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Sunday, June 29, 2008

प्रोड्यूसर आमिर खान काफी एक्टिव हो गए हैं

मैं जाने तू ... का पहला निर्माता नहीं हूं। इसे पहले जामू सुगंध बना रहे थे। मुझे मालूम था कि इमरान अब्बास की फिल्म कर रहे हैं। उस समय मैंने इमरान से केवल इतना ही पूछा था कि क्या आपको अब्बास और फिल्म की कहानी पसंद है? उन्होंने हां कहा तो मैंने कहा कि जरूर करो। उस वक्त जामू सुगंध आर्थिक संकट से गुजर रहे थे। उन्होंने तीन फिल्में की घोषणा की थी। दो की शूटिंग भी आरंभ हो गई थी, लेकिन वे उन्हें बना नहीं पाए। जाने तू ... अभी शुरू नहीं हुई थी। तब अब्बास मेरे पास प्रोजेक्ट लेकर आए और पूछा कि क्या आप इसे प्रोडयूस करना चाहेंगे। मैंने कहानी सुनी तो कहानी अच्छी लगी। तब तक अब्बास फिल्म के चार गाने रहमान के साथ रिकॉर्ड कर चुके थे। वे गाने भी मुझे पसंद आए। फिर मैंने अब्बास से कहा कि पांच-छह सीन शूट कर के दिखाओ। उन्होंने कुछ सीन शूट किए। वे भी मुझे पसंद आए। मुझे विश्वास हुआ कि अब्बास फिल्म कर पाएंगे। फिर मैंने इमरान का स्क्रीन टेस्ट देखा। हर तरह से संतुष्ट हो जाने पर मैंने फिल्म प्रोडयूस करने का फैसला किया। जाने तू ... बनाने का मेरा फैसला पूरी तरह से गैरभावनात्मक था। ऐसा नहीं था कि इमरान के लिए फिल्म बनानी है तो फिल्म ढूंढने चलें। यह अपने आप हो गया। एक तरह से इमरान ने अपनी फिल्म खुद खोजी। मैं बाद में शामिल हो गया।
फिर भी जाने तू ... के निर्माण के फैसले के समय इमरान के भांजे होने की वजह तो काम कर रही होगी?
निर्माता के तौर पर मैं थोड़ा अलग ढंग से सोचता हूं। और मेरी पहली जिम्मेदारी दर्शकों के साथ है। अगर मुझे कहानी पसंद नहीं आती या इमरान इस फिल्म में नहीं जंचते तो मैं इमरान को नहीं लेता। सबसे पहले तो कहानी पसंद आना जरूरी है।
आमिर खान को किसी प्रोजेक्ट के लिए राजी कर पाना आसान काम नहीं है। जाहिर सी बात है कि उनकी सहमति से बनी फिल्म में खोट निकालना मुश्किल काम होगा?
ऐसा नहीं है कि मैं जो भी फिल्म बनाऊंगा, वह कामयाब ही होगी। मेरी कोशिश रहती है कि अपनी तरफ से कोई कसर न छोडं़ू। फिर फिल्म बनती है और कामयाब होती है तो वह अलग बात है।
फिल्म चुनते समय कोई और नजरिया रहा या आमिर ने अपनी पसंद के मुताबिक ही फिल्म चुनी?
फिल्म चुनते समय मैं कहानी को एक दर्शक के तौर पर सुनता हूं। उस समय मेरे दिमाग में यह नहीं रहता कि मैं फिल्म कर रहा हूं या नहीं कर रहा हूं। कोई प्रोजेक्ट लेकर आता है तो मैं यह नहीं पूछता कि आप मुझे कौन सा रोल देने वाले हैं। रंग दे बसंती की मैंने कहानी सुनी थी। फरहान की फिल्म दिल चाहता है की मैंने कहानी सुनने के बाद पूछा था कि कौन सा रोल मेरे लिए सोचा है। उन्होंने सिड सोचा था, जो आखिरकार अक्षय खन्ना ने किया। मैंने तब कहा था कि मुझे आकाश ज्यादा पसंद है। कई दफा ऐसा भी हुआ है कि मैंने कहानी सुनी है। कहानी पसंद आई है, लेकिन मुझे अपना रोल पसंद नहीं आया। तब मैंने डायरेक्टर से कहा कि आप बनाइए, लेकिन मुझे लेकर मत बनाइए।
अब्बास और इमरान की बातचीत से ऐसा लगता है कि यह फिल्म सामान्य लव स्टोरी है, जो रियलिस्टिक अंदाज में शूट की गई है। आपके नजरिये से इस में और क्या खास बात है?
कहानी सुनते समय मैं इस पर ध्यान देता हूं कि कहानी कैसे कही जा रही है। रंग दे बसंती जब मैंने की थी, उस वक्त भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद पर चार फिल्में आ चुकी थीं। ऐसा नहीं था कि उनकी कहानी में हम कुछ बदल देते। हर निर्देशक के बोलने का अंदाज अलग होता है। जाने तू ... की कहानी सुनते समय लगा कि अब्बास ने ताजा कहानी लिखी है। कैरेक्टर और संवाद अच्छे हैं। फिल्म आपको नयी लगेगी। इसमें कुछ अलग बात है। सामान्य तौर पर लव स्टोरी में माता-पिता खिलाफ रहते हैं। इस फिल्म में वैसी कोई बात नहीं है। किसी और की खिलाफत है। मुझे यह एंटरटेनिंग लगी। फिल्म दिल को छूती है। इसमें पहले की फिल्मों जैसा मैलोड्रामा नहीं है। जिंदगी की सहज सच्चाइयां फिल्म के जरिए सामने आती है।
इमरान को एक्टर के तौर पर कैसे आंकते हैं आप?
उसमें संभावनाएं हैं। वह अच्छा है। अभी उसे सीखने की जरूरत है। वह आगे जाएगा।
ऐसा लग रहा है कि प्रोडयूसर आमिर खान काफी एक्टिव हो गए हैं?
कोशिश कर रहा हूं। मैं प्रोडयूस तो तारे जमीन पर ही कर रहा था। इत्तफाक से अब्बास टायरवाला की जाने तू ... आई। ये अच्छी लगी तो मैंने कहा कि चलो इसे भी बना लेता हूं। सौभाग्य से मेरी प्रोडक्शन टीम बहुत अच्छी है। चूंकि बाद में मैं तारे जमीन पर डायरेक्ट करने लगा तो मुझे एहसास हुआ कि जाने तू.. के लिए प्रोड्यूसर की जिम्मेदारी सही तरीके नहीं निभा पाऊंगा। डायरेक्ट करते समय मैं कुछ और नहीं कर सकता। पहले सोचा कि जाने तू.. .बाद में करता हूं, लेकिन वह फैसला सही नहीं लगा। फिर मैंने मंसूर खान से कहा कि आप आकर मेरी जिम्मेदारी संभाल लो। मंसूर मान गए। उसके बाद दो और स्क्रिप्ट आई। अभिनव देव की दिल्ली बेली और अनुषा रिजवी की लिखी फिल्म, जिसे वही डायरेक्ट भी करेंगी। इन दोनों के लिए हां कह दिया है।
लोग तो जानना चाह रहे हैं कि किरण की फिल्म कब शुरू हो रही है?
किरण ने अपनी कंपनी शुरू कर दी है। उन्होंने एक स्क्रिप्ट लिखी है, जिसे वह खुद डायरेक्ट करेंगी। मुझे वह फिल्म पसंद आई है।
तो क्या उसमें आमिर हैं?
अभी मैं नहीं हूं। अगर किरण चाहेंगी तो मुझे खुशी होगी। वैसे किरण का नजरिया है कि उन्हें छोटी फिल्म बनानी है। मैंने सबकुछ किरण के ऊपर छोड़ दिया है। वह गुरिल्ला टाइप फिल्म बनाएंगी। 18-20 लोग ही प्रोडक्शन टीम में रहेंगे। दो-तीन महीनों में फिल्म की शूटिंग आरंभ हो जाएगी। उनकी कंपनी का नाम सिनेमा-73 है। उस साल किरण पैदा हुई थीं शायद..
राजकुमार हिरानी की फिल्म कब शुरू कर रहे हैं?
इस फिल्म की शूटिंग पहले शुरू हो जाएगी, लेकिन मैं एक नवंबर से इसमें शामिल होऊंगा।
अब्बास ने बताया कि आप सेट पर बिल्कुल नहीं गए?
उसकी वजह यह रही कि हमलोग तारे जमीन पर और जाने तू.. साथ-साथ शूट कर रहे थे। और फिर मंसूर सेट पर थे ही, इसलिए जरूरत नहीं थी कि मैं सेट पर जाऊं।
ऐसा देखा गया है कि मशहूर डायरेक्टर और एक्टर प्रोडक्शन में आने के बाद नए डायरेक्टरों को अवसर देने के बावजूद उनसे अपनी शैली की ही फिल्में बनवाते हैं या अपनी सोच से उन्हें प्रभावित करते हैं। आप का क्या रवैया रहा?
मैं इस तरह से नहीं सोचता। अगर मैं किसी नए डायरेक्टर या किसी और के साथ काम कर रहा हूं तो जाहिर सी बात है कि उसकी काबिलियत पर मुझे भरोसा है। वह कुछ कहना चाह रहा है, जो मुझे भी पसंद है। अब जो चीज मुझे पसंद आ चुकी है, उसे तोड़ने-मरोड़ने की जरूरत ही नहीं है। मैंने एक्टर के तौर पर भी कभी किसी के काम में हस्तक्षेप नहीं किया। हां, अगर मुझे लगेगा कि काम मुझे पसंद नहीं आ रहा है तो उसे बिल्कुल छोड़ दूंगा या फिर अपने हाथ में ले लूंगा। तारे जमीन पर के समय मुझे लगा कि फिल्म अच्छी नहीं बन पा रही है तो मैंने डायरेक्शन संभाल लिया।
नासिर साहब ने आपको लेकर फिल्म बनाई थी। आपने उनके नाती इमरान के साथ फिल्म बनाई। लगता है कि एक चक्र पूरा हो गया?
हां, बगैर किसी योजना के यह चक्र पूरा हो गया। और अगर आज नासिर साहब होते तो बहुत खुश होते।

Saturday, June 28, 2008

किरण राव ने बनायी अलग प्रोडक्शन कंपनी

आमिर खान की पत्नी किरण राव ने सिनेमा 73 नाम से अपनी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी बनायी है। वह अपनी पहली फिल्म इसी बैनर तले बनाएंगी। निर्देशन में आशुतोष गोवारीकर की सहायक रह चुकी किरण राव आमिर खान से शादी करने के बाद से सुर्खियों में रही हैं। आमिर खान से उनकी शादी के बाद से ही कयास लगाए जा रहे हैं कि वह आमिर खान प्रोडक्शन के लिए किसी फिल्म का निर्देशन कर सकती हैं, जिसमें स्वाभाविक रूप से आमिर खान होंगे। आमिर खान ने इन सभी कयासों पर विराम लगाते हुए स्पष्ट कहा कि किरण ने अपनी कंपनी खड़ी कर ली है और वह उसी बैनर से फिल्म बनाएंगी, जिसमें उनके होने की संभावना नहीं है।
हैदराबाद में गजनी की शूटिंग कर रहे आमिर खान ने खास बातचीत में किरण की फिल्म की घोषणा के बारे में पूछने पर कहा, किरण ने सिनेमा 73 नाम की कंपनी बनायी है। वह अपने बैनर तले एक छोटी फिल्म बनाना चाहती हैं। फिल्म की स्क्रिप्ट उन्होंने स्वयं लिखी है और वह खुद इसे निर्देशित करेंगी। मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी है। मुझे वह फिल्म पसंद आई। किरण की फिल्म में स्वाभाविक रूप से आमिर खान तो होंगे ही? इस सवाल पर हंसते हुए आमिर खान ने कहा कि अभी तक तो मैं नहीं हूं। हां, किरण चाहेंगी तो मुझे खुशी होगी। आमिर खान ने आगे कहा कि वह इस फिल्म को छोटी प्रोडक्शन टीम के साथ गुरिल्ला टाइप से बनाना चाहती हैं। अगले दो-तीन महीनों में फिल्म की शूटिंग आरंभ हो जाएगी।

ठंडी और सपाट 'वाया दार्जिलिंग'

-अजय ब्रह्मात्मज
खुशी इस बात की है एनएफडीसी की फिल्म नियमित सिनेमाघरों में रिलीज हुई, लेकिन गम इस बात का है कि एनएफडीसी की फिल्म अभी तक अपने ढर्रे से बाहर नहीं निकल सकी है। अरिंदम नंदी शिल्प, कथ्य और प्रस्तुति में कला फिल्मों के नाम पर बदनाम हो चुकी शैली में जकड़े हुए हैं। वाया दार्जिलिंग आखिरकार निराश करती है।हनीमून के लिए दार्जिलिंग गए नवदंपती में से पति लौटने के दिन गायब हो जाता है। मामले की तहकीकात कर रहे पुलिस अधिकारी राबिन रहस्य की तह तक नहीं पहुंच पाते। सालों बाद दोस्तों की महफिल में वह उस घटना की बातें करते हैं। वहां मौजूद दूसरे दोस्त उस घटना के कारण और परिणाम की अलग-अलग व्याख्या करते हैं। एक ही घटना के चार अंत सुनाए और दिखाए जाते हैं।अरिंदम नंदी ने रोशोमन से मशहूर हुई एक कहानी अनेक अंत की शैली तो अपना ली है, लेकिन अपनी अनेकता में वह रोचकता नहीं बनाए रख पाते। हर व्याख्या में कुछ खामियां और कमियां हैं, जिनके कारण रहस्य कौतूहल पैदा नहीं करता। फिल्म की मूल कहानी में गति और रोचकता है, लेकिन व्याख्याओं का चित्रण बिल्कुल ठंडा और सपाट है। केके मेनन, रजत कपूर और विनय पाठक जैसे एक्टर भी एक जैसी फिल्मों और एक जैसी भूमिकाओं में अब नीरस लगने लगे हैं। संभवत: निर्देशक इन प्रतिभाशाली एक्टरों को भूमिकाओं की चुनौती नहीं दे पा रहे हैं। दोष एक्टरों का यही है कि वे भी आजमाए हुए फार्मूलों में बंध गए हैं। प्रशांत नारायण एकआयामी अभिनेता हैं और संध्या मृदुल के अभिनय की एकरसता साफ झलकती है।वाया दार्जिलिंग में दार्जिलिंग की खूबसूरती नहीं उभर सकी है। फिल्म के परिवेश से नहीं जाहिर होता कि हम बंगाल में बन रही कोई फिल्म देख रहे हैं। अरिंदम नंदी कथित हिंदी फिल्म बनाने की कोशिश में विफल रहे हैं।

थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक:और परी को प्यार हो गया

थोडा प्यार, थोडा मैजिक चौंके नहीं। पर्दे पर फिल्म का नाम हिंदी में ऐसे ही आता है- थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक। ड के नीचे बिंदी लगाना पब्लिसिटी डिजाइनर भूल गया और हमारे निर्माता-निर्देशकों का हिंदी ज्ञान इतना नहीं होता कि वे ड और ड़ का फर्क समझ सकें। प्रसंगवश पिछले दिनों पांचवी पास के एक इवेंट में किंग खान शाहरुख भी पढ़ो को पढो लिखते पाए गए थे। बहरहाल, थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक रोचक फिल्म है। इस तरह की फिल्में हम पहले भी देख चुके हैं। विदेशों में कई फिल्में इस विधा में बनी हैं। उनमें से कुछ के दृश्य तो थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक में भी लिए गए हैं। मौलिकता की शर्त थोड़ी ढीली करने के बाद फिल्म देखें तो मजा आएगा। रणबीर तलवार के जीवन की एक दुर्घटना उनके वर्तमान और भविष्य को बदल देती है। उनकी गलती से एक दंपती की सड़क दुर्घटना में मौत हो जाती है। जज महोदय अनोखा फैसला सुनाते हैं, जिसके तहत मृत दंपती के चारों बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी रणबीर को सौंप दी जाती है। रणबीर और चारों बच्चों के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। स्थिति यह आती है कि दोनों ही पक्ष भगवान से कुछ करने की गुहार लगाते हैं। थ्री पीस सूट और फ्रेंच दाढ़ी के भगवान (ऋषि कपूर) एक परी को गीता (रानी मुखर्जी) नाम से धरती पर भेजते हैं। वह अपनी जादुई शक्ति और इमोशनल युक्ति से चारों बच्चों और रणबीर को जोड़ देती है। इस प्रक्रिया में वह खुद भी बदल जाती है। परी को इंसान से प्यार हो जाता है। उसकी आंखों में भी आंसू आ जाते हैं और वह आंसू में छिपी खुशी और प्यार के दर्द के अहसास से भर जाती है। कुणाल कोहली ने पहले बन चुकी फिल्मों की थीम को नए तरीके से पेश किया है। दुलाल गुहा की फिल्म दुश्मन में भी कुछ ऐसी ही कहानी थी। एक सड़क दुर्घटना के दोषी राजेश खन्ना को विधवा मीना कुमारी की मदद के लिए उसके पास जाकर रहना होता है। कुणाल कोहली फिल्म पत्रकार के तौर पर भले ही नकल करने पर दूसरे निर्देशकों का मखौल उड़ाते रहे हों। अपनी बारी आई तो वह भी नकल करने से नहीं चूके। चूंकि इस तरह की फिल्में एक स्तर पर दर्शकों के दिलों को छू लेती हैं, इसलिए कुणाल नकल के बावजूद अपने प्रयास में सफल हो जाते हैं। हां, उन्होंने बच्चों से सुंदर काम लिया है। बच्चे स्वाभाविक और प्रिय लगते हैं। उनकी मासूमियत कहानी को मार्मिक बनाती है। सैफ अली खान अपने किरदार के साथ न्याय करते हैं। उनका खिंचा और तनाव युक्त चेहरा उनकी कठोरता जाहिर नहीं कर पाता, लेकिन हल्के-फुल्के दृश्यों में वे सटीक लगते हैं। रानी मुखर्जी लंबे समय के बाद नेचुरल लगी हैं। शायद यह किरदार का असर हो। फिल्म का गीत-संगीत सुना हुआ लगता है। प्रसून जोशी और शंकर एहसान लाय ने मिलकर लगभग ऐसा ही गीत-संगीत तारे जमीन पर में भी दिया था। दूसरी बात जो अखरती है, वह परिवेश का मनमर्जी से बदलना दिल्ली से लास एंजिलिस और फिर दिल्ली.. ऐसे आगे-पीछे के दृश्यों में आते हैं कि निर्देशक के दृश्य संयोजन पर शक होता है।

