Search This Blog

Thursday, January 31, 2008

कैरेक्टर में ढलने की जरूरत क्यों?

-अजय ब्रह्मात्मज


यह खबर लोगों ने पढ़ी और देखी जरूर होगी। मधुर भंडारकर चाहते हैं कि उनकी फिल्म की नायिका किसी मॉडल की तरह छरहरी दिखे। इसी कारण वे प्रियंका चोपड़ा पर वजन कम करने का दबाव भी डाल रहे हैं। कहा जा रहा है कि शूटिंग के पहले प्रियंका को अपना वजन आठ किलोग्राम घटाना है। वे अभी तक आधे में पहुंची हैं। इस खबर के पीछे का सच यह है कि आजकल निर्देशक चरित्रों के अनुसार एक्टर के कायिक परिवर्तन पर बहुत जोर दे रहे हैं। दरअसल, एक्टर भी इससे आ रहे फर्क को महसूस करने के बाद ऐसे परिवर्तन के लिए सहज ही तैयार हो जा रहे हैं।

ज्यादा पीछे न जाएं और पिछले साल की फिल्मों को याद करें, तो तीन एक्टर इस नए ट्रेंड के सबूत के तौर पर दिखते हैं। गुरु में अभिषेक बच्चन, ओम शांति ओम में शाहरुख खान और तारे जमीं पर में आमिर खान॥। सच तो यह है कि इन तीनों ने ही फिल्म के चरित्र के अनुसार अपना वजन बढ़ाने और घटाने के साथ ही शरीर पर अलग ढंग से मेहनत भी की। गुरु के मुख्य किरदार के लिए अभिषेक बच्चन को अपना वजन बढ़ाना पड़ा। मध्यांतर के बाद में वे काफी तोंदिले और मोटे दिखाई पड़ते हैं। तोंद तो विशेष मेकअप से बनाई गई थी, लेकिन मोटापा उन्होंने अर्जित किया था। इसी प्रकार ओम शांति ओम में अपने सिक्स पैक एब को दिखाने के लिए शाहरुख ने महीनों वर्जिश भी की और विशेष खाद्य और पेय पदार्थो का सेवन किया। बयालीस की उम्र में ऐसा गठीला बदन बनाना और दिखाना सचमुच मुश्किल काम है। शाहरुख की महीनों की मेहनत बेकार नहीं गई। इस फिल्म को देखने के लिए दर्शकों की भीड़ टूट पड़ी और अगर पत्र-पत्रिकाओं की खबरों पर यकीन करें, तो ओम शांति ओम के बाद शाहरुख के महिला प्रशंसकों की संख्या और बढ़ गई है। तारे जमीं पर में आमिर खान को शिक्षक बनना था, इसलिए उन्होंने भी चोला बदला। हालांकि क्लोजअप शॉट में उनकी उम्र चेहरे से झांकती रही, लेकिन बाकी दृश्यों में वे जंचे।

माना जा रहा है कि आज के डायरेक्टर और एक्टर बेहद प्रोफेशनल हो गए हैं। इसलिए वे कैरेक्टराइजेशन पर बहुत जोर देते हैं। ऊपरी तौर पर यह सही भी लगता है, लेकिन लोग दो बीघा जमीन देखें और उसी के आगे-पीछे के वर्षो में बनी बलराज साहनी की कोई और फिल्म देखें, तो पाएंगे कि दो बीघा जमीन में बीमार और कमजोर रिक्शेवाले की भूमिका निभाने के लिए बलराज साहनी ने अपनी काया बदली थी। चूंकि बलराज साहनी उस जमाने की त्रयी (दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद) की तरह स्टार नहीं थे, इसलिए उन्होंने ऐसी मेहनत की। इसके अलावा, वे अभिनय की यथार्थवादी परंपरा से अभिभूत थे। खुद देव आनंद ने गाइड के क्लाइमेक्स के लिए अपना वजन कम किया था। पहले केवल सीरियस किस्म के एक्टर ही कैरेक्टराइजेशन के लिए इसे जरूरी मानते थे। लोग गौतम घोष की फिल्म पार देखें। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह ने अपना वजन कम किया था और बाल भी कटवाए थे।

कैरेक्टराइजेशन पर आमिर खान ने सबसे पहले ध्यान दिया। गुलाम और सरफरोश के बाद वे अपनी हर फिल्म के साथ लुक बदलते हैं और जरूरत के मुताबिक वजन भी घटाते और बढ़ाते हैं। इस बदलाव के बाद उन्हें कामयाबी पाते देख दूसरे एक्टरों ने भी इस पर अमल करना शुरू किया। अब यह घोषित ट्रेंड बन गया है। इन दिनों एक्टर इस संबंध में बताते हुए खूब इतराते हैं।

निजी जिंदगी में वैसे शरीर पर ध्यान देने का फैशन संजय दत्त और सलमान खान से आरंभ हुआ। इन दोनों एक्टरों ने देश भर में जिम कल्चर फैला दिया। इनके बाद रितिक रोशन ने स्वस्थ शरीर का जम कर प्रचार किया और कसरत की कद्र बढ़ा दी। इसके बावजूद इन दिनों रणबीर कपूर जैसे भी एक्टर हैं, जो यह जरूरी नहीं समझते कि एक्टर को मांसपेशियां दिखानी चाहिए। हां, वे यह जरूर मानते हैं, अगर किसी किरदार के लिए मुझे सिक्स पैक एब की जरूरत पड़ी, तो तीन महीने के अभ्यास के बाद मैं खुद को जरूर ढाल लूंगा।

सिगरेट और शाहरुख़ खान

शाहरुख़ खान ने कहा कि फिल्मों में सिगरेट पीते हुए कलाकारों को दिखाना कलात्मक अधिकार में आता है और इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए.अगर आप गौर से उस समाचार को पढें तो पाएंगे कि एक पंक्ति के बयान से खेला गया है.फिल्म पत्रकारिता की यही सामाजिकता है।

हमेशा बहस कहीं और मुड़ जाती है.सवाल फिल्मों में किरदारों के सिगरेट पीने का नहीं है.सवाल है कि आप उसे अपने प्रचार में क्यों इस्तेमाल करते हैं.क्या पोस्टर पर स्टार की सिगरेट पीती तस्वीर नहीं दी जाये तो फिल्म का प्रचार नहीं होगा ?चवन्नी ने देखा है कि एक ज़माने में पोस्टर पर पिस्तौल जरूर दिखता था.अगर फिल्म में हत्या या बलात्कार के दृश्य हैं तो उसे पोस्टर पर लाने की सस्ती मानसिकता से उबरना होगा. फिल्म के अन्दर किसी किरदार के चरित्र को उभारने के लिए अगर सिगरेट जरूरी लगता है तो जरूर दिख्यें.लेकिन वह चरित्र का हिस्सा बने,न कि प्रचार का।

