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Saturday, August 30, 2008

हिन्दी टाकीज:दर्शक की यादों में सिनेमा -रवीश कुमार

हिन्दी टाकीज-7
रवीश कुमार को उनके ही शब्दों में बताएं तो...हर वक्त कई चीज़ें करने का मन करता है। हर वक्त कुछ नहीं करने का मन करता है। ज़िंदगी के प्रति एक गंभीर इंसान हूं। पर खुद के प्रति गंभीर नहीं हूं। मैं बोलने को लिखने से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं क्योंकि यही मेरा पेशा भी है। ...रवीश ने हिन्दी टाकीज के ये आलेख अपने ब्लॉग पर बहुत पहले डाले थे,लेकिन चवन्नी के आग्रह पर उन्होंने अनुमति दी की इसे चवन्नी के ब्लॉग पर पोस्ट किया जा सकता है.जिन्होंने पढ़ लिया है वे दोबारा फ़िल्म देखने जैसा आनंद लें और जो पहले पाठक हैं उन्हें तो आनंद आएगा ही ....
जो ठीक ठीक याद है उसके मुताबिक पहली बार सिनेमा बाबूजी के साथ ही देखा था। स्कूटर पर आगे खड़ा होकर गया था। पीछे मां बैठी थी। फिल्म का नाम था दंगल। उसके बाद दो कलियां देखी। पटना के पर्ल सिनेमा से लौटते वक्त भारी बारिश हो रही थी। हम सब रिक्शे से लौट रहे थे। तब बारिश में भींगने से कोई घबराता नहीं था। हम सब भींगते जा रहे थे। मां को लगता था कि बारिश में भींगने से घमौरियां ठीक हो जाती हैं। तो वो खुश थीं। हम सब खुश थे। बीस रुपये से भी कम में चार लोग सिनेमा देख कर लौट रहे थे। ये वो दौर था जब सिनेमा हाल में आने वाली फिल्मों के ट्रेलर के लिए तस्वीरों का इस्तमाल होता था। चार पांच किस्म की तस्वीरों को देख देख कर दर्शक कहानी का अंदाज़ा लगाता था। इतना ही अगली शो के लिए इंतज़ार करने वाले कई दर्शक दरवाज़े पर कान लगाकर हॉल से बाहर धमकती आवाज़ सुना करते थे। अपने भीतर सिनेमा का पूरा माहौल बन जाता था।इन सब के बीच सिनेमा देखने का अनुभव बिहार कॉपरेटिव सोसायटी में दिखाई जाने वाली फिल्मों से भी हुआ। प्रोजेक्टर पर राजेंद्र कुमार की फिल्म गंवार पच्चीसों बार देखी। प्राण का लेग पीस खाने के अंदाज़ से ही प्रभावित हो कर चिकन खाते वक्त लेग पीस का मुरीद हो गया। खाते वक्त अजीब सी ताकत का एहसास होता था। लगता था कि मुर्गे के इसी हिस्से में सब कुछ है। उल्टी टांग को चबाते जाओ और उल्टा टांग कर सामने वाले की मरम्मत करते जाओ। हिंदी सिनेमा के कई हिस्सों ने खाने के अंदाज़ को काफी प्रभावित किया है। फिल्में न होती तो मां के हाथ का बना खाना इतना बड़ा सार्वजनिक प्रसंग न बनता। उसका रोमांटिकरण नहीं होता। आइसक्रीम खाने का रोमांटिकरण भी फिल्मों से समाज में आया है। नहीं तो किसी विष्णुपुराण में कहां लिखा है कि इंडिया गेट पर आइसक्रीम खाने जाना है। हमारी उम्र इतनी ही थी कि फर्क करना मुश्किल होता था कि कौन सुपरस्टार है और कौन नहीं। धीरे धीरे पता चलता गया कि दूरदर्शन पर दिखाई गई अजनबी फिल्म के राजेश खन्ना नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन स्टार हैं। नाई भी मेरे बाल कुछ बच्चन मार्का काट दिया करता था। कान पर जब भी कुछ बाल छोड़ता ताकि कान बच्चन की तरह ढंके रहे, एक बार वसीम मियां से झगड़ा हो ही जाता था। वसीम स्मार्ट हेयर कट नाम था उनकी दुकान का। दिन भर अपने दोनों बेटों को गरियाते रहते थे कि काम नहीं करता, फिल्में देखता रहता है लेकिन मेरे कान पर बाल इसलिए छोड़ देते थे कि बच्चन के भी कान ढंके होते थे।हमारे परिवार के एक सदस्य सिनेमची थे। वो एक कॉपी में देखी गई फिल्मों को क्रमवार लिखते थे। उनके हाथ में आया एक एक पैसा बॉलीवु़ड के कई स्टारों की आर्थिक समृद्धि के लिए समर्पित हो गया। इतना ही नहीं वे कॉपी के दूसरे हिस्से में आने वाली फिल्मों के नाम भी लिखा करते थे। इसके लिए वे सार्वजनिक प्रताड़ित भी किये जाते थे कि फिल्म ही देखते हैं, पढ़ते लिखते नहीं। मेरे मोहल्ले में शिवा नाम का एक लड़का था। वो जब भी सिनेमा देख कर आता तो बकायदा अभिनय कर कहानी सुनाता। हम सब नहीं देखने वाले दर्शक पूरे रोमांच के साथ शिवा से फिल्म की कहानी सुना करते थे। शिवा कहता॥जानते हो..हेमा को प्राण हेलिकॉप्टर से बांध देता है। म्यूज़िक चलता है..ढैन ढैन...ढन....ढन। तभी धर्मेंद आ जाता है...शिवा की आंखे घूमने लगतीं, मुंह बिदक चुके होते और दांत खिसक चुके होते थे। पूरी कोशिश होती कि पर्दे की कहानी को साक्षात अपने चेहरे पर उतार कर वंचित दर्शकों के सीने में उतार दें। शिवा के भीतर एक प्रोजेक्टर चलने लगता था। फिल्मों के बारे में जानने का एक जरिया मायापुरी नाम की प्रतीका भी था। मायापुरी के स्ट्रीप हों या बेकार से लेख, इसके बावजूद इस पत्रिका ने बॉलीवुड को घर घऱ में पहुंचाया। मायापुरी ही तो थी जो सफर में बॉलीवुड को लेकर चलती थी। ट्रेन में बैठे हों और मायापुरी पढ़ रहे हों। राजेश खन्ना और डिम्पल की प्रेम कहानी और हेमा का जलना। अमिताभ और रेखा के बीच धधकते शोले और जया का जलना। ट्रेन गाती हुई चली जाती थी। हिंदी फिल्मों के गाने।लेकिन शिवा हमारे लिए असली ट्रेलर का काम करता। जानी दुश्मन की कहानी उसने इस अंदाज़ में बताई कि डर से देखने भी नहीं गया। यह वो दौर था जब इंदिरा गांधी की हत्या होनी थी और अमिताभ बच्चन का जादू अभी और चलना था। कूली की शूंटिग में घायल होने के बाद अमिताभ वापस आ चुके थे। दर्शकों की प्रार्थना स्वीकार हो चुकी थी। निर्देशक ने भी पुनीत इस्सर के उस घूंसे को पर्दे पर फ्रीज़ कर दिया जिसके कारण अमिताभ को चोट लगी थी। आंखें फाड़ कर देखता रह गया। एक घूंसा और मेरा सुपर स्टार। उफ।मगर इससे पहले एक शौक पूरा करना था। मुकद्दर का सिंकदर का प्रचार करना था। ऑटो में बैठकर बोलने का शौक। भाइयों और बहनों..अररर...अर...आ गया आ गया..मुकद्दर का सिंकदर। पटना में पहली बार...राजधानी का गौरव...अशोक सिनेमा...पूरे परिवार के साथ देखना न भूलें...रोजाना चार शो। बहुत मजा आया था इस शौक को पूरा कर। किसी को पता भी नहीं चला और काम भी हो गया। किसी दोपहर को जब फिल्मों की प्रचार गाड़ी दनदनाती गुज़रती तो लाउडस्पीकर की आवाज़ बहुत देर तक गूंजती रहती। क्रांति जब मोना सिनेमा में लगी थी तब खबर आई थी हॉल में धमाका हो गया है। दो रंगदार टिकट न मिलने पर मारा पीटी कर बैठे थे।पीवीआर से पहले के दौर में बालीबुड ने सिनेमा के दर्शकों में एक विशिष्ठ वर्ग पैदा किया था। प्रथम दिन पहला शो देखने वाले दर्शकों का वर्ग। लाठी खाकर रातों को जागर टिकट ले लेना। कई लोग इसलिए भी करते थे ताकि पहला शो देखने का रिकार्ड बना रहे और न देख पायें तो सिनेमा ही नहीं देखते थे। इगो में। चार बजे सुबह उठ कर चला गया था अग्निपथ का टिकट लेने। लाइन में लगे रहे। अचानक लाठी चल गई। एक लाठी लगी भी। चप्पल कहीं छूट गया। कमीज़ का बटन टूट गया। लेकिन जिस अमीर दोस्त को पकड़ लाया था टिकट के पैसे देने वो लाठी खाने के बाद भी डटा रहा। पहले दिन पहला शो का टिकट लेने के लिए। टिकट मिला भी। मज़ा आया था। अग्निपथ अग्निपथ..। एशियाड के बाद से सिनेमा की सार्वजनिक दुनिया में बंटवारा होने लगा। रंगीन टीवी ने बहुत कुछ बदला। रविवार को सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था। सारे पड़ोसी घर में जमा हो जाते थे। उस दौर में देवानद की बनारसी बाबू, राजेश खन्ना की अजनबी दिखाई जाती थी। आरजू तो टीवी पर काफी देखी गई थी। बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है। नवरंग फिल्म डीडी पर आ रही थी। मोहल्ले की पच्चीस तीस लड़के-लड़कियां टीवी देख रही थीं। सब के सब रो रही थीं। अब रोती हैं या नहीं मालूम नहीं लेकिन सिनेमा एक मौका देता ही है आपके भीतर की कहानी को पर्दे की कहानी से जोड़कर बाहर लाने का। हम सब फिल्मों से जुड़ रहे थे। बालीवुड का देशव्यापी प्रसार अभियान सफल हो रहा था। नरसिंहा राव के आने से पहले और बाबरी मस्जिद के गिरने से पहले तक सिनेमा एक रोमांचकारी अनुभव हुआ करता था। कयामत से कयामत तक हो या अजनबी कौन हो तुम या फिर नदिया के पार जैसी फिल्मों का दौर अभी बाकी था। लव स्टोरी,रॉकी और बेताब आकर चली गई थी। स्टार पुत्रों की कहानी उस दौर में भी लिखी गई। आज के पत्रकार भी लिखते हैं। स्टार पोतों की कहानी। उसी दौर में एक छठ पूजा में कर्ज का वो गाना रात भर गूंजता रहा। आज भी याद है मेरे मोहल्ले का लाउडस्पीकर बंद होता तो कहीं दूर से आवाज़ आने लगती थी..ओम शांति ओम। हे तुमने कभी किसी को दिल दिया है...। इसी वक्त एक डिस्को शर्ट का चलन भी आ गया था। डिस्को शर्ट काफी चमकता था। पीले रंग का काफी पोपुलर हुआ था। हीरो में जैकी श्राफ के पीले शर्ट के पोपुलर होने से पहले। हीरो के बाद से तो न जाने कितने लोगों ने काली पैंट और पीली शर्ट बनवाई थी। दर्ज़ियों के होर्डिंग बदल गए थे। जैकी की तस्वीर आ गई थी।यह तमाम बातें अस्सी के शुरूआती साल से लेकर १९९० तक की हैं। शायद समय का क्रम ठीक नहीं है। लेकिन बेतरतीब ही सही सिनेमा को याद करने पर बहुत कुछ निकलने लगता है। जब भी बंदिनी का वो गाना दूरदर्शन पर देखता..ओरे मांझी..गाने में हाजीपुर का पहलेजा घाट दिख जाता। हम भी मोतिहारी से हाजीपुर आते फिर हाजीपुर के पहलेजा घाट में पानी के जहाज पर सवार होकर पटना आते थे। स्टीमर पटना के दूजरा में उतरता था। कोई बच्चा बाबू थे जिनका स्टीमर चलता था। पहली बार इसी स्टीमर पर देखा था कि अगले हिस्से में कारें हैं और पीछले हिस्से में लोग। बाबूजी के साथ ऑमलेट और उस पर गोलमिर्च छिड़क कर खाने का अनुभव यहीं हुआ था। बहरहाल मैं सिनेमा को याद कर रहा हूं।एक फिल्म और आई थी। जिसे मैं नहीं देख सका। गर्भ ज्ञान। पटना में जब यह फिल्म लगी तो काफी चर्चा हुई थी। तब पता नहीं चल पाया था कि यह वयस्कों के लिए है या ज्ञान के प्रसार के लिए। केवल वयस्कों के लिए का लेबल तो आज भी होता होगा। तीसरी कसम ने तो एक अलग पहचान बना दी थी। रेणु की कहानी थी और बिहार। तब नहीं पता था कि बिहार एक अतिपिछड़ा राज्य है। राज्य से बाहर लोग बिहारी के रूप में पहचाने जाते हैं। दूसरे राज्यों से भगाये जाते हैं। यह सब नहीं मालूम था। शायद राजकपूर ने बहुत ध्यान से देखा होगा बंबई में काम के लिए आने वाले बिहारी मज़दूरों को। उनकी सादगी राजकपूर को तीसरी कसम में ईश कहने के लिए मजबूर करती होगी...ईश..लगता था कि वाह इस हिंदुस्तान के हम भी हिस्सा हैं। बिहार की पृष्ठभूमि पर भले ही कम फिल्में बनी हों लेकिन एक तरह की मासूमियत हुआ करती थी। शूल और गंगा जल ने बिहार को वो चेहरा दिखाया जो बाद में राजनीतिक परिवर्तन का हिस्सा बना। तब तक बिहार भी तो बहुत बदल गया था।
दर्शक की याद में सिनेमा-२
सिनेमा ने नौजवानों को नैतिक नहीं बने रहने के लिए कई तरह से मजबूर किया। इस देश में लाखों नौजवान होंगे जिन्होंने फिल्म देखने के लिए झूठ बोला। अपने बड़े भाई से, पिता से, प्रिंसिपल से और पड़ोसी से। देख के आए फिल्म और बताने लगे कि लाइब्रेरी में प्रेमचंद पढ़ रहे थे। नब्बे के दशक तक शहरों की बड़ी आबादी स्थायी होती थी। अभी की तरह नहीं कि दस साल पटना में, बीस साल दिल्ली में और बाकी के साल मुंबई में। स्थायी आबादी होने के कारण मोहल्ले की पहचान मज़बूत हुई। रिश्तेदारों की नज़र मज़बूत होती थी। नतीजा...अरे आज पप्पू को देखे अप्सरा सिनेमा में। पढ़ता लिखता नहीं है का। बस जैसे ही चाय पीकर जासूस रिश्तेदार विदा हुए अंदर फिल्मी अंदाज़ में लात घूंसे चलने लगते।सिनेमा हॉल की तरफ कदम बढ़ाने में पांव थरथराते थे। कहीं कोई देख न ले।चाचा या पड़ोस की आंटी। कहीं बड़े भाई भी दोस्तों के साथ न पहुंच गए हों सिनेमा देखने। याद कीजिएगा तो ऐसे ढेरो प्रसंग मिलेंगे इस तरह के टकराव के। सिर्फ पकड़े ही नहीं जाते थे बल्कि पहली बार घर वालों को पता चलता था कि इनके कौन कौन दोस्त हैं।आवारा लोफर यही सब इनाम मिलता था सिनेमा देखकर लौटने पर। अब तो घर के ही लोग कहते हैं फिल्म देख आओ। शुरू में ऐसा नहीं था। हमारे परिवार के उसी सदस्य ने,जो सिनेमची थी,एक सत्य कथा बताई थी। पटना के मिलर स्कूल से भाग जाते थे फिल्म देखने। ज़्यादा फिल्में पर्ल और राजधानी का गौरव अशोक सिनेमा हॉल में ही देखी क्योंकि ये दोनों सिनेमा घर मिलर स्कूल के नज़दीक थे। जब प्रिंसिपल को शक हुआ तो कहा कि पिता को बुला कर लाओ। अब उनमें इतनी हिम्मत तो नहीं थी कि पिता को बुलाते। लिहाजा एक चाय वाले को चाचा बना कर ले गए। इसके आगे की बात याद नहीं लेकिन इन्ही की सुनाई एक और कहानी है। इनके कुछ दोस्त सिनेमा देख रहे थे। सिगरेट पीने के लिए(तब शायद लोग हॉल में भी पीते होंगे)पीछे बैठे दर्शक से दियासलाई मांग बैठे। पीछे वाले अपनी बीड़ी जलाई और जलती तीली आगे बढ़ाई तो हल्की रौशनी में अपने ही सपूत का चेहरा दिख गया। बस लगे वहीं लात जूते से उन्हें मारने। भगदड़ मच गई।लड़कियों के लिए फिल्म देखना बहुत मुश्किल होता था। हमारे मोहल्ले में गीता दीदी थीं। उन्हें फिल्म देखने का बहुत शौक था। गीता दीदी साधारण सी महिला। इस बात की आशंका में डूबी रहने वाली लड़की कि कहीं कोई छेड़ न दे। बगल से तेज़ स्कूटर गुज़र जाए तो बिना देखे कि कौन चला रहा है वो चिल्लाने लगती थीं। दस बारह साल की उम्र में मैं गीता दीदी के साथ मर्द बन कर फिल्म देखने जाता था। उन्हें लगता था कि ये रहेगा तो कोई छेड़ेगा नहीं और मुझे लगता था कि मुफ्त में फिल्म देख रहा हूं। मोहल्ले की तमाम लड़कियों के लिए सिनेमा देखना तभी साकार होता था जब कोई बब्लू,पप्पू या मुन्ना उनके साथ फिल्म देखने को तैयार होता। तभी मांओं को भरोसा हो जाता था कि कोई लड़का साथ में है तो कुछ नहीं होगा। क्योंकि यह वो समय था जब लड़कियां घरों से बाहर सिनेमा हाल में ही दिखती थीं। लड़कों और लड़कियों के बीच एक अजीब किस्म का अभद्र सार्वजनिक टकराव होता था। सिटियां बजती थीं। फब्तियां चलती थीं। तो बेताब फिल्म भी इसी तरह देखी मैंने। आठ दस लड़कियों के साथ। चार पांच रिक्शे पर लादी गईं और मैं उनका पहरेदार मर्द उन्हीं में से एक किसी दीदी की गोद में बैठ कर बेताब देखने गया था। आखिरी ऐसी फिल्म मैने प्यार किया देखी। नब्बे का पहला साल था और मैं दिल्ली आ गया। इस बीच लालू प्रसाद के राज में पिछड़ों और अगड़ों के बीच तनाव के कारण सत्ता पाए पिछड़े उदंड हो गए तो अगड़े लड़के दिल्ली के लिए रवाना हो गए। अगड़ा समाज स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि दूध वाले ग्वाला लोग अब सरकार चला रहे हैं। ऐसा ही झगड़ा मैंने दो परिवारों के बीच देखा था। यादव जी थे और दूसरे ठाकुर साहब। ठाकुर परिवार के अंकल आंटी अक्सर उन पर फब्तियां कस देते कि अहिर लोग के राज में बौरा गए हैं। इस तरह की सार्वजनिक हिकारत ने भी लालू के समर्थकों को उदंड किया और लालू को लापरवाह नेता बनाया।ख़ैर इसका नतीजा कानून व्यवस्था पर पड़ा। मेरे दिल्ली आने के बाद मोहल्ले की लड़कियों का इस तरह रिक्शे पर लदा कर जाना बद हो गया। मेरा पटना लौटना कम हो गया और उनकी समस्या का सामाजिक समाधान निकाला जाने लगा। शादी हो गई सब की। तब से उनमें से शायद किसी से नहीं मिला हूं। क्योंकि उन लड़कियों को सिनेमा दिखाने वाला जीवन साथी मिल चुका था। बब्लू,पप्पू और मुन्ना बेकार हो चुके थे बल्कि ये भी अब खराब हो चुके ज़माने में भरोसे के लायक नहीं रहे थे। पटना में सिनेमा हॉल की हालत खस्ता होने लगी। अशोक अब राजधानी का गौरव नहीं लगता है। राजधानी का गौरव इसलिए था कि इस सिनेमा हॉल में सीटी बजाने पर सख्ती थी। दर्शकों की इसी आदत के कारण कई सिनेमा घरों ने हट्ठे कट्ठे पहलवान पाले थे। जो पहले दरवाज़े पर बेताब दर्शकों को ठेलते,उन्हें नियंत्रित कर एक एक कर भीतर जाने देते और फिर हॉल के अंदर पान की पीक थूकने या सीटी बजाने पर धुनाई करते। देश भर में कई सिनेमा घरों ने इन्ही पहलवानों के दम पर पारिवारिक होने की ख्याति पाई। नौ से बारह का शो काफी बदनाम शो माना जाता था। हॉस्टल के लड़के या रात की बस पकड़ने वाले लोग ही इस तरह से शो ज़्यादा देखा करते। रिक्शा वालों की भीड़ होती। फिल्म के साथ पंखा कूलर का भी मज़ा मिलता था। तभी तो हर हॉल पर शान से लिखा गया...एयरकूल। वातानुकूलित। असंख्य भारतीयों को एयरकंडीशन का सार्वजनिक अनुभव कराने का गौरव सिर्फ और सिर्फ हमारे सिनेमा हॉल को हासिल है। दूसरी तरफ सिनेमा देखने में मास्टर लोग भी पैदा हुए। जो टिकट लेने में माहिर होते, लाइन के बाहर से आकर अपना हाथ खिड़की की छेद में घुसेड़ देते और कॉलर ऊंचा कर चल देते। एक खास किस्म का आत्मविश्वासी युवा दर्शक पैदा हुआ जो टिकट लेकर सीढ़ियों पर दनदनाते हुए चढ़ता और दरवाजे पर धमक जाता। इनसबके कारण भी कई शरीफ लोगों के लिए सिनेमा देखना किसी युद्ध से लौटने जैसा होता था। कुछ शरीफ सिनेमा देखने के क्रम में ही शराफत से मुक्ति पाते थे। ऐसी ही किसी दुपहरी मैं और मेरा दोस्त पर्ल में श्री ४२० देखने चले गए। पहली बार बिना बताए और मोहल्ले की लड़कियों के बगैर। तीन से छह का शो था। अचानक बाहर बारिश होने लगी और अंदर भी। राजकूपर तो नर्गिस के साथ छतरी में हो लिए लेकिन मैं और अभय डर गए। अगर बारिश होती रही तो घर कैसे पहुंचेंगे। भींग कर जायेंगे तो पकड़े जायेंगे। बस बीच सिनेमा से ही भाग लिये। यह भी तो देखना था कि छह बजे के बाद पहुंचने पर कोई न पकड़ ले कि सिनेमा देख कर आया है। उसके बाद से कभी झूठ बोल कर सिनेमा देखने नहीं गया। लेकिन मालूम चला कि जो लोग झूठ बोलकर सिनेमा देखते थे वो आखिरी सीन पर एक्ज़िट पर पहुंच जाते ताकि फिल्म खत्म होने पर बत्ती के जलने से वहां मौजूद कोई रिश्तेदार न देख ले। इसलिए वो सबसे पहले निकलते और जल्दी घर पहुंचने की कोशिश करते। बाकी यादें बाद में।

फ़िल्म समीक्षा :रॉक ऑन

दोस्ती की महानगरीय दास्तान
-अजय ब्रह्मात्मज
फरहान अख्तर की पहली फिल्म दिल चाहता है में तीन दोस्तों की कहानी थी। फिल्म काफी पसंद की गई थी। इस बार उनकी प्रोडक्शन कंपनी ने अभिषेक कपूर को निर्देशन की जिम्मेदारी दी। दोस्त चार हो गए। महानगरीय भावबोध की रॉक ऑन मैट्रो और मल्टीप्लेक्स के दर्शकों के लिए मनोरंजक है।

आदित्य, राब, केडी और जो चार दोस्त हैं। चारों मिल कर एक बैंड बनाते हैं। आदित्य इस बैंड का लीड सिंगर है और वह गीत भी लिखता है। उसके गीतों में युवा पीढ़ी की आशा-निराशा, सुख-दुख, खुशी और इच्छा के शब्द मिलते हैं। चारों दोस्तों का बैंड मशहूर होता है। उनका अलबम आने वाला है और म्यूजिक वीडियो भी तैयार हो रहा है। तभी एक छोटी सी बात पर उनका बैंड बिखर जाता है। चारों के रास्ते अलग हो जाते हैं। दस साल बाद आदित्य की पत्नी के प्रयास से चारों दोस्त फिर एकत्रित होते हैं। उनका बैंड पुनर्जीवित होता है। आपस के मतभेद और गलतफहमियां भुलाकर सब खुशहाल जिंदगी की तरफ बढ़ते हैं।

लेखक-निर्देशक अभिषेक कपूर ने रोचक पटकथा लिखी है। ऊपरी तौर पर फिल्म में प्रवाह है। कोई भी दृश्य फालतू नहीं लगता लेकिन गौर करने पर हम पाते हैं कि कैमरा आदित्य को कुछ ज्यादा पसंद कर रहा है। फरहान होने का यह अघोषित दबाव हो सकता है। फिल्म की खूबी सभी किरदारों के लिए उपयुक्त कलाकारों का चयन है। फरहान के रूप में हम अपारंपरिक अभिनेता से परिचित होते हैं तो अर्जुन रामपाल पहली बार सक्षम अभिनेता के रूप में नजर आते हैं। पुरब कोहली, ल्यूक केनी, प्राची देसाई और शहाना गोस्वामी सभी ने अपने किरदारों को खास छटा दी है। फिल्म का एक किरदार संगीत भी है। पूरी फिल्म में उसकी निरंतरता दृश्यों और घटनाओं को जोड़ती है।

महानगरीय स्वरूप में बनी रॉक ऑन खूबसूरत फिल्म है। अगर यह थोड़ी छोटी व कसी होती तो इसका प्रभाव और बेहतर होता। गीतकार जावेद अख्तर और संगीतकार शंकर, एहसान, लॉय ने फिल्म के अनुरूप शब्द और धुन चुने हैं।