Friday, June 27, 2008

वेब दुनिया पर चवन्नी चैप

चवन्नी चैप, फिल्मों पर बढ़िया खेप
-रवींद्र व्यास
हिंदी में फिल्मों पर बेहतर साहित्य का अभाव है। यदि आप हिंदी पत्रिकाओं-अखबारों पर सरसरी निगाह ही डालेंगे तो पाएँगे कि यहाँ किसी भी फिल्म पर औसत दर्जे के चलताऊ किस्म के लेख ज्यादा मिलेंगे। इनका स्वाद भी कुछ-कुछ चटखारेदार होता है। उसमें फूहड़ किस्म की टिप्पणियाँ होती हैं और जो जानकारियाँ दी जाती हैं उनमें अधिकांश में गॉसिप होते हैं। फिल्म समीक्षाओं का लगभग टोटा है। जो समीक्षाएँ छपती हैं उनमें आधी से ज्यादा जगह कहानी घेर लेती है। बचे हिस्से में कुछ सतही पंक्तियाँ भर होती हैं जैसे- संगीत मधुर है और फोटोग्राफी सुंदर है। अभिनय ठीक-ठाक है। लेकिन इस परिदृश्य में कुछ फिल्मी पत्रकार हैं, जो फिल्मों पर औसत दर्जे से थोड़ा ऊपर उठकर कुछ बेहतर लिखने की कोशिश करते हैं। यदि फिल्मों पर आपको ठीकठाक लेख या टिप्पणियाँ पढ़ना हो तो आपके लिए अजय ब्रह्मात्मज का ब्लॉग चवन्नी चैप एक बेहतर विकल्प हो सकता है। कई लोग उनके इस ब्लॉग का नाम चवन्नी छाप लिखते हैं लेकिन इसकी पोस्ट्स पढ़कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह कतई चवन्नी छाप नहीं है। फिल्मों में दिलचस्पी रखने वाले प्रेमियों को इस ब्लॉग में हर तरह की टिप्पणियाँ, जानकारियाँ, नई-पुरानी फिल्मों की समीक्षाएँ, नए-पुराने निर्देशकों और अभिनेता-अभिनेत्रियों पर लेख मिल जाएँगे। फिल्म संगीत और गीत पर रोचक टिप्पणियाँ मिल जाएँगी और अच्छी कहानी के लिए तरसती हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बारे में भी पठनीय सामग्री हाथ लग सकती है। यही नहीं, अमिताभ बच्चन से लेकर ऐश्वर्या राय और आशुतोष गोवारिकर से बेहतर साक्षात्कार भी पढ़ने को मिल जाएँगे। चवन्नी चैप पर बीस जून की एक पोस्ट समांतर सिनेमा के दिग्गज फिल्मकार श्याम बेनेगल पर केंद्रित है। बेनेगल को बैंकॉक में नौवें आईफा अवार्ड समारोह में लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। बेनेगल पर एक टिप्पणी में कहा गया है कि अक्सर बिमल राय से लेकर श्याम बेनेगल तक को महान फिल्मकार बताते रहे हैं लेकिन क्या हमने इन महान फिल्मकारों को निजी तौर पर परखा, देखा और समझा है? आप आसपास पूछकर देख लें, संभव है अधिकांश ने उनकी फिल्में देखी भी न हों। अजयजी अपनी इस टिप्पणी में श्याम बेनेगल को कोट करते हैं।कई दूसरे निर्देशकों के साथ मैं भी फिल्में निर्देशित कर रहा था। हम सभी यही चाहते थे कि सिनेमा सिर्फ पलायन और मनोरंजन का माध्यम नहीं बना रहे। देश के प्रमुख समीक्षक चिदानंद दासगुप्ता ने अपने एक लेख में कहा है कि अगर सत्यजीत राय की फिल्में टैगोर के प्रबोधन का चित्रण करती हैं, तो श्याम बेनेगल की फिल्मों में हम नेहरू के भारत को देख सकते हैं, क्योंकि लोकतंत्र, धर्म निरपेक्षता, अवसर की समानता, मानव अधिकार और नारी अधिकार आदि मामलों में श्याम बेनेगल ने ही नेहरू की सोच को फिल्मों में प्रतिस्थापित किया। हिंदी फिल्मों में सामाजिक दृष्टि से इतना सचेत और जागरूक दूसरा कोई फिल्मकार शायद नहीं है।यह सही है यदि हम श्याम बेनेगल की अंकुर, मंथन, मंडी, त्रिकाल, कलयुग फिल्में देखें तो कहा जा सकता है कि इस फिल्मकार ने हिंदी सिनेमा को नई सिनेमा भाषा और तेवर दिए हैं। इस ब्लॉग पर मंदा ही रहा धंधा टिप्पणी में कहा गया है कि सरकार राज से लेकर समर फिल्म के बावजूद बॉलीवुड का धंधा ठंडा रहा है। एक टिप्पणी अभिनेत्री करीना कपूर बनाम ब्रांड बेबो में करीना के विभिन्न प्रोडक्ट्स के लिए विज्ञापन करने पर की गई है और जानकारी दी गई है कि वे विज्ञापनों से सबसे ज्यादा आय कमाने वाली अभिनेत्री बन गई हैं। फिल्म समीक्षाओं के तहत इसमें एकदम नई फिल्म मेरे बाप पहले आप और सरकार राज से लेकर साँवरिया और ओम शांति ओम पर समीक्षाएँ हैं। सरकार राज पर रामगोपाल वर्मा के फिल्मों में एक खास तरह के माहौल रचने की कुशलता की तारीफ की गई है लेकिन साथ ही यह कहा गया है कि बतौर एक पूरी फिल्म यह उनकी एक और असफल फिल्म है। मेरे बाप पहले आप के बारे में कहा गया है कि इसमें प्रियदर्शन दोहराव के शिकार हुए हैं जबकि फराह खान निर्देशित फिल्म ओम शांति ओम के बारे में अजयजी ने लिखा है कि फिल्म इंटरवल तक रोचक है लेकिन इसके बाद पुनर्जन्म और फालतू ड्रामेबाजी में उलझकर रह गई है। हाँ, उन्होंने समर को एक सामाजिक सरोकार वाली फिल्म बताकर तारीफ की है। किशोर कुमार की फिल्म हॉफ टिकट के बहाने किशोर कुमार पर एक अच्छी टिप्पणी है जिसमें उनकी बहुमुखी प्रतिभा के गुण गिनाते हुए उनका प्रशस्ति गान किया गया है। चवन्नी चैप की फिल्म की हर नई बातों पर नजर है। यह इससे साफ होता है कि उन्होंने दो नए सितारों पर एक लेख दिया है जिसमें लव स्टोरी २०५० में हरमन बावेजा और जाने तू या जाने ना फिल्म में इमरान खान की संभानाओं पर बात की है। जहाँ तक साक्षात्कार का सवाल है, अधिकांश साक्षात्कार बहुत ही सतही सवालों से भरे होते हैं और उनके उत्तर भी लगभग उतने ही सतही होते हैं। लेकिन चवन्नी चैप में साक्षात्कार पढ़ने का मजा है क्योंकि यहाँ अभिनेता-अभिनेत्रियों और निर्देशक से कुछ अच्छे और बेहतर सवाले पूछे गए हैं। लिहाजा उनके उत्तर भी अच्छे और बेहतर हैं। इसलिए अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय और आशुतोष गोवारिकर के इंटरव्यू रोचक और पठनीय हैं। अमिताभ बच्चन का इंटरव्यू तो अमिताभ के ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है। अच्छी कहानी के लिए तरसती हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इसके लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं, इसकी जानकारी दी गई है। बिग बी, आमिर खान और सलमान खान के ब्लॉग लिखे जाने को लेकर भी अच्छे लेख हैं। यही नहीं, जापानी लोक कला, एकेडमी अवार्ड आदि विषयों पर लेख पढ़ने को मिलेंगे। उनका यूआरएल है http://chavannichap.blogspot.com/

Thursday, June 26, 2008

सम्राट अशोक के रूप में दिखेंगे अमिताभ

-अजय ब्रह्मात्मज
रिलाएंस बिग एंटरटेनमेंट और बिग बी की कंपनी एबी कॉर्प के बीच हुए 1500 करोड़ केसंयुक्त निर्माण की खबरों में जिन चार निर्देशकों का नाम आया है, उनमें से एक डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी हैं।
डॉ द्विवेदी अमिताभ बच्चन को अपनी फिल्म में सम्राट अशोक के रूप में पेश करेंगे। पीरियड सीरियल और फिल्म के लिए मशहूर डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने नयी फिल्म केलिए मौर्य काल को चुना है। उनके करीबी सूत्रों के मुताबिक फिल्म में पिता अशोक और पुत्र कुणाल के संबंधों के साथ ही कुणाल की सौतेली मां तिष्यरक्षिता की कहानी रहेगी।
डॉ द्विवेदी ने इस फिल्म का लेखन लगभग पांच साल पहले आरंभ किया था,लेकिन बीच में पिंजर में व्यस्त हो जाने के कारण उसे रोक दिया था। डॉ द्विवेदी के एक मित्र के मुताबिक विश्व भर में फैले आतंकवाद, घृणा, युद्ध और हिंसा के माहौल के खिलाफ इस फिल्म की कल्पना की गई थी। सभी जानते हैं कि कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक बौद्ध हो गए थे। इस फिल्म में दया, करुणा, क्षमा और मैत्री के भाव पर जोर है। सम्राट अशोक के जीवन की एक महत्वपूर्ण नाटकीय घटना पर आधारित इस फिल्म की का संदेश आज के लिए प्रासंगिक और उपयुक्त है।
डॉ द्विवेदी के करीबी सूत्रों के मुताबिक अभी तक केवल अमिताभ बच्चन की भूमिका सुनिश्चित है। अन्य चरित्रों केलिए उपयुक्त कलाकारों के चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। उम्मीद की जा रही है कि मानसून के बाद इस फिल्म की शूटिंग आरंभ होगी। इंटरनेशनल स्तर की इस फिल्म का शोध कार्य पूरा हो चुका है और स्क्रिप्ट तैयार है।

फिल्मी कारोबार खुले हैं नए द्वार

-अजय ब्रह्मात्मज
अभी तक हम यही जानते और मानते हैं कि फिल्में यदि बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करतीं, तो निर्माता घाटे में रहता है और इसीलिए उक्त फिल्म से जुड़े स्टारों का बाजार भाव गिर जाता है। यह सच जरूर है, लेकिन फिल्मों के व्यापक कारोबार का यह पूरा सच नहीं है। इन दिनों फिल्मों की कमाई के कई नए द्वार खुल गए हैं। आमतौर पर हिंदी फिल्मों का निर्माता अगर अपनी फिल्म रिलीज कर लेता है, तो वह नुकसान में नहीं रहता। तत्काल वह फायदे में भले ही नहीं दिखे, लेकिन एक अंतराल में वह निवेशित राशि निकाल ही लेता है। इसीलिए लगातार फ्लॉप हो रहीं फिल्मों के बावजूद निर्माता नई फिल्मों की घोषणाएं करते ही रहते हैं।
दरअसल, पहले बॉक्स ऑफिस कलेक्शन ही फिल्मों की आय का मुख्य जरिया था, क्योंकि फिल्में 25 हफ्तों और 50 हफ्तों तक सिनेमाघरों में टिके रहने के बाद निर्माताओं और स्टारों के चेहरे पर मुस्कान लाती थीं, लेकिन सच तो यह है कि अब चेहरे पर यह मुस्कान 25 और 50 दिनों में ही आ जाती है। कुछ फिल्में तो सप्ताहांत के तीन दिनों में ही फायदा दिखाने लगती हैं। एक सच यह भी है कि लगभग एक हजार प्रिंट एक साथ सिनेमाघरों में रिलीज कर बड़े निर्माता आरंभिक तीन दिनों में ही लाभ सुनिश्चित कर लेते हैं। इसके लिए आक्रामक प्रचार, डिस्ट्रीब्यूशन का अच्छा नेटवर्क और सही थिएटरों के चुनाव जैसे कारक महत्वपूर्ण होते हैं। गौरतलब यह है कि इस तरह की तात्कालिक कमाई में मल्टीप्लेक्स की खास भूमिका होती है। पिछले दिनों हमने देखा कि टशन की रिलीज के समय मल्टीप्लेक्स के मालिक और यशराज फिल्म्स के बीच सहमति नहीं होने से यशराज फिल्म्स को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इसके बावजूद टशन से यशराज फिल्म्स को लाभ होगा, क्योंकि और कई तरीकों और नए द्वारों से टशन ने कारोबार किया है। फिल्म कारोबार की ये सहयोगी गतिविधियां फिल्म रिलीज होने के पहले से आरंभ हो जाती हैं। फिल्म के निर्माण और प्रचार में मुख्य रूप से निर्माता निवेश करते हैं। निर्माण और प्रचार के दौरान स्पांसर, इवेंट और इन फिल्म मार्केटिंग के जरिए वे आवश्यक खर्च की भरपाई कर लेते हैं। इन दिनों फिल्मों के ऐसे मार्केटिंग एजेंट उभर आए हैं, जो फिल्म के निर्माण और प्रचार में निर्माता-निर्देशक की मदद करते हैं। उनकी आर्थिक चिंताओं को कम करने में इन पेशेवर एजेंटों की भूमिका बढ़ती जा रही है। टशन, एसिड फैक्ट्री और मिशन इस्तांबुल जैसी फिल्मों के आक्रामक प्रचार को बाजार का जबर्दस्त समर्थन मिलता है। पॉपुलर स्टारों और बड़े बैनरों की फिल्मों के लिए नए किस्म का कारोबार लाभदायक सिद्ध होता है।
गौर करें, तो फिल्म आरंभ होने के पहले ही इन दिनों अलग-अलग किस्म के पार्टनर और स्पांसर की लंबी-चौड़ी लिस्ट आती है। इस लिस्ट में शामिल प्रोडक्ट फिल्म की लागत को कम करते हैं। निर्माण के समय कंज्यूमर प्रोडक्ट की इन फिल्म प्लेस्मेंट से लेकर होर्डिग, न्यूज पेपर ऐड, रेडियो प्रचार और टीवी प्रोमो के लिए की गई पार्टनरशिप से निर्माता का धन बचता है। बचा हुआ धन एक तरह से निर्माता के लाभ को बढ़ाता है। इसके अलावा, रिंग टोन, स्क्रीन सेवर, इमेजेज आदि से भी फिल्मों की कमाई बढ़ती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इधर फिर से म्यूजिक इंडस्ट्री में उछाल दिख रहा है। टी-सीरीज और बिग म्यूजिक फिल्म संगीत के होशियार व्यापारी के रूप में सामने आ रहे हैं। फिल्मों के म्यूजिक राइट में भी बढ़ोत्तरी हुई है।
फिल्म की रिलीज से पहले बाजार के समर्थन से फिल्मों के जबरदस्त प्रचार की नई रणनीति उभरी है। एसिड फैक्ट्री का ही उदाहरण लें, तो इस निर्माणाधीन फिल्म से संबंधित इवेंट के आयोजनों ने इसे बड़ी फिल्म के तौर पर स्थापित कर दिया है। ऐसा लग रहा है कि संजय गुप्ता के कैंप से स्टाइलिश और बड़ी फिल्म आ रही है। फिल्म क्या है, यह तो बाद में पता चलेगा! दरअसल.. बाजार किसी भी फिल्म को इसलिए गर्म करता है कि वह उसके जरिए अपने प्रोडक्ट के कुछ ग्राहक बना ले। फिल्म की क्वालिटी या बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन में ऐसे स्पांसर और ब्रैंड की कोई रुचि नहीं रहती है। वे रिलीज के पहले ही हाइप करते हैं और अपने प्रोडक्ट के ग्राहक जुटा लेते हैं। फिल्म निर्माताओं को इससे फायदा ही होता है। उनकी फिल्म का प्रचार होता है और बगैर खर्च किए फिल्म का बाजार बनता है।

Wednesday, June 25, 2008

बॉक्स ऑफिस:२६.०६.२००८

सिनेमाघर खाली...दे ताली
पिछले हफ्ते रिलीज हुई दे ताली, हाल-ए-दिल और खुश्बू तीनों फिल्मों के दर्शकों को मिला दें तो भी दर्शकों का प्रतिशत सौ के करीब नहीं पहुंचेगा। सबसे अधिक दर्शक दे ताली को मिले, लेकिन उसके शो में भी सिनेमाघर खाली ही रहे। आरंभिक दिनों में इस फिल्म का कलेक्शन तीस से चालीस प्रतिशत रहा। फिल्म के प्रचार से दर्शकों का आकर्षण बना था, लेकिन पहले ही शो के बाद दर्शक निराश हो गए। हाल-ए-दिल में कुमार मंगत की बेटी लांच हुई हैं। उनके साथ दो नए स्टार अध्ययन सुमन और नकुल मेहता हैं। यह फिल्म अमिता पाठक के लिए बनायी गयी थी, लेकिन वह दर्शकों को पसंद नहीं आई। हां, नकुल और अध्ययन को थोड़ी सराहना जरूर मिल गई। पहलाज निहलानी की खुश्बू में भी नई जोड़ी थी। इस नई जोड़ी को भी दर्शकों ने फिल्म के साथ नकार दिया।
तीनों फिल्में पहले ही हफ्ते में फ्लॉप साबित हुई। क्या हो गया है दर्शकों को? न तो वे कॉमेडी पसंद कर रहे हैं और न लव स्टोरी। ट्रेड विशेषज्ञों की राय में तीनों ही फिल्में कहानी, मेकिंग और प्रस्तुति के स्तर पर कमजोर थीं। दर्शक बता रहे हैं कि अब वे साधारण फिल्मों से संतुष्ट नहीं होंगे। देखना है कि इस हफ्ते रिलीज हो रही कुणाल कोहली की थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक और अरिंदम नंदी की वाया दाजीर्लिग दर्शकों को संतुष्ट कर पाती है या नहीं?