शाहरुख़ खान इधर थोड़े संयमित हुए हैं.पहले प्रेस से मिलते समय कैमरे के आगे वे बेशर्मों की तरह सिगरेट पीते रहते थे.इधर होश आने पर उन्होंने कैमरे के आगे सिगरेट से परहेज कर लिया है.चवन्नी को याद है एक बार किसी टॉक शो में उन्होंने इसी सवाल पर कहा था कि मैं अपने प्रशंसकों को को सिगरेट पीने के लिए नहीं कहता.यह मेरी व्यक्तिगत पसंद है.आप क्यों अपनाते हैं?अब उन्हें कौन समझाए कि एक स्टार अगर सार्वजनिक तौर पर सिगरेट पीता है तो उसका क्या असर होता है?

इस मामले में उन्हें आमिर खान से सीखना चाहिए.तारे ज़मीन पर की रिलीज के समय आमिर ने यह लत पकड़ ली थी,लेकिन उस फिल्म के धुआंधार प्रचार में वे कहीं भी सिगरेट पीते नज़र नहीं आये.अमिताभ बच्चन पर जब आपत्ति की गयी थी तो उन्होंने माफ़ी माँग ली थी.

सिगरेट और शाहरुख़ खान

Wednesday, January 30, 2008

छोटे कद का उम्दा कलाकार

चवन्नी राजपाल यादव की बात कर रहा है।

राजपाल यादव को पहली बार दर्शकों ने प्रकाश झा के सीरियल मुंगेरी के भाई नौरंगी लाल में देखा था.वे सभी को पसंद आये थे.लोगों ने पूछा भी था कि प्रकाश झा कहाँ से मुंगेरी लाल यानी रघुबीर यादव के छोटे भाई को खोज कर ले आये. शयद सरनेम की समानता के कारण ऐसा हुआ था और दोनों की कद-काठी भी मिलती थी.वैसे दोनों ही राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र रहे हैं।

राजपाल को फिल्मों का पहला मौका इ निवास की फिल्म शूल में मिला.इस फिल्म में राजपाल यादव ने कुली का छोटा सा रोल किया था.राम गोपाल वर्मा को वह जंच गए.रामू ने उन्हें फिर जंगल में थोड़ा बड़ा रोल दिया.इस फिल्म में वह मुख्य खलनायक सुशांत सिंह से ज्यादा चर्चित हुए.देखते ही देखते राजपाल यादव के पास काम की कमी नहीं रही.उन दिनों राजपाल यादव से चवन्नी की लगातार मुलाकातें होती थीं या कम से कम हर फिल्म की रिलीज के समय बात होती थी कि फिल्म कैसी लगी?

इधर राजपाल की फिल्मों की संख्या बढ़ती गयी और उसी अनुपात में वार्तालाप छोटी और कम होती गयी.अब केवल गाहे-बगाहे कभी बात हो जाती है.चवन्नी अपने परिचित कलाकारों की ऐसी व्यस्तता से खुश होता है.राजपाल यादव ने कहा था कि वह हिन्दी फिल्मों का हीरो बनना चाहते हैं.तब यह बात कई लोगों को छोटे मुँह बड़ी बात लगी थी.लेकिन राजपाल ने साबित किया कि फिल्मों में जगह पाने के लिए कद-काठी से अधिक प्रतिभा की ज़रूरत रहती है।

राजपाल यादव की अगली फिल्म रामा रामा क्या है ड्रामा इस शुक्रवार को रिलीज हो रही है.राजपाल की कुछ फिल्में यादगार हैं.मैं,मेरी पत्नी और वो;मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूँ;वक़्त;आदि आदि.राजपाल यादव ने फिल्में लेते समय किरदार की लम्बाई-चौड़ाई या रुप-रंग पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.उनकी फिल्मों की संख्या १०० के लगभग पहुंच रही होगी.उनहोंने नाम,शोहरत और पैसे कमा लिए हैं.लेकिन इसके साथ ही वे हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के कुचक्र के शिकार भी हो गए है.हर तरह की फिल्म करने के चक्कर में उनकी प्रतिभा का उपयोग नहीं हो पा रहा है।

रघुबीर यादव और राजपाल यादव में यह बड़ा फर्क है.राजपाल ने धारा के साथ चलना स्वीकार किया,जबकि रघुबीर यादव किनारे बैठ कर फिल्मों की धारा देखते रहे.किसने सही किया?यह वक़्त बताएगा.चवन्नी इसी बात से खुश है कि रघुबीर यादव और राजपाल यादव ने एक मुकाम पाया और कई लोगों के लिए प्रेरणा बने.

Tuesday, January 29, 2008

फिल्मी चलन- एक प्रतिनिधि इंटरव्यू

इन दिनों फिल्म स्टार इंटरव्यू देने से भागते हैं.बेचारे पत्रकारों की समस्या का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.आम तौर पर फिल्म पत्रकारों को ही दोषी माना जाता है और कहा जाता है कि उनके पास सवाल नहीं रहते.ऊपर से फिल्म बिरादरी के लोग शिक़ायत करते हैं कि हम से एक ही तरह के सवाल पूछे जाते हैं।

चलिए आपको चवन्नी बताता है कि आम तौर पर ये इंटरव्यू कैसे होते हैं.मान लीजिये एक फिल्म 'मन के लड्डू' रिलीज हो रही है.इसमें कुछ बड़े कलाकार हैं.बड़ा बैनर और बड़ा निर्देशक भी है.फिल्म की रिलीज अगर १ मार्च है तो १५ फरवरी तक प्रोड्यूसर की तरफ से फिल्म का पी आर ओ एक मल्टी मीडिया सीडी भेजेगा.इस सीडी में चंद तस्वीरें,फिल्म की कहानी और फिल्म के कलाकारों की लिस्ट रहती है.इधर सीडी मिली नहीं कि अख़बारों में उसके आधार पर पहली झलक आने लगती है.न प्रोड्यूसर कुछ बताता है और न निर्देशक को फुरसत रहती है.अमूमन फिल्म की रिलीज के दो दिनों पहले तक फिल्म पर काम ही चल रहा होता है।

