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Tuesday, April 29, 2008

मलखंभ : मल्लिका और खम्भा

मल्लिका और खम्भा को एक साथ मिला देन तो यही शब्द बनेगा.अगर इस शब्द में किसी को कोई और अर्थ दिख रहा हो तो आगे न पढ़ें।
कमल हसन की फ़िल्म दसावतारम आ रही है.इस फ़िल्म में कमल हसन ने दस भूमिकाएं निभायीं हैं.कमल हसन को रूप बदलने का पुराना शौक है.बहरहाल एक रूप में उनका साथ दे रही हैं मल्लिका शेरावत.मल्लिका शेरावत ने अभिनेत्री के तौर पर भले ही अभी तक कोई सिक्का न जमाया हो,लेकिन उनकी चर्चा होती रहती है.इसी फ़िल्म के मुसिक रिलीज के मौके पर वह चेन्नई में मौजूद थीं और ऐसा कहते हैं की जब खास मेहमान के तौर पर आए जैकी चान से उछारण की गलतियां होने लगीं तो मल्लिका ने उनकी मदद की.आखी वह उनकी फ़िल्म में काम जो कर चुकी हैं.पिछले साल वह गुरु में मैंया मैंया गति नज़र आई थीं.और हाँ हिमेश रेशमिया की फ़िल्म आपका सुरूर में भी दिखी थीं.दोनों ही फिल्मों में उनके आइटम गीत थे.बस...
मल्लिका शेरावत के बारे में आप क्या सोचते हैं और क्या इस मलखंभ के लिए दसावतारम देखने जायेंगे?
और हाँ बिग बी के लिए काफी सवाल आए.कुछ सवालों के जवाब अमिताभ बच्चन ने दिए हैं.जल्दी ही आप उनके जवाब यहाँ पढेंगे.

आमिर खान के भतीजे इमरान खान


आमिर खान ने अपने भतीजे इमरान खान को पेश करने के लिए एक फ़िल्म बनाई है-जाने तू.यह उनके प्रोडक्शन की तीसरी फ़िल्म होगी.आमिर को उम्मीद है की लगान और तारे ज़मीन पर की तरह यह भी कामयाब होगी और इस तरह वे कामयाबी की हैट्रिक लगन्र में सफल रहेंगे।
आप सभी जानते होंगे की आमिर खान को उनके चाचा नासिर खान ने पेश किया था.फ़िल्म थी क़यामत से क़यामत त और उसके निर्देशक थे मंसूर खान.आमिर ने परिवार की उसी परम्परा को निभाते हुए अपने भतीजे को पेश किया है.उनकी फ़िल्म के दिरेक्टोर हैं अब्बास टायरवाला ।
आज कल की फिल्मों और नए सितारों को पेश करने की चलन से थोड़े अलग जाकर इमरान खान को पड़ोसी चेहरे के तौर पर पेश किया जा रहा है.अगर याद हो तो आमिर खान भी इसी छवि के साथ आए थे।
और हाँ याद रखियेगा की इमरान खान को पहली बार आप ने चवन्नी के ब्लॉग पर देखा.

Monday, April 28, 2008

बिग बी के लिए सवाल

big b ke liye aapke paas kai sawal honge.kal hamari mulaqat tay hui hai.chavanni chahta hai ki aap ki jigyashayen bhi unke saamne rakhi jaayen.please apne sawal jaldi se jaldi post karen.
maaf karen aaj yah post nagri mein tabdeel nahin ho pa raha hai.shayad server tang kar raha hai.
chhonki jaldi baaji hai,isliye aaj roman mein hi padh len.
aap apne sawal alag se bhi bhej sakte hain,pataq hoga;
chavannichap@gmail.com

Sunday, April 27, 2008

पैसे कमाने का शॉर्टकट हैं मल्टीस्टारर फिल्में

-ajay brahmatmaj

पिछले साल की कामयाब फिल्मों पर सरसरी निगाह डालने पर हम पाते हैं कि उन फिल्मों में से अधिकांश में एक से अधिक स्टार थे। अक्षय कुमार, सलमान खान, गोविंदा और बाकी स्टार भी जमात में आने पर ही कामयाब हो सके। ऐसा लगता है कि सोलो हीरो की फिल्मों का रिस्क बढ़ गया है और इसीलिए उनके प्रति दर्शकों की रुचि भी अब कमहो गई है। सैफ अली खान का ही उदाहरण लें। हां, इस साल उनकी रेस कामयाब जरूर हुई, लेकिन पिछले साल ता रा रम पम पिट गई। हालांकि आमिर खान और शाहिद कपूर अपवाद कहे जा सकते हैं, क्योंकि तारे जमीं पर और जब वी मेट में उन्होंने अकेले ही दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। ओम शांति ओम में भी अकेले शाहरुख खान थे, लेकिन एक स्तर पर उसमें भी स्टारों की भारी भीड़ थी। भले ही वह भीड़ एक गाने में रही हो!

दरअसल, इस साल भी वही ट्रेंड आगे बढ़ता दिख रहा है। रितिक रोशन और ऐश्वर्या राय के भावपूर्ण अभिनय से सजी फिल्म जोधा-अकबर को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। उसकी तुलना में रेस साधारण फिल्म थी, लेकिन सैफ, अक्षय खन्ना, अनिल कपूर, कैटरीना कैफ और बिपाशा बसु की मौजूदगी ने दर्शकों को आकर्षित किया। इस हफ्ते रिलीज हो रही यशराज फिल्म्स की टशन में फिर से सैफ और अनिल कपूर हैं। उनके साथ करीना कपूर और अक्षय कुमार भी हैं। माना जा रहा है कि यह फिल्म अवश्य सफल होगी। सफलता के इस विश्वास के पीछे इसफिल्म में चार स्टारों की मौजूदगी ही है। इन दिनों कॉमेडी हो या ऐक्शन या फिर किसी और प्रकार का ड्रामा, निर्देशक कोशिश करते हैं कि फिल्म में एक से अधिक स्टार हों। दरअसल, इन दिनों फिल्मों की कहानी और प्रस्तुति में इस बात की गुंजाइश रखी ही जाती है कि उसमें एक से अधिक स्टार शामिल किए जा सकें, क्योंकि आजकल सोलो हीरो या हीरोइन की फिल्मों को व्यवसाय की दृष्टि से भारी जोखिम माना जा रहा है। अगर सोलो हीरो या हीरोइन की फिल्म है, तो उसमें आइटम सॉन्ग या फिर मेहमान भूमिका के बहाने स्टार हीरो को जरूर लिया जाता है। ज्यादा स्टार हों, तो फिल्म लागत और पहचान में स्वयं ही बड़ी हो जाती है। ऐसी फिल्मों के प्रोमोशन पर पर्याप्त खर्च भी किया जाता है। माना जाता है कि हर स्टार के अपने प्रशंसक होते हैं। इसीलिए अगर फिल्म में एक से ज्यादा स्टार हैं, तो प्रशंसक भी उसी अनुपात में बढ़ते हैं और आखिरकार फिल्म के कामयाब होने की संभावना खुद-ब-खुद बढ़ जाती है।

मल्टीस्टारर फिल्मों के इस पहलू को स्वीकार करने के बावजूद एक तर्क यह भी दिया जाता है कि आज के स्टार अभिनय के लिहाज से इतने सक्षम नहीं हैं कि वे पूरी फिल्म को अकेले खींच सकें। उनकी इस कमी को छिपाने और फिल्म बिजनेस को चलाए रखने के लिए प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स ने तरकीब बदल ली है। मुख्य रूप से व्यवसाय और लाभ को ध्यान में रखने के कारण हर फिल्म में अधिक स्टारों को ठूंसने की कोशिश की जा रही है। कुछ ही फिल्मकार ऐसे हैं, जो अपने विषय से संचालित करते हैं। प्रकाश झा की आगामी फिल्म राजनीति का उदाहरण दें, तो वह भी मल्टीस्टारर फिल्म है। इस फिल्म में अभी तकअजय देवगन, नाना पाटेकर, मनोज बाजपेयी और रणवीर कपूर के साथ प्रियंका चोपड़ा के होने की खबर मिली है।

अगर फिल्में व्यवसाय के बजाए विषय से संचालित हों, तो ज्यादा स्टारों का होना उचित लगता है। अन्यथा, पैसे कमाने और कामयाबी हासिल करने का शॉर्टकट फॉर्मूला हो जाती हैं मल्टीस्टारर फिल्में। फिलहाल ऐसा ही लग रहा है।

Saturday, April 26, 2008

बॉक्स ऑफिस:२४.०४.२००८

तनुजा चंद्रा की होप एंड ए लिटिल शुगर से फिल्म इंडस्ट्री को बहुत लिटिल होप थी। एक तो यह फिल्म अंग्रेजी में है और सीमित प्रिंट के साथ रिलीज हुई है। रिलीज होने के बाद दर्शकों ने पाया कि फिल्म में दम नहीं है। विषय अच्छा था। फिल्म नहीं बन सकी। यह समस्या कई फिल्मकारों के साथ है कि वे संवेदनशील विषय चुनते हैं, पर फिल्म पूरी करने में चूक जाते हैं। इससे विषय का नुकसान हो जाता है।

दावा है कि अजय देवगन की यू मी और हम ने दस दिनों में 41 करोड़ का बिजनेस कर लिया है और पहली बार अजय की फिल्म विदेशों में चल रही है। इस फिल्म को समीक्षकों ने सराहा, लेकिन फिल्म अध्येताओं को यू मी और हम अच्छी नहीं लगी। जयदीप सेन की क्रेजी 4 सामान्य बिजनेस कर रही है। लगता है कॉमेडी फिल्मों के प्रति दर्शक उदासीन हो रहे हैं या फिर कॉमेडी के नाम पर उदासी परोसी जा रही है। यू मी और हम तथा क्रेजी 4 औसत फिल्में साबित होंगी।

इस हफ्ते 2008 की पहली छमाही की धमाकेदार फिल्म टशन का इंतजार है। यशराज फिल्म्स की टशन बॉक्स ऑफिस की रंगत बदल सकती है।

Friday, April 25, 2008

टशन: एक फंतासी

-अजय ब्रह्मात्मज

इसे यशराज फिल्म्स की टशन ही कहेंगे।

इतने सारे स्टार, ढेर सारे खूबसूरत लोकेशन, चकाचक स्टाइल और लुक, नई तकनीक से लिए गए एक्शन दृश्य, थोड़ा-बहुत सीजीआई (कंप्यूटर जेनरेटड इमेजेज), नॉर्थ इंडिया का कनपुरिया लहजा और इन सभी को घोल कर बनायी गयी टशन। ऊपर से आदित्य चोपड़ा की क्रिएटिव मार्केटिंग ़ ़ ़ हिंदी फिल्मों के सबसे बड़े और कामयाब प्रोडक्शन हाउस से आई फिल्म है टशन का बाजार गर्म था। यही तो यशराज फिल्म्स की टशन है।

सिंपल सी कहानी है। कानपुर शहर में एक उचक्का रिक्शेवाला एक बेटी के सामने उसके बाप की हत्या कर देता है। बेटी उस हत्यारे के पीछे लग जाती है और अपने पिता की अस्थियां विसर्जित करने के साथ ही उस हत्यारे से पिता के खून का बदला लेती है। वह साफ कहती है कि हम सीधे और शरीफ लोग नहीं हैं। हम कमजोर भी नहीं हैं। वक्त पड़ने पर एक-दूसरे की मदद से कुछ भी कर सकते हैं। टशन में कुछ भी कर दिखाने की जिम्मेदारी पूजा सिंह (करीना कपूर), बच्चन पांडे (अक्षय कुमार) और जिम्मी क्लिफ (सैफ अली खान) की है।