Tuesday, June 24, 2008

25 साल पहले 24 जून को रिलीज हुई थी 'अर्थ'

-अजय ब्रह्मात्मज
देश इस समय व‌र्ल्डकप में भारत की जीत की 25वीं वर्षगांठ पर जश्न मना रहा है। जश्न और खुशी के इस माहौल में अगर याद करें तो पच्चीस साल पहले व‌र्ल्ड कप के दिनों में ही महेश भट्ट निर्देशित अर्थ रिलीज हुई थी। स्मिता पाटिल, शबाना आजमी और कुलभूषण खरबंदा अभिनीत इस फिल्म ने रिलीज के साथ ही दर्शकों को प्रभावित किया था। मुख्यधारा की फिल्म होने के बावजूद समाज के सभी वर्गो में अर्थ की सराहना हुई थी। हिंदी फिल्मों में महिलाओं के चित्रण के संदर्भ में इसे क्रांतिकारी फिल्म माना जाता है। अर्थ की रिलीज की पच्चीसवीं वर्षगांठ के अवसर पर खास बातचीत में महेश भट्ट ने कहा कि मैं आज जो भी हूं, वह इसी फिल्म की बदौलत हूं। पच्चीस सालों के बाद भी अर्थ का महत्व बना हुआ है। मुझे इस फिल्म के लिए ही याद किया जाता है। उन्होंने बेहिचक स्वीकार किया कि अर्थ उनकी और परवीन बॉबी के संबंधों पर आधारित आत्मकथात्मक फिल्म थी। चूंकि विवाहेतर संबंध की परेशानियों को में स्वयं भुगत चुका था, इसलिए शायद मेरी ईमानदारी दर्शकों को पसंद आई।
फिल्म के नायक इंदर मल्होत्रा (कुलभूषण खरबंदा)से दर्शकों की कोई सहानुभूति नहीं होती। दर्शक कुछ समय तक पूजा (शबाना आजमी) और कविता (स्मिता पाटिल) दोनों के आग्रहों को सही मानते हैं। लेकिन आखिरकार उन्हें पूजा का उठाया कदम उचित लगता है। इस फिल्म की यही जीत थी कि पूजा का पति जब उसे छोड़ देता है तो वह आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ एक स्वतंत्रता भी हासिल करती है। वह दोबारा किसी पुरुष का सहारा नहीं लेती। न तो वह पति को दोबारा स्वीकार करती है और न ही प्रेमी का सहारा लेती है। महेश भट्ट ने आगे कहा कि इस फिल्म में जब शबाना आजमी अपनी प्रेमिका से निराश होकर लौटे पति कुलभूषण खरबंदा को फिर से स्वीकार करने से मना करती है तो वास्तव में वह औरतों की एक लंबी लड़ाई जीत लेती है।
मुझे याद है कि इस फिल्म को समाज के हर तबके की औरतों ने सराहा और स्वीकार किया था। हालांकि फिल्म में कोई भी नारीवादी भाषण या नारा नहीं था, मगर समाजशास्त्रियों ने इसे नारी मुक्ति और स्वतंत्रता की फिल्म कहा था। उन्होंने यह भी बताया कि फिल्म 1982 के दिसंबर महीने में सेंसर हो गई थी, लेकिन सिनेमाघरों में यह 1983 के जून महीने में पहुंची।
महेश भट्ट ने स्वीकार किया कि इन दिनों उनकी या किसी और की फिल्मों में पूजा जैसी औरत नहीं दिखाई पड़ती। अर्थ की रिलीज के पच्चीस सालों के बाद भी हमारी फिल्मों में औरतों का रिग्रेसिव और दकियानूसी चित्रण होता है। खुद मेरे बैनर की फिल्में भी इस भेड़चाल में शामिल है।

Sunday, June 22, 2008

खतरनाक खेल है एक्टर बनना: हरमन बवेजा

-अजय ब्रह्मात्मज
हैरी बवेजा के पुत्र हरमन अपनी पहली फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही चर्चा में आ गए है। चर्चा इसलिए भी कि उनकी यह फिल्म भविष्य की प्रेम कहानी पर आधारित होगी। प्रस्तुत है हरमन से बातचीत के अंश
आपके बारे में सुनते आए हैं कि पहले आप प्रोडक्शन में जाने वाले थे। एक्टिंग में आने का कब और कैसे इरादा हुआ?
मैंने सबसे पहले होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की। दसवीं करके मैं स्वीटजरलैंड चला गया था। होटल मैंनेजमेंट सीखने। वहां पहले साल में सिलवर मेडलिस्ट रहा, लेकिन मुझे उस में मजा नहीं आया । मैं वापस आ गया, तब मैंने डैड से कहा कि डैड मुझे नहीं लगता है कि मुझे ये कंटीन्यू करना है। एक चीज में अगर मेरा दिल नहीं है तो मैं उसको क्यों करता रहूं? मुझे लगता है कि फिल्मों में मेरा मन लगता है। एक्िटग हो, डायरेक्शन हो, इसी फील्ड में कुछ करना है। उन्होंने कहा कि ठीक है। उन्होंने सबसे पहले असिस्टेंट डायरेक्टर बनाया और फिर मुझे सीधे एक प्रोडक्शन की जिम्मेदारी दे दी। एक छोटी सी फिल्म थी ये क्या हो रहा है? 2001 या 2002 में आई थी। चार नए लड़के थे और चार नई लड़कियां थी। पापा ने कहा कि ये पिक्चर तुझे बनानी है। हंसल मेहता आपके डायरेक्टर हैं। पिक्चर की फ‌र्स्ट कॉपी तक पापा एक दिन भी सेट पर नहीं आए। पापा को शायद यह भी पता नहीं था कि पिक्चर का बजट कितना है। पिक्चर बिकी कितने में?
कब सोचा कि फिल्म लव स्टोरी 2050 ही करनी है। स्क्रिप्ट आपने फायनल किया या डैड ने?
डैड का आइडिया था। उन्हीं का निर्णय था। हां, पापा ने मुझसे राय मागी थी। मैं अभी इस लायक नहीं हूं कि डैड को सुझाव दूं। हमलोग दो-तीन फिल्मों पर काम कर रहे थे। लव स्टोरी ही बनानी थी। फिर लगा कि टर्न, ट्विस्ट और ड्रामा तो हर लव स्टोरी में होता है। इसमें ऐसा क्या है, जो दुनिया ने नहीं देखा है। डैड के पास एक स्क्रिप्ट थी, वे घर चलाने और खुद को स्थापित करने की चिंता में उस फिल्म को नहीं बना सके थे। उन्होंने वह स्क्रिप्ट निकाली और कहा कि अपने बेटे के साथ इसे बनाऊंगा। उन्होंने तीन-चार साल पहले उस पर काम शुरू किया और आज वह इनती बड़ी फिल्म हो गयी।
क्या इस फिल्म का कोई रेफरेंस है, हम इसे किस प्रकार की फिल्म कह सकते हैं?
ऐसी कोई फिल्म आप ने देखी ही नहीं है। इसमें 2008 से 2050 तक की लव स्टोरी है। हॉलीवुड में भी ऐसी लव स्टोरी नहीं बनी है। बिल्कुल मौलिक आइडिया है। इसमें फ्लाइंग कार है। ढाई तीन सौ मंजिलों की बिल्डिंग है। रोबोट हैं। आप कहेंगे कि यह सब तो पहले देखा है। अब आप पीरियड फिल्मे देखेंगे तो घोड़े-हाथी देखेंगे ही। यह भी एक प्रकार की पीरियड फिल्म है। इसका पीरियड अतीत में नहीं, भविष्य में है।
स्पेशल इफेक्ट और एनीमेशन का इस्तेमाल हुआ होगा?
एनीमेशन नहीं। स्पेशल इफेक्ट है। फ्लोरा फाउंटेन, गेटवे ऑफ इंडिया, वीटी स्टेशन जैसी ऐतिहासिक इमारतें वैसी ही हैं, लेकिन उनके आसपास सबकुछ बदल गया है। इन सारी चीजों को तैयार करने में तीन साल लगे हैं। लव स्टोरी 2050 रेगुलर हिंदी फिल्म नहीं है।
बयालीस साल बाद इमोशन कितना बदलेगा?
वह बदलाव दिखाया है हमने। प्रियंका का एक गाना है हे यू लवर ब्वॉय, विल यू बी माई टॉय, खेलूं खिलौने से फिर तोड़ दूं, एक पल मिलूं, अगले पल छोड़ दूं.. प्यार तो कभी नहीं बदलेगा। देखा जाए तो हर चीज प्यार की वजह से ही बनती और चलती है।
आमतौर पर भारतीय अधिक भावनात्मक होते हैं। यहां तक कि उनकी भावनाओं से खेलकर मूर्ख भी बनाया जा सकता है। क्या 2050 के इमोशन कुछ अलग होंगे?
बिल्कुल, आज भी आप ऐसे लोगों से मिल सकते हैं, जो पचास साल पहले की भावनाओं और मूल्यों के साथ जी रहे हैं। आप कहते हैं न कि यार थोड़ा बदल जा, सयाने हो जा। वैसे लोग आप को कहते हैं कि तू बदल गया है। तेरे अंदर इमोशन नहीं रहा।
अपने किरदार और फिल्म के बारे में कितना बता सकते हैं?
मेरा नाम करण मल्होत्रा है। करण एक्सट्रीम स्पोर्ट्स में रुचि लेता है। उसे खतरों से लगाव है। रोलर कोस्टर पर वह उल्टा बैठ जाता है ताकि पिछली सीट वाली लड़की से बात कर सके। उसको यह डर नहीं है कि गिरेगा तो मरेगा। उसे जिंदगी से प्यार है, लेकिन मौत का डर नहीं है। मैंने इस फिल्म के लिए काफी ट्रेनिंग ली। लगता है कि मैं कैरेक्टर में थोड़ा ज्यादा ही घुस गया, इसलिए मुझे खतरनाक स्पोर्ट्स अच्छे लगने लगे हैं। लोग सावधान करते रहे कि तू खिलाड़ी नहीं, एक्टर है। थोड़ी सावधानी बरत और जान जोखिम में न डाल।
और प्रियंका चोपड़ा?
उनका रोल बिल्कुल अलग है। उन्होंने आज तक ऐसा किरदार नहीं निभाया। दर्शक इस फिल्म में प्रियंका को देख कर खुश होंगे।

Saturday, June 21, 2008

हाल-ए-दिल:21वीं सदी में आजादी के समय का प्रेम

-अजय ब्रह्मात्मज
कई बार फिल्मों के शीर्षक ही उनकी क्वालिटी का अहसास करा देते हैं। 21वीं सदी में हाल-ए-दिल नाम थोड़ा अजीब सा लगता है न? यह फिल्म भी अजीब है। शिमला से मुंबई तक फैली इस कहानी में न तो महानगर मुंबई की आधुनिकता दिखती है और न शिमला की स्थिर भावुकता। फिल्म का बड़ा हिस्सा ट्रेन में है, लेकिन वहां भी जब वी मेट जैसी कहानी और प्रसंगों की छुक-छुक नहीं है।
संजना पिछली सदी की यानी आजादी के आसपास की लड़की और प्रेमिका लगती है। रोहित के प्यार में डूबी संजना अंत-अंत तक शेखर की भावनाओं को नजरअंदाज करती है। और फिर रोहित जैसे परिवेश का युवक इस सदी में अपनी प्रेमिका से अलग किए जाने पर भला क्यों नींद की गोलियां खाएगा? कहीं कुछ गड़बड़ है। किरदारों को गढ़ने में लेखक से मूल गलतियां हो गई हैं। उसके बाद जो कहानी लिखी जा सकी, वह विश्वसनीय नहीं लगती। इसके अलावा फिल्म की रफ्तार इतनी धीमी है कि किरदारों से सहानुभूति के बजाय ऊब होने लगती है। युवा धड़कनों की प्रेम कहानी में मन उचाट हो जाए तो लेखक और निर्देशक की विफलता स्पष्ट है। इस फिल्म में तीन नए एक्टर हैं। अमिता पाठक के स्वाभाविक गुणों के अनुरूप संजना नहीं है। वह संजना के चरित्र में ढल भी नहीं पातीं। फिल्म की नायिका की आवश्यक ग्रूमिंग नहीं की गयी। कई दृश्यों में तो वह अपनी उम्र से बड़ी दिखती हैं। शेखर सुमन के बेटे अध्ययन सुमन का व्यक्तित्व आकर्षक है। उनकी स्क्रीन पे्रजेंस है, लेकिन उनके किरदार को ढंग से विकसित नहीं किया गया है। नकुल मेहता को अपनी प्रतिभा दिखाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला है। वह निराश नहीं करते। इस फिल्म से अध्ययन सुमन और नकुल मेहता को व्यक्तिगत फायदा होगा। हां, कई बार फिल्म असफल रहती है, लेकिन उसके अभिनेता सफल साबित होते हैं।

Friday, June 20, 2008

दे ताली: उलझी कहानी

-अजय ब्रह्मात्मज
प्रचार के लिए बनाए गए प्रोमो धोखा भी देते हैं। दे ताली ताजा उदाहरण है। इस फिल्म के विज्ञापनों से लग रहा था कि एक मनोरंजक और यूथफुल फिल्म देखने को मिलेगी। फिल्म में मनोरंजन तो है, लेकिन कहानी के उलझाव में वह उभर नहीं पाता। ईश्वर निवास के पास मिडिल रेंज के ठीक-ठाक एक्टर थे, लेकिन उनकी फिल्म साधारण ही निकली। दे ताली देखकर ताली बजाने का मन नहीं करता।
तीन दोस्तों अमु, अभी और पगलू की दोस्ती और उनके बीच पनपे प्यार को एक अलग एंगल से रखने की कोशिश में ईश्वर निवास कामयाब नहीं हो पाए। दोस्ती और प्रेम की इस कामिकल कहानी में लाया गया ट्विस्ट नकली और गढ़ा हुआ लगता है। साथ-साथ रहने के बावजूद एक-दूसरे के प्रति मौजूद प्यार को न समझ सकने के कारण सारी गलतफहमियां होती हैं। इन गलतफहमियों में रोचकता नहीं है।
ईश्वर निवास ने शूल जैसी फिल्म से शुरुआत की थी, लेकिन उसके बाद की अपनी फिल्मों में वह लगातार निराश कर रहे हैं। या तो उन्हें सही स्क्रिप्ट नहीं मिल पा रही है या कुछ बड़ा करने के चक्कर में वह फिसल जा रहे हैं। दे ताली जैसी फिल्म की कल्पना उनकी सीमाओं को जाहिर कर रही है। कुछ नया करने से पहले उन्हें अपनी सारी फिल्में एक बार देख लेनी चाहिए ताकि, वह उनकी भूलों से भविष्य में बच सकें।
अभिनेताओं में केवल रितेश देशमुख ही संतुष्ट करते हैं। उन्होंने अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है। आफताब शिवदासानी और रिम्मी सेन को किरदार अच्छे मिले थे, लेकिन उन्हें पर्दे पर उतारने में उनकी संजीदगी नजर नहीं आती। आयशा टाकिया में ग्लैमर है। मुस्कुराना, नृत्य करना या होंठ दिखाना ही एक्टिंग है तो आयशा टाकिया जबरदस्त एक्ट्रेस हैं। फिल्म के गीत-संगीत में दम है, लेकिन फिल्म में उसका उचित उपयोग नहीं हो पाया है। फिल्म खत्म होने के बाद गीत देने का चलन निर्माता-निर्देशक की फिजूलखर्ची ही है। दर्शक थिएटर से निकलने की हड़बड़ी में ऐसे गीत का आनंद नहीं उठा पाते।

श्याम बेनेगल का सम्मान



-अजय ब्रह्मात्मज


थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक में आयोजित 9वें आईफा अवार्ड समारोह के दौरान हिंदी फिल्मों केपुरस्कार समारोह में श्याम बेनेगल को लाइफ टाइम एचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दरअसल, श्याम बेनेगल का नाम फिल्म इंडस्ट्री में आज भी बहुत आदर व सम्मान से लिया जाता है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इस अच्छे फिल्मकार के कार्य को अभी तक रेखांकित नहीं किया गया है। चूंकि उनका काम इतना महत्वपूर्ण और स्पष्ट है कि बगैर गहराई में गए ही सभी उनके नाम का उल्लेख करते रहते हैं।
गौर करें, तो नामोल्लेख का भी फैशन चलता है। जैसे कि गुरुदत्त, बिमल राय, के.आसिफ जैसे महान फिल्मकारों को बिना देखे ही सिनेप्रेमी महान निर्देशक मान लेते हैं। निश्चित ही वे सभी महान हैं, लेकिन क्या हमने निजी तौर पर उनकी महानता को परखा, देखा और समझा है? आप आसपास पूछ कर देख लें। संभव है, अधिकांश ने उनकी फिल्में देखी भी न हों! ऐसे ही श्याम बेनेगल का नाम हर संदर्भ में लिया जाता है।
हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा से दरकिनार कर दिए गए विषयों, चरित्रों और स्थानों को श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्मों में जगह दी। उन्होंने लंबे अभ्यास के बाद 1974 में अंकुर का निर्देशन किया। हिंदी फिल्मों के इतिहास में अंकुर का ऐतिहासिक महत्व है। यहीं से पैरेलल सिनेमा की शुरुआत होती है और साथ ही साथ उस तरह के निर्देशकों की जमात बढ़ती है, जो सिनेमा के यथार्थवादी स्वरूप को गढ़ने की कोशिश में लगे थे। श्याम बेनेगल ऐसी फिल्मों के नेतृत्वकारी फिल्मकार रहे, लेकिन अपनी विनम्रता में वे किसी प्रकार के नेतृत्व से इनकार करते हैं। उन्होंने हमेशा कहा कि कई दूसरे निर्देशकों के साथ मैं भी फिल्में निर्देशित कर रहा था। हम सभी यही चाहते थे कि सिनेमा सिर्फ पलायन और मनोरंजन का माध्यम नहीं बना रहे।
देश के प्रमुख समीक्षक चिदानंद दासगुप्ता ने अपने एक लेख में कहा है कि अगर सत्यजीत राय की फिल्में टैगोर के प्रबोधन का चित्रण करती हैं, तो श्याम बेनेगल की फिल्मों में हम नेहरू के भारत को देख सकते हैं, क्योंकि लोकतंत्र, धर्म निरपेक्षता, अवसर की समानता, मानव अधिकार और नारी अधिकार आदि मामलों में श्याम बेनेगल ने ही नेहरू की सोच को फिल्मों में प्रतिस्थापित किया। हिंदी फिल्मों में सामाजिक दृष्टि से इतना सचेत और जागरूक दूसरा कोई फिल्मकार शायद नहीं है। उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एकनया परिवेश गढ़ा और कई कलाकारों और तकनीशियनों को सामने ले आए। उन्होंने यह साबित किया कि फिल्मों के लिए स्टार पहली आवश्यकता नहीं है।
इस छोटे आलेख में श्याम बेनेगल के योगदान को समेटना नामुमकिन है। बस एक ही पहलू पर ध्यान दें कि उनकी हर फिल्म की भाषा भी अलग होती है। वे जिस परिवेश की कहानी चुनते हैं, उसी परिवेश की भाषा रखते हैं। संवादों में स्थानीय मुहावरों का सुंदर समावेश करते हैं और लहजा पूरी तरह से भाषा और क्षेत्र विशेष से प्रेरित रहता है। उनकी भाषा भिन्न होने के बावजूद समझ में आने लायक रहती है। अंकुर, मंडी, जुनून, मंथन आदि फिल्मों को याद करें या फिर से देखें, तो लोग इस तथ्य से सहमत हो जाएंगे।
पुरस्कार लेते समय श्याम बेनेगल ने बिल्कुल सही कहा कि हाशिए के विषयों के फिल्मकार को आज मुख्यधारा का पुरस्कार समारोह सम्मानित कर रहा है। उन्होंने न तो इस पर आश्चर्य व्यक्त किया और न ही गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने वस्तुस्थिति की तरफ इशारा किया! बस, श्याम बेनेगल की फिल्मों के सम्यक अध्ययन और मूल्यांकन की जरूरत है। जरूरत यह भी है कि हम उनके संभाषणों को संकलित करें, क्योंकि वे संभाषण वे वैचारिक स्पष्टता के साथ फिल्म, समाज और अपने समय को देखते हैं।

Thursday, June 19, 2008

बॉक्स ऑफिस:२०.०६.२००८

मंदा ही रहा धंधा

राम गोपाल वर्मा की फिल्म सरकार राज का विज्ञापन आया है कि एक हफ्ते में उसने 50 करोड़ से अधिक की कमाई कर ली है और आगे की कमाई जारी है। जब भी किसी फिल्म का ऐसा विज्ञापन आता है तो ट्रेड के लोग कहने लगते हैं कि सही कमाई का योग विज्ञापन में दी गई राशि से कम ही होगा। इस फिल्म को लेकर बच्चन परिवार और राम गोपाल वर्मा कुछ ज्यादा ही संवेदनशील और आक्रामक हैं। अमिताभ बच्चन और राम गोपाल वर्मा अपने ब्लॉग के जरिए आलोचकों को जवाब दे रहे हैं। बहरहाल, ट्रेड सर्किल में चर्चा है कि यह फिल्म मुंबई और महाराष्ट्र में औसत से बेहतर कारोबार कर लेगी, लेकिन अन्य सर्किट में वितरकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। अन्य राज्यों से संतोषजनक रिपोर्ट नहीं आ रही है।
पिछले हफ्ते रिलीज हुई मेरे बाप पहले आप और समर-2007 का बुरा हाल रहा। दोनों ही फिल्मों ने निराश किया और दर्शकों को जुटाने में उनकी असमर्थता पहले दिन से ही जाहिर होने लगी थी। विषय वस्तु की गंभीरता और जटिलता के कारण समर-2007 दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आई। मेरे बाप पहले आप से प्रियदर्शन दर्शकों को नहीं हंसा सके। समर-2007 की तुलना में उसे ज्यादा दर्शक मिले, फिर भी 40 प्रतिशत ही कलेक्शन हो पाया। इस साल की पहली छमाही में रिलीज हुई हर कॉमेडी फ्लॉप साबित हुई। क्या दर्शक हंसना नहीं चाहते या फिल्में हंसा नहीं पा रही हैं?

