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Monday, September 29, 2008

हमका सलीमा देखाय देव...-चण्डीदत्त शुक्ल

हिन्दी टाकीज-१०
इस बार हिन्दी टाकीज में चंडीदत्त शुक्ल .यूपी की राजधानी लखनऊ से 128 किलोमीटर, बेकल उत्साही के गांव बलरामपुर से 42, अयोध्या वाले फैजाबाद से 50 किलोमीटर दूर है गोंडा. 1975 के किसी महीने में यहीं पैदा हुए थे चण्डीदत्त शुक्ल. वहीं पढ़े-लिखे. लखनऊ और जालंधर में कई अखबारों, मैगजीन में नौकरी-चाकरी करने के बाद फिलहाल दैनिक जागरण, नोएडा में चीफ सब एडिटर हैं.लिखने-पढ़ने की दीवानगी है, वक्त मिले न मिले मौका निकाल लेते हैं. थिएटर, टीवी-सिनेमा से पुरानी रिश्तेदारी है. स्क्रिप्टिंग, एक्टिंग, वायस ओवर, एंकरिंग का शौक है पर जो भी काम करने को मिले, छोड़ते नहीं. सुस्त से ब्लागर भी हैं. उनके ब्लाग हैं www.chauraha1.blogspot.com और www.chandiduttshukla1.blogspot.com. साहित्य में भी बिन बुलाए घुसे रहने के लिए तैयार. कई किताबों की योजना है पर इनमें से चंद अब भी फाइनल होने के इंतजार में हैं...और जानना हो, तो chandiduttshukla@gmail.com पर मिल सकते हैं।

हमका सलीमा देखाय देव...
झींकते-रींकते हुए हम पहले मुंह बनाते, फिर ठुनकते और जब बस न चलता तो पेंपें करके रोने लगते। देश-दुनिया के हजारों बच्चों की तरह हम भी दुलरुआ थे, मनबढ़ और बप्पा की लैंग्वेज में कहें, तो बरबाद होने के रस्ते पर तेजी के साथ बढ़ रहे थे. खैर, कुढ़ने के बावजूद बप्पा खुद ही पिच्चर दिखाने अक्सर ले जाते. कभी न ले जाते, तो दादी पइसा, मिठाई और -- कुटाई नहीं होने देंगे -- का भरोसा थमाकर फिल्म देखने भेज देतीं. तो यूं पड़े हममें सिलमची (ब-तर्ज चिलमची) होने के संस्कार लेकिन नहीं...सिनेमा से भी कहीं पहले दर्शक होने के बीज पड़ गए थे. हम दर्शक बने आल्हा प्रोग्राम के, रामलीला के, नउटंकी के. भाई लोगों को जानके खुसी होगी कि ये तरक्की हमने तब हासिल कर ली थी, जब बमुश्किल चार-पांच साल के होंगे. पिता गजब के कल्चरल हैं (खानदानी रुतबे के बावजूद). जावा मोटरसाइकिल पर हमें आगे-पीछे कहीं भी टांग-टूंगकर रात, आधी रात,पछिलहरा (एकदम भोर)निकल लेते किसी भी सांस्कृतिक अनुष्ठान का पहरुआ बनने. पान खाने के तगड़े शौकीन हैं वे. बनारसी तमकुहा पान वे खाते रहते और हम उनके अगल-बगल दुबके, नौटंकी-आल्हा-रहंस (रासलीला का छोटा एडिशन) का मजा मुंह बाए हुए लेते. रात में गांव-गंवई के बीच, तरह-तरह की बतकही के हल्ले में थोड़ा-सा म्यूजिकल भी कान में पड़ जाता और यूं जीवन में कल्चर की सत्यनारायण कथा ने प्रवेश किया.

सिनेमा की बात
समझ में नहीं आता--कब से याद करूं? तब से, जब प्रकाश, संगीत और दृश्यों का विधान पता नहीं था...रोशनियों के दायरे आंखों के इर्द-गिर्द छाए रहते, दृश्यों की जगह कुछ परछाइयां नजर आतीं और कानों को अच्छा लगने वाले सुर-साज रूह को छू जाते...या तब से याद करूं, जब पता चलने लगा था कि फिल्म मोटामोटी क्या है, सीन कैसे बनते हैं और कहानी-गाने कहां वजूद में आते हैं। या फिर और बाद से, जब इन सबकी तकनीक से भी परिचित हुआ. जरा-सा खुद काम कर, थोड़ा औरों को देखकर और बहुत-सा पढ़कर...लेकिन पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर फिल्म का, पढ़े सो पंडित होय, सो फिल्मों का सही संस्कार बीच के दिनों में ही हुआ...अलसाए दिन, जब कुछ-कुछ पता चल चुका था पर ढेर सारी अलमस्ती ही साथ थी...यानी छुटपन...

इससे भी पहले टीवी
तब आठ-दस साल का था। घर में टीवी नहीं थी, क्यों नहीं थी, ठीकठीक याद नहीं आता.शायद आर्थिक दिक्कतें वजह हों, या फिर घर में पांडित्य का दबदबा...जिसके तहत टीवी, सलीमा या पिच्चर को नरक का आधार समझा-बताया गया...खैर, वजह जो हो, घर में टीवी नहीं थी तो नहीं थी. शायद पूरे शहर में (हमारे मोहल्ले में तो खैर हंड्रेड परसेंट पक्का है कि माया फूफा को छोड़कर किसी घर में नहीं थी) पांच-सात ही रही हो...सो,गोंडा शहर में टीवी जिन गिने-चुने घरों में थी, उनके यहां या तो मेरा जाना-आना नहीं था, या फिर घुसने को ही नहीं मिलता था. फिर भी टीवी से मोहब्बत हो गई थी...सूं...सूं...करते, या जलतरंगें बजाते, या फिर शहनाई की धुन (संगीत के जानकार निर्बुद्धि पर हंसें नहीं) बजाते हुए सत्यम शिवम सुंदरम की धुन गूंजती, साढ़े पांच बजे शाम का शायद वक्त था, तब हम लोग माया फूफा के घर की इकलौती खिड़की पर सिर देकर खड़े हो जाते...गर्मियों में बुआ जी, जिनसे हमारा रिश्ता मोहल्ले के अच्छे, इज्जतदार पड़ोसियों की निकम्मी औलादों से ज्यादा और कुछ नहीं था, जमकर गरियातीं और उनके लड़के भी अपने उत्कृष्ट होने का हर दस मिनट पर एहसास दिलाते, पर हम थे कि खिड़की छोड़ने को तैयार न रहते...नीले बैकग्राउंड में ह्वाइट कलर का गोला पता नहीं कितने जादुई ढंग से देर तक घूमता, फिर बुआ जैसी शक्ल वाली ही एक लड़की, एंकर, एनाउंसर, समाचार वक्ता, जो चाहे कह लें, ढेर सारे कपड़े पहने सामने आती और कुछ भी बोलना शुरू कर देती. हम मुंह बाए बस उसका मुंह ही देखते रहते. अपनी गली-मोहल्ले की ही कोई बहुत खबसूरत लड़की लगती वो...पर ऐसी, जिसे दूर से ही देखा जा सकता है, छुओगे तो काट लेगी.सीरियलों की बात चलती है, तो नुक्कड़ याद आता है, उससे भी कहीं ज्यादा इंतजार. एक स्टेशन पर लंबा इंतजार. बहुत छोटा-सा था, जब वहां से प्रेम का लेसन पढ़ा. बहुत बाद में एक फिल्म का गाना सुनते हुए--रोमांस का भी एक लेक्चर होना चाहिए, वो लेसन फिर-फिर याद आया. मुंगेरीलाल के हसीन सपने और मुंगेरी के भाई नौरंगी लाल जैसे धारावाहिकों के दृश्य अब तक नसों में बेचैनी पैदा कर देते हैं.मालगुडी डेज, तमस, एक कहानी की तो उफ्फ॥पूछिए ही मत...।टीवी पर ही पहले-पहल जासूसी सीरियल देखे.करमचंद की गाजरें और किटी की किटकिट. यहीं रामायण, महाभारत और चंद्रकांता जैसे भव्य धारावाहिक.रामायण के वक्त तक घर में एक बहुत मरियल ब्लैक एंड ह्वाइट टीवी आ गया था.पिता जी से हम लोगों ने खूब चिल्ल-पों मचाई, तो उन्होंने एंटीना में बुस्टर कलर टीवी वाला लगवा दिया, बोले-अभी बुस्टर लगवा दिया है कलर वाला, बाद में टीवी भी ला देंगे. टीवी तो खैर कलर बहुत साल नहीं आई. पहले बड़ी ब्लैक एंड ह्वाइट आई और बहुत साल चली. हमने कब कलर टीवी खरीदी, वो प्रसंग कोई हैसियत नहीं रखता, इसलिए उसका जिक्र अभी नहीं--फिर कभी. टेलिविजन पर फिल्में भी किश्तवार आती थीं...अब भी आती हैं, यकीन न हो तो बाइस्कोप देख लीजिए. तीन घंटे की फिल्म चार दिन में आती है. लेकिन जब ये फिल्में आतीं, तो टीवी के आगे बैठने को लेकर जो धकापेल मचती, बताने लायक नहीं है. बिनावजह यादों को हिंसा से भरपूर का लेबल दे दिया जाएगा.

चुनांचे...रंगोली भी लाजवाब रही...
हेमामालिनी कभी झक सफेद साड़ी में दिखतीं तो कभी नीले रंग की।(ब्लैक एंड ह्वाइट टीवी पर ब्ल्यू कलर का कवर लगा था). अब उनके जैसी धुनदार (ट्रांसलेशन -- म्यूजिकल) एंकर कोई नहीं दिखती. संडे की सुबे-सुबे हम सब दर्जन भर बच्चे चौकड़ी मारकर फर्श पर बैठ जाते. नक्शेबाजी करते हुए गनेश दद्दा (घर के टीवी आपरेटर) स्टाइल के साथ टीवी खोलते. टीवी की बीमारी ज्यादा नहीं बढ़ी तब तक सिनेमा की छूत लग गई थी. सारा दिन मुसलसल आवारागर्दी करने के बाद नाइट शो देखने जाता था. अक्सर अकेले, कभी-कभार पड़ोस के किसी दोस्त के साथ. हर बार पैसे मुझे ही चुकाने होते पर टिक्की और गोलगप्पा साथ वाला ही खिलाता.

गोंडा में सिनेमा हॉल
तीन हैं सिनेमा हॉल। इनमें से तीनों की हालत पर कुछ कहूंगा,तो इनके ओनर हड्डी-पसली एक कर देंगे पर अव्यवस्था हर जगह है. कहीं थोड़ी कम, तो कहीं थोड़ी ज्यादा. पिछली छुट्टियों में घर गया था, तो पता चला कि एक बिकने वाला भी है, दूसरे में फिल्म देखना बहुत बड़े संत्रास को न्योता देने जैसा है और तीसरे में अब नई फिल्में नहीं लगतीं, ये वो है जिसकी हालत कुछ बेहतर थी. घर के सबसे करीब था कृष्णा. मुझे वहां लगने वाली डाकू रानी हसीना, चंबल की नागिन टाइप की पिच्चरें बहुत प्रिय थीं. खूब ठांय-ठूंय, सेक्सुअल कॉमेडी देखता औऱ किशोरावस्था में मिली हॉट नॉलेज को ग्रहण करता. यहीं पर गानों वाली किताब मिलती थी, चार आने-अठन्नी और कोई-कोई बारह आने की. चार-पन्नों की किताब में नायक नायिका-गीतकार के नाम दिए होते, एक बहुत खराब सी काली-सफेद तस्वीर बनी होती, जिस पर स्याही पुत गई होती और हम सब उसे खरीदकर किसी धर्मग्रंथ जैसी श्रद्धा के साथ पढ़ते.

पुराने जमाने के हीमेश
यहीं सुना था दिवाना मुझको लोग कहें...नाक से यें यें यें कहने का मजा हिमेश रेशमिया क्या जानें...यही दीवानगी रास्ते का पत्थर किसमत ने मुझे बना दिया...तक भी पहुंची। कहीं तो ये दिल कहीं मिल नहीं पाते...और हीरो के गाने सुनते हुए बहुत रोया हूं मैं॥और तब यकीन मानिए कोई इश्क-विश्क मसलन-लड़कियों से जो होता है...वो भी नहीं था. खैर, मिथुन चक्रवर्ती का पराक्रमी डांस, जितेंद्र और श्रीदेवी की मस्त-मस्त मूवीज, पद्मालय का तिलिस्म...बहुत कुछ देखा. एक डायरी ही बना ली थी, जिसमें फिल्मों की रिलीज, कहानी और बजट तक लिखा होता. फिल्म इतिहासकारों के लिए विशेष संदर्भ ग्रंथ बन सकता है. सलीमा के विशेष समर्पण के चलते बाद में हाईस्कूल का रिसर्च स्कालर बनना पड़ा.ये वे दिन थे, जब हर फिल्म में हीरोइन के साथ हीरो की जगह खुद को देखता था. रास्ते में लौटते हुए खंभें ठोंकते हुए फाइट की प्रैक्टिस, गली में भौंकते कुत्तों को जानी कहने की आदत. बारिश में भीगकर जुकाम को दावत देने का जुनून, क्या कहें, समाज की भाषा में कितने पैसे फूंके और कितना समय व्यर्थ किया पर सपने देखने की आदत कब सिनेमा का गंभीर दर्शक बना देती है, यह बताने की बात नहीं है. हां, एक बात स्वीकार करूंगा, चाहे मेरे सेलेक्शन पर कितने ही सवाल क्यों न उठें...मुझे अब तक कोई भी फिल्म बतौर दर्शक बुरी नहीं लगी, मैंने भरपूर मजे लेकर उसे देखा है. चाहे वो डाकू रानी वाली फिल्म हो या फिर अर्थ जैसी अर्थवान फिल्म.

क्लासिक का चककर
धीरे-धीरे उम्र बढ़ी तो सलीमा भी चुनचुनकर देखने लगा। गुलजार, हृषिकेश मुखर्जी, महबूब, गुरुदत्त, प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई भी..., सुभाष घई, महेश भट्ट. सबको देखा, बार-बार देखा. एक फिल्म आई थी मैं आजाद हूं. लोगों ने कहा बंडल है. मुझे अब भी लगता है कि नहीं थी. तब एक ही दिन में तीन शो देख लिए थे. इस दावे पर सवाल उठ सकता है कि मैं सिनेमा का गंभीर दर्शक हूं...जवाब दूंगा, सिनेमा को तो गंभीरता से ही देखा है...देखा जाने वाला सिनेमा गंभीर न हो तो मैं क्या करूं। खैर, गंभीर फिल्में देखने से कहीं ज्यादा पढ़ी जाती हैं...वहीं से सिनेमा का असल आस्वाद मिला है पर ये आनंद-अध्ययन हॉल में नहीं हो सका, वीसीआर- की बदौलत ही पूरा हो पाया. हम सब जुनूनी लोग चंदा करके वीसीआर मंगाते, टीवी भी॥रिक्शे पर लदकर आता..साथ में तीन फिल्में...एक कैसेट हम लोग लाते...वीसीआर वाले को नहीं बताते...फिल्म चालू होती...जल्दी-जल्दी गाने रिवाइंड, फारवर्ड करके फिल्म देख लेते...कोई गाना अच्छा लगता, तो पूरा भी देखते. सुबू-सुबू वीसीआर वाला आता और कवर छूकर बोलता, वीसीआर गरम क्यों है? तुम लोगों ने तीन से ज्यादा फिल्में देख ली हैं क्या? हम काउंट करके बताते कि अभी तो नवै घंटा हुआ है, बारह घंटे का फिल्म कैसे देख लेंगे भाई?