इन दिनों खल किरदारों को लेकर फिल्म बनाने का चलन जोरों पर है। इस फिल्म के ही सारे किरदार खल स्वभाव के हैं। कोई थोड़ा कम तो कोई थोड़ा ज्यादा। भैया जी के नाम से मशहूर लखन सिंह कानपुर से मुंबई आकर अंडर व‌र्ल्ड सरगना बन जाता है। उसके दो ही शौक हैं - हत्या करना और अंग्रेजी बोलना। चूंकि अंग्रेजी आती नहीं, इसलिए वह अंग्रेजी सीखने के लिए कॉल सेंटर के कर्मचारी और टीचर जिम्मी क्लिफ को गुरू बना लेता है। जिम्मी क्लिफ को लड़कियां बदलने का शौक है। वह पूजा सिंह के प्रेम में गिरफ्तार हो जाता है। पूजा उसके प्रेम को भुनाती है। वह जिम्मी का इस्तेमाल करती है और भैया जी की बड़ी रकम लेकर चंपत हो जाती है। अब उस लड़की को खोजने के लिए बच्चन पांडे को कानपुर से बुलाया जाता है। देसी किस्म के गुंडों और सरगनों की स्टाइलिश धड़-पकड़, मारपीट और छल-कपट में कुछ भी हो सकता है। कोई भी चीज उड़ सकती है। कुछ भी भहरा कर गिर सकता है और ऐसी घटनाएं घट सकती हैं, जो सिर्फ सपनों में घटती हैं।

टशन एक फंतासी है। मॉर्डन तकनीक और टेस्ट की फंतासी, जो संभव है कि देश के अधिकांश दर्शक नहीं समझ पाएं। टशन की टीम ने रंगीन, आकर्षक, चमकदार, हैरतअंगेज, काल्पनिक और लाउड किस्म की इस फंतासी में नाच-गाना, रोमांस, अश्लील संवाद और हरकतें सब कुछ देसी टशन के नाम पर ठूंस दिया है। बस, एक ही चीज छूट गयी है ़ ़ ़ वह है कहानी। फिल्म का प्रभाव बढ़ाने के लिए बैकग्राउंड म्यूजिक भी इतना लाउड है कि कानों पर असर करता है।

कहते हैं अनिल कपूर का टपोरी अंदाज आदित्य चोपड़ा को बहुत पसंद है। अनिल कपूर निराश नहीं करते। बच्चन पांडे के रूप में अक्षय कुमार भी दिल जीतते हैं। हां,दर्शकों को रिझाने के लिए जो अश्लील हरकतें उन्होंने की है,उनसे बचा जा सकता था। करीना कपूर को सेक्सी दिखना था। वह दिखी हैं। फिल्म समझ में न आए तो यह दर्शकों का ही कसूर है। यशराज फिल्म्स ने तो अपनी टशन में एक एंटरटेनिंग फिल्म बनाने की कोशिश की है।

Thursday, April 24, 2008

प्रकाश झा से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत-2

पिछले से आगे...

डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का यह रुझान तात्कालिक ही लगता है, क्योंकि आप फीचर फिल्मों की तरफ उन्मुख थे?

उन दिनों फीचर फिल्म कोई दे नहीं रहा था। डॉक्यूमेंट्री में कम लागत और कम समय में कुछ कर दिखाने का मौका मिल जाता था। 1975 से 1980.81 तक मैं डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाता रहा और सैर करता रहा। यहां फिल्में बनाता था। और पैसे जमा कर कभी इंग्लैंड, कभी जर्मनी तो कभी फ्रांस घूम आता था। विदेशों में जाकर थोड़ा काम कर आता था। कह सकते हैं कि छुटपुटिया काम ही करता रहा। 1979 में बैले डांसर फिरोजा लाली ... । उनके साथ वाक्या ये हुआ था कि वे बोलशेवे तक चली गई थीं। रॉयल एकेडमी में सीखा उन्होंने सिंगापुर में भी रहीं, लेकिन कभी लाइमलाइट में नहीं रहीं। उनके पिता पूरी तरह समर्पित थे बेटी के प्रति। मुझे बाप-बेटी की एक अच्छी कहानी हाथ लगी। मैंने उन पर डॉक्यूमेट्री शुरू कर दी। उसी सिलसिले में मुझे रूस जाना पड़ा। रूस में बोलवेशे से उनके कुछ फुटेज निकालने थे। फिर लंदन चला गया। उनकी फिल्म पूरी करने के लिए। उसमें मुझे काफी लंबा समय लग गया। थोड़ी लंबी डॉक्यूमेंट्री थी। पैसों की दिक्कत थी। इधर-उधर से पैसे जमा किए थे। रूस और लंदन का वह प्रवास मेरे लिए महत्वपूर्ण रहा। उन चार-पांच सालों में लंदन में मीडिया का एक्सपोजर मिला। डॉक्यूमेंट्री और यथार्थवादी सिनेमा के प्रति अप्रोच मिला। अचानक लगा कि किसी ने झकझोर कर जगा दिया हो। मुझे लगा कि मैं कुछ खास नहीं कर रहा हूं। फिल्में तो ऐसे बननी चाहिए। 1980 का साल मेरे लिए आत्ममंथन का साल रहा। मेंने खुद को खोजा। फिल्ममेकर के तौर पर मेरे अंदर बड़ा परिवर्तन आ गया। बाद के वर्षों में मेरी फिल्मों में यथार्थ का जो नाटकीय चित्रण दिखता है, वह वहीं से आया। 1980 के अंत या 81 के आरंभ में वह डॉक्यूमेंट्री पूरी हो गई थी। 50 मिनट की बनी थी वह फिल्म। उसका शीर्षक रखा मैंने 'बा द दा' यानी 'डांस बाई टू' बाप- बेटी की कहानी। 'बा द दा' बैले डांस का एक आयटम भी होता है।

और बिहारशरीफ के दंगों पर आपने कब फिल्म बनाई?
वहीं आ रहा हूं। जब मैं लंदन से लौटने की तैयारी कर रहा था उन्हीं दिनों बिहारशरीफ में दंगे भड़के। दंगों की खबर मुझे लंदन में ही मिल गई थीं। मार्च का महीना था। मैं वहां से चलने ही वाला था। बीबीसी पर न्यूज दिखा कि 'इन द हिंदू स्टेट ऑफ बिहार मुस्लिम आर बूचर्ड'। मुझे उस खबर से धक्का लगा। दंगा काफी जोर फैला था। बहुत सारे मुसलमान मारे भी गए थे। चार दिनों तक नरसंहार चला था। मंबई में लैंड करते ही मैं सीधे फिल्म्स डिवीजन गया। उस समय थापा साहब चीफ प्रोड्यूसर होते थे... एन एस थापा। थापा साहब देख कर बड़े खुश हुए। मैंने उनसे कहा कि अभी-अभी लंदन से लौटा हूं। मुझे एक यूनिट दे दीजिए, मैं फौरन बिहारशरीफ जाना चाहता हूं। यूनिट का मतलब होता है कैमरा, साउंड रिकॉर्डिस्ट आदि। मैं ट्रेन में बैठकर बिहारशरीफ जाना चाहता हूं।

इस बीच परिवार से संपर्क रहा कि नहीं।। क्या परिवार के समर्थन के अभाव में कभी कोई दिक्कत नहीं हुई?
मेरी डॉक्यूमेंट्री 1975 में आ गई थी। उन दिनों मेरे पिताजी मोतिहारी में रहते थे। मां और पिताजी वहीं सिनेमा देखने गए और उन्होंने मेरी फिल्म देखी। पहले फिल्म शुरू होने के पहले फिल्म्स डिवीजन की फिल्में दिखाई जाती थीं। उन्होने फिल्म देखी तो सन्नाटे में आ गए। मां तो रोने लगी। उसने पिताजी से कहा कि अभी मुंबई चलिए। मैंने 1975 के अंत 1976 की शुरुआत की है। जुहू में पेइंग गेस्ट रहता था। मां से मेरा प़त्राचार था। पिताजी से कोई बात नहीं होती थी। दोनों अचानक आ गए। उनके यहां आने के बाद पिताजी से बातें हुईं बराबरी के स्तर पर ... आज तक वैसी ही है। दोनों हफ्ते भर यहां रहे। बड़ा अच्छा रहा। मैंने उन्हें मुंबई दर्शन कराया। उन दिनों के बारे में सोचने पर आज भी इमोशनल हो जाता हूं। मां और पिता जी के साथ उस एक हफ्ते की बातचीत और फिर मेरे प्रति उनका वास्तविक कंसर्न समझ कर अने पर गुस्सा भी आया।

डायरेक्टर प्रकाश झा का निर्माण काल या तैयारी में लगभग आठ-नौ साल लगे?
मैं 1975 से 1981 तक के समय को ज्यादा महत्वपूर्ण समझता हूं। इस पीरियड में लगातार घूमता और सीखता रहा। फिल्ममेकिंग सीखने के बाद एक स्वतंत्र नजरिया बना। हर चीज को एक खास ढंग से देखने का सलीका आया। इस पीरियड ने मुझे ठोस जमीन दी। फर्म किया। इसकी वजह से मैं जीवन और काम में निर्भयी बना। बिहारशरीफ के दंगों पर बनाई डॉक्यूमेंट्री फिल्म ने मुझे एक रियलिस्ट अप्रोच दिया। 1975 के पहले का काम अनगढ़ है और उसे मैं 'मेक टू ऑर्डर' फिल्में कहूंगा। उनमें कोई खास बात नहीं थी।

कह सकते हैं कि बिहारशरीफ के दंगों पर बनी फिल्म ने आपकी दिशा बदल दी। रियलिस्ट फिल्मांकन के प्रभाव को आपने समझा और शायद वहीं से फिल्म के लिए प्ररित हुए हों?
1975 से पहले मैंने जो सीखा था... उसका मैंने इस्तेमाल किया। वह फिल्म डायरेक्ट और हार्ड हिटिंग थी। आप अभी उस फिल्म को देखें तो पता चलेगा, तब तब दंगे समाप्त हो गए थे। तनाव बना हुआ था। मैंने दंगे से प्रभावित लोगों से बातें की... जहां दंगा हुआ था वहां। मतलब दंगे के बाद के सन्नाटे में डरे हुए चेहरे... उनकी बोलती आंखें। जेल में जाकर बातें की। रिफ्यूजी कैंप में लोगों से मिला। उन सभी के साथ क्या हुआ, कैसे हुआ... सब कुछ रिकॉर्ड किया। वहां स्पेशल मजिस्ट्रेट वी एस दूबे थे। वे झारखंड के चीफ सेक्रेटरी होकर रिटायर किए। उनसे मिला। उन्होंने पूरी इजाजत दी कि जिससे मर्जी हो... जाकर मिलें। कुछ नहीं छिपाना है। उन से काफी बल मिला। उस फिल्म को मैंने शैवाल की की एक कविता से खत्म किया थां धर्मयुग में छपी उनकी कविता का उपयोग उनकी अनुमित से किया। बाद में उनकी कहानी पर ही मैंने 'दामुल' बनाई। बहरहाल, फिल्म जमा हुई। फिल्म्स डिवीजन के एडवाइजरी बोर्ड ने फिल्म देखी। उस बोर्ड के चैयरमैन हृषीकेष मुखर्जी थे। फिल्म देखकर वे तमसाए हुए बाहर निकले और पूछा, 'किसने बनाई है यह फिल्म?' लोगों ने मेरी तरफ इंगित किया तो वे मुझे पकड़कर रोने लगे। उन्होंने बहुत तारीफ की। उस फिल्म का प्रदर्शित किया गया, लेकिन चार दिनों में प्रतिबंधित हो गई। चार दिनो में सारे प्रिंट वापस ले लिए गए। बाद में उस साल उस फिल्म को सर्वोत्तम डॉक्यूमेंट्री का नेशनल अवार्ड मिला।
बाकी है अभी ...