मुख्य कलाकार : फरहान अख्तर, अर्जुन रामपाल, पूरब कोहली, ल्यूक केनी, प्राची देसाई
निर्देशक : अभिषेक कपूर
तकनीकी टीम : बैनर-एक्सेल फिल्म्स, संगीतकार-शंकर एहसान लॉय, गीतकार- जावेद अख्तर, संवाद- फरहान अख्तर, छायांकन-जैसन वेस्ट

Friday, August 29, 2008

फ़िल्म समीक्षा:चमकू

-अजय ब्रह्मात्मज
यथार्थ का फिल्मी चित्रण

शहरी दर्शकों के लिए इस फिल्म के यथार्थ को समझ पाना सहज नहीं होगा। फिल्मों के जरिए अंडरव‌र्ल्ड की ग्लैमराइज हिंसा से परिचित दर्शक बिहार में मौजूद इस हिंसात्मक माहौल की कल्पना नहीं कर सकते। लेखक-निर्देशक कबीर कौशिक ने वास्तविक किरदारों को लेकर एक नाटकीय और भावपूर्ण फिल्म बनाई है। फिल्म देखते वक्त यह जरूर लगता है कि कहीं-कहीं कुछ छूट गया है।

एक काल्पनिक गांव भागपुर में खुशहाल किसान परिवार में तब मुसीबत आती है, जब गांव के जमींदार उससे नाराज हो जाते हैं। वे बेटे के सामने पिता की हत्या कर देते हैं। बेटा नक्सलियों के हाथ लग जाता है। वहीं उसकी परवरिश होती है। बड़ा होने पर चमकू नक्सल गतिविधियों में हिस्सा लेता है। एक मुठभेड़ में गंभीर रूप से घायल होने के बाद वह खुद को पुलिस अस्पताल में पाता है। वहां उसके सामने शर्त रखी जाती है कि वह सरकार के गुप्त मिशन का हिस्सा बन जाए या अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठे। चमकू गुप्त मिशन का हिस्सा बनता है। वह मुंबई आ जाता है, जहां वह द्वंद्व और दुविधा का शिकार होता है। वह इस जिंदगी से छुटकारा पाना चाहता है लेकिन अपराध जगत की तरह सरकारी गुप्त मिशन का भी रास्ता एकतरफा होता है। वहां से सामान्य जिंदगी में कोई जिंदा नहीं लौटता। चमकू इसका अपवाद है। वह विजयी होता है।

कबीर कौशिक की पटकथा और संरचना दो दशक पहले के शिल्प में है। वे पुरानी शैली में दृश्य रचते हैं और उनका फिल्मांकन भी उसी तरीके से करते हैं। दर्शक घटनाओं और दृश्यों की सटीक कल्पना करने लगते हैं। हद तो तब होती है जब फिल्म की नायिका गर्भवती होने की घोषणा करती है। तात्पर्य यह है कि नक्सल पृष्ठभूमि की अनोखी कहानी घिसी-पिटी फार्मूलाबद्ध हिंदी फिल्म में तब्दील हो जाती है।

कबीर को भारतीय रेल से कुछ ज्यादा प्रेम है। उनकी पिछली फिल्म का क्लाइमेक्स ट्रेन में था। इस फिल्म में क्लाइमेक्स के पूर्व के दृश्य ट्रेन में हैं। वैसे चलती ट्रेन में डिब्बे के अंदर एक्शन की कल्पना रोमांचक है।

Wednesday, August 27, 2008

बॉक्स ऑफिस:२९.०८.२००८

नही चला मल्लिका का जादू

सिंह इज किंग ने यह ट्रेंड चालू कर दिया है कि शुक्रवार को फिल्म रिलीज करो और अगले सोमवार को कामयाबी का जश्न मना लो। इसके दो फायदे हैं- एक तो ट्रेड में बात फैलती है कि फिल्म हिट हो गयी है और दूसरे कामयाबी के जश्न की रिपोर्टिग देख, सुन और पढ़ कर दूसरे शहरों के दर्शकों को लगता है कि फिल्म हिट है, तभी तो पार्टी हो रही है। इस तरह कामयाबी के प्रचार से फिल्म को नए दर्शक मिल जाते हैं।
पिछले सोमवार को फूंक की कामयाबी की पार्टी थी। एक बुरी फिल्म की कामयाबी का जश्न मनाते हुए निर्देशक राम गोपाल वर्मा की संवेदना अवश्य आहत हुई होगी। मन तो कचोट रहा होगा, लेकिन कैसे जाहिर करें? बहरहाल, फूंक के प्रचार से आरंभिक दर्शक मिले। पहले दिन इसका कलेक्शन 70 प्रतिशत था। राम गोपाल वर्मा की पिछली फिल्मों के व्यापार को देखते हुए इसे जबरदस्त ओपनिंग मान सकते हैं। शनिवार को दर्शक बढ़े, लेकिन रविवार से दर्शक घटने आरंभ हो गए। इस फिल्म की लागत इतनी कम है कि सामान्य बिजनेस से भी फिल्म फायदे में आ गयी है।
मान गए मुगले आजम और मुंबई मेरी जान का बुरा हाल रहा। संजय छैल की मान गए मुगले आजम देखने दर्शक गए ही नहीं, जबकि उसमें मल्लिका शेरावत थीं। दर्शक कंफ्यूज रहे कि किस तरह की फिल्म है? मुंबई मेरी जान का प्रचार सही नहीं था। इसे समीक्षकों की सराहना मिली, लेकिन इसे देखने गंभीर दर्शक ही गए। मुंबई की जिंदगी को दर्शाती इस फिल्म ने दूसरे शहरों में दर्शकों को आकर्षित नहीं किया।
पिछली फिल्मों में बचना ऐ हसीनों औसत व्यापार कर रही है। यशराज फिल्म्स के लिए यह राहत की बात है। सिंह इज किंग का उफान कम हुआ है। अब उसके दर्शक घट रहे हैं।

Tuesday, August 26, 2008

फिल्मी पर्दे और जीवन का सच

-अजय ब्रह्मात्मज
कुछ दिनों पहले शबाना आजमी ने बयान दे दिया कि मुसलमान होने के कारण उन्हें (पति जावेद अख्तर समेत) मुंबई में मकान नहीं मिल पा रहा है। उनके बयान का विरोध हो रहा है। शबाना का सामाजिक व्यक्तित्व ओढ़ा हुआ लगता है, लेकिन अपने इस बयान में उन्होंने उस कड़वी सच्चाई को उगल दिया है, जो भारतीय समाज में दबे-छिपे तरीके से मौजूद रही है। मुंबई की बात करें, तो अयोध्या की घटना के बाद बहुत तेजी से सामुदायिक ध्रुवीकरण हुआ है। निदा फाजली जैसे शायर को अपनी सुरक्षा के लिए मुस्लिम बहुल इलाके में शिफ्ट करना पड़ा। गैर मजहबी और पंथनिरपेक्ष किस्म के मुसलमान बुद्धिजीवियों, शायरों, लेखकों और दूसरी समझदार हस्तियों ने अपने ठिकाने बदले। आम आदमी की तो बात ही अलग है। अलिखित नियम है कि हिंदू बहुल सोसाइटी और बिल्डिंग में मुसलमानों को फ्लैट मत दो।

हिंदी सिनेमा बहुत पहले से इस तरह के सामाजिक भेदभाव दर्शाता रहा है। देश में मुसलमानों की आबादी करीब बीस प्रतिशत है, लेकिन फिल्मों में उनका चित्रण पांच प्रतिशत भी नहीं हो पाता। मुख्यधारा की कॉमर्शिअॅल फिल्मों में कितने नायकों का नाम खुर्शीद, अनवर या शाहरुख होता है? नायिकाओं के नाम भी जेबा, सलमा या शबनम नहीं होते। हां, अगर मुस्लिम परिवेश की फिल्म बन रही हो, तो अवश्य मुस्लिम समाज, परिवार और किरदार नजर आते हैं। आखिर क्यों किसी कॉमर्शिअॅल रोमांटिक फिल्म का हीरो मुसलमान नहीं होता? ऊपरी तौर पर देखें, तो ज्यादातर नायकों के नाम हिंदू परिवारों के प्रचलित नाम ही होते हैं। हिंदी फिल्मों में पंजाबी व्यक्तियों और संस्कृति के वर्चस्व से वे मल्होत्रा, मेहरा आदि ही होते हैं। क्या कभी नर्मदेश्वर पांडे, रामखेलावन यादव या मंगतू पासवान हिंदी फिल्म का हीरो हो सकता है? नहीं हो सकता, क्योंकि हिंदी फिल्में अघोषित रूप से लोकप्रिय संस्कृति के नाम पर जो बेचना और दिखाना चाहती है, उसके लिए ये नाम बाधक होंगे। माना जाता है कि ये नाम, उपनाम और जातियां देश के डाउन मार्केट से संबंधित हैं। चूंकि हिंदी फिल्मों के दर्शक मुख्यरूप से बहुसंख्यक हिंदू हैं, इसलिए उनकी धार्मिक-सामाजिक भावनाओं का खयाल रखते हुए किरदारों के नाम तक हिंदू रखे जाते हैं। अगर कोई मुसलमान किरदार फिल्म में होगा भी, तो उसे त्याग की मूर्ति के रूप में दिखाया जाएगा। वह अपनी जान देकर भी हीरो को बचाएगा। रोजा के बाद तो पठानी शूट, खत की गई दाढ़ी और सूरमा लगी आंखों के किरदार मुसलमान होने के साथ ही राष्ट्रद्रोही भी हो गए। तात्पर्य यह है किसामाजिक भेदभाव का यह यथार्थ पर्दे पर लंबे समय से चित्रित हो रहा है। सामाजिक जीवन में भेदभाव से परेशान होने पर भी मुसलमान नागरिकखामोश थे। अब वे बोलने लगे हैं। उनके बयानों से सांप्रदायिक सद्भाव की चादर ओढ़े समाज में तिलमिलाहट हो रही है।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सालों से धार्मिक धु्रवीकरण है। धर्म विशेष, प्रदेश विशेष और संप्रदाय विशेष के आधार पर काम दिए और लिए जाते हैं। हां, इंडस्ट्री के लोग इतने प्रोफेशनल अवश्य हैं कि हुनरमंदों को ही काम मिलता है। इस संदर्भ में धर्म, जाति और प्रदेश केनाम पर अतिरक्ति समझौता नहीं किया जाता। मुमकिन है शबाना आजमी के बयान के बाद इस दिशा में समाजशास्त्रीय अध्ययन और विमर्श आरंभ हो। यह जरूरी भी है, क्योंकि महानगरों में जाति और धर्म विशेष के धु्रवीकरण की प्रक्रिया चल रही है। यह देश के सामाजिक और पंथनिरपेक्ष संस्कृति के लिए खतरनाक है। सिनेमा से जुड़ी लोकप्रिय हस्तियों ने तकलीफ बताई है, तो इस तरफ सभी का ध्यान गया है।

Monday, August 25, 2008

हिन्दी टाकीज: फ़िल्में, बचपन और छोटू उस्ताद-रवि रतलामी

हिन्दी टाकीज-6
हिन्दी टाकीज में इस बार रवि रतलामी.ब्लॉग जगत के पाठकों को रवि रतलामी के बारे में कुछ भी नया बताना नामुमकिन है.उनके कार्य और योगदान के हम सभी कृतज्ञ हैं.उन्होंने चवन्नी का आग्रह स्वीकार किया और यह सुंदर आलेख भेजा.इस कड़ी को कम से कम १०० तक पहुँचाना है.चवन्नी का आप सभी से आग्रह है कि आप अपने अनुभव और संस्मरण बांटे.आप अपने आलेख यूनिकोड में chavannichap@gmail.com पर भेजें.

फ़िल्में, बचपन और छोटू उस्ताद



पिछली गर्मियों में स्पाइडरमैन 3 जब टॉकीज में लगी थी तो घर के तमाम बच्चों ने हंगामा कर दिया कि वो तो टॉकीज पर ही फ़िल्म देखने जाएंगे और वो भी जितनी जल्दी हो सके उतनी. उन्हें डीवीडी, डिश या केबल पर इसके दिखाए जाने तक का इंतजार कतई गवारा नहीं था. और उसमें हमारा हीरो छोटू भी था.



बच्चे उठते बैठते, खाते पीते अपने अभिभावकों को प्रश्न वाचक दृष्टि से देखते रहते कि उन्हें हम कब फ़िल्म दिखाने ले जा रहे हैं. अंततः जब छोटू ने स्पाइडरमैन फ़िल्म देखने के नाम पर खाना पीना बंद कर बुक्के फाड़कर रोना पीटना शुरू कर दिया कि उनके पापा-मामा तीन मर्तबा वादा करने के बाद भी स्पाइडरमैन दिखाने नहीं ले जा रहे हैं, तो हार कर बच्चों को फ़िल्म दिखाने ले जाना ही पड़ा.



अंधेरे सिनेमा हाल के चमकीले पर्दे पर जब चमड़ी से चिपके लाल रंग का ड्रेस पहने फ़िल्म का हीरो स्पाइडरमैन काले रंग के उसी किस्म के ड्रेस पहने शैतान खलनायक से जब लड़ाई करने लगा तो छोटू और उसका चार वर्षीय हम उम्र चचेरा भाई - बिट्टू भी आपस में झगड़ने लगे.



छोटू ने कहा – मैं लाल वाला हीरो हूं. तू काला वाला है. मैं तुझे मार दूंगा. मैं तुझे हरा दूंगा. बिट्टू ने कहा – नहीं मैं लाल वाला हूं - तू काला वाला है. मैं तुझे मार डालूंगा.



और वहीं उनमें स्पाइडरमैन वर्सेस खलनायक की लड़ाई होने लगी. वे दोनों अपने आप को स्पाइडरमैन समझने लगे, और दूसरे को खलनायक और वहीं टॉकीज में लड़ने लगे. उन दोनों को अन्य दूसरे दर्शकों के क्रोध से बचने के लिए जैसे तैसे तत्काल समझाया गया, मगर स्पाइडरमैन का जादू उनके मन से निकलने में महीनों लग गए. जब तब भी मौका पाते स्पाइडरमैन बन जाते और छड़ी या रॉड या कभी झाड़ू से ही, उन दोनों में युद्ध शुरू हो जाता.



छोटू जब रितिक रौशन की फ़िल्म देखता है तो महीनों तक रितिक रोशन बना रहता है. उठते बैठते, चलते-फिरते उसे अपने अंदर रितिक नजर आता है. ओरिजिनल वाला नहीं, पर्दे वाला हीरो. कहीं रितिक का गाना बजा नहीं, इधर रितिक स्टाइल में छोटू का डांस शुरु हुआ नहीं.



छोटू जब आइस एज की फिल्म देख लेता है, तो वो प्यारा हाथी बन जाता है. दिन-रात, सुबह शाम उसे आइस एज देखना होता है. बारंबार, दसियों बार. सीन दर सीन याद रहते हैं. मगर हर बार देखने में एक नए तरह का मजा आता है. और फ़िल्म पचासवीं बार देख लेने के बाद भी बोर नहीं करती – पहली मर्तबा देखने का ही मजा मिलता है छोटू को.



आप इस प्यारे हीरो छोटू उस्ताद से नहीं मिलना चाहेंगे? देखिए छोटू उस्ताद का पाजामा डांस –



यू-ट्यूब की कड़ी यह है http://in.youtube.com/watch?v=LXJgfXEuLv8




मुझे भी याद है अपने बचपन (में देखी गई) की फ़िल्मों का. तब फ़िल्में आज की तरह इतनी आसान और सुलभ भी तो नहीं होती थीं कि डीवीडी, टीवी, केबल और डिश के माध्यम दिन में दर्जनों फ़िल्मों से छांट लीजिए देखने के लिए. मेरी पहले पहल की देखी हुई (जो याद है) फ़िल्म थी – दस लाख. ओमप्रकाश का अभिनय, नीतूसिंह (बाल कलाकार के रूप में) की अदाकारी वो सब दिल में छप सी गई थी. फ़िल्म का थीम सांग – गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा, तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा (फ़िल्म दस लाख की लॉटरी खुलने के थीम पर बनाई गई थी) तो पहाड़े की तरह अभी भी याद है. पिछले दिनों जी क्लासिक पर यह फ़िल्म दिखाई गई तो समय निकाल कर कुछ हिस्से मैंने फिर से देखे.



एक और किस्सा - बात तब की है जब मैं प्रायमरी में पढ़ता था. राजेश खन्ना की एक फ़िल्म आराधना रिलीज हुई थी. कक्षा में टीचर जी भी महीनों आराधना ग्रस्त रहीं. हम छात्रों से (जो फ़िल्में देख चुके थे या देख आते थे) गणित के बजाए आराधना के सीन पूछतीं और याद डायलाग उगलवातीं. आराधना के गीत गवातीं. मैं उतना प्रिविलेज्ड बच्चा नहीं था – आराधना जैसी फ़िल्में हमारे हिस्से में तब आया नहीं करती थीं – तो मैं बस उन सीन की कल्पना कर लिया करता था.



बचपन में हमारे हिस्से में अकसर धार्मिक फ़िल्में आती थीं. जब धार्मिक फ़िल्में टॉकीज में लगती तो पारिवारिक आयोजन की तरह पूरा घर फ़िल्म देखने जाया करता था. तब फ़िल्मों में देवों और असुरों के बाबू भाई मिस्त्री के बनाए हुए चमत्कार अत्यंत चमत्कृत करते थे और बाद में महीनों कल्पना के घोड़े पर सवार मैं अपने आपको छोटू की तरह भगवान का रूप समझता और कल्पना में असुरों से युद्ध करता.



अब मैं फ़िल्में देखता हूं – चाहे वो सांवरिया (जिसे 3 घंटे झेलना नामुमकिन हो गया) हो चाहे डाई हार्ड-3 (इसकी अविश्वसनीय मारधाड़ भी असहनीय रही) तो मैं अपने आपको हीरो के बजाए उसका क्रिटिक ज्यादा पाता हूं. सिनेमा के बीच में दिमाग कहीं और उलझने लगता है. शायद मेरे भीतर का हीरो – छोटू उस्ताद कहीं ग़ायब हो गया है. कहीं खो गया है. यदि वो आपको कहीं मिले तो उसका अता पता दीजिएगा...


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Sunday, August 24, 2008

फ़िल्म समीक्षा:मुंबई मेरी जान

मुंबई के जिंदादिल चरित्र
ऐसी फिल्मों में कथानक नहीं रहता। चरित्र होते हैं और उनके चित्रण से ही कथा बुनी जाती है। हालांकि फिल्म के पोस्टर पर पांच ही चरित्र दिखाए गए हैं, लेकिन यह छह चरित्रों की कहानी है। छठे चरित्र सुनील कदम को निभाने वाला कलाकार अपेक्षाकृत कम जाना जाता है, इसलिए निर्माता ने उसे पोस्टर पर नहीं रखा। फिल्म के निर्देशक निशिकांत कामत हैं और वे सबसे पहले इस उपक्रम के लिए बधाई के पात्र हैं कि आज के माहौल में वे ऐसी भावनात्मक और जरूरी फिल्म लेकर आए हैं।
11 जुलाई 2006 को मुंबई के लोकल ट्रेनों में सीरियल बम विस्फोट हुए थे। एक बारगी शहर दहल गया था और इसका असर देश के दूसरे हिस्सों में भी महसूस किया गया था। बाकी देश में चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं, लेकिन अगले दिन फिर मुंबई अपनी रफ्तार में थी। लोग काम पर जा रहे थे और लोकल ट्रेन का ही इस्तेमाल कर रहे थे। मुंबई के इस जोश और विस्फोट के प्रभाव को निशिकांत कामत ने विभिन्न चरित्रों के माध्यम से व्यक्त किया है। उनके सभी चरित्र मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवेश के हैं। न जाने क्यों उन्होंने शहर के संपन्न और सुरक्षित तबके के चरित्रों को छुआ ही नहीं।
बम विस्फोट से सीधे प्रभावित होने वालों में रूपाली जोशी (सोहा अली खान) और निखिल अग्रवाल (आर माधवन) हैं। टीवी रिपोर्टर रूपाली का मंगेतर इस विस्फोट में लापता हो जाता है। विस्फोट की रिपोर्ट कर रही रूपाली खुद उसका शिकार होती है और चैनल उसकी व्यथा का प्रसारण करता है। इस प्रक्रिया में समाचार संग्रह के दबाव की अनिवार्यता और उसमें निहित अमानवीयता भी नजर आती है। निखिल को हम एक जिम्मेदार और देश के प्रति वफादार नागरिक के रूप में देखते हैं। हादसे का स्वयं शिकार होने के बाद उसे संभलने में वक्त लगता है, लेकिन वह मुंबई की जिंदगी की निरंतरता के रूप में हमें फिर लोकल ट्रेन में दिखाई देता है।
थामस (इरफान खान) रात में काफी बेचकर गुजारा करता है। विस्फोट का असर उसके धंधे पर पड़ता है। महानगरों की माल संस्कृति की चपेट में आया थामस एक बार अपमानित होने पर अजीब तरीके से बदला लेता है। सुरेश (के के) के रूप में हम ऐसे हिंदू नौजवान को देखते हैं, जो हर मुसलमान को शक की निगाह से देखता है, लेकिन सच से सामना होने पर उनकी आंखें खुलती हैं। मुंबई पुलिस के तुकाराम पाटिल (परेश रावल) और सुनील कदम (विजय मौर्या) फिल्म के स्थायी भाव अवसाद को व्यक्त करते हैं। रिटायर होने जा रहे तुकाराम का एहसास और सुनील की निराशा झिंझोड़ती है।
मुंबई मेरी जान चरित्रों के अनुरूप अभिनेताओं के चयन से खास बन गई है। परेश रावल का किरदार और उनका अभिनय अनजाना नहीं है, लेकिन विजय मौर्या ने सुनील कदम की निराशा को पूरे आवेग से निभाया है। थामस के किरदार में इरफान ने अस्पष्ट संवादों के बावजूद निम्नमध्यवर्गीय आक्रोश को बखूबी व्यक्त किया है। अपनी गलती का एहसास होने पर बेचैनी और उद्विग्नता से से वे पश्चाताप करते हैं और फिर राहत मिलने पर सिर्फ भंगिमाओं से खुशी जाहिर करते हैं। इस फिल्म में उनका मौन मुखर है। उन्होंने यादगार चरित्र निभाया है।
मुख्य कलाकार : परेश रावल, सोहा अली खान, इरफान खान, आर माधवन, के.के. मेनन और विजय मौर्या आदि।
निर्देशक : निशिकांत कामत
तकनीकी टीम : निर्माता- रोनी स्क्रूवाला, संगीत- समीर फाटपरेकर, कथा-संवाद-गीत- योगेश विनायक जोशी

Saturday, August 23, 2008

फ़िल्म समीक्षा:फूँक

डर लगा राम गोपाल वर्मा के लिए
फूंक डराती है। यह डर फिल्म देखने के बाद और बढ़ जाता है। डर लगता है कि राम गोपाल वर्मा और क्या करेंगे? प्रयोगशील और साहसी निर्देशक राम गोपाल वर्मा हर विधा में बेहतर फिल्म बनाने के बाद खुद के स्थापित मानदंडों से नीचे आ रहे हैं। डर लग रहा है कि एक मेधावी निर्देशक सृजन की वैयक्तिक शून्यता में लगातार कमजोर और साधारण फिल्में बना रहा है। फूंक रामू के सृजनात्मक क्षरण का ताजा उदाहरण है।
पूरी फिल्म इस उम्मीद में गुजर जाती है कि अब डर लगेगा। काला जादू के अंधविश्वास को लेकर रामू ने लचर कहानी बुनी है। फिल्म की घटनाओं, दृश्य और प्रसंग का अनुमान दर्शक पहले ही लगा लेते हैं।

फिल्म खतरनाक तरीके से काला जादू में यकीन करने की हिमायत करती है और उसके लिए बाप-बेटी के कोमल भावनात्मक संबंध का उपयोग करती है। रामू से ऐसी पिछड़ी और प्रतिगामी सोच की अपेक्षा नहीं की जाती। फिल्में सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करती, भारतीय समाज में वे दर्शकों की मानसिकता भी गढ़ती हैं। एक जिम्मेदार निर्देशक से अपेक्षा रहती है कि वह मनोरंजन के साथ कोई विचार भी देगा।

मुख्य कलाकार : सुदीप, अमृता खनविलकर, अहसास चानना, श्रेय बावा, ज्योति सुभाष, जाकिर हुसैन, किशोर कदम आदि।
निर्देशक : राम गोपाल वर्मा
तकनीकी टीम : निर्माता- आजम खान, लेखक- मिलिंद गडकर