रोटिया बैरन मजा लिए जाए रे...
कहने को बहुत कुछ है...इतना जिसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, मसलन-कैसे सिनेमा हॉल में गेटकीपर से झगड़ा करके फिल्म देखी...कैसे प्रीमियर में फिल्म देखने के लिए मुंबई ही पहुंच गए, कैसे एक फिल्म के सेट पर हीरोइन को ही पटा लिया और बाद में डायरेक्टर से वो झाड़ खाई कि पूछो ही नहीं...पर न पढ़ने वालों के पास सब्र बचेगा और न लिखने की फुर्सत बची है...वैसे भी, ये सबकुछ इतना खूबसूरत है कि यादों में ही सिमटा रहे, तो अच्छा, नहीं तो अपनी चमक खो सकता है। अब वो पहले जैसी मस्ती कहां...कंप्यूटर, डीवीडी, वीसीडी, होम थिएटर, म्यूजिक सिस्टम, टेप रिकार्डर...आज सबकुछ है. कुछ फिल्म वालों से जान-पहचान, मेल-मुलाकात है, जिनसे नहीं है, उनसे हाथ मिलाते ही सुरसुरी आ जाए...वैसा खयाल भी नहीं बचा है फिर भी...पहले जैसी मस्ती और मजा नहीं है...कहीं खो गया है भाई लार्जर देन लाइफ वाले सलीमा का जादू...

Saturday, September 27, 2008

सम्मान भावना के खो चुके अर्थ तलाशें-महेश भट्ट

-महेश भट्ट
अभी कुछ ही समय बीता है, जब सहारा वन चैनल के रियलिटी शो झूम इंडिया के आिखरी और निर्णायक एपीसोड के दौरान एक प्रतियोगी के कमेंट ने मुझे आहत किया। मैं तीन लोगों के निर्णायक मंडल में शामिल था। यह कमेंट भी प्रत्यक्ष तौर पर मेरे िखलाफ नहीं था, बावजूद इसके मैंने इस तरह की हरकतों का विरोध करना ठीक समझा और कार्यक्रम से वॉकआउट कर गया। मुझे एहसास हुआ कि भले ही मैं समाज की मूल्य प्रणाली को लेकर बहुत ज्यादा नहीं सोचता हूं, इस विषय को लेकर अधिक चिंतित नहीं रहता, फिर भी मैं इसी समाज का एक हिस्सा हूं। हमारी मूल्य प्रणाली में स्त्रियों और बुजुर्गो को सम्मान की नजर से देखा जाता है और इनके िखलाफ कुछ गलत होते देख मेरा मन मुझे कचोटने लगता है। इसलिए जब एक प्रतियोगी ने मेरे साथी निर्णायकों शबाना आजमी और आनंदजी भाई का उपहास उडाया, मुझे महसूस हुआ कि उसने एक मान्य सामाजिक व्यवहार की लक्ष्मण रेखा लांघी है और इसका विरोध किया जाना चाहिए। मानव समाज के इस सबसे मूल्यवान खजाने को बचाने, बनाए रखने और बढाने की कोशिश की जानी चाहिए, जिसमें एक व्यक्ति के सम्मान को बेहद अहमियत दी जाती है।
जातिगत टिप्पणियों का विरोध
इसे संयोग कहें या कुछ और, इस शो में मेरे भावनात्मक उफान के अगले ही दिन एक अन्य हास्यास्पद विवाद की खबरें छाई रहीं। माधुरी दीक्षित की फिल्मों में वापसी वाली फिल्म आजा नच ले पर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने प्रतिबंध लगा दिया। बॉलीवुड में हमारे जैसे ढेरों लोग यह जानने को उत्सुक थे कि कैसे एक निर्दोष-सी फिल्म पर इतनी कडी प्रतिक्रिया हो सकती है! जब हमने यह जानने की कोशिश की तो मालूम हुआ कि माननीय मुख्यमंत्री को फिल्म के एक गीत पर एतराज था और उनके अनुसार यह गीत दलित भावनाओं को आहत करता है। इस गीत की एक पंक्ति में आए .. कहे मैं सुनार हूं.. जैसे शब्दों को लेकर बखेडा खडा हो गया। माना गया कि इस पंक्ति से एक समुदाय को आपत्ति हो सकती है। उसी दिन शाम को नेशनल चैनल ने इस विवाद को लेकर मुझसे टेलीफोन पर लाइव प्रतिक्रिया मांगी तो मैंने अपनी निजी भाईचारे की भावना के बावजूद विरोधियों का ही पक्ष लिया। बाद में मैंने खुद से पूछा-ऐसा मैंने क्यों किया? मुझे इसका क्या फायदा मिला? मुझे मायावती की राजनीति से न नफा है, न कोई नुकसान, न ही मैं दलित राजनीति करना चाहता हूं। कारण सीधा-सादा है। मैं महज हाशिए पर खडे लोगों और शताब्दियों तक दबाए-कुचले गए लोगों के पक्ष में खडा हूं, जो अब विरोध के स्वर मुखर करने लगे हैं। दरअसल, सच तो यह है कि अपनी भाषा, रूपकों या बिंबों में हम कहीं न कहीं परंपरागत और युगों से चले आ रहे इन पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाते हैं। खुशी की बात है कि मुख्यमंत्री ने इन पूर्वाग्रहों को चोट पहुंचाने के लिए बॉलीवुड का सहारा लिया। उनका कहना था कि उस समुदाय को भी समाज के तमाम अन्य तबकों की तरह सम्मानजनक ढंग से जीने का अधिकार है। यह इस बात की ओर इंगित करता है कि 21वीं सदी के पहले दशक में दलितों के प्रति बेहतर व्यवहार की मांग ज्यादा स्पष्ट ढंग से मुखरित हुई है और बॉलीवुड को इस लडाई में नेतृत्वकारी भूमिका निभानी है।
हाशिए पर खडे लोगों का गीत
बीते दिनों के बारे में सोचता हूं तो महसूस करता हूं कि बॉलीवुड ने अपनी कहानियों में व्यक्ति के सम्मान और इज्जत की इस भावना को प्रतिस्थापित ही किया है। फिल्म फिर सुबह होगी में साहिर लुधियानवी साहब के लिखे हुए एक गीत ने अपना खास मुकाम बनाया। गीत के बोल इस प्रकार थे -
माना कि अभी तेरे-मेरे अरमानों की कीमत कुछ भी नहीं, मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, इंसानों की कीमत कुछ भी नहीं, इंसानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में ना तोली जाएगी, वो सुबह कभी तो आएगी..।
यह फिल्म काफी हद तक दोस्तोवोस्की के नॉवेल क्राइम एंड पनिशमेंट पर आधारित थी, साथ ही तत्कालीन नेहरूकालीन भारत में असहाय लोगों के हक में एक भावनात्मक निवेदन करती थी। आजाद भारत में जब हजारों प्रवासी अपने लिए बेहतर िजंदगी की तलाश में निकल पडे थे और जिस तरह तमाम शहर उनके दबाव तले बिखर रहे थे, उस समूचे घटनाक्रम पर यह फिल्म मानवीयता की उत्कंठा लिए एक राजनीतिक टिप्पणी करती थी। यह गीत दर्शाता था कि किस तरह गरीब और मुफलिस युगों से अपने सम्मान की खातिर तन और मन से एकजुट होकर लड रहे हैं। भारतीय सिनेमा का स्वर्णयुग कहे जाने वाले पचास के दशक में ऐसी थीम्स पर खासा काम किया गया।
जमीर और सम्मान की लडाई
राज कपूर की फिल्म श्री 420 की कहानी भी यही दिखाती थी कि असह्य भुखमरी और गरीबी की हालत में भी लोग अपने जमीर को िजंदा रखते हैं, अपने आत्मसम्मान को गिरवी नहीं रखते, जबकि दूसरी तरफ धनी लोग समाज के तमाम मानदंडों का मखौल उडाते हैं लेकिन वे अपने पैसे और ताकत के बल पर समाज में प्रतिष्ठित और सम्माजनक िजंदगी बिताते हैं।
एक अन्य उदाहरण है फिल्म मदर इंडिया का। ऑस्कर के लिए नामांकित इस पहली भारतीय फिल्म में मां बनी नरगिस दत्त शत्रु की बेटी की अस्मिता और सम्मान के लिए अपने ही बेटे की हत्या कर देती है। एक स्त्री का अपमान मां की नजर में असह्य था, भले ही वह शत्रु की बेटी क्यों न हो। अपने कलेजे के टुकडे को खुद खत्म करने के मार्मिक दृश्य आज तक लोगों के जेहन में अंकित हैं। इस मां को पूरे समाज की संवेदना और सराहना प्राप्त होती है और लोग इस मां को मदर इंडिया कहने लगते हैं। निर्माता बिमल रॉय ने अपनी फिल्मों के जरिए हमेशा अन्याय और गैर-बराबरी के िखलाफ आवाज उठाई, फिर चाहे यह असमानता धार्मिक, आर्थिक स्तर पर हो या सामाजिक स्तर पर। अछूत समस्या को लेकर उन्होंने फिल्म सुजाता बनाई। फिल्म में एक अछूत लडकी अपना पालन-पोषण करने वाली ब्राह्मण मां की जान बचाती है, उन्हें रक्तदान कर। इस तरह ब्राह्मण परिवार और समाज में वह सम्मान हासिल करती है, जो उसे अछूत होने के चलते कभी नहीं मिल सकता था। फिल्मी पर्दे पर ईमानदारी, सच्चरित्रता और सच्चाई का पक्ष लेने वाले पात्र दर्शकों की वाहवाही प्राप्त करते हैं और सम्मान के काबिल समझे जाते हैं। पात्रों में थोडे-बहुत शारीरिक अंतरों और बॉडी लैंग्वेज के माध्यम से दर्शक को बताया जाता है कि यह अच्छा व्यक्ति है या बुरा। अच्छा व्यक्ति हमेशा बुजुर्गो और कमजोरों का सम्मान हासिल करता है, उनके चरण स्पर्श कर या उन्हें प्रणाम कर, स्त्रियों और अधिकारविहीनों का सम्मान कर, जबकि विलेन या खलनायक मर्यादाहीन व्यवहार कर सामाजिक अच्छाइयों को बिगाडने का काम करते हैं..।
रचनात्मकता का संघर्ष
जहां तक मुझे याद आता है, उन दिनों हिंदी सिनेमा में दो महान प्रेम कहानियां एकसाथ आया करती थीं। पहले ढंग की कहानी में नायक के एंद्रिक प्रेम को दर्शाया जाता था, जिसमें गीत-नृत्य, आंसुओं और दिल टूटने की गाथा होती थी। जबकि दूसरी कहानी का नायक संसार से सम्मान और प्रेम पाने को आतुर रहता, अपनी सामाजिक-आर्थिक पहचान के लिए संघर्षरत रहता। समय के साथ यह दूसरी कहानी अधिक महत्वपूर्ण होती गई, प्रेम कहानी पीछे चली गई..। विगत समय में प्यासा इस लिहाज से एक महान फिल्म थी, जिसमें एक कलाकार अपनी कला के बल पर सम्मान पाने की हसरत रखता है, लेकिन अंतत: दुनियावी एहसास उसे इस कबीरी नतीजे तक पहुंचा देते हैं कि यहां इस संसार में हमेशा मुर्दो को ही पूजा जाता है। इस फिल्म का गीत, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हो.. भी खासा चर्चित रहा।
सम्मान भावना में कमी
समाज में सम्मान भावना में आया यह ह्रास मानव निर्मित है। ठीक अकाल और सूखे की तरह, जब उस जिजिविषा का ही अंत हो जाता है, जो पृथ्वी पर मनुष्य के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए जरूरी है। प्राकृतिक आपदाएं संतुलन स्थापित करने का प्रकृति का अपना एक तरीका हैं। सम्मान मनुष्य द्वारा मनुष्य को दिया गया वह खास गुण है, जिसके द्वारा समाज में शक्ति-संतुलनको अक्षुण्ण बनाए रखने का प्रयास किया जाता रहा है। इसीलिए नेतृत्व करने वाले हमेशा महत्वपूर्ण हुआ करते हैं, अनुयायी सदैव उनके पीछे चलते हैं।
मुझसे न पूछें कि क्यों, मगर हमारी निजी अवधारणा काफी हद तक इस पर निर्भर करती है कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं। हम खुद को दूसरों की नजर में अच्छा बनाए रखना चाहते हैं, िजंदगी भर सम्मान हासिल करने के लिए दुनिया की तरफ देखते हैं ताकि खुद के प्रति अच्छा महसूस कर सकें। हम इस बात से नफरत कर सकते हैं, लेकिन इससे इनकार नहीं कर सकते कि दुनिया की नजर में उच्च स्तर या सम्मान हासिल करना एक ऐसा विचार है जो बहुतों द्वारा किसी एक को दिया जाने वाला सबसे शानदार इहलौकिक तोहफा है। लगभग हर समय में विभिन्न समाजों ने विभिन्न समूहों को यह सम्मान दिया है। पुराने समय में उपदेशकों, सैनिकों, शाही घरानों और शासकों ने अपने समाज या प्रजा से यह अनमोल उपहार प्राप्त किया। राजशाही या कुलीन समाजों में यह तो संभव था कि दुकानदार या व्यापारी धनी हो जाएं, लेकिन उन्हें समाज के वैसे सम्मानित सदस्य की तरह नहीं देखा जाता था, जिस तरह तथाकथित ऊंची जाति वालों को देखा जाता था। यहां ऊंची जाति शासक वर्ग का प्रतीक है।
पैसे से तौली जाने लगी प्रतिष्ठा
मगर फिर एक समय ऐसा भी आया, जब सम्मान इस स्तर पर मिलने लगा कि आपके पास कितना संग्रह है, यानी आप भौतिक स्तर पर कितने समृद्ध हैं। ऐसे समय में बिजनेसमैन नए शासक के बतौर स्थापित हुए। यह नतीजा था पश्चिम में हुई औद्योगिक क्रांति और अमेरिका में तीस के दशक में आए बिखराव का। अंतत: आजादी के बाद इसने भारत को भी अपने लपेटे में ले लिया और सम्मान का आधार ही पैसा होता चला गया।
आज, आपकी हैसियत तभी कुछ है, जबकि बैंक में दस अंकों का रोकडा आपके नाम जमा हो। ऐसे समाज में जब करोड की कीमत वही हो चुकी है, जो कल तक लाख की थी। समाज की सबसे मजबूत करेंसी यानी सम्मान को ही खत्म कर दिया गया है। यह समय ऐसा है, जब येन-केन-प्रकारेण सभी शीघ्र से शीघ्र धनी हो जाना चाहते हैं। सुखोपभोग और पैसे की हमारी ललक तात्कालिक सुख प्राप्ति का माध्यम हो चुकी है। यूज एंड थ्रो वाले इस युग में न सिर्फ चीजों की खरीद-फरोख्त कर, उनका उपभोग कर उन्हें फेंक दिया जा रहा है, बल्कि लोगों को भी इस्तेमाल कर फेंक देने की प्रवृत्ति बढती जा रही है। निठारी जैसे जघन्य और पाशविक कांड इसी हवस की परिणति हैं। इसीलिए आज टीवी पर मनुष्य द्वारा मनुष्य पर की जाने वाली क्रूर और रक्तरंजित कहानियों की भरमार है। सामाजिक पतनशीलता की पराकाष्ठा है यह।
हर आर्थिक सफलता को सांस्कृतिक नव-जागरण का अनुयायी होने की आवश्यकता है। समय है कि उभरते हुए भारत को अपने युवाओं को यह सिखाना चाहिए कि सच्चे सम्मान का मूल्य समाज के लिए क्या है। हाल ही में आई फिल्म तारे जमीन पर में आमिर खान ने जन्मजात मानसिक रोग से ग्रस्त बच्चों के प्रति यह सम्मान प्रदर्शित किया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक-दूसरे के प्रति सम्मान और शुभकामना प्रदर्शित करने की भारतीय परंपरा दोनों हाथों को जोडकर प्रणाम करने की है। इस प्रणाम का अर्थ है, मैं आपके भीतर मौजूद उस परमपिता परमेश्वर के प्रति नतमस्तक हूं। चलें, अपनी दुनिया को पीछे छूट चुकी संस्कृति का दर्शन कराएं और एक सादगीमय प्रणाम के नए अर्थ खंगालें।

