड' की शुरुआत उनकी स्मृति में कैद इमेज से हुई थी। तो आज भी किसी धुंधले मौसम में, किसी मोड़ से गुजरते हुए, बारिश से भीगा कोई पोस्टर मुझे दिखता है तो मैं ठिठकता हूं, अपनी बाइक की रफ्तार थोड़ी कम करता हूं। शायद मेरे चेहरे पर वैसा ही विस्मय दिखता हो जैसा छह-सात बरस की उम्र में आटो से झांकते हुए रहा होगा। ....मैं चाहता हूं कि वह विस्मय बना रहे।

Saturday, October 11, 2008

विश्वप्रिय अमिताभ बच्चन


जन्मदिन 11 अक्टूबर पर विशेष...

सम्राट अशोक के जीवन के एक महत्वपूर्ण प्रसंग पर डॉ।चंद्रप्रकाश द्विवेदी की अगली फिल्म है। इसमें अशोक की भूमिका अमिताभ बच्चन निभा रहे हैं। बिग बी के जन्मदिन (11 अक्टूबर) के मौके पर डॉ।द्विवेदी ने हमें अमिताभ बच्चन के बारे में बताया। इस संक्षिप्त आलेख में द्विवेदी ने भारतीय इतिहास के महानायक अशोक और भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन की कई समानताओं का उल्लेख किया है। बिग बी लोकप्रियता, पहचान और स्वीकृति की जिस ऊंचाई पर हैं, वहां उन्हें विश्वप्रिय अमिताभ बच्चन की संज्ञा दी जा सकती है।

पश्चिम के साहित्यकार एचजी वेल्स ने अपनी एकपुस्तक में सम्राट अशोक का उल्लेख किया है। उनके उल्लेख का आशय यह है कि अगर विश्व के सम्राटों की आकाशगंगा हो, तो उसमें जो सबसे चमकता हुआ सितारा होगा, वह अशोक हैं। यह अभिप्राय ऐसे लेखक और चिंतक का है, जो अशोक को भारत के बाहर से देख रहा है। जापान में सोकोतु नामक राजा हुए। उन्हें जापान का अशोक कहा जाता है। गौरतलब है कि राजा सोकोतु ने अशोक की तरह ही घोषणाएं जारी की थीं। दक्षिण-पूर्व एशिया में जहां-जहां बौद्ध धर्म है, वहां-वहां बौद्ध धर्म के इतिहासकार अशोक को जानते हैं। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अशोक का प्राथमिक योगदान है। भारत के बाहर बौद्ध धर्म को पहुंचाने का श्रेय अशोक को ही है। इतिहास में अशोक की छवि देवानाम प्रिय है, यानी जो अपने कर्म से देवताओं का भी प्रिय हो गया। अशोक के लिए दूसरा विशेषण प्रियदर्शी है। सम्राट अशोक भारतीय इतिहास के एक ऐसे महानायक हैं, जिनके करीब कोई और नहीं पहुंचता। ऐसे महानायक पर फिल्म बनाने की बात सोचते ही वर्तमान भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के अभिनेताओं में किसी को चुनना हो, जो इस महानायक के चरित्र को निभा सके, तो मैं निस्संकोच कहूंगा कि भारतीय सिनेमा में अमिताभ बच्चन से अधिक उपयुक्त दूसरा कोई नहीं है। वे न केवल श्रेष्ठ अभिनेता हैं, बल्कि उन्होंने एक ऐसा व्यक्तित्व अख्तियार कर लिया है, जो भारतीय दर्शकों के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय है। सच तो यह है कि भारत के साथ ही अब वे देश की सीमाओं के बाहर विश्व नागरिकों के बीच भी सुपरिचित व्यक्तित्व बन चुके हैं। हम उन्हें विश्वप्रिय अमिताभ बच्चन कह सकते हैं। निश्चित ही सम्राट अशोक की तरह वे भी प्रियदर्शी हैं। सम्राट अशोक की भूमिका में अमिताभ बच्चन को देखने के मेरे कारण हैं। दरअसल, अशोक भारतीय इतिहास के जटिल चरित्र हैं। उनके जीवन के वैयक्तिक वैविध्य का अध्ययन होता रहा है। अशोक का आक्रामक व्यक्तित्व रहा है। वे अजेय योद्धा थे। अमिताभ बच्चन भी अपनी युवावस्था में एंग्री यंग मैन के रूप में दर्शकों के बीच लोकप्रिय रहे। वे हिंदी सिनेमा के अजेय नायक रहे। लोग देखें कि भारतीय इतिहास का एंग्री एंग मैन बाद में अपने व्यवहार से ऋषितुल्य हो जाता है। उन्हें बुद्धगतिक भी कहा जाता है, यानी जिसका व्यवहार बुद्ध जैसा हो। मुझे लगता है कि भारतीय सिनेमा में अशोक की तरह ही जीवन को इतनी परिपूर्णताओं के साथ देखने वाले और अपने व्यक्तिगत जीवन में इतनी विडंबनाओं को लेकर चलने वाले अकेले व्यक्ति अमिताभ बच्चन हैं। मैं सम्राट अशोक और अमिताभ बच्चन की तुलना करने की भूल नहीं कर सकता। दोनों की कुछ समानताएं बता रहा हूं। दोनों के अनुभवों की यात्रा कुछ-कुछ एक जैसी रही है।
अपनी फिल्म के सिलसिले में अमिताभ बच्चन से कई बार मिलना हुआ। मेरी स्क्रिप्ट में अशोकका जिस रूप में चित्रण है, वह उनके आचरण में भी दिखा। जैसे कि बौद्ध भिक्षुओं के लिए कहा जाता है कि वे आंखों से कम से कम संप्रेषण करें। वे प्रयत्न करते हैं कि दूसरे व्यक्तियों की आंखों में सीधे न देखा जाए। जैसे ही आंखों से आंखें मिलती हैं, परस्पर संवाद आरंभ हो जाता है। भिक्षा मांगते समय भी बौद्धों की नजर भूमि पर रहती है। आप आश्चर्य करेंगे कि अमिताभ बच्चन अधिकांश समय भूमि की ओर देखते हैं। वे अधिकतर चर्चाओं में नहीं रहते। वस्तुओं और घटनाओं पर वे अपना अभिप्राय नहीं देते। वे निर्णायक टिप्पणियां नहीं करते। मैं उन्हें उदात्त मौन का धनी व्यक्ति कहूंगा। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लोगों को कई हस्तियां मिल जाएंगी, जो हर विषय पर टिप्पणी देती हैं। उनके पास आलोचना रहती है, उनके पास समीक्षा होती है, उनके पास निर्णय होते हैं, उनके पास पूर्वाग्रह होते हैं।
अमिताभ बच्चन आलोचना, समीक्षा, निर्णय और पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं हैं। जो जैसा है, वे उसे वैसे ही स्वीकार करते हैं। मुझे लगता है कि उन पर यह प्रभाव हरिवंश राय बच्चन का भी हो सकता है। मैं जब-जब उनके नजदीक गया। मैंने उन्हें ऐसा ही पाया। ऐसी ही मुद्रा अशोक की है।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में उन्होंने विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया है। अशोक जैसे उदात्त और जटिल चरित्र को निभाने के लिए जो गरिमा चाहिए, वह उनके पास है। अशोक का व्यक्तित्व है उनमें। अशोक के लिए हमें जो भाषा चाहिए, उसमें वे पारंगत हैं। मेरी फिल्म में चौंसठ वर्ष के बाद के अशोक हैं। अमिताभ बच्चन की आयु भी चौंसठ से ज्यादा है। यह एक सुयोग है कि भारतीय इतिहास के एक महान चरित्र और महानायक की भूमिका भारतीय सिनेमा के महान व्यक्तित्व और महानायक निभा रहे हैं। अशोक की तरह उनकी कीर्ति भारत के बाहर फैल चुकी है। मुझे नहीं लगता कि अशोक की भूमिका के लिए अमिताभ बच्चन से अधिक उपयुक्त कोई दूसरा अभिनेता मिल सकता है। लोग चकित होंगे कि इसे लिखते समय भी मेरे मन-मस्तिष्क में अमिताभ बच्चन थे! यही लगता था कि इस भूमिका को वे ही निभा सकते हैं। इसे लिखने के तुरंत बाद मैंने उनसे संपर्क करने की कोशिश आरंभ कर दी थी। यह मेरा सौभाग्य है कि उन्होंने अशोक की भूमिका निभाने के लिए सहमति दे दी। अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्व की विशेषताओं की बात करूं, तो वे हैं-ग्रहण, मनन और चिंतन। वे बहुत कम बोलते हैं। वे सारगर्भित बोलते हैं। पहले वे आपको स्वीकार करते हैं, ग्रहण करते हैं। वे बीच में कभी नहीं टोकते। दूसरी-तीसरी मुलाकात में लोगों को आभास होगा कि उन्होंने आपके आशय और मंतव्य पर मनन किया है। विचार किया है। उसके बाद की मुलाकातों में वे अहसास दिला देते हैं कि वे चिंतन कर रहे हैं। फिर लोगों को पता चलता है कि वे अपने निष्कर्षो और सहमति के प्रति कितने गंभीर हैं! रही बात अभिनेता अमिताभ बच्चन की, तो अपनी फिल्म की शूटिंग के बाद ही उसके बारे में निजी अनुभव बांट सकूंगा। अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्व के अनेक अनजान पहलू हैं। इस बारे में उनके करीबी, रिश्तेदार और दोस्त ही बता सकते हैं।