Wednesday, April 23, 2008

प्रकाश झा से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

शुरू से बताएं। फिल्मों में आने की बात आपने कब और क्यों सोची?
मैं तो दिल्ली यूनिवर्सिटी में फिजिक्स ऑनर्स की पढ़ाई कर रहा था। उस समय अचानक लगने लगा कि क्या यही मेरा जीवन है? ग्रेजुएशन हो जाएगा, फिर आईएएस ऑफिसर बनकर सर्विसेज में चले जाएंगे। पता नहीं क्यो वह विचार मुझे पसंद नहीं आ रहा था। काफी संघर्ष dरना पड़ा उन दिनों परिवार की आशंकाएं थीं। उन सभी को छोड़-लतार कर... बीच में पढ़ाई छोड़ कर मुंबई आ गया। पैसे भी नहीं लिए पिताजी से... पिताजी से मैंने कहा कि जो काम आप नहीं चाहते मैं करूं, उस काम के लिए मैं आप से पैसे नहीं लूंगा। चलने लगा तो घर के सारे लोग उदास थे... नाराज थे। मेरे पास तीन सौ रूपये थे। मैं मुंबई आ गया... फिल्मो के लिए नहीं, पेंटिंग में रुचि थी मेरी। जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स का नाम सुना था। मैंने कहा कि वहीं जाऊंगा। वहां जाकर जीवन बनाऊंगा घर छोड़कर चला आया था। मंबई आने के बाद जीविका के लिए कुछ.कुछ करना पड़ा। ट्रेन में एक सज्जन मिल गए थे.राजाराम। आज भी याद है। दहिसर - मुंबई का बाहरी इलाका-में बिल्डिंग वगैरह बनाते थे। उनके पास यूपी जौनपुर के बच्चे रहते थे। वहीं हमको भी सोने की जगह मिल गई। दिन भर निकलते थे काम-वाम की खोज में।


आप तो जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स के लिए मुंबई आए थे न? फिर काम-वाम की खोज...?
जे जे गया तो पता चला कि वहां सेमेस्टर शरू होने में थोड़ा वक्त लगेगा। मेरे पास एक कैमरा होता था। मेरी थाती वही थी। कभी तस्वीरें वगैरह खीच लेते थे। काम के लिहाज से पहला रेगुलर काम एक इंग्लिश स्पीकिंग इंस्टीट्यूट था। बिजनेशसमैन वहां सीखने आते थे। एक्सपोर्टर से बात करने के लिए उन्हें अंग्रेजी की जरूरत पड़ती थी।मेरी अंग्रेजी थोड़ी अच्छी हुआ करती थी। मेरी उम्र तब 19-20 साल थी। वहां एप्लाई किया तो काम मिल गया। बड़े-बूढ़े लोगों को अंग्रेजी सिखाता था। तीन-चार घंटे दिन में काम करना होता था। बाकी समय में जहांगीर आर्ट गैलरी, जे जे और दूसरी आर्ट गैलरीयों में घूमा करते थे। उसी बीच मेरी मुलाकात दहिसर की बिल्डिंग में रह रहे एक आर्ट डायरेक्टर से हुई। उनका नाम आगा जानी था। शीशे का काम करते थे। 'धरमा' का सेट लगाया था उन्होंने जिसमें नवीन निश्चल, प्राण और रेखा वगैरह थे। फिल्म के डायरेक्टर चांद थे। उन्होंने एक दिन मुझे फोटोग्राफी करते देख लिया। उन्होंने मुझे बुलाया। मेरी तस्वीरें देखीं और चाय पिलाई। मुझ में इंटरेस्ट दिखाया। मैंने ऐसा समझा कि उन्हें मैं काम का आदमी लगा, जो आर्ट डायरेक्शन में एसिस्ट कर सकता है। अगले दिन वे शूटिंग पर जा रहे थे, संडे का दिन था... मैंने पूछ दिया कि कहां जा रहे हैं आगा साहब, तो तपाक से बोले, 'सन एंड सैंड में सेट लगा है। वहीं जा रहा हूं' मैंने यों ही पूछ दिया कि चलूं मैं भी, तो उन्होंने साथ कर लिया। फिल्मी दुनिया से मेरा वह पहला जुड़ाव रहा। मुंबई आने के बाद भी मेरी कभी इच्छा नहीं हुई थी कि किसी स्टार से मिलूं या शूटिंग देखने चला जाऊं। पूरी तरह से पेंटिंग में डूबा था मै... बहरहाल उस दिन फिल्म की शूटिंग देखने चला गया 'सन एंड सैंड' के आस-पास तब कोई दूसरा होटल नहीं था। एकदम खाली जगह थी। वहीं 'धरमा' का सेट लगा था। 'राज को राज रहने दो' गाने की शूटिंग थी। वहां का माहौल मुझे बहुत अच्छा लगा। लाइटिंग चल रही थी। मैं एक कोने में खड़े होकर रात के नौ बजे तक शूटिंग देखता रहा। बीच में दो बार आगा जानी पूछने आए। फिर उन्होंने कहा कि वे लौट रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि आप जाइए, मैं आ जाऊंगा। मैं वहां से हिला ही नहीं। मेरे मन-मस्तिष्क में बात आई कि यही करना है। रात में लौटा तो आगा जी के पास गया। वे अभी सोए नहीं थे। उनसे मैंने मन की बात कही और दबाव डाला कि 'आपको मेरी मदद करनी होगी।' अगले दिन सुबह फिर मिला और मैंने कहा चलिए, जिंदगी में मुझे मेरा लक्ष्य मिल गया है।


पहली बार शूटिंग देखने का ऐसा असर हुआ? उसके पहले कितनी फिल्में देखी थीं आपने या फिल्मों का कितना और किस तरह का शौक था?
मैं तो तिलैया के आर्मी स्कूल में था। दिल्ली आने पर भी ऐसा नहीं था कि फिल्म देखने के लिए परेशान रहते हों। कॉलेज के दिनों में 'पाकीजा' रिलीज हुई थी। मैंने 'पाकीजा' दो-तीन बार जरूर देखी थी। स्कूल के दिनों में पेंटिंग, मूर्तिकारी आदि का शौक था। दिल्ली गया तो बड़े-बड़े आर्टिस्ट के काम का एक्सपोजर मिला। उन्हें देखकर लगता था। कि मैं कुछ कर सकता हूं... लेकिन सन एंड सैंड का वह दिन तो कमाल का था। लगा कि कुछ पा लिया है मैंने। आगा जी ने अगले दिन चांद साहब से मिलवा दिया। चांद साहब ने तेरहवां एसिस्टैंट बना लिया। चीफ एसिस्टैंट देवा था। मैं रोजाना सुबह आ जाता था और चाय-वाय, कुर्सी-उर्सी का इंतजाम करता था या देवा जो बोलता था, उसे कर देता था। मैं देखता-समझता रहा। कुछ एसिस्टैंट चार-पांच साल से लगे हुए थे। देवा बारह-तेरह साल से असिस्टैंट था। फिल्म माध्यम के प्रति मेरी रुचि बढ़ती गई। कुल पांच दिन रहा मैं एसिस्टैंट। पांच रुपये मिलते थे तब रोज के...


सिर्फ पांच दिन ही एसिस्टैंट रहे और वह भी पांच रुपए प्रति दिन पर..?
हां, पांच रुपए ही लंच के तौर पर मिलते थे। लंच ब्रेक के समय हम लोग बाहर जाकर खा लेते थे। तब जुहू बस स्टॉप पर चिलिया की दुकान थी। वहां डेढ़ रुपए में खाना हो जाता था। उडीपी होटल में दो रुपए पैंतीस पैसे में इतनी बड़ी थाली मिलती थी कि हम खा नहीं सकते थे। पांच दिनों में ही मुझे अंदाजा लगा कि अगर एसिस्टैंट बने रहे तो बारह-पंद्रह सालो तक कोई उम्मीद नहीं रहेगी। छठे दिन वहां का शेड्यूल खत्म होते ही मैं पूना चला गया। पूना फिल्म इंस्टीट्यूट में जाकर मैंने सब कुछ पता किया। वहां सिर्फ एक ही कोर्स के लिए मैं क्वालीफाई कर रहा था, सिर्फ एक्टिंग के लिए। बाकी पढ़ाई के लिए ग्रेजुएशन जरूरी था। मैंने ग्रेजुएशन किया नहीं था। मुंबई लौटने के बाद मैंने दहिसर छोछ़ दिया। नौकरी की खोज शुरू की। सोचा कि ऐसी नौकरी कर लूं, जिसमें पढ़ाई का वक्त भी मिले। ताड़देव के एक रेस्तरां में एप्लाई किया। उनका नया ब्रांच कुलाबा में खुल रहा था। होटल के मालिक तीन भाई थे। उसमें से एक सैनिक स्कूल में पढ़ा था। उसने मुझे रख लिया। तीन सौ रुपए महीने के की नौकरी लगी। नौकरी के साथ मैंने केसी कॉलेज में मैंने एडमिशन भी ले लिया। वहां रोज क्लास नहीं करता था। टीचरों से दोस्ती कर ली थी और अपनी मजबूरी बता दी। वे अटैंडेंस लगा देते थे। होटल में सुबह नौ बजे से रात नौ बजे तक काम करना होता था। बीच में दो-तीन घंटे का खाली समय मिल जाता था। उसी में पढ़ाई होती थी। मेरे सारे पैसे बच जाते थे। बाद में वे पैसे पूना के फीस के काम आए।

पूना कब गए आप?
उसी साल मैंने पूना में एडमिशन लिया। एडीटिंग का कोर्स मिला। मेरे साथा डेविड धवन और रेणु सलूजा थे। उस साल डायरेक्शन में केतन मेहता, कुंदन शाह, विधु विनोद चोपड़ा और सईद मिर्जा थे। उन दिनों नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी भी वहां थे। वैसा बैच फिर नहीं निकला। केतन डायरेक्शन कोर्स में थे। उन्होंने एक डाक्यूमेंट्री बनाई थी, जिसे मैंने सबसे पहले एडिट किया। साल बीतते-बीतते इंस्टीट्यूट में गड़बड़ियां होने लगीं। मैं वहां 1973 में गया था। 1974 की बात कर रहा हूं। गिरीश कर्नाड डायरेक्टर थे तब और इंस्टीट्यूट में स्ट्राइक हो गया। स्टूडेंट औ गिरीश कर्नाड के बीच टकराव हो गया था। इंस्टीट्यूट बंद कर दिया गया।


फिर ...
हम लोग लौटकर मुंबई आ गए। मुंबई में शिवेंद्र सिन्हा के यहां ठिकाना बना। उनके भतीजे मंजुल सिन्हा मेंरे दोस्त थे। मंजुल एफटीआईआई में डायरेक्शन में थे। हम लो दिन भर इधर-उधर घूमते और रात में शिवेंद्र जी के यहां जाकर फर्श पर सो जाते थे। वहीं अजीत सिन्हा भी थे। बाद में उन्होंने मेरे साथ काम किया। आजीविका के लिए हम लोग स्किप्ट वगैरह लिखते थे। चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी, फिल्म्स डिवीजन और इधर-उधर हाथ मारकर कुछ जुगाड़ कर लेते थे। पता चला कि गोवा की सरकार वहां की संस्कृति पर डॉक्यूमेंट्री बनवाना चाहती है। वहां की मुख्यमंत्री शशिकला जी को एक मित्र जानता था। उनसे मिलने गोवा गया पहुंच गए। वह फिल्म मिल गई। छावड़ा साहब - इन दिनों प्रकाश झा प्रोडक्शन में कार्यरत - की विज्ञापन एजेंसी थी। वहां भी जाकर कुछ काम कर देते थे। फिल्म मेकिंग का जुनून सवार था। आखिरकार 1975 में गोवा सरकार की डॉक्यूमंट्री 'अंडर द ब्लू' पूरी हो गई। 1975 में मेरा पहला काम सामने आया।

बाकी है अभी....

