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Friday, February 29, 2008

ठीक रिलीज के पहले यह खेल क्यों?



-अजय ब्रह्मात्मज

पंद्रह फरवरी को जोधा अकबर देश भर में फैले मल्टीप्लेक्स के चैनलों में से केवल पीवीआर में रिलीज हो पाई। बाकी मल्टीप्लेक्स में यह फिल्म रिलीज नहीं हो सकी। मल्टीप्लेक्स के नियमित दर्शकों को परेशानी हुई। खासकर पहले दिन ही फिल्म देखने के शौकीन दर्शकों का रोमांच कम हो गया। उन्हें भटकना पड़ा और सिंगल स्क्रीन की शरण लेनी पड़ी। निर्माता और मल्टीप्लेक्स मालिकों के बार-बार के इस द्वंद्व में दर्शकों का आरंभिक उत्साह वैसे ही दब जाता है। वैसे भी फिल्म बिजनेस से जुड़े लोग यह जानते ही हैं कि पहले दिन के कलेक्शन और सिनेमाघरों से निकली प्रतिक्रिया का बड़ा महत्व होता है।


याद करें, तो इसकी शुरुआत यश चोपड़ा की फिल्म फना से हुई थी। उस फिल्म की रिलीज के समय मल्टीप्लेक्स का लाभ बांटने के मुद्दे पर विवाद हुआ था। फना बड़ी फिल्म थी, उसमें एक तो आमिर खान थे और दूसरे काजोल की वापसी हो रही थी, इसलिए संभावित बिजनेस को लेकर यशराज फिल्म्स ने अपना हिस्सा बढ़ाने की बात कही। हालांकि उस दौरान ठीक समय पर समझौता हो गया और 60-40 प्रतिशत के अनुपात में सहमति भी हो गई। मल्टीप्लेक्स मालिकों ने पहली बार दबाव महसूस जरूर किया, लेकिन वे यशराज फिल्म्स के साथ कोई बिगाड़ नहीं कर सकते थे।


दबाव के इस खेल के पीछे की सच्चाई यह है कि बड़े बैनर मल्टीप्लेक्स की भारी कमाई की हिस्सेदारी चाहते हैं, जबकि कोई बड़ी फिल्म रिलीज होती है, तो मल्टीप्लेक्स में उसके शो बढ़ जाते हैं। नए-नए खुले मल्टीप्लेक्स को प्रादेशिक सरकारों से राजस्व में विशेष तरह की छूटें भी मिली हुई हैं। नतीजतन उनका मुनाफा निर्माताओं और वितरकों को खटकने लगता है। हालांकि वही निर्माता और वितरक फिल्म फ्लॉप होने पर मल्टीप्लेक्स मालिकों के नुकसान से विचलित नहीं होते।


लोभ मल्टीप्लेक्स मालिकों के मन में भी रहता है। वे भी चाहते हैं कि बड़ी और पॉपुलर फिल्मों से ज्यादा कमाई कर लें। इन दिनों फिल्मों का व्यापार इतना डांवाडोल हो गया है कि रेगुलर शो जारी रखना भी कई बार भारी पड़ता है। मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को भी आदत हो गई है। उन्होंने अपने आसपास के थिएटरों में से कुछ को सुनिश्चित कर लिया है। फुर्सत मिलते ही वे उन मल्टीप्लेक्स में पहुंच जाते हैं। ऐसे नियमित दर्शकों की संतुष्टि के लिए हर हफ्ते नई फिल्मों और बड़ी फिल्मों का पैकेज चाहिए ही। निर्माता-वितरक और मल्टीप्लेक्स दोनों पक्ष की मजबूरी है कि वे एक-दूसरे का सहयोग करें।


जोधा अकबर का उदाहरण लें, तो इस बार एक दिन के बाद 50-50 प्रतिशत के अनुपात में लाभ बांटने पर रजामंदी हुई, लेकिन एक दिन का पूरा व्यापार मारा गया और इसका सीधा नुकसान निर्माता और वितरकों को ही हुआ। हालांकि मल्टीप्लेक्स वाले जोधा अकबर नहीं, तो कोई और फिल्म दिखाते रहे। भले ही दर्शकों की संख्या घट गई हो, लेकिन वे इसे जारी नहीं रख सके। आखिरकार दबाव में आकर उन्होंने निर्माताओं का शेयर बढ़ाया। इस गफलत में दर्शकों को बेहद तकलीफ होती है, इसलिए क्या ऐसा नहीं हो सकता कि समय रहते ही कोई समझौता हो जाए, क्योंकि जब मालूम है कि अगली फिल्म बड़ी है और उसे देखने के लिए ज्यादा दर्शक आ सकते हैं, तो निर्माताओं और मल्टीप्लेक्स मालिकों को थोड़ा पहले से ही बातचीत आरंभ कर देनी चाहिए। दरअसल, दोनों पक्ष दबाव का खेल खेलते हैं और यह मानकर चलते हैं कि दूसरा पक्ष मान जाएगा। हालांकि अंत तक मल्टीप्लेक्स के मालिक मुनाफे का अनुपात बढ़ाने के मूड में नहीं रहते। वैसे, अभी तक के सभी प्रसंगों में देखा गया है कि आखिर में निर्माता जीतते हैं और इसीलिए उन्होंने अपना शेयर 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक ला दिया है। बेहतर होगा कि हर फिल्म के हिसाब से शेयरिंग का प्रतिशत पहले से सुनिश्चित कर लिया जाए, ताकि दर्शक पहले दिन फिल्म देखने से वंचित न रहें!

Thursday, February 28, 2008

फरवरी के २९ दिनों में ५ शुक्रवार,२ बेकार

कैसा संयोग है साल के सबसे कम दिनों के महीने फरवरी में इस बार ५ शुक्रवार पड़े.महीने की पहली तारीख को शुक्रवार था और महीने की आखिरी तारीख को भी शुक्रवार है.लेकिन क्या फायदा..२ शुक्रवार तो बेकार ही गए.२२ और २९ फर्र्वारी को कोई भी फ़िल्म रिलीज नहीं हुई.वैसे १ फ़रवरी को रिलीज हुई रामा रामा क्या है ड्रामा और ८ फ़रवरी को रिलीज हुई मिथ्या बकवास ही निकलीं.केवल सुपरस्टार एक हद तक ठीक थी.हाँ १५ फ़रवरी को रिलीज हुई जोधा अकबर सचमुच ऐतिहासिक फ़िल्म है.इस फ़िल्म को लेकर अभी जो भी बवाल चल रहा हो,आप यकीन करें भविष्य में इस फ़िल्म का अध्ययन किया जायेगा.आप सभी को यह फ़िल्म कैसी लगी?आप अपनी राय जरूर लिखें.चवन्नी को बताएं ...चवन्नी सबको बताएगा।
chavannichap@gmail.com

Sunday, February 24, 2008

मराठी माणुष और बिहारी बाला की प्रेमकहानी,संजय झा की फ़िल्म 'मुम्बई चकाचक'



संजय झा ने दो फिल्में निर्देशित कर ली हैं.'मुम्बई चकाचक' उनकी तीसरी फ़िल्म है.यह फ़िल्म आज की है और मुम्बई को एक अलग अंदाज में पेश करती है.भूल जाइये कि राज ठाकरे ने क्या बयान दिया और उसकी वजह से क्या बवाल हुआ?यह एक साफ प्रेम कहानी है,जिसका नायक एक मराठी माणुष है और नायिका बिहारी बाला है.क्या इस प्रेम पर राज ठाकरे को आपत्ति हो सकती है?हो...प्यार करनेवाले डरते नहीं,जो डरते हैं वो प्यार करते नहीं।

संजय झा ने इस प्रेमकहानी में मुम्बई के पर्यावरण की समस्या को भी जोड़ा है.इस अनोखी फ़िल्म में बीएमसी के कर्मचारी भी विभिन्न भूमिकाओं में नज़र आयेंगे.संजय झा ने फ़िल्म की मुख्य भूमिकाएं राहुल बोस,आयशा धारकर,विनय पाठक और मंदिरा बेदी को सौंपी हैं.नायक का नाम कोका है और नायिका बासमती है-इनके बीच गंगाजल बने विनय पाठक भी हैं।
यह फ़िल्म इस साल के उत्तरार्ध में रिलीज होगी.


Friday, February 22, 2008

निर्देशक सईद मिर्जा का पत्रनुमा उपन्यास



-अजय ब्रह्मात्मज
अरविंद देसाई की अजीब दास्तान से लेकर नसीम जैसी गहरी, भावपूर्ण और वैचारिक फिल्में बना चुके सईद मिर्जा के बारे में आज के निर्देशक ज्यादा नहीं जानते। दरअसल, वे डायरेक्टर अजीज मिर्जा के छोटे भाई हैं। उनका एक परिचय और है। वे अख्तर मिर्जा के बेटे हैं और उल्लेखनीय है कि अख्तर मिर्जा ने ही नया दौर फिल्म लिखी थी।

दरअसल, सईद मिर्जा ने नसीम के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बदलती स्थिति को देखते हुए निर्देशन से संन्यास ले लिया। उन्होंने न तो माथा पीटा और न ही किसी को गाली दी। वे मुंबई छोड़कर चले गए और इन दिनों ज्यादातर समय गोवा में ही बिताते हैं। इधर गोवा में रहते हुए उन्होंने एक पत्रनुमा उपन्यास लिखा है, जिसमें वे गुजर चुकीं अपनी अम्मी को आज के हालात बताते हैं और साथ ही उनकी बातें, उनके फैसले और उनका नजरिया भी पेश करते हैं। सईद मिर्जा ने इस किताब को नाम दिया है-अम्मी- लेटर टू ए डेमोक्रेटिक मदर।

सईद मिर्जा की यह किताब उनकी फिल्मों की तरह साहित्यिक परिपाटी का पालन नहीं करती। संस्मरण, विवरण, चित्रण, उल्लेख और स्क्रिप्ट के जरिए उन्होंने अपने माता-पिता की प्रेम कहानी गढ़ी है। उन्होंने बगैर किसी दावे के अपना पक्ष भी रखा है। उन्होंने नुसरत बेग और जहांआरा बेगम की प्रेम कहानी भी सुनाई है। कुल मिलाकर उनकी यह किताब आजादी के बाद प्रगतिशील मूल्यों के साथ विकसित हुए व्यक्ति के असमंजस की कहानी है। सईद मिर्जा घोषित रूप से कम्युनिस्ट जरूर हैं, लेकिन उन्होंने वैचारिकता के नाम पर थोथेबाजी कभी नहीं की है। वे समझना चाहते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ कि दुनिया एकध्रुवीय हो गई और अमेरिका का ऐसा वर्चस्व बढ़ गया!

