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Saturday, May 31, 2008

रामू और बच्चन परिवार के लिए मायने रखती है सरकार राज

रामगोपाल वर्मा की सरकार राज के साथ खास बात यह है कि यह उनकी बड़ी फ्लॉप रामगोपाल वर्मा की आग के बाद आ रही है। सच तो यह है कि फिलहाल सफलता को सलाम करने वाली फिल्म इंडस्ट्री ने रामू का नाम लगभग खारिज कर दिया है। हालांकि कभी उनके दफ्तर के बाहर संघर्षशील कलाकार और निर्देशकों की कतार लगी रहती थी। माना यह जाता था कि यदि रामू की फैक्ट्री का स्टाम्प लग जाए, तो फिल्म इंडस्ट्री में पांव टिकाने के लिए जगह मिल ही जाती है, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि उसी इंडस्ट्री में एक फिल्म के फ्लॉप होने के बाद रामू के पांव के नीचे की कालीन खींच ली गई है।
अब देखना यह है कि रामू सरकार राज के जरिए फिर से लौट पाते हैं या नहीं? सरकार राज के साथ दूसरी खास बात यह है कि इसमें बच्चन परिवार के तीन सदस्य काम कर रहे हैं, जबकि सरकार में केवल अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन थे। इस बार बहू ऐश्वर्या राय बच्चन भी हैं। गौरतलब है कि अभिषेक और ऐश्वर्या की शादी के बाद दोनों की साथ वाली यह पहली फिल्म होगी। कहा यह भी जा रहा है कि बच्चन परिवार के सदस्यों ने इस फिल्म में जोरदार अभिनय किया है।
उल्लेखनीय है कि रामू की सरकार सफल इसलिए भी हुई थी, क्योंकि वह एक चुस्त फिल्म थी। लोगों को फिल्म बांधे रखती थी और फिल्म में अमिताभ बच्चन का अभिनय भी उत्कृष्ट था। पूरी फिल्म दर्शकों को जंच गई थी। इसी आधार पर कहा जा रहा है कि सरकार राज की सफलता सुनिश्चित है। वैसे, अभिषेक बच्चन भी जोर देकर यही कह रहे हैं कि इस फिल्म से रामगोपाल वर्मा अपने आलोचकों को खामोश कर देंगे। गौरतलब बात यह है कि फिल्म सरकार राज पिछली फिल्म सरकार से आगे बढ़ती है। सरकार सुभाष नागरे के कामकाज को उनके बेटे शंकर नागरे ने अच्छी तरह से संभाल लिया है। शेपर्ड पॉवर प्लांट की सीईओ अनीता राजन आकर नागरे परिवार के सामने पॉवर प्लांट का प्रस्ताव रखती है। पहले सरकार साफ मना कर देते हैं, लेकिन शंकर उन्हें पॉवर प्लांट के फायदे बताता है, तो वे राजी हो जाते हैं। शंकर का पॉवर प्लांट का सपना साकार होने की दिशा में धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, तो इसी दौरान कई तरह की अड़चनें आ जाती हैं। विरोधी ताकतें सक्रिय हो जाती हैं और सत्ता का संघर्ष भयानक रूप ले लेता है। विरोधियों की कोशिश है कि राजनीतिक परिदृश्य से नागरे परिवार का नाम ही मिट जाए। फिल्म में कहा भी गया है कि सत्ता दी नहीं जाती, उसे लेना पड़ता है।
पिछली फिल्म सरकार में गीत लिखे थे संदीपनाथ ने और संगीत था बापी-टुटुल का। सरकार राज में भी गीतकार और संगीतकार ये लोग ही हैं और सरकार राज के गीत चाह भंवर तृष्णा.. को भी सरकार के गीत गोविंदा गोविंदा.. की तरह पसंद किया जा रहा है। फिल्म सरकार राज की रिलीज विभिन्न कारणों से टलती रही। अब सब कुछ ठिकाने पर है। यह जल्द ही थिएटर में पहुंच रही है। कहा जा रहा है कि इस फिल्म के प्रचार में बच्चन परिवार के सदस्यों ने बढ़-चढ़कर सहयोग दिया है, क्योंकि उनके परिवार की प्रतिष्ठा से जुड़ गई है यह फिल्म। इसमें कोई दो राय नहीं कि फिल्म सरकार राज की सफलता उनके परिवार के लिए खास मायने रखती है।

Friday, May 30, 2008

राम गोपाल वर्मा और सरकार राज

यहाँ प्रस्तुत हैं सरकार राज की कुछ तस्वीरें.इन्हें चवन्नी ने राम गोपाल वर्मा के ब्लॉग से लिया है.जी हाँ,रामू भी ब्लॉग लिखने लगे हैं।
http://rgvarma.spaces.live.com/default.aspx


















वुडस्टाक विला: एक और धोखा

-अजय ब्रह्मात्मज
संजय गुप्ता ने खुद को एक ब्रांड के तौर पर स्थापित कर लिया है। उनकी फिल्मों की रिलीज के पहले खूब चर्चा रहती है। अलग-अलग तरीके से वह फिल्म से संबंधित कार्यक्रम करते रहते हैं और टीवी चैनलों के लिए जरूरी फुटेज की व्यवस्था कर देते हैं। दर्शकइस भ्रम में रहते हैं कि कोई महत्वपूर्ण फिल्म आ रही है। एक बार फिर ऐसा ही धोखा हुआ है। हंसल मेहता के निर्देशनमें बनी वुडस्टाक विला इसी धोखे के कारण निराश करती है।
विदेश में बसे भारतीय मूल के मां-बाप का बेटा सैम तफरीह के लिए भारत आया है। एक बातचीत में वह अपने दोस्त को बताता है कि भारत में हाट स्पाइसेज हैं, इसलिए वह यहां आया है। माफकरें, हाट स्पाइसेज का अर्थ आप गरम मसाला न लें। उसका इशारा लड़कियों की तरफ है। हर रात एक नई लड़की की तलाश उसका शौक है।
इसी शौक के चक्कर में वह जारा के संपर्क में आता है। जारा उससे एक डील करती है कि वह उसे किडनैप कर ले और उसके पति से पचास लाख रुपयों की मांग करे। वह जांचना चाहती है कि उसका पति उसे प्यार करता है या नहीं? भूल से भी आप अपने पति का प्यार जांचने के लिए ऐसा तरीका आजमाने की मत सोचिएगा। बहरहाल, इस प्रपंच में एक हत्या हो जाती है। सैम मुश्किल में फंसता है, लेकिन फिल्म का लेखक उसे आसानी से अंतत: निकाल ले जाता है। वह विदेश लौट जाता है। बीच की कहानी का रहस्य लिखना उचित नहीं है, क्योंकि अगर आप संजय और हंसल के प्रशंसक हैं तो कुछ तो रहस्य बचा रहे।
वुडस्टॉक विला सिकंदर खेर की पहली फिल्म है। चिराग तले अंधेरा का सिकंदर से उपयुक्त उदाहरण नहीं हो सकता। सिकंदर के पिता अनुपम खेर और मां किरण खेर हैं। दोनों अभिनय के क्षेत्र में कई पुरस्कार ले चुके हैं और अनुपम तो कई शहरों में अभिनय की पाठशाला चलाते हैं। लेकिन इसमें उनका क्या दोष? सिकंदर खेर के चेहरे पर न तो कोई भाव दिखता है और न उनकी आंखों में कोई चमक है। ठंडी आंखों और भावशून्य चेहरे के इस अभिनेता की कद-काठी अच्छी है। उनके लंबे सुंदर बाल हैं और रफ लुक देने के लिए फिल्म में दाढ़ी रखने की छूट दे दी गयी है। फिर भी सिकंदर खेर प्रभावित नहीं करते।
फिल्म निश्चित रूप से स्टाइलिश है, लेकिन चमकदार थाली में करीने से बेस्वाद व्यंजन की तरह है। आरंभ के दृश्य में अलग अंदाज में दिखी मुंबई बाद में विला और पब में सिमट कर रह जाती है। एक गाने में संजय दत्त की मौजूदगी यों ही निकल जाती है। वुडस्टाक विला हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में विदेशी फिल्मों के प्रभाव में बन रही अभारतीय फिल्मों का नमूना है। अफसोस की बात है कि असफलता के बावजूद यह चलन जोर पकड़ रहा है, क्योंकि ऐसी फिल्मों के सपोर्ट में बाजार खड़ा है।

Thursday, May 29, 2008

कहां से लाएं कहानी?

-अजय ब्रह्मात्मज
घोर अकाल है। दरअसल, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कहानी की ऐसी किल्लत पहले कभी नहीं हुई। अभी हर तरफ यही सुगबुगाहट है। सभी एक-दूसरे से कहानी मांग रहे हैं। हर व्यक्ति नए विचार, विषय और वस्तु की तलाश में है और शायद इसीलिए कुछ महीने पहले सुभाष घई के हवाले से खबर आई थी कि वे मौलिक कहानी के लिए एक करोड़ रुपए देने को तैयार हैं। उन्होंने एक बातचीत में यह भी कहा कि अगर कोई उनके इंस्टीट्यूट में स्क्रिप्ट राइटिंग का कोर्स करने आए और महंगी फीस न दे पा रहा हो, तो वे उसे मुफ्त में ट्रेनिंग देंगे। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में भी स्क्रिप्ट राइटिंग पर जोर दिया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले एनएफडीसी ने स्क्रिप्ट राइटिंग का वर्कशॉप किया था। हाल में दो संस्थानों ने स्क्रिप्ट राइटिंग को बढ़ावा देने और नए लेखन की उम्मीद में दो अभियान आरंभ किए हैं। तात्पर्य यह कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कहानियों की मांग है और एक अरब से ज्यादा व्यक्तियों के देश में कायदे की बीस-पचीस कहानियां भी नहीं मिल पा रही हैं, जिन पर फिल्म बनाई जा सके!
मिर्ची मूवीज ने स्क्रिप्ट-कहानी के लिए प्रतियोगिता आयोजित की है। आप हिंदी या अंग्रेजी में हजार से तीन हजार शब्दों की एक कहानी भेजें। अजीज मिर्जा और कमलेश पांडे उनमें से प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार के योग्य कहानियां चुनेंगे। बाद में उन कहानियों पर फिल्में बनाई जाएंगी। प्रोत्साहन के लिए पचास प्रतियोगियों को पांच-पांच हजार रुपए के इनाम दिए जाएंगे। इसी प्रकार महिन्द्रा के सौजन्य से स्पंदन ने आइडिया आमंत्रित किया है। आप उन्हें कहानी का आइडिया भेजें। वे चौबीस व्यक्तियों को आमंत्रित करेंगे। इनमें से बारह प्रविष्टियों को पचास हजार रुपये का वजीफा दिया जाएगा। एक वर्कशॉप में अनुराग कश्यप, श्रीराम राघवन और अंजुम रजबअली स्क्रिप्ट डेवलप करने का परामर्श देंगे। फिर इसमें से छह श्रेष्ठ प्रविष्टियों को चुना जाएगा, उन्हें 90,000 रुपये का वजीफा दिया जाएगा। परामर्शदाताओं की मदद से लेखक स्क्रिप्ट विकसित करेंगे। अंत में तीन प्रविष्टियों को चुना जाएगा और उन पर फिल्में बनाई जाएंगी। स्पंदन का यह प्रयास स्क्रिप्ट लैब की तरह है। विदेशों में इस तरह के लैब चलते हैं, जिनमें अनुभवी लेखक, निर्देशक और तकनीशियन की मदद से स्क्रिप्ट तैयार किए जाते हैं।
कैसी विडंबना है कि रामायण, महाभारत वेद-उपनिषद, कथा साहित्यागार और पंचतंत्र के देश में कहानियों का अकाल पड़ गया है। देश में लगभग दो दर्जन भाषाओं को मान्यता प्राप्त है। इन भाषाओं की अपनी संस्कृति, परंपरा और कहानियों का भंडार है। इन सभी भाषाओं में लेखकलगातार लिख रहे हैं। साहित्य का अपना बाजार है, लेकिन इन स्रोतों के बावजूद कहानियां नहीं मिल रही हैं। मुंबई में फिल्म राइटर्स एसोसिएशन है। इसके सदस्यों की संख्या आठ हजार से ऊपर है, लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि आठ कहानियां भी साल में नहीं मिल पा रही हैं! गौर करें, तो इस अकाल की सच्चाई कुछ और ही है।
कहानियों की यह मांग और छटपटाहट बेमानी है। ज्यादातर फिल्मकार मौलिक कहानियों से बचते हैं। अगर कोई हिम्मत करता है, तो स्टार आड़े आ जाते हैं। दरअसल, हर निर्देशक और स्टार कामयाब फिल्म की तलाश में रहता है। वह लेखकके सामने पिछले दिनों सफल और हिट हुई फिल्म की मिसाल रखता है और कहता है कि कुछ वैसी हो, लेकिन अलग कहानी चाहिए। अब यह चेंज, चेंज और सेम का समीकरण समझ में नहीं आता! नतीजा यह होता है कि चंद नई कहानियां ही फिल्मों में ढल पाती हैं!

बिग बी के ब्लॉग से 'अलाद्दीन' की तस्वीरें और चंद बातें

बिग बी यानि अमिताभ बच्चन अपने ब्लॉग पर रोचक जानकारियाँ भी दे रहे हैं.उन्होंने अपनी ताज़ा फ़िल्म 'अलाद्दीन' की तस्वीरें पोस्ट की हैं और उनके बारे में विस्तृत तरीके से बताया है.फ़िल्म में विशेष प्रभाव को समझाया है और यह आशंका भी व्यक्त की है कि भविष्य में ऐक्टर का काम मुश्किल और चुनौतियों से भरा होगा। पीली आभा की दोनों तस्वीरें एक गाने की हैं.और नीली आभा की तस्वीरें एक विशेष प्रभाव के दृश्य हैं।
दोनों आभा की तस्वीरों में जो हरे और नीले रंग की पृष्ठभूमि दिख रही है.वह फ़िल्म बदल जायेगी.वहाँ कुछ और छवियाँ आ जायेंगी.आप अनुमान भी नहीं लगा सकेंगे कि कैसे यह कमाल हुआ होगा.इन दिनों सभी ऐक्टर अभिनय के इस तकनीकी पक्ष से जूझ रहे हैं.आजकल हर फ़िल्म में कमोबेश विशेष प्रभाव तो रहता ही है.

इस तस्वीर में अमिताभ बच्चन एक बर्फीली पहाडी पर हैं. इस उम्र में भी उनका जोश देखते ही बनता है.आप दोनों तस्वीरों को गौर से देखें और फ़िल्म देखते समय याद रखें तो थोड़ा समझ पायेंगे.बिग बी अपने ब्लॉग पर कई बार ऐसी जानकारियां सहज शब्दों में लिख देते है.बिल्कुल आम दर्शक भी समझ सकते हैं।
http://blogs.bigadda.com/ab/

Wednesday, May 28, 2008

बॉक्स ऑफिस:३०.०५.२००८

धड़ाम से गिरी धूम धड़ाका
वक्त आ गया है कि हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक रिलीज के पहले अपनी कॉमेडी फिल्मों की परख कर लें। पिछले हफ्ते रिलीज हुई डॉन मुत्थुस्वामी और धूम धड़ाका से सीखने की जरूरत है। दोनों ही फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धड़ाम से गिरीं।
डॉन मुत्थुस्वामी में मिथुन चक्रवर्ती और धूम धड़ाका में अनुपम खेर थे। दोनों ने मेहनत भी की थी, पर जैसे अकेला चना भांड़ नहीं फोड़ सकता ़ ़ ़ वैसे ही अकेला एक्टर फिल्म नहीं चला सकता। फिल्म के चलने में कई ताकतों का मजबूत हाथ होता है। डॉन मुत्थुस्वामी और धूम धड़ाका नकल में खो रही अकल के नमूने हैं। फिल्मों की क्वालिटी के अनुपात में ही उन्हें दर्शक मिले। दोनों फिल्मों के कलेक्शन दस से पंद्रह प्रतिशत ही रहे। मुंबई में दर्शकों के अभाव की वजह से पहले ही दिन धूम धड़ाका के कुछ शो रद्द करने पड़े।
घटोत्कच ने भी निराश किया। उम्मीद थी कि छुट्टी के दिनों में बच्चों को केंद्रित कर बनायी गयी यह फिल्म ठीक चलेगी, लेकिन बच्चों ने घटोत्कच में रुचि नहीं दिखाई। पहले दिन जो कुछ बच्चे देखने गए, उन्होंने अपने दोस्तों से फिल्म देखने की सिफारिश नहीं की। एनीमेशन का नाम देकर बच्चों को झांसा नहीं दिया जा सकता। पुरानी फिल्मों में जन्नत और भूतनाथ औसत कारोबार कर रही है। इस हफ्ते अनुपम खेर और किरण खेर के बेटे सिकंदर खेर की पहली फिल्म वुडस्टॉक विला रिलीज हो रही है। इसके साथ ही राजपाल यादव की तिहरी भूमिका की फिल्म हंसते-हंसते भी आ रही है।

फट से फायर फिलम लगा दे

चवन्नी को राकेश रंजन की यह कविता बहुत सही लगी.चवन्नी के पाठक यह न समझें कि आजकल चवन्नी फिल्मों की दुनिया से बाहर टाक-झाँक कर रहे हैं.इस कविता में भी फ़िल्म का ज़िक्र है और वह भी विवादास्पद फ़िल्म फायर का...
आ बचवा,चल चिलम लगा दे।
रात भई,जी अकुलाता है
कैसा तो होता जाता है
ऊ ससुरा रमदसवा सरवा
अब तक रामचरित गाता है
रमदसवा जल्दी सो जाए
ऐसा कोई इलम लगा दे ।
आ बचवा,अन्दरवा आजा
हौले से जड़ दे दरवाजा
रामझरोखे पे लटका दे
तब तक यह बजरंगी धाजा
हाँ,अब,सब कुछ बहुत सही है
फट से फायर फिलम लगा दे.
अभी-अभी जन्मा है कवि संग्रह से

Tuesday, May 27, 2008

१२ घंटे पीछे क्यों है ब्लॉगवाणी?

ब्लॉगवाणी में सुधार और परिष्कार हुआ है.कई नई सुविधाएं आ गई हैं.देख कर अच्छा लग रहा है.लेकिन घड़ी क्यों गड़बड़ हो गई है ब्लॉगवाणी की?आज सवेरे १० बज कर ७ मिनट पर चवन्नी ने एगो चुम्मा पोस्ट किया था.जब ब्लॉगवाणी पर जाकर चवन्नी ने देखा तो वहाँ रात का १० बज कर ७ मिनट हो रहा था.तारीख भी कल की थी.ब्लॉगर लोग तो आजकल ब्लोगयुद्ध में लगे हैं,इसलिए शायद किसी धुरंधर ब्लॉगर का ध्यान इधर नहीं गया.चवन्नी की इस हिमाकत को ग़लत न लें आप सभी.जरूरी समझा चवन्नी ने,इसलिए ध्यान दिला रहा है।
अरे ये क्या हो रहा है...पसंद और टिप्पणी दोनों बरस रहे हैं...नहीं,नहीं ...बादल थे ,गरजे और गुजर गए...

एगो चुम्मा...पर हुआ विवाद

ख़बर पटना से मिली है.चवन्नी के एक दोस्त हैं पटना में.फिल्मों और फिल्मों से संबंधित गतिविधियों पर पैनी नज़र रखते हैं.टिप्पणी करते हैं। उन्होंने ने बताया की पटना में पिछले दिनों एक भोजपुरी फ़िल्म के प्रचार के लिए मनोज तिवारी और रवि किशन पहुंचे.फ़िल्म का नाम है - एगो चुम्मा देले जइह हो करेजऊ।
भोजपुरी के इस मशहूर गीत को सभी लोक गायकों ने गाया है.अब इसी नाम से एक फ़िल्म बन गई है.उस फ़िल्म में मनोज तिवारी और रवि किशन दोनों भोजपुरी स्टार हैं.साथ में भाग्यश्री भी हैं.इस फ़िल्म के प्रचार के लिए आयोजित कार्यक्रम में मनोज ने मंच से कहा की इस फ़िल्म का नाम बदल देना चाहिए.भोजपुरी संस्कृति के हिसाब से यह नाम उचित नहीं है,लेकिन रवि भइया को इसमें कोई परेशानी नहीं दिखती.मनोज हों या रवि दोनों एक- दूसरे पर कटाक्ष करने का कोई मौका नहीं चूकते.सुना है कि बात बहुत बढ़ गई.मनोज ने अगला वार किया कि रवि भइया की असल समस्या मेरी मूंछ है.कहते रवि किशन ने मंच पर ही कहा कि तुम्हारा मूंछ्वे कबाड़ देंगे।
मनोज तिवारी और रवि किशन की नोंक-झोंक से आगे का मामला है यह.भोजपुरी फिल्मों में भरी मात्रा में अश्लीलता रहती है.भोजपुरी दर्शकों को रिझाने के नाम भोजपुरी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक अश्लीलता परोसते रहे हैं.कहा जा रहा है कि भोजपुरी फिल्में इसी कारण स्तरहीन होती जा रही हैं.एक बड़ी सांस्कृतिक सम्भावना चंद रुपयों के लालच में मारी जा रही है.समय आ गाया है कि सभी चेत जाएं और भोजपुरी फिल्मों की भलाई के लिए सामूहिक तौर पर फूहड़ता और अश्लीलता से परहेज करें।
मनोज को पहल करनी चाहिए और रवि किशन को उनका समर्थन करना चाहिए.यहाँ बस एक ही सवाल है कि सदियों से प्रचलित एगो चुम्मा ...गीत आज अचानक कैसे इतना अश्लील हो गाया कि उस नाम से फ़िल्म नहीं बन सकती.कहीं मनोज बाबु का कोई सगूफा तो नहीं था यह...हो सकता है फ़िल्म को गर्म करने के लिए उन्होंने यह बात कही हो.