Tuesday, April 22, 2008

बया में 'पहली सीढ़ी' सीरिज़ में प्रकाश झा का इंटरव्यू

पहली सीढ़ी
मैं प्रवेश भारद्वाज का कृतज्ञ हूं। उन्होंने मुझे ऐसे लंबे, प्रेरक और महत्वपूर्ण इंटरव्यू के लिए प्रेरित किया। फिल्मों में डायरेक्टर का वही महत्व होता है, जो किसी लोकतांत्रिक देश में प्रधानमंत्री का होता है। अगर प्रधानमंत्री सचमुच राजनीतिज्ञ हो तो वह देश को दिशा देता है। निर्देशक फिल्मों का दिशा निर्धारक, मार्ग निर्देशक, संचालक, सूत्रधार, संवाहक और समीक्षक होता है। एक फिल्म के दरम्यान ही वह अनेक भूमिकाओं और स्थितियों से गुजरता है। फिल्म देखते समय हम सब कुछ देखते हैं, बस निर्देशक का काम नहीं देख पाते। हमें अभिनेता का अभिनय दिखता है। संगीत निर्देशक का संगीत सुनाई पड़ता है। गीतकार का शब्द आदोलित और आलोड़ित करते हैं। संवाद लेखक के संवाद जोश भरते हैं, रोमांटिक बनाते हैं। कैमरामैन का छायांकन दिखता है। बस, निर्देशक ही नहीं दिखता। निर्देशक एक किस्म की अमूर्त और निराकार रचना-प्रक्रिया है, जो फिल्म निर्माण \सृजन की सभी प्रक्रियाओं में मौजूद रहता है। इस लिहाज से निर्देशक का काम अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। श्याम बेनेगल ने एक साक्षात्कार में कहा था कि यदि आप ईश्वर की धारणा में यकीन करते हों और उसे महसूस करना चाहते हों या साक्षात देखना चाहते हों तो किसी निर्देशक से मिल लें। फिल्म निर्देशक धरती पर चलता-फिरता साक्षात ईश्वर होता है। अगर यह संसार ईश्वर की मर्जी से चलता है तो फिल्मों का तीन घंटों का यह माया संसार निर्देशक की मर्जी पर टिका रहता है। वह पूरी फिल्म के एक-एक दृश्य का सृजनहार होता है। अफ़सोस की बात है कि हिंदी फिल्मों में स्टार को महत्वपूर्ण स्थान मिल गया है। लेकिन निर्देशक आज भी पहचान के मोहताज हैं। इन दिनों निर्देशक अपनी गरिमा भी खो बैठे हैं। अब ये केवल किसी विचार, धारणा या प्रस्ताव को 'एक्सक्यूट' करते हैं। उसे बिकाऊ वस्तु बना देते हैं।

प्रवेश भारद्वाज ने मुझे बार-बार उकसाया और अखबारों की नौकरी की सुविधाओं और प्रमाद से बार-बार झकझोरा। मुझे निर्देशक हमेशा से आकर्षित करते रहे हैं, इसलिए कहीं न कहीं मैं प्रवेश को सुनता और समझता रहा। इस सीरिज में कोशिश है कि हम निर्देशकों की तैयारी, मानसिकता और उस परिवेश को समझें, जिसमें उन्होंने निर्देशक बनने का ही फैसला किया। पहली फिल्म बन जाने और उसके बाद मिली पहचान के पश्चात की यात्रा से हम सभी कमोबेश परिचित होते हैं, लेकिन पहली फिल्म मिलने के पहले के अनिश्चय, आशंका, आत्मविश्वास और आत्मसंघर्ष से हम परिचित नहीं हो पाते। हर इंटरव्यू के पहले मैंने निर्देशकों से आग्रह किया कि वे अपने आरंभिक जीवन के प्रति नॉस्टेलजिक एटीट्यूड न रखते हुए सब कुछ बताएं।

इस सीरिज की शुरुआत प्रकाश झा से हुई। उन्होंने इसे 'पहली सीढ़ी' नाम दिया। इसे संयोग ही कहें कि 'बया' के संपादक गौरीनाथ ने इस सीरिज के लिए पहला इंटरव्यू प्रकाश झा का ही मांगा। प्रकाश झा मेरे अग्रज और मार्गदर्शक हैं। विवादों और शंकाओं से जूझते हुए अपनी क्रिएटिव अस्मिता की धुरी पर टिके प्रकाश झा के योगदान का मूल्यांकन अभी नहीं किया जा सकता। उन्होंने हिंदी सिनेमा को नई भाषा दी है।

प्रकाश झा से मेरी मुलाकात अग्रज सुमंत मिश्र के साथ हुई थी। वे बिहार से लौटकर आए थे और मुंबई में खुद को फिर को फिर से संजो रहे थे। उन्होंने 'बंदिश' की तैयारी शुरु कर दी थी। पहली मुलाकात बेहद औपचारिक थी। तब तक मैंने तय नहीं किया था कि फिल्मों पर ही लिखना है। हां, फ्रीलांसिंग के दबाव में फिल्मी हस्तियों से मिलने का क्रम आरंभ हो चुका था। 'मुंगेरी के भाई नौरंगीलाल' के समय प्रकाश झा से विस्तृत बातें हुईं। तब तक मैं श्याम बेनेगल के संपर्क में आ चुका था और दो-तीन निर्देशकों के साक्षात्कार कर चुका था। प्रकाश झा का रहस्यमय व्यक्तित्व मुझे अपनी ओर खींच रहा था। खासकर उनकी तीक्ष्ण मुस्कुराहट ... ऐसा लगता है कि कोई राज होंठों के कोनें में छिपा है। बस, वे बताने ही जा रहे हैं। ऐसी मुस्कुराहट के समय प्रकाश झा की आंखें सजल हो जाती हैं। बहरहाल, औपचारिकता टूटी और मैंने थोड़ा करीब से उन्हें देखा। हां, 'मृत्युदंड' के समय प्रकाश जी से गाढ़ा परिचय हुआ और उसके बाद से संपर्क और परिचय की सांद्रता में कभी कमी नहीं आई। मैंने जब इस इंटरव्यू की बात की तो उन्होंने झट से कहा, शुरू करो ... बोलो कब इंटरव्यू करना है। और इस तरह 'पहली सीढ़ी' की नींव पड़ी।
कल पढ़ें इस इंटरव्यू का पहला हिस्सा....

शाहरुख़ की हिन्दी पर वाह कहें!!!!


शाह शाहरुख़ खान का प्यार का नाम है.उनके करीबी उन्हें इसी नाम से पुकारते है.चवन्नी ने सोचा कि नाम लेकर ही शाहरुख़ के करीब होने का भ्रम पाल लिया जाए.मजाक एक तरफ़...इस पोस्ट में चवन्नी शाहरुख़ की हिन्दी से आपको परिचित कराएगा.चवन्नी को अच्छी तरह मालूम है कि शाहरुख़ को हिन्दी आती है.कम से कम वे हिन्दी बोल और समझ सकते हैं.आज के अभिनेता-अभिनेत्री तो हिन्दी बोलने की बात आने पर ही कसमसाने लगते हैं.शाहरुख़ को पांचवी पास इतनी हिन्दी अवश्य आती है.चवन्नी हिन्दी लिखने और पदने के सन्दर्भ में यह बात कर रहा है.चूंकि वे दिल्ली में रहे हैं और परिवार में दिल्ली की भाषा ही बोली जाती थी,इसलिए वे समझ भी सकते हैं.चवन्नी को आश्चर्य होता है कि हिन्दी के नाम पर नाक-भौं सिकोरने वाले शाह को हिन्दी लिखने की क्या जरूरत पड़ गई है.यह मनोरंजन की माया है,जहाँ राजनीति की तरह हिन्दी ही चलती है.पिछले दिनों शाहरुख़ खान ने हिन्दी में एक संदेश लिखा.बड़ा भारी जलसा था....वहाँ शाहरुख़ खान ने यह संदेश स्वयं लिखा.अब आप ऊपर की तस्वीर को ठीक से देखें.आप पायेंगे कि शाह को पढ़ते रहिये के ढ के नीचे बिंदी लगाने की जरूरत नहीं महसूस हुई.उन्हें कोई बताने वाला भी नहीं था कि वे पढ़ते को ग़लत तरीके से लिख रहे है.शाह की इस हिन्दी पर हम वाह ही कर सकते हैं.यह क्या कम एहसान है कि देश का इतना बड़ा स्टार यानि किंग खान हिन्दी लिख रहा है?आप चाहें तो इसी पर गुमान कर लें या फिर दुःख हो रहा हो तो उन्हें पत्र लिखें.अपनी शिकायत दर्ज करे.

Monday, April 21, 2008

ब्लॉग पर बेलाग बच्चन

बच्चन यानि बिग बी यानि अमिताभ बच्चन को इस अंदाज में आपने नहीं देखा होगा.आप जरा उनके ब्लॉग पर जाएं और उनकी छींटाकशी देखें। उन्होंने चौथे दिन के ब्लॉग में शत्रुघ्न सिन्हा पर सीधा आरोप लगाया है.पिछले दिनों शत्रु भइया ने अपने अंदाज में कहा कि आईफा के नामांकन की क्या बात करें?वहाँ कोई किसी का बेटा है,कोई किसी कि बहु है और कोई किसी कि बीवी है.उनकी इस टिपण्णी के आशय को समझते हुए बिग बी चुप नहीं रहे.उन्होंने रवीना टंडन को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के समय के विवाद का जिक्र किया और बताया कि कि कैसे तब कि जूरी में पूनम सिन्हा की सिफारिश पर मैकमोहन को शामिल किया गया था.जो लोग नहीं जानते उनकी जानकारी के लिए चवन्नी बता दे कि शत्रुघ्न सिन्हा कि पत्नी हैं पूनम सिन्हा.बहरहाल,बिग बी के ब्लॉग से लग रहा है कि वे सभी को जवाब देने के मूड में हैं।
उन्होंने एक साल पहले आउटलुक पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट में शामिल टिप्पणीकारों को भी नहीं बख्शा है.उन्होंने सुनील गंगोपाध्याय,राजेंद्र यादव,प्रभाष जोशी और परितोष सेन को जो पत्र लिखे थे,उन्हें सार्वजनिक कर दिया है.उन्होंने सभी को चुनौती दी है कि वे अपनी टिप्पणियों को सही ठहराएँ.उन्होंने लोकतांत्रिक और सेकुलर देश में रहने काहवाला देते हुए कहा है कि उन्हें अपने धर्म के पालन का पूरा अधिकार है .एक जगह वे ख़ुद को हिंदू कहते हैं।
बिग बी यानि अमिताभ बच्चन के ब्लॉग को पढ़ना रोचक अनुभव हो सकता है.आप पढ़ें और देखें कि हमारे आइकन कि क्या चिंताएं हैं.वे भी आम ब्लॉगर की तरह पहले अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं.उन्हें ऐसा लगता है कि मीडिया ने उनके साथ हमेशा अन्याय किया है.इस ब्लॉग के जरिये वे स्सेधे अपने पाठकों और दर्शकों से सम्बन्ध बना रहे हैं।
शिकायत और गुस्से तक ही उनका ब्लॉग सीमित नहीं रहता.वे बेलाग तरीके से विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय भी जाहिर करते हैं.पहली बार अमिताभ बच्चन के उदगार पढने को मिल रहे हैं.आप यह भी देखें कि वे कितने व्यस्त हैं,फिर भी अपनी पोस्ट करते हैं.रात के तीन और चार बजे उन्होंने पोस्ट अपडेट किए हैं।
चवन्नी को पूरी उम्मीद है कि इस ब्लॉग के जरिये हम देश के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को करीब से जान पाएंगे.