सईद मिर्जा की यह किताब फिल्म इंडस्ट्री की भी झलक देती है। फिल्म इंडस्ट्री में लेखक की स्थिति और मन की स्थिति का विवरण उन्होंने अपने पिता के मार्फत दिया है। अपने माता-पिता की कहानी बताते समय न ही वे किसी भावुकता के शिकार होते हैं और न ही उनकी यह कोशिश है कि वे अपने माता-पिता को किसी सिंहासन पर बिठा दें। वास्तव में, वामपंथी विचारधारा से प्रभावित लेखकों का यह अंतर्निहित गुण है कि वे घटना, प्रसंग और स्मृतियों के असंपृक्त होकर अपनी बातें कह सकते हैं और दरअसल, सईद मिर्जा में भी यह गुण है। किताब के वे प्रसंग उल्लेखनीय हैं, जब सईद मिर्जा मुंबई से बाहर निकलते हैं और देश के विभिन्न इलाकों के किरदारों और उनके संघर्षो से अम्मी को परिचित कराते हैं। दरअसल, इन प्रसंगों के माध्यम से वे अपने आत्मसाक्षात्कार की बातें भी करते हैं कि कैसे वे इन किरदारों से वाकिफ नहीं थे।

आजादी के बाद की स्थितियों और प्रगति पर सवाल उठाते उनके विवरणों को पढ़ना किसी उद्घाटन की तरह भी है। खासकर शहरी पाठकों के लिए यह एक जरूरी किताब हो सकती है। सईद मिर्जा ने अम्मी -लेटर टू ए डेमोक्रेटिक मदर में एक अनोखा प्रयोग किया है। उन्होंने ईरान के अपने क्रांतिकारी दोस्तों की याद में इस किताब का पृष्ठ 124 सादा छोड़ दिया है। किताब में इस तरह की श्रद्धांजलि का यह अनोखा प्रयोग है। सईद मिर्जा ने इच्छा जाहिर की है कि अब वे लिखना चाहते हैं।

वैसे, सईद मिर्जा के प्रशंसकों के लिए एक खुशखबरी यह भी है कि वे बहुत दिनों बाद एक बार फिर निर्देशन में लौट रहे हैं। रजत कपूर के आग्रह पर उन्होंने सावधान जनाब नामक फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी ली है। उम्मीद की जा सकती है कि एकरूपता, लोकप्रियता और विशुद्ध मनोरंजन के इस दौर में सईद मिर्जा की शैली की उत्तेजक, विचारपूर्ण और सार्थक फिल्म हम फिर से देख पाएंगे।

Sunday, February 17, 2008

दोषी आप भी हैं आशुतोष...

पिछले शुक्रवार से ही यह ड्रामा चल रहा है.शनिवार की शाम में पत्रकारों को बुला कर आशुतोष गोवारिकर ने सफ़ाई दी और अपना पक्ष रखा.ये सारी बातें वे पहले भी कर सकते थे और ज्यादा जोरदार तरीके से गलतफहमियाँ दूर कर सकते थे.जोधा अकबर को नुकसान पहुँचने के दोषी आशुतोष गोवारिकर भी हैं.उनका साथ दिया है फ़िल्म के निर्माता रोनी स्क्रूवाला ने...जी हाँ निर्देशक-निर्माता फ़िल्म के माता-पिता होते हैं,लेकिन कई बार सही परवरिश के बावजूद वे ख़ुद ही संतान का अनिष्ट कर देते हैं.जोधा अकबर के साथ यही हुआ है।

मालूम था कि जोधा अकबर में जोधा के नाम को लेकर विवाद हो सकता है.आशुतोष चाहते तो फौरी कार्रवाई कर सकते थे.समय रहते वे अपना पक्ष स्पष्ट कर सकते थे.कहीं उनके दिमाग में किसी ने यह बात तो नहीं भर दी थी कि विवाद होने दो,क्योंकि विवाद से फ़िल्म को फायदा होता है.जोधा अकबर को लेकर चल रह विवाद निरर्थक और निराधार है.लोकतंत्र में विरोध और बहस करने की छूट है,लेकिन उसका मतलब यह नहीं है कि आप तमाम दर्शकों को फ़िल्म देखने से वंचित कर दें।

सरकार को इस दिशा में सोचना चाहिए कि सेंसर हो चुकी फ़िल्म का प्रदर्शन सही तरीके से हो.इस प्रकार की सुपर सेंसरशिप तत्काल बंद होनी चाहिए.हमलोग किस व्यवस्था में रह रहे हैं?जहाँ मनोरंजन को लोकतंत्र का सहयोग नहीं मिल पा रहा है.कभी गुजरात,कभी राजस्थान तो कभी बिहार में किसी व्यक्ति,समूह और समुदाय को आपत्ति होती है और फ़िल्म का प्रदर्शन रूक जाता है.ऐसी ज्यादतियों से निबटने का कोई रास्ता तो होना चाहिए।

और आशुतोष एवं रोनी से एक और सवाल...आख़िर शुक्रवार के पहले ही मल्टीप्लेक्स मालिकों से कोई समझौता क्यों नहीं हो पाया?देश के ढेर सारे दर्शक पहले दिन ही फ़िल्म देखने का उत्साह और जोश रखते हैं.उनके इस उत्साह और जोश से भी फ़िल्म की लोकप्रियता बढ़ती है.इस बार शुक्रवार को जोधा अकबर पीवीआर के अलावा किसी और मल्टीप्लेक्स में रिलीज ही नहीं हो सकी।

और फिर फ़िल्म के फ्लॉप होने की अफवाह फिलाने वाले कौन लोग हैं?जोधा अकबर को दर्शकों का समर्थन मिल रहा है,लेकिन देखने के बाद.ढेर सारे दर्शकों को कुप्रचार से फ़िल्म के विमुख किया जा रहा है.इस कुप्रचार में अंग्रेजी मीडिया और पत्रकार शामिल हैं.यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जो फिल्मों की भारतीय परम्परा को नष्ट करने पर तुली है और आयातित विचार,शैली और प्रभाव को ही श्रेष्ठ ठहरा रही है.चवन्नी को बाहरी प्रभाव से परहेज नहीं है,लेकिन अपनी जातीय परम्परा छोड़ने की जरूरत क्या है?हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री पर गौर करें तो इन दिनों ऐसे फिल्मकार ज्यादा सक्रिय और मुखर हैं,जिनका भारतीय ज्ञान सिफर है.