Friday, September 26, 2008

फिल्म समीक्षा:हरि पुत्तर

माहौल खराब करती है हरि पुत्तर जैसी फिल्में
फिल्म के निर्माता-निर्देशक ने हैरी पाटर से मिलता जुलता नाम हरि पुत्तर रखकर भले ही चर्चा पा ली हो, लेकिन इस फिल्म की जितनी भ‌र्त्सना की जाए कम है। बच्चों के लिए ऐसी अश्लील, फूहड़ और विवेकहीन फिल्म की कल्पना किसी अपराध से कम नहीं।
भारत में बच्चों के लिए बनाई जाने वाली फिल्मों की वैसे ही कमी है। लेकिन हरि पुत्तर जैसी फिल्में माहौल को और भी गंदा व खराब करती हैं। विदेशी फिल्म से प्रेरणा लेकर बनाई गई इस फिल्म को घटिया ढंग से लिखा और फिल्मांकित किया गया है। हरि अपने माता-पिता के साथ इंग्लैंड रहने चला गया है। वहां एक दिन परिवार के सभी लोग भूल से उसे छोड़कर पिकनिक पर निकल जाते हैं। कहानी यह है कि कैसे वह गुप्त मिशन में लगे अपने पिता के प्रोजेक्ट की चिप की रक्षा करता है?
यह फिल्म रोचक बन सकती थी लेकिन इसे देखकर तो यही लगता है कि हम बच्चों को कामेडी के नाम पर क्या परोस रहे हैं? सारिका और जैकी श्राफ ने इतना बुरा काम कभी नहीं किया। बाल कलाकार जैन खान को दी गई हिदायतें ही फूहड़ है, इसलिए उनके अभिनय में फूहड़ता दिखती है। सौरभ शुक्ला और विजय राज के बुरे अभिनय के लिए भी हरि पुत्तर याद की जा सकती है। यदि इस साल की सबसे बुरी फिल्मों की सूची बने तो हरि पुत्तर टॉप-5 में रहेगी।

'द्रोण' में मेरा लुक और कैरेक्टर एकदम नया है-अभिषेक बच्चन


-अजय ब्रह्मात्मज

कह सकते हैं कि अभिषेक बच्चन के करिअर पर थ्री डी इफेक्ट का आरंभ 'द्रोण' से होगा। यह संयोग ही है कि उनकी आगामी तीनों फिल्मों के टाइटल 'डी' से आरंभ होते हैं। 'द्रोण', 'दोस्ताना' और 'दिल्ली-६' में विभिन्न किरदारों में दिखेंगे। 'द्रोण' उनके बचपन के दोस्त गोल्डी बहल की फिल्म है। इस फंतासी और एडवेंचर फिल्म में अभिषेक बच्चन 'द्रोण' की शीर्षक भूमिका निभा रहे हैं। पिछले दिनों मुंबई में उनके ऑफिस 'जनक' में उनसे मुलाकात हुई तो 'द्रोण' के साथ ही 'अनफारगेटेबल' और बाकी बातों पर भी चर्चा हुई। फिलहाल प्रस्तुत हैं 'द्रोण' से संबंधित अंश ...

- सबसे पहले 'द्रोण' की अवधारणा के बारे में बताएं। यह रेगुलर फिल्म नहीं लग रही है।
0 'द्रोण' अच्छे और बुरे के सतत संघर्ष की फिल्म है। सागर मंथन के बाद देवताओं ने एक साधु को अमृत सौंपा था। जब साधु को लगा कि असुर करीब आ रहे हैं और वे उससे अमृत छीन लेंगे तो उसने अमृत घट का राज प्रतापगढ़ के राजा वीरभद्र सिंह को बताया और उनसे सौगंध ली कि वे अमृत की रक्षा करेंगे। इसी कारण उन्हें 'द्रोण' की उपाधि दी गयी। मैं इस फिल्म में आदित्य की भूमिका निभा रहा हूं। मैं वीरभद्र सिंह के वंश का हूं। इस पीढ़ी में मेरा दायित्व है कि मैं अमृत की रक्षा करूं, इसलिए मुझे द्रोण की उपाधि दी जाती है। आदित्य इन चीजों से अंजान सामान्य जिंदगी जी रहा होता है, लेकिन एकबारगी उसकी जिंदगी बदल जाती है।
- एक तरह से आप डबल रोल निभा रहे हैं। एक ही किरदार खास परिस्थिति में बदल जाता है?
0 जी हां, मैं पहले सामान्य युवक आदित्य हूं। 'द्रोण' की उपाधि मिलने के बाद मेरी जिंदगी बदल जाती है। मेरा दायित्व बढ़ जाता है। मेरे जीवन शैली में बदलाव आ जाता है। अब मुझे अपनी मां के साथ अमृत की रक्षा करनी है। देवताओं को दिए गए सौगंध की लाज रखनी है और असुरों को भी हराना है।
- इस फिल्म को लेकर कहा जा रहा है कि यह अभिषेक बच्चन की सुपरहीरो फिल्म है?
0 मालूम नहीं, कहां से यह बात फैली है। यह सुपरहीरो फिल्म नहीं है। द्रोण के पास कोई सुपरपावर नहीं है। वह एक शक्तिशाली राजा जरूर है। उसकी शक्तियां अलौकिक लग सकती हैं, लेकिन वह कहीं से भी सुपरहीरो नहीं कहा जा सकता।
- इस फिल्म की योजना कैसे बनी?
0 गोल्डी पहले किसी और विषय पर फिल्म लिख रहे थे। वह क्राइम थ्रिलर थी। उन्हें अचानक इस विषय का खयाल आया। उन्होंने 'गुरु' की शूटिंग के दौरान आकर मुझ से बात की और कहा कि बड़े पैमाने पर वे एक फिल्म की योजना बना रहे हैं। मैंने उनसे इतना ही कहा कि अगर आप अपने विषय को लेकर आश्वस्त हैं तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है। गोल्डी के साथ मेरा ऐसा ही रिश्ता है। मुझे भी लगा कि मैं 'द्रोण' करूं या न करूं, लेकिन मैं इसे देखना चाहूंगा। इस विषय ने मुझे इतना आकर्षित किया कि मैंने गोल्डी को फट से हां कह दिया।
- इस फिल्म में विरासत की बात की गयी है। अभिषेक बच्चन स्वयं और द्रोण के किरदार के रूप में उसे कितना महत्व देते हैं?
0 'द्रोण' का वजूद ही इस विरासत की वजह से है। मैं अपनी बात करूं तो मैं विरासत को बहुत महत्व देता हूं। मेरे माता-पिता, दादा-दादी और उनसे भी पहले के हमारे पूर्वजों ने हमें विरासत सौंपी है। हमें उसकी रक्षा करने के साथ उसे आगे भी बढ़ाना चाहिए। हम क्या हैं? वास्तव में हम उसी विरासत के हिस्से हैं। मेरे लिए दादा जी द्वारा दिया गया बच्चन नाम और उसकी विरासत सबसे मूल्यवान धरोहर है। मैं उस पर गर्व करता हूं।
- 21वीं सदी में विरासत की बात करना ... क्या ऐसा नहीं लगता कि यह सामंती सोच है?
0 इसे सामंती व्यवस्था और मूल्यों से जोड़ कर न देखें। विरासत क्या है? मेरे लिए यह पिता और दादा द्वारा दिए गए मूल्य और सिद्धांत हैं, जो किसी भौतिक संपदा से अधिक मूल्यवान हैं।
- निजी तौर पर आपके लिए 'द्रोण' का अनुभव कैसा रहा? यह रेगुलर किस्म की फिल्म नहीं है और न ही आपका किरदार हिंदी फिल्मों का रेगुलर हीरो है?
0 मेरे लिए तो बहुत ही अलग रहा। मैंने 'द्रोण' जैसी कोई फिल्म पहले नहीं की थी। मुझे नहीं लगता कि जल्दी ही कोई दूसरा मौका भी नहीं मिलेगा। यह फिल्म बड़े पैमाने पर बनी है। मेरी अभी तक की सबसे महंगी फिल्म है 'द्रोण'। इस फिल्म का लुक और मेरा कैरेक्टर एकदम नया है। मुझे इस लाइन पर बनी कोई और हिंदी फिल्म याद नहीं आती। यह अपनी तरह की पहली फिल्म है और यही सबसे बड़ी चुनौती रही। मेरे लिए कोई रेफरेंस पाइंट नहीं था।
- किस तरह की चुनौतियां या मुश्किलें रहीं?
0 बड़ी फिल्म की मुश्किलें भी बड़ी होती हैं। अगर हम बड़ा काम करते हैं तो उसकी जांच होती रहती है। हमें अपनी मेहनत और लगन से वह अर्जित करना पड़ता है। मुश्किलें स्वाभाविक रूप से आती हैं। प्राग में ऐसी बर्फ गिरी की दो दोनों तक हम बैठे रहे। बीकानेर जैसी जगह में ऐसी बारिश हुई कि सेट बह गया। नामीबिया में शूटिंग कर रहे थे तो चक्रवात आया। हम ने तो सोचा भी नहीं था कि ऐसा कुछ होगा।
- ऐसी फिल्म में अभिनय और अभिव्यक्ति की निरंतरता पर कितना ध्यान पड़ता है?
0 हर फिल्म में वैसी निरंतरता पर ध्यान देना पड़ता है। एक एक्टर की मेहनत किसी भी फिल्म में कम नहीं होती। ऐसी फिल्मों में दूसरों की मेहनत बढ़ जाती है कि क्या पहना था और आगे क्या पहनना है? उसमें एक कंटीन्यूटी रखनी पड़ती है। इस किरदार के लिए मुझे पांच-छह चीजों का प्रशिक्षण लेना पड़ा। फिल्म में मेरा कॉस्ट्यूम 10 से 15 किलोग्राम के बीच रहता था। वह पहन कर चलना पड़ता था। मुझे मजा आया।
- इस फिल्म में अंडरवाटर स्टंट भी किया है आपने?
0 जी हां, और वह बहुत खतरनाक था। मुझे बगैर ऑक्सीजन मास्क के पानी में रहना था। स्टंट के समय अपनी सांसें रोक कर रखनी थी। अगर आक्सीजन की अचानक जरूरत महसूस हो तो सहायता के लिए एक आदमी रहता था। 20 फीट गहरे पानी के टैंक में इसकी शूटिंग हुई थी। पहले दिन तो पानी के दबाव के कारण नाक से खून बहने लगा था। रोजाना आठ से नौ घंटे पानी में शूटिंग करनी पड़ी थी। मैं उस कठिन शूटिंग को नहीं भूल सकता। उसका अलग रोमांच था।
- आप एक सुपरस्टार के बेटे होने के साथ दुनिया की सबसे खूबसूरत इंटरनेशनल आइकॉन के पति भी हैं। इनके कारण कोई दबाव या चुनौती महसूस करते हैं?
0 बिल्कुल नहीं। न ही कोई दबाव रहता है और न कोई चुनौती महसूस करता हूं। मैं इसके बारे में सोचता ही नहीं। अगर यह सब देखने और सोचने लगूं तो अपनी नार्मल जिंदगी तबाह कर लूंगा। मुझे अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करते हुए काम करना चाहिए और परिणाम दर्शकों पर छोड़ देना चाहिए। मैं वही करता हूं।
- अब पिता अमिताभ बच्चन से आपकी तुलना नहीं की जाती। आप ने अपनी जगह पा ली है क्या?
0 मैं नहीं कह सकता कि मेरी कोई जगह बनी है या नहीं। लोग पहले पापा से मेरी तुलना करते थे और यह नैचुरल था। बाद में उन्हें लगा कि मेरी शैली अलग है। अगर कोई समानता दिखती है तो भी मैं शर्मिंदा नहीं हूं। मैं उनका बेटा हूं। उनके गुण मुझ में आने और रहने चाहिए। अगर कोई कहता है कि मैं तो अमिताभ बच्चन की तरह एक्टिंग करता हूं तो मेरे लिए यह बड़ी सराहना है। आप अमिताभ बच्चन को एक्टर के तौर पर देखें और फिर उनसे मेरी तुलना का महत्व समझें।

- मां के साथ भी आ रहे हैं आप 'द्रोण' में?

