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Monday, March 31, 2008

हिंदी सिनेमा में हॉलीवुड का इन्टरेस्ट


-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों के ट्रेड पंडित भले ही संजय लीला भंसाली की फिल्म सांवरिया को फ्लॉप घोषित कर चुके हों, लेकिन मुंबई में सक्रिय सोनी पिक्चर्स के अधिकारी इस फिल्म से संतुष्ट हैं और इसीलिए वे आगे भी हिंदी फिल्म के निर्माण के बारे में सोच रहे हैं। सिर्फ सोनी पिक्चर्स ही नहीं, बल्कि हाल-फिलहाल में हॉलीवुड की अनेक प्रोडक्शन कंपनियों ने मुंबई में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है और इसीलिए वायाकॉम, डिज्नी, वार्नर ब्रदर्स, सोनी बीएमजी और ट्वेंटीएथ सेंचुरी फॉक्स के अधिकारी हिंदी फिल्मों के निर्माताओं के साथ संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं। कहते हैं, इस बार वे निश्चित इरादों और रणनीति के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की गलियों में घूम रहे हैं।
पिछले दिनों इंटरनेशनल पहचान की अभिनेत्री के इंटरव्यू के लिए प्रतीक्षा करते समय उनसे मिलने आए डिज्नी के अधिकारियों से मुलाकात हो गई। सारे अधिकारी अमेरिका से आए थे। उनके इरादों का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उनके विजिटिंग कार्ड में एक तरफ सारी जानकारियां हिंदी में छपी थीं। इन दिनों हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों के विजिटिंग कार्ड में हिंदी का अ भी नहीं होता। यह तथ्य इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि हर बार की तरह इस बार वे भारतीय भावनाओं को समझते हुए प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने उक्त अभिनेत्री के साथ एक बड़ी हिंदी फिल्म की बात की। डिज्नी ने यश चोपड़ा के साथ एनिमेशन फिल्म रोडसाइड रोमियो पूरी कर ली है। जुगल हंसराज निर्देशित इस एनिमेशन फिल्म में पॉपुलर स्टार सैफ अली खान और करीना कपूर ने आवाजें दी हैं।
उल्लेखनीय है कि वार्नर ब्रदर्स ने कुछ वर्ष पहले फिल्म वितरण के साथ हिंदी फिल्मों में कदम रखा था, लेकिन भारतीय दर्शक और फिल्म बाजार की सही समझ नहीं होने के कारण वे चूक गए। इसीलिए इस बार वे संभल कर आ रहे हैं। उन्होंने निखिल आडवाणी से उनकी फिल्म चांदनी चौक टू चाइना के लिए हाथ मिलाया है। हाल ही में सोनी बीएमजी ने विशेष फिल्म्स के साथ डील की है। सोनी बीएमजी के अधिकारी कुछ और प्रोडक्शन कंपनियों से भी बातें कर रहे हैं। इधर कुछ निर्देशकों ने बताया कि ट्वेंटीएथ सेंचुरी फॉक्स ने भारत में फिल्म निर्माण का फैसला कर लिया है। रुपर्ट मर्डोक की इस कंपनी ने स्टार टीवी के अधिकारियों को यह जिम्मेदारी सौंपी है। सूचनाओं के मुताबिक इस साल के अंत तक उनकी फिल्मों की घोषणा हो जाएगी। यूटीवी पहले से ही ट्वेंटीएथ सेंचुरी फॉक्स के साथ एम नाइट श्यामलन की फिल्म द हैपनिंग प्रोड्यूस कर रही है।
अभी चल रही इन गतिविधियों के नतीजे 2008 के अंत या 2009 के आरंभ में दिखने शुरू हो जाएंगे। माना जा रहा है कि हिंदी फिल्मों के प्रसार, प्रभाव और उनकी ताजा स्वीकृति को देखते हुए हॉलीवुड की बड़ी कंपनियों ने मुंबई का रुख किया है। हिंदी फिल्में अब यूके और यूएसए के पारंपरिक बाजारों से निकल रही हैं। जर्मनी और फ्रांस में दर्शकों को दीवाना बनाने के बाद नए देशों में भी उन्होंने आकर्षक दस्तक दी है। पिछले दिनों आशुतोष गोवारीकर की जोधा अकबर के प्रदर्शन ने 28 देशों में हिंदी फिल्मों के नए दर्शक तैयार किए। जाहिर-सी बात है कि हॉलीवुड की प्रोडक्शन कंपनियों और स्टूडियो की नजर इस बाजार पर है। संभव है कि नई रणनीति के तहत वे भारतीय कलाकार और तकनीशियनों को अपने यहां के प्रोडक्शन में शामिल करें।
अच्छी बात है कि हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक इस बार डरे हुए नहीं हैं। उन्हें यह नहीं लग रहा है कि हॉलीवुड के निर्माता अपनी गहरी जेबों और धैर्यपूर्ण सुनिश्चित मार्केटिंग से उनके बाजार और दर्शकों पर कब्जा कर लेंगे। एक अच्छी बात यह है कि ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक हॉलीवुड के साथ संयुक्त निर्माण की संभावनाओं के लिए तैयार हैं और उनसे हाथ मिला रहे हैं।

Wednesday, March 26, 2008

बॉक्स ऑफिस:२६.०३.२००८

पहली तिमाही की आखिरी फिल्म रेस से ट्रेड पंडितों की उम्मीद पूरी हो गई। इस फिल्म को ओपनिंग अच्छी मिली और पहले तीन दिनों में इसका कारोबार अस्सी प्रतिशत से ऊपर रहा। जनवरी सेमार्च तक आशुतोष गोवारिकर की जोधा अकबर के अलावा किसी और फिल्म का बिजनेस संतोषजनक नहीं रहा था। ऐसे में रेस के कारोबार से इंडस्ट्री में खुशी की लहर आई है। फिल्म के निर्माता रमेश तौरानी ने फिल्म के प्रदर्शन की आक्रामक रणनीति अपनाई। उन्होंने खाली सिनेमाघरों में अपनी फिल्म भर दी। उन्होंने करण जौहर और यश चोपड़ा की तरह फिल्म के अधिकतम प्रिंट जारी किए और पहले तीन दिनों की भरपूर कमाई का पुख्ता इंतजाम किया। सूत्रों के मुताबिक रेस के 1100 से अधिक प्रिंट सिनेमाघरों में चल रहे हैं।
रेस का मल्टीस्टारर होना दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचने का अच्छा जरिया बना। सैफ अली खान, अक्षय खन्ना और अनिल कपूर के साथ कैटरीना कैफ और बिपाशा बसु का ग्लैमर काम आया। समीक्षकों ने फिल्म की आलोचना तो की लेकिन एक स्तर तक अब्बास-मस्तान की स्टाइल को सराहा। इस फिल्म को युवा दर्शक मिल रहे हैं। उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि फिल्म के सारे किरदार बुरे क्यों हैं?
पिछले हफ्तों की फिल्मों में 26 जुलाई ऐट बरिस्ता और ब्लैक एंड ह्वाइट फ्लाप हो चुकी हैं।

Monday, March 24, 2008

आमिर खान का माफीनामा

आमिर खान पिछले दिनों टोरंटो में थे.वहाँ पहुँचने के पहले उन्होंने अपने ब्लॉग के जरिये टोरंटो के ब्लॉगर मित्रों को संदेश दिया था कि आप अपना सम्पर्क नम्बर दें.अगर मुझे मौका मिला तो आप में से कुछ मित्रों को बुलाकर मिलूंगा.इस सुंदर मंशा के बावजूद आमिर खान टोरंटो में समय नहीं निकाल सके.उन्होंने टोरंटो के अपने सभी ब्लॉगर मित्रों से माफ़ी मांगी है,लेकिन वादा किया है कि वे भविष्य में अपने ब्लॉगर मित्रों से जरूर मिलेंगे.टोरंटो के एअरपोर्ट से उन्होंने यह पोस्ट डाली है।
गजनी के नए गेटउप में आमिर खान के कान काफी बड़े-बड़े दिख रहे हैं.आमिर खान ने बताया है कि उन्हें बचपन में बड़े कान वाला लड़का कहा जाता था.बचपन में उनका एक नाम बिग इअर्स (big ears) ही पड़ गया था.

Friday, March 21, 2008

खेमों में बंटी फ़िल्म इंडस्ट्री, अब नहीं मनती होली

-अजय ब्रह्मात्मज
हर साल होली के मौके पर मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मिथक बन चुकी आरके स्टूडियो की होली याद की जाती है। उस जमाने में बच्चे रहे अनिल कपूर, ऋषि कपूर, रणधीर कपूर से बातें करें, तो आज भी उनकी आंखों में होली के रंगीन नजारे और धमाल दिखाई देने लगते हैं। कहते हैं, होली के दिन तब सारी फिल्म इंडस्ट्री सुबह से शाम तक आरके स्टूडियो में बैठी रहती थी। सुबह से शुरू हुए आयोजन में शाम तक रंग और भंग का दौर चलता रहता था। विविध प्रकार के व्यंजन भी बनते थे। वहां आर्टिस्ट के साथ तकनीशियन भी आते थे। कोई छोटा-बड़ा नहीं होता था। उस दिन की मौज-मस्ती में सभी बराबर के भागीदार होते थे। एक ओर शंकर-जयकिशन का लाइव बैंड रहता था, तो दूसरी ओर सितारा देवी और गोपी कृष्ण के शास्त्रीय नृत्य के साथ बाकी सितारों के फिल्मी ठुमके भी लगते थे। सभी दिल खोल कर नाचते-गाते थे। स्वयं राजकपूर होली के रंग और उमंग की व्यवस्था करते थे। दरअसल, हिंदी सिनेमा के पहले शोमैन राजकपूर जब तक ऐक्टिव रहे, तब तक आरके स्टूडियो की होली ही फिल्म इंडस्ट्री की सबसे रंगीन और हसीन होली बनी रही। उन दिनों स्टार के रूप में दिलीप कुमार और देव आनंद भी राजकपूर की तरह ही पॉपुलर थे और फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें वैसा ही सम्मान प्राप्त था, लेकिन वे दोनों राजकपूर की तरह सामाजिक और दोस्तबाज नहीं थे। यही कारण था कि राजकपूर इंडस्ट्री की सोशल गतिविधियों का केंद्र हमेशा बने रहे। उन्होंने अपनी इस हैसियत को खूब एंज्वॉय भी किया।
राजकपूर के निधन के बाद उनके बेटों ने कुछ वर्षो तक होली की वह परंपरा जरूर बनाए रखी, लेकिन धीरे-धीरे आरके आरके स्टूडियो की होली में फिल्म इंडस्ट्री के लोगों की संख्या कम होने लगी। दरअसल, महसूस यह किया गया कि होली तो होती है, लेकिन राजकपूर वाली गर्मजोशी और स्नेह नदारद रहती है। फिर यश चोपड़ा और सुभाष घई सरीखे स्वघोषित शोमैन अपनी फिल्मों की कामयाबी के साथ होली का आयोजन करने जैसे शगूफे भी जरूरी मान बैठे। यश चोपड़ा और सुभाष घई भी होली का आयोजन करने लगे। चढ़ते सूरज को प्रणाम करने में यकीन रखनेवाली इंडस्ट्री ने रुख बदल लिया। अब उन्हें अचानक आरके स्टूडियो काफी दूर लगने लगा!
इसी बीच अमिताभ बच्चन एक बड़े स्टार के रूप में उभरे। उनका संबंध इलाहाबाद से था और उनकी फिल्म का एक गीत रंग बरसे भीगे चुनरवाली.. काफी चर्चित और लोकप्रिय होली गीत हो चुका था। यही वजह है कि होली का संबंध सहज ही अमिताभ बच्चन से जुड़ गया। अमिताभ बच्चन के आवास प्रतीक्षा में होली के दिन भीड़ बढ़ने लगी। एक दौर ऐसा भी आया, जब देखा जाने लगा कि इस बार किस-किस को बच्चन जी ने बुलाया है! अगर निमंत्रण नहीं मिला है, तो यह मान लिया जाता था कि अभी आप इंडस्ट्री में किसी मुकाम पर नहीं पहुंचे हैं या फिर आपका वक्त निकल गया। ऐसे ही कयासों और उपेक्षाओं से खेमेबाजी आरंभ हुई। जाहिर-सी बात थी कि जिन्हें प्रतीक्षा से निमंत्रण नहीं मिलता था, वैसे लोगों का खेमा धीरे-धीरे ऐक्टिव हो गया। हालांकि और किसी की होली में न तो भीड़ जुटती थी और न ही कोई खबर बन पाती थी, क्योंकि सारे स्टारों की जमघट प्रतीक्षा में ही लगती थी। इस तरह लंबे समय तक प्रतीक्षा में होली की रंगीन फुहारें और गीतों की गूंज छाई रही, लेकिन यह सिलसिला अमिताभ बच्चन के पिता कवि हरिवंश राय बच्चन के निधन के साथ टूट गया। उसके बाद से बच्चन परिवार अभी तक खुद को संभाल नहीं पाया है। पिछले साल उनकी माता तेजी बच्चन के निधन होने की वजह से होली के आयोजन का सवाल ही नहीं उठता। हालांकि बीच में एक बार शाहरुख खान ने अवश्य अपने पुराने बंगले के टेरेस पर होली का आयोजन किया, तो लोगों ने यह मान लिया था कि अब होली का नया सेंटर शाहरुख खान का बंगला होगा, लेकिन उन्होंने अगले साल आयोजन नहीं किया और खुद दूसरों की होली में दिखे। हां, यहां यह याद दिलाना आवश्यक होगा कि सेटेलाइट चैनलों के आगमन और सीरियल के बढ़ते प्रसार के दिनों में सीरियल निर्माताओं ने अपनी यूनिट के लिए होली का आयोजन आरंभ किया। इस प्रकार की होली चुपके से होली के पहले ही होली के दृश्य जोड़ने के काम आने लगी। होली ने कृत्रिम रूप ले लिया। अभी फिल्म इंडस्ट्री घोषित-अघोषित तरीके से इतने खेमों में बंट गई है कि किसी ऐसी होली के आयोजन की उम्मीद ही नहीं की जा सकती, जहां सभी एकत्रित हों और बगैर किसी वैमनस्य के होली के रंगों में सराबोर हो सकें!

रेस: बुरे किरदारों की एंटरटेनिंग फिल्म

-अजय ब्रह्मात्मज

प्रेम, आपसी संबंध और संबंधों में छल-कपट की कहानियां हमें अच्छी लगती हैं। अगर उनमें अपराध मिल जाए तो कहानी रोचक एवं रोमांचक हो जाती है। साहित्य, पत्रिकाएं और अखबार ऐसी कहानियों से भरे रहते हैं। फिल्मों में भी रोमांचक कहानियों की यह विधा काफी पॉपुलर है। हम इस विधा को सिर्फ थ्रिलर फिल्मों के नाम से जानते हैं। निर्देशक अब्बास मस्तान ऐसी फिल्मों में माहिर हैं। हालांकि उनकी 36 चाइना टाउन और नकाब को दर्शकों ने उतना पसंद नहीं किया था। इस बार वे फॉर्म में दिख रहे हैं।
रणवीर और राजीव सौतेले भाई हैं। ऊपरी तौर पर दोनों के बीच भाईचारा दिखता है, लेकिन छोटा भाई ग्रंथियों का शिकार है। वह अंदर ही अंदर सुलगता रहता है। उसे लगता है कि बड़ा भाई रणवीर हमेशा उस पर तरस खाता रहता है। वह उसके प्रेम को भी उसका दिखावा समझता है। रणवीर घोड़ों के धंधे में है। उसमें आगे रहने की ललक है और वह हमेशा जीतने की कोशिश में रहता है। दूसरी तरफ राजीव को शराब की लत लग गई है। रणवीर की जिंदगी में दो लड़कियां हैं। एक तो उसकी नयी-नयी बनी प्रेमिका सोनिया और दूसरी सोफिया, जो उसकी सेक्रेटरी है। राजीव की नजर सोनिया पर पड़ती है तो वह भाई से वादा करता है कि अगर उसकी शादी सोनिया से हो जाए तो वह शराब छोड़ देगा। रणवीर अपने पनपते प्रेम की कुर्बानी देता है। शादी के बाद भी राजीव की आदतें नहीं बदलतीं। ऐसे में सोनिया और रणवीर करीब आ जाते हैं। राजीव को इसकी भनक लगती है और फिर नए नाटकीय मोड़ आते हैं। इस दरम्यान एक हत्या भी हो जाती है। उस हत्या की गुत्थी सुलझाने आरडी और मिनी आते हैं। उनके आने के बाद फिल्म में हंसी के पल आते हैं। ऊपरी तौर पर वर्णित इस कहानी के कई पेंच हैं। चूंकि यह थ्रिलर और मर्डर मिस्ट्री है, इसलिए कहानी बता देना उचित नहीं होगा। बस यों समझिए कि हर किरदार दूसरे के खिलाफ साजिश रचने में लगा है। लेखक शिराज अहमद ने पटकथा को इतना चुस्त और रहस्यपूर्ण रखा है कि हर सिक्वेंस के बाद शक की सूई किसी और दिशा में घूम जाती है। थ्रिलर फिल्मों का यही आनंद है कि अंत-अंत तक दर्शक असमंजस में रहें। अब्बास मस्तान रेस में दर्शकों का असमंजस बनाए रखते हैं।
सैफ अली खान की निजी जिंदगी में जो भी चल रहा हो, बतौर एक्टर वे ग्रो कर रहे हैं। उन्होंने कूल अंदाज में इस किरदार को निभाया है। अक्षय खन्ना असुरक्षित और कायर भाई के रूप में अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय करते हैं। उनकी प्रतिभा का फिल्मों में सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। अनिल कपूर एक बार फिर साबित करते हैं कि वे हर तरह के रोल में जंचते हैं। अभिनेत्रियों में बेवकूफ मिनी के रोल में समीरा रेड्डी अपनी भावमुद्राओं से हंसने का मौका देती हैं। बिपाशा बसु और कैटरीना कैफ का उपयोग ग्लैमर के लिए किया गया है। उन्हें थोड़े भावपूर्ण दृश्य भी दिए गए हैं, जिनमें दोनों अभिनय करने की कोशिश करती दिखती हैं।
फिल्म का तकनीकी पक्ष उपयुक्त और उत्तम है। चेज के दृश्य हों या रोमांचक एक्शन के सिक्वेंस ़ ़ ़कैमरामैन ने उन्हें खूबसूरती से पेश किया है। साउथ अफ्रीका के डरबन और केप टाउन शहर का वैभव दिखता है। बैकग्राउंड संगीत में सलीम-सुलेमान ने रहस्य बढ़ाने में निर्देशक की मदद की है। प्रीतम का संगीत पॉपुलर टेस्ट का है।
होली के मौके पर अब्बास मस्तान ने दर्शकों को एंटरटेनिंग फिल्म दी है। बस एक ही बात खलती है कि फिल्म के सारे किरदार बुरे स्वभाव के हैं। क्या आज की दुनिया ऐसी ही हो गई है?

गंजे हो गए आमिर खान

अपनी नई फ़िल्म 'गजनी' के लिए आमिर खान को गंजा होना था.कल टोरंटो जाने से पहले अपने आवास पर उन्होंने हेयर स्टाइलिस्ट अवाँ कांट्रेक्टर को घर पर बुलाया।बीवी किरण राव और गीतकार प्रसून जोशी के सामने उन्होंने बाल कटवाए और गजनी के लुक में आ गए.आमिर खान ने अपनी फिल्मों के किरदार के हिसाब से लुक बदलने का रिवाज शुरू किया.गजनी में उन्हें इस लुक में इसलिए रहना है कि सिर पर लगा जख्म दिखाया जा सके.आमिर ने फ़िल्म के निर्देशक मुर्गदोस से अनुमति लेने के बाद ही अपना लुक बदला.ऐसा कहा जा रहा है कि 'गजनी'में मध्यांतर के बाद वे इसी लुक में दिखेंगे.