Saturday, February 16, 2008

पंजाब का ज्यादा असर है हिंदी फिल्मों पर

-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले दिनों हिंदी फिल्मों के एक विशेषज्ञ ने अंग्रेजी की एक महत्वपूर्ण पत्रिका में हिंदी सिनेमा की बातें करते हुए लिखा कि भारतीय सिनेमा पर बॉलीवुड हावी है और बॉलीवुड पर पंजाब और उत्तर भारत का गहरा असर है। करवा चौथ और काउबेल्ट कल्चर ने हिंदी फिल्मों को जकड़ रखा है। उनकी इस धारणा में आधी सच्चाई है। पंजाब ने अवश्य हिंदी सिनेमा को लोकप्रियता के कुचक्र में जकड़ रखा है। अगर कथित काउबेल्ट यानी कि हिंदी प्रदेशों की बात करें, तो उसने हिंदी फिल्मों को मुक्ति और विस्तार दिया है। पिछले चंद सालों की लोकप्रिय और उल्लेखनीय फिल्मों पर सरसरी नजर डालने से भी यह स्पष्ट हो जाता है। अगर गहरा विश्लेषण करेंगे, तो पता चलेगा कि हिंदी सिनेमा की ताकतवर पंजाबी लॉबी ने हिंदी प्रदेशों की जातीय सोच और संस्कृति को हिंदी फिल्मों से बहिष्कृत किया है।
याद करें कि कब आखिरी बार आपने हिंदी प्रदेश के किसी गांव-कस्बे या शहर को किसी हिंदी फिल्म में देखा है! ऐसी फिल्मों कर संख्या हर साल रिलीज हो रही सौ से अधिक फिल्मों में बमुश्किल दो-चार ही होगी, क्योंकि अधिकांश फिल्मों के शहर आप निर्धारित नहीं कर सकते। डायरेक्टर ऐसी वास्तविकता से बचते हैं। अगर शहर विशेष की पृष्ठभूमि रखी जाए, तो अनेक सावधानियां अनिवार्य हो जाती हैं। लोककथाओं की तरह किसी देश के किसी शहर की इन फिल्मी कहानियों का नायक राज, रोहित, करण आदि होता है। इन दिनों वह अमूमन एक पंजाबी गीत अवश्य गाता है। इस गीत में कभी फिल्म के सारे कलाकार शामिल होते हैं, तो कभी सिर्फ नायक-नायिका। ढोल की तेज थाप पर थिरकते हीरो-हीरोइन दर्शकों को आकर्षित करते हैं। हिंदी फिल्मों में इस संयोग को यश चोपड़ा, आदित्य चोपड़ा और करण जौहर ने कला के तौर पर विकसित कर लिया है। कामयाबी का यह ऐसा अचूक फॉर्मूला बन गया है कि बाकी निर्देशक फिल्म में सिचुएशन न होने पर टाइटिल या क्रेडिट लाइनों के साथ ऐसे गीतों का ही इस्तेमाल करते हैं। पंजाब के असर को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। आजादी के बाद लाहौर में स्थित हिंदी फिल्म इंडस्ट्री विस्थापित होकर मुंबई पहुंची। वहां से कई कलाकार और तकनीशियन मुंबई आए। उन्होंने यहां प्रोडक्शन कंपनियां स्थापित कीं। आजादी के बाद के दशकों में पंजाब, बंगाल और दक्षिण भारत के निर्माता-निर्देशक एक साथ सक्रिय रहे। देश के विभिन्न प्रांतों से आई प्रतिभाओं ने हिंदी फिल्मों को समृद्ध किया। उनके योगदान से ही हिंदी फिल्मों का स्वर्ण काल रचा गया। समय बीतने के साथ हिंदी फिल्मों में एक तरफ वंशवाद बढ़ा और दूसरी तरफ पंजाबी लॉबी भी मजबूत होती गई। फिल्म बिजनेस, निर्माण और वितरण के साथ पंजाब से आए कलाकारों की पकड़ यहां मजबूत होती गई। अमिताभ बच्चन भले ही शीर्ष पर बने रहे, लेकिन वे ज्यादातर पंजाबी निर्माता-निर्देश्कों की फिल्मों में ही काम करते रहे। नौवें और पिछली सदी के अंतिम दशक तक आते-आते फिल्मों में पंजाब का असर कुछ अधिक हो गया। इस दौर की फिल्मों ने एक नया दर्शक समूह खोज निकाला। विदेशों में बसे आप्रवासी भारतीय नए दर्शक के तौर पर उभरे। चूंकि इन दर्शकों में भारी संख्या पंजाब के लोगों की थी, इसलिए पंजाबी तीज-त्योहार और गीत-संगीत को अहमियत दी गई।
गौर करें, तो पिछले दो दशकों में हिंदी सिनेमा से हिंदी समाज अनुपस्थित है। दर्शकों को कंज्यूमर समझने की मानसिकता के बाद हिंदी समाज डाउन मार्केट सब्जेक्ट हो गया है। विशाल भारद्वाज निर्देशित ओमकारा और प्रकाश झा निर्देशित अपहरण जैसी फिल्मों को छोड़ दें, तो हिंदी फिल्मों में हिंदी प्रदेशों के चरित्र भी नहीं दिखाई देते। ऐसी स्थिति में काउबेल्ट के प्रभाव की बात लिखना और कहना बिल्कुल उचित नहीं है। हिंदी फिल्मों पर पंजाब का गहरा असर है। यह असर कुछ नई फिल्मों की रिलीज के बाद और बढ़ेगा, इसमें कोई शक नहीं

Friday, February 15, 2008

उल्लेखनीय और दर्शनीय है जोधा अकबर

-अजय ब्रह्मात्मज
हिदायत-मोबाइल फोन बंद कर दें, सांसें थाम लें, कान खुले रखें और पलकें न झुकने दें। जोधा अकबर देखने के लिए जरूरी है कि आप दिल-ओ-दिमाग से सिनेमाघर में हों और एकटक आपकी नजर पर्दे पर हो।

सचमुच लंबे अर्से में इतना भव्य, इस कदर आकर्षक, गहरी अनुभूति का प्रेम, रिश्तों की ऐसी रेशेदारी और ऐतिहासिक तथ्यों पर गढ़ी कोई फिल्म आपने नहीं देखी होगी। यह फिल्म आपकी पूरी तवज्जो चाहती है। इस धारणा को मस्तिष्क से निकाल दें कि फिल्मों का लंबा होना कोई दुर्गुण है। जोधा अकबर भरपूर मनोरंजन प्रदान करती है। आपको मौका नहीं देती कि आप विचलित हों और अपनी घड़ी देखने लगें।

जैसा कि अमिताभ बच्चन ने फिल्म के अंत में कहा है- यह कहानी है जोधा अकबर की। इनकी मोहब्बत की मिसाल नहीं दी जाती और न ही इनके प्यार को याद किया जाता है। शायद इसलिए कि इतिहास ने उन्हें महत्व ही नहीं दिया। जबकि सच तो यह है कि जोधा अकबर ने एक साथ मिल कर चुपचाप इतिहास बनाया है।

इसी इतिहास के कुछ पन्नों से जोधा अकबर वाकिफ कराती है। मुगल सल्तनत के शहंशाह अकबर और राजपूत राजकुमारी जोधा की प्रेमकहानी शादी की रजामंदी के बाद आरंभ होती है। आशुतोष गोवारीकर आरंभ के बीस मिनट सारे कैरेक्टर को स्थापित करने में बिताते हैं। युद्ध के मैदान में बड़े हो रहे अकबर को हम देखते हैं। बैरम खां की छत्रछाया में अकबर गद्दीनशीं होते हैं और हेमू के साथ पानीपत की निर्णायक लड़ाई होती है। कहा जाता है कि इस लड़ाई के अंत में अकबर ने हेमू का सिर कलम कर गाजी का खिताब लिया था, लेकिन आशुतोष गोवारीकर के अकबर ऐसा करने से मना कर देते हैं। दरअसल आशुतोष के अकबर धर्मनिरपेक्ष, सहिष्णु और प्रजाहितैषी अकबर हैं। आशुतोष ने अकबर से फिल्म के अंत में कहलवा भी दिया है- यह बात भी आप सब पर रोशन रहे कि हर मजहब के एहतराम और बर्दाश्त करने की चाहत ही आने वाले हिंदुस्तान को सुनहरा बना सकती है। अकबर की यह ख्वाहिश आज के हिंदुस्तान के लिए भी प्रासंगिक है। दुर्भाग्य की बात है कि ऐसी फिल्म को लेकर निरर्थक विवाद चल रहा है और राजस्थान के दर्शक इसे नहीं देख पा रहे हैं।

फिल्म में एक प्रसंग आता है, जब अकबर तीर्थयात्रा महसूल समाप्त करने की घोषणा करते हैं। सवाल उठता है कि शाही खजाने में महसूल खत्म करने से जो कमी आएगी, उसे कैसे भरा जाएगा? अकबर का जवाब होता है- शाही खजाना है क्या? हम मुगल अफगान या दूसरे गैरमुल्कियों की तरह लुटेरे नहीं हैं, जो हिंदुस्तान की दौलत लूट कर खजाना भरने की हवस से भरे रहे। यह हमारा मुल्क है और हम इसके जिस्म पर लूट के जख्म नहीं देख सकते। और इसके लिए हमें अपनी अवाम को उनका मजहब देखे बगैर सीने से लगाना है। गौर करें कि आशुतोष केवल जोधा और अकबर की प्रेमकहानी नहीं दिखा रहे हैं। वे 450 साल के पहले के इतिहास के पन्नों को पलट कर कुछ और भी बताना चाह रहे हैं। क्या हमारे शासक सुन और देख पा रहे हैं?

अकबर के व्यक्तित्व के निर्माण में जोधा की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिका को भी फिल्म रेखांकित करती है। कहानी के द्वंद्व को जोधा की दो शर्तो से समझा जा सकता है। इन शर्तो में ही भविष्य के अकबर की सोच की बुनियाद पड़ती है। जोधा की मांग है- हमारी पहली मांग है कि हमें अपने धर्म, अपनी आस्था और रहन-सहन बनाए रखने की पूरी स्वतंत्रता दी जाएगी। किसी हालत में अपना धर्म बदलने को विवश नहीं किया जाएगा। दूसरी मांग हमें अपने प्रभु की मूरत साथ लाने दी जाएगी। इसे बिठाने को महल के हमारे कक्ष में एक मंदिर की स्थापना करायी जाएगी। ये हैं हमारी दो मांगे। अकबर जोधा को अकेले में आश्वासन नहीं देते। वे सार्वजनिक तौर पर कहते हैं- हम राजपूत राजकुमारी के बेखौफ जज्बे की सादगी को सलाम करते हैं। हम उन्हें यह बता दें कि हम भी इसी सरजमीं की पैदाइश हैं, जिस पर वो पैदा हुई हैं और हम भी वही जज्बा रखते हैं। हमारा फैसला है कि आमेर की राजकुमारी का यह रिश्ता हमें मंजूर है। उनकी शर्ते इंशाअल्लाह लब्ज-ब-लब्ज पूरी होंगी।

कह सकते हैं कि शादी की इन दो शर्तो और फिर जोधा की समझदारी ने अकबर की सोच को वह दिशा दी, जिस पर चलते हुए उन्होंने बाद में दीन-ए-इलाही की अवधारणा पेश की। जोधा उन्हें फतह करने और राज करने का फर्क समझाती है और हम कालांतर में देखते हैं कि अकबर कैसे अपनी प्रजा के साथ-साथ जोधा का भी दिल जीतते हैं। यह एक ऐसी प्रेमकहानी है, जिसकी सामाजिकता तत्कालीन राजनीति और सत्ता को भी प्रभावित करती है।