Friday, October 10, 2008

फ़िल्म समीक्षा: हैलो

दर्शकों को बांधने में विफल
-अजय ब्रह्मात्मज
दावा है कि वन नाइट एट काल सेंटर को एक करोड़ से अधिक पाठकों ने पढ़ा होगा। निश्चित ही यह हाल-फिलहाल में प्रकाशित सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास रहा है। इसी उपन्यास पर अतुल अग्निहोत्री ने हैलो बनाई है। इस फिल्म के लेखन में मूल उपन्यास के लेखक चेतन भगत शामिल रहे हैं, इसलिए वे शिकायत भी नहीं कर सकते कि निर्देशक ने उनकी कहानी का सत्यानाश कर दिया। फिल्म लगभग उपन्यास की घटनाओं तक ही सीमित है, फिर भी यह दर्शकों को उपन्यास की तरह बांधे नहीं रखती।
अतुल अग्निहोत्री किरदारों के उपयुक्त कलाकार नहीं चुन पाए। सोहेल खान की चुहलबाजी उनके हर किरदार की गंभीरता को खत्म कर देती है। हैलो में भी यही हुआ। शरमन जोशी पिछले दिनों फार्म में दिख रहे थे। इस फिल्म में या तो उनका दिल नहीं लगा या वे किरदार को समझ नहीं पाए। अभिनेत्रियों के चुनाव और उनकी स्टाइलिंग में समस्या रही। गुल पनाग, ईशा कोप्पिकर और अमृता अरोड़ा तीनों से ही कुछ दृश्यों के बाद ऊब लगने लगती है। उनकेलिबास पर ध्यान नहीं दिया गया। ले-देकर दिलीप ताहिल और शरत सक्सेना ही थोड़ी रुचि बनाए रखते हैं। जाहिर सी बात है कि दो प्रौढ़ कलाकार किसी फिल्म से दर्शकों को जोड़े नहीं रख सकते। इस फिल्म की समस्या यह है कि एक ही आफिस में सारे किरदारों को दिखाना है। लोकेशन की सीमाबद्धता के कारण निश्चित ही निर्देशक फिल्म को दृश्यात्मक तरीके से बहुत आकर्षक नहीं बना पाता। यहां उसकी कल्पनाशीलता की परीक्षा होती है। पढ़ते समय हम शब्दों में उलझे रहते हैं लेकिन देखते समय नाटकीयता और विविधता आवश्यक हो जाती है। बार-बार वही दीवारें, मेज, पैसेज और एक ही वेशभूषा में किरदार दिखते हैं। ऐसे में फ्लैशबैक और दृश्यांतरण बहुत जरूरी हो जाता है। निर्देशक अतुल अग्निहोत्री इस लिहाज से चूक गए हैं। उपन्यास का क्लाइमेक्स बेहद रोमांचक है। फिल्म में इसे और भी रोमांचक बनाया जा सकता था लेकिन निर्देशक ने किसी हड़बड़ी या मजबूरी में उस दृश्य को जल्दी समेट दिया। सलमान खान और कैटरीना कैफ की मौजूदगी भी फिल्म को रोचक नहीं बना पाती।

