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Thursday, July 31, 2008

झूठ है दोस्ती का दिखावा और दावा

-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म इंडस्ट्री के सितारे हमेशा दोस्ती के दावे करते हैं। सार्वजनिक बातचीत और इंटरव्यू में वे दोस्ती का हवाला देते हैं और घोर विरोधी और प्रतियोगी स्टार की तारीफ भी करते हैं। शायद ही कभी किसी सितारे के मुंह से किसी और सितारे की बुराई निकली हो। यह सब सच दिखने के बावजूद हिंदी फिल्मों की तरह वास्तविक नहीं होता। सब दिखावा है। छल है, मुखौटा है। हाल ही में कैटरीना कैफ के जन्मदिन पार्टी में सलमान खान और शाहरुख खान के बीच हुई तू-तू मैं-मैं राष्ट्रीय खबर बन गई। अलग-अलग कोणों और संबंधित सितारों के दृष्टिकोण से विस्तार में बताया जा रहा है कि उस रात क्या-क्या हुआ? सलमान और शाहरुख के बीच मेल कराने की कोशिश में लगे आमिर खान और संजय दत्त के बारे में भी लिखा जा रहा है। यह भी संकेत दिया जा रहा है कि फिल्म इंडस्ट्री इस मुद्दे को लेकर खेमों में बंट गई है, लोग अपनी-अपनी वफादारी घोषित कर रहे हैं। इस घोषणा की गहराई में जाएं, तो पाएंगे कि सभी अपने स्वार्थ से प्रेरित हैं। कोई मुद्दे की तह में नहीं जाना चाहता! तह में जाने पर खलबली की जानकारी मिलती है। सतह पर सब कुछ स्थिर और शांत नजर आता है। दिखता कुछ भी नहीं, लेकिन अंदर ही अंदर मारकाट चलती रहती है। उसी मारकाट की एक झलक सलमान-शाहरुख की तू-तू मैं-मैं में नजर आई। हम जिन्हें अपना आदर्श, आइकॉन और भगवान समझते हैं, वे सितारे वास्तव में कैसी नीचता को जी रहे हैं! सवाल यह नहीं है कि सलमान ने शाहरुख को उकसाया या शाहरुख ने सलमान को भड़काया! दरअसल, समझने की बात यह है कि दोनों के मन में कोई खलिस थी, जो पार्टी के माहौल में सामने आ गई। कोई भी दूध का धुला नहीं है। न सलमान और न ही शाहरुख..। हमारे इन सितारों की चमक के पीछे कितना कलुष और अंधेरा है!
अमिताभ बच्चन अपने परिवार और अन्य सितारों के साथ अनफॉरगेटेबल टुअॅर पर हैं। वहां से ब्लॉग पर लिख रहे हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में कुछ लोग उनके इस सफल और हिट टुअॅर को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। वे इस कामयाब टुअॅर की गलत तस्वीर पेश कर रहे हैं। अमिताभ बच्चन ने किसी का नाम नहीं लिया है, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में सभी समझ रहे हैं कि उनका इशारा इंडस्ट्री की किस लॉबी की तरफ है! अगर अमिताभ बच्चन का टुअॅर कामयाब होता है, तो उससे किस स्टार के टुअॅर पर असर पड़ेगा। जाहिर-सी बात है कि शक की सूई शाहरुख पर जाकर टिकती है। मजेदार तथ्य यह भी है कि अपने ब्लॉग में अमिताभ बच्चन उन्हें अपना दोस्त और शुभचिंतक भी बताते हैं। इसी प्रकार अक्षय कुमार ने पिछले दिनों अपना गुस्सा जाहिर किया। पर्सनल ट्रेनर के साथ प्रेम की खबरों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कुत्ते शब्द का इस्तेमाल किया और कहा कि इन सभी को सामने आकर लड़ना चाहिए। अक्षय की लगातार सफलता से शीर्ष पर बैठे स्टारों का आसन हिलने लगा है।
दरअसल.., हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में संबंध, दोस्ती और रिश्ते किसी और इंडस्ट्री की तरह ही स्वार्थ और मतलब पर टिके होते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में चढ़ते सूरज को सभी प्रणाम करते हैं। जो कामयाब है, उसी की कद्र है और उसी से डर है। साजिशों का सिलसिला कभी बंद नहीं हुआ। मजे की बात तो यह है कि यहां हर चमकता सितारा अपनी चमक बनाए रखने के लिए बाकी सितारों की छवि धूमिल करने में लगा रहता है। फिल्मों की छीनाझपटी, लॉबिंग और कैंपबाजी कोई नई घटना नहीं है। हां, पहले यह सब इतना कुरूप नहीं था। पहले फिल्म हथियाने और बेहतरीन रोल से तारीफ पाने की फिक्र में सितारे टकरा जरूर जाते थे, आजकल मानदंड बदल गए हैं, क्योंकि अब किसी स्टार को आंकने का पैमाना उसकी कमाई हो गई है। जो सबसे अधिक पैसे वसूल रहा है, वह सबसे बड़ा स्टार है। भले ही उसकी संवाद अदायगी, अभिनय और इस कला से संबंधित अन्य बारीकियों में लाखों खामियां हों! मुनाफे की लालसा में सभी ऐसे स्टारों से चिपके रहते हैं। हो सकता है कि सलमान खान और शाहरुख खान जल्दी ही गलबहियां डाले नजर आएं और एक-दूसरे की दोस्ती का दावा भी करें। दोनों साथ में कोई फिल्म भी करते दिख सकते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में दोस्ती का यह दिखावा और दावा तभी तक का सच है, जब तक किसी और झड़प और तू-तू मैं-मैं की खबर नहीं आती है! यह कभी न भूलें कि जो पर्दे पर अपने अभिनय से आपका दिल जीत सकते हैं, वे जिंदगी में आपको सहज ही भ्रमित भी रख सकते हैं!

Wednesday, July 30, 2008

बॉक्स ऑफिस:०१.०८.२००८

लुढ़कीं दोनों फिल्में
अपूर्व लाखिया की मिशन इस्तांबुल और गणेश आचार्य की मनी है तो हनी है बाक्स आफिस पर लगभग समान गति से लुढ़क गई। दोनों ही फिल्मों को दर्शकों ने नकार दिया। क्या हम मान लें कि लव स्टोरी का ट्रेंड चल रहा है? जाने तू या जाने ना के हिट होने और किस्मत कनेक्शन के अच्छे प्रदर्शन के बाद माना जा सकता है कि सावन के मौसम में दर्शक प्रेम कहानियों में मस्ती ले रहे हैं।
एक्शन फिल्म मिशन इस्तांबुल का रोमांच और कॉमेडी फिल्म मनी है तो हनी है की गुदगुदी उन्हें नहीं बांध सकी। उम्मीद की जा रही थी कि मिशन इस्तांबुल को छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में पर्याप्त दर्शक मिलेंगे। फिल्म देखकर निकले दर्शकों ने दोस्तों और परिचितों से फिल्म देखने की सिफारिश नहीं की।
यही हाल मनी है तो हनी है का रहा। गोविंदा सहित छह कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद दर्शकों को हंसने के ज्यादा अवसर नहीं मिले। केवल मनोज बाजपेयी इस डूबती साधारण फिल्म में तिनके का सहारा बने रहे। फिल्म के निर्माता कुमार मंगत अवश्य परेशान होंगे कि आधा दर्जन फ्लाप फिल्मों के बाद वे कैसी फिल्मों की प्लानिंग करें।
मिशन इस्तांबुल को 30 प्रतिशत की ओपनिंग मिली तो मनी है तो हनी है केवल 20 प्रतिशत दर्शक जुटा सकी। पुरानी फिल्मों में किस्मत कनेक्शन कम बजट की होने के कारण औसत व्यापार कर रही है। उसके साथ रिलीज हुई कांट्रैक्ट को दर्शक भूल चुके हैं। जाने तू या जाने ना चौथे हफ्ते में भी दर्शकों को खींच रही है।

बच्चन परिवार का जोश






अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर 'अविस्मरणीय' यात्रा की झलकियाँ दी हैं.चवन्नी के पाठकों के लिए वहीँ से ये तस्वीरें ली गई हैं.

Monday, July 28, 2008

हिन्दी टाकीज:फिल्में देखना जरूरी काम है-रवि शेखर

रवि शेखर देश के जाने-माने फोटोग्राफर हैं.उनकी तस्वीरें कलात्मक और भावपूर्ण होती हैं.उनकी तस्वीरों की अनेक प्रदर्शनियां हो चुकी हैं.इन दिनों वे चित्रकारों पर फिल्में बनाने के साथ ही योग साधना का भी अभ्यास कर रहे हैं.चित्त से प्रसन्न रवि शेखर के हर काम में एक रवानगी नज़र आती है.उन्होंने हिन्दी टाकीज सीरिज में लिखने का आग्रह सहर्ष स्वीकार किया.चवन्नी का आप सभी से आग्रह है की इस सीरिज को आगे बढायें।


प्रिय चवन्नी,

एसएमएस और ईमेल के इस जमाने में बरसों बाद ये लाइनें सफेद कागज पर लिखने बैठा हूं। संभाल कर रखना। तुमने बनारस के उन दिनों को याद करने की बात की है जब मैं हिंदी सिनेमा के चक्कर में आया था।

और मुझे लगता है था कि मैं सब भूल गया हूं। यादों से बचना कहां मुमकिन हो पाता है - चाहे भले आपके पास समय का अभाव सा हो।

सन् 1974 की गर्मियों के दिन थे। जब दसवीं का इम्तहान दे कर हम खाली हुए थे। तभी से हिंदी सिनेमा का प्रेम बैठ चुका था। राजेश खन्ना का जमाना था। परीक्षा के बीच में उन दिनों फिल्में देखना आम नहीं था। तभी हमने बनारस के 'साजन' सिनेमा हाल में 'आनंद' पहली बार देखी थी और चमत्कृत हुआ था।

हम जिस समाज में रहते हैं उसके चरित्र हमें बनाते हैं। आज मुड़कर देखता हूं - तो दो-तीन ऐसे मित्र हैं जिनके प्रभाव से मैं हिंदी सिनेमा से परिचित हुआ।

सबसे पहली फिल्म हमने अपने बाबूजी के साथ देखी थी -'दो बदन' मनोज कुमार की निशांत सिनेमा में तब मैं चौथी क्लास में पढ़ता था। उसके बाद हर साल परीक्षा के बाद बाबू जी एक फिल्म देखने ले जाते थे। इस सिलसिले में दूसरी फिल्म थी -'अनुपमा'। उस समय 'अनुपमा' मेरे बिल्कुल पल्ले नहीं पड़ी थी। बए एक गीत था -'धीरे -धीरे मचल ऐ दिले बेकरार कोई आता है' फिल्म देखने के बाद गीत से एक दोस्ती सी हो जाती थी। जब रेडियो पर किसी देखी फिल्म का गाना आता था तो आवाज थोड़ी बढ़ा दी जाती थी।

बनारस उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर एक महत्वपूर्ण शहर है। वहां ढेरों सिनेमा हॉल थे -दीपक, कन्हैया, निशात, चित्रा, गणेश टाकीज मुख्य शहर में थे। कन्हैया बिल्कुल गोदौलिया चौराहे के पास और चित्रा चौक में। चित्रा पहली मंजिल पर था। चित्रा सिनेमा सुबह के शो में विदेशी फिल्में दिखाया करता था। जिसे देखने के लिए शहर के पढ़े- लिखे लोग इकट्ठे होते थे। उस वक्त यह पता करना मुश्किल होता था कि कौन सी अंग्रेजी फिल्म अच्छी होगी।

उस समय सिनेमा के दर अपनी जेब पर ज्यादा जोर नहीं डालते थे। दो की पाकेट मनी (जो कि एक रुपये हुआ करती थी) बचा कर एक फिल्म देखी जा सकती थी। एक रुपये नब्बे पैसे में फर्स्ट क्लास में बैठकर अनगिनत फिल्में देखी है मैंने। तभी तो आज कल फिल्मों के एक टिकट के लिए सौ रुपये का नोट निकालना जरा अच्छा नहीं लगता।

उस जमाने में गाने रेडियो पर सुने जाते थे। अमीन सायानी का बिना गीत माला रेडियो का सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम हुआ करता था। अमीन भाई बीच- बीच में फिल्म पत्रकारिता भी किया करते थे। बिनाका गीत माला से मेरा पहला परिचय मेरे जीजा जी ध्रुवदेव मिश्र ने कराया था। वे मेरे जीवन में आने वाले पहले रसिक व्यक्ति थे - जिनको जीवन में आनंद लेना मजा लेना आता था।

उनके साथ मैंने राजेश खन्ना की 'हाथी मेरा साथी' देखी थी। तब मुझे लगा था . मैंने जीवन की सबसे अच्छी फिल्म देखी है।

पर सिनेमा का चश्का लगा था मुझे अपने मामा जी से गर्मियों की छुट्टियों में मैं बनारस से निकल जाया करता था- गोरखपुर। गोरखपुर से सटे हल्दिया पिघौरा गांव में मेरे मामा जी रहा करते हैं। तब नाना- नानी भी थे। पिघौरा से गोरखपुर लगभग 13 किलोमीटर है। और सायकिल से रोज हमलोग शहर जाया करते थे। शहर में छोटे- बड़े कई काम हुआ करते थे - मामा जी के और उसी में समय निकाल कर एक महीने तक हम लोग एक फिल्म भी देखा करते थे। इस तरह पहली बार हमने एक महीने में अठ्ठाइस फिल्म देख डाली थी। यी वीडियो के आने के पहले की बात है। और हमें स्वयं आशचर्य हुआ करता था।

गोरखपुर में सिनेमा रोडर पर ही तीन- चार सिनेमा हॉल थे। बाकी सायकिल हो तो कुछ भी दूर नहीं। मामा जी दिलीप कुमार के फैन थे। और मुझे पहली बार दिलीप कुमार की फिल्मों में रस लेना उन्होंने ही सिखाया था। तब पुरानी फिल्में भी सिनेमाघरों में धड़ल्ले से चला करती थी, वो भी रियायती दरों पर।

बनारस लौटा तो नये कॉलेज में दोस्त बने और फिल्मों का सिलसिला शुरू हो गया। मुझे लगता था कि - फिल्में देखना एक जरूरी काम है ताकि फिल्मों की जानकारी होनी चाहिए। यह सामान्य ज्ञान जैसा था और हम घंटों फिल्मों की चर्चा करते रहते थे।

'आनंद' सिनेमा शहर से थोड़ा दूर था उन दिनों। वहां पर 'रोटी, कपड़ा और मकान' रिलीज हुई थी। जिसका बेहद लोकप्रिय गीत था -'बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी'।

(यह गाना आज भी आकाशवाणी पर बैन है) धीरे-धीरे शहर के बीच पुराने सिनेमाहाल अपने रखरखाव की वजह से घटिया होते होते गये, -कुर्सियां टूट गयीं। उनमें खटमल भी होते थे। जगह-जगह पान के पीक होना तो बनारस की शान थी। पर इससे क्या फर्क पड़ता है। फिल्म देखने के सुख पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता था।

लहुरा बीर पर प्रकाश टॉकीज था। जिसमें 'बॉबी' रिलीज हुई थी। सड़क के उस पार क्वींस कॉलेज था। जहां हम पढ़ाई कर रहे थे। पता चला एक दिन क्वींस कॉलेज के प्रिंसिपल ने वहां धाड़- मार दी और स्कूल यूनिफार्म में सिनेमा देख रहे बच्चों को पकड़ लाए।

उसके बाद ही आयी थी 'शोले' आनंद सिनेमा हाल में। फिल्म हिट होने का क्या मतलब होता है वह किसी छोटे शहर में ही महसूस किया जा सकता है। शहर का शायद ही ऐसा कोई मानव हो जिसने 'शोले' और 'जय संतोषी मां' न देखी हो। दो फिल्में लगभग एक साल तक एक ही हॉल में जमी रही। दोनों फिल्मों की जबरदस्त 'रिपीट बैल्यू' थी। हमने भी 7 या 8 बार 'शोले' हॉल में देखी होगी - कभी किसी के साथ कभी किसी के साथ।

'जय संतोषी मां' देखने मैं नहीं गया।

'साजन' सिनेमा हॉल का जिक्र मैं कर चुका हूं। उसके बाद नदेसर पर 'टकसाल' खुला और लंका पर 'शिवम' 'शिवम' में काशी हिन्दू विशविद्यालय के छात्रों की भीड़ रहा करती थी। नदेसर शहर के दूसरे छोर पर था - वहां फिल्म देखना नहीं हो पाता था।

अस्सी पर एक सिनेमा हाल था 'भारती' वहां अच्छी अंग्रेजी फिल्में चलती थीं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के नजदीक होने के कारण वहां भीड़ भी रहती थी। बीच में ऐसा भी होता था कि 'भारती' में लगने वाली कोई भी फिल्म देखी जा सकती है। वहां खचाखच भरे हॉल में हमने देखी थी। - 'इण्टर द ड्रैगन', 'टॉवरिंग इनफर्नो' तुम्हें याद होगा - वी एच एस टेप का जमाना उसके बाद आया। जनता ने सिनेमा हॉल जाना बंद कर दिया। जगह.जगह कैसेट लायब्रेरी खुल गयी।

मेरे एक मित्र हैं - संजय गुप्ता। उनकी अपनी वीडियो लायब्रेरी थी। हमलोग वीएचएस कैमरे से शादी भी शूट करते थे। तब एक-एक दिन न जाने कितनी फिल्में उसके ड्रॉइंग रूम में देखी होगी।

तब भी हॉल में जाकर फिल्म देखना हमेशा अच्छा लगता था। इस बीच भेलूपूर में दो नए हाल आकर पुराने हो गये थे - गुंजन और विजया।

गुंजन में हमने 'मदर इंडिया' पहली बार देखी थी। मेरे नए नए जवान होने के उस दौर में श्याम बेनेगल की फिल्मों की भी यादें हैं। विश्वास नहीं होता अब 'अंकुर', 'निशांत', 'भूमिका', 'मंथन', 'मंडी' जैसी फिल्मों को एक छोटे शहर में सिनेमा हॉल में देखा जा सकता था। ओर धर्मेन्द्र-हेमामालिनी, रेखा, अमोल पालेकर, संजीव कुमार, राजेन्द्र कुमार, वैजन्ती माला-दिलीप कुमार राज कपूर, देव आनंद जैसे नाम आप के जीवन पर किस कदर प्रभावित करते थे।

हिंदी सिनेमा और हिंदी गीतों का प्रेमी प्रेम सीखता है - सितारों से। रफी, किशोर, लता, आशा, गुलजार, मजरूह, आ डी, साहिर, मदन मोहन से।

मुझे पक्का भरोसा है आज भी अपने देश के सूदूर कोनों में लोग जवान हो रहे होंगे। वैसा ही प्रभाव होगा। वैसी ही सनक होगी। बस सितारों के नाम अलग होंगे - शाहरुख, सलमान, संजय दत्त, रानी, करीना, दीया, कंगना, आमिर ... इत्यादि।