0 मां के साथ एक और फिल्म कर चुका हूं। मां तो मां हैं। शॉट के बाद वह मां हो जाती हैं। मैं चाहूंगा कि उनके साथ एक पूरी फीचर फिल्म करूं। इसमें उनका रोल बहुत छोटा है। उनके साथ काम करने में मजा आया। मां के साथ तो दुलार पाना निश्चित है।




Thursday, September 25, 2008

फिल्मों की आय से भी बनती है राय

-अजय ब्रह्मात्मज
यह चलन कुछ समय से तेज हुआ है। फिल्म रिलीज होने के कुछ दिनों और हफ्तों के बाद अखबारों, ट्रेड पत्रिकाओं और इंटरनेट पर विज्ञापनों और खबरों के जरिए निर्माता फिल्म के ग्रॉस कलेक्शन की जानकारी देता है। यह आंकड़ा काफी बड़ा होता है। ऐसा लगता है कि फिल्म ने खूब व्यवसाय किया है और इसीलिए कलेक्शन इतना तगड़ा हुआ है। दरअसल, इस अभियान के पीछे निर्माता की मंशा और कोशिश यही रहती है कि फिल्म हिट मान ली जाए, क्योंकि अगर फिल्म के प्रति धारणा बन गई कि वह हिट है, तो उससे निर्माता को फायदा होता है। दरअसल, निर्माता आगामी फायदे के लिए आंकड़ों का झूठ गढ़ता है। वह आम दर्शकों समेत ट्रेड को भी झांसा देता है, जबकि ट्रेड पंडित वास्तविक आय के बारे में अच्छी तरह जान रहे होते हैं।
गौर करें, तो ग्रॉस कलेक्शन झूठ से अधिक झांसा है। आंकड़ा सही रहता है, लेकिन वास्तविक आय कुल आमद की दस-पंद्रह प्रतिशत ही होती है। चूंकि आम दर्शक और सामान्य पाठक इन आंकड़ों के समीकरण से वाकिफ नहीं होते, इसलिए ग्रॉस कलेक्शन देखकर फिल्म को हिट मान लेते हैं। इस कलेक्शन में वितरक और प्रदर्शक के शेयर शामिल रहते हैं। इसके अलावा, फिल्म प्रदर्शन के विभिन्न अधिकारों को बेचने से होने वाली आय भी उसमें जोड़ दी जाती है। यहां तक कि आयकर विभाग को दिया जाने वाला कर भी घटाया नहीं जाता! जाहिर-सी बात है कि सभी स्रोतों से आनेवाली रकम का कुल योग भारी मुनाफे का भ्रम देता है और इससे फिल्म का मार्केट भी बनता है। फिल्म कुछ और दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचने में सफल होती है। ट्रेड सर्किल में सफलता का आडम्बर बना रहता है। ट्रेड पंडित ग्रॉस कलेक्शन के झांसे की परम्परा में ठीक-ठीक बता सकते हैं। कहते हैं, इसकी शुरुआत अनजाने में हुई थी। शोमैन सुभाष घई की फिल्म खलनायक की रिलीज के समय की बात है। उस फिल्म की रिलीज के समय संजय दत्त पर गैरकानूनी तरीके से हथियार रखने का अभियोग लगा था। खलनायक पर्दे और वास्तविक जिंदगी के मेल से कामयाब रही थी। कुछ हफ्तों के बाद घई ने ट्रेड पत्रिकाओं में ग्रॉस कलेक्शन का विज्ञापन दिया था। तब यह रकम दस करोड़ बताई गई थी। अपने समय के हिसाब से किसी फिल्म के लिए वह बहुत बड़ी रकम थी। इस प्रसंग का मजेदार पहलू यह है कि विज्ञापन छपने के कुछ ही दिनों के अंदर ही आयकर अधिकारी घई के ठिकाने पर पहुंच गए थे। दस करोड़ की आय हो और आयकर अधिकारी निष्क्रिय रहें? ऐसा कैसे हो सकता था! पिछले दिनों एक मुलाकात में घई ने उस घटना को सुनाने के साथ ही बताया था कि उनकी वास्तविक आय पचहत्तर लाख से ज्यादा नहीं थी। शोमैन ने निस्संकोच जानकारी दी कि हिट समझी जाने वाली ताल से उन्हें नुकसान हुआ था, जबकि फ्लॉप मानी गई यादें उन्हें मुनाफा दे गई थी। फिल्मों के हिट या फ्लॉप होने की धारणाएं सच नहीं होतीं।
सचमुच हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में झूठ और झांसे का कारोबार चलता है। यहां जो दिखता है, वही वास्तविकता नहीं है, क्योंकि वह नियोजित तरीके से दिखाया जाता है। उसके पीछे लाभ की मंशा रहती है। जो वास्तविकता होती है, उस पर झूठ का मुलम्मा चढ़ा दिया जाता है और कोई भी उन्हें खुरचकर तह तक नहीं पहुंचना चाहता। मीडिया को इतनी फुर्सत नहीं है और अगर किसी ने व्यक्तिगत रुचि लेकर कुछ जानने-समझने की कोशिश भी की, तो ऐसी तरकीब नहीं है कि सच जाना जा सके! लिहाजा झूठ का व्यापार चलता रहता है।

बॉक्स ऑफिस:२६.०९.२००८


वेलकम टू सज्ज्जनपुर को मिले दर्शक

पिछले हफ्ते की तीनों ही फिल्में कामेडी थीं। सीमित बजट की इन फिल्मों में कोई पॉपुलर स्टार नहीं था। कमर्शियल दृष्टिकोण से देखें तो इन सभी में सबसे ज्यादा पॉपुलर अमृता राव को माना जा सकता है। वह वेलकम टू सज्जनपुर में थीं।


वेलकम टू सज्जनपुर श्याम बेनेगल की फिल्म है। कह सकते हैं कि उन्होंने पहली बार इस विधा की फिल्म बनाने की कोशिश की और सफल रहे। वेलकम टू सज्जनपुर को दर्शक मिल रहे हैं। शुक्रवार को इस फिल्म को ओपनिंग उल्लेखनीय नहीं थी, लेकिन शनिवार के रिव्यू और आरंभिक दर्शकों की तारीफ से इसके दर्शकबढ़े। इस फिल्म के लिए 40-50 प्रतिशत दर्शक कम नहीं कहे जा सकते। इस फिल्म को छोटे शहरों में आक्रामक प्रचार के साथ अभी भी ले जाया जाए तो कुछ और दर्शक मिलेंगे। यह भारतीय गांव की कहानी है, जहां हंसी के लिए सीन नहीं लिखने पड़ते।


बाकी दो फिल्मों में हल्ला के निर्देशक जयदीप वर्मा अपनी फिल्म को मिली प्रतिक्रिया से दुखी और नाराज है। उन्हें लगता है कि उनकी उद्देश्यपूर्ण फिल्म को किसी साजिश के तहत नकार दिया गया। ऐसा नहीं है। फिल्म ही बुरी थी। उन्हें आत्मावलोकन करना चाहिए। तीसरी फिल्म सास बहू और सेंसेक्स अज्छे इरादों के बावजूद फिल्म नहीं बन सकी। इन फिल्मों को दर्शक पलटकर देखने भी नहीं आ रहे हैं। पुरानी फिल्मों में विक्रम भट्ट की 1920 में हनुमान चालीसा का प्रभाव काम कर गया। दर्शक आ रहे हैं और नयी फिल्मों की रिलीज के बावजूद वह सिनेमाघरों में डटी हुई है।

इस हफ्ते हरि पुत्तर और रफूचक्कर रिलीज हो रही है। फिर से दोनों कामेडी फिल्में हैं।

Monday, September 22, 2008

हम फिल्में क्यों देखते हैं?-शशि सिंह

हिन्दी टाकीज-९
जिन खोजा तिन पाइया का मुहावरा शशि सिंह के बारे में सही बयान करता है. झारखण्ड के हजारीबाग जिले में स्थित कोलफील्ड रजरप्पा में पले-बढे शशि सिंह हिन्दी के पुराने ब्लॉगर हैं.सपने देखने-दिखने में यह नौजवान जितना माहिर है,उन्हें पूरा करने को लेकर उतना ही बेचैन भी है.अपनी जड़ों से गहरे जुड़े शशि सिंह ने प्रिंट पत्रकारिता शरुआत की थी.इन दिनों वे न्यू मीडिया (mobile vas) में सक्रीय हैं और वोडाफोन में कार्यरत हैं.शशि सिंह के आग्रह से आप नहीं बच सकते,क्योंकि उसमें एक छिपी चुनौती भी रहती है,जो कुछ नया करने के लिए सामने वाले को उकसाती है।

हम फिल्में क्यों देखते हैं? जाहिर सी बात है फिल्में बनती हैं,इसलिए हम फिल्में देखते हैं। यकीन मानिये अगर फिल्में नहीं बनतीं तो हम कुछ और देखते। मसलन, कठपुतली का नाच, तमाशा, जात्रा, नौटंकी, रामलीला या ऐसा ही कुछ और। खैर सौभाग्य या दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है,इसलिए हम फिल्में देखते हैं।

फ्लैश बैक
फिल्में देखने की बात चली तो याद आता है वो दिन जब मैंने सिनेमाघर में पहली फिल्म देखी। सिनेमा का वह मंदिर था,रामगढ़ का राजीव पिक्चर पैलेस। इस मंदिर में मैंने पहली पूजा स्कूल से निकलने और कॉलेज में दाखिले के पहिले की थी... वह भी अकेले। नाम तो ठीक-ठीक याद नहीं पर फिल्म में हीरोइन अपने अजय देवगन की श्रीमती (तब कुवांरी) काजोल थीं और शायद उनकी भी यह पहली ही फिल्म थी।

पहली फिल्म देखने में मैंने इतनी देर क्यों की? मुगालते में मत रहिये... शराफत के किस्से आगे हैं। खैर, झारखंड के हजारीबाग जिले में रजरप्पा प्रोजेक्ट कोलफील्ड की हमारी कॉलोनी नजदीकी शहर रामगढ़ से बीस किलोमीटर दूर थी और हम बच्चों की पूरी दुनिया कॉलोनी तक ही सीमित हुआ करती थी। लिहाजा शहर के सिनेमाघर में यह फिल्म देखना मेरे लिए नये अनुभवों से भरा बड़ा ही साहसिक कदम और था... उस दिन तो मानो खुले आसमान में पहली उड़ान-सा अहसास था।

अब चलिए जरा पीछे के कालखंड में चलकर फिल्में देखने के मेरे कारणों की पड़ताल करते हैं। तकरीबन 1500 घरों की हमारी कॉलोनी में पहला टेलिविजन सन 84 के आखिरी महीनों में और हमारे मुहल्ले में उसके कुछ महीने बाद यानी सन 85 में आया। यहीं से शुरू होता है फिल्म दर्शक बनने का मेरा सिलसिला।

नीले गगन के तले
हालांकि इससे पहले कॉलोनी के खुले मैदान में 16 एमएम प्रोजेक्टर से साप्ताहिक तौर पर दिखाई जाने वाली फिल्में देखी थी,पर यादें धुंधली है,इसलिए उस दौरान देखी गई फिल्मों का दोष घर के बुजुर्गों के मत्थे। वैसे ये अनुभव भले ही धुंधले हैं,मगर सिनेमा देखने का यह तरीका मुझे सबसे ज्यादा रोमांचित करता है।

खुले मैदान में साप्ताहिक सिनेमा का चलन इस इलाके के सभी कोलफील्ड के कॉलोनियों में था। रजरप्पा सहित कोल इंडिया की सभी कॉलोनियों में तो इस प्रथा को खत्म हुये सालों हो गये। मगर इसी इलाके के टिस्को यानी टाटा सन्स की कोलियरी वेस्ट बोकारो में यह प्रथा आज भी जिन्दा है। बात दीगर है कि यहां भी यह अब रस्मी दस्तूर भर रह गया है। उपयोगिता की बात करें तो यह वेस्ट बोकारो में रास्ते पर ठेले-खोमचे लगाने वालों को तो सिनेमा से जरूर जोड़े हुये है।

फिल्मों की नर्सरी टेलीविजन का आगमन
जैसा कि मैंने अपने मुहल्ले में टीवी आने का जिक्र किया। स्वाभाविक-सी बात है यह एक ऐतिहासिक घटना (मेरे फिल्मची बनने की जड़ें यहीं हैं) थी... और मुहल्ले के इस इतिहास के रचयिता थे बच्चों के चहेते तिवारी चचा। बाद में मुहल्ले के पहले रंगीन टीवी और पहले वीसीपी के स्वामित्व का सम्मान भी इन्हीं के खाते में आया।

बहरहाल, तिवारी चचा अपने घर टीवी आने के ऐतिहासिक आयोजन में हम बच्चों को शामिल करना नहीं भूले। शायद चचा को मालूम था कि हम बच्चे ही इस इतिहास के जीते-जागते पन्ने हैं,जिनके माध्यम से जमाने में उनकी कृतित्व को पढ़ा जायेगा। हुआ भी यही, आगे महीनों तक हम बच्चे चचा के शौर्य का यशगान करते रहे। इस मुनादी के लिए चचा हममें बिना नागा किये दूरदर्शन के कार्यक्रमों की आरएसएस फीड डालना नहीं भूलते थे।

घर वालों को भी हमारे टीवी देखने पर कुछ खास ऐतराज नहीं होता था। कारण एक तो मुहल्ले का लगभग हर घर तिवारी चचा के शौर्य के प्रभाव में आ चुका था और वह खुद भी दर्शकों में शामिल था, दूजा यह कि घर वालों को कुछ समय के लिए हमारे उधम से छुटकारा मिल जाया करता।

उन दिनों हमारे इतवार खास होने लगे। क्योंकि एक तो इतवार की शाम को टीवी पर फिल्में आती थीं, दूसरे सिर्फ इतवार को ही दिन में भी कार्यक्रम प्रसारित होते थे। हालांकि फिल्मी गीतमाला चित्रहार की वजह से बुधवार और शुक्रवार की भी खासी अहमियत थी।

शुरूआत में हमारे लिए फिल्म और कृषि दर्शन, चित्रहार और समाचार में ज्यादा अंतर नहीं था। हमारे लिए तो टीवी देखना ही एकमेव ध्येय था। शाम को सत्यम, शिवम, सुंदरम के उद्घोष के साथ दूरदर्शन के पट खुलने से लेकर जब तक झपकी न आने लगे तब तक बच्चे चचा के घर डटे रहते थे। अक्सर हमसे से अधिकतर बच्चे टांगकर या बहला फुसलाकर घरों को लाये जाते। कभी-कभी तो हम दूरदर्शन के पट बंद होने तक उस पर टकटकी लगाये रहते थे।

खैर, समय बीतता गया। धीरे-धीरे हमें टीवी के दूसरे कार्यक्रमों और फिल्मों का फर्क समझ में आने लगा। कहने की जरूरत नहीं कि फिल्में हमें ज्यादा आकर्षित कर रही थीं। अब तक मेरे घर सहित मुहल्ले के कई घरों में टीवी के एंटिने दिखने लगे थे। लेकिन हमारे तिवारी चचा के घर की रौनक पर मुहल्ले के दूसरे एंटिना फर्क नहीं डाल सके थे। क्योंकि अब उनके टीवी के स्क्रीन पर तस्वीरें रंगीन दिखने लगी थीं। मुहल्ले के इतिहास के सूत्रधारों यानी हम बच्चों की अब भी चचा का वफादार बने रहना टीवी (ब्लैक एंड ह्वाइट ही सही) वाले घरों के अभिभावकों को खटकने लगा था। पर अक्सर उनकी झिड़कियों पर चचा का रंगीन टीवी भारी पड़ता था(आज फिल्मों में रंग-संयोजन के प्रति अपने संवेदनशीलता की वजह मैं इसे ही मानता हूं)।

वीएचएस क्रांति
अब उस दौर का आगमन होता है,जब फिल्में देखने के लिए उस दूरदर्शन पर निर्भरता कम होती जा रही थी, जिस पर सिर्फ पुरानी फिल्मों की ही चहल थी। वीएचएस क्रांति के इस दौर में हमारे फिल्म दर्शकत्व को एक नया आयाम मिला और हम नई फिल्में देखने में खुद को सक्षम पाने लगे। इस दौर को वीडियो युग कहना सबसे सही होगा। इस दौर में वीसीपी और वीसीआर का स्वामी होना मुहल्ले में किसी सल्तनत के सुल्तान-सी हैसियत दिलाता था। हालांकि मुहल्ले के पहले वीसीपी का मालिक होने का श्रेय भी अपने तिवारी चचा को ही जाता है, मगर तब तक बाज़ार में वीसीपी किराये पर देने का व्यवसाय शुरू हो चुका था। इस व्यवसाय की वजह से चचा की बैठक को किसी और बैठक से कड़ी चुनौती मिलने वाली थी।

यह चुनौती मिली मुहल्ले में एक ऐसे सदस्य के आगमन से,जो पुलिस सेवा में थे। इस परिवार के आने से हमारी वानर सेना की ताकत में तो इजाफा हुआ ही साथ ही मुहल्ले के लोगों की फिल्में देखने की आदत में आमूलचूल परिवर्तन हुआ।