Monday, May 26, 2008

सलमान खान का शुक्राना


सलमान खान ने भी ब्लॉग लिखना शुरू कर दिया है.उन्होंने यह ब्लॉग हम सभी की तरह ब्लागस्पाट पर ही आरंभ किया है.इसका नम दस का दम रखा गया है.इसी नाम से सलमान खान सोनी टीवी पर एक शो लेकर आ रहे है.यह उसी से संबंधित है.लोगों को लग सकता है कि दस का दम के प्रचार के लिए इसे शुरू किया गया है.अगर ऐसा है भी तो क्या दिक्कत है?सलमान खान ने अभी तक पाँच पोस्ट डाली है।

आप अवश्य पढ़ें.आप समझ पाएंगे कि सलमान किस मिजाज के व्यक्ति हैं.उनमें एक प्रकार का आलस्यपना है.वह उनके लेखन में झलकता है.खान त्रयी के बाकी दोनों खान आमिर और शाहरुख़ कि तरह उन्हें बतियाने नहीं आता.बहुत कम बोलते हैं और जिंदगी की साधारण चीजों में खुश रहते हैं.सलमान खान ने यहाँ अपने दर्शकों से सीधे बात की है.चवन्नी को तो उनकी बातों रोचक जानकारी मिली है.सलमान खान का कहना है कि अक्ल हर काम को ज़ुल्म बना देती है.यही कारन है कि सलमान खान अक्लमंदी की बातें करने से हिचकते हैं।

सलमान खान का अपना दर्शक समूह है.उनकी फ़िल्म को पहले दिन अवश्य दर्शक मिलते हैं.गौर करें तो उन्होंने बहुत उल्लेखनीय फ़िल्म नहीं की है,फिर भी लोकप्रियता के मामले में वे आगे रहे हैं.सलमान के दर्शकों का समूह अलग है.आप चाहें तो उसे चवन्नी छाप भी कह सकते है।

सलमान से एक बार चवन्नी ने पूछा था कि कभी वे दूसरे सितारों की तरह ऐतिहासिक या पीरियड फ़िल्म क्यों नहीं करते?तो सलमान खान ने छूटते ही कहा ...पागल हुआ हूँ क्या?मुझे एक्टिंग नहीं आती.मैं जैसा हूँ,वही परदे पर दिखाना है तो ठीक है.सलमान खान में गजब का आकर्षण है.परदे पर आते ही मानो किरणें निकलती है,जो आम दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर लेती हैं।
सलमान खान दस का दम को शुक्राना कह रहे हैं.उनका मानना है कि दर्शकों ने पिछले १९ सालों में उन्हें जो प्रेम और स्नेह दिया है,वे उसी का शुक्रिया अदा कर रहे हैं।

Saturday, May 24, 2008

कंफ्यूजन की बिसात पर कामेडी का तड़का

-अजय ब्रह्मात्मज

प्रियदर्शन की फिल्मों से एक खास ट्रेंड चला है। जिसके मुताबिक कहानी में कंफ्यूजन पैदा करो तो कामेडी अपने आप निकल आएगी। हिंदी फिल्मों में इन दिनों कामेडी के नाम पर ऐसी ही फिल्में बन रहीं हैं। अगर आप अपनी समझ और संवेदना का स्तर नीचे ले आएं तो डान मुत्थुस्वामी जैसी फिल्म का आनंद उठा सकते हैं।
जिन शक्ति सामंत ने आराधना और अमर प्रेम जैसी फिल्में दी हों उनके ही सामंत मूवीज के बैनर तले डान मुत्थुस्वामी का निर्माण हुआ है। 14-15 साल पहले मिथुन चक्रवर्ती ने सीमित बजट की सी ग्रेड फटाफट फिल्मों का फैशन आरंभ किया था। लगता है उसी दौर की एक फिल्म छिटक कर 2008 में आ गई है। पिता की आत्मा की शांति के लिए डान मुत्थुस्वामी (मिथुन चक्रवर्ती) अच्छा आदमी बनना चाहता है। पिता की अंतिम इच्छा के मुताबिक जिंदगी और मौत के बीच लटके व्यक्ति की मदद के लिए वह कुछ भी कर सकता है। नेक इंसान बनने की उसकी घोषणा केसाथ शुरू हुआ कंफ्यूजन इतना बढ़ता है कि कुछ समय के बाद आप सोचना बंद कर देते हैं।
निर्देशक असीम सामंत ने मिथुन की प्रतिभा के साथ खिलवाड़ किया है। लेकिन, फिल्म से यह भी पता लगता है कि बेहतरीन अभिनेता कैसे किसी घटिया कहानी में भी जान डाल सकता है। डॉन मुत्थुस्वामी सिर्फ मिथुन की अदाकारी के लिए देखी जा सकती है।

घटोत्कच: एनीमेशन के नाम पर फूहड़ प्रस्तुति

-अजय ब्रह्मात्मज
एस श्रीनिवास के निर्देशन में बनी घटोत्कच एनीमेशन फिल्मों के नाम पर चल रहे कारोबार की वास्तविकता सामने ला देती है। महाभारत के पात्र घटोत्कच के जीवन पर बनी इस एनीमेशन फिल्म को सुंदर और प्रभावशाली बनाने की संभावनाएं थीं, लेकिन निर्देशक ने एक मिथकीय किरदार को कैरीकेचर और कार्टून बना कर रख दिया है।
एनीमेशन की बारीकियों में न जाकर सिर्फ कहानी की ही बात करें तो घटोत्कच के जीवन में हास्यास्पद प्रसंग दिखाने के लिए निर्देशक की कपोल कल्पना उसे आज तक खींचती है। समझ में नहीं आता कि निर्देशक की क्या मंशा है? आखिर किन दर्शकों के लिए यह फिल्म बनाई गई है। घटोत्कच की विकृत प्रस्तुति महाभारत के एक उल्लेखनीय वीर का मखौल उड़ाती है और उसे हिंदी फिल्मों के साधारण कामेडियन में बदल देती है।
भीम और हिडिम्बा के बेटे घटोत्कच की महाभारत में खास भूमिका रही है। उन्होंने अपने शौर्य, पराक्रम और चमत्कार से श्रीकृष्ण का आर्शीवाद भी पाया था। अगर यह फिल्म बाल घटोत्कच के कारनामों तक सीमित रहती तो भी मनोरंजक और शिक्षाप्रद होती।
घटोत्कच एनीमेशन के नाम पर फूहड़ प्रस्तुति है। दिक्कत यह है कि ऐसी फिल्म की मार्केटिंग बच्चों के बीच की जा रही है, जो आधुनिक शिक्षा के नाम पर पहले ही अपने इतिहास और मिथक से कट रहे हैं।

Thursday, May 22, 2008

बच्चों की फिल्म में हैं अपार संभावनाएं

-अजय ब्रह्मात्मज
आप लोगों ने भी गौर किया होगा। अगर कोई बच्चा किसी अक्षर के उच्चारण में तुतलाता है और आप उसी शब्द का तोतला उच्चारण करें, तो वह नाराज हो जाता है। इसकी सीधी वजह यह है कि वह अपनी जानकारी में सही उच्चारण कर रहा होता है और हम सभी से अपेक्षा रखता है कि हम भी सही उच्चारण करें। बच्चों की फिल्मों के बारे में यही बात कही जा सकती है। हमने अपनी तरफसे तय कर लिया है कि बच्चों की फिल्में कैसी होनी चाहिए और बच्चों को क्या पसंद आता है? बाल संवेदना के नाम पर ऐसी फिल्में बनती रही हैं, जिन्हें बच्चे बड़ों के तोतले उच्चारण की तरह नापसंद करते रहे हैं।
लगभग दो दशकों तक चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी के सौजन्य से ऐसी दर्जनों फिल्में बनीं, जिन्हें न तो बच्चों ने पसंद किया और न ही बड़ों ने! गौरतलब यह है कि ऐसी अधिकांश फिल्में 26 जनवरी, 15 अगस्त और चाचा नेहरू के जन्मदिन बाल दिवस पर बच्चों को जबरन दिखाई जाती हैं। चूंकि स्कूल और बाल सोसाइटी का सर्कुलर जारी हो गया रहता है, इसलिए युनिफॉर्म पहने बच्चे मन मारकर ऐसी फिल्में देखते हैं। सामान्य तौर पर भारतीय फिल्मों और खास कर हिंदी फिल्मों के फिल्मकारों ने बच्चों की फिल्मों पर अधिक ध्यान नहीं दिया। चूंकि ऐसी फिल्मों की लागत और कमाई सीमित रहती है, इसलिए मुनाफाखोर निर्माताओं ने कभी लेखक-निर्देशकों को बाल फिल्मों के लिए प्रश्रय ही नहीं दिया।
ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में भी हम इस मामले में जागरूक नहीं हो पा रहे हैं। बच्चों के मनोरंजन के नाम पर कार्टून और चिल्ड्रेन शो के नामों पर करोड़ों की कमाई कर रहे चैनलों के कार्यक्रमों पर ध्यान दें, तो अधिकांश कार्यक्रम और शो विदेशी हैं। जाहिर-सी बात है कि विदेशी निर्देशक ने अपनी सोच और संस्कृति से ही उन्हें बनाया होगा! ये कार्यक्रम भारतीय बच्चों की सोच की दिशा बदल रहे हैं। अपने देश के बच्चों को अपने ही देश की कहानियां देखने-सुनने को नहीं मिल रही हैं। हम अनजाने ही अपने बच्चों को विदेशी कथाभूमि और भावभूमि के रसास्वादन के लिए धकेल दे रहे हैं। धीरे-धीरे उनकी रुचि और सोच ऐसी बन जाएगी कि वे भारतीय कहानियों से ही परहेज करने लगेंगे। शहरों में पले-बढ़े बच्चों से बात करके देख लें। उन्हें भारतीय मिथ को और इतिहास के चरित्रों के बारे में उतना ही मालूम रहता है, जितना कोर्स में पढ़ाया जाता है।
यह स्थिति बहुत भयावह है। भारतीय मनोरंजन की दुनिया में बाल संवेदना और मनोरंजन पर बाजार का ध्यान गया है। छिटपुट कोशिशें आरंभ भी हो चुकी हैं। फीचर फिल्म, एनिमेशन फिल्म और टीवी शो में बच्चों की रुचि का ध्यान रखते हुए विषय तय किए जा रहे हैं। ट्रेड विशेषज्ञों ने भी घोषणा की है कि बच्चों के मनोरंजन का बाजार तेजी से बढ़ेगा। इधर फीचर फिल्मों में बच्चों की मौजूदगी बढ़ी है। उन्हें केंद्रीय भूमिकाएं मिली हैं। पिछले साल नन्हे जैसलमेर, अपना आसमान और तारे जमीं पर में बाल कलाकार मुख्य भूमिकाओं में दिखे। इन फिल्मों ने दर्शकों को प्रभावित भी किया। इस साल आई भूतनाथ में बंकू और भूतनाथ के रिश्ते ने भारतीय परिवारों के बिखर रहे मूल्यों के प्रति सचेत किया। यह फिल्म एक साथ बच्चों और बुजुर्गो के मुद्दों को छूती है और उनके मनोभाव की समझ बढ़ाती है। हिंदी फिल्मों में बच्चों की मौजूदगी या यूं कहें कि बच्चों की फिल्मों के प्रति हमारी धारणा मकड़ी से बदली। कैसी विडंबना है कि इस फिल्म को चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी ने रिजेक्ट कर दिया था। विशाल भारद्वाज ने उसके बाद ब्लू अंब्रेला बनाई। उनका कहना है कि वे बच्चों की केंद्रीय भूमिका वाली फिल्में बनाते रहेंगे। इस तरफ दूसरे मेकरों को भी ध्यान देना चाहिए। अपार संभावनाएं हैं, लेकिन उचित प्रयास के बाद ही उन संभावनाओं को मूर्त किया जा सकता है।

Wednesday, May 21, 2008

बॉक्स ऑफिस :२०.०५.२००८

औसत कारोबार कर लेगी जन्नत
जन्नत हिट हो गयी है। फिल्म से संबंधित एक प्रमुख व्यक्ति का यही एसएमएस आया तो लगा कि हर फिल्म की रिलीज के बाद उस यूनिट के लोगों द्वारा किए जाने वाले झूठे प्रचार का ही यह हिस्सा होगा। लेकिन सप्ताहांत के तीन दिनों में जन्नत ने उम्मीद से ज्यादा बिजनेस किया और सचमुच हिट होने की दिशा में अग्रसर दिखी।
कुणाल देशमुख निर्देशित जन्नत से ज्यादा उम्मीद नहीं की गयी थी। इमरान हाशमी का मार्केट पिछली कुछ फिल्मों से ढीला ही चल रहा था। नायिका सोनल चौहान एकदम नयी थीं। फिर भी जन्नत को दर्शकों ने पसंद किया।
फिल्म का आरंभिक कलेक्शन 90 फीसदी तक पहुंचा। सोमवार से फिल्म के कलेक्शन में थोड़ी गिरावट आई है। इस हफ्ते की फिल्मों को दर्शक मिले तो जन्नत का कलेक्शन और घटेगा। फिर भी माना जा रहा है कि जन्नत औसत कारोबार कर लेगी और और कम बजट के कारण निर्माताओं के लिए फायदेमंद साबित होगी। भूतनाथ को शहरों में दर्शकों ने पसंद किया। खास कर बच्चे इसे देख रहे हैं और उन्हें दिखाने के चक्कर में परिवार के बड़ों को भी इसे देखना पड़ रहा है। भूतनाथ के साथ रिलीज हुई जिम्मी सिनेमाघरों से उतर रही है। यशराज फिल्म्स की टशन बाक्स ऑफिस पर बुरी तरह गिरी है। फिल्म के निर्माता-निर्देशक नहीं समझ पा रहे हैं कि उनसे कहां गलती हुई।

Tuesday, May 20, 2008

खप जाती है एक पीढ़ी तब मिलती है कामयाबी

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री समेत हर इंडस्ट्री और क्षेत्र में ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे। हजारों- लाखों उदाहरण हैं। एक पीढ़ी के खपने और होम होने के बाद ही अगली पीढ़ी कामयाब हो पाई। आजकल मनोवैज्ञानिक और अन्य सभी कहते हैं कि बच्चों पर अपनी इच्छाओं और सपनों का बोझ नहीं लादना चाहिए। लेकिन हम अपने आसपास ऐसे अनेक व्यक्तियों को देख सकते हैं, जिन्होंने अपने माता या पिता के सपनों को साकार किया।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे कई उदाहरण हैं। हाल ही में 'हाल-ए-दिल' के म्यूजिक रिलीज के समय फिल्म के निर्माता कुमार मंगत मंच पर आए। उन्होंने कहा कि मैं कुछ भी बोलने से घबराता हूं। लेकिन आज मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। आज मैं अवश्य बोलूंगा। उन्होंने समय और तारीख का उल्लेख करते हुए बताया कि 1973 में मैं आंखों से सपने लिए मुंबई आया था। इतने सालों के बाद मेरा वह सपना पूरा हो रहा है। मेरी बेटी अमिता पाठक फिल्मों में हीरोइन बन कर आ रही है। अमिता पाठक के पिता कुमार मंगत हैं। लंबे समय तक वे अजय देवगन के मैनेजर रहे। इन दिनों वे बिग स्क्रीन एंटरटेनमेंट के मालिक हैं और कई फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं।

आप लोगों को शायद मालूम हो कि अनिल कपूर और बोनी कपूर के पिता सुरेन्द्र कपूर कभी गीता बाली के सचिव थे। बोनी कपूर की फिल्म के आरंभ में सबसे पहले गीता बाली की ही तस्वीर आती है। सुरेन्द्र कपूर सचिव से प्रोड्क्शन में आए और फिर प्रोड्यूसर बन गए। आज उनके बेटे कामयाब हैं। उनकी पोती सोनम कपूर ने कपूर परिवार के वारिस रणवीर कपूर के साथ काम किया।

नरगिस, मीना कुमारी, मधुबाला की मां ने जिंदगी खपा दी अपनी बेटियों का भविष्य संवारने और अपने सपनों को निखारने में। निश्चित ही इस संदर्भ में और भी कई नाम गिनाए जा सकते हैं। संभव है कि कुछ के बारे में आप जानते हों। प्लीज बताएं ... हम उन लोगों को सादर याद करें, जिन्होंने अपनी मेहनत का नतीजा अगली पीढ़ी को दिया। खेत उन्होंने जोते, बीज उन्होंने डाले, फसल उन्होंने बोयी ... और फसल काटी अगली पीढ़ी ने ...

Monday, May 19, 2008

माँ से नहीं मिले खली पहलवान

खली पहलवान भारत आए हुए हैं.आप पूछेंगे चवन्नी को पहलवानी से क्या मतलब? बिल्कुल सही है आप का चौंकना. कहाँ चवन्नी चैप और कहाँ पहलवानी?
चवन्नी को कोई मतलब ही नहीं रहता.मगर खली चवन्नी की दुनिया में आ गए.यहाँ आकर वे राजपाल यादव के साथ फोटो खिंचवाते रहे और फिर रविवार को धीरे से मन्नत में जा घुसे.मन्नत ??? अरे वही शाहरुख़ खान का बंगला.बताया गया की आर्यन और सुहाना खली पहलवान के जबरदस्त प्रशंसक हैं.प्रशंसक तो आप के भी बच्चे हो सकते हैं,लेकिन खली वहाँ कैसे जा सकते हैं।बेचारे खली पहलवान के पास तो इतना समय भी नहीं है कि वे माँ के पास जा सकें.चवन्नी को पता चला है कि खली की माँ ने घर का दरवाजा ८ फीट का करवा दिया है.उसे ४ फीट चौडा भी रखा है,ताकि लंबे-चौड़े हो गए बेटे को घर में घुसने में तकलीफ न हो.वहाँ नए दरवाजे के पास बैठी माँ खली का इंतज़ार कर रही है और यहाँ खली पहलवान शाहरुख़ खान के बेटे-बेटी का मनोरंजन कर रहे हैं।
ऐसा कैसे हो रहा कि ढाई साल के बाद अपने देश लौटा बेटा माँ के लिए समय नहीं निकल पा रहा है.ऐसा भी तो नहीं है कि उसके पास गाड़ी-घोडा नहीं है.उसे तो बस सोचना है और सारा इन्तेजाम हो जायेगा.लगता है खली पहलवान कद-काठी से जितना बड़ा हुआ है,भावनाओं में उतना ही छोटा हो गया है.क्या आप को नहीं लगता कि उसे सबसे पहले अपनी माँ तंदी देवी का दर्शन करना चाहिए था और पिता ज्वाला राम का आशीर्वाद लेना चाहिए था।
हर भारतीय के मन में किसी न किसी रूप में फिल्मों से जुड़ने की दबी इच्छा रहती है.चवन्नी को लगता है कि खली पहलवान भी इसी इच्छा के वशीभूत होकर मुम्बई के चक्कर लगा रहा है.ख़बर मिली है कि उसे एक-दो फिल्में भी मिल गई हैं.

Saturday, May 17, 2008

छोटी फिल्मों का सीमित संसार

-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी की छोटी फिल्में अवधि, आकार या विषय की दृष्टि से छोटी नहीं होतीं, बल्कि बजट और कलाकारों से फिल्में छोटी या बड़ी हो जाती हैं। फिर उसी के अनुरूप उनका प्रचार भी किया जाता है। भले ही विडंबना हो, लेकिन यही सच है कि हिंदी फिल्में आज भी स्टार के कारण बड़ी हो जाती हैं। अगर स्टार रहेंगे, तो बजट बढ़ेगा और यदि बजट बढ़ा, तो फिल्म अपने आप महंगी हो जाती है। महंगी फिल्मों में निवेशित धन उगाहने के लिए मार्केटिंग और पब्लिसिटी पर भी ज्यादा खर्च किया जाता है। यह अलग बात है कि कई बार नतीजा ठन-ठन गोपाल हो जाता है, जैसा कि टशन के साथ हुआ।
बहरहाल, हम छोटी फिल्मों की बातें कर रहे हैं। सुभाष घई की कंपनी मुक्ता आ‌र्ट्स ने सर्चलाइट नाम से एक अलग कंपनी बनाई है। यह कंपनी छोटी फिल्मों का निर्माण करती है। नागेश कुक्नूर की फिल्म इकबाल से इसकी शुरुआत हुई। यूटीवी ने भी स्पॉट ब्वॉय नाम से एक अलग कंपनी खोलकर छोटी फिल्मों का निर्माण आरंभ किया है। उनकी पहली फिल्म आमिर जल्दी ही रिलीज होगी। स्पॉट ब्वॉय ही अनुराग कश्यप की फिल्म देवड़ी का भी निर्माण कर रही है। यशराज फिल्म्स ने कोई अलग से कंपनी नहीं बनाई है, लेकिन पिछले साल आई काबुल एक्सप्रेस एक ऐसी ही छोटी फिल्म थी। अन्य प्रोडक्शन हाउस भी ऐसी छोटी फिल्मों की योजनाओं में लगे हैं। स्वतंत्र निर्माता और युवा निर्देशकों की पहली फिल्में आमतौर पर इसी श्रेणी की छोटी फिल्में होती हैं।
हिंदी फिल्मों में कभी पैरेलल सिनेमा का चलन था। सिनेमा की इस परंपरा से हमें श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, केतन मेहता, सईद मिर्जा, प्रकाश झा और कुंदन शाह जैसे निर्देशक मिले। सीमित बजट में बड़े कथ्य की उनकी फिल्मों ने दर्शकों को सिनेमा की इस क्षमता का परिचय दिया था कि हमारे आसपास की वास्तविक जिंदगी भी फिल्मों की कहानी बन सकती है। पैरेलल सिनेमा के विकसित और प्रचलित होने के निश्चित कारण थे और उन कारणों के खत्म होने के साथ ही पैरेलल सिनेमा का चलन भी समाप्त हो गया।
इधर महानगरों में मल्टीप्लेक्स कल्चर के आगमन के बाद यह महसूस किया गया कि शहरी दर्शक कुछ अलग किस्म का सिनेमा चाहते हैं। दरअसल, विश्व सिनेमा से परिचित ये दर्शक बॉलीवुड की कथित मसाला फिल्मों से ऊब गए हैं और इसीलिए वे कथ्य, अभिनय और शिल्प में बदलाव चाहते हैं। वे सहज सिनेमा चाहते हैं। इन दर्शकों ने ही बीइंग साइरस, भेजा फ्राय और खोसला का घोंसला जैसी फिल्मों को स्वीकार किया। फिल्म ट्रेड के लोग आज भी नहीं समझ पा रहे हैं कि भेजा फ्राय क्यों और कैसे हिट हो गई? इस फिल्म के बिजनेस ने स्वतंत्र निर्माताओं को प्रेरित किया। हालांकि भेजा फ्राय वाली कामयाबी किसी और फिल्म को नहीं मिली, लेकिन यह सच है कि प्रयोग की संभावना बढ़ी। अभी छोटी फिल्मों के स्टार और डायरेक्टर भी पॉपुलर हो रहे हैं। रणवीर शौरी और विनय पाठक की जोड़ी किसी भी छोटी फिल्म की सफलता की गारंटी समझी जा रही है। रजत कपूर ऐसी फिल्मों के सुपरिचित नाम हैं। वे ऐक्टिंग के साथ-साथ डायरेक्शन में भी व्यस्त हैं। उन्होंने रघु रोमियो से छोटी शुरुआत की और फिल्म निर्माण का नया विकल्प लेकर सामने आए। उनके आजमाए ढांचे को दूसरे निर्माता-निर्देशक भी आजमा रहे हैं। छोटी फिल्मों के जरिए रजत कपूर आज प्रतिष्ठित नाम बन गए हैं।
उम्मीद की जा रही है कि छोटी फिल्मों का संसार और विस्तृत होगा। सीमित बजट होने के कारण ऐसी फिल्मों का नुकसान बड़ा नहीं होता और फिर इन दिनों किसी भी फिल्म में निवेशित धन को उगाहने के इतने माध्यम सामने आ गए हैं कि शायद ही किसी को घाटा होता हो! यह अलग बात है कि छोटी फिल्मों के इस संसार के ज्यादातर दर्शक शहरी हैं।
इसलिए उनकी रुचि को ही प्राथमिकता दी जाती है। महानगरों के मल्टीप्लेक्स और शहरी होम वीडियो सर्किट में ही इस किस्म की छोटी फिल्में चल पा रही हैं। अधिकांश भारत और उसके दर्शक इन छोटी फिल्मों के दायरे से बाहर हैं।

Friday, May 16, 2008

बस नाम से ही 'जन्नत'