दस साल का हुआ मामी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल

-अजय ब्रह्मात्मज
हर साल मुंबई में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होता है। इस साल 7 से 13 मार्च के बीच आयोजित फेस्टिवल में 125 से अधिक फिल्में दिखाई गई। सात दिनों के इस फेस्टिवल में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी कई नामी हस्तियों ने हिस्सा भी लिया। सबसे सुखद बात यह रही कि कई सक्रिय फिल्मकारों ने दर्शकों, फिल्म प्रेमियों और फिल्मों में आने के इच्छुक व्यक्तियों से आमने-सामने बातें भी कीं। उन्होंने उनके साथ फिल्म निर्माण से संबंधित मुद्दों पर बातें कीं और उनकी जिज्ञासाओं को शांत किया और उसके बाद अपनी विशेषज्ञता शेयर की। मुंबई का मामी फिल्म फेस्टिवल इस मायने में विशेष है कि इसके आयोजन में फिल्म इंडस्ट्री के सदस्यों की भागीदारी रहती है। हालांकि महाराष्ट्र की सरकार आर्थिक मदद करती है, लेकिन फेस्टिवल से संबंधित किसी भी फैसले में कोई सरकारी दबाव और हस्तक्षेप नहीं रहता।
इस फेस्टिवल की कई उपलब्धियां हैं। मशहूर निर्देशक नागेश कुकनूर को पहली बार इसी फेस्टिवल से पहचान मिली। कोंकणा सेन शर्मा इसी फेस्टिवल के जरिए हिंदी निर्माता-निर्देशकों से परिचित हुई थीं। देश-विदेश की कई विख्यात फिल्में पहली बार यहां प्रदर्शित होने के बाद राष्ट्रीय चर्चा में आई। अभी तक यह जानकारी नहीं मिली है और न ही किसी ने उल्लेख किया है कि इस फेस्टिवल से प्रेरित होकर वह फिल्मकार बन गया। फिर भी मुंबई के कई युवा फिल्मकार ऐसे फेस्टिवल को अत्यंत आवश्यक मानते हैं। उनकी राय में मामी जैसे फेस्टिवल में देश-विदेश की उत्कृष्ट फिल्में देखकर फिल्मों की समझदारी बढ़ती है। मुंबई में फिल्मकार बनने के इच्छुक युवकों का अच्छा जमावड़ा है। उन्हें अच्छी फिल्मों के लिए किसी और शहर में प्रवास नहीं करना पड़ता।
इस बार की बात करें, तो मशहूर स्पेनिश डायरेक्टर कार्लोस साउरा को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया और उनकी फिल्म फादोस का प्रदर्शन भी किया गया। इस फिल्म में फादो संगीत की पुर्तगाली परंपरा का दृश्यात्मक चित्रण किया गया था। फेस्टिवल में धर्मेद्र को भी लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया। इस अवसर पर ऋषि कपूर, गुलजार और हितेन्द्र घोष को भी सम्मानित किया गया। ठीक है कि मीडिया इस फेस्टिवल को उचित कवरेज नहीं देता, क्योंकि यहां मंत्रियों और स्टारों से ज्यादा फिल्मों पर ध्यान दिया जाता है और सिर्फ फिल्मों की बात चलती है, तो दर्शकों से पहले रिपोर्टर भाग खड़े होते हैं। इस साल भी न्यूज चैनलों के कैमरे पहले और आखिरी दिन ही दिखाई पड़े। वजह साफ है, मीडिया और फिल्म पत्रकारिता इन दिनों मुख्य तौर पर ग्लैमर और गॉसिप तक ही सीमित रह गई है।
बहरहाल, दसवें मामी फिल्म फेस्टिवल में कॉन, वेनिस और बर्लिन में पुरस्कृत और प्रशंसित फिल्में लाई गई थीं। पिछले साल कॉन फिल्म फेस्टिवल की साठवीं वर्षगांठ के अवसर पर दुनिया भर के 35 नामी निर्देशकों से पांच-पांच मिनट की फिल्म बनाने का आग्रह किया गया था। उन छोटी फिल्मों को देखना सुखद अनुभव रहा।
इस साल जया बच्चन की पहल पर यंग डायरेक्टर के लिए अनोखी प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। मुंबई डायमेंशन नाम की इस प्रतियोगिता में मुंबई से संबंधित छोटी फिल्में बनानी थीं। अच्छी बात यह रही कि श्रेष्ठ प्रविष्टियों को पुरस्कृत भी किया गया। अब जरूरत है कि इन अच्छी फिल्मों को आम दर्शकों तक कैसे पहुंचाया जाए और यह किसी अभियान के तहत ही संभव हो सकता है। फिल्मों के डिजिटल होने के बाद फिल्मों का प्रदर्शन सस्ता और सुविधाजनक हो गया है। हां, कोई पहल करे और इन फिल्मों को महानगरों के विभिन्न मोहल्लों के साथ छोटे शहरों में ले जाए, तो निश्चित ही एक समझदार सिने संस्कृति विकसित हो सकती है!

Thursday, March 20, 2008

बॉक्स ऑफिस १९.०३.०८

ऐसा लग ही रहा था कि 26 जुलाई ऐट बरिस्ता बाक्स आफिस पर डूब जाएगी। वही हुआ भी। इस फिल्म के हश्र पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। फिल्म पूरे भारत में रिलीज भी नहीं हो सकी थी। फिल्म ट्रेड के एक विशेषज्ञ की राय में निर्देशक मोहन शर्मा ने विषय तो महत्व का चुना था, लेकिन उसके साथ वह न्याय नहीं कर सके। उन्होंने एक संभावना भी खत्म कर दी। उनकी राय में किसी अच्छे विषय पर बुरी फिल्म बन जाए तो निर्माता उस विषय को फिर से छूने में कतराते हैं। ब्लैक एंड ह्वाइट के बारे में सुभाष घई जो भी पोस्टर छपवा और महानगरों की दीवारों पर सटवा रहे हों, सच तो यही है कि बाक्स आफिस पर फिल्म विफल रही। समीक्षकों ने अवश्य तारीफ की, मगर उनकी तारीफों का दर्शकों पर कोई असर नहीं हुआ। वैसे ब्लैक एंड ह्वाइट दिल्ली और महाराष्ट्र में टैक्स फ्री हो चुकी है। उम्मीद है कि दर्शक बढ़ेंगे और फिल्मकारों का नुकसान कम होगा। बाक्स आफिस पर कोई भी प्रतियोगिता नहीं होने से जोधा अकबर के दर्शक ज्यादा नहीं घटे हैं। यह फिल्म सप्ताहांत में दर्शक खींच रही है। इस हफ्ते अब्बास मस्तान की थ्रिलर रेस आ रही है।

चुंबन चर्चा : हिन्दी फ़िल्म


हिन्दी फिल्मों में चुम्बन पर काफी कुछ किखा जाता रहा है.२००३ में मल्लिका शेरावत की एक फ़िल्म आई थी 'ख्वाहिश'.इस फ़िल्म में उन्होंने लेखा खोर्जुवेकर का किरदार निभाया था.फ़िल्म के हीरो हिमांशु मल्लिक थे.मल्लिक और मल्लिका की यह फ़िल्म चुंबन के कारन चर्चित हुई थी.इस फ़िल्म में एक,दो नहीं.... कुल १७ चुंबन थे। 'ख्वाहिश' ने मल्लिका को मशहूर कर दिया था और कुछ समय के बाद आई 'मर्डर' ने तो मोहर लगा दी थी कि मल्लिका इस पीढ़ी की बोल्ड और बिंदास अभिनेत्री हैं।

१७ चुंबन देख कर या उसके बारे में सुन कर दर्शक दांतों तले उंगली काट बैठे थे और उनकी पलकें झपक ही नहीं रहीं थीं.हिन्दी फिल्मों के दर्शक थोड़े यौन पिपासु तो हैं ही.बहरहाल चवन्नी आप को बताना चाहता है कि १९३२ में एक फ़िल्म आई थी 'ज़रीना',उस फ़िल्म में १७.१८.२५ नहीं .... कुल ८६ चुंबन दृश्य थे.देखिये गश खाकर गिरिये मत.उस फ़िल्म के बारे में कुछ और जान लीजिये।

१९३२ में बनी इस फ़िल्म को ८६ चुंबन के कारण कुछ दिनों के अन्दर ही सिनेमाघरों से उतारना पड़ा था.फ़िल्म के निर्देशक एजरा मीर थे.एजरा मीर बाद में डाक्यूमेंट्री फिल्मों के जनक माने गए.उनकी इस फ़िल्म में चार्ली,जाल,नज़ीर,याकूब और जुबैदा ने अभिनय किया था. इस फ़िल्म के प्रिंट और फोटो नहीं मिल पा रहे हैं.अगर आप को कहीं से जानकारी मिले तो बताएं।

हिन्दी फिल्मों के आरम्भिक दशकों में चुंबन खुलेआम चित्रित किया जाता था.आज़ादी के बाद ही इस आज़ादी पर पाबन्दी लगी। देश आजाद होने के बाद नैतिकता के पहरेदार सामने आए और सेंसर नीति बदली गई.उसके बाद इसे अश्लील,अनावश्यक और आपत्तिजनक मान लिया गया.गनीमत है कि अब निर्माता-निर्देशक फ़िल्म में चुंबन के महत्व को समझ रहे हैं.

Tuesday, March 18, 2008

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:वर्तमान दशक

यह दशक अभी समाप्त नहीं हुआ है.अगले दो साल में अभी न जाने किस-किस अभिनेत्री का दीदार होगा और न जाने किसका जादू दर्शकों के सिर चढ़ कर बोलेगा?फिलहाल दीपिका पदुकोन और सोनम कपूर अपने-अपने हिसाब से जलवे बिखेर रही हैं.दोनों एक ही दिन ९ अक्टूबर २००७ को परदे पर आयीं और छ गयीं.दीपिका की पहली फिम 'ओम शान्ति ओम' थी,जिसे फराह खान ने निर्देशित किया था.सोनम के निर्देशक संजय लीला भंसाली हैं.उनकी 'सांवरिया' से सोनम का आगमन हुआ.ऐसा लगता है कि दोनों का सफर लंबा है.हाँ,रास्ते अलग-अलग हैं. अब थोड़ा पीछे चलें.प्रीति जिंटा को शेखर कपूर पेश करने वाले थे.उनकी फ़िल्म नहीं बन सकी.मणि रत्नम की 'दिल से' में प्रीति की झलक दिखी थी.उनकी ज्यादातर फिल्में इसी दशक में आई हैं.इसी दशक में अमृता राव एक सामान्य सी फ़िल्म 'अब के बरस' से आयीं.धीरे-धीरे उनहोंने अपनी तरह की जगह बना ली.हेमामालिनी की बेटी एषा देओल अभी तक कोई मुकाम नही छू सकी हैं.करिश्मा कपूर की बहन करीना कपूर ने जे पी दत्ता की फ़िल्म 'रिफ्यूजी' से धमाकेदार शुरूआत की,लेकिन उनका सफर ठीक नहीं रहा.पिछले साल 'जब वी मेट' से उनकी लोकप्रियता में इजाफा हो गया है.ऐश्वर्या राय और सुष्मिता सेन की तरह ही फिर से विश्व सुंदरी और ब्रह्माण्ड सुंदरी प्रियंका चोपड़ा और लारा दत्ता की जोड़ी फिल्मों मं कामयाब रही.एक नाम बिपाशा बसु का अलग से लेना होगा.वह कोलकाता से मुम्बई आकर फिल्मों में जगह बनने में कामयाब रहीं.उनकी पहली फ़िल्म 'अजनबी' थी.इस दशक की अन्य अभिनेत्रियों में गुल पनाग,रिम्मी सेन,कोंकणा सेन शर्मा,तनुश्री दत्ता,मल्लिका शेरावत,रिम्मी सेन आदि का ज़िक्र किया जा सकता है.

Monday, March 17, 2008

कामयाबी की कीमत चुकाती करीना कपूर


कामयाबी की कीमत सभी को चुकानी पड़ती है। इन दिनों करीना कपूर इसी फेज से गुजर रही हैं। दरअसल, जब वी मेट के बाद उनकी जिंदगी हर लिहाज से इसलिए बदल गई, क्योंकि सोलो हीरोइन के रूप में उनकी फिल्म रातोंरात हिट हो गई। इस फिल्म में उनके काम की तारीफ की गई और इसीलिए अब पुरस्कारों की बरसात हो रही है। अभी तक दो बड़े पुरस्कार उनकी झोली में आ चुके हैं और ऐसा माना जा रहा है कि देश-विदेश के सारे पुरस्कार इस बार अकेले करीना कपूर ही ले जाएंगी। पुरस्कारों की बात चलने पर आंतरिक खुशी से उनका चेहरा दीप्त हो उठता है। वे सूफियाना अंदाज में कहती हैं, पुरस्कारों का मिलना अच्छा लगता है। कई बार नहीं मिलने पर भी दुख नहीं होता, लेकिन यदि जब वी मेट के लिए पुरस्कार नहीं मिलता, तो जरूर बुरा लगता। करीना कपूर अभी से लेकर अगले साल के अप्रैल महीने तक व्यस्त हैं, लेकिन उन्होंने सोच रखा है कि समय से सूचना मिल गई, तो वे हर पुरस्कार लेने जाएंगी और कुछ अवार्ड समारोह में परफॉर्म भी करेंगी।
करीना पर इधर बेवफाई का आरोप लगा है। कुछ लोगों की राय में उन्होंने शाहिद कपूर को छोड़ कर अच्छा नहीं किया। वास्तव में करीना के प्रशंसक आज भी सैफ अली खान के साथ उनके प्रेम को स्वीकार नहीं कर सके हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि शाहिद बेचारा हो गया है। सच्चाई यह है कि करीना ने हाल ही में शाहिद के जन्मदिन पर उन्हें बधाई दी और घंटों बातें भी कीं। दरअसल, दोनों एक-दूसरे की गतिविधियों से वाकिफ रहते हैं। जरूरत पड़ने पर सलाह-मशविरा भी करते हैं। और तो और, दोनों का पब्लिसिटी एजेंट भी एक ही व्यक्ति है।
लंबे समय तक करीना कपूर फ्लॉप फिल्मों की हिट हीरोइन के तमगे के साथ घूमती रहीं। इसे करीना की खूबी और निर्माता-निर्देशकों का उनके प्रति विश्वास ही कहें कि एक-एक कर फ्लॉप होती फिल्मों के बावजूद उन्हें हर तरह की फिल्में मिलती रहीं। करीना खुद कहती हैं, मुझे मालूम था कि मेरी फिल्में नहीं चल पा रही हैं। उस दौर में कुछ निर्माताओं ने किनारा भी कर लिया, लेकिन मुझे कोई मलाल नहीं है। मुझे खुशी है कि उसी दौर में मैंने चमेली, देव और ओमकारा जैसी फिल्में भी कीं। आप बताएं कि समकालीन हीरोइनों में और किस हीरोइन ने ऐसी वॅरायटी दी है! अपने इस साफदिल और मुंहफट स्वभाव के कारण ही करीना को कई बार दिक्कतें भी हुई हैं। उनके साथ यह अच्छी बात है कि वे कुछ भी मन में नहीं रखतीं। इस मुलाकात में करीना ने खुल कर बताया कि वे जॉन अब्राहम के साथ फिल्म में क्यों काम कर रही हैं? सभी जानते हैं कि करण जौहर के शो में उन्होंने जॉन अब्राहम की आलोचना यह कह कर की थी कि उनके चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन ही नहीं रहता। याद दिलाने पर वे समझाती हैं, मुझे नहीं लगता कि मेरे उस स्टेटमेंट को जॉन ने सीरियसली लिया था और फिर वह एक प्रकार का शो है। मुझे अष्ट विनायक की तरफ से रूमी जाफरी की इस फिल्म का ऑफर मिला, तो मैंने इसलिए भी अपनी स्वीकृति दे दी कि जॉन के साथ यह मेरी पहली फिल्म होगी। दर्शक हमेशा नई जोडि़यां देखना पसंद करते हैं। कौन जाने, हमारी जोड़ी हिट हो गई तो? वैसे, करीना फिलहाल अजय देवगन, अक्षय कुमार, सलमान खान, सैफ अली खान और संभव है कि आमिर खान के साथ फिल्मों में काम कर रही हैं। उन्होंने अजय देवगन के साथ हाल ही में गोलमाल रिट‌र्न्स की शूटिंग पूरी की है। वे इसी महीने की 15 तारीख से मेलबॉर्न में मैं और मिसेज खन्ना की शूटिंग आरंभ कर रही हैं। करीना आगे बताती हैं, ऑस्ट्रेलिया के बाद मुझे साजिद नाडियाडवाला की फिल्म कमबख्त इश्क के लिए लॉस एंजिल्स भी जाना है। वहां लगभग पचास दिनों तक अक्षय कुमार के साथ शूटिंग करनी है। फिर मैं लंदन आ जाऊंगी। लंदन में करण जौहर निर्मित और रेंजिल डिसिल्वा निर्देशित फिल्म करूंगी। इसमें मेरे साथ सैफ हैं। उसके बाद न्यूजीलैंड और स्पेन में रूमी जाफरी की फिल्म की शूटिंग करनी है। क्या इस लंबे शेड्यूल में भारत आना-जाना होगा? करीना तुरंत कहती हैं, क्यों नहीं? ऐड फिल्मों और दूसरे प्रोफेशनल कमिटमेंट भी तो रहते हैं और उनके लिए तो मुझे बीच-बीच में आना ही पड़ेगा। हालांकि वे यह नहीं बतातीं कि कुछ यात्राएं तो सैफ के लिए भी होंगी या फिर सैफ उनके सेट पर पहुंचते रहेंगे!

Sunday, March 16, 2008

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:आखिरी दशक

पिछली सदी का आखिरी दशक कई अभिनेत्रियों के लिए याद किया जायेगा.सबसे पहले काजोल का नाम लें.तनुजा की बेटी काजोल ने राहुल रवैल की 'बेखुदी'(१९९२) से सामान्य शुरुआत की.'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' उनकी और हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री की अभी तक सबसे ज्यादा हफ्तों तक चलनेवाली फ़िल्म है.यह आज भी मुम्बई में चल ही रही है.ऐश्वर्या राय १९९४ में विश्व सुंदरी बनीं और अगला कदम उन्होंने फिल्मों में रखा,उन्होंने मणि रत्नम की फ़िल्म 'इरुवर'(१९९७) से शुरूआत की.आज वह देश की सबसे अधिक चर्चित अभिनेत्री हैं और उनके इंटरनेशनल पहचान है.जिस साल ऐश्वर्या राय विश्व सुंदरी बनी थीं,उसी साल सुष्मिता सेन ब्रह्माण्ड सुंदरी घोषित की गई थीं.सुष्मिता ने महेश भट्ट की 'दस्तक'(१९९६) से फिल्मी सफर आरंभ किया.रानी मुख़र्जी 'राजा की आयेगी बारात' से फिल्मों में आ गई थीं,लेकिन उन्हें पहचान मिली विक्रम भट्ट की 'गुलाम' से.'कुछ कुछ होता है' के बाद वह फ़िल्म इंडस्ट्री की बड़ी लीग में शामिल हो गयीं.इस दशक की संवेदनशील अभिनेत्री ने तब्बू ने बाल कलाकार के तौर पर देव आनंद की फ़िल्म 'हम नौजवान' की थी.नायिका के रूप में वह 'प्रेम' में दिखीं.इसी दशक में एक परम्परा टूटी थी.हिन्दी फिल्मों के पहले खानदान कपूर परिवार की किसी लड़की ने अभिनेत्री बनने का फैसला किया और फिल्मों में आ भी गई.करिश्मा कपूर ने १९९१ में 'प्रेमकैदी' जैसी साधारण फ़िल्म से शुरूआत की और फिर एक स्थान हासिल किया.शिल्पा शेट्टी भी इसी दशक में आई थीं,उनकी पहली फ़िल्म 'बाजीगर' थी।
इस दशक की अन्य अभिनेत्रियों में रवीना टंडन,सोनाली बेंद्रे,ममता कुलकर्णी और पूजा बेदी के नाम लिए जा सकते हैं.