Wednesday, June 18, 2008

अभिनेत्री करीना कपूर बनाम ब्रांड बेबो


ताजा खबर है कि करीना कपूर ने एक साबुन के विज्ञापन के लिए करोड़ों की रकम ली है। इस तरह वह विज्ञापन से कमाई करनेवाली महंगी अभिनेत्रियों में से एक हो गई हैं। इन दिनों वह हर तरह के कंज्यूमर प्रोडक्ट के विज्ञापनों में दिख रही हैं। अभिनेत्रियों की मांग कॉस्मेटिक, पर्सनल केयर प्रोडक्ट और ज्वेलरी के विज्ञापनों में ज्यादा रहती है। करीना कपूर इस तरह के विज्ञापनों में आगे हैं। वह लाइफ स्टाइल प्रोडक्ट बेचने के लिए सबसे उपयुक्त एक्ट्रेस मानी जा रही हैं।

इन दिनो फिल्म अभिनेत्रियों की कमाई का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से आता है। पॉपुलर एक्टर की तरह पॉपुलर एक्ट्रेस भी इस कमाई पर पूरा ध्यान दे रही हैं। बाजार में करीना कपूर की मांग बढ़ने का एक कारण यह भी है कि पिछले साल उनकी फिल्म 'जब वी मेट' जबरदस्त हिट रही। उनके कुछ प्रशंसकों को लग सकता है कि शाहिद कपूर से अलग होकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। नैतिकता के इस प्रश्न से उनके इमेज पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उल्टा दर्शकों के बीच उनकी चाहत बढ़ गई है। हीरोइनों के सपनों में खोए दीवाने दर्शकों के लिए करीना कपूर ऐसी आइकॉन बन गयी हैं, जो किसी एक सितारे से नहीं बंधी हैं। शाहिद कपूर के साथ उनके संबंध को टिकाऊ माना जा रहा था। सैफ अली खान के साथ उनके संबंधों को लेकर आम धारणा है कि वह कभी भी टूट सकता है। इस तरह करीना कपूर का ख्वाब उनके दीवानों के लिए सुरक्षित है। अमूमन शादीशुदा या मजबूत संबंधों की हीरोइनों की लोकप्रियता धीरे-धीरे कम हो जाती है। शाहिद से संबंध तोड़कर करीना कपूर ने अपनी लोकप्रियता में ज्यादा इजाफा ही किया है।

ऐसा लगता है कि करीना कपूर थोड़ी मेहनत, लगन और एकाग्रता से काम करें तो वह बेहतर अभिनय कर सकती हैं। उन्होंने 'चमेली', 'ओमकारा' और 'जब वी मेट' में इसके उदाहरण दिए हैं, लेकिन उन्हें सुधीर मिश्र, विशाल भारद्वाज या इम्तियाज अली जैसा निर्देशक भी चाहिए। करण जौहर टाइप निर्देशक तो करीना कपूर के जरिए लाइफ स्टाइल और फिगर में ही ऊब-डूब करते रहेंगे। तय करीना को ही करना है कि वह पॉपुलैरिटी और डिमांड के बीच कैसे संतुलन बिठाती हैं और अपने लिए कौन सा रास्ता चुनती हैं। अभिनेत्री करीना कपूर और ब्रांड बेबो एक-दूसरे की पूरक बन कर ही कामयाब रहेंगी।

Tuesday, June 17, 2008

'उत्सुशी-ए' - सिनेमा से पहले मनोरंजन की जापानी लोकशैली




सिनेमा, फिल्म, मूवी, पिक्चर, चलचित्र ... आप इसे जो नाम दें और जिस अर्थ में समझें, मनोरंजन का सशक्त माध्यम हो गया है। सिनेमा के वजूद में आने के पहले भी तो मनोरंजन के साधन और माध्यम होंगे। हम उन्हें मनोरंजन की लोकशैली कहते हैं। भारत की बात करें तो हर क्षेत्र और प्रदेश की नाट्य एवं नृत्य शैलियां हैं। कठपुतलियों का नृत्य रहा है। छाया और प्रकाश के माध्यम से भी नागरिकों के बहलाने के प्रयास होते रहे पश्चिमी और योरोपीय देशों में 'फैंटसमैगोरिया' का चलन रहा तो चीन और जापान में छायाचित्रों के माध्यम से गांव-कस्बों में मनोरंजन किया जाता रहा।

जापान की एक ऐसी ही मनोरंजक लोकशैली 'उत्सुशी-ए' है। जापानी भाषा, संस्कृति और इतिहास के जानकार चवन्नी और उसके पाठकों की जानकारी में इजाफा कर सकते हैं। चवन्नी को इसके संबंध में जो जानकारी मिली, वह उसे बांटने के लिए तत्पर है। सिनेमा के प्रचलित होने के पहले जापान में उत्सशी-ए के शो काफी पसंद किए जाते थे। अठारहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के अंत तक उत्सशी-ए का बोल बाला रहा। इदो और मेइजी काल में इस शैली का विकास और विस्तार हुआ।

उत्सशी-ए में छवियां पर्दे पर नाचती, घूमती और थिरकती हैं। पश्चिमी देशों में मुख्य रूप से एक लालटेन की रोशनी में यह प्रदर्शन किया जाता था। जापान के कलाकारों ने छह और उससे ज्यादा लालटेनों की मदद से इस कला को सिनेमा की खूबियों तक विकसित कर लिया था। कट, फेड, डिजॉलव, डबल एक्सपोजर और जूम जैसी तकनीक का इस्तेमाल वे कैमरे और फिल्म के विकास के पहले कर रहे थे। सिनेमा के आविष्कार से सौ साल पहले ही जापानियों ने प्रोजेक्शन तकनीक से दर्शकों का मनोरंजन करना सीख लिया था। इस प्रदर्शन में कुछ लालटेनें स्थिर रख दी जाती हैं या फिर हाथों में लेकर उन्हें आगे-पीछे कर प्रकाश की तीव्रता को बदला जाता है। उत्सुशी-ए के प्रदर्शन में छह से ज्यादा कलाकारों की जरूरत पड़ती थी।

सिनेमा के विकास के बाद यह मनोरंजन की यह कलाशैली लुप्तप्राय हो रही थी । 1950 से 1980 के बीच अयाको शिबा ने अपने पिता गैजिरो कोबायाशी की मदद से इसे बचाया। दोनों ने उस समय तक जीवित उत्सुशी-ए कलाकारों की मदद से इस शैली को संरक्षित किया। जापान में आए 1923 के भूकंप और विश्वयुद्धों में अन्य कलाओं के साथ 'उत्सुशी-ए' का भी भारी नुकसान हुआ था।

उत्सुशी-ए की लालटेनें और स्लाइड्स बालसा की लकड़ी से बनाए जाते हैं। बालसा की लकड़ियां हल्की होती हैं। कलाकार दो-तीन घंटों तक उंगलियों, हथेलियों की मदद से उन्हें विविध रूपों में संयोजित करने में नहीं थकते थे। उत्सुशी-ए के प्रदर्शन में लालटेन थामने वालों के साथ संगीतज्ञों और कथावाचकों की जरूरत पड़ती थी। परफॉर्मिंग आर्ट की खूबी है कि हर प्रदर्शन में थोड़ी विविधता आ जाती है। कई बार दर्शकों की रुचि और प्रतिक्रिया से कहांनियां भी बदल जाती हैं या नया मोड़ ले लेती हैं। उत्सुशी-ए में इसकी भरपूर संभावना रहती थी।

(अगर कोई तथ्यात्मक भूल हो तो चवन्नी सुधारने के लिए तैयार है। अपने सुधी पाठकों से चवन्नी की गुजारिश है कि वे सिनेमा के पहले की मनोरंजन परंपराओं के बारे में अपनी जानकारी बांटे।)

Sunday, June 15, 2008

शैली और शिल्प में दोहराव: मेरे बाप पहले आप

अजय ब्रह्मात्मज
प्रियदर्शन कभी अपनी कामेडी फिल्मों से गुदगुदाया और हंसाया करते थे। अब उनकी शैली और शिल्प के दोहराव से ऊब होने लगी है। यही कारण है कि मेरे बाप पहले आप विषय की नवीनता के बावजूद रोचक नहीं लगती है।
विधुर पिता जनार्दन और बेटे गौरव का अजीबोगरीब रिश्ता है। बेटा बाप को बेटा कह कर बुलाता है। वह उन्हें डांटता, फटकारता, धमकाता और पुचकारता है। चूंकि बाप ने दूसरी शादी नहीं की और बेटों को पालने में अपनी जिंदगी निकाल दी, इसलिए अब बेटा उन्हें अपने बेटे की तरह प्यार से पालता है। वह उन्हें बुरी संगत से बचाना चाहता है। फिल्म की नायिका शिखा है। वह किसी पुरानी घटना का बदला लेने के लिए पहले नायक गौरव को तंग करती है और फिर दोस्त बन जाती है। इस दोस्ती के दरम्यान गौरव और शिखा को पता चलता है कि गौरव के पिता और शिखा की आंटी पुराने प्रेमी हैं। वे उन दोनों की शादी करवाने की युक्ति रचते हैं। इस प्रक्रिया में वे खुद भी एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं, लेकिन अपनी शादी से पहले वे बुजुर्गो की शादी करवाते हैं। बेटे से पहले बाप की शादी के कंसेप्ट पर दृश्यों को जोड़-मोड़ कर यह फिल्म बना दी गयी है।
अक्षय खन्ना के अभिनय का हाइपर रूप फिल्म के अनुकूल है। इसी प्रकार परेश रावल और ओमपुरी भी स्वतंत्र रूप से कुछ दृश्यों में अच्छे लगते हैं। जीनिलिया की मासूमियत और खूबसूरती आंखों को भाती है। इन वजहों से हम फिल्म से बंधे रहते हैं, लेकिन अंत में ठगे जाने का अहसास होता है। फिल्म के बनावटी दृश्यों से उत्पन्न की गयी स्थिति देर तक नहीं हंसाती।
मेरे बाप पहले आप का तकनीकी पक्ष भी कमजोर है। खास कर साउंड डिजाइनिंग में बरती गयी लापरवाही स्पष्ट है। प्रियदर्शन समर्थ फिल्मकार हैं, लेकिन ऐसी फिल्मों के निर्देशन से वे अपनी ही चमक फीकी कर रहे हैं। दर्शक फिल्म देख कर हंसे तो ठीक है। मेरे बाप पहले आप जैसी फिल्म देख कर प्रियदर्शन पर हंसी आती है और यह शुभ संकेत नहीं है।
अक्षय खन्ना और जीनिलिया का उच्चारण दोष खटकता है। अक्षय खन्ना बाहर को भाहर और ब्राह्मण को भ्रामण बोलते हैं तो जीनिलिया दिन-दहाड़े को दिन-धाड़े बोलती हैं।

Saturday, June 14, 2008

हाफ टिकट :किशोर कुमार की फ़िल्म


चवन्नी ने आज ही हाफ टिकट देखी है।

किशोर कुमार और मधुबाला की यह फिल्म 1962 में बनी थी। फिल्म के लेखक-निर्देशक कालिदास थे। सलिल चौधरी ने शैलेन्द्र के गीतों को धुनों से सजाया था। इस फिल्म का हर गीत निराला और अपारंपरिक था। 'आ के सीधे दिल पे लगी कटरिया ' युगल गीत है। किशोर कुमार ने सलिल चौधरी को बड़ी मुश्किल से राजी किया था कि स्त्री और पुरुष दोनों ही स्वरों के लिए उन्हीं की आवाज इस्तेमाल की जाए। किशोर कुमार का यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था। वे अपने स्टेज प्रोग्राम में इस गीत को अवश्य गाते थे।

'हाफ टिकट' विजय नामक युवक की कहानी है, जो नियमित जिंदगी नहीं जी सकता। उसके फितूरों से परेशान होकर पिता उसे घर से निकाल देते हैं। उसके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह मंबई का टिकट भी खरीद सके। वह हाफ टिकट लेता है और बारह साल के मोटे-तगड़े लड़के का वस्त्र धारण करता है। वह ऐसा बच्चा, जिसका शरीर बड़ा हो गया है, लेकिन दिमाग किसी बच्चे का ही है। सफर शुरू होने के समय ही एक बदमाश किस्म का व्यक्ति विजय का चाचा बन जाता है और उसकी जेब में दो लाख का हीरा डाल देता है। पुलिस के डर से वह ऐसा करता है। बाद में हीरा वापस लेने के लिए वह विजय के पीछे पड़ता है। विजय की अचानक मुलाकात रजनी से होती है। वह रजनी से प्रेम करने लगता है। रजनी का असली नाम आशा है। बाद में पता चलता है की जिस लड़की के पिता को विजय ने भगा दिया था,आशा वही लड़की है। इस तरह हंसी-मजाक में फिल्म खत्म होती है।

किशोर कुमार की बहुमुखी प्रतिभा के दर्शन के लिए यह फिल्म निश्चित रूप से देखनी चाहिए। किशोर कुमार खुले दिल से अभिनय करते थे। इस फिल्म के गीतों में उनकी टांगें जमीन पर कभी सीधी नहीं पड़ी हैं। वे हमेशा टांगों को हिलाते हुए चलते और गाते हैं। आजकल रितिक रोशन और हरमन बावेजा वैसे ही नृत्य फास्ट बीट पर करते हैं। फिल्म में स्पेशल इफेक्ट और एक्शन भी है। आखिरी दृश्यों के एक्शन के लिए अवश्य ही कोई तरकीब इस्तेमाल की गयी होगी। क्रेन से लटके किशोर कुमार को भी हिम्मत करनी पड़ी होगी। इस फिल्म में मधुबाला का सीमित भूमिका है।प्राण की खास भूमिका है.प्राण का नृत्य भी देखने लायक है.

'हाफ टिकट' पूरी तरह से किशोर कुमार की फिल्म है। किशोर कुमार के प्रशंसकों को यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए।किशोर कुमार की बेफिक्र अदाओं,निर्बंध नृत्य,अनोखे परिधान और अजीबोगरीब harkaton से दर्शक bandhe रहते हैं.