-अजय ब्रह्मात्मज
भट्ट कैंप की खूबी है कि वे फटाफट फिल्में बनाते हैं। सीमित बजट, छोटी बात, नए व मझोले कलाकार और चौंकाने वाले कुछ संवाद..। जन्नत भी इसी प्रकार की फिल्म है। इसे युवा निर्देशक कुणाल देशमुख ने निर्देशित किया है।
अर्जुन दीक्षित आदर्शवादी पिता का बेटा है। पिता से अलग मिजाज के अर्जुन द्वारा चुना हुआ माहौल अलग है। वह तीन पत्ती के खेल से जल्दी पैसे कमाने के चक्र में घुसता है और क्रिकेट मैच की फिक्सिंग तक पहुंचता है। धारावी की झोपड़पट्टी से निकला अर्जुन एक दिन दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन के शानदार बंगले में रहने लगता है।
कहते हैं पाकिस्तानी कोच वूल्मर की हत्या की घटना से प्रेरित है यह फिल्म। अमीर बनने की लालसा रखने वाले अर्जुन की कहानी उस घटना के इर्द-गिर्द बुनी गई है। फिल्म में एक प्रेम कहानी भी है, जिसका तनाव किरदारों को जोड़े रखता है। भट्ट कैंप की फिल्मों में नायक-नायिका हमेशा खिंचे-खिंचे से रहते हैं। तनावपूर्ण प्रेम संबंध उनकी फिल्मों की विशेषता बन गयी है। जन्नत में अर्जुन और जोया के बीच भी ऐसा ही संबंध है। जन्नत की कहानी दो स्तरों पर चलती है। प्रेम कहानी के आगे-पीछे अर्जुन के अमीर बनने की कहानी का दुष्चक्र है।
जन्नत जल्दबाजी में बनायी गयी फिल्म है। प्रेम कहानी और मैच फिक्सिंग से अमीर बनने की कहानी जुड़ नहीं पाई है। ऐसा लगता है कि बीच-बीच में प्रेम प्रसंग की गांठ लगायी जा रही है। अर्जुन के चरित्र के शेड्स को व्यक्त करने में इमरान हाशमी असफल रहे। वे द्वंद्व और भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते। गहरी अनुभूतियों के समय भी उनका चेहरा सपाट बना रहता है। नयी अभिनेत्री सोनल चौहान की मौजूदगी आकर्षक है। पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका में नए अभिनेता समीर कोचर ने उल्लेखनीय कार्य किया है। छोटी सी भूमिका में अभिमन्यु सिंह दिखे हैं।
जन्नत की खूबी संवाद और माहौल में है। फिल्म का परिवेश हमें अपने आसपास का लगता है। लगता है कि ऐसे किरदार हो सकते हैं, जो ऐसी स्थितियों में इसी तरह से बोलते हैं। दिक्कत यह है कि जन्नत की वास्तविकता सतही है। लेखक और निर्देशक ने गहरे उतरने या सच को खुरचने की कोशिश नहीं है। इसी कारण फिल्म अंतिम प्रभाव में निष्फल रहती है।

बॉक्स ऑफिस: १५.०५.२००८

भूतनाथ और जिम्मी में स्वाभाविक रूप से भूतनाथ को ज्यादा दर्शक मिले। हीरो-हीरोइन की रोमांटिक थ्रिलर या कामेडी जैसी फिल्म नहीं होने के बावजूद दर्शक उत्साह से भूतनाथ देखने आए। शायद अमिताभ बच्चन का आकर्षण रहा हो। इस फिल्म का कलेक्शन पहले दिन 60 प्रतिशत रहा। सप्ताहांत में कलेक्शन बढ़ा, लेकिन सोमवार से गिरावट दिखी।
हिंदी फिल्मों का निश्चित खांचों में होना जरूरी होता है। भूतनाथ चिल्ड्रेन फिल्म या फैमिली फिल्म की दुविधा का शिकार हुई। फिर भी निर्माता रवि चोपड़ा और निर्देशक विवेक शर्मा का प्रयास उल्लेखनीय कहा जाएगा।
जिम्मी की बॉक्स ऑफिस संभावना कम थी। मिथुन चक्रवर्ती के बेटे मिमोह चक्रवर्ती के प्रति किसी स्टार सन का आकर्षण नहीं था। फिल्म का प्रचार उस ढंग से किया ही नहीं गया था। इसके अलावा फिल्म भी कमजोर थी। मिमोह अच्छे डांसर हैं, लेकिन वह फिल्म को बचा नहीं सके। इस फिल्म का आरंभिक कलेक्शन 20-25 प्रतिशत ही रहा। समीक्षकों ने मिमोह के लुक और ड्रेस सेंस की काफी आलोचना की।
पहले की फिल्मों में अनामिका और मिस्टर ह्वाइट मिस्टर ब्लैक सिनेमाघरों से उतारी जा रही हैं। यशराज फिल्म्स ने मल्टीप्लेक्स मालिकों से समझौता किया, लेकिन तब तक फिल्म की निगेटिव हवा बन चुकी थी। इसलिए दर्शकों ने मल्टीप्लेक्स को भरने में रुचि नहीं दिखाई।
इस हफ्ते महेश भट्ट कैंप की जन्नत रिलीज हो रही है। आईपीएल की सरगर्मी के बीच क्रिकेट मैदान के पिच के बाहर खेले जाने वाले खेल पर बनी है यह फिल्म।

Thursday, May 15, 2008

ब्लॉग पर चल रही भौं-भौं

चवन्नी तो सोच रहा था की यह हिन्दी ब्लॉगर आपस में भौं-भौं करते रहते है.टिप्पणियों के माध्यम से एक-दूसरे को काटते और चाटते रहते हैं.चवन्नी को कोफ्त होती रही है ऐसी भौं-भौं से.उसे लगता था की हिंदीवाले बीमारू प्रदेश के हैं.हमेशा खौफ में जीते हैं और किसी की तरक्की उन्हें रास नहीं आती.पिछले दिनों हिन्दी ब्लॉग की दुनिया में जो शब्दों के बाण चले उनसे आप सभी वाकिफ हैं।
इधर आप ने गौर किया होगा की कुछ फिल्मी हस्तियाँ ब्लॉग लिख रही है.अमिताभ बच्चन तो इतने नियमित हैं कि आलोक पुराणिक के प्रतियोगी हो गए हैं.आप रोजाना कुच्छ न कुछ उनके ब्लॉग पर पा सकते हैं.उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा से लेकर शाहरुख़ खान तक से भौं-भौं की.चलते-चलते कुछ पत्रकारों पर भी छींटाकशी करने से वे बाज नहीं आते.अगर १०-१२ साल पहले भी आप ने कुछ उनके ख़िलाफ़ लिख दिया हो या बोल दिया हो तो हो सकता है कि वे अपने ब्लॉग में पलटवार करें.ब्लॉग का maadhyam उन्हें मिल गया है और इसे वे हथियार की तरह इअतेमाल कर रहे हैं।
दूसरे हैं आमिर खान.उनहोंने लगान का डीवीडी रिलीज करने के बाद अपने प्रशंसकों से बात करने के लिए यह ब्लॉग आरंभ किया था.कुछ अच्छी जानकारियां भी दी थीं.बाद में इसे उन्होंने अपने वेबसाइट में बदल दिया और अब ब्लॉग लिखने के साथ कभी-कभी चैट भी करते हैं.अभी दो दिन पहले उन्होंने लिखा कि वे पंचगनी में हैं.अपनी माँ और बच्चों के बोर्ड गेम खेल रहे हैं .शाहरुख़ उनका पाँव चैट रहा है और वे उसे बिस्किट खिला रहे हैं.इसके बाद वे बताते हैं कि आप कोई निष्कर्ष न निकालें शाहरुख़ मेरे कुत्ते का नाम है.वे आगे लिखते हैं कि वास्तव में उनके पंचगनी के बंगले की देखभाल करनेवाले व्यक्ति के कुत्ते का नाम शाहरुख़ है.उनकी इस पोस्ट के बाद उन्हें सैकड़ों घृणा पत्र मिले हैं.ये सारे पत्र ब्लॉग पर हैं.लेकिन आमिर को इस मस्ती की क्यों सूझी? इसके पीछे क्या आशय या उद्देश्य हो सकता है?
चवन्नी तो ब्लॉग की इस भौं-भौं से सहमा हुआ है.उसे डर लगता है इन स्टारों के ब्लॉग की गली में जाने से.न जाने कौन कब झौंआ पड़े?

Tuesday, May 13, 2008

पहली सीढ़ी:आशुतोष गोवारिकर से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

पहली सीढ़ी सीरिज में इस बार प्रस्तुत है आशुतोष गोवारिकर से हुई बातचीत.यह बातचीत जोधा अकबर की रिलीज से पहले हुई थी.आशुतोष ने इस बातचीत को बहुत गंभीरता से लिया था और पूरे मनोयोग से सभी प्रश्नों के उत्तर दिए थे।

आपका बचपन कहाँ बीता। आप मुंबई के ही हैं या किसी और शहर के...? सिनेमा से आपका पहला परिचय कब हुआ?

- मेरा जन्म मुंबई का ही है। मैं बांद्रा में ही पला-बढ़ा हूँ। जिस घर में मेरा जन्म हुआ है, उसी घर में आज भी रहता हूँ। फिल्मों से मेरा कोई संबंध नहीं था। मैं जब स्कूल में था, तो तमन्ना भी नहीं थी कि फिल्मों में एक्टिंग करूँगा। मेरे पिताजी एक पुलिस ऑफिसर रह चुके हैं। ऐसा भी नहीं था कि उनका कोई फिल्मी संबंध हो। जिस बंगले में मैं रहता था, वह बंगला कुमकुमजी का था। कुमकुमजी ने मदर इंडिया और अन्य कई फिल्मों में काम किया। कुमकुमजी को हम लोग पहचानते थे। उस समय उनके घर पर काफी सारे स्टारों का आना-जाना था। तीसरी कक्षा में मैंने एक नाटक किया था। उसमें मैंने पीछे खड़े एक सिपाही का किरदार किया। मेरा कोई डायलॉग नहीं था। उस नाटक का प्रसारण दूरदर्शन पर हुआ था। लेकिन दिमाग में खयाल नहीं आया कि एक्टिंग करना है या फिल्मों में जाना है। सिर्फ कॉलेज में आने के बाद जब मैं बीएस-सी कर रहा था, तो एक ख्वाहिश जागी कि अब क्या-क्या हो सकता है और क्या कोशिश की जा सकती हैं? कॉलेज में मौके थे। अन्य गतिविधियों में हिस्सा ले सकते थे। लोकनृत्य, समूह गीत, नाटकल विभिन्न भाषाएँ... सब में मैंने अपना नाम दिया। ऐसे ही तुक्का मारा था मैंने और तकदीर ऐसी थी कि सब में मुझे चुन लिया गया। तो वे जो तीन साल थे सीनियर कॉलेज के, उस दौरान हर साल मैं पाँच नाटक, चार फोक डांस, तीन समूह गीत करता रहा। ये सब मैंने किया तब आत्मविश्वास जागा कि एक्टिंग कर सकता हूँ। केतन मेहताजी उन्हीं दिनों आए। उनकी पहली फिल्म आ रही थी 'होली'। वे अलग-अलग कॉलेज में जाकर कास्टिंग कर रहे थे और नए एक्टर खोज रहे थे। मीठीबाई में जब आए तो उन्होंने मेरा परफॉर्मेंस देखा। उन्होंने पूछा कि मैं फिल्म बना रहा हूँ क्या तुम रोल करोगे? मैंने कहा कि नेकी और पूछ-पूछ। सौ प्रतिशत करूँगा। 'होली' करने के बाद मुझे खुद पर विश्वास हुआ कि निश्चित रूप से यह मेरा पेशा हो सकता है। फिर मैंने सोचा कि फिल्मों में एक्टिंग करना है। सच कहूँ तो मैं अचानक संयोग से एक्टर बन गया।

फिल्में तो देखते रहे होंगे आप? आम मध्यमवर्गीय परिवार में फिल्में देखी जाती हैं। आप कितनी फिल्में देख पाते थे यानी हफ्ते या महीने में कितनी बार...?

फिल्म देखने की फ्रीक्वेंसी बहुत अच्छी थी, क्योंकि माता-पिता को बहुत पसंद था फिल्में देखना। हफ्ते में दो फिल्में तो होती ही थीं। वे फैसला करते थे कि कौन सी फिल्म एडल्ट है? कौन सी फिल्म यू है? उस हिसाब से हमें ले जाते थे। पहली फिल्म जो मैंने देखी है, वो 'आराधना' है। तो बाकायदा मेरा भी गुरु शर्ट बना था, डबल बटन वाला, जो राजेश खन्नाजी पहनते हैं। और दूसरी फिल्म जो मैंने लगभग पंद्रह-सोलह बार देखी होगी, वह थी रामानंद सागर साहब की 'आँखें। वह भी कुमकुम आपा के घर में। वहाँ पर 60 एमएम के प्रोजेक्टर से दीवार पर फिल्म देखते थे। अगर आप 'स्वदेश' के 'ये तारा' का फिल्मांकन याद करें तो वही प्रोजेक्टर मेरे दिमाग में था। जो दीवार पर बैठकर देखना या गणपति में गली में बैठकर फिल्म देखना, जिससे दोनों तरफ से आप फिल्म देख सकते हैं। फिल्म देखने का बहुत ही मजबूत प्रभाव रहा है। ऐसा नहीं था कि अनुमति नहीं थी या मौका नहीं था। हम न्यू टॉक‍िज थिएटर या बांद्रा टॉक‍िज थिएटर जाकर देखते थे। उन दिनों भी हम आज की तरह ही फिल्में देखते थे।

क्या फिल्म देखने की पसंद-नापसंद रहती थी। आप चुनते थे कि यह देखनी है और यह नहीं देखनी है?

नहीं, ऐसा कुछ नहीं था। जिस फिल्म की रिपोर्ट अच्छी हो, उसे जरूर देखते थे। कौन सी फिल्म देखनी है, इसका ज्यादातर फैसला माँ-पिताजी ही करते थे।

ठीक है कि वे फैसला लेते थे, लेकिन फैसले का आधार क्या होता था? कि यह फिल्में देखना हैं और यह फिल्म नहीं देखना है?

सर्टिफिकेट बहुत महत्वपूर्ण था। ए या यू। उसके बाद में तो फिल्म की रिपोर्ट देखकर जाते थे कि पड़ोसी ने देख ली है, चलो हम भी देख आते हैं।

आजकल एक बात कही जाती है कि पब्लिक सूँघ लेती है। उस समय भी कुछ ऐसा माहौल था क्या?

बिलकुल था, निसंदेह था। मैंने अमिताभ बच्चन की हर फिल्म देखी, लेकिन एक फिल्म मैं देखने ही नहीं गया। और वह फिल्म थी 'आलाप'। मैं 'सुहाग' देख रहा हूँ, मैं 'ईमान धर्म' देख रहा हूँ, मैं 'जंजीर', 'त्रिशूल', 'दीवार' देख रहा हूँ और अचानक अमितजी का पोस्टर है, प्रोफाइल में है, 'आलाप'। 'स्वदेश' के साथ भी यही हुआ है मेरे हिसाब से। 'स्वदेश' के पोस्टर में शाहरुख खान नाव पर बैठा है, तो जो मेरे जैसे दर्शक रहे होंगे, वे नहीं गए होंगे। 'आलाप' देखने मैं नहीं गया था। मेरी तरह के दर्शक आज भी होंगे, जिन्होंने शाहरुख को नाव पर देखकर फिल्म नहीं देखने का फैसला लिया होगा। उन्हें लगा है कि यह कुछ अलग है। तो मेरे हिसाब से दर्शक इस किस्म की चीजें सूँघ लेते हैं। वे सोचते हैं कि ऐसी फिल्म देखने जाएँ या न जाएँ। अब 'आलाप' बहुत अच्छी फिल्म थी। लेकिन एक ढाँचा हो जाता है। जैसे आज के दर्शक इतना सवाल नहीं पूछते। बचपन में हम जरूर पूछते थे। किसी भी फिल्म में चार चीजें जाननी होती थीं। हीरो कौन है? हीरोइन कौन है? कॉमेडियन कौन है और विलेन कौन है? अगर पोस्टर पर लिखा है कि धर्मेन्द्र, हेमामालिनी, महमूद और प्राण, तो ये फिल्म कमाल की होगी। क्योंकि हीरो कमाल है। महमूद कॉमेडियन है तो हँसी-मजाक बहुत होगा। विलेन जबरदस्त है। अब वैसी बात नहीं रही, क्योंकि ज्यादातर कॉमेडी खुद हीरो ही करता है। फिल्मों में खलनायक अलग और महत्वपूर्ण हो गए हैं। मतलब प्राण हैं तो हम देखने जाते थे कि उन्होंने इस फिल्म में क्या विलेनगीरी की है। इस फिल्म में डकैती की है तो अगली फिल्म में वह खून करेगा। तब खलनायकी छोटे स्तर की थी। अब खून करने से काम नहीं चलता। अब तो विलेन देश बेचता है। पहले लोग कास्टिंग देखते थे। 'मधुमती' का उदाहरण लें- दिलीप कुमार हैं, वैजयंतीमाला हैं, प्राण हैं, जॉनी वाकर हैं, मतलब अच्छी फिल्म होगी। अब फिल्मों के प्रति ऐसा नजरिया खत्म हो गया या यों कहें कि खो गया है। शायद हम समय के साथ आगे बढ़ गए हैं।

1985 में आपने 'होली' की। उसके बाद आपने एक्टिंग पर ही ज्यादा फोकस किया। संभव है आपको अवसर भी मिले हों?

बिलकुल। मैं खुद के प्रति उत्साहित था कि मुझमें एक्टिंग का इंटरेस्ट है और लोग कहते थे कि थोड़ा टैलेंट भी है। मैंने अभिनय का कोई प्रशिक्षण नहीं लिया था। मैं किसी फिल्म स्कूल में नहीं गया।

उस समय एफटीआईआई तो रहा होगा? वहाँ क्यों नहीं गए?

एफटीआईआई में अभिनय का प्रशिक्षण बंद हो गया था। केवल एनएसडी (नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) से लड़के आ रहे थे। मुंबई में रोशन तनेजा साहब का स्कूल था। मुझे कभी खयाल नहीं आया कि अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण लिया जाए। 'होली' के बाद मुझे अमोल पालेकर की 'कच्ची धूप' और महेश भट्‍ट की 'नाम' और सईद मिर्जा की 'सलीम लंगड़े पे मत रो' जैसी प्रोजेक्ट मिलते गए। मुझे लगा कि एक के बाद एक प्रोजेक्ट मिल रहे हैं, इसका मतलब है कि मैं कुछ कर रहा हूँ। अब मैं ब्रेक नहीं ले सकता कि फिल्म स्कूल चला चाऊँ या दिल्ली चला जाऊँ। फिर ऐसा वक्त भी आया कि मुझे जिस तरह की फिल्में मिलनी चाहिए थीं, वैसी नहीं मिल रही थीं। एक ढाँचे में बँधता जा रहा था। फिल्में करने के बाद तकनीशियनों की भूमिका और योगदान के बारे में समझ सका। एक्टिंग के जरिए मैं फिल्ममेकिंग के बाकी प्रोसेस से वाफिक होने लगा। तब निर्देशन की तरफ मेरी रु‍चि बढ़ी।

उन दिनों सफल एक्टर के क्या मानदंड थे?

आपको बताऊँ कि जो भी फिल्म इंडस्ट्री में आता है, वह हीरो बनने ही आता है। यहाँ तो गायक भी हीरो बनने आते हैं। उनका सपना होता है कि मैं किशोर कुमार की तरह सिंगिंग स्टार बन जाऊँगा। आप हिन्दी फिल्मों के गायकों को करीब से देखें तो पाएँगे कि उन सभी में हीरो होने की झलक है। गाने के स्टाइल में भी एक अदा है। आप मौका देंगे तो वे रोल निभा देंगे। कुछ हीरो बन पाते हैं, कुछ कैरेक्टर रोल करने लगते हैं। कुछ टीवी में चले जाते हैं। कुछ प्रोड्‍यूसर बन जाते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद हर कोई अपनी एक पोजीशन खोज लेता है। ग्लैमर की दुनिया इतनी लुभावनी है कि इसे छोड़कर कहीं जाने का मन नहीं करता। एक्टिंग नहीं चल रही तो कुछ और कर लेता हूँ। मेरे साथ हुआ है, इसलिए कह रहा हूँ। मैं तो उनको बहुत सुलझा हुआ मानूँगा जो चार-पाँच साल तक जूझने के बाद यह समझ कर लौट गए कि फिल्म इंडस्ट्री हमारे लिए नहीं है। उनमें से कई ने बिजनेस किया और बिजनेस में तरक्की की। मुझे ऐसे लोग मिलते हैं। वे अपने गाँव, कस्बे, शहर लौट गए। अभी भी मिलते हैं तो यह कहना नहीं भूलते कि कोई रोल हो तो बोलना। सब के अपने अनुभव हैं।

आपको जिस तरह के काम मिल रहे थे, उसमें कितनी आय हो जाती थी। सीधे पूछूँ कि आर्थिक स्थिति कैसी थी?

अगर बैंकिंग में आप जाते हैं तो वहाँ वेतन निश्चित है। प्रायवेट कंपनी में ऐसा निश्चित नहीं है। फिल्म बिजनेस भी अनिश्चित रहता है। फिल्म इंडस्ट्री में रोल मिलने पर सेलिब्रेट करते हैं, चेक मिलने पर नहीं करते। यहाँ चेक से ज्यादा जरूरी रोल है, क्योंकि उसके जरिए ही आप अपना हुनर दिखा सकते हैं। जब थोड़ी स्थिति मजबूत होती है तो हिम्मत आती है कि पैसे भी पूछ लें। यह फिल्म इंडस्ट्री का अनलिखा कायदा है।

इसका मतलब आरंभ में आपको भी पैसे नहीं मिले। परिवार में बड़ी संतान होने के कारण जिम्मेदारियाँ तो रही होगी...

अच्छा इस अर्थ में॥ इसे मैं अपना सौभाग्य कहूँगा कि मुझे पिताजी से पूरा समर्थन मिला। पिताजी ने कहा कि एक्टिंग करो, लेकिन पढ़ाई का ध्यान रखो। डिग्री बहुत जरूरी है। अगले मोड़ पर केतन मेहता के बारे में बताया कि वे एक फिल्म के लिए बुला रहे हैं तो पिताजी ने कहा कि कर लो। फिल्म खत्म होने के बाद जब मैंने कहा कि यह मेरा प्रोफेशन रहेगा तो उन्होंने कहा कि ठीक है, मैं तुम्हारे पीछे हूँ। मेरा इतना ही सुझाव है कि अपने लिए एक समय सीमा तय करो... मान लो दो साल तय करते हो तो दो साल कोशिश करो। मैं समर्थन करता हूँ, लेकिन उसके बाद तुम्हें खुद के बारे में सोचना होगा। अगर कुछ नहीं हो पा रहा है तो जो डिग्री आपने ली है, उसका क्या उपयोग हो सकता है यह आपको देखना है। तो मुझे समर्थन था। समर्थन शायद इसलिए भी था कि डैडी-मम्मी को फिल्में देखना बहुत ज्यादा पसंद था।

मतलब फिल्मों में काम करना एक सम्माननीय प्रोफेशन था ?

नहीं... फिल्म इंडस्ट्री की अपनी अच्छाइयाँ और बुराइयाँ हैं। उनका कहना था कि आप जाओ तो अच्छाइयाँ पकड़कर चलना, वही बेहतर है। पहली बार जब मैंने कहा कि विलेन का रोल कर रहा हूँ तो वे चौंके... अच्छा नहीं है, रेप करना या... फिर उन्हें लगा कि नहीं, यह तो एक्टिंग है। 'इंद्रजीत' फिल्म थी वह। हालाँकि मुझे विलेन का रोल करते हुए मजा नहीं आया, क्योंकि उसमें शेड्‍स और मोटिवेशन नहीं था। प्राण जैसा कुछ करने का मौका नहीं मिला था।

तो विलेन भी बन गए आप ?