इस प्रेमकहानी की भव्यता को आशुतोष गोवारीकर ने कला निर्देशक नितिन चंद्रकांत देसाई, केमरामैन किरण देवहंस, कोरियोग्राफर चिन्नी ओर रेखा प्रकाश तथा संवाद लेखक के।पी. सक्सेना के सहयोग से हासिल किया है। के.पी. सक्सेना के संवाद सीधे दिल में उतरते हें और मानस को मथते हैं। मुंबई के संवाद लेखक उनसे सीख सकते हैं कि कैसे विभिन्न चरित्रों की भाषा भिन्न रखी जा सकती है। गीतकार जावेद अख्तर और संगीतकार ए आर रहमान विशेष तौर पर उल्लेखनीय हैं। दोनों ने मिलकर फिल्म को उचित सांगीतिक संगत दी है। खासकर फिल्म के दृश्यों के प्रभाव को बढ़ाने में पाश्‌र्र्व संगीत का सुंदर उपयोग हुआ है। फिल्म का कला ओर शिल्प पक्ष बेहतरीन है।

एक्टिंग के लिहाज से रितिक रोशन सबसे आगे हैं। जिस मेहनत और लगन से उन्होंने अकबर को साकार किया है, वह प्रशंसनीय है। पृथ्वीराज कपूर की कतई याद नहीं आती। ऐश्वर्या राय ने राजपूत राजकुमारी के दर्प और सौंदर्य को अच्छी तरह अभिव्यक्त किया है। यह उनकी एक और यादगार फिल्म हो गई। अन्य कलाकारों में इला अरूण नाटकीय हो गई हैं। पूनम सिन्हा अकबर की मां की भूमिका में जंचती हैं। निकितन धीर पहली ही फिल्म में आकर्षित करते हैं। इस फिल्म की भव्यता में उन सैकड़ों-हजारों अनाम जूनियर आर्टिस्टों का सबसे बड़ा योगदान है, जिन्होंने युद्ध और नृत्य के दृश्यों को विशालता दी है।

अंत में हिंदी फिल्मों की जातीय परंपरा में बनी यह आशुतोष गोवारीकर की जोधा अकबर उल्लेखनीय और दर्शनीय फिल्म है। हमें और भी ऐसी फिल्मों की जरूरत है।

जोधा अकबर:चवन्नी के पाठकों का मत

चवन्नी ने अपने ब्लॉग पर पाठकों से पूछा था क्या लगता है जोधा अकबर का? चलेगी या नहीं चलेगी? इस बार पाठकों ने बड़ी संख्या में भागीदारी की और पहले दिन से ही नहीं चलेगी का दावा करने वालों की तादाद ज्यादा रही.बीच में एक बार चलेगी और नहीं चलेगी का पलड़ा बराबर हो गया था,लेकिन बाद में फिर से नहीं चलेगी के पक्ष में ज्यादा मत आए।

यह मत फ़िल्म रिलीज होने के पहले का है.आज फ़िल्म रिलीज हो रही है,हो सकता है कि मुंहामुंही फ़िल्म की तारीफ हो फिर दर्शक बढ़ें.फिलहाल चवन्नी के पाठकों में से ३३ प्रतिशत की राय है कि फ़िल्म चलेगी और ६७ प्रतिशत मानते हैं कि नहीं चलेगी।

अगर आप ने फ़िल्म देखी हो तो अपनी राय लिखें और अपनी समीक्षा भी भेजे.चवन्नी को अआप कि समीक्षा प्रकाशित कर खुशी होगी.

Thursday, February 14, 2008

प्रेमीयुगल अभिषेक और ऐश्वर्या


आज हर जगह रोमांस और प्रेम का जिक्र हो रहा है.चवन्नी ने सोचा कि क्यों नहीं फ़िल्म इंडस्ट्री की कोई प्रेमकहानी बताई जाए.वैसे तो कई प्रेमीयुगल हैं,जिनकी प्रेम्कहानियाँ आकर्षित करती हैं और उनसे पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियाँ बनती है.टीवी चैनलों के ब्रेकिंग न्यूज़ बनते हैं.हालांकि पूरा देश ऐसी खबरों को महत्व दिए जाने की निंदा करता है,लेकिन उन्हें देखता भी है.यह एक सच्चाई है,जिसे अमूमन लोग स्वीकार नहीं करते.पॉपुलर कल्चर के प्रति एक घृणा भाव समाज में व्याप्त है।

चवन्नी अभिषेक और ऐश्वर्या की जोड़ी को अद्भुत मानता है.दोनों की शादी को मीडिया ने विवादों में भले ही ला दिया हो और हमेशा उन पर नज़र रखने का सिलसिला कम नहीं हुआ हो,इसके बावजूद दोनों बेहद सामान्य पति-पत्नी की तरह की जिंदगी के मजे ले रहे हैं.चवन्नी यह बात फिलहाल दावे के साथ इसलिए कह सकता है कि,उसने हाल ही में दोनों से मुलाक़ात की और ऐसे ही मुद्दों पर बात की.कहते हैं उनका हनीमून अभी तक ख़त्म नहीं हुआ है.मौका मिलते ही दोनों एक जगह हो जाते हैं.उनके पास ऐसी सुविधाएं हैं की वे भौगोलिक दूरी को अपने प्रेम के आड़े नहीं आने देते.हालांकि मीडिया इस बात से भी नाराज रहता है कि दोनों इस तरह से क्यों मिलते और साथ रहते हैं।

इस प्रेमीयुगल के साथ एक ख़ास बात है कि दोनों वर्किंग फ़िल्म स्टार हैं और दोनों ही काफी व्यस्त हैं.फिलहाल ऐसी कोई फिल्मी जोड़ी नहीं है जो टक्कर के स्टार हों और पति-पत्नी भी हों.आप सारे पॉपुलर स्टार को देख लें या तो उनकी शादियाँ नहीं हुई हैं या फिर उनकी बीवियाँ या शौहर फ़िल्म स्टार नहीं हैं या नहीं रहे.बहुत मुश्किल होता है हमकदम बनना.अभिषेक और ऐश्वर्या अपने दाम्पत्य की चुनौतियों को समझते हैं और थोड़े सावधान भी रहते हैं।

चवन्नी आज उन्हें बधाई देता है और पुरने रिवाज के हिसाब से कहना चाहता है कि उन्हें किसी की नज़र न लगे.चश्मेबद्दूर ...

Tuesday, February 12, 2008

एपिक रोमांस है जोधा अकबर : आशुतोष गोवारिकर


आशुतोष गोवारिकर से अजय ब्रह्मात्मज की लंबी बातचीत का यह एक हिस्सा है.कभी मौका मिला तो पूरी बातचीत भी आप यहाँ पढ़ सकेंगे...



मध्ययुगीन भारत की प्रेमकहानी ही क्यों चुनी और वह भी मुगल काल की?

मैंने यह पहले से नहीं सोचा था कि मुगल पीरियड पर एक फिल्म बनानी है। लगान के तुरंत बाद हैदर अली ने मुझे जोधा अकबर की कहानी सुनायी। कहानी का मर्म था कि कैसे उनकी शादी गठजोड़ की शादी थी और कैसे शादी के बाद उनके बीच प्रेम पनपा। मुझे उस कहानी ने आकर्षित किया। आखिर किस परिस्थिति में आज से 450 साल पहले एक राजपूत राजकुमारी की शादी मुगल शहंशाह से हुई? मुझे लगा कि यह भव्य और गहरी फिल्म है और उसके लिए पूरा शोध करना होगा। हमने तय किया कि पहले स्वदेस पूरी करेंगे और साथ-साथ जोधा अकबर की तैयारियां शुरू कर देंगे। दूसरा एक कारण था कि मैं एक रोमांटिक लव स्टोरी बनाना चाहता था। लगान और स्वदेस में रोमांस था, लेकिन वे रोमांटिक फिल्में नहीं थीं। मुझे 1562 की यह प्रेमकहानी अच्छी लगी कि कैसे दो धर्म और संस्कृति के लोग साथ में आए और कैसे शादी के बाद दोनों के बीच प्रेम हुआ।

आप इसे एपिक रोमांस कह रहे हैं। इतिहास के पन्नों से ली गयी यह प्रेमकहानी आज के दर्शकों को कितनी पसंद आएगी?

अभी कुछ भी कहना मुश्किल है। मैं भारत के इतिहास के द ग्रेट अकबर की प्रेमकहानी दिखा रहा हूं। आप गौर करें कि कोई भी अचानक ग्रेट नहीं हो जाता। जीवन के आरंभिक वर्षो में महानता के लक्षण खोजे जा सकते हैं। चूंकि अकबर की शादी गठजोड़ की शादी है, इसलिए मेरी रुचि यह जानने में रही है कि दोनों के बीच कैसे प्रेम हुआ। जिस काल को आप ने देखा नहीं है, उस काल की प्रेमकहानी गढ़ना सचमुच रोचक चुनौती रही है।

अकबर के लिए रितिक रोशन और जोधा के लिए ऐश्वर्या राय ही क्यों?