Friday, April 18, 2008

होप एंड ए लिटिल सुगर:एक संवेदनशील विषय का सत्यानाश

-अजय ब्रह्मात्मज
तनुजा चंद्रा की अंग्रेजी में बनी फिल्म होप एंड ए लिटिल शुगर का विषय प्रासंगिक है। उन्होंने विषय को सुंदर तरीके से किरदारों के माध्यम से पेश किया है, लेकिन कहानी कहने की जल्दबाजी में उन्होंने प्रसंगों को सही क्रम में नहीं रखा है।
दर्शक के तौर पर हम फिल्म से जुड़ते हैं और किसी बड़े अंतद्र्वद्व की उम्मीद करते हैं कि फिल्म खत्म हो जाती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि बजट का संकट आ गया या फिर तनुजा का ही धैर्य खत्म हो गया। जो भी हो, एक संवेदनशील विषय का सत्यानाश हो गया।
कहानी अली की जिंदगी से आरंभ होती है। हम उसे 1992 में हुए मुंबई के दंगों के दौरान एक बच्चे के रूप में देखते हैं। बड़ा होकर वह अमेरिका चला जाता है। किसी प्रकार से गुजर-बसर करता हुआ वह फोटोग्राफी के अपने शौक को जिंदा रखता है। उसकी मुलाकात सलोनी से होती है। सलोनी उसकी फोटोग्राफी को बढ़ावा देती है। सलोनी के परिवार से अली की निकटता बढ़ती है। इस बीच 11 सितंबर की घटना घटती है। इसमें सलोनी का पति हैरी मारा जाता है। हैरी के पिता सेना के रिटायर्ड कर्नल हैं। उन्हें मुसलमानों से सख्त नफरत है। वह अली को बर्दाश्त नहीं कर पाते। सलोनी से अली की निकटता उन्हें बुरी लगती है। एक रात वह उसे मारने के इरादे से घर से निकलते हैं, लेकिन रास्ते में उन पर आक्रमण होता है। कुछ अमेरिकी उन्हें ओसामा कह कर मारते हैं। कर्नल को अहसास होता है कि अमेरिकी समाज में फैली नफरत उनकी घृणा से बड़ी है। वह अली से माफी मांगते हैं और सलोनी को उसके हाल पर छोड़ कर भारत लौट जाते हैं।
तनुजा चंद्रा ने कर्नल के आकस्मिक फैसलों की ठोस जमीन नहीं तैयार की है। अमेरिकी समाज में एशियाई मूल के लोगों के प्रति बढ़ी घृणा को भी वह उचित प्रभाव के साथ चित्रित नहीं कर पाई हैं। फिल्म अधूरी और जल्दबाजी में समेटी गयी लगती है।
महिमा चौधरी और अनुपम खेर ने अपने किरदारों को संजीदगी से निभाया है। लंबे समय बाद बातों बातों में वाले रंजीत चौधरी इस फिल्म में दिखाई पड़े। कलाकारों ने फिल्म को संवारने में कोई कोताही नहीं की है, फिर भी फिल्म संभल नहीं पाई है।

लाहौर से जुड़े हिंदी फिल्मों के तार

-अजय ब्रह्मात्मज
लाहौर से हिंदी फिल्मों का पुराना रिश्ता रहा है। उल्लेखनीय है कि आजादी के पहले हिंदी सिनेमा के एक गढ़ के रूप में स्थापित लाहौर में फिल्म इंडस्ट्री विकसित हुई थी। पंजाब, सिंध और दूसरे इलाकों के कलाकारों और निर्देशकों के लिए यह सही जगह थी। गौरतलब है कि 1947 में हुए देश विभाजन के पहले लाहौर में काफी फिल्में बनती थीं। यहां तक कि मुंबई में बनी हिंदी फिल्मों के प्रीमियर और विशेष शो आवश्यक रूप से लाहौर में आयोजित किए जाते थे। एक सच यह भी है कि यहीं अशोक कुमार को देखने के बाद देव आनंद के मन में ऐक्टर बनने की तमन्ना जागी थी।
वैसे भी, आजादी के पहले लाहौर भारत का प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र था। गौरतलब है कि 1947 में देश विभाजन के बाद लाहौर से कुछ कलाकार और फिल्मकार मुंबई गए और मुंबई से कुछ कलाकार लाहौर आ गए। गौर करें, तो मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री आजादी के बाद तेजी से विकसित हुई। लाहौर में कुछ समय तक फिल्में अच्छी तादाद में बनती रहीं, लेकिन पर्याप्त दर्शकों के अभाव में हर साल फिल्मों की संख्या घटती ही चली गई। धीरे-धीरे स्टूडियो बंद होते गए। फिल्म निर्माण की गतिविधियों से गुलजार रहने वाले इलाके रॉयल पार्क में आज दूसरे किस्म की चहल-पहल है। दरअसल, भारत और पाकिस्तान में लोग यह भूल चुके हैं कि हिंदी फिल्मों के विकास में लाहौर की क्या भूमिका रही है? दोनों देशों के फिल्म अध्येताओं ने कभी लाहौर और मुंबई के टूटे-जुड़े तारों को देखने-दिखाने की कोशिश ही नहीं की।
लाहौर में बहुत कम फिल्में बनती हैं। हालांकि हिंदी और पंजाबी में कभी-कभी एक-दो फिल्में आ जरूर जाती हैं, लेकिन यहां के दर्शकों के बीच फिल्में देखने की रुचि कम नहीं हुई है। हालांकि हिंदी फिल्में अवैध तरीके से लाहौर एवं पूरे पाकिस्तान में बड़े चाव से देखी जाती हैं। यश चोपड़ा और महेश भट्ट सरीखे फिल्मकार दोनों देशों के बीच फिल्मों के परस्पर प्रदर्शन की वकालत करते रहे हैं। वैसे, सरकारी स्तर पर इधर अच्छे संकेत मिल रहे हैं। गत 4 अप्रैल को भारत में पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए का प्रदर्शन हुआ, तो उससे एक-दो हफ्ते पहले पाकिस्तान में अब्बास-मस्तान की रेस और आमिर खान की तारे जमीं पर रिलीज हुई। लाहौर में भारत के सभी एंटरटेनमेंट चैनल्स दिखते हैं। लाहौर और पाकिस्तान की पत्र-पत्रिकाओं में हिंदी फिल्मों के सितारों की खबरें छपती रहती हैं। माल रोड पर हर इतवार को एक गली में पुरानी किताबों की दुकानें लगती हैं, जहां पुरानी फिल्मी पत्रिकाएं आसानी से मिल जाती हैं। पाकिस्तान से उर्दू में ऐसी कई पत्रिकाएं भी निकलती हैं, जिनमें तीन-चौथाई से ज्यादा सामग्री हिंदी फिल्मों से ही संबंधित होती हैं। टीवी चैनलों और अखबारों में फिल्मी खबरों और गतिविधियों को स्थान मिलता है।
पाकिस्तान में हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता का अनुमान लाहौर के लोगों की रुचि से लगाया जा सकता है। लाहौर के बाजारों और सड़कों पर दुकानों, पोस्टर्स और होर्डिग्स से झांकते हिंदी फिल्मों के सितारे इस रुचि और स्वीकृति का सबूत हैं। इन दिनों पंजाब के गायकों को भी हिंदी फिल्मों में जगह मिल रही है। उस्ताद नुसरत फतह अली से आरंभ हुआ यह सिलसिला राहत अली खां के जरिए आगे बढ़ रहा है। लाहौर में म्यूजिक की दुनिया में ऐक्टिव कलाकार रिकॉर्डिग और वीडियो शूटिंग के लिए मुंबई की ओर रुख करते रहते हैं। ये सभी बातें इस बात की संभावना जता रहे हैं कि दोनों देशों के मध्य फिल्मों की गतिविधियां दिन ब दिन बढ़ रही हैं। अगर पाकिस्तान में बनी फिल्मों को भारत का बाजार मिल जाए और भारतीय फिल्मों का प्रदर्शन पाकिस्तान में मुमकिन हो सके, तो दोनों देशों की फिल्म इंडस्ट्री को फायदा होगा। साथ ही, इसमें दोनों देशों के दर्शकों का फायदा भी निहित है।

Thursday, April 17, 2008

बॉक्स ऑफिस: १७.०४.२००८

अभिनेता से निर्देशक बने अजय देवगन की फिल्म यू मी और हम को पूरी सराहना मिली, लेकिन उसे आमिर खान की फिल्म तारे जमीन पर जैसी कामयाबी नहीं मिल सकी। फिर भी महानगरों में इस फिल्म को दर्शक मिले और ऐसा कहा जा रहा है कि मौखिक प्रचार से फिल्म को फायदा हुआ।
सोमवार को इस फिल्म का बिजनेस उस रफ्तार से नहीं घटा, जिसकी आशंका थी। हालांकि फिल्म छोटी थी, पर इंटरवल के बाद के अनावश्यक विस्तार के कारण फिल्म लंबी लगी। फिल्म रोचक न लगे तो दो घंटे की फिल्म भी लंबी लग सकती है।
जयदीप सेन निर्देशित क्रेजी 4 ने बॉक्स आफिस पर सामान्य बिजनेस किया। यों उम्मीद थी कि रितिक रोशन और शाहरुख खान के आयटम की वजह से दर्शकों की भीड़ बढ़ेगी। शायद दर्शक समझदार हो गए हैं। वे आयटम सॉन्ग के झांसे में नहीं आते। और फिर इस फिल्म को लेकर उठा विवाद राकेश रोशन के हित में नहीं रहा। फिल्म में चार प्रतिभाशाली कलाकार थे, लेकिन उन्हें ऐसी स्क्रिप्ट नहीं मिली कि वे कमाल दिखा सकें।
पिछली फिल्मों में शौर्य और भ्रम के दर्शक निरंतर घटते जा रहे हैं। इन फिल्मों से विशेष उम्मीद भी नहीं थी। पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए को सीमित दर्शक मिले हैं। यह फिल्म ज्यादातर सिनेमाघरों में एक शो में चलने के कारण टिकी हुई है और अभी तक दर्शकों को आंशिक रूप से खींच रही है।

Wednesday, April 16, 2008

लाहौर से लौटा चवन्नी

चवन्नी पिछले दिनों लाहौर में था.लाहौर में उसकी रूचि इसलिए ज्यादा थी आज़ादी के पहले लाहौर फ़िल्म निर्माण का बड़ा सेंटर हुआ करता था.कोल्कता,मुम्बई और लाहौर मिलकर हिन्दी फिल्मों का अनोखा त्रिकोण बनाते थे.आज़ादी के बाद भारत-पाकिस्तान के नज़रिये से देखने के कारन १९४७ में बनी ने सीमा के बाद दोनों ही देशों के सिनेप्रेमियों ने लाहौर के योगदान को भुला दिया.पाकिस्तान तो नया देश बना था.उसके साथ पहचान का संकट था या यों कहें कि उसे नई पहचान बनानी थी,इसलिए उसने विभाजन से पहले के भारत से जुड़ने वाले हर तार को कटा.इसी भूल में पाकिस्तान में लाहौर में बनी हिन्दी फिल्मों कि यादें मिटा दी गयीं.१९४७ के बाद बनी फिल्मों को पाकिस्तानी(उर्दू) फिल्में कहा गया और कोशिश कि गई कि उसे हिन्दी फिल्मों से अलग पहचान और स्थान दी जाए.अपने यहाँ भारत में भी किसी ने लाहौर के योगदान को रेखांकित करने कि कोशिश नहीं कि.हम इस प्रमाद में रहे कि हम किस से कम हैं?