दरअसल:गांव और गरीब गायब हैं हिंदी फिल्मों से

-अजय ब्रह्मात्मज
बाजार का पुराना नियम है कि उसी वस्तु का उत्पादन करो, जिसकी खपत हो। अपने संभावित ग्राहक की रुचि, पसंद और जरूरतों को ध्यान में रखकर ही उत्पादक वस्तुओं का निर्माण और व्यापार करते हैं। कहने के लिए सिनेमा कला है, लेकिन यह मूल रूप से लाभ की नीति का पालन करता है। खासकर उपभोक्ता संस्कृति के प्रचलन के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने अपनी पूरी शक्ति वैसी फिल्मों के उत्पादन में लगा दी है, जिनसे सुनिश्चित कमाई हो। निर्माता अब उत्पादक बन गए हैं। माना जा रहा है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की अधिकांश कमाई मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों और विदेशों से होती है। नतीजतन फिल्मों के विषय निर्धारित करते समय इन इलाकों के दर्शकों के बारे में ही सोचा जा रहा है। यह स्थिति खतरनाक होने के बावजूद प्रचलित हो रही है। पिछले दिनों फिल्मों पर चल रही एक संगोष्ठी में जावेद अख्तर ने इन मुद्दों पर बात की, तो ट्रेड सर्किल ने ध्यान दिया। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं और हिंदी पत्रकारों की चिंता के इस विषय पर फिल्म इंडस्ट्री अभी तक गंभीर नहीं थी, लेकिन जावेद अख्तर के छेड़ते ही इस विषय पर विचार आरंभ हुआ। लोग बैठकों में ही सही, लेकिन अब विमर्श करने लगे हैं। जावेद अख्तर ने स्पष्ट कहा कि देश की पचहत्तर प्रतिशत आबादी अभी गांव में ही रहती है। हिंदी सिनेमा उनकी सुध नहीं ले रही है। वेलकम टू सज्जनपुर एक अपवाद मात्र है। इसी प्रकार मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है, जबकि एक सच यह भी है कि ज्यादातर दर्शकों की पहुंच में अभी मल्टीप्लेक्स नहीं आए हैं। जावेद अख्तर ने कहा कि जब मैं इंडस्ट्री में आया था, तब मेरे सीनियरों ने सलाह दी थी कि ऐसी स्क्रिप्ट लिखने की कोशिश करना, जो गांव-कस्बों के दर्शकों को अपील करे। अभी यह बात किसी युवा लेखक या निर्देशक को कही जाए, तो वे हंस पड़ेंगे और संभव है, सुझाव देने वालों को पुरातनपंथी समझ कर आगे बातचीत ही न करें। जावेद अख्तर ने वाजिब चिंता जाहिर की है कि इस प्रवृत्ति से न केवल हिंदी सिनेमा विभाजित हो जाएगा, बल्कि वह मुख्य रूप से अमीरों का ही सिनेमा हो कर रह जाएगा। उसके दायरे से गरीब बाहर हो जाएंगे।
जावेद साहब मुंबई में रहते हैं और ओम शांति ओम और रॉक ऑन जैसी फिल्मों के गीत लिखते हैं। शायद उन्हें ठीक-ठीक मालूम नहीं है कि उनकी चिंताएं वास्तविक रूप ले चुकी हैं और गांव, गरीब और उनसे संबंधित सारी चीजें हिंदी फिल्मों से बाहर हो चुकी हैं और इन दिनों तो सामान्य फिल्मों की शूटिंग भी किसी कस्बे या गांव में नहीं होती। गांव आता भी है, तो सरसों से लहलहाता पंजाब का गांव आता है, जहां समृद्धि छलक रही होती है। हमारे फिल्मकार उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में जाने की हिम्मत ही नहीं करते, शायद इसलिए, क्योंकि वहां के परिदृश्य से उनकी फिल्मों की दृश्य संरचना में निर्धनता झलकने लगेगी। गरीबी पर फिल्म बनाने की बात कौन कहे? आज के फिल्मकार अपनी फिल्म के किसी कोने में भी गरीब की झलक नहीं दिखाना चाहते। सुख से अघाए दर्शक का स्वाद क्यों खराब किया जाए?
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का अगर यही रवैया रहा, तो जल्दी ही उसके पारंपरिक दर्शक अपनी रुचि और पसंद का सिनेमा खोज लेंगे या नई तरह की फिल्मों का निर्माण कर लेंगे। इसकी शुरुआत हो चुकी है। फिलहाल भोजपुरी फिल्मों ने बिहार से हिंदी फिल्मों को बाहर खदेड़ दिया है। पिछले दिनों द्रोण और किडनैप जैसी फिल्मों के मुकाबले बिहार में हम बाहुबली ने अच्छा प्रदर्शन किया। उसके ज्यादा प्रिंट रिलीज हुए। चूंकि हम बाहुबली का विषय बिहार के दर्शकों का परिचित और करीब था, इसलिए स्वाभाविक रूप से वह फिल्म चली। दर्शकों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए भोजपुरी सिनेमा के साथ कॉरपोरेट व‌र्ल्ड जुड़ रहा है और स्तरीय फिल्मों के निर्माण के लिए आवश्यक धन भी आने लगा है। हम बाहुबली एक बड़ा संकेत है, लेकिन क्या मुंबई में बैठे ट्रेड पंडित इसे भांप कर मुंबइया निर्माताओं को सचेत कर रहे हैं? लगता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की पकड़ अपने अंदरूनी इलाकों पर ढीली हो गई है!