तुम्हारा
रवि

Saturday, July 26, 2008

ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से-महेश भट्ट

संबंधों में मिले विश्वासघात का जख्म बडा गहरा होता है और वह शायद कभी नहीं भरता। अपनी आत्मकथा पर आधारित फिल्म वो लमहे के दौरान अपने अस्तव्यस्त अतीत के भंवर में फिर से डूबने-उतराने और टाइम मैगजीन के कवर पर छपी परवीन बॉबी के साथ अपने खत्म हो चुके संबंधों को याद करते हुए मैंने उन जख्मों को फिर से एक बार देखा।
खतरनाक तरीके से जीने के उन दिनों में हम लोग जोनाथन लिविंग स्टोन सीगल को पढते थे, जॉन लेनन को सुनते थे और मुक्त प्रेम की बातें करते थे। मैं परवीन बॉबी के साथ रहता था और रजनीश का शिष्य भी था, उनके संप्रदाय का संन्यासी।
स्वच्छंद प्रेम में ईष्या के बीज
हम मर्जी से उनके संप्रदाय में शामिल हुए थे। हमें बताया गया था कि स्वच्छंद जीवन जीने से ही प्रबोधन होता है। हम इस भ्रम में जीते थे कि नशे की आड लेकर और उन्मुक्त संबंध निभाकर निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है, समाधि की स्थिति प्राप्त की जा सकती है। हर बंधन से मुक्ति मिल जाती है। ऐसी ही कई बातें हम सोचा करते थे..। एक शाम मैं साधना में लीन था, तभी एक ब्लैंक कॉल आया। दूसरी तरफ की चुप्पी ने सब कुछ कह दिया। मैं समझ गया कि फोन पर वही मशहूर फिल्म स्टार है, जिसने हाल ही में परवीन के प्रति अपना प्रेम जाहिर किया था।
मेरे पूरे तन-बदन में आग लग गई, ऐसा लगा कि मैंने नंगा तार छू लिया हो। मैं उस आध्यात्मिक व्यामोह से झटके में बाहर निकल आया, जिसे बडी मुश्किल से रगों में उतार रहा था, मैं ईष्या से कांपने लगा और मुझे अच्छी तरह मालूम था कि दूसरे सिरे पर मौजूद व्यक्ति भी वैसा महसूस कर रहा होगा। अचानक क्लिक की आवाज हुई और फोन कट गया। उस एक क्षण में मैंने हरी आंखों के दैत्य का साक्षात्कार किया..। इस एक दैत्य ने महापुरुषों से लेकर साधारण जनों तक को नहीं छोडा, संत और पापी भी इससे नहीं बच सके, सभ्यता की शुरुआत से यह मनुष्य को अपना ग्रास बनाता रहा है, और दरअसल इस दैत्य का नाम है ईष्या।
प्रेम में कोई शर्त नहीं होती
रजनीश से परिचय के बाद पहली बार महसूस कर रहा था कि मैं साधना नहीं कर पा रहा हूं। मैं परवीन और उसके खामोश चाहने वाले, दोनों का गला घोंट देना चाहता था। मैंने अपनी जंगली भावनाओं पर मुश्किल से काबू किया और महसूस किया कि इस लडाई में मेरी जीत नहीं होगी, मैं बेतहाशा गलियों में भटकता रहा।
गली के कुत्ते पहले मुझे देखकर भौंके, फिर उन्हें लगा कि मैं भी उनमें से एक हूं। मेरा आध्यात्मिक तिलिस्म मेरे सामने टूट रहा था और मैं उसे रोकने में लाचार था।
रजनीश ने कहा था, प्रेम बिलाशर्त होता है। लेकिन यह गुरुमंत्र मेरे काम नहीं आ रहा था। सब कुछ बिलकुल स्पष्ट था, मुझे मजबूत सहारे की जरूरत थी। मैं ईष्या की आग में तप रहा था। मुझे एहसास हुआ कि चीजें हमेशा के लिए बदल जाएंगी। निराशा और हताशा की उस घडी में मुझे एक ही रास्ता सूझ रहा था। मैं कुछ करने को उतावला हो रहा था।
पूरी रात भटकने के क्रम में हुआ यह कि करीब सुबह के दो बजे पूरी तरह से नशे में धुत मैं अपने मित्र यू.जी.कृष्णमूर्ति के घर पहुंचा। मैंने घंटी बजाई। वह सामने आए। मैंने छूटते ही उनसे पूछा, क्या मेरे लिए ईष्या से मुक्त होना संभव है? और क्या इसके साथ ही मैं अपनी प्रेमिका-साथी के सान्निध्य में खुश होकर बहस एवं बातें भी कर सकता हूं? मैं उससे अपनी मनोदशा को छिपा सकता हूं? मैं उससे सब कुछ शेयर कर सकता हूं। मैं अपने दिल में चल रही भावनाओं के उफान को संभाल नहीं पा रहा हूं, मैं क्या करूं?
संस्कृति सिखाती है पाखंड
उनका जवाब आज भी मुझे याद है। अपनी प्रेमिका और उस आदमी की हत्या की बात सोचना तुम्हारे लिए बिलकुल स्वाभाविक है। यही स्वस्थ प्रतिक्रिया है। अगर धार्मिक या किसी और कारण से तुम कुछ अलग तरह से सोचते तो गलत होते। फिर तुम बीमार आदमी कहलाते। संस्कृति ने दुर्भाग्य से तुम्हें पाखंडी बना दिया है।
तुम जो महसूस कर रहे हो, वही सच है। अगर कोई तुमसे कहता है कि कोई राह है, जिससे तुम ईष्या से मुक्त हो सकते हो और अपनी स्त्री के सान्निध्य का आनंद उठा सकते हो तो निश्चिय ही वह तुम्हें मूर्ख बना रहा है। ऐसा संभव ही नहीं है। तुम्हें यह गोली निगलनी होगी। बस एक बात समझ लो, अगर ईष्या गई तो संबंधों की इच्छा भी गई। अगर पागल हुए बिना तुम यह सब हासिल कर सकते हो तो मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं।
संन्यासी और ईष्यालु प्रेमी का द्वंद्व
ईष्या से हुई मुलाकात ने मुझे बेनकाब कर दिया था। मेरा असली चेहरा सामने आ गया था। मेरे चेहरे से संन्यासी का नकाब फट गया था। परवीन से मेरा रोलर कोस्टर संबंध चलता रहा, लेकिन रजनीश से मेरा दीवानगी की हद तक गया रोमांस खत्म हो गया था।
महेश, भगवान तुम से बहुत नाराज हैं। मैं फिल्मिस्तान में शूटिंग कर रहा हूं। जल्दी से मिलने आओ, तुम्हें एक संदेश देना है.., मेरे दोस्त विनोद खन्ना का फोन था। मेरी जिंदगी में उनका भारी योगदान है। मुझे रजनीश के प्रवचन याद आए। उन्होंने समझाया था कि प्रेम बिना शर्त होता है, उन्होंने विस्तार से समझाया था कि मनुष्य का किसी चीज से लगाव या ईष्या का भाव कैसे अरुचिकर है।
मुझे एक अस्वीकृत-तिरस्कृत और ईष्यालु प्रेमी के रूप में देखकर ओशो को मुझसे घृणा हुई। वह मेरे तिरस्कार को निगल नहीं पा रहे थे। मैंने महसूस किया कि वह शब्दों के बाजीगर हैं, शब्दों से खेलना उनकी फितरत है। बडे-बडे मुहावरों और पवित्र धारणाओं के साथ दुनिया को आधा सच ही बताते हैं। शायद लोग यही चाहते भी हैं और कोई भी यथार्थ को जानना-समझना नहीं चाहता।
ईष्या से बचना संभव नहीं
मैंने महसूस किया कि आडंबरपूर्ण होने से बेहतर है कि मैं जंगली पशु बना रहूं। मैं इसी नर्क का हिस्सा हूं और इसी नर्क की आग में जिंदा रहूंगा और जलूंगा। काल्पनिक स्वर्ग में जाने के सपने मैं नहीं देखूंगा।
ईष्या को समाप्त करना अपने साए से अलग होना है। हम जब तक सूरज की रोशनी में रहेंगे, तब तक हमारा साया हमारे साथ रहेगा। अपने साए से हमें तभी मुक्ति मिल सकती है, जब खुद से मुक्त हो जाएं। इस प्रकार खुद के नहीं रहने पर ईष्या खत्म हो जाती है। जीते जी इस मनोविकार से बचने की संभावना कम ही है। मृत्यु के साथ ही सारी भावनाएं खत्म होती हैं।
दोस्त-दोस्त न रहा
मानवीय संबंधों में संयुक्त मालिकाना हक नहीं चला करता। यह सिद्धांत बाजार का है, संबंधों का नहीं। लेकिन हिंदी सिनेमा में मेरे दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक कृष्णमूर्ति के विचारों का हमेशा विरोध किया गया।
मैं यहां संगम जैसी फिल्म का उदाहरण देना उचित समझता हूं। इस फिल्म ने हमें अपने स्कूली दिनों में काफी प्रभावित किया था। संगम फिल्म में राजकपूर, राजेंद्र कुमार और वैजयंती माला थे। फिल्म की कहानी दोस्ती में त्याग पर आधारित थी। जब एक दोस्त को मालूम होता है कि वह जिस लडकी को चाहता है, उसी से उसका दोस्त भी मोहब्बत करता है तो फिल्म के क्लाइमेक्स में वह खुद को गोली मार लेता है, ताकि उसके न रहने पर उसके दोस्त को वह लडकी मिल जाए। उन दिनों वह दोस्त हमारा आदर्श हो गया था। उस फिल्म का एक गीत आज भी देश के सामूहिक अचेतन में गूंजता रहता है दोस्त दोस्त ना रहा, प्यार प्यार ना रहा.. राज कपूर ने ईष्या के भाव को इस गीत में पूरी मनोव्यथा से व्यक्त किया था। हिंदी सिनेमा में इस भाव पर ऐसा दूसरा कोई गीत नहीं लिखा जा सका।
लेकिन हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि छठे और सातवें दशक में ज्यादातर हिंदी फिल्मों में ईष्या के भाव को सतही और सीधे तरीके से चित्रित किया गया। इन फिल्मों में हीरोइन को आकर्षित करने के लिए हीरो वैंप के साथ फ्लर्ट करता था, ताकि वह ईष्यालु होकर प्रेम करने लगे। इसी प्रकार हम उन फिल्मों को कैसे भूल सकते हैं, जब विलेन हीरोइन को खो देता था तो हीरो की हत्या की साजिश रचता था। जब मैं फिल्मकार बना तो मैंने अर्थ में ईष्या का नंगा चित्रण किया। उस फिल्म में परित्यक्त पत्नी अपने पति की रखैल पर उतावली होकर आक्रमण करती है, वह भी लोगों के बीच नशे में धुत होकर, उस दृश्य ने देश को दहला दिया था और दर्शकों को ईष्या का सही स्वाद दिया था।
ओंकारा यानी ईष्या का चरम
ईष्या का नंगा चित्रण हाल ही में फिल्म ओंकारा में दिखा। विशाल भारद्वाज ने शेक्सपीयर के नाटक ओथेलो पर आधारित इस फिल्म में अजय देवगन को ईष्यालु किरदार दिया था। ईष्या के वशीभूत ओंकारा न केवल अपनी प्रेमिका की हत्या करता है, बल्कि अपनी जान भी ले लेता है।
भारत में हम लोगों ने ईष्या के भाव को अभी तक फिल्मों में अच्छी तरह चित्रित नहीं किया है, शायद इसी कारण हमारी फिल्मों में जिंदगी की गहराई नहीं होती और हमारी जिंदगी सिनेमा में तो बिल्कुल ही नहीं दिखती। मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने ईष्या के भाव को अलग तरीके से यों लिखा है.. तुम अगर मुझ को न चाहो तो कोई बात नहीं तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी।

फ़िल्म समीक्षा:मिशन इस्तांबुल

-अजय ब्रह्मात्मज
अपूर्व लाखिया ने मिशन इस्तांबुल में टेररिज्म के संदर्भ में एक्शन-थ्रिलर की कल्पना की है। यह फिल्म टेररिज्म पर नहीं है। हिंदी में बनी एक्शन फिल्मों में हम ऐसी चुनौतियों की कहानी देखते रहे हैं। नयापन यही है कि तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में घटनाएं घटती हैं और उसमें भारत से गया टीवी जर्नलिस्ट विकास सागर शामिल है। दूसरी फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी लाजिक वगैरह न खोजें। बस एक्शन के रोमांच का अनुभव करें। विकास सागर देश के तेज-तर्रार और एक लोकप्रिय चैनल के स्टार रिपोर्टर हैं। वह एंकरिंग भी कर लेते हंै। अपने काम में मशगूल रहने के कारण विकास बीवी अंजलि को ज्यादा समय नहीं दे पाते। बीवी भी जर्नलिस्ट है, लेकिन वह इसी वजह से तलाक लेना चाहती है। मालूम नहीं, हमारे फिल्मकार कामकाजी दंपतियों के बीच तालमेल बिठाना कब सीखेंगे? बहरहाल, विकास तुर्की के अल जोहरा चैनल का आफर स्वीकार करता है और इस्तांबुल पहुंच जाता है। वहां उसकी मुलाकात गजनी और अल ओवाइस से होती है। टेररिज्म की गतिविधियों के कवरेज के दौरान उसे अपने चैनल के कार्याकलाप पर शक होता है। उसके शक को रिजवान खान पुख्ता कर देता है। वह उसे सावधान करता है कि अब उसका इस चैनल से निकलना मुश्किल है, क्योंकि चैनल छोड़नेवालों को दुनिया ही छोड़नी पड़ती है। विकास टेररिस्ट सरगना गजनी के भारत संबंधी नापाक इरादों की जानकारी सरकार तक पहुंचाना चाहता है। उसकी मदद में रिजवान खान आता है। उसे टेररिस्टों से इसलिए बदला लेना है कि एक आतंकवादी हमले में उसकी बीवी और बेटी हलाक हो गई थीं। रिजवान और विकास मिल कर आतंकवादियों के सारे मंसूबों पर पानी फेर देते हैं। बताने की जरूरत नहीं कि फिल्म के अंत में विकास की बीवी अंजलि भी उसे मिल जाती है। अपूर्व लाखिया ने सुरेश नायर के साथ मिल कर फिल्म लिखी है। उन्होंने कहीं भी यह दिखाने या बताने की कोशिश नहीं की है कि वे टेररिज्म पर फिल्म बना रहे हैं। फिल्म बड़े ही चुस्त तरीके से आधार रच देती है। ज्यादा प्रसंग और घटनाएं नहीं हैं। नायक और खलनायक को आमने-सामने खड़ा करने के बाद एक्शन आरंभ हो जाता है। एक्शन कहीं हैरतअंगेज है तो कहीं घिसा-पिटा है। एक्शन फिल्मों में आधुनिक हथियारों से लड़ने के बावजूद आखिरी फैसला कुश्ती से ही होता है। यह सिर्फ हिंदी फिल्मों की समस्या नहीं है। हालीवुड में भी यही होता है। फिल्मकार कहते हैं कि कुश्ती के बाद आम दर्शक को जीत का अहसास होता है। उसे लगता है कि हीरो की तरह वह भी दुश्मनों को हरा सकता है। अपूर्व ने फिल्म के एक्शन डायरेक्टर से अच्छा काम लिया है। निकितन धीर और शब्बीर आहलूवालिया निराश नहीं करते। सुनील शेट्टी छोटी सी भूमिका में प्रभाव छोड़ जाते हैं। अभिनेत्रियों में श्र्वेता भारद्वाज से उम्मीद बनती है। श्रिया सरन साधारण हैं। फिल्म के गीत-संगीत में तुर्की का अहसास है। अपूर्व ने फिल्म को छोटा रखा है। अच्छी बात है कि व्यर्थ के विस्तार में न जाकर उन्होंने एक्शन पर ही सारा ध्यान केंद्रित किया है। यहां तक कि पे्रम कहानी में भी वह नहीं उलझे हैं। उनकी यह फिल्म युवा दर्शकों को पसंद आएगी।

Friday, July 25, 2008

हानि हमारे महाभारत की

-अजय ब्रह्मात्मज
चैनल 9 एक्स पर कहानी हमारे महाभारत की आरंभ हुआ है। इस धारावाहिक को हम लेखक, निर्देशक या शोधकर्ता के नाम से नहीं पहचान रहे हैं, बल्कि इसे एकता कपूर का धारावाहिक कहा जा रहा है। एकता की प्रोडक्शन कंपनी विभिन्न चैनलों के लिए दर्जन से अधिक धारावाहिकों का निर्माण करती है। यह भी उनमें से ही एक धारावाहिक बन चुका है। इसकी दो हफ्तों की कडि़यां देख चुके दर्शकों को भारी निराशा हुई है। उनका मानना है कि यह कहानी नहीं, बल्कि हानि हमारे महाभारत की है!
दूरदर्शन के दिनों में धारावाहिक उनके निर्देशकों के नाम से जाने जाते थे। उन दिनों निर्देशक ही निर्माता होते थे या यों कहें कि निर्माता-निर्देशक भी होते थे। रामानंद सागर, बी.आर. चोपड़ा, संजय खान और डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के धारावाहिकों की सोच, दिशा और क्वालिटी पर उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा की छाप थी। वे सभी निर्देशक होने के साथ ही विचार-संपन्न व्यक्ति भी थे, जिनकी धारावाहिकों की भूमिका और प्रभाव को लेकर एक सुनिश्चित सोच थी। एकता कपूर महज एक निर्माता हैं। सच तो यह है कि एक मेकर या निर्देशक के रूप में उनकी कोई पहचान नहीं है। उन्हें इस धारावाहिक के लिए समर्थ, योग्य और सक्षम निर्देशक का चुनाव करना चाहिए था। अब भी देर नहीं हुई है। याद करें कि स्टार प्लस ने भी एक महाभारत की उद्घोषणा की थी। उसे बॉबी बेदी का महाभारत कहा गया था। बॉबी भी निर्माता हैं। हालांकि उन्होंने डॉ. द्विवेदी को अपना निर्देशक नियुक्त किया था, लेकिन उन्हें पूरा क्रेडिट देने में वे सकुचा गए। उसकेअटकने में बड़ी बाधा स्वयं बॉबी हैं। क्रिएटिव असहमति के कारण उसे डॉ. द्विवेदी छोड़ चुके हैं। उम्मीद है कहानी हमारे.. से बॉबी सबक लेंगे और पूरी तैयारी के साथ आएंगे। ऐसा लगता है कि एकता और बॉबी के लिए महाभारत का निर्माण पैशन से अधिक पैसों का खेल है। उन्हें प्रसारित करने वाले चैनलों के लिए टीआरपी की गारंटी, जो आखिरकार कमाई में तब्दील हो जाएगी। उन्हें लगता है कि भारतीय मानस में सदियों से पॉपुलर रहे इस एपिक को धारावाहिक का रूप देकर वे करोड़ों की कमाई कर सकते हैं। इस लालसा में दोनों ने कॉन्टेंट से अधिक पैकेजिंग पर ध्यान दिया। उपभोक्ता संस्कृति के इस दौर में सीरियल, टीवी शो, फिल्म और दूसरे एंटरटेंमेंट इवेंट प्रोडक्ट बन गए हैं। उनकी जबर्दस्त मार्केटिंग की जाती है और दर्शकों को लुभाने, बिठाने और फांसने के लिए तिकड़मी जाल बिछाए जाते हैं और इसमें दर्शक फंस भी जाते हैं।
एकता के कहानी.. पहले ही एपिसोड से दर्शकों की धारणा और रुचि से पलट प्रवृत्ति का पालन कर रही है। रजस्वला द्रौपदी को श्रृंगार करते दिखाने की भारी गलती उनसे हो गई है। पहले एपिसोड में सिंदूर गिरने से जो ड्रामा क्रिएट हुआ, वह सास-बहू टाइप के सीरियल के लिए तो उचित है, लेकिन पौराणिक और धार्मिक धारावाहिक में ऐसी छूट लेने की कतई अनुमति नहीं दी जा सकती। मजे की बात तो यह है कि हड़बड़ी में आरंभ किए गए इस धारावाहिक की आरंभिक कडि़यों में महत्वपूर्ण चरित्रों की प्रतिक्रियाओं को दिखाया ही नहीं गया। वजह यह थी कि उन कलाकारों का तब तक चयन ही नहीं हुआ था और जो चुने भी गए, उन कलाकारों के चयन में असावधानी बरती गई है! बालाजी कैंप में मौजूद कलाकारों को जबरन पौराणिक परिधान पहना कर कैमरे के सामने खड़ा कर दिया गया। मानो टमटम में अकेली जुतने वाली घोडि़यों को रथ में जोत दिया गया हो! जाहिर है, रथ खींचने का कौशल अलग और सामूहिक होता है। अधिकांश कलाकारों को हम अन्य भूमिकाओं में देखते रहे हैं और देख भी रहे हैं और इसीलिए दुर्योधन, द्रौपदी, गंगा आदि के चरित्रों के रूप में हम उन्हें स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
महाभारत के चरित्रों की वेशभूषा को कैलेंडर आर्ट से अलग करना उचित है, लेकिन उसे ग्रीक और रोमन शैली में ढाल देना किसी अपराध से कम नहीं है। लहराते वस्त्र पर्दे पर नयनाभिरामी जरूर लग सकते हैं, लेकिन सौंदर्यबोध के स्तर पर वे भारतीय परिवेश का बोध बिल्कुल नहीं कराते। ऐसा लगता है कि पीटर बु्रक की प्रस्तुति से कुछ तत्व लेकर उन्हें आधुनिक रूप दे दिया गया है! सच तो यह है कि यहां भी एक जल्दबाजी दिखाई पड़ती है। इन सबसे अधिक खटकती है भाषा। इन कलाकारों के हिंदी उच्चारण पर ध्यान देने की जरूरत है। वे युद्ध को युध तो न बोलें। द को ध और हैं को है सुनना पड़े, तो धारावाहिक के क्रम बाधित होते हैं। कुछ हफ्तों में दर्शकों की प्रतिक्रियाएं आरंभ हो जाएंगी। इस बात की उम्मीद कम है कि कहानी.. इस स्वरूप में पॉपुलर होगा और अगर किसी प्रकार यह पॉपुलर हो भी गया, तो वह देश के सांस्कृतिक परिवेश के लिए बुरा होगा, क्योंकि हम अपने महाकाव्य के प्रति दूषित और भ्रमित धारणा बना लेंगे।

Wednesday, July 23, 2008

बॉक्स ऑफिस:२५.०७.२००८

औसत व्यापार करेगी किस्मत कनेक्शन

सिनेमाघरो में भीड़ बनी हुई है। यह भीड़ मुख्य रूप से जाने तू या जाने ना के लिए है। आमिर खान ने इस फिल्म में एक नया गाना भी जोड़ दिया है। कहा जा रहा है कि किशोर और युवा दर्शक उस गाने के लिए फिर से जाने तू.... देख रहे हैं। मुंबई और दूसरे शहरों के सिनेमाघरों में जाने तू.... के स्टार्स ने अपनी मौजूदगी से दर्शकों के बीच नई उत्तेजना पैदा कर दी है।

पिछले हफ्ते रिलीज फिल्मों में किस्मत कनेक्शन की ओपनिंग अच्छी रही। शाहिद कपूर-विद्या बालन की इस फिल्म पर दर्शकों की मिश्रित प्रतिक्रिया है। किस्मत कनेक्शन को जाने तू.... की सफलता का फायदा मिला है। सिनेमाघरों में पहुंचे दर्शक इसे भी देख रहे हैं। हालांकि सोमवार से थोड़ी गिरावट आई है, लेकिन माना जा रहा है कि किस्मत कनेक्शन औसत व्यापार कर लेगी। पीवीआर को अपनी तीसरी फिल्म कांट्रैक्ट से जबरदस्त झटका लगा है। आमिर खान प्रोडक्शन के साथ आई उनकी तारे जमीन पर और जाने तू... ने अच्छा बिजनेस किया। तीसरी फिल्म राम गोपाल वर्मा की कांट्रैक्ट दर्शकों को अपनी तरफ नहीं खींच सकी। रामू की अंडरव‌र्ल्ड की फिल्मों की सफलता की संभावना फिलहाल नहीं दिख रही है। इसे समीक्षकों ने भी पसंद नहीं किया। पुरानी फिल्मों में लव स्टोरी 2050 और महबूबा सिनेमाघरों से उतर चुकी हैं।

Tuesday, July 22, 2008

बिग बक बन्नी

चवन्नी को बिग बक बन्नी का यह संक्षिप्त परिचय रवि रतलामी से प्राप्त हुआ।
तीन घंटों की हिन्दी फ़िल्में क्या आपको बोर नहीं करतीं? आम अंग्रेज़ी फ़िल्में भी डेढ़-दो घंटे से कम नहीं होतीं.

आमतौर पर किसी भी फ़िल्म में एक छोटी सी कथा होती है - बुराई पर अच्छाई की जीत. इसे कहने के लिए, इसी बात को बताने के लिए दर्शकों पर लगातार डेढ़ से तीन घंटे अत्याचार करना कितना सही है? कोई फ़िल्म कितना ही अच्छा बन जाए, गीत संगीत, दृश्य और भावप्रण अभिनय से सज जाए, परंतु फ़िल्म की लंबाई दर्शकों को पहलू बदलने को, बीच-बीच में जम्हाई लेने को मजबूर कर ही देती है.

ऐसे में, एक घिसी पिटी कहानी पर बनाई गई एक छोटी सी त्रिआयामी एनीमेशन फिल्म – बिग बक बन्नी देखना कई मामलों में सुकून दायक है.

वैसे यह फिल्म कई मामलों में बेजोड़ भी है. इसे ब्लेंडर नाम के एक मुफ़्त स्रोत अनुप्रयोग की सहायता से तैयार किया गया है. इस फिल्म को क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेंस के तहत जारी किया गया है जिसे हर कोई मुफ़्त में देख सकता है व लोगों में वितरित कर सकता है. यानी आपको इसे देखने के लिए इसे खरीदने की आवश्यकता नहीं.