बहरहाल,इसके बाद तय किया जाता है कि फिल्म के स्टार इंटरव्यू देंगे.पत्रकार से पूछा जाता है कि क्या आप इंटरव्यू करना चाहेंगे?अब कौन मना करेगा?बताया जाता है कि आप १८ फरवरी को शाम में ६ बजे प्रोड्यूसर के ऑफिस में आ जाइये.वहाँ १०-१० के कमरे में सारे पत्रकार बिठा दिए जाते हैं.प्रोड्यूसर थोडा उदार हुआ तो चाय,ठंडा,पानी का इन्तेजाम कर देगा.अब सारे पत्रकार इंतज़ार शुरू करते हैं.पी आर ओ का आदमी बार-बार बताता रहेगा कि बस स्टार चल चुका है.मुम्बई की ट्रैफिक का बहाना बना कर आराम से हीरो दो घंटे देर से मुस्कराता हुआ पहुंचेगा.परिचित और सीनियर पत्रकारों से हाथ मिला कर वह सभी के गुस्से को शांत कर देगा.फिर इंटरव्यू शुरू होगा.वह मुखिया की तरह मध्य में बैठ जाएगा और पंचों और गाँव के लोगों की तरह सारे पत्रकार उसे घेर लेंगे।

अरे हाँ पी आर ओ का आदमी पहले ही बता देगा कि आप कोई पर्सनल सवाल नहीं पूछेंगे.सवाल सिर्फ फिल्मों से संबंधित हो.किसी पर्सनल सवाल से स्टार का मूड ऑफ़ हो गया तो मुश्किल होगी,क्योंकि इंटरव्यू नहीं होगा।

पहला सवाल-आप को इस रोल में क्या खास लगा?
स्टार-बहुत जबरदस्त रोल है.मैंने पहले कभी ऐसा रोल नहीं किया.मैं निर्देशक का एहसानमंद हूँ कि उन्होने मुझे इसके लिए चुना.इस रोल का ग्रे शेड मुझे पसंद है.अब आप ही बताएं कि है न जबरदस्त रोल।
(पत्रकारों के बीच फुसफुसाहट होती है ...हाँ...हाँ..सभी अपनी खीसें निपोर देते हैं।)
दूसरा सवाल-क्या रोल है और अगर कहानी बता सकें?
स्टार-कहानी तो मैं नहीं बता सकता.आप फिल्म देखें.हाँ,मेरे किरदार का नाम मनोज है और इस रोल के लिए मुझे वजन घटाना पड़ा.तीन महीने की मेहनत और कसरत से यह हो सका.हाँ,मेरे कपड़े विक्रम ने डिजाईन किये हैं.उनमें खास बात है.वे किरदारों के अनुरूप कपडे डिजाईन करते हैं.इतना ही कह सकता हूँ कि फिल्म की कहानी जबरदस्त है और बिल्कुल नए तरीके से निर्देशक ने इसे चित्रित किया है।
तीसरा सवाल-फिल्म की नायिका के बारे में क्या कहेंगे?
स्टार-जी उनकी क्या तारीफ करूं.वह बहुत सहयोग करती है.उनके रहने पर सेट का माहौल बहुत खुशगवार रहता है.मैंने उनके नखरों के बारे में सुना था,लेकिन मुझे कभी ऐसा एहसास नहीं हुआ।
चौथा सवाल-और फिल्म के निर्देशक?
स्टार-उन्हें मालूम रहता है कि उन्हें क्या चाहिए.वह हम कलाकारों को निखरने का मौका देते है.बहुत फ़ोकस होकर काम करते हैं.आप यकीन मानें अभी कोई ऐसा निर्देशक नहीं है ,जो उनके जैसा काम कर सके।
पांचवां सवाल-शूटिंग कैसी रही?
स्टार-घरेलू माहौल था.बिल्कुल पिकनिक जैसा रहा.पता ही नहीं चला और शूटिंग खत्म हो गयी।अच्छा दोस्तों मैं थोडा जल्दी में हूँ...अगर और कोई सवाल हो तो फ़ोन कर लीजियेगा.स्टार किसी और का मोबाइल नंबर देकर चलता बनेगा...

चवन्नी ने स्टार के जवाब थोड़े छोटे कर दिए हैं.क्योंकि स्टार इसी को रबड़ की तरह खींच कर बताता है.और भी सवाल-जवाब होते हैं.उन पर फिर कभी।

इसके बाद पत्रकारों का काम शुरू होता है.वे इसे विशेष इंटरव्यू बताते हैं और अपनी तरफ से जोड़कर इसे पठनीय और रोचक बनाते हैं.किसी फिल्म की तरह ही इस तरह के ज्यादातर इंटरव्यू सच पर आधारित कल्पना से तैयार किया जाता है.उद्देश्य एक ही है कि मनोरंजन हो.पाठक पढें तो मनोरंजित हों.

Monday, January 28, 2008

शाहरुख़ खान को फ़्रांस का सम्मान

शाहरुख़ खान को कल रात फ़्रांस के राजदूत जेरोम बोनाफों ने फ़्रांस के प्रतिष्ठित insignia of officer in the order of arts & letters से सम्मानित किया.उन्हें यह सम्मान इसलिए दिया गया है कि उन्होंने कला और साहित्य के क्षेत्र में प्रसिद्धि पायी है और फ़्रांस एवं शेष दुनिया में उसे प्रचारित भी किया है.यह हिन्दी फिल्मों का जलवा है.शाहरुख़ खान को इतराने का यह मौका उसी हिन्दी फिल्म ने दिया है,जिसमें बोलने और बात करने से वे कतराते हैं.उस पर चवन्नी फिर कभी विस्तार से बताएगा।

कल रात मुम्बई के एक पंचसितारा होटल में यह सम्मान दिया गया.फ़्रांस के राजदूत महोदय ने आश्वस्त किया कि भविष्य में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्मों को ज्यादा तरजीह दी जायेगी.कोशिश रहेगी कि कान फिल्म महोत्सव में भारत की फिल्में आमंत्रित की जाएँ.राजदूत महोदय ने स्वीकार किया कि फ़्रांस अभी तक भारतीय फिल्मों को अधिक तवज्जो नहीं दे रहा था।