मैंने कहो ना..प्यार है देखी थी। मुझे उसमें रितिक रोशन का व्यक्तित्व पसंद आया था। रितिक में योद्धा की क्वालिटी है। रही टैलेंट की बात तो आप कोई सवाल ही नहीं कर सकते। पहली ही फिल्म में उन्होंने साबित कर दिया था। फिर कोई..मिल गया देखी तो मेरा विश्वास बढ़ गया। मुझे लगा कि वे अकबर की भूमिका निभा सकेंगे। एश्वर्या राय का कॅरियर देखें तो पाएंगे कि वह मुख्यधारा की फिल्मों के साथ ही अलग किस्म की फिल्में भी करती रही हैं। आप उनकी रेनकोट देखें या शब्द या फिर चोखेर बाली ही देख लें। मुझे मालूम था कि वह अलग किस्म की भूमिकाएं करना चाहती हैं। एक्टर में यह इच्छा हो तो काम आसान हो जाता है। खूबसूरती की तो वह मिसाल हैं। मुझे तो लगता है कि वह अमर चित्र कथा में से आई हैं। मैंने दोनों से कृष और धूम-2 के पहले संपर्क किया था और वे राजी हो गए थे। उन्होंने पूछा था कि हम दोनों धूम-2 जैसी फिल्म कर रहे हैं। उससे कोई फर्क तो नहीं पड़ेगा। मैंने उन्हें आश्वस्त किया था कि मेरी फिल्म जोधा अकबर है। आज देखें तो धूम-2 से मुझे फायदा हो सकता है।
क्या ऐसा कह सकते हैं कि लगान की कामयाबी और स्वदेस की सराहना के कारण आप जोधा अकबर की हिम्मत कर सके? इस पैमाने और खर्च पर क्या फिल्म की कल्पना पहले नहीं की जा सकती थी?
लगान के तुरंत बाद भी जोधा अकबर बन सकती थी। मेरी तैयारी नहीं थी। मुझे अकबर और जोधा को जानना-समझना था, जबकि स्वदेस के मोहन भार्गव को मैं अच्छी तरह जानता था। दो-तीन सालों के अध्ययन और शोध के बाद ही मैं जोधा और अकबर के चरित्र को आत्मसात कर सकता था। मैं रिसर्च का काम किसी और को नहीं दे सकता। मेरे लिए जरूरी था कि सारी किताबें खुद पढ़ूं। मुझे सारी चीजों की जानकारी होनी चाहिए। लोकेशन भी मैं ही फायनल करूं। यह सब न हो तो आप पीरियड फिल्म रिक्रिएट नहीं कर सकते। दर्शकों के मन भी यह रहता है कि हां..हां..दिखाओ क्या बनाया है? वे भी इम्तिहान लेने के मूड में रहते हैं। मुझे निर्माता जुटाने या इस फिल्म के लिए पैसे उगाहने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई।

वास्तविक लोकेशन पर जाने के बजाए आप ने एनडी स्टूडियो में सेट लगाया। क्या इससे फिल्म की भव्यता प्रभावित नहीं होगी?

हमलोग वास्तविक लोकेशन पर गए थे। आगरा फोर्ट और आमेर का किला देखने गए थे। वहां अधिकारियों से बातें हुई। समस्या यह थी कि वहां शूटिंग के लिए पर्यटकों की आवाजाही नहीं रोकी जा सकती थी। उनकी प्लानिंग छह महीने और साल भर पहले सुनिश्चित होती है। एक व्यवस्था बन रही थी कि मुझे रात से सुबह तक की अनुमति दे दी जाए। केवल रात-रात में शूटिंग कर मैं अच्छी फिल्म नहीं बना सकता था। और फिर वहां मैं जानवरों को नहीं ले जा सकता था। मुझे अपने सामान रात में लगा कर सुबह हटाना भी पड़ता। हमें 37 करोड़ के निश्चित बजट में ही काम पूरा करना था। मेरी पत्नी और फिल्म की कार्यकारी निर्माता सुनीता ने सुझाव दिया कि हमलोग सेट लगा लें। हमने एक ही सावधानी रखी कि फिल्म में वास्तविकता का एहसास हो। राज बब्बर तो आगरा के हैं। उन्होंने सेट देखा तो दंग रह गए।

अकबर का संदर्भ आते ही मुगलेआजम की याद आती है। क्या आपने पुरानी हिंदी फिल्मों से भी रेफरेंस लिए?

ऐसी तुलना स्वाभाविक है, लेकिन मेरी फिल्म की कहानी और उसका समय मुगलेआजम से बिल्कुल अलग है। परिवेश और चरित्रों के निर्माण में यह फर्क आप महसूस करेंगे। दोनों फिल्मों का रोमांस भी अलग है। मुगलेआजम में सलीम-अनारकली का रोमांस था। मेरी फिल्म में जोधा और अकबर का रोमांस है। न यहां अनारकली कनीज थी और सलीम राजकुमार था। मेरी फिल्म में अकबर बादशाह है और जोधा राजकुमारी है। दोनों रोमांस का बैकड्रॉप अलग है। मुगलेआजम इस देश की श्रेष्ठ फिल्म है, हर लिहाज से। वह महान क्लासिक है। उससे तुलना की बात तो हम सोच ही नहीं सकते।

जोधा अकबर के संगीत के बारे में क्या कहेंगे?

मैं फिर से जावेद अख्तर और ए.आर. रहमान के साथ काम कर रहा हूं। हमारे बीच यह समझदारी बनी कि फिल्म का संगीत एहसास तो पीरियड का दे, लेकिन आज के दर्शकों को वह अपील करे। उस जमाने का संगीत देकर हम ज्यादा से ज्यादा लोगों तक नहीं पहुंच सकते। मुझे कहने को जश्ने बहारा है.. फिल्म की थीम के हिसाब से सबसे ज्यादा पसंद है।

मान्यता की माँग में सिन्दूर

मान्यता की माँग में सिन्दूर देख कर कई लोगों को हैरत हो रही होगी.दुबई से मुम्बई आई एक सामान्य सी लड़की की आंखों में कई सपने रहे होंगे.इन सपनों को बुनने में हमारी हिन्दी फिल्मों ने ताना-बाना का काम किया होगा.तभी तो वह मुम्बई आने के बाद फिल्मों में पाँव टिकने की कोशिश करती रही.उसे कभी कोई बड़ा ऑफर नहीं मिला.हाँ,प्रकाश झा ने उसे 'गंगाजल'में एक आइटम गीत करने का मौका दिया।
मान्यता ने वहाँ से संजय की संगिनी बनने तक का सफर अपनी जिद्द से तय किया।

गौर करें कि यह किसी भी सामान्य लड़की का सपना हो सकता है कि वह देश के सबसे चर्चित और विवादास्पद फिल्म ऐक्टर की की संगिनी बने.चवन्नी बार-बार संगिनी शब्द का ही इस्तेमाल कर रहा है.इसकी भी ठोस वजह है.अभी मान्यता को पत्नी कहना ठीक नहीं होगा.संजय दत्त के इस भावनात्मक उफान के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.कल को वे किसी और के साथ भी नज़र आ सकते हैं.दोनों की शादी का मकसद सिर्फ साथ रहना है.दोनों दो सालों से साथ रह ही रहे थे.दवाब में आकर संजय ने भावनात्मक उद्रेक में शादी की बात मान ली।

चवन्नी इसे मान्यता के दृष्टिकोण से बड़ी उपलब्धि के तौर पर देख रहा है.जिस लड़की का आइटम गीत भी लोगों ने नज़रंदाज कर दिया था.आज वह देश के सभी अख़बारों के प्रथम पेज कि खबर.हर अखबार में उसकी तस्वीर छपी है.क्या उसने सोच-समझकर इस रिश्ते की पहल की होगी?कहते लड़कियां भवन में फैसले नहीं लेतीं.वे पहले फिसला लेटी हैं,और फिर भावनाओं में फँस जाती हैं।

मान्यता और संजय की दोस्ती और रिश्तों की बात करें तो संजय के एक निर्माता दोस्त ने बाबा से मनु की मुलाक़ात करवाई थी.ऐसी मुलाकातें आम है.संजय जैसे ऐक्टर की ज़िंदगी में आई ऐसी लड़कियों की गिनती नहीं की जाती.लेकिन पहली मुलाक़ात में ही कुछ ऐसा टंका भिड़ा कि मान्यता संजय के करीब आती गयी और संजय के पुराने दोस्त छूटते गए.यहाँ तक कि परिवार में भी मान्यता का पद और कद बढ़ता गया.वह संजय की बहनों प्रिय और नम्रता की नाखुशी के बावजूद संजय दत्त की हमसफ़र बनी रही।

मान्यता ने सब कुछ हासिल किया.यह संजय की तीसरी शादी है तो मान्यता की चौथी शादी है.मान्यता ने आज सब कुछ हासिल कर लिया है.उसकी यह यात्रा किसी परिकथा की तरह ही है.हाँ,किसी दिन वह बताये तो रोचक कहानी सुनने को मिलेगी.

Monday, February 11, 2008

संजय को मान्यता मिली

संजय ने आखिरकार मान्यता के संग शादी कर ली.यह उनकी तीसरी शादी है.सबसे पहले उनकी शादी ऋचा शर्मा के साथ हुई थी.यह शादी लंबे समय तक नहीं चल सकी. संजय दत्त की अकेली बेटी त्रिशाला की माँ ऋचा शर्मा ही थीं.ऋचा शर्मा की मौत हो चुकी है.

मुम्बई बम विस्फोट में फंसने के बाद संजय दत्त को जेल जाना पड़ा था.वे जेल से निकले तो रिया पिल्लै ने उनसे जबरदस्त हमदर्दी दिखाई और कालांतर में उनकी बीवी बन गयी.भावनाओं के उफान में की गयी यह शादी यथार्थ की कठोर सच्चाईयों से टकराने पर टिक नहीं सकी.रिया पिल्लै बाद में लिएंडर पेस के बच्चे की माँ बनी ।
इस बार फिर संजय के जेल का सिलसिला चला तो उन्हें मान्यता के साथ देखा गया.कयास लगाया जाता रहा कि दोनों ने शादी कर ली है ...हालांकि संजय दत्त ने हाँ या ना नहीं की.इन्हीं कयासों के बीच उन्होंने आखिरकार मान्यता को अपनी संगिनी बना लिया.



इस शादी में संजत दत्त की बहनें मौजूद नहीं थीं.उनकी नामौजूदगी बहुत कुछ कहती है.आप क्या कहते हैं?