Thursday, October 9, 2008

राहुल उपाध्याय:बिग बी ब्लॉग के अनुवादक

चवन्नी की मुलाक़ात राहुल उपाध्याय से ब्लॉग पर ही हुई.चवन्नी को उनका नुवाद सरल,प्रवाहपूर्ण और मूल के भावानुरूप लगा.चवन्नी ने उनसे बात भी की.पेश है उनसे हुई संक्षिप्त बातचीत...
-आपने अमिताभ बच्चन के ब्लॉग के अनुवाद के बारे में क्यों सोचा?
मैंने कई लोगों को यह कहते हुए पाया कि अमिताभ अंग्रेज़ी में क्यों लिख रहे हैं। जबकि उनकी फ़िल्में हिंदी में हैं। उन फ़िल्मों को देखने वाले, उन्हें चाहने वाले अधिकांश हिंदी भाषी हैं। और ऐसा सवाल उनसे एक साक्षात्कार में भी किया गया था। सुनने में आया हैं कि अमित जी भरसक प्रयास कर रहे हैं ताकि वे हिंदी में ब्लाग लिख सके। कुछ अड़चनें होगी। कुछ उनकी सीमाएं होगी। जिनकी वजह से 170 दिन के बाद भी वे हिंदी में ब्लाग लिखने में असमर्थ हैं। मुझे भी शुरु में कुछ अड़चने पेश आई थी। आजकल यूनिकोड की वजह से हिंदी में लिखना-पढ़ना-छपना आसान हो गया है। तो मैंने सोचा कि क्यों न उनका बोझ हल्का कर दिया जाए। अगर मैं अनुवाद कर सकता हूँ तो मुझे कर देना चाहिए। बजाए इसके कि बार बार उनसे अनुरोध किया जाए और बार बार उन्हें कोसा जाए कि आप हिंदी में क्यों नहीं लिखते हैं। जो पाठक हिंदी में पढ़ना चाहते हैं अब उनके लिए अमित जी का ब्लाग उपलब्ध है हिंदी में यहाँ:http://amitabhkablog-hindi.blogspot.com/
-अमिताभ बच्चन के बारे में आपकी क्या धारणा है?
वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। एक सशक्त अभिनेता। उन्होंने कुछ यादगार गीत भी गाए हैं। मैं बचपन से उनका प्रशंसक हूँ। जबसे मैंने उनकी फ़िल्म 'आनंद' देखी थी, 5 वीं कक्षा में। उसके बाद से उनकी हर फ़िल्म देखी हैं। 'मिस्टर नटवरलाल', 'दो और दो पाँच', 'दीवार', 'फ़रार', 'अभिमान', 'मुक़द्दर का सिकंदर' आदि हर फ़िल्म एक से बढ़ कर एक थी। 'अकेला', 'जादूगर' आदि के समय की फ़िल्मों ने निराश किया। लेकिन उनका सितारा फिर बुलंद हुआ और अब उनकी तकरीबन हर दूसरी फ़िल्म अच्छी होती है।
-अमिताभ बच्चन की पोस्ट कितनी जल्दी आप अनुवाद करते हैं?
अनुवाद करने में ज्यादा से ज्यादा एक घंटा लगता है। उनका ब्लाग कब पोस्ट होता है उसका कोई निश्चित समय नहीं है और न ही कोई स्वचालित तरीका है पता करने का। इसलिए दिन में जब भी मौका मिलता है मैं देख लेता हूँ कि कोई नई पोस्ट आई हो तो अनुवाद कर दूँ। अभी तक 172 वें दिन की पोस्ट का इंतज़ार है।
-आपको कैसी प्रतिक्रियाएं मिली हैं?
सब ने बधाई दी है। कहा कि यह सार्थक प्रयास है। हिंदी पढ़ने-समझने वालों के लिए ये उपयोगी साबित होगा। कुछ ने चिंता ज़ाहिर की है कि कहीं अमित जी नाराज़ न हो जाए कि बिना उनकी अनुमति के मैंने ये कदम कैसे उठा लिया। मैंने अभी तक किसी को कोई जवाब नहीं दिया है। लेकिन तीन बातें आपसे कहना चाहूँगा।1 - इरादे अगर नेक हो तो काम बुरा नहीं हो सकता।2 - मैंने उन्हे 168 वें दिन की 40 वीं टिप्पणी में लिख दिया है कि अगर उन्हें इस अनुवाद से आपत्ति हो तो मुझसे कहे और मैं अनुवाद करना और पोस्ट करना बंद कर दूँगा। अगर वे चाहे तो मेरा अनुवाद अपने ब्लाग के साथ रख सकते हैं। या फिर वे मुझसे बेहतर अनुवादक से कह दे कि वे अनुवाद कर के एक हिंदी का ब्लाग खोल दे।3 - गाँधी जी ने कहा था कि 'be the change you want to see in the world' दुनिया बदलनी हो तो पहले खुद को बदलो। इस का मैंने ये अर्थ निकाला कि अमित जी से आग्रह करने के बजाए खुद ही क्यों न अनुवाद कर दूँ?
-आप अमेरिका के किस शहर और पेशे में हैं?
मैं अमेरिका के 'सिएटल' शहर में रहता हूँ। पिछले 22 साल से अमेरिका में हूँ। पहले चार साल पढ़ाई की फिर पिछले 18 साल सूचना प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में काम किया। पिछली जुलाई तक मैं माईक्रोसाफ़्ट में काम कर रहा था। फ़िलहाल 1 साल के अवकाश पर हूँ। चिंतन में हूँ कि आगे क्या करूँ? ज़िंदगी एक ही होती है। ये कोई अनिवार्य तो नहीं कि इस ज़िंदगी में एक ही तरह का काम किया जाए। चाहता हूँ कि कुछ नया करूँ। कुछ अलग करूँ। कोरी किताबी ज़िंदगी न जीऊँ। कुछ लीक से हटकर काम करूँ। पैसे कमाने का ज़ुनून नहीं हैं। कुछ कर गुज़रने का है।
-भारत में कहाँ के रहने वाले हैं?
मैं रतलाम (मध्य प्रदेश) का रहने वाला हूँ। जहाँ से मैंने सातवीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद शिमला, कलकत्ता, बनारस से शिक्षा प्राप्त की।
-कितनी हिन्दी फिल्में देखते हैं?
हर शुक्रवार को एक फ़िल्म देख लेता हूँ पूरे परिवार के साथ। घर पर। प्रोजेक्टर पर। घर में टी-वी नहीं है। कमरे की दीवार को पर्दा बना रखा है। पिछली जुलाई से, जब से नौकरी छोड़ी है, और चिंतन में लगा हूँ, तब से फ़िल्म देखना भी छोड़ दिया है। इन दिनों एक एक पल कुछ नया करने की दिशा में खर्च हो रहा है।
-हिन्दी फिल्मों के बारे में आप क्या सोचते हैं?
हिंदी फ़िल्मों ने मेरे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। माँ की परिभाषा, बहन की इज़्ज़त, राखी की गरिमा, होली-दीवाली का महत्व - ये सब हिंदी फ़िल्मों से ही सीखा है। संक्षेप में - हिंदी फ़िल्मों से ही मुझे भारतीय संस्कार मिले हैं और उनका ज्ञान हुआ है। 'दीवार' फ़िल्म का छोटा सा डायलाग - 'मेरे पास माँ है' - बहुत बड़ी बात कह जाता है। जिसे कि दुनिया की कोई और फ़िल्म नहीं समझा सकती है और न हीं कोई दूसरी भाषा का दर्शक उसे समझ सकता है।
आप चाहें तो उन्हें upadhyay@yahoo.com पर पत्र भेज सकते हैं.