इस अवसर पर शाहरुख़ खान ने फ्रांसीसी फिल्मों की तारीफ की और जोर देकर कहा कि हर दर्शक और फिल्मकार को फ़्रांस की फिल्में देखनी चाहिए.उन्होंने बगैर किसी शर्म के बताया कि वे दिल्ली में जवानी के दिनों में फ्रांसिसी फिल्में देखा करते थे.देखने के मुख्य वजह उन फिल्मों के प्रणय दृश्य होते थे।

फ़्रांस के अपने अनुभव बांटते हुए उनहोंने बताया कि उन्हें इस बात का एहसास है कि वे फ़्रांस में काफी पॉपुलर हैं.एक बार वे मशहूर रित्ज़ होटल में ठहरे थे.होटल से निकलने लगे तो भीड़ उमड़ पड़ी.किसी ने कहा कि यह टॉम क्रूज़ नहीं है ,फिर इतनी भीड़ क्यों?थोडी देर में भीड़ का एक और रेला शाहरुख़ खान और एस आर के चिल्लाता हुआ आया और सवाल पूछने वाला उस लहर में खो गया.

Sunday, January 27, 2008

चोली में फुटबाल

माफ़ करें अगर ऐसे गानों और गब्बर सिंह जैसी फिल्मों से भोजपुरी सिनेमा आगे बढ़ रहा है तो बहुत गड़बड़ है.कहीं भोजपुरी सिनेमा किसी गड्ढे में गिरकर तो आगे नहीं बढ़ रहा है.भोजपुरी फिल्मों में अश्लील गीतों और उसी के मुताबिक अश्लील मुद्राओं पर बहुत जोर रहता है।क्या सचमुच दर्शक यही चाहते हैं?

चवन्नी की समझ में एक बात आ रही है कि भोजपुरी सिनेमा के दर्शक मुख्य रुप से पुरुष हैं.उनकी अतृप्त यौन आकांक्षाओं को उकसा कर पैसे बटोरे जा रहे हैं.यह अच्छी बात नहीं है.भोजपुरी इलाक़े के बुद्धिजीवियों को हस्तक्षेप करना चाहिए.वक़्त आ गया है कि हम भोजपुरी सिनेमा की मर्यादा तय करें और उसे इतना शिष्ट बनायें कि परिवार की बहु-बेटियाँ भी उसे देख सकें।

शीर्षक में आये शब्द गब्बर सिंह नाम की फिल्म के हैं.इसमें चोली में बाल,फुटबाल और वोलीबाल जैसे शब्दों का तुक भिडा़या गया है.इस गाने में फिल्म के दोनो नायक और लिलिपुट जैसे वरिष्ठ कलाकार अश्लील तरीके से नृत्य करते नज़र आये हैं.कृपया इस तरफ ध्यान दें और अपनी आपत्ति दर्ज करें।

भोजपुरी सिनेमा को गंगा,बियाह,गवना,बलमा,सैयां आदि से बाहर आने का समय आ गया है.बाबु मनोज तिवारी और बाबु रवि किशन भी इस दिशा में पहल कर सकते हैं.

Friday, January 25, 2008

कॉमेडी, थ्रिलर और एक्शन यानी संडे

-अजय ब्रह्मात्मज

कॉमेडी, थ्रिलर और एक्शन तीनों को उचित मात्रा में मिला कर रोहित शेट्टी ने अपने किरदारों के साथ ऐसा घोला कि एक मनोरंजक फिल्म तैयार हो गई है। रोहित ने पारंपरिक तरीके से एक-एक कर अपने प्रमुख किरदारों को पेश किया है। किरदारों को स्थापित करने के बाद उनके ट्रैक आपस में मिलना शुरू करते हैं। शुरू में एक कंफ्यूजन बनता है, जो इंटरवल तक सस्पेंस में तब्दील हो जाता है।

फिल्म के शुरू में चेजिंग होती है। उस समय हीरो राजवीर चांदनी चौक की गलियों, मुंडेरों और छतों पर दौड़ता-छलांग लगाता दिखाई पड़ता है। फिल्म के अंत में भी चेज है, लेकिन वह कारों में हैं। कारें नाचती हुई पलटती हैं। कारों को उड़ाने, पलटाने और ध्वस्त कराने में रोहित को आनंद आता है।
सहर (आयशा टाकिया) और राजवीर (अजय देवगन) की इस प्रेम कहानी में कुमार (इरफान खान) और बल्लू (अरशद वारसी) भी आते हैं। सहर की जिंदगी से एक संडे मिसिंग है और फिल्म का सस्पेंस इसी संडे से जुड़ा है। इरफान खान ने स्ट्रगलिंग एक्टर का सुंदर काम किया है। आखिरकार वे भोजपुरी फिल्मों के सिंगिंग स्टार बन जाते हैं, लेकिन इस उपलब्धि को छोटी नजर से पेश किया गया है। फिल्म का सस्पेंस कहानी में धीरे से घुस जाता है और सारे किरदारों को अपनी ओर मोड़ लेता है। फिर सस्पेंस को खोलने और सुलझाने में राजवीर और उसके सहयोगी अनवर (मुकेश तिवारी) की तरकीबें रोचक तरीके से सामने आती हैं।

इरफान खान के किरदार में और भी संभावनाएं थीं। उनकी कॉमिक प्रतिभा का और सुंदर इस्तेमाल हो सकता था। फिर भी जितने दृश्य उन्हें मिले हैं, उनमें इरफान अपनी मसखरी से संतुष्ट करते हैं। अरशद वारसी इस बार कभी लाउड तो कभी किरदार से अलग होते से दिखे। अजय देवगन कॉमिक दृश्यों में फबते हैं। आयशा टाकिया को उलझनों से भरी एक लड़की का किरदार निभाना था। वह इसे निभा ले जाती हैं।

गीत-संगीत कहानी के अनुरूप है। थोड़ी मौज-मस्ती और चुहलबाजी गानों में दिखाई पड़ती है। हां, आयटम सौंग में तुषार कपूर और ईशा देओल कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते। फिल्म के अंत में जोड़ी गई मेकिंग की फुटेज भी रोचक है।