सुपर स्टार: पुराने फार्मूले की नई फिल्म


-अजय ब्रह्मात्मज


यह रोहित जुगराज की फिल्म है। निश्चित रूप से इस बार वे पहली फिल्म जेम्स की तुलना में आगे आए हैं। अगर कोई कमी है तो यही है कि उन्होंने हमशक्लों के पुराने फार्मूले को लेकर फिल्म बनायी है।

कुणाल मध्यवर्गीय परिवार का लड़का है। बचपन से फिल्मों के शौकीन कुणाल का सपना है कि वह फिल्म स्टार बने। उसके दोस्तों को भी लगता है कि वह एक न एक दिन स्टार बन जाएगा। अभी तक उसे तीसरी लाइन में चौथे स्थान पर खड़े होकर डांस करने का मौका मिला है। कहानी में टर्न तब आता है,जब उसके हमशक्ल करण के लांच होने की खबर अखबारों में छपती है। पूरे मुहल्ले को लगता है कि कुणाल को फिल्म मिल गयी है। कुणाल वास्तविकता जानने के लिए फिल्म के दफ्तर पहुंचता है तो सच्चाई जान कर हैरत में पड़ जाता है।

नाटकीय मोड़ तब आता है,जब कुणाल से कहा जाता है कि वह करण के बदले फिल्म में काम करे। प्रोड्यूसर पिता की समस्या है कि करण को एक्टिंग-डांसिंग कुछ भी नहीं आती और उन्होंने फिल्म के लिए बाजार से पैसे उगाह लिए हैं। कुणाल राजी हो जाता है। कहानी आगे बढ़ती है। एक और जबरदस्त मोड़ आता है,जब करण की मौत हो जाती है और कुणाल को रियल लाइफ में भी करण होने की एक्टिंग करनी पड़ती है। कुणाल के भावनात्मक ऊहापोह को निर्देशक ने अच्छी तरह से रचा है।
कुणाल खेमू ने दोहरे चरित्र को कुशलता से निभाया है। फिल्म पूरी तरह से कुणाल पर ही निर्भर करती है। उन्हें दर्शन जरीवाला, ट्यूलिप जोशी, ऑशिमा साहनी, शरत सक्सेना, रीमा और अमर का उचित सहयोग मिला है। फिल्म इंटरवल के पहले लड़खड़ाती है, लेकिन इंटरवल के बाद संभल जाती है। इंटरवल के बाद के कई इमोशनल सीन दिल को छूते हैं और मुश्किल में फंसे कुणाल के प्रति सहानुभूति जगाते हैं। कुणाल खेमू सक्षम अभिनेता के तौर पर उभर रहे हैं।

Sunday, February 10, 2008

मिथ्या: अधूरे चरित्र, कमजोर पटकथा


-अजय ब्रह्मात्मज
रजत कपूर ने अलग तरह की फिल्में बनाकर एक नाम कमाया है। ऐसा लगने लगा था कि इस दौर में वे कुछ अलग किस्म का सिनेमा कर पा रहे हैं। उनकी ताजा फिल्म मिथ्या इस उम्मीद को कम करती है। इस फिल्म में वे अलग तरीके से हिंदी फिल्मों के फार्मूले के शिकार हो गए है। मिथ्या निराश करती है।
वीके एक्टर बनने की ख्वाहिश रखता है। वह कोशिश करता है और किसी प्रकार जूनियर आर्टिस्ट बन पाया है। उसकी मुश्किल तब खड़ी होती है,जब वह मुंबई के एक डॉन राजे सर का हमशक्ल निकल आता है। विरोधी गैंग के लोग उसे अगवा करते हैं और उसे अद्भुत एक्टिंग एसाइनमेंट देते हैं। उसे राजे सर बन जाना है और फिर अगवा किए गैंग का काम करना है। मजबूरी में वह तैयार हो जाता है। इस एक्टिंग की अपनी दिक्कतें हैं। वह किसी तरह इस जंजाल से निकलना चाहता है। इस कोशिश में उससे ऐसी गलतियां होती हैं कि वह दोनों गैंग का टारगेट बन जाता है। और जैसा कि ऐसी स्थिति में होता है। आखिरकार उसे अपनी जान देनी पड़ती है।
हिंदी फिल्मों में हमशक्ल का फार्मूला इतना पुराना और बासी हो गया है कि रजत कपूर उसमें कोई नवीनता नहीं पैदा कर पाते। हमशक्ल की फिल्मों में लॉजिक को ताक पर रखना पड़ता है। इस फिल्म के भी कई प्रसंगों में कार्य-कारण संबंध नहीं बैठ पाते। आश्चर्य होता है कि रजत कपूर जैसे समझदार निर्देशक से ऐसी गलतियां कैसे हो सकती हैं।
यह फिल्म एक स्तर पर अंडरव‌र्ल्ड पर बनी फिल्मों का मजाक उड़ाती फिल्म लगती है और कभी ब्लैक कॉमेडी का भी एहसास देती है,लेकिन अधूरे चरित्र और कमजोर पटकथा मिथ्या को किसी एक श्रेणी में शामिल नहीं होने देते। अगर कलाकारों के परफार्मेस की बात करें तो रणवीर कपूर ने अपनी भूमिका को सही तरीके से निभाया है। ब्रिजेन्द्र काला छोटी भूमिका में भी प्रभावित करते हैं। विनय पाठक ने इस बार निराश किया है। दरअसल उनके चरित्र को कायदे से विकसित ही नहीं किया गया है।

Saturday, February 9, 2008

छोटे फिल्म फेस्टिवल की सार्थकता

-अजय ब्रह्मात्मज

गोरखपुर, पटना, गया, भोपाल, जयपुर, शिमला जैसे शहरों के साथ ही मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में भी छोटे पैमाने पर अनेक फिल्म फेस्टिवल होते रहते हैं। दरअसल, देश की दूसरी तमाम गतिविधियों की तरह फिल्म फेस्टिवल के भी श्रेणीकरण और वर्गीकरण हो गए हैं। और उन श्रेणियों और वर्गो के आधार पर उनकी चर्चा होती है और उनका पैमाना भी तय होता है।

एक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल है, जोकि पिछले चार सालों से गोवा में ही हो रहा है। भारत सरकार ने तय किया है कि वह हर साल इसे गोवा में ही आयोजित करेगी और चंद सालों में उसे कान, बर्लिन, वेनिस और टोरंटो की तरह महत्वपूर्ण इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल बना देगी। हालांकि पिछले चार सालों में ऐसा कोई संकेत नहीं मिला। लेकिन हो सकता है कि पांचवें साल में कोई चमत्कार हो जाए।

गोवा के अतिरिक्त कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, पुणे और तिरुअनंतपुरम के फिल्म फेस्टिवल राष्ट्रीय महत्व रखते हैं। क्योंकि इन फेस्टिवलों में भी सिनेप्रेमी और फिल्मकार पहुंचते हैं। चूंकि इन सभी फिल्म फेस्टिवल का बजट अपेक्षाकृत ज्यादा होता है, इसलिए फिल्मों का चुनाव अच्छा रहता है। देश और विदेश के फिल्मकारों की भागीदारी अच्छी रहती है। इन विशिष्ट आयोजनों से अलग हैं दूसरे शहरों और महानगरों में छोटे पैमाने पर आयोजित फिल्म फेस्टिवल। गोरखपुर में संजय जोशी के नेतृत्व में भी एक फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होता है। एक अच्छी बात यह है कि बगैर किसी प्रायोजक और बड़े सरकारी सहयोग के संजय जोशी और उनकी टीम इस फेस्टिवल का आयोजन कर रही है और उसे एक विशिष्ट स्वरूप देने की कोशिश कर रही है। पटना में पिछले तीन सालों से फिल्म फेस्टिवल आयोजित हो रहा है। सीमित बजट में आयोजित यह फेस्टिवल भी पटना के दर्शकों को बेहतरीन सिनेमा के प्रति जागृत करने में सफल रहा है। जयपुर के कुछ आयोजनों की भी काफी चर्चा रही है। कह सकते हैं कि सीमित संसाधनों के दम पर आयोजित इन फिल्म फेस्टिवल का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहां दिखावा नहीं होता। फिल्मकारों और बड़ी हस्तियों के अभाव में फेस्टिवल का स्वरूप संतुलित बना रहता है और छोटे स्तर पर ही सही, लेकिन ये फेस्टिवल अपना उद्देश्य पूरा जरूर करते हैं। जरूरत है कि दर्शक ऐसे फेस्टिवल का समर्थन करें और अपने शहरों में आयोजित फेस्टिवल का हिस्सा बनें। वैसे, ऐसे छोटे आयोजनों को प्रशासनिक सुविधाएं भी मिलनी चाहिए। प्रायोजकों से परहेज करने के बजाए उन्हें ऐसे आयोजनों के लिए प्रेरित भी करना चाहिए। सच तो यह है कि देश के छोटे शहरों में फेस्टिवल होंगे, तो निश्चित रूप से बेहतरीन फिल्मों के निर्माण और प्रदर्शन का माहौल बनेगा और कई नई प्रतिभाएं भी सामने आएंगी। हां, अगर विभिन्न प्रदेशों से आए फिल्मकार और कलाकार ऐसे आयोजनों को सहयोग दें, तो फेस्टिवल का आकर्षण बढ़ सकता है। मुख्य धारा की रोचक व सफल फिल्में भी ऐसे फिल्म फेस्टिवल में शामिल की जा सकती हैं, जैसे कि चक दे इंडिया, तारे जमीन पर, गांधी माई फादर आदि।