फ़िल्म का तकनीकी पक्ष तो शानदार है ही, प्रस्तुति, कथ्य में कसावट, दृश्यों की बुनावट सभी कुछ दर्शनीय है. दस मिनट से भी कम समय की इस फ़िल्म को देखकर आप महसूस कर सकते हैं कि बड़ी से बड़ी बात कहने के लिए ढाई तीन घंटे की फ़िल्मों की आवश्यकता ही क्या है?

यू ट्यूब में इस फ़िल्म को यहाँ या फिर यहाँ देखें. इसके बढ़िया क्वालिटी फ़िल्म को डाउनलोड कर देखने के लिए (जिसमें, जाहिर है आपको ज्यादा आनंद आएगा,) यहाँ चटका लगाएं.

इस साल मैं काफी व्यस्त हूं-शाहिद कपूर

-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म जब वी मेट की कामयाबी के बाद शाहिद कपूर चर्चा में आ गए। इन दिनों वे न केवल विद्या बालन और सानिया मिर्जा, बल्कि फिल्म किस्मत कनेक्शन को लेकर भी चर्चा में हैं। प्रस्तुत हैं शाहिद कपूर से हुई बातचीत के अंश..
फिल्म किस्मत कनेक्शन से क्या उम्मीदें हैं?
फिलहाल मैं खुश हूं। मैंने फिल्म देखी है और मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि हम लोगों ने जिस रूप में इस फिल्म के बारे में सोचा था, फिल्म बिल्कुल वैसी ही बनी है। इस खुशी के साथ दर्शकों के रिऐक्शन के बारे में जानने की उत्सुकता है। अंतिम फैसला तो वही करेंगे! यह फिल्म रोमांटिक कॉमेडी है। उम्मीद है, लोग फिल्म को पसंद करेंगे।
अजीज मिर्जा के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
शुरू में थोड़ी उलझन थी। हालांकि मुझे यही लगता था कि मैं 27 साल का हूं और अजीज अंकल साठ से ज्यादा के हैं। हमारा कनेक्शन मालूम नहीं कैसा होगा! लेकिन मैं चकित हुआ कि वे इंडस्ट्री के युवा निर्देशकों से ज्यादा रिलैक्स और यंग हैं। दरअसल, अजीज अंकल ऐक्टर के प्रिय डायरेक्टर हैं।
क्या खासियत है इस फिल्म में?
अजीज अंकल की फिल्मों की यही खूबी है कि वे सच्चाई के आसपास होती हैं। उनके किरदारों से लोग जुड़ाव महसूस करते हैं। उनके हीरो-हीरोइन कभी लार्जर दैन लाइफ नहीं होते! उनका हीरो कभी अच्छाइयों का पुतला नहीं होता। उनके हीरो में इनसान की तरह अच्छी-बुरी बातें रहती हैं। किस्मत कनेक्शन में उनकी पहले की फिल्मों की तरह रोजमर्रा की परेशानियां हैं। उन परेशानियों से किरदार कैसे जूझते हैं, यही इसमें दिखाया गया है। इस फिल्म में मेरा किरदार आम जिंदगी से लिया गया है। उसकी उम्र 26 की हो गई है। वह अभी तक करियर को अपना नहीं सका है!
कितना डिफरेंट है यह किरदार जब वी मेट के हीरो से?
मैं इस बात से बहुत खुश हूं कि इस फिल्म में मेरा किरदार जब वी मेट से बहुत अलग है। वह थोड़ा चुपचाप रहता था। वह अमीर खानदान से था, लेकिन इस फिल्म में मैं लाउड कैरेक्टर निभा रहा हूं। वह स्मार्ट है। वह लोगों से अपनी बात मनवा लेता है। उसके पास खाने-पीने या गाड़ी पेट्रोल भराने के भी पैसे नहीं होते, तो वह अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करता है। अपनी स्मार्टनेस से दूसरों को प्रभावित करता है। यह बिल्कुल आज का किरदार है।
किस्मत कनेक्शन नाम से लगता है कि भाग्यवादी फिल्म होगी?
यह भाग्य और किस्मत की बातें जरूर हैं, लेकिन उन फिल्मों की तरह नहीं है, जो आपको भाग्यवादी बना देती हैं या फिर बोर करती हैं! यह हल्की-फुल्की फिल्म है। इसको लोग चार बार भी देख सकते हैं। फिल्म में किसी प्रकार की नेगॅटिव फीलिंग नहीं है और न ही किसी प्रकार की रिग्रेसिव सोच है। जिंदगी को सीरियस नजरिए से न लेते हुए हल्के अंदाज में कुछ बातें कही गई हैं।
फिल्म में किस्मत की बात आपके प्रेम के संदर्भ में आई है या करियर के संदर्भ में?
इसमें मेरे कैरेक्टर के हर पहलू में मौजूद है किस्मत, क्योंकि किस्मत का कनेक्शन उसके करियर से ही बनता है, लेकिन उसमें रोमांस भी शामिल है। दोनों ही मामलों में किस्मत उसके काम आती है।
कहा जा रहा है कि आपने ज्यादातर निर्माताओं को किस्मत कनेक्शन की रिलीज के लिए रोक रखा है?
इस साल मैं काफी व्यस्त हूं। मुझे फिल्में छोड़नी पड़ी हैं। फिर मैं किसी से क्यों इंतजार करवाऊंगा! मेरी चार फिल्में घोषित हो चुकी हैं। केन घोष की फिल्म आधी बन चुकी है। विशाल भारद्वाज की फिल्म की शूटिंग कर रहा हूं। उसके बाद पापा की फिल्म शुरू होगी और इस बीच यशराज की फिल्म भी शुरू करूंगा। मेरा यह नजरिया नहीं रहता कि किसी फिल्म के नतीजे के लिए इंतजार करूं! मुझे फिल्में अच्छी लगें, तो तीन-चार के लिए हां कह दूंगा। नहीं पसंद आए, तो बैठा रहना पसंद करूंगा। अच्छी चीज तो कहीं से भी आ सकती है।
आप आशुतोष गोवारीकर की फिल्म नहीं कर सके, ऐसे ही कुछ और डायरेक्टर होंगे..?
आशुतोष की फिल्म नहीं कर पाने का मुझे अफसोस है। मैं उनकी फिल्मों का प्रशंसक रहा हूं। उनकी लगान मेरी प्रिय फिल्म है। फिल्ममेकर के रूप में मैं उनकी बेहद इज्जत करता हूं। उन्हें मुंबई के एक खास मौसम में फिल्म शूट करनी थी और उन तारीखों में दो फिल्मों की शूटिंग कर रहा था, इसलिए मन मारकर न कहना पड़ा। यह मेरा नुकसान है।
विद्या बालन की अपनी पहचान है। उनके साथ कैसी निभी?
विद्या बेहद संवेदनशील ऐक्ट्रेस हैं। उन्हें ज्यादातर इंडियन रोल में ही देखा गया है। इस फिल्म में उन्हें अलग रोल मिला है। अपने रोल के लिए वे बिल्कुल सही हैं। व्यक्ति के रूप में वे बहुत अच्छी हैं। मेरी उनके साथ अच्छी निभती है। उनके साथ काम करने में मजा आया। उन्हें लेकर जिस तरीके की बातें की जा रही हैं, वे फिल्म देखने के बाद दूर हो जाएंगी।

Monday, July 21, 2008

वो काग़ज़ की कश्‍ती, वो बारिश का पानी-अविनाश

समझौते,सुविधाओं और संपर्कों की बूंदाबांदी के इस दौर में ज्यादातर लोग भीग रहे हैं.कुछ ही लोग हैं,जिनके पास विचारों का छाता या सोच की बरसाती है.इस बेईमान मौसम में ख़ुद को संभाले रखना भी एक लड़ाई है.अविनाश हमारे बीच सधे क़दमों से बेखौफ आगे बढ़ रहे हैं.चवन्नी ने ऐसा उत्साह विरले व्यक्तियों में देखा है,जो आपकी हर योजना के प्रति सकारात्मक राय रखे और यथासंभव सहयोग और साथ के लिए तैयार रहे.चवन्नी ने सिनेमा को लेकर कुछ अलग किस्म के लेखों के बारे में सोचा और दोस्तों से ज़िक्र किया.सबसे पहला लेख अविनाश ने भेजा.चवन्नी उसे यहाँ प्रकाशित कर रहा है.इच्छा है कि इस सीरिज़ के अंतर्गत हम सिनेमा से निजी संबंधों को समझें और उन अनुभवों को बांटे ,जिनसे हमें सिने संस्कार मिला.चवन्नी का आग्रह होगा कि आप भी अपने अनुभव भेजें.इसे फिलहाल हिन्दी टाकीज नाम दिया जा रहा है।

वो काग़ज़ की कश्‍ती, वो बारिश का पानी

अविनाश

नौजवानी में एक अजीब सी गुन-धुन होती है। आप आवारा हैं और मां-बाप का आप पर बस नहीं, तो आप या तो कुछ नहीं बनना चाहते या सब कुछ बन जाना चाहते हैं। जैसे एक वक्त था, जब मुझे लगता था कि मैं भारतीय सिनेमा का एक ज़रूरी हिस्सा बनूं। ठीक-ठीक ऐसा ही ख़याल नहीं होगा। ख़याल ये होगा कि या तो बड़ा अभिनेता बनूं या बड़ा निर्देशक। मुकेश की मोटी जिल्दवाली किताबें देख कर नाक से गाने वाले दिनों में ये भी ख़याल रहा होगा कि गायक ही बन जाऊं। जो चीज़ें हमें बांधती थीं, वो सब हम होना चाहते हैं।

भारतीय समाज की फूटती हुई कोंपलों के ये ख़याल बताते हैं कि सिनेमा का उस पर कितना गहरा असर है। ये असर रंगों-रोशनियों का है, जो आमतौर पर हमारे समाज से अब भी ग़ायब हैं। गांवों में अगर बिजली गयी है, तो अब भी बहुत कम रहती है। देश के बड़े शहरों के अलावा जो बचे हुए शहर और कस्बे हैं, वहां तो पूरे-पूरे दिन और पूरी-पूरी रात बिजली होती ही नहीं।

वो दिन थे, जब चंदा जुटाया जाता था। हर घर से पांच-पांच रुपये की रक़म बंधती थी। साठ रुपये हो जाते थे, तो ब्लैक एंड व्हाइट टीवी और तीन सिनेमा के कैसेट आते थे। सत्तर रुपये में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी रंगीन हो जाती थी। बैटरी ज़रूरी था। फिर जगमगाते बलखाते सीन के बीच बिना पलक झपके रतजगा होता था। ये रतजगा हममें से कइयों के बचपन का हिस्सा रहा होगा और अब हमारी स्मृतियों की सबसे बारीक, मुलायम परत पर वो रतजगा मौजूद है।

बचपन की फिल्मों के नाम नहीं होते। वे सिर्फ जादू होते हैं। हर नया सिनेमा तब एक वाक़या होता था। उन वाक़यों से हमारी मुठभेड़ हमें पैसे चुराने का साहस देती थी। हम पैसे चुरा कर फिल्में देखते थे और मार खाते थे और फिर फिल्में देखते थे। सिनेमा देखने जैसे नैतिक असमंजस ने कभी हमारे मनोबल को नहीं गिराया। इसके बावजूद नहीं, जब आठवीं की तिमाही परीक्षा में सात विषयों के अंक लाल घेरे में रंग कर सामने रख दिये गये।

उन दिनों, जब हमारी मासूम आंखें परदे को पूरा-पूरा देख भी नहीं पाती होंगी, बाबूजी पांच बहनों और तीन बेटियों के अपने परिवार को गंगाधाम दिखाने ले गये थे। दरभंगा के सोसाइटी सिनेमा हॉल में तब लोकभाषाओं की फिल्में लगती थीं। क्या देख पाये, क्या नहीं, अब याद नहीं। इतना ही याद है कि गांव में उसके बाद जहां कही चार लोगों के बीच मैं फंसता और वे मुझे गाना सुनाने को कहते, तो मैं सुनाता था- मोर भंगिया के मनाय दs हो भोले नाथ, मोर भंगिया के मनाय दs।

गांव में नये पहुना का मान तब तक नहीं होता था, जब तक वे ससुराल के नौनिहालों के साथ बैठकर सिनेमा हॉल में कैम्पाकोला की पार्टी नहीं देते थे। ऐसी टोलियों में जाकर हमने मासूम देखी, सदा सुहागन देखी। नाम याद रखने लायक होश में आने से पहले देखी हुई फिल्मों के नाम ज़ेहन में नहीं हैं। चंद रोशनियों की खुदबुदाहट है, जो अब भी कभी-कभी अवचेतन में चमक उठती है।

हमारी बहनों का हीरो जीतेंद्र था। लिहाजा हम भी जीतेंद्र को अपना हीरो मानते थे। जबकि वे जीतेंद्र के ढलते हुए दिन थे। अमिताभ बच्चन कांग्रेस की राजनीति में उलझे हुए थे। डिस्को डांसर के बाद मिथुन चक्रवर्ती शबाब पर थे और गोविंदा का जलवा अब आने ही वाला था। आप सोचिए, भारतीय सिनेमा के इन चंचल चितेरों ने हमारी किशोर दुनिया को किस कदर बेचैन कर दिया होगा। हम नाचना चाहते थे। चीखना-चिल्लाना चाहते थे। लेकिन घर की धीर-गंभीर दीवारें आंखें तरेर कर देखती थीं। हम सहम कर कोर्स की किताबें ढूंढ़ने लग जाते थे।

लेकिन फिर भी अगला सिनेमा देखने के लिए सेंध मारने की तैयारी में जुट जाते थे।

Sunday, July 20, 2008

मेरी बीवी का जवाब नहीं: अभिषेक बच्चन

-अजय ब्रह्मात्मज
वे भारत ही नहीं, एशिया के सर्वाधिक ग्लैमरस परिवार के युवा सदस्य हैं, लेकिन घर जाने से पहले अभिषेक बच्चन शूटिंग स्पॉट के मेकअप रूम में पैनकेक की परतों के साथ ही अपनी हाई-फाई प्रोफाइल भी उतार आते हैं। ऐश्वर्या राय के साथ उनकी शादी का कार्ड पाना पूरे मुल्क की हसरत थी, तो अब देश इस इंतजार में है कि उनके आंगन में बच्चे की किलकारी कब गूंजेगी? एक लंबी बातचीत में जूनियर बच्चन ने खोला अपनी निजी जिंदगी के कई पन्नों को-
ऐश्वर्या राय में ऐसी क्या खास बात है कि आपने उनसे शादी की?
वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त थीं। वह ऐसी हैं, जिनके साथ मैं अपनी जिंदगी गुजार सकता हूं। वह ऐसी हैं, जो सिर्फ मेरी ही चिंता नहीं करतीं, बल्कि पूरे परिवार का ख्याल रखती हैं। वह जैसी इंसान हैं, उनके बारे में कुछ भी कहना कम होगा। वह अत्यंत दयालु और सुंदर हैं। बचपन से मुझे मां-पिताजी ने यही शिक्षा दी कि जिंदगी का उद्देश्य बेहतर इंसान बनना होना चाहिए। ऐश्वर्या वाकई बेहतर इंसान हैं।
शादी के बाद आपका जीवन कितना बदला है?
फर्क यह आया है कि परिवार में अब एक नया सदस्य आ गया है। शादी के बाद सभी का जीवन बदलता है, जिम्मेदारी बढ़ती है। मैं कोई अलग या खास आदमी नहीं हूं। मेरे जीवन में भी बदलाव आया है।
अगर कोई विवाद हुआ तो किसकी बात मानी जाती है या मानी जाएगी?
आपकी शादी हो गई है न। आप अच्छी तरह जानते हैं कि किसकी बात मानी जाती है। वैसे अभी तक ऐसी स्थिति नहीं आई है। जब आएगी, तब देखेंगे।
ऐश्वर्या कितनी अच्छी पत्नी हैं?
मेरी तो एक ही पत्नी है और वह ऐश्वर्या हैं, इसलिए मैं किसी से उनकी तुलना नहीं कर सकता। जो मैंने सोचा था, वैसी पत्नी मिली।
जया जी के साथ ऐश्वर्या के संबंध के बारे में बताएं?
बहुत ही अच्छा है। मुझसे ज्यादा प्रगाढ़ संबंध हैं मां से, जो बहुत खास है। दोनों एक-दूसरे को स्नेह और आदर देते हैं। साथ में काफी समय बिताते हैं। मेरे मां-पिताजी को लगता है कि परिवार में एक बेटी आ गई है। उनके साथ बहू से ज्यादा बेटी जैसा व्यवहार होता है। श्वेता दीदी तो अब दिल्ली में रहती हैं, यहां परिवार में ऐश्वर्या उनकी कमी पूरी करती हैं।
कोई पुरानी आदत आप को छोड़नी पड़ी?
बिल्कुल नहीं। जैसा था, वैसा ही हूं।
ऐश्वर्या को आपने कितना बदल दिया?
यह आप उनसे पूछिए। मैं कैसे बता सकता हूं?
क्या ऐश्वर्या को खाना पकाना आता है?
जी हां, जिस दिन वह घर में आई, उस दिन रस्म के मुताबिक उन्होंने रसोई में काम किया। वह हलवा बहुत अच्छा बनाती हैं। हलवा मेरे घर में सभी को बहुत पसंद है।
आशंका व्यक्त की जा रही है कि शायद ऐश्वर्या लंबे समय तक फिल्मों में काम न करें?
वो काम कर रही हैं। लगातार फिल्में हैं उनके पास, वो काम करती रहेंगी। मैं चाहूंगा कि ऐश्वर्या काम करती रहें। मैं उनका जबरदस्त फैन हूं। यही चाहूंगा कि वो फिल्में करती रहें, जब तक उनका मन हो। मैंने, मां ने या पिताजी ने उन्हें कभी रोका नहीं है कि अब आप काम नहीं कर सकतीं। लोग भूल जाते हैं कि मेरे मां-पिता दोनों एक्टर हैं। मेरी मां ने शादी के बाद एक्टिंग नहीं छोड़ी, मेरी पैदाइश के समय उन्होंने एक्टिंग छोड़ी। मेरी बहन तब ढाई साल की थी, लेकिन वह काम करती रही थीं। उन्होंने एक्टिंग इसलिए छोड़ी कि उस समय वह सारा ध्यान परिवार में लगाना चाहती थीं। उन्होंने कहा कि अब मैं जीवन के इस दौर का आनंद उठाना चाहती हूं। वह उनकी व्यक्तिगत पसंद थी। उनसे किसी ने एक्टिंग छोड़ने के लिए नहीं कहा था। नौवें दशक के आरंभ में उन्होंने सिलसिला की। फिर हम बड़े हो गए। बोर्डिग स्कूल चले गए। जब हम बड़े हो गए तो उन्होंने फिर से एक्टिंग शुरू की और हजार चौरासी की मां जैसी फिल्म की। उस फिल्म के रोल ने उन्हें प्रेरित किया। मेरे परिवार में किसी ने किसी को कभी मना नहीं किया। मैं उम्मीद करता हूं कि ऐश्वर्या काम करती रहेंगी।
भारत इतना बड़ा देश है। इसमें दो राज्यों और संस्कृतियों के परिवारों में शादी होती है तो खान-पान से लेकर रस्म-ओ-रिवाज तक की कई दिक्कतें आती हैं। आप लोगों के परिवार में ऐसा सांस्कृतिक फर्क तो नहीं होगा?
पारंपरिक रूप से हम यूपी के हैं और वह कर्नाटक की हैं, लेकिन ऐसा कोई फर्क नहीं महसूस हुआ। ऐश्वर्या बहुत ही मिलनसार हैं और जल्दी घुल-मिल जाती हैं।
कितनी कोशिश रहती है कि आप दोनों साथ रहें और दिखें?
हम दोनों पति-पत्नी हैं। हम साथ रहना चाहते हैं। यह सामान्य बात है कि हम बाहर साथ जाएं और साथ दिखें। मौका मिलता है तो हम हमेशा साथ ही आते-जाते हैं। मैं न रहूं तो वह अकेली जाती हैं या वो न रहें तो मैं अकेला जाता हूं। कोशिश यही रहती है कि हम ज्यादा समय तक दूर न रहें।
पिछले साल खबर आई थी कि आप द्वारिका गए थे बच्चे की कामना लेकर, इस बारे में क्या कहेगे?
बिल्कुल गलत, मेरे दादा जी की पुण्यतिथि थी। हम लोग हर साल उनकी पुण्यतिथि के दिन किसी धार्मिक स्थान पर जाते हैं। ईश्वर का आशीर्वाद लेते हैं और उनके लिए प्रार्थना करते हैं।
फिर भी बच्चे की कामना तो होगी ही?
अभी हम लोगों ने इस बारे में नहीं सोचा है। हम युवा दंपति हैं और दोनों ही अपने-अपने काम में काफी व्यस्त हैं। हम दोनों मानते हैं कि जब बच्चे होने होंगे तो हो जाएंगे, आप उसकी प्लानिंग नहीं कर सकते।
एक बार खबर आई थी कि अमिताभ बच्चन ने अभिषेक बच्चन के लिए बेटी की नहीं, बेटे की कामना की। यह घटना समीर जी की पुस्तक के विमोचन के समय की है।
देखिए कि मीडिया कैसे गलत तरीके से कोई बात पेश करता है। मेरे पिताजी समीर जी की पुस्तक के विमोचन समारोह में गए थे। समीर जी ने कहा था कि मेरे पिता ने अमिताभ बच्चन के लिए गीत लिखे, मैं अभिषेक के लिए लिख रहा हूं और मैं चाहूंगा कि मेरा बेटा अभिषेक के बेटे के लिए गीत लिखे। इस संदर्भ में पिता जी ने कहा कि मैं जरूर चाहूंगा कि आपके बेटे मेरे पोते के लिए गीत लिखें। मीडिया ने इस वक्तव्य को गलत तरीके से पेश किया।
अपने पिताजी के बारे में कुछ बताएं?
उनके साथ सेट पर बीता हर दिन नया अनुभव छोड़ जाता है। जितना समय साथ बीते, उतना अच्छा। हर दिन विशेष होता है। वे पिता, इंसान और एक्टर सभी रूपों में द बेस्ट हैं।
अगर मैं पूछूं कि आप ने उनसे क्या सीखा है तो?
सब कुछ। मैंने अपने मा-पिता से ही सीखा है। मैं आज जो भी हूं, उन्हीं की वजह से हूँ। मैंने माँ-पिताजी की फिल्में देखी हैं और उनसे सीखा है। सेट पर वे किस तरह रोल को अप्रोच करते हैं? सेट से बाहर वे कैसे व्यवहार करते हैं? इंसान को कैसा होना चाहिए? इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं डैड।
आपके परिवार के चारों सदस्य अत्यंत व्यस्त हैं। एक परिवार के तौर पर मिलना-जुलना कैसे होता है?
बचपन से माँ का एक नियम रहा है कि अगर सारे लोग मुंबई में हैं तो चौबीस घंटे में एक बार सभी साथ मिलकर खाएंगे। वह चाहे नाश्ता हो या दिन या रात का खाना। आज भी वही नियम लागू होता है। हम लोग ज्यादातर डिनर एक साथ करते हैं।
लेकिन आप लोगों का काम तो अलग-अलग समय पर खत्म होता है?
सभी लोग इंतजार करते हैं। अगर मेरा पैकअप एक बजे रात को हो रहा है और पापा का छह बजे हो गया है तो वे इंतजार करेगे, मेरे लिए या मैं उनके लिए। पूरा परिवार एक साथ ही डिनर करता है।
आपके दादा जी के समय नियम था कि डायनिंग टेबल पर सभी हिंदी में बात करेंगे।
आज भी यही कोशिश रहती है। मां की सलाह रहती है कि डायनिंग टेबल पर कोई भी फिल्मों की बात नहीं करेगा। यह दादा जी के वक्त से चल रहा है। हम लोग अन्य विषयों पर बातें करते हैं। हम लोग हर तरह के विषयों पर बातें करते हैं। कितनी बातें हैं। दुनिया की इतनी घटनाएं हैं। मीडिया की वजह से हमें कितनी तो जानकारियां मिल जाती हैं। किसी ने कोई किताब पढ़ी हो तो उसकी बात होगी। ये सारे नियम-सिद्धांत दादा जी के समय से बने हैं।
आप एक अतिव्यस्त अभिनेता के पुत्र के रूप में बड़े हुए। आपका बचपन कैसा बीता था?
बचपन की अनेक यादें हैं। खासकर संडे की यादों से आज भी मन खुश हो जाता है। पिताजी संडे को छुट्टी लिया करते थे। उस दिन वे शूटिंग नहीं करते थे। हमलोग पूरे हफ्ते संडे का इंतजार करते थे और उसकी प्लानिंग करते थे। कई बार तो उनके साथ फुर्सत के पल बिताना ही महत्वपूर्ण हो जाता था। प्रतीक्षा के गार्डन में हम लोग खूब खेलते थे। संडे के लंच का खास महत्व रहता था। दादा जी-दादी जी, चाचा का परिवार और हमलोग एकत्रित होकर लंच लेते थे। एक कमरे में साथ बैठने की ऊर्जा आज भी महसूस करता हूं। अब लगता है कि कैसे हमारे अंदर भारतीय मूल्य आए। कैसे हम ने संयुक्त परिवार का महत्व समझा। पिताजी कभी-कभी यूं ही ड्राइव पर ले जाते थे। उनके साथ होने का आनंद कभी कम नहीं हुआ। आज भी पिताजी साथ रहते हैं तो मैं बहुत एक्साइटेड रहता हूं।
बचपन में पिताजी की डांट भी तो पड़ती होगी?
उन्होंने कभी किसी बात पर नहीं डांटा या पीटा। हमलोगों को अनुशासन में रखा जाता था, लेकिन कभी कोई चीज थोपी नहीं जाती थी। मां और पिताजी हमेशा सपोर्टिव रहे। हमने जो चाहा, वही किया और हर काम में उन दोनों का निर्देशन और समर्थन मिला। उनकी कोशिश रही कि हमें बेहतरीन चीजें और सुविधाएं दें। वे सब कुछ मुहैया करवा देते थे। यह हम पर निर्भर करता था कि हम उन चीजों और सुविधाओं का क्या उपयोग करते हैं? मां और पिताजी ने हमें खुला माहौल दिया। मैं अब महसूस करता हूं कि कैसे मां और पिताजी ने बगैर किसी प्रत्यक्ष दबाव के हमारे अंदर जिम्मेदारी का एहसास भरा। उन्होंने कभी नहीं कहा कि यह तुम्हें करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए। उन्होंने हमें ऐसी समझदारी दी कि हम स्वयं अपने लिए अच्छा-बुरा तय कर सकें।
मीडिया के रवैए के बारे में क्या कहेंगे?
पापा हमेशा कहते हैं कि यह जिंदगी तुमने चुनी है। यह सब इस जिंदगी का हिस्सा है। अगर पसंद नहीं है तो एक्टर मत बनो। अगर एक्टर बने हो तो यह सब होगा। तुम्हें इसके साथ जीना है और हम इसके साथ जीते हैं। मीडिया इतना बुरा नहीं है।
कहते हैं कि मीडिया आपकी प्रायवेसी में घुसपैठ करता है?
मैं बहुत ही प्रायवेट व्यक्ति हूं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप अपनी प्रायवेसी कैसे संभालते हैं।
क्या आप मुंबई में आसानी से घूम लेते हैं। दर्शक और प्रशंसक घेर लेते होंगे?
मैं हाजी अली में जाकर जूस पीता हूं। वरली सी फेस पर भुट्टा खाता हूं और शिवाजी पार्क में वड़ा-पाव खा लेता हूं। आप अपना खाइए-पीजिए। हां, किसी ने पहचान लिया तो वह पास आता है। वे क्या चाहते हैं, एक ऑटोग्राफ। कभी हाथ मिलाना चाहते हैं या साथ में फोटो खींचते हैं। इसमें क्या जाता है? आप उन्हें खुश कर दें। मैं आज जो कुछ भी हूं, उनकी वजह से ही हूं। उनसे कैसे दूर रह सकता हूं।