याद करें तो आज़ादी और विभाजन के बाद बड़ी तादाद में कलाकार और तकनीशियन लाहौर से मुम्बई आए और कुछ मुम्बई से लाहौर गए.दोनों जगहों पर उन सभी ने बदले माहौल में नए तरीके से सिनेमा कि बेल को सींचा.यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुम्बई का सिनेमा तेजी से विक्सित हुआ,जबकि लाहौर का सिनेमा पुरानी ऊर्जा से कुछ समय तक चलता रहा,लेकिन २० साल बीतते-बीतते उसने दम तोड़ दिया.विभाजन के पहले सिर्फ़ लाहौर में ११ स्टूडियो थे.पंचोली स्टूडियो का अपना नाम था.आज उनमें से कोई भी स्टूडियो नहीं बचा है.हाँ,पाकिस्तान बनने के बाद जो स्टूडियो बने ...वे हैं,लेकिन नाम के लिए ही.अभी साल में बमुश्किल ४ फिल्में बन पाती हैं।

चवन्नी चाहता है कि लाहौर,मुम्बई और कोल्कता के बीछ के खोये और समान लिंक को रेखांकित किया जाए.अगर इस सम्बन्ध में आप कोई मदद करें तो चवन्नी को खुशी होगी.चवन्नी लाहौर में डॉ। ओमर आदिल से मिला.उनहोंने ने पाकिस्तान टीवी के लिए एक सीरीज़ बनाई थी,जिसमें आज़ादी के पहले लाहौर और वहाँ बनी फिल्मों कि बातें की गई थीं.

Thursday, April 10, 2008

सरकारी सेंसर के आगे..

-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले दिनों फिक्की फ्रेम्स में अभिव्यक्ति की आजादी और सामाजिक दायित्व पर परिसंवाद आयोजित किया गया था। इस परिसंवाद में शर्मिला टैगोर, प्रीतिश नंदी, श्याम बेनेगल, जोहरा चटर्जी और महेश भट्ट जैसी फिल्मों से संबंधित दिग्गज हस्तियां भाग ले रही थीं। गौरतलब है कि शर्मिला टैगोर इन दिनों केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की चेयरमैन हैं, जिसे हम सेंसर बोर्ड के नाम से जानते रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि सेंसर शब्द हट जाने के बाद भी फिल्म ट्रेड में प्रचलित है। बहरहाल, उस दोपहर शर्मिला टैगोर अभिभावक की भूमिका में थीं और सभी को नैतिकता का पाठ पढ़ा रही थीं। उन्होंने फिल्मकारों को उनके दायित्व का अहसास कराया। इसी प्रकार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से संबंधित जोहरा चटर्जी यही बताती रहीं कि सरकार ने कब क्या किया?
श्याम बेनेगल बोलने आए, तो उन्होंने अपने अनुभवों के हवाले से अपनी चिंताएं जाहिर कीं। उन्होंने बताया कि मुझे अपनी फिल्मों को लेकर कभी परेशानी नहीं हुईं। मैं जैसी फिल्में बनाता हूं, उनमें मुझे केवल सेंसर बोर्ड के दिशानिर्देश का खयाल रखना पड़ता था। मेरी या किसी और की फिल्म को सार्वजनिक प्रदर्शन का अनुमति-पत्र इसी संस्था से मिलता है। फिल्म को प्रदर्शन से रोकने या काट-छांट की सलाह भी बोर्ड ही देता। आज भी कागजी तौर पर यही स्थिति है। अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने आगे कहा कि मैं अपनी ताजा फिल्म को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरत रहा हूं। मेरी सावधानी की वजह बोर्ड की हिदायतें नहीं हैं। मैं उन सभी को लेकर सचेत हूं, जो देश के कोने-कोने में मौजूद हैं और किसी छोटी एवं अनर्गल मुद्दे के बहाने से शोर कर सकते हैं। उनके शोर से घबराकर प्रशासन कानून और व्यवस्था की आड़ में फिल्म पर रोक लगा देता है। मैं नहीं चाहता कि मेरी फिल्म किसी एक संवाद या गाने की किसी एक पंक्ति के कारण किसी के निशाने पर आ जाए। उन्होंने आजा नचले का उदाहरण दिया और जोर देकर कहा कि इस फिल्म के एक गाने की जिस पंक्ति पर आपत्ति की गई, वह तो सदियों से हमारे मुहावरे में प्रचलित है! फिर भी हंगामा बरपा और फिल्म के बिजनेस का नुकसान हुआ!
श्याम बेनेगल के कहने का आशय यही था कि उन्हें अभी केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से ज्यादा चिंता, बोर्ड के बाहर मौजूद समाज की करनी पड़ रही है। उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाई जा रही ऐसी अतिरिक्त पाबंदी के ट्रेंड को खतरनाक माना और कहा कि समय रहते इसे रोक देना चाहिए। महेश भट्ट का पक्ष आक्रामक था। उन्होंने अपनी फिल्म जख्म और हाल की फिल्म परजानिया काउदाहरण देते हुए प्रश्न उठाया कि कैसे केन्द्र में बैठी सरकार अपनी पसंद-नापसंद हम पर लादती है! उन्होंने बताया कि जख्म को तत्कालीन सरकार ने तब प्रदर्शन की अनुमति दी, जब मैंने फिल्म के दंगों के दृश्यों में शामिल दंगाइयों की भगवा पट्टी का रंग बदला। आज की सरकार के एजेंडा में परजानिया फिट बैठती है, तो उसने उस पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं लगाई! उन्होंने बताया कि हमारी अभिव्यक्ति की आजादी वास्तव में पिंजड़े की आजादी है। हम अपने फड़फड़ाते पंख की आवाज सुनकर ही उड़ने काअहसास पाल लेते हैं। प्रचलित भाषा में सेंसर बोर्ड यानी केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की अनुमति के बाद विभिन्न समुदायों, संस्थाओं, व्यक्तियों और धर्मो की आपत्तियों के बाद कानून और व्यवस्था की समस्या बता कर फिल्म का प्रदर्शन रोक देना गलत है। दरअसल, यह प्रशासन की ही जिम्मेदारी है कि वह फिल्मों के सुरक्षित प्रदर्शन की व्यवस्था करे। ऐसा लग रहा है कि प्रशासन ऐसे मामलों में सख्ती नहीं बरत रहा है। जोधा अकबर का प्रदर्शन जिस तरह से रोका गया, वह वास्तव में खतरे की घंटी है। वक्त आ गया है कि आजादी की अभिव्यक्ति के पैरोकार और समर्थक सामने आएं और कोई रास्ता सुझाएं। और उसके लिए सरकार को ही इस संबंध में पहल करनी होगी। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और गृह मंत्रालय के मंत्रियों और अधिकारियों को मिलकर कड़े फैसले लेने होंगे। लोकतंत्र में विरोध और असहमति की गुंजाइश रहनी चाहिए, लेकिन वह पारदर्शी और समुचित हो।

Wednesday, April 9, 2008

बॉक्स ऑफिस :१०.०४.२००८

पिछले हफ्ते तीन फिल्में रिलीज हुई। तीनों का ही बॉक्स आफिस पर बुरा हाल रहा। किसी भी फिल्म को बीस प्रतिशत से अधिक दर्शक नहीं मिले।
पाकिस्तान से आई खुदा के लिए के प्रति उत्सुकता थी। मुंबई में इसे दर्शक भी मिले। बाकी शहरों में दर्शकों ने अधिक रुचि नहीं दिखाई। इस फिल्म की रिलीज से दर्शक वाकिफ नहीं थे। अगर इस फिल्म का कायदे से प्रचार किया गया होता तो और ज्यादा दर्शक मिल सकते थे। हां, समीक्षकों ने इसे अधिक पसंद किया। इस फिल्म में कोई बड़ा स्टार नहीं था, इसलिए फिल्म को आरंभिक दर्शक नहीं मिले।
शौर्य जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करने के बावजूद होम वीडियो के जरिए दर्शकों के बीच बनी रहती हैं। समर खान को अपनी फिल्म की ऐसी ही मौजूदगी से संतुष्ट होना पड़ेगा। पवन कौल की भ्रम को लेकर दर्शक भ्रमित नहीं रहे। वे सिनेमाघरों में नहीं गए।
अश्वनी धीर की वन टू थ्री भी दर्शकों ने खारिज कर दी। आम तौर पर कामेडी फिल्में औसत व्यवसाय कर लेती हैं, लेकिन इस फिल्म का अनुभव अच्छा नहीं रहा।
अब्बास मस्तान की रेस के दर्शक कम हुए हैं। यह फिल्म बड़े शहरों में अभी तक ठीक-ठाक व्यवसाय कर रही है, लेकिन छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन में फिल्म टिकी नहीं रह सकी। बॉक्स office