Saturday, March 15, 2008

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:नौवां दशक

नौवें दशक में आई मधुर मुस्कान माधुरी दीक्षित को दर्शक नहीं भूल पाये हैं.धक्-धक् गर्ल के नाम से मशहूर हुई इस अभिनेत्री ने अपने नृत्य और अभिनय से सचमुच दर्शकों की धड़कनें बढ़ा दी थीं.राजश्री कि १९८४ में आई 'अबोध' से उनका फिल्मी सफर आरंभ हुआ.उनकी पॉपुलर पहचान सुभाष घई की 'राम लखन' से बनी.'तेजाब'के एक,दो ,तीन.... गाने ने तो उन्हें नम्बर वन बना दिया.माधुरी की तरह ही जूही चावला की १९८४ में आई पहली फ़िल्म 'सल्तनत' पर दर्शकों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया.हाँ,१९८८ में आमिर खान के साथ 'कयामत से कयामत तक' में वह सभी को पसंद आ गयीं.श्रीदेवी की 'सोलवा सावन' भी नहीं चली थी,लेकिन १९८३ में जीतेन्द्र के साथ 'हिम्मतवाला' में उनके ठुमके भा गए .पद्मिनी कोल्हापुरे कि शुरूआत तो देव आनंद की 'इश्क इश्क इश्क' से हो गई थी,लेकिन उन्हें दर्शकों ने राज कपूर की 'सत्यम शिवम् सुन्दरम' से पहचाना.इस फ़िल्म में उन्होंने जीनत अमन के बचपन का रोल किया था.इस दशक की अन्य अभिनेत्रियों में अमृता सिंह,मंदाकिनी,किमी काटकर आदि का उल्लेख किया जा सकता है.

Friday, March 14, 2008

उम्मीदों पर पानी फेरती 26 जुलाई..

-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म का संदर्भ और बैकड्राप सिनेमाघरों में दर्शकों को खींच सकता है। आप पूरी उम्मीद से सिनेमा देखने जा सकते हैं लेकिन, अफसोस कि यह फिल्म सारी उम्मीदों पर पानी फेर देती है। 2005 में मुंबई में आई बाढ़ को यह फिल्म असंगत तरीके से छूती है और उस आपदा के मर्म तक नहीं पहुंच पाती।
घटना 26 जुलाई, 2005 की है। उस दिन मुंबई में बारिश ने भयावह कहर ढाया था। चूंकि घटना ढाई साल ही पुरानी है, इसलिए अभी तक हम सभी की स्मृति में उसके खौफनाक दृश्य ताजा हैं। मुंबई के अंधेरी उपनगर में स्थित एक बरिस्ता आउटलेट में चंद नियमित ग्राहक आते हैं। बाहर वर्षा हो रही है। वह तेज होती है और फिर खबरें आती हैं कि भारी बारिश और बाढ़ के कारण शहर अस्त-व्यस्त हो गया है। टीवी पर चंद फुटेज दिखाए जाते हैं। इसी बरिस्ता में राशि और शिवम भी फंसे हैं। एक फिल्म लेखक हैं। एक सरदार दंपती है। दो-चार अन्य लोगों के साथ बरिस्ता के कर्मचारी हैं। इनके अलावा कुछ और किरदार भी आते हैं। फिल्म में बैंक डकैती, एड्सग्रस्त महिला, खोई हुई बच्ची का प्रसंग आता है। रात भर की कहानी सुबह होने के साथ समाप्त हो जाती है। हम देखते हैं कि राशि और शिवम रात भर की नजदीकी से एक-दूसरे के करीब आ गए हैं।
मोहन शर्मा की अवधारणा बेजोड़ थी, लेकिन फिल्म असंगत और साधारण है। इस फिल्म में बाढ़ की भयावहता के दर्शन नहीं होते। शहर में उस दिन प्रकृति ने जो कहर बरपाया था, उसका अहसास फिल्म नहीं देती। यहां तक कि उस आपदा के प्रभाव से किरदारों के अंदर उठ रहे भावनाओं के उफान को भी निर्देशक चित्रित नहीं कर पाए हैं। कोई बेचैनी, अकुलाहट और अनिश्चितता चरित्रों के चेहरों पर नहीं दिखती। ऐसा लगता है कि चंद घंटों के लिए किसी जगह पर कुछ चरित्र एकत्रित हो गए हैं और समय बिताने के लिए वे एक-दूसरे से बातें कर रहे हैं।
फिल्म के अंत में उस दिन की भयावहता और उससे निबटने में मुंबई के जोश का जिक्र लिख और बोल कर अवश्य किया गया है। काश, यह सब फिल्म में भी दिखाई पड़ता तो फिल्म उल्लेखनीय हो जाती।

अजय देवगन की परीक्षा!

-अजय ब्रह्मात्मज
आमिर खान के समान ही अजय देवगन के बारे में भी यही कहा और सुना जाता रहा है कि वे निर्देशन में दखलंदाजी करते हैं। सेट पर और सेट के बाहर डायरेक्टर के साथ ही उनका ज्यादा समय गुजरता है। दरअसल, करियर के आरंभ से अभिनेता अजय देवगन ने निर्देशक की कुर्सी के पास ही अपनी कुर्सी रखी और फिल्म निर्देशन की बारीकियों को सीखने-समझने की कोशिश करते रहे। इसलिए अगर यू मी और हम उनके निर्देशन में आ रही है, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
उल्लेखनीय है कि अजय देवगन एक जमाने के स्टंट मास्टर और फिर ऐक्शन डायरेक्टर रहे वीरू देवगन के बेटे हैं, जिन्होंने सुनील दत्त की फिल्म रेशमा और शेरा से अपना फिल्मी जीवन आरंभ किया। पापा की देखादेखी अजय देवगन जब बड़े हो रहे थे, तो उनकी आंखों में भी फिल्मी सपने तैर रहे थे। इसीलिए उन्होंने अपने पिता के साथ काम आरंभ कर दिया था और शौकिया तौर पर वीडियो कैमरे से कुछ शूटिंग भी कर लेते थे। इच्छा तो थी कि फिल्म के हीरो बनें, लेकिन प्रश्न यह उठता है कि स्टारों के इस माया प्रदेश में कौन ऐक्शन डायरेक्टर के सामान्य चेहरे के बेटे को तरजीह देता? इसीलिए अजय देवगन का ध्यान कैमरे के पीछे की गतिविधियों में ज्यादा लगता था, क्योंकि वहीं संभावना दिखती थी। इसी क्रम में अजय देवगन प्रयोगशील निर्देशक शेखर कपूर के संपर्क में आए और उनके सहायक बन गए। तब शेखर कपूर दुश्मनी की शूटिंग आरंभ कर रहे थे और कुछ विज्ञापन फिल्में भी बना रहे थे।
शेखर कपूर के साथ थोड़े समय काम करने के बाद अजय देवगन ने दूसरी राह पकड़ ली। उन्होंने फिल्मों में बतौर हीरो खुद को आजमाने का जोखिम लिया। इरादा यह था कि अगर कहीं लोगों को पसंद आ गए, तो ठीक, वर्ना ऐक्शन और डायरेक्शन में तो जीवन खपाना ही है। ऐक्शन की खूबियों से सजा कर फूल और कांटे के हीरो को पेश किया गया। दो मोटर साइकिलों पर खड़े होकर दर्शकों के बीच आए अजय देवगन को तत्काल कामयाबी मिल गई। किसी ने सोचा भी नहीं था कि फिल्म इतनी बड़ी हिट साबित होगी! तब ट्रेड पंडितों और फिल्म व्यवसाय के माहिरों ने अजय देवगन पर ध्यान नहीं दिया था। उन्हें लगा था कि हर साल दर्जनों की तादाद में किस्मत आजमाने वाले फिल्मी-गैर फिल्मी परिवारों से आए नौजवानों में से ही एक अपना शौक पूरा कर रहा है। तब किसी को अंदाजा नहीं था कि वे जिसे नजरअंदाज कर रहे हैं, वह युवक भविष्य का भरोसेमंद ऐक्टर और स्टार साबित होगा! वर्तमान पीढ़ी के अभिनेताओं में अजय देवगन अकेले एक ऐसे अभिनेता हैं, जिन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्होंने हमेशा अपने किरदारों को संजीदगी से पर्दे पर निभाया। हर किस्म की भूमिकाओं में उन्होंने गंभीरता दिखाई। अभी कह सकते हैं कि निर्देशक का स्वभाव रखने के कारण वे निर्देशक के दृष्टिकोण को अन्य अभिनेताओं की तुलना में अच्छी तरह समझ लेते हैं। एक अभिनेता होने के बाद भूमिकाओं की चुनौतियां ज्यादा मायने नहीं रखतीं। किसी भी भूमिका को उसका संदर्भ और परिप्रेक्ष्य सार्थक बनाता है। ऐक्टर तो हमेशा स्क्रिप्ट की सीमा में बंधा होता है। स्क्रिप्ट से बाहर जाकर अगर आप कुछ करते हैं, तो या तो आप स्टार होते हैं या फिर वह किरदार ही ताकतवर होता है। फिलहाल सभी की नजर अजय देवगन की फिल्म यू मी और हम पर लगी है। इस फिल्म के परिणाम से अजय देवगन का ऐक्टिंग और डायरेक्शन करियर, काजोल का करियर और देवगन फिल्म्स की प्रतिष्ठा जुड़ गई है। खासकर तारे जमीन पर की शानदार कामयाबी के बाद वे अब अनजाने ही आमिर खान के मुकाबले में आ गए हैं। हालांकि यू मी और हम को लेकर अजय देवगन के मन में कोई घबराहट नहीं है, लेकिन पंडितों, भविष्यवक्ताओं और आलोचकों का क्या करेंगे, जो समय से पहले सब कुछ पढ़ने, देखने और बताने को विह्वल रहते हैं!

Thursday, March 13, 2008

आमिर खान से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

आमिर खान से लंबी बातचीत। दो साल पहले हुई यह बातचीत कई खास मुद्दों को छूती है.

- आमिर आप लगातार चर्चा में हैं। अभी थोड़ा ठहरकर देखें तो आप क्या कहना चाहेंगे?

0 सच कहूं तो मैं कंफ्यूज हूं। मैं अपने इर्द-गिर्द जो देख रहा हूं। मीडिया में जिस तरह से रिपोर्टिग चल रही है। टेलीविजन और प्रेस में जो रिपोर्टिग चल रही है, जिस किस्म की रिपोर्टिग चल रही है, जिस किस्म का नेशनल न्यूज दिखाया जा रहा है उससे मैं काफी कंफ्यूज हूं कि यह क्या हो रहा है हम सबको। हम किस दौर से गुजर रहे हैं। झूठ जो है, वह सच दिखाया जा रहा है। सच जो है, वह झूठ दिखाया जा रहा है। जो चीजें अहमियत की नहीं हैं, वह नेशनल न्यूज बनाकर दिखायी जा रही है। लोगों की जिंदगी नेशनल न्यूज बनती जा रही है। समाज के लिए जो महत्वपूर्ण चीजें हैं, उन्हें पीछे धकेला जा रहा है। यह सब देखकर मैं हैरान हूं, कंफ्यूज हूं।- आप फिल्म इंडस्ट्री से हैं, आपने बहुत करीब से इसे जिया और देखा है। अभी के दौर में एक एक्टर होना कितना आसान काम रह गया है या मुश्किल हो गया है?0 जिंदगी अपने मुश्किलात लेकर आती है। हर करियर में अपनी तकलीफें और मुश्किलात होती हैं। एक एक्टर और सफल एक्टर होने पर आप अलग किस्म की मुश्किलों और मुद्दों का सामना करते हैं। खासकर इस दौर में जब मीडिया में इतना कंपीटिशन है हर रोज एक नया टेलीविजन चैनल आ रहा है, हर टेलीविजन चैनल दूसरे चैनल से कंपीट कर रहा है और उस कंपीटिशन में वह ऊंटपटांग न्यूज जल्दी से जल्दी देना चाह रहा है। अगर आप सफल एक्टर हैं तो आपका किस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है या आपके बारे में लोग कैसी चीजें उछाल रहे हैं। कुछ सही, कुछ गलत, ज्यादा गलत। इस माहौल में एक एक्टर के तौर पर मेरा क्या रेस्पांस होना चाहिए। किस तरह से इसे मुझे डील करना चाहिए। ऐसी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। सिर्फ टेलीविजन ही नहीं। नेशनल प्रेस में भी हो रहा है यह। बड़े अखबार भी सनसनी पर उतर आए हैं। औरतों की नंगी तस्वीरें दिख रही अखबारों में, जहां नेशनल न्यूज छपना चाहिए। ऐसी सूरत में एक व्यक्ति, एक एक्टर और उस पर भी सफल एक्टर होने के नाते यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि मैं कैसे पेश आऊं, क्या करूं?

- पिछले कुछ सालों में सफल स्टार को बिकाऊ प्रोडक्ट बनाकर पेश किया जा रहा है। आपके प्रति फिल्म इंडस्ट्री, समाज और बाजार का यही रवैया है। हर कोई आपको क्रिएटिव व्यक्ति के तौर पर नहीं देखकर बेची जा सकने वाली एक वस्तु समझ रहा है?

0 आप सही कह रहे हैं। आपने सही समझा है। मैं कहूंगा कि इसे व्यापक रूप में लिया जाना चाहिए। सिर्फ फिल्मों में ऐसा नहीं हो रहा है। चूंकि मैं फिल्म एक्टर हूं । इसलिए मेरी जो फिल्में हैं ़ ़ ़ उन्हें देखना होगा कि किस किस्म की फिल्में हैं। बाजार मुझे किस तरह इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है। बाजार हमेशा मुझे या किसी और को भी इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा अपने फायदे के लिए ़ ़ ़ जो होना भी चाहिए कुछ हद तक, लेकिन हम क्रिएटिव फील्ड में हैं और मुझे एक क्रिएटिव आर्टिस्ट के तौर पर उसे संतुलित करना पड़ेगा। मुझे मालूम है कि आजकल किस तरह की फिल्म सुपरहिट हो रही है या किस तरह की फिल्म चल रही है, लेकिन मुझे एक आर्टिस्ट के तौर पर ऐसा भी काम करना है जो सफल हो या न हो, लेकिन मेरा जी कर रहा है कि मैं ये करूं ़ ़ ़ 'रंग दे बसंती', 'मंगल पांडे', या 'लगान' करूं।भले ही ये फिल्में पहली नजर में न लगें कि चलनेवाली है, लेकिन मैं क्रिएटिवली मैं वह करना चाह रहा हूं, जो दिल चाह रहा है। इस मामले में मैंने अपने लिए सही फैसले लिए। मैं अभी तक बिका नहीं हूं। मैं क्रिएटिवली सही फैसले ले रहा हूं। मैं बाजार को इजाजत नहीं दे रहा हूं कि वह मुझे गलत तरीके से इस्तेमाल करे। अपने क्रिएटिव चुनाव के साथ ही मैं बाजार को सफल फिल्में भी दे रहा हूं। अपने क्रिएटिव चुनाव के साथ मैं सफलता दे रहा हूं। मैं संतुलित होकर चल रहा हूं फिल्मों में ़ ़ ़ लेकिन मेरा इस्तेमाल सिर्फ फिल्मों में नहीं होता। मेरा इस्तेमाल न्यूज पेपर बेचने में भी होता है, चैनल की व्यूवरशिप बढ़ाने में भी होता है। किसी कॉमेडी शो में मेरा मजाक उड़ाकर उसे बेचा जाता है, क्योंकि वह आमिर खान का मजाक उड़ाएंगे तो दर्शक देखेंगे। या न्यूज चैनल पर दस दफा नाम लेंगे ़ ़ ़ यह सिर्फ आमिर खान की समस्या नहीं है। हर सेलिब्रिटी के साथ यही हो रहा है। सेलिब्रिटी का इस्तेमाल सिर्फ फिल्मों में ही नहीं हो रहा है, बल्कि संबंधित मीडिया - टेलीविजन, न्यूजपेपर हो ़ ़ ़ उसमें भी इस्तेमाल किया जा रहा है। वह हमारे नियंत्रण में नहीं है कि वे हमारे बारे में क्या कह रहे हैं? वे सही कह रहे हैं या गलत कह रहे हैं ़ ़ वह तो दूर की बात है। मेरी शादी, जो मेरे लिए एक पवित्र चीज है, जो मेरे लिए बहुत ही पर्सनल चीज है। उसका खिलवाड़ बनाया गया, जिस पर मेरा कोई कंट्रोल नहीं था। यहां मेरे घर के सामनेवाली सड़क पर आठ-दस ओबी वैन खड़ी थी। जब हम पंचगनी गए ़ ़ ़ परिवार और नजदीकी दोस्तों के साथ तो वहां पर उन्होंने घुसने की कोशिश की। प्रेस ने, टेलीविजन ने और जितनी रिपोर्टिग हुई है ़ ़ ़ मैं अपने प्रशंसकों को कहना चाहूंगा कि मेरी शादी की 99़ 99 प्रतिशत रिपोर्टिंग गलत हुई है। वह गलत मैं इसलिए कह रहा हूं कि वे पहुंच नहीं पाए। मुझ तक या मेरे परिवार तक वे पहुंच नहीं पाए तो वे मनगढ़ंत चीजें बनाते गए। कि आज शादी में ये हो रहा है और आज ये पका है और आज ़ ़ ़ जुनैद ने ये कहा, आयरा ने वो कहा ़ ़ ़ ये सब वे अपने मन से लिख-बोल रहे थे। यह सब गलत बात है, लेकिन दुर्भाग्य से हम इस दौर में रह रहे हैं, जहां मुझ जैसी सेलिब्रिटी का ऐसा इस्तेमाल हो रहा है, जिस पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है। जबकि प्रेस और टेलीविजन को मालूम था कि शादी मेरी पर्सनल चीज है और मैं उसे पर्सनल रखना चाहता हूं। वे उसकी इज्जात नहीं करते। इसका क्या इलाज है मैं खुद नहीं जानता हूं।

- मीडिया की शिकायत थी और इंडस्ट्री के कुछ स्टार भी सोच रहे थे - आमिर को मालूम है कि वह देश के चहेते स्टार हैं और वह शादी करने जा रहे हैं। उनकी शादी एक खबर है और उस खबर की रिपोर्ट होनी चाहिए। उस समय आपके समकालीन एक स्टार का कहना था कि मीडिया से मिलकर अपनी बातें कहकर आपको नमस्ते कर लेना चाहिए था। मीडिया की राय है कि सार्वजनिक जिंदगी में होने के कारण आप खुद को ऐसी स्थितियों से काट नहीं सकते।

0 आपके इस सवाल का जवाब देने के बजाए मैं सवाल करना चाहता हूं कि आखिर क्यों मैं अपनी जाति जिंदगी पर सार्वजनिक रूप से बहस करूं? क्यों करूं मैं? क्योंकि प्रेस चाहता है? क्योंकि मीडिया इससे पैसा बनाना चाहता है। क्योंकि टेलीविजन चैनल अपने इश्तहार बेचते हैं उस टाइम स्लॉट में। मैं अपनी जाति जिंदगी को सोप ऑपेरा क्यों बनाऊं? क्या मुझे हक नहीं है एक इंसान के तौर पर यह फैसला लेने का कि मैं अपनी शादी में किस को बुलाऊं ़ ़ ़ अपनी शादी के बारे में मैं किस से बात करूं और किस से बात न करूं, यह तय करने का हक मेरा होना चाहिए कि मीडिया का होना चाहिए। मैं इस देश के एक आम इंसान से पूछना चाहता हूं कि आपकी कल शादी होनेवाली है ़ ़ ़ तो इसका फैसला आप और आपका परिवार करेगा या देश का मीडिया?