Saturday, July 19, 2008

मीलों तक फैली हुई है तनहाई: महेश भट्ट

चवन्नी को अजय ब्रह्मात्मज के सौजन्य से महेश भट्ट के कुछ लेख मिले हैं,इन लेखों में उन्होंने एहसास की बात की है.अपने जीवन और फिल्मों के आधार पर लिखे इन लेखों में महेश भट्ट पूरे संजीदगी और ईमानदारी से ख़ुद को अभिव्यक्त किया है.
अकेलापन, तनहाई..नाम कोई भी हो, लेकिन यह अद्भुत एहसास हमें हमेशा खुद से जोडे रहता है, दुनिया की भीड में एकाकीपन का आनंद ही अलग है। मशहूर कवि रिल्के ने कहा था कि अवसाद और अकेलापन रचनात्मकता को जन्म देता है। यही हमें सृजन की दुनिया में ले जाता है..। जब से मैंने खुद को जाना, तनहाई ही मेरी बहन और भाई है। तनहाई के गर्भ में समाने के बाद ही मैंने जाना कि इंसान के दिल में अकेलेपन का कितना बडा खजाना छिपा है..। इस तनहाई ने ही श्रव्य और दृश्य माध्यम से कहानी सुनाने की मेरी योग्यता को छीला और आकार दिया है।
बस एक पल लगता है गुब्बारे के धागे को हाथ से छूटने में सिर्फ एक पल लगता है। हाथ बढा कर धागा फिर से पकड लिया तो ठीक गुब्बारा फिर से बच्चों का खिलौना बन जाता है, वर्ना एक बार दरवाजे से बाहर निकल गया और उसमें गैस भरी हो तो वह ऊपर ही चढता जाता है। हालांकि जमीन पर छूट गए बच्चे गुब्बारे को पहुंच से बाहर जाते देख रो रहे होते हैं, अनंत आकाश की तरफ बढते गुब्बारे को तो किसी पक्षी की तरह आजादी मिल जाती है, लेकिन गुब्बारा किसी गुलाम की तरह ही उड पाता है, जितनी गैस हो उतना ही। बहुत ऊंचाई पर पहुंचने के बाद वह खिलौना भी तो नहीं रह जाता कौन परवाह करता है कि क्यों गुब्बारा अपना कर्ज उतारता है और फट जाता है उसके अंदर की हवा बाहर की हवा से मिल जाती है अंदर की हवा तो उसे सांस भी नहीं दे पाती।
तनहाई का कीडा
किंडरगार्टन के दिनों में मुझे तनहाई का पहला एहसास हुआ। संयोग से बाई ने मेरे लिए जो गुब्बारा खरीदा था वह मेरे हाथ से छूट गया था और मैं चीखता हुआ उसे आकाश में ऊपर उडते हुए तब तक देखता रहा, जब तक कि वह फट नहीं गया। चमकीले नीले आकाश में लाल गुब्बारे के उस अकेलेपन का बिंब इतना समय बीतने के बाद भी मेरी स्मृतियों में ताजा है।
मेरी मां मुझे अकसर डांटती थी, जाओ, जाकर बच्चों के साथ खेलो, यों अकेले मत बैठे रहो। हर वक्त कुछ सोचते रहते हो। तनहाई का कीडा तुम्हें अंदर से खा जाएगा। मां के दबाव और समझाने के बावजूद मैं बच्चों के झुंड में शामिल नहीं हो पाता था। जब से मैंने खुद को जाना, तब से तनहाई ही मेरी बहन और भाई है। तनहाई के गर्भ में समाने के बाद मैंने जाना कि इंसान के दिल में अकेलेपन का कितना बडा खजाना छिपा है वह कभी खत्म ही नहीं हो सकता। इस तनहाई ने ही श्रव्य और दृश्य माध्यम से कहानी सुनाने की मेरी योग्यता को छीला और आकार दिया है।
कला का आधार है अकेलापन
तनहाई के आधार पर ही सारी कलाएं टिकी हैं। वास्तव में मानव चेतना में अस्तित्वात्मक तनहाई को बडा बोझ समझा जाता रहा है, लेकिन अगर इसका सही उपयोग करें तो वह कीमती उपहार भी है। तनहाई ने ही कवियों, फिल्मकारों और संगीतज्ञों को बेहतरीन रचना और सृजन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ऐसी रचनाएं दीं, जो हमारे दिलोदिमाग पर छा जाती हैं। सुख-दुख के उदात्त क्षणों में, प्रेम-वियोग के भावुक पलों में और तनहाई को जन्म देने वाली ऐसी घडियों में ही इंसान ने मिट्टी, रंग, शब्द और अन्य गतिविधियों से खुद को अभिव्यक्त करना सीखा। हम तनहाई के एहसानमंद हैं अन्यथा हमारे संग्रहालय और कलागृहों का क्या होता? सब खाली पडे रहते। भारतीय सिनेमा में तनहाई का इस्तेमाल मुख्य रूप से एक ही श्रेणी में हुआ है विरह की तनहाई। मैं श्वेत-श्याम फिल्मों के उस दौर को कैसे भूल सकता हूं, जब हीरो-हीरोइन एक-दूसरे से बिछुडने के बाद स्टूडियो के आकाश के नीचे खडे होकर प्रतीक्षा और मिलन की उम्मीद के गीत गाते थे। मेरी एक हिट फिल्म नाम में ज्यादा कमाई की लालसा से विदेश गए संजय दत्त की तनहाई का चित्रण था। चिट्ठी आई है गीत ने दुनिया भर के भारतीयों का दिल छू लिया था। बेहतर िजंदगी की तलाश में घर छोडकर दूर शहरों और देशों में भटक रहे लोगों को इस गीत ने रुला दिया था। औद्योगिक क्रांति के बाद विस्थापन की प्रक्रिया आरंभ हुई और एक अलग किस्म की तनहाई हमारी सामाजिक िजंदगी में घुस आई। शुरू के दौर की श्वेत-श्याम फिल्मों में गांव छोडकर शहर गए पुरुषों की तनहाई का चित्रण मिलता है। उस समय के सारे फिल्मकार (मेरे पिता समेत) कहीं और से मुंबई आए थे। कैसी विडंबना है कि वियोग के बाद ही पता चलता है कि हम किसी को याद करते हैं और कोई हमें याद करता है वियोग की इस खुशी का एहसास ही अलग होता है। इससे प्यार जागता है और हम अपने प्रेमियों एवं परिजनों के प्रति अधिक आसक्त हो जाते हैं।
आंखों में तूफान सा क्यों है
जब मैं किंडरगार्टन में था तो मेरा नौकर एक गीत गुनगुनाता रहता था- मेरे पिया गए रंगून, वहां से किया है टेलीफून, तुम्हारी याद सताती है..। गौर करें तो इस तनहाई ने ही संचार क्रांति को जन्म दिया होगा। अपने प्रियजनों से बात करने की उमंग का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि हम अपना कितना समय फोन और इंटरनेट पर बातचीत में बिताते हैं। हम करते क्या हैं? अपने बारे में उन्हें बताते हैं और उनके बारे में जानने की कोशिश करते हैं।
दूर देश में बैठे प्रियजनों को सुनने, उनके बारे में पढने और जानने में ही हमारा काफी वक्त गुजरता है। हमारे दिल का एक हिस्सा ऐसे ही जज्बातों से भरा रहता है। विरह से प्रेम दोगुना होता है हमारे दिल में प्यार बढता है। लेखकों और कवियों ने अपनी तनहाई के दर्द को गीतों और कहानियों के माध्यम से फिल्मों में डालकर उसे समृद्घ किया। सदियों से चला आ रहा देह व्यापार की जडें भी कहीं न कहीं तनहाई में ही धंसी हैं। मुंबई के बियर बार भी उदाहरण हैं कि आदमी कैसे अपनी तनहाई से भागना चाहता है।
मुजफ्फर अली ने गमन नाम की खूबसूरत फिल्म बनाई थी। उस फिल्म में उन्होंने गांव से शहर आकर टैक्सी ड्राइवर बने एक देहाती आदमी के अकेलेपन को छुआ था। शायर शहरयार ने सपनों की नगरी मुंबई में आए उन सभी संघर्षरत भारतीयों की भावनाओं को स्वर दिया था, जो गांव, घर, खेत छोडकर इस शहर से कुछ पाने की उम्मीद रखते हैं। शहरयार पूछते हैं- सीने में जलन आंखों में तूफान-सा क्यों है? इस शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यों है..? उनके इन सवालों में ही भारत के महानगरों में तनहाई के दर्द का जवाब छिपा है।
तनहाई के फिल्मकार गुरुदत्त
निस्संदेह भारतीय फिल्मकारों में गुरुदत्त ने तनहाई को सबसे अच्छी तरह से समझा और अपनी फिल्मों में व्यक्त किया। प्यासा में एक संघर्षरत कवि का गुस्सा है। वह इस दुनिया से अपनी बात कहना चाहता है। मेरे ख्याल में तनहाई पर बनी बेहतर हिंदी फिल्मों में से एक है प्यासा। कागज के फूल में उन्होंने इस विषय को और गहराई से छुआ। इस फिल्म में गुरुदत्त ने एक फिल्मकार की तनहाई को पकडा, जो फिर से रोशनी की दुनिया में लौटना चाहता है, लेकिन वह खाली सेट पर सुनसान मौत का शिकार होता है। इस फिल्म का शीर्षक ही बहुत कुछ कह देता है। इस फिल्म का एक संदेश यह भी है कि जिंदगी अविजित खेल है। स्कोर बोर्ड पर नंबर बदलते रहते हैं, लेकिन अंत में आपको कुछ नहीं मिलता। गुरुदत्त में यह स्वाभाविक गुण था। हम सभी जानते हैं कि वह कभी-कभी गहन निराशा के शिकार होते थे और इसी नैराश्य में उन्होंने आत्महत्या भी कर ली थी। अपनी फिल्मों में मैंने शहरी जिंदगी में तनहाई के विषय को अलग-अलग पहलुओं से छुआ है। अर्थ में एक गृहिणी का अकेलापन था, जिसका पति उसे छोडकर एक अभिनेत्री से प्रेम करने लगता है। इस फिल्म की एक खासियत थी कि समाज के विभिन्न तबकों से आए इसके सारे किरदार अपनी तनहाइयों से लड रहे थे। कैफी आजमी ने बहुत खूबसूरती के साथ इस भाव को शब्द दिए थे- कोई ये कैसे बताए कि वो तनहा क्यों है
सारांश में एक बुजुर्ग दंपती का गुस्सा था, जिन्हें समकालीन पतनशील और बेलाग दुनिया में अपने अकेले बेटे की मौत के बाद पैदा हुई तनहाई से गुजरना पडता है। जनम में मैंने अपनी अवैधता और पिता के प्रति अव्यक्त गुस्से की तनहाई को व्यक्त किया था। जिस्म ऊपरी तौर पर श्रृंगारिक फिल्म लगती है, लेकिन उसका मूल भाव सईद कादरी के गीत आवारापन, बंजारापन, एक खला है सीने में के जरिए अच्छी तरह सामने आया था। जिस्म का संदेश था कि दैहिक आनंद के नशे में भी तनहाई के साए से मुक्ति नहीं मिल सकती।
धर्मेद्र और तनहाई
हाल ही में मुंबई से दिल्ली की एक उडान में धर्मेद्र मिल गए। हीमैन धर्मेद्र अपनी तनहाई की बातें बताने लगे। जमीन से 35,000 फीट की ऊंचाई पर फिल्म इंडस्ट्री के हैंडसम हीरो की बातें सुनकर दंग रह गया।
उन्होंने कहा, मेरी मां ने मुझे जन्म दिया, लेकिन तनहाई ने मुझे एक्टर बनाया। सफल होने के बाद मैं सफलता के नशे और शराब में डूब गया। उस अराजक जिंदगी ने मुझे आखिरकार अमेरिका के एक नर्सिग होम में अकेले बिस्तर पर गिरा दिया। विदेश की भूमि में अस्पताल के बिस्तर पर अकेला लेटा था तो मुझे रहस्यमय अनुभूति हुई। लगा अस्पताल की खामोशी तोडते हुए कोई मेरे कानों में फुसफुसा रहा है, धर्मेद्र, तुम मुझ से क्यों डर रहे हो? क्या तुम्हें याद नहीं है कि संघर्ष के दिनों में स्टूडियो के बाहर मैंने ही तुम्हारी उंगली थामी थी? मुंबई के फुटपाथ पर मैं ही तो तुम्हारे बगल में सोई थी। सफल होने के बाद तुम मुझे भूल गए आज सारे तुम्हें छोड गए हैं लेकिन देखो मैं आज भी तुम्हारे साथ हूं। मैं तुम्हें कभी छोडकर नहीं जाऊंगी, हमेशा साथ रहूंगी कौन हो तुम? धर्मेंद्र ने पूछा। मैं तनहाई हूं तुम्हारी दूसरी मां। तुम्हारी मां ने तुझे जन्म दिया, लेकिन मैंने तुम्हें स्टार बनाया।
इस तरह मैंने महसूस किया कि मानव सभ्यता और संस्कृति का ब्रह्मसूत्र है तनहाई। अगर आप इसका नाभि-नाल काट दें तो हमारी सारी कलाएं, संस्कृति और मनोरंजन की चीजें भरभरा कर गिर जाएंगी इसलिए तनहाई जिंदाबाद!

फ़िल्म समीक्षा:किस्मत कनेक्शन

लव स्टोरी में सोशल कंसर्न
-अजय ब्रह्मात्मज
हम आप खुश हो सकते हैं कि जाने तू या जाने ना जैसी मनोरंजक फिल्म की रिलीज के एक पखवारे के भीतर ही एक और मनोरंजक फिल्म किस्मत कनेक्शन आई है। हालांकि यह भी लव स्टोरी है, लेकिन इसमें अजीज मिर्जा का टच है। किस्मत कनेक्शन टोरंटो के बैकड्राप में बनी भारतीय इमोशन की प्रेम कहानी है, जिसमें कुछ घटनाएं और स्थितियां नई हैं।
अजीज मिर्जा की खासियत है कि उनकी फिल्में हकीकत के करीब लगती हैं। उनकी फिल्मों में यथार्थ का पुट रहता है। समानता, बराबरी, मानव अधिकार और वंचितों के अधिकार की बातें रहती हैं। लेकिन, यह सब कहानी का मुख्य कंसर्न नहीं होता। इसी फिल्म को लें। प्रतिभाशाली छात्र राज मल्होत्रा पढ़ाई पूरी करने के बाद बेरोजगार है। भविष्य बताने वाली हसीना बानो जान उसे समझाती है कि वह अपना लकी चार्म खोजे और उसे अपने साथ रखे तो उसके सारे काम हो जाएंगे।
राज मल्होत्रा की प्रिया से मीठी भिड़ंत होती रहती है। चंद भिड़ंतों के बाद राज को एहसास होता है कि प्रिया उसकी लकी चार्म है। दोनों में दोस्ती होती है और फिर दोस्ती प्यार में बदल जाती है..। जरा ठहरें, इतना सिंपल अंत नहीं है। इस बीच मनमुटाव, नोकझोंक और छोटे-मोटे हादसे भी होते हैं।
राज और प्रिया की प्रेमकहानी काल्पनिक नहीं है। वे इसी धरती पर रहते हैं। चूंकि इस फिल्म में वे टोरंटो में रहते हैं, इसलिए वहां की सामाजिक मुश्किलों से दो-चार होते हैं। अजीज मिर्जा ने राजू बन गया जेंटलमैन की मूल कहानी में कुछ घटनाएं जोड़-घटा कर किस्मत कनेक्शन बनाई है। कामयाब होने की राज की जिद और कम्युनिटी सेंटर को बचाने की प्रिया की कोशिश में हम रियल किस्म के किरदारों को देख पाते हैं।
फिल्म के सहज दृश्य और संवाद याद रह जाते हैं। शाहिद कपूर और विद्या बालन की जोड़ी बेमेल नहीं लगती। प्रिया थोड़ी मैच्योर और समझदार लड़की है, इसलिए विद्या उस रोल के लिए उपयुक्त हैं। शाहिद इस फिल्म में एक कदम आगे आए हैं। वे समर्थ अभिनेता के तौर पर उभर रहे हैं। फिल्म का गीत-संगीत विषय के अनुकूल है। उन्हें आयटम सौंग की तरह फिल्म की कहानी में चिप्पियों की तरह नहीं जोड़ा गया है।