Wednesday, October 8, 2008

बॉक्स ऑफिस:०९.१०.२००८

द्रोण और किडनैप ने निराश किया
कई बार धारणाएं फिल्म को चलाती हैं और कई बार उनके खिलाफ भी काम करती हैं। पिछले हफ्ते रिलीज हुई फिल्मों के संदर्भ में यह बात एक साथ सच और गलत हुई। माना जा रहा था कि संजय गढ़वी की किडनैप को दर्शक मिलेंगे। इमरान खान फिल्म के सबसे बड़े आकर्षण थे। फिल्म को आरंभ में 70-80 प्रतिशत दर्शक मिले भी, लेकिन दर्शकों की निराशा ने उसे अगले ही दिन तीस प्रतिशत नीचे ला दिया। किडनैप के मामले में प्रचार से बनी धारणा गलत साबित हुई। दूसरी धारणा सच निकली। द्रोण के विज्ञापन आने के समय से ही कानाफूसी चल रही थी कि फिल्म को शायद ही दर्शक पसंद करें। धारणा सच निकली। द्रोण का आरंभिक कलेक्शन किडनैप से कम रहा। हालांकि अब दोनों समान रूप से नीचे फिसल गई हैं और लगभग बराबर बिजनेस कर रही हैं।
संजय गढ़वी और गोल्डी बहल दोनों ने दर्शकों को निराश किया। चूंकि दोनों फिल्में महंगी थी, इसलिए घाटे की राशि ज्यादा होगी। उल्लेखनीय है कि दोनों ही फिल्मों को चार दिनों का वीकएंड मिला था, पर फिल्मों को कोई फायदा नहीं हो सका। महानगरों और मल्टीप्लेक्स से बाहर निकलें तो सुदूर शहरों में भोजपुरी फिल्म हम बाहुबली अच्छा बिजनेस कर रही है। बिहार में पहले हफ्ते में इसका कलेक्शन 80 प्रतिशत से अधिक रहा। उत्तर प्रदेश और पंजाब में भी हम बाहुबली ने उल्लेखनीय बिजनेस किया है। मुंबई मंत्रा की अनिल अजिताभ निर्देशित हम बाहुबली अपने इलाकों में द्रोण और किडनैप से आगे रही है।
श्याम बेनेगल की फिल्म वेलकम टू सज्जनपुर पूरे देश में अच्छा व्यवसाय कर रही है। दूसरे हफ्ते भी इसे दर्शक मिलते रहे। इस हफ्ते चेतन भगत की वन नाइट एट कॉल सेंटर उपन्यास पर आधारित हैलो आ रही है। इसका निर्देशन अतुल अग्निहोत्री ने किया है।