फ़िल्म समीक्षा:मान गए मुगलेआज़म

छेल हुए फेल
कैसे मान लें कि जो अच्छा लिखते और सोचते हैं, वे अच्छी फिल्म नहीं बना सकते? मान गए मुगलेआजम देख कर मानना पड़ता है कि संजय छैल जैसे संवेदनशील, चुटीले और विनोदी प्रकृति के लेखक भी फिल्म बनाने में चूक कर सकते हैं। फिल्म की धारणा भी आयातित और चोरी की है, इसलिए छैल की आलोचना होनी ही चाहिए। ऐसी फिल्मों के लिए निर्माता से ज्यादा लेखक और निर्देशक दोषी हैं।
गोवा के सेंट लुईस इलाके में कलाकार थिएटर कंपनी के साथ जुड़े कुछ कलाकार किसी प्रकार गुजर-बसर कर रहे हैं। अंडरव‌र्ल्ड पर नाटक करने की योजना में विफल होने पर वे फिर से अपना लोकप्रिय नाटक मुगलेआजम करते हैं। अनारकली बनी (मल्लिका सहरावत) शबनम का एक दीवाना अर्जुन (राहुल बोस) है। जब भी उसके पति उदय शंकर मजूमदार (परेश रावल) अकबर की भूमिका निभाते हुए पांच मिनट का एकल संवाद आरंभ करते हैं, अर्जुन उनकी पत्नी से मिलने मेकअप रूम में चला जाता है। बाद में पता चलता है कि वह रा आफिसर है। इंटरवल तक के विवाहेतर संबंध के इस मनोरंजन के बाद ड्रामा शुरू होता है। रा आफिसर थिएटर कंपनी के कलाकारों की मदद से आतंकवादियों की खतरनाक योजना को विफल करता है।
ट्रीटमेंट की बात करें तो रंगमंच और वास्तविक घटनाओं के मेल से उपजे हास्य को जाने भी दो यारो में बहुत अच्छी तरह चित्रित किया जा चुका है। संजय छैल उसी स्कूल के निर्देशक होने का दावा करते हैं, इसलिए उस शिल्प और शैली से उनका प्रेरित होना क्षम्य है, किंतु विषय और निर्वाह के स्तर पर नवीनता तो आनी चाहिए। फिल्म की पटकथा से कंफ्यूजन इतना बढ़ जाता है कि उलझन होने लगती है। पूरी फिल्म में केवल पांच-छह प्रसंगों में ही हंसी आती है।
पर्दे पर मल्लिका की मौजूदगी में मादकता है। ज्यादातर निर्देशक उनकी इस खूबी का उपयोग करते हैं। अगर उन्हें भावनात्मक दृश्य मिल जाते हैं तो मुश्किल खड़ी होती है। अभिनय की उनकी सीमाएं नजर आने लगती हैं। परेश रावल और के के मेनन सिद्धहस्त अभिनेता हैं। उन्होंने इस फूहड़ फिल्म में भी सधा अभिनय किया है। राहुल बोस अपने रोल में मिसफिट हैं।
मान गए मुगलेआजम कामेडी से ज्यादा पैरोडी लगती है। छैल निर्देशन में तीसरा मौका गंवा बैठे। हां, फिल्म के संवादों में उनका चुटीलापन बरकरार है, लेकिन फिल्म सिर्फ संवादों से तो नहीं बनती।

समाज को चाहिए कुछ विद्रोही-महेश भट्ट

दावानल खबरों में है। कैलिफोर्निया के जंगल की आग तबाह कर रही है। इन पंक्तियों को लिखते समय मैं टीवी पर आग की लपटें देख रहा हूं। कम ही लोग महसूस कर पाते हैं कि आग पर्यावरण का जरूरी हिस्सा है, क्योंकि यह पुराने को जला देती है और नए विकास के लिए जगह बनाती है। इसी प्रकार विद्रोही भी जरूरी होते हैं। संस्कृति के पर्यावरण को सुव्यवस्थित और विकसित करने के लिए उनकी जरूरत पडती है। जंगल की आग की तरह वे भी पुराने को जला देते हैं। विद्रोही संस्कृति की मोर्चेबंदी को तोडते हैं और जिंदगी के नए अवतार के लिए जगह बनाते हैं।
विद्रोह के परिणाम
तुम वही क्यों नहीं करते, जो तुम्हें कहा जाता है? स्कूल के दिनों में मुझे अपने शिक्षक से अकसर यह डांट मिलती थी। पर आप जो समझाते और कहते हैं, उस तरह से आप खुद जीवन बसर नहीं करते। आप मुझे ईमानदार होने के लिए कहते हैं और मैं पाता हूं कि मेरे आसपास हर आदमी अपने दावे के विपरीत काम कर रहा है। मेरे पूर्वज उन भिक्षुओं की तरह थे, जो आदर्श की माला जपते रहे, लेकिन जीवन में उन्हें नहीं उतार सके। जो शिक्षक मुझे शिवाजी के साहस के बारे में बता रहे थे, वे स्कूल के बाहर खडी उत्तेजित भीड को पत्थर चलाते देख क्लास से सबसे पहले भागे। मेरे मां-बाप ईमानदार जिंदगी का सबक देते रहे और खुद बेईमान जिंदगी जीते रहे, मैंने प्रिंसिपल से गुस्से में ये बातें कही थीं। वे पादरी भी थे। मेरे प्रति करुणा व समझदारी दिखाने के बजाय स्कूल से मेरी छुट्टी कर दी गई। उन्होंने कहा, तुम व्रिदोही हो, हमें अनुशासित छात्र चाहिए। ऐसे छात्र नहीं, जो केवल सवाल करते हैं। सवाल पूछने की मेरी इच्छा और चीजों को समझने की जिद को कतर दिया गया।
आईकन बन जाते हैं विद्रोही
मैं तो उस घटना का एहसानमंद हूं कि उस अनुभव ने मेरी सोच और एहसास को हमेशा के लिए बदल दिया। आज मैं 59 साल का हूं और वैसा ही महसूस करता हूं। कई दफा लगता है, दुनिया और आसपास के विचारों पर ज्यादा उग्रता से विरोध करता हूं। मेरे अंदर का विद्रोही स्वभाव मुझे छोड नहीं रहा है। कला जगत का परिदृश्य देखें तो पाएंगे कि यह विद्रोहियों से भरा है। उन्हें अपने समय में स्वीकृति नहीं मिली, लेकिन समय बीतने के साथ वे आईकॅन बन गए। संस्कृति में सबसे पहले उन्हें स्वीकृति और सराहना मिलती है, जो समय के साथ चलते हैं और प्रचलित परंपराओं को दोहराते हैं। विद्रोही आता है, परंपराओं को तहस-नहस करता है। निस्संदेह मौजूद मॉडल और आदर्श के अनुरूप काम कर रहे लोग नए विद्रोहियों को दबाने की कोशिश करते हैं, ताकि वे पुरानी जिंदगी और सोच को तबाह न कर सकें। लेकिन जिस तरह हर रात की सुबह होती है, उसी प्रकार विद्रोही की सोच कामयाब होती है। वही जिंदगी और प्रगति का प्रतीक होता है और आखिर में उसी की जीत होती है।
फिल्म जगत के विद्रोही
भारतीय सिनेमा को विश्व के मानचित्र पर सम्मानित जगह दिलाने वाले सत्यजित राय विद्रोही थे। उनका सिनेमा विशेष और पृथक था, वह बदलते बंगाल की संस्कृति का द्योतक था। वह स्वयं बंगाल के थे। सच्चा विद्रोही अनुगामियों की चिंता नहीं करता। वह जो सोचता है, वही करता है। वह अपनी राह का अकेला यात्री होता है। समय की रेत में बाद की पीढियां उसके कदमों के निशान खोजती हैं और उस जोश को समझने की कोशिश करती हैं कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया? कभी उन्हें सफलता मिलती है तो कभी शुष्क जीवनी लिखी जाती है, जिसमें सिर्फ घटनाओं का उल्लेख होता है। विद्रोही की सोच और जीवन ऊर्जा को समझने की कोशिश नहीं की जाती।
राज कपूर को अपने समय में विद्रोही कहा जाता था। उन्होंने फिल्मों में स्त्री-पुरुष संबंधों को जैसे चित्रित किया, उसकी कल्पना भी उनके पूर्वजों ने नहीं की थी। उनके प्रेम दृश्य रूखे एवं हिंसक होते थे। तब की ज्यादातर फिल्मों में प्रेम दृश्य अशारीरिक और कोमल होते थे। आर.के. के प्रतीक चिह्न में एक पुरुष ने स्त्री को अपनी बांहों में ले रखा है और प्रेम के वशीभूत वह उसकी तरफ झुका हुआ है। राज कपूर की निजी जिंदगी भी खुली थी। वे दूसरों की तरह दरवाजे बंद करके प्रेम नहीं करते थे। राज कपूर-नरगिस की प्रेम कहानी शुद्धतावादी समाज में अवैध प्रेम का नमूना थी। उसी प्रेम कहानी के दम पर स्वर्णयुग की एक-एक फिल्म का निर्माण हुआ। जब शम्मी कपूर जंगली में बर्फीली ढलान से याहू चिल्लाते हुए लुढके तो उन्होंने हिंदी फिल्मों के हीरो का अंदाज बदल दिया। उनके पहले प्रेम की अभिव्यक्ति में भी हीरो खिचे-खिचे रहते थे। जंगली किशोरावस्था की मेरी पहली फिल्म है। उसकी सफलता का राज है कि शम्मी ने ब्यूटी क्वीन सायरा बानो से प्रेम का खुला इजहार किया। जवान हो रहे सभी दोस्त प्रेम की वैसी ही भावना महसूस करते थे। शम्मी कपूर को तब रिबेल स्टार कहा गया था।
समानांतर सिनेमा में विद्रोह
आठवें और नौवें दशक में जब हिंदी सिनेमा की आग ठंडी पड गई थी और निर्माताओं के लिए फिल्म सिर्फ मुनाफे का धंधा बन चुकी थी, उन्हीं दिनों समानांतर सिनेमा का जन्म हुआ। इसके फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा के पॉपुलर फैशन के खिलाफ विद्रोह किया था। पॉपुलर फिल्मों में केवल नाच-गाने और पलायनवादी मेलोड्रामा होता था। ऐसे समय में दादा साहेब फालके पुरस्कार से इस साल सम्मानित हुए श्याम बेनेगल ने फिल्मों में प्रवेश किया था। उनकी पहली फिल्म अंकुर में गांव की किसान महिला ने सामंती जमींदार के यौन शोषण के खिलाफ विद्रोह किया था। संयोग से वह हिंदी फिल्मों की महान अभिनेत्री शबाना आजमी की भी पहली फिल्म थी।
बगावत की तारीफ
यह वही मुश्किल दौर था। जब मैंने चार फ्लॉप फिल्मों के बाद आत्मकथात्मक फिल्म अर्थ बनाई थी। इसे प्रिव्यू में तारीफें मिली थीं, लेकिन प्रचलित फॉर्मूले से सर्वथा अलग होने के कारण लगभग एक साल तक कोई खरीदार नहीं मिला था। सीधी सी वजह थी। फिल्म इंडस्ट्री पर राज कर रहे लोगों को यह स्वीकार नहीं था कि हीरोइन सदियों से चले आ रहे पुरुष वर्चस्व को चुनौती दे और उससे बगावत करे। दशकों बाद भी मेरी फिल्म प्रासंगिक है और नए दौर की फिल्मों के विषय से आगे है। इसकी नायिका अपने पति व प्रेमी दोनों की जिंदगी से निकल जाती है और अपनी शर्तो पर स्वतंत्र जिंदगी चुनती है। फिल्म इंडस्ट्री ने भविष्यवाणी की थी कि अपने अंत की वजह से फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। लेकिन सच यही है कि बगावत भरे अंत के कारण ही फिल्म सफल हुई। सफलता का कारण यह भी था कि इसने शहरी औरतों को पहली बार धोखेबाज पतियों को पलटकर जवाब देने की दबी भावना को स्वर दिया, साबित किया कि दुनिया विद्रोहियों को इसलिए पंसद करती है कि अधिकतर लोग इस तरह बगावत नहीं कर पाते।
सच्चाई का रास्ता एकाकी
अपनी पहली फिल्म सारांश में अनुपम खेर ने बी. वी. प्रधान का जो किरदार निभाया था, वह मेरा अभी तक का सबसे शानदार किरदार है। इस साहसी फिल्म का मेरा नायक सदियों पुरानी पुनर्जन्म की अवधारणा के खिलाफ लडता है। इसे बनाना आसान नहीं रहा। तब मैं 33 साल का था। मुझे राजश्री प्रोडक्शन के मुखिया सेठ ताराचंद बडजात्या से लडना पडा था। वे श्री अरविंदों के भक्त थे। उन्होंने सीधे पूछा, कैसे कह सकते हो कि पुनर्जन्म नहीं होता? क्या तुम संतों से ज्यादा जानते हो? संतों ने कहा है कि आत्मा अमर है। उन्होंने फिल्म के क्लाइमेक्स की शूटिंग से पहले यह सवाल रखा था। मेरा जवाब था, हम अमर नहीं हैं, सर। हम मर जाते हैं, लेकिन जिंदगी अमर रहती है। उसका अंत नहीं है। सारांश में मेरा यही संदेश है। फिल्म में यही बात कही जाएगी या फिल्म नहीं बनेगी। उनके विचारों को मैंने चुनौती दे दी थी। वह कुछ समय बहस करते रहे, समझाते रहे, लेकिन तो भी मैं अपनी राय से टस से मस नहीं हुआ तो उन्होंने जिद छोड दी। उसके बाद तो सारांश ने इतिहास रचा। वह क्लासिक फिल्म बन गई। ऐसा इसलिए हुआ कि मैं किसी विद्रोही की तरह उस विश्व दृष्टि से चिपका रहा, जिसके लिए मैं लड रहा था। इस आलेख का सार यही है कि सच्चे कलाकार का सफर अकेला होता है। अधिकतर कलाकार महसूस करते हैं कि विद्रोह करते ही आप अकेले हो जाते हैं, लेकिन तभी सच्ची कला का जन्म भी होता है। पलटकर देखता हूं कि जब भी मैंने स्थापित मूल्यों के खिलाफ विद्रोह किया, तब-तब लोगों को मैंने प्रभावित किया। अपने विश्वास के लिए मर-मिटने की इच्छा ने ही मुझे जिंदगी दी। जीवन का विपरीत शब्द मृत्यु नहीं, बल्कि एकरूपता है। विद्रोही एकरूपता छोडते हैं और जीवन पाते हैं अपनी मृत्यु के बाद।

Thursday, August 21, 2008

दरअसल:प्रचार में गौण होते निर्देशक

-अजय ब्रह्मात्मज
हर कलाकार अपने इंटरव्यू में निर्देशक को कैप्टन ऑफ द शिप कहता है। मुहावरा बहुत पुराना जरूर है, लेकिन यही मुहावरा प्रचलित है। हां, निर्देशक फिल्म रूपी जहाज का कप्तान होता है, क्योंकि यही सच है। निर्देशक ही फिल्म की प्लानिंग करता है। एक रचना-संसार सुनिश्चित करता है। लेखक की मदद से किरदार गढ़ता है और फिर उनमें प्राण फूंक देता है। पर्दे पर चलते-फिरते वे किरदार दर्शकों से संवाद और संवेदना स्थापित करते हैं। दो से तीन घंटे की उस दुनिया को गढ़ने वाला निर्देशक ही होता है। अगर आप फिल्म जगत से वाकिफ हैं और निर्माण की प्रक्रिया से परिचित हैं, तो निर्देशक की नियामक भूमिका को समझ सकते हैं। एक सिम्पल विचार को फिल्म में परिणत करना और फिर उसे व्यापार योग्य वस्तु बना देने में आज के निर्देशक की भूमिका फिल्म पूरी होने के साथ खत्म हो जाती है। फिल्म का फाइनल प्रिंट आते ही इन दिनों बाजार के जानकार उसकी मार्केटिंग और पैकेजिंग की रणनीति तय करना शुरू कर देते हैं। अफसोस की बात तो यह है कि इस रणनीति में निर्देशक की राय नहीं ली जाती और न उसे इतना जरूरी समझा जाता है कि फिल्म के प्रचार में उसका समुचित उपयोग किया जाए! वैसे, एक सच यह भी है कि अधिकांश निर्देशकों ने इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है। वे हाशिए पर आ गई भूमिका से संतुष्ट हैं, क्योंकि उन्हें यही लगता है कि अगर उन्होंने हस्तक्षेप किया, तो वे अगली फिल्म से वंचित हो सकते हैं।
हालांकि पिछले दिनों दो-चार निर्देशकों ने इस ताजा स्थिति के प्रति नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने सोदाहरण बताया कि फिल्मों के प्रचार में निर्देशक गौण होता है। केवल स्टार बोल रहे होते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि मीडिया की भी रुचि निर्देशकों में नहीं रहती। हां, अगर निर्देशक करण जौहर, आशुतोष गोवारीकर जैसे नामचीन हों, तो अलग बात है, अन्यथा फिल्म के फ‌र्स्ट लुक में उनके एक-दो उद्धरण भर रख दिए जाते हैं। एक नाराज निर्देशक ने बताया कि हीरो या हीरोइन को फिल्मों के कथ्य की कोई जानकारी नहीं होती। कायदे से वे अपने किरदारों को भी नहीं जानते। फिल्म निर्माण और उसके प्रचार में अजीब किस्म की लापरवाही घुसती जा रही है। पॉपुलर स्टारों में यदि दो-तीन को छोड़ दें, तो बाकी को इसकी परवाह भी नहीं रहती कि फिल्म में उनके चरित्र को किस रूप में पेश किया गया है! फिल्म की रिलीज के समय वे चंद मोटी-मोटी बातें कहते हैं, जिसे सिर्फ फिल्म का नाम बदल कर उनकी हर फिल्म के साथ दिखाया जा सकता है। मसलन, मेरा काम अच्छा है, अलग है.. फिल्म के निर्देशक को अपना काम मालूम है.. हीरो-हीरोइन का सुंदर सहयोग रहा..। शूटिंग का माहौल पारिवारिक था.. बड़ा मजा आया। टीवी के एंटरटेनमेंट रिपोर्टर स्टारों की एकरूप टिप्पणी के साथ फिल्म के गतिचित्र जोड़कर पैकेज तैयार कर लेते हैं। उस नाराज निर्देशक ने आगे कहा, इससे टीवी के दर्शकों का मनोरंजन तो हो जाता है, लेकिन वे समझ नहीं पाते कि फिल्म में क्या है? वे असमंजस में रहते हैं।
हालांकि फिल्म के शुरू और अंत में ए फिल्म बाई.. लिखने का रिवाज चल पड़ा है, लेकिन फिल्म का कर्ता-धर्ता निर्देशक ही फिल्म के बारे में कुछ नहीं बता पाता। सच तो यह है कि वह स्टारों की बकवास सुनने के लिए विवश रहता है। उसकी अकुलाहट और पीड़ा हम समझ सकते हैं। अपने सृजन के बारे में कुछ न बोल-बता पाने की तकलीफ से गुजरते निर्देशक की वेदना तब और बढ़ जाती है, जब उसकी फिल्म का अभिप्रेत जाहिर नहीं हो पाता। स्टार ज्यादा से ज्यादा अपने रोल के बारे में बता पाते हैं। उनके सामने पूरी फिल्म की समझ नहीं रहती। अगर फिल्म के प्रचार के समय निर्देशक का नजरिया सुसंगत तरीके से पेश किया जाए, तो दर्शकों को धारणा बनाने और निर्णय लेने में सुविधा होगी कि वे फिल्म देखें या न देखें! उसके बाद दर्शक फिल्म को सही परिप्रेक्ष्य में देख पाएंगे और तब फिल्म की सराहना और आलोचना भी अधिक तार्किक और संगत होगी।

बॉक्स ऑफिस:२२.०८.२००८

पर्व-त्योहार से हुआ फायादा

पर्व-त्योहार के दिनों में सिनेमाघरों में भीड़ बढ़ जाती है। साथ में छुट्टियां आ जाएं तो टिकट बिक्री अच्छी होती है। पिछले हफ्ते रिलीज हुई बचना ऐ हसीनों और गाड तुसी ग्रेट हो को 15 अगस्त, रक्षाबंधन, शब-ए-बारात और नवरोज के साथ रविवार का फायदा हुआ।

चार दिनों में फिल्मों का आरंभिक कलेक्शन संतोषजनक रहा। बचना ऐ हसीनों यशराज की फिल्म है। इस बार उन्हें सामान्य लाभ होता दिख रहा है। टशन के गम के बाद यशराज टीम में खुशी की लहर लौटी है। महानगरों और मल्टीप्लेक्स में यह फिल्म अधिक पसंद की जा रही है। सिंगल स्क्रीन और अपेक्षाकृत मध्यम व छोटे शहरों में इसके दर्शक तेजी से घट रहे हैं। फिल्म की कहानी और किरदार हिंदी सिनेमा के दर्शक से कनेक्ट नहीं हो पाए। दूसरी फिल्म गाड तुसी ग्रेट हो में सलमान खान के कारण दर्शकों ने रुचि दिखाई। यह फिल्म छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन में ज्यादा अच्छा व्यवसाय कर रही है। वैसे इस फिल्म के प्रति भी दर्शकों का उत्साह जल्दी ही ठंडा हो गया। मंगलवार से इस फिल्म के दर्शक घटे हैं। लगता है कि बचना ऐ हसीनों और गाड तुसी ग्रेट हो सामान्य बिजनेस ही कर पाएंगी।

पिछली फिल्म सिंह इज किंग के प्रचार का शोर अब थम गया है। चूंकि यह फिल्म ऊंची कीमत में बेची गई थी, इसलिए देखना है कि वितरक लाभ में रहते हैं या नहीं? तीसरे हफ्ते में सही तस्वीर सामने आएगी। फिर भी आरंभिक कलेक्शन और तीन दिनों की भीड़ ने सिंह इज किंग को हिट की श्रेणी में ला दिया है।

Wednesday, August 20, 2008

जो काम मिले, उसे मन से करो: बिपाशा बसु

फिल्म बचना ऐ हसीनों की एक हसीना बिपाशा बसु हैं। उनका फिल्म के हीरो से मुंबई में रोमांस होता है। कुछ गाने होते हैं और बस काम खत्म। हीरोइन की ऐसी भूमिकाओं से बहुत संतुष्ट नहीं होतीं बिपाशा बसु, हालांकि वे नाखुश भी नहीं हैं। वे आह भरती हुई कहती हैं, अब कहां बची हैं लीड भूमिकाएं। वैसे रोल ही नहीं लिखे जा रहे हैं! मैंने तो कुछ सालों पहले ही लीड रोल की चिंता छोड़ दी। काम करना है, तो जो भूमिका मिले, उसे मन से करो और उसी में अपनी छाप छोड़ दो।
बिपाशा आश्वस्त हैं कि दीपिका पादुकोण और मिनिषा लांबा जैसी नई अभिनेत्रियों के बीच वे बेमेल नहीं लगेंगी। वे धीरे से बता भी देती हैं, मिनिषा उम्र में मुझसे बड़ी ही होंगी। हां, वे देर से फिल्मों में आई हैं, इसलिए मुझ से छोटी दिखती हैं। वैसे उम्र से क्या फर्क पड़ता है? आप जब तक पर्दे पर आकर्षक और ग्लैमरस दिखते हैं, तब तक सब ठीक है। बिपाशा इस फिल्म में राधिका का किरदार निभा रही हैं, जो दुनिया के रस्म-ओ-रिवाज को नहीं मानती। वे मानती हैं किउनकी स्क्रीन एज ज्यादा है। वे पिछले छह सालों से काम कर रही हैं। मॉडलिंग, फिल्में और विज्ञापनों की वजह से उनका चेहरा जाना-पहचाना है। वे कहती हैं, मैंने अपना करियर बहुत जल्दी आरंभ कर दिया। मैं मुंबई में अकेली संघर्ष कर रही थी। मुझे खुशी है कि बगैर किसी गॉडफादर के मैंने अपनी जगह बनाई है। बिपाशा पूरे आत्मविश्वास के साथ बताती हैं, दर्शकों के साथ मेरा एक रिश्ता बन चुका है। मेरी फिल्मों, मेरे काम और मेरे पारदर्शी व्यक्तित्व के कारण वे मुझे पसंद करते हैं। मैंने अपने दर्शकों से कभी कुछ नहीं छिपाया। यही कारण है कि उन्हें मैं अच्छी लगती हूं।
अपनी पिछली फिल्मों के बारे में बात करते हुए वे बताती हैं, कहना या समझना मुश्किल होता है कि कोई फिल्म क्यों नहीं चली? मैं अपने बारे में कह सकती हूं कि रोल समझने के बाद ही मैं फिल्मों के लिए हां करती हूं और फिर सौ प्रतिशत मेहनत करती हूं। किसे मालूम था कि बीड़ी जलइले.. इतनी बड़ी हिट साबित होगी..! लोग उसे आइटम सॉन्ग कहते हैं, लेकिन मेरे लिए तो अब वह गीत किसी फिल्म से ज्यादा खास है। क्या बिपाशा गंभीर फिल्में या गहराई वाले रोल नहीं करना चाहतीं? वे तुरंत जवाब देती हैं, जरूर करना चाहती हूं और किया भी है। मेरी पंख ऐसी ही फिल्म है, लेकिन गंभीर और गहरी भूमिका का कॉन्सेप्ट मैं नहीं समझ पाई। क्या किसी औरत को तकलीफ में दिखाने से रोल गंभीर हो जाता है? बिपाशा ने हाल ही में एक बांग्ला फिल्म सब चरित्रो काल्पोनिक पूरी की है। इसमें उन्होंने टिपिकल बंगाली महिला का किरदार निभाया है। वे कहती हैं, मैं इस तरह की और भी फिल्में करना चाहती हूं। शुरू में तो लगा था कि मैं कहां आ गई, लेकिन बंगाल के लोगों का अप्रोच देखकर मैं प्रभावित हूं। मैं बांग्ला में आगे भी फिल्में कर सकती हूं, लेकिन कॉमर्शिअॅल बांग्ला फिल्में नहीं करूंगी। बिपाशा चाहती हैं कि उन्हें हिंदी में भी चरित्र प्रधान फिल्में मिलें। वे कहती हैं, लेकिन ऐसी फिल्में कौन बना रहा है? हम अभिनेत्रियों को सीमाओं में बांध दिया गया है, फिल्में अभिनेताओं पर केंद्रित होती हैं। क्या वे इस स्थिति में किसी सुधार की उम्मीद करती हैं? बिपाशा कहती हैं, उम्मीद तो कर ही सकती हूं। इन दिनों अलग-अलग विषयों पर फिल्में बन रही हैं। कल कोई एक फिल्म सफल हो गई, तो उसका ट्रेंड चल पड़ेगा। मैं ट्रेंड, फैशन और डिमांड के हिसाब से नहीं चलती। बीड़ी जलइले.. के बाद मुझे उस तरह की कई फिल्मों के ऑफर आए, लेकिन मैंने मना कर दिया।

Tuesday, August 19, 2008

श्रीमान सत्यवादी और गुलजार

माना जाता है कि बिमल राय की फिल्म 'बंदिनी' से गुलजार का फिल्मी जीवन आरंभ हुआ। इस फिल्म के गीत 'मेरा गोरा अंग लेइ ले' का उल्लेख किया जाता है। किसी भी नए गीतकार और भावी फिल्मकार के लिए यह बड़ी शुरूआत है।

लेकिन क्या आपको मालूम है कि गुलजार ने 'बंदिनी' से तीन साल पहले एसएम अब्बास निर्देशित 'श्रीमान सत्यवादी' के गीत लिखे थे। इस फिल्म में गीत लिखने के साथ निर्देशन में भी सहायक रहे थे। तब उनका नाम गुलजार दीनवी था। दीनवी उपनाम उनके गांव दीना से आया था। हेमेन गुप्ता की फिल्म 'काबुलीवाला' में भी उनका नाम सहायक निर्देशक के तौर पर मिलता है। जाने क्यों गुलजार के जीवनीकार उनकी इस फिल्म का उल्लेख नहीं करते? गुलजार ने स्वयं भी कभी स्पष्ट नहीं कहा कि 'बंदिनी' के 'गोरा अंग लेई ले' के पहले वे गीत लिख चुके थे।

'श्रीमान सत्यवादी' में राज कपूर और शकीला ने मुख्य चरित्र निभाए थे। फिल्म में दत्ताराम वाडेकर का संगीत था। गीतकारों में हसरत जयपुरी, गुलजार दीनवी और गुलशन बावरा के नाम हैं। गुलजार दीनवी ने इस फिल्म में (1) भीगी हवाओं में (मन्ना डे,सुमन कल्याणपुर), (2) क्यों उड़ा जाता है आंचल (सुमन कल्याणपुर), (3) एक बात कहूं वल्लाह (मुकेश, मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर) और (4) रुत अलबेला मस्त समां (मुकेश) गीत लिखे थे।

कल उनका जन्मदिन था। चवन्नी की विलंबित बधाइयां। चवन्नी जानना चाहता है कि गुलजार 'श्रीमान सत्यवादी' का उल्लेख क्यों नहीं करते और उनके जीवनीकार भी इस तथ्य के प्रति क्यों खामोश रहते हैं? क्या आप कुछ कहना चाहेंगे?