- यह बात कितनी सच है कि आप मीडिया से नाराज हैं?

0 मैं सभी को एक तराजू में कभी नहीं तौलता हूं। मेरी समझ में हर इंसान अलग किस्म का होता है। मीडिया में कई लोग अच्छे हैं और कई लोग बुरे हैं। मीडिया में कई ऐसे लोग हैं, जिनसे मेरी शिकायत है और मीडिया में कई ऐसे लोग हैं, जिनसे मेरी कोई शिकायत नहीं है। मेरी समझ से यह आज पूरी तरह पैसे का खेल हो गया है, क्योंकि नए -नए न्यूजपेपर आ गए हैं। सीा चाहते हैं कि मुझे रीडर मिले। मुझे ज्यादा रीडिरशिप मिलेगी तो मुझे ज्यादा इश्तहार मिलेगा। टेलीविजन की ज्यादा व्यबरशिप होगी तो विज्ञापन के ज्यादा पैसे मिलेंगे। यह पूरा पैसे का खेल हो गया, जबकि मेरे खयाल से न्यूज रिपोर्टिग जिम्मेदारी का काम है। पूरा देश आपकी बात सुन रहा है। पूरा देश जानना चाह रहा है कि देश में सबसे अहम चीज क्या हुई और वह अहम चीज किसी स्टार से किसी स्टार के अफेयर या उनकी शादी टूटी या उनका कुत्ता गुम गया ़ ़ ़ यह तो अहम न्यूज नहीं है न।़ बहुत सी चीज हो रही हैं देश में। लोग गरीबी से मर रहे हैं। किसान मर रहे हैं। अहम खबरें पीछे होती जा रही हैं। इस वक्त अगर कोई सेक्टर सबसे ज्यादा भ्रष्ट है तो वह दुर्भाग्य से मीडिया है। मेरी यह प्रार्थना है कि आने वाले वालों में यह बात बरले। मीडिया वाचडॉग है। हम गलत काम करें तो आप रोकें। अभी तो मीडिया गलत काम कर रहा है ़ ़ उसे कौन रोकेगा? आज पॉलिटिशियन गलत करें, कोई भी गलत काम करे, पुलिस फोर्स है, ज्यूडिसरी है - तो उसे कौन सामने लाएगा। मीडिया ही न? न्यूज रिपोर्टिग ही यह चीज बाहर ला सकती है। यह सब छोड़कर आप यह दिखा रहे हैं कि कौन सा आई जी राधा बन गया तो आप प्राइम टाइम का वक्त बर्बाद कर रहे हैं। अभी आप टीवी खोल कर देखें लें कि ब्रेकिंग न्यूज में क्या चल रहा है। ब्रेकिंग न्यूज प्रोग्राम हो गया है आजकल।

- आपने 'रंग दे बसंती' के समय से मीडिया से कोई बात नहीं की। इसके दो पहलू सामने आए - एक तो यह कि फिल्म के चलने या न चलने में मीडिया का कोई हाथ नहीं होता और दूसरे आमिर खान ने मीडिया से बदला लिया।

0 अच्छा सवाल है। आपकी सोच सही है। मैंने फिल्म की रिलीज के पहले एक भी इंटरव्यू नहीं दिया। मेरे अंदर ऐसी कोई भावना नहीं है कि मैं मीडिया को कुछ दिखाना चाह रहा हूं। मीडिया को नीचा दिखाने या बदले की भावना है ही नहीं। मैं किस से बदला लूंगा और क्या बदला लूंगा। मैं इतना परेशान और कंफ्यूज होकर चुप हो गया था। मेरे पास शिकायत आई थी कि मैं अपने फायदे के लिए मीडिया का इस्तेमाल करता हूं। तो पिछली बार मैंने सोचा कि चलो इस्तेमाल नहीं करता हूं। मेरे ऊपर लगा यह इल्जाम भी खत्म हो। अब 'रंग दे बसंती' सुपर-डुपर हिट हो गई तो मैं मीडिया को यह कहने की कोशिश नहीं कर रहा हूं कि देखो, मैंने दिखा दिया। यह मेरी भावना ही नहीं है। मीडिया में कई लोग हैं, जो काफी अच्छी रिर्पोटंग करते हैं और वे पिछले कई सालों से अच्छा काम करते आ रहे हैं। यह एक दौर है, जिससे हमारा नेशनल मीडिया गुजर रहा है? हर ग्रुप चाह रहा है कि मैं आगे बढूं। आगे बढ़ने के चक्कर में दुर्भाग्य से सभी अपनी जिम्मेदारी भूल कर अजीब काम कर रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा पाठकों को आकर्षित करने के लिए अजीबोगरीब चौंकानेवाली खबरें दी जा रही है। किसी गांव में किसानों के मरन की खबर बहुत उत्तेजक नहीं होगी।

- आजकल टीवी पर समाचार भी मनोरंजन हो गया है?

0 बिल्कुल, जबकि मेरी समझ में समाचार को समाचार होना चाहिए। आजकल मैं दूरदर्शन देखता हूं। वे समाचार के वक्त समाचार ही प्रसारित करते हैं। यही मेरा कहना है। यह बहुत खतरनाक ट्रैड है। तो मैंने मीडिया को कुछ नहीं दिखाया। मैं तो पीछे हट गया कि मुझे कुछ बोलना ही नहीं है।

- 'मंगल पांडे' के प्रति मिली प्रतिक्रिया से आप दुखी और उदास हैं और एक हद तक नाराज भी?

0 उस फिल्म की रिलीज के समय मीडिया के एक सेक्शन का रवैया मेरी समझ में नहीं आया। उस समय मैंने एक शब्द भी नहीं कहा था। आज आठ महीनों के बाद आपके पूछने पर जवाब दे रहा हूं। एक तथ्य पर गौर करें - मेरे पास हजारों स्क्रिप्ट आती है। मैं और भी कोई फिल्म कर सकता हूं। रोमांटिक या कॉमेडी फिल्म कर सकता हूं। मेरे पास फिल्मों की कमी नहीं है, फिर भी मैं एक ऐसा विषय चुनता हूं। जिस पर मुझे लगता है कि मुझे फिल्म बनानी चाहिए। हमारे देश के लोगों को यह फिल्म देखनी चाहिए। यह मेरी क्रिएटिव चाहत है और एक सामाजिक व्यक्ति के नाते यह मेरा फर्ज है। मैं जानता था कि यह फिल्म बहुत ज्यादा महंगी होनेवाली है। मालूम नहीं कामयाब हो या न हो, फिर भी मैं कोशिश की मेरी समझ में ऐसी कोशिश मैं करूं या कोई और करे ़ ़ ़ मीडिया को सपोर्ट करना चाहिए। सपोर्ट तो दूर की बात है ़ ़ ़ मीडिया के एक सेक्शन ने उस वक्त सिर्फ लथाड़ने की कोशिश की। हर रोज गलत और बुरी रिपोर्ट आती थी फिल्म के बारे में। रिलीज के पहले दिन खबर आई कई अखबारों में ़ ़ ़ उसमें से एक टाइम्स ऑफ इंडिया भी था कि फिल्म फ्लॉप हो चुकी है। कम से कम तीन-चार दिन रूकने के बाद आप कह सकते हैं कि फिल्म फ्लॉप हो चुकी है। पता करें कि कलेक्शन क्या है? फिर बताएं कि फिल्म हिट हुई है या फ्लॉप हुई है। पहले दिन या दूसरे दिन आप आर्टिकल छाप रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि आपने पहले से ही तय कर लिया है । क्योंकि न्यूज पेपर की प्रिटिंग एक दिन पहले होती है। आपने पहले से तय कर लिया कि मुझे इस फिल्म को फ्लॉप बताना है। वरना आपको कहां से पता चला कि फिल्म फ्लॉप है। अभी तक तो रिलीज नहीं है? अभी तक तो हमें दर्शकों का रिएक्शन नहीं मिला है। अगर 'मंगल पांडे' का उदाहरण लें तो 'मंगल पांडे' का पहले हफ्ते का कलेक्शन रिकॉर्ड ब्रेकिंग कलेक्शन था। आपकी पहले हफ्ते की रिपोर्टिग यही कह सकती है कि यह रिकॉर्ड ब्रेकिंग कलेक्शन है। रिलीज के दिन आपकी रिपोर्टिग अगर कुछ कह सकती है तो वह यही कह सकती है कि - एक फिल्म आई थी 'वीर जारा' जिसने पहले हफ्ते में तेरह करोड़ का धंधा किया था हिंदुस्तान में।और 'मंगल पांडे' ने उन्नीस से बीस करोड़ का धंधा किया है। तो तेरह से चौदह, सतरह, अठारह नहीं ़ ़ हम सीधे बीस करोड़ पर पहुंचे हैं। यह एक न्यूज है, हिस्ट्री है, यह रिकार्ड है। लेकिन उस वक्त ज्यादातर मीडिया ने यही रिपोर्ट किया कि फिल्म फ्लॉप है। किस आधार पर यह रिपोर्ट हुई है मुझे पता नहीं। क्योंकि मुझे जो रेस्पांस मिला है फिल्म का। पर्सनली मैं बात कर रहा हूं, क्योंकि कई जगह मैंने ट्रेवल किया। लोगों से मैं मिला। थिएटर में गया । मुझे फिल्म को मिक्स रेस्पांस मिला है। कई लोगों को यह फिल्म बेहद पसंद आई है, कई लोग निराश भी हुए हैं। शायद उन्हें इतिहास नहीं पता था कि उस वक्त क्या हुआ था। लेकिन हमें वह बताना था।

-उस समय 'मंगल पांडे' को लेकर विवाद हुए। खासकर रानी मुखर्जी के किरदार और मंगल पांडे के कोठे पर जाने को लेकर लोगों की आपत्ति थी?

0 यह विवाद हुआ कि हमलोगों ने सही इतिहास दिखाया या नहीं? इस संबंध में मैं लंबा-चौड़ा डिशकशन कर सकता हूं। मैं एक बड़ी अहम चीज कहना चाहूंगा इस मामले में। कैम्ब्रीज यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर हैं हिस्ट्री के, वह हेड ऑफ डिपार्टमेंट हैं हिस्ट्री के। उन्होंने एक आर्टिकल लिखा वहां के अखबारों में और 'मगल पांडे' की एतिहासिकता पर लगे आरोपों का खंडन किया। मैं तो उनको जानता भी नहीं। उन्होंने पढ़ा होगा। उन्होंने बताया कि किस तरह की फिल्म बिल्कुल सही है। हमने खूब रिसर्च की और जाहिर है कि हमने कुछ चीजें ऐसी की हैं जो इतिहास की किताबों में न हों। ये बात उस वक्त भी मैंने कही थी। ये बहुत पुरानी बात हो गई। ये मुझे बार-बार दोहराना नहीं है। उस वक्त यह भी निकला था कि मंगल पांडे की फैमिली के लोग हैं, जो कहते हैं कि हमने उनका किरदार सही तरीके से नहीं दिखाया। और वह वेश्या के कोठे पर दो दफा गए। हां,फिल्म के अंदर यह दिखाया है। लेकिन यह भी तो देखिए कि वह दो दफा क्यों गए हैं? वह किसी लड़की को खरीदने नहीं गए हैं। वह एक दफा गए एक लड़की को यह कहने कि अगर तुम भागना चाहती है तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं। एक औरत की लाचार या गरीब औरत जो मुश्किल में है, उसकी मदद करने गए हैं। यह उनको बुरे लाइट में तो नहीं दिखाता है, अच्छे लाइट में दिखाता है। और दूसरी दफा तब जाते हैं जब एक अंग्रेज अफसर बदतमीजी करता है एक औरत के साथ। उस समय वह उसको मारने जाते हैं। आप बताएं कि इसमें हमने क्या चरित्र हत्या की? मुझे तो समझ में नहीं आया। खैर , मेरा यह कहना है कि उस वक्त जो मेरी नाराजगी थी, वह प्रेस के एक सेक्शन से थी। उन्होंने इस फिल्म को सपोर्ट करना तो दूर, उन्होंने अपनी जान लगा दी यह प्रूफ करने में कि फिल्म फ्लॉप है।

-मंगल पांडे के बिजनेस के बारे में क्या कहेंगे।

0 अब आप फिल्मों का कलेक्शन देखें तो जो हिट फिल्म है उस दौरान की या उससे पहले की। जो फिल्में हिट मानी जाती है। जैसे 'मैं हूं ना', 'कल हो न हो' ये सारी फिल्में हिट मानी जाती हैं। इनसे तो हमने कम से कम दो या तीन गुणा ज्यादा धंधा किया है। मतलब इतने ज्यादा लोगों ने टिकट खरीदा है उस फिल्म का। 'मंगल पांडे' फ्8 या ब्0 करोड़ की फिल्म है। हमने अगर उतना धंधा किया है तो हम सिर्फ अपना खर्च निकाल पाए हैं। लेकिन आप यह देखिए कि एक एक्टर के तौर पर मेरे लिए वह फिल्म बड़ी सक्सेस है। एक एक्टर के तौर पर मैं उस फिल्म से बड़ा खुश हूं कि मैंने ये फिल्म की। मुझे गर्व है अपने चुनाव का। उस फिल्म एक प्रोजेक्ट के तौर पर देखें तो टैलेंटेड डायरेक्टर होने के बावजूद केतन मेहता को बड़ी कामयाबी नहीं मिली थी। बॉबी भी नए प्रोडयूसर थे। उनको भी इतनी कामयाबी नहीं मिली थी। इस संदर्भ में प्रोजेक्ट को आप देखें तो उसे उन्नीस करोड़ की ओपनिंग मिलना ही रिकॉर्ड बे्रकिंग न्यूज है। अपने-आप में रिकार्ड ब्रेक है ही ।

- नहीं, हो सकता है, ट्रेड के लोग इस ढंग से देख रहे हों।उनके लिए फिल्म का हिट होन उसकी लागत के अनुपात से तय होता है।

0 ये हुई बिजनेस की बात। अगर आप बिजनेस की रिर्पोट कर रहे हैं तो आपको इतना तो रिपोर्ट करना पड़ेगा सबसे पहले कि इसमें - कहां तेरह करोड़ और कहां उन्नीस करोड़ ये तो आपको रिर्पोट करना चाहिए? यह आपने नहीं किया। मेरा सवाल है कि क्यों नहीं की आपने यह रिपोर्ट। आजतक मैंने कहीं नहीं सुना कि 'मंगल पांडे' ने रिकार्ड ब्रेक कर दिया। मैंने सिर्फ इतना ही सुना है कि 'मंगल पांडे' फ्लॉप है। और फ्लॉप किस एंगल से है यह? स्टार के तौर पर मेरे लिए तो सुपर हिट है यह फिल्म। एक स्टार काम है लोगों अंदर लाना। वह मैंने बखूबी किया, जबकि प्रोजेक्ट कमजोर था। तब भी मैंने किया। तब भी मैंने रिकॉर्ड ब्रेक किया। ये मेरे लिए सबसे बड़ा सक्सेस है स्टार के तौर पर। मेरी समझ से कोई ऐसा दर्शक नहीं है जो कहता कि फिल्म बुरी है। मैंने जो रेस्पांस देखा है। आधे लोग कहते हैं कि बड़ी अच्छी लगी उनको। आधे लोग कहते हैं कि यार हम थोड़े निराश हुए। 'लगान' के बाद कुछ और आना चाहिए था। दर्शक कुछ ज्यादा की उम्मीद कर रहे थे। हो सकता है कि मेरी फिल्म चार सालों के बाद आ रही थी तो उनकी उम्मीद भी ज्यादा थी।

- ऐसा लगता है कि मीडिया में कुछ लोगों या मीडिया के एक ग्रुप की आपसे व्यक्तिगत खुन्नस है और वह खुन्नस उस फिल्म पर निकली?

0 हो सकता है। यह बात हो सकती है। क्योंकि मैं उस किस्म का इंसान हूं, जो काम से काम रखता है। कुछ ऐसे जर्नलिस्ट हैं, जो चाहते हैं कि हम उनसे खूब दोस्ती करें, तभी वे अच्छा लिखेंगे। मैं इस चीज को नहीं मानता हूं। एक जर्नलिस्ट होने के नाते आपको स्टार से, सेलिब्रिटी से कटा रहना चाहिए। ताकि आप सच्चाई से लिख सकें। आपके दिल में क्या है, आपके जहन में क्या है। आप मेरे दोस्त बन जाएंगे तो आप मेरे बारे में क्या क्रिटिसाइज करेंगे? आप क्या गलती निकालेंगे मेरी। ये तो नहीं है कि मैं गलती नहीं करूंगा। कभी-कभी मैं अच्छा काम करूंगा। कभी मैं बुरा काम करूंगा। एक जर्नलिस्ट के नाते आपका काम है कि आप उसको सही तरीके से परखें। और उस चीज को सामने लाएं। मुझे लगता है कि प्रेस के कुछ लोग इसलिए मेरे खिलाफ हैं, क्योंकि मैं ज्यादा दोस्ती नहीं करता हूं लोगों से। या पर्सनल रिलेशनशिप नहीं रखता उनसे। शायद कुछ जर्नलिस्ट यह नहीं पचा पाते कि मैं अलग काम कर रहा हूं और उसमें भी मैं कामयाब हो रहा हूं। हो सकता है कि वे सोचते हों कि जरा इसको नीचे लाओ। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि क्या है?

- आपकी फिल्मों पर आ रहा हूं मैं। ऐसा माना जाता है कि 'सरफरोश' के बाद आप में एक बदलाव आया । 'सरफरोश' के बाद 'लगान' आई, फिर 'दिल चाहता है' , 'मंगल पांडे' और अब 'रंग दे बसंती' ़ ़ ़ क्या आप भी मानते हैं कि 'सरफरोश' से ही यह बदलाव आया या शुरू से एक धागा था, जो बाद में फिल्मों को जोड़ गया?