जो नहीं है उसे पर्दे पर तलाशते हैं लोग-महेश भट्ट

कुछ साल पहले की बात है। ब्रिटेन के एक अंग्रेजी रियैलिटी शो बॉलीवुड स्टार का मैं जज था। बॉलीवुड में अभिनेत्री बनने की लालसा से एक गोरी लडकी शो में हिस्सा लेने आई थी। मैंने उससे पूछा, तुम हॉलीवुड के बजाय बॉलीवुड में क्यों काम करना चाहती हो? उसने बेहिचक कहा, क्योंकि उसकी फिल्में रोमैंटिक होती हैं। हॉलीवुड के लेखक-निर्देशक हर फिल्म को यथार्थवादी बना देते हैं। मैं सप्ताहांत में पाकिस्तानी, ग्रीक या रूसी दोस्तों के साथ बॉलीवुड की फिल्में देखना पसंद करूंगी। मुझे किसी बौद्धिक फिल्म देखने से ज्यादा मजा आनंद हिंदी फिल्मों के गाने गुनगुनाने में आएगा। उसके जवाब से मेरा दिल खुश हो गया, मैंने महसूस किया कि भूमंडलीकरण के इस दौर में बॉलीवुड की फिल्मों की अपील बढ रही है। हिंदी सिनेमा का आकर्षण बढ रहा है।
कल्पना की उडान
हिंदी फिल्में देख चुके पश्चिम के अधिकतर दर्शकों को बॉलीवुड की फिल्में नाटकीय और अनगढ लगती हैं। इसकी वजह यही हो सकती है कि हमारी ज्यादातर फिल्में तीन घंटे की होती हैं, हीरो-हीरोइन मौका मिलते ही नाचने-गाने लगते हैं। हमारी फिल्मों की कहानियां कल्पना की ऊंची उडान से निकलती हैं। उनमें ढेर सारे संयोग होते हैं और अवास्तविक उम्मीदें रहती हैं। एक ही गीत में नायक-नायिका के कपडे बदल जाते हैं। साडी से मिनी स्कर्ट और बिजनेस सूट से टीशर्ट-जींस में आने में उन्हें पलक झपकने भर की देर लगती है। वे उसी गीत में कई बार गोवा से स्विट्जरलैंड जाते और आते हैं। पश्चिम के दर्शकों के विपरीत हमारे दर्शकों को इसमें कोई विसंगति नहीं नजर आती। सीधी वजह है, हिंदी फिल्मों का दर्शक एक जादुई संसार में प्रवेश करना चाहता है, जहां कुछ भी असंभव न हो और रोमैंस का एकछत्र राज हो। इसलिए आश्चर्य नहीं कि फिल्मों की शुरुआत से लेकर अभी तक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादातर फिल्मों ने पहले प्यार के जादू का ही प्रचार-प्रसार किया। कुछ ही फिल्में अपवाद हैं। हिंदी फिल्मों ने हमेशा इस सत्य को झुठलाने की कोशिश की कि सब कुछ धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। जो चीज आज शुरू हुई है, उसका एक अंत होगा। जो ऊपर चढता है, उसे नीचे उतरना पडता है। जिंदगी के साथ ही मौत का रिश्ता बना हुआ है.. इन बातों से हिंदी में बनी रोमैंटिक फिल्में परहेज करती हैं और बडी आसानी से उन्हें नजरअंदाज कर देती हैं। मेरे हिंदी प्राध्यापक ने कॉलेज में बताया था, अगर मुझे किसी लडकी से प्यार करने और रोमैंटिक हिंदी फिल्म देखने में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाए तो मैं रोमैंटिक हिंदी फिल्म चुनूंगा। इसकी साफ वजह है कि हर प्रेम कहानी की तरह मेरी कहानी का भी अंत होगा, लेकिन फिल्म में मैं सुख की उम्मीद कर सकता हूं। फिल्म में सब कुछ ठीक हो जाएगा, हीरो-हीरोइन गले में बांहें डाले अस्त होते सूर्य की तरफ उमंग से जाते मिलेंगे और पा‌र्श्व संगीत में कोई मधुर धुन बज रही होगी।
रोमैंस की ट्रेजेडी
अपने लंबे फिल्मी करियर को पलट कर देखता हूं तो अपने गुरु राज खोसला के बताए लियो तोलस्तोय के एक उद्धरण को कभी नहीं भूल पाता। उन्होंने कहा था कि इसे मंत्र की तरह याद कर लो। राज खोसला अत्यंत रोमैंटिक व्यक्ति थे। उन्होंने मैं तुलसी तेरे आंगन की और दो बदन जैसी रोमैंटिक फिल्में भी बनाई थीं। उन्होंने तोलस्तोय का जो उद्धरण बताया था मनुष्य भूकंप, महामारी, हर प्रकार के रोग और आत्मा पर लगी कैसी भी चोट सह लेता है, लेकिन जिस ट्रेजेडी का मनुष्य पर सबसे ज्यादा गहरा असर होता है, वह है बेडरूम की ट्रेजडी। राज खोसला ने कहा था, इसलिए हम फिल्मकारों को चाहिए कि हम दर्शकों को उनकी निजी जिंदगी की आग से बचने का रास्ता दें। अपने करियर की शुरुआत में ही मुझे एहसास हो गया था कि हम फिल्मकार वास्तव में भ्रम निर्माण के बिजनेस में लगे हैं। हमारा यह विश्वास सच्चा नहीं है कि हम यथार्थ का फिर सृजन करते हैं। आप अब तक की सबसे बडी हिट फिल्म की खोज करें तो पाएंगे कि मुगलेआजम सबसे ऊपर है। मुगलेआजम एक साधारण लडकी अनारकली और राजकुमार सलीम की प्रेम कहानी थी, जिसे भावपूर्ण तरीके से मधुबाला और दिलीप कुमार ने पर्दे पर निभाया था। दस साल की छोटी उम्र में मैंने वह फिल्म देखी थी। रिलीज होने के साथ ही फिल्म देखने के लिए भीड टूट पडी थी। उस फिल्म में शीशमहल में गाया अनारकली का गीत जब प्यार किया तो डरना क्या आज भी देश के मानस में गूंजता और कौंधता है। मुगलेआजम में कामुक दृश्य को बेहद संवेदनशील तरीके से चित्रित किया गया था। उस दृश्य में दिलीप कुमार मधुबाला के कामोद्दीप्त चेहरे को सफेद पंख से सहलाते हैं। यह दृश्य एक्स्ट्रीम क्लोजअप में रखा गया था, लेकिन उसका जादुई प्रभाव पडा।