Tuesday, April 8, 2008

प्यार का मर्म समझाएगी यू मी और हम : अजय देवगन

अप्रैल का महीना अजय के लिए खुशियों की सौगात बनकर आया है। दो अप्रैल को अजय का जन्मदिन था और इसी शुक्रवार उनके निर्देशन में बनी पहली फिल्म यू मी और हम प्रदर्शित हो रही है। यही नहीं फिल्म की नायिका उनकी पत्नी काजोल है। अजय ब्रह्मात्मज इस मौके पर उनसे खास बातचीत की-
निर्देशन में आने का फैसला क्यों लिया?
निर्देशन वैसे ही मेरा पहला पैशन था। एक्टर बनने से पहले मैं सहायक निर्देशक था और अपनी फिल्में बनाता था। मैंने तो सोचा भी नहीं था कि एक्टर बनना है। मेरा ज्यादा इंटरेस्ट डायरेक्शन में था। एक्टिंग में तो मुझे धकेल दिया गया कि चलो फूल और कांटे फिल्म कर लो। वह फिल्म हिट हो गयी और मेरा रास्ता ही बदल गया। मैं एक्टिंग में चला गया।
एक स्थापित एक्टर को निर्देशक की कुर्सी पर बैठने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
बहुत ज्यादा मैंने नहीं सोचा कि अभी मुझे डायरेक्ट करना है, इसलिए कोई सब्जेक्ट खोजूं। ऐसा इरादा भी नहीं था। मैंने अपने दिल की बात मानी। एक विचार दो-तीन सालों से मुझे मथ रहा था। मैं उसे बनाना चाहता था। ऐसा इसलिए क्योंकि अपने आइडिया को सबसे अच्छे तरीके से मैं ही अभिव्यक्त कर पाऊंगा।
फिल्म को लेकर मन में अनेक विचार आते होंगे, क्या कहते है?
यह पूरी तरह से कॉमर्शियल और एंटरटेनिंग फिल्म है। इसमें भरपूर कॉमेडी है। पूरा ड्रामा है। इमोशंस हैं। हिंदी पिक्चर का कंपलीट पैकेज है। गाने हैं। उस दायरे में रहते हुए फिल्म बनायी है। मेरे लिए फिल्ममेकिंग की सबसे ज्यादा जरूरी चीज यही लगती है कि आप पब्लिक को एंटरटेन करें। वे खुश होकर सिनेमाघर से निकलें। विचार के बारे में बताऊं तो मुझे लगा कि हमलोग इतने नकारात्मक माहौल में जी रहे हैं। कोई अच्छी बात बोलने की कोशिश नहीं कर रहा है। अब अगर प्यार की ही बात करें, संबंधों की बात करें या पति-पत्नी की बात करें तो आप जिधर देखो उधर तलाक हो रहे हैं। लोग कहते हुए मिल जाएंगे कि यार प्यार तो था, लेकिन अब जम नहीं रही है। मैंने महसूस किया कि रोमांटिक चीजों को जस्टीफाई करना ही नहीं चाहिए। जस्टीफाई करने पर जिंदगी का एहसास कम हो जाता है। अगर आप किसी लड़की के प्रति आकर्षित होते हैं तो विज्ञान के मुताबिक वह केमिकल रिएक्शन है। अगर आप ऐसे विश्लेषण करने लगे तो प्यार का चार्म ही खत्म हो जाता है। जो लोग कहते हैं कि प्यार नहीं रहा। उनके बारे में मेरा यही कहना है कि या तो वे तब गलत थे या अब गलत हैं। विवाह में कुछ गलत नहीं है। गलत आप हैं। संबंधों में कोई कमी नहीं होती। कमी हमारे अंदर पैदा होती है।
एक ऐसे समय में जब सारे संबंध और एहसास मर रहे हैं, तब एक फिल्मकार के तौर पर आप कैसे उन्हें जीवित रखने की वकालत कर रहे हैं?
आस्था, एहसास और विश्वास से हमें ऊर्जा मिलती है। मेरा कहना है कि हर आदमी की जिंदगी में समस्याएं आती हैं, लेकिन समस्याएं इंसान से बड़ी नहीं होतीं। इंसान ही उसे बड़ा बनाता है। आप समस्या के बारे में सोचने के बजाए उसके समाधान के बारे में सोचेंगे तो हर आदमी अपनी समस्या का हल खोज सकता है।
आस्था, एहसास और विश्वास की बात कर रहे हैं आप। इस भाव को फिल्म में कैसे व्यक्त किया गया है?
मेरी फिल्म में तीन जोड़ियां हैं। एक जोड़ी है, जो अपनी शादी से खुश नहीं है। उनकी नाखुशी की वजह यह नहीं है कि उनकी जिंदगी में कोई तीसरा आदमी या औरत मौजूद है। वे एक- दूसरे से ही नाखुश रहते हैं। वजह पूछो तो छोटी-मोटी बातें बताते हैं। एक अविवाहित जोड़ी है, जो बहुत खुश रहती है। उन्हें लगता है कि हमारे संबंध ऐसे ही इतने खूबसूरत हैं तो शादी क्यों करे? एक मुख्य जोड़ी है। वे मिलते हैं। उनमें प्यार होता है। कैसे वे शादी करते हैं और कैसे उनकी जिंदगी में तकलीफ भी आती है। वे हंसते-हंसते तकलीफ का सामना करते हैं और साथ रहते हैं। मुख्य जोड़ी की जिंदगी को देखकर नाखुश जोड़ी सबक लेती है। जो अविवाहित हैं, वे प्रेरित होकर शादी कर लेते हैं। इसी भाव को ड्रामा, इमोशन और ह्यूमर के जरिए कहा गया है।
हिंदी फिल्मों के जिस दायरे की बात आप कर रहे हैं, उसे आप खासियत मानते हैं, लेकिन क्या नाच-गाना और ड्रामा-ह्यूमर से फिल्मकार की सीमाएं नहीं तय हो जातीं?
अगर आप स्क्रिप्ट पर ठीक से काम करें और हिंदी फिल्म के दायरे को याद रखें तो कोई सीमा नहीं बनती। हम फिल्में बनाते हैं पब्लिक के लिए, पब्लिक को यह सब अच्छा लगता है। अगर दायरे मे रह कर फिल्म की प्लानिंग करें तो वह खासियत बन जाती है। मैं अपनी फिल्म की बात करूं तो मेरा हर गाना फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाता है। अगर आप मेरी फिल्म के गाने ही ध्यान से सुन लें तो आप को कहानी समझ में आ जाएगी। मैं इसका श्रेय विशाल और मुन्ना को दूंगा। यह आप पर निर्भर करता है कि आप उसे अपनी सीमा बनाते हैं या खासियत। स्क्रिप्ट पूरी हो जाने के बाद कुछ जोड़ा जाता है तो वह चिप्पी की तरह लगता है।
हां, अगर आप खुद ही निर्माता, निर्देशक और एक्टर हैं तो क्रिएटिव रिस्क भी ले सकते हैं। यू मी और हम की बात करें तो हम क्या नया देखेंगे?
रिस्क जैसा तो नहीं लिया है। मैंने बेहतरीन फिल्म बनाने की कोशिश की है। कितनी बेहतरीन हो पाई है? यह तो दर्शक तय करेंगे। मैंने बाजार और हिंदी फिल्मों के दर्शकों की रुचि का खयाल रखा है। इस फिल्म में चौंकाने वाली कोई बात नहीं है। मैंने कुछ कहने की अवश्य कोशिश की है। इसमें ज्यादा मेहनत लगती है। कॉमर्शियल ढांचे में रह कर लोगों को एंटरटेन करते हुए ऐसी दो बातें कह जाएं जो दर्शकों को याद रह जाएं। मेरा इरादा यह नहीं है कि फिल्म देखने के बाद कोई दंपति ताली बजाए। अगर बैठे-बैठे उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया तो मुझे लगेगा कि मेरी फिल्म कामयाब हो गयी है। अगर कोई अकेले फिल्म देख रहा है तो वह फिल्म देखने के बाद अपनी बीवी या प्रेमिका को फोन करे कि मैं तुम्हें मिस कर रहा हूं। अभी तक जिन लोगों ने फिल्म देखी है, उनकी यही राय है।
एक बार पहले भी आपने कुछ कहने की कोशिश की थी। राजू चाचा को आज किस रूप में देखते हैं?
उस फिल्म के जरिए मैंने कुछ कहने की कोशिश नहीं की थी। वह बहुत खूबसूरत फिल्म थी। आज भी लोग उसकी तारीफ करते हैं।
पिछले आठ-दस सालों में अजय देवगन में क्या परिव‌र्त्तन आया है?
उम्र बढ़ने के साथ हम सभी मैच्योर होते हैं। छोटी उम्र में अनुभव कम होने से कुछ फैसले हम भावावेश में ले लेते हैं। अनुभव होने पर आप बिजनेस समझने लगते हैं। मैंने बिजनेस का यह पक्ष सीख लिया है। क्रिएटिव तौर पर यह सीखा है कि कोई समझौता नहीं करना चाहिए। अगर आप ही प्रोड्यूसर और डायरेक्टर हैं तो यह झगड़ा कम हो जाता है। मेरे पास टीम बहुत अच्छी है। मुझे टीम के साथ काम करना आ गया है।
कहते हैं डायरेक्टर ही टीम का कप्तान होता है। आज के माहौल में यह बात कितनी सच रह गयी है?
आज भी यही सच है। डायरेक्टर ही कप्तान है और रहेगा। फिल्म का विजन उसका होता है। फिल्म उसको नजर आती है। क्या चाहिए और क्या नहीं चाहिए? यह किसी और को नजर आ ही नहीं सकता। उसका संबंध फिल्म के हर दृश्य और किरदार से रहता है। सीन और शॉट के बारे में वही फैसला ले सकता है। बाकी टीम को उसका कहा मानना चाहिए। डायरेक्टर की सोच को निखारने का काम उसकी टीम करती है।
काजोल कम फिल्में क्यों कर रही हैं?
वह पहले से ही ऐसा कर रही हैं। साल में एक-दो फिल्में ही करती रही हैं। अब भी यह नहीं है कि वह साल में चार फिल्में करेंगी। शादी के बाद उन्हें कोई फिल्म पसंद नहीं आई। मैंने कहानी सुनाई तो उन्होंने फट से हां कह दिया। उन्होंने मुझे ज्यादा चार्ज कर दिया। काजोल ने कहा कि तुम बनाओ। मैं इसमें काम करूंगी। उन्होंने कॅरियर और परिवार के बीच अच्छा संतुलन बिठाया है।
काजोल को अभिनेत्री के तौर पर आप कैसे देखते हैं और उन्हें निर्देशित करना कितना आसान या मुश्किल रहा, क्योंकि वह आप की बीवी भी हैं?
एक्ट्रेस के तौर पर उनके बारे में मुझे कुछ कहने या बताने की जरूरत नहीं है। इसके बारे में दुनिया जानती है। वह स्पॉनटेनियस एक्ट्रेस है। वह शॉट देने के पहले ज्यादा नहीं सोचतीं। वह बहुत ईमानदार है। उनकी ईमानदार स्क्रीन पर दिखती है। वह अंदर से महसूस कर किरदार में उतार देती है। निर्देशक के तौर पर आप को कम ज्यादा लग रहा हो तो आप बता दें। इस फिल्म में आप को उनके टलेंट के नए पहलू दिखाई पड़ेंगे।

Friday, April 4, 2008

खुदा के लिए: मुस्लिम समाज का सही चित्रण

-अजय ब्रह्मात्मज
पाकिस्तान से आई फिल्म खुदा के लिए वहां के हालात की सीधी जानकारी देती है। निर्देशक शोएब अख्तर ने अमेरिका, ब्रिटेन और पाकिस्तान की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान के उदारमना मुसलमानों की मुश्किलों को कट्टरपंथ के उभार के संदर्भ में चित्रित किया है। उन्होंने बहुत खूबसूरती से जिहाद की तरफ भटक रहे युवकों व कट्टरपंथियों की हालत, 11 सितंबर की घटना के बाद अमेरिका में मुसलमानों के प्रति मौजूद शक, बेटियों के प्रति रुढि़वादी रवैया आदि मुद्दों को पर्दे पर उतारा है। ताज्जुब की बात है कि ऐसी फिल्म पाकिस्तान से आई है।
पाकिस्तान में मंसूर और उसके छोटे भाई को संगीत का शौक है। दोनों आधुनिक विचारों के युवक हैं। उनके माता-पिता भी उनका समर्थन करते हैं। छोटा भाई एक दोस्त की सोहबत में कट्टरपंथी मौलाना से मिलता है और उनके तर्कों से प्रभावित होकर संगीत का अभ्यास छोड़ देता है। माता-पिता उसके स्वभाव में आए इस बदलाव से दुखी होते हैं। बड़ा भाई संगीत की पढ़ाई के लिए अमेरिका चला जाता है। वहां उसकी दोस्ती एक अमेरिकी लड़की से होती है। वह उससे शादी भी कर लेता है। 11 सितंबर की घटना के बाद उसे आतंकवादियों से संबंध रखने के शक के कारण गिरफ्तार कर लिया जाता है। उसे इतना परेशान किया जाता है कि वह विक्षिप्त हो जाता है।
दूसरी तरफ, ब्रिटेन में बसे मंसूर के चाचा को अचानक परिवार की मर्यादा का ख्याल आता है। वह अपनी बेटी मैरी के अंग्रेज प्रेमी की खबर पाते ही झूठ बोल कर उसे पाकिस्तान ले आते हैं और जबरन उसकी शादी अपने भतीजे से करवा देते हैं। वह मंसूर का छोटा भाई है, जो जिहाद के रास्ते पर चल पड़ा है। मैरी अपने अंग्रेज पे्रमी तक जबरन शादी की सूचना भेजने में सफल हो जाती है। पाकिस्तान स्थित ब्रिटिश दूतावास के अधिकारी सक्रिय हो जाते हैं। पाकिस्तान की कोर्ट में मुकदमा चलता है। वहां मौलाना वली की दलीलों से कट्टरपंथ के तर्कों की बखिया उघेड़ी जाती है। मुस्लिम समाज के प्रति मौजूद भ्रांतियों को यह फिल्म एक हद तक दूर करती है। निश्चित ही कट्टरपंथ उभार पर है, लेकिन उसका विरोध भी उसी समाज में हो रहा है।
तकनीकी दृष्टि से भारतीय फिल्मों से खुदा के लिए की तुलना करें तो यह पिछली सदी के आठवें दशक की फिल्म लगती है। पटकथा और संपादन में खामियां और कमियां नजर आती हैं। इस फिल्म का कथ्य मजबूत और प्रासंगिक है। कलाकारों में हिंदी फिल्मों के नसीरूद्दीन शाह का किरदार और उनकी भूमिका प्रभावशाली है। मंसूर की भूमिका में शान ने सुंदर अभिनय किया है। अन्य कलाकारों का अभिनय भी कहानी की मांग पूरी करता है। फिल्म का संगीत बेहतरीन है।