मजेदार बात क्या थी कि जब मैं हीरो का रोल माँगता था तो कहा जाता था कि तुम विलेन के लिए क्यों नहीं कोशिश करते। तुम में सॉफ्टनेस कम है, जो हीरो के लिए जरूरी है। जब विलेन के लिए कोशिश की तो कहा गया कि तुम बड़े सॉफ्ट लगते हो... सही विलेन नहीं लगोगे... तो मेरा पिंग-पौंग होता रहा वहाँ पर। फिर मुझे लगा कि वे विनम्र तरीके से मुझसे बता रहे हैं कि मुझमें टैलेंट नहीं है। फिर भी मैं लगा रहा और जो रोल मिलते थे, उन्हें करता रहा। मेरी किस्मत अच्छी रही कि दीपक तिजोरी, आमिर खान और शाहरुख खान जैसे दोस्त मुझे समझते रहे। दीपक और आमिर ने मुझे पहले मौका दिया। आमिर ने पहले सुझाव दिया कि पिक्चर करते हैं, मगर डेढ़ साल के बाद शुरू करेंगे। फिर दीपक तिजोरी ने ऑफर किया। इस प्रकार 'पहला नशा' पहले बन गई। फिर 'बाजी' हुई।

आप डायरेक्टर बनने के बाद भी एक्टिंग करते रहे ?

नहीं, फिल्मों में एक्टिंग बंद हो गई। सीरियल में एक्टिंग करना शुरू किया। उसकी वजह थी कि डायरेक्शन की मेरी दुकान बंद हो गई। दोनों फिल्में जब नहीं चलीं तो डायरेक्शन का मेरा शटर डाउन हो गया। अगर कोई फिल्म न चले तो सबसे पहला दोषी डायरेक्टर माना जाता है। फिर हीरो... मेरे मामले में फिल्में नहीं चलीं। फिल्मों के न चलने के कारण हो सकते हैं, लेकिन सच यही था कि लोग विश्वास खो चुके थे। निर्माताओं का भरोसा नहीं रहा। उस दौरान मुझे 'सीआईडी' सीरियल करना पड़ा। वह रोल इंटरेस्टिंग था, इसलिए भी किया। फिर 'वो' किया। जब दोनों फिल्में रिलीज हुई थीं तो मुझे यही लगा था कि मैंने कोई महान कलाकृति बनाई है। दर्शक मेरी फिल्म नहीं समझ सके। दर्शक क्या जानें? एक फैशन है न कि मेरी फिल्म समय से आगे की थी, आज के दर्शक नहीं समझ सके। दस साल बाद के दर्शकों के लिए है। अब सोचता हूँ तो अपनी वेबकूफी समझ में आती है। दस साल आगे के दर्शकों के लिए फिल्म क्यों बना रहे हो? आज के दर्शकों के लिए बनाओ न? एक साल के बाद मनन-चिंतन करने पर समझ में आया कि समस्या मेरे साथ थी। मेरी स्क्रिप्ट में खामियाँ थीं। दोनों फिल्मों का कांसेप्ट कमजोर था। बहुत सारे लोगों ने कहा कि 'पहला नशा' में दीपक तिजोरी की जगह आमिर खान होता तो फिल्म कहाँ पहुँच गई होती? फिर 'बाजी' आई तो लोगों ने कहा कि इसमें आमिर खान की जगह अक्षय कुमार या सनी देओल होते तो फिल्म एक्शन में चल जाती। सच तो यह था कि फिल्म किसी भी सूरत में नहीं चलती। समस्या एक्टरों में नहीं थी। दोनों ने बहुत अच्छा परफार्मेंस दिया। उनसे सबक लेकर मैंने नई फिल्म के बारे में सोचना शुरू किया।

कुछ नए सिरे से करने का इरादा हुआ या आत्ममंथन वगैरह चला और फिर किसी नतीजे पर पहुँचे?

दो फिल्मों के फ्लॉप होने के बाद मेरी हेकड़ी निकल गई। दर्शक को समझ में नहीं आई वाली बात इसी हेकड़ी से आई थी। फिर एहसास हुआ और मैंने सोचना शुरू किया कि बिमल राय और वी। शांताराम सरीखे फिल्मकारों ने जो फिल्में बनाईं, वो क्यों बनाईं? मैंने उनके काम को फिर से देखा। फिल्मों को फिर से समझने की कोशिश की। कई सारे उद्‍घाटन हुए।


पहले जरा बता दें कि 'पहला नशा' के लिए धन कहाँ से आया या आपने कैसे इंतजाम किया ?

मुहम्मद रहीम, विरल शाह और दीपक तिजोरी तीनों निर्माता थे। दीपक अपने दो दोस्तों को साथ में ले आया था। तीनों को मुझमें विश्वास था, जो मैंने बाद में तोड़ा। तीनों को लगा था कि दीपक की लांचिंग होगी और उनकी कंपनी स्थापित हो जाएगी।

क्या मैं कह सकता हूँ कि मुंबई के होने और एक्टिंग के दौरान हुई जान-पहचान के कारण आपको फिल्म के लिए धन जुटाने में आसानी हुई ?

बिल्कुल... मैं आपको बताऊँ कि 'होली' में मैं आमिर खान के साथ था। 'सर्कस' में शाहरुख खान के साथ था। दीपक से मेरी प्रतिद्विंद्विता थी। मैं मीठी बाई कॉलेज का था और वह एनएम कॉलेज का था। इंटर कॉलेज कंपीटिशन में हम आपने-सामने भिड़ते थे। इसे मेरी तकदीर कहिए या जो कुछ... हम लोग साथ ही बढ़े। 'मैंने प्यार किया' के ओरिजनल कास्ट मैं और भाग्यश्री थे। सूरज को 'कच्ची धूप' की जोड़ी चाहिए थी। उन्हें बाद में लगा कि मैं मिसफिट हूँ। भाग्यश्री तो ठीक है, लेकिन लड़का बदलना चाहिए। उसके बाद सलमान आए। हमारे बीच बातचीत होती थी। मुझे मालूम था कि सलमान कब सूरज से मिलने गए। इन सारी वजहों से आसानी रही, लेकिन मैं इस लाइन में यह सोचकर नहीं आया था कि डायरेक्टर बनूँगा। डायरेक्शन एक टेक्नीकल मीडियम है। अगर उसमें आना है तो एफटीआईआई, पूना या सत्यजित राय इंस्टीट्‍यूट, कोलकाता या दिल्ली और चेन्नई के फिल्म स्कूल में जाकर डायरेक्शन सीखना चाहिए। मेरे लिए अच्छी बात रही कि एक्टिंग के दौरान अप्रत्यक्ष रूप से डायरेक्शन की ट्रेनिंग होती रही। जो लोग इंस्टीट्‍यूट में पढ़ने का खर्च नहीं उठा सकते। उन्हें आकर डायरेक्शन में असिस्ट करना चाहिए।

आप जानते हैं कि किसी नए व्यक्ति का असिस्टैंट बनना भी कितना मुश्किल काम है। सब पूछते हैं कि क्या अनुभव है? शुरुआत ही नहीं होगी तो अनुभव कहाँ से आएगा ?

कुछ लोग सीधे किसी डायरेक्टर के पास पहुँच जाते हैं और कहते हैं कि हमें कुछ नहीं आता, लेकिन आपके साथ काम करना है। यह तो नहीं चलेगा। आपको कुछ तो आना चाहिए। कुछ तो सीखा होगा आपने। कुछ पढ़ा ही होगा। फिल्म के प्रति पैशन दिखाई दे। आप कह सके कि मैं बेनेगल, सत्यजित राय या फिर आज के किसी फिल्ममेकर के बारे में जानते हैं। पढ़ा है मैंने। डायरेक्टर के लिए जरूरी तकनीक की जानकारी नहीं है, पर फिल्मों को मैं समझता हूँ। जिस डायरेक्टर को मिलने जा रहे हैं, कम से कम उस डायरेक्टर की फिल्में पढ़-देखकर उसके पास जाना चाहिए। असिस्ट करना जरूरी है। असिस्ट करने के बाद ही टेक्नीकल प्रोसेस सीखेंगे। संपर्क बनेगा। इसके साथ ही फिल्म इंडस्ट्री की मुश्किलों से सीधा परिचय होगा। जरूरी नहीं है कि सभी को आते ही काम मिल जाए। डायरेक्शन में जाना है तो असिस्टैंट के तौर पर ही शुरुआत होनी चाहिए।

अगर आप ‍अभिनेता के तौर पर सफल हो गए होते तो हमें 'लगान' जैसी फिल्म नहीं मिलती और हम डायरेक्टर आशुतोष गोवारीकर से भी वंचित रह जाते।

बिलकुल, बिलकुल... इस पर मैंने भी बहुत बार सोचा है। मैं अभिनेता आशुतोष के बारे में निश्चित नहीं हूँ कि वह सफल होने पर क्या करता? लेकिन मेरी 'पहला नशा' और 'बाजी' चल गई होती तो भी 'लगान' नहीं बन पाती। हो सकता था, तब मैं सालों बाद बुढ़ापे में कोई ऐसी कोशिश करता॥ यह भी हो सकता था कि मुझे ऐसी कोशिश की जरूरत ही नहीं पड़ती। मेरे निर्माताओं को बुरा लग सकता है, लेकिन 'पहला नशा' और 'बाजी' का न चलना एक रूप में मेरे लिए फायदेमंद ही रहा। उनकी असफलता की वजह से ही मैं 'लगान' जैसी फिल्म लिख सका।

लगान' जैसी फिल्म लिखने की हिम्मत कैसे बटोरी आपने? दो फिल्मों का असफल होना, एक्टर के तौर पर न चलना... कहीं न कहीं निराशा रही होगी, फिर भी आपने बिलकुल अलग किस्म की फिल्म लिखने की हिम्मत दिखाई? हो सकता है पारिवारिक दबाव भी रहा होगा, क्योंकि आपकी शादी हो चुकी थी और बच्चे भी थे?

खुद को खोजने और पाने की कोशिश से वह हिम्मत मिली। अपने माइनस पाइंट को समझने और स्वीकार करने के बाद नए सिरे से शुरू करने के अप्रोच और एटीट्‍यूट से मैं 'लगान' लिख सका। मैंने किसी खुन्नस में 'लगान' नहीं लिखी। मुझे किसी को कुछ नहीं दिखाना था और न ही फिल्म इंडस्ट्री को बदलना था। जिन्होंने भी कहा कि आशुतोष का कैरियर तो डायरेक्टर के रूप में खत्म हो गया, वे सब सही थे, क्योंकि मैंने फिल्में ही वैसी बनाई थीं। अब मैं थोड़ी सुविधा के साथ कह सकता हूँ कि मैंने भारतीय सिनेमा की क्लॉसिक फिल्मों को देखकर जो समझा... बड़े फिल्मकार कैसे वैसी फिल्में बना गए और सफल हुए। मैं परंपरा के साथ एक नयापन खोज रहा था। जब मैंने लिखी तो असंभव-सी कहानी लगी थी। उसकी कहानी थी 1893 में एक छोटा-सा गाँव, अंग्रेज साम्राज्य के खिलाफ खड़ा होता है और अपना लगान माफ करवाने के लिए क्रिकेट खेलता है। अजीब-सी कहानी है न? कोई भी सुनकर दरवाजा ही दिखाएगा। आमिर खान ने भी पहली बार मना कर दिया था। पहली प्रतिक्रिया यही होगी... च्च... कुछ और बात करते हैं। जब मैंने सारे डिटेल के साथ सुनाया... किस तरह करूँगा, इमोशनल कंटेंट क्या है, ड्रामा कहाँ होगा, रोमांस कितना रहेगा, ह्यूमर किस तरह आएगा... यह सब लिखते हुए मैं खोज और पा रहा था। दो फ्लॉप फिल्मों के बाद अगर कोई डायरेक्टर ऐसी फिल्म सुनाता है तो स्वाभाविक है कि सभी मना करें। शायद मेरे पास भी कोई आता तो मैं भी मना कर देता। अगर मैं आमिर खान के नजरिए से देखूँ तो उन्हें सलाम करता हूँ। एक तो उन्होंने भुवन का रोल स्वीकार किया और दूसरे उसे प्रोड्‍यूस करने के लिए आगे आए। आमिर में डायरेक्टर को पहचानने की सिक्स्थ सेंस है।

थोड़ा पीछे चलें। क्या सोच कर 'पहला नशा' की प्लानिंग की गई थी? क्या उस तरह की फिल्में उस समय हिट हो रही थीं या आप कुछ और सोच कर उसे बना रहे थे?

मर्डर मिस्ट्री... मुझे लगा कि ऐसी फिल्में कम बनी हैं और मर्डर मिस्ट्री में एक रोचकता रहती है। 'बाजी' बनाने का मकसद आमिर खान को एक्शन हीरो के तौर पर पेश करना था। उस फिल्म का दूसरा कोई मकसद नहीं था।

क्या नए डायरेक्टर ऐसा दवाब रहता है कि निकट अतीत में सफल हुई फिल्मों या सफल निर्देशकों की लीक पर चलो। क्या 'पहला नशा' और 'बाजी' के समय किसी डायरेक्टर या फिल्म की प्रेरणा थी?

ऐसा मेरी सोच नहीं रही कि ये ट्रेंड है तो इस तरह की फिल्म बनाते हैं।

आपकी सोच और योजनाओं में वैयक्तिकता रही?

वैयक्तिकता ज्यादा बड़ा शब्द है इस प्रसंग में... मैं नासमझ ज्यादा था। मैं ट्रेंड, कामयाबी या कुछ और सोच ही नहीं रहा था। यह भी ख्याल नहीं था कि कुछ अलग ही करना है। उत्साह केवल यह था कि दीपक तिजोरी के साथ फिल्म बनानी है, चलो मर्डर मिस्ट्री बनाते हैं। नादानी कहिए, नासमझी कहिए... मैं नासमझी मानता हूँ इसको। अपरिपक्वता भी थी। मेरे पीछे या साथ तब कोई ऐसा नहीं था, जो कह सके कि आशुतोष 'पहला नशा' मत बनाओ। गलत फिल्म चुनी है तुमने। तुम्हें यह नहीं बनानी चाहिए। तुम क्या करोगे? तुम पहले एक रोमांटिक पिक्चर बनाओ। नाम लेने की जरूरत नहीं है, लेकिन बड़े प्रोड्‍यूसर के बेटे जो लांच हुए हैं, उनके पिताजियों ने उन्हें बताया है कि बेटा क्या कर रहे हो? मॉडर्न करो लेकिन प्लॉट ट्रेडिशनल लो... कोई भी समझ सकता है किसकी बात कर रहा हूँ। आपको पता ही होगा कि वे फिल्में कौन सी हैं? यह मुझे बताने वाला कोई नहीं था। दीपक को भी पता नहीं था। हम लोगों की नासमझी रही।

क्या मैं कहूँ कि फिल्मी परिवार से न होने का खामियाजा भुगतना पड़ा?

नहीं, मैं तो परिपक्वता की कमी कहूँगा। एक खास बात बताऊँ। मुझे जब कोई अवसर मिलता है तो मैं उसके परिणाम के बारे में नहीं सोचता हूँ। मेरे खयाल में अवसर आते ही हैं कभी-कभी। फिर सोचना क्या है, पकड़ लो। 'होली' की बात करें, मैंने सोचा नहीं, मैंने कहा कि अवसर है पकड़ लो। वैसे ही दीपक ने प्रस्ताव रखा तो मैंने हाँ कह दिया। अंग्रेजी में कहावत है कि छलाँग लगाने के पहले देख लो। मेरा उलटा है 'पहले छलाँग मार दो, फिर देखो।'

आत्मज्ञान के बाद आपने 'लगान' बनाई। कल्पना करें कि वह भी असफल हो जाती तो?

'लगान' के साथ अलग बात है। असफल भी हो जाती तो मुझे शर्म नहीं होती। मुझे उस फिल्म का गर्व था। पहली कॉपी देखकर हम खुश हुए थे कि हाँ, यह फिल्म है। अगर वह नहीं चलती तो काम नहीं मिलता... यही न? तो 'लगान' के पहले ही कौन सा काम मिल रहा था। मैं पहले से शून्य था... माइनस में नहीं जा सकता था। मैंने 'लगान' और 'स्वदेस' पर एक साथ काम शुरू कर दिया था। ऐसा नहीं था कि मैंने 'लगान' के बाद 'स्वदेस' के बारे में सोचा। आमिर ने मुझसे पूछा था कि पहले 'लगान' बनाओगे या 'स्वदेस'? उस समय मुझे लगा था कि 'स्वदेस' के लिए थोड़ी और परिपक्वता चाहिए। वह मुश्किल फिल्म थी। मैं बताऊँ कि कभी-कभी लिखने में आप कमाल की भावनाएँ सृजित करते हैं, लेकिन उसे पर्दे पर लाएँ कैसे? वह बहुत मुश्किल काम है, इसलिए मैंने उस समय 'लगान' को चुना।

पहले अभिनेता, फिर निर्देशक और उसके बाद निर्माता... अब तो आप अपनी पसंद की फिल्में बना सकते हैं। क्या शुरू में फिल्मों के लिए निर्माता जुटाने में दिक्कतें हुई थीं?

- 'पहला नशा' में कोई दिक्कत नहीं हुई थी। 'बाजी' में हुई थी, इसलिए कि सलीम अख्तर साहब अपनी फिल्मों में खुद बहुत ज्यादा इनवॉल्व रहते हैं। उसकी मार्केटिंग और प्रोड्‍यूसिंग में पूरा हिस्सा लेते हैं। निर्माता के तौर पर वे ठीक थे। उनकी माँग रहती थी कि स्क्रिप्ट के लेवल पर॥ कि यहाँ दृश्य बदल दो यहाँ कुछ डाल दो। हाँ, अगर मुझे कभी सौ व्यक्तियों की जरूरत पड़ती थी तो ये नहीं कहते थे कि दस में कर लो। आमिर खान तो अभी तक का सबसे आदर्श निर्माता रहा। छोटा-सा उदाहरण दूँ। अंग्रेज आपको कोलाबा (मुंबई का एक इलाका) के पीछे भी मिल जाते हैं। फिल्म इंडस्ट्री हमेशा एक सिस्टम रहता है कि आप कोलाबा से ही लाते हो। वे सस्ते होते हैं। मेरी तमन्ना थी कि इंग्लैंड से एक्टर आना चाहिए। आमिर ने एक बार भी बहस नहीं की और हर तरह की सहूलियतें दीं। उसकी वजह से मैं 'लगान' को ठीक वैसी ही बना सका, जैसी बनाना चाहता था। 'बाजी' में स्क्रिप्ट के स्तर पर परेशानी हुई थी।

क्या अब भी किसी प्रकार का दबाव या हस्तक्षेप रहता है? 'लगान' के बाद का सफल निर्देशक भी कोई समझौता करता है क्या?

- मेरे लिए सफलता, सराहना और इज्जत है। जरूरी नहीं है कि आपकी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाब ही हो। लोगों की रुचि आप में बनी रहे। अगर इज्जत गई और बॉक्स ऑफिस पर भी फिल्म नहीं चली, फिर तो समस्या है। मेरे मामले में 'स्वदेस' को लेकर इज्जत बरकरार है, इसलिए मैं 'जोधा अकबर' बना पाया। मैं बाजार की जरूरत पर ध्यान नहीं देता। स्क्रिप्ट पर पहले ध्यान दें और बाद में उसे पर्दे पर लाने पर ध्यान केंद्रित करें। खुद ही जाँच-पड़ताल चलनी चाहिए। अब जैसे कि 100 करोड़ की फिल्म नहीं बनानी चाहिए। उतने पैसे कहाँ से लौटेंगे? मैं वैसा फैसला इसलिए भी नहीं लूँगा कि मैं खुद ही समझता हूँ।

एक निर्देशक के लिए परिवार का सपोर्ट कितना जरूरी होता है। आपकी स्थिति में पूछूँ तो पत्नी और बच्चों का कैसा सपोर्ट मिला?

मैं तो फिर से खुद को भाग्यशाली कहूँगा। 'स्वदेस' बनाने के समय सबसे पहले उनसे पूछा कि अगर आप हाँ कहते हो तभी कंपनी लांच करेंगे। दर्शक तो हमारे घरवाले भी होते हैं। कहानी लिखने के बाद सबसे पहले घरवालों को सुनाता हूँ। उनकी प्रतिक्रिया सुनने के बाद कुछ चीजें जोड़ता हूँ। कुछ चीजें बढ़ाता हूँ और कुछ सुधार करता हूँ। मेरी बहन अश्लेषा मेरी कानूनी सलाहाकार हैं। उसने कारपोरेट लॉ पढ़ा है। पिता जी सब कुछ देख-समझ कर विश्लेषित करते हैं। सभी की भागीदारी रहती है। मैं उसे महत्व भी देता हूँ। फिल्म निर्माण का सारा प्रशासन और प्रबंधन उनके जिम्मे है। मैं उसमें पड़ता भी नहीं हूँ। मेरा काम क्रिएटिव है। कहानी लिखना, फिल्म बनाना। वह निर्माता हैं।

आपकी 'लगान' और 'स्वदेस' में देश के दो बड़े स्टार थे। कितना जरूरी है स्टार पर निर्भर रहना... क्या आप स्टार की मदद लेना पसंद करते हैं।

हर फिल्म की कहानी तय करेगी कि उस में कौन स्टार होगा? कास्टिंग क्या होगी यह विषय तय करता है। आप कह सकते हैं, 'लगान' या 'स्वदेस' में कोई नया लड़का भी हो सकता था। यह एक मिथ है कि फलां रोल कोई और नहीं कर सकता। ऐसा नहीं है। बहुत सारे लोग कर सकते हैं। फिल्म थोड़ी सी बदलेगी। थोड़ी सी बदल जाएगी। फिल्म का निबंधन परिवर्तित होगा lekin यह जरूर होगा कि पांच लोगों में सबसे ज्यादा अनुकूल यह आदमी है। 'लगान' की कहानी अलग है। वह तो मैंने आमिर को ध्यान में रखकर ही लिखी थी। आमिर के साथ मैं 'बाजी' कर चुका था। मैं उसे प्रभावित करना चाहता था। पूछ सकते हैं कि आमिर सफल नहीं रहता तो ... तो शायद 'लगान' बनती ही नहीं। 'स्वदेस' में मामला अलग था। अगर मुझे श्रीपेरूबंदूर और जौनपुर पहुंचना है, नेपाणी पहुंचना है, 24 परगना पहुंचना है तो मुझे एक चेहरे की जरूरत थी। संयोग से ऐसा हुआ था कि शाहरुख खान ने 'लगान' के लिए ना बोला था तो उसके लिए दिल में था कि 'लगान' मैं कर सकता था। अब क्या बना रहे हो? स्वदेस? मैं कर रहा हूं। फिर मैंने कहा कि अच्छी बात है। हमदोनों को-एक्टर रह चुके हैं। 'जोधा अकबर में मुझे 27 साल का अकबर चाहिए था। सलीम के जन्म तक की फिल्म है। जो विवरण मेरे दिमाग में अकबर के हैं, उनके लिए रितिक ही उपयुक्त हैं। मैंने सीधे रितिक को ही अप्रोच किया। किसी भी फैसले का परिणाम फिल्म की रिलीज के बाद ही पता चलता है। अगर फिल्म चल जाए तो डायरेक्टर विजनरी हो जाता है। उसे सब कुछ पहले से पता था। अगर नहीं चली तो कहेंगे कि समझ ही नहीं पाया। नहीं चली न?