मैं शुरू ही कुछ ऐसी फिल्में कर रहा हूं जो उस दौर के लिए अलग होतीं हैं। 'कयामत से कयामत तक ' आप आज देख कर कह सकते हैं कि यार बड़ी कमाल की लव स्टोरी है और लव स्टोरी तो कमर्शियल चीज होती है। लेकिन उस दौर में जाइए आप, पंद्रह साल पहले जाइए, तो उस वक्त सिर्फ एक्शन फिल्में चल रही थीं। 'कयामत से कयामत तक' को बेचने में नासिर साहब को छह महीने से ज्यादा लगा था। कोई खरीदने के लिए तैयार नहीं था। क्यों? क्योंकि वो लव स्टोरी थी। क्यों? क्योंकि वो नए स्टार कास्ट थे। क्यों? क्योंकि उनको लगा कि म्यूजिक कमजोर है। म्यूजिक का दौर था ही नहीं। तो आप देखिए कि उस वक्त भी हमलोग ने जो किया वह काफी अलग किया था। 'जो जीता वही सिकंदर' कोई आम फिल्म नहीं है। 'दिल है कि मानता नहीं' कोई आम फिल्म नहीं है। हां, सोशल कमेंट नहीं है उन फिल्मों में लेकिन ़ ़ ़ अगर मैं अपने खुद के काम को एनलाइज करने की कोशिश करूं तो मैं ये देख सकता हूं कि उसमें एक धागा है रिवेलियन का जो चल रहा है।मैं हमेशा प्रवाह के खिलाफ फिल्म करने की कोशिश कर रहा हूं। हो सकता है कि आरंभिक फिल्मों में मैं खुद करो परख रहा होऊं। जहां तक कि सोशली रेलीवेंट फिल्मों का सवाल है, तो मेरे हिसाब से 'सरफरोश' से पहले आई थी 'गुलाम'। मेरे हिसाब से 'गुलाम' में भी सोशल रेलीेवेंस था। उसमें बताया गया था कि समाज के अनपढ़ युवक अपनी ऊर्जा गलत दिशा में खर्च कर रहे हैं। सोशल कंसर्न के लिहाज से गुलाम मेरी पहली फिल्म थी। देखिए फिल्म रिलीज होती है, लेकिन उस पर काम दो या तीन साल पहले से शुरू हो जाता है। जब मेरी फिल्म 'राजा हिंदुस्तानी' रिलीज हुई थी, क्99म् की बात कर रहा हूं मैं। तो उस वक्त मैं एक तरह से महत्वपूर्ण मोड़ पर आ गया था अपने कैरियर के। क्योंकि 'राजा हिंदुस्तानी' बहुत ही बड़ी हिट थी। और लगातार मैंने कई सालों से कामयाब फिल्म दी थी। उससे पहले 'रंगीला' आई थी। उससे एक साल पहले 'हम हैं राही प्यार के' आई थी। ये सारी कामयाब फिल्में थीं। मैं उस मोड़ पर आ गया था कि मैं अपनी कामयाबी का इस्तेमाल पॉजीटिव ढंग से कर सकूं। लिहाजा उस वक्त से जो चीजें मुझे सोशली इंपोर्टेट लगती थीं मैं उन चीजों को लेने की कोशिश करता था। जब 'सरफरोश' का सब्जेक्ट आया तो उस वक्त आईएसआई का बड़ा जोर था। क्रॉस बोर्डर टेररिज्म की चर्चा थी। उसके साथ-साथ दक्षिणपंथी भी उभार पर थे। इसके साथ-साथ हिंदू-मुसलिम इश्यू को भी उठाया गया। ये चीजें मेरे जहन में थीं, क्योंकि पिछले पांच-छह सालों से अखबारों में पढ़ रहा था। अपने आस-पास महसूस कर रहा था। तो हो सकता है उस वजह से मेरा झुकाव स्क्रिप्ट की तरफ हुआ हो। जाहिर है हमारे ईद-गिर्द जो चीजें होती हैं, उसका हम पर असर होता है़ ़ और मैं जिस किस्म का आर्टिस्ट हूं, मुझे लगता है कि जो मुझे सक्सेस मिली है, जो लोगों की प्रार्थना और दुआओं से मिली है, जो लोगों के सपोर्ट और प्यार से मुझे सक्सेस मिली है, उसका मुझे कुछ पॉजीटिव इस्तेमाल भी करना चाहिए। न सिर्फ मैं लोगों को इंटरटेन करूं। करीब आठ साल हो गए थे मेरे कैरियर में। मैं उस पोजिशन में में पहुंच गया था कि मुझमें काफी स्ट्रेंग्थ आ गई थी लोगों के सपोर्ट से। अब उसका इस्तेमाल मैं सही ढंग से करूं। शायद तब से मैंने इस किस्म की फिल्में भी चुननी शुरू की जो सोशली रेलीेवेंट भी हों।

- 'लगान' से एक बहुत बड़ा मोड़ आया। आपके पर्सनल लाइफ में, आपके फिल्म कैरियर में, हर लिहाज से। अभी आप पलट कर कैसे देखते हैं? उसकी कामयाबी को आप अपने करिसर और जीवन में कितना इंपोर्टेंट मानते हैं?

0 मेरे खयाल में 'लगान' भारतीय सिनेता के लिए बहुत इंपोर्टेट है। निश्चित ही मेरी जिंदगी में वह बहुत इंपोटर्ेंट मोड़ था। पहली फिल्मं प्रोडयूस कर रहा था मैं। लेकिन जिस किस्म की फिल्म बनी वह। उसने सारे रूल तोड़ दिए। इंडियन सिनेमा की मेनस्ट्रीम फिल्ममेकिंग को एक अलग डायरेक्शन में वो ले गई वह फिल्म। बहुत ही अहम फिल्म है मेरी कैरियर की। और उसके साथ-साथ मैं कहूंगा कि 'सरफरोश' भी अहम फिल्म है मेरे कैरियर की। उसके बाद 'मंगल पांडे' बहुत अहम फिल्म है मेरे कैरिअर की।

- पिछली बार दैनिक जागरण के एक पाठक ने आपसे पूछा था,कि क्या आप हर फिल्म में अंग्रेज को भगाते रहेंगे?

0 नहीं अंग्रेजों से मुझे कोई परेशानी नहीं है। संयोग ऐसा हुआ कि 'लगान' और 'मंगल पांडे' की कहानी में अंगे्रज थे।

- 'रंग दे बसंती' में भी लगभग वही स्थिति है?

0 'रंग दे बसंती' अंग्रेजों के खिलाफ बनी फिल्म नहीं है। इसमें अतीत के कंातिकारी किरदार अंग्रेजों के खिलाफ हैं। हम ता इसमें आज के किरदार निभा रहे थे। 'रंग दे बसंती' ऐसी फिल्म है, जो अपने देश के नौजवानों को जगाने का काम करती है। इस फिल्म की कोशिश सही है। मैं यह नहीं कहता कि हमारे देश के नौजवान निखट्टू हैं। नहीं। एक देश के नौजवानों का एक सेक्शन है, जो समाज से बेखबर है। बाकी अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। आम तौर पर हम अपनी सामाजिक जिममेदारी भूल रहे हैं। हर आदमी यही सोचता है कि मुझे नहीं हो रहा है तो ठीक है। मैं क्यों फिक्र करूं? जब तक मुझ पर नहीं आएगी, मैं अपनी उंगली नहीं उठाऊंगा। लेकिन समाज में हर काम हमें एक साथ मिलकर करना है। चाहे वो जो भी चीज हो। जो भी गलत काम हो रहा है,उसके खिलाफ जब तक हम सब अपनी आवाज अलहदा और इकट्ठा नहीं उठाएंगे तब तक तब्दिली नहीं आएगी। तब तक प्रोग्रेस नहीं आएगा। तब तक खुशी नहीं होगी, तब तक अमन नहीं होगा। हमें मिल कर ही कुछ करना होगा। हमारा देश जो है, हमारी सोसायटी जो है, एक घर की तरह है। घर का एक सदस्य चिल्लाता रहेगा तो कुछ नहीं होगा। हम सब को मिलकर वह करना होगा। हमारे घर में कोई तकलीफ है या कोई खराबी है, तो हमें उसे ठीक करना है। कोई बाहर का आदमी आकर नहीं ठीक करने वाला है। वह हमको ही करना है। हमारी फिल्म यही कहने की कोशिश कर रही है। एक वक्त बात चली थी कि यह फिल्म अंग्रेजी में बनाएं,क्योंकि यह बहुत ही मॉडर्न किस्म की फिल्म है। मैंने कहा कि नहीं। यह फिल्म अंग्रेजी में तो बिल्कुल ही नहीं बननी चाहिए। क्यों? क्योंकि यह फिल्म हिंदुस्तानियों से बात करने की कोशिश कर रही है । सबसे पहले तो इसको हिंदुस्तानी में बनाना चाहिए हमें। अंग्रेजों के लिए हम नहीं बना रहे हैं यह फिल्म। यह हम अपने लिए बना रहे हैं। अपने देश के लोगों के लिए बना रहे हैं इसको देखकर हम में से कुछ जागें। तो अंग्रेजों के खिलाफ है ही नहीं यह फिल्म।

- इस बात में कितनी सच्चाई है कि राजकु मार संतोषी की भगत सिंह आप करने वाले थे?

0 वह मुझे ऑफर हुई थी। राजकुमार संतोषी ने मुझे ऑफर की थी, पर मैंने ना कर दिया था। मेरी ना करने की वजह यह थी कि ़ ़ ़ मेरा बहुत ही सिंपल लॉजिक था कि ़ ़ ़ देखिए मैं कोई भी काल्पनिक किरदार प्ले कर लूंगा। 'रंग दे बसंती का डीजे एक काल्पनिक किरदार है ़ ़ ़ वह रियल नहीं है। डीजे आजाद प्ले कर रहा है फिल्म की डाक्यूमेंट्री के अंदर। अगर हम फिल्म बना रहे हैं भगत सिंह के ऊपर ़ ़ भगत सिंह ख्फ् वर्ष के उम्र में शहीद हो गए थे। जब मुझे यह फिल्म ऑफर की गई थी, संतोषी की भगत सिंह तो मेरी उम्र शायद फ्ब् वर्ष की थी। मैंने कहा कि राज मैं कम से कम दस साल बड़ा हूं इस रोल के लिए । करने को मैं कर लूं। क्योंकि एक कलाकार के तौर पर मुझे अलग-अलग उम्र के किरदारों को निभाना पड़ता है। हो सकता है मैं भगत सिंह की उम्र का दिख जाऊं और परफॉर्म भी कर दूं, लेकिन मेरी समझ से, खासकर भगत सिंह के किरदार में सच्चाई तभी आएगी, जब आप कटघरे में खड़े होकर उस इंसान को देखें, तो देखने में हमें लगे ़ ़ यार यह तरुण लड़का है,अभी तक इसकी मूंछें नहीं निकली हैं ठीक से और यह इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है, जो मुझे महसूस नहीं हो रही हैं। यह अपनी जान देने पर तैयार हो गया। अपने सिद्धांतों के लिए। उसका धक्का मुझे तभी लगेगा,जब भगत सिंह का किरदार निभाने वाला अठारह साल का लड़का होगा। आपको अठारह साल का लड़का ही लेना चाहिए इस रोल में। आप कामयाब डायरेक्टर हैं। अठारह साल के लड़के को लेकर बना सकते हैं। नया लड़का लीजिए और बेहतर होगा कि सरदार लीजिए। उससे विश्वसनीसता आएगी। भगत सिंह का कैरेक्टर कौन नहीं प्ले करना चाहेगा? महान किरदार है उनका। लेकिन मुझे लगा था कि मैं शूट नहीं कर रहा हूं उससे। दूसरी वजह यह थी कि उस वक्त जब आए थे मेरे पास, तो मुझे े वह स्क्रिप्ट बनाई इतनी ठीक नहीं लगी थी।

- स्वतंत्रता की लड़ाई के दौर के किरदारों में कौन आपको प्रिय है,जो प्रभावित भी करता हो?

0 महात्मा गांधी ़ ़ ़ उनका व्यक्तित्व मुझे आकर्षित करता है। उसकी वजह है,उनकी ताकत,उनकी ईमानदारी,अहिंसा का उनका सिद्धंात ़ ़ ़स्वतंत्रता की लड़ाई का नेतृत्व उन्होंने अहिंसा करा मार्ग अपना कर किया। कमाल का काम किया उन्होंने। उनमें आंतरिक शक्ति थी। अंग्रेजों से निबटने की बुद्धि थी उनके पास। उनमें अंग्रेजों से निबटने की बौद्धिक और मानसिक क्षमता थी। वह अंग्रेजों के खिलाफ मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी लड़ रहे थे। किस तरह उन्होंने पूरे देश को इकट्ठा किया? किस तरह उन्होंने लोगों को प्रेरित किया। किस तरह उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता दिखलायी। दन सबक साथ-साथ उनकी सबसे अहम बात है कि वह अहिंसा में विश्वास करते थे। आज वह कहुत ही जरूरी हो गया है। मेरे लिए सबसे आकर्षक किरदार गांधी जी हैं।

- इसका मतलब 'रंग दे बसंती' में जो डीजे करता है, आमिर खान उस तरह से नहीं सोचते हैं?

0 एक चीज और मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि अगर 'रंग दे बसंती' का क्लाइमेक्स वहां पर होता, जहां पर वे लड़के रक्षा मंत्री को मार देते हैं ़ ़ ़ वहां फिल्म खत्म हो जाती। ये लोग बड़े खुश होते कि हमने डिफेंस मिनिस्टर को मार दिया। न्यूज आता टीवी पर कि शायद आतंकवादियों का हाथ होगा। फलां होगा ़ ़ ़ढिमका होगा और इन लोगों पर किसी को संदेह नहीं होता। अगर वहां पर फिल्म खत्म हो जाती ़ ़ और ये बड़े खुश होते कि हमने बदला ले लिया। जो हम करना चाहते थे, वो हमने कर दिखाया। तब आप यह कह सकते हैं कि हमारा मैसेज था कि हिंसा ही जवाब है। लेकिन हमारी फिल्म वहां पर खत्म नहीं होती। वे लड़के हिसात्मक कदम उठा लेते हैं, उसके बाद उन्हें अहसास होता है कि वास्तव में वह गलत कदम था। पहले वे अलग-अलग कोशिश करते हैं, एक दम निराश हो जाते हैं। डीजे रो देता है कि यार हमलोगों की कोई औकात ही नहीं है। जब उनकी स्थिति ऐसी हो जाती है कि वे लोग कुछ नहीं कर पाते तब उन्हें लगता कि यार कम से कम इस दरिन्दे को मार तो दो। और उस जुनून में जाकर वे उसे मार देते हैं। दरिंदे को मारने के बाद वे खुश नहीं हैं। उन्हें यह एहसास होता है कि जो हम करने चले थे, वह तो हासिल ही नहीं हुआ। जिस वजह से हम उसे मारने चले थे, वह तो हासिल ही नहीं हुआ है। यह तो और बड़ा हीरो बन गया। इसलिए फिल्म वहां खत्म नहीं होती। फिल्म आगे बढ़ती है। फिल्म का अंतिम संदेश करण के मुंह से निकलता है जब वह ऑल इंडिया रेडियो में माइक पर होता है। वह कहता है कि शायद हमने जो किया है वह गलत किया है और हम उस गलती को पब्लिलिी कबूल करने आए हैं यहां। जो हमको सजा मिलेगी, वह मिलनी चाहिए। लेकिन हम यह कहना चाह रहे हैं कि कुछ करना होगा। ऐसे हम जिंदगी नहीं जी सकते हैं। पहला कॉलर बोलता है कि अच्छा किया आपने। ऐसे ही सबको ही मार देना चाहिए। सारे पॉलिटीशियन को खड़ा कर के मार देना चाहिए। तो उसका जवाब क्या आता है? करण यह नहीं कहता कि सही कह रहे हैं आप। करण कहता है कि नहीं। कितने लोगों को मारेंगे आप, किस-किस को मारेंगे,आप किसको मारेंगे? इनको हटा दीजिए। इनकी जगह पर किसी और मिनिस्टर को ले आइए। वे क्या अलग होने वाले हैं? नहीं, अलग नहीं होने वाले हैं। ये जो मिनिस्टर हैं, ये किसी और ग्रह से नहीं आए हैं। ये हम में से ही एक हैं। हमारी सोसायटी के हैं। हमने इन्हें चुना है। ये हमारे बीच के हैं। अगर ये भ्रष्ट हैं तो हम भ्रष्ट हैं। अगर कुछ बदलना है तो इनको लाइन में खड़ा कर के गोली मत मारो। अगर कुछ बदलना है तो खुद को बदलो। यह संदेश है फिल्म का। यह बहुत ही साफ संदेश दिया गया है। इसमें कोई अस्पष्टता नहीं है। तो जब मैं यह कहता हूं कि मैं गांधी जी का प्रशंसक हूं तो मुझे लगता है कि फिल्म उनका प्रचार करती है। फिल्म बताती है कि हिंसा से कुछ नहीं होगा। वास्तव में हमें जागना है।

- लेकिन जब आप फिल्म की कहानी सुन रहे होते हैं तो क्या सचमुच वैचारिेक ओर दार्शनिक स्तर पर इन सारी चीजों को देखते और ध्यान में रखते हैं?

0 हां, मैं गौर करता हूं। खासकर अगर फिल्म सामाजिक रूप से रेलीवेंट टॉपिक पर हो तब तो मैं अवश्य ही अपने विचारों से फिल्म की कहानी को मैच करता हूं कि यह मैच करती है कि नहीं। अगर नहीं करती है तो मैं नहीं करता हूं। अगर फन है या मजेदार और मनोरंजक फिल्म है,उसमें कोई विचार या सोशली रेलीवेंट चीज हम नहीं कह रहे हैं तो अलग बात हो गई। उसमें भी मैं चेक करता हूं कि यार कोई ऐसी चीज तो हम नहीं दिखा रहे हैं बीच में,जिसें मैं नहीं मानता हूं। जब सोशली रेलीवेंट फिल्म मैं चुनता हूं तो उस वक्त तो मैं निश्चित ही यह ध्यान में रखता हूं। अगर फिल्म कुछ कह रही है और मैं कुछ अलग कह रहा हूं तो मैं नहीं करता हूं।

- क्या एक फैनेटिक मुसलिम या एक कट्टरपंथी हिंदू या किसी टैररिस्ट का रोल आपको दिया जाएगा तो आप करेंगे?

0 हां करूंगा मैं। लेकिन वह होता है रोल। और फिल्म क्या कह रही है, वह अलग चीज होती है। निगेटीव रोल करने से कभी नहीं कतराता हूं। 'क्9ब्7 अर्थ' मैंने की है। फिल्म कह रही है कि लोग लड़ रहे हैं। आठ साल की एक पारसी लड़की के दृष्टिकोण से फिल्म दिखायी जा रही है। ़ ़ ़ कि कैसे लोग बदल रहे हैं मेरे इर्द-गिर्द, क्या देख रही हूं मैं। ये क्या हो रहा है? किस तरह बंटवारा किया जा रहा है? किस तरह लोगों के जहन में जहर घोला जा रहा है? फिल्म जो है 'क्9ब्7 अर्थ' ़ ़ ़ वह उस लड़की का दृष्टिकोण है। उसमें शायद मेरा निगेटिव कैरेक्टर हो ़ ़ ़ उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह एक किरदार है।

- बहुत बड़ी बात कही आपने ़ ़ जरूरी नहीं कि हर बार आप ही फिल्म के हीरो हों, या यों कहें कि कोई मैसेज देना हो तो जरूरी नहीं कि वह आपके जुबान से ही जाए। किसी और के जुबान से भी जा सकता है।

0 हां किसी और के जुबान से भी जा सकता है। 'रंग दे बसंती' में तो करण कहता है। मैं तो कहता भी नहीं हूं। करण ही ऑल इंडिया रेडियो में सभी से बातें करता है। - अपने बहुत सारे क्रिटिक को पहली बार 'रंग दे बसंती' में आप अच्छे लगे। उन्हें लगा कि आपने अच्छा अभिनय किया है। 0 क्या कह सकता हूं। शुक्रिया कहूंगा मैं। - और उसके साथ कुछ जोड़ा उन्होंने। उसका कारण बताया है कि आमिर ने जब-जब कोस्टार के साथ कुछ किया है,वहां वे अच्छे लगे। उनकी राय में 'मंगल पांडे' के फ्लॉप होने की एक वजह यही है कि कोस्टार उतने एक्टिव नहीं दिखे? बाकी किरदार उस तरह से उभर नहीं पाए?0 गलत। 'मंगल पांडे' में जो कैरेक्टर है कैप्टन गोर्डन का वह मंगल पांडे के टक्कर का रोल था। दोनों पैरेलर रोल था। आप यह नहीं कह सकते है कि मंगल पांडे का रोल बेटर था या कैप्टन गोर्डन का। दोनों हीरो हैं फिल्म के। तो यह बात गलत है कि सिर्फ मेरा ही किरदार था और किसी का किरदार नहीं था। कैप्टन गोर्डन का किरदार था।

- सहयोगी और बाकी क्रांतिकारी उभर कर नहीं आए?