रोमैंस के फिल्मकार राज कपूर
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की यादगार फिल्मों की सूची बनाएं तो उनमें कई रोमैंटिक फिल्में आ जाएंगी, लेकिन मेरे लिए राज कपूर की बॉबी तो नगीना है। यह फिल्म राज कपूर ने हताशा के दिनों में बनाई थी। उनकी महत्वाकांक्षी फिल्म मेरा नाम जोकर फ्लॉप हो चुकी थी। तब उन्होंने रोमैंस का दांव खेला था। बॉबी किशोरों की सरल प्रेम कहानी थी। बॉबी के गीत सदाबहार रोमैंटिक गीत हैं। मैं शायर तो नहीं और हम तुम एक कमरे में बंद हों जैसे गीत आनंद बख्शी ने लिखे और उन्हें लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने धुनों से सजाया। बॉबी के बाद न जाने कितने निर्देशकों ने अपनी फिल्मों में यही प्रभाव पैदा करने की कोशिशें कीं, मगर कोई भी सफल नहीं हो सका। मैंने एक बार आनंद बख्शी से इसका कारण पूछा था तो उनका जवाब था, राज कपूर, मैं और लक्ष्मीकांत उस पीढी के थे, जो प्रेम की मन्मथ शक्ति में यकीन करते थे। आज की पीढी के लिए रोमैंस सिर्फ पैसे कमाने का जरिया है।
पाकीजा का आदर्श रोमैंस
कमाल अमरोही की पाकीजा हिंदी फिल्मों का एक और नगीना है। सालों बाद भी उसकी चमक बनी हुई है। पाकीजा 1972 में बनी थी। लगभग उसी समय मैंने अपना करियर शुरू किया था। यह फिल्म एक तवायफ की जिंदगी के अंतरंग भावों और इच्छाओं को बहुत सुंदरता से चित्रित करती है। लता मंगेशकर ने कैफी आजमी केलिखे गीत चलते चलते और मजरूह सुल्तानपुरी के गीत इन्हीं लोगों ने को इस मिठास के साथ गाया था कि उन्हें सुन कर आज भी मन मस्त हो जाता है। इस फिल्म के संगीत के लिए नौशाद हमेशा याद किए जाएंगे। इस फिल्म की कहानी में दम था। एक तवायफ चाहती है कि उसका नवाब उसे इस जिंदगी से निकाल ले जाए और किसी भी रोमैंटिक कहानी की तरह उसकी तमन्नाएं पूरी हो जाती हैं। इस लेख को टाइप कर रही मेरी बेटी शाहीन पूछती है, क्या आपने कभी कोई रोमैंटिक फिल्म नहीं बनाई? हां, बनाई न, मैं जवाब देता हूं, अर्थ रोमैंटिक फिल्म है। आशिकी, दिल है कि मानता नहीं, गैंगस्टर और मर्डर में तो स्त्री-पुरुष का रोमैंस था। अर्थ में स्त्री का स्वयं से रोमैंस है। अर्थ की शबाना आजमी इस धारणा को तोडती है कि स्त्री की जिंदगी में पुरुष के होने से ही रोमैंस पूरा होता है। वह खुद को पा लेती है और फिर गर्व के साथ क्षितिज की ओर निकल जाती है। मुझे मालूम है कि अधिकतर औरतें ऐसा करना चाहती हैं, लेकिन नहीं कर पातीं। यही कारण है कि जब पर्दे पर ऐसा होता है तो उनकी अतृप्त भावनाएं पूरी होती हैं।
रोमैंस का अर्थ
पापा, फिर रोमैंस का मतलब क्या होता है? मेरी बेटी का अगला सवाल है। मैं उसे बताता हूं, रोमैंस तो सिर्फ कहानियों में होता है। सामान्य जिंदगी में रोमैंस के लिए जगह नहीं है। सामान्य जिंदगी में सब कुछ श्वेत-श्याम होता है। रोमैंस उसमें रंग भरता है। इसी रोमैंस के लिए तो करवाचौथ और वेलेंटाइन डे मनाया जाता है। हर रोमैंटिक व्यक्ति कल्पना की दुनिया में जीता है। उसे वास्तविक दुनिया से डर लगता है। वह अपने डीवीडी प्लेयर पर रोमैंटिक फिल्में देखता है, आई पॉड में प्रेम गीत लोड करता है, ताकि जिंदगी की तमाम तकलीफों को भुला सके। सारी रोमैंटिक फिल्मों में तर्क से ज्यादा जोर पैशन पर रहता है।
उम्मीदों के हवाई किले
हिंदी फिल्मों के रोमैंटिक हीरो हमेशा अपनी भावनाएं जाहिर करना चाहते हैं। वे अपने मन के भीतर दबी किसी भी भावना को दबाते या छिपाते नहीं। अगर वे भावनाओं को दबाएंगे या छिपाएंगे तो फिल्म में हर दस मिनट के बाद पेड के इर्द-गिर्द घूमकर गाने कैसे गाएंगे? लेकिन आखिरकार रोमैंटिक व्यक्ति जिंदगी की कठोर सच्चाइयों के खिलाफ खडा होता है। संक्षेप में वह उम्मीद में ही जीता और उम्मीद में ही मर जाता है।