हमारे ये नये पड़ोसी बाजार में उपलब्ध सेवाओं के इस्तेमाल से तो परहेज नहीं करते लेकिन पुलिस में थे इसलिए उसकी कीमत चुकाना अपनी शान के खिलाफ समझते। वीडियो पर फिल्में दिखाने का व्यवसाय करनेवालों पर तो ये मानो अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे।

अब इस तरह के सुविधा से लैस पड़ोसी के मुकाबले अपने तिवारी चचा कहां टिकने वाले थे, लिहाजा अब उन्होंने हथियार डाल दिया। इस मामले में ड्राइविंग सीट तो चचा ने छोड़ दी,लेकिन बस की सवारी नहीं छोड़ी। आखिर थे तो वो बहुत बड़े फिल्मची।

तिवारी चचा के फिल्म प्रेम से प्रेरणा और उनके संरक्षण में हम सब ने अपने पुलिस पड़ोसी के विशेषाधिकारों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। पुलिस पड़ोसी के नाम की धौंसपट्टी में इलाके के सभी वीडियो पार्लर वाले थे। बस जब भी इशारा होता पार्लर वाले वीसीपी और चार-पांच कैसेट तो देते ही देते वीडियो हॉल वाला अपना रंगीन टीवी भी ठेले पर लदवाकर हमारे मुहल्ले में पहुंचा जात थेे।

इस दौर में हमारे मुहल्ले में वीडियो फिल्म प्रदर्शन सार्वजनिक आयोजन का रूप ले चुका था। और जब आयोजन सार्वजनिक हो तो भव्य होना लाजिमी है। पुलिस पड़ोसी के राज में वीडियो प्रदर्शन कमरों से निकलकर बाहर खुले में होने लगे और एक-साथ कम-से-कम तीन-चार फिल्मों का प्रदर्शन अनिवार्य हो गया। इस तरह के आयोजनों की नियमितता लगभग साप्ताहिक होती थी। विशेष मौकों पर कभी-कभी यह आयोजन सप्ताह में एकाधिक बार होते। भव्यता की वजह से वीडियो लोकप्रियता में टीवी को भी पीछे छोड़ चुका था।

वीडियो का जादू उन दिनों इतना सिर चढ़ चुका था कि छोटे कस्बों में सिनेमाघर नहीं थे,वहां वीडियो हॉलों का जाल बिछ गया था। हमारी कॉलोनी के पड़ोस में स्थित ग्रामीण बाजार चित्तरपुर जैसी छोटी जगह में भी तीन-तीन वीडियो हॉल स्थानीय मांग को पूरा करने में असमर्थ थे। इतना ही नहीं लंबी दूरी की रात्रि बसों में वीडियो का न होना लगभग अनिवार्य शत्र्त हो चुकी थी। वीडियो कोचों की शुरुआत पहले रांची-पटना रूट की बसों से हुई, बाद में धीरे-धीरे लोगों के सिनेमा प्रेम और वीडियो की तकनीक के मेल ने लगभग सभी रूट की बसें वीडियो सुविधा से युक्त होने लगे।

यहां तक कि तिवारी चचा के घर वीसीपी आने से काफी पहले मैंने वीडियो पर अपने जीवन की पहली फिल्म बस में ही देखी थी। उस फिल्म का नाम आज भी मुझे याद है... फिल्म थी जीतेन्द्र अभिनीत 'कालभैरवÓ । अमूमन हमारा परिवार गांव जाने के लिए रामगढ़ से छपरा वाली बसों से सफर करता था, मगर तब तक उन बसों में वीडियो नहीं लगे थे। तो पापा ने हम चारों भाई-बहनों (एक बहन, तीन भाई) और मम्मी को वीडियो दिखाने के लिए छपरा के बजाय पटना वाली बस पकड़ी। थैक्यू पापा!!! अब पिता होने की वजह से समझ सकता हूं कि तब पूरे परिवार और सामान के साथ पटना से छपरा के लिए गाड़ी बदलने में कितनी तकलीफ हुई होगी। ये तकलीफ आपने हमें सिर्फ वीडियो दिखाने के लिए सही थी।

सैटेलाइट की छाया
हमारे इलाके में जब तक सैटेलाइट टीवी के केबल खींचे जाते हम स्कूल छोडऩे की दहलीज पर पहुंच चुके थे। अच्छा हां, यहां यह उल्लेख करना तो रह ही गया कि स्कूल के कई दूसरे साथियों की तरह मुझे स्कूल से भागकर वीडियो हॉल में फिल्में देखने का शौक बिल्कुल नहीं था। कारण दो थे, पहला तो हमारा मोहल्ले की फिल्मप्रेमी जनता इतनी सक्षम थी कि जब जी चाहे वीडियो हॉल हमारे मोहल्ले पहुंच जाता। दूसरा, कि मैं क्लास का मॉनिटर हुआ करता था,लिहाजा ऐसा करना न तो मैं अफोर्ड कर सकता था और न ही मुझे ऐसा करना शोभा देता। वैसे मेरी मॉनिटरी भागकर फिल्म देखने वाले कई दोस्तों को हेडमास्टर की मार से बचाने के काम जरूर आई।

हां तो बात सैटेलाइट दौर की... इस दौर में टीवी पर फिल्मों ने कम फिल्म आधारित कार्यक्रमों ने खास प्रभावित किया। विशेष तौर पर जी टीवी पर आने वाले तीन-चार कार्यक्रम मुझे खासतौर पर याद हैं... पहला फिलिप्स टॉप टेन, दूसरा अनु कपूर की अंताक्षरी, तीसरा सारेगमा और चौथा फिल्मी चक्कर। इसमें भी फिल्मी चक्कर मुझे खास पसंद था। सतीश शाह और रत्ना शाह अभिनीत इस कॉमेडी सीरियल में फिल्मों के पीछे दीवाने परिवार की कहानी गुदगुदा जाती थी।

बचपना खत्म हो चुका था। धीरे-धीरे अब हम जवानी की दहलीज पर आ चुके थे। फिल्मों के बारे में अब अपनी एक स्वतंत्र राय बन चुकी थी। फिल्में देखने में चूजी होते जा रहे थे। वैसे भी अब छोटे पर्दे पर फिल्में देखना पहले जितना मजा नहीं दे रहा था।

बड़ा पर्दा
बड़े पर्दे पर फिल्में देखने का सिलसिला कॉलेज के दिनों शुरू हुआ। कॉलेज की पढ़ाई के लिए कॉलोनी छोड़ हजारीबाग रहना होने लगा। बात 1992 दिसम्बर की है,जब मैंने संत कोलम्बस कॉलेज में दाखिला लिया। रहना होता था छात्र बहुल इलाका कोर्रा में और सिनेमा देखने के लिए शहर में चार सिनेमा हॉलों की सुविधा थी।

ये चारों थे लक्ष्मी, विशेश्वर, इंद्रपुरी और मोहन टॉकीज। इनमें लक्ष्मी और विशेश्वर एक ही प्रागंण में थे यानी आज के हिसाब से मल्टीप्लैक्स। बेहद भव्य और शहर की शान इस हॉल में अमूमन नई फिल्में लगती थी। इन्द्रपुरी की भी हालत अच्छी थी। चौथा मोहन टॉकीज कई मामलों में बाकियों से अलग था। आपने अब यही सुना होगा कि थियेटरों में सिर्फ शुक्रवार को ही फिल्में बदलती है, मगर हमारे मोहन टॉकीज के मामले में ऐसी कोई गारंटी नहीं थी। फिल्में किसी भी दिन बदल सकती थी। वैसे मोहन टॉकीज की सीटों में रहने वाले खटमल भी खासे मशहूर थे। शहर के सबसे पुराने और खस्ताहाल मोहन टॉकीज में मैंने पूरे पांच साल के अपने हजारीबाग प्रवास के दौरान सिर्फ डेढ़ फिल्में देखी थी। एक तो सनी देओल वाली 'बॉर्डरÓ और आधी फिल्म थी 'हम सब चोर हैंÓ। हम सब चोर हैं इतनी वाहियात फिल्म थी कि मैं और मेरा दोस्त विवेक इंटरवल से ज्यादा नहीं झेल पाये और निकल भागे।

इंद्रपुरी में उन दिनों नई के साथ-साथ कई बार पुरानी क्लासिक फिल्में दिखाई जाती थी। मार्निंग शो में लगने वाली ए श्रेणी वाली अंग्रेजी फिल्में इंद्रपुरी की शान थी। लेकिन इस हॉल को मैं याद करना चाहूंगा फिल्म 'दोस्तीÓ के लिए। दोस्ती फिल्म मैंने अपने परम मित्र और रूम पार्टनर विवेक के साथ देखी थी। फिल्म देखकर दोनों इतने भावुक हुई कि पूरे रास्ते हम दोनों अपनी दोस्ती की कसमें खाते आयें और तय किया कि हम अपनी दोस्ती ताउम्र कायम रखेंगे। मुझे फख्र है कि हम आज भी अपने वादे पर कायम है। इस घटना के साथ एक और मजेदार बात ये थी कि यह फिल्म हमने अपने बी.ए. पार्ट - टू की परीक्षा के दौरान देखी थी। यानी दो दिन की परीक्षा के बीच में मिले एक दिन के ब्रेक के दौरान। ये इसलिए भी खास है,क्योंकि परीक्षा के दिनों में छंटा से छंटा फिलिमची भी सिनेमा हॉल की तरफ रूख नहीं करता था।

लक्ष्मी और विशेश्वर हॉल तो हजारीबाग की शान और हम सब की पहली पसंद हुआ करता था। इसकी भव्यता और इसका विशाल प्रांगण इसे आसपास की इलाकों में एक दर्शनीय स्थान बनाता था। फिल्म 'खलनायकÓ को देखने उमड़ी भीड़ की टक्कर की भीड़ मैंने सिर्फ मुम्बई की लोकल ट्रेन या दिल्ली की बसों में देखी है। हजारीबाग जैसे छोटे से शहर में 1000 से ज्यादा सीटों वाले सिनेमा हॉल में फिल्म 'हम आपके हैं कौनÓ 17-18 हफ्ते तक चली थी। हालत ये थी... शहर में उन दिनों इस फिल्म के बाद ही शायद किसी बात की चर्चा होती थी। माधुरी प्रशंसक एक दोस्त ने तो यह फिल्म 36 बार देखी थी।

दौर बीत चुका
अब तो यह दौर भी बीत चुका है। अब सितारों की दुनिया भी करीब से देखता हूं... साथ में उठना-बैठाना और गपियाना भी होता है,मगर वो मजा नहीं आता जो तिवारी चचा की टीवी देखने में आता था। अभी पिछले दिनों ही गया था चचा से मिलने। 23 साल पुरानी वो रंगीन टीवी आज भी उनके बैठक की शोभा है और बिल्कुल ठीक-ठाक हालत में है। उस वक्त टीवी पर कार्यक्रम पता नहीं कौन-सा आ रहा था मगर मैं उसके स्क्रीन पर अपने बचपन को लाइव देख रहा था।

Friday, September 19, 2008

फ़िल्म समीक्षा:वेलकम टू सज्जनपुर


सहज हास्य का सुंदर चित्रण

-अजय ब्रह्मात्मज

श्याम बेनेगल की गंभीर फिल्मों से परिचित दर्शकों को वेलकम टू सज्जनपुर छोटी और हल्की फिल्म लग सकती है। एक गांव में ज्यादातर मासूम और चंद चालाक किरदारों को लेकर बुनी गई इस फिल्म में जीवन के हल्के-फुल्के प्रसंगों में छिपे हास्य की गुदगुदी है। साथ ही गांव में चल रही राजनीति और लोकतंत्र की बढ़ती समझ का प्रासंगिक चित्रण है।
बेनेगल की फिल्म में हम फूहड़ या ऊलजलूल हास्य की कल्पना ही नहीं कर सकते। लाउड एक्टिंग, अश्लील संवाद और सितारों के आकर्षण को ही कामेडी समझने वाले इस फिल्म से समझ बढ़ा सकते हैं कि भारतीय समाज में हास्य कितना सहज और आम है। सज्जनपुर गांव में महादेव अकेला पढ़ा-लिखा नौजवान है। उसे नौकरी नहीं मिलती तो बीए करने के बावजूद वह सब्जी बेचने के पारिवारिक धंधे में लग जाता है। संयोग से वह गांव की एक दुखियारी के लिए उसके बेटे के नाम भावपूर्ण चिट्ठी लिखता है। बेटा मां की सुध लेता है और महादेव की चिट्ठी लिखने की कला गांव में मशहूर हो जाती है। बाद में वह इसे ही पेशा बना लेता है। चिट्ठी लिखने के क्रम में महादेव के संपर्क में आए किरदारों के जरिए हम गांव की ऊंच-नीच, छल-प्रपंच और राजनीति को भी समझते चलते हैं।
श्रेयस तलपड़े ने महादेव की संजीदगी और सादगी को बेहद खूबसूरती से पर्दे पर पेश किया है। नई पीढ़ी के अभिनेताओं में हम श्रेयस को नेचुरल एक्टर के रूप में पाते हैं। अमृता राव सुंदर हैं और साधारण दिखने के लिए उन्हें अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती। कमला के किरदार को उन्होंने सहज तरीके से चित्रित किया है। रवि झांकल किन्नर मुन्नी बाई के रोल में प्रभावित करते हैं। रवि ने अपने बेधड़क अभिनय से किरदार को जीवंत कर दिया है। यशपाल शर्मा की स्वाभाविकता उल्लेखनीय है। वे अपने किरदारों के अनुरूप लगने लगते हैं।
फिल्म की खूबी भाषा की तरलता और मौलिकता है। शहरी दर्शकों को कुछ शब्दों को समझने में दिक्कत हो सकती है। वास्तव में पापुलर हिंदी फिल्मों ने हिंदी भाषा को दो-तीन हजार शब्दों में सीमित कर दिया है। फिल्म का गीत-संगीत पक्ष कमजोर है। थोड़े और भावपूर्ण गीत व मधुर संगीत की गुंजाइश थी। हां, पा‌र्श्व संगीत प्रभावशाली है। खासकर पृष्ठभूमि में दूर से आती लोक गीतों की आवाज गांव के माहौल को जिंदा कर देती है।

पीड़ा में दिलासा देती है प्रार्थना:महेश भट्ट



एक गोरी खूबसूरत औरत झुक कर कुरान की आयतें पढती हुई मेरे चेहरे पर फूंकती है। ताड के पुराने पत्तों से मेरे ललाट पर क्रॉस बनाती है। फिर गणेश की तांबे की छोटी मूर्ति मेरे हाथों में देती है, धीमे कदमों से दरवाजे की ओर लौटती है। जाते हुए कमरे का बल्ब बुझाती है। नींद के इंतजार में उस औरत की प्रार्थनाओं से मैं सुकून और सुरक्षा महसूस करता हूं।