Thursday, April 3, 2008

अभिनेत्रियों का अभिनय

-अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियों को आप एक तरफ से देखें और उन पर जरा गौर करें और फिर बताएं कि उनमें से कितनी अभिनेत्रियां गंभीर और गहरी भूमिकाओं के लिए उपयुक्त हैं! इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारी ज्यादातर अभिनेत्रियां ग्लैमरस रोल के लिए फिट हैं और वे उनमें आकर्षक भी लगती हैं, लेकिन जैसे ही उनकी भूमिकाओं को निर्देशक गहरा आयाम देते हैं, वैसे ही उनकी उम्र और सीमाएं झलकने लगती हैं। एक सीनियर निर्देशक ने जोर देकर कहा कि हमारी इंडस्ट्री में ऐसी अभिनेत्रियां नहीं हैं कि हम बंदिनी, मदर इंडिया, साहब बीवी और गुलाम जैसी फिल्मों के बारे में अब सोच भी सकें। उन्होंने ताजा उदाहरण खोया खोया चांद का दिया। इस फिल्म में मीना कुमारी की क्षमता वाली अभिनेत्री चाहिए थी। सोहा अली खान इस भूमिका में चारों खाने चित्त होती नजर आई। सोहा का उदाहरण इसलिए कि उन्होंने खोया खोया चांद जैसी फिल्म की। अगर अन्य अभिनेत्रियों को भी ऐसे मौके मिले होते, तो शायद उनकी भी कलई खुलती! अभी की ऐक्टिव अभिनेत्रियों में केवल ऐश्वर्या राय ही गंभीर और गहरी भूमिकाओं के साथ न्याय कर सकती हैं। उनकी देवदास और चोखेर बाली के सबूत दिए जा सकते हैं। हां, देवदास में माधुरी दीक्षित ने भी साबित किया था कि अगर उन्हें ऐसी चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं दी जाएं, तो वे उन्हें बखूबी निभा सकती हैं। उन्होंने प्रकाश झा की फिल्म मृत्युदंड में दमदार रोल किया था और उसके लिए वाजिब पुरस्कार भी जीता। मनीषा कोइराला में वह लुक और क्षमता है, लेकिन उन्होंने अपने करियर के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई। तब्बू भी हैं, लेकिन वे इन दिनों मुंबई से नदारद हैं। थोड़ी पहले की पीढ़ी में काजोल हैं। फना में तो वे ठीक लगी थीं। देखना है कि फिल्म यू मी और हम में उनकी यह क्षमता सामने आती है कि नहीं? इस फिल्म में उम्रदराज पिया के रोल में दर्शक उन्हें भी जांच लेंगे।
अब आज की लोकप्रिय अभिनेत्रियों को परखें। करीना कपूर चमेली और ओमकारा में झलक मात्र दे पाई। दोनों ही फिल्मों के निर्देशकों ने उनकी अभिनय क्षमता की सीमाओं का खयाल रखते हुए किरदार को अधिक गहराई नहीं दी। जब वी मेट में करीना की बहुत तारीफ हो रही है, लेकिन यह किरदार अपने चुलबुलेपन के कारण ज्यादा पसंद किया गया। इंटरवल के बाद बगैर मेकअप की करीना को देख कर दर्शक हंस रहे थे। उनकी बड़ी बहन करिश्मा कपूर को फिजा और जुबैदा में लगभग इसी तरह की चुनौती मिली थी। हालांकि उन्होंने मेहनत भी की, किंतु अनुभव और अभिनय की अपनी सीमाओं के कारण वे दर्शकों को प्रभावित करने में असफल रहीं। डोर फिल्म के रोल के लिए आयशा टाकिया को काफी तारीफ मिली, लेकिन घाघरा पहनी औरत उस गति और मुद्रा में भाग ही नहीं सकती। आयशा का दौड़ना वास्तव में जींस पहनने वाली लड़की का दौड़ना है। उनके बैठने-उठने में भी गंवई टच नहीं था। आज की अभिनेत्रियां बॉडी लैंग्वेज की बातें तो करती हैं, लेकिन उनके अभिनय में किरदार के हिसाब से बॉडी लैंग्वेज में बदलाव नहीं दिखता। यही कारण है कि वे गंभीर और गहरी भूमिकाओं के लिए उपयुक्त नहीं लगतीं।
किरदार के हिसाब से बॉडी लैंग्वेज का बदलाव देखना हो, तो हाल ही में आई संजय गुप्ता की फिल्म दस कहानियां में रोहित राय निर्देशित राइस प्लेट कहानी देखें। दक्षिण भारतीय बुजुर्ग महिला के किरदार को शबाना आजमी ने बड़ी खूबसूरती से आत्मसात किया है। शबाना को उस चरित्र में देखकर लगा था जैसे वे उस किरदार में ढल गई। आज की अभिनेत्रियों की एक बड़ी समस्या भाषा भी है। फिर यह सब यों ही नहीं आते! इसके लिए अभिनय की तालीम जरूरी है।

Tuesday, April 1, 2008

मैसेज भी है क्रेजी 4 में: राकेश रोशन


राकेश रोशन ने अपनी फिल्म कंपनी फिल्मक्राफ्ट के तहत अब तक जितनी भी फिल्में बनाई हैं, सभी का निर्देशन उन्होंने खुद किया है, लेकिन क्रेजी-4 उनकी कंपनी की पहली ऐसी फिल्म है, जिसे दूसरे निर्देशक ने निर्देशित किया है। फिल्म में खास क्या है, बातचीत राकेश रोशन से।
अपनी कंपनी की फिल्म क्रेजी 4 आपने बाहर के निर्देशक जयदीप सेन को दी। वजह?
बात दरअसल यह थी कि कृष के बाद मैं बहुत थक गया था। इसलिए सोचा कि साल-डेढ़ साल तक कोई काम नहीं करूंगा, लेकिन छह महीने भी नहीं बीते कि बेचैनी होने लगी। एक आइडिया था, इसलिए मैंने सोचा कि यही बनाते हैं। मैंने जयदीप सेन से वादा किया था कि एक फिल्म निर्देशित करने के लिए दूंगा। इसलिए उनसे आइडिया शेयर किया। वह आइडिया सभी को पसंद आया और वही अब क्रेजी 4 के रूप में आ रही है। जयदीप के अलावा, अनुराग बसु भी मेरे लिए एक फिल्म निर्देशित कर रहे हैं। उनकी फिल्म गैंगस्टर से प्रभावित होकर मैंने रितिक रोशन और बारबरा मोरी की फिल्म काइट्स उन्हें दी है। मैं आगे भी नए और बाहर के निर्देशकों को फिल्में दूंगा। मेरे अंदर ऐसा गुरूर नहीं है कि अपने बैनर की सारी फिल्में मैं ही निर्देशित करूं।
आइडिया आपका था, लेकिन दूसरा निर्देशक उसे अपने हिसाब से रचेगा। क्या इस तरह की आजादी आप दे पाएंगे?
बिल्कुल आजादी देता हूं, लेकिन मुझे जंचना चाहिए। और हां, अगर मुझे कोई खामी दिखती है, तो मैं सुझाव जरूर देता हूं। मैं उनके साथ बैठता हूं। मेरी सहमति के बाद ही वे आगे बढ़ते हैं। दरअसल, वे मेरे अनुभव का लाभ उठाना चाहते हैं। अगर उनके अंदर अहं नहीं है और मेरे अंदर अहंकार नहीं है, तो बेहतर काम होगा ही। वैसे, एक सच्चाई यह भी है कि अगर कोई निर्देशक सुनने को तैयार नहीं हो, तो मैं उसके साथ काम ही नहीं करूंगा।
क्रेजी 4 किस तरह की फिल्म है और निर्देशक ने कैसी फिल्म बनाई है?
यह सोशल मैसेज देने वाली एक अच्छी फिल्म है और जयदीप ने संतोषजनक काम किया है। दरअसल, क्रेजी 4 में हम एंटरटेनिंग तरीके से सोशल मैसेज दे रहे हैं। इस फिल्म के माध्यम से हम यह बताना चाहते हैं कि लोग किसी को डांट कर या प्रवचन देकर नहीं समझा सकते। हां, अगर रोचक और मनोरंजक तरीके से कोई बात कही जाए, तो उसका असर ज्यादा होता है। यह फिल्म अरशद वारसी, राजपाल यादव, इरफान और सुरेश मेनन पर है। मैंने उन्हें बुलाकर कहा था कि यह फिल्म आप लोगों के कारण ही चलेगी, क्योंकि आपके कैरेक्टर और परफॉर्मेस की फिल्म है। आप एक-दूसरे पर हावी होने की कतई कोशिश मत करिएगा।
माना जाता है कि फिल्म चाहे जिस भी विधा की हो, उसमें लव स्टोरी होनी ही चाहिए?
यह कहानी मेरे पास पहले से थी और मुझे अभी का वक्त इसके लिए सही लगा। वैसे, मुझे उम्मीद है कि दर्शक इसे पसंद करेंगे। मेरी अन्य फिल्मों की तरह यह भी एंटरटेनिंग फिल्म ही होगी।
फिल्म का मैसेज क्या है?
फिल्म रोचक तरीके से यह सवाल हल करती है कि हम जिन्हें क्रेजी समझ रहे हैं, क्या वे सचमुच क्रेजी हैं या यह दुनिया क्रेजी है? चारों किरदारों के जरिए यह बात बहुत ही खूबसूरत अंदाज में कही गई है।
फिल्म में शाहरुख खान, रितिक रोशन और राखी सावंत को एक साथ लाने की वजह कहीं यह तो नहीं है कि फिल्म कमजोर पड़ रही थी?
बिल्कुल नहीं, ये सब फिल्म की जरूरत के हिसाब से आए हैं। शाहरुख और राखी नहीं होते, तो कोई और होता। मैंने उन दोनों से रिक्वेस्ट की और दोनों मान गए, तो फिर किसी और को लेने का सवाल ही नहीं था। रितिक फिल्मक्राफ्ट के निदेशक भी हैं। वे फिल्म में चारों किरदारों को इंट्रोड्यूस करते हैं।