0 फिल्म उनके बारे में नहीं थी। फिल्म थी ब्रिटिश और इंडिया के बीच में जो लड़ाई है ़ ़ उसमें एक ब्रिटिश ऑफिसर और एक भारतीय सिपाही दिखाया गया। उसमें दो कैरेक्टर अहम थे ़ ़़ ़ लेखक ने जो दृष्टिकोण रखा,उसमें उन दोनों को सामने रखा है। एक ब्रिटिश दृष्टिकोण और एक भारतीय। उसमें जो ब्रिटिश कैरेक्टर का रोल है, वह उतना ही अहम है, उतना ही इंपोटर्ेंट है, जितना कि हिंदुस्तानी का। उस हिसाब से उससे कोई समझौता नहीं किया गया है फिल्म के अंदर। मैंने अक्सर ऐसी फिल्में की हैं, जिनमें मैं सिर्फ अकेला हीरो रहा हूं। और वे फिल्में बड़ी कामयाब हुई हैं। ऐसा कुछ नहीं है कि सिर्फ वही फिल्में हिट होती हैं, जिसमें पांच-छह लोग होते हैं। आप 'गुलाम' ले लीजिए या 'सरफरोश' ले लीजिए या 'दिल' या 'राजा हिंदुस्तानी' ़ ़ ़ बहुत सी फिल्में हैं ़ ़ मैंने सोलो स्टार भी किए हैं, मल्टीस्टारर भी किए हैं। या ऐसी फिल्में जिसमें ज्यादा कैरेक्टर हों या एक कैरेक्टर हो। 'दिल है कि मानता नहीं' में सिर्फ दो ही कैरेक्टर थे- लड़का-लड़की।

- जब आप मंगल पांडे जैसे किरदार के साथ काफी लंबे समय तक रहते हैं तो उससे आपकी रोजमर्रा जिंदगी में कितनी खलल पड़ती है? या आप कम्पार्टमेंटलाइज कर लेते हैं कि नहीं इस समय मैं किरदार में हूं और अब नार्मल इंसान हूं ़ ़ ़

0 आम तौर पर जब मैं एक काम कर रहा होता हूं तो मुझे दूसरा काम उस वक्त नहीं अच्छा लगता। ऐसा नहीं होता कि एक काम रोक कर कोई और काम करूं। जब अभी मैं इंटरव्यू दे रहा हूं तो मुझे और कुछ नहीं करना है। मैं यह नहीं चाहूंगा कि शूटिंग में आपको बुला लिया और शूटिंग भी कर रहा हूं और आपको इंटरव्यू भी दे रहा हूं। कभी-कभी शायद करना पड़े, सिचुएशन ऐसी हो। लेकिन मुझे यह पसंद नहीं है। मुझे मजा नहीं आता। अपनी तरफ से मैं ऐसी स्थिति नहीं आने देता। जाती जिंदगी में किसी ककिरदार से अभी तक खलल नहीं आया है। लेकिन यह बात सही है कि जब मैं एक कैरेक्टर को लेकर एक फिल्म करता हूं तो मैं चाहता हूं कि उस कैरेक्टर को पूरी तरह से जीऊं। और उस प्रक्रिया का पूरा आनंद उठाऊं जब मैं उस कैरेक्टर को प्ले कर रहा हूं। लेकिन ऐसा नहीं है कि अगर मैं छह महीने मंगल पांडे की शूटिंग कर रहा हूं तो छह महीने तक मैं मंगल पांडे ही बन गया हूं और बाकी जिंदगी में भी मैं मंगल पांडे की तरह व्यवहार कर रहा हूं। जब शूटिंग हो जाती है, मैं घर आता हूं। घर में रहने के वक्त मैं मंगल पांडे नहीं रहता। हां यह जरूर है कि उस छह महीने के दौरान अक्सर यह होता है कि जब मैं शूटिंग नहीं कर रहा हूं और घर पर बैठा हूं तो भी मैं अपने कैरेक्टर के साथ खेलता हूं कि अगर मंगल इस वक्त यहां होता तो क्या करता? तो मैं अपनी कल्पना को मांजता रहता हूं। किसी किरदार से मेरी पर्सनल लाइफ डिस्टर्ब नहीं होती। - एक्टर कहते हैं कि कई किरदार उनके साथ रह जाते हैं?0 नहीं, मेरे साथ ऐसा नहीं होता है। मेरे साथ अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। हां, आगे चलकर हो तो पता नहीं,लेकिन अभी तो ऐसा नहीं हुआ है।- कई बार ऐसे किरदार होते हैं जो कहीं न कहीं आपकी जिंदगी को भी प्रभावित करते हैं?0 देखिए, हर चीज आदमी पर कुछ न कुछ प्रभाव तो छोड़ती है। जब मैं कोई किताब पढूं या आपसे बातचीत करूं या कोई फिल्म देखूं या कोई हादसा हो ़ ़ ़ हर चीजका असर होता है ़ ़ ़ कैरेक्टर प्ले करना तो फिर भी बहुत बड़ी चीज हो गई। मैं छह महीना वही चीज कर रहा हूं। कुछ इंपैक्ट तो आता है हर चीज का इंसान पर। तो हर कैरेक्टर किसी न किसी तरह से आपको प्रभावित करता है। कोई चीज छोड़ जाता है आपके साथ। और आप एक इंसान के तौर पर विकसित होते हैं। बदलते हैं। आप में परिव‌र्त्तन दिखता है।

- हिस्ट्री में कितने अच्छे थे आप?

0 स्कूल में मैं इतना अच्छा नहीं था। लेकिन पढ़ाई के बाद जब मैं फिल्मों में आया तो हिस्ट्री में मेरा इंट्रेस्ट बढ़ा। मुझे किताबें पढ़ने का बहुत शौक है। हिस्टोरिकल बुक भी पढ़ता हूं। अलग-अलग दौर के बारे में जानकारी हासिल करने में मेरी रुचि है। 'अर्थ शास्त्र' भी पढ़ी है मैंने। ऐतिहासिक हस्तियों के बारे में पढ़ना अच्छा लगता है।

- संयोग ऐसा कि 'लगान' के बाद से आपने जितनी फिल्में कीं,उनमें से अधिकांश का संबंध इतिहास से रहा। क्या यह किसी पसंद और सोच के कारण है?

0 पसंद और सोच कह सकते हैं। लेकिन यह भी सोचिए कि उस वक्त मुझे क्या फिल्में ऑफर की जा रही हैं? उनमें से कौन सी मुझे पसंद आ रही हैं? अगर हां मैं रायटर-डायरेक्टर होता तब पूरी तरह से अपनी पसंद पर चलता कि मैं इस वक्त इस मूड में हूं और मुझे यह करना है। इसके बाद मैं इस मूड में हूं मुझे वह करना है। लेकिन मैं रायटर-डायरेक्टर नहीं हूं। मैं एक्टर हूं। यह संयोग है कि आशुतोष मेरे पास स्क्रिप्ट लेकर आए। हां, 'लगान' मुझे पसंद आई मैंने की। 'मंगल पांडे' मुझे पसंद आई मैंने की। लेकिन कहानी मैंने नहीं लिखी। स्क्रिप्ट मैंने नहीं लिखी। स्क्रिप्ट मेरे पास आई । अगर केतन मेरे पास नहीं आते या कोई और एक्टर हां कर लेता तो वह मेरे पास नहीं आते। 'रंग दे बसंती' मेरे पास आई, मुझे पसंद आई मैंने की। शायद मेरे पास नहीं आती। मैंने नहीं लिखी कहानी। - आपके पास कॉमेडी भी आई होगी। कुछ लव स्टोरी भी आई होगी। कुछ दूसरी तरह की भी फिल्में भी आई होंगी ़ ़ ़0 लेकिन कोई ऐसी नहीं आई जो मुझे पसंद आए।

- या फिर कहीं न कहीं आपके माइंड सेट में या ़ ़

0 मेरे माइंड में ये जरूर था कि 'मंगल पांडे' और 'रंग दे बसंती' दोनों ड्रामैट्रिक फिल्मस है। मैंने राकेश से कहा भी था कि यार उस वक्त 'मंगल पांडे' रिलीज भी नहीं हुई थी। 'मंगल पांडे' की शूटिंग शुरू होने वाली थी। और मैंने राकेश से कहा कि, 'राकेश तुम्हारी फिल्म करने से पहले ़ ़ ़ मेरा दिल चाह रहा है कि मैं कोई हल्की-फुल्की सी कॉमेडी फिल्म करूं? दोनों ड्रामैटिक फिल्में एक बाद एक न आएं। बीच में एक कुछ अलग किस्म की फिल्म आए। लेकिन मुझे कुछ मिला नहीं।

- कौन ऐसे किरदार हैं जो और आपको आकर्षित कर रहे हैं।

0 हिस्ट्री में तो गांधी जी खुद एक कमाल के कैरेक्टर हैं, जो प्ले करना चाहूंगा। उन पर तो एक फिल्म बन चुकी है। शायद फिर न बने। मेरी जानकारी में चंद्रगुप्त बहुत रोचक किरदार है। अकबर का रोल निभाने में मजा आएगा। ऐसे तो बहुत हैं ़ ़ ़ हिस्ट्री में तो एक से एक कैरेक्टर हैं।

- खबर थी कि यश चोपड़ा से आपकी अनबन है, इसलिए आप उनकी फिल्मों में काम नहीं करते। लेकिन, अभी 'फना' आ रही है?

0 'डर' के दौरान यश जी से मेरी अनबन हुई थी। हमारे मतभेद थे, इसलिए मैं उस फिल्म से अलग हो गया था। इस बीच मैंने उनके साथ कोई फिल्म नहीं की। मेरे सीनियर हैं। समय के साथ अनबन वाली बात पुरानी हो गई। एक दिन आदि (आदित्य चोपड़ा) का फोन आया कि वह एक फिल्म ऑफर करना चाह रहे हैं।- यश चोपड़ा के साथ फिर से फिल्म करने में कोई दिक्कत नहीं हुई?0 'फना' से पहले भी यश जी से मेरी मुलाकातें होती रही हैं। पुरानी बातों को भूलकर हमलोग मिलते रहे हैं। उन्होंने पहले मुझे बुलाया था। हमारी बातचीत हुई थी। मुझे भी लगा कि जो पुरानी अनबन थी, उसे भूल जाना चाहिए। यश जी ने भी कहा कि हम साथ में काम करें या न करें ़ ़ ़ लेकिन संबंध तो अच्छे हो सकते हैं। मैंने भी कहा - ठीक है सर।़ उसके बाद से हमलोग कहीं भी मिले तो मैं पूरी इज्जत से पेश आता था और वह प्यार से मिलते थे।

- 'फना' के लिए हां करने की और कोई वजह?

0 किसी भी फिल्म के लिए हां करने की मेरी पहली वजह होती है स्क्रिप्ट। फिर मैं निर्माता और डायरेक्टर आदि देखता हूं। स्क्रिप्ट अच्छी लगती है तो यह जरूर चाहता हूं कि फिल्म ठीक से बने और अच्छी तरह रिलीज हो। मुझे इस फिल्म की स्क्रिप्ट अच्छी लगी थी, इसलिए खुशी-खुशी मैंने हां कर दी।

- कैसी फिल्म है यह?

0 'फना' मूल रूप से रोमांटिक फिल्म है। इसमें पॉपकॉर्न रोमांस नहीं है, थोड़ी मैच्योर कहानी है।- क्या अपने कैरेक्टर के बारे में कुछ बता सकते हैं?0 हां, बता तो सकता हूं, लेकिन फिल्म रिलीज होने के पहले उस पर बात करना ठीक नहीं होगा। आपने तो फिल्म देखी नहीं है, इसलिए आपके सवाल भी नहीं होंगे। बेहतर होगा कि फिल्म की रिलीज के बाद हमलोग इस पर बात करें। इतना भर कहूंगा कि टूरिस्ट गाइड टाइप का कैरेक्टर है मेरा।

- क्या आपको जरूरी नहीं लगता कि आप अपनी फिल्मों और कैरेक्टर के बारे में रिलीज से पहले बात करें?

0 देखिए, मुझे अपने काम के बारे में कम बातें करनी हैं। मुझे काम करना है। लोग मेरा काम देखें और उसे महसूस करें और अपने हिसाब से उसे समझें। फिल्म की रिलीज के बाद में उनसे बातें करूं कि मेरे जहन में क्या था? मैंने क्यों ये किया, क्यों वो नहीं किया? जैसे 'रंग दे बसंती' के बारे में अभी बात करने में मजा आता है। आपने वह फिल्म देख रखी है तो आप मेरी बात समझ पाएंगे कि मैं क्या कह रहा हूं। मैं फिल्म के प्रसंग, दृश्य और संवाद भी बता सकता हूं।- सुना है कि यशराज फिल्म में सभी के साथ तीन फिल्मों का कांट्रेक्ट होता है। क्या आप भी उनकी तीन फिल्में करेंगे?0 नहीं, मेरे साथ ऐसा नहीं है। मैं कभी ऐसा कांट्रेक्ट करता ही नहीं हूं। मेरे लिए कहानी महत्वपूर्ण होती है। बगैर स्क्रिप्ट के तो मैं वैसे भी कोई चीज साइन नहीं करूंगा। तो फिलहाल मैंने 'फना' की है। आगे कोई स्क्रिप्ट मिली तो सोचेंगे।

- होम प्रोडक्शन में क्या हो रहा है?

0 अमोल गुप्ते की एक स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है। अमोल खुद चाहते हैं कि वह डायरेक्ट करें। उसने मुझ पर अंतिम फैसला छोड़ा है। मैं भी चाहता हूं कि वही डायरेक्ट करे।


Wednesday, March 12, 2008

हिन्दी फिल्म:महिलायें:आठवां दशक

आठवां दशक हर लिहाज से खास और अलग है.श्याम बेनेगल ने १९७४ में 'अंकुर' फ़िल्म में शबाना आज़मी को मौका दिया.उनकी इस कोशिश के पहले किसी ने सोचा नहीं था कि साधारण नैन-नक्श की लड़की हीरोइन बन सकती है.मशहूर शायर कैफी आज़मी की बेटी शबाना ने साबित किया कि वह असाधारण अभिनेत्री हैं.उनके ठीक पीछे आई स्मिता पाटिल ने भी दर्शकों का दिल जीता.हालांकि हेमा मालिनी को राज कपूर की फ़िल्म 'सपनों का सौदागर' १९६८ में ही मिल चुकी थी,लेकिन १९७० में देव आनंद के साथ'जॉनी मेरा नाम' से हेमा के हुस्न का ऐसा जादू चला कि आज तक उसका असर बरकरार है.एक और अभिनेत्री हैं इस दौर की,जो उम्र बढ़ने के साथ अपना रहस्य गहरा करती जा रही हैं.जी हाँ,रेखा के ग्लैमर की घटा 'सावन भादो' से छाई.अमिताभ और रेखा की जोड़ी ने इस दशक में दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया.अपने अलग अंदाज और अभिनय के लिए सिम्मी गरेवाल जानी गयीं.सफ़ेद कपडों में वह आज भी टीवी पर अवतरित होती हैं तो दर्शक उनकी मृदुता के कायल होते हैं.१९७३ में राज कपूर की 'बॉबी' से आई डिंपल कपाडिया पहली फ़िल्म के बाद ही राजेश खन्ना के घर में गायब हो गयीं.इस दशक में ही आई जीनत अमान ने पहली बार हीरोइन के शहरी तेवर और अंदाज से दर्शकों को रु-ब-रु कराया।
इस दौर की अन्य अभिनेत्रियों में रीना राय,टीना मुनीम,रति अग्निहोत्री,जया प्रदा,राधा सलूजा,रेहाना सुलतान और सारिका का उल्लेख किया जा सकता है.

बॉक्स ऑफिस १२.०३.२००८

चवन्नी चैप पर बॉक्स ऑफिस का नया सिलसिला जारी हो रहा है.कोशिश रहेगी कि हर हफ्ते इसे यहाँ प्रकाशित किया जाए.अजय ब्रह्मात्मज नियमित रूप से हफ्तावार यह बॉक्स ऑफिस जागरण में लिखते हैं,वहीं से साभार यह यहाँ पोस्ट होगा.चवन्नी मानता है के ब्लॉग के पाठक और अखबार के पाठक एक होने के साथ ही अलग-अलग भी होते हैं।

फीकी रही ब्लैक एंड ह्वाइट

सुभाष घई की ब्लैक एंड ह्वाइट को खाली मैदान मिला था। फिल्म का विशेष प्रचार भी किया गया था। इसके बावजूद बॉक्स ऑफिस पर यह उम्मीद के मुताबिक सफल साबित नहीं हुई। हालांकि इस फिल्म में नए अभिनेता अनुराग सिन्हा और अनुभवी अनिल कपूर के अभिनय की तारीफ जरूर हुई।
सुभाष घई ने इस फिल्म में अपनी शैली बदली थी और सीमित बजट में रियलिस्टिक फिल्म बनाने की कोशिश की थी। एक ट्रेंड पंडित के मुताबिक कमर्शियल फिल्ममेकर को रियलिस्टिक फिल्म बनाने के बारे में सोचना ही नहीं चाहिए। ऐसे में वे न घर के रह पाते हैं और न घाट के। ब्लैक एंड ह्वाइट का पहला दिन बुरा रहा। समीक्षकों की तारीफ के बाद शनिवार और रविवार को दर्शक बढ़े। फिर सोमवार से दर्शकों की संख्या में गिरावट दिखी। इधर दिल्ली में इस फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया गया है। उम्मीद है कि इसके बाद कलेक्शन बढ़ेगा।

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:सातवां दशक

क्या आप ने आयशा सुलतान का नाम सुना है?चलिए एक हिंट देता है चवन्नी.वह नवाब मंसूर अली खान पटौदी की बीवी है.जी,सही पहचाना-शर्मिला टैगोर.शर्मीला टैगोर को सत्यजित राय ने 'अपु संसार' में पहला मौका दिया था.उन्होंने सत्यजित राय के साथ चार फिल्मों में काम किया,तभी उन पर हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री की नज़र पड़ी.शक्ति सामन्त ने उन्हें 'कश्मीर की कली' के जरिये हिन्दी दर्शकों से परिचित कराया.जया भादुड़ी की पहली हिन्दी फ़िल्म 'गुड्डी' १९७१ में आई थी,लेकिन उन्हें सत्यजित राय ने 'महानगर' में पहला मौका दिया था.दारा सिंह की हीरोइन के रूप में मशहूर हुई मुमताज की शुरूआत बहुत ही साधारण रही,लेकिन अपनी मेहनत और लगन से वह मुख्य धारा में आ गयीं.राजेश खन्ना के साथ उनकी जोड़ी जबरदस्त पसंद की गई.साधना इसी दशक में चमकीं.नाजी हुसैन ने आशा पारेख को 'दिल देके देखो' फ़िल्म १९५९ में दी,लेकिन इस दशक में वह लगातार उनकी पाँच फिल्मों में दिखाई पड़ीं.वह हीरोइन तो नही बन सकीं,लेकिन उनकी मौजूदगी दर्शकों ने महसूस की.हेलन को कोई कैसे भूल सकता है?उनके नृत्य के जलवों से फिल्में कामयाब होती थीं.इसी प्रकार अरूणा ईरानी को भी दर्शकों ने पहचाना.इस दौर में तनुजा,बबीता और मौसमी चटर्जी को भी दर्शकों ने देखा और पसंद किया.