Tuesday, October 7, 2008

खलनायकों के बगैर खाली है हमारी दुनिया: देवदत्त पटनायक

जरा रावण के बगैर रामायण, कंस के बगैर कृष्णलीला, शकुनि के बगैर महाभारत की कल्पना करें। खलनायक ही कथा पूरी करते हैं। देवता राक्षसों की हत्या करते रहते हैं, लेकिन वे वापस आ जाते हैं। ऐसी कोई अंतिम निर्णायक जीत नहीं होती, जिसमें खल चरित्रों का हमेशा के लिए सफाया हो जाए। नए खलनायक पैदा होते रहते हैं, इसलिए नए नायकों की जरूरत पड़ती रहती है। नए अवतार, नए देवता, नयी देवियां, नए नायक। ठीक वैसे ही जैसे कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री हर शुक्रवार को नए खलनायक और नए नायक ले आती है।
श्वेत-श्याम फिल्मों की याद करें तो उनमें खून के प्यासे मुनीम या लोलुप बलात्कारी अवश्य रहते थे। गब्बर सिंह के बगैर हम 'शोले' की कल्पना नहीं कर सकते। मोगैंबो के बगैर 'मिस्टर इंडिया' की कल्पना नहीं की जा सकती। रणजीत, जीवन, प्राण, अमरीश पुरी जैसे अभिनेताओं ने खलनायक के तौर पर अपना कॅरिअर बनाया। शशिकला, ललिता पवार और हेलन खलनायिकाओं के तौर पर मशहूर रहीं।
युग बदल गया है। हम कलयुग के नए दौर में हैं, जहां खलनायक नहीं हैं। जब नायक ही खलनायकों की भूमिकाएं करने लगें तो ऐसा लगेगा ही कि खलनायक गायब हो गए। आज रूपहले पर्दे पर नाराज युवक नहीं है। भ्रष्ट राजनेता और गुंडे भी नहीं दिखते। नायिकाएं पुरानी खलनायिकाओं की तरह नाभिदर्शना कपड़े पहनती हैं। करण जौहर द्वारा रचे गए इस ब्रह्मांड में हर व्यक्ति सुंदर, सुशील और अद्भुत है। सख्त पिता और रोमांसहीन पति खलनायक हो गए हैं। राम गोपाल वर्मा की फिल्मों में अंडरव‌र्ल्ड सरगना और भ्रष्ट राजनेता हीरो हैं। इस पीढ़ी को क्या हो गया है? क्या जीवन के प्रति यह दृष्टिकोण ही सही दृष्टिकोण है या यह भ्रांति है, जिसे हम यथार्थ पर थोपना चाहते हैं?
जवाब उतना सहज नहीं है, जितना हम सोचते हैं, चाहे मिथक का संदर्भ लें या लोकप्रिय फिल्मों का। मिथकों में खलनायक मुख्य रूप से असुर या राक्षस होते हैं, लेकिन प्रह्लाद जैसे नेक असुर और विभीषण जैसे भले राक्षस भी होते हैं। सारे असुर बुरे नहीं हैं और न ही सारे राक्षस बुरे हैं। जीवन में उनकी भी भूमिका है। उनके बगैर सागर मंथन नहीं हो सकता था और अमृत भी नहीं मिल पाता।
हिंदू मिथक की बात करें तो हमें शैतान नहीं मिलते। शैतान की अवधारणा फारस से आई। हिंदी धर्म में कर्म से देवता भी राक्षस बन सकते हैं और राक्षसों को देवता का दर्जा मिल सकता है। भागवत पुराण में उल्लेख है कि विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने महर्षि सनत कुमार को वैकुंठ में आने से रोका। इस अपराध के लिए उन्हें शाप मिला कि वे राक्षस के रूप में जन्म लेंगे। द्वारपालों ने विरोध किया। उन्होंने कहा कि द्वारपाल के तौर पर वे अपना धर्म निभा रहे थे, क्योंकि जब महर्षि आए तो विष्णु सो रहे थे। फिर उन्हें सजा क्यों दी जा रही है? चूंकि श्राप दिया जा चुका था, इसलिए उसे बदला नहीं जा सकता था। विष्णु ने द्वारपालों को आश्वस्त किया कि वे जब भी राक्षस के तौर पर जन्म लेंगे, वे धरती पर अवतरित होंगे और उनकी हत्या कर देंगे ताकि वे फिर से वैकुंठ आ सकें। इसलिए जब जय और विजय ने हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के तौर पर जन्म लिया तो विष्णु वराह और नरसिंह के तौर पर अवतरित हुए। जय और विजय ने जब रावण और कुंभकर्ण के तौर पर जन्म लिया तो विष्णु राम बन कर आए। वे जब शिशुपाल और दंतवक्र बने तो विष्णु ने कृष्ण के रूप में जन्म लिया। इस तरह उन खलनायकों का एक इतिहास था। विष्णु उनकी हत्या कर उन्हें सजा नहीं दे रहे थे, बल्कि उनके वैकुंठ लौटने का मार्ग सुगम कर रहे थे।
परिस्थितियों के मुताबिक एक चरित्र भला या बुरा हो सकता है। जब देवता नेक काम (इंद्र द्वारा वृत्र की हत्या) करते हैं तो उनकी प्रशंसा होती है, लेकिन जब वे बुरा काम (इंद्र का अहिल्या पर आसक्त होना) करते हैं तो उन्हें सजा मिलती है। जब एक असुर नेक काम (माया द्वारा पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ का निर्माण) करता है तो उसकी प्रशंसा होती है और जब असुर बुरे काम (बक और हिडिम्बा) करता है तो उसे सजा मिलती है। मिथक में हमेशा इस तरफ ध्यान दिलाया जाता है कि कोई व्यक्ति क्यों खलनायक है? रामायण में राम अपने वनवास में विरध और कबंध जैसे अनेक राक्षसों से मिलते हैं। हत्या के बाद वे यक्ष या गंधर्व में बदल जाते हैं और बताते हैं कि किसी ऋषि या देवता को नाराज करने के कारण वे शाप से राक्षस बन गए थे। हमें लगातार बताया जाता है कि कोई भी व्यक्ति जन्मजात खलनायक नहीं होता। वह या तो परिस्थितियों की वजह से या आत्मसंयम की कमी की वजह से खलनायक बन जाता है। महाभारत में जब भीम दुर्योधन की जांघ चीरकर उसके सिर पर नाचते हैं तो कृष्ण उन्हें डांटते हैं, 'दुर्योधन का अपमान मत करो। वह तुम्हारा भाई है और राजा रहा है।' इस प्रकार कुछ भी पूरी तरह से सही या पूरी तरह से गलत नहीं है। सब कुछ कहीं बीच में है।
भारत के समाजवादी अर्थव्यवस्था से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ने से शायद हमारी मानसिकता भी बदल रही है। हम दुनिया को नायकों और खलनायकों के बीच विभाजित करके नहीं देखना चाहते। हम नायकों में खल स्वभाव और खलनायकों में नेकदिल चाहते हैं। हम सफेद और काले के बीच भूरा भी देखते हैं। अखबारों में भ्रष्ट नेताओं और नेकदिल आतंकवादियों की खबरें छपती हैं। मीडिया बताता है कि सही और गलत तो परिप्रेक्ष्य की बात है। एक चैनल किसी व्यक्ति को खलनायक बताता है। दूसरा चैनल उसी को नायक घोषित कर देता है। मीडिया नियंत्रण खत्म करने और सेंसरशिप समाप्त होने से हम पहले की तरह नादान नहीं रह गए हैं। हम देख रहे हैं कि सब कुछ माया है- नैतिकता की भ्रांति है। शायद इसी कारण युवा पीढ़ी अपना पक्ष रखने से बच रही है। वे दुनिया बदलने नहीं आए हैं। वे पैसे कमाना और मजे लेना चाहते हैं। विचारधारा की लड़ाई लड़ने वालों को आज खोखला और व्यर्थ का आलोचक समझा जाता है। फिर क्यों परेशान रहें? फिल्म इंडस्ट्री इसे चित्रित कर रही है। यही कारण है कि फिल्मों में द्वंद्व से ज्यादा समारोहों का चित्रण रहता है। कोई युद्ध नहीं है, क्रांति नहीं है, विचारधारा नहीं है। केवल प्रेम का चक्कर है, मधुर मिलन है, नाच-गाना है और विवाह है। अब दर्शकों को उत्तेजित करने के लिए बलात्कार के दृश्य की जरूरत नहीं है। पर्दे पर चल रहा चुंबन ही काफी है। ऐसा लगता है कि हम मिथकों की कहानियों में वर्णित पुरानी सभ्यता के करीब आ रहे हैं - उस सभ्यता में सब कुछ ग्राह्य और स्वीकार्य था और इसी कारण हम खलनायकों को जिंदगी का हिस्सा मानने लगे हैं। शायद यह अच्छी बात है - पूंजीवाद का सतयुग आ रहा है या फिर यह भी संभव है कि हम प्रलय के निकट पहुंच रहे हों!
[लेखक पौराणिक-मिथकीय प्रसंगों के विश्लेषक हैं]
devdutt@devdutt.com devdutt.pattanaik@gmail.com