मुश्किल वक्त की दिलासा
अपनी शिया मुस्लिम मां की यह छवि मेरी यादों से कभी नहीं गई। मां ने हिंदू ब्राह्मण से गुपचुप शादी की थी। वह मदर मैरी की भी पूजा करती थी। मेरे कानों में अभी तक गणपति बप्पा मोरया, या अली मदद और आवे मारिया के बोल गूंजते हैं। जब मैं कुछ सीखने-समझने और याद करने लायक हुआ तो पाया कि मैं कहीं भी रहूं, ये ध्वनियां हमेशा साथ रहती हैं। बीमारी या भयावह पीडा के समय पूरी दुनिया में लोगों ने इन शब्दों का जाप किया है। सोचा कि क्या सचमुच इन शब्दों में राहत देने की शक्ति है। यह वह समय था, जब देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। इसे विडंबना कहें कि जहां देवताओं की अधिकतम संख्या है, उसका प्रधानमंत्री घोषित रूप से नास्तिक था। उन्होंने सौगंध खाई कि वे अंधविश्वास मिटा देंगे और देश को वैज्ञानिक सोच से लैस करेंगे। दुर्भाग्य से उनकी लडाई में कम ही लोग साथ आए। सिनेमा की बात करें तो फिल्मों में प्रार्थना को पर्याप्त जगह दी गई।

अंधेरी राहों की मार्गदर्शक
व्ही. शांताराम की दो आंखें बारह हाथ का गीत ऐ मालिक तेरे बंदे हम भरत व्यास ने लिखा था। वसंत देसाई के संगीत निर्देशन में इसे लता ने गाया। यह गीत समय की धुंध में लुप्त नहीं हो सका, बहुत लोकप्रिय हुआ। मुझे नहीं लगता कि हिंदी फिल्मों का कोई दूसरा भजन इतना लोकप्रिय हुआ। सुनने वाले को उसकी असहायता एवं अक्षमता का बोध कराता है। बताता है कि वह ब्रह्मांड का कितना कमजोर-तुच्छ प्राणी है। यह गीत जब रेडियो पर आता था तो मां वॉल्यूम तेज करने को कहती थीं, जबकि दूसरे फिल्मी गीतों को सुनने पर सख्त हिदायत थी कि वॉल्यूम कम रखो।
तू प्यार का सागर है.. गीत मुझे याद आता है। शैलेंद्र के लिखे गीत को शंकर- जयकिशन ने स्वरबद्ध किया था। मन्ना डे की आवाज कानों में भक्ति रस घोलती है। 1955 में आई सीमा फिल्म में यह गीत बलराज साहनी और नूतन पर फिल्माया गया था। इस श्वेत-श्याम फिल्म की कांपती छवियां मेरी चेतना में हैं। नूतन निराशा की अतल गहराइयों में हैं, कुछ कर गुजरने को विवश हैं। उनकी अंतरात्मा की उथल-पुथल को स्वर देती यह आवाज बलराज के होठों से फूटती है और नूतन को बचाती है। बाद में तमाम फिल्मों में ऐसे गीतों का इस्तेमाल किया गया। मैंने भी इनका उपयोग किया।

सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश
सातवें दशक के आरंभ में देश को एक सांगीतिक उपहार मिला, जो उसके खजाने का कीमती हिस्सा बन गया। आज भी यह उपहार उतना ही महत्वपूर्ण है। हम दोनों फिल्म के लिए साहिर लुधियानवी ने एक गीत लिखा, अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम। देव आनंद की फिल्म के इस गीत को लता मंगेशकर ने आवाज दी थी। मेरे खयाल में यह दिल से निकली प्रार्थना है कि युद्ध समाप्त करो, बर्बरता एवं हिंसा खत्म करो। सभी के मन में एक-दूसरे के प्रति करुणा पैदा हो। यह गीत धर्मनिरपेक्ष भारत की सोच का प्रतिनिधित्व करता है।
भजनों और प्रार्थनाओं के बगैर हिंदी फिल्मी संगीत की क्या स्थिति होती? मेरी लेखिका मित्र शगुफ्ता रफीक कहती हैं, अतीत में जब हमारे लेखक किसी नेक किरदार को फिल्म में स्थापित करना चाहते थे तो उन्हें मंदिर या विशाल महल के पूजा घर में प्रार्थना करते दिखते थे। 21वीं सदी के फिल्मकार भी कुछ कुछ होता है और कभी खुशी कभी गम में इस शिल्प की नकल करते हैं। किसी ने सच ही कहा है कि चीजें जितनी बदलती हैं, उतनी ही मूल जैसी रहती हैं।

भक्ति संगीत की मांग ज्यादा
म्यूजिक इंडस्ट्री भजन एवं प्रार्थना से आमदनी सुनिश्चित करती है। अगर छठे दशक में मन्ना डे ने भजन गाए तो अनूप जलोटा और जगजीत सिंह आज गा रहे हैं। मैंने जगजीत से पूछा कि वे भजन क्यों गाने लगे तो बोले, भक्ति संगीत की बिक्री गजलों से ज्यादा होती है। गौर करें कि हर त्यौहार के पहले उससे संबंधित भक्ति संगीत से बाजार पट जाता है। यशु दास ने दक्षिण भारत में भजन गाकर लोकप्रियता हासिल कर ली। लगभग सभी गायक इस तथ्य से सहमत होंगे कि महानतम प्रार्थना गीत का सृजन नौशाद और शकील बदायूंनी ने किया और बैजू बावरा में उसे मोहम्मद रफी ने आवाज दी। नास्तिकों ने भी इसके हृदयस्पर्शी ओज को स्वीकार किया। इसके सृजन में मुसलमानों का सहयोग रहा। कव्वालियां एवं नात भी फिल्मों में आए। लगभग हर फिल्म में किसी दरगाह पर कव्वाली हो रही होती है और साथ में कोई नाटकीय दृश्य चलता है।

सूफी गायकी का प्रभाव
कुछ वर्ष पहले फिल्मों में सूफी संगीत फिर से लौटा। इस बार पाकिस्तान से यह आया। नुसरत फतेह अली की आवाज पूरे एशिया को दीवाना बना देती थी। आबिदा परवीन अपनी गायकी से रुला देती हैं।
मेरे एक लेखक मित्र कहते हैं, जब भी फिल्म में कोई भयानक या जानलेवा स्थिति आती है तो अंत में प्रार्थना काम आती है। सिनेमा में ऐसे कई दृश्य मिलेंगे, जब हीरोइन बदहवास होकर दौडती किसी मूर्ति के कदमों में गिर जाती है। अपने पति, प्रेमी, मां, पिता या किसी और के लिए प्राणों की भीख मांगती है। दर्शकों को यकीन रहता है कि अंत में फिल्म का सुखद अंत हो जाएगा। ज्यादातर फिल्मों में यह संवाद रहता है, मरीज को दवा की नहीं, दुआ की जरूरत है। क्या आप जानते हैं कि इंडस्ट्री में नियमित शूटिंग स्थलों में अस्पताल एवं पुलिस स्टेशन की तरह एक स्थायी मंदिर होता है। सभी जानते हैं कि आखिरी क्षणों में शूटिंग के लिए मंदिर मिलना मुश्किल होता है, क्योंकि सभी वहां शूट करते हैं। स्टूडियो मालिक सिर्फ दृश्य के मुताबिक मूर्तियां बदल देते हैं। 35 साल पहले जब मैं यहां आया था, तब से यही स्थिति चल रही है।

असुरक्षा में राहत देती प्रार्थना
मानव जाति आखिर क्यों प्रार्थना में इतना यकीन करती है? मन में बचपन से यह सवाल है। मां को रोज 3-4 घंटे पूजा करते देखा, महसूस किया कि वह अपनी तकलीफ और पीडा भूलने के लिए पूजा-प्रार्थना करती है। अनिश्चितताओं से जूझने के लिए उसने प्रार्थना को अस्त्र बना लिया था। हम फिल्मकार दर्शकों की इसी भावना का खयाल रखते हुए प्रार्थना का उपयोग करते हैं। भारत में ईश्वर से अधिक बिक्री किसी और चीज की नहीं होती। अगर आपने ईश्वर बेच दिया तो फिर प्रार्थना की जरूरत बन जाती है।

बच्चन का सराहनीय व्यवहार

-अजय ब्रह्मात्मज
यह उम्र का असर हो सकता है। यह भी संभव है कि इसके पीछे किसी भी प्रकार के विवाद से दूर रहने की मंशा काम करती हो। इन दिनों अमिताभ बच्चन तुरंत बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। वे अपने ब्लॉग पर झट से लिखते हैं कि अगर मेरी बात से कोई आहत हुआ हो, तो मैं माफी मांगता हूं। एंग्री यंग मैन अब कूल ओल्ड मैन में बदल चुका है। उनके इस आकस्मिक व्यवहार से उनके पुराने प्रशंसकों को तकलीफ भी हो सकती है। विजय अब चुनौती नहीं देता। मुठभेड़ नहीं करता। विवाद की स्थिति आने पर दो कदम पीछे हट कर माफी मांग लेता है। ऐक्टर की इमेज को सच समझने वालों को निश्चित ही अमिताभ बच्चन की ऐसी मुद्राओं से आश्चर्य होता होगा! पिछले दिनों मुंबई में जो हुआ, उसे एक प्रहसन ही कहा जा सकता है। द्रोण फिल्म की म्यूजिक रिलीज के अवसर पर जया बच्चन के कथन का गलत आशय निकाला गया और उसे मराठी अस्मिता से जोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने बच्चन परिवार के विरोध का नारा दे दिया। बच्चन परिवार उनके निशाने पर पहले से है। इस विरोध के कारणों की पड़ताल करें तो हम राज ठाकरे के वक्तव्य और आचरण का निहितार्थ समझ सकते हैं। बच्चन को निशाना बना कर ही वे राष्ट्रीय खबरों में आ सकते हैं। दूसरे बच्चन ने अपनी इंटरनेशनल लोकप्रियता के बावजूद यह कभी नहीं छिपाया कि वे यूपी के हैं। छोरा गंगा किनारे वाला के नाम से मशहूर अमिताभ बच्चन उत्तर प्रदेश के साथ ही सारे हिंदी प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
हिंदी भाषा और उससे जुड़े मसलों की यही विडंबना है कि कोई भी इसके समर्थन में खड़ा नहीं होता। हिंदी इस देश की राजभाषा है। इस भाषा के बोलने पर एक प्रादेशिक नेता बिफर जाता है। मजेदार तथ्य यह है कि कानून और व्यवस्था के जिम्मेदार भी हाथ खड़े कर देते हैं। अमिताभ बच्चन को माफी मांगनी पड़ती है। अगले चुनाव के समीकरणों को देखते हुए कोई भी राजनीतिक पार्टी एक मशहूर नागरिक के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार का समर्थन नहीं करती। ऊहापोह की इस स्थिति में सदी के महानायक को माफी मांगने के अलावा और कोई उपाय नहीं सूझता।
अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर माफीनामे के साथ जो सफाई पेश की है, उससे उनकी असहाय स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। उन्हें एक-एक कर सारे कार्यो का विवरण देना पड़ा है और बताना पड़ा है कि उन्होंने कब और कैसे मराठी लोगों की मदद की। वे अपने इस पोस्ट में बचाव की मुद्रा में दिखते हैं। समझ में नहीं आता कि उन्हें इस तरह अपने बचाव में सबूत पेश करने की क्या जरूरत पड़ गई? और इसके बावजूद उनके खिलाफ उठाया कदम वापस नहीं लिया जाता। जब वे सार्वजनिक माफी मांगते हैं और उसे विभिन्न समाचार चैनलों के जरिए दिखाया और समाचार पत्रों के जरिए पढ़ाया जाता है, तब जाकर विवाद समाप्त होता है।
बच्चन परिवार के इस प्रसंग ने कई सवाल छोड़ दिए हैं? जरूरत है कि इन सवालों पर हम समय रहते विचार करें और किसी कारगर नतीजे पर पहुंचें। अगर कोई राह नहीं खोजी गई, तो भविष्य में इससे भयंकर घटनाएं होंगी। धर्म, राजनीति और संप्रदाय में बंटे देश को भाषा के आधार पर बांटने की नई कोशिश की जाएगी। हिंदी फिल्मों का अस्तित्व खतरे में नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह बाजार की जरूरत है। बाजार की जरूरत हर किस्म के भेदभाव और राजनीति से ऊपर रहती है, लेकिन अस्मिता और अहं की लड़ाई में कई बार व्यक्तियों और समूहों का नुकसान होता है। गनीमत है कि बच्चन परिवार के सदस्य सुरक्षित रहे, लेकिन संवेदनशील अमिताभ बच्चन को मानसिक आघात अवश्य लगा होगा। यह उनका बड़प्पन है कि उन्होंने बगैर कोई अपराध किए ही माफी मांग ली। उन्होंने शांति की पहल की, निश्चित ही उनका यह प्रयास सराहनीय है।

Thursday, September 18, 2008

बॉक्स ऑफिस:२६.०९,२००८


औसत व्यापार कर लेगी 1920
निर्माता सुरेन्द्र शर्मा की विक्रम भट्ट निर्देशित डरावनी फिल्म 1920 हर जगह पसंद की गयी। मुंबई के मल्टीप्लेक्स से लेकर छोटे शहरों के सिं गल स्क्रीन तक में इसे ठीक-ठाक दर्शक मिल रहे हैं। विक्रम भट्ट की पिछली फिल्मों की तुलना में 1920 बड़ी हिट है। एक लंबे समय के बाद विक्रम भट्ट ने फिर से कामयाबी का स्वाद चखा है। मुंबई में आरंभिक दिनों में इसका कलेक्शन 55 से 60 प्रतिशत के बीच रहा। चूंकि फिल्म की तारीफ हो रही है, इसलिए ट्रेड पंडित अनुमान लगा रहे हैं कि 1920 औसत व्यापार कर लेगी। नए चेहरों रजनीश दुग्गल और अदा शर्मा को लेकर बनी फिल्म के लिए यह बड़ी बात है।
अर्जुन बाली की रू-ब-रू में भले ही रणदीप हुडा और शहाना गोस्वामी ने बेहतर काम किया था। लेकिन लचर पटकथा और कमजोर प्रस्तुति केकारण फिल्म दर्शकों को नहीं बांध सकी। पहले दिन इसे सिर्फ 15 प्रतिशत दर्शक मिले। रितुपर्णो घोष की फिल्म द लास्ट लियर अंग्रेजी फिल्म है, लेकिन अमिताभ बच्चन, प्रीति जिंटा और अर्जुन रामपाल के कारण हिंदी फिल्मों के ट्रेड सर्किल में उसकी चर्चा है। इस फिल्म को पर्याप्त दर्शक नहीं मिले।
मुंबई मेरी जान और वेडनेसडे ने साबित किया है कि फिल्में अच्छी हों और उन्हें समीक्षकों की सराहना मिल जाए तो छोटे बजट की फिल्में भी कामयाब साबित हो सकती है। उम्मीद है कि दोनों फिल्मों की कामयाबी निर्माता-निर्देशकों को नए प्रयोगों के लिए उकसाएगी। पिछली फिल्मों में हाइजैक और तहान को दर्शक नहीं मिल रहे हैं।
इस हफ्ते श्याम बेनेगल की वेलकम टू सज्जनपुर, शोना उर्वशी की सास बहू और सेंसेक्स तथा जयदीप वर्मा की हल्ला दर्शकों को हंसाने आ रही है।

Saturday, September 13, 2008

फ़िल्म समीक्षा:१९२०

डर लगता है
-अजय ब्रह्मात्मज

डरावनी फिल्म की एक खासियत होती है कि वह उन दृश्यों में नहीं डराती, जहां हम उम्मीद करते हैं। सहज ढंग से चल रहे दृश्य के बीच अचानक कुछ घटता है और हम डर से सिहर उठते हैं। विक्रम भट्ट की 1920 में ऐसे कई दृश्य हैं। इसे देखते हुए उनकी पिछली डरावनी फिल्म राज के प्रसंग याद आ सकते हैं। यह विक्रम की विशेषता है।