Friday, July 18, 2008

फ़िल्म समीक्षा:कांट्रेक्ट

फिर असफल रहे रामू
बारीक स्तर पर कांट्रैक्ट के दृश्यों के बीच उभरते भाव और निर्देशक की सोच को जोड़ने की कोशिश करें तो यह फिल्म कथित स्टेट टेरेरिज्म का चित्रण करती है। राम गोपाल वर्मा ने विषय तो रखा है अंडरव‌र्ल्ड और आतंकवाद के बीच गठबंधन का, लेकिन उनकी यह फिल्म एक स्तर पर राजसत्ता की जवाबी रणनीति का संकेत देती है। आतंकवादी संगठन जिस तरह किसी शोषित या पीडि़त को गुमराह कर आतंकी बना देते हैं, लगभग उसी तरह पुलिस और प्रशासन भी अपने गुर्गे तैयार करता है। कांट्रैक्ट देख कर तो ऐसा ही लगता है।
रामू अपनी फिल्मों में मुख्य रूप से चरित्रों से खेलते हैं। अगर रंगीला और सत्या की तरह चरित्र सटीक हो जाएं तो फिल्में सफल हो जाती हैं। चरित्रों के परिवेश, पृष्ठभूमि और परिप्रेक्ष्य में वे गहरे नहीं उतरते। देश की सामाजिक स्थितियों की समझदारी नहीं होने के कारण यह उनकी सीमा बन गई है। कांट्रैक्ट में यह सीमा साफ नजर आती है।
सेना के रिटायर अधिकारी अमन (अद्विक महाजन) को पुलिस अधिकारी अहमद हुसैन आतंकवादियों से निबटने के लिए अंडरव‌र्ल्ड में घुसने के लिए प्रेरित करता है। पहली मुलाकात में ऐसे मिशन में शामिल होने से साफ इंकार कर देने वाला अमन एक आतंकवादी हमले में बीवी और बेटी की मौत के बाद स्वयं ही मिशन में शामिल होता है। हमें लगता है कि उसके इस मिशन से अंडरव‌र्ल्ड और टेरेरिज्म का रिश्ता बेनकाब होगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। निर्देशक राम गोपाल वर्मा और उनके लेखक प्रशांत पांडे यहां विफल रहे। अमन के अमान बनने और सुलतान को खत्म करने की पटकथा में ड्रामा और एक्शन की कमी है।
कांट्रैक्ट में रामू की पिछली फिल्मों के दृश्यों, घटनाओं, स्थितियों, पात्रों और संवादों तक का दोहराव है। सरकार राज में एक संवाद था - फैसले गलत नहीं होते, नतीजे गलत होते हैं। वह इस फिल्म में भी सुनाई पड़ता है। हां, इस फिल्म में सुल्तान की भूमिका में जाकिर हुसैन किरदार को अच्छी तरह निभा गए हैं। नए अभिनेता अद्विक में भी आत्मविश्वास है। साक्षी गुलाटी कुछ दृश्यों में सिर्फ सुंदर दिखती हैं।

मुख्य कलाकार : अद्विक महाजन, साक्षी गुलाटी, जाकिर हुसैन, प्रशांत पुरंदरे आदि।
निर्देशक : राम गोपाल वर्मा
तकनीकी टीम : निर्माता : प्रवीण निश्चल, अजय बिजली, संजीव बिजली, संगीत : अमर मोहिले, बापी-टुटुल, साना, लेखक : प्रशांत पांडे, गीत : प्रशांत पांडे, महबूब

Thursday, July 17, 2008

गुरुदत्त पर एक किताब


-अजय ब्रह्मात्मज
नौ जुलाई को गुरुदत्त का जन्मदिन था। उनकी आकस्मिक मौत हो गई थी 1964 में। हिंदी फिल्मों के इतिहास में गुरुदत्त का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ इसलिए भी लिया जाता है, क्योंकि उनकी फिल्में प्यासा और कागज के फूल की गणना क्लासिक फिल्मों में होती है। वैसे, उनकी अन्य फिल्मों का भी अपना महत्व है। युवा फिल्मकार श्रीराम राघवन उनकी थ्रिलर फिल्मों से बहुत प्रभावित हैं, तो संजय लीला भंसाली को गुरुदत्त का अवसाद पसंद है। माना जाता है कि गानों के पिक्चराइजेशन में गुरुदत्त सिद्धहस्त थे। इतनी सारी खूबियों के धनी गुरुदत्त निजी जिंदगी में एकाकी और दुखी रहे। दरअसल, पत्नी गीता दत्त से उनकी नहीं निभी। वहीदा रहमान के प्रति अपने प्यार को वे कोई परिणति नहीं दे सके। उनके जीवन के इन पहलुओं पर कम लिखा गया है। कायदे से उनकी फिल्मों की विशेषताओं पर भी पर्याप्त चर्चा हिंदी फिल्मों के दर्शकों के बीच नहीं मिलती है। हमने मान लिया है कि वे महान फिल्मकार थे। हमने उनकी मूर्ति बना दी है और लेखों, बयानों और टिप्पणियों में उनका नामोल्लेख कर ही इस फिल्मकार को दर्शकों से जोड़ने की कोशिश की इतिश्री समझ लेते हैं।
इस बार गुरुदत्त के जन्मदिन के अवसर पर पेंग्विन ने उनके ऊपर एक किताब प्रकाशित की है, जिसे लिखा तो सत्या सरन ने है, लेकिन यह मुख्य रूप से अबरार अल्वी के संस्मरणों की एक बानगी है। अबरार अल्वी दस सालों तक गुरुदत्त के सहायक, लेखक और सलाहकार रहे। किताब का नाम है टेन इयर्स विद गुरुदत्त : अबरार अल्वीज जर्नी। सत्या सरन ने अपनी भूमिका में बताया है कि एक इंटरव्यू में अबरार अल्वी ने चुनौती दी थी कि क्या कोई उनकी बातों को लिखने या छापने के लिए तैयार है, क्योंकि उनके पास गुरुदत्त के बारे में बताने के लिए बहुत कुछ है। सत्या सरन ने उनकी यह चुनौती स्वीकार की और फिर इस किताब ने आकार लिया। पूरी किताब पढ़ने के बाद चंद घटनाओं और प्रसंगों की अंदरूनी व्याख्या के अलावा, ऐसी कोई जानकारी नहीं मिलती, जो गुरुदत्त के सृजनात्मक व्यक्तित्व पर प्रकाश डाल सके। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि अपने संस्मरणों के जरिए अबरार अल्वी ने ज्यादातर खुद के बारे में ही बताया है। वे यह भी संकेत देते हैं कि आर पार से लेकर बहारें फिर भी आएंगी तक के लेखन में वे सहयोग देते रहे, लेकिन उन्हें समुचित क्रेडिट नहीं मिला। वे इस बात पर नाराज हैं कि उन्हें साहब बीबी और गुलाम का निर्देशक भी नहीं माना जाता। आम धारणा है कि गुरुदत्त ने इस फिल्म में अपना नाम नहीं दिया था। एक छोटा-सा सवाल उठता है कि अबरार अल्वी अगर इतने प्रतिभाशाली और समझदार लेखक हैं, तो गुरुदत्त के निधन के बाद उनकी प्रतिभा की सरिता कैसे सूख गई? वे अब तक कोई उल्लेखनीय फिल्म क्यों नहीं कर सके? स्थापित प्रतिभाओं और प्रतिमाओं के सम्मान को ग्रहण लगाने और क्षतिग्रस्त करने का काम उनके सहयोगी करते रहते हैं या फिर यह कोशिश रहती है कि उक्त सम्मान का कुछ अंश उन्हें भी मिल जाए! अबरार अल्वी इस कोशिश में असफल रहते हैं। वे अपने सहयोग और योगदान के जिन प्रसंगों का उल्लेख करते हैं, वे अमूमन हर फिल्म के कुछ दृश्य, संवाद या कुछ और प्रसंग हैं। यानी उनसे पूरी फिल्म नहीं बनती! गुरुदत्त के निधन केचौवालीस साल बाद क्रेडिट न मिलने का जिक्र कर मालूम नहीं अबरार क्या साबित करना चाहते हैं?
किताब को पढ़ते समय उम्मीद थी कि गुरुदत्त, गीता दत्त और वहीदा रहमान के रिश्तों के संदर्भ में कोई नई जानकारी मिलेगी, गुरुदत्त की मानसिक स्थिति और द्वंद्व को हम उनके सहयोगी के संस्मरणों के जरिए समझ सकेंगे, किंतु अफसोस की बात यह है कि अबरार अल्वी न तो गुरुदत्त के अवसाद और भावनात्मक संघर्ष को उजागर करते हैं और न घटनाओं या स्थितियों का विस्तृत ब्यौरा ही देते हैं! उनके संस्मरण सपाट हैं, जिनमें आत्मश्लाघा के अहंकारी अंश हैं। हो सकता है कि सत्या सरन संस्मरणों को संकलित और संगठित नहीं कर सकी हों, लेकिन उन्होंने किताब की एकरेखीय और क्रमिक रूपरेखा उनके संस्मरणों के आधार पर ही तय की होगी। किताब से गुरुदत्त के जीवन के दस महत्वपूर्ण सालों की ऐसी झलक नहीं मिलती है, जो फिल्मकार या व्यक्ति गुरुदत्त से जुड़े रहस्य को कम कर सके!

बॉक्स ऑफिस:२५.०७.२००८

बाक्स आफिस पर थोड़ी हलचल दिखी
पिछले हफ्ते रिलीज हुई महबूबा और खेला को दर्शक नहीं मिले। महबूबा आठ साल बासी फिल्म थी। इस फिल्म के हीरो संजय दत्त और अजय देवगन का लुक भी बदल चुका है। मनीषा कोइराला तो अब पेरिस में घर बसाने का सोच रही हैं। पुराने लुक के स्टार आज के दर्शकों को बिल्कुल पसंद नहीं आए। अफजल खान की महबूबा दर्शकों को नहीं रिझा सकी।
रितुपर्णो घोष की बांग्ला फिल्म खेला हिंदी में डब की गई थी। स्त्री-पुरुष संबंध की ऐसी संवदेनशील फिल्मों के सीमित दर्शक होते हैं। खेला से उम्मीद भी नहीं थी कि उसके लिए दर्शकों की भीड़ उमड़ेगी।
पहले की फिल्मों में लव स्टोरी 2050 के दर्शक नहीं बढ़े। फिल्म के प्रति समीक्षकों और आम दर्शकों की प्रतिक्रिया लगभग एक सी होने के कारण इस फिल्म का आरंभिक उफान पहले ही हफ्ते में उतर गया। हैरी बावेजा इस महत्वाकांक्षी फिल्म में असफल रहे। दूसरी तरफ जाने तू या जाने ना तेजी से बड़ी हिट होने की तरफ बढ़ रही है। माना जा रहा है कि वह इस साल की अभी तक सबसे बड़ी हिट हो जाएगी। महानगरों, प्रादेशिक राजधनियों, शहरों और छोटे शहरों तक में इस फिल्म को दर्शक मिल रहे हैं। लंबे समय बाद बाक्स आफिस पर थोड़ी हलचल दिखाई पड़ रही है और कुछ सिनेमाघरों से टिकटों के ब्लैक में बिकने की खबरें आ रही है। आमिर खान इस फिल्म में एक नया गाना जोड़ने की सोच रहे हैं। उन्होंने इस संबंध में दर्शकों की राय मांगी है।

Wednesday, July 16, 2008

५२ प्रतिशत ने 'कहानी हमारे महाभारत की' को बहुत बुरा माना

अभी पिछले दिनों एकता कपूर के महाभारत का प्रसारण आरम्भ हुआ है.फिलहाल इस पर कोई टिप्पणी नहीं करते हुए चवन्नी उस सर्वेक्षण के नतीजे यहाँ दे रहा है,जो इसी पृष्ठ पर देखे जा सकते हैं। चवन्नी ने पाँच विकल्प दिए थे। बहुत अच्छा है,अच्छा है ,बुरा है ,बहुत बुरा है और ठीक है। आश्चर्य है की किसी ने भी इसे अच्छ है नही माना। बहुत अच्छा मानने वाले २६ पतिशत रहे तो बहुत बुरा मानने वालों का प्रतशत उनसे दोगुना ५२ प्रतिशत रहा। ठीक है और बुरा है मानने वालों का प्रतिशत बराबर रहा.दोनों ही विकल्पों में १०-१० प्रतिशत मत पड़े।
अब आप की बारी है.आप बताएं कि यह धारावाहिक आप को कैसा लगा?

Saturday, July 12, 2008

फ़िल्म समीक्षा:खेला

तनाव का पाजिटिव अंत
-अजय ब्रह्मात्मज
रितुपर्णो घोष की खेला संवेदना और विषय के आधार पर हिंदी साहित्य में नई कहानी के दौर की याद दिलाती है। स्त्री-पुरुष संबंधों में निहित द्वंद्व और पार्थक्य को देश के साहित्यकारों और फिल्मकारों ने अलग-अलग नजरिए से चित्रित किया है। रितुपर्णो घोष स्त्री-पुरुष संबंध के तनाव को इस फिल्म में नया अंत देते हैं।
खेला राजा और शीला की कहानी है। राजा फिल्ममेकर है। वह अपनी फिल्म के लिए किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहता। राजा फिल्म बनाने के सपने में इस कदर लिप्त और व्यस्त रहता है कि वह शीला के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाता। शीला की सोच गृहिणी की है। वह राजा को गृहस्थी की चिंताओं में भी देखना चाहती है। स्थिति यह आती है कि दोनों अलग हो जाते हैं। राजा अपनी फिल्म में डूब जाता है। उधर शीला अपने एकाकीपन से त्रस्त होकर राजा के पास अलगाव के कागजात भिजवा देती है। रितुपर्णो घोष ने ऐसे विषयों पर 15-20 साल पहले बन रही फिल्मों की तरह कथित नारीवाद का नारा नहीं लगाया है और न पुरुष को उसके सपनों के लिए दुत्कारा है। फिल्म के अंत में राजा और शीला एक साथ रहने का फैसला करते हैं और इस तरह उनके बीच मौजूद तनाव का पाजिटिव अंत होता है।
फिल्म में प्रोसेनजीत और मनीषा कोईराला मुख्य किरदारों को निभाते हैं। प्रोसेनजीत ने युवा फिल्मकार की मुश्किलों और दुविधाओं को अच्छी तरह पर्दे पर उतारा है। मनीषा कोईराला का सधा अभिनय चरित्र के अनुकूल है। राइमा सेन भी अपने किरदार के साथ न्याय करती हैं। खेला का आकर्षण छोटा बच्चा है। उसकी मासूमियत आकर्षित करती है।
रितुपर्णो घोष की ऐसी फिल्में कहानी की तरह होती हैं। उनमें न तो औपन्यासिक विस्तार होता है और न बहुआयामी चरित्र होते हैं। ऐसी फिल्मों को देखने का एक अलग आनंद होता है। बांग्ला में बनी यह फिल्म हिंदी में डब की गई है। अगर डबिंग पर थोड़ा ध्यान दिया गया होता तो फिल्म का प्रभाव और बेहतर होता।

Friday, July 11, 2008

फ़िल्म सामीक्षा : महबूबा

पुराना रोमांस और त्याग
-अजय ब्रह्मात्मज
अफजल खान की फिल्म महबूबा शैली, शिल्प, विषय और प्रस्तुति- हर लिहाज से पुरानी लगती है। और है भी। हालांकि फिल्म के हीरो संजय दत्त और अजय देवगन आज भी पापुलर हैं, लेकिन उनकी आठ साल पुरानी छवि कहीं न कहीं दर्शकों को खटकेगी। फिल्म की हीरोइन मनीषा कोईराला आज के दर्शकों के मानस से निकल चुकी हैं। पापुलर किस्म की फिल्मों के लिए उनका टटका होना जरूरी है। फिल्म बासी हो चुकी हो तो उसका आनंद कम हो जाता है।
फिल्म की कहानी वर्षा उर्फ पायल (मनीषा कोईराला) पर केंद्रित है। उसके जीवन में श्रवण धारीवाल (संजय दत्त) और करण (अजय देवगन) आते हैं। संयोग है कि श्रवण और करण भाई हैं। ऐसी फिल्मों में अगर हीरोइन के दो दीवाने हों तो एक को त्याग करना पड़ता है या उसकी बलि चढ़ जाती है। महबूबा में भी यही होता है। यहां बताना उचित नहीं होगा कि मनीषा के लिए संजय दत्त बचते हैं या अजय देवगन।
महबूबा भव्य, महंगी और बड़ी फिल्म है। फिल्म के बाहरी तामझाम और दिखावे पर जो खर्च किया गया है, उसका छोटा हिस्सा भी अगर कथा-पटकथा पर खर्च किया गया होता तो फिल्म मनोरंजक हो जाती। चूंकि फिल्म का विषय और शिल्प लगभग एकदशक पुराना है, इसलिए महानगरों में इसे दर्शक नहीं मिलेंगे। कस्बे और छोटे शहरों में यह फिल्म दर्शकों को पसंद आ सकती है। महबूबा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का पर्याय बन चुकी बॉलीवुड श्रेणी की फिल्म है। अब ऐसी फिल्में नहीं बनतीं।
महबूबा में मनीषा को कुछ अच्छे दृश्य मिले हैं। उन दृश्यों में उन्होंने अभिनय क्षमता का परिचय दिया है। संजय और अजय का काम साधारण है। फिल्म की फोटोग्राफी अवश्य आकर्षित करती है। अशोक मेहता कैमरे से कमाल करते हैं और साधारण दिखने वाली वस्तुओं में भी चमक पैदा कर देते हैं। बुडापेस्ट के सौंदर्य को उन्होंने बहुत अच्छी तरह शूट किया है। अफसोस है कि एक साधारण फिल्म में उनका यह योगदान निरर्थक ही रहेगा।

Thursday, July 10, 2008

हीरोइनों की बढ़ती फीस

-अजय ब्रह्मात्मज
कहा यह जा रहा है कि करीना कपूर और ऐश्वर्या राय ने अपनी लोकप्रियता के आधार पर फिल्म निर्माताओं और ऐड फिल्म एजेंसियों से अपनी फीस बढ़वाने में सफलता हासिल की है। फिलहाल इन दोनों हीरोइनों को फिल्म और ऐड व‌र्ल्ड से सबसे ज्यादा पैसे मिल रहे हैं। हालांकि उन्हें फीस में मिल रही रकम पॉपुलर पुरुष स्टारों से कम ही है, लेकिन इधर उस रकम में गुनात्मक इजाफा भी हुआ है। अगर खबरों पर यकीन करें, तो करीना ने हाल ही में एक ऐड के लिए पांच करोड़ रुपये लिए, तो ऐश्वर्या को रोबोट के लिए सात करोड़ से ज्यादा रुपये मिले। वैसे, वास्तविक रकम क्या मिली या क्या मिल रही है, इसे न तो ऐक्टर बताते हैं और न ही ऐक्ट्रेस।
कहते हैं कि फिल्म जब वी मेट की जबर्दस्त कामयाबी ने करीना को पूरी तरह से कॉन्फिडेंस दिया। दरअसल, उनकी समझ में यह आया कि अगर वे मेहनत करें और स्क्रिप्ट पर ध्यान देने केसाथ डायरेक्टर को तरजीह दें, तो सिर्फ अपने कंधों पर ही फिल्म खींच सकती हैं। हालांकि जब वी मेट में शाहिद कपूर भी थे, लेकिन फिल्म पूरी तरह से करीना की ही फिल्म थी। सच तो यह है कि उन्होंने इस फिल्म में दर्शकों के साथ जो रिश्ता कायम किया, वह अभी तक चल रहा है। इस बीच उनकी टशन जैसी असफल फिल्म भी आई, जो तमाम प्रचार और दावों के बावजूद नहीं चल सकी। नतीजा यह हुआ कि करीना ने जब वी मेट की कामयाबी का पूरा श्रेय लिया और तुरंत अपनी फीस भी बढ़ा दी। शायद इसलिए, क्योंकि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के निर्माता कामयाब हीरोइनों और डायरेक्टरों के लिए जेबें ढीली करने में नहीं सकुचाते। उन्होंने करीना की बढ़ी फीस को उचित माना और उसके लिए राजी भी हो गए। सिर्फ करीना ही नहीं! इन दिनों बिपाशा बसु और लारा दत्ता भी अपनी फीस को लेकर सचेत हो गई हैं। पिछले दिनों दोनों ने विजक्राफ्ट द्वारा आयोजित बच्चन परिवार के अनफॉरगेटेबल टुअॅर से खुद को अलग कर लिया। मीडिया में तारीखों की समस्या की बातें की गई, लेकिन पर्दे की पीछे की सच्चाई यही है कि फीस को लेकर सहमति नहीं बन पाने के कारण बिपाशा और लारा इस टुअॅर से अलग हुई। उन्होंने विजक्राफ्ट और बच्चन परिवार के सामने अपनी मांग रखी। ठीक है कि उन्हें इससे फिलहाल नुकसान हुआ और उन्हें आईफा के बैंकॉक आयोजन में नहीं निमंत्रित किया गया, लेकिन उन्होंने यह संदेश तो दे ही दिया कि वे प्रोफेशनल हैं और अपनी प्रोफेशनल सेवाओं के लिए उचित फीस चाहती हैं!
दरअसल, हीरोइनों की बढ़ रही फीस को फिल्म इंडस्ट्री में इन दिनों बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। कॉरपोरेट व‌र्ल्ड मानता है कि हीरोइनों को उनके योगदान के अनुपात में फीस मिलनी चाहिए। इन दिनों फिल्मों के पॉपुलर हीरो 15 से 25 करोड़ रुपए तक ले रहे हैं। ऐसी स्थिति में हीरोइनों का पांच से दस करोड़ लेना अनुचित नहीं है। इस बढ़ोत्तरी और बदलाव के बावजूद गौर करें, तो हीरोइनों की फीस हीरो के आसपास नहीं ठहरती। इन दिनों कोई भी नंबर वन हीरोइन या हीरो नहीं है, लेकिन फिर भी यदि पांच टॉप हीरो और पांच टॉप हीरोइनों की फीस की तुलना करें, तो यह अंतर साफ नजर आ जाएगा! ऐश्वर्या किसी भी सूरत में अभिषेक बच्चन से बड़ी ब्रैंड हैं, लेकिन दस के सूचकांक में अगर अभिषेक दस पर हैं, तो ऐश्वर्या हैं सात पर..। यह एक कड़वी सच्चाई है।
एक ट्रेड विशेषज्ञ कहते हैं, हीरो-हीरोइनों की फीस का यह फर्क बना रहेगा, क्योंकि हिंदी फिल्में आज भी हीरो के नाम पर ही बनती, बेची जाती और चलती हैं। वे तर्क देते हैं, हाल-फिलहाल में कोई भी ऐसी फिल्म नहीं आई है, जिसे नायिका प्रधान कहा जा सके! नायिका प्रधान फिल्में मुख्य रूप से प्रयोगात्मक और कम बजट की होती हैं, इसलिए फिल्म कारोबार में उनकी कामयाबी और सराहना को कोई भी दर्जा हासिल नहीं है। सच यही है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री भारतीय समाज की तरह ही पुरुष प्रधान है। यहां भी पुरुषों का बोलबाला है और चूंकि हिंदी फिल्मों के दर्शकों का बड़ा प्रतिशत पुरुष ही हैं, इसलिए हीरो ही उन्हें आकर्षित करता है। हीरोइनें फिल्म की कहानी में ही नहीं, पूरे कारोबार में सजावट और नमूने के काम आती हैं। कहते हैं, उनकी मादकता और कामुकता ही बेची जाती है। दरअसल.., हिंदी फिल्मों की हीरोइनें यदि अपनी भूमिकाओं पर ध्यान देना आरंभ करेंगी और ठोस किरदारों की मांग करेंगी या फिर फिल्म में केंद्रीय और हीरो के समतुल्य भूमिका के लिए दबाव डालेंगी, तभी वास्तविक बदलाव आएगा। वर्ना एकाध फिल्मों की कामयाबी से चंद महीनों और सालों के लिए किसी एक हीरोइन की फीस बढ़ जाएगी और यह विभ्रम होगा कि अब हीरोइनों का स्थान और भाव हीरो के बराबर हो रहा है!