Tuesday, March 11, 2008

पेन उठाओ,बॉलीवुड हिलाओ

यह एक मौका है.अगर आप को लगता है कि आप की किसी कहानी पर फ़िल्म बन सकती है और आप को कोई जरिया नहीं मिल रहा हो किसी फ़िल्म निर्माता या स्टार तक पहुँचने का तो आप मिर्ची मूवीज के इस अभियान और खोज में शामिल हो सकते हैं.आपको १००० से ३००० शब्दों में अपनी कहानी लिखनी है और इनके पास भेज देनी है.आप की कहानी के निर्णायक होंगे अज़ीज़ मिर्जा और कमलेश पण्डे.इस प्रतियोगिता या खोज में प्रथम को १० लाख रुपये,द्वितीय को ५ लाख रुपये और तृतीय को ३ लाख रुपये का पारितोषिक मिलेगा.उन कहानियो पर स्क्रिप्ट लिखी जायेगी और फिर फ़िल्म भी बनेगी.इन तीन विजेताओं के अलावा ५० लेखकों को पांच-पाँच हजार के पुरस्कार मिलेंगे.तो यह मौका है आप के लेखक बन जाने का.आप ज्यादा जानकारी के लिए मिर्ची मूवीज लिंक पर जाएं.या फिर उन्हें mirchimovies@indiatimes.com पर लिखें।
जी इस प्रतियोगिता में हिन्दी या अंग्रेज़ी में कहानी भेजी जा सकती है.

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:छठा दशक

देश की आज़ादी बाद के इस दशक को हिन्दी फिल्मों का स्वर्णकाल माना जाता है.पिछले दशक में आ चुकी नरगिस और मधुबाला की बेहतरीन फिल्में इस दशक में आयीं.आज हम जिन निर्देशकों के नाम गर्व से लेते हैं,वे सब इसी दशक में सक्रिय थे.राज कपूर,बिमल राय,के आसिफ,महबूब खान,गुरु दत्त सभी अपनी-अपनी तरह से बाज़ार की परवाह किए बगैर फिल्में बना रहे थे।
इस दशक की बात करें तो शोभना समर्थ ने अपनी बेटी नूतन को 'हमारी बेटी' के साथ पेश किया.नूतन का सौंदर्य अलग किस्म का था.उन्हें 'सीमा' के लिए फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला.१९६३ में आई 'बंदिनी' में कल्याणी की भूमिका में नूतन ने भावपूर्ण अभिनय किया.इसी दशक में दक्षिण से वैजयंतीमाला आयीं.वह प्रशिक्षित नृत्यांगना थीं.उनके लिए फिल्मों में डांस दृश्य रखे जाने लगे.वह काफी मशहूर रहीं अपने दौर में.कहते हैं राज कपूर ने निम्मी को सबसे पहले महबूब खान की 'अंदाज' के सेट पर देखा था,उन्होंने तभी 'बरसात' में निम्मी को छोटी सी भूमिका दी थी.उन्हें यह नाम भी राज कपूर ने ही दिया था.महबूब खान की प्रयोगशीलता गजब की थी.उन्होंने पश्चिम की फिल्मों प्रभावित होकर फरहत नाम की एक लड़की को चुना और उसे नादिरा नाम दिया.नादिरा की पहली फ़िल्म 'आन' थी.इसमें वह राजकुमारी राजश्री की भूमिका में थीं.नादिरा में सम्भावना थी कि वह हीरोइन बनें,लेकिन राज कपूर की 'श्री ४२०' में माया के भूमिका से उनकी ऐसी वैंप इमेज बनी के निर्देशक उन्हें नायिका की भूमिका देने से कतराने लगे.इस दशक में आई महजबीन बानो उर्फ़ मीना कुमारी को कोई कैसे भूल सकता है.दर्द का पर्याय बन कर उभरी मीना कुमारी की पहली बड़ी फ़िल्म १९५२ में आई 'बैजू बावरा'थी.उस फ़िल्म से लेकर 'पाकीजा' तक मीना कुमारी ने दर्शकों को अपनी तकलीफ से ही बांधे रखा.शायरी और शराब में वह डूब चुकी थीं.हैदराबाद की वहीदा रहमान पर गुरु दत्त की नज़र पड़ी.वे उन्हें लेकर मुम्बई आए और देव आनंद के साथ 'सी आई डी'(१९५६) फ़िल्म में पेश किया.अगली फ़िल्म 'प्यासा' थी.इस फ़िल्म के दौरान दोनों का रोमांस हुआ.कहते हैं गुरु दत्त अपनी ज़िंदगी में वहीदा रहमान के आकर्षण से नहीं उबर पाये।
इस दशक में नंदा,साधना,माला सिन्हा और गीता बाली भी चर्चित रहीं.

Monday, March 10, 2008

शाहरुख़ खान ने पढी कविता

शाहरुख़ खान ने समर खान की फ़िल्म 'शौर्य' के लिए एक कविता पढी है.इसे जयदीप सरकार ने लिखा है।

शौर्य क्या है?
शौर्य क्या है?
थरथराती इस धरती को रौंदती फौजियों के पलटन का शौर्य
या सहमे से आसमान को चीरता हुआ बंदूकों की सलामी का शौर्य
शौर्य क्या है?
हरी वर्दी पर चमकते हुए चंद पीतल के सितारे
या सरहद का नाम देकर अनदेखी कुछ लकीरों की नुमाईश
शौर्य क्या है?
दूर उड़ते खामोश परिंदे को गोलियों से भून देने का एहसास
या शोलों की बरसातों से पल भर में एक शहर को श्मशान बना देने का एहसास
शौर्य क्या है?
बैठी हुई आस में किसी के गर्म खून सुर्ख हो जाना
या अनजाने किसी जन्नत की फिराक में पल-पल का दोज़ख हो जाना
बारूदों से धुन्धलाये इस आसमान में शौर्य क्या है?
वादियों में गूंजते किसी गाँव के मातम में शौर्य क्या है?
शौर्य क्या है?
शयद एक हौसला,शयद एक हिम्मत......
मजहब के बनाये दायरे को तोड़कर किसी का हाथ थाम लेने की हिम्मत
गोलियों के बेतहाशा शोर को अपनी खामोशी से चुनौती देने की हिम्मत
मरती-मारती इस दुनिया में निहत्थे डटे रहने की हिम्मत
शौर्य
आने वाले कल की खातिर अपनी कायनात को आज बचा लेने की हिम्मत
शौर्य क्या है?

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:पांचवा दशक

पांचवे दशक की शुरूआत बहुत अच्छी रही.महबूब खान ने १९४० में 'औरत' नाम की फ़िल्म बनाई.इस फ़िल्म को ही बाद में उन्होंने 'मदर इंडिया' नाम से नरगिस के साथ बनाया.'औरत' की सरदार अख्तर थीं.उन्होंने इस फ़िल्म के पश्चात् महबूब खान के साथ शादी कर ली थी.इस दौर में फिल्मों में पीड़ित नायिकाओं की अधिकता दिखाई देती है.इसके अलावा फिल्मों के सवक होने से नाच-गाने पर जोर दिया जाने लगा.ऐसी अभिनेत्रियों को अधिक मौके मिले]जो नाच और गा सकती थीं.खुर्शीद ने 'भक्त सूरदास'(१९४३) ,'तानसेन'(१९४३) और 'पपीहा रे'(१९४८) से दर्शकों को झुमाया.देश के बँटवारे के बाद खुर्शीद पाकिस्तान चली गयीं.एक और मशहूर अभिनेत्री और गायिका ने पाकिस्तान का रूख किया था.उनका नाम नूरजहाँ था।महबूब खान के 'अनमोल घड़ी'(१९४६) के गीत आज भी कानों में रस घोलते हैं.भारत में उनकी आखिरी फ़िल्म दिलीप कुमार के साथ 'जुगनू' थी.खुर्शीद और नूरजहाँ तो पाकिस्तान चली गयीं,लेकिन सुरैया ने यहीं रहम का फैसला किया. वजह सभी जानते हैं.हालांकि उनकी मुराद पूरी नहीं हो सकी.सुरैया की पहली फ़िल्म 'ताजमहल'(१९४१) थी.'अनमोल घड़ी' के साथ नूरजहाँ की याद आती है,लेकिन इसी फ़िल्म में गया सुरैया का गीत 'सोचा था क्या,क्या हो गया' ने उनके प्रशंसकों की भीड़ बढ़ा दी थी.कहते हैं उनकी फ़िल्म 'बड़ी बहन' के प्रीमियर के समय पुलिस को उन्हेब बचने के लिए लाठी चार्ज करना पड़ा था.फिल्मों और फ़िल्म स्टारों की दीवानगी का यह पहला उदाहरण माना जाता है.कोलकाता से जद्दन बाई अपनी बेटी फातिमा अब्दुल रशीद को लेकर मुम्बई आ गई थीं.यहाँ महबूब खान ने उन्हें नरगिस नाम दिया.१९४८ में आई 'आग' दे नरगिस ने कामयाबी की ऐसी ज्वाला जगाई कि सुनील दत्त से शादी करने तक वह राज कपूर समेत पूरे देश के दिलों क्व्व धड़कन बनी रहीं.मुमताज बेगम जहाँ गरीब परिवार में पैदा हुईं,लेकिन वह बाला की खूबसूरत थीं.उनके पिता अताउल्लाह खान ने हिमांशु राय और देविका रानी से अपनी बेटी की मुलाक़ात करवाई.उन्होंने उस लड़की को 'बसंत' फ़िल्म में बाल कलाकार का काम दिया और उसका नाम बदल कर बेबी मुमताज कर दिया.देविका रानी ने ही उन्हें मधुबाला नाम दिया.बतौर नायिका मधुबाला की पहली फ़िल्म 'नीलकमल' थी.उस फ़िल्म के निर्देशक केदार शर्मा थे.चार सालों में उहोंने २४ फिल्मों में काम कर तहलका मचा दिया था.बांबे टॉकीज की १९४९ में आई 'महल' से वह सबकी चहेती बन गयीं।

Sunday, March 9, 2008

सीरियस विषय पर सेंसिबल फिल्म है क्रेजी-4 : जयदीप सेन

-अजय ब्रह्मात्मज
राकेश रोशन अपने वादे पर अटल रहे। कृष की शूटिंग के दौरान उन्होंने अपने सहायक जयदीप सेन से वादा किया था कि वह उन्हें एक फिल्म निर्देशित करने के लिए देंगे। उन्होंने कृष से खाली होते ही नयी फिल्म की योजना बनायी और उसकी जिम्मेदारी जयदीप सेन को सौंपी। राकेश रोशन की कंपनी फिल्मक्राफ्ट की यह पहली फिल्म होगी, जिसे कोई बाहरी निर्देशक निर्देशित कर रहा है।
जयदीप सेन को फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादातर लोग राजा सेन के नाम से जानते हैं। राजा ने सालों पहले एनआर पचीसिया के साथ फिल्मों की यात्रा आरंभ की। तब वह अपराधी फिल्म बना रहे थे और राजा उर्फ जयदेव सेन उसमें प्रोड्क्शन एसिस्टैंट थे। उसके बाद हैरी बावेजा, राज कंवर और मुकुल आनंद के साथ काम करने के पश्चात जयदीप सेन ने अपने दोस्त और डायरेक्टर चंदन अरोड़ा की सलाह पर राकेश रोशन से मुलाकात की। राकेश रोशन उन दिनों कृष की शूटिंग आरंभ करने जा रहे थे और एक सक्षम सहायक की तलाश में थे। यहां यह उल्लेख जरूरी होगा कि दिल्लगी में जयदीप सेन एक्टर-डायरेक्टर सनी देओल के एसोसिएट थे।
जयदीप सेन के शब्दों में, जब चंदन ने मुझे राकेश जी से मिलने की सलाह दी तो मैं थोड़ी दुविधा में था। उन दिनों मैं अपनी फिल्म की प्लानिंग कर रहा था। एक बार तो लगा कि फिर से एसिस्टैंट बनना होगा, लेकिन फिर मन में आया कि राकेश जी से सीखने का मौका मिलेगा। मैं उनकी फिल्म करण अर्जुन का जबरदस्त प्रशंसक हूं और उसे बार-बार देखता हूं। ऐसा संयोग देखिए अब उन्हीं के बैनर से मेरी अपनी फिल्म आ रही है।
क्रेजी- 4 के बारे में जयदीप बताते हैं, यह आइडिया राकेश जी का ही है। उन्होंने मुझे इसके बारे में बताया और मेरी प्रतिक्रिया मांगी। मुझे तो झट से फिल्म पसंद आ गयी। नए डायरेक्टर को इससे और अच्छा सेटअप क्या मिल सकता था? यह एक सीरियस विषय पर बनी सेंसिबल कॉमेडी फिल्म है। बहुत ही हल्के-फुलके तरीके से एक गंभीर बात कहने की कोशिश की गयी है। इसे मशहूर टीवी सीरियल ऑफिस ऑफिस के लेखक अश्विनी धीर ने लिखा है। इतनी अच्छी स्क्रिप्ट मिली मुझे और साथ ही चुनौती भी मिली कि मेरा काम उससे छोटा न हो।
जयदीप सेन अपनी फिल्म क्रेजी-4 को कॉमेडी से अधिक सैटॉयर मानते हैं। इसमें चार व्यक्तियों के जरिए समाज की विसंगतियों को देखने की कोशिश की गयी है। चार क्रेजी किस्म के व्यक्तियों की कहानी है, लेकिन हम फिल्म को देखते हुए सोचने पर मजबूर होंगे कि क्रेजी वे चारों जन हैं या हमारा पूरा समाज है? जयदीप सेन बताते हैं कि इसमें इरफान खान, अरशद वारसी, राजपाल यादव और सुरेश मेनन ने चार अलग-अलग स्वभाव के क्रेजी इंसानों की भूमिका निभायी है। उनकी केयरटेकर डॉ. सोनाली सान्याल की भूमिका में जूही चावला हैं। ये सभी मुंबई से दूर खंडाला के आसपास कहीं रहते हैं। एक बार डॉ. सान्याल उन्हें लेकर मुंबई आती हैं और फिर जो होता है. . . वही पूरी फिल्म है।
जयदीप सेन क्रेजी -4 को बासु चटर्जी और हृषीकेश मुखर्जी की कॉमेडी एवं हल्की-फुल्की फिल्मों की परंपरा में मानते हैं। जयदीप की राय में, वैसी फिल्मों के दर्शक आज भी मौजूद हैं। दर्शकों की रुचि बदली है, लेकिन वह टेक्नीक और दूसरी खूबियों के मामले में, कंटेंट के मामले में हमारे दर्शकों को आज भी दिल छू लेने वाली कहानियां अच्छी लगती हैं। नए जमाने के हिसाब से हमने क्रेजी-4 का पेस थोड़ा फास्ट रखा है और हां, इसमें राखी सावंत एवं शाहरुख खान के आइटम सांग भी हैं।

...और कितने देवदास


-अजय ब्रह्मात्मज
शरत चंद्र चंट्टोपाध्याय की पुस्तक देवदास 1917 में प्रकाशित हुई थी। उनकी यह रचना भले ही बंगला और विश्व साहित्य की सौ महान कृतियों में स्थान नहीं रखती हो, लेकिन फिल्मों में उसके बार-बार के रूपांतर से ऐसा लगता है कि मूल उपन्यास और उसके किरदारों में ऐसे कुछ लोकप्रिय तत्व हैं, जो आम दर्शकों को रोचक लगते हैं। दर्शकों का यह आकर्षण ही निर्देशकों को देवदास को फिर से प्रस्तुत करने की हिम्मत देता है।
संजय लीला भंसाली ने 2002 में देवदास का निर्देशन किया था। तब लगा था कि भला अब कौन फिर से इस कृति को छूने का जोखिम उठाएगा? हो गया जो होना था।
सन् 2000 के बाद हिंदी सिनेमा और उसके दर्शकों में भारी परिवर्तन आया है। फिल्मों की प्रस्तुति तो बदल ही गई है, अब फिल्मों की देखने की वृति और प्रवृत्ति में भी बदलाव नजर आने लगा है। पिछले आठ सालों में जिस तरह की फिल्में पॉपुलर हो रही हैं, उनके आधार पर कहा जा सकता है कि दुख, अवसाद और हार की कहानियों पर बनी फिल्मों में दर्शकों को कम आनंद आता है। एक समय था कि ऐसी ट्रेजिक फिल्मों को दर्शक पसंद करते थे और दुख भरे गीत गाकर अपना गुबार निकालते थे। एकाध अपवादों को छोड़ दें तो इधर रोमांस, थ्रिलर और कॉमेडी फिल्में ही ज्यादा पसंद की जा रही हैं।
इस परिप्रेक्ष्य में सुधीर मिश्र और अनुराग कश्यप का फिर से देवदास पर आधारित फिल्म की बात सोचना सचमुच हिम्मत और युक्ति की बात है।
अनुराग कश्यप कहते हैं,भारतीय समाज में हम सभी आत्ममंथन और निजी दुख से प्यार करते हैं और दूसरों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यही कारण है कि देवदास का किरदार और उसका विषय हर पीढ़ी के दर्शकों को पसंद आता है। अनुराग आगे बताते हैं, मेरी फिल्म देवदास से प्रेरित है, लेकिन वह आज की कहानी है, इसलिए उसका नाम देव.डी है। मेरा देव पंजाब का आधुनिक युवक है, जो बेहद समझदार और दुनियादारी से परिचित है। अनुराग की फिल्म में अभय देओल , माही, कल्की और दिब्येंदु भट्टाचार्य मुख्य भूमिकाएं निभा रहे हैं।
दूसरी तरफ सुधीर मिश्र अपनी फिल्म देवदास के मूल कथानक को राजनीतिक संदर्भ दे रहे हैं। उन्होंने राजनीतिक बैंक ड्रॉप में देवदास को गढ़ा है। उनकी फिल्म में मां का किरदार महत्वपूर्ण है, जो अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं की थाती देव को सौंपती हैं। एक तरह से मां की मदद के लिए राजनीति में आया देव आखिरकार कैसे राजनीति के पचड़े में फंसता है। यहां नए संबंध बनते हैं, क्योंकि उन संबंधों का राजनीतिक महत्व है। सुधीर मिश्र कहते हैं, मेरी फिल्म की कहानी शरत चंद्र के उपन्यास से अलग है। मैंने अपनी फिल्म में देवदास के स्वभाव को लिया है और उसे आज के संदर्भ में देखने की कोशिश की है।
क्या एक-दूसरे माहौल और समय में भी देवदास वैसे ही रिएक्ट करेगा, जैसे बिमल राय और संजय लीला भंसाली की फिल्मों में करता रहा या शरत चंद्र के उपन्यास में चित्रित हुआ? सुधीर मिश्र की फिल्म में शाइनी आहूजा और चित्रांगदा सिंह मुख्य भूमिकाओं में हैं।
देवदास उपन्यास के अंत में शरत चंद्र ने लिखा था, यदि कभी देवदास सरीखे अभागे, असंयमी और पापी के साथ आपका परिचय हो जाये तो उसके लिए प्रार्थना करना कि और चाहे जो हो, लेकिन उसकी तरह किसी की मृत्यु न हो। शायद सुधीर मिश्र और अनुराग कश्यप दोनों की ही फिल्मों में देवदास की मृत्यु नहीं होगी या उनकी फिल्म शोकांतिका नहीं होगी। यह भी पहली बार होगा कि देवदास पर आधारित इन फिल्मों के किरदार मूल उपन्यास के किरदारों से बिल्कुल अलग और समकालीन होंगे। दोनों ने अपने लिए यह चुनौती पहले ही खत्म कर दी है कि वे मूल के कितने करीब होते हैं?
फिल्म लेखक कमलेश पांडे दोनों युवा निर्देशकों के प्रयास की सराहना करते है और कहते हैं, यह छूट निर्देशकों को मिलनी चाहिए कि वे किरदार को अपनी जरूरत के सांचे में ढाल सकें। बस इतनी सावधानी रखें कि वे शाहरुख खान की अशोक की तरह अशोक को न बदल दें। आज के हिसाब से समसामयिक और सार्थक परिवर्तन का स्वागत होगा। देवदास में आत्मदया का एक भाव है। मुझे नहीं लगता कि आज की पीढ़ी के दर्शकों को यह भाव पसंद आएगा। गौर करें कि देवदास पतित व्यक्ति नहीं है। वह एक विरोध के तहत शराब को हाथ लगाता है। त्याग और विरोध के ऐसे किरदार की प्रासंगिकता इसी से समझ सकते हैं कि सौ सालों के बाद भी वह हमारी स्मृति में ताजा है। देखना रोचक होगा कि सुधीर मिश्र और अनुराग कश्यप के देवदास को दर्शक कितना पसंद करते हैं?