Monday, August 18, 2008

हिन्दी टाकीज:इस तरह सुनते जैसे हम देख रहे हों -विमल वर्मा

हिन्दी टाकीज-5

विमल वर्मा अपने बारे में लिखते हैं... बचपन की सुहानी यादो की खुमारी अभी भी टूटी नही है॥ जवानी की सतरगी छाँव गोरखपुर,बलिया,आज़मगढ़, इलाहाबाद, और दिल्ली मे.. फिलहाल १२ साल से मुम्बई मे.. चैनल के साथ रोजी-रोटी का नाता...उसी खुमारी से हम सिनेमा से सम्बंधित कुछ यादें ले आयें हैं.विमल वर्मा ने वादा किया है की वे बाद में विस्तार से लिखेंगे,तब तक के लिए पेश है....

जब छोटा था तो, फ़िल्म देखना हमारे लिये उत्सव जैसा होता था...घर से नाश्ता॥पानी की बोतल आदि के साथ....पूरा परिवार फ़िल्म देखने जाता था...हमारे लिये एकदम पिकनिक जैसा होता था...बचपन में धार्मिक फ़िल्में देखने ही जाया करते थे.....मैं छोटे बड़े शहर में पिताजी की नौकरी की वजह से बहुत रहे थे......समय रेडियो ट्रांजिस्टर का था कुछ खास गीत होते थे जिन्हें सुनकर हम उन जगहों को याद करते थे.....जहां हम पहले रह आये थे जैसे ।ताजमहल फ़िल्म का गाना "जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा" या "हंसता हुआ नूरानी चेहरा".......बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है कानपुर की याद दिलाता, गोरखपुर "ये जो मोहब्बत है ये उनका काम" गोरखपुर की...गोरखपुर के फ़र्टिलाईज़र में एक मनोरंजन केन्द्र हुआ करता था ,जहां हर शनिवार और इतवार फ़िल्म का दिन होता था.....कॉलोनी में सब बच्चों के लिये ये दोनों दिन किसी उत्सव की तरह होता था,मुझे अच्छी तरह याद है जब हम फ़िल्म देखने जाते तो पीछे की सीट के लिय ५० पैसा टिकट था...और हम बच्चों के लिए दरी पर बैठने की व्यवस्था थी जिसका किराया २० पैसे होता था..और हम सबसे आगे बैठकर मज़ा लेते थे फ़िल्म का......

पहले तो फ़िल्म एक स्टैण्डनुमा पर्दे पर दिखाई जाती थी ाअक्सर बच्चों की भगमभाग में फ़िल्म चलते चलते पर्दा गिर जाया करता था, फिर एक हंगामा ,एक शोर चारों तरफ़ फ़ैल जाता था। इससे उबरने के लिये सफ़ेद दीवार को ही पर्दा बना कर उस पर फ़िल्म आयोजकों दिखाना शुरु किया....मुख्यत: ब्लैक एन्ड वाईट ही फ़िल्म और कभी -कदास अंग्रेज़ी फ़िल्म भी देखने को मिल जाती थीं॥अमूमन पुरानी फ़िल्में ही हम देख पाते.....कुछ- कुछ,अंतराल पर पूरे हॉल की बत्तियाँ जल जाती थी,रील बदलने के लिये.........मुनीमजी,दो आँखे बारह हाथ,मधुमती,सूरज,धरती,हसीना मान जाएगी,वो कौन थी,कोहरा,बन्दीनी..हिमालय की गोद में...अभी तो बस इतनी ही फ़िल्में याद आ रहीं हैं और इसी कड़ी में हमने अंग्रेज़ी फ़िल्में भी देखी थीं ..., "बीस साल बाद" देखकर डर गये थे...पर "हक़ीक़त" फ़िल्म का वो गीत जिसे रफ़ी साहब ने गाया था ..."कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियों " को को सुनते समय मेरे शरीर के रोंए खड़े हो जाते। हाथी मेरे साथी को देखकर मैने भी राजेश खन्ना कट कुर्ता बनवाया था।

कभी किसी शहर में जाने का मौका मिलता॥तो वहाँ के सबसे अच्छे सिनेमा हॉल में ही सिनेमा देखने का भी चस्का हमे था..जैसे गोरखपुर के तरंग टॉकीज़ में पहली फ़िल्म कच्चे धागे थी और हमने पहले दिन वहां फ़िल्म देखी थी...इलाहाबाद के चन्द्रलोक में..या मुज़फ़्फ़रपुर में खुले नये संजय टॉकीज़ में भी फ़िल्म देखने का मौका हमे मिल चुका था...छोटी जगह में रहते हुए सारी फ़िल्म भी देख लेना सम्भव नहीं था..पर उस समय एक चलन ये भी था कि किसी मित्र ने अगर कोई नई फ़िल्म देख ली तो तो सबको कहानी सुनाता....सब घेर के बैठेते...और पूरी फ़िल्म हम कुछ इस तरह सुनते जैसे हम देख रहे हों .....और कभी कोई पूछता कि फ़लानी फ़िल्म देखे क्या? तो हमारा जवाब हाँ में ही होता..क्यौकी कहानी तो पता रहती थी।

वैसे देवरिया के सलेमपुर का वाक्या याद आता है... सलेमपुर में रहते हुए फ़िल्म कम ही देख पाना हो पाता था...पर कभी गोरखपुर या बनारस जाते तो मौका निकाल कर फ़िल्म ज़रूर देखते थे....कभी -कभी तो ऐसा होता कि गोरखपुर गये और लगातार तीन पिक्चर हॉल में तीन पिक्चर भी देख लेते......और जब कोई कहानी सुनाने के लिये कहता तो तीनों फ़िल्म की कहानी गडमड हो जाया करतीं थीं।

कुछ याद सलेमपुर की भी है, जब हम स्कूल में पढ़ रहे थे सलेमपुर देवरिया जिले का एक तहसील है वहाँ सिनेमा हॉल के नाम पर एक टूरींग टॉकीज़ ही था,हर छ: महीने पर उस सिनेमा हॉल का नाम बदल जाया करता था ...कभी उसका नाम अशोक हो जाता तो कभी सम्राट.....वैसे ।कभी कभी तो टिकट लेने के बाद भी वहां का आदमी आपसे बोल सकता था कि पांच आदमी और ले आइये तो पिक्चर शुरु करते हैं....पिक्चर शुरु करने से पहले सिनेमाहॉल के ऊपर लगे लाउडिस्पीकर से किसी फ़िल्म का गाना बजा करता था॥जब तक गाना बज रहा हो समझिये फ़िल्म अभी शुरु नहीं हुई है.....एक गाना खूब तेज़ -तेज़ बजा करता.....दोनों ने किया था प्यार मगर...............मेरी महुआ तेरे वादे क्या हुए.......गाना बजना बन्द तो समझिये फ़िल्म शुरू हो चुकी है।

।एक गज़ब की घटना याद आ रही है सुनिये...हम वहां दीलीप कुमार की "दास्तान"फ़िल्म देख रहे थे....और इन्टरवल के बाद देखा कोई दूसरी फ़िल्म शुरू हो गई है शायद "हिन्दुस्तान की कसम" ...जब पूछ -ताछ की गई तो पता चला कि रेलवे के मालगोदाम से फ़िल्म चोरी से निकाल कर सिनेमा हॉल वाले दिखा रहे थे...खैर हम फ़िर "हिन्दुस्तान की कसम" देखकर ही आए.........खैर बिजली चले जाने पर आम शहरों की तरह कुर्सियाँ की ठाँ ठूँ तो होती ही थी....और हर जगह की तरह यहां भी लोग अगर किसी वजह से फ़िल्म रूकी तो सिनेमाहॉल वालों के रिश्तेदारों से मैखिक सम्बन्ध भी स्थापित करने लग जाते थे.........

मुझे याद है गोरखपुर के कृष्णा टाकीज़ में एक समय "इंटर क्लास" भी हुआ करता था...उसमें कोई टिकट नहीं होता था...सीट नम्बर हाथ पर लिख दिया जाता था और जब तक हम हॉल में नहीं घुस जाते तब तक अपने हथेली का पसीना सुखाते रहते...डर रहता कि सीट नम्बर कहीं मिट गया तो शायद सिनेमा देखने को नहीं मिलेगी.......
उमर क्या रही थी ये ठीक से पता नहीं पर कला फ़िल्मों का दौर भी चल ही रहा था...मैं अपने बड़े भाई के साथ अंकुर फ़िल्म देखने गया॥इन्टरवल के बाद भी लोग बाग गुमसुम बैठे फ़िल्म देख रहे थे...अचानक फ़िल्म रुक गई हॉल की लाईटें जल गईं...मैने भाई से पूछा ये क्या? तो भाई ने कहा अरे भाई उठो फ़िल्म खत्म हो गई....ये कला फ़िल्म है ना..इसका दी एन्ड ऐसे ही होता है...और ऐसी बहुत सी कला फ़िल्में हमने देखी थी जिसके खत्म होने पर मैं और बड़े भाई एक दूसरे को मुस्कुराते हुए मुँह देखते कहते इसका भी दी एन्ड हो गय़ा...

इलाहाबाद विश्विद्यालय की फ़िल्म सोसायटी हमने बहुत सी फ़िल्म देखी है....तारकोव्स्की,बर्गमैन,कुरोसावा,त्रुफ़ों,गोदार. ... इन महान फ़िल्म निर्देशकों से परिचय मेरा इलाहाबाद का ही है...यहाँ अलग अलग भाषाओं की अंतरराष्ट्रीय फ़िल्में भी हमने खूब देखी हैं ....अपनी कमज़ोर अंग्रेज़ी के चक्कर में समझ में नहीं आता था फ़िल्मों की सबटाईटल पढ़े कि फ़िल्म देखें...इस चक्कर में बहुत सी फ़िल्में सबटाइटिल ही पढ़ने में लगा रहा.....और फ़िल्म खत्म हो जाती थी , सोसायटी के सदस्य फ़िल्म के गम्भीर दर्शक होते... गम्भीरता से फ़िल्म देखते...और बाद में उस फ़िल्म पर बहस भी करते....तो एक बार हम फ़िल्म देख रहे थे...फ़िल्म थी...मणि कौल की उसकी रोटी....बात ८० के दशक की है...देखने वालों में प्रोफ़ेसर और छात्र होते थे..इनकी संख्या ३० से ५० के आस पास होती थी...तो उसकी रोटी जैसी धीमी फ़िल्म का आनन्द ले रहे थे..यहां भी कुछ -कुछ देर पर रील बदलने का खेल रहता...क बार फ़िल्म की रील बदलने के बाद फ़िल शुरु हुई.... रील बदलने के चक्कर में फ़िल्म कुछ उल्टी लग गई....पहले तो लोगों को लगा कि निर्देशक ने कुछ खास प्रयोग किया है...पर थोड़ी देर में एक कमज़ोर सी आवाज़ आई ...."रील लगता है उल्टी लग गई है" फिर वो आवाज़ जैसे गायब सी हो गई...पर थोड़ी देर के बाद पूरे आत्मविश्वास से कई आवाज़ आई कि भाई रोको, फ़िल्म की रील उल्टी लग गई है....पूरे हॉल मे रोशनी हो गई...लोग उस चेहरे को तलाश रहे थे जिसने इस गलती को पकड़ा था....खैर फिल्म खत्म होने पर जब लोग बाहर निकल रहे थे तो पूरे सन्नाटे के बीच सिर्फ़ जूतों और चप्पलों की आवाज़ ही आ रही थी....पूरे हॉल में सन्नाटा पसरा हुआ था .......लोग बिना किसी से बात किये दरवाज़े से बाहर निकल रहे होते....

Sunday, August 17, 2008

मुहब्बत न होती तो कुछ भी न होता-महेश भट्ट

यह दुनिया प्रेम के विभिन्न प्रकारों से बनी है। मां का अपने शिशु से और शिशु का मां से प्रेम, पुरुष का स्त्री से प्रेम, कुत्ते का अपने मालिक से प्रेम, शिष्य का अपने गुरु या उस्ताद से प्रेम, व्यक्ति का अपने देश और लोगों से प्रेम और इंसान का ईश्वर से प्रेम आदि। प्रेम का रहस्य वास्तव में मृत्यु के रहस्य से गहरा होता है।
मानव जीवन के इस महत्वपूर्ण तत्व और मानवीय व्यापार एवं व्यवहार में इसके महत्व के बारे में कुछ बढाकर कहने की जरूरत नहीं है। हम लोगों में से अधिकतर या तो प्रेम जाहिर करते हैं या फिर किसी की प्रेमाभिव्यक्ति पाते हैं। लेकिन यह प्रेम है क्या जो हम सभी को इतनी खुशी और गम देता है?
एक आलेख में प्रेम के संबंध में इन सभी के विचार और दृष्टिकोण को समेट पाना मुश्किल है। मैं हिंदी फिल्मों की अपनी यादों के प्रतिबिंबों के सहारे प्रेम के रूपों को रेखांकित करने की कोशिश करूंगा। माता-पिता, कवि, पैगंबर, उपदेशक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक अपनी-अपनी तरह से प्रेम को समझते हैं। हिंदी फिल्मकारों की भी अपनी समझ है।
मदर इंडिया का प्रेम
समय की धुंध हटाने के साथ मैं खुद को एक सिनेमाघर में पाता हूं। एक श्वेत-श्याम फिल्म चल रही है। पूरे हॉल में खामोशी है और भावनाओं में डूबे गीत के शब्द धुनों के साथ गूंज रहे हैं। चलो चलें हम, सपनों के गांव में, कांटों से दूर कहीं, फूलों की छांव में
एक बच्चा मौत के करीब है। उसने अपनी मां की उंगलियां पकड रखी हैं। मां उसे अंतिम घडियों में दिलासा दे रही है। मेरा गला रुंध गया था। आंखें भर आई और मैं अपने बगल में बैठी खुशबूदार औरत को थामे सिसक रहा हूं वह मेरी मां है। जब तक िजंदा रही, मां ही मेरी दुनिया रही। आरंभिक वर्षो में हिंदी सिनेमा ने मां-शिशु संबंध को सूख जाने तक निचोडा। मां-बेटे के संबंधों पर बनी महानतम फिल्म मदर इंडिया है। राष्ट्रीय भावनाओं की यह फिल्म एक देसी भारतीय महबूब खान के दिल से निकली थी। महबूब खान गुजरात के बनसारी गांव से आए थे। मदर इंडिया पहली भारतीय फिल्म थी, जो ऑस्कर में नामांकन सूची तक पहुंची थी। इस फिल्म का हर दृश्य मुझे याद है। निरक्षर फिल्म निर्देशक महबूब खान ने मां-शिशु संबंध के हर पहलू और कोणों को चित्रित किया था। वैसी फिल्म दोबारा नहीं बन सकी। मदर इंडिया वास्तव में त्रिकोणीय प्रेम कहानी है, जिसमें एक मां बेटे और समाज के प्रेम के बीच फंसी है। समाज की प्रतिष्ठा बढाने के लिए वह बेटे की जान ले लेती है। गोली लगने के बाद बिरजू मां के पास आता है और हृदय विदारक दृश्य में मां को सोने के कंगन देता है। ये वही कंगन हैं जो मां ने पेट पालने के लिए गिरवी रखे थे। बिरजू साहूकार से छीन कर कंगन ले आया था। इन पंक्तियों को लिखते समय भी उन दृश्यों की यादों से आंखों में नमी आ गई है।
अलग-अलग रूपों में प्रेम
हिंदी फिल्मों में बहन-भाई और भाई-भाई के संबंधों का भी खूब इस्तेमाल किया गया। बहन-भाई के संबंध राखी के बहाने निर्देशकों ने दिखाए। दक्षिण भारत के मशहूर एक्टर शिवाजी गणेशन ने तो राखी नाम की फिल्म बनाई थी। हिंदी फिल्म का खजाना भाई-भाई के संबंधों की फिल्मों से भरा है, लेकिन उनमें से एक सर्वश्रेष्ठ है और सच कहें तो बाद की सभी फिल्मों में कहीं न कहीं उसकी नकल ही होती रही। वह फिल्म है दिलीप कुमार की गंगा जमुना। यह भी मदर इंडिया की तरह त्रिकोणीय प्रेम कहानी थी, जिसमें भाई और भाई के बीच के प्रेम एवं भाई एवं पुलिस अधिकारी के रूप में कर्तव्य के बीच द्वंद्व था। इस फिल्म का अंत भी दुखद था। यश चोपडा ने इसी फिल्म को नए अंदाज में सलीम-जावेद की लिखी फिल्म दीवार में पेश किया। मैंने भी दो भाइयों को लेकर एक फिल्म बनाई थी, लेकिन मेरी फिल्म में दोनों सौतेले भाई थे। नाम फिल्म में संजय दत्त और कुमार गौरव को लेकर मैंने भाई-भाई के बीच के प्रेम के विषय को छुआ था। नाम मेरी पहली हिट फिल्म रही।
और फिर प्रेम के दूसरे प्रकार भी हैं दोस्तों के बीच का प्रेम। दोस्ती पर बनी तमाम फिल्मों में से राजश्री प्रोडक्शन की दोस्ती की याद से मेरी आंखें आज भी भर आती हैं। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इस फिल्म में कर्णप्रिय संगीत दिया था। राज खोसला की दोस्ताना में अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा की दोस्ती की कहानी थी। उनकी दोस्ती बिगडती है तो एक-दूसरे का कट्टर दुश्मन बना देती है। राकेश रोशन ने इसी विषय पर खुदगर्ज बनाकर डायरेक्टर के तौर पर अपनी शुरुआत की थी। उसमें जीतेंद्र और शत्रुघ्न सिन्हा थे।
देशप्रेम की भावना
हिंदी सिनेमा में देश-प्रेम की कहानी चेतन आनंद की फिल्म हकीकत के पहले स्पष्ट रूप में नहीं आई थी। 1962 के भारत-चीन युद्घ के बाद बनी इस फिल्म ने युद्ध में हुई हार की मन:स्थिति से निकलने में देश की मदद की थी। देश ने देखा कि किस तरह हमारे जवानों ने बर्फीली चोटियों पर ताकतवर चीनियों का मुकाबला किया था। इस फिल्म ने दर्शकों के दिलों में देश प्रेम की भावना का अद्भुत संचार किया था और उन्हें देश के लिए मर-मिटने का संदेश दिया था। बाद में कई निर्देशकों ने देश-प्रेम की भावना को भुनाने की कोशिश की, लेकिन कोई भी चेतन आनंद की ऊंचाई नहीं हासिल कर सका। हां, मनोज कुमार ने देश प्रेम को एक अलग रंग दिया।
विचित्र बात है कि सहेली के अलावा मुझे कोई दूसरी फिल्म याद नहीं आ रही है, जिसमें दो औरतों के बीच के प्रेम को दर्शाया गया हो। दो औरतों के संबंधों को बाद में फायर फिल्म में लेस्बियन पहलू से दिखाया गया। इस फिल्म को लेकर शुद्धतावादियों ने देश में हंगामा खडा कर दिया था। इसकी वजह यही हो सकती है कि हिंदी सिनेमा आज भी पुरुषों की जागीर है। औरतें रसोई तक सीमित हैं और उनकी आवाज नहीं सुनी जाती। इस एकआयामी दृष्टिकोण से जीवन को देखने के कारण हमारी फिल्में निर्धन हुई हैं। अच्छा हुआ कि पिछले दस सालों में नारी सशक्तीकरण के प्रभाव से कई महिला डायरेक्टर सामने आई हैं।
बॉलीवुड की प्रेम पर निर्भरता
बहरहाल, पूरी दुनिया में मनोरंजन उद्योग जिस प्रेम पर मुख्य रूप से आश्रित है और फलता-फूलता है वह प्रेम स्त्री और पुरुष के बीच का रोमांटिक प्रेम है। हॉलीवुड और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का अलिखित नियम है कि अगर फिल्म में प्रेम कहानी नहीं होगी तो फिल्म नहीं चलेगी या कम चलेगी। आश्चर्य नहीं कि इसी कारण दुनिया भर के फिल्मकारों ने अलग-अलग तरीकों से फिल्म की विभिन्न विधाओं में प्रेम कहानियों की हर संभावित छवि को उकेरा। मुगलेआजम हमें मुगलों की भव्यता और शान-ओ-शौकत की दुनिया में ले जाती है। उस फिल्म में अगर सलीम और अनारकली की प्रेम कहानी की गहराइयां नहीं होतीं तो हम पर उस भव्यता का असर थोडा कम होता। इस फिल्म को मैंने पहली बार दस साल की उम्र में देखा था। मुझे आज भी याद है कि कैसे प्यार किया तो डरना क्या देश का लोकप्रिय गीत बन गया था।
राजकपूर को भारतीय सिनेमा का शोमैन कहा जाता है और उन्हें दादा साहेब फालके एवार्ड भी मिला। उन्होंने अपनी हर फिल्म में प्रेम की भावना और उससे जुडी कामुकता को उभारा। बरसात, श्री 420, आवारा, संगम, बॉबी, राम तेरी गंगा मैली जैसी फिल्मों में हम राजकपूर की शैली की प्रेम कहानियां देख सकते हैं।
देश की एक लोकप्रिय म्यूजिकल फिल्म आशिकी का निर्देशन मैंने किया था। इस शहरी प्रेम कहानी के बगैर मेरा फिल्मी करियर इतना समृद्ध नहीं होता। इस फिल्म के प्रेमगीत सदाबहार हैं और इसी फिल्म से नदीम-श्रवण की जोडी फिल्मों में आई थी।
गहरा होता है प्रभाव प्रेम का
जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो उसे बेशकीमती उपहार देते हैं। यह उपहार आप स्वयं हैं, आपका समय है और एनर्जी। अगर वही प्रेम, समय और एनर्जी मिले तो रोमांस पैदा होता है। लेकिन प्रेमी-प्रेमिका से समान प्रेम न मिले तो निगेटिव भावनाएं जन्म लेती हैं-तिरस्कार, क्रोध और निराशा घेरती है। इसके अच्छे परिणाम भी हैं, जब तिरस्कृत प्रेमी महान कला का सृजन करते हैं। दुष्परिणाम यह है कि कुछ लोग निराशा, पागलपन और आत्महत्या की हद तक पहुंच जाते हैं। अधूरे प्रेम के भाव को व्यक्त करने वाले अनगिनत फिल्मी गीत हैं। निस्संदेह हिंदी फिल्मकारों ने प्रेम के सभी पहलुओं को छुआ है। प्रेम निकाल दें तो मनोरंजन उद्योग चरमरा कर गिर जाएगी। इस प्रेम के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें।

Saturday, August 16, 2008

फ़िल्म समीक्षा:बचना ऐ हसीनों

एक फिल्म में तीन प्रेम कहानियां
बहरहाल, हिंदी लिखने और बोलने में बरती जा रही लापरवाही बचना ऐ हसीनों में भी दिखती है। शीर्षक में ही हसीनो लिखा गया है।
फिल्म में राज और उसकी जिंदगी में आई तीन हसीनाओं की कहानी है। राज दिलफेंक किस्म का नौजवान है। लड़कियों को प्रेमपाश में बांधना और फिर उनके साथ मौज-मस्ती करने को उसने राजगीरी नाम दे रखा है। वह अपनी जिंदगी में आई माही और राधिका को धोखा देता है। उनकी मनोभावनाओं और प्यार की कद्र नहीं करता। फिर उसकी मुलाकात गायत्री से होती है। वह गायत्री से प्रेम करने लगता है। जब गायत्री उसका दिल तोड़ती है और उसके प्रेम को अस्वीकार कर देती है, तब उसकी समझ में आता है कि दिल टूटने पर कैसा लगता है? इस अहसास के बाद वह पुरानी प्रेमिकाओं, माही और राधिका, से माफी मांगने वापस लौटता है। वह उनके सामने स्वीकार करता है कि वह कमीना और गिरा हुआ आदमी है। संभवत: हिंदी फिल्म में पहली बार हीरो ने खुद को कमीना और गिरा हुआ इंसान कहा है। पुरानी प्रेमिकाओं से जबरदस्ती माफी लेने के बाद राज नई प्रेमिका गायत्री के पास लौटता है। इस दरम्यान गायत्री को भी अहसास हो चुका है कि वह राज से प्रेम करने लगी है। दोनों साथ होते हैं और फिल्म खत्म हो जाती है।
बचना ए हसीनों में पुरुषवादी सोच शुरू से ही सक्रिय है। फिल्म का नायक ही तय करता है कि उसे कब बुरा आदमी रहना है और कब अच्छा बन जाना है। आजाद तबीयत की नायिकाएं भी विवश हैं। वे प्रतिक्रिया में कुछ करती भी नहीं..21वीं सदी में भी फिल्म का नायक उन पर हावी रहता है। फिल्म में खुले आम दिखाया गया है कि नायक के संबंध एक से ज्यादा लड़कियों से हैं, फिर भी तीसरी प्रेमिका उसे अंगीकार करती है, जबकि तीनों लड़कियों की जिंदगी में किसी और लड़के को हम नहीं देखते।
नायक के लिए नायिकाओं का अक्षत यौवन आवश्यक है। लड़कियां अमृतसर की हों या फिर मुंबई या सिडनी की.. वे घरेलू हों, माडल सरीखी और महत्वाकांक्षी हों या विदेश में पढ़ रही स्वतंत्र छात्र हों..उनकी जिंदगी किसी पुरुष के सहारे के बिना पूरी नहीं हो सकती। पिछड़े सोच की यह फिल्म सिर्फ दिखने में आधुनिक और 21वीं सदी की है।
कलाकारों की बात करें तो मिनिषा लांबा की सीमाएं नजर आने लगती हैं। मिनिषा विभिन्न भावों को देर तक संभाल नहीं पाती हैं। दीपिका पादुकोण पहली फिल्म में ज्यादा आकर्षक दिखी थीं। शाहरुख खान के साथ होने के कारण तब दीपिका के अभिनय पर अधिक ध्यान नहीं गया था। इस फिल्म में पता चलता है कि दीपिका सीमित क्षमताओं की अभिनेत्री हैं। दीपिका के लिए आवश्यक है कि वह अभिनय कौशल को निखारें। रणबीर कपूर आकर्षक लगे हैं। उन्होंने हीरो के ग्रे, ब्लैक और ह्वाइट तीनों भावनाओं को दृश्यों के अनुकूल निभाया है। पहली फिल्म की तुलना में वे अधिक आत्मविश्वास में दिखे हैं।
निर्देशक ने एक ही फिल्म में तीन प्रेम कहानियों को शामिल कर फिल्म को बोझिल कर दिया है। इसी वजह से फिल्म लंबी लगने लगती है। इस फिल्म में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का उल्लेख बार-बार आया है। रेफरेंस के तौर पर उसका बारंबार इस्तेमाल निर्देशक और निर्माता की सोच-समझ को जाहिर करता है। किरदारों के रेफरेंस अगर फिल्म हो जाएं तो हम समझ सकते हैं कि फिल्म कितनी जीवंत बन सकती है?