फिल्मों के डिजीटल होने के बाद तो अब प्रिंट, प्रोजेक्टर और थिएटर की भी आवश्यकता नहीं रह गई है। अगर छोटे-मझोले शहरों में सिने सोसायटी गठित हों और वे अपने स्तर पर मासिक, त्रैमासिक या वार्षिक रूप से किसी विषय, फिल्मकार, भाषा या देश पर केंद्रित फिल्मों का फेस्टिवल करे, तो कम खर्च में एक अभियान चलाया जा सकता है। आप यकीन करें कि इस अभियान को सुधी दर्शकों का समर्थन मिलेगा और साथ ही सार्थक फिल्मों का एक माहौल बनेगा।

Wednesday, February 6, 2008

सेंसर हो गयी 'जोधा अकबर'


चवन्नी को जानकारी मिली है की कल मुम्बई में जोधा अकबर को सेंसर प्रमाणपत्र मिल गया है.कल ही यह फिल्म क्षेत्रीय सेंसर बोर्ड में भेजी गयी थी.मुम्बई में सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने इसे देखा और बगैर किसी कतरब्योंत के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति दी।


जोधा बाई के नाम को लेकर चल रहे विवाद को ध्यान में रख कर आशुतोष गोवारिकर ने एक डिस्क्लेमर डाला था,लेकिन आदतन वह अंग्रेजी में लिखा था.सेंसर बोर्ड ने सिफारिश की है कि यह डिस्क्लेमर हिन्दी में भी दिया जाना चाहिए.साथ ही यह लिखने का भी निर्देश दिया गया है कि जोधा के और भी कई नाम हैं.आशुतोष ने इस मामले में पहले भी स्पष्टीकरण दिया है कि उन्होंने जयपुर के राजघराने की सहमति से जोधा बाई नाम रखा है.आशु ने यह भी कहा है कि अकबर के साथ जोधा का नाम मुगलेआज़म के कारण विख्यात हो चुका है. वे उसे बदलकर किसी प्रकार का जोखिम नहीं लेना चाहते.
सेंसर बोर्ड ने यह भी सिफारिश की है कि फिल्म में इस आशय का भी एक डिस्क्लेमर हो कि इस फिल्म में वर्णित ऐतिहासिक तथ्य निर्देशक की व्याख्या है.निर्देशक की व्याख्या से इतर व्याख्याएँ भी हो सकती हैं।
हाँ,सेंसर बोर्ड ने जोधा अकबर को यूए प्रमाणपत्र दिया है.सेंसर बोर्ड का तर्क है कि फिल्म के युद्ध दृश्यों में हाथी के पाँव के नीचे कुचलते लोगों को दिखाया गया है. ऐसे दृश्यों को देख कर ही फिल्म के लिए यूए कि सिफारिश की गयी है।
जोधा अकबर १५ फरवरी को रिलीज हो रही है.


Tuesday, February 5, 2008

अभिषेक बच्चन का जन्मदिन

आज अभिषेक का जन्मदिन है.पूरा बच्चन परिवार आज जयपुर में है,क्योंकि अभिषेक बच्चन वहाँ राकेश मेहरा की फिल्म दिल्ली-६ की शूटिंग कर रहे हैं.राकेश उन्हें छोड़ना नहीं चाहते थे और परिवार के अन्य सदस्य खाली थे लिहाजा तय हुआ की जन्मदिन जयपुर में ही मनाया जाये।

अभिषेक बच्चन को अपने पिता अमिताभ बच्चन की छवि की छाया से निकलने में पांच साल और १६ फिल्में लग गयीं.मशहूर पिता के बेटे होने का नुकसान अभिषेक को उठाना पड़ा है,लेकिन उस नुकसान की तुलना में फायदे अधिक हुए है.दूसरे ऐक्टर तो सवाल करते ही हैं न की अगर अभिषेक के पिता अमिताभ बच्चन नहीं होते तो क्या उन्हें १६ फिल्मों का मौका मिलता?जवाब एक ही होगा की नहीं मिलता।

इसके बावजूद अभिषेक अभी जिस स्थिति में हैं और उन्होंने जो थोड़ी जगह बनायीं है,उसमें उनकी मेहनत और लगन है.और फिर दर्शकों ने भी स्वीकार कर ही लिया.युवा के बाद से ही अभिषेक बच्चन की स्वतंत्र पहचान बनी.पिछले साल आई गुरु कथ्य के स्तर पर चाहे जैसी फिल्म हो,लेकिन ऐक्टर अभिषेक बच्चन के नज़रिये से देखें तो उन्होंने एक कठिन भूमिका को साकार किया था।

गुरु की बात आई तो चवन्नी आप को बताना चाहता है कि अभिषेक बच्चन ने फिल्म के नायक गुरु की भूमिका निभाने में अपने निर्माता मित्र वासु भगनानी की मदद ली थी.उन्होंने गुरु के चलने-फिरने और बात-व्यवहार में वासु का अंदाज ढल दिया था.इस फिल्म के लिए अभिषेक बच्चन को मोटा भी होना पड़ा था.खुद को मोटा करना थोडा मुश्किल काम होता है।

अभिषेक बच्चन फिलहाल बहुत खुश हैं.कह सकते हैं की देश की एक खूबसूरत अभिनेत्री उनकी पत्नी हैं.उनका फिल्मी कैरिअर ठीक चल रहा है.उनके माता-पिता भी सक्रिय जीवन जी रहे हैं।

बधाई अभिषेक बच्चन!जन्मदिन की असंख्य बधाई!!

Monday, February 4, 2008

मैंने युवा अकबर का किरदार निभाया है: रितिक रोशन


-अजय ब्रह्मात्मज


रितिक रोशन को इंटरव्यू के लिए पकड़ पाना लगभग उतना ही मुश्किल काम है, जितनी दिक्कत उन्हें किसी फिल्म के लिए राजी करने में किसी निर्देशक को होती होगी।


आप अपनी फिल्मों के चुनाव के प्रति काफी सावधान रहते हैं। क्या वजह रही कि जोधा अकबर के लिए हाँ कहा? पीरियड, कॉस्टयूम और अकबर तीनों में से क्या आपको ज्यादा आकर्षित कर रहा था?


मेरे लिए अकबर आकर्षण और चुनौती दोनों थे। कोई मिल गया और धूम 2 की मेरी भूमिका को देखते हुए जोधा अकबर में मेरी भूमिका एकदम अलग है। इसके लिए मुझे खास तरह से तैयारी करनी पड़ी। 14 किलो का कवच पहनकर मैंने स्वयं को किसी पुराने योद्धा की तरह से महसूस किया। मेरी कोशिश रही है कि अकबर के बारे में जो भी जानकारी है, उसके आधार पर उनके एटीट्यूड को ईमानदारी से पर्दे पर उतार सकूं। अकबर के लिए मैंने ढेर सारी किताबें पढ़ीं। मुगल काल और अकबर के बारे में सारी जानकारियां एकत्रित कीं। उन्हें आत्मसात किया। शूटिंग शुरू करते समय मैंने सारी जानकारियां दिमाग से निकाल दीं।

आप इस फिल्म को किस नजरिये से देखते है?


जोधा अकबर का मकसद मनोरंजन करना है, शिक्षा देना या डाक्यूमेंट्री नहीं है। मैं ऐसी फिल्मों पर विश्वास कम ही करता हूं। यह मेरे लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।

कृष से कितनी अलग रही जोधा अकबर?


मेरे लिए कृष से बिल्कुल अलग फिल्म रही जोधा अकबर। कृष में मुझे मालूम था कि क्या करना है? उसकी हर अदा पहले से मेरे दिमाग में थी। सेट पर जाने के बाद मैं उन्हें करता गया। अकबर के साथ ऐसी बात नहीं थी। इसकी शूटिंग मेरे लिए किसी मुकाबले की तरह रही। जब जो चुनौती आई, उसका मुकाबला डायरेक्टर आशुतोष गोवारिकर की मदद से करता रहा।

क्या अकबर की भूमिका निभाते समय सचेत या अप्रत्यक्ष रूप से आप पृथ्वीराज कपूर से प्रभावित रहे?


अगर आप पता करें तो पाएंगे कि अकबर की वास्तविक आवाज और उनका कद पृथ्वीराज जी से बिल्कुल अलग था। अकबर उतने लंबे नहीं थे और उनकी आवाज पतली थी। पृथ्वीराज जी ने अपनी प्रतिभा से अकबर को जिस तरह से चित्रित किया, वही अकबर की छवि बन गयी। उस छवि को कमर्शियल स्वीकृति भी मिल गयी, क्योंकि मुगलेआजम सफल रही। मैंने जिस अकबर की भूमिका निभायी है, वह उम्र में छोटा है और अभी दुनिया को समझ रहा है। उसकी आंखों में खोज है। वह कभी विस्मित और चकित होता है तो कभी हैरान और परेशान भी होता है। आप कह सकते हैं कि दोनों में उम्र के फर्क से काफी अंतर आ गया है। मुगलेआजम के अकबर उम्रदराज, अनुभवी और महाबली थे, जबकि जोधा अकबर के अकबर अनिश्चित है और अभी राह खोज रहा है। आशुतोष भी नहीं चाहते थे कि मैं अकबर को कांफीडेंट और पावरफुल रूप में चित्रित करूं।


इस फिल्म के दौरान अकबर को जानने के बाद उनके व्यक्तित्व की किस खासियत से प्रभवित हुए और क्या अकबर की जिंदगी मिले तो आप उसे स्वीकार करेंगे? आपको मानना पड़ेगा कि आज कल के फिल्म स्टार किसी राजा की तरह ही होते हैं?