सामाजिक सरोकार की फिल्म है समर 2007

-अजय ब्रह्मात्मज
आयटम सांग, कामेडी, एक्शन और मल्टीस्टारर फिल्मों के इस दौर में सुहैल तातारी ने सामाजिक सरोकार की फिल्म निर्देशित की है। सालों बाद किसी फिल्म में गांव, किसान और किसानों की आत्महत्या के पहलू सामने आए हैं। यह डाक्यूमेंट्री, उपदेशात्मक या महज बोलवचन की फिल्म नहीं है। फिल्म अपनी बात कह जाती है। अगर आप कान एवं ध्यान लगाएं तो बात समझ में भी आती है।
अमीर परिवारों के पांच बच्चे कैपिटेशन फी देकर मेडिकल कालेज में दाखिला लेते हैं। उन सभी का ध्यान पढ़ाई से ज्यादा दूसरी चीजों में लगा रहता है। उनकी अपनी एक समृद्ध, काल्पनिक और निरपेक्ष दुनिया है। सच से उनका सामना पहली बार तब होता है, जब छात्र संघ के चुनाव का समय आता है। प्रकाश नाम का छात्र नेता अपने स्वतंत्र सोच से उन्हें चुनौती देता है और राजनीति के लिए उकसाता है। पांचों युवक चुनाव की चपेट में आते हैं और फिर एक दबाव के कारण कैंपस से पलायन करते हैं। वे बचने का आसान रास्ता चुनते हैं और गांव के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र पर सेवा देने के बहाने निकल जाते हैं। गांव पहुंचते ही उनका यथार्थ से साक्षात्कार होता है। कुछ समय तक वे निरपेक्ष और उदासीन रहते हैं, लेकिन स्थितियों की भयावहता उन्हें झकझोरती है। उन्हें अंदरूनी तौर पर सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास होता है और वे सिस्टम के खिलाफ खड़े दिखाई देते हैं। किसानों की आत्महत्या की घटनाओं से आंखें मूंद कर जीनेवालों को हम आखिरकार उनके संघर्ष और समर्थन में देखते हैं। उन्हें एक मुद्दत के बाद जगने का अहसास होता है और वे किसानी की जंग में शामिल हो जाते हैं। सुहैल तातारी की समर-2007 सामाजिक और राजनीतिक समझ की फिल्म है। फिल्मकार के सोच और सरोकार को हम चरित्रों के निर्माण, घटनाओं और प्रसंगों के चित्रण व सार्थक संवादों के जरिए ग्रहण करते हैं। सुहैल तातारी ने सहज तरीके से इस जटिल कहानी को पेश किया है। दृश्यों और चरित्रों का विन्यास स्वाभाविक है। फिल्म के मुख्य चरित्र अंत:प्रेरणा से बदलते हैं। कल तक जिसे वे अपनी समस्या और दुनिया नहीं मानते थे, उसी में उनकी सक्रिय हिस्सेदारी होने लगती है। यह फिल्मकार की खूबी है कि कुछ भी शुष्क और थोपा हुआ नहीं लगता। चूंकि कलाकार अपेक्षाकृत नए हैं, इसलिए दर्शकों से उनका रिश्ता बनने में थोड़ा समय लगता है। सुहैल के धैर्य, संयम और अंकुश से सिकंदर खेर अलग अंदाज में दिखते हैं और अपने अभिनय से संतुष्ट करते हैं। इस फिल्म के सरप्राइज आशुतोष राणा हैं। उन्होंने मुखिया के किरदार को सहज तरीके से अंडरप्ले किया है। लंबे समय के बाद वह अपने साम‌र्थ्य की फिर से झलक देते हैं। गुल पनाग, युविका चौधरी, अर्जन बाजवा, प्रशांत नारायण और सचिन खेडेकर का अभिनय संतोषजनक है।
फिल्म के अंत में दिए गए आंकड़े फिल्म के प्रभाव को गहरा करते हैं और संवेदनशील दर्शकों को सावधान करते हैं। फिल्म में एक संवाद है कि खाली खबर से इनकी (किसानों) कब्र खुदनी बंद नहीं होगी। खबरों से आगे की पहल जरूरी है, अन्यथा शहरों के माल और मल्टीप्लेक्स भी सुरक्षित नहीं रह सकेंगे।

Friday, June 13, 2008

चार जुलाई को चमकेंगे दो स्टार!

-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए पहली छमाही कोई सुखद समाचार नहीं ला सकी। न तो कोई फिल्म जबर्दस्त सफलता हासिल कर सकी और न ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से आए स्टारसन में कोई चमक दिखी। हाल ही में रिलीज हुई वुडस्टॉक विला में आए सिकंदर खेर को ढेर होते हमने देखा। उसके पहले मिथुन चक्रवर्ती के बेटे मिमोह चक्रवर्ती अपनी पहली फिल्म जिम्मी में फुस्स साबित हुए। आश्चर्य की बात तो यह है कि दोनों ही नवोदित स्टारों को दर्शकों ने नोटिस नहीं किया। हालांकि दोनों के पास अभी एक-एक फिल्म है, लेकिन कहना मुश्किल है कि दूसरी फिल्मों में वे कोई जलवा बिखेर पाएंगे!
हां, चार जुलाई को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के दो स्टार चमकने को तैयार हैं। लव स्टोरी 2050 से हैरी बावेजा के पुत्र हरमन बावेजा और जाने तू या जाने ना से आमिर खान के भतीजे इमरान खान की फिल्मों में एंट्री हो रही है। चार जुलाई को एक साथ रिलीज हो रही इन दोनों फिल्मों के मुख्य कलाकारों को फिलहाल भविष्य के स्टार के रूप में देखा जा रहा है। उनकी पहली फिल्म की रिलीज के पहले ही उनकी आने वाली फिल्में भी लगभग पूरी हो गई हैं। दोनों को लगातार फिल्मों के ऑफर मिल रहे हैं और ऐसा कहा जा रहा है कि अगर दोनों ने अपनी पहली फिल्म से दर्शकों को थोड़ा भी संतुष्ट किया, तो उनके घरों के आगे निर्माताओं की कतारें लग जाएंगी।
हिंदी फिल्मों के इतिहास में हमेशा से चार-पांच स्टारों की ही मांग सबसे ज्यादा रही है। आज भी वही स्थिति बनी हुई है, लेकिन एक फर्क जरूर आ गया है। पहले हर स्टार की साल में कम से कम चार-पांच फिल्में रिलीज हो जाया करती थीं, लेकिन इधर एक समय में एक फिल्म की शूटिंग करने की प्राथमिकता के कारण पॉपुलर स्टारों की बमुश्किल दो फिल्में ही आ पाती हैं। तीनों खानों के साथ अक्षय कुमार, रितिक रोशन, अभिषेक बच्चन और जॉन अब्राहम की पिछली फिल्मों को याद करें, तो इस स्थिति को अच्छी तरह समझ सकते हैं। इन सभी में केवल अक्षय कुमार अकेले ऐसे स्टार हैं, जिनकी ज्यादा फिल्में आ रही हैं और उनमें से अधिकांश सफल भी हो रही हैं।
जाहिर-सी बात है कि इस परिदृश्य में आधे दर्जन स्टारों के सहारे दर्शकों के लिए सौ-सवा सौ फिल्मों की सालाना जरूरत पूरी नहीं की जा सकती! दरअसल, यही वजह है कि निर्माता-निर्देशक और फिल्मों के बड़े कॉरपोरेट हाउस भरोसेमंद स्टार के लिए तरस रहे हैं और इसीलिए किसी में थोड़ी संभावना दिखते ही सब उस पर टूट पड़ते हैं। अगर वह संभावना फिल्म इंडस्ट्री से उभर रही हो, तो उस पर निर्माता-निर्देशकों का भरोसा कुछ ज्यादा ही होता है।
फिल्म इंडस्ट्री के लोग जब इंटरव्यू में कहते हैं कि हमारी इंडस्ट्री एक परिवार की तरह है, तो दर्शक और इंडस्ट्री के बाहर के लोगों को हंसी आती है। खेमेबाजी और आगे बढ़ने की फिक्र में भले ही इंडस्ट्री के सदस्य एक-दूसरे के विरोध में नजर आएं, लेकिन यह एक ठोस सच्चाई यह भी है कि इंडस्ट्री में एक-दूसरे की मदद की पुरानी परंपरा रही है। मैं तुम्हारा समर्थन करता हूं, तुम मुझे सहयोग देना की नीति पर अमल करती फिल्म इंडस्ट्री का घेरा इतना मजबूत होता है कि बाहर से आए कलाकारों को उसे भेदने के लिए भारी मेहनत करनी पड़ती है। क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि किसी बाहरी ऐक्टर को अभिषेक बच्चन जितने अवसर मिल पाते हैं? लेकिन फिल्म इंडस्ट्री के लोग घाटा उठाकर बिरादरी के लड़कों को मौका नहीं देते। बहुत ही क्रूर तरीके से छंटाई भी चलती रहती है। चूंकि फिल्म निर्माण शुद्ध रूप से बिजनेस हो गया है, इसलिए उनमें ही निवेश किया जाता है, जिनसे मुनाफे की उम्मीद हो। फिलहाल हरमन बावेजा और इमरान खान ऐसी उम्मीद के रूप में दिख रहे हैं। दोनों की दूसरी फिल्में भी तैयार हैं और आगामी फिल्मों की बातचीत भी चल रही है। दोनों के पीछे फिल्म इंडस्ट्री के अनुभवी और सफल व्यक्ति हैं, जिनके अपने संबंध और प्रभाव भी कार्य कर रहे हैं। चार जुलाई को इन दोनों कलाकारों की चमक सुनिश्चित की जा रही है और हैरी बावेजा और आमिर खान रणनीति बना रहे हैं।

Wednesday, June 11, 2008

बॉक्स ऑफिस:१३.०६.२००८

दोनों को पिटा ही मानिए
बाक्स आफिस पर भले ही सरकार राज का राज कायम नहीं हो सका, लेकिन राम गोपाल वर्मा के नाम पर आग और अन्य फ्लाप एवं बुरी फिल्मों के कारण जमी धूल थोड़ी साफ हुई। रामू सरकार राज में सरकार से आगे नहीं बढ़ सके। हां, उन्होंने यह जता दिया कि अभी वह चुके नहीं हैं और फिर से लौट सकते हैं। सरकार राज के प्रति फिल्म ट्रेड सर्किल में गर्माहट थी। बच्चन परिवार के तीन सदस्यों के कारण माना जा रहा था कि फिल्म को अच्छी ओपनिंग मिलेगी। पर हकीकत यह रही कि मुंबई में ओपनिंग का प्रतिशत दूसरे शहरों की तुलना में बेहतर रहने के बावजूद उम्मीद से कम था। आरंभिक दिनों में 50-60 प्रतिशत कलेक्शन साधारण फिल्म के लिए बेहतर कहा जा सकता है। सरकार राज के लिए यह प्रतिशत कम है।
मुंबई में मानसून की पहली बौछार से भी दर्शकों में कमी आई। अगले दिन शनिवार को दर्शक बढ़े, लेकिन रविवार से गिरावट आरंभ हो गई। फिर भी माना जा रहा है कि फिल्म मुंबई और महाराष्ट्र में औसत व्यापार कर लेगी।
राजकुमार गुप्ता की आमिर छोटी फिल्म थी। समीक्षकों ने उसकी खूब सराहना की। निर्माताओं ने फिल्म के प्रचार पर समुचित ध्यान नहीं दिया था, इसलिए दर्शक इसेदेखने ही नहीं गए। आमिर शीर्षक, नए अभिनेता राजीव खंडेलवाल और नए निर्देशक राजकुमार गुप्ता- तीनों में ऐसा आकर्षण नहीं था कि दर्शक सिनेमाघरों की तरफ जाएं। समीक्षकों की सराहना और दर्शकों की संस्तुति से अगले दिनों में फायदा हुआ, लेकिन ऐसी फिल्मों की प्राणवायु ही सीमित रहती है।

Sunday, June 8, 2008

प्रचलित परंपरा से जरा हट कर है आमिर

-अजय ब्रह्मात्मज
यूटीवी स्पाटब्वाय की पहली फिल्म आमिर हिंदी फिल्मों की लोकप्रिय परंपरा में नहीं है। यह निर्देशक राज कुमार गुप्ता और अभिनेता राजीव खंडेलवाल की पहली फिल्म है। उन्होंने साबित किया है कि बेहतर फिल्म बनाने के लिए स्टार, नाच-गाने और लटके-झटकों की जरूरत नहीं है। अगर आपका कथ्य मजबूत है और आपके कलाकार उसे सही संदर्भ में अभिव्यक्त कर देते हैं तो फिल्म प्रभावित करती है।
आमिर डा. आमिर अली के जीवन के एक दिन की कहानी है। लंदन से तीन साल बाद भारत लौटे डा. आमिर अली का जीवन एयरपोर्ट से निकलते ही एक कुचक्र में फंसता है। उनके परिवार को किसी ने किडनैप कर लिया है और वह व्यक्ति उनसे कुछ ऐसे काम करवाना चाहता है, जिसके लिए वह तैयार नहीं हैं। परिजनों की सुरक्षा के दबाव में वह मजबूरन अनचाहे काम को अंजाम देने के लिए बढ़ते हैं। आखिरकार एक ऐसी घड़ी आती है, जब वह फैसला लेते हैं और वह फैसला उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल देता है।
आमिर की पृष्ठिभूमि में मुंबई है, लेकिन यहां न तो ताज होटल है और न गेट वे आफ इंडिया है, न क्वीन नेकलेस और न ही हाजी अली की दरगाह। मुंबई के नाम पर जो प्रतीक हम फिल्मों में देखते रहे हैं उनमें से केवल मुंबई वीटी स्टेशन ही फिल्म में दिखा है। इस मुंबई में डोंगरी, मुहम्मद अली रोड, क्राफर्ड मार्केट, कसाईवाड़ा जैसे निचले इलाके हैं, जहां इस महानगर की महत्वपूर्ण आबादी गुजर-बसर करती है। आमिर देखते हुए अनुराग कश्यप की ब्लैक फ्राइडे और नो स्मोकिंग की याद आती है। यह स्वाभाविक भी है। एक तो कहानी उन निचले इलाकों की है और दूसरे फिल्म के निर्देशक लंबे समय तक अनुराग के सहायक रहे हैं।
आमिर में दिखाया गया है कि कैसे एक समझदार और आधुनिक व्यक्ति उनके द्वारा घृणा की राजनीति के खिलाफ खड़े होकर कट्टरपंथियों के सोच को चुनौती दे रहा है। यह फिल्म तो टैक्स फ्री होनी चाहिए और हर माध्यम से सभी समूह के दर्शकों के बीच पहुंचनी चाहिए।

फिर असफल रहे रामू

-अजय ब्रह्मात्मज
क्लोज अप, फुसफुसाहट, साजिश, हत्या..सरकार की काली लुंगी, बगैर कालर की काली शर्ट, माथे पर लाल टीका, रीमलेस चश्मा और पूरे माहौल में धुआं-धुआं ़ ़ ़यह सब कुछ हम सभी ने राम गोपाल वर्मा की पिछली फिल्म सरकार में देखा था। इन सब के साथ इस बार थोड़ा बदलाव है। सरकार यानी सुभाष नागरे के बेटे शंकर ने शूट पहन लिया है और विदेश से एक लड़की अनीता राज आ गई है। कहानी मुंबई से पसर कर ठाकुरवाड़ी तक गई और हमने राव साहब के भी दर्शन किए। एक नया किरदार सोम भी आया। कुछ नए खलनायक दिखे- काजी, वोरा, कांगा और पाला बदलता वफादार चंदर ़ ़ ़
रामू ने सरकार की तकनीक ही रखी। उन्होंने अमिताभ, अभिषेक और ऐश्वर्या को भावपूर्ण दृश्य दिए ताकि वे चेहरे और आंखों से अभिनय की बारीकियां प्रदर्शित करें। इस संदर्भ में कई क्लोजअप में बुरे लगने के बावजूद अमिताभ तो भाव प्रदर्शन में सफल रहे, लेकिन अभिषेक और ऐश्वर्या में अपेक्षित ठहराव नहीं दिखा। हां, कैमरे के आगे छोटे कलाकार अवश्य टिके रहे और उन्होंने ही इस फिल्म की नाटकीयता बनाए रखने में मदद की।
फिल्म की कहानी राजनीति, विदेशी निवेश, औद्योगिकीकरण की समस्याओं को इंटरवल के पहले छूती है। ऐसा आभास हुआ कि कहानी गैंगस्टर परिवार से निकलकर व्यापक संदर्भ ले रही है और शायद हम अपराध और राजनीति के पहलुओं से बाहर निकल कर वर्तमान महाराष्ट्र की समस्याओं को समेटती कोई फिल्म देखने जा रहे हैं। लेकिन राजनीतिक समझ के अभाव के कारण कहानी फिर से सिमटकर परिवार में आ गई और हत्या, बदला और साजिश की साधारण फिल्म बन कर रह गई।
वैसे भी यह परिवार की ही कहानी है, क्योंकि शंकर की हत्या के बाद सुभाष नागरे अपने मृत बेटे विष्णु के बेटे चीकू को नागपुर से मुंबई बुलाने का आदेश देता है।
रामू फिर से असफल रहे, लेकिन इस बार उनकी फिसलन ़ ़ ़ आग जैसी नहीं है। उनके पास अमिताभ जैसा समर्थ अभिनेता है और कई नाटकीय दृश्य हैं। रामू की टेकिंग और दृश्य संयोजन में दोहराव दिखने लगा है। अब उन्हें अपने फिल्मों की भावभूमि बदलनी चाहिए या फिर कुछ नए प्रयोगों और लेखकों का सहारा लेना चाहिए।
सरकार राज आरंभिक आधे घंटे में अपेक्षाएं बढ़ा देती है, लेकिन इंटरवल के तुरंत बाद से कहानी का आधार दरकने लगता है। फिल्म के कथानक का सबसे कमजोर पक्ष यह है कि सुभाष नागरे को आखिरकार हत्या और साजिश के कारण बताने पड़ते हैं। किसी भी फिल्ममेकर की तब कमजोरी ही दिखाई देती है जब उसका किरदार कहानी के पेंचों को सुनाने या बताने लगे। अनीता राज और शंकर नागरे के चरित्र निर्वाह पर निर्देशक ने अधिक ध्यान नहीं दिया है।
तकनीकी दृष्टि से सरकार की श्रेणी की फिल्म है सरकार राज। बस पटकथा और दृश्य संयोजन में तालमेल नहीं दिखाई पड़ता। फिल्म में वन लाइनर अच्छे बन पड़े हैं, लेकिन वैसे दृश्य स्पष्ट रूप से रेखांकित किए जान पड़ते हैं।