चवन्नी की सलाह :देख सकते हैं

Thursday, January 24, 2008

शुरू हो फिल्मों की पढ़ाई

-अजय ब्रह्मात्मज

अब स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में फिल्मों को पाठ्यक्रम में शामिल करने का वक्त आ गया है। दरअसल, आज फिल्में हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन गई हैं। हर व्यक्ति फिल्में देखता है और यही वजह है कि फिल्में और उनके स्टार हमारी बातचीत और विमर्श का हिस्सा बन गए हैं। फिल्मों के इस प्रसार और प्रभाव के बावजूद अभी तक सामाजिक स्तर पर फिल्मों के प्रति हमारा रवैया सहज नहीं हो पाया है, क्योंकि इसे एक विषय के तौर पर पाठ्यक्रम में शामिल करने को हम तैयार नहीं हैं। कुछ विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र कोर्स या किसी कोर्स के हिस्से के तौर पर सिनेमा की पढ़ाई आरंभ जरूर हो गई है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।

इन दिनों हर तरह की प्रतियोगिता की परीक्षाओं में सिनेमा से संबंधित सवाल पूछे जाते हैं। इन प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थी अपने सामान्य ज्ञान या उपलब्ध सीमित जानकारियों के आधार पर ही जवाब देते हैं। अभी तक कोई व्यवस्थित पुस्तक या संदर्भ स्रोत नहीं है, जहां से विधिवत और क्रमिक जानकारी ली जा सके। फिल्मों पर आ रही पुस्तकें मुख्य रूप से स्टार या फिल्म पर ही केंद्रित होती हैं, क्योंकि ट्रेंड, इतिहास और प्रवृत्तियों को लेकर पुस्तकें लिखने का चलन नहीं है। प्रकाशक भी हीरोइनों की रसदार जीवनी में रुचि दिखाते हैं। उनसे किसी पीरियड या ट्रेंड पर किताब की बात करें, तो सीधा जवाब होता है कि हिंदी में कौन पढ़ता है ऐसी पुस्तकें? अब सवाल यह उठता है कि पहले पुस्तकें छपेंगी, तभी तो पता चलेगा कि उसके पाठक हैं या नहीं? इधर जरूरत महसूस की जा रही है कि दर्शकों में सिने संस्कार लाने के लिए उन्हें फिल्मों के इतिहास की सही जानकारी दी जाए। फिल्म एप्रिसिएशन के कोर्स छोटी कक्षाओं के लिए भी तैयार किए जाएं, ताकि दर्शकों की रुचि विकसित हो सके।

चूंकि बचपन से हम लोकप्रिय सिनेमा के नाम पर ज्यादातर फूहड़, अश्लील और घटिया फिल्में देखकर आनंदित होते रहते हैं, इसलिए हमारा सिने संस्कार भी वैसा ही हो जाता है। हमें साधारण किस्म की मनोरंजक फिल्में अच्छी लगती हैं। अगर किसी फिल्म में मुद्दे और महत्व की बातें हों, तो हम उन्हें गंभीर का दर्जा देकर किनारे कर देते हैं। बेहतरीन फिल्में सिर्फ आभिजात्य और शिक्षित समूह तक ही सीमित रह जाती हैं। ऐसा मान लिया गया है कि पढ़े-लिखे लोगों का सिनेमा अलग होता है और सिनेमा का आम दर्शक चालू किस्म की फार्मूला फिल्में ही पसंद करता है। इस धारणा को हमारे निर्माता, निर्देशक और स्टार अपनी सुविधा और फायदे के लिए हमेशा पुष्ट करते रहते हैं। निश्चित तौर पर हर दौर में बेहतरीन फिल्मों का प्रतिशत कम रहता है। दर्शकों के बीच फिल्मों का ज्ञान बढ़ाकर अच्छी और खराब फिल्मों का भेद बताकर और सिनेमा की समझ पैदा कर हम दर्शकों को बेहतरीन सिनेमा से जोड़ सकते हैं। अगर देश के विशिष्ट और अविवादित फिल्मी हस्तियों और सार्थक व खूबसूरत फिल्मों से हम उन्हें परिचित कराएं, तो अवश्य फर्क आएगा। सामाजिक जीवन और पाठ्यक्रम में फिल्मों से परहेज कर हम दर्शकों को यथास्थिति में ही रखेंगे। दरअसल.. जरूरत है कि हम फिल्मों को सहेज कर रखें और उसकी शिक्षा दें।

रिया की पार्टी में नहीं आएंगे रुश्दी

चवन्नी कल रात से ही परेशान था .उसे बताया गया था कि रिया सेन की जन्मदिन पार्टी में सलमान रुश्दी आ रहे है.मायानगरी मुम्बई के लिए यह बड़ी घटना है और चवन्नी को इस पर नज़र रखनी चाहिए.चवन्नी ने अपना चश्मा साफ किया और कल रात जल्दी सो गया ताकि ताज़ा दिमाग से पूरे मामले को देख और समझ सके.सलमान रुश्दी सिर्फ लिख कर ही परेशान नहीं करते.वे देख कर भी दुखी करते हैं.अब इसी प्रसंग को लें.पद्मा लक्ष्मी से बिछुड़े अभी कुछ ही महीने हुए होंगे और जनाब रिया सेन के रसिक हो गए।

हुआ यों कि परमेश्वर गोदरेज की एक पार्टी में शामिल होने के लिए वे मुम्बई आये थे.बड़े लोगों की उस पार्टी में कई बड़ी हस्तियाँ थीं.वहीं अपनी सेन सिस्टर्स रिया और राइमा भी थीं.दोनों आकर्षक हैं,जवान हैं और नैन मटक्का करने में उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं होती.वास्तव में चवन्नी की मध्यवर्गीय बिरादरी की यह समस्या है कि कोई पुरुष किसी स्त्री से थोडा अंतरंग हो जाता है तो खबर फैल जाती है कि आग लगने वाली है,क्योंकि धुआं दिखा है.चवन्नी को लगता है कि यह धुआं उन पत्रकारों के दिमाग में रहता है जो भावनात्मक रुप से असुरक्षित ज़िंदगी जी रहे होते हैं.उस पर अलग से और कभी बात होगी।

रिया और रुश्दी के प्रसंग में नया पेंच यह है कि रुश्दी साहब का दिल रिया और राइमा की अम्मा मुनमुन सेन पर आया है.और वहाँ तक पहुँचने के लिए उन्हें बेटियों का जरिया आसान लगा.पार्टी के दौरान उन्होंने थोडी रूचि और अंतरंगता दिखाई.लगे हाथ रिया ने उन्हें अपने जन्मदिन के लिए आमंत्रित कर लिया.रुश्दी जैसा व्यक्ति भला क्यों रिया का दिल तोड़ता?उन्होंने कहा कि जरूर आएंगे.खबर फैल गयी।

ताज़ा खबर है कि सलमान रुश्दी चुपके से अपने ठिकाने को रवाना हो गए और अब रिया सफ़ाई देत फिर रही हैं कि ऐसी तो कोई बात ही नहीं थी.चवन्नी खुश है कि चलो राहत मिली.