Friday, August 15, 2008

फ़िल्म समीक्षा:गॉड तूसी ग्रेट हो

ठीक नहीं है परिवर्तन
इस फिल्म की धारणा रोचक है। अगर प्रकृति और जीवन के कथित नियंता भगवान की जिम्मेदारी इंसान को दे दी जाए तो क्या होगा? अरुण प्रजापति नौकरी, प्रेम, परिवार और जीवन की उलझनों में फंसा निराश युवक है। लगातार असफलताओं ने उसे चिडि़चिड़ा बना दिया है। वह भगवान से संवाद करता है और अपनी नाकामियों के लिए उन्हें दोषी ठहराता है। उसके आरोपों से झुंझला कर भगवान उसे अपनी दिव्य शक्तियों से लैस कर देते हैं और कहते हैं कि अगले दस दिनों तक वह दुनिया चलाए।
मध्यवर्गीय अरुण सबसे पहले अपनी समस्याएं दूर करता है और फिर दुनिया भर के लोगों की मनोकामनाएं पूरी कर देता है। सबकी मनोकामना पूरी होते ही दुनिया में हड़कंप मच जाता है। व्यवस्था चरमरा जाती है। फिर भगवान समझाते हैं कि दुनिया को नियंत्रण में रखना कितना जरूरी है। यथास्थिति बनी रहे तो दुनिया सुचारू ढंग से चलती रहती है। परिवर्तन दुनिया के लिए ठीक नहीं है। हर इंसान को अपना जीवन भगवान के ऊपर या सहारे छोड़ देना चाहिए? भगवान इस दुनिया में संतुलन बनाए रखते हैं। दुनिया को व्यवस्थित करने के लिए भगवान उसे फिर से यथास्थिति में ले आते हैं।
इस फिल्म का उद्देश्य इंसान और भगवान की भिड़ंत से लोगों को हंसाना है। कुछ दृश्यों में प्रयास सफल भी रहा है। गॉड तूसी ग्रेट हो में इंसान की इच्छाओं को गलत, असामाजिक, गैरकानूनी और खतरनाक स्वरूप में ही रखा गया है। क्या हर इंसान गलत इच्छाओं के वशीभूत ही रहता है? इंसान को असमर्थ और अयोग्य दिखलाने के लिए उसके सोच को विध्वंसात्मक दिखाया गया है। मनुष्य द्वारा निर्मित सभी जीवनोपयोगी उपकरणों को नजरअंदाज कर बम, बंदूक आदि का उल्लेख किया गया है। बताया गया है कि इंसान ने केवल संहारक चीजें ही बनाई हैं। गॉड तूसी ग्रेट हो मानव सभ्यता के विकास का विरोध करती है और हमें समझाती है कि सुखी रहने के लिए सब कुछ भगवान पर छोड़कर आदिम युग में लौट जाना उचित है।
सलमान के अभिनय में लाउडनेस बढ़ गया है। उन्हें अपनी संवाद अदायगी पर मेहनत करनी चाहिए। अदृश्य को अद्रष्य नहीं बोलना चाहिए। कानों को बुरा लगता है। प्रियंका चोपड़ा सीमित एक्सप्रेशन की अभिनेत्री हैं। योग्य निर्देशक ही उन्हें अलग अंदाज में पेश कर पाते हैं। अमिताभ बच्चन के लिए यह साधारण रोल था, जिसे उन्होंने उतने ही साधारण तरीके से निभा दिया है।
उम्मीद थी कि लेखक के तौर पर सफल रहे रूमी जाफरी की फिल्म ज्यादा रोचक और मनोरंजक होगी। रूमी संतुष्ट तो नहीं करते, लेकिन संकेत देते हैं कि वह दर्शकों की भावनाओं को समझते हैं। समय, संसाधन और सहयोग मिले तो वे अच्छी कामेडी फिल्म बना सकते हैं। इस फिल्म में अरुण के पिता के रूप में उन्होंने अनुपम खेर को जो किरदार दिया है, वह उल्लेखनीय है। अनुपम खेर ने उसे बहुत अच्छी तरह निभाया है।
मुख्य कलाकार : सलमान खान, प्रियंका चोपड़ा, अमिताभ बच्चन, मनीषा कोईराला, अनुपम खेर आदि।
निर्देशक : रूमी जाफरी
तकनीकी टीम : निर्माता- अफजल खान, कथा-पटकथा-संवाद - रूमी जाफरी, गीत- जलीस शेरवानी, शब्बीर अहमद, देवेन शुक्ला, संगीत- साजिद-वाजिद

Thursday, August 14, 2008

सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता

-अजय ब्रह्मात्मज
मंगलवार 5 अगस्त को अक्षय शिवम शुक्ला ने एकता कपूर के बालाजी टेलीफिल्म्स के दफ्तर केसामने आत्महत्या की कोशिश की। अपमान, निराशा और उत्तेजना में शुक्ला ने भले ही यह कदम उठाया हो, लेकिन इस घटना के कारणों पर ठंडे दिमाग से गौर करने की जरूरत है। अक्षय सिर्फ एक खबर नहीं हैं। एक सच्चाई हैं। मुंबई में अक्षय जैसे हजारों युवक संघर्ष करते हुए सिसक रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वे सभी अक्षय जैसे दुस्साहसी नहीं हैं या फिर उन्होंने अभी तक उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है। लिखने और बताने की जरूरत नहीं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का ग्लैमर देश के सुदूर कोनों में बैठे युवक-युवतियों को आकर्षित करता है। वे हर साल हजारों की तादाद में मुंबई पहुंचते हैं और फिल्म इंडस्ट्री की चौखट के बाहर ही अपनी उम्र और उम्मीद गुजार देते हैं। ऐसे महत्वाकांक्षी व्यक्तियों में एक अदम्य जिद होती है कि वे अवसर मिलने पर अवश्य कामयाब होंगे, लेकिन अवसर मुंबई पहुंच जाने की तरह आसान होता, तो क्या बात थी..?
फिल्म इंडस्ट्री की उम्र सौ साल से अधिक लंबी हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई ऐसा जरिया या तरीका विकसित नहीं हो पाया है कि फिल्मों के विभिन्न क्षेत्र और विभागों में प्रवेश के इच्छुक व्यक्ति उसका उपयोग कर सकें। ज्यादातर लोग कामयाबी को किस्मत से जोड़कर देखते हैं और कामयाब ऐक्टर, तकनीशियन या अन्य संबंधित व्यक्तियों की मेहनत को नजरंदाज कर देते हैं। गौर करने पर हम जान सकते हैं कि सालों की लगन और एकाग्रता के बाद ही कोई व्यक्ति जीवन में सफल होता है। यह तथ्य फिल्म इंडस्ट्री समेत जीवन के सभी क्षेत्रों में देखने को मिलता है। बिल्कुल सही कहते हैं कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता, क्योंकि उसके लिए मेहनत, लगन और एकाग्रता की लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। रास्ते अलग हो सकते हैं। कोई थोड़ा तेज या कोई थोड़ा धीमे मंजिल तक पहुंचता है, लेकिन सच तो यह है कि सफर की मुश्किलें कभी कम नहीं होतीं।
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री प्रमुख रूप से मुंबई में केंद्रित है। इसका विकेन्द्रीकरण नहीं हुआ। हिंदी प्रदेशों की राजधानियों में कभी-कभार सुगबुगाहट दिखी, किंतु इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों के कारण फिल्म निर्माण का कार्य वहां विकसित नहीं हो सका। इसके अलावा, हिंदी प्रदेशों की राजधानियों में फिल्म और मनोरंजन उद्योग से संबंधित प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम भी उपलब्ध नहीं हैं। मधुबनी, मुरादाबाद, मोहाली या मनाली के आकांक्षी युवक को पता हीं नहीं है कि फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश के क्या तरीके हो सकते हैं! पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित फिल्मी सामग्रियां उसके आकर्षण को बढ़ाती हैं। गॉसिप और इंटरव्यू में संयोग, किस्मत और भाग्य के बारे में स्टारों की जुबानी किस्से छपते हैं और देश के विभिन्न शहरों में बैठे युवक गुमराह हो रहे होते हैं। वे अगली फुर्सत में ट्रेन पकड़ते हैं और सीधे मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, कुर्ला टर्मिनस और मुंबई सेंट्रल में उतरते हैं। वे अपने सपनों के साथ मुंबई की सड़कें छानते हैं। उनमें से कोई एक कामयाब होता है, तो फिर हजारों-लाखों युवक उसकी कहानी से प्रेरित होकर मुंबई का रुख कर लेते हैं।
इस अनवरत सिलसिले की एक कड़ी हैं अक्षय शिवम शुक्ला..। कह सकते हैं कि वे एक कमजोर कड़ी थे, क्योंकि चंद हफ्तों के अंदर वे हिम्मत हार गए और निराशा की उत्तेजना में उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की। क्या इस घटना के बाद बालाजी टेलीफिल्म्स या अन्य प्रोडक्शन हाउस, स्टार और डायरेक्टर ऐसा कोई कदम उठाएंगे कि भविष्य में शुक्ला की घटनाएं न दोहराई जा सकें। कोई तरीका तो खोजना ही होगा! यह एक सामाजिक समस्या है। हमें उन सपनों, आकांक्षाओं और भविष्य को आत्मदाह से बचाना होगा, जो दिशा और अवसर मिलने पर फिल्म इंडस्ट्री में कुछ जोड़ सकते हैं!

Wednesday, August 13, 2008

बॉक्स ऑफिस:१५.०८ २००८

सिंह इज किंग ने बनाए नए रिकार्ड
अक्षय कुमार और विपुल शाह ने प्रचार के तरीके सीख लिए हैं। सिंह इज किंग को चर्चा में रखने के लिए दोनों लगातार मीडिया से मुलाकात और बातचीत कर रहे हैं। सोमवार को उन्होंने जश्न-ए-कामयाबी की पार्टी भी रख दी और बताया कि सिंह इज किंग ने सारे पुराने रिकार्ड तोड़ दिए हैं। अक्षय कुमार और विपुल शाह को और क्या चाहिए?
अत्यंत कारगर तरीके से प्रचारित सिंह इज किंग को ओपनिंग अपेक्षा से थोड़ी कम रही। शत-प्रतिशत ओपनिंग नहीं हो सकी। मुंबई में बारिश की वजह से दर्शकों को दिक्कत हुई। मुंबई में एक मल्टीप्लेक्स ने प्रति दिन 28 शो रखे और उतने दर्शक जुटा लिए। सिंह इज किंग के संबंध में समीक्षकों की मिश्रित प्रतिक्रिया है। उसकी वजह से ऐसा माना जा रहा है आने वाले दिनों में दर्शक कम होंगे। उससे वितरकों और प्रदर्शकों को थोड़ा नुकसान हो सकता है, क्योंकि यह फिल्म भारी कीमत में सभी ने खरीदी है। फिल्म की लागत अधिक होने के कारण कलेक्शन की राशि को मुनाफा बनने में वक्त लगेगा। विपुल शाह खुश हैं कि उनकी फिल्म ने आरंभिक कलेक्शन के नए रिकार्ड बनाए हैं।
अगली और पगली के प्रति बनी आरंभिक जिज्ञासा समाप्त हो चुकी है। पिछले हफ्ते इस फिल्म के दर्शक अचानक कम हो गए। कुछ सिनेमाघरों ने सिंह इज किंग के अतिरिक्त शो केलिए अगली और पगली उतार दी। मिशन इस्तांबुल और मनी है तो हनी है की अब चर्चा नहीं है।
इस हफ्ते सिद्धार्थ आनंद की बचना ऐ हसीनों और रूमी जाफरी की गॉड तूसी ग्रेट हो आ रही है। पहली रोमांटिक और दूसरी कामेडी फिल्म है।

Monday, August 11, 2008

हिन्दी टाकीज: सिनेमा बुरी चीज़ है, बेटा-नचिकेता देसाई

हिन्दी टाकीज में इस बार नचिकेता देसाई । नचिकेता देसाई ने भूमिगत पत्रकारिता से पत्रकारिता में कदम रखा। पिछले २५ सालों में उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसियों से लेकर हिन्दी और अंग्रेज़ी के विभिन्न अख़बारों में सेवाएँ दीं.आपातकाल के दौर में उन्होंने रणभेरी नाम की पत्रिका निकली थी.इन दिनों अहमदाबाद में हैं और बिज़नस इंडिया के विशेष संवाददाता हैं.अहमदाबाद में वे हार्मोनिका क्लब भी चलाते हैं.आप उन्हें nachiketa.desai@gmail.com पर लिख सकते हैं।

बात मेरे बचपन की है. बनारस में राज कपूर की फिल्म 'संगम' लगी थी. मेरी बड़ी बहन और उसकी सहेलियां फिल्म देखना चाहती थीं. अब बनारस में उन दिनों लड़कियां अकेली सिनेमा देखने नहीं जा सकती थीं. इसलिए उन्होंने मेरी नानी से कहा, "चलो हमारे साथ, अच्छी फिल्म है." नानी, श्रीमती मालतीदेवी चौधरी, प्रसिद्ध गांधीवादी नेता थीं, भारत की संविधान सभा की सदस्य रह चुकी थीं और उड़ीसा के आदिवासियों के बीच उन्हें उनके अधिकारों के लिए संगठित करने का काम करती थीं. बहुत ना-नुकुर के बाद राजी हो गईं।

चार घंटे की फिल्म, तिस पर वैजयंती माला के नहाने का सीन, उन चार सहेलियों ने नानी की उपस्थिति में कैसे देखी होगी इसका अंदाज़ा पाठक लगा लें. नानी गुस्से से आगबबूला हो गई थीं. "केते अभद्र !!!' (कितनी असभ्य फिल्म थी) बस इतना कहा और पूरे एक दिन बहन से बात-चीत बंद रखी।

सिनेमा के बारे में हमारे घर में बड़े बुज़ुर्गों की राय लगभग इसी प्रकार की थी. सिनेमा का मतलब प्यार, इश्क, मोहब्बत, मार-पीट. बच्चों को इन सब से दूर रखना ही अच्छा. वैसे पिताजी गांधीजी के आश्रम में पले-बड़े होने के बावज़ूद फिल्मी गाने गुनगुनाते सुने जाते थे।

जहां तक मुझे याद है, हम बच्चों ने पहली फिल्म चार्ली चैपलिन की 'मोडर्न टाइम्स' देखी थी, वह भी मां-पिताजी के साथ. दुसरी फिल्म 'नवरंग' थी. वैसे जब मैं दूसरी कक्षा में था तो वडोदरा में हमारी मकान मालकिन एक सिनेमा थिएटर के पास पान की दुकान चलाया करती थीं. उसका बेटा, जो मुझसे करीब ५-६ साल बड़ा था, हर नई फिल्म देखने के बाद मुहल्ले के बच्चों को हमारे बरामदे पर बैठा कर उस फिल्म की कहानी सुनाया करता था. हम बहुत चाव के साथ और मुंह बाए कहानी सुनते थे।

तीन-चार वर्षों के बाद, जब मैं शायद छठी या सातवीं कक्षा में था तो हमारी स्कूल की ओर से हमें 'दोस्ती' फिल्म दिखाने ले जाया गया. मैं उस फिल्म में बहुत रोया. फिल्म के दो नायक थे. एक पैर से अपंग और दूसरा नेत्र हीन. एक गाता था, दूसरा माउथ ओर्गन बजाता था. चूंकि मैं भी माउथ ओर्गन बजाता था, मुझे उस बाजा बजाने वाले हीरो से विशेष सहानुभूति हो गई होगी।

हमारे स्कूल में महिने में एक बार फिल्म दिखाई जाती थी. मैंने अपने स्कूल में "दो आंखें बारह हाथ", "नया दौर" और 4-5 अंग्रेजी फिल्में देखी थी।

मैट्रिक की परीक्षा के आखिरी पर्चे के बाद, मेरी कक्षा के सभी लड़के 'पडोसन' फिल्म देखने गए. यह पहली फिल्म थी जो मैं अपने दोस्तों के साथ देखने गया, जिसमें मेरे बड़े-बजुर्ग उपस्थित नहीं थे. उस फिल्म में एक सीन में सायरा बानू बाथरूम के टब में से नहा कर, तौलिया लपेटते हुए बाहर निकलते हुए दिखाई देती है. मेरा एक सहपाठी उस सीन में अपनी कुर्सी के नीचे बैठ गया यह सोच कर कि शायद ऐसा करने से उसे हिरोईन पूर्नतया नग्न दिखाई देगी. हम लोगों ने कई दिनों तक इस बात को ले कर उसका मजाक उड़ाया।

यूनिवर्सिटी में प्रवेश पाते ही मानों मुझे आज़ादी मिल गई. मैंने उन दिनों क्लास छोड़ कर कई फिल्में देख डालीं. एक दिन पिताजी के एक मित्र ने मुझे क्लास से भाग कर सिनेमा देखते रंगे हाथ पकड़ लिया. खबर घर तक पहुंच गई. मां ने खाली इतना कहा कि सिनेमा देखा तो हमें उसकी कहानी भी सुना दो।

कोलेज के दिनों मुझे शशी कपूर बहुत पसंद था. उसकी तरह बाल बनाने से ले कर उसकी स्टाइल में डांस करना, मैंने सब किया, यह भ्रम पाल कर कि मैं भी उसकी तरह लगता हूं. मेरी समय-समय पर मन पसंद लड़कियां मुझे किसी न किसी हिरोइन जैसी लगती थीं. कोई राखी की तरह, कोई सायरा बानू की तरह, दूसरी वहीदा रहमान की तरह तो कोई तनूजा या रेखा कि तरह. मन प्रसन्न रहता था कि मेरी पसंद की लड़कियां इन जैसी सुंदर हैं।

आज कल मैं अपने आपको किसी भी हीरो जैसा नहीं मान पा रहा. न ही किसी महिला मित्र को हिरोइन की तरह.

Sunday, August 10, 2008

पहली सीढ़ी:राज कुमार हिरानी से अजय ब्रह्मात्मज की baatcheet

'पहली सीढ़ी' निर्देशकों के इंटरव्यू की एक सीरिज है। मेरी कोशिश है कि इस इंटरव्यू के जरिए हम निर्देशक के मानस को समझ सकें। पहली फिल्म की रिलीज के बाद हर निर्देशक की गतिविधियां पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनल के माध्यम से दुनिया के सामने आ जाती हैं। हम पहली फिल्म के पहले की तैयारियों में ज्यादा नहीं जानते। आखिर क्यों कोई निर्देशक बनता है और फिर अपनी महत्वाकांक्षा को पाने के लिए उसे किन राहों, अवरोधों और मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। आम तौर पर इस पीरियड को हम 'गर्दिश के दिन' या 'संघर्ष के दिन' के रूप में जानते हैं। वास्तव में यह 'गर्दिश या 'संघर्ष से अधिक तैयारी का दौर होता है, जब हर निर्देशक मिली हुई परिस्थिति में अपनी क्षमताओं के उपयोग से निर्देशक की कुर्सी पर बैठने की युक्ति में लगा होता है। मेरी कोशिश है कि हम सफल निर्देशकों की तैयारियों को करीब से जानें और उस अदम्य इच्छा को पहचानें जो विपरीत स्थितियों में भी उन्हें भटकने, ठहरने और हारने से रोकती है। सफलता मेहनत का परिणाम नहीं होती। अनवरत मेहनत की प्रक्रिया में ही संयोग और स्वीकृति की कौंध है सफलता... क्योंकि सफलता प्रतिभा का उपसंहार नहीं होती। वह प्रतिभा में समविष्ट रहती है। प्रतिभा स्वीकृत होती है तो सफलता बन जाती है।
राजकुमार हिरानी से मेरी पहली मुलाकात विधु विनोद चोपड़ा के दफ्तर में हुई थी। फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई थी। ज्यादातर पत्रकार विधु विनोद चोपड़ा का इंटरव्यू कर रहे थे। मैंने देखा कि एक शर्मीले स्वभाव का व्यक्ति चुपचाप बैंच पर बैठा है। उनकी आंखों की चमक ने मुझे आकर्षित किया। परिचय करने पर मालूम हुआ कि वह 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' के डायरेक्टर हैं। अखबारी किस्म का औपचारिक इंटरव्यू कर मैं चला आया। फिल्म रिलीज हुई और कुछ हफ्तों के बाद सफल हो गई। फिर से मुलाकात हुई। यह मुलाकात थोड़ी लंबी और अनौपचारिक थी। इसके बाद ऐसा संयोग हुआ कि मुझे अपने सूत्रों से थोड़ा पहले जानकारी मिल गई कि 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। मैंने हिरानी को मोबाइल से संदेश भेजा। कुछ घंटों के बाद यह सूचना सार्वजनिक हो गई, लेकिन हिरानी यह नहीं भूले कि मैंने उन्हें पला संदेश दिया था। मालूम नहीं इस घटना का हमारे परिचय में क्या महत्व है, लेकिन हिरानी उसके बाद की मुलाकातों में सभी के सामने इसका इसका उल्लेख करते रहे। यह उनके स्वभाव की अंतरंगता और उदारता है।
दो कामयाब फिल्मों के निर्देशक राजकुमार हिरानी आज भी उसी शर्मीले स्वभाव के हैं। लेकिन बातचीत के दरम्यान वे खुलते हैं और बगैर किसी छिपाव, दबाव और दोहराव के अपना मत रखते हैं। राजकुमार हिरानी ने हिंदी फिल्मों को लोकप्रियता का नया शिल्प दिया है। उनकी फिल्में आम दर्शक से लेकर खास दर्शकों तक को बांधती हैं और सभी को स्पंदित एवं आनंदित करती हैं। सचमुच बड़े निर्देशक की यही खूबी होती है कि वह 'मास और 'क्लास' के विभाजन को खत्म कर देता है। उसकी फिल्में समय की सीमा में आबद्ध नहीं रहतीं। समकालीन निर्देशकों में राजकुमार हिरानी एक सशक्त हस्ताक्षर हैं।


- आप नागपुर से हैं? नागपुर हिंदू संगठन आरएसएस का गढ़ माना जाता है। क्या उनसे कभी संसर्ग रहा या आप प्रभावित हुए ?
0 कॉलेज जाने तक मुझे पता नहीं था कि नागपुर आरएसएस का गढ़ माना जाता है । वहां उनका मुख्य कार्यालय है, पर ऐसा नहीं है कि आम आदमी ज्यादा प्रभावित होते हों। हां कुछ शाखाएं लगती हैं। बचपन में देखा करता था। लोग मैदानों में शाखाएं लगाते थे। पर ऐसा नहीं है कि मैं कभी उन शाखाओं में गया या इंफूलुऐंस रहा है उनका। हिंदू संगठनों का जितना असर मुंबई में है, वैसा ही वहां भी था। ऐसा नहीं था कि हिंदू लहर चल रही हो और सभी उसमें गोते लगा रहे हों।

- किस तरह का परिवार था अपका? आपके पिता जी क्या करते हैं? हैं अभी?
0 हां, मेरे पिता जी हैं। मम्मी-डैडी नागपुर में रहते हैं। संयुक्त परिवार है हमलोगों का। तब चाचा जी साथ में थे। मेरे डैड वास्तव में टाइपराइटिंग इंस्टीट्यूट चलता था। बैकग्राउंड यह है कि वे पार्टीशन के टाइम पर पाकिस्तान से आए थे। पार्टीशन के समय वह 14-15 साल के थे। उनके पिताजी नहीं आए थे। वे पाकिस्तान में ही गुजर गए थे। मां और भाई लोग थे साथ में। आगरा के पास है फिरोजाबाद। वहां कुछ दिनों तक हमारा परिवार रिफ्यूजी कैंप में रहा। पहले वहां काम किया। वहां से फिर काम खोजते-खोजते वे नागपुर पहुंचे। कुछ टाइम नौकरी की वहां पर। उस समय टाइपराइटर का नया दौर शुरू हुआ था। तो एक टाइपराइटर लिया... टाइप करते-करते टाइपराइटिंग इंस्टीट्यूट शुरू किया। फिर बाद में डिस्ट्रीब्यूटर बनकर कर टाइपराइटर बेचते थे। मेरी स्मॉल बिजनेस फैमिली है। परिवार के दूसरे सदस्यों ने बाद में पढ़ाई-लिखाई की। ज्यादातर वकील हैं सब मेरी फैमिली में। मुझ से भी उम्मीद की जा रही थी कि मैं पढक़र वकील बनूंगा। और मैंने बी कॉम किया भी। बी कॉम के बाद एक साल लॉ भी किया। मेरा शुरू से लगाव था थिएटर की तरफ। कॉलेज के दिनों में नाटक लिखा करता थां। ऑल इंडिया रेडियो युवावाणी एक प्रोग्राम आता था। उसके लिए भी कुछ नाटक लिखे थे। खूब जम कर थिएटर करते थे। छोटा सा ग्रुप था हमारा आवाज।

- थिएटर में किस तरह के प्ले किए जाते थे?
0 छोटा सा ग्रुप था हमारा। वहां मराठी थिएटर बहुत स्ट्रौंग था। हम तो मराठी में नहीं करते थे,पर देखते बहुत थे। चाहे वो महाराष्ट्र नाट्य महोत्सव हो, वह हर साल वहां होता था। हम कुछ लोगों ने मिलकर एक थिएटर ग्रुप शुरू किया था आवास। कुछ कॉलेज के लोग थे, कुछ बाहर के थे, कुछ प्रोफेशनल... रेगुलर बेसिक पर काफी प्ले करते थे। हर किस्म के प्ले किए। ज्यादातर मराठी के लिखे हुए। मराठी से रूपांतर या कुछ बंगाली प्ले से ट्रांसलेट कर के करते थे। रेगुलर शोज भी करते थे हमलोग। होता ये था कि हिंदी थिएटर इतना स्ट्रोंग था नहीं तो टिकटें खुद बेचनी पड़ती थी। लोगों को खुद बुलाना पड़ता था। पर मजा आता था,इसलिए करते थे। काफी साल किया। वहां से शौक जागा...