Friday, June 6, 2008

कॉमेडी का कन्फ्यूजन कन्फ्यूजन में कॉमेडी

-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले कुछ समय से हिंदी फिल्मों में कॉमेडी का चलन पूरी तरह से बढ़ा है, क्योंकि इसे सफलता का फार्मूला माना जा रहा है। कह सकते हैं कि यही ताजा ट्रेंड है, लेकिन चंद वर्षो और चंद फिल्मों के बाद अब यह ट्रेंड दम तोड़ता नजर आ रहा है। हाल की असफल कॉमेडी फिल्मों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि अभी के निर्माता-निर्देशक कॉमेडी के नाम पर पूरी तरह से कंफ्यूजन के शिकार हैं!
कॉमेडी फिल्मों का एक इतिहास रहा है। दरअसल, जब शुद्ध रूप से कॉमेडी फिल्में नहीं बनती थीं, तो फिल्मों में कॉमेडी का पैरलल ट्रैक रहता था। दरअसल, एक सच यह भी है कि जॉनी वॉकर और महमूद सरीखे कलाकारों को उन दिनों हीरो जैसा दर्जा हासिल था। उनके लिए गाने रखे जाते थे और कई रोचक प्रसंग भी कहानी में जोडे़ जाते थे। यह सिलसिला लंबे समय तक चला। सच तो यह है कि उन दिनों हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कॉमेडियन की एक अलग जमात हुआ करती थी। अमिताभ बच्चन के आगमन के बाद जिन फिल्मी तत्वों का नुकसान हुआ, उनमें कॉमेडी भी रही। एंग्री यंग मैन के अवसान के बाद फिर से फिल्मों की कहानी बदली और जॉनी लीवर, डेविड धवन और गोविंदा का उदय हुआ। डेविड धवन और गोविंदा की जोड़ी ने कुछ कामयाब कॉमेडी फिल्में दीं। सलमान खान, अक्षय कुमार और संजय दत्त को अपनी फिल्मों में लाने के पहले डेविड ने गोविंदा के साथ दर्शकों को खूब हंसाया। उनकी पिछली फिल्म पार्टनर में सलमान खान और गोविंदा थे। पार्टनर हालांकि सफल रही, लेकिन उस फिल्म से जाहिर हुआ किकहानी पर अधिक मेहनत नहीं की जा रही है। हर दस-पंद्रह मिनट पर एक हास्य स्थिति या प्रसंग डाल दिया गया है, जिनके बीच कोई तारतम्य नहीं है। यही वजह है कि पार्टनर हिस्सों में अच्छी लगती है। इन दिनों कॉमेडी फिल्मों में डेविड धवन की सक्रियता थोड़ी कम हो गई है।
बीच में दक्षिण से आए निर्देशक प्रियदर्शन ने हेराफेरी से कॉमेडी फिल्मों को नई दिशा दी। उनकी पहली दो-तीन फिल्मों में किरदार और कहानी दिखे। बाद में प्रियदर्शन ने कंफ्यूजन को अपनी फिल्मों का मूल आधार बना लिया। उन्होंने एक फार्मूला विकसित किया, जिसमें इंटरवल के बाद भारी कंफ्यूजन के बीच सारे किरदार दौड़ते-भागते नजर आते हैं। कॉमेडी के इस सरलीकरण से निर्माताओं को भले ही फायदा हुआ हो, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री का दूरगामी नुकसान ही हुआ। उस नुकसान के नतीजे अब दिख रहे हैं। कंफ्यूजन की कहानी चित्रित करने में प्रियदर्शन माहिर हैं, लेकिन उनकी उस विशेषता के अनुकरण में दूसरे निर्देशक बुरी तरह विफल रहे। कॉमेडी फिल्मों का मुख्य उद्देश्य दर्शकों को हंसाना है। सवाल उठता है कि दर्शकों को कैसे हंसाएं? पहले की कॉमेडी फिल्मों और आज की कॉमेडी फिल्मों की तुलना से हम इस मामले में निर्देशकों की सोच में आए फर्क को समझ सकते हैं। पहले हास्य की स्थितियां जीवन के प्रसंगों से ली जाती थीं। ऐसे किरदारों की मूर्खता के पीछे भी एक लॉजिक होता था और कोशिश यही होती थी कि दर्शकों की भावनात्मक संवेदना को चोट न पहुंचे। इधर की कॉमेडी फिल्मों में यह संयम सिरे से गायब है।
अब दर्शकों को आहत करने के साथ हंसाने की कोशिश की जा रही है। हम फिल्मों में हंसने के बजाए चिढ़ने और रोने लगते हैं। प्रियदर्शन की नकल में सारे निर्देशक कंफ्यूजन क्रिएट करने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे स्वयं उसमें फंस जाते हैं। नतीजा यह होता है कि दर्शक भी असहज हो उठते हैं। इस दौर में पड़ोसन, अंगूर और चुपके चुपके जैसी कॉमेडी फिल्मों की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। उस सहज हास्य के लिए एक कहानी की जरूरत होती है और फिर सामान्य जीवन के हास्यास्पद दृश्य चुनने पड़ते हैं। वैसी फिल्मों में मेहनत और कल्पना दोनों की ज्यादा जरूरत होती है। अभी सब कुछ फटाफट चाहिए, यही वजह है कि सिर्फ दृश्यों को ही जोड़ा जाता है। इस जल्दबाजी में जीवन पकड़ में नहीं आता, तो हंसी कहां से समझ में आएगी

Thursday, June 5, 2008

ऐश्वर्या राय से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

ऐश्वर्या राय की यह बातचीत उनके व्यक्तित्व के ऐसे पहलुओं को सामने लाती है, जिनकेबारे में वे कम बातें करती हैं। यहां हम एक बेटी, बहू और बीवी ऐश्वर्या राय साथ ही ऐक्ट्रेस ऐश्वर्या राय से मिलते हैं॥

ऐश्वर्या राय की कई पहचान है। वह मिस व‌र्ल्ड रही हैं। एक्ट्रेस हैं। एक ब्रांड हैं। बेटी हैं और अब पत्नी एवं बहू भी हैं। बहू होते ही जब आप नए घर में जाती हैं तो बहुत कुछ छूटता या छोड़ना पड़ता है ़ ़ ़
मैं भगवान की शुक्रगुजार हूं। उनका आशीर्वाद है। मैं एक घर से ब्याह कर दूसरे घर में आई हूं तो फिर से वही मां-बाप का प्यार, वही अपनापन मिला ़ ़ ़ यह सिर्फ इंटरव्यू के लिए नहीं कह रही हूं। दिल की बात कह रही हूं। अभिषेक और हम हमेशा कहते हैं कि अब हमें दो मां-पिता मिल गए हैं। इसके लिए मैं उन्हें भी धन्यवाद दूंगी, क्योंकि हमारे अंदर अगर यह भावना है तो यह उनकी ही देन है। शायद हमारी परवरिश में ही था। हमें कुछ अलग से नहीं सिखाया गया। हमारे अंदर पहले से ही था। दोनों ही परिवारों में कई संभावनाएं हैं। मैं जिस परिवार से आई और जिस परिवार में व्याही गई-दोनों लगभग एक जैसे ही हैं। किसी भी लड़की के लिए यह बहुत बड़ा एहसास होता है ़ ़ ़ जब लगे ही नहीं कि यह अलग दुनिया है ़ ़ ़ अलग परिवार है। यहां सब कुछ नया है। अगर देखा जाए तो बदलाव जैसी कोई बात है भी नहीं, सब कुछ इतना सहज और सामान्य रहा ़ ़ ़ वही प्रवाह रहा। एक अंदरूनी बदलाव आ जाता है। सोचने और कंसर्न का दायरा बड़ा हो जाता है। अभी मेरा छोटा-परिवार नहीं रहा। बड़ा परिवार है। मैं से ज्यादा हम पर जोर है, जीवन में वह बहुत मजबूत हो गया है।

शादी को ऐश्वर्या राय किस रूप में लेती हैं?
बहुत ही खूबसूरत रूप है। अद्भुत खुशी का दौर होता है। मैं तो कहूंगी कि हर लड़की को इससे गुजरना चाहिए। शादी के बाद खुद का करीबी साक्षात्कार होता है। जिंदगी की सच्चाई और संबंधों को हम अलग से समझ पाते हैं। संबंधों का महत्व बढ़ जाता है। पति के साथ जो संबंध है, वह बहुत कीमती है। पति के साथ परस्पर आदर और प्रचुर प्रेम और सास-ससुर का स्नेह और प्यार तो मां-पिता के समान है। मैं तो बहुत सौभाग्यशाली हूं। शादी के बाद जब लड़की अपने ससुराल जाती है, तो मायके में उसकी जड़ें गहरी हो जाती हैं। परिवार के हर सदस्य के साथ आपके संबंध में कुछ नयी चीजें जुड़ जाती हैं। यह बहुत ही खूबसूरत साक्षात्कार है।

अमूमन मध्यवर्गीय परिवारों में सास-बहू के रिश्ते की बातें चलती हैं। माना जाता है कि आरंभ में समझदारी की दिक्कतें होती हैं। इस पारंपरिक धारणा के बारे में अपने संबंध में क्या कहेंगी?
हमारे तौर-तरीके और मूल्य मध्यवर्गीय हैं। मैं मध्यवर्गीय परिवार की लड़की हूं। आप यकीन करें कि इस परिवार के भी मूल्य और तौर-तरीके मध्यवर्गीय ही हैं। आप हमारी जड़ें देखिए। दादाजी, दादी मां और पा का परिवार मध्यवर्गीय रहा है। मां का भी परिवार ऐसा ही है। मेरी मां भी तीन बहनें हैं और यहां भी मां की तीन बहने हैं। उनके आपसी संबंधों की समानता देखकर दंग रह गई। सार्वजनिक तौर पर यह कहना शायद ज्यादा लगेगा, लेकिन अभिषेक और श्वेता को उनके मां-पिता ने बहुत सामान्य तरीके से पाला। आप उन्हें मनुष्य के रूप में देखें ़ ़ ़ उनके मूल्य बहुत मजबूत हैं। सिर्फ इस कारण इस परिवार को अलग नहीं कह सकते कि मां जया और पा अमिताभ बच्चन ऐक्टर हैं या मैं और अभिषेक ऐक्टर हैं। कल को हमारे बच्चे होंगे। उनके लिए तो हम भी ऐक्टर मां-बाप होंगे, लेकिन हमें अपने मां-बाप से जो मूल्य मिले हैं ़ ़ ़ हम उन्हीं मूल्यों को उन्हें सौंपेंगे। हमारे मूल सांस्कृतिक मूल्य मध्यवर्गीय ही है। करियर में हम जो भी करें, प्रोफेशनल तरीके से कुछ करें ़ ़ ़ तो उनसे बनी इमेज पर हमारा नियंत्रण नहीं है ़ ़ ़ उससे लग सकता है कि हमारे मूल्य अलग हैं, लेकिन हमारी जड़ों को देखें तो मूल्यों का पता चल जाएगा।

पहले परिवार का नियम था कि दिन का एक भोजन परिवार के सभी सदस्य साथ में करेंगे और डिनर टेबल पर सभी हिंदी में बातें करेंगे?
वह आज भी चल रहा है। हमलोग पूरी कोशिश करते हैं। अभिषेक के साथ मेरी बातचीत ज्यादा अंग्रेजी में ही होती है, लेकिन यह जरूरी है कि हमारी हिंदी मजबूत, स्पष्ट और साफ हो। मां और पा के कहने पर हम अमल करते हैं और पूरी कोशिश करते हैं कि हिंदी में बोलें। आपने सही कहा कि दिन का एक भोजन हमलोग साथ में करते हैं।

डिनर में क्या बनेगा, यह कौन डिसाइड करता है?
हम करते हैं। सभी की पसंद रहती है। मां कहती हैं कि तुम से कोई परेशानी नहीं होती। मैं भी यही कहती हूं कि सभी सामान्य और सहज हैं। कोई परेशानी नहीं होती। किसी के नखरे नहीं हैं। सभी दूसरों को समझने और उसके हिसाब से एडजस्ट करने के लिए तैयार रहते हैं। हम सभी रिलैक्स्ड इंडिविजुअल हैं।

अभिषेक बच्चन के बारे में बताएं?
अभिषेक को तो सभी जानते ही हैं। मैं तो उनसे प्यार ही करती हूं। मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि वे मेरी जिंदगी में आए।

अभिषेक की किस बात ने आपको आकर्षित किया?
किसी एक बात पर स्पष्ट रूप से कहना संभव नहीं होगा। वे जैसे व्यक्ति हैं ़ ़ ़ वे जैसे हैं। हमारे रिश्ते की सबसे अच्छी बात रही कि हम पहले से दोस्त रहे हैं। हमारी दोस्ती समय के साथ बढ़ती गई। हमारी समझदारी बहुत वास्तविक रही है। मैं नहीं कहती कि रिश्ते बनावटी होते हैं, लेकिन हमारा रिश्ता शुद्ध, स्पष्ट और पारदर्शी रहा। हम हमेशा एक-दूसरे से बातें शेयर करते रहे। हमारे बीच गहन प्यार और ढेर सारा आदर है। हम दोनों एक-दूसरे का भरपूर खयाल रखते हैं। एक-दूसरे की जरूरी चीजों को समझते हैं। हम दोनों एक जैसे ही हैं। अभिषेक चाइल्डमैन हैं और मैं चाइल्ड वीमैन हूं। इससे हम दोनों का संतुलन बना रहता है। कभी-कभी मैं किसी बच्ची की तरह व्यवहार करती हूं। उस समय अभिषेक मैच्योर हो जाते हैं। आप उनकी फिल्में देखें। उनके इंटरव्यू पढ़ें। आपको लगेगा कि उनमें परिपक्वता है। वे बहुत तीव्र और गहरे हैं, लेकिन कभी-कभी वे एकदम बच्चे बन जाते हैं। तमाशा करते हैं ़ ़ ़ आपको फंसाने की कोशिश करते हैं ़ ़ ़ ठीक मेरी तरह। मैं कभी बच्ची हो जाती हूं तो कभी सनसाइन गर्ल की तरह मैच्योर रहती हूं। मैं हमेशा अपनी उम्र से आगे रही। अपनी उम्र से ज्यादा बड़ी औरत रही।

आप दोनों के फैसलों में एक-दूसरे की सलाह या मदद की मात्रा कितनी रहती है?
हम दोनों के व्यक्तित्व में यह बात रही है कि हम अपनी बातें परिवार के साथ शेयर करते हैं। हम दोनों के परिवार ऐसे रहे हैं कि वे सलाह देंगे ़ ़ ़ और हम उनकी सलाह को पूरे ध्यान से सुनते हैं। आखिरकार हमारी फिल्में दर्शकों के लिए बनती हैं। वे भी दर्शक हैं। फिल्म के बारे में अलग-अलग राय सुनने से फिल्म को समझने में मदद मिलती हैं। उल्लेखनीय है कि उनकी सलाह और मदद के बावजूद यह अहसास दिलाया जाता है कि फैसले हम ने खुद लिए हैं। कभी मेरे मां-पिता या अभिषेक के मां-पा ने यह नहीं कहा या दवाब डाला कि ऐसा ही करो ़ ़ ़ इस तरह हमें अपने फैसलों का नाज होता है। एक आत्मविश्वास भी रहता है, लेकिन हम मन ही मन जानते हैं कि उनकी सलाह का निर्णायक प्रभाव है। हम उनकी राय पर ध्यान देते हैं और वे हमारे लिए महत्वपूर्ण है। वह आज भी चल रहा है। अब हम दोनों अलग नहीं रहे। अभिषेक और ऐश्वर्या अब दो मैं नहीं रहे। अब हम हम बन गए हैं। यह स्वाभाविक है कि हम एक-दूसरे से शेयर करें, तो हम अपने सोच-विचार और फैसले में एक-दूसरे की मदद लेते हैं। अगर एक तरह से सोच रहे हों, तो खुशी होती है।

कहते हैं कि शेयरिंग के साथ रिश्ते में स्पेस भी मिलना चाहिए?
हां, निश्चित ही। अभिषेक का एक अपना व्यक्तित्व है। वे इस बात को समझते हैं कि मैं अपना काम खुद देखती और संभालती रही हूं। वे इसका आदर करते हैं। हम दोनों एक-दूसरे पर कुछ थोपते नहीं हैं। हम खुद-ब-खुद एक-दूसरे के करीब आते हैं। सहारा लेते हैं और सुकून से रहते हैं। मेरे खयाल से इसी में दोनों की खुशी है कि हम मददगार बने रहें। हमारा निजी व्यक्तित्व तो है ही ़ ़ ़ मुझे अपने काम से बेहद प्यार है, लेकिन मैं अपने प्रियजनों को नाराज कर कुछ नहीं करती। सौभाग्य से मैं कभी ऐसी स्थिति में फंसी नहीं। मुझे हमेशा बेहतर और इज्जत भरा काम मिला, इसलिए दूसरों की भावनाएं अभी आहत ही नहीं हुई।

आप दोनों पहली फुर्सत में एक-दूसरे के पास चले जाते हैं, लेकिन इस संबंध में कहा जाता है किआपकी फिल्मों के नियमित काम में व्यवधान पड़ता है। दिल्ली-6, जोधा अकबर और दोस्ताना के संबंध में ऐसा कहा गया ़ ़ ़
हो ही नहीं सकता कि हम किसी फिल्म का नुकसान करें या व्यवधान डालें। हम सभी प्रोफेशनल हैं। परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के काम का खयाल रखते हैं। अपने काम का खयाल रखते हैं। आपको याद होगा कि अभिषेक के जन्मदिन के मौके पर पा आए थे, लेकिन तबियत खरात होने के बावजूद वे शूटिंग पर लौट गए। हमलोग कई बार कहते भी हैं कि आप खुद को क्यों इतना झोंकते हैं ़ ़ ़ लेकिन यह उनका प्रोफेशनल अप्रोच है। इस परिवार में सभी अपने काम के प्रति बिल्कुल सही रहते हैं। जो धारणा है उसके विपरीत सच्चाई है। एक-दूसरे के सेट पर हम ज्यादा सावधान रहते हैं। जोधा अकबर के सेट पर दो-तीन बार अभिषेक आए, तो शॉट की जगह पर आने से बचते रहे। पा भी आए मिलने, तो आशु ने बुलाया कि सेट तो देख लीजिए। हम तो वैसे ही फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं। हम ऐसे ही हैं। दिल्ली-6 की बात करें, तो राकेश, भारती और विनोद प्रधान को मैं बहुत पहले से जानती हूं। जोधा अकबर की रिलीज के समय अभिषेक विशेष तौर पर आए। जहां तक लोगों केकहने की बातें हैं, तो उस पर हमारा कोई काबू नहीं है।

कुछ तो लोग कहेंगे ़ ़ ़ लोगों का काम है कहना ़ ़ ़
बिल्कुल। अभी तो मैं आगे की बातें भी बता सकती हूं। हम जब से एक हुए, तब से ऐसी बातें चल रही हैं। आगे लिखेंगे कि उनके बीच तनाव हो गया है या किसी और से उनकी दोस्ती हो रही है। हम दोनों जिस प्रोफेशन में हैं, वहां यह स्वाभाविक है। अगर मैं अभी काम नहीं करती तो कहते कि देखो दबाव में आकर काम नहीं कर रही है। अगर मैं आज काम कर रही हूं और कल भी करती रहूंगी तो लिखा जाएगा कि वह केवल अपने करिअर पर ध्यान दे रही है। वह अपने परिवार के बारे में सोचती ही नहीं। दोनों ही तरह की बातें होती रहेंगी। लिखा जाएगा कि अभिषेक या मैं अपने को-स्टार को लेकर पजेसिव हैं या वे मेरे को-स्टार से जलते हैं। या मैं उनकी को-स्टार को पसंद नहीं करती। आगे चलकर स्कैंडल बनाने की कोशिश करेंगे। यह सब तो होगा ही। हमें मजबूत रहना है। हमें मालूम है कि हम किस सफर पर हैं ़ ़ ़ हमें मालूम है कि क्या-क्या लिखा है, लेकिन वही पहले हमारे निजी ताकत और फिर एक दंपति के रूप में हमारी ताकत काम आएगी। हमारा असली प्रेम, आदर और विश्वास ही ऐसी स्थितियों में हमारी मदद करेगा। ऐसी बातें हैं और रहेंगी ़ ़ ़ हमारी जिंदगी का यह भी एक पहलू है। हमें यह एहसास दिला दिया गया है।