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:चौथा दशक

चौथे दशक के क्रांतिकारी फिल्मकार थे वी शांताराम .उनहोंने १९३४ में 'अमृत मंथन' नाम की फ़िल्म बनाई थी और हिंदू रीति-रिवाजों में प्रचलित हिंसा पर सवाल उठाये थे.१९३६ में बनी उनकी फ़िल्म'अमर ज्योति' में पहली बार नारी मुक्ति की बात सुनाई पड़ी.इस फ़िल्म की नायिका दुर्गा खोटे थीं.यह फ़िल्म वेनिस के इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में भी दिखाई गई थी.१९३१ में आर्देशर ईरानी की पहली बोलती फ़िल्म 'आलम आरा' आई थी.इस फ़िल्म की हीरोइन जुबैदा थीं.जुबैदा देश की पहली महिला निर्माता और निर्देशक बेगम फातिमा सुल्ताना की बेटी थीं.इस दौर की हंटरवाली अभिनेत्री को कौन भूल सकता है?नाडिया ने अपने हैरतअंगेज कारनामों और स्टंट से सभी को चकित कर दिया था. उनका असली नाम मैरी एवंस था.'बगदाद का जादू','बंबईवाली','लुटेरू ललना' और 'पंजाब मेल' जैसी फिल्मों से उन्होंने अपना अलग दर्शक समूह तैयार किया.एक तरफ नाडिया का हंटर चल रहा था तो दूसरी तरफ़ रविंद्रनाथ ठाकुर की पोती देविका रानी का फिल्मों में पदार्पण हुआ.उन्होंने बाद में हिमांशु राय से शादी कर ली.दोनों ने मिलकर बांबे टॉकीज की स्थापना की.१९३३ में बनी 'अछूत कन्या' में दर्शकों ने पहली बार एक समझदार और पढी-लिखी अभिनेत्री का दर्शन किया.लीला चिटनीस ने अपने चार बच्चों को पालने के लिए फिल्मों में एक्स्ट्रा का काम शुरू किया,लेकिन जल्दी ही वह माँ के तौर पर मशहूर हो गयीं.सायरा बानो की माँ नसीम बानो १९३५ में बनी 'खून की पुकार' से आयीं,लेकिन १९३९ में बनी सोहराब मोदी की फ़िल्म 'पुकार' से वह सभी के दिलों की धड़कन बन गयीं.

Saturday, March 8, 2008

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:तीसरा दशक




ललिता पवार
कानन देवी
आज ८ मार्च है.पूरी दुनिया में यह दिन महिला दिवस के तौर पर मनाया जाता है.चवन्नी ने सोचा कि क्यों न सिनेमा के परदे की महिलाओं को याद करने साथ हीउन्हें रेखांकित भी किया जाए.इसी कोशिश में यह पहली कड़ी है.इरादा है कि हर दशक की चर्चित अभिनेत्रियों के बहाने हम हिन्दी सिनेमा को देखें.यह एक परिचयात्मक सीरीज़ है।

तीसरा दशक

सभी जानते हैं के दादा साहेब फालके की फ़िल्म 'हरिश्चंद्र तारामती' में तारामती की भूमिका सालुंके नाम के अभिनेता ने निभाई थी.कुछ सालों के बाद फालके की ही फ़िल्म 'राम और सीता' में उन्होंने दोनों किरदार निभाए।इस दौर में जब फिल्मों में अभिनेत्रियों की मांग बढ़ी तो सबसे पहले एंगलो-इंडियन और योरोपीय पृष्ठभूमि के परिवारों की लड़कियों ने रूचि दिखाई.केवल कानन देवी और ललिता पवार ही हिंदू परिवारों से आई थीं.उस ज़माने की सबसे चर्चित अभिनेत्री सुलोचना थीं.उनका असली नाम रूबी मेयेर्स था.कहा जाता है कि उनकी महीने की कमाई मुम्बई के तत्कालीन गवर्नर से ज्यादा थी.सुलोचना आम तौर पर शहरी किरदार ही निभाती थीं.एक अभिनेत्री गौहर थीं.वह ज्यादातर घरेलू औरत की भूमिका निभाती थीं,जो अपने पति का हर नखरा सहती थी.रेनी स्मिथ ने फिल्मों में अपना नाम सीता देवी रखा.सीता देवी हिमांशु राय की पसंदीदा अभिनेत्री थीं.वह प्रणय और चुम्बन दृश्यों के लिए अधिक मशहूर हुईं.चुम्बन की बात चली तो चवन्नी आप को बता दे कि ललिता पवार ने १९२२ में 'पति भक्ति' फ़िल्म में चुम्बन देकर सबको चौंका दिया था.फाल्के की बेटी मंदाकिनी पहली बाल कलाकार थी.पतिएंस कूपर डबल रोल करने वाली पहली अभिनेत्री थीं.उन्हें वैसी भूमिकाएं अधिक मिलती थीं,जिसमें मासूम लड़की यौन इच्छाओं के कारन नैतिक द्वंद्व में फँसी रहती थी.तीसरे दशक में ही हिन्दी फिल्मों की पहली महिला निर्देशक का आगमन हो चुका था.बेगम फातिमा सुल्ताना ने १९२६ में 'बुलबुल-ए-परिस्तान' का निर्माण और निर्देशन करने के साथ ही उसमें काम भी किया था.

Friday, March 7, 2008

ब्लैक एंड ह्वाइट:दुनिया और भी रंगों में जीती और मुस्कराती है

-अजय ब्रह्मात्मज


चलिए पहले तारीफ करें शोमैन सुभाष घई की। उन्होंने अपनी ही लीक छोड़कर कुछ वास्तविक सी फिल्म बनाई है। आतंकवाद को भावुक दृष्टिकोण से उठाया है। उनकी शैली में खास बदलाव दिखता है, चांदनी चौक की रात और दिन के दृश्यों में उन्होंने दिल्ली को एक अलग रंग में पेश किया है। सुभाष घई की इस कोशिश से दूसरे फार्मूला फिल्मकार भी प्रेरित हों तो अच्छी बात होगी।


नुमैर काजी (अनुराग सिन्हा) नाम का युवक अफगानिस्तान से भारत आता है। वह जेहादी है, उसका मकसद है दिल्ली के लाल किले में बम विस्फोट। उसे चांदनी चौक के निवासी गफ्फार नजीर के गुजरात के दंगों में उजड़ गए भाई के बेटे की पहचान दी गई है। अपने मकसद को पूरा करने के लिए नुमैर के पास हैं महज 15 दिन। दिल्ली में उसकी मदद के लिए कई लोगों का इंतजाम किया जाता है।
नुमैर काजी की मुलाकात उर्दू के प्रोफेसर राजन माथुर (अनिल कपूर) से हो जाती है। राजन को नुमैर से सहानुभूति होती है। नुमैर सहानुभूति का फायदा उठाता है और उनके दिल और घर दोनों में अपनी जगह बना लेता है। उन्हीं के साथ रहने लगता है। राजन माथुर की फायरब्रांड बीवी रोमा (शेफाली शाह) पहले उसे पसंद नहीं करती, लेकिन एक आतंकवादी हमले में नुमैर उनकी बेटी को बचाता है तो उनका दिल भी पसीज जाता है। नुमैर माथुर दंपति की मदद से लाल किले का एंट्री पास हासिल कर लेता है। ऐन कार्रवाई से पहले वह अपना इरादा बदलता है। वहां से भाग खड़ा होता है। दिल्ली की पुलिस पीछा करती है और एक सिपाही निशाना भी साधता है, लेकिन तभी राजन माथुर सामने आ जाते हैं। नुमैर बच निकलता है और फिर अपने देश में जाकर राजन माथुर के निर्दोष होने और उनसे प्रभावित होकर आतंकवादी हरकत न करने के आशय का ई-मेल भेजता है। मेल का मजमून होता है-मैं जानता हूं कि आप प्रोफेसर माथुर को जज्बाती समझ कर सजा देंगे, लेकिन मेरी नजरों में प्रोफेसर माथुर एक ऐसा हिंदुस्तानी है, जिसकी आंखों में मैंने हिंदुस्तान देखा है। उसके रंग देखे हैं, जिसने मुझे एक संगीन गुनाह करने से रोका है और बताया है कि दुनिया केवल काले और सफेद रंगों में ही नहीं और भी रंगों में जीती और मुस्कराती है। आज मैं महसूस करता हूं कि अगर मेरे साथ प्रोफेसर माथुर और वे बेकसूर लोग और वे बच्चे मर जाते तो अल्लाह मुझे कभी माफ नहीं करता।



आतंकवादी नुमैर काजी में यह बदलाव राजन माथुर की वजह से आता है। वह अपनी आंखों से देखता है कि कैसे चांदनी चौक के हिंदू, मुसलमान और सिख मिल-जुल कर रहते हैं। सुभाष घई ने आतंकवाद के खिलाफ दिल्ली के चांदनी चौक की तहजीब के उदाहरण से मानवता का मैसेज दिया है। फिल्म के कई दृश्य दिल को छूते और प्रभावित करते हैं। एक तरफ राजन माथुर हैं तो दूसरी तरफ गफ्फार नजीर जैसे शायर भी है, जिनके दिल में हिंदुस्तान धड़कता है। ब्लैक एंड व्हाइट में हबीब तनवीर, अनिल कपूर और शेफाली शाह ने अपने किरदारों को बखूबी निभाया है। हबीब की मौजूदगी और संवाद अदायगी फिल्म को चांदनी चौक का जरूरी टच देती है। अनुभवी अभिनेताओं के बीच अनुराग सिन्हा पूरे आत्मविश्वास से भरे दिखते हैं। उन्होंने नाराज और प्रतिहिंसा में उबल रहे युवक की भूमिका में एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन की याद दिला दी है।



सुभाष घई विषय की नवीनता और भिन्नता के बावजूद हिंदी फिल्मों के फार्मूले से नहीं बच पाते। उन्होंने पूरी घटना को संयोगों से इतना सरल बना दिया है कि एक गंभीर राजनीतिक और सामाजिक समस्या का फिल्मी निदान हो जाता है। समस्या यह है कि सुभाष घई फिल्म को रोचक और मनोरंजक बनाए रखने के दबाव से नहीं बच पाते और इसी चक्कर में फिल्म अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाती। फिल्म टुकड़े-टुकड़े में ही अच्छी लगती है। समेकित प्रभाव की बात करें तो सुभाष घई का प्रयास साधारण साबित होता है।

बारबरा मोरी:पहला परिचय



राकेश रोशन की कंपनी फिल्मक्राफ्ट 'काइट्स' नाम की फ़िल्म बना रही है.इस फ़िल्म के निर्देशक अनुराग बासु हैं.अनुराग बासु की 'गैंगग्स्टर' और 'मेट्रो' मशहूर फिल्में रही हैं.अनुराग बासु ने सीरियल निर्देशन से शुरूआत की थी.उन्हें फ़िल्म निर्देशन का पहला मौका महेश भट्ट ने दिया.फ़िल्म थी 'साया' ,जो बुरी तरह फ्लॉप हुई थी.लेकिन महेश भट्ट ने हिम्मत नहीं हरी.दोनों ने एक और फ्लॉप फ़िल्म बनाई.उस फ़िल्म की समाप्ति के समय अनुराग बासु को ब्लड कैंसर हो गया था.पत्नी की सेवा और अपने आत्मबल से वह इस जानलेवा बीमारी की गिरफ्त से बाहर आया.भट्ट कैंप से बहर आकर उनहोंने 'मेट्रो' बनाई.यह फ़िल्म खूब पसंद की गई.उसके बाद ही राकेश रोशन ने उन्हें अपनी कंपनी की फ़िल्म बनने के लिए निमंत्रित किया।


यह तो तय था कि फ़िल्म के हीरो रितिक रोशन होंगे,लेकिन फ़िल्म की कहानी के लायक हीरोइन नहीं मिल पा रही थी.अनुराग ने राकेश रोशन से कहा कि क्यों न हॉलीवुडकी हीरोइनों में से चुना जाए.राकेश रोशन ने अनुराग को खुली छूट दी.कई सारी हीरोइनों से मिलने के बाद आखिरकार अनुराग बासु ने बारबरा मोरी को पसंद किया।


बारबरा मोरी के पिता का खानदान जापान का है.उनकी माँ मेक्सिको की हैं.जब मोरी ३ साल की थीं,तभी उनके माता-पिता का तलाक हो गया.मोरी मेक्सिको आ गयीं.थोडी बड़ी होने पर उनहोंने एक रेस्तरां में वेटर का काम पकड़ लिया.वहीं उनकी मुलाक़ात फैशन डिजाइनर मार्कोस तोलेदो से हुई.मार्कोस ने उन्हें मॉडल बना दिया.कुछ समय तक मॉडलिंग करने के बाद मोरी को लगा कि इसमें लंबा भविष्य नहीं है.उन्होंने समय रहते एक्टिंग की ट्रेनिंग ली और अपना करीअर बदला.मोरी को पहला काम टेलीनोवेल में मिला.ओग १९९८ में बनी 'अजुल तेकुइला' से मशहूर हुईं.२००५ में आई 'मुजेर दे मी हेर्मानो , ला' से वह दुनिया भर में मशहूर हो गयीं।


और अब रितिक रोशन के साथ काम करने के बाद उनकी ख्याति में इजाफा ही होगा.खासकर दक्षिण एशिया के दर्शक उनसे परिचित हो जायेंगे.हिन्दी सिनेमा के इस पह्ल्लो और विस्तार का हमें स्वागत करना चाहिए.

Thursday, March 6, 2008

बारबरा मोरी:रितिक रोशन की नई हीरोइन




बारबरा मोरी रितिक रोशन की नई हीरोइन हैं.उरुग्वे की बारबरा मोरी रितिक रोशन के साथ अनुराग बासु के निर्देशन में 'काइट्स' फ़िल्म में काम करेंगी.इसके निर्माता राकेश रोशन ही हैं.बारबरा मोरी ke बारे में विशेष जानकारी कल सुबह पढ़ें.


फिल्मों में वैचारिकता

-अजय ब्रह्मात्मज

कला और व्यावसायिक फिल्मों के बीच की दीवार अब ढह चुकी है, क्योंकि धीरे-धीरे कला फिल्मों के दर्शक और निर्देशक सिकुड़ते जा रहे हैं। दरअसल, समय के दबाव के कारण ही उनकी रुचि में बदलाव आया है और सच तो यह है कि अब वह दौर भी नहीं है, जब कला और व्यावसायिक सिनेमा के पार्थक्य को महत्व दिया जाता था! कला फिल्मों की टीम अलग होती थी और व्यावसायिक फिल्मों का अलग संसार था। कला फिल्मों को मिल रहा सरकारी संरक्षण बंद हो चुका है। आश्चर्य की बात तो यह है कि छोटे-मोटे निर्माता भी अब कला फिल्मों में धन निवेश नहीं करते!
कला फिल्मों का सीधा रिश्ता है वैचारिकता और सामाजिकता से। हिंदी सिनेमा के इतिहास पर नजर डालें, तो हम पाएंगे कि कला फिल्मों का उद्भव घनघोर व्यावसायिकता के दौर में हुआ था। दरअसल, हिंदी फिल्मों की समृद्ध परंपरा में एक ऐसा मोड़ भी आया था, जब मुख्य रूप से प्रतिहिंसा और बदले की भावना से प्रेरित फिल्में ही बन रही थीं। सलीम-जावेद में से जावेद अख्तर ने बखूबी उस दौरान लिखी अपनी फिल्मों को समाज की बौखलाहट से जोड़ दिया, लेकिन अमिताभ बच्चन को लेकर बनी प्रमुख फिल्मों का विश्लेषण करने पर हम यही पाएंगे कि उस नाराज नायक को समाज से कुछ लेना-देना नहीं था, क्योंकि वह खुद पर हुए अत्याचार का बदला लेने के लिए व्यक्तिगत लड़ाई लड़ता था। दरअसल, हिंदी फिल्मों के व्यावसायिक फिल्मकार कभी इतने विचारवान ही नहीं रहे कि वे भावना से आगे बढ़कर सोच की बातें करें। बासु चटर्जी, श्याम बेनेगल और दूसरे युवा फिल्मकारों ने सातवें दशक के अंत और आठवें दशक के आरंभ में जोरदार दस्तक दी। उनकी फिल्मों में वैचारिकता थी। किसी विचार से प्रेरित होने के कारण उनकी फिल्मों में सामाजिकता भी दिखी। उनकी फिल्मों में अपने परिवेश को हमने पहली बार करीब से देखा।
यह एक अलग किस्सा है कि कैसे इन फिल्मकारों का अपने समाज से जमीनी रिश्ता नहीं होने के कारण कहीं न कहीं अभिव्यक्ति के स्तर पर एक दुराव रहा। फिर भी आठवें दशक के आरंभ में फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा के समांतर आकाश से परिचित कराया और यह दिखाया कि फिल्मों में आम जन भी नायक बन सकते हैं। संवेदना और सौंदर्यबोध के स्तर पर यह एक बहुत बड़ा शिफ्ट था, जो उस समय के आंदोलनों और अभियानों से ऊर्जा हासिल कर रहा था। हालांकि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के निर्माता-निर्देशक हिंदी फिल्मों के स्वायत्त संसार में यकीन करते हैं। उन्हें लगता है कि फिल्मों का बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं रहता। निर्माता, निर्देशक, स्टार और दर्शक का चतुर्भुज ही हिंदी फिल्मों की दशा और दिशा तय करता है। वे यह भूल जाते हैं कि फिल्मों के लिए आवश्यक ये चारों जन सामाजिक प्राणी भी हैं। क्यों एक काल विशेष में खास तरह की फिल्में पसंद की जाती हैं और बाद में वैसी फिल्मों से एलर्जी होने लगती है? इन पहलुओं पर हमारे निर्माता, निर्देशक और फिल्मों के ट्रेड विशेषज्ञ विचार नहीं करते। हालिया रिलीज फिल्म जोधा अकबर का उदाहरण लें, तो जोधाबाई के नाम पर चल रहे विरोध की वास्तविकता यह है कि कुछ दर्शकों को अकबर नायक के रूप में स्वीकार नहीं है। खुद ही देख लें कि जिन प्रदेशों में इसके प्रदर्शन पर पाबंदी लगी है, वहां का मुख्य राजनीतिक स्वर क्या है?
फिल्म मनोरंजन का साधन है, लेकिन वह एक विचार भी है। शुद्ध और स्वायत्त मनोरंजन जैसी कोई चीज नहीं होती। फिल्मों के लिए विषय हमेशा समय की जरूरत और प्रचलित रुचि को ध्यान में ही रखकर तय किए जाते हैं। कुछ फिल्में अपवाद होती हैं और वे ही विचारों से प्रेरित होती हैं। उन फिल्मों का ध्येय मनोरंजन के साथ एक संदेश या विचार देना भी होता है। ऐसी फिल्मों के निर्देशकों के व्यक्तित्व की छानबीन करें, तो पाएंगे कि वे विचारों से लैस हैं और हिंदी फिल्मों की सीमित दुनिया में ही कुछ नया करने की लालसा रखते हैं। दरअसल, उनकी वैचारिकता ही फिल्मों को विषय और कथ्य के स्तर पर विस्तार देती है।