किसी भी फिल्म की प्रस्तुति के लिए स्टार की कितनी जरूरत पड़ती है? हिंदी फिल्मों के बाजार में स्टार की अहमियत सबसे बड़ी दिखती है।

जब आपका विषय जोखिम भरा है तो जरूरत पड़ती है कि उसमें कुछ कमर्शियल मसाले डाले जाएं। निश्चित रूप से वह पड़ना चाहिए। मतलब यह है कि अगर हम 'लगान' कर रहे हें तो गाने हैं फिल्म में। मैं कभी भी बगैर गानों के फिल्म नहीं बनाऊंगा। इस मामले में मैं स्पष्ट हूं। मुझे संगीत अच्छा लगता है और मेरा मानना है कि फिल्म में संगीत होना ही चाहिए। 'जोधा अकबर' में अगर नया लड़का रहता तो दर्शकों के लिए वही आकर्षण नहीं रहेगा, जो रितिक की वजह से है। एक जाना-माना चेहरा और जो एक एक्टर भी है ... सिर्फ स्टारडम की बात नहीं है, एक्टिंग भी होनी चाहिए... फिल्म के विषय के हिसाब से खास एक्टिंग स्टाइल का एक्टर लेना चाहिए। मैं दस फिल्मों के नाम बता सकता हूं,जिसमें कास्टिंग गलत है। कई बार फिल्म नहीं चलती है तो कास्टिंग गलत लगती है। फिल्म चलती है तो कोई सवाल ही नहीं उठता। अगर आप मेरी राय पूछ रहे हैं तो मुश्किल फिल्म करते समय... यानी 'स्वदेस' जैसी फिल्म करते समय नया लड़का लेता हूं तो मुश्किल होगी। 'जोधा अकबर' में उतना खतरा नहीं था, फिर भी रितिक रोशन से अतिरिक्त आकर्षण बनता है।

आप लेखक के तौर पर क्यों जुड़ते हैं हर प्रोजेक्ट से... क्या यह विभाग दूसरों को नहीं सौंपा जा सकता या आपको लगता है कि आप स्वयं शामिल रहेंगे तो लेखन सही होगा और फिर उसे पर्दे पर उतारने में सहूलियत होगी।

फिल्म का कंसेप्ट और स्टोरी जब तक मुझे न जंचे... मैं फिल्म शुरू नहीं करता। 'जोधा अकबर ' का कंसेप्ट हैदर अली ने दिया 'लगान' के तुरंत बाद। हैदर अली नुक्कड़ के एक्टर थे। 'मुगलेआजम' तो अनारकली और सलीम की कहानी है। जोधा अकबर के बारे में तो हम जानते ही नहीं। एक रोचक पहलू हो सकता है। सन् 2001 से जोधा अकबर मेरे दिमाग में था। आम तौर पर लेखक सातवें-आठवें दशक की फिल्मों को ही फिर से लिख रहे हैं। नयी कहानियां नहीं आ पा रही हैं। ऐसा मुझे लगता है। नयी कहानियां उपन्यास के स्तर पर है। क्लासिक साहित्य पर फिल्में बन चुकी हैं। नए साहित्य पर कुछ नहीं हो रहा है।

पिछले दिनों यश चोपड़ा से बात हो रही थी। उन्होंने कहा कि ज्यादातर युवा निर्देशक खुद ही फिल्म लिखते हैं। हिंदी फिल्मों में आया यह बहुत बड़ा शिफ्ट है। इससे आप कितने सहमत हैं?

मैं पूरी तरह से सहमत हूं, लेकिन मैं खुद को लेखक नहीं मानता। अगर आप मुझ से एक फिक्शन या निबंध लिखने की बात कहेंगे तो मैं नहीं लिख पाऊंगा। मैं कहानी के मोड़, विकास, चरित्रांकन आदि में मदद करता हूं और यह करते समय मेरे सामने दृश्यात्मक कल्पना रहती है। मेरी विशेषता पटकथा है। अगर साहित्य के मानदंडों से आप मुझे मापेंगे-तौलेंगे तो मैं बहुत खोखला हूं। मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने प्रेमचंद नहीं पढ़ा है। भारत का क्लासिक साहित्य नहीं पढ़ा है। हां, मराठी साहित्य पढ़ा है। देश का राष्ट्रीय साहित्य नहीं पढ़ा है। लेकिन एक एहसास है कि 'गोदान' क्या है? उसकी कहानी क्या है? क्यों लिखी गयी? क्या प्रभाव हुआ? हिंदी प्रदेश से आए लड़के कह सकते हैं कि मैंने तो मिडिल स्कूल में 'गोदान' पढ़ लिया था। ऐसा इसलिए हुआ कि वह आपको थमा दिया गया होगा। मेरी पीढ़ी ... सॉरी मैं सबके लिए कहूंगा, लेकिन यह सच है कि हम सभी खोखले हैं। हम शहरी हैं। हमको कुछ पता ही नहीं है। हमें धरती मां के बारे में जानकारी 'मदर इंडिया' से मिली है। एक किसान की जिंदगी में क्या होता है? यह हमें पता है, क्योंकि हमने 'दो बीघा जमीन' देखी है। यह सही नहीं है। किताब पढ़ कर या स्वयं अनुभव कर जो विचार सरणि बनती है, वह हमारे पास नहीं है। एक लेखक के तौर पर भी हम रिपीट कर रहे हैं।

लेकिन फिल्मों की दृश्यात्मकता तो बदलनी है। कैसी छवियां दिखानी है, यह कैसे तय करते हैं?

हां, छवियों में नयापन लाने की कोशिश रहती है। 'स्वदेस' की बात करें तो छह महीने तक मैं तय नहीं कर पा रहा था कि हरिदास का दृश्य कैसे ले आऊं? ट्रेन का दृश्य कैसे रखूं। क्या कहना है यह पता था, लेकिन कैसे कहना है, यह समझ में नहीं आ रहा था। मुझे शिक्षा की बात करनी थी, लेकिन मोहन भार्गव और फिल्म से उसे जोड़ने में छह-छह महीने लग गए। स्क्रिप्ट का ढांचा है, कि अमेरिका से मोहन भार्गव आया है। उसे कावेरी अम्मा को लेकर जाना है, लेकिन उसे कैसे दिखाएं?


क्या यह 'राइटर्स ब्लॉक ' है?

नहीं, यह राइटर्स ब्लॉक नहीं है। मैं इसे कंसेप्ट ब्लॉक कहूंगा। मां सुशील हैं। उनकी एक बेटी हैं। बेटी से रोमांस वगैरह है। रोमांस में अटके तो राइटर्स ब्लॉक है। यह ब्लॉक किसी फिल्म, किसी की सलाह या किसी और तरीके से खुल जाता है। फिल्म में क्या दिखाना है, यह सही तरीके से मालूम हो। जो करना है, उसे कैसे दिखाएं और जो नहीं दिखा सकते, उसे बातचीत में लाना होगा। मुझे मोहन से बोलवाना पड़ा कि मैं नहीं मानता कि हमारा देश दुनिया का सबसे महान देश है, लेकिन यह मानता हूं कि हमारा देश दुनिया का सबसे महान देश है, लेकिन यह मानता हूं कि हमारे अंदर काबिलियत है महान बनने की । यह अगर फिल्म में बोलवा रहा हूं तो कब बोलवा रहा हूं। यह फर्स्ट हाफ में नहीं हो सकता। दर्शक भी फिल्म देखे और समझे, कि फिल्म किस दिशा में जा रही है, फिर जब नायक कहेगा तआ लगेगा कि हां, मैं भी ऐसा महसूस करता हूं। यह सब क्राफ्ट है। अगर 'स्वदेस' के लेखक के बारे में पूछेंगे तो वे के.पी. सक्सेना हैं, जिन्होंने मेरे कंसेप्ट को सही शब्द दिए। 'पानी में पिघल जाना बर्फ का मुकद्दर होता है' जिस दिन मैं यह लिख दूं, उस दिन मैं अपने आपको राइटर मान लूंगा। मैं यह सोच ही नहीं सकता। 'चूल्हे से रोटी निकालने के लिए चिमटे को अपना मुंह जलाहिं के पड़ी'... ये सक्सेना साहब है। यह अनुभव और सीख से आता है। फिर मुझसे पूछा जाता है कि मैं क्या करता हूं? एक निर्देशक के तौर पर मैं संवाद पकड़ता हूं... जावेद साहब में वह प्रतिभा हैं। मैं उन्हें उत्साहित करता हूं। सही चीज चुनता हूं। सही चीज चुनने का कोर्स नहीं होता। उसे आप पढ़ा नहीं सकते।

'स्वदेस' के बारे में किस तरह की बातें सुनने को मिलीं?

स्लो है, लंबी लगती है और थोड़ी डॉक्यूमेंट्रीनुमा हो गयी है। तीनों आलोचनाएं मैं स्वीकार करता हूं। अगर हरिदास का दृश्य है और उसका प्रभाव पैदा करना है तो मुझे यह दिखाना होगा कि वह क्या कह रहा है। उसे सुनना जरूरी है। उसकी स्पीड से ही हमें सुनना होगा। हमारी समस्या इतनी बड़ी है कि दो घंटे में नहीं कही जा सकती थी। फिल्म के लिए रियलिज्म जरूरी था। लोगों को इसी कारण डॉक्यूमेंट्री और भाषण लगने लगा। अगर मैं सामाजिक तौर पर प्रासंगिक फिल्म बना रहा हूं तो स्वाभाविक तौर पर भाषण आ जाएगा। मैं उसे डरा नहीं। मुझे उतनी बातें कहनी थीं। मुझे कलक्टर के फोन आए। उन्होंने पूछा कि मुंबई में रह कर आपने यह फिल्म कैसे बनाई? आपका गांव से क्या रिश्ता रहा है? कैसे आपने इतने विस्तार में सब कुछ दिखाया। उन्होंने मुझे अपने इंस्टीट्यूट में भाषण देने के लिए बुलाया। आईएएस ऑफिसर जब नौकरी में जाएं तो उन्हें गांव के लिए क्या करना चाहिए? मैंने हाथ जोड़ लए। मैंने कहा कि मैं फिल्ममेकर हूं। अगर आपको मेरी फिल्म में कोई बात लगती है तो प्लीज फिल्म की स्क्रीनिंग रखिए आप उनके लिए। हर फिल्म के अपने प्लस और माइनस पाइंट होते हैं। अगर हम अपने बचपन में लौटें। फिल्म देखने की लोकप्रिय रुचि की बात करें तो सबसे पहले आता है रोमांस, फिर आता है एक्शन, एक्रशन के बाद मर्डर मिस्ट्री, मर्डर मिस्ट्री के बाद कॉमेडी, कॉमेडी के बाद फैमिली ड्रामा और उसके बाद आता है सोशल ड्रामा। सबसे नीचे है सोशल ड्रामा। यह फिल्म करते समय शाहरुख समेत किसी के दिमाग में यह बात नहीं थी कि हम 'दिलवाले ...' का रिकॉर्ड तोड़ने वाले हैं। हो ही नहीं सकता। या तो फिल्म का टाइटल होता 'दिल है स्वदेस' ... या 'स्वदेस है मेरे दिल में' ... दर्शकों को लगता है कि रोमांस है। मुझे मालूम था कि फिल्म का यही हश्र होगा। मेरा बॉक्स ऑफिस का कलेक्शन नहीं था। मेरा डर था कि फटके नहीं पड़ने चाहिए... मैंने सोचा पूरा रिसर्च कर फिल्म बनाना चाहिए। पहले सोशल ड्रामा में एक सवाल के साथ फिल्म खत्म होती थी। मुझे सवाल नहीं पूछना था या आप सोचिए नहीं कहना था... मैंने अपने हिसाब से शिक्षा और स्वावलंबन की बात की।

आपके लिखने की प्रक्रिया क्या रहती है। मुंबई से बाहर जाकर लिखते हैं?

नहीं, मैं मुंबई के बाहर नहीं जाता। अभी लिख रहा हूं। आप से अभी बातें करते हुए कुछ चीजें सूझी हैं 'जोधा अकबर' के लिए। वह लिखूंगा। मैं अलग-थलग होकर नहीं लिख सकता।मुझे कंसेप्ट के लिए वक्त लगता है। कंसेप्ट आ जाने पर मैं कहीं भी लिख सकता हूं। मेरा काम चलता ही रहता है। मैं फोन पर, पीसी पर, लैपटॉप पर आए विचार नोट करता रहता हूं। मैं बच्चों के साथ भी बैठता हूं तो लिख देता हूं। मेरे लिए लिखने की प्रक्रिया है। के पी सक्सेना को स्क्रिप्ट देता हूं तो वे पहले ड्राफ्ट के लिए बीस दिन और दूसरे ड्राफ्ट के पंद्रह दिन लेते हैं। वे यहां आते नहीं हैं। वे लखनऊ में ही लिखते हैं। 'लगान' के बाद मैंने सभी फिल्म शोध पूर्ण लिखी हैं।

युवा निर्देशकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?

फिल्मों का अध्ययन करें। फिल्मों पर किताबें पढ़ें। इंटरटेनमेंट के जरिए किताबें, लेख खोजें। फिल्म पढ़ें। या फिर फिल्म स्कूल में दाखिला लेकर आएं। किसी भी निर्देशक से मिलते समय अपनी जानकारी का परिचय दें।

क्या फिल्म प्रशिक्षण का विकेन्द्रीकरण नहीं होना चाहिए?

इस संबंध में सोचना पड़ेगा। आप ने अच्छी बात उठायी है। क्षेत्रीय सिनेमा का नुकसान हुआ है। सब कुछ मुंबई में केन्द्रित हो गया है।


Sunday, May 11, 2008

घर का द्वार खोल दिया है: अमिताभ बच्चन

इन दिनों अमिताभ बच्चन आक्रामक मुद्रा में हैं। ऐसा लगता है कि वे किसी भी आरोप, प्रश्न या आशंका पर चुप नहीं रहना चाहते।

आजकल आपकी ब्लॉगिंग की बहुत चर्चा है। यह माध्यम आपके संपर्क में कब आया?

-हाल ही में। यह बहुत अच्छा माध्यम है। हम अपने प्रशंसकों के साथ व्यक्तिगत संपर्क कर सकते हैं। यह मुझे बहुत अच्छा लगता है। जैसे आप और हम अभी आमने-सामने बैठकर बातें कर रहे हैं, उसी तरह हम प्रशंसकों के साथ बातें कर सकते हैं।
आपके ब्लॉग पर लोगों के कमेंट्स में पूछा जा रहा है कि बच्चन जी क्या हिंदी में ब्लॉगिंग नहीं कर सकते?

-हां, अवश्य करेंगे। यह टेक्नोलॉजी मेरे लिए नई है। मेरे कंप्यूटर में अभी वह सॉफ्टवेयर नहीं है जो हिंदी में कनवर्ट कर देता है। वह अभी बन रहा है। जैसे ही बन जाएगा, उसके बाद हम सीधे हिंदी में भी लिखेंगे।
एक सवाल हवा में है कि बच्चन जी ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्यों वे ब्लॉग पर सभी के जवाब लिख रहे हैं? ऐसी स्थिति क्यों आ गई?

-क्यों परेशान हो रहे हैं? कैसी स्थिति आ गई है? ये मेरा जीवन है, उसे मैं अपने ढंग से व्यतीत करना चाह रहा हूं। मुझे अब एक जरिया प्राप्त हो गया है, जिससे मैं अपनी भावनाओं को जनता के लिए व्यक्त कर सकता हूं। उन्हें मैं व्यक्त कर रहा हूं। अगर अच्छा लगता है तो पढ़ें। नहीं अच्छा लगता है तो न पढ़ें।
ब्लॉग का माध्यम बहुत ही उचित है। इससे आप लिखने लगे हैं। शायद एक साथ बहुत कम बार ऐसा मौका मिला हो, जब लिखा हो आपने।

-कई इंटरव्यू हैं, उनको मैं स्वयं लिखता हूं। मैं बहुत कम इस तरह से बैठ कर बात करता हूं। मेरे पास समय का थोड़ा अभाव भी रहता है, इसलिए मैं प्रश्नों को मंगवा लेता हूं फिर उत्तर दे देता हूं। इसका रिकॉर्ड भी रखता हूं। जो बात मैंने कही अब उसको मैं ब्लॉग पर डाल देता हूं, ताकि लोगों को पता चले कि मैंने क्या कहा और किस तरह से पत्रकारों ने उसको छापा।
आप ब्लॉग लिख रहे हैं तो कुछ ऐसी चीजें भी सामने आएंगी जो अमूमन लोग आप से पूछ नहीं पाते हैं?

-यह तो मैंने कई बार कहा है कि यह मेरा अखबार है। एक बार खुल गया है तो इसमें अच्छी बातें आएंगी, बुरी बातें आएंगी, अश्लील बातें भी आएंगी, लोगों को खेद होगा, बहुत सी बातों पर रोष होगा, उन सब बातों का मैं उत्तर दूंगा। यदि उत्तर देने लायक हो तो। मैंने कोई मॉडरेटर बीच में नहीं डाला है। हालांकि वेबसाइट ऑनर का कहना है कि हमारे यहां ऐसा मॉडरेटर है, जो आप की अनचाही या नापसंद चीजों को डिलीट कर सकता है। मैंने कहा कि यह बात मत कीजिए। यदि मैंने अपने घर का द्वार खोल दिया है तो सब को आमंत्रण है, आएं। लिखें।
आपके ब्लॉग को पढ़ते हुए मैंने एक बात महसूस की कि आप अपने स्वर्गीय पिता हरिवंश राय बच्चन के बहुत करीब हैं।

-मन के अंदर कोई बात होगी और वह पिता जी से संबंधित होगी तो उसके बारे में लिखा ही जाएगा। वह हमारे प्रत्येक क्षण, प्रत्येक सांस में समाए हुए हैं तो उनकी बात तो निकलेगी ही।
आपके पिता ने एक बार कहा था कि कभी किसी समारोह में जाओ तो पहली पंक्ति में मत बैठना?

-मत बैठने की बात नहीं कही थी। उन्होंने कहा था, जिस समारोह में जाओ, आखिरी पंक्ति में बैठो, क्योंकि वहां से हटाए जाओगे तो आगे ही जाओगे।
यह बात आपके जीवन में कितनी सच हो पाई?

-मैं तो हमेशा जाकर पीछे बैठता हूं।
आगे कभी नहीं बैठते हैं?

-कोई जबरदस्ती वहां बैठा दे तो मुझे बड़ा अजीब लगता है। आम तौर पर मैं तो चाहूंगा कि मैं पीछे रहूं।
उनकी दो बातें आप बार-बार उद्धृत करते हैं। 'मन का हो तो बहुत अच्छा न हो तो ज्यादा अच्छा' दूसरी 'जब तक जीवन है,तब तक संघर्ष है'। क्या अभी भी यही दोनों आधार बातें हैं?

-बिल्कुल, अंतिम सांस तक. जब तक जीवन रहेगा, तब तक संघर्ष रहेगा।
पिता जी की किताबों के अलावा ऐसी कौन सी किताबें हैं जो आपको प्रिय रही हैं या जिन्होंने आपको प्रभावित किया हो?

-ज्यादातर पिता जी के लेखन को ही पढ़ता आया हूं। उससे प्रभावित होता रहा हूं। स्कूल-कॉलेज के जमाने में, चाहे वह शेक्सपियर हो या अंग्रेजी लिटरेचर हो या प्रेमचंद हों चाहे सुमित्रा नंदन पंत हों या निराला हों, इन सबको हमने पढ़ा। ज्यादातर आत्मकथा को पढ़ने में आनंद आता है। बहुत से ऐसे प्रख्यात लोग हैं विश्व में जिनकी अपनी कहानी अपने ही शब्दों में पढ़ने से अत्यंत सुख प्राप्त होता है। बहुत कुछ सीखने को मिलता है। हालांकि मैं अभी भी यही कहूंगा कि बाबूजी के लेखन के सामने वह शून्य के बराबर हैं।
जीवनी में ऐसी कोई खास रुचि की वजह है?

-पता चलता है कि किस तरह एक महत्वपूर्ण इंसान जिसने समाज में अपना नाम कमाया हो, उसने अपना जीवन कैसे व्यतीत किया। उसके जीवन में क्या-क्या समस्याएं आई। क्या-क्या हर्ष के समय आए। सुख-दुख सब चीजों का वर्णन होता है। उसको पढ़ने में आनंद आता है।
आधिकारिक रूप से अपनी जीवनी लिखने की अनुमति अभी तक आपने किसी को दी है?

-नहीं। मैं ऐसा मानता हूं कि मेरे जीवन में ऐसा कुछ नहीं है, जिसके बारे में कुछ लिखा जा सकता है।
जया जी के बारे में कुछ बताएंगे? उनकी व्यस्तताएं क्या हैं आजकल?

-वे पार्लियामेंट में हैं और फिल्में भी करती हैं। अद्र्धागिनी के तौर पर हम सब का ध्यान रखती हैं और घर संभालती हैं।
विभिन्न मुद्दों पर आखिरी फैसला किसका होता है, आपका या जया जी का?
-हम सब मिल-जुल कर रहते हैं। हम सब परिवार हैं।

ऐसा कहा जाता है कि निर्णय लेने में आप थोड़ी देर लगाते हैं?

-हां, मैं निर्णय जल्दी नहीं ले पाता हूं। सोचता हूं ज्यादा।
निर्णय के परिणाम के बारे में सोचने लगते हों शायद?

-हां, कभी-कभी निर्णय नहीं ले पाता हूं।
ऐसी स्थितियों में कौन..?

-यह सब व्यक्तिगत बातें हैं, इसके ऊपर हम चर्चा नहीं करेंगे।
जैसे अभी परिवार के सभी सदस्य व्यस्त हैं। देश क्या, दुनिया के अलग-अलग कोने में रहते हैं। ऐसी स्थिति में पारिवारिक निर्णयों के लिए आधुनिक उपकरणों का सहारा लेना पड़ता होगा?

-क्यों नहीं कंप्यूटर है, फोन है, इंटरनेट है। बात कर लेते हैं। छवि देख लेते हैं, ऐसा लगता है कि आमने-सामने बैठकर बात कर रहे हैं। हम प्रति दिन ऐसे ही बात करते हैं।
वेबकैम के जरिए बात होती होगी?

-नहीं, स्पाइक के जरिए। स्पाइक एक सॉफ्टवेयर है, उसके थ्रू बात करते हैं।
-कितने टेक्नोसैवी हो गए हैं अभी आप, पहले घबराते थे?

-ज्यादा नहीं, किसी तरह अब संभाल लेते हैं।
मुझे याद है, एक इंटरव्यू आपके ऑफिस में किया था तो आपने कहा था कि आपकी नातिन जो है, वो ज्यादा जानती है।
-हां, वह ज्यादा जानती हैं।

कितने आध्यात्मिक या धार्मिक हैं आप?

-जितना होना चाहिए हमारी समझ में, उतना ही हम हैं। धर्म और अध्यात्म के बारे में मैं बात नहीं करना चाहूंगा। वह विचार बहुत व्यक्तिगत होते हैं, आपके माध्यम से सार्वजनिक हो जाएंगे। मैं नहीं चाहता हूं कि धर्म की बात पर सार्वजनिक रूप से चर्चा करूं।
कोई ऐसा शौक जिसको आप अब इस उम्र में पूरा करना चाहते हों?

-चाहता हूं कि कोई वाद्य यंत्र सीख पाऊं।
कोई ऐसी चीज जो रह गई हो आपके मन में, जो पूरी करनी बाकी हो?

-संगीत में शिक्षा। यह बाकी है अभी।
कौन सा संगीत?

-शास्त्रीय संगीत हो या कोई भी ऐसा संगीत हो। शास्त्रीय संगीत हो जाए तो बहुत अच्छा है। उसके बाद जितने और संगीत हैं, वो सीखेंगे।
पिता जी पर कुछ करने की योजनाएं, कोई फिल्म या बायोपिक जैसी फिल्म?

-बहुत सी चीजें हैं मन के अंदर। धीरे-धीरे हम उनको व्यक्त करेंगे।
कोई ऐसी योजना है, जिसमें कोई लाइब्रेरी या रिसर्च सेंटर या ऐसा कुछ?