क्या आपको नहीं लगता कि पिछले कुछ सालों में गहरी और अनुभूति वाली सारी फिल्में आपकी झोली में आ गिरीं ़ ़ ़ ऐसा संयोग कैसे हुआ?
आप इसे संयोग की बात कह कर मेरी प्रतिभा पर शक कर रहे हैं। गौर करें तो मैं जब फिल्मों में आई तब से ऐसी ही फिल्में कर रही हूं। पिछले दस-बारह सालों में इंडस्ट्री में काफी बदलाव आ गया है। पहले इस तरह की बात होती थी कि हीरो को इस तरह का रोल करना चाहिए। दो-चार गाने हों। स्क्रीन पर ज्यादा देर तक रहे तभी लंबा करिअर चलेगा। आप देखें कि मेरी पहली फिल्म इरूवर थी। उस समय कई फिल्मों के ऑफर थे। लोगों ने पूछा भी कि भले ही मणिरत्नम मोहन लाल के साथ काम कर रही हो। मेरे लिए तो वे किसी संस्थान की तरह हैं। मैं उनसे कितना सिखूंगी। मेरा परिप्रेक्ष्य यही था। जिसे लोग सुरक्षित रास्ता या निश्चित फार्मूले की बात कहते हैं, जिससे हर हीरोइन को गुजरना ही होता है ़ ़ ़ उसे शुरू से ही मैंने तय किया कि नहीं करूंगी। मैं इस सोच में नहीं फंसूंगी कि वैसी फिल्में करूंगी तो इंडस्ट्री में ज्यादा दिनों तक टिकी रहूंगी। या इस तरह के रोल करूं या किसी हीरो के साथ जोड़ी बना लूं, मैं इन सारी चीजों से दूर रही। यह मेरी ख्वाहिश, निर्देशकों का विश्वास है कि मैं हस तरह की धारणाओं को तोड़ पाई। इरूवर जींस और कंडू कोंडेन तमिल फिल्में कीं, तीनों ही फिल्में अलग-अलग किस्म की थीं। कथित रूप से कॉमर्शिअॅल नहीं थीं। मुझे खुशी है कि उन फिल्मों की चर्चा हुई। हिंदी फिल्मों में और प्यार हो गया मेरी पहली फिल्म थी। उसी फिल्म के साथ आ अब लौट चलें आरंभ हुई। वह हीरो-हीरोइन से ज्यादा बाप-बेटे की कहानी थी। आपने सही कहा कि मेरी झोली में अच्छी फिल्में आई, लेकिन मैं सच कह रही हूं कि मैंने कभी सुरक्षित होने के लिहाज से उन फिल्मों को नहीं चुना। संजय लीला भंसाली की हम दिल दे चुके सनम मेरी तीसरी फिल्म थी। उसमें मेरा देसी लुक था। मैंने यह नहीं सोचा कि केवल साडि़यों और भारतीय कपड़ों में ही लोग देखेंगे। वह किरदार बहुत मजबूत था। ताल में सुभाष जी ने मुझे बहुत अच्छा रोल दिया। जोश में पश्चिमी लुक था और चुलबुली लड़की थी मैं। शाहरुख खान की बहन बनी थी। लोगों ने कहा भी कि बहन क्यों बन रही हो? मैं घिसे-पिटे तरीके के रोल से बचने के लिए यह सब कर रही थी। मैं यह नहीं कह रही कि किसी मिशन के साथ आई थी, लेकिन जब ऐसी फिल्में मिली तो मैं पीछे नहीं हटी। मैंने कहा कि मैं फिल्मों में काम कर रही हूं। मुझे इंडस्ट्री और दर्शकों को स्पष्ट कर देना है, मुझे खुशी है कि यह संदेश गया। मैं किसी इमेज के चक्कर में नहीं रही। मैं खुद को कमर्शियल अभिनेत्री साबित करने के भी चक्कर में नहीं रही। नृत्य मेरी विशेषता है। मेरी फिल्मों में हर डायरेक्टर ने कुछ नया करने की कोशिश की। मेरे पास च्यादा गाने नहीं है, जो कि होने चाहिए थी। जोधा अकबर में मैंने आशुतोष से आग्रह किया था कि एक गाना मुझे दें। राजस्थानी लोक नृत्य और सूफीवाद का अच्छा मेल हो सकता है। आशु ने कहा कि विचार अच्छा है, लेकिन मेरे नैरेटिव में नहीं आता। मैं उनके फैसले का आदर किया। मुझे खुशी है कि मेरी फिल्में यादगार हो गई, क्योंकि मेरे निर्देशकों ने अपनी फिल्मों और किरदार पर ध्यान दिया।

आपकी फिल्मों में अच्छी फिल्मों का प्रतिशत अच्छा रहा है ़ ़ ़
हां, कई फिल्में तो छूट भी गई। ऐसी कई फिल्में चाह कर भी नहीं कर पाई। एक साल में ज्यादा से ज्यादा तीन ऐसी फिल्में कर सकते हैं। चौथी फिल्म के तौर पर एक हल्की-फुल्की फिल्म कर सकते हैं। ऐसी फिल्म हो, जिसमें एक्टिंग के लिहाज से च्यादा मेहनत नहीं करनी हो। जैसे कि मैंने डेविड धवन की फिल्म या क्यों हो गया न की ़ ़ ़ मैंने इन फिल्मों को इसलिए किया कि वे हल्की फिल्में थीं। मैं खुश हूं कि मैंने वे फिल्में कीं। मुझ पर कोई दबाव नहीं था। मैंने खाकी भी की। हालांकि वह एक स्ट्रांग स्टोरी थी, लेकिन मेरे काम पर च्यादा दबाव नहीं था। अब जैसे गुरु का उदाहरण दूं। उसमें सुजाता का काम च्यादा नहीं था, लेकिन मैंने पूरा समय दिया ताकि मणि अपने हिसाब से शूट कर सकें। मेरे ऊपर दबाव नहीं था। अभी रोबोट करने जा रही हूं। उसमें मेरा कोई इंटेंस रोल नहीं है। वह कमर्शियल और फन फिल्म है। उसमें वक्त लगेगा, क्योंकि तकनीकी रूप से वह बहुत डिमांडिंग फिल्म है ़ ़ ़ वक्त काफी लगेगा उस फिल्म के बनने में ़ ़ ़ मेरे लिए उसमें काफी काम रहेगा, क्योंकि वह एक अलग भाषा की फिल्म होगी। मुझे मेहनत करनी पड़ेगी। इनपुट और मेहनत तो रहेगी। भले ही दुनिया को लगे कि हल्का-फुल्का रोल है और इमोशनली इंटेंस नहीं है।

कहा जा रहा है कि आप सबसे महंगी एक्ट्रेस हो गयी हैं। ज्यादा पैसों का आकर्षण आपके काम और पसंद को भी प्रभावित कर सकता है?
मैं बाकी लोगों के बारे में कह नहीं सकती। मैं तो पहले जैसे काम करती थी, वैसे ही करती रहूंगी। मेरा काम ही बोलेगा। इतने सालों में आप लोगों ने पहचाना होगा कि मैं पैसे और काम में किसे महत्व देती हूं। जहां तक ऐक्टर के पैसे बढ़ने की बात है तो आमदनी बढ़ना तो पॉजीटिव बात है। यह फिल्म इंडस्ट्री की सफलता है। यह प्रगति है और मान लीजिए कि इंडस्ट्री फल-फूल रही है। यह पूरा बिजनेस है। कोई खेल-खिलवाड़ है नहीं ़ ़ ़ लोग समझ रहे हैं। निवेशक धन लगा रहे हैं। प्रोड्यूसर पैसे लगा रहे हैं। यह प्रोजेक्ट पर भी निर्भर करता है। आप इसका सरलीकरण नहीं कर सकते।

क्या शाहरुख खान के साथ कोई फिल्म करेंगी?
क्यों नहीं? पहली फिल्म में मैं उनकी बहन थी। मेरे लिए फिल्म और डायरेक्टर ज्यादा महत्वपूर्ण रहते हैं। मुझे खुशी है कि मेरी फिल्मों की कहानी अलग रही है। हीरो कभी मुद्दा नहीं रहे।

श्रीराम राघवन की फिल्म की क्या स्थिति है?
लोग मुझ पर आरोप लगा रहे थे कि मेरी वजह से देरी हो रही है। सच तो यह है कि श्रीराम अपनी स्क्रिप्ट को अंतिम रूप दे रहे हैं। मैंने श्रीराम से कहा कि आप स्पष्ट कर दीजिए। लोग खामखां मेरे परिवार पर आरोप लगा रहे हैं। ये बातें अच्छी नहीं हैं। स्क्रिप्ट तैयार होते ही हमलोग काम शुरू कर देंगे।

सरकार राज कैसी लग रही है? आप अभिषेक और अमित जी के साथ आ रही हैं?
उन दोनों के साथ काम करना आनंददायक है। मैं इसलिए नहीं कह रही हूं कि अमित जी मेरे श्वसुर और अभिषेक मेरे पति हैं। इंडस्ट्री में कोई भी कलाकार और तकनीशियन यही बात कहेगा। कैमरा चालू होते ही हमारे निजी रिश्ते खत्म हो जाते हैं और हम एक्टर में बदल जाते हैं। अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन के साथ काम करना तो हमेशा आनंददायक रहा। दोनों फैंटेस्टिक एक्टर हैं। रामू मुझ से सत्या के समय से मिल रहे हैं। तब से अभी तक हमलोग साथ काम नहीं कर पाए। तारीखों की दिक्कत थी। आखिरकार सरकार राज साथ कर सके। उनका दिमाग बिल्कुल अलग तरीके से काम करता है। उनके पास भविष्य के लिए भी कई फिल्मों की योजनाएं हैं।

अमिताभ बच्चन के साथ काम करना सुखद अनुभव रहता है। सभी ऐसा कहते हैं, आप क्या कहती हैं?
अनुभव से इतने समृद्ध ऐक्टर के साथ काम करना सुखद और सीखने लायक होता है। उनका अनुभव ही देख लें। अभिषेक ने भी बेहतर अभिनेता के तौर पर निखरे हैं। उनके साथ काम करना हमेशा अच्छा लगता है। गुरु में हमलोगों का काम पसंद किया गया। हम लोगों के पास अभी जिस तरह की फिल्मों के विषय और विचार आ रहे हैं, उससे लगता है कि सभी हमें एक्टर के तौर पर पहचान रहे हैं। जरूरी नहीं है कि पर्दे पर हम पति-पत्नी और प्रेमी-पे्रमिका ही रहें। मैं एक बात पर जोर देना चाहूंगी कि आप यह न भूलें कि जया जी और अमित जी मां-पिता भी हैं। उनके लिए मैं उनकी बहू हूं और अभिषेक उनके बेटे हैं। यह रिश्ता इतना रियल है।

जोधा में कौन सी बात सबसे प्रभावित करती है?
उनकी अंदरूनी ताकत। उन्होंने शादी का अहम फैसला लिया। मुगल शहंशाह और राजपूत राजा के बीच राजनीतिक संबंध बन रहा था। उस राजनीतिक संबंध के तहत जोधा की शादी हो रही थी। जोधा एक तरीके से अपने दुश्मन से शादी कर रही थी। वह जवान लड़की थी। निश्चित ही उसकी अंदरूनी ताकत रही होगी कि पिता से असहमत होते हुए भी उसने अपने पिता की प्रतिष्ठा रखी और अपनी प्रजा के लिए ऐसा कदम उठाया। वह एक नयी दुनिया में गयी नए धर्म के लोगों के बीच गयी। उसने उस शादी को स्वीकार किया और मौका दिया कि समझदारी विकसित हो। मतभेदों के बावजूद समझदारी बन सके। जोधा ने अकबर को किस तरह प्रभावित किया॥ एक संबंध में खूबसूरती यही है, जब किसी बात को थोपा न जाए और प्यार एवं अपनापन के साथ एक समझदारी और लगाव विकसित हो जाए। तब उस रिश्ते की जड़ें मजबूत होती हैं। उनके संबंधों की यही सुंदरता है। अकबर और जोधा ने एक-दूसरे पर धर्म, व्यवहार, विश्वास थोपा नहीं, लेकिन दोनों को अपनी संस्कृति और धर्म का अभिमान रहा। उन्होंने इस बारे में बड़े बयान नहीं दिए। जोधा यह बात मुगल जनाना में ले आई और अकबर को राजी कर सकी। अकबर राजनीतिज्ञ तो थे ही, लेकिन बेहतरीन इनसान भी थे। उनकी दूरदृष्टि ही थी कि उन्होंने जोधा से शादी की। पहले यह सोच दिमाग में थी, बाद में दिल में उतर गई।

जोधा अकबर मां-पिता द्वारा की गई शादी और उसके बाप पनपे प्यार को भी स्थापित करती है?
हां, इस हिसाब से यह आज की फिल्म है। आज भी देश में 70-80 प्रतिशत शादियां मां-पिता ही तय करते हैं। इस फिल्म को देखकर समझ सकते हैं कि शादी के बाद कैसे प्रेम पनपता है या नजदीकी बढ़ती है।

Wednesday, June 4, 2008

बॉक्स ऑफिस:०६.०५.२००८

अगले ही दिन ढेर हुई वुडस्टॉक विला

सिर्फ प्रचार से फिल्में चल जातीं तो सिकंदर खेर अभिनीत वुडस्टॉक विला को बॉक्स आफिस पर कीर्तिमान स्थापित करना चाहिए था। सच है कि संजय गुप्ता की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर पहले ही दिन दम तोड़ दिया। सिकंदर खेर का आकर्षण काम नहीं कर सका। दर्शक नहीं आए और फिल्म अगले ही दिन ढेर हो गयी।
वुडस्टॉक विला को आरंभिक दिनों में पंद्रह प्रतिशत दर्शक भी नहीं मिले। दर्शकों के आरंभिकरुझान से ही स्पष्ट हो गया था कि फिल्म सिनेमाघरों में टिक नहीं पाएगी। सोमवार से दर्शकों में भारी गिरावट आयी। हंसते हंसते का प्रदर्शन और भी बुरा रहा। उसे दस प्रतिशत ही दर्शक मिले। हंसते हंसते के निर्माताओं को रोते-रोते अगली फिल्म की तैयारी करनी होगी।
ट्रेड विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों ही फिल्में बुरी थीं, इसलिए उनका यह हाल हुआ। ताज्जुब है कि फिल्म इंडस्ट्री के अनुभवी निर्माता-निर्देशक कैसे इस तरह की फिल्मों को लेकर आश्वस्त रहते हैं और कुछ यों प्रचार करते हैं कि उनकी फिल्म नए मानदंड स्थापित कर देगी।
पिछले हफ्तों में फिल्में न चलने की वजह आईपीएल को माना जा रहा है। अब तो आईपीएल खत्म हुआ। देखें, इस हफ्ते दर्शक सिनेमाघरों का रूख करते हैं या नहीं? इस हफ्ते राम गोपाल वर्मा की सरकार राज राज कुमार गुप्ता की आमिर और मशहूर अमरोही की हम से है जहां प्रदर्शित हो रही हैं।

Tuesday, June 3, 2008

जोधा अकबर के १०० दिन और उसके कटे दृश्य

जोधा अकबर के १०० दिन हो गए.इन दिनों हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में १०० दिनों और ५० दिनों की भी पार्टियाँ होती हैं.पहले फिल्में सिल्वर जुबली और गोल्डेन जुबली मनाती थीं.२१ वीं सदी में सिल्वर और गोल्डेन जुबली सपना हो गई हैं.आजकल तो पहले दिन की अच्छी शुरूआत हो जाए तो अल दिन या रविवार तक सुपर हित के पोस्टर लग जाते हैं.जन्नत के साथ ऐसा हुआ है।
बहरहाल,जोधा अकबर के १०० दिन पूरे होने के अवसर पर निर्देशक और निर्माता आशुतोष गोवारिकर ने पार्टी दी.चवन्नी भी वहाँ गया था.इस पार्टी में उन्होंने फ़िल्म के कटे हुए दृश्य दिखाए.आशुतोष ने बताया की उन्होंने पहले सब कुछ स्क्रिप्ट के मुताबिक शूट कर लिया था.बाद में फ़िल्म संपादित करते समय उन्होंने दृश्य काटे. इस मौके पर उन्होंने सारे कटे दृश्य दिखाए.कुछ अत्यन्त मार्मिक और महत्वपूर्ण दृश्य थे,लेकिन फ़िल्म की लम्बाई की वजह से उन्हें रखने का मोह आशुतोष को छोड़ना पड़ा।
अकबर के दरबार में बीरबल की एंट्री का दृश्य रोचक और जानदार था.कैसे महेश दास नाम का व्यक्ति अकबर को अपनी हाजिरजवाबी से खुश करता है और दरबार में जगह पाता है.कैसे मुल्ला दो प्याजा उसे दरबार में आने से रोकने की आखिरी कोशिश में विफल होते हैं.मुग़ल दरबार का यह दृश्य फ़िल्म में रहना चाहिए था.जोधा और अकबर के बीच के कुछ खास दृश्य भी कटे हैं।
चवन्नी उम्मीद करता है आशुतोष गोवारिकर जोधा अकबर की डीवीडी में ये सारे दृश्य अवश्य डालेंगे.