- वैसा थिएटर जो बंबई या दिल्ली में हो रहा था, गंभीर किस्म के नाटक... ?
0 हमलोग का वैसा नहीं था। हमलोगों की सोच थी कि आदमी खुद धक्के खाते हुए सिखता है... वैसा थिएटर था। कोई गाइड करने वाला नहीं था। चंद शौकिया लोग थे,वे जुड़ गए थे साथ में और नाटक करना चाहते थे। मगर यह था कि हमलाग रेगुलर बेसिस पर नाटक करते थे। मुझे याद है कि साल में दो-तीन प्ले तो करते ही थे। कॉलेज से बाहर प्रोफेशनल रूप से कुछ जुटा कर। उतना पैसा जमा कर लिया जाता था कि एक हॉल बुक कर सकें। पर गाइड करने के लिए कोई था नहीं। जैसा कि दिल्ली में एनएसडी ग्रुप था या मुंबई में दूसरे ग्रुप सक्रिय थे। हमलोग खुद से धक्के खाते-खाते रास्ता ढूंढ़ते हुए मिल जाते थे थिएटर के लोग। एक किशोर कुलकर्णी जी थे, वो हैं अभी भी। उनको हम ले आते थे। वह मराठी थिएटर डायरेक्ट करते थे। उन्होंने कुछ हमारे प्ले डायरेक्टर किए तो उनसे सीखने को मिला। वैसे सीखते-सीखते कुछ करते रहे। वहीं से शौक जागा कि फिल्मों में जाया जाए और फिल्मों में कुछ किया जाए।

- बचपन में तो फिल्में देखते रहे होंगे?
0 फिल्म तो बहुत देखते थे। अक्सर जाते थे।

- पारिवारिक आउटिंग होती थी या...?
0 मुझे बचपन का याद है कि मैं दादी के साथ किसी शनिवार या रविवार को... य़ा शायद महीने में एक बार उनके साथ फिल्म देखने जाता था। डैड नहीं जा पाते थे, वेे व्यस्त रहते थे। मैं उनके साथ रिक्शा में बैठकर जाता था। मैं और मेरा भाई... दोनों को वह अपने साथ फिल्म ले जाती थीं। भारत टॉकिज था वहां पर छोटा सा। बारह आने में टिकट मिलता था एक। नीचे स्टॉल में बैठकर देखता था। उनके साथ हमने बहुत फिल्में देखी।

- किस तरह की फिल्में? उनकी च्वाइस कैसी होती थी?
0 सारी फिल्में।

- ऐसा नहीं कि ये देखना और वो नहीं देखना है?
0 ऐसा कुछ नहीं था। मुझे याद है कि मैं इतना छोटा था कि जो फिल्म देखकर आता था उसका हीरो ही मेरा आदर्श बन जाता था। मुझे ये भी याद है कि नवीन निश्चल की फिल्म देखता था तो मुझे लगता था कि नवीन निश्चल जैसा कोई नहीं है। बचपन में... आठ-दस साल के उम्र में तो यही होता है। कॉलेज पहुंचने पर आदमी की च्वाइस बनती है।

- उन दिनों की देखी हुई पहली फिल्म के बारे में बताएं,जिसकी छाप आपके मन पर रह गई हो?
0 मुझे याद है... 'संगम'। 'संगम' मुझे याद है, जब मैंने देखी थी तो उस समय बहुत अच्छी लगी थी। जब से एक च्वाइस होने लगी कि मुझे इस टाइप की फिल्में देखनी हैं तो मैँने हृषिकेश मुखर्जी की फिल्में देखनी शुरू की। तब मुझे लगा कि इस तरह की फिल्म में मुझे मजा आता है। चाहे वो 'आनंद' हो या 'गोलमाल' हो चाहे वो 'चुपके चुपके' हो। मनमोहन देसाई की फिल्में देखा करते थे। वहां एक्सपोजर ज्यादा था नहीं। बाद में इंस्टीट्यूट गया...

- नागपुर में कितने थिएटर थे उस समय?
0 नागपुर में उस समय बाईस-तेईस थिएटर... अभी भी लगता है उतने ही हैं। इधर पहला मल्टीप्लेक्स बन रहा है। उनमें से आधे से ज्यादा में आप जा नहीं सकते थे। बहुत खराब कंडीशन में थे। चंद थिएटर ठीक थे घर के पास में, वहां जाकर देखा करता था।

- आपने बताया कि 'संगम' और कौन सी याद है?
0 याद कर रहा हूं , हां 'संगम' मुझे ज्यादा याद है।

- हीरो जो पहली बार पहचान में आया हो... कि ये फलां हीरो है?
0 ये मुझे लगता है कि अमिताभ बच्चन ही थे। स्कूल में ही थे उस समय। अमिताभ वाज ए हीरो। मुझे याद है कि हम साइकिल पर स्कूल जाते थे... चाल-ढाल भी फिर कुछ वैसी हो जाती थी। अचानक लगता था कि हम भी बेस में गहरी आवाज में बात कर रहे हैं। आयडलीज्म होता था। हम भी बेस में बात करते थे। उस टाइप के कपड़े पहनना चाहते थे। अब सोच कर हंसी भी आती है। मुझे याद है कि टेलर के पास गया था... उस समय मैंने अमिताभ की कोई फिल्म देखी थी। मैंने टेलर से कहा था कि मुझे उनके टाइप की शर्ट चाहिए। अब हंसते हैं... सब दोस्त जाते थे बनवाने के लिए। एक टेलर नागपुर में था, वो बना कर देता था। फिल्म देखकर शर्ट तैयार करता था। मुझे एक फिल्म याद है। वो फिल्म थी राखी, अमिताभ और विनोद मेहरा की फिल्म थी 'बेमिशाल'। उसमें अमिताभ ने जो शर्ट पहनी थी, वह हम कई दोस्तों ने सिलवाई थी। अमिताभ तो हम सभी के आदर्श थे।

- क्या चीजें अच्छी लगती थी? फिल्म देखने के लिए उत्साह क्यों होता था? सिर्फ देखने के लिए फिल्म देखना या वहां लड़कियां मिलेंगी या वहां दोस्तों के साथ मौज-मस्ती होगी, उद्देश्य क्या होता था?
0 फिल्म देखने का आनंद उठाना ही उद्देश्य होता था।
लड़कियां तो उस टाइम... काफी पहले की बात कर रहा हूं। नागपुर काफी रूढ़िवादी शहर था। उस समय शायद लड़कियां अकेली फिल्म देखने के लिए नहीं जाती थी। दोस्तों के साथ आउटिंग करने का… मस्ती करना शामिल रहता था। कोई भी बहाना ढूंढ़ लेते थे। एक दिन बारिश पर रही थी और मैंने कहा, मौसम अच्छा है यार, फिल्म देखते हैं। मुझे याद है कि मैंने मम्मी से जाकर कहा कि फिल्म देखने जा रहा हूं। परमिशन लेनी पड़ती थी। चाचा जी थे बाजू में ,उन्होंने पूछा क्यों? अभी क्यों जा रहे हो फिल्म देखने? मैंने कहा कि मौसम अच्छा है। उन्होंने पलटकर कहा, मौसम अच्छा है तो मौसम का आनंद लो न? फिल्म देखने क्यों जा रहे हो? था शौक और काफी देखा करता था फिल्में। मुझे याद है, वहां जब कोई नई फिल्म आती थी और पॉपुलर फिल्म होती थी, ऐसा लगता था कि चलेगी बहुत तो सुबह पांच बजे के शो हुआ करते थे वहां पर। मुझे याद 'कुर्बानी' फिल्म जब लगी थी तो सुबह पांच से साढ़े सात का शो होता था। फिर साढ़े सात का शो होताथा। इस तरह दो एडिशनल शो होते थे। पहला हफ्ता चलता था। वह सुबह के सात बजे के शो में काफी फिल्में देखी है मैंने। जब कॉलेज पहुंचा तो वह समय कॉलेज का होता था। सुबह सात बजे से कॉलेज होता था... तो कई बार निकल जाते थे। ऐसा नहीं कि अक्सर... पर कभी आदमी निकल जाया करता था। 'कुर्बानी' मुझे अच्छी तरह याद है। सात बजे का शो देखने के लिए यह सोच कर गया कि सात बजे का शो है तो लोग कम जाएंगे। पहला शो है टिकट मिल जाएगी। पहुंचे तो पता लगा कि पिछली फिल्म के दर्शक लाइन में लगे हैं। वहां गुरुवार को फिल्म लगती थी। यहां शुक्रवार को लगती है। बुधवार को लास्ट शो जो फिल्म लगी थी... वो खत्म हुआ तो उसको देखकर लोग थिएटर से निकले और रात को ही लाइन में लग गए सुबह की शो देखने के लिए। इतनी पॉपुलर हुई थी 'कुर्बानी' सात बजे का शो भी हाउसफुल था। देखनी है फिल्म यह सोच लिया था। मुझे याद है कि एक लडक़ा टिकट लेकर खड़ा था । बोल रहा था एक्सट्रा टिकट-एक्सट्रा टिकट । मैं और मेरा दोस्त था। मैंने कहा कि एक्सट्रा है तो दे दो यार। तो वह कहता है कि इतना ज्यादा लूंगा। यानी वो ब्लैक कर रहा था। ब्लैक मार्केटियरं नहीं था। वो लडक़ा था ऐसे ही था कोई... हमने ले ली टिकट। हम छोडऩा नहीं चाहते थे फिल्म। पैसे थे उतने... मैंने कहा कि दे दो। उस समय साढ़े पांच रूपये के टिकट होते थे। वो कुछ सात-आठ रूपये मांग रहा था। मैंने ग्यारह रूपये दिए और कहा कि इसमें इतना ही लिखा हुआ है। तुम ब्लैक कैसे कर सकते हो। वह बहाने करने लगा। उधर हम बेताब थे कि टिकट कैसे छोड़ दें? तो ले ली। पता चला कि वह भेला लडक़ा ब्लैक मार्केटियर ही था। क्योंकि हमारी बक-झक में तीन-चार हट्टे-कट्टे से लोग आ गए। हमने उसे बारह रूपये दिए थे। एक रूपया उसने वापस नहीं दिया। वो तीन-चार लोग जमा हो गए मेरे पास। एक कहता है आपने पैसे नहीं दिए? मैंने कहा दिया। वो सोलह मांग रहा था। डर रहे हैं कि कहीं मार न पर जाए। फिर भी कह रहे हैं कि इसमें ग्यारह लिखा हुआ है। तो वह कहता है - आपने तो बारह ही दिए उसको। आप क्या ब्लैक की बात करते हो? आप दिए तो? मैं कहा दिए तो, एक वापस करो न? डरे हुए थे। तो वो कहता है कि देख लेंगे। हमने कहा देख लो... दिल नहीं हो रहा था कि फिल्म छोड़ दें। हम जाकर बैठ गए सिनेमा हॉल में जाकर। मैंने कहा देखी जाएगी। बाद में वही लडक़ा आकर बगल में बैठ गया। उसने भी एक्सट्रा टिकट खरीदी। फिल्म खत्म हुई तो हम सामने के दरवाजे से नहीं निकले। हम पीछे से निकले। कहीं वो लोग रोक न लें। एक होता था आकर्षण उस टाइम फिल्में देखने का। और कोई इंटरटेनमेंट था नहीं। टेलीविजन नहीं था।

- फिल्में देखने के अलावा और क्या चीजें पसंद आती थी, जैसे लॉबिंग कार्ड देखना। मुझे याद है हमलोग बचपन में जाते थे, फिल्म देखने से पहले चार दिन लॉबिंग कार्ड ही देखकर चले आते थे?
0 इंटरवल में निकल कर देखता था। चलो ये-ये हो गया। अब ये-ये होने वाला है। ये बाकी है। लाबिंग कार्ड देख कर स्टोरी जज करने की कोशिश करता था। फिल्म इंटरेस्टिंग होगी कि नहीं? बहुत होता था। आजकल वो सब खत्म हो गया।

- फिल्मों से आपका लगाव बढ़ता गया,लेकिन आपने कब महसूस किया कि फिल्मों में ही जाना है?
0 जब थिएटर करने लगे तो फिर मुझे लगा कि अब मुझे फिल्म में कुछ करना है। मुझे लिखने का शौक था। और मैंने घरवालों से भी कहा।इसे सौभाग्य कहें मेरा। मेरी कोई जान-पहचान नहीं थी किसी फिल्म वाले से... क़ोई एसोसिएशन नहीं था। एक तरह से टिपिकल बिजनेस फैमिली। कुछ टाइम तक खटका, मुझे लगा कि शायद... लेकिन मेरे डैड को नहीं खटका। पर बाकी परिवार में सबको लगा कि ये क्या है?

- ये क्या है में क्या सवाल थे?
0 फिल्मों में जाने का मतलब उस समय नागपुर शहर में यही होता था कि एक्टर बनने जाने चाहता है। उनको यह नहीं समझ में आता था डायरेक्टर बनने जाना चाहता है। तो काफी लोग आरंभ में हंसते रह। पर मेरे डैड... उन्होंने कहा, तुम्हें जो करना है, वो करो। हम बोलेंगे ये करो तो उसका कोई फायदा नहीं। जब तक हो यहां हमारे साथ काम करो... बाकी फिर करना है तो करो। मुझे पता भी नहीं था कि फिल्म इंस्टीट्यूट है और वहां जाने का कोई तरीका होगा। तो मैं सोच रहा था कि बंबई आऊंगा किसी के साथ काम करूंगा। तो उन्होंने ही कहा कि करना है तो फिल्म इंस्टीट्यूट से होते हुए जाओ।

- उसके पहले बंबई कोई एक्सपोजर नहीं था आपका?
0 बंबई आ चुका था एक-दो बार। शहर देखा था मैंने। पर कोई कनेक्शन नहीं था। अनजाना शहर था। उसी वजह से डैड का कहना था कि अगर करना ही है तो ट्रेंड होकर करो। अपने-आप को ट्रेंड करो। हैव द प्रोपर एजुकेशन देन गो। वही मुझसे कहते रहते थे कि फिल्म इंस्टीट्यूट जाओ... फिर मैं फिल्म इंस्टीट्यूट गया। वहां से प्रोस्पेक्टस ले लाया। फॉर्म भेजा मैंने। मैंने बी कॉम किया था। ग्रेजुएशन के बाद अप्लाय किया। तो एडमिशन नहीं हुआ। मैंने डायरेक्शन के लिए अप्लाय किया था। तो फिर मैंने लॉ करना शुरू किया... मेरी फैमिली में सब वकील थे। मगर मन वहीं लगा रहा। लॉ करने के साथ प्ले भी करते रहे, कॉलेज में भी और और बाहर भी...।

- और इस बीच प्ले चलते रहे?
0 वो तो रेगुलर चलता रहा। मुख्य आकर्षण वही था। प्ले करते रहना है, लिखते रहना है। वो सब चलता रहता था। पहली बार एडमिशन नहीं हुआ,लेकिन टेस्ट देने के बाद थोड़ा सा पता चला कि कैसे होता है। इंस्टीट्यूट में गया था तो कुछ लोगों से मिला। मुझे पता चला इंस्टीट्यूट में एडमिशन के लिए करीब तीन-चार हजार लोग अप्लाय करते हैं हर साल। और बत्तीस सीट होती हैं टोटल। तो आसान नहीं है इतना। पता लगा कि आठ सीट होती थी हर कोर्स के लिए। मुझसे किसी ने कहा कि एडीटिंग में अप्लाय करो। अगर चार हजार लोग अप्लाय करते हैं तो दो हजार लोग डायरेक्शन के लिए करते हैं। एडीटिंग के लिए पांच-छह सौ लोग करते होंगे। उसमें ज्यादा चांस है। मैंने कहा कि मुझे कुछ आयडिया नहीं एडीटिंग क्या होता है। इतना था कि चलो एडीटिंग में घुस जाएंगे तो फिर डायरेक्शन कर लेंगे, वहां से कुछ हो जाएगा। तो अगले साल एडीटिंग में अप्लाय किया।

- अप्लाय करते समय ये दिमाग में था कि किस फील्ड में जाना है?
0 ये शौक था कि फिल्म बनाना है। क्योंकि प्ले डायरेक्ट करते थे नागपुर में तो यह दिमाग में था कि फिल्म डायरेक्ट करनी है। डायरेक्शन में नहीं हुआ तो सोचा चलो अब एडीटिंग में अप्लाय करते हैं। थोड़ा समझ में आ गया था कि किस तरह के पेपर्स होते हैं। दो टेस्ट होते थे। एक एप्टीट्यूड टेस्ट होता था, वो बैंक के एग्जाम जैसा होता था। वो आपका लॉजिक समझने की कोशिश करते थे। मैंने तैयारी शुरु की। फिर पढऩा शुरू किया फिल्मों के बारे में। वर्ल्ड सिनेमा समझने की कोशिश की। नेशनल सिनेमा समझने की कोशिश की, उस समय एक्सपोजर नहीं था।

- वो कौन लोग हैं जिन्होंने मदद की थी उस समय?
0 नहीं, मैं खुद गया था इंस्टीट्यूट। एक एग्जाम दे चुका था। वहां की लायब्रेरी देखी थी। पढऩा है तो पढ़ो। तो मैंने लाइब्रेरी में एक हफ्ता बिताया। वहां से मेरे लौटने के बाद नागपुर में एक फिल्म क्लब खुला ।

- आपने चालू किया?
0 नहीं। एक अलग ग्रुप था। उन्होंने शुरू किया। वल्र्ड सिनेमा आता था, फिल्म आरकाईव से फिल्में आती थीं। वो देखना शुरू हुआ। थोड़ा एक्सपोजर मिला। पूरी तैयारी के साथ एग्जाम दिया। उस साल सलेक्शन हो गया एडीटिंग में। अब लगता है कि अच्छा ही हुआ। एडीटिंग से आज मुझे इतनी मदद मिलती है। अगर डायरेक्शन कर के आता तो बहुत थयोरीटिक्ल कोर्स होता आज। एक टेक्नीकल बैकग्राउंड है। कहानी तो आदमी लिख लेता है। वह कोई आपको सीखा नहीं सकता शायद। फिर वहां से बंबई आया।

- बंबई में किनके साथ शुरू में?
0 एडीटिंग पास कर के आया था तो मैंने कुछ साल एडीटिंग की। हुआ यह कि... मुझे जब पहला टेलीग्राम मिला था मुझे एडमिशन का... आदमी, एक छोटे शहर से आया आदमी। ऐसा लगता था कि इंस्टीट्यूट में एडमिशन हो जाएगी बस लाइफ बन गई। हम निकलेंगे यहां से फिर फिल्म बनाएंगे। इसमें क्या है? प्रोब्लम क्या है? मुझे अभी तक याद है, जब टेलीग्राम आया। टेलीग्राम आता था,यू हैव बिन सलेक्टेड फोर दिस कोर्स... मैं उसको रख नहीं पा रहा था नीचे। मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि एडमिशन हो गयी। मैं देख रहा हूं। ऐसे देख रहा हूं। यार अब तो लाइफ हो गया सेट... अब जाएंगे तीन साल कर के निकलेंगे। और हो जाएंगे। देखता रहा, पता नहीं कितने घंटों तक मैंने देखा रहा होगा। मैं नागपुर से पहला व्यक्ति था इंस्टीट्यूट जाने वाला।

- यह किस साल की बात होगी?
0 84 से 87 तक था मैं इंस्टीट्यूट में। यह 84 की बात है। फिर बस पहुंच गए इंस्टीट्यूट। सात दिन में पता लग गया कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है कि हम यहां से निकलेंगे तो दुनिया चेंज हो जाएगी। अभी तो हम सीख रहे हैं। बाहर जाकर कुछ और सीखना है। ऐसा कुछ नहीं है। वो बड़ा इंटलेक्टचुअल सी जगह थी। जाते ही स्ट्राइक हो गई इंस्टीट्यूट में... रैगिंग होती थी। कहते थे खड़े होकर चिल्लाओ। वांट मोर स्टॉक, वी वांट फलेक्सीबिलिटी। न हमको स्टॉक समझ में आता था और न फलेक्सीबिलिटी समझ में आती थी। खड़े होकर चिल्ला रहे हैं नहीं तो रैगिंग होती थी। तो वो बड़ा इंटलेक्चुअल सा माहौल था वहां पर। कोई भी कुछ भी बोलता था। थोड़ा सी छद्म बौद्धिकता थी वहां पर। तो मैं डीप्रेशन में आ गया था। और मैं वापस आ गया नागपुर। फिर बीस-पच्चीस दिन बाद टेलीग्राम आया कि वापस आ जाओ। मृणाल सेन आ रहे हैं। गर्वनिंग कॉन्सिल के मेंबर हैं। उनकी मीटिंग है। उनका घेराव करना है। तो हम पहुंच गए वापस। मृणाल सेन आए, उनका घेराव किया गया। पुलिस आई, पुलिस सबको पकडक़र ले गई। अस्सी स्टूडेंट थे जेल में बैठे। मैं सोच रहा था मैं आया था फिल्म बनाने, यहां पुलिस स्टेशन में बैठे हुए हैं। बहुत डिप्रेशन में आ गया। स्ट्राइक खत्म हुई तो फिर आए। फिर क्लासेस शुरू हुए। वहां से फिर कांफिडेंश वापस आया। जब काम करना शुरू किया, जब स्टील कैमरे दिए जाते थे, जाकर शूट करते थे। फिर यह फीलिंग आने लगी कि नहीं यार हम जानते हैं। ऐसा नहीं है कि ... ये इंटलेक्चुअलिज्म अपनी जगह पर है। कांफिडेंश वापस आया फिर इन्जॉय करने लगा आदमी। और आज मैं देखता हूं तो मुझे लगता है कि वो तीन साल कल बीते हैं।

- आपने थिएटर का अभ्यास किया था। फिल्म इंस्टीट्यूट में तो विजुअल मीडियम के हिसाब से ट्रेनिंग चल रही होगी। कितना आसान रहा देखने और सोचने में आया बदलाव?
0 इंस्टीट्यूट ट्रेंड कर रहा था। हमलोग सीख रहे थे। पुराना भूल गया था। क्योंकि जब एक बार छुट्टी में घर गया तो... बाकी ग्रुप के लोग लोग प्ले कर रहे थे। मैंने सोचा फिर प्ले करूंगा। एक प्ले था कोई डायरेक्ट कर रहा था, मैं एक्ट कर रहा था ... तब मुझे लगा कि मैं भूल गया हूं। अब मेरे लिए ये मुश्किल है ... सच कहूं तो खुसुर-पूसुर करके सब लोग बात करते थे कि इसको हो क्या गया है। पहले तो बहुत अच्छा करता था। अब ठीक से नहीं कर पा रहा है। थोड़ा सा हो गया था कुछ,बदल गया था। उस माहौल से निकल कर इस माहौल में ढल गया। कई सालों तक लगता रहा कि अभी थिएटर करना चाहिए था। लेकिन अब नहीं लगता है।