-सोच-विचार चल रहा है और धीरे-धीरे समय से उसको हम अंकित करेंगे।
किसी विश्वविद्यालय के सहयोग से भी ऐसा हो सकता है?

-वह भी सब बताएंगे। विश्वविद्यालय के सहयोग से हो या व्यक्तिगत हो या कैसा हो, उसको बताएंगे। अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
अभी कोई योजना नहीं है?

-चल रही है, इसके बारे में हम अभी चर्चा नहीं कर सकते हैं!
खुद को आप कितना सामाजिक मानते हैं?

-जहां तक करना चाहिए, जितना मैं ठीक समझता हूं, उसे मैं करता हूं। हो सकता है कि मेरा जो रवैया है, वह कुछ लोगों को नापसंद हो।
..लेकिन आपके आचरण में कभी अहंकार तो दिखा नहीं? इसके बावजूद क्यों दुर्भावना पैदा हो जाती है बार-बार?

-जो पैदा करते हैं, उनसे पूछिए। मैं तो पैदा कर नहीं रहा हूं।
कुछ तो सोचा या समझा होगा आपने?

-जब है ही नहीं मेरे अंदर तो उसमें सोचने की क्या जरूरत है। क्यों समय बरबाद करें हम अपना।
इधर आप एक अलग किस्म से फिर से चर्चा में हैं। यह उत्तेजना अचानक तो नहीं होगी। इसके पीछे कुछ आधार होगा?

-मेरी समझ में नहीं आता कि पत्रकार जो हैं, मीडिया जो है, वो इतनी उत्सुक क्यों है? इस तरह के प्रश्न क्यों पूछती है? जब नहीं बोलते हैं तो बोलती है कि आप बोलते नहीं हैं। जब बोलते हैं तो कहते हैं कि आप क्यों बोल रहे हैं? इसीलिए कहीं न कहीं मुझे इसका निर्णय करना पड़ेगा कि मैं जब चाहूंगा बोलूंगा। मैं जब चाहूंगा, नहीं बोलूंगा।
टाइम्स ऑफ इंडिया के लेख में आपने असहमति की रक्षा की बात की है। क्या संदर्भ है उसका?

-पत्रकारों के लिए मैंने कहा था जो आपका लेखन है, उससे मैं सहमत हूं या असहमत हूं, यह मेरा अधिकार है। लेकिन आपका जो अधिकार है, लिखने का, उसके लिए मैं अपनी जान देने के लिए तैयार हूं।
अगर इस ढंग का भाव है तो फिर असहमति और मतभेद क्यों हो जाता है?

-होता है, क्योंकि आपका अधिकार अलग है, मेरा अधिकार अलग है। मेरा विचार अलग है या आपकी सोच अलग है। प्रजातंत्र का नागरिक होने के नाते यह मेरा अधिकार है।आप जो कहें उससे मैं हर बार तो सहमत नहीं हो सकता हूं, न ही हर बार आप मेरी बात से सहमत हो सकते हैं।
कोई गाइड लाइन तय की जा सकती है क्या? मीडिया और स्टार के बीच क्या रिलेशन हो? किस हद तक हो?

नहीं, बिल्कुल नहीं। कभी होनी भी नहीं चाहिए।
क्या अभिनय अनुभवों को ही फिर से जीना है?

-ऐसा मैं नहीं मानता हूं। लेकिन यदि हमारे पास कोई अनुभव हो किसी एक वाकये का तो उसे अभिनय में लाना कोई बुरी बात नहीं है।
क्या आपने अभिनय की कोई औपचारिक ट्रेनिंग ली थी?

-जी नहीं।
एक्टर आजकल ट्रेंड होकर आते हैं। अभिनय के लिए प्रशिक्षण को कितना जरूरी मानते हैं आप?

-मैं यह नहीं कहता हूं कि यह जरूरी है, लेकिन मैं कहता हूं कि यह अच्छी बात है।
हिंदी फिल्मों का अभिनेता होने के लिए क्या गुणवत्ता होनी चाहिए?

-सबसे पहले भाषा सीखें। आजकल की जो नई पीढ़ी है, मुझे लगता है कि उनके उच्चारण में काफी गलतियां हैं। अभिषेक से लेकर जितने भी हैं, उन सबको सबसे पहले मैं यही कहता हूं कि भाषा सीखो।
आपके प्रोडक्शन हाउस में क्या चल रहा है?

-प्रोडक्शन चल रहा है। फिल्में चल रही हैं। ज्वाइंट प्रोडक्शन हैं। यूटीवी के साथ हैं। रिलायंस के साथ हैं और धीरे-धीरे आगे बढ़ेंगे।
अभिषेक कितना ध्यान रख रहे हैं एबीकॉर्प का या पारिवारिक जिम्मेदारियों का?

-पूरा, परिवार के सभी लोग हमारी कंपनी के साथ जुड़े हुए हैं। अपनी राय देते हैं। हमारे बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स पर हैं। वो सब सोच-विचार डालते हैं उसमें।
आप कैसी फिल्म करेंगे? यह फैसला अभी आप करते हैं या सब लोग मिलकर?

-हमारे पास निमंत्रण आता है तो हम उस पर डिस्कस करते हैं, सब के सामने। कुछ की राय अच्छी होती है, कुछ की नहीं। हम लोग एक कॉमन राय लेकर आगे बढ़ जाते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि हम राय नहीं लेते हैं।
सबसे पहले कौन सा प्रोजेक्ट फ्लोर पर आने वाला है?

-अभी 'शूबाइट' है सुजीत सरकार की यूटीवी के साथ। फिर कुछ और फिल्में आएंगी।
आप बार-बार कहते हैं कि अब फिल्म मेरे कंधे पर नहीं रहती है, इसलिए फिल्म करना बहुत आसान है मेरे लिए?

-आसान नहीं है, फिल्म करना कभी भी आसान काम नहीं है। फिल्म का पूरी तरह से श्रेय, जो हमारे कंधों पर पहले होता था, वह अब बंट गया है। बोझ थोड़ा कम हो गया है। हल्का हो गया है। हमारे साथ और लोग रहते हैं फिल्म में।
आपको लगता है कि आप अब अकेले कोई फिल्म लेकर कर आगे नहीं जा सकते?

-अब बहुत सी चीजें जोड़नी पड़ती हैं साथ में। सहकलाकारों को लेना पड़ता है। जो मुझ से ज्यादा प्रचलित कलाकार हैं, उनको लिया जाता है। मार्केटिंग के लिए फिल्म को बेचने के लिए। फिल्म को एक बड़ी रूप-रेखा देने के लिए सब करना पड़ता है।
लेकिन आप तो मानेंगे कि आपकी वजह से हिंदी फिल्मों का जो कहानी लिखने का तरीका था, वह बदला। पहले किसी भी बुजुर्ग कलाकार को, जिन्हें कैरेक्टर आर्टिस्ट कह दिया जाता था, केंद्र में रख कर फिल्में नहीं लिखी जाती थी?

-बिल्कुल गलत धारणा है आपकी। दादा मुनि अशोक कुमार जी, बलराज साहनी, मोती लाल के लिए फिल्में लिखी जाती थी। वह सब सक्षम कलाकार रहे, उनके जैसा कभी हुआ नहीं कलाकार फिर से।
शायद मैं आपके जवाब से मतभेद रखूं। मेरा मानना है कि केबीसी के बाद वाले फेज में जिस ढंग से फिल्में लिखी गई अमिताभ बच्चन को लेकर, वैसा हिंदी फिल्मों के इतिहास में कभी नहीं हुआ।
-ऐसा आप मानना चाहते हैं, मैं नहीं मानता हूं।
तर्क देंगे?

-है ही नहीं कोई, कितनी फिल्में मैं कर रहा हूं। 'अलादीन' मैं कर रहा हूं, इसमें रितेश देशमुख, संजय दत्त हैं। इससे पहले भी कितनी फिल्में हुई हैं, 'सरकार राज' में अभिषेक हैं, ऐश्वर्या हैं। प्रमुख भूमिका मेरी नहीं है।
चलिए तर्क-वितर्क नहीं करते हैं। सिर्फ फिल्म के नाम ही देखें, तो भूतनाथ के बारे में क्या कहेंगे?

-कोई जरूरी नहींहै कि जिसके नाम पर है, वही महत्वपूर्ण हो फिल्म में।
फिल्मों की बात करें तो ऐसी कौन सी फिल्म है, जिन्हें आप संजोकर रखना चाहते हैं? अगर मैं गिफ्ट के तौर पर तीन-चार फिल्म आपकी मांगूं तो?

-डेढ़ सौ फिल्मों में से तीन-चार फिल्मों को निकालना बड़ा मुश्किल काम है। मैं चाहूंगा कि आप सभी फिल्में रखें अपने दिल के अंदर। मैं तो ऐसा मानता हूं सभी फिल्में मेरे लिए आकर्षक है और मेरा जो भी छोटा-बहुत योगदान रहा है उनमें, उसकी मैं सराहना करता हूं।

Saturday, May 10, 2008

क्या अपनी फिल्में देखते हैं यश चोपड़ा?


-अजय ब्रह्मात्मज


फिल्म टशन की रिलीज और बॉक्स ऑफिस पर उसके बुरे हश्र के बाद यही सवाल उठ रहा है कि क्या यश चोपड़ा अपनी फिल्में देखते हैं? चूंकि वे स्वयं प्रतिष्ठित निर्देशक हैं और धूल का फूल से लेकर वीर जारा तक उन्होंने विभिन्न किस्म की सफल फिल्में दर्शकों को दी हैं, इसलिए माना जाता है कि वे भारतीय दर्शकों की रुचि अच्छी तरह समझते हैं। फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि यशराज फिल्म्स की पांच फिल्मों में से चार औसत से नीचे और सिर्फ एक औसत या औसत से बेहतर फिल्म हो पा रही है। ऐसा तो नहीं हो सकता कि रिलीज के पहले ये फिल्में उनकी नजरों से नहीं गुजरी हों! क्या यश चोपड़ा की सहमति से इतनी बेकार फिल्में बन रही हैं?
नील एन निक्की, झूम बराबर झूम जैसी फिल्मों को देखकर कोई भी अनुभवी निर्देशक उनका भविष्य बता सकता है? खास कर यश चोपड़ा जैसे निर्देशक के लिए तो यह सामान्य बात है, क्योंकि पिछले 60 सालों में उन्होंने दर्शकों की बदलती रुचि के अनुकूल कामयाब फिल्में दी हैं। वीर जारा उनकी कमजोर फिल्म मानी जाती है, लेकिन टशन और झूम बराबर झूम के साथ उसे देखें, तो कहना पड़ेगा कि वह क्लासिक है।
दिल तो पागल है के समय यश चोपड़ा ने अपने बेटे के दबाव और प्रभाव में आकर अपनी शैली बदली। फिर भी हिंदी फिल्मों की पारंपरिक संवेदना यश चोपड़ा निर्देशित फिल्मों में बनी रही। यहां तक कि आदित्य की फिल्में भी नवीनता के आग्रह के बावजूद पारंपरिक ढांचे में ही बनी हैं। उनकी प्रस्तुति में आधुनिकता है। शिल्प पुराने अंदाज का ही है। फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि आदित्य की देख-रेख में बनी फिल्म बेकार साबित हो रही हैं?
जबरदस्त प्रचार, सितारों की भीड़ और टशन टीम के अहंकार से लग रहा था कि यशराज फिल्म्स की नायाब फिल्म आ रही है। इस फिल्म के निर्देशक ने रिलीज से पहले मीडिया से कोई बात नहीं की और अब उनसे मीडिया यह पूछने के लिए भी तैयार नहीं है कि उन्होंने इतनी खराब फिल्म क्यों बनाई? यशराज फिल्म्स ने अपने हिसाब से मनोरंजन का महल खड़ा करने की कोशिश की थी, लेकिन पहले ही दिन दर्शकों के पांव रखते यह महल ढह गया। फिल्म की इस नियति की कल्पना निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य, निर्माता आदित्य चोपड़ा और यश चोपड़ा ने नहीं की होगी।
अगर यशराज फिल्म्स से आ रही खबरों पर यकीन करें, तो फिल्मों के चुनाव और प्रस्तुति के मामले पर पिता यश चोपड़ा और पुत्र आदित्य के बीच लंबे समय से मनमुटाव चल रहा है। यश चोपड़ा की हर सलाह अनसुनी हो जाती है। यहां तक कि उनके सुझाए ऐक्टर और सब्जेक्ट भी आदित्य की टीम के लिए मायने नहीं रखते। उन पर विचार ही नहीं किया जाता। आदित्य यशराज फिल्म्स के क्रिएटिव कमांडर हैं। केवल उनके ही आदेश पर अमल होता है। यश चोपड़ा अपने प्रोडक्शन हाउस के सिग्नेचर मात्र रह गए हैं। न ही उनसे कुछ पूछा जाता है और न ही राय पर गौर किया जाता है।
दरअसल.., टशन की असफलता वह खतरे की घंटी है, जिसकी गूंज यशराज फिल्म्स के हर कोने में सुनाई पड़ी है। गहरा मंथन और विचार चल रहा है कि आखिर यशराज फिल्म्स किस प्रकार की फिल्में लेकर आए? इस साल रोडसाइड रोमियो एनिमेशन फिल्म और कुणाल कोहली की थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक रिलीज होगी। साल के अंत तक आदित्य चोपड़ा निर्देशित फिल्म रब ने बना दी जोड़ी आएगी। उम्मीद रखनी चाहिए कि आदित्य फिर से यशराज फिल्म्स को मनोरंजन की पटरी पर ले आएंगे, लेकिन अभी तो यशराज की गाड़ी पटरी से उतरी दिख रही है!

मिमोह ने खुद को साबित किया अच्छा डांसर

पहले यह जान लें कि जिम्मी मिथुन चक्रवर्ती के बेटे मिमोह चक्रवर्ती की पहली फिल्म है। किसी भी स्टार सन की पहली फिल्म में निर्देशक की कोशिश रहती है कि वह स्टार सन के टैलेंट को अच्छी तरह से दिखाए। जिम्मी देखने के बाद कह सकते हैं कि मिमोह अच्छे डांसर हैं और एक्शन दृश्य में भी सही लगते हैं। जहां तक एक्टिंग और इमोशन का मामला है तो अभी उन्हें मेहनत करनी होगी। जिम्मी के पिता ने बिजनेस फैलाने के लिए कर्ज में भारी रकम ली थी और बिजनेस में कामयाब नहीं होने पर दिल के दौरे से उनकी मृत्यु हो गयी। अब जिम्मी की जिम्मेदारी है कि वह उनके कर्ज को चुकाए। ज्यादा पैसे कमाने के लिए वह दिन में आटोमोबाइल इंजीनियर और रात में डीजे का काम करता है। उसे हर समय डांस करते ही दिखाया गया है। जिम्मी एक साजिश का शिकार होता है। खुद को निर्देष साबित करने में वह अपने एक्शन का हुनर भी दिखाता है। निर्देशक ने जिम्मी को ज्यादा इमोशनल सीन नहीं दिए हैं। शायद वह मिमोह की सीमाओं को जानते होंगे। अमूमन स्टार सन की फिल्म का पैमाना बड़ा होता है। मिमोह को यह सौभाग्य नहीं मिला। सीमित बजट की फिल्म में दोयम दर्जे के सहयोगी कलाकारों से काम लिया गया है। यही कारण है कि फिल्म का ड्रामा प्रभावित नहीं करता। कमजोर पटकथा और शिल्प के कारण मिमोह चक्रवर्ती उभर नहीं पाए हैं। निर्देशन पर राज एन। सिप्पी की पकड़ ढीली हो चुकी है। वह दो दशक पहले की फिल्मों जैसे दृश्यों की ही परिकल्पना करते हैं। नतीजतन फिल्म बेअसर साबित होती है। मिमोह को अभी इमोशन, आवाज, संवाद अदायगी पर काम करने की जरूरत है। उनके लंबे बाल अच्छे नहीं लगते। कहा जा सकता है कि उनके लुक पर भी मेहनत नहीं की गयी है। हां, डांस करते हुए मिमोह प्रभावित करते हैं और ऐसा लगता है कि उसमें उनका मन भी रमता है, लेकिन हिन्दी फिल्मों के हीरो को डांस के साथ बहुत कुछ करना पड़ता है.

डरावनी फिल्म नहीं है भूतनाथ

-अजय ब्रह्मात्मज
बीआर फिल्म्स की भूतनाथ डरावनी फिल्म नहीं है। फिल्म का मुख्य किरदार भूत है, लेकिन उसे अमिताभ बच्चन निभा रहे हैं। अगर निर्देशक अमिताभ बच्चन को भूत बना रहे हैं तो आप कल्पना कर सकते हैं कि वह भूत कैसा होगा? भूतनाथ का भूत नाचता और गाता है। वह बच्चे के साथ खेलता है और उससे डर भी जाता है। इस फिल्म का भूत केवल निर्दोष बच्चे की आंखों से दिखता है।
निर्देशक विवेक शर्मा ने एक बच्चे के माध्यम से भूत के भूतकाल में झांक कर एक मार्मिक कहानी निकाली है, जिसमें रवि चोपड़ा की फिल्म बागवान की छौंक है। बंटू के पिता पानी वाले जहाज के इंजीनियर हैं, इसलिए उन्हें लंबे समय तक घर से दूर रहना पड़ता है। वे अपने बेटे और बीवी के लिए गोवा में मकान लेते हैं। उस मकान के बारे में मशहूर है कि वहां कोई भूत रहता है। मां अपने बेटे बंकू को समझाती है कि भूत जैसी कोई चीज नहीं होती। वास्तव में एंजल (फरिश्ते) होते हैं। फिल्म में जब भूत से बंकू का सामना होता है तो वह उसे फरिश्ता ही समझता है। वह उससे डरता भी नहीं है। भूत और बंटू की दोस्ती हो जाती है और फिर बंकू की मासूमियत भूत को बदल देती है। इस सामान्य सी कहानी में बागवान का इमोशन डाला जाता है, जहां संतान मां-बाप के प्रति लापरवाह दिखाए जाते हैं। दर्शकों के बीच हय इमोशन प्रभावी सिद्ध होता है। भूतनाथ में आखिरकार श्राद्ध संपन्न किया जाता है और भूत को मुक्ति मिल जाती है।
विवेक शर्मा ने भूत और बच्चे की दोस्ती की इमोशनल कहानी अच्छे तरीके से चित्रित की है। हालांकि भूत की धारणा ही अवैज्ञानिक है। लेकिन फिल्मों और किस्सों में ऐसी कहानियों से मनोरंजन होता है। विवेक शर्मा का भूत चमत्कार नहीं करता और न ही बंकू से दोस्ती हो जाने पर उसे अव्वल स्थिति में ला देता है। बंकू एक बार कुछ करने के लिए कहता है तो भूत का जवाब होता है। जिंदगी में मैजिक नहीं होता, मेहनत होती है। मेहनत और क्षमा का संदेश देती यह फिल्म बुजुर्गो की कद्र और देखभाल की भी वकालत करती है।
फिल्म में भूतनाथ और बंकू के किरदारों में अमिताभ बच्चन और अमन सिद्दिकी ने उपयुक्त लगते हैं। दोनों की दोस्ती के भावुक क्षण और दृश्य रोचक हैं। शाहरुख खान अतिथि भूमिका में हैं, इसलिए औपचारिक तरीके से काम कर निकल गए हैं। जूही चावला निराश नहीं करतीं। राजपाल यादव और प्रियांशु चटर्जी के किरदारों का निर्वाह नहीं हो पाया है। लगता है कि दोनों के दृश्य कटे हैं या फिर उनके किरदारों को विकसित नहीं किया गया है।
फिल्म के अंत में बताया गया है कि इसका सिक्वल आ सकता है। यह देखना रोचक होगा कि विवेक शर्मा अगली फिल्म की कहानी किस दिशा में मोड़ते हैं।

Friday, May 9, 2008

बॉक्स ऑफिस:०८.०५.२००८

फिल्म कामेडी हो या सस्पेंस या फिर सामाजिक रूप में प्रासंगिक, दर्शक उन्हीं फिल्मों को पसंद करते हैं, जो अच्छी बनी हो। पिछले हफ्ते की रिलीज फिल्मों को देखें तो तीनों फिल्में अलग-अलग मिजाज की थीं। उम्मीद की जा रही थी कि कामेडी और सस्पेंस को ठीक-ठाक दर्शक मिल जाएंगे, लेकिन अफसोस की बात है कि तीनों ही फिल्में बाक्स आफिस पर गिर पड़ीं।
आश्चर्य ही हो रहा है कि किसी भी फिल्म को 25 प्रतिशत से अधिक की ओपनिंग नहीं मिली। प्रणाली का विषय अच्छा था, पर फिल्म इतनी बुरी थी कि कुछ दर्शक इंटरवल के बाद थिएटर में नहीं लौटे। मिस्टर ह्वाइट और मिस्टर ब्लैक की कामेडी दर्शकों को नहीं भायी। अरशद वारसी और सुनील शेट्टी की जोड़ी दर्शकों को पसंद नहीं आई। अनामिका का सस्पेंस इतना ठहरा हुआ था कि दर्शक ऊब गए।
तात्पर्य यह कि तीनों ही फिल्मों को दर्शकों ने नकार दिया। फिल्मों में ऐसा आकर्षण नहीं है कि अब कोई उम्मीद की जा सके।
पहले की फिल्मों में टशन ने यशराज फिल्म्स को गहरा झटका दिया। फिल्म एक हफ्ते के बाद मल्टीप्लेक्स में रिलीज हुई, लेकिन तब तक इतना कुप्रचार हो चुका था कि दर्शक पहुंचे ही नहीं। ट्रेड विशेषज्ञों के मुताबिक टशन छोटे शहरों में अच्छा बिजनेस कर रही है, लेकिन वह औसत कारोबार ही कर पाएगी। टशन के साथ रिलीज हुई सिर्फ तो सिनेमाघरों से उतर भी चुकी है।
इस हफ्ते अमिताभ बच्चन की भूतनाथ और मिमोह चक्रवर्ती की जिम्मी आ रही है।