Wednesday, January 23, 2008

दिल्ली,लाहौर और मुम्बई पर बन रही फिल्में

भारत और पाकिस्तान के ये तीन महानगर हैं.लाहौर तो किसी ज़माने में शिक्षा और संस्कृति के साथ व्यापर का भी केन्द्र हुआ करता था.देश के विभाजन के साथ पंजाब का भी विभाजन हुआ और लाहौर लहूलुहान हो गया.आज तक लाहौर रिस रहा है.उस पर कभी और चर्चा करेगा चवन्नी...लेकिन चवन्नी क्यों चर्चा करे?

चवन्नी को पता चला है कि लाहौर की पृष्ठभूमि पर हिन्दी में तीन फिल्मों की तैयारी चल रही है.इनमें से दो फिल्मों की कहानी तो हीरामंडी के इर्द-गिर्द घूमती हैं और तीसरी का संबंध विभाजन से है.पूजा भट्ट की फिल्म हीरामंडी पर ही केन्द्रित है और इस में आशुतोष राणा फिर से एक खतरनाक खलनायक की भूमिका निभाने जा रहे हैं.उम्मीद है कि फ़रवरी में इस फिल्म की शूटिंग आरंभ हो जायेगी.संजय लीला भंसाली ने भी एक फिल्म प्लान की है.उनकी फिल्म में मुमकिन है रानी मुख़र्जी शीर्ष भूमिका निभाएं,संजय के व्यक्तित्व की तरह यह फिल्म अभी तक रहस्य में है.मालूम नहीं कब शुरू होगी फिल्म?लाहौर पर बन रही तीसरी फिल्म होगी राज कुमार संतोषी की.घोषणाएं करने में अव्वल संतोषी की फिल्म असगर वजाहत के नाटक जिस लाहौर नइ देख्या ... पर आधारित है.इस फिल्म के लिए संतोषी ने सैफ अली खान से बात की थी,लेकिन उनहोंने मन कर दिया है.मालूम नहीं रतन की माँ का रोल संतोषी किसे दे रहे हैं?इस नाटक को पढ़ते हुए गुलज़ार के मेरे अपने की मीना कुमारी याद आ जाती हैं.क्या है कोई अभिनेत्री जो मीना कुमारी का किरदार निभा ले?

चवन्नी अब बात करेगा दिल्ली की-दिल्ली पर भी तीन फिल्में बन रही हैं.दिली-६,चांदनी चौक टू चाइना और दिल्ली बेली.दिल्ली-६ की शूटिंग चालू हो गयी है.फ़िलहाल जयपुर में अभिषेक बच्चन और सोनम कपूर के साथ राकेश मेहरा फिल्म के खास दृश्य वहाँ फिल्मा रहे हैं.दिल्ली-६ चांदनी चौक का पिन कोड है.निखिल अडवानी की चांदनी चौक टू चाइना भी चांदनी चौक से शुरू होगी.इस में अक्षय कुमार और दीपिका पादुकोन भी हैं. तीसरी फिल्म के निर्माता आमिर खान हैं और वे मुख्य भूमिका भी निभाएंगे .दिल्ली बेली वास्तव में दिल्ली की अंतड़ियों को खोलेगी.इस फिल्म को लिखा है अक्षत वर्मा ने और इसका निर्देशन स्वीडेन के रॉबर्ट कर रहे हैं मार्च से इसकी शूटिंग आरंभ हो जायेगी।

अब अंत में मुम्बई.मुम्बई तो लगातार हिन्दी फिल्मों में दिखती रही है,लेकिन कुछ ही फिल्मों में इसका चरित्र सामने आया है.युवा निर्देशक संजय झा की फिल्म चकाचक मुम्बई -अ क्लीन लव स्टोरी में मुम्बई अलग अंदाज में दिखेगी.मुम्बई पर ही मुम्बई मेरी जान भी बन रही है.इसमें आर माधवन और इरफान खास भूमिकाएं निभा रहे हैं.इसके निर्देशक कामथ हैं,जिनकी मराठी में बनी डोंबिवली फास्ट खूब चर्चित हुई थी.

Tuesday, January 22, 2008

सलाम सलीम बाबा


चवन्नी ने यह पोस्ट पिछले साल १२ अक्टूबर को लिखी थी.चवन्नी को ख़ुशी है कि यह फिल्म ऑस्कर में श्रेष्ठ वृत्तचित्र के लिए नामांकित हुई है.चलिए उम्मीद करें कि इसे अन्तिम पुरस्कार भी मिले।

नोर्थ कोलकाता में रहते हैं सलीम बाबा. दस साल की उम्र से वे सिनेमाघरों के बाहर फेंके फिल्मों के

निगेटिव जमा कर उन्हें चिपकाते हैं और फिर चंद मिनटों की फिल्म टुकड़ियों की तरह अपने अ।सपास के बच्चों को दिखाते हैं. यह उनका पेशा है. यही उनकी अ।जीविका है. ऐसे ही फिल्में दिखाकर वे पांच बच्चों के अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं.चवन्नी को पता चला कि टिम स्टर्नबर्ग ने उन पर 14 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'सलीम बाबा' बनायी है. यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म ऑस्कर भेजी गयी थी. खुशी की बात है कि 'सलीम बाबा' अंतिम अ।ठ की सूची में अ। गयी है. अगर ज्यूरी को पसंद अ।ई तो यह नामांकित भी होगी. 'सलीम बाबा' का पूरा नाम सलीम मोहम्मद है. उन्हे अपने पिता से यह प्रोजेक्टर विरासत में मिला है. इसे हाथ से चलाया जाता है. सलीम बाबा की फिल्में देखने बच्चे जमा होते हैं. सिनेमाघरों में जाकर फिल्में देख पाने में असमर्थ बच्चे अपने चहेते स्टारों की चंद झलकियां या फिल्म टुकड़ियां देख कर ही मस्त हो जाते हैं.सलीम बाबा के पास जो हस्तचालित प्रोजेक्टर है, उस पर भी विदेशियों की नजर है. ऐसे प्रोजेक्टर दुनिया में बहुत कम बचे हैं. सलीम बाबा को इसकी मुंहमांगी कीमत मिल सकती है, लेकिन सलीम बाबा हैं कि इसे खुद से अलग नहीं करना चाहते. वे चाहते हैं कि उनके बेटे भी इस विरासत को अ।गे ले जांए. अभी उनके बेटे मदद करते हैं. लेकिन फिल्में जिस तरह से डिजीटल हो रही हैं… उस स्थिति में कुछ सालों के बाद उन्हें फिल्मों के निगेटिव कहां से मिलेंगे?'सलीम बाबा' वास्तव में सिनेमा के विकास की जिंदा कड़ी हैं. चवन्नी सलीम बाबा को सलाम करता है और चाहता है कि उनका प्रोजेक्टर सुरक्षित रहे और वह सिनेमा के मनोरंजन से वंचित बाल-बच्चों को सिनेमा से जोड़े रखे. चवन्नी टिम स्टर्नबर्ग को बधाई देता है. वह चाहता है कि 'सलीम बाबा' पहले ऑस्कर की डॉक्यूमेंट्री श्रेणी में नामांकित हो और फिर अंतिम पुरस्कार भी हासिल करे.सलाम सलीम बाबा !