Wednesday, July 9, 2008

पहली छमाही नहीं मिली वाहवाही

-अजय ब्रह्मात्मज
पहली छमाही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए तबाही लेकर आई है। आश्चर्य की बात तो यह है कि और साल की तुलना में इस साल की पहली छमाही में फिल्मी कारोबार एकदम ठंडा रहा। पिछले साल की बात करें, तो छह महीने में 49 फिल्में रिलीज हुई थीं, लेकिन इस साल फिल्मों की संख्या घटकर 41 हो गई है और यदि यही स्थिति रही, तो सैकड़ों की संख्या में हिंदी फिल्में बनने का ब्यौरा अब केवल इतिहास की किताबों में मिलेगा! इन 41 फिल्मों में से हम चार ऐसी फिल्में भी नहीं बता सकते, जिन्होंने अच्छा कारोबार किया हो। फिल्में सिनेमाघरों में टिकने का नाम ही नहीं ले रही हैं। वजह मात्र यही है कि दर्शकों को ये फिल्में भा नहीं रही हैं।
रेस और जन्नत ने बचाई इज्जत
हालांकि पहली छमाही में ही नौ नए डायरेक्टर और उतने ही नए ऐक्टर फिल्मों में आए। आमिर, समर 2007 और भूतनाथ लीक से हटकर बनी फिल्में थीं। उनकी प्रशंसा जरूर हुई, लेकिन दर्शकों ने उन्हें खारिज भी कर दिया। दर्शकों की पसंद और फिल्मों के चलने की बात करें, तो अब्बास-मस्तान की रेस और नए डायरेक्टर कुणाल देशमुख की जन्नत ने ही फिल्म इंडस्ट्री की इज्जत रखी। इन दोनों ने अच्छा बिजनेस किया। इन फिल्मों ने पाकिस्तान में भी शानदार बिजनेस किया। चूंकि पाकिस्तान के शहरों में दोनों फिल्में भारत और अन्य देशों के साथ-साथ रिलीज हुई, इसलिए दर्शक सिनेमाघरों में आए। अन्य सफल फिल्मों में मिथ्या, यू मी और हम, जोधा अकबर और पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए का उल्लेख किया जा सकता है। इधर सरकार राज के निर्माता कामयाबी का दावा जरूर कर रहे हैं, लेकिन ट्रेड विशेषज्ञ उसे नुकसान का सौदा मान रहे हैं। जोधा अकबर महंगी फिल्म थी, इसलिए लंबे समय तक सिनेमाघरों में टिकने के बाद वह अपनी लागत निकाल सकी। उन दिनों जोधा अकबर को किसी मुकाबले का सामना नहीं करना पड़ा। अजय देवगन के निर्देशन में आई यू मी और हम को भी दर्शकों ने रिजेक्ट कर दिया था। उन्हें बतौर निर्देशक आमिर खान जैसी प्रशंसा नहीं मिली!
कॉमेडी की ट्रैजेडी
माना यही जाता है कि कॉमेडी फिल्में देखकर हंसी आती है। यही वजह है कि इन दिनों हर जगह कॉमेडी पर जोर है। दरअसल, कॉमेडी को लेकर दलील यह भी दी जा रही है कि दुनिया में इतना तनाव और परेशानी है कि दर्शक हंसी के लिए तरस रहे हैं। बेचारे दर्शक हंसी की तलाश में प्रचारित कॉमेडी फिल्में देखने जाते हैं और रोते हुए बाहर निकलते हैं। मानो उन्होंने कोई टै्रजेडी फिल्म देख ली हो! इस साल की पहली छमाही में लगभग एक दर्जन कॉमेडी फिल्में आई, लेकिन दुख की बात यह है कि उनमें से एक ने भी पिछले साल की पार्टनर या वेलकम जैसा कारोबार नहीं किया! अपनी शैली की कॉमेडी फिल्मों के लिए मशहूर प्रियदर्शन की मेरे बाप पहले आप भी दर्शकों को हंसाने में विफल रही। समीक्षकों का मानना है कि उनका कन्फ्यूजन वाला फॉर्मूला अब काम नहीं कर रहा है! एक तरह की सिचुएशन देखकर दर्शक ऊब चुके हैं। यहां तक कि कॉमेडी फिल्मों के चेहरे भी नहीं बदल रहे हैं! वही परेश रावल और राजपाल यादव नजर आते हैं।
फुस्स हुई टशन
यशराज फिल्म्स को ऐसा झटका पहले नहीं लगा था। सैफ अली खान, अक्षय कुमार, करीना कपूर और अनिल कपूर के बावजूद टशन दर्शकों को आकर्षित नहीं कर सकी। वैसे, पहले हफ्ते मल्टीप्लेक्स में रिलीज नहीं होने से भी फिल्म को नुकसान हुआ! कहते हैं, बॉक्स ऑफिस पर टशन के धराशाई होने के बाद यशराज फिल्म्स में गहरा विचार-विमर्श हुआ है। जानकारों का मानना है कि इस बैनर की नई फिल्मों के भी चलने की उम्मीद कम ही है। हां, शाहरुख खान की रब ने बना दी जोड़ी यशराज को राहत जरूर दे सकती है। शाहरुख उनके तारणहार हो सकते हैं।
नए चेहरे, नई उम्मीदें
फिल्मी कारोबार के इस ठंडे माहौल में आए कुछ नए ऐक्टर और डायरेक्टर उम्मीद की किरण लग रहे हैं। आमिर के निर्देशक राजकुमार गुप्ता, समर 2007 के निर्देशक सुहैल तातारी, यू मी और हम के निर्देशक अजय देवगन और भूतनाथ के निर्देशक विवेक शर्मा से उम्मीद की जा रही है कि उनकी अगली फिल्में बेहतर होंगी। नए चेहरों में ब्लैक ऐंड ह्वाइट के अनुराग सिन्हा, आमिर के राजीव खंडेलवाल, माई नेम इज ऐंथनी गोनसाल्विस के निखिल द्विवेदी, हाल-ए-दिल के अध्ययन सुमन और समर 2007 के सिकंदर खेर के बारे में माना जा रहा है कि ये भविष्य के व्यस्त सितारे होंगे। देखें, अगली छमाही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की पहली छमाही की तबाही की कितनी भरपाई कर पाती है? वैसे भी, पिछले कई सालों से साल में केवल 4-5 फिल्में ही अच्छा कारोबार कर रही हैं। बाकी सौ फिल्में गिनती के काम आती हैं। एक सच यह भी है कि कॉरपोरेट संस्कृति के बाद फिल्मों की क्वालिटी और पैशन में तेजी से ह्रास हुआ है!

बॉक्स ऑफिस:११.०७.२००८

हिट हो गई है जाने तू या जाने ना

एक लंबे अंतराल के बाद बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों की भीड़ दिख रही है। टिकट नहीं मिल पाने के कारण दर्शक एक मल्टीप्लेक्स से दूसरे मल्टीप्लेक्स भाग रहे हैं। किसी भी निर्माता के लिए इससे बड़ी खुशी नहीं हो सकती कि उसकी फिल्म को देखने भीड़ उमड़ पड़ी हो। आमिर खान की यह लगातार तीसरी हिट है। उनके होम प्रोडक्शन से आई लगान और तारे जमीन पर के बाद जाने तू या जाने ना की सफलता से ट्रेड सर्किल यकीन करने लगा है कि आमिर खान दर्शकों की रुचि समझते हैं।
जाने तू या जाने ना के दर्शकों में लगातार इजाफा हो रहा है। मुख्य रूप से किशोर और युवा दर्शकों के बीच यह फिल्म पसंद की जा रही है। फिल्म में दोस्ती और प्यार का सरल एवं आधुनिकअंदाज उन्हें अपने अनुकूल और आसपास का लग रहा है। यही कारण है कि कॉलेज के नए सत्र आरंभ होते ही नए दोस्तों का झुंड सिनेमाघरों की ओर रूख कर रहा है।
जाने तू या जाने ना के साथ रिलीज हुई लव स्टोरी 2050 को दर्शकों ने नापसंद कर दिया है। उन्हें न तो इस फिल्म की लव स्टोरी पसंद आई और न 2050 का चित्रण। हालांकि फिल्म के निर्देशक हैरी बवेजा बयान दे रहे हैं कि उनकी फिल्म को नुकसान पहुंचाया गया। ट्रेड सर्किल की राय में उन्होंने खुद ही फिल्म को इस स्थिति में ला दिया। इस फिल्म को लेकर बना हाइप भी दर्शक नहीं जुटा सका। पहले हफ्ते में इसे 25 से 30 प्रतिशत दर्शक मिले। इसके विपरीत जाने तू या जाने ना ने अस्सी प्रतिशत से शुरूआत की। मौखिक प्रचार से जाने तू..... के दर्शकों की संख्या बढ़ रही है।
इस हफ्ते दो छोटी और एक बासी फिल्म रिलीज हो रही है। ऐसा लगता है कि जाने तू..... की बढ़त बरकरार रहेगी।

Tuesday, July 8, 2008

जाने तू.. देखकर सभी को मजा आएगा: अब्बास टायरवाला

अब्बास टायरवाला ने निर्देशन से पहले फिल्मों के लिए गीत और स्क्रिप्ट लिखे। लगातार लेखन के बाद एक दौर ऐसा भी आया, जब उन्हें न ही कुछ सूझ रहा था और न कुछ नया लिखने की प्रेरणा ही मिल पा रही थी! इसी दौर में उन्होंने निर्देशन में उतरने का फैसला किया और अपनी भावनाओं को जानू तू या जाने ना का रूप दिया। यह फिल्म चार जुलाई को रिलीज हो रही है। बातचीत अब्बास टायरवाला से..
जाने तू या जाने ना नाम सुनते ही एक गीत की याद आती है। क्या उस गीत से प्रेरित है यह फिल्म?
बिल्कुल है। यह मेरा प्रिय गीत है। गौर करें, तो पाएंगे कि इतने साल बाद भी इस गीत का आकर्षण कम नहीं हुआ है। पुराने गीतों की बात ही निराली है। इन दिनों एक फैशन भी चला है। नई फिल्मों के शीर्षक के लिए किसी पुराने गीत के बोल उठा लेते हैं। फिल्म की थीम के बारे में जब मुझे पता चला कि प्यार है, तो इसके लिए मुझे जाने तू या जाने ना बोल अच्छे लगे। इस गीत में खुशी का अहसास है, क्योंकि यह लोगों को उत्साह देता है। मैंने इसी तरह की फिल्म बनाने की कोशिश की है। कोशिश है कि फिल्म लोगों को खुशी दे।
जाने तू या जाने ना के किरदार इसी दुनिया के हैं या आजकल की फिल्मों की तरह उनकी अपनी एक काल्पनिक दुनिया है?
इस फिल्म में लंबे समय बाद हमें इस दुनिया के किरदार देखने को मिलेंगे। वैसे हिंदी फिल्मों में हमारे किरदार वास्तविक नहीं होते। ऐसा लगता है कि या तो हमें वास्तविक दुनिया को भूलने के लिए मजबूर किया गया है, या हम खुद ही उसे भूल जाना चाहते हैं। इसकी वजह यह भी है कि हमें बैंकॉक में मुंबई दिखाना है, लंदन के किसी कॉलेज में जेवियर कॉलेज दिखाना है और हमें ऑस्ट्रेलिया के किसी सड़क को भारत की सड़क बताना है। कहीं न कहीं, यह सोच बैठ गई है कि हमारे शहर और हमारा देश इतना खूबसूरत नहीं है। अमूमन हम अपने शहर को घिनौने या बदसूरत रूप में ही दिखाते हैं। हम गली-कूचों में तभी जाते हैं, जब अंडरव‌र्ल्ड दिखाना होता है। इन कथित खामियों और कमियों के बावजूद इस देश का एक रंग है। मुंबई हमें फिल्मों में नहीं दिखती। मुंबई के समंदर का रंग नीला नहीं है। धूसर, भूरा और गंदा रंग है, लेकिन उसके सामने बैठ कर जो मोहब्बत करते हैं, उन्हें वह बहुत ही रोमांटिक लगता है। मैं चाहता था कि अपने शहर को ही दिखाऊं। इस शहर के रंग, भाषा, माहौल और आशिकी को मैंने पकड़ने और दिखाने की कोशिश की है। फिल्म का हर किरदार मेरी याद, मेरे दोस्तों और मेरे किसी दौर से जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही यह परियों की कहानी की तरह है और इसीलिए प्यार, मोहब्बत, अहसास और झगड़े भी हैं इसमें।
प्यार-मोहब्बत और अहसास तो हम हर फिल्म में देखते हैं। इस फिल्म में यह किस तरह अलग है?
लोगों ने अवश्य देखी होगी ऐसी फिल्में, लेकिन उन्होंने इस शहर में इस जिंदगी की और हम लोगों की कहानी नहीं देखी होगी। लोगों ने बॉलीवुड की अलग मायानगरी देखी है। जाने.. की मुस्कुराहट और खुशी लोगों को अपनी लगेगी। उन्हें अपनी भाषा में आसपास की कहानी दिखेगी। लव स्टोरी के साथ इसमें कई मसाले भी होंगे।
ऐसा क्यों हो रहा है कि सारे लेखक एक समय के बाद निर्देशक हो जाते हैं और सारे युवा निर्देशक अपनी फिल्में खुद लिखते हैं? पहले तो ऐसा नहीं था?
पहले का दौर अलग था। तब काम का बंटवारा था। आज के दौर में फिल्मों की मांग बढ़ गई है और एक सच यह भी है कि कॉरपोरेट प्रभाव बढ़ने के कारण फिल्म बनाने के अधिक मौके भी अब ज्यादा मिलने लगे हैं। आपके पास कोई नया आइडिया हो, तो आप निर्देशक बन सकते हैं। निर्देशक बनने में कम जोखिम है। मैं कहना चाहूंगा कि ज्यादातर निर्देशकों को फिल्में नहीं मिलनी चाहिए। अपने छोटे से करियर में मुझे लगा कि मैं दूसरों से बुरी फिल्म नहीं बनाऊंगा। लेखक होने के कारण यह आत्मविश्वास है। इसके साथ ही मेरे मां-पिता ने सिखाया कि अगर एक काम कोई और कर सकता है, तो मैं भी मेहनत कर उस काम को उसी स्तर का या उस से बढि़या कर सकता हूं। देखना है कि यह बात सही उतरती है या मैं मुंह की खाऊंगा..!
स्क्रिप्ट लिखते समय कोई ऐक्टर ध्यान में था क्या?
मैंने कभी ऐक्टर की इमेज को लेकर फिल्म नहीं लिखी। शाहरुख खान की दोनों फिल्में अशोका और मैं हूं ना उदाहरण हैं। इस फिल्म के लेखन के समय तो इमरान खान कहीं थे ही नहीं! मैं किसी स्टार को ध्यान में रख कर फिल्म कभी नहीं लिखूंगा। मेरे लिए यह नामुमकिन है।
क्या यह मालूम था कि फिल्म का अदिति.. गीत इतना पॉपुलर हो जाएगा?
ए.आर. रहमान ने जब यह धुन पहली बार सुनाई थी, तभी मुझे इस बात का अहसास हो गया था कि यह गीत पॉपुलर होगा। वैसे यूनिट के लोगों को लगता था कि पप्पू.. ज्यादा हिट होगा। तब मैं सभी से यही कहता था कि अदिति.. सभी की जुबान पर चढ़ जाएगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसमें नई बात सरल तरीके और मधुर धुन के साथ कही गई है। जब प्रोमो बने, तब भी सबकी राय यही थी कि पप्पू.. का प्रोमो पहले चलाना चाहिए। मैं चाहता था कि अदिति.. ही पहले चले। मैंने आमिर खान से भी कहा। उन्होंने कहा कि अगर निर्देशक होने के नाते आपको यह गीत पहले चलाना है, तो हम इसे ही पहले चलाएंगे।
जाने तू.. यूथफुल लग रही है?
प्रोमोशन देख कर ऐसा लग सकता है। मैं लोगों को बताना चाहता हूं कि यह फिल्म यूथ के बारे में जरूर है, लेकिन सभी के देखने लायक है। यह मेरा दर्शकों से वादा है कि इसे देखने के बाद कोई नहीं कह सकता कि हमें मजा नहीं आया। बहुत सारे भाव, रस, किरदार और बातें हैं, जो हर उम्र के दर्शकों को लुभाएंगे।
लेखक और गीतकार होने के कारण निर्देशक अब्बास को कितनी मदद मिली?
चूंकि सारी जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी, इसीलिए मुझे बहुत खुशी मिली। मैं यहां बताना चाहूंगा कि मुझसे पहले केवल गुलजार साहब ने ही अपनी फिल्मों के गीत, स्क्रिप्ट और कहानी लिखे हैं।
दर्शक क्यों जाएं आपकी फिल्म देखने?
मैंने सच्चाई से फिल्म बनाई है। इसमें उमंग, भावना, दोस्ती और प्यार की यात्रा है। इस यात्रा में लोगों को पूरा आनंद आएगा। यह फिल्म किसी को बुरी नहीं लगेगी। यह या तो लोगों को पसंद आएगी या बहुत पसंद आएगी। यह मेरा आत्मविश्वास है। मैं अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाकर लोगों को फिल्म देखने के लिए आमंत्रित करता हूं। लोग दोस्त और परिवार के साथ इसे देखें। मेरी बात का यकीन करें कि उनका शुक्रवार बर्बाद नहीं होगा।

Sunday, July 6, 2008

हरमन बवेजा बनाम इमरान खान

पिछली चार जुलाई को हरनाम बवेजा ने 'लव स्टोरी २०५०' और इमरान खान ने 'जाने तू या जाने ना' से अपनी मौजूदगी दर्शकों के बीच दर्ज की.अभी से यह भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा कि दोनों में कौन आगे जायेगा ?पहली फ़िल्म के आधार पर बात करें तो इमरान की फ़िल्म'जाने तू...'की कामयाबी सुनिशिचित हो गई है.'लव स्टोरी...' के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती.हालाँकि चार जुलाई के पहले हरमन की फ़िल्म की ज्यादा चर्चा थी और इमरान की फ़िल्म छोटी मानी जा रही थी.वैसे भी हरमन की फ़िल्म ५० करोड़ में बनी है,जबकि इमरान की फ़िल्म की लगत महज १० करोड़ है।
चवन्नी को इसका अंदेशा था.सबूत है इसी ब्लॉग पर किया गया जनमत संग्रह.चवन्नी ने पूछा था की पहले किसकी फ़िल्म देखेंगे? २५ लोगों ने इस जनमत संग्रह में भाग लिया था,जिनमें से १७ ने इमरान की फ़िल्म पहले देखने की राय दी थी,बाकी ८ ने हरमन के पक्ष में मत दिए.चवन्नी को तभी समझ जाना चाहिए था कि दोनों फिल्मों के क्या नतीजे आने जा रहे हैं.चवन्नी ने एक पोस्ट के बारे में सोचा भी था।
हरमन और इमरान को मीडिया आमने-सामने पेश कर रहा है.मुमकिन है कि कुछ दिनों के अन्दर इस तरह के आलेख भी आने लगें कि इमरान ने हरमन को पछाड़ा.कोई शक नहीं कि 'जाने तू...' अच्छी चल रही है और उसकी तुलना में 'लव स्टोरी...' पिछड़ती जा रही है,किंतु सिर्फ़ इस आधार पर इमरान की जीत घोषित कर देना अनुचित होगा.अभी इश्क के इम्तेहान और भी हैं...इमरान की परीक्षा अगली फ़िल्म में होगी.हरमन को भी मौका मिलेगा कि वे अगली फ़िल्म में इस फ़िल्म की भरपाई कर सकें.उनकी अगली फ़िल्म अनीस बज्मी के साथ है,जो कामयाब फिल्मों के पर्याय बन गए हैं.इमरान कि अगली फ़िल्म संजय गडवी के साथ है,जिन्होंने धूम फिल्में बनाई थीं.हाँ कह सकते हैं कि पहले राउंड में इमरान आगे निकल गए हैं।
अगर दोनों के अभिनय क्षमता पर ध्यान देन तो ज्यादा अन्तर नहीं है.हरमन कुछ मामलों में आगे हैं.हिन्दी फिल्मों के अभिनेता के लिए आवश्यक नाच,गाना और मारधाड़ के लिए वे उपयुक्त हैं.उनके चेहरे में आकर्षण है,जो फिलहाल रितिक रोशन के नक़ल माना जा रहा है.जल्दी ही उनकी अपनी पहचान बन जायेगी.दूसरी तरफ़ इमरान का आम चेहरा उन्हें सहज और साधारण किरदारों के लिए अनुकूल ठहराता है.एक्शन दृश्यों में इमरान कैसे लगेंगे,कहना मुश्किल है।
आब आप कि बरी है.आप बताएं कि आप को कौन ज्यादा पॉपुलर होता दिख रहा है?