- प्रशिक्षण कितना जरू री मानते हैं?
0 मैं समझता हूं कि बहुत जरूरी है ट्रेनिंग। ऐसा नहीं कि लोग डायरेक्ट नहीं सीखते हैं। डायरेक्ट भी सीखते हैं। हमको लगता है कि औपचारिक ट्रेनिंग का फायदा यह है कि आप सब कुछ व्यवस्थित ढंग से सीखते हैं। आपको हर चीज मिल जाती है। आप पहले दिन से कैमरा लेकर खड़े हो जाते है। आप समझते हैं कि लेंसिंग क्या होता है? लाइटिंग क्या होता है। लैप क्या होता है? स्टॉक क्या होता है। यहां पर आप सीखना भी चाहो तो ... किसी को असिस्ट करोगे तो आपको पहले पता नहीं होगा। कैमरामेन आपको थोड़े ही झांकने देगा कैमरा में से। वो आपको नहीं बताएगा कि लेंस क्या होता है। वह तो काम कर रहा है। अगर आप वह सीख कर आओ यहां पर तो ... फिर देखो और करो तो यहां आसान है। ये नहीं कह रहा हूं कि ऐसे नहीं सीख सकते हैं। पर औपचारिक ट्रेनिंग बहुत बेहतर है। ट्रेनिंग से खराब स्टूडेंट भी निकलेंगे, अच्छे स्टूडेंट भी निकलेंगे। हर मेडिकल कॉलेज से निकला हुआ डाक्टर जरूरी नहीं कि अच्छा डॉक्टर होगा। पर आपको एक वातावरण मिलता है सीखने के लिए। अब आप उसका कितना फायदा उठाते हैं। इंस्टीट्यूट में पूरा माहौल मिलता है। कमाल की लाइब्रेरी उपलब्ध है। जो फिल्म आप देखना चाहो। वल्र्ड सिनेमा आपके पास उपलब्ध है। आपके सारे दोस्त दिन भर सिनेमा पर बात कर रहे हैं। माहौल कमाल का मिलता है। साइड इफेक्ट भी है। आप इंटलेक्चुअल हो जाओ। आप एटीट्यूड दिखाना शुरू कर दो आप सोचने लगो कि कुछ हो तो आप बिखर भी सकते हो। पर आप उसको पॉजिटीवली लो तो आपको बहुत फायदा होगा। मुझे लगता है कि मुझे आज भी कोई कहे जाकर पढ़ाई करो कहीं तो मैं झट से तैयार हो जाऊंगा। सच कहता हूं,मन करता है कि कुछ चीजें अभी भी कहीं जाकर सीखना चाहिए। छोटा कोर्स छह हफ्ते का या महीने-दो महीने का करना चाहिए। म्यूजिक के बारे में थोड़ा और जानना चाहता हूं। मन करता है कि किसी दिन जाकर चेक करूंगा।

- मुंबई आने के बाद पहला जॉब क्या किया आपने?
0 पहला काम किया एडीटिंग का। एक एड फिल्म की मैंने। भरत रंगाचारी फिल्ममेकर थे। उन्होंने एक एड फिल्म बनाई थी। उनकी एड फिल्म एडिट की। उसके बाद रेणु सलूजा ने मुझे ट्रेक्लींग का काम दिया। एक डाक्यूमेंट्री थी उस पर काम किया।

- डायरेक्टर का नाम क्या था?
0 एक डाक्यूमेंट्री बनाई थी शबनम ने। रेणु एडिट कर चुकी थी। उसके बाद साउंड का काम करना था। दो काम किए,उसके बाद फिर दो-तीन महीनों तक कुछ काम ही नहीं था।

- काम नहीं मिलने पर पैसों की दिक्कत रही होगी ?
0 इंस्टीट्यूट में स्कॉलरशिप मिलती थी। फीस बहुत कम थी। 257 रूपये भरा करते थे हमलोग एक सेमेस्टर का। समझ लीजिए कि हमलोग मुफ्त में ही पढ़ते थे। चार-पांच सौ रूपये महीने में हो जाता था। चार सौ रूपए स्कॉलरशिप मिलती थी। हर ग्रुप में दो लोगों को मिलती थी।

- वहां ड्रग्स से कैसे बचे आप?
0 इंस्टीट्यूट में ड्रग्स का कभी प्रोब्लम नहीं रहा। मुझे नहीं लगता कि कोई भी ड्रग्स लेता था। दारू वहां बहुत चलती थी इंस्टीट्यूट में। दारू वहां बहुत पीते थे लोग,लेकिन वह सीरियस लेवल पर नहीं था। एकाध होगा कोई ऐसा मामला ... हर कॉलेज में जितना होता है, उतना होता था। यह धारणा है वहां के बारे में ... हमारे टाइम पर नहीं था। आप जो समस्या कह रहे हैं, वो समस्या तो नहीं थी,पर आने के बाद दो-तीन महीना काम नहीं था। फिर कुछ छोटा सा मिलता था। तो वो पहले छह महीने मैं कहूंगा कि थोड़ी दिक्कत थी। उस समय फैमिली ने सपोर्ट किया।

- अकेले रहे या दोस्तों के साथ रहे? किस इलाके में रहे?
0 हुआ ये मेरे साथ, मुझे याद है ... मेरा डिप्लोमा फिल्म खत्म हुआ सबसे पहले। डिप्लोमा फिल्म खत्म कर के मैं चला गया नागपुर शहर।

- क्या नाम रखे थे डिप्लोमा फिल्म का?
0 एट कॉलम अफेअर। वहां ग्रुप बनते थे। चार लोगों का एक डायरेक्टर होता था। एक कैमरामेन, एक एडिटर। मेरे साथ डायरेक्टर थे श्रीराम राघवन। वो मेरे बैच में थे। अभी उन्होंने एक हसीना थी डायरेक्ट की थी। श्रीराम राघवन डायरेक्टर, हरिनाथ कैमरामेन थे, मैं एडिटर था। डाक्यूमेंट्री बनाई जिसको नेशनल अवार्ड भी मिला था बाद में। फिल्म बनाई और मैं चला गया। हमारा एक वीडियो कोर्स होने वाला था। दो महीने का कोर्स था। उसके लिए मैं लौटकर आया एक महीने के बाद । तो पता लगा कि वह कोर्स नहीं होने वाला है। इसका मतलब हमारा तीन साल का कोर्स खत्म हो गया अब आप जाइए। मैं गया तो पता लगा कि हमारे रूम से हमारा सामान निकाल दिया गया था। एक हॉल में रख दिया गया था। जिसको हम अपना घर समझते थे। वहां जाकर पता चला कि वो घर है ही नहीं। सारे स्टूडेंट बंबई या कहीं और भी जा चुके थे। और मुझे किसी ने खबर नहीं की थी। मुझे याद है, मैं पूरा दिन बैठा रहा कैंपस में न कमरा था अपना न कुछ और। जिसे हम अपना घर समझते थे, वहां अचानक असहाय बैठे थे। अब करें क्या? पूरा दिन मैं सोचता रहा कि अब मैं करूं क्या? मैं बंबई जाऊं कि मैं नागपुर जाऊं? क्योंकि मैं कहीं जाने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था। मुझे लग रहा था कि दो महीने का कोर्स खत्म होगा उसके बाद बंबई के लिए तैयारी करेंगे। बंबई में घर था न ठिकाना था। नागपुर जाकर कोई फायदा नहीं है। आना तो फिर बंबई ही है। फिर मैंने कहा अभी चलते हैं। मैंने वहां से एक बैग पैक किया और बाकी सामान को हॉल में छोड़ा। मैंने सोचा कि बाद में आकर पिकअप करूंगा कभी। एक बैग लेकर मैं ... एशियाड बस चलती थी उस समय। बस पकडक़र मैं बंबई पहुंचा था सुबह पांच बजे। मैं सीधा गया था श्रीराम राघवन के यहां। उनका घर है यहां पर। उसके घर गया, बेल बजाई, उसने दरवाजा खोला, वो हंसता हुआ मुझे देख रहा था। मैंने गालियां दी। तू साला बताया नहीं मेरे को ... उसने कहा कि मैंने जानबूझकर डिसाइड किया कि नहीं बताएंगे तुमको। आने दो पता लगेगा फिर। मालूम था कि यहीं आओगे तुम। उसका बंबई में मकान था। उसके माता-पिता पूना में रहते थे। अंदर गया तो हमारे तीन और बैचमेट सोए हुए थे, गद्दे डाल के। वो नींद में थे। मैं भी जाकर सो गया। सात बजे मुझे याद है कि सिक्कों की आवाज आने लगी। खट-खट-खट सिक्के ... उठा, देखा तो सब एक-एक रूपए के क्वाइन गिन रहे थे सब लोग। क्योंकि नीचे एक फोन बूथ होता था। और घर पर फोन नहीं था। वो फोन बूथ में जाकर सुबह लग जाते थे ... एक फिल्म की डायरेक्ट्री होती थी सबके पास। डायरेक्ट्री लेकर सब फोन करते थे। जो कैमरामेन होगा तो वो कोई कैमरामेन को फोन करेगा जॉब के लिए। मैंने देखा, बोला मर गया यार। कठोर सच्चाई दिखने लगी ... ये क्या हो रहा है। मैं बैठा रहा। पूरा प्रोसेस ही होता था कि आज इसको मिलना है, आज इस डायरेक्टर को मिलना है। वो सब चलता रहता था। अगले दिन मेरे पास भी वही था। मैं डायरेक्ट्री लेकर बैठा हुआ था। कुछ सिक्के थे और सुबह से फोन लगा रहे थे। फोन लगाते थे, फिर लोगों को मिलते थे। संयोग से मुझे पहले हफ्ते में ही पहला काम मिल गया। उसके कुछ पैसे मिले। मगर उसके बाद छह महीने तक कोई काम नहीं था। फिर वो वीडियो कोर्स आ गया। दो महीनों के लिए फिर से फिल्म इंस्टीट्यूट गए। वहां से जब लौटकर आए तो लगा कि काम ऐसे मिल नहीं सकता है। हम उम्मीद में बैठे हुए थे। हम लोगों से मिलते थे लेकिन किसी को विश्वास नहीं होता था। वो आपके साथ क्यों काम करेगा। हमको पता है कि शायद हम काम में अच्छे हैं। पर उसको तो नहीं पता है। फिर मैंने एक एडीटिंग रूम ज्वाइन किया। एक स्टूडियो था एकता वीडियो, सांताक्रूज में, उस समय वीडियो का टेक्नोलॉजी शुरू हुआ था। लो बैंड में एडीटिंग होता था। यह 1988 की बात है। वहां पर मैंने जॉब किया। उस समय ऐसा नहीं लगता था कि कोई स्ट्रगल कर रहे हैं। जिसको सोचो तो ... मजा आता था।

- उस समय शादी नहीं हुई थी क्या ?
0 मेरी शादी 1994 में हुई।

- कोई इमोशनल अफेयर या कोई गर्ल फ्रेंड ... इन व्यस्तताओं से बचे हुए थे?
0 कुछ नहीं, बचे हुए नहीं थे। वंचित थे।

- सोच रखा था या ...?
0 बिल्कुल नहीं, कोई मिल जाती तो बड़ी खुशी होती। वहां मुझे बारह सौ रूपए मिलते थे। हुआ ये कि वहां, एकता वीडियो में,लोगों से मिला। वहां लोग एडीटिंग करने आते थे। एडिटर लेकर आते थे। जिसको एडिटर नहीं होता था उसके साथ हम काम करते थे। उसमें छह महीना काम किया। वहां टीवी के काम आते थे। सीरियल का काम होता था ज्यादातर। मैंने सीरियल को एडिट करना शुरू किया। फिर कांटेक्ट बन गया। एडवर्टाइज में एक बार किसी के लिए काम करो, उसको आपका काम पसंद आता है तो आपको फिर से बुलाता है। वहां छह महीना और बाहर छह महीना फ्रीलांसिंग करने के बाद मुझे नियमित रूप से एडिटींग का काम मिलना शुरू हो गया। फिर एक दिन भी फ्री नहीं होता था। एक फीचर फिल्म भी एडिट की मैंने।

- फीचर फिल्म कौन सी थी?
0 अनंत बनानी की फिल्म थी 'जजबात'। उन्होंने खुद प्रोड्यूस की थी, पर वह चली नहीं। जॉय ऑगस्टीन ने एक फिल्म बनाई थी। उनकी पहली फिल्म,जो आधे में ही बंद हो गई थी। वो एडिट की। तो मेरा फिल्म का ऐसा एक्पीरियेंस रहा कि एक फिल्म की, वो चली नहीं तो पैसे नहीं मिले उसके। फिर दूसरी की वो बंद हो गई उसके भी पैसे नहीं मिले। काम इतना रहता था कि फीचर फिल्म उस समय स्टीनबेक पर होता था। छह-छह महीना एडिट करो फिर पैसे नहीं मिलें तो ... अचानक लगने लगा कि यार ये दुकान सरवाइव नहीं कर रहा है। उस दौरान मैं एडवरटाइजिंग के कुछ लोगों से मिला। उनके लिए एड फिल्में तैयार की। वहां कुछ अच्छे किस्म के लोग मिले। जो टिपिकल फिल्मी नहीं थे। वे अच्छे लोग थे और उनसे मिलने-जुलने में अच्छा लगता था। धीरे-धीरे पता नहीं कैसे अपने आप एड फिल्म में रूचि जागी। एड फिल्म एडिट करते-करते ... कुछ डायरेक्ट करने के लिए भी मिल गई। एक आदमी चाहता था डायरेक्टर । फिर डायरेक्ट करना शुरू कर दिया। वो फिल्में बनने लगी। फिर वहां से प्रोड्यूस करना शुरू कर दिया। करते-करते एड फिल्म की प्रोड्क्शन कंपनी बन गई। गुड वर्क ... वो चलता रहा। फिर उस बीच विधु विनोद चोपड़ा की मिशन कश्मीर मिल गई।

- इस बीच डायरेक्टर बनने का सपना कैसे बचाए रखा। क्या ऐसा नहीं हुआ कि एडिटिंग में पैसे आ रहे हैं तो आप संतुष्टï होकर इसी काम को आगे बढ़ाते रहें?
0 मैं नागपुर से यह नहीं सोचकर आया था कि मैं डाक्यूमेंट्री बनाऊंगा या एड फिल्में करूंगा। मुझे नहीं लगता कि कोई यह सोच कर आता है। हो सकता है कुछ लोग डाक्यूमेंट्री या एड फिल्म का ही सोच कर आते हों। हमें नागपुर में तो मालूम ही नहीं था कि एड फिल्में क्या होती हैं? जब इंस्टीट्यूट गए थे तो टेलीविजन भी नहीं था आज जैसा।। ये था कि फिल्में करनी है तो सौ प्र्रतिशत फिल्में ही बनानी हैं। पर सही दरवाजा नहीं मिल रहा था। न ठीक किस्म के लोग मिल रहे थे। लोगों से मिलना-जुलना बहुत मुश्किल होता था। फीचर फिल्म में मेरा एक्सपोजर इतना इच्छा नहीं रहा था। फिर विनोद के साथ जब मिलना शुरू हुआ तो कुछ मजा आया। लगा कि यार यह आदमी लगन वाला है। इनके साथ काम करने का मजा है। कुछ आदमी पैसे के लिए सब कुछ करते हैं। और कुछ मजे के लिए काम करते हैं। मुझे याद है, हम इंस्टीट्यूट में जो फिल्में बनाते थे, उसमें कोई कमर्शियल दृष्टिïकोण नहीं होता था। फिर भी जितना मजा वह फिल्म बनाने में आता था। बाहर किसी एड फिल्म में नहीं आया। क्योंकि आप यहां किसी के लिए बना रहे हो। यह सोचकर कि उसको ये प्रोडक्ट बेचना है तो उस हिसाब से पैकेज करना है। इंस्टीट्यूट में सारे लोग मिलकर पैसेनेटली, सारे स्टूडेंट अपनी एक्सरसाइज करते थे। इसको ऐसा बनाएंगे। एक्सपलोर करेंगे, ये करेंगे, वो करेंगे। फिल्म बनती थी स्क्रीन होती थी। देखते थे। वास्तव में कई बार ऐसा लगता था कि रीढ़ की हड्डी सीधी है। चलते थे हम तो चाल में फर्क आ जाता था। मजा आता था। वह मजा मुझे वापस 'मुन्नाभाई' में मिला। मैंने और कुछ नहीं सोचा, इसलिए फिल्म बनाई कि मजा आ रहा है बनाने में।

- 'मिशन कश्मीर' के बाद कैसे बात बनी। विनोद ने सुझाव दिया या आपने उनसं आग्रह किया?
0 विनोद ने कभी किसी और के लिए फिल्म प्रोड्यूस नहीं की थी। वे खुद के लिए फिल्में बनाते थे। मुझे उनकी फिल्म एडिट करने में बहुत मजा आया। पहले भी एडिट कर चुका था, पर इतना मजा नहीं आया था जितना मजा इनके साथ काम करने में आया। तो उसके बाद मैं वापस गया तो सोचा कि अब अगर मैं फिल्म नहीं बनाऊंगा तो शायद कभी नहीं बना पाऊंगा। पहले होता यह था कि एड फिल्में करते थे। एक हफ्ते का गैप मिलता फिर सोचते थे कि चलो स्क्रिप्ट लिखेंगे। फिर एक हफ्ता लिखते थे। फि र एड फिल्म आ जाती थी। तीन महीने तक फिर कुछ नहीं करते थे फिर एक हफ्ते करते थे। ऐसे में सालों साल निकल गए। स्क्रिप्ट पूरी ही नहीं होती थी। अगर होती भी थी तो पसंद नहीं आती थी।

- तब तक शादी हो गई थी, बच्चे वगैरह हो गए थे?
0 हां, शादी हो गई थी। बच्चे भी हो गए थे। मेरी पत्नी काम करती हैं। आर्थिक परेशानी नहीं थी।

- आपकी पत्नी किस जॉब में थीं?
0 मेरी पत्नी इंडियन एअरलाइनस में है। तकलीफ नहीं थी। मैंने काफी काम किया था तो पैसे भी बचाए थे। मैं साच कर देखा कि अगर मैं एक साल काम न करूं तो भी सरवाइव कर सकता हूं। फिर मैंने कहा कि छह महीने ट्राई करता हूं। नहीं होगा तो फिर वापस करेंगे। ऐसा नहीं था कि काम नहीं मिलेगा। तो मैंने छह महीना सब कुछ बंद कर दिया। ऑफिस में फैक्स मशीन से स्क्रिप्ट आती थी। मैं देखता भी नहीं था। ऑफिस सब लोग डर गए थे। स्टॉफ लोग बोलते थे कि पागल हो गया है। छह महीने के बाद मुझे लगने लगा कि स्क्रिप्ट ठीक है तो मैं विनोद से मिला उस समय। यह सोचकर नहीं कि वे फिल्म प्रोड्यूस करेंगे। यह सोचकर कि मिलने गया कि आप कुछ एक्टरों से मिला दीजिए मुझे। और मैं चाहता हूं कि कोई एक्टर मान जाए तो फिर कोई फाइनेंस भी कर देगा। मेरा अपना प्रोड्क्शन हाऊस था। मैंने सोचा कोई फाइनेंसर मिल जाएगा तो मैं बना सकता हूं। बनाने का तो एक्सपीरियेंस था। उन्होंने कहा किस से मिलना है। उन्होंने कहा कि ऐसे कैसे तुम्हें किसी से मिलवाऊं। पता नहीं तुम क्या बनाना चाहते हो। फिर मैंने उन्हें स्क्रिप्ट सुनाई। उनको स्क्रिप्ट अच्छी लगी। उन्होंने कुछ सुझाव दिए। ऐसा-ऐसा करो। एक-दो महीने तक हमलोग मिलते रहे।

- पहले से स्टोरी आपके पास थी?
0 मेरे पास एक स्टोरी थी । तीन स्टूडेंट हैं, जो मेडिकल कॉलेज में हैं। उनकी एक स्टोरी थी मेरे पास में। मेरे बहुत दोस्त हैं। नागपुर में 12वीं के बाद आदमी या तो मेडिसीन करता था या इंजीनियरिंग करता था। मैं इंजीनियरिंग करना चाहता था। मेरे बहुत सारे लोग दोस्त जो 12वीं के बाद मेडिकल करना चाहते थे। मैं तो घुस नहीं पाया इंजीनियरिंग में। मेरे बहुत सारे दोस्तों इंजीनियरिंग में चले गए थे। बहुत सारे दोस्तों को मेडिकल में एडमिशन मिल गई थी। वही दोस्त थे। मैं बी कॉम कर रहा था। सुबह सात से दस कॉलेज होता था,उसके बाद फ्री। तो नाटक करते थे। उसके रिहर्सल चलते रहते थे। हमारे ग्र्रुप में कुछ मेडिकल के लडक़े थे। उन्हें कम समय मिलता था तो हम उनके हॉस्टल में जाकर रिहर्सल करते थे। मैं मेडिकल कॉलेज में बहुत जाता था। जाता था तो बहुत सारी चीजें दिखाई देती थी। और लिखने की आदत थी। एक डायरी साथ में रखते थे। जो थॉट आए लिख दो। वो थॉट इंस्टीट्यूट में भी मेरे साथ रहे। इंस्टीट्यूट से निकलने के बाद एक स्क्रिप्ट बनाई थी। मेडिकल कॉलेज के तीन स्टूडेंट की कहानी थी । उस कहानी में हंसी के प्रसंग बहुत थे। रोचक थे सीन, लेकिन उनको जोडऩे के लिए कोई कहानी नहीं थी। सीन पढ़ो तो मजा आता था मगर जोड़ता नहीं था। इसलिए वह हमेशा पड़ी रहती थी। फिर हमने दूसरी स्क्रिप्ट लिखनी शुरू की वह पूरा किया। 'बाबूजी धीरे चलना' लेकिन उसमें मजा नहीं आ रहा था। वह संभल नहीं रही थी। एक मरीज है जो मर जाता है, बाद में भूत बनकर आता है और वो बताता है। वो बताता है कि क्या-क्या हुआ उसके साथ। मेडिकल सिस्टम पर टिप्पणी थी। वह थोड़ी बेहतर हुई। फिर भी मुझे लगा कि यार यह रीयल नहीं है। फिर एक दिन ये ख्याल में आया कि अगर एक भाई मेडिकल स्कूल में आ जाए । ऐसा लगा कि बहुत मस्ती भी हो सकती है। और उसके जरिए हम टिप्पणी भी कर सकते हैं। 'मिशन कश्मीर' के बाद वह थॉट आया। तब लिखना शुरू किया मैंने। जब मुझे लगा कि यह कहानी बन सकती है तो छह महीने उसे लिखा।

- फिर वह कहानी विनोद को सुनाई़?
0 हां, उनको सुनाई। उनको पसंद आई। कुछ सवाल थे उनके। दो महीने और काम किया। मुझे कु छ समय के लिए लगा कि मुझे बोल रहे हैं, आश्वासन दे रहे हैं, लेकिन मुझे किसी से मिला क्यों नहीं रहे हैं। केवल सलाह देते रहे और मैं करता रहा। फिर एक दिन उन्होंने पूछा कि कौन प्रोड्यूस कर रहा है। मैंने कहा हैं कुछ लोगों से बातें हुई हैं। बात हुई भी थी, लेकिन फायनल नहीं थी। उन्होंने मुझ से कहा कि मैं इसको करता हूं। हां, मैं प्रोड्यूस करता हूं। तो फिर वहां से बात आगे बढ़ी कि किस के साथ काम करनाचाहिए। फिर उन्होंने सलाह दी कि शाहरुख के साथ करो। मैंने सोचा और क्या चाहिए।मन में गुदगुदी उठी कि पहली फिल्म शाहरुख के साथ। उन्होंने शाहरुख को फोन किया मैंने जाकर स्क्रिप्ट सुनाई। वह 'देवदास' की शूटिंग कर रहे थे। मैंने स्क्रिप्ट उन्हें दे दी। मैं सुनाने गया था, लेकिन उन्होंने कहा कि टाइम नहीं है। स्क्रिप्ट छोड़ जाओ, मैं पढ़ लूंगा। मैंने मन में सोचा ये तो पढ़ेगा नहीं। उन्होंने स्क्रिप्ट पढ़ी और दूसरे दिन फोन किया और कहा कि मुझे स्क्रिप्ट अच्छी लगी है,मिलते हैं। फिर एक महीना तक मैं उनसे रोज मिलता रहा। बहस चलती रही । मैंने महसमस किया कि स्क्रिप्ट पसंद आने के बाद वह मुझे परख रहे थे कि ये है कौन? बना पाएगा कि नहीं। फिर एक महीने के बाद उन्होंने हां की। तय हुआ कि हम साथ में काम करेंगे।

- जबकि विधु विनोद चोपड़ा आपके साथ थे?
0 आदमी सोचता है न कि डायरेक्टर कौन है। क्या है? वह सुपरस्टार हैं। क्यों काम करें किसी नए डायरेक्टर के साथ। फिर उनकी गर्दन की तकलीफ सामने आई। वह ऑपरेशन करवाने चले गए। फिर पता लगा कि साल भी लग सकता है। दो साल भी लग सकते हैं। क्योंकि वह काफी फिल्में कर रहा थे उस वक्त। तब संजय दत्त का नाम आया। और मैं बड़ा चौंका था। उस समय लग रहा था कि एक प्रोजेक्ट शाहरुख के साथ हो रहा था और वह रुक गया। अब वही फिल्म संजय के साथ करनी होगी। बाद में लगा कि इससे ज्यादा कोई भी आदमी इस रोल को शूट नहीं कर सकता है। एक तरह से अच्छा ही हुआ।

- इस फिल्म के निर्माण के दौरान कभी ऐसा निराशा नहीं हुई कि पता नहीं फिल्म बन पाएगी कि नहीं बन पाएगी? क्या होगा?
0 नहीं, दो साल लगे। 2000 में 'मिशन कश्मीर' खत्म हुई थी। अक्तूबर से मैंने लिखनी शुरू की थी। 2001 के मध्य में विनोद को सुनार्ई। विनोद के हां कहने के बाद भी दो साल लगे इस इस फिल्म के शुरू होने में। पर मुझे विनोद ने आश्वस्त कर दिया था। इसलिए कांफिडेंस था । विनोद ने कहा था कि यह फिल्म बनेगी जरूर। हम बनाएंगे। थोड़ा टाइम लगेगा। ऐसी निराशा नहीं थी। विश्वास था कि विनोद कह रहे हैं तो फिल्म रजरूर बनेगी। पर चिंता होती थी। आदमी काम नहीं कर रहा था। एड फिल्म बंद कर दी थी तीन साल से। काम नहीं करने का अपना दबाव काम करता है। अगर पैसे की कमी होती थी तो बीच में एक एड फिल्म कर लेता था। मुझे डर कभी नहीं लगा। पहले और दूसरे मुन्नाभाई में भी तीन साल का गैप रहा। मुझे लगता है कि आप पैसे के पीछे लगातार भागते रहेंगे तो फिर आप पैसे ही कमाते रहेंगे। फिर आप स्क्रिप्ट नहीं लिख सकते। आप आराम से लिखो। पैसे तो आ ही जाते हैं, कहीं न कहीं से घूम-फिर कर कहीं-कहीं से।