Wednesday, May 7, 2008

प्रकाश झा से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

पहली सीढ़ीमैं प्रवेश भारद्वाज का कृतज्ञ हूं। उन्होंने मुझे ऐसे लंबे, प्रेरक और महत्वपूर्ण इंटरव्यू के लिए प्रेरित किया। फिल्मों में डायरेक्टर का वही महत्व होता है, जो किसी लोकतांत्रिक देश में प्रधानमंत्री का होता है। अगर प्रधानमंत्री सचमुच राजनीतिज्ञ हो तो वह देश को दिशा देता है। निर्देशक फिल्मों का दिशा निर्धारक, मार्ग निर्देशक, संचालक, सूत्रधार, संवाहक और समीक्षक होता है। एक फिल्म के दरम्यान ही वह अनेक भूमिकाओं और स्थितियों से गुजरता है। फिल्म देखते समय हम सब कुछ देखते हैं, बस निर्देशक का काम नहीं देख पाते। हमें अभिनेता का अभिनय दिखता है। संगीत निर्देशक का संगीत सुनाई पड़ता है। गीतकार का शब्द आदोलित और आलोड़ित करते हैं। संवाद लेखक के संवाद जोश भरते हैं, रोमांटिक बनाते हैं। कैमरामैन का छायांकन दिखता है। बस, निर्देशक ही नहीं दिखता। निर्देशक एक किस्म की अमूर्त और निराकार रचना-प्रक्रिया है, जो फिल्म निर्माण \सृजन की सभी प्रक्रियाओं में मौजूद रहता है। इस लिहाज से निर्देशक का काम अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। श्याम बेनेगल ने एक साक्षात्कार में कहा था कि यदि आप ईश्वर की धारणा में यकीन करते हों और उसे महसूस करना चाहते हों या साक्षात देखना चाहते हों तो किसी निर्देशक से मिल लें। फिल्म निर्देशक धरती पर चलता-फिरता साक्षात ईश्वर होता है। अगर यह संसार ईश्वर की मर्जी से चलता है तो फिल्मों का तीन घंटों का यह माया संसार निर्देशक की मर्जी पर टिका रहता है। वह पूरी फिल्म के एक-एक दृश्य का सृजनहार होता है। अफ़सोस की बात है कि हिंदी फिल्मों में स्टार को महत्वपूर्ण स्थान मिल गया है। लेकिन निर्देशक आज भी पहचान के मोहताज हैं। इन दिनों निर्देशक अपनी गरिमा भी खो बैठे हैं। अब ये केवल किसी विचार, धारणा या प्रस्ताव को 'एक्सक्यूट' करते हैं। उसे बिकाऊ वस्तु बना देते हैं।प्रवेश भारद्वाज ने मुझे बार-बार उकसाया और अखबारों की नौकरी की सुविधाओं और प्रमाद से बार-बार झकझोरा। मुझे निर्देशक हमेशा से आकर्षित करते रहे हैं, इसलिए कहीं न कहीं मैं प्रवेश को सुनता और समझता रहा। इस सीरिज में कोशिश है कि हम निर्देशकों की तैयारी, मानसिकता और उस परिवेश को समझें, जिसमें उन्होंने निर्देशक बनने का ही फैसला किया। पहली फिल्म बन जाने और उसके बाद मिली पहचान के पश्चात की यात्रा से हम सभी कमोबेश परिचित होते हैं, लेकिन पहली फिल्म मिलने के पहले के अनिश्चय, आशंका, आत्मविश्वास और आत्मसंघर्ष से हम परिचित नहीं हो पाते। हर इंटरव्यू के पहले मैंने निर्देशकों से आग्रह किया कि वे अपने आरंभिक जीवन के प्रति नॉस्टेलजिक एटीट्यूड न रखते हुए सब कुछ बताएं।इस सीरिज की शुरुआत प्रकाश झा से हुई। उन्होंने इसे 'पहली सीढ़ी' नाम दिया। इसे संयोग ही कहें कि 'बया' के संपादक गौरीनाथ ने इस सीरिज के लिए पहला इंटरव्यू प्रकाश झा का ही मांगा। प्रकाश झा मेरे अग्रज और मार्गदर्शक हैं। विवादों और शंकाओं से जूझते हुए अपनी क्रिएटिव अस्मिता की धुरी पर टिके प्रकाश झा के योगदान का मूल्यांकन अभी नहीं किया जा सकता। उन्होंने हिंदी सिनेमा को नई भाषा दी है।प्रकाश झा से मेरी मुलाकात अग्रज सुमंत मिश्र के साथ हुई थी। वे बिहार से लौटकर आए थे और मुंबई में खुद को फिर को फिर से संजो रहे थे। उन्होंने 'बंदिश' की तैयारी शुरु कर दी थी। पहली मुलाकात बेहद औपचारिक थी। तब तक मैंने तय नहीं किया था कि फिल्मों पर ही लिखना है। हां, फ्रीलांसिंग के दबाव में फिल्मी हस्तियों से मिलने का क्रम आरंभ हो चुका था। 'मुंगेरी के भाई नौरंगीलाल' के समय प्रकाश झा से विस्तृत बातें हुईं। तब तक मैं श्याम बेनेगल के संपर्क में आ चुका था और दो-तीन निर्देशकों के साक्षात्कार कर चुका था। प्रकाश झा का रहस्यमय व्यक्तित्व मुझे अपनी ओर खींच रहा था। खासकर उनकी तीक्ष्ण मुस्कुराहट ... ऐसा लगता है कि कोई राज होंठों के कोनें में छिपा है। बस, वे बताने ही जा रहे हैं। ऐसी मुस्कुराहट के समय प्रकाश झा की आंखें सजल हो जाती हैं। बहरहाल, औपचारिकता टूटी और मैंने थोड़ा करीब से उन्हें देखा। हां, 'मृत्युदंड' के समय प्रकाश जी से गाढ़ा परिचय हुआ और उसके बाद से संपर्क और परिचय की सांद्रता में कभी कमी नहीं आई। मैंने जब इस इंटरव्यू की बात की तो उन्होंने झट से कहा, शुरू करो ... बोलो कब इंटरव्यू करना है। और इस तरह 'पहली सीढ़ी' की नींव पड़ी।

शुरू से बताएं। फिल्मों में आने की बात आपने कब और क्यों सोची?मैं तो दिल्ली यूनिवर्सिटी में फिजिक्स ऑनर्स की पढ़ाई कर रहा था। उस समय अचानक लगने लगा कि क्या यही मेरा जीवन है? ग्रेजुएशन हो जाएगा, फिर आईएएस ऑफिसर बनकर सर्विसेज में चले जाएंगे। पता नहीं क्यो वह विचार मुझे पसंद नहीं आ रहा था। काफी संघर्ष dरना पड़ा उन दिनों परिवार की आशंकाएं थीं। उन सभी को छोड़-लतार कर... बीच में पढ़ाई छोड़ कर मुंबई आ गया। पैसे भी नहीं लिए पिताजी से... पिताजी से मैंने कहा कि जो काम आप नहीं चाहते मैं करूं, उस काम के लिए मैं आप से पैसे नहीं लूंगा। चलने लगा तो घर के सारे लोग उदास थे... नाराज थे। मेरे पास तीन सौ रूपये थे। मैं मुंबई आ गया... फिल्मो के लिए नहीं, पेंटिंग में रुचि थी मेरी। जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स का नाम सुना था। मैंने कहा कि वहीं जाऊंगा। वहां जाकर जीवन बनाऊंगा घर छोड़कर चला आया था। मंबई आने के बाद जीविका के लिए कुछ.कुछ करना पड़ा। ट्रेन में एक सज्जन मिल गए थे.राजाराम। आज भी याद है। दहिसर - मुंबई का बाहरी इलाका-में बिल्डिंग वगैरह बनाते थे। उनके पास यूपी जौनपुर के बच्चे रहते थे। वहीं हमको भी सोने की जगह मिल गई। दिन भर निकलते थे काम-वाम की खोज में।
आप तो जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स के लिए मुंबई आए थे न? फिर काम-वाम की खोज...?जे जे गया तो पता चला कि वहां सेमेस्टर शरू होने में थोड़ा वक्त लगेगा। मेरे पास एक कैमरा होता था। मेरी थाती वही थी। कभी तस्वीरें वगैरह खीच लेते थे। काम के लिहाज से पहला रेगुलर काम एक इंग्लिश स्पीकिंग इंस्टीट्यूट था। बिजनेशसमैन वहां सीखने आते थे। एक्सपोर्टर से बात करने के लिए उन्हें अंग्रेजी की जरूरत पड़ती थी।मेरी अंग्रेजी थोड़ी अच्छी हुआ करती थी। मेरी उम्र तब 19-20 साल थी। वहां एप्लाई किया तो काम मिल गया। बड़े-बूढ़े लोगों को अंग्रेजी सिखाता था। तीन-चार घंटे दिन में काम करना होता था। बाकी समय में जहांगीर आर्ट गैलरी, जे जे और दूसरी आर्ट गैलरीयों में घूमा करते थे। उसी बीच मेरी मुलाकात दहिसर की बिल्डिंग में रह रहे एक आर्ट डायरेक्टर से हुई। उनका नाम आगा जानी था। शीशे का काम करते थे। 'धरमा' का सेट लगाया था उन्होंने जिसमें नवीन निश्चल, प्राण और रेखा वगैरह थे। फिल्म के डायरेक्टर चांद थे। उन्होंने एक दिन मुझे फोटोग्राफी करते देख लिया। उन्होंने मुझे बुलाया। मेरी तस्वीरें देखीं और चाय पिलाई। मुझ में इंटरेस्ट दिखाया। मैंने ऐसा समझा कि उन्हें मैं काम का आदमी लगा, जो आर्ट डायरेक्शन में एसिस्ट कर सकता है। अगले दिन वे शूटिंग पर जा रहे थे, संडे का दिन था... मैंने पूछ दिया कि कहां जा रहे हैं आगा साहब, तो तपाक से बोले, 'सन एंड सैंड में सेट लगा है। वहीं जा रहा हूं' मैंने यों ही पूछ दिया कि चलूं मैं भी, तो उन्होंने साथ कर लिया। फिल्मी दुनिया से मेरा वह पहला जुड़ाव रहा। मुंबई आने के बाद भी मेरी कभी इच्छा नहीं हुई थी कि किसी स्टार से मिलूं या शूटिंग देखने चला जाऊं। पूरी तरह से पेंटिंग में डूबा था मै... बहरहाल उस दिन फिल्म की शूटिंग देखने चला गया 'सन एंड सैंड' के आस-पास तब कोई दूसरा होटल नहीं था। एकदम खाली जगह थी। वहीं 'धरमा' का सेट लगा था। 'राज को राज रहने दो' गाने की शूटिंग थी। वहां का माहौल मुझे बहुत अच्छा लगा। लाइटिंग चल रही थी। मैं एक कोने में खड़े होकर रात के नौ बजे तक शूटिंग देखता रहा। बीच में दो बार आगा जानी पूछने आए। फिर उन्होंने कहा कि वे लौट रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि आप जाइए, मैं आ जाऊंगा। मैं वहां से हिला ही नहीं। मेरे मन-मस्तिष्क में बात आई कि यही करना है। रात में लौटा तो आगा जी के पास गया। वे अभी सोए नहीं थे। उनसे मैंने मन की बात कही और दबाव डाला कि 'आपको मेरी मदद करनी होगी।' अगले दिन सुबह फिर मिला और मैंने कहा चलिए, जिंदगी में मुझे मेरा लक्ष्य मिल गया है।
पहली बार शूटिंग देखने का ऐसा असर हुआ? उसके पहले कितनी फिल्में देखी थीं आपने या फिल्मों का कितना और किस तरह का शौक था?मैं तो तिलैया के आर्मी स्कूल में था। दिल्ली आने पर भी ऐसा नहीं था कि फिल्म देखने के लिए परेशान रहते हों। कॉलेज के दिनों में 'पाकीजा' रिलीज हुई थी। मैंने 'पाकीजा' दो-तीन बार जरूर देखी थी। स्कूल के दिनों में पेंटिंग, मूर्तिकारी आदि का शौक था। दिल्ली गया तो बड़े-बड़े आर्टिस्ट के काम का एक्सपोजर मिला। उन्हें देखकर लगता था। कि मैं कुछ कर सकता हूं... लेकिन सन एंड सैंड का वह दिन तो कमाल का था। लगा कि कुछ पा लिया है मैंने। आगा जी ने अगले दिन चांद साहब से मिलवा दिया। चांद साहब ने तेरहवां एसिस्टैंट बना लिया। चीफ एसिस्टैंट देवा था। मैं रोजाना सुबह आ जाता था और चाय-वाय, कुर्सी-उर्सी का इंतजाम करता था या देवा जो बोलता था, उसे कर देता था। मैं देखता-समझता रहा। कुछ एसिस्टैंट चार-पांच साल से लगे हुए थे। देवा बारह-तेरह साल से असिस्टैंट था। फिल्म माध्यम के प्रति मेरी रुचि बढ़ती गई। कुल पांच दिन रहा मैं एसिस्टैंट। पांच रुपये मिलते थे तब रोज के...
सिर्फ पांच दिन ही एसिस्टैंट रहे और वह भी पांच रुपए प्रति दिन पर..?हां, पांच रुपए ही लंच के तौर पर मिलते थे। लंच ब्रेक के समय हम लोग बाहर जाकर खा लेते थे। तब जुहू बस स्टॉप पर चिलिया की दुकान थी। वहां डेढ़ रुपए में खाना हो जाता था। उडीपी होटल में दो रुपए पैंतीस पैसे में इतनी बड़ी थाली मिलती थी कि हम खा नहीं सकते थे। पांच दिनों में ही मुझे अंदाजा लगा कि अगर एसिस्टैंट बने रहे तो बारह-पंद्रह सालो तक कोई उम्मीद नहीं रहेगी। छठे दिन वहां का शेड्यूल खत्म होते ही मैं पूना चला गया। पूना फिल्म इंस्टीट्यूट में जाकर मैंने सब कुछ पता किया। वहां सिर्फ एक ही कोर्स के लिए मैं क्वालीफाई कर रहा था, सिर्फ एक्टिंग के लिए। बाकी पढ़ाई के लिए ग्रेजुएशन जरूरी था। मैंने ग्रेजुएशन किया नहीं था। मुंबई लौटने के बाद मैंने दहिसर छोछ़ दिया। नौकरी की खोज शुरू की। सोचा कि ऐसी नौकरी कर लूं, जिसमें पढ़ाई का वक्त भी मिले। ताड़देव के एक रेस्तरां में एप्लाई किया। उनका नया ब्रांच कुलाबा में खुल रहा था। होटल के मालिक तीन भाई थे। उसमें से एक सैनिक स्कूल में पढ़ा था। उसने मुझे रख लिया। तीन सौ रुपए महीने के की नौकरी लगी। नौकरी के साथ मैंने केसी कॉलेज में मैंने एडमिशन भी ले लिया। वहां रोज क्लास नहीं करता था। टीचरों से दोस्ती कर ली थी और अपनी मजबूरी बता दी। वे अटैंडेंस लगा देते थे। होटल में सुबह नौ बजे से रात नौ बजे तक काम करना होता था। बीच में दो-तीन घंटे का खाली समय मिल जाता था। उसी में पढ़ाई होती थी। मेरे सारे पैसे बच जाते थे। बाद में वे पैसे पूना के फीस के काम आए। पूना कब गए आप?उसी साल मैंने पूना में एडमिशन लिया। एडीटिंग का कोर्स मिला। मेरे साथा डेविड धवन और रेणु सलूजा थे। उस साल डायरेक्शन में केतन मेहता, कुंदन शाह, विधु विनोद चोपड़ा और सईद मिर्जा थे। उन दिनों नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी भी वहां थे। वैसा बैच फिर नहीं निकला। केतन डायरेक्शन कोर्स में थे। उन्होंने एक डाक्यूमेंट्री बनाई थी, जिसे मैंने सबसे पहले एडिट किया। साल बीतते-बीतते इंस्टीट्यूट में गड़बड़ियां होने लगीं। मैं वहां 1973 में गया था। 1974 की बात कर रहा हूं। गिरीश कर्नाड डायरेक्टर थे तब और इंस्टीट्यूट में स्ट्राइक हो गया। स्टूडेंट औ गिरीश कर्नाड के बीच टकराव हो गया था। इंस्टीट्यूट बंद कर दिया गया।
फिर ...हम लोग लौटकर मुंबई आ गए। मुंबई में शिवेंद्र सिन्हा के यहां ठिकाना बना। उनके भतीजे मंजुल सिन्हा मेंरे दोस्त थे। मंजुल एफटीआईआई में डायरेक्शन में थे। हम लो दिन भर इधर-उधर घूमते और रात में शिवेंद्र जी के यहां जाकर फर्श पर सो जाते थे। वहीं अजीत सिन्हा भी थे। बाद में उन्होंने मेरे साथ काम किया। आजीविका के लिए हम लोग स्किप्ट वगैरह लिखते थे। चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी, फिल्म्स डिवीजन और इधर-उधर हाथ मारकर कुछ जुगाड़ कर लेते थे। पता चला कि गोवा की सरकार वहां की संस्कृति पर डॉक्यूमेंट्री बनवाना चाहती है। वहां की मुख्यमंत्री शशिकला जी को एक मित्र जानता था। उनसे मिलने गोवा गया पहुंच गए। वह फिल्म मिल गई। छावड़ा साहब - इन दिनों प्रकाश झा प्रोडक्शन में कार्यरत - की विज्ञापन एजेंसी थी। वहां भी जाकर कुछ काम कर देते थे। फिल्म मेकिंग का जुनून सवार था। आखिरकार 1975 में गोवा सरकार की डॉक्यूमंट्री 'अंडर द ब्लू' पूरी हो गई। 1975 में मेरा पहला काम सामने आया।

डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का यह रुझान तात्कालिक ही लगता है, क्योंकि आप फीचर फिल्मों की तरफ उन्मुख थे? उन दिनों फीचर फिल्म कोई दे नहीं रहा था। डॉक्यूमेंट्री में कम लागत और कम समय में कुछ कर दिखाने का मौका मिल जाता था। 1975 से 1980.81 तक मैं डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाता रहा और सैर करता रहा। यहां फिल्में बनाता था। और पैसे जमा कर कभी इंग्लैंड, कभी जर्मनी तो कभी फ्रांस घूम आता था। विदेशों में जाकर थोड़ा काम कर आता था। कह सकते हैं कि छुटपुटिया काम ही करता रहा। 1979 में बैले डांसर फिरोजा लाली ... । उनके साथ वाक्या ये हुआ था कि वे बोलशेवे तक चली गई थीं। रॉयल एकेडमी में सीखा उन्होंने सिंगापुर में भी रहीं, लेकिन कभी लाइमलाइट में नहीं रहीं। उनके पिता पूरी तरह समर्पित थे बेटी के प्रति। मुझे बाप-बेटी की एक अच्छी कहानी हाथ लगी। मैंने उन पर डॉक्यूमेट्री शुरू कर दी। उसी सिलसिले में मुझे रूस जाना पड़ा। रूस में बोलवेशे से उनके कुछ फुटेज निकालने थे। फिर लंदन चला गया। उनकी फिल्म पूरी करने के लिए। उसमें मुझे काफी लंबा समय लग गया। थोड़ी लंबी डॉक्यूमेंट्री थी। पैसों की दिक्कत थी। इधर-उधर से पैसे जमा किए थे। रूस और लंदन का वह प्रवास मेरे लिए महत्वपूर्ण रहा। उन चार-पांच सालों में लंदन में मीडिया का एक्सपोजर मिला। डॉक्यूमेंट्री और यथार्थवादी सिनेमा के प्रति अप्रोच मिला। अचानक लगा कि किसी ने झकझोर कर जगा दिया हो। मुझे लगा कि मैं कुछ खास नहीं कर रहा हूं। फिल्में तो ऐसे बननी चाहिए। 1980 का साल मेरे लिए आत्ममंथन का साल रहा। मेंने खुद को खोजा। फिल्ममेकर के तौर पर मेरे अंदर बड़ा परिवर्तन आ गया। बाद के वर्षों में मेरी फिल्मों में यथार्थ का जो नाटकीय चित्रण दिखता है, वह वहीं से आया। 1980 के अंत या 81 के आरंभ में वह डॉक्यूमेंट्री पूरी हो गई थी। 50 मिनट की बनी थी वह फिल्म। उसका शीर्षक रखा मैंने 'बा द दा' यानी 'डांस बाई टू' बाप- बेटी की कहानी। 'बा द दा' बैले डांस का एक आयटम भी होता है। और बिहारशरीफ के दंगों पर आपने कब फिल्म बनाई? वहीं आ रहा हूं। जब मैं लंदन से लौटने की तैयारी कर रहा था उन्हीं दिनों बिहारशरीफ में दंगे भड़के। दंगों की खबर मुझे लंदन में ही मिल गई थीं। मार्च का महीना था। मैं वहां से चलने ही वाला था। बीबीसी पर न्यूज दिखा कि 'इन द हिंदू स्टेट ऑफ बिहार मुस्लिम आर बूचर्ड'। मुझे उस खबर से धक्का लगा। दंगा काफी जोर फैला था। बहुत सारे मुसलमान मारे भी गए थे। चार दिनों तक नरसंहार चला था। मंबई में लैंड करते ही मैं सीधे फिल्म्स डिवीजन गया। उस समय थापा साहब चीफ प्रोड्यूसर होते थे... एन एस थापा। थापा साहब देख कर बड़े खुश हुए। मैंने उनसे कहा कि अभी-अभी लंदन से लौटा हूं। मुझे एक यूनिट दे दीजिए, मैं फौरन बिहारशरीफ जाना चाहता हूं। यूनिट का मतलब होता है कैमरा, साउंड रिकॉर्डिस्ट आदि। मैं ट्रेन में बैठकर बिहारशरीफ जाना चाहता हूं। इस बीच परिवार से संपर्क रहा कि नहीं।। क्या परिवार के समर्थन के अभाव में कभी कोई दिक्कत नहीं हुई? मेरी डॉक्यूमेंट्री 1975 में आ गई थी। उन दिनों मेरे पिताजी मोतिहारी में रहते थे। मां और पिताजी वहीं सिनेमा देखने गए और उन्होंने मेरी फिल्म देखी। पहले फिल्म शुरू होने के पहले फिल्म्स डिवीजन की फिल्में दिखाई जाती थीं। उन्होने फिल्म देखी तो सन्नाटे में आ गए। मां तो रोने लगी। उसने पिताजी से कहा कि अभी मुंबई चलिए। मैंने 1975 के अंत 1976 की शुरुआत की है। जुहू में पेइंग गेस्ट रहता था। मां से मेरा प़त्राचार था। पिताजी से कोई बात नहीं होती थी। दोनों अचानक आ गए। उनके यहां आने के बाद पिताजी से बातें हुईं बराबरी के स्तर पर ... आज तक वैसी ही है। दोनों हफ्ते भर यहां रहे। बड़ा अच्छा रहा। मैंने उन्हें मुंबई दर्शन कराया। उन दिनों के बारे में सोचने पर आज भी इमोशनल हो जाता हूं। मां और पिता जी के साथ उस एक हफ्ते की बातचीत और फिर मेरे प्रति उनका वास्तविक कंसर्न समझ कर अने पर गुस्सा भी आया। डायरेक्टर प्रकाश झा का निर्माण काल या तैयारी में लगभग आठ-नौ साल लगे? मैं 1975 से 1981 तक के समय को ज्यादा महत्वपूर्ण समझता हूं। इस पीरियड में लगातार घूमता और सीखता रहा। फिल्ममेकिंग सीखने के बाद एक स्वतंत्र नजरिया बना। हर चीज को एक खास ढंग से देखने का सलीका आया। इस पीरियड ने मुझे ठोस जमीन दी। फर्म किया। इसकी वजह से मैं जीवन और काम में निर्भयी बना। बिहारशरीफ के दंगों पर बनाई डॉक्यूमेंट्री फिल्म ने मुझे एक रियलिस्ट अप्रोच दिया। 1975 के पहले का काम अनगढ़ है और उसे मैं 'मेक टू ऑर्डर' फिल्में कहूंगा। उनमें कोई खास बात नहीं थी। कह सकते हैं कि बिहारशरीफ के दंगों पर बनी फिल्म ने आपकी दिशा बदल दी। रियलिस्ट फिल्मांकन के प्रभाव को आपने समझा और शायद वहीं से फिल्म के लिए प्ररित हुए हों? 1975 से पहले मैंने जो सीखा था... उसका मैंने इस्तेमाल किया। वह फिल्म डायरेक्ट और हार्ड हिटिंग थी। आप अभी उस फिल्म को देखें तो पता चलेगा, तब तब दंगे समाप्त हो गए थे। तनाव बना हुआ था। मैंने दंगे से प्रभावित लोगों से बातें की... जहां दंगा हुआ था वहां। मतलब दंगे के बाद के सन्नाटे में डरे हुए चेहरे... उनकी बोलती आंखें। जेल में जाकर बातें की। रिफ्यूजी कैंप में लोगों से मिला। उन सभी के साथ क्या हुआ, कैसे हुआ... सब कुछ रिकॉर्ड किया। वहां स्पेशल मजिस्ट्रेट वी एस दूबे थे। वे झारखंड के चीफ सेक्रेटरी होकर रिटायर किए। उनसे मिला। उन्होंने पूरी इजाजत दी कि जिससे मर्जी हो... जाकर मिलें। कुछ नहीं छिपाना है। उन से काफी बल मिला। उस फिल्म को मैंने शैवाल की की एक कविता से खत्म किया थां धर्मयुग में छपी उनकी कविता का उपयोग उनकी अनुमित से किया। बाद में उनकी कहानी पर ही मैंने 'दामुल' बनाई। बहरहाल, फिल्म जमा हुई। फिल्म्स डिवीजन के एडवाइजरी बोर्ड ने फिल्म देखी। उस बोर्ड के चैयरमैन हृषीकेष मुखर्जी थे। फिल्म देखकर वे तमसाए हुए बाहर निकले और पूछा, 'किसने बनाई है यह फिल्म?' लोगों ने मेरी तरफ इंगित किया तो वे मुझे पकड़कर रोने लगे। उन्होंने बहुत तारीफ की। उस फिल्म का प्रदर्शित किया गया, लेकिन चार दिनों में प्रतिबंधित हो गई। चार दिनो में सारे प्रिंट वापस ले लिए गए। बाद में उस साल उस फिल्म को सर्वोत्तम डॉक्यूमेंट्री का नेशनल अवार्ड मिला।

डॉक्यूमेंट्री तो आप अब भी बनाते रहते हैं, लेकिन अगर फीचर फिल्मों की बात करें तो उसकी शुरूआत कैसे हुई और क्यों आपने जरूरी समझा कि फीचर फिल्म बनानी चाहिए?