Saturday, July 5, 2008

फ़िल्म समीक्षा:लव स्टोरी २०५०

न साइंस है और न फिक्शन
-अजय ब्रह्मात्मज
हैरी बवेजा की लव स्टोरी 2050 से उम्मीद थी कि हिंदी फिल्मों को एक छलांग मिलेगी। इस फिल्म ने छलांग जरूर लगाई, लेकिन पर्याप्त शक्ति नहीं होने के कारण औंधे मुंह गिरी। अफसोस ही है कि इतनी महंगी फिल्म का यह हाल हुआ। लव स्टोरी 2050 बुरी फिल्म बनाने की महंगी कोशिश है।
फिल्म दो हिस्सों में बंटी है। इंटरवल के पहले सारे किरदार आस्ट्रेलिया में रहते हैं और जैसा कि होता आया है, वे सभी हिंदी बोलते हैं। उनके आसपास स्थानीय लोग नहीं रहते। पड़ोसियों के सिर्फ घर दिखते हैं। हां, हीरो-हीरोइन डांस करने लगें तो कुछ लोग साथ में नाचने लगते हैं और अगर उन्हें पैसे नहीं मिले हों तो वे औचक भाव से घूरते हैं, जैसे कि बंदर और मदारी को देखकर हमारा कौतूहल जाग जाता है। इंटरवल के बाद कहानी सन् 2050 की मुंबई में आ जाती है। आकाश में इतनी कारें और अन्य सवारियां उड़ती दिखाई पड़ती हैं... क्या 2050 में पतंगें सड़कों पर दौड़ेंगी और पक्षी पिंजड़ों में बंद हो जाएंगे? फिल्म में एक अजीब सी तितली है, जो 2008 के आस्ट्रेलिया में नाचती हुई आकर हथेली पर बैठ जाती है और सन् 2050 में भी हीरो-हीरोइन की आंखों के आगे आकर पुरानी यादें ताजा कर जाती है।
लव स्टोरी 2050 हैरी बवेजा का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है। ऐसा बुरा सपना उन्होंने क्यों देखा? अब वे उसे पूरी दुनिया को दिखा रहे हैं। उनके इस सपने को साकार करने में भवानी अय्यर, सुपर्ण वर्मा और अन्य दो लेखकों की भी मदद ली गई है। इन लेखकों के योगदान पर रोना आता है। कैसे कोई इतने प्रभावहीन दृश्यों की कल्पना कर सकता है और मोहविष्ट होकर उसे खींच भी सकता है। सायकिल रेस और हीरोइन तक पहुंचने की हीरो की भागदौड़ से आरंभ हुई उकताहट बढ़ती ही जाती है।
फिल्म के दृश्यों के मुताबिक संवाद लिखे गए हैं, घिसे-पिटे, पुराने और सपाट। प्रेम के प्रसंगों में भी नवीनता नहीं है। सन् 2050 की कल्पना तो और दुखी करती है। रोबोट, कंप्यूटराइज्ड घर और आकाश में चलते वाहन...भविष्य में ग्राउंड फ्लोर के निवासियों के आवागमन का साधन क्या होगा?
हां, हिंदी भाषाभाषी खुश हो सकते हैं कि सन् 2050 में भी मुंबई की बोलचाल की भाषा हिंदी ही होगी, इसलिए यह डर मन से निकाल दें कि अंग्रेजी भविष्य में हिंदी को निगल जाएगी या मुंबई से हिंदीभाषियों को खदेड़ दिया जाएगा। कहते हैं न निराशा में भी आशा छिपी होती है।

Friday, July 4, 2008

फ़िल्म समीक्षा:जाने तू या जाने ना

कुछ नया नहीं, फिर भी नॉवल्टी है
-अजय ब्रह्मात्मज
रियलिस्टिक अंदाज में बनी एंटरटेनिंग फिल्म है जाने तू या जाने ना। एक ऐसी प्रेम कहानी जो हमारे गली-मोहल्लों और बिल्डिंगों में आए दिन सुनाई पड़ती है।
जाने तू... की संरचना देखें। इस फिल्म से एक भी किरदार को आप खिसका नहीं सकते। कहानी का ऐसा पुष्ट ताना-बाना है कि एक सूत भी इधर से उधर नहीं किया जा सकता। सबसे पहले अब्बास टायरवाला लेखक के तौर पर बधाई के पात्र हैं। एयरपोर्ट पर ग्रुप के सबसे प्रिय दोस्तों की अगवानी के लिए आए चंद दोस्त एक दोस्त की नई गर्लफ्रेंड को प्रभावित करने के लिए उनकी (जय और अदिति) कहानी सुनाना आरंभ करते हैं। शुरू में प्रेम कहानी के नाम पर मुंह बिचका रही माला फिल्म के अंत में जय और अदिति से यों मिलती है, जैसे वह उन्हें सालों से जानती है। दर्शकों की स्थिति माला जैसी ही है। शुरू में आशंका होती है कि पता नहीं क्या फिल्म होगी और अंत में हम सभी फिल्म के किरदारों के दोस्त बन जाते हैं।
माना जाता है कि हिंदी फिल्में लार्जर दैन लाइफ होती हैं, लेकिन जाने तू.. देख कर कहा जा सकता है कि निर्देशक समझदार और संवेदनशील हो तो फिल्म सिमलर टू लाइफ हो सकती है। जाने तू... में विशेष नयापन नहीं है, हिंदी फिल्मों की प्रचलित धारणाओं, दृश्यों, प्रसंगों और संवादों का उपयोग किया गया है। अव्यक्त प्रेम को दर्शाती चरित्रों की व्याकुल मनोदशा में कोई नवीनता नहीं है। यह अब्बास टायरवाला के कुशल लेखन और निर्देशन की सफलता है कि घिसे-पिटे फार्मूले की फिल्म में उन्होंने नॉवल्टी पैदा कर दी है। किरदार पुराने हैं, चेहरे नए हैं। भाव पुराने हैं, अभिव्यक्ति और प्रतिक्रियाएं नई हैं। द्वंद्व और संघर्ष घिसा-पिटा है, लेकिन उनका संकलन और निष्पादन नवीन है। गीतों का मर्म प्राचीन है, शब्द नए हैं। यहां तक कि ए.आर. रहमान के संगीत की मधुरता पुरानी है, लेकिन ध्वनियां नई हैं। जाने तू... की यही ताजगी उसकी खूबी बन गयी है।
एक नवीनता गौरतलब है। फिल्म में तीन मां-पिता हैं और तीनों विभिन्न पृष्ठभूमि और परिस्थिति के दांपत्य का चित्रण करते हैं। फिल्म के हीरो और उसकी मां के अंतर्सबंध का ऐसा चित्रण हिंदी फिल्मों में नहीं मिलता। 21वीं सदी की आधुनिक मां की भूमिका में रत्ना पाठक शाह का व्यक्तित्व आकर्षित करता है। शायद यह हिंदी फिल्मों की पहली मां है, जिन्होंने साड़ी नहीं पहनी है। नायिका का संवेदनशील चित्रकार भाई... ऐसे किरदार फार्मूला फिल्मों में गैरजरूरी माने जाते हैं।
इमरान खान अभी कैमरे के आगे सधे नहीं हैं। कुछ दृश्यों में उनका प्रयास दिख जाता है। फिर भी उनकी नेचुरल एक्टिंग अच्छी लगती है। जीनिलिया का सहज और स्वाभाविक अभिनय अदिति के चरित्र को अच्छी तरह पर्दे पर जीवंत करता है। प्रतीक बब्बर प्रभावित करते हैं। छोटे-मोटे किरदारों में आए कलाकार खटकते नहीं हैं। सभी का सराहनीय योगदान है।

निर्देशकों का लेखक बनना ठीक है, लेकिन.. .

-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले कुछ सालों में फिल्म लेखन में बड़ा बदलाव आया है। उल्लेखनीय है कि इस बदलाव की तरफ सबसे पहले यश चोपड़ा ने संकेत किया था। उन्होंने अपने बेटे आदित्य चोपड़ा समेत सभी युवा निर्देशकों के संबंध में कहा था कि वे सब अपनी फिल्मों की स्क्रिप्ट खुद लिखते हैं। भले ही दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे के समय यह ट्रेंड नहीं रहा हो, लेकिन हाल-फिलहाल में आए अधिकांश युवा निर्देशकों ने अपनी फिल्में खुद लिखीं और उन युवा निर्देशकों ने किसी और की कहानी ली, तो पटकथा और संवाद स्वयं लिखे। इस संदर्भ में हिंदी फिल्मों के एक वरिष्ठ लेखक की टिप्पणी रोचक है। उनकी राय में फिल्म लेखक-निर्देशक और निर्माता की भागीदारी पहले भी रहती थी, लेकिन वे कथा, पटकथा और संवाद का क्रेडिट स्वयं नहीं लेते थे। उन्होंने महबूब खान, बी.आर. चोपड़ा, बिमल राय और राजकपूर के हवाले से कहा कि इन सभी निर्देशकों की टीम होती थी और इस टीम में लेखक भी रहते थे। स्टोरी सिटिंग का चलन था। फिल्म की योजना बनने के बाद फिल्म के लेखक, ऐक्टर, निर्माता और निर्देशक साथ बैठते थे। सलाह-मशविरा होती थी और फिल्म के लिए नियुक्त लेखक हर स्टोरी सिटिंग के बाद अपनी कहानी और पटकथा में सुधार करता था। फिल्मों के दृश्य, प्रसंग और संवाद तक डायरेक्टर बताते थे, लेकिन उन्होंने कभी लेखकों के साथ क्रेडिट शेयर नहीं किया। यह बदलाव इधर ही दिख रहा है कि निर्देशक फिल्म के लेखन में शामिल होने का क्रेडिट भी लेने लगे हैं!
पुराने खयाल के वरिष्ठ लेखक से पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता। यह भी हो सकता है कि फिल्म लेखन में निर्देशकों की बढ़ती दखलंदाजी की प्रतिक्रिया में वे उनके योगदान और क्रेडिट को नकार रहे हों! हालांकि यह सच है कि क्रेडिट लेने का आजकल जैसा मोह पुराने निर्देशकों में नहीं था। राजकपूर तो अपनी फिल्म के गीतों के मुखड़े और धुन तक सुझाते थे। अपनी फिल्मों की कथा सुझाने के बाद वे उसके विस्तार और लेखन में नियमित रूप से साथ रहते थे, लेकिन उन्होंने कभी लेखकों के अधिकार का हनन नहीं किया। चूंकि निर्देशक फिल्म यूनिट का मुखिया और दिशा निर्धारक होता है, इसलिए फिल्म निर्माण के हर क्षेत्र में उनका सहयोग वांछित है। इधर के निर्देशकों को लगता है कि लेखक उनके आइडिया को तरीके से डेवलॅप नहीं कर पाते! आइडिया और लेखन के गैप को भरने के लिए उन्हें की-बोर्ड खड़काना ही पड़ता है। जाहिर-सी बात है कि वे अपनी मेहनत की पहचान भी चाहते हैं, इसलिए फिल्म लेखन की विभिन्न श्रेणियों (कथा, पटकथा और संवाद) में अपना नाम जोड़ने से नहीं हिचकते। युवा निर्देशक अपनी फिल्मों की कहानी खुद ही खोजते हैं। इन दिनों हर निर्देशक पहली फिल्म निर्देशित करने के पहले कम से कम दो-तीन स्क्रिप्ट तो लिख ही चुका होता है। फिर स्क्रिप्ट लेखन के सॉफ्टवेयर भी आ गए हैं। उनसे अनेक सुविधाएं मिल जाती हैं। स्क्रिप्ट लेखन का तकनीकी पक्ष इन सॉफ्टवेयर की सहायता से संभाल लिया जाता है। रही बात संवाद की, तो निर्देशक इसे अंग्रेजी में लिख देते हैं और फिर फिल्म यूनिट का कोई हिंदी जानकार या सहायक या स्वयं अभिनेता ही उन्हें हिंदी में बोल देते हैं। इसी प्रक्रिया के कारण आज की फिल्मों के संवाद प्रभावशाली नहीं हो पाते!
युवा निर्देशकों के लेखक बनने से देखें, तो कई समस्याएं भी उभरी हैं। अधिकांश युवा निर्देशक अंग्रेजी फिल्में देखकर और उनके जरिए ही हिंदी फिल्मों में प्रवेश करते हैं, इसलिए उनकी स्क्रिप्ट पर विदेशी प्रभाव स्पष्ट रहता है। यदि लोग इधर की फिल्मों पर गौर करेंगे, तो पाएंगे कि चुस्त और गतिमान होने के बावजूद वे दर्शकों से जुड़ नहीं पातीं! उसकी एक वजह यही है कि भारतीय भावनाओं को विदेशी शिल्प में ढालना मुश्किल है। युवा निर्देशक कोशिश करते हैं, लेकिन इस कोशिश में भावनाओं की कशिश खो जाती है और दृश्य प्रभावहीन हो जाता है। फिल्म लेखन बड़ी चुनौती है। इस चुनौती से निबटने के लिए युवा निर्देशकों को पेशेवर लेखकों की मदद लेनी चाहिए या फिर अपनी लेखन-कला समृद्ध करनी चाहिए! उसके लिए यह बहुत जरूरी है कि उन्हें भारतीय संस्कृति, इतिहास, रिवाज और भाषा का सम्यक ज्ञान हो।