1920 वास्तव में एक प्रेम कहानी है, जो आजादी के पहले घटित होती है। अर्जुन और लिसा विभिन्न धर्मोके हैं। अर्जुन अपने परिवार के खिलाफ जाकर लिसा से शादी कर लेता है। शादी के तुरंत बाद दोनों एक मनोरम ठिकाने पर पहुंचते हैं। वहां रजनीश को एक पुरानी हवेली को नया रूप देना है। फिल्म में हम पहले ही देख चुके हैं कि हवेली में बसी अज्ञात शक्तियां ऐसा नहीं होने देतीं। लिसा को वह हवेली परिचित सी लगती है। उसे कुछ आवाजें सुनाई पड़ती हैं और कुछ छायाएं भी दिखती हैं। ऐसा लगता है किहवेली से उसका कोई पुराना रिश्ता है। वास्तव में हवेली में बसी अतृप्त आत्मा को लिसा का ही इंतजार है। वह लिसा के जिस्म में प्रवेश कर जाती है। जब अर्जुन को लिसा की अजीबोगरीब हरकतों से हैरत होती है तो वह पहले मेडिकल सहायता लेता है। डाक्टर के असफल होने पर वह पादरी की भी मदद लेता है। आखिरकार उसे बचपन में सुने कुछ भजन और मंत्र याद आते हैं और वह उनके उपयोग से लिसा को बचाता है।

डरावनी फिल्मों में रूढि़यां, धार्मिक मान्यताएं और पुराने विश्वास इस्तेमाल किए जाते हैं। विक्रम ने भी इस फिल्म में धार्मिक भजन का उपयोग किया है। इस फिल्म को रहस्यपूर्ण बनाने में उन्हें फिल्म के छायाकार प्रवीण भट्ट की भरपूर मदद मिली है। फिल्म का कला पक्ष उल्लेखनीय है। 1920 को पीरियड का रंग और परिवेश देने में कला निर्देशक राजेश पोद्दार ने मनोयोग से काम किया है।

1920 रजनीश और अदा शर्मा की पहली फिल्म है। अदा की अदाकारी से ऐसा नहीं लगता कि यह उनकी पहली फिल्म है। अदा ने सभी तरह के भावों को सुंदर तरीके से अभिव्यक्त किया है। उनके साथ रजनीश भी जंचे हैं। विक्रम की पिछली कुछ फिल्में दर्शकों ने नापसंद की थीं। इस फिल्म से उन्हें अपने दर्शक वापस मिल सकते हैं। अगर संगीत भी परिवेश के अनुरूप होता तो फिल्म का प्रभाव और बढ़ जाता। राखी सावंत का आइटम गीत अनावश्यक है। वह फिल्म में थोपा हुआ लगता है।

Friday, September 12, 2008

यहां माफी मांगने का मौका नहीं मिलता: अदा शर्मा



विक्रम भट्ट की 1920 अदा शर्मा की पहली फिल्म है, लेकिन फिल्म देखने वालों को यकीन ही नहीं होगा कि उनकी यह पहली फिल्म है। अपने किरदार को उन्होंने बहुत खूबसूरती और सधे अंदाज में निभाया है। प्रस्तुत हैं अदा शर्मा से बातचीत..

पहली फिल्म की रिलीज के पहले से ही तारीफ हो रही है। इसके लिए आपने कितनी तैयारी की थी?

पूरी तैयारी की थी। डांस, ऐक्टिंग और एक्सप्रेशन, सभी पर काम किया था। विक्रम वैसे भी न केवल पूरी सीन को परफॉर्म करके बताते हैं, बल्कि संवाद, इमोशन आदि सब-कुछ समझा देते हैं। उससे काफी मदद मिली।

दूसरी अभिनेत्रियों की तरह थिएटर या ट्रेनिंग लेकर आप नहीं आई हैं?

थिएटर किया है मैंने, लेकिन तब नहीं सोचा था कि ऐक्टिंग करना है। जैसे डांस सीखती थी, वैसे ही थिएटर करती थी। हां, ऐक्टिंग क्लासेज में कभी नहीं गई। मुझे इसकी जरूरत भी नहीं महसूस हुई। मुझे लगा कि मेरे अंदर ऐक्टिंग टैलॅन्ट है और अभ्यास से हम उसे निखार सकते हैं। मेरे खयाल में अभिनय आपके व्यक्तित्व में जन्म से ही आता है।

पहली फिल्म के लिए आपने क्या सावधानी बरती?

अभी बहुत टफ मुकाबला है। आप पहली फिल्म के बहाने किसी से माफी नहीं मांग सकते। आपको पहली बार ही साबित करना है। संवाद, अदायगी, अभिव्यक्ति या कुछ और खराब होने पर यह लॉजिक नहीं दे सकते कि यह तो मेरी पहली फिल्म थी!

पहली फिल्म के रूप में 1920 को स्वीकारने की वजह?

मैं इसे अपने अच्छे कर्मो का फल कहूंगी। मैं भाग्यवादी बात नहीं कर रही हूं। मैं कह रही हूं कि जो सोचा, मेहनत की, तैयारी की, कोशिश की, उन सभी का नतीजा है 1920। इस फिल्म को देखने के बाद हर कोई समझ जाएगा कि मैंने इसके लिए हां क्यों की! शायद इसलिए भी, क्योंकि मुझे पहली फिल्म में ही बड़ा मौका मिला है।

पहली फिल्म के रूप में हर अभिनेत्री रेगुलर कॉमर्शिअॅल फिल्म चाहती है, जिसमें नाच,गाना और रोमांस हो, लेकिन 1920 तो हॉरर फिल्म है?

यह फिल्म पूरी तरह कॉमर्शिअॅल है। यह एक लव-स्टोरी है और रोमांटिक भी। फिल्म शुरू करने से पहले मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी थी और लिसा के रोल को समझने के बाद ही हां किया था। मुझे मालूम है कि यह फिल्म क्या देने जा रही है। इसमें मैं बहुत खूबसूरत लगी हूं।

आपने फिल्म की हेअॅर-स्टाइल अपना ली है या ऐसे ही हैं आपके बाल?

ऐसे ही हैं मेरे बाल। फिल्म में बालों को कुछ इस तरह का स्टाइल देना था, जो सुंदर लगे और उस पीरियड के मुताबिक भी। यह नेचुरल स्टाइल है। चूंकि फिल्म में यही लुक है, तो लोगों को लग रहा है कि मैंने फिल्म का लुक ही रख लिया है।

फिल्म के हीरो रजनीश दुग्गल के बारे में क्या कहेंगी?

वे बहुत कॉन्फिडेंट हैं। फिल्म में उनका ईमानदार अभिनय दर्शकों के दिल को जरूर छूएगा। दरअसल, दर्शक उनके किरदार से जुड़ाव महसूस करेंगे। रजनीश ने बहुत अच्छी तरह अपने किरदार को निभाया है। मुझे यकीन है कि वे जल्द ही बड़े स्टार बनेंगे।

क्या 1920 के बाद आपकी प्रतियोगिता करीना और कैटरीना से होगी?

प्रतियोगिता तो रहेगी ही। मेरे खयाल में सभी अभिनेत्रियों की अपनी क्वालिटी है और उन्हें उस क्वालिटी के हिसाब से ही फिल्में मिलती हैं। मेरी कोशिश होगी कि क्वालिटी भी फिल्म में नजर आए। मैं चाहूंगी कि फिल्म लेखक और निर्देशक लिखते और सोचते समय मेरी क्वालिटी को ध्यान में रखें। मुझे लगता है कि जो भी सफल हीरोइनें हैं, वे अपनी मेहनत से हैं।

आप खुद में क्या विशेषता देखती हैं?

मैं कोई एक विशेषता नहीं बता सकती। मैं एक किस्म का रोल नहीं करना चाहती। मैं चाहूंगी कि मुझे कॉमेडी, रोमांटिक और हिस्टोरिकल फिल्में भी मिलें और वैसे भी इमोशनल ड्रामा मैं बेहतर कर सकती हूं। मेरी पहली फिल्म देखने के बाद लोगों को मालूम हो जाएगा कि मुझमें क्या विशेषताएं हैं।

दो-तीन वर्षो में अदा कहां रहेंगी?

मैं इस तरह से कोई करियर-ग्राफ बना कर नहीं चल रही हूं कि इस साल इतना हो गया, तो अगले साल उतना छूना है। मुझे पता है कि फिल्म इंडस्ट्री में बिजनेस प्लानिंग नहीं की जा सकती। यहां कई सारे फैक्टर काम करते हैं। बस, इतना ही कह सकती हूं कि डटी रहूंगी। कोशिश जारी रहेगी कि दर्शकों में मेरी भी पहचान बने।


Wednesday, September 10, 2008

हिन्दी टाकीज:हजारों ख्वाईशें ऐसी... -विनीत उत्पल

हिन्दी टाकीज-८
इस बार विनीत उत्पल.विनीत ने बडे जतन से सब कुछ याद किया है.विनीत पेशे से पत्रकार हैं।

फिल्म, फ़िल्म और फ़िल्म, यह शब्द है या कुछ और। इससे परिचय कैसे हुआ, क्यों हुआ, यह मायने रखता है। दीवारों पर चिपके पोस्टरों, अख़बारों में छपी तस्वीरें, गली-मोहल्ले में लाउडस्पीकरों में बजते गाने व डायलाग या घरों में रेडियो से प्रसारित होने वाले फिल्मी गाने मन मस्तिष्क पर दस्तक देते। उत्सुकता जगाते। शादी-ब्याह के मौके पर माहौल को मदमस्त करते फिल्मी गाने हों या २६ जनवरी या १५ अगस्त को बजने वाले देशभक्ति के तराने, बचपन की अठखेलियों के साथ कौतुहल का विषय होता। बचपन के वो दिन जब हजारों ख्वाईशें ऐसी कि फिल्मी पोस्टर पर हीरो को स्टाइल देते देख ख़ुद के अरमान स्मार्ट बनने और दीखने की कोशिश में खो जाते। उस दौर में तमाम हीरोइनें एक जैसी लगतीं। मन में उथल-पुथल कि गाने बजते कैसे हैं, डायलाग कैसे बोला जाता है, हीरो जमीन से उठकर परदे पर कैसे आता है, क्या पोस्टर पर दीखने वाला स्टंट वास्तव में होता है।

वो हसीन पल
मां बताती है कि सैनिक स्कूल, तिलैया में हर शनिवार को फ़िल्म दिखाया जाता था। फुर्सत मिलने पर घर के लोग फ़िल्म देखने जाते थे। पापा जब सैनिक स्कूल में गणित के टीचर थे तभी मेरा जन्म हुआ। मैं कुछेक महीने का होऊंगा, तभी पापा सैनिक स्कूल की नौकरी छोड़ भागलपुर विवि में लेक्चरर हो गए। अक्सर मां को याद आता है सैनिक स्कूल के वो पल।

यह आकाशवाणी है
जब मैंने होश संभाला तो घर में उसी रेडियो की आवाज को गूँजते पाया जो पापा को शादी में मिली थी। घर के जो लोग फुर्सत में होते आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले गाने सुनते, एफएम तो था नहीं। स्वाभाविक रहा होगा, मेरी रूचि गाने की ओर बढ़ी होगी। मेरे दादाजी गाना सुनने के शौकीन थे।

यह किसका डायलाग है रे...
घर में रेडियो के माध्यम से जाना कि गाना क्या होता है। मौके-बेमौके पर मोहल्ले में बजने वाले लाउडस्पीकरों से जाना कि यह शहंशाह का डायलाग है या गब्बर सिंह का। उसी दौर में पहली बार टेलीविजन से रूबरू हुआ। मन चंचल और स्वभाव जिद्दी। रविवार की शाम फीचर फ़िल्म दूरदर्शन पर दिखायी जाती। दूसरे के यहां फ़िल्म देखने जाता लेकिन इंटरवल तक। सालों दर साल यही क्रम चलता रहा।

भूखे पेट न भजन गोपाला
मैं उम्र के उस पड़ाव से गुजर रहा था जब मेरे दोस्त लुकछिप कर सिगरेट पीते, फ़िल्म देखने जाते, सेक्स की बातें करते, यहाँ तक कि मारपीट भी। लेकिन मेरी सोच उस वक्त भी और आज भी कुछ उल्टी थी। मेरा मानना था कि जो काम सभी करेंगे वह मैं नहीं करूँगा। यही कारण रहा कि कभी भी मेरे दोस्तों का ग्रुप नहीं बना। दोस्तों की देखा-देखी में सिगरेट को मुंह लगाया लेकिन छिपके कुछ भी काम करना अच्छा नहीं लगा, जो आज भी है। शाकाहारी तो बचपन से हूँ ही। फ़िल्म देखने की इच्छा हुई, लेकिन लगा कि तीन घंटे तक हाल में भूखा रहना पड़ेगा। घर के लोग फ़िल्म देखने जाते नहीं थे, मेरा अकेले जाने का सवाल ही नहीं था।

छुट्टियों में गाँव, गाँव के वो लोग
कालेज में गरमी और दशहरे की लम्बी छुट्टियाँ होती थी। सपरिवार गाँव जाते। वहां के लोगों को फ़िल्म देखने और उसके बारे में विस्तार से बातें करते देखता, चुपके से सुनता। जिसकी शादी होती वह पहली बार अपनी दुल्हन को फ़िल्म दिखाने जरूर ले जाता। मेरा बालमन सोचता और समझता कि फ़िल्म देखना रोमांचक होता होगा। कुछ न कुछ खास तो होगा ही क्योंकि गाँव के लोग शादी के बाद ही सिनेमा देखने जाते है। मैं तय करता पहले फ़िल्म देखने जाऊँगा तब शादी करूँगा।

पापा की मार और दुलार
मेरा सौभाग्य रहा कि पापा ही मेरे पथ-प्रदर्शक रहे। चाहे पढ़ाई की बात हो या दुनिया जहान की। खेल का मैदान हो या फिल्मी दुनिया की, राजनीति की रपटीली राहों की कहानियां हों या बीमारी से छुटकारा पाने की तरकीब, उन्हें आलराउंडर पाया। शायद फिल्मों की बातें भी उन्हीं से जाना होऊंगा, क्योंकि जीवन का सबसे अधिक समय मां के साथ नहीं बल्कि पापा के साथ बीता। सही काम न करने पर वो खुश, नहीं तो डांट-फटकार यहाँ तक कि पड़ती थी मार। पापा ने ही बताया था कि अमिताभ बच्चन एक हीरो है और उसके पिता हरिवंश राय बच्चन एक कवि और प्रोफेसर रहे हैं। मेरा मन सोचता आख़िर मैं भी तो एक प्रोफेसर का बेटा हूँ तो मैं भी क्यों नही...