हंसते हुए, बाहर से ऐसा लग सकता है, लेकिन उनकी जिंदगी और हमारी जिंदगी में बहुत फर्क है। हम जवाबदेह हैं। हमें दूसरों की नौकरी करनी पड़ती है। अकबर के व्यक्तित्व में कई खासियतें हैं। उसने इतने पावरफुल होने के बावजूद दूसरों की सलाह पर ध्यान दिया और खुद को सुधारने के लिए तैयार रहा। इसके अलावा वह ताकतवर होने के साथ ही संवेदनशील है। रही बात अकबर की जिंदगी स्वीकार करने की तो मैं अपनी जिंदगी से संतुष्ट हूं। इसे बदलना नहीं चाहूंगा। हम वैसी जिंदगी आज के समय में नहीं जी सकते।

ऐश्वर्या राय का अप्रोच कैसा रहा?


सेट पर ऐश्वर्या का अप्रोच मेरे जैसा ही है। मैं को-एक्टर के लिए भी सेट पर रहता हूं और फ्रेम में नहीं होने पर भी अपने संवाद बोलता हूं। मैंने देखा है कि ऐश्वर्या भी ऐसा ही करती हैं। वह समर्पित आर्टिस्ट हैं और उनकी मौजूदगी में काम करने में मजा आता है।

निर्देशक आशुतोष गोवारिकर के बारे में आपकी क्या राय है?


आशुतोष की जितनी तारीफ की जाए कम है मैं हमेशा आशुतोष के साथ काम करना चाहूंगा। यह सही है कि जोधा अकबर की स्क्रिप्ट ने मुझे खासा प्रभावित किया है जो कि मेरे लिए किसी बोनस से कम नहीं है। उनके अंदर ऐसी क्षमता है जो किसी भी दृश्य को पर्दे पर साकार रूप में उतार देती है। उनमें मानवीय रिश्तों की संवेदनशीलता को समझने की गहरी पकड़ है। आशुतोष अक्सर शॉट के बीच में भी दखल देकर उसे नया रूप दे देते है। मैंने ऐसा महसूस किया कि शॉट पहले से भी अच्छा हो जाता है।

Saturday, February 2, 2008

हाय रामा, क्या है ड्रामा

-अजय ब्रह्मात्मज

लगता है इस फिल्म की सारी क्रिएटिविटी शीर्षक गीत में ही खप गई है। अदनान सामी के गाए गीत में शब्दों से अच्छा खेला गया है। सुनने में भी अच्छा लगता है। इस गीत के चित्रांकन में फिल्म के सारे कलाकार दिखे हैं, लेकिन शुरू के क्रेडिट के समय ही यह गाना खत्म हो जाता है। उसके बाद फिल्म आरंभ होती है, तो फिर उसके खत्म होने का इंतजार शुरू हो जाता है।

रामा रामा क्या है ड्रामा में निर्देशक एस चंद्रकांत ने कामेडी क्रिएट करने की असफल कोशिश की है। अमूमन स्फुट विचार को लेकर बनाई गई फिल्मों का यही हश्र होता है। अधूरी कहानी और आधे-अधूरे किरदारों को लेकर फिल्म पूरी कर दी जाती है। इस फिल्म में निर्देशक एक संदेश देना चाहते हैं कि बीवी का जिंदगी में खास महत्व होता है और सफल दांपत्य के लिए पति-पत्नी को थोड़ा बहुत एडजस्ट करना चाहिए।

फिल्म का सारा भार राजपाल यादव के कंधों पर है और उनके कंधे इस फिल्म को ढो नहीं पाते। बाकी कलाकारों का उन्हें लापरवाह सहयोग मिला है। हां, फिल्म में अंग्रेजी के गलत शब्दों का इस्तेमाल करते हुए मिसरा जी (संजय मिश्रा) आते हैं तो राजपाल यादव के साथ उनकी जोड़ी जमती है। अनुपम खेर, नेहा धूपिया, अमृता अरोड़ा और आशीष चौधरी अधपके किरदारों को अपने अभिनय से और भी कच्चा कर देते हैं।

रामा रामा क्या है ड्रामा कामेडी की विधा में कमजोर कोशिश है और फिर कहानी का निर्वाह पुरुषों के दृष्टिकोण से किया गया है, जिसमें बीवी को ही तमाम परीक्षाओं से गुजर कर पूर्ण साबित होना है। पुरुष किरदारों की कमियों के लिए उन्हें ही कसूरवार समझा गया है। आखिरकार जब वे घरेलू औरत और सेविका की भूमिका के लिए तैयार हो जाती हैं तो फिल्म खत्म हो जाती है।

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लौटे आदित्य चोपड़ा,ले आएंगे ' रब ने बना दी जोड़ी


बहुत पहले मनमोहन देसाई की एक फिल्म आई थी ' सुहाग '.इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और रेखा थे.उन दिनों दोनों की जोड़ी ने धूम मचा रखी थी.इसी फिल्म का गीत है ' रब ने बना दी जोड़ी '.इस गीत में दोनों की मस्ती और अंतरंगता दिखती है.अब इसी गीत को आधार बना कर आदित्य चोपड़ा अपनी नयी फिल्म की योजना बना रहे हैं।


आदित्य चोपड़ा हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के चमत्कारी निर्देशक माने जाते हैं.उनकी पहली फिल्म ' दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे ' अभी तक मुम्बई के एक सिनेमाघर में चल रही है.वह १३वें साल में प्रवेश कर चुकी है.आदित्य चोपड़ा कि पहली फिल्म का ऐतिहासिक महत्व हो गया है.उनकी दूसरी फिल्म ' मोहब्बतें ' ज्यादा नहीं चली थी,लेकिन उस फिल्म से अमिताभ बच्चन की दूसरी पारी निखर गयी थी. यह आज से आठ साल पहले की बात है।
पिछले आठ सालों में आदित्य चोपड़ा ने यशराज फिल्म्स में बन रही सभी फिल्मों की निगरानी की.उन्होंने कांसेप्ट से लेकर उनकी रिलीज तक पर नज़र रखी.उनमें से कुछ हिट रहीं और कुछ सुपर फ्लॉप साबित हुईं.आदित्य चोपड़ा ने इन आठ सालों में अपना स्टूडियो भी खड़ा किया। यह मुम्बई का आधुनिकतम स्टूडियो है.इस कार्य में उनकी पत्नी पायल का भरपूर सहयोग रहा।
पायल का जिक्र आ गया तो चवन्नी आप को बता दे कि आदित्य और पायल के संबंध में तनाव आया था.कारण रानी मुख़र्जी को माना गया था .बात तो तलाक तक आ गयी थी और यह भी खबर फैली थी कि उनके पिता यश चोपड़ा बहु पायल को पुराना स्नेह ही देते हैं और आदित्य ने किसी होटल को शरणगाह बना लिया है.लगता है अब उनके जीवन की उथल-पुथल ख़त्म हो गयी है।
वैसे भी सवाल किया जा रहा था कि चमत्कारी निर्देशक को क्या हो गया कि वह फिर से कोई फिल्म निर्देशित नहीं कर रहा है.पिछले आठ सालों में यशराज फिल्म्स की कोई फिल्म चली तो उसका श्रेय निर्देशक और लेखक ले गए.फिल्म फ्लॉप हुई तो सारा इल्जाम आदित्य चोपड़ा के माथे चढ़ा।' चक दे इंडिया ' का उदाहरण सामने है,सभी ने लेखक जयदीप सहनी और निर्देशक शिमित अमीन की ही तारीफ की।
अब आदित्य चोपड़ा ने कमर कस ली है और वे ' रब ने बना दी जोड़ी ' लेकर आ रहे हैं.इस में उनके चहेते स्टार शाहरुख़ खान रहेंगे.किसी नयी लड़की को उनके साथ रखने की बात चल रही है.कहा जा रहा है कि भारतीय सौन्दर्य से परिपूर्ण किसी लड़की को लिया जाएगा।
अब क्या यह अतना जरूरी है कि ' रब ने बना दी जोड़ी ' रोमांटिक लव स्टोरी है?

Friday, February 1, 2008

जोधाबाई,हरखा बाई या हीरा कुंवर?

जोधा अकबर की रिलीज में अभी दो हफ्ते की देर है.एक विवाद छेड़ा गया है कि अकबर के साथ जिसकी शादी हुई थी, उस राजपूत राजकुमारी का नाम जोधा बाई नहीं था.एक जाति विशेष के संगठन ने आपत्ति की है और आह्वान किया है कि राजस्थान में इस फिल्म को नहीं चलने देंगे.हो सकता है कि वे अपने मकसद में कामयाब भी हो जाएँ,क्योंकि जब भी किसी फिल्म पर इस तरह की सुपर सेंसरशिप लगी है तो सरकार पंगु साबित हुई है।

सवाल है कि अगर राज परिवार के वंशजों को इस नाम पर आपत्ति नहीं है तो बाकी लोगों को इस नाम के उपयोग से गुरेज क्यों है?क्या यह सिर्फ आत्मप्रचार के लिए छेड़ा गया विवाद है?अगर आपत्ति करने वाले जोधा के नाम नाम को लेकर गंभीर हैं तो उन्हें पहले मुगलेआज़म पर सवाल उठाना चाहिए.१९६० में बनी इस फिल्म ने भारतीय मानस में जोधा और अकबर की ऐसी छवि बिठा दी है कि आशुतोष गोवारिकर के अकबर बने रितिक रोशन और जोधा बनी ऐश्वर्या राय को दिक्कत हो रही है।

अपने देश में फिल्मों के साथ विवादों का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है.कोई भी कहीं से उठता है और अपनी उंगली दिखा देता है.बाकी लोग भी उसे देखने कगते हैं और फिल्मकार की सालों की मेहनत एकबारगी कठघरे में आ जाती है।

चवन्नी इस स्थिति को सही नहीं मानता.