Thursday, July 3, 2008

इमरान खान से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

रियलिस्टिक और नैचुरल है जाने तू ....- इमरान खान

क्या आप पहली रिलीज के लिए तैयार हैं?
मुझे नहीं लगता कि ऐसे तैयार होना आसान है, हम ये नहीं सोचते हैं कि आगे जाकर क्या होगा। हमने कोशिश की है कि अच्छी फिल्म बन सके, मैंने ईमानदारी से काम किया है ....आगे क्या होगा किसी को पता नहीं।
लेकिन कुछ तो तैयारी रही होगी। बाहर इतना कम्पिटीशन है। आप पहुंचेंगे, बहुत सारे लोग पहले से ही मैदान में खड़े हैं?
कम्पिटीशन के बारे में आपको सोचना नहीं चाहिए। आपको अपना काम करना है। अगर मैं बैठ कर सोचूंगा कि बाकी एक्टर क्या कर रहे हैं, कैसी फिल्में कर रहे हैं। ये कॉमेडी फिल्म कर रहा है, ये रोमांटिक फिल्म कर रहा है तो मैं अपने काम पर ध्यान नहीं दे पाऊंगा। मुझे अपना काम करना है, मुझे अपना काम देखना है। मुझे सोचना है कि मुझे कैसी फिल्में अच्छी लगती हैं। मुझे कैसी स्क्रिप्ट पसंद हैं। और ये काम मैं कितने अच्छे तरीके से कर सकता हूं। कभी किसी को देख जलना नहीं चाहिए, इंस्पायर होना चाहिए। किसी और को देखकर अपना काम नहीं करना चाहिए। मेरे खयाल में कम्पिटीशन के बारे में सोचना नहीं चाहिए।
कैसे फैसला लिया कि जाने तू या जाने ना ही करनी है पहले?
यही फिल्म आई मेरे पास। मुझे एक्टर नहीं बनना था। मुझे रायटर-डायरेक्टर बनना था। मैं फिल्म स्कूल भी गया था। मैंने ट्रेनिंग ली है। मैंने सोचा था कि मैं वापस आकर डायरेक्टर बनूंगा। मैंने रायटिंग और डायरेक्शन का कोर्स किया था। मैंने सोचा था कि मैं यहां आकर डायरेक्टर बनूंगा। रायटर बनूंगा। और मैं यही काम कर रहा था। मैंने एकाध स्क्रिप्ट लिखी थी। मैं लोगों से मिल रहा था। टेलीविजन में भी कोशिश कर रहा था कि शायद कोई टेलीविजन शो में रायटर-डायरेक्टर बनूं। असिस्टेंट बन जाऊं या ऐसा कुछ करूं। बीच में अचानक से मेरी मुलाकात अब्बास टायरवाला से हुई। मुझे वे बहुत पसंद आए। उन्होंने मुझे जाने तू या जाने ना की कहानी सुनाई। मुझे कहानी बहुत पसंद आई। और अब्बास ने कहा कि मैं इस कहानी के लिए बिल्कुल सही हूं। उन्होंने कहा कि पहली मुलाकात से मुझे लग गया था कि यू आर द राइट पर्सन ़ ़ मुझे भी कहानी बहुत अच्छी लगी। मैंने इतना सोचा भी नहीं कि मैं ऐसे लांच हो जाऊंगा, मैं हीरो बनूंगा। मैं ये करूंगा। मैं वो करूंगा। मुझे लगा कि एक फिल्म आई है, मुझे फिल्म पसंद है तो मैं कर लेता हूं। आगे जाकर अगर कोई फिल्में ना मिले तो भी ठीक है।
फिल्म के लिए आपको अब्बास ने राजी किया या आपको इस फिल्म में क्या बात अच्छी लगी, जिसकी वजह से आपने तुरंत हां कह दिया?
बहुत यूथफूल कहानी है। बहुत ईमानदार फिल्म है। मैंने ऐसी बहुत फिल्में देखी हैं, जहां रायटर, डायरेक्टर और एक्टर ने कोशिश की कि वे आज के यूथ को दिखाएं कि आजकल के नौजवान कैसे हैं। उनमें से ज्यादातर ठीक से दिखा नहीं पाए। शायद वे ठीक से समझ नहीं पाए कि आज की यूथ कैसी है, उनकी सोच कैसी है, उनकी लाइफ कैसी है। अब्बास खुद बहुत यंग हैं। मुझे लगा कि फिल्म में जो इमोशन हैं, जो सिचुएशन हैं, जो कैरेक्टर हैं, वे सब रियल है। मैं तुरंत इस कहानी से जुड़ गया। मुझे लगा कि कोई ऐसी फिल्म बना रहा है, जो पॉपुलर कमर्शियल हिंदी फिल्म है, लेकिन इतनी रियलिस्टक भी है। मुझे लगा किमुझे इसका हिस्सा होना पड़ेगा। आय वांट टू।
जैसे आप बता रहे थे कि आप डायरेक्टर बनना चाहते थे और उसकी ट्रेनिंग भी ली थी आपने और जब ये एक्टिंग का ऑफर आया तो आपने हां कर दी। आपने क्यों सोचा कि चलो एक्टिंग कर लेते हैं?
क्योंकि मुझे एक्टिंग का भी बहुत शौक है। मुझे फिल्मों का बहुत शौक है। चाहे वो रायटिंग हो या डायरेक्शन या कैमरा वर्क ....एडीटिंग भी मुझे बहुत पसंद है। मुझे गानों का बहुत शौक है। म्यूजिक बहुत सुनता हूं।
आपकी पढ़ाई-लिखाई कहां हुई है?
मेरी स्कूलिंग काफी जगहों पर हुई है। पहले मुंबई में हुई थी। मैं बॉम्बे स्कॉट्सि में था फोर्थ स्टैंडर्ड तक। उसके बाद मैं ऊटी चला गया। मैं ऊटी में बोर्डिग स्कूल में था आठवीं कक्षा तक। 9वीं और 10वीं में मैं बंगलूर में था। उसके बाद 11वीं और 12वीं मैंने अमेरिका में की। उसके बाद फिल्म स्कूल गया।
फिल्म स्कूल जाने का इरादा क्यों? आपने फिल्म स्कूल ही क्यों चुना?
मैं फिल्मों में काम करना चाहता था। मुझे फिल्मों का बहुत शौक था। मैंने थोड़ा-बहुत सोचा कि कुछ और करूं। कुछ पसंद नहीं आया। जब पंद्रह-सोलह साल का था, मुझे मालूम था कि मुझे फिल्मों में कुछ करना है। वो क्या है, ठीक से मुझे मालूम नहीं था। सोचते-सोचते मैं डायरेक्शन पर आ गया। मैं बचपन से लिखता रहा हूं। मैं छोटी-मोटी फिल्में भी बनाता था। मुझे मालूम था कि मुझे डायरेक्शन का शौक है, रायटिंग का शौक है। उस समय के एक्टरों को देख कर मुझे नहीं लगता था कि मैं ये कर सकता हूं। मैं अपने आप को उस स्टाइल में नहीं देख पाता था। मैंने सोचा नहीं था कि मैं एक्टर बनूंगा। जब ये स्क्रिप्ट आई, इसमें जो हीरो का कैरेक्टर है, वो एक सीधा-सादा नार्मल लड़का है। उसकी बॉडी नहीं है, वो डांस नहीं कर सकता। वो फाइट नहीं करता। सीधे शब्दों में कहें तो ब्वॉय नेक्स्ट डोर है। इसलिए मुझे लगा कि मैं कर सकता हूं। यह रियलिस्टिक और नेचुरल कैरेक्टर है, इसे मैं निभा सकता हूं।
आपको पहली बार यह कब एहसास हुआ कि आप फिल्म फैमिली से हैं और आपकी फैमिली के लोग एक्टर हैं, डायरेक्टर या नाना जी हैं वो फिल्म वाले हैं।
मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया, क्योंकि हमारी फैमिली फिल्मी नहीं है। मतलब हम फिल्मी पार्टियों में नहीं जाते थे। मैं कभी दूसरे एक्टर, डायरेक्टर या प्रोडयूसर के बच्चों के साथ नहीं खेलता था। कभी उनसे मिला भी नहीं हूं। मेरे जो स्कूल के दोस्त थे, मैं उनके साथ खेलता था। हमारी जो फैमिली फ्रेंड हैं वो फिल्मों में काम नहीं करते हैं। मुझे मालूम था कि मेरी फैमिली के लोग फिल्मों में काम करते हैं। क्योंकि मैं सेट पर जा चुका था, एडीटिंग, शूटिंग देख चुका था, लेकिन वो जो फिल्मी-फिल्मी जिसको कहते हैं, वो मैंने कभी देखा नहीं था। और आज तक मैंने नहीं देखा है। हमारी सोच ऐसी नहीं है।
पहली बार कब किसी सेट पर गए थे आप?
जब मैं तीन-चार साल का था। कयामत से कयामत तक की शूटिंग पर गया था। मैंने उसमें एक छोटा रोल भी किया था। मैंने आमिर मामू का बचपन का रोल किया। उसमें शायद एक-दो शॉटस हैं। जो जीता वही सिकंदर में थोड़ा बड़ा रोल है। फिर से आमिर मामू का बचपन। उसके लिए मैंने शायद पांच-छह दिनों की शूटिंग की थी। बचपन से मैं सेट पर जाता रहा हूं, लेकिन मैंने हमेशा उसे ऐसे देखा कि ये काम है। ये नहीं कि ये कुछ ग्लैमरस है या यहां स्टार हैं। मुझे बस ये नजर आया कि ये काम है। लोग सबेरे उठते हैं, नहा कर काम पर जाते हैं, वो शॉट डायरेक्ट करते हैं, कोई एक्टिंग कर रहा है, कोई कैमरा चला रहा है। कोई अपना शॉट देख रहा है, काम कर के शाम को वापस घर लौट आते हैं। हम भी ऐसे ही काम करते हैं।
इस फिल्म के बारे में और कुछ बताएं। एक्टर बनने की क्या चुनौतियां हैं। उनके लिए किस तरह की तैयारी करनी पड़ी?
हमने काफी तैयारी की है। अब्बास हमेशा चाहते थे कि कैरेक्टर बहुत नैचुरल लगे और हर कैरेक्टर के बीच की रिलेशनशिप असली लगे। फिल्म देखते समय लोग ऐसा न लगे कि हीरो के दोस्त और हीरोइन की सहेलियां हैं। लोगों को लगना चाहिए कि ये छह-सात लड़के-लड़कियां हैं। ये दोस्त हैं। हमने वर्कशॉप किए। हम लोग सात-आठ दिनों के लिए पंचगनी गए थे। हमने स्क्रिप्ट रीडिंग की। हमने डांस प्रैक्टिस किया। एक्टिंग केलिए भी वर्कशॉप किया अब्बास के साथ। अब्बास ने जोर दिया कि हम खुद कुछ सोचें कैरेक्टर के बारे में। हम खुद कैरेक्टर को डेवलप करें। वो कहते थे कि सीन कैसे करेंगे आप? आप बैठे रहेंगे, खड़े रहेंगे, आप क्या करेंगे। आप सोचो। उन्होंने हमें कभी डायरेक्शन नहीं दिया। बहुत आजादी दी कि आपको जैसे करना है, आपको जो सही लगे, आप वैसे करें और आपको जो नेचुरल लगे। उन्होंने कहा कि मुझे एक्टिंग-एक्टिंग बिल्कुल नहीं दिखनी है। एकदम रियलिस्टिक होना चाहिए। हमारी सोच है कि हिंदी फिल्मों के हीरो को हीरो होना चाहिए। ये जो कैरेक्टर है, ये हीरो हीरो नहीं लग रहा है। इतना सीधा-सादा नार्मल सा लड़का है। मेरा सोच थी कि मुझे अच्छे कपड़े पहनने चाहिए, मेरा अच्छा हेयर स्टाइल होना चाहिए। अब्बास उन सभी बातों के लिए मना कर रहे थे। शुरूआत में मुझे थोड़ा अजीब लगा कि शायद डायरेक्टर पागल हो गया है।
लेकिन इमरान और फिल्म के किरदार जय सिंह राठौड़ में फर्क तो रहा होगा?
जय सिंह राठौड़ का कैरेक्टर बिल्कुल मेरे जैसा है। मुझे लगा कि अब्बास ने मुझे देखकर ये कैरेक्टर बनाया है। जय के कुछ प्रिंसिपल है, वह गांधीवादी है। वह बहुत शांत है। अहिंसा में यकीन करता है। कम बात करता है, ज्यादा सोचता है और मैं भी ऐसे ही हूं।
लेकिन पर्दे पर उसे उतारने में दिक्कत तो हुई होगी?
नहीं, कोई दिक्कत नहीं हुई। क्योंकि वर्कशॉप के वजह से बहुत फायदा हुआ। दूसरा ये है कि उसकी पर्सनैलिटी से मेरी पर्सनैलिटी मिलती है। मैं उसे बहुत आसानी से समझ सकता था।
अच्छी बात है कि आपकी तरफ से कोई घबराहट जैसी चीज दिख नहीं रही है। फिर भी आप से उम्मीदें हैं और उन उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए आप कितने चिंतित हैं? दबाव तो महसूस कर रहे होंगे।
मैं ज्यादा सोचता नहीं हूं उसके बारे में। मुझे लगता है कि अगर आप इसके बारे में सोचेंगे तो आप इतना घबरा जाएंगे, इतना डर जाएंगे कि कुछ कर नहीं पाएंगे। मैं यह सोचता हूं कि मेरे सामने क्या काम है? आज मुझे क्या करना है? आज मुझे सेट पर जाकर तीन सीन पूरे करने हैं तो मेरी चिंता यह होगी कि मैं कितने अच्छे तरीकेसे उसे कर लूं। ईमानदारी से अपना काम करूं। अगर मेरा काम अच्छा नहीं लगे तो उसमें मैं कुछ कर नहीं सकता हूं। अगर मैं ये बैठकर सोचूं कि लोगों की ये उम्मीदें हैं तो मैं डर के मारे कुछ नहीं कर पाऊंगा।
कभी ऐसा हुआ कि अचानक रात में या कभी परेशान होकर आपने कहा कि मामू आप मुझे बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए या अब्बास बताओ कि मुझे क्या करना है?
मैं मामू से काफी बार पूछ चुका हूं कि कभी-कभी मुझे लगा कि यह ठीक से नहीं जा रहा है। कुछ प्रोब्लम्स हैं। मुझ में यह कमी है। मैं यह ठीकसे नहीं कर पा रहा हूं या फिल्म में यह प्रोब्लम है। आमिर मामू ने मुझे समझाया ़ ़ ़ मेरा एक्सपीरियेंश कम हैं। जो वे देख सकते हैं, वो मैं नहीं देख सकता हूं। जब मुझे लग रहा है कि यह प्रोब्लम है। आमिर मामू कहते थे कि आप पूरी फिल्म को देखो। मैं एक छोटे से प्रोब्लम को लेकर फंस गया था कि इस सीन में मेरा कॉस्टयूम खराब है। आमिर मामू ने कहा कि पूरी फिल्म को देखो। फिल्म यहां शुरू होती है और आप अंत में अगर ऐसा कॉस्टयूम पहन रहे हैं या कोई दूसरा कास्टयूम पहन रहे है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अगर लोगों को फिल्म यहां तक पसंद आएगी, तो एक कमीज की वजह से लोग नाराज नहीं हो जाएंगे। उनको यह नहीं लगेगा कि फिल्म बकवास है। अगर लोगों को फिल्म यहां तक पसंद नहीं आई तो आपके शर्ट को देख कर इम्प्रेस नहीं हो जाएंगे। अगर उनको इम्प्रेस होना है, तो वो पूरी फिल्म से इम्प्रेस हो जाएंगे। ये उनका एक्सपीरियेंश है।
और क्या टिप्स दिए हैं आमिर ने आपको।
टिप्स काफी कम दिए हैं उन्होंने।
वो परफेक्शनिस्ट हैं तो कुछ न कुछ असर डाला होगा उन्होंने। देखो भाई काम जो होना चाहिए, वह बेहतर होना चाहिए। कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। दबाव बन जाता है। सही स्थिति क्या है?
सही सिचुएशन यह है कि उन्होंने बहुत सोच-समझ कर पिक्चर बनाई है। उन्होंने अब्बास से बहुत सवाल किए कि आप फिल्म कैसे बनाएंगे, क्या करना है? उन्होंने मुझ से भी अनेक सवाल किए। मुझे उनके लिए दुबारा ऑडिशन देना पड़ा। पहले मैंने ऑडिशन दिया था और अब्बास ने मुझे चुन लिया था। आमिर मामू को चेक करना था कि वाकई मैं काम कर पाऊंगा या नहीं। ये नहीं कि उन्होंने मुझे बस ऐसे ले लिया। उन्होंने काफी जोर दिया कि.... जब मैं काम कर रहा हूं तो मुझे अपने काम पर पूरा ध्यान देना है। दस-पंद्रह दिनों की शूटिंग के बाद मैं अब्बास केसाथ बदतमीजी कर रहा था। हम बहुत सारे यंग एक्टर थे। सब 20-21 साल के थे तो हम थोड़ी मस्ती कर रहे थे। एक दिन आमिर मामू ने मुझे पकड़ कर कहा कि, देखो इमरान जब तुम काम कर हो तो आपको सिर्फ काम का सोचना है। आपको अपने डायरेक्टर को पूरा सपोर्ट देना है। क्योंकि वह अपनी फिल्म बनाने की कोशिश कर रहा है। और बहुत बार होता है फिल्म इंडस्ट्री में कि डायरेक्टर को कोई सपोर्ट नहीं देता। स्टार उनको डेट नहीं देते हैं। प्रोडयूसर उनको कह रहा है कि पैसे कम खर्च करो, विदेश मत जाओ, यहीं शूट करो। आप सपोर्ट नहीं करेंगे तो उसे जिस तरीके से फिल्म बनानी चाहिए,वह फिल्म नहीं बना पाएगा। आपको हमेशा वहां रहना चाहिए। उनको कभी मत कहो कि छह बज गए मुझे घर जाना है। मुझे भूख लगी है, मुझे ये है, मुझे वो है ़ ़ ़ भूख तो उसे भी लगी है न? लेकिन वह फिल्म बना रहा है। आप भी फिल्म बनाने आए हैं। आपको सपोर्ट देना है। यह मत कहो कि कल रात को मैं सोया नहीं। डायरेक्टर भी नहीं सोया होगा। वह सेट पर शायद आप से पहले आया होगा। और आपके पैकअप के बाद भी वह यहां रहेंगा और कल के शूट प्लानिंग करेगा। उसके बाद मेरी समझ में आया कि आमिर मामू काम कैसे करते हैं और वे इस वजह और इस पोजिशन पर आज ऐसे ही नहीं पहुंचेहैं।
अब्बास की तरफ से क्या सावधानियां या टिप्स आपको दी गई?
अब्बास नए डायरेक्टर हैं। उन्होंने मुझे कोई टिप्स नहीं दिया। हमने जो कुछ भी काम किया, सब मिलकर किया। अब्बास और मैं आज भाई जैसे बन चुके हैं। हम दोनों ने इतनी तैयारी की है, कास्टिंग, लोकेशन, कास्टयूम .... जो कुछ भी है, मैंने अब्बास का साथ दिया। जो कुछ भी हम कर रहे थे, हमदोनों ने बैठकर, मिलकर सोचा। इसको कैसे करें? क्या करें? इस कैरेक्टर .... सिर्फ मेरा कैरेक्टर नहीं, बाकी कैरेक्टर उनकी कास्टिंग, कॉस्टयूम .... जो कुछ भी है। मैंने उनका बहुत साथ दिया।
मंसूर खान का क्या रोल था?
मंसूर मामू का प्रोडयूसर का रोल था। वे रोज सेट पर आते थे और उनको ये देखना था कि फिल्म सही तरीके से बन रही है या नहीं? पैसे सही तरीके से खर्च हो रहे हैं या नहीं? हमारे बजट, लोकेशन और क्रिएटिव इनपुट का ध्यान रखना था। अब्बास को देखना था कि वे अपना काम कैसे कर रहे हैं? मैं कैसे परफोर्म कर रहा हूं। वे एक ब्रिज थे। प्रोडयूसर और डायरेक्टर के बीच। आमिर मामू प्रोडयूसर थे और अब्बास डायरेक्र... उन दोनों के बीच मंसूर मामू खड़े थे। अब्बास को कहते थे कि अब्बास पैसा च्यादा खर्च हो रहा है, आपको दो दिन में कम्पिलीट करना है, तीन दिन में नहीं। लेकिन अगर उनको लगता कि हमें वाकई तीन दिन चाहिए और अगर हम दो दिन में करेंगे तो सही नहीं जाएगा तो आमिर मामू को समझाते थे। अब्बास नीड मोर टाइम, आप उनको सपोर्ट करें।
कह सकते हैं कि मंसूर की फिल्में सफल रही हैं। काफी अनुभवी हैं वे। उस हिसाब से हो सकता है कुछ सीन भी बताते हों वे कि इस ढंग से करो या इसको ऐसा भी किया जा सकता है।
नहीं, बिल्कुल नहीं। क्योंकि अब्बास का काम करने का जो तरीका है वो मंसूर मामू से काफी मिलता है। उनकी स्टोरी टेलिंग की स्टाइल लगभग एक जैसी है। कहानी अब्बास ने लिखी है। स्क्रीनप्ले और डायलॉग सब उन्होंने लिखे हैं। वे जानते हैं कि उनको क्या पोट्रे करना है। कभी-कभी अगर कोई दिक्कत थी तो मंसूर मामू उन्हें सलाह देते थे कि मैं जानता हूं अब्बास तुम ये करना चाह रहे हो, लेकिन ठीक से नहीं हो रहा है। तो ऐसे करो या वैसे करो। थोड़ा-बहुत टेक्नीकल नॉलेज भी था .. एडवाइज दे रहे थे अब्बास को ़ ़ ़ किस लेंस से किया जाए वाइड शॉट लें या क्लोज जाएं। जैसे कभी बता दिया कि इस शॉट पर अब्बास अगर क्लोजअप लेंगे तो उसका इमोशनल इम्पेक्ट ज्यादा आएगा।
अब इमरान तुम्हें क्या लगता है, हिंदी फिल्मों का एक्टर बनना कितना आसान है?
बहुत मुश्किल है। क्योंकि मेरी हिंदी बहुत-बहुत कमजोर थी और आज भी काफी कमजोर है। मैं बंबई में बड़ा नहीं हुआ हूं। मैं साउथ इंडिया में बड़ा हुआ और फिर अमेरिका चला गया। जब मैंने शुरू किया था तो मैं हिंदी बिल्कुल नहीं बोलता था। मुझे एक-दो लफ्ज आते थे बस । मैंने डिक्शन पर बहुत काम किया। ये काफी मुश्किल था। मैं उतना अच्छा डांस भी नहीं करता हूं। मुझे डांस करना पसंद नहीं है। मैंने उस पर भी बहुत काम किया।
शर्मीले स्वभाव के हैं आप।
हां, मैं बहुत शर्मीले स्वभाव का हूं। आज के हीरो बहुत अच्छे डांसर हैं। वे इतने शर्मीले नहीं हैं। उनको डांस करने का बहुत शौक है। जैसे आप रितिक रोशन को देखें या शाहिद कपूर कैसे नाचते हैं। उनको डांस का बहुत शौक है। मुझे इतना शौक नहीं है। मैं उनकी तरह डांस तो नहीं कर सकता हूं.... तो मैंने बहुत काम किया डांस पर। एक्शन भी बहुत सीखना पड़ा। काफी मुश्किल रहा है। लेकिन मजा भी बहुत आता है मुझे। क्योंकि बाद में जब आप कम्पिलीट प्रोडक्ट को देखते हैं, तो लगता है कि इतना कुछ किया है। इतना कुछ काम किया है और अब पिक्चर ठीक-ठाक लग रही है। मैं ये नहीं कह सकता हूं कि पिक्चर बहुत अच्छी लग रही है। क्योंकि मुझे सिर्फकमजोरियां नजर आती हैं पिक्चर की।
क्या ऐसा लगता है कि आप इस फैमिली से न होते तो फिल्मों में आना और ज्यादा मुश्किल होता?
मुश्किल तो होता। मुझे यह भी नहीं मालूम कि अगर मैं इस फैमिली से नहीं होता तो क्या मुझे फिल्मों का इतना शौक होता? क्योंकि बचपन से मैंने सिर्फ फिल्में देखी हैं। ये देखा कि लोग शूटिंग कैसे करते हैं, एडीटिंग कैसे करते हैं। मुझे बचपन से शौक है।
हिंदी फिल्मों की क्या चीज आकर्षित करती है। चूंकि आप फिल्मों की पढ़ाई भी कर चुके हैं और फिल्म भी कर चुके हैं। हिंदी फिल्मों के साथ क्या खास बातें हैं जो आपको आकर्षित करती है। हिंदी फिल्में आपके लिए क्या है?
मुझे हिंदी फिल्मों का इमोशन बहुत अच्छा लगता है। मुझे लगता है कि जो इंग्लिश फिल्में हैं या फ्रेंच या जर्मन जो भी हैं। उनमें इतना इमोशन नहीं है, जितना हमारी फिल्मों में है। एक तो हम जो गाने डालते हैं फिल्मों में, हर गाने का एक रीजन है। हम गाने को यहां क्यों डाल रहे हैं। जब हीरो को हीरोइन से प्यार हो जाता है, वो एक गाना गाता है। अपनी दिल का हाल बताने के लिए गीत गाता। अगर दोनों रूठ गए हैं तो एक उदास गीत होगा। इस तरह हमारी फिल्मों में इमोशन आते हैं। अगर आप कोई कोई इंग्लिश फिल्म देखें तो आपको शायद इतना रोना नहीं आएगा। वो कॉमेडी फिल्में अच्छी बना लेते हैं, लेकिन इमोशन है, जो ड्रामा है, जो रोना-धोना है। वो मुझे लगता है कि हम सबसे अच्छा करते हैं।
अब किस तरह से खुद को देख रहे हैं। किस तरह की फिल्में.... क्योंकि चार तारीख को हरमन भी आ रहे हैं।
ऐसे तो मैं हरमन को जानता नहीं हूं। पर्सनली नहीं जानता हूं। लेकिन मैंने पहले ही कहा कि मैं सोचता नहीं हूं कि और लोग क्या कर रहे हैं?
उनकी फिल्म काफी बड़ी फिल्म है। साइंस फिक्सन फिल्म है। अगर मैं ज्यादा सोचूं तो मैं ज्यादा उस पर ध्यान दूंगा, मेरा फोकस उधर चला जाएगा। मुझे अपनी फिल्म पर ध्यान देना है कि हमाके पो्रमोशन कैसे चल रहे हैं। लोगों को हमारा म्युजिक पसंद आ रहा है या नहीं, हमारा ट्रेलर पसंद आ रहा है या नहीं? मेरा फिल्म देखने का इरादा तो है, क्योंकि मुझे साइंस फिक्शन पसंद है। लेकिन मैं ये भी मानता हूं और ये मैं आमिर मामू से सीखा है, वो हमेशा कहते हैं कि अगर फिल्म अच्छी है तो आप उसे मार नहीं सकते हैं और अगर फिल्म खराब है तो आप उसे बचा नहीं सकते।
हरमन के लिए क्या मैसेज देंगे आप?
आपको मालूम है? मेरी एक फ्रेंड है, वो हरमन के साथ एक दूसरी फिल्म में काम कर चुकी है। वो असिस्टेंट थी। पता नहीं कहीं शूटिंग कर रहे थे, कुछ लोग मेरी फ्रेंड के साथ बदतमीजी कर रहे थे। उसने बताया कि उस सेट पर एक ही जेंटलमेन था, वो था हरमन। उसने आकर मेरे दोस्त को बचाया। जो लोग बदतमीजी कर थे,उनसे कहा कि यहां से निकल जाओ। मैं हरमन को थैक्यू कहना चाहूंगा कि उसने मेरे फ्रेंड का साथ दिया।
वैसे हरमन की कामयाबी के लिए आप क्या कहेंगे? कोई घबराहट है क्या?
घबराहट तो नहीं है। मुझे ये भी लगता है कि हमारी इंडस्ट्री में नए टैलेंट का आना बहुत जरूरी है। नए एक्टर का, नए रायटर का, नए डायरेक्टर का। जो यंग और टैलेंटिड हो, हमें उसका सपोर्ट करना चाहिए। जितने नए एक्टर, डायरेक्टर और रायटर आएंगे, इस इंडस्ट्री का उतना ही भला होगा। मैं हरमन की कामयाबी चाहूंगा।
वो दिख रहा है कि पहली फिल्म के आने के पहले ही आप लोगों को फिल्में मिल गई हैं। दूसरी फिल्म पूरी हो चुकी है।
हां, दूसरी फिल्म पूरी हो चुकी है और तीसरी फिल्म की शूटिंग कर रहा हूं।
उसके बाद भी लगातार ऑफर आ रहे है। उस हिसाब आप समझ सकते हैं कि कितनी कमी है। इसक ा कितना फायदा उठा पा रहे हैं या किस तरह की फिल्में आप चुन रहे हैं?
किडनैप थ्रिलर है। ज्यादा कुछ कह नहीं सकता हूं उसके बारे में, क्योंकि उनके प्रोमोशन शुरू नहीं हुए। उसमें काफी सस्पेंस और ड्रामा है।
उसमें आप अकेले हैं?
नहीं, संजय दत्त हैं।
हीरोइन कौन है आपकी?
हीरोइन है मिनीषा लांबा।
दूसरी लक क्या है?
लक में अभी-अभी हीरोइन कास्ट हुई है। उसका नाम श्रुति हसन है। कमल हसन की बेटी। यह अष्टविनायक की फिल्म है। उसमें डैनी डेंजोगप्पा हैं, मिथुन चक्रवर्ती हैं और रवि किशन हैं।
कौन डायरेक्टर हैं?
सोहम।
अगले पांच सालों में इमरान खुद को कहां देख रहे हैं?
उसके बारे में सोचा नहीं है मैंने। जब कोई भी स्क्रिप्ट आती है मेरे पास। जब कोई भी प्रोजेक्ट आए, मैं हमेशा दर्शक की तरह सोचता हूं। मैं कहानी सुनता हूं और बैठकर सोचता हूं कि अगर मैंने टिकट खरीद कर यह फिल्म देखी तो मुझे पसंद आएगी या नहीं? यह नहीं सोचता हूं कॉमेडी फिल्म है या कुछ और? मैं बस सोचता हूं कि अगर मैंने टिकट खरीद कर यह पिक्चर देखी तो मेरा पैसा वसूल होगा या नहीं? अगर मुझे पसंद आया तो मैं कर लेता हूं। अगर मुझे पसंद नहीं आया तो मैं नहीं करता हूं। ज्यादा इंटेलेक्चुअल बन के कुछ फायदा नहीं है।
डायरेक्शन और रायटिंग क्या बैक बर्नर पर चला गया है?
डायरेक्शन तो फिलहाल बैक बर्नर पर चला गया है। थोड़ी-बहुत रायटिंग करता हूं, लेकिन अभी तक कुछ इतना पसंद नहीं आया है मुझे।
रायटिंग किस तरह की सिर्फ फिल्मों की रायटिंग करते हैं या क्रिएटिव रायटिंग भी करते हैं?
हां, फिल्मों की रायटिंग कर रहा हूं।
पोयम, शायरी या इस तरह के....
नहीं, मुझमें वह टैलेंट नहीं है।
प्रेम-मोहब्बत तो आपके उम्र में जरूरी है, उस फ्रंट पर क्या सोचते हैं?
मेरी गर्लफ्रेंड है। उसका नाम अवंतिका है, हम पिछले छह साल से साथ हैं। अभी आगे का कुछ सोचा नहीं है।
वह क्या करती हैं?
वह भी फिल्मों में काम करती हैं। वो प्रोडक्शन में काम करती हैं एक प्रोडक्शन कंपनी में। प्रोडयूसर हैं।