- अगर प्रभाव की बात पूछूं तो आप किन निर्देशकों के नाम लेंगे? एक तो विधु विनोद चोपड़ा की संगत का असर हो सकता है। बाकी कौन?
0 हिंदी सिनेमा से प्रभावित रहा। हृषिकेश मुखर्जी का सबसे बड़ा प्रभाव है। उनकी बहुत फिल्म मैंने देखी हैं और वे मुझे अच्छी लगती हैं। आज भी वो फिल्में याद है। उस दिन 'आनंद' की बात निकली तो मैंने उसकी कविता सुना दी। मुझे पूरी कविता याद थी आनंद की 'मौत तू एक ... ' मैं भी चौंका था। बचपन में देखी थी वह फिल्म। तो फिल्में याद रह जाती हैं। गुलजार साहब के फिल्मों का काफी प्रभाव रहा है। उनकी सारी फिल्में पसंद हैं मुझे। व्यक्तिगत स्तर पर विनोद से मिलने के बाद कहुत सारी बातें समझ में आईं। उनसे सिनेमासे अधिक जिंदगी जीने का एक अंदाज सीखा है। विनोद बिल्कुल गैरफिल्मी व्यक्ति हैं। साफ दिल और ईमानदार किस्म के आदमी हैं। थोड़ा मिसअंडरस्टुड आदमी, क्योंकि वो बोलते हैं फटाफट बोल देते हैं। मैं उनको बहुत नजदीक से जानता हूं। मैं देखा है कि बहुत साफ हैं। हर स्थिति में वो एक ही चीज लेकर चलते हैं कि मुझे फेअर रहना है। वो बहुत सिद्धांतवादी हैं। मैंने उनसे बहुत सीखा है। कैसे वह अपनी फैमिली को देखते हैं? कैसे अपने काम को हैंडल करते हैं? कैसे अपनी निजी जिंदगी संभालते हैं। विनोद से कमाल का एटीट्यूड सीखा। उसने मुझे थोड़ा सा निडर बनाया। मुझे ऐसा लगता है कि उससे मेरी असुरक्षा खत्म हो गई। ऐसा नहीं था कि पहले कोई असुरक्षा थी, पर काफी फर्क पड़ा है। आदमी को डर रहता है कि काम न करूं तो क्या होगा? थोड़ा बहुत होता था कभी। पर अब बिल्कुल नहीं होता। बड़े निडर किस्म के आदमी हैं वह। लोगों को डर रहता है न कि अब मैं ये नहीं करूंगा तो क्या होगा? ये क्या बोलेगा मेरे बारे में, पैसा कमाना जरूरी है। अब बिल्कुल फर्क नहीं पड़ता है। बहुत ज्यादा इस चीज का असर हुआ है मुझ पर उनका। वैसे ही काम करूं। उनका भी पैशन काम ही है। मैंने देखा है। वह कभी यह सोचकर सिनेमा नहीं बनाते कि ये बनाऊंगा तो ओवरसीज में ज्यादा चलेगा। और ये यहां पर ज्यादा चलेगा। वह जाकर एकलव्य बनाते हैं राजस्थान में... क्योंकि उनको पसंद है।

-हिंदी सिनेमा के इस दौर में आप 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' लेकर आए। उसमें वैसी चमक-दमक नहीं है। क्या कभी सोचा नहीं कि जमाने के साथ चलूं?
0 इसलिए कहता हूं कि इन फिल्ममेकर जैसी हिम्मत होनी चाहिए।मुझे एन चंद्रा साहब मिले थे फिल्म फेस्टिवल में। मैं उनसे पहले कभी नहीं मिला था। वे दौड़ते हुए आए। अभी तक याद है, मैं भूल नहीं सकता। गोवा में 'मुन्नाभाई' के रिलीज होने के कई महीनों के बाद। दौड़ कर आए और मुझसे कहा, 'तुम ने मेरी तरह के सिनेमा में मेरा विश्वास फिर से जगा दिया है। मैंने अपनी जिंदगी ऐसे सिनेमा से शुरू की थी और निडर होकर बनाता था। मुझे लगता था कि दिल से बनाना चाहिए। कहीं बाद में मुझे लगने लगा कि यार थोड़ा ये, थोड़ा वो होना चाहिए। इसमें कमर्शियल होना चाहिए। इसमें ये होना चाहिए। फिर मैं बिखर गया। उन्होंने कहा कि अगर आप यह स्क्रिप्ट मेरे पास लेकर आते तो मैं आपको ऑफिस से भगा देता। बोलता कि बेवकूफ हो गया है। अस्पताल की पिक्चर,मरीज और डॉक्टर, ये कौन देखेगा? क्योंकि कोई भी कमर्शियल एलीमेंट नहीं है इसमें। इसकी सफलता देखने के बाद मुझे लगता है कि जो दिल को अच्छा लगे, वही बनाना चाहिए। मैं तारीफ करूंगा कि उन्होंने अपने मन की बात कही। ऐसी बातों से अपना विश्वास बढ़ता है कि वही बनाना चाहिए जो दिल को अच्छा लगता है। यह सोच कर नहीं बनाएंगे कि दूसरों को क्या अच्छा लगता है। अगर हम ये सोचकर बनाएंगे कि दूसरों को ये अच्छा लगता है तो हमको कैसे पता लगेगा कि दूसरों को क्या अच्छा लगता है। हम वही बना सकते हैं जो हमको पता है और जो हमको अच्छा लगता है। फिर उम्मीद करें कि जो हमको अच्छा लगता है और वह दूसरों को भी अच्छा लगे।

- लेकिन जितना धैर्य था आपके पास था या जिस तरीके से आपने खुद को बचाए रखा। तेरह साल उधर निकल गए और तीन साल इधर... सोलह साल के बाद आप एक फिल्म बना पाए हैं? सोलह सालों तक उस ख्वाब को बचाए रखना कि कोई नई फिल्म करनी है। मैं खासकर इसलिए पूछ रहा हूं कि जो नए डायरेक्टर आते हैं यहां पर,वे बहुत जल्दी निराश होने लगते हैं। उनसे आप क्या कहना चाहेंगे? सभी को दिखता है कि राजकुमार हिरानी की 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' पहली फिल्म थी और उसने कमाल कर दिया । पहली फिल्म के पहले का जो स्ट्रगल है, उसे लोग नहीं जानते?
0 मैं यह बोलता हूं कि कभी लगा ही नहीं कि स्ट्रगल है ये। उसको नाटकीय करना चाहें और आज की सफलता के संदर्भ में हम बोल सकते हैं कि यार हमने ऐसा किया। हम ऐसे रहते थे। एक कमरे में रहते थे और तीन मिलकर रहते थे... ड्रामाटाइज कर सकते हैं, पर मजा आता था। हमलोग रहते थे साथ में दो-दो, तीन-तीन लोग एक कमरे में। श्रीराम राघवन के घर पर रहा, फिर बाद पीजी रहते थे एक गुजराती फैमिली के घर पर। उस समय यह सोचते थे था कि यार एक सिंगल रूम हो जाए जहां पर अकेले रह सकें। क्योंकि फोन पर बात करने में बड़ी दिक्कत होती थी। हॉल में जाकर फोन करना पड़ता था। गुजराती ओल्ड कपल था। वे सुनते रहते थे कि हम क्या बातें करते हैं? हम दोस्तों से खुल कर बात नहीं कर पाते थे। मैं ये कहता था कि यार एक अपना रूम हो जहां अपना फोन हो कम से कम गाली देनी है तो खुलकर दे सकते हैं। ये पीछे बैठे हुए हैं। मगर इंस्टीट्यूट से आने से यह सबसे बड़ा फायदा था कि सपोर्ट सिस्टम था। अन्यथा मेरे लिए तो कोई तरीका ही नहीं था कि मैं डायरेक्ट बंबई आ जाता। क्योंकि कोई था नहीं। इंस्टीट्यूट से क्या होता है कि हर साल बत्तीस लोग पास होते हैं। कुछ साउथ के, कुछ कलकत्ता के होते हैं। बीस-पच्चीस लोग बंबई आते हैं। और यह समझिए कि हर साल बीस-पच्चीस लोग वहां से निकलकर साथ में स्ट्रगल कर रहे हैं। तो पहले छह महीना साल भर ये होता है कि रोज शाम को सारे लोग मिलते हैं। हमलोग पांच-छह लोग रोज शाम को मिलते थे, भाई तेरा क्या हुआ? आज मैं इसको मिला, मेरे को ये काम मिला। फिर दूसरों को भेजते थे। तो अकेलापन नहीं था।

- इंस्टीट्यूट की अपनी बाउंडिंग होती है या... ?
0 कमाल की बाउंडिंग होती है। आदमी एक-दूसरे को हेल्प करता है। और वो नहीं होता तो, अकेला आदमी शायद पागल हो जाता।

- अचानक कोई आए इंस्टीट्यूट से और कहे कि आपके साथ काम करना चाहूंगा तो आप का क्या जवाब होगा?
0 अगर आपके पास उस समय जरूरत होगी, और आपको ठीक लगेगा तो आप उसको काम दोगे। मन में रहता है कि अपना इंस्टीट्यूट का है, अपने यहां का है, हेल्प करना चाहिए। जैसा मुझे नागपुर के लिए वैसा बहुत लगता है। कोई नागपुर से आ जाए, कोई अचानक मिल जाए। नागपुर का छोड़िए कोई बोल दे कि मैं बाजू वर्धा से हूं या अमरावती से हूं तो लगता है कि अरे यार अपने इलाके का है। अरे यार आओ। बातें करने का दिल करता है। इंस्टीट्यूट का मामला अलग होता है। एक तो सबको हिस्ट्री पता होता है कि फलां इस बैच में था। आप कोशिश भी करते हैं उनसे मिलने की। मैं भी निकला जैसे तो मुझे मालूम था। मैं डेविड धवन और केतन मेहता से जाकर मिला। इन लोगों से मिलते हैं। हर बार आदमी काम नहीं दे पाता है। आपके पास होगा तो आप दे पाओगे। लेकिन यह जरूर बताते हैं कि आप इधर चले जाओ, उधर जाओ। उसकी वजह से ही मैं लगातार एडीटिंग करता रहा। दिल में फिल्म बनाने की तमन्ना बैठी थी। और ये तो मैंने देखा है कि आपको साठ साल की उम्र का भी आदमी मिल जाएगा जो फिल्म बनाने निकला है। तो उसको लगता है कि फिल्म बना लूंगा अभी। अगले दो साल में हो जाएगा। भले ही जिंदगी निकली जा रही हो। मुझे नहीं लगगता कि आदमी हार जाता है। वह इसमें रहता ही है। जो निकला है फिल्म बनाने के लिए... शायद बना पाए न बना पाए तो वो बात अलग है। तो मुझे नहीं लगा मुझे सोलह साल लगग गए। शायद वह समय लगना ही था। सोलह साल लगने ही थे, क्योंकि अगर मैं कहूं कि संजय लीला भंसाली के साथ में हमलोग पास आउट हुए थे। संजय भंसाली आए और उन्होंने विनोद के साथ काम करना शुरू कर दिया था। मैं जिन लोगों से मिला उस टाइम, वे अलग थे। अगर लाइक माइंडेड लोग शुरू में मिल जाते तो शायद जल्दी हो जाता। मैं एडवरटाइजिंग में चला गया। उसने मेरे कुछ साल ले लिए। थोड़ा सा सरवाइवल का भी मामला होता है। आदमी चाहता है कि थोड़ा सा कमाए नहीं तो... फिर कौन आदमी कमाने के चक्कर में किधर चला जाए? किसको कब मौका मिले?

- इस बीच कोई सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव भी आप पर रहा?
0 नहीं, मुझे कुछ खास दिलचस्पी नहीं थी। न कोई प्रभाव रहा और ना ही कोई रुचि रही।

- आपके पिताजी माइग्रेट हुए थे पाकिस्तान से । उनके अंदर कोई कटुता या गुस्सा रहा हो?
0 बिल्कुल नहीं। मुझे लगता है कि राजनीति वक्त की लड़ाई है। विनोद का एक गाना था कि ये अलग चीजों की जंग है, इसमें बिचारा आदमी का क्या करना? बहुत फ्रेंड हैं मेरे, जो अलग कम्युनिटी के हैं और मैं बहुत शिद्दत से मानता हूं कि कोई आदमी बुरा नहीं होता। बस,परिस्थितियां होती हैं, जिनके कारण आदमी अलग ढंग से व्यवहार करता है।

- पहला शॉट का पहला दिन जिस दिन पहला एक्शन बोला था आप ने?
0 पहला शॉट लिया था हमने। रूस्तम वो अपने घर आ रहा है। उसकी टैक्सी है... उसके फादर को यहां पर बंद कर के रखा हुआ है। वो निकल कर आता है, सीढ़ी चढ़ते हुए दौड़ता है अपने फादर के कमरे में। वो पहला शॉट लिया था। उस दिन स्ट्रेस यही था कि ये फिल्म बड़ी जल्द बननी थी। विनोद ने कहा कि इतना बजट है, इतने टाइम में बनाना है। तो मैंने कलकुलेशन किया था कि हमें बीस शॉट हर दिन लेने हैं। और अगर मैं बीस शॉट नहीं ले पाऊंगा तो इस टाइम में पूरा नहीं कर सकता । सबसे बड़ा प्रेशर यही था कि बीस शॉट लेने हैं। दूसरा बड़ा प्रेशर यह था विनोद प्रधान शूट कर रहे थे इस फिल्म को। विनोद प्रधान 'देवदास' शूट कर के इस फिल्म पर आए थे। 'देवदास' में एक दिन में वह एक शॉट लेते थे। मुझ पर सबसे बड़ा प्रेशर यही था कि बीस शॉट मैं करूंगा कैसे? तो मैंने विनोद के ऊपर इतना प्रेशर डाल दिया था, रोज बोल-बोलकर कि विनोद बीस शॉट लेने हैं। ये करना है, ये करना है। तो मैंने कहा कि अगर ये नौ बजे का शॉट है तो अगर मैं दस बजे तक पहला शॉट ले पाऊं तो शायद हो जाए। पहले दिन पौने दस बजे हमलोग ने पहला शॉट शूट कर लिया। मैंने विनोद को फोन किया और कहा मैंने पहला शॉट ले लिया है पौने दस बजे। उसने कहा, 'वेरी गुड लगे रहो' और उस दिन हमने बाइस शॉट लिए थे। मुझे याद है मैंने फूल भेजे विनोद के यहां। मैंने कहा कमाल है। उसके बाद मुझे संजय मिला था। मैंने संयज को बताया कि बीस शॉट ले रहे हैं। तब मुझे संजय कहता है, बीस शॉट? उतना तो हम एक महीने में लेते थे।

- वो कितना बड़ा उत्साह होता है, जब आप डायरेक्टर के कुर्सी पर बैठे होते हैं।?
0 आय डोंट नो... मुझे लगता है कि उस टाइम एक जिम्मेदारी होती है। एक प्रेशर होता है। फस्र्ट फिल्म में तो यह प्रेशर था कि अब अपने जिम्मेदारी है। सबकुछ ठीक होना है। विनोद बिल्कुल शामिल नहीं होते हैं। वे पूरी जिम्मेदारी आपके ऊपर सौंप देते हैं। सब कुछ आपके ऊपर डाल देते हैं। उन्होंने पैसे बैंक में डाल दिए। ये चेक बुक है। आप साइन करवाकर करो। इतने में फिल्म बनानी है आपको। बात खत्म। फिर आप की जिम्मेदारी बन जाती है। अगर डायरेक्टर समझ ले कि पोजिशन ऑफ पावर में हूं, तो वो तो गलत एटीट्यूड होगा।

- पावर ऑफ क्र्रिएशन तो होता होगा?
0 नहीं उस टाइम... बोला जाए तो फटी पड़ी रहती है। कि टाइम पर खत्म नहीं हुआ तो मर जाऊंगा। ये लोकेशन मेरे पास नहीं है। मेरा तो छह-सात किलो वजन कम हो गया था 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' बनाते-बनाते।

- 'मुन्नाभाई...' रिलीज होने के तुरंत या उस दिन या उसके दो-चार दिन में जो हालत हुई या जिस ढंग से हुआ कि ये फिल्म तो गई। रिलीज के दो दिन तक पंद्रह-बीस प्रतिशत का कलेक्शन रहा?
0 रिलीज के दिन मुझे याद है, मैं गया था गेईटी सारे असिस्टेंट आए कि चलो-चलो फिल्म चलते हैं। मैं तो सो गया था उस दिन।

- कोई चिंता नहीं थी?
0 क्या हुआ कि हमलोगों ने बहुत लोगों को फिल्म दिखाई थी। कोई खरीद नहीं रहा था फिल्म। इतने डिस्ट्रीब्यूटर आए, सब देखते थे और बोलते थे ये बंबई के बाहर नहीं चलेगी। बंबई की भाषा ठाणे से आगे नहीं चलेगी। किसी ने नहीं खरीदी। आधी जगह विनोद ने रिलीज की। कई जगह नुकसान में विनोद को रिलीज करनी पड़ी। एक करोड़ अस्सी लाख कका नुकसान था, जिस समय फिल्म रिलीज हुई। किनोद ने कहा कि चलो कमा लेंगे। वीडियो वगैरह है, इसको कवर कर के हो जाएगा। तो उस प्रोसेस में हमने बहुत लोगों को फिल्म दिखाई। डिस्ट्रीब्यूटर खरीदते नहीं थे, लेकिन फ्रेंड देखते और बोलते थे कि यार बड़ी अच्छी पिक्चर है। मेरे को ये खुशी थी कि लोग फिल्म देखेंगे और बोलेंगे यार अच्छी फिल्म बनाई है। मुझे था कि मेरे मां-बाप देखेंगे। मेरी फैमिली देखेगी। मेरे दोस्त देखेंगे और बोलेंगे यार अच्छा काम किया। फिल्म चली या न चली ठीक है,काम तो अच्छा किया। वह संतोष था। रिलीज हुई उसके बाद थके हुए हालत में आकर सो गया घर में जाकर। मैं सोया हुआ था फोन आया दोपहर को। सोए नहीं थे कई महीनों से सो गए उस दिन। एक-डेढ़ बजे एसिस्टैंट का फोन आया। उसने कहा, सर जाकर फिल्म देखनी चाहिए। पब्लिक का रीएक्शन देखना चाहिए। तो हम पांच-छह लोग निकल गए गेईटी थिएटर में। अंदर घुसे... कोई जानता भी नहीं था उस टाइम। अंदर गए । मैंने गेटकीपर से पूछा कि कैसी है फिल्म? उसने अंगूठा उलट दिया। उस टाइम मेरे को लगा कि यार ये क्या हो गया? मै यह उम्मीद नहीं कर रहा था कि हंड्रेड परसेंट कलेक्शन होगा। यह था कि पचास परसेंट होगा । उसने अंगूठा उलटा किया तो मैं डर गया। अंदर गया तो कैरमबोर्ड वाला सीन चल रहा था उस समय। लोग हंस रहे, जम्प कर रहे हैं, एकाध को तो सीट पर उछलते हुए देखा। तालियां बजा रहे हैं। मैंने कहा ये ऐसे-ऐसे क्यों कर रहा है। ये तो साला लोगों को पसंद आ रही है। फिर समझ में आया कि वह बॉक्स ऑफिस की बात कर रहा था। यानी लोग ही नहीं है अंदर। फिर मैंने कहा पूरी फिल्म देखी नहीं तो, ये तो पहला ही शो चल रहा है, ये कैसे बकबास कर रहा है। फिर हम गए दूसरे थिएटर। गीता थिएटर वरली में, फिर मराठा मंदिर। फिर शाम को न्यू अम्पायर पहुंचे। वहां पहुंचते-पहुंचते जिस थिएटर में देखे कमाल का रिएक्शन। बोमन था न्यू अम्पायर के पास में रहता था। उसको बुलाया, बोला आकर देखो। वो आया तो रोने लगा, आंख से आंसू आ गए रिएक्शन देखकर। उसकी भी पहली फिल्म थी। मैंने कहा यार ऐसा होगा नहीं। लोग आने चाहिए। शाम को निकले तो नौ बजे का शो हाउसफुल था। श्याम श्राफ का फोन आया। वह डिस्ट्रीब्यूटर थे हमारे। वो कहते हैं कि मौखिक प्रचार से फिल्म चलती पर इतना फास्ट पिकअप करती है मैंने पहली बार देखा है। बारह बजे जिन लोगों ने फिल्म देखी, दोस्तों को फोन किया नाइट शो से कुछ-कुछ थिएटर में हाउसफुल होना शुरू हो गया।

- जब नेशनल अवार्ड मिल गया तब कैसा रहा?
0 ये आप ही ने बताया मुझे। नेशनल अवार्ड... मैं तब तक दूसरी फिल्म में लग गया था। पॉपूलर अवार्ड शुरू हुए। दिसंबर में रिलीज हुई फिल्म और फट-फट अवार्ड आने शुरू हुए। पहले अवार्ड तक तो लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। स्क्रीन अवार्ड हुए तो उसमें कोई ज्यादा नहीं थे। अभी रिलीज हुई थी तो लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि इसको कहां डालें। मुझे याद है कि प्रेस स्कीनिंग में किसी जर्नलिस्ट ने मुझसे कहा था कि सब देखकर निकले तो लोगों को लग रहा था कि पिक्चर अच्छी है। पर लोग ग्रेड वगैरह ठीक नहीं देना चाह रहे थे। एक-दूसरे से पूछ रहे थे कि क्या बोलें? क्योंकि एक तो संजय दत्त की पिक्चर। नाम 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' तो समझ में नहीं आता कि क्या... भाई की टाइप की फिल्म लगती है। संजय दत्त की लाइन से पंद्रह फिल्में फ्लॉप थीं। मन कह रहा था कि इसको भी ठीक से रेट नहीं दें। बड़ा कन्फ्यूजन सा था। वही बात अवार्ड के साथ भी हुई । बाद में भी फिर तारीफ मिलने लगी फिल्म को। नेशनल अवार्ड... अच्छा ही लगता है सुनकर कि गुड फीलिंग कि पसंद आई लोगों को।

- आखिरी सवाल... 'लगे रहो मुन्नाभाई' में गांधी जी को लाने की बात कहां से आई? आप कितना जरूरी मानते हैं गांधी को?
0 मैं बहुत गहराई से उन्हें मानता हूं।

- वर्धा में उनका आश्रम था। नागपुर के बहुत पास है? बचपन का कोई प्रभाव मानें क्या?
0 मुझ पर ऐसा कोई गहरा प्रभाव नहीं रहा। मैंने गांधी फिल्म देखी थी। वह मुझे बहुत अच्छी लगी थी। हमेशा उनमें कोई बात लगती थी। थोड़ी बहुत उनकी किताबें पढ़ी थीं। पर ऐसा नहीं था कि कोई फिल्म बनाऊंगा कभी, कुछ नहीं। पर एक बात लगती थी। सच में गांधी फिल्म देखने के बाद कि कुछ बात है इस आदमी में... कभी भी डिस्कशन हो जाए तो लोग कहते हैं आज के जमाने गांधी चल नहीं सकते। उस जमाने में चल गए उनके तरीके। मेरे को लगता था कि उन्होंने अलग ढंग से सोचा- हड़ताल उन्होंने सोची, कोई नहीं करता था। उपवास उन्होंने सोचा उस टाइम ... आज नहीं चलेंगे शायद पॉसिबल है। पर उस टाइम वो विचित्र तरीके खोजते थे कुछ। नमक उठाए ... कुछ एक बात थी उनमें, कुछ एक जीवनशैली कहूंगा। 'एमबीबीएस' के बाद मैंने बहुत पढऩा शुरू किया। ऐसे ही। कुछ किताबें मिली। पढ़ता चला गया। तब मुझे लगा कि इनको लेकर कुछ करना चाहिए। गांधी को गाली देना आज फैशन हो गया कि गांधी को कोई भी चीज के लिए दोषी ठहरा दो। दोष मढ़ऩा सबसे आसान काम है, क्योंकि उससे अपनी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। मुझे लगा कि कुछ कहना चाहिए। अगर ऐसे ही गांधी जी को लेकर कुछ कहेंगे तो कोई सुनेगा नहीं। बोलेंगे यार बोर कर रहा है। मैंने कहा मुन्नाभाई के साथ ही कुछ कर सकते हैं। डॉक्टरों को लेकर कुछ कहते हैं तो बोर करते हैं। मुन्नाभाई डॉक्टरों को लेकर कुछ करता है तो रुचि रहेगी। मैंने फिल्म में यही कहने की कोशिश की है कि उनके सिद्धांत आज भी चल सकते हैं। हमें उनमें विश्वास करना चाहिए। इस बात का मैं उपदेश नहीं दे सकता था। मैंने अपनी तरफ से कुछ नहीं कहा है । कहीं ऐसा शब्दों में नहीं कहा है। मुन्नाभाई तरीके से हो रहा है, इंटरटेनिंग वजह से हो रहा है। इमोशनल वजह से हो रहा है। अभी तक मैं खुद संदेह में था कि कैसी प्र्र्रतिक्रिया मिलेगी। कल का रेस्पांस देखकर आया तो लगगा कि हम सफल होंगे। आज रात को बच्चन साहब देख रहे हैं।

- युवा और आकांक्षी डायरेक्टर के लिए क्या संदेश देंगे?
0 संदेश नहीं देना चाहिए। सलाह देना सबसे खतरनाक चीज है। मेरे खयाल में लोग खुद सीखते हैं। हर आदमी अपने-आप धक्के खाते हुए अपनी राह खोज लेता है। आदमी जो करना चाहे तो - गांधी जी की एक पंक्ति है - उद्देश्य खोजो,साधन मिल जाएंगे। क्या करना चाहते हो, खोजो रास्ता अपने आप निकल आएगा। अगर पैशन है तो वह होता है। मेरे साथ हुआ है। हो सकता है कि लोग मुझे भाग्यशाली कहें । फिर भी मैंने जहां तक देखा है, होता है। मैं दूसरे लोगो को भी देखता हूं। तय करो कि आप क्या करना चाहते हो, अगर लगन और चाव है तो अपने-आप रास्ता निकल आता है।