७०% मत मिले अमिताभ बच्चन को

पिछले दिनों चवन्नी ने आप कि राय मांगी थी कि आप अशोक की भूमिका में अमिताभ बच्चन और अजय देवगन में किसे देखना चाहेंगे?इस बार आप की हिस्सेदारी उत्साहजनक रही.चवन्नी के पाठकों में से जिन सभी ने मतदान दिए,उन में से ७० प्रतिशत ने अमिताभ बच्चन के पक्ष में मतदान किया.अजय देवगन को केवल ३०% मतदाता ही अशोक की भूमिका में देखना चाहते हैं।
अगर आप ने मतदान नहीं किया था और अब अपनी राय देना चाहते हैं तो स्वागत है.आप टिप्पणी के रुप में अपनी राय पोस्ट करें.

Monday, January 21, 2008

आमिर खान ने सिगरेट छोड़ी और उठाए चार और कदम

आमिर खान ने अपने ब्लोग पर आज ही लिखा है कि उनहोंने आखिरकार सिगरेट पीने की बुरी आदत छोड़ दी.आपको याद होगा कि तारे ज़मीन पर की रिलीज के समय तनाव में उनहोंने सिगरेट पीनी शुरू कर दी थी.आज सुबह के पोस्ट में उनहोंने साफ लिखा है कि वे पांच कदम उठा कर अपनी दिनचर्या नियमित करने जा रहे हैं।

पहला कदम-सिगरेट की लत से तौबा.फिल्म सितारों से प्रभावित होने वाले किशोरों के लिए यह सबक है कि आप धूम्रपान की आदत एकबारगी छोड़ सकते हैं.बताने की ज़रूरत नहीं कि चवन्नी ने भी एकबारगी अपनी ३५-४० सिगरेट की आदत ८ साल पहले छोड़ी थी.हाँ,चवन्नी को दिल का झटका लगा था.चवन्नी नहीं चाहता कि उसके पाठकों को कोई झटका लगे.आप चवन्नी से नहीं तो आमिर खान से तो सीख सकते हैं।

दूसरा कदम-अपनी दिनचर्या दुरूस्त करने के लिए आमिर जल्दी सोने पर अमल करेंगे.यह एक बेहतर तरीका है कि आप सवेरे उठ कर जल्दी-जल्दी अपने काम शुरू कर दें।

तीसरा कदम-आमिर का तीसरा कदम है कि वे नियमित रुप से कसरत करेंगे.आमिर ४२ के हो चुके हैं और एक्टिंग करते है.जाहिर है उनके लिए सेहतमंद होने के साथ ही चुस्त और आकर्षक दिखना ज़रूरी है।

चौथा कदम-फिर से पौष्टिक bhojan पर ध्यान देंगे.चवन्नी जनता है कि आमिर खान नाप-तौल कर खाते हैं.यह सेहत के लिए ज़रूरी है।

पांचवां कदम-पहले चारों कदमों से पीछे न हटना.पांचवां कदम सबसे रोचक है.अगर यह उठ गया तो बाकी चार कदम उठेंगे ही।

देखा आप ने कि एक स्टार भी अपनी दिनचर्या को लेकर आम आदमी की तरह ही परेशान और दुखी रहता है.हर बार खुद को व्यवस्थित करने की ज़रूरत सभी को पड़ती है.

Sunday, January 20, 2008

एक तमाचे की झनझनाहट

एक तमाचे की ऐसी झनझनाहट की उम्मीद गोविन्दा ने तो नहीं ही की होगी.चवन्नी गोविंदा से कई दफा मिल चुका है.शोहरत की अपनी चालाकियों के बावजूद गोविंदा के अन्दर आज भी विरार का छोरा मौजूद है.निश्चित ही उस छोरे ने बदमाशी कर रहे प्रशंसक को तमाचा जड़ा होगा और अब उसका खामियाजा नेता गोविंदा झेल रहा है.अभिनेता गोविंदा को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता.दूसरे अभिनेताओं ने बड़ी-बड़ी गलतियाँ की हैं और फिर भी शान से दांत निपोरे घूमते नज़र आते हैं।

चवन्नी ने गोविंदा को उस दौर में भी करीब से देखा है,जब वे हाथ मिलाने तक से हिचकिचाते थे,उन्हें यह वहम रहता था कि कोई उनकी जान के पीछे पड़ा है और उन्हें कोई ज़हर न दे दे.गोविंदा ने विवश होकर ही तमाचा मर होगा. वैसे चवन्नी का कोई इरादा नहीं है कि वह गोविंदा के बचाव में तर्क जुटाए।

फिल्म कलाकारों को करीब से देखनेवाले जानते हैं कि कई बार प्रशंसक अजीब सी बदतमीजियां करते हैं.चवन्नी शहर का नाम नहीं लेना चाहता.वह एक बार रितिक रोशन के साथ वहाँ गया था.उसने देखा कि ५०-५५ की उम्र की औरतें,जो रितिक की माँ से छोटी नहीं होंगी...उस उम्र की महिलायें रितिक को चिकोटी काट रही हैं.चवन्नी को रितिक की रोनी सूरत आज भी याद है।

गोविंदा के तमाचे की झनझनाहट गूँज में बदल गयी है और शायद दिल्ली में भी सुनाई पड़ी है.तभी to चवन्नी के चीची भाई सफ़ाई देते फिर रहे हैं उनहोंने घोषणा की है कि वे अमिताभ बच्चन का रास्ता अख्तियार करेंगे.राजनीति छोड़ देंगे और एक्टिंग पर ध्यान देंगे.यह उनका फैसला है.ठीक ही होगा,लेकिन इस संदर्भ में उनहोंने सुनील दत्त का नाम नाहक घसीट लिया कि वे उनकी तरह राजनीति में नहीं फँसे रहेंगे,चवन्नी को लगता है कि गोविंदा की राजनीतिक समझ गड़बड़ है.