Sunday, June 1, 2008

अभिषेक बच्चन से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

अभिषेक बच्चन की पहली फिल्म से लेकर आज तक जितनी भी फिल्में आयीं है सभी में उनका अलग अंदाज देखने को मिला। प्रस्तुत है अभिषेक से बातचीत-
अभिषेक इन दिनों क्या कर रहे हैं?
शूटिंग कर रहा हूं। दिल्ली-6 की शूटिंग कर रहा था। उसके बाद करण जौहर की फिल्म कर रहा हूं, जो तरूण मनसुखानी निर्देशित कर रहे हैं। फिर रोहन सिप्पी की फिल्म शुरू करूंगा। काम तो है और आप लोगों के आर्शीवाद से काफी काम है।
सरकार राज आ रही है। उसके बारे में कुछ बताएं?
सरकार राज, सरकार की सीक्वल है। इसमें फिर से नागरे परिवार को देखेंगे। सरकार जहां खत्म हुई थी, उससे आगे की कहानी है इसमें। नयी कहानी है और नयी समस्या है। इसमें ऐश्वर्या राय भी हैं। मैं तो बहुत एक्साइटेड हूं। ऐश्वर्या इस फिल्म में बिजनेस वीमैन का रोल निभा रही हैं। वह नागरे परिवार के सामने एक प्रस्ताव रखती हैं और बाद में उस परिवार के साथ काम करती हैं।
द्रोण के बारे में क्या कहेंगे? सुपरहीरो फिल्म है?
सब लोग द्रोण को सुपरहीरो फिल्म समझ रहे हैं। वह सुपरहीरो फिल्म नहीं है। हां, मैं फिल्म का हीरो हूं, लेकिन सुपरहीरो नहीं हूं। द्रोण एक फैंटेसी फिल्म है। उस फिल्म का थोड़ा सा काम बाकी है। उस फिल्म में पोस्ट प्रोडक्शन का काम लंबा है। फिल्म में काफी मैजिक है। द्रोण आज की फिल्म है। कॉस्ट्यूम भी है, लेकिन कॉस्ट्यूम ड्रामा नहीं है। यह हाइपर रियल फिल्म है। मैंने ऐसी फिल्म पहले नहीं की। मेरे खयाल में कटिंग एज एंटरटेनमेंट होगा। इंटरनेशन स्टैंडर्ड के करीब होगी फिल्म। मैंने कभी स्पेशल इफेक्ट की फिल्म नहीं की है, इसलिए मैं तो सब कुछ सीख रहा हूं। फिल्म के डायरेक्टर गोल्डी मेरे दोस्त हैं। और क्या बताऊं फिल्म के बारे में।
फिल्म में आपका नाम द्रोण ही होगा न? प्रियंका चोपड़ा क्या कर रही हैं?
हां, मेरा नाम द्रोण ही है। प्रियंका चोपड़ा मेरी बॉडी गार्ड हैं। मैं उनसे प्रेम भी करता हूं।
संयोग से आपकी सरकार राज और द्रोण दोनों में आपके मां-पिता में से एक हैं। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
द्रोण में मां के साथ ज्यादा काम नहीं है। दो-तीन दिनों का ही काम था, लेकिन बहुत मजा आया। लागा चुनरी में दाग में भी हम दोनों थे। उसमें एक दिन का काम था। उसके पहले हम दोनों ने एक बंगाली फिल्म देस की थी। मां के साथ सबसे बड़ा मजा यही है कि कट बोलते ही वह एक्टर से मां बन जाती हैं। पूछती हैं कि खाना खाया कि नहीं या ममता भरी कोई बात करने लगती है। परिवार में सारे लोग अपने कॅरियर और काम में इतने व्यस्त है कि हम अलग-अलग जगह काम कर रहे होते है। डैड के साथ तो फिर भी ज्यादा टाइम मिल जाता है। मां के साथ कम मौका मिलता है रहने का। एक्टर के तौर पर मैं क्या कह सकता हूं। शी इज जस्ट एन आउटस्टैंडिग आर्टिस्ट। आप उन्हें काम करते देख कर भी बहुत कुछ सीख सकते हैं। उनके साथ काम करना तो शुद्ध आनंद है। उन जैसी प्रतिभा का नियमित काम नहीं करना तो प्रतिभा की बर्बादी है।
अभिनेता की तरह निर्देशक की जिंदगी में भी उतार-चढ़ाव आता है। रामू की बात करें, रामगोपाल वर्मा की आग के बाद ऐसा लग रहा है कि वे खत्म हो गए। ऐसी स्थिति में रामू के साथ सरकार राज करते समय कोई संकोच या डर नहीं लगा?
बिल्कुल नहीं, कभी नहीं, मेरे अनुसार रामू अपने देश के एक प्रतिभाशाली निर्देशक हैं। निर्देशक कभी सफल होते हैं और कभी नहीं हो पाते। सरकार राज करते समय किसी के मन में यह ख्याल तक नहीं आया। रामू ने मुझे नाच तब दी थी, जब मेरी कोई फिल्म हिट नहीं हुई थी। उन्होंने मुझमें विश्वास किया था। उन्होंने मुझ में कुछ देखा था। रामू के साथ काम करते समय मैं उनकी प्रतिभा देख पाता हूं। उनकी एक फिल्म नहीं चली तो इसका मतलब यह नहीं होता कि आप उनका नाम मिटा दें। उन्होंने सरकार राज में गजब का काम किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि इस फिल्म से वे सभी को खामोश कर देंगे।
ऐसा माना जाता है कि आपकी कोई ब्रांडिंग नहीं हुई है। किसी एक इमेज में आप नहीं बंधे हैं। यह आपकी कोशिश है या संयोग से ऐसा हुआ है?
एक एक्टर के तौर पर हम सभी चाहते हैं कि हम ब्रांडेड न हों। उससे बचे रहने पर मौका मिलता है कि हम अलग किस्म की फिल्में करें। हमारा हर किरदार अलग हो। मेरी पीढ़ी की बात करें और रितिक का उदाहरण लें। रितिक ने कहो ना..प्यार है से शुरूआत की। उसने फिजा, कोई मिल गया, कृष, धूम और जोधा अकबर जैसी फिल्में कीं। आप वैरायटी देखिए और ये सभी फिल्में हिट है। इन सारी फिल्मों में रितिक का काम बहुत सराहा गया। हम एक्टर है कुछ नया करते हैं तो हमें अच्छा लगता है। मैंने भी रिफ्यूजी से शुरूआत की थी। फिर मैंने कुछ न कहो जैसी फिल्म की। युवा, सरकार , बंटी बबली, दस, धूम, धूम-2 । मैं मानता हूं कि मेरी पीढ़ी किसी ब्रांड या इमेज में नहीं बंधी है। मेरी पीढ़ी निर्देशकों को मौका दे रही है कि वे रोचक रोल लिखें और हम उन्हें यह विश्वास दिला सकते हैं कि हम वे रोल कर पाएंगे। हमारी पीढ़ी का कोई भी अभिनेता एक तरह की फिल्म तक सीमित नहीं रहा है। हम सभी इस तथ्य के लिए सचेत नहीं हैं कि हमें एक्शन हीरो बनना है या रोमांटिक हीरो बनना है। हम सब कुछ करना चाहते हैं। इसे आप लालच कहेंगे या मूर्खता कहेंगे, मुझे नहीं मालूम, लेकिन मुझे खुशी है कि हम ऐसा कर पा रहे हैं।
क्या यह बात आप तक पहुंची कि आप रितिक रोशन के समान मेहनत नहीं करते या काम के प्रति उनकी तरह गंभीर नहीं रहते?
नहीं, मुझे किसी ने नहीं कहा कि मैं मेहनत नहीं करता हूं। मुझे लगता है कि दूसरों के समान मैं भी मेहनत करता हूं। और ज्यादा करनी चाहिए। जरूर करनी चाहिए, क्योंकि सुधार की संभावना हमेशा बनी रहती है। मेहनत की गुंजाइश रहती है। अभी तक किसी ने नहीं कहा कि मैं अपने काम के प्रति गंभीर नहीं रहता। मुझे हंसी आती है। आप इसे मेरा प्रमाद या अहंकार ना समझें। गुरु पिछले साल की हिट फिल्म थी। वह जनवरी में रिलीज हुई थी। दर्शक खुश थे। समीक्षकों ने दयालुता दिखाई। अब चूंकि लंबे समय से कोई फिल्म नहीं आई है तो लोग कहने लगे कि अभिषेक गंभीर नहीं है। यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मेरे ख्याल में यह असंगत और मिथ्या आरोप है, लेकिन ऐसे आरोपों के बीच जीना हमारी नियति है। हमारा काम ही बोलता है। हम प्रचारक रख कर दूसरों की राय नहीं बदल सकते। हमारे बारे में राय हमारे काम से बनती है। हमें इसी में यकीन रखना चाहिए। मैं नहीं जानता हूं कि ऐसी बातें कहने वाले लोग कौन हैं? उन्होंने मेरे साथ कौन सी फिल्म की है? उन्होंने ऐसी धारणा किस आधार पर बनाई। और फिर कड़ी मेहनत क्या है? कौन तय करेगा। हर आदमी की अपनी शैली होती है। अगर कड़ी मेहनत का मतलब एक कोने में बैठकर अपनी पंक्तियां याद करना है तो मुझे खेद है कि मैं ऐसा नहीं कर सकता। मेरा अपना अप्रोच है और वह मेरे लिए कारगर है। हो सकता है वह अप्रोच दूसरों के लिए कारगर न हो, लेकिन मैं अपनी प्रक्रिया दूसरों पर नहीं लादता। मुझे लगता है कि मैं अपना काम पूरी ईमानदारी और मेहनत से करता हूं। फिर भी अगर कोई कुछ कह रहा है तो मुझे ध्यान देना चाहिए। मैं ऐसे लोगों से मिलकर यह जानना चाहूंगा कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं?
फिल्म हिट होती है तो सारा श्रेय एक्टर को मिलता है। उसी प्रकार फिल्म फ्लॉप हो तो दोषी भी एक्टर ही माना जाता है, ऐसा क्यों?
क्योंकि वह फिल्म का चेहरा होता है। आप ने पहले कहा था कि आप आलोचकों की टिप्पणियों से सीखते और खुद को सुधारते हैं, लेकिन जब लोग आपकी तारीफ करते हैं तो वह माथे पर चढ़ता भी होगा। आप कैसे संतुलन बनाए रखते हैं? मैं शुरू से स्पष्ट हूं कि जो आज ऊपर है, कल वह नीचे आएगा। यह प्रकृति का नियम है। यही जिंदगी का नियम है। गुरु हिट हुई। फिल्म की, मेरे रोल की और मेरे परफॉर्मेस की तारीफ हुई , मुझे यह मालूम था कि अगली फिल्म गुरु जैसी नहीं चलेगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं कोशिश करना छोड़ दूं। पर आप कामयाब होते हैं। आप गिरते हैं, फिर उठते हैं और आगे बढ़ते हैं। आप गिरने पर रुक नहीं जाते। फिर से आगे बढ़ते हैं। मेरे दादाजी कहते थे कि जिंदगी में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आप कितनी बार गिरते हैं। महत्व इस बात का है कि आप कितनी बार खुद को बटोर कर उठते हैं और आगे बढ़ते हैं।
मणिरत्नम की युवा और गुरु दोनों ही फिल्मों में आपका काम बेहतरीन रहा। कहते है निर्देशक-अभिनेता की समझदारी हो तो फिल्म एवं भूमिका में निखार आता है। और किन निर्देशकों के साथ आप ऐसी समझदारी महसूस करते हैं?
मैं सारा श्रेय निर्देशकों को दूंगा। मैं बहुत ही सीमित किस्म का एक्टर हूं। इसलिए मैं अपने निर्देशकों से खास मदद चाहता हूं। मुझे अपनी सीमाएं मालूम हैं। मुझे मालूम है कि मैं क्या कर रहा हूं। मुझे यह भी मालूम है कि मैं क्या नहीं कर सकता हूं। मेरे खयाल से यह मालूम होना ज्यादा जरूरी है। मुझे निर्देशक का प्यार और विश्वास चाहिए होता है। अगर निर्देशक के साथ मैं सहज हूं तो मैं कुछ भी कर सकता हूं। शायद यही वजह है कि मैंने अपने दोस्तों के साथ ज्यादा काम किया है। गोल्डी बहल, रोहन सिप्पी, करण जौहर ये सब के सब मेरे दोस्त हैं। मणिरत्नम भी दोस्त हो गए हैं। हमारी समझदारी थी, तभी युवा वैसी बन पाई। बिल्कुल सही कहा आपने कि निर्देशक-अभिनेता की समझदारी हो तो सब कुछ निखर जाता है।
आजकल बॉडी बनाने पर बहुत जोर दिया जा रहा है। सिक्स पैक एब तो मशहूर ही हो गया। क्या इसे जरूरी नहीं मानते?
जरूरी मानता हूं, अगर किरदार की जरूरत है। जब मैं गुरु कर रहा था तो मणि सर ने कहा था कि जैसे-जैसे गुरु बूढ़ा होता जा रहा है, वैसे-वैसे उसे मोटा होना है। उस फिल्म के लिए मैंने ग्यारह किलो वजन बढ़ाया था। वह फिल्म की जरूरत थी। अगर कल किसी फिल्म में सिक्स पैक की जरूरत होगी तो उसकी कोशिश करूंगा। मेरा मानना है कि यह विजुअल मीडियम है और आपको कैरेक्टर की तरह दिखना चाहिए। जरूरी नहीं है कि सिक्स पैक एब हो ही। एक्टर होने की पहली शर्त है कि आप एक्टिंग जानें, लेकिन कैरेक्टर की तरह दिखना भी चाहिए। सरकार राज में लुक है, हल्की दाढ़ी और खास तरीके से काढ़े गए बाल। रामू ने इस बार कहा कि पार्ट वन की तरह पतला-दुबला नहीं होना है, क्योंकि शंकर नागरे बड़ा हुआ है। वह परिवार का मुखिया बन गया है। वह समृद्ध हुआ है। इसलिए हमने उसे पतला-दुबला नहीं दिखाया है। पहले में शंकर के हाथ में चीजें नहीं थीं। अब सब कुछ शंकर के हाथ में है। सरकार में उसे पतला-दुबला दिखाया गया था। उसकी आंखों में जिंदगी की भूख थी। अब वह भूख नहीं है। अब चूंकि वजन घटाने का फैशन चल रहा है, इसलिए खालिद मोहम्मद ने कहीं लिख दिया कि मैं मोटा दिखता हूं। आपको नहीं मालूम कि मैं क्या कर रहा हूं। मैं कौन सा रोल निभा रहा हूं।
शरीर सौष्ठव दिखने का नया क्रेज है। आप क्या कहते है?
हां है न, समय बदल गया है। अगर दर्शक वैसे ही देखना चाहते हैं तो हमारे ऊपर दबाव आएगा ही। मुझे अभी तक कोई ऐसा रोल नहीं मिला है। न ही कोई दबाव पड़ा है।
पिछले दिनों खबर आई थी कि ऐश्वर्या राय पिंक पैंथर-2 की शूटिंग के समय अकेलापन महसूस कर रही थीं, तो आप उनसे मिलने चले गए थे, लेकिन उसकी वजह से क्या शूटिंग में व्यवधान पड़ा?
हुआ यों था कि ऐश्वर्या बोस्टन में पिंक पैंथर-2 की शूटिंग कर रही थी। मेरा मुंबई का शेड्यूल रद्द हो गया था। मैं खाली था तो बस ऐसे ही मिलने चला गया। अब मालूम नहीं कि मीडिया को कैसे महसूस हो गया कि वह अकेलापन महसूस कर रही हैं। शूटिंग में कोई व्यवधान नहीं पड़ा।
आप एक्टर हैं। दुनिया में तमाम किस्म के लोगों से मिलते हैं। आपका एक्सपोजर गजब का होता है। कई सारी चीजें आप यों ही सीख और जान लेते हैं?
एक्टर तो स्पंज की तरह होते हैं। सब कुछ देखना और समझना ही हमारा काम है। यह हमारे काम का हिस्सा है। अब जैसे कि इस इंटरव्यू के समय आपका दाहिना हाथ गाल के आसपास रहा है। आप सवाल पूछते समय ऊपर दायीं तरफ देखते हैं और जब मैं लंबा जवाब देता हूं तो आप रिकॉर्डर देखते हैं। यह मेरा निरीक्षण है। यही मेरा काम है। हो सकता है कि कल किसी किरदार को निभाते समय मैं आपकी इस आदत का इस्तेमाल कर लूं। गुरु के समय मैंने बॉडी लैंग्वेज और बोलने का लहजा वासु भगनानी की तरह रखा था।
आप राजनीतिक रूप से कितने जागरूक हैं?
मैं राजनीतिक रूप से जागरूक नहीं हूं और होना भी नहीं चाहता हूं। मैं राजनीति समझ नहीं पाता। देश की घटनाओं की चर्चा होती है, लेकिन जरूरी नहीं है कि उस पर राजनीतिक नजरिए से बात हो। मेरा अपना दृष्टिकोण है। मैं परिवार में बात करते समय उसे रखता हूं। मेरी ऐसी कोई हैसियत नहीं है कि मैं अपना दृष्टिकोण सार्वजनिक रूप से रखूं या उसकी बात करूं। मेरा वह काम नहीं है। मेरा काम है एक्टिंग करना।
आप एक्टिंग के साथ कुछ प्रोडक्ट के साथ भी जुड़े हैं। उनके ब्रांड एंबैसडर हैं?
यह एक्टिंग का ही विस्तार है। मैं वैसे ही प्रोडक्ट का ब्रांड एंबैस्डर बनना स्वीकार करता हूं, जिन में यकीन रखता हूं। मैं मोटोरोला मोबाइल इस्तेमाल करता हूं। मेरे ख्याल में दर्शकों तक पहुंचने और उनसे जुड़ने का यह भी एक जरिया है।
ओम शांति ओम में आप थोड़ी देर के लिए दिखे और अपना ही मजाक उड़ाते हैं? और सांवरिया कैसी लगी?
वह स्क्रिप्ट का हिस्सा था। फराह और शाहरुख दोस्त हैं हमारे। वे बहुत करीबी हैं। आप उन्हें ना नहीं कह सकते। मैं दोस्ती के लिए बहुत कुछ करता हूं। मुझे वह फिल्म पसंद आई।
सांवरिया भी मुझे अच्छी लगी। वह बिल्कुल अलग फिल्म है। दोनों अलग फिल्में हैं।
इन दोनों फिल्मों के एक ही दिन रिलीज होने से असहज स्थितियां बनीं। अगर कभी आपके साथ ऐसा हुआ तो आप का क्या स्टैंड होगा?
मैं कोशिश करूंगा कि ऐसी स्थिति न बने। अगर किसी भी तरह से टाला नहीं जा सके तो मैं दर्शकों की राय का इंतजार करूंगा।
लगभग सभी स्टार अपने होम प्रोडक्शन को तरजीह दे रहे हैं और उनकी फिल्में सफल भी रहती हैं। क्या आप इस दिशा में नहीं सोच रहे हैं?
अगर ऐसी बात है तो मैं इस दिशा में सोचूंगा। वैसे, मैं इसे नहीं मानता। क्योंकि फिल्में चलती हैं, एक्टर या प्रोडक्शन हाउस कोई भी हो।
कभी किसी से प्रतियोगिता महसूस करते हैं?
आज सबसे अच्छी बात यह है कि कोई प्रतिद्वंद्विता या प्रतियोगिता नहीं है। स्वस्थ प्रतियोगिता है। हम एक-दूसरे को इसके लिए प्रेरित करते हैं। फिल्म इंडस्ट्री बहुत प्यारी जगह है और हमारे रिश्ते परिवार की तरह हैं।
क्या आप इसके प्रति सचेत रहते हैं कि फिल्म क्या संदेश दे रही है?
अगर कोई फिल्म गलत संदेश दे रही है तो आप उसका हिस्सा नहीं हो सकते। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप एक्टर के तौर पर जिम्मेदार नहीं हैं। आपको जानकारी होनी चाहिए। आप यह नहीं कह सकते कि कोई भी फिल्म कर लूंगा। वह चाहे जो भी संदेश दे। मैं ऐसी फिल्म का हिस्सा नहीं हो सकता जो समाज विरोधी संदेश दे रही हो। एक्टर के तौर पर तब मैं अपनी जिम्मेदारी से चूकूंगा।