पहले पढ़ाई फ़िर फ़िल्म
पापा का मानना था कि फ़िल्म देखने में सिर्फ़ समय और पैसे की बर्बादी होती है। तीन घंटे कोई बच्चा पढ़ाई कर ले तो क्लास में बेहतर या मैदान में खेल ले तो अच्छे स्वास्थ का स्वामी बन सकता है। पढ़ाई के मामलों में वे किसी भी तरह का सामंजस्य बिठाने के खिलाफ रहे हैं। यह अलग बात थी कि मेरे मामलों में उन्होंने अपना उसूल बदला। मैं उन दिनों फ़िल्म देखने जाता था, क्या समझता यह पता नहीं। शाम को दूरदर्शन पर फ़िल्म देखने के लिए जाने के लिए भूमिकाएँ बांधनी पड़ती थी। सुबह से शाम तक इतनी पढ़ाई करनी होती थी कि पापा खुश हो जायें। पापा द्वारा पूछे सवालों का जबाब नहीं दिया तो सारी योजना का वाट लगने का खतरा होता था।

जो जीता वही सिकंदर
पापा का कहना था कि क्लास में बेहतर करने के साथ-साथ मेरा दिया हुआ टास्क पूरा करोगे तभी तुम्हारी बात मानी जायेगी। बालपन में अपने सपने को हकीकत में बदलने का एक ही रास्ता सूझता, वो था जमकर पढ़ाई करने का। कभी पापा जीतते तो कभी मैं। शायद पापा को अपने बेटे से हारने के बाद भी गर्व होता, जैसा एक पिता को होता है। वे हंसकर मुझे अपनी मर्जी से जीने की छूट देते। लेकिन जब मैं हारता तो थोड़ी देर के लिए झल्लाता और अपनी खामियों को अगली बार दूर करने का प्रयास करता। ऐसे ही रोमांचक समय में अमर अकबर एंटोनी, नागिन, कालीचरण, शोले, रोटी , कपड़ा औए मकान, सीता और गीता, राम और श्याम, हाथी मेरा साथी, सत्यम, शिवम सुन्दरम, क्रांति आदि न जाने कितनी फिल्में इंटरवल तक देखी।

कल्पना की अनुगूँज
सत्तर व अस्सी के दशक में तारापुर महज एक छोटा सा क़स्बा हुआ करता था। यहां की गलियों में मेरा बचपन बीता। एक ही सिनेमा हॉल था, कल्पना टाकिज। कुछ अरसा पहले पता चला उसका अब नामोनिशान नहीं है। टाकिज के मालिक ने हॉल के बगल में ही एक वीडीओ हाल भी खोला था, जहाँ सीडी के जरिये नयी फिल्में दिखाई जाती थी। कल्पना सिनेमा हॉल की टिकटें १५ अगस्त और २६ जनवरी को उस दौर में भी ब्लैक में बिका करती थीं। ये सब जानकारी मुझे अपने दोस्तों से मिलती रहती थी। दीगर बात यह थी की तारापुर की जनसँख्या कम होने के कारण लोग एक-दूसरे को जानते थे। इस कारण जो भी बच्चे लुकछिप कर फ़िल्म देखने जाते, घर तो घर पूरा मोहल्ला और स्कूल तक में यह ख़बर फ़ैल जाती और लोग उसे अच्छी नजर से देखने से इंकार करते।

पैसे चुराकर देखी थी पहली फ़िल्म
आठवीं क्लास में था, जब पहली बार हॉल में जाकर बड़े परदे पर फ़िल्म देखी थी। घर में दादाजी के बटुए से साढे तीन रूपये चुराए थे। तीन रुपये में दो टिकटें आयीं और पचास पैसे का पसंदीदा नास्ता झालमुढी खाया था। फ़िल्म थी जंगबाज, हीरो थे गोविंदा और राजकुमार। गया तो था फ़िल्म देखने लेकिन जिज्ञासु मन होने के कारण फ़िल्म कम हॉल का सीन अधिक देख रहा था। आगे-पीछे के कुर्सियों की ओर झांक इस डर से भी रहा था कि कोई पहचान का न मिल जाए। डर था कि घर तक मामला बता दिया तो बिना पूछे सिनेमा देखने का दंड भुगतना पड़ सकता है। जिस साथी के साथ फ़िल्म देखने गया था उसे पहले ही मैंने सख्त हिदायत दे रखी थी कि इसकी जानकारी किसी को कानोकान न हो, तभी मैं टिकट का खर्चा दूंगा। हम अपने मिशन में कामयाब रहे थे।

माली तो दो पर फ़िल्म एक
जब आप एक बार किसी काम को पूरा करने में सफल हो जाते हैं तो आपकी इच्छा और मनोदशा कुछ और हो जाती है। तारापुर में फ़िर छिप कर किसी और दोस्त के साथ फ़िल्म एक फूल, दो माली देखने गया। फ़िल्म अच्छी लगी। जीवन के १८ साल तारापुर की गलियों में बिताये लेकिन हॉल में इन दो फ़िल्मों को छोड़ कोई भी फ़िल्म नहीं देखी। या तो छिपकर फ़िल्म देखने की कभी इच्छा नहीं हुई या कल्पना सिनेमा हॉल की बदतर हालत देखकर।

काश, आमिर जैसे स्मार्ट होता
उम्र के जिस मोड़ पर वास्तविक तौर से फ़िल्म जगत से रूबरू हुआ, यही वह वक्त था जब बालीवुड की मायावी दुनिया में आमिर खान, सलमान खान, माधुरी दीक्षित जैसे कलाकारों का पदार्पण हुआ। फ़िल्म क़यामत से क़यामत तक का पोस्टर देख पसंदीदा हीरा आमिर खान बना तो जूही चावला के मनमोहक मुस्कान खूब भाती थी। माधुरी दीक्षित, दिव्या भारती, काजोल की अख़बारों में छपी तश्वीरें मेरे किताबों के जिल्द को आकर्षक बनाती। इसी कालखंड में घायल, दिल, आशिकी, आज का अर्जुन, हम आपके हैं कौन, कुली नंबर वन, कारण-अर्जुन, दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे, रंगीला, बार्डरतेजाब, मैंने प्यार किया, सौदागर, साजन, सड़क, मोहरा जैसी तमाम फिल्में विभिन्न चैनलों पर देखी।

मैं भी होता एक सितारा
सुनहरे परदे की चमकती दुनिया स्नातक की पढाई करने के दौरान सर चढ़ कर बोल रही थी। सोचता क्यों न फ़िल्म पत्रकार बन जाऊं। उसी दरम्यान एक बार इंदौर गया था, दीदी के पास। पास ही फ़िल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे रहते हैं। उनसे मिलने गया और भविष्य के सपनों को सामने रखा। उन्होंने जहाँ इस फील्ड में न आने की सलाह दी वहीं सत्यजीत रे फ़िल्म संस्थान से डिग्री लेने पर मुम्बई में कुछ बात बनने की बात कही। बस मामला जस की तस अटक गया।

कोलकाता की वो बारिश
इंटर करने के बाद इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तयारी कर रहा था। उसी दौरान कई-कई महीनों तक कोलकाता में रहा। मेरा ठिकाना सेन्ट्रल कोलकाता स्थित राजेंद्र छात्रावास हुआ करता था। वहां रहने के दौरान एक दिन की बात याद आती है। घनघोर बारिश हो रही थी। सुबह उठा, पता नहीं क्या सूझी, फ़िल्म देखने चला गया। अकेला था, मन परेशान था। लगातार चार शो देखा। राजा बाबू और सूर्यवंशम फ़िल्म इनमें प्रमुख था। बाद के साल में कोलकाता में अपने दोस्तों के साथ सरफ़रोश देखी, जिस दिन रिलीज हुई थी।

हॉल में ही सो गया
नब्बे के दशक के आखिर में तारापुर के रामस्वारथ कालेज से पापा का ट्रांसफर मारवाडी कालेज, भागलपुर हो गया। संयोगबस इसी कालेज से मैंने भी स्नातक की है। उस दौरान न तो कभी फ़िल्म देखने की इच्छा हुई और न ही मौका मिला। उस दौर में मेरा सबसे अधिक समय सामाजिक कामों में बीतता था, जिस कारण पापा की नाराजगी का सदैव सामना करना होता था। हाँ, एक बार दीदी और उनके ससुराल वालों के साथ भागलपुर के प्रतिष्ठित हॉल शारदा सिनेमा हॉल में फ़िल्म देखने गया था। संजय दत्त की कोई फ़िल्म थी। सुबह कोलकाता से लौटा था, थका था, हॉल ही में सो गया।


बाइस्कोप की पढाई
दिल्ली आया तो कभी फुर्सत ही नहीं मिली कि मल्टीप्लेक्स में फ़िल्म देखने जा सकूँ। फ़िर भी इतने सालों में सिर्फ़ और सिर्फ़ तीन फिल्म देखी। मेरी बुरी आदत रही है कि जो कम मन से नहीं हुआ उसका बारे में ज्यादा ख्याल नहीं रखता, यही इन तीनों फ़िल्मों के साथ हुआ। दोस्तों का मन रखने गया था। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली से कोर्स करने के दौरान सही तौर पर फिल्मों और इसकी बुनयादी चीजों से अवगत हुआ। यहीं, गोविन्द निहलानी को सुना, अनवर जमाल व सेजो सिंह की बनी फ़िल्म स्वराज देखी। फ़िल्म के तकनीकी पक्षों को जाना। अशोक चक्रधर ने अपनी बनी टेली फ़िल्म दिखाई। निर्देशक के काम को जाना, स्क्रिप्ट राइटिंग सीखी। असगर वजाहत और जवरीमल पारिख जैसे टीचर मिले। विवेक दुबे ने दुनिया की बेहतरीन फ़िल्मों की जानकारी दी।

जिन्दगी की जीत पर यकीन कर
जामिया में पढाई के दौरान और अपने समय की बेहतरीन फ़िल्मों को देख कर सिने जगत के कई पहलुओं से अवगत हुआ। घर में भी इस बात के जानकारी दी। न तो मैं और न ही मेरे घर के लोग इस विधा को उस नजरिये से देखते हैं जिस नजरिये से आम पब्लिक देखती है। भले ही लोगों को फ़िल्म के मायावी दुनिया प्रभावित करती हों, लेकिन मेरे साथ ऐसा कभी नहीं रहा। वास्तविकता के धरातल पर जीना शगल है, भले ही कल्पना की उड़ान आसमान के इस छोड़ से उस छोड़ तक अपनी तान भरती रहे।

Thursday, September 4, 2008

मेट्रो, मल्टीप्लेक्स और मार्केटिंग

-अजय ब्रह्मात्मज
अपने शहरों के सिनेमाघरों में लगी फिल्मों के प्रति दर्शकों की अरुचि को देखकर लोग मानते हैं कि फिल्म चली नहीं, लेकिन अगले ही दिन अखबार और टीवी चैनलों पर निर्माता, निर्देशक, आर्टिस्ट और कुछ ट्रेड पंडितों को चिल्ला-चिल्लाकर लिखते और बोलते देखते हैं कि फिल्म हिट हो गई है। लोग यह भी देखते हैं कि इस चीख का फायदा होता है। सिनेमाघर की तरफ दर्शकजाते दिखाई देते हैं। पहले-दूसरे दिन खाली पड़ा सिनेमाघर तीसरे दिन से थोड़ा-थोड़ा भरने लगता है।
फिल्म चलाने की यह नई रणनीति है। ट्रेड विशेषज्ञों के मंतव्य के पहले ही शोर आरंभ कर दो कि मेरी फिल्म हिट हो गई है। यही चल रहा है। पिछले दिनों फूंक की साधारण कामयाबी का बड़ा जश्न मनाया गया। इसके सिक्वल की घोषणा भी कर दी गई! उस रात पार्टी में सभी अंदर से मान रहे थे कि फूंक रामू की पिछली फ्लॉप फिल्मों से थोड़ा बेहतर बिजनेस ही कर रही है, फिर भी सभी एक-दूसरे को बधाइयां दे रहे थे और कह रहे थे कि फिल्म हिट हो गई है। एंटरटेनमेंट और न्यूज चैनल के रिपोर्टर पार्टी में दी जा रही बधाइयों का सीधा प्रसारण कर रहे थे। मीडिया प्रचार की इस चपेट में आम दर्शकों का आना स्वाभाविक है।
धीरे-धीरे दर्शकों के बीच यह विचार फैलाया जा रहा है कि हमें कामयाब और हिट फिल्में देखनी चाहिए। चूंकि हिट होना फिल्म की सफलता की पहली शर्त है, इसलिए निर्माता की पूरी कोशिश किसी तरह हिट का तमगा लेने में रहती है। फिल्म अच्छी है या बुरी, इस पर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं है। अच्छी फिल्मों का बॉक्स ऑफिस पर बुरा हश्र होते हम दिन-रात देखते रहते हैं। मुंबई मेरी जान अपेक्षाकृत बेहतरीन फिल्म थी, लेकिन उसे दर्शक नहीं मिल सके। ऐसी अनेक अच्छी फिल्में प्रचार और बाजार के सहयोग के अभाव में दर्शकों से वंचित रह जाती हैं।
कहते हैं इस सिलसिले की शुरुआत बोनी कपूर ने की थी। महेश भट्ट ने उसे मजबूत किया और बाकी निर्माता अब उसी की नकल करते हैं। बीस साल पहले सैटेलाइट चैनल नहीं आए थे और एंटरटेनमेंट चैनल व न्यूज चैनल हमारी जिंदगी के जरूरी हिस्सा नहीं बने थे। दरअसल, तब पोस्टर और होर्डिग ही कारगर हथियार थे। निर्माता अपनी फिल्मों की रिलीज के अगले ही दिन सुपरहिट का पोस्टर शहरों में लगवा देते थे। तब भी आश्चर्य होता था कि अभी शुक्रवार को ही तो फिल्म रिलीज हुई है, सोमवार को सुपरहिट कैसे हो गई? लेकिन उसका असर होता था। दर्शकों की संख्या घटती नहीं थी। मल्टीप्लेक्स के आगमन के बाद इस रणनीति में थोड़ा बदलाव आया है। अब कोशिश की जाने लगी है कि अधिकतम प्रिंट और अधिकतम शो के साथ फिल्म रिलीज करो और तीन दिनों में ही आरंभिक कमाई कर लो। इस प्रयोग के पहले नमूने के तौर पर धर्मा प्रोडक्शन की फिल्म काल का उदाहरण उचित होगा। शाहरुख खान के उत्तेजक डांस और भारी प्रचार के साथ पहले ही तीन दिनों में कारोबार करने का प्रयोग सफल रहा। उसके बाद से करण जौहर और यशराज फिल्म्स ने अधिकतम प्रिंट जारी करने का रिवाज बना लिया। नतीजा है कि सिंह इज किंग के 1500 से अधिक प्रिंट जारी किए गए थे।
वास्तव में हिंदी फिल्में अभी मुख्य रूप से मेट्रो, मल्टीप्लेक्स और मार्केटिंग पर निर्भर करती हैं। इन तीनों के मेल से ही फिल्मों का बिजनेस निर्धारित किया जा रहा है। मल्टीप्लेक्स के कलेक्शन की गिनती होती है और ज्यादातर मल्टीप्लेक्स मेट्रो शहरों में हैं। फिल्म की मार्केटिंग टीम रिलीज के पहले समां बांधती है। दर्शकों को उकसाती है और उन्हें सिनेमाघरों की तरफ आने के लिए प्रेरित करती है। अब किसे चिंता है कि प्रदेश की राजधानियों और जिलों में फिल्में चलती हैं या नहीं? इस व्यापार का एक दुष्परिणाम यह भी है कि सिनेमा के विषय मल्टीप्लेक्स के दर्शकों की रुचि से तय किए जा रहे हैं।