फिल्म और फीचर फिल्म बनाने का विचार कर रहा था मै। मैंने शैवाल की कहानी 'कालसूत्र' और 'दामुल' की पटकथा लिखी। उसके लिए प्रोड्यूसर खोज रहा था। मनमोहन शेट्टी उन दिनों मेरे दोस्त हो गए थे। उन्होंने कहा चलो बनाते हैं। लेकिन बैलेंस करने के लिए एक कमर्शियल फिल्म भी सोचो। चाय पीते- पीते हमने उन्हें स्कूल की एक कहानी सुनाई। इस तरह 'हिप हिप हुर्रे' का आइडिया आया। गुलजार साहब ने उसकी पटकथा लिखी। योजना थी कि 'हिप हिप हुर्रे' और 'दामुल' दोनों साथ में बनाई जाए। बिहार में ही दोनों फिल्म की शूटिंग होनी थी। 'हिप हिप हुर्रे' करते-करते थक गए तो सोचा कि पहले उसी को एडिट कर रिलीज करते हैं। इस तरह 'दामुल' में छह महीने की देर हो गई। इस बीच 'दामुल' की पटकथा एनएफडीसी में जमा कर दी थी। वहां से मंजूरी मिल गई। इस तरह 'हिप हिप हुर्रे' पहली फिल्म हो गई और 'दामुल' दूसरी फिल्म हो गई, जबकि 'दामुल' की योजना पहले बनी थी।
'दामुल' को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और आप की एक पहचान बनी। आप उन फिल्मकारों में शामिल हो गए, जिन्हें समांतर सिनेमा का पैरोकार माना जाता था।
मैं इतने सरल तरीके से अपनी पहचान को नहीं देख पाता। 'दामुल' फिल्म इसलिए बन पाई कि मैं मूलतः गांव का हूं और गांव की सामाजिक व्यवस्था और उसके पीछे की राजनीति को समझ सकता हूं। अपनी लंबी कहानी को छोटा करूं तो मैंने 1987 में 'परिणति' बनाई। विजय दान देथा की कहानी पर फिल्म बनी थी। मैंने ढेर सारा काम किया। 'क्लासिकल डांस फ्रॉम इंडिया' सीरिज के अंतर्गत 13 फिल्में बना दीं। बीच में मेरी शादी हो गई। पर्सनल लाइफ थोड़ा डिस्टर्ब रहा। 1988 तक आते-आते मुझे लगा कि अपने आप को रिवाइव करने की जरूरत है। मैंने गांव लौटने के बारे में सोचा। 1989 में यहां सब कुछ पैक कर के पटना चला गया। चार सालों तक बिहार में रहा। एक-दो संस्थाओं के साथ मिलकर काम करने लगा। मंडल कमीशन, लालू राज और ओपन मार्केट इकॉनोमी का असर दीखने लगा था।
उस दौर में आपने बिहार में और क्या किया। सुना है कि आपकी सांस्कृतिक गतिविधियां काफी बढ़ गई थीं और आप के साथ बिहार के अनेक युवक जुड़े थे।
वहां अनुभूति नाम संस्था का गठन किया। उसके जरिए मैंने बहुत सारे युवकों को प्रशिक्षित किया। मेरे अनेक एसिस्टैंट और कैमरामैन आपको इंडस्ट्री में मिल जाएंगे। एफटीआईआई से सतीश बहादुर को बुलाकर फिल्म एप्रीशिएन कोर्स चलाता था। सिनेमा की शिक्षा पर भी मैंने ध्यान दिया। विजयकांत, संजीव और शैवाल जैसे लेखकों के संपर्क में रहा। चंपारण जाकर 'संवेदन' नाम संस्था बनाई, जिसके तहत लोगों को छोटे- मोटे उद्योग करने के लिए प्रेरित किया। बिहार में चार-पांच साल बिताने के बाद फिर एक टर्न आया। एक सैचुरेशन आ गया। जमा पूंजी समाप्त हो गई। दूसरी समस्या थी कि मैंने बेटी गोद ली थी। वह चार- पांच साल की हो गई थी। सन् 1993 में मां का देहांत हो गया। मां के गुजरते ही मेरे छोटे परिवार में बिखराव आ गया। पहले कभी सोचा ही नहीं था कि मां ने कैसे सभी को जोड़ रखा है। पिताजी उदास होकर गांव चले गए और मैं अपनी बेटी दिशा को लेकर मुंबई आ गया।
सन् 1993 के बाद आपकी दूसरी पारी आरंभा होती है, जब आपने 'बंदिश', 'मृत्युदंड' आदि फिल्में की। नए सिरे से शरूआत करने में दिक्कत तो हुई होगी?
मैं साढ़े चार-पांच साल की दिशा को लेकर मुंबई आ गया। यहां कोई घर नहीं था। कुछ महीने तक जुहू के एक होटल में रहे। 'मृत्युदंड' की कहानी लिखी थी। सोचा कि इसे बनाएंगे। एनएफडीसी में स्क्रिप्ट जमा की थी। अचानक महसूस किया मैंने कि जमीन आसमान का फर्क आ गया है। पहले दस-बारह लाख में फिल्में बन जाती थी। अब लोगों ने बताया कि सत्तर-अस्सी लाख से कम में कुछ भी नहीं होगा। मैंने मनमोहन शेट्टी से बात की। उन्होंने कहा कि बनानी तो तुम्हें ही होगी, देखो कि कैसे जोड़-तोड़ करते हो। उनके एक मकान में मैं अंधेरी में शिफ्ट हो गया। दिशा को पंचगनी के स्कूल में डाला और फिर से तिनका-तिनका जोड़ना शुरू किया।
लौटने के बाद दीप्ति नवल से भेंट-मुलाकात हुई?

हमारे संपर्क हमेशा बने रहे। बातचीत होती रहती थी। हम लोगों के बीच ऐसा कोई झगड़ा नहीं हुआ था। हमारे बीच नकारत्मक भाव कभी नहीं रहा। आरंभ में ही थोड़ी-बहुत टेंशन हुई थी। यहां आया तो दिशा की देखभाल में उन्होंने मेरी मदद की। बीच में विनोद पंडित से उनके संबंध हो गए तो वे दोनों साथ रहने लगे थे। हम लोगों की बातचीत थी। मेल-मिलाप भी रहा।
लौटने के बाद आपकी पहली फिल्म तो 'बंदिश' रही न? जिसमें जैकी श्रॉफ और जूही चावला थे?
जावेद सिद्दकी, रॉबिन भट्ट और सुरजीत सेन मिलकर स्क्रिप्ट लिखते थे। किसी ने उनसे हमारा परिचय करा दिया। जैकी श्रॉफ फिल्म में आ गए तो एक फायनेंसर भी मिल गया। सबने कहा कि कमर्शियल बनानी चाहिए। उस सेटअप में काम आरंभ किया तो कमर्शियल जान-पहचान शुरू हुई। 'बंदिश' शुरू तो हो गई, लेकिन मेरा कभी इंटरेस्ट नहीं रहा। मन लगाकर मैं उसे नहीं बना सका। वह विषय भी मेरे अनुकूल नहीं था। उस फिल्म से यह बात समझ में आ गई कि कमर्शियल फिल्म में किस तरह से काम होता है। फिल्म इंडस्ट्री में बढ़ रहा कमर्शियल दबाव भी मैंने महसूस किया। संयोग अच्छा रहा कि 'बंदिश' के बनते- बनते 'मृत्युदंड' पर भी काम शरू हो गया। एक बात समझ में आ गई थी कि 'मृत्युदंड' में किसी पॉपुलर हीरोइन को लेना होगा। उसके बगैर फिल्म धारदार नहीं होगी और शायद सफल भी नहीं होगी।
'मृत्युदंड' के लिए माधुरी दीक्षित को राजी कैसे किया। माधुरी दीक्षित तो घोर कमर्शियल फिल्म की हीरोइन थीं और उन दिनों काफी पॉपुलर थीं। क्या वह 'मृत्युदंड' के लिए आसानी से राजी हो गईं?
उन दिनों सुभाष घई से दो-चार बार मुलाकातें हुई थीं। उन्होंने पूछा था कि क्या कर रहे हो तो मैंने 'मृत्युदंड' की योजना के बारे में बताया था। उन्होंने एक दिन घर बुलाया और 'मृत्युदंड' की कहानी सुनी। कहानी सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए पूछा कि किस हिरोइन के बारे में सोच रहे हो, तो मैंने माधुरी दीक्षित का नाम लिया। उन्होंने माधुरी को फोन कर दिया। मुलाकात तय हो गई। उन्होंने कहा कि कहानी सुना दो। अब माधुरी ही हां या ना करेगी। जिस दिन मैं माधुरी दीक्षित से मिलने सुभाष घई की 'खलनायक' के सेट पर गया, उस दिन 'चोली के पीछे' गाने की शूटिंग चल रही थी। फिल्मिस्तान स्टूडियो के मेकअप रूम में शॉट के बीच में उन्होने कहानी सुननी शरू की। मैंने देखा कि कुछ देर बाद वह अटक गई। उन्हें कुछ पसंद आया। उन्होंने शॉट रोक दिया और अगले पौने घंटे में कहानी सुनी। तब तक मुझे आशा नहीं थी कि वो हां करेंगी। कहां 'चोली के पीछे ...' और कहां 'मृत्युदंड'? लेकिन उन्होने कहानी खत्म होते ही हां कहा। उसके बाद शबाना आजमी आईं। बाकी कलाकार आए। मायावाला साहब आए। उन्होंने फायनेंस किया। उस फिल्म को पूरा करने के दरम्यान मेरी यूनिट फिर से खड़ी हो गई। फिर से लोग जुड़े, एक सिस्टम बना और हम वापस अपने पैरों पर खड़े हो गए। फिल्म सफल भी हुई। हालांकि हमें ज्यादा लाभ नहीं हुआ, लेकिन 'मृत्युदंड' से एक स्टैंडिंग बन गई। मेरी भी समझदारी विकसित हुई कि किस तरह की फिल्म बनानी है। उसके आगे की कहानी सब जानते हैं।
'हिप हिप हुर्रे' और 'दामुल' के निर्देशन के समय आपके समकालीनों में कौन से डायरेक्टर एक्टिव थे। किन लोगों के साथ आपका ज्यादा मिलना-जुलना था?

दोनों ही फिल्मों की शूटिंग मैंने बिहार में की थी। मुंबई में बहुत कम लोगों को जानता था। एफटीआईआई के लोग थे। कुंदन शाह, केतन मेहता आदि। उन लोगों से मिलना-जुलना होता था। हिंदी फिल्मों के कमर्शियल वर्ल्ड से मेरी कोई जान-पहचान नहीं थी कभी कोई इच्छा भी नहीं रही थी उधर घुसने की। 'दामुल' को नेशनल अवार्ड मिला तो चर्चा जरूर हुई। उस समय हम नेशनल अवार्ड का महत्व नहीं समझ पाए थे। उस समय हम लोग खुद को अलग जाति का फिल्ममेकर समझते थे। आज तो सब गड्डमड्ड हो गया है और अभी कमर्शियल फिल्मों को भी नेशनल अवार्ड मिल जाता है।
एक साथ आरंभ हुई आपकी दोनों फिल्में 'हिप हिप हुर्रे' और 'दामुल' बिल्कुल अलग स्वभाव की थीं। ऐसा लगता है कि 'हिप हिप हुर्रे' की शैली आपने मजबूती से नहीं पकड़ी?
उसमें मेरी रुचि थी ही नहीं। वह तो हंसते खेलते और चाय पीते-पीते मैंने बना दी थी।
'दामुल' के समय किस तरह के प्रभाव में थे आप?
यथार्थवादी सिनेमा का प्रभाव जरूर था। अपनी सोच और समझ भी विकसित हुई थी। डायरेक्टर फिल्म के लिए जरूरी शिल्प पर मैंने काम किया। कैरेक्टर भी उसी हिसाब से सोचे। सच कहूं तो मेरी अपनी शैली और पसंद की पहली फिल्म 'दामुल' ही थी। ये जो चार फिल्में मैंने बनाई हैं। सामाजिक कलह को लेकर बनी 'दामुल', 'मृत्युदंड', 'गंगाजल' और 'अपहरण...' ये चारों पॉलिटिकल फिल्में हैं। चारों सामाजिक दृष्टि से प्रासंगिक फिल्में हैं। इसी क्रम में अब राजनीति आएगी।
क्या कारण है कि हिंदी प्रदेशों से डायरेक्टर नहीं आ पाते। सब के पास बड़े सपने होते हैं, लेकिन क्या कमी रह जाती है कि उनकी फिल्में बन नहीं पातीं।
फिल्म इंडस्ट्री में जगह बनाने और पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है। हम लोगों की तरफ से आए युवक या तो भटक जाते हैं या उनका धैर्य टूट जाता है। छोटे लाभों में भी कई लोग फंस जाते हैं। अगर आप फिल्म निर्देशन में आ रहे हैं तो एक बात न भूलें कि यह लोगों का माध्यम है। आप उनकी भाषा में अपनी बात कहिए। उनकी समझ में आने के हिसाब से ड्रामैटाइज कीजिए। आप देखें कि मेरी 'मृत्युदंड' से बेहतर 'गंगाजल' रही और 'गंगाजल' से भी बेहतर 'अपहरण' रही। हम भी सीखते- समझते जा रहे हैं। मेरी फिल्मों के भी दर्शक हैं। उन्हें मेरी फिल्मों का इंतजार रहता है।
अपने अनुभवों से युवा निर्देशकों को क्या सलाह देंगे?
स्टडी कीजिए। आप जो कहना या बनाना चाह रहे हैं, उसे अच्छी तरह स्टडी कीजिए। इस माध्यम को समझिए और अपने विषय को पहले एक दर्शक के तौर पर देखिए। एक आम दर्शक की तरह अपनी फिल्म को देखिए और समझिए। यह संप्रेषणा का माध्यम है। हम बहुत बड़ी बात कह रहे हों और अगले की समझ में ही न आए तो क्या फायदा? बात इस ढंग से कही जाए कि सामान्य से सामान्य दर्शक की भी समझ में आए।
आपने अपनी फिल्मों में राजनीति से परहेज नहीं किया। कमर्शियल सिनेमा में आपकी फिल्मों का एक राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण रहता है। खासकर बिहार में जाति व्यवस्था और उनके अंतर्संबंधों के बीच पल और चल रही राजनीति को आपने छुआ है।
मैं मूलतः गांव का व्यक्ति हूं, और फिर बिहार से हूं। बिहार का समाज एक ऐसा समाज है, जो सामाजिक और राजनीति समझता है और राजनीतिक बातें करता है। मुझे समाज के अंदर सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से जो परिवर्तिल दिखे, उन्हें समय-समय पर मैंने अपनी फिल्मों का विषय बनाया। 'दामुल' पारंपिरक सामंतवादी परिवेश की फिल्म है। राजनीतिज्ञ, प्रशासन और सामंत के बीच किस तरह के संबंध थे और वे कैसे ग्रास रूट लेवल पर काम कर रहे थे। 1990 में मंडल कमीशन की और मुक्त बाजार की नीति से समाज में ठेकेदार बढ़े और धार्मिक कट्टरता भी बढ़ी। पारंपरिक सामंतवादी समीकरण में बदलाव आया। इस परिवर्तन को मैंने 'मृत्युदंड' में रखा। 'मृत्युदंड' के सात-आठ साल बाद जिन्हें बैकवॉर्ड समझा जाता था, वे पॉलिटिकली आगे बढ़े। उनको सत्ता मिली तो समाज में फिर परिवर्तन दिखा। यह सब एक सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रिया और विकास है, अगर उसे ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में रख कर देखें तो समझ में आता है। पिछड़ी जाति के लोगों के सत्ता में आने के बाद उनके बीच मतभेद बढ़े। आप देखते हैं कि कैसे एक यादव दूसरे यादव को मार सकता है। इसे हमने 'गंगाजल' के बैकड्रॉप में डील किया। मेरी फिल्मों में राजनीतिक गतिविधियां दिखती हैं।
हां, लेकिन किसी राजनीतिक स्टैंड या टिप्पणी से आप बचते हैं?
मैं किसी राजनीतिक टिप्पणी या विचारधारा की बात नहीं करता। मैं बचता नहीं हूं। यह मेरा काम नहीं है। एक फिल्ममेकर के तौर पर मैं अपने समाज की गतिविधियों को चित्रांकित करता हूं। मैं राजनीति को समाज और व्यक्तियों के स्तर पर डील करता हूं। यही कारण है कि मेरी फिल्में राजनीतिक मानी जाती हैं। फिल्मों के राजनीतिक होने का मतलब यह नहीं हो सकता कि उसमें नारेबाजी हो या आइडियोलॉजी हो। कभी कथ्य की जरूरत होने पर वैसी फिल्म भी बन सकती है, लेकिन वह कोई शर्त नहीं है।
क्या वजह है कि हिंदी फिल्में राजनीति से इस कदर बचती रही हैं कि अराजनीतिक हो जाती हैं। अगर कुछ फिल्मों में राजनीति आती भी है तो वह शहरी और एकेडमिक होती है या फिर पूरी तरह से काल्पनिक और फिल्मी होती है?
मुझे ऐसा लगता है कि आम तौर पर हिंदी फिल्मों के फिल्ममेकर राजनीति से ज्यादा परिचित नहीं हैं। उनकी कोई राजनीतिक पढ़ाई-लिखाई नहीं है। उनका राजनीतिक आधार नहीं है। उन्हें संदर्भ नहीं मिल पाता। दूसरे राजनीति से प्रेरित फिल्मों को कमर्शियल नहीं माना जाता। बहुत तरह की बातें हो सकती हैं। मैं खुद जब स्क्रिप्ट लिख रहा होता हूं तो इसके लिए चिंतित रहता हूं कि मेरी फिल्म का कमर्शियल भविष्य क्या होगा? क्या कोई मेरी फिल्म देखने आएगा? संयोग की बात कहें या दर्शकों की जागरूकता कहें... मेरी फिल्में चल जाती हैं। यह जोखिम का मामला है, इसलिए लोग फिल्में नहीं बनाते।
ऐसी भी धारणा है कि दर्शक राजनीतिक फिल्में नहीं देखना चाहते?
दर्शकों की मानसिकता समझने की जरूरत है। दर्शक पॉलिटिकल या हिस्टोरिकल या एक्शन फिल्म देखने नहीं जाता। वह ड्रामा देखने जाता है। उसे कंपलीट एंटरटेनमेंट चाहिए। हर तरह की फिल्म एंटरटेन करती है। अब यह डायरेक्टर पर निर्भर करता है कि वह कैसे एंटरटेन करता है। बौद्धिक मनोरंजन भी होता है। मैं इसमें यकीन करता हूं। अगर मेरी फिल्में आपको मानसिक तौर पर झकझोरती हैं तो वे आपको एंटरटेन करती हैं।
आपकी अगली फिल्म का नाम ही 'राजनीति' है? उसमें राजनीति के कौन से पहलू और पक्ष होंगे?
'राजनीति' में मैं लोकतंत्र की बातें करूंगा। लोकतंत्र का इन दिनों क्या उपयोग-दुरूपयोग हो रहा है। उसे कैसे निहित स्वार्थ के तहत इस्तेमाल किया जा रहा है। अपने यहां लोकतंत्र को बरगलाने की पुरानी परंपरा है। महाभारत के दिनों से देश में राजनीति और चालबाजी चल रही है। मुझे लोकतंत्र छल-कपट से भरा टर्म लगता है। लोकतंत्र जैसा कुछ रह नहीं जाता। मुट्ठी भर लोग लोकतंत्र का जामा पहन कर उसका इस्तेमाल करते हैं। इसका भरपूर दुरुपयोग हो रहा है हमारे देश और समाज में।
अपने यहां संसदीय लोकतंत्र है। इस अवधारणा में आप कितना विश्वास रखते हैं?
आप इंदिरा गांधी के जमाने से ही देख लें कि कैसे सरकारें बनती हैं। कैसे प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों का चुनाव होता है। क्या यही लोकतंत्र है? आपने कर्नाटक में देखा, बिहार में देखा, उत्तरप्रदेश में देखा...हर प्रदेश और केंद्र की वही हालत है।
क्या हमारी फिल्में संसदीय लोकतंत्र का समर्थन करती हैं?
मेरी अगली फिल्म में देखिए।
मैं हिंदी की अन्य फिल्मों को समेटते हुए पूछ रहा हूं?
मुझे नहीं लगता। हिंदी फिल्मों में गहरा विश्लेषण नहीं रहता। मैं अपनी फिल्मों में बनते-बदलते राजनीतिक समीकरण की बातें करता हूं। बिमल राय की 'दो बीघा जमीन' को मैं राजनीतिक फिल्म मानता हूं। श्याम बेनेगल की फिल्मों में राजनीति का वस्तुगत चित्रण है। कुछ और फिल्मकारों की फिल्मों के उदाहरण दिए जा सकते हैं। लेकिन यह हिंदी फिल्मों की उल्लेखनीय प्रवृत्ति नहीं है। ना ही ऐसी कोई ठोस परंपरा है।
कई बार कमर्शियल फिल्मों में राजनीति का ऐसा नकार होता है कि सारे राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हैं और इन सभी को भून देना चाहिए... संसद को उड़ा देना चाहिए... आदि आदि।
यह अपभ्रंश है। सारे राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हैं या पूरा पुलिस महकमा करप्ट है। ऐसी धारणा घातक है। इसी धारणा के तहत लोग ये भी कहते हैं कि सारे फिल्मकार व्यभिचारी हैं। लोग कहते हैं कि तुम फिल्मवालों का क्या? कुछ भी चलता है वहां।
क्या किसी फिल्मकार का अपना राजनीतिक मत या पक्ष होना चाहिए?
यह तो फिल्मकार पर निर्भर करता है।
मैं आप से पूछ रहा हूं।
मेरा कोई राजनीतिक पक्ष नहीं है। मैं सामाजिक नीति और विकास की नीति का पक्षधर हूं। मुझे लगता है कि सभी को विकास का अवसर मिलना चाहिए। तभी बराबरी के समाज का निर्माण हो सकेगा। बाजार बढ़े, लेकिन वह इस हिसाब से बढ़े कि सब की जरूरतों को साथ लेकर बढ़े।