Saturday, January 19, 2008

बांबे टू बैंकाक की बकवास ट्रिप

-अजय ब्रह्मात्मज

हैदराबाद ब्लू जैसी फिल्म से करियर आरंभ कर हिंदी में इकबाल और डोर जैसी फिल्में निर्देशित कर चुके नागेश कुकनूर आखिरकार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कुचक्र के शिकार हो ही गए। अपने सुर से हट कर उन्होंने नई तान छेड़ी और उसमें बुरी तरह से असफल रहे। बांबे टू बैंकाक नागेश की अब तक की सबसे कमजोर फिल्म है।

बावर्ची शंकर सिंह (श्रेयस तलपड़े) रेस्तरां में छूट गए हैंडबैग में मोटी रकम देख कर लालच में आ जाता है। वह पैसे चुरा कर भागता है। गफलत में वह एयरपोर्ट पहुंच जाता है। फिर मौका पाकर बचने के लिए वह बैंकाक जा रहे डाक्टरों के प्रतिनिधि मंडल में शामिल हो जाता है। डॉक्टर भाटवलेकर बन कर बैंकाक पहुंचे शंकर की समस्याएं दोतरफा हैं। एक तो उसे डॉक्टरी का कोई ज्ञान नहीं है और दूसरे पहली नजर में ही उसे एक थाई लड़की जासमीन (लेना) भा जाती है, जो उसकी भाषा नहीं समझती। अनेक गलतफहमियों के बीच दोनों का प्यार पल्लवित होता है। इस फिल्म में एक अलग ट्रैक अंडरव‌र्ल्ड डान जैम उर्फ जमाल खान (विजय मौर्या) का भी चलता है। शंकर उसी के पैसे लेकर भागा है।

बांबे टू बैंकाक में द्विभाषी संवाद हैं। कभी थाई, कभी हिंदी और टूटी-फूटी अंग्रेजी में बोले गए संवादों का तारतम्य बिठाने में दिक्कत होती है। आंखें फिल्म देख रही होती हैं और दिमाग संवादों को समझने में लगा रहता है। दोनों के बीच तालमेल नहीं बैठने से कोफ्त होती है। बांबे टू बैंकाक की प्रस्तुति के लिए इस शिल्प का चुनाव कर नागेश कुकुनूर ने कॉमेडी को दुरूह बना दिया है। कॉमेडी फिल्मों में शिल्प और कथ्य की सहजता रहती है, जिसे आजकल हमारे कामयाब निर्देशक नानसेंस ड्रामा तक खींच कर ले आए हैं।

बुरी फिल्म में अभिनय की क्या तारीफ की जाए? फिर भी विजय मौर्या का प्रयास उल्लेखनीय है। रैप पसंद करने वाले डान के रूप में वह मुग्ध करते हैं। थाई अभिनेत्री लेना का काम संतोषजनक है। श्रेयस तलपड़े कुछ नया नहीं कर पाए हैं। फिल्म की शुरुआत रोमांचक कॉमेडी की उम्मीद जगाती है, लेकिन बैंकाक पहुंचते ही फिल्म लड़खड़ा जाती है। फिल्म में थाई समाज को करीब से देखने का मौका मिलता है, जहां लड़कियां मसाज पार्लर में काम करने और ग्राहकों को शारीरिक आनंद देने के धंधे को गलत नहीं मानतीं और उनके प्रति परिवार एवं समाज का रवैया भी अपमानजनक नहीं होता।

नागेश समझदार निर्देशक हैं। उनसे ऐसी चूक कैसे हो गई? क्या ज्यादा कामयाबी की तमन्ना और पैसों के प्रलोभन ने उन्हें विचलित कर दिया? बेहतर रहेगा कि वह अपनी तरह की फिल्में बनाते रहें और अगर नई विधा में हाथ आजमाने का प्रयास करें तो उसकी बारीकियां सीख लें। कॉमेडी में चुटीले संवादों का खास महत्व होता है और हास्यास्पद प्रसंग रहते हैं। इनके अभाव में बांबे टू बैंकाक की कॉमेडी सपाट हो गई है।

चवन्नी की सलाह -न देखें.

Thursday, January 17, 2008

फिल्मों के बाद सीरियल के रिमेक

-अजय ब्रह्मात्मज

लगभग बीस साल पहले दूरदर्शन के दिनों में रामानंद सागर के धारावाहिक रामायण और बी।आर. चोपड़ा के महाभारत के प्रसारण ने इतिहास रचा था। कहते हैं, महाभारत और रामायण के प्रसारण के समय मुहल्ले और गलियां सूनी हो जाती थीं। चूंकि टीवी उस वक्त तक घर-घर नहीं पहुंचा था, इसलिए पड़ोसी परिवारों के लोग एक साथ बैठकर इन पौराणिक धारावाहिकों का आनंद उठाते थे। पिछले बीस वर्षो में दर्शकों और टीवी कार्यक्रमों में भारी बदलाव आ चुका है, लेकिन लगता है टीवी मनोरंजन का इतिहास खुद को दोहराने की स्थिति में आ गया है। बड़े जोर-शोर से एक नए चैनल पर रामायण का प्रसारण होने जा रहा है और महाभारत की तैयारियां चल रही हैं।

नए रामायण से हम नवीनता या प्रयोग की उम्मीद नहीं कर सकते, क्योंकि इसे सागर आ‌र्ट्स के बैनर के तहत ही बनाया जा रहा है। हां, बीस साल पहले इसके निर्देशक रामानंद सागर थे। अब निर्देशन की कमान उनके पोते शक्ति सागर ने संभाली है। कहना मुश्किल है कि कहानी और प्रस्तुति के स्तर पर कितना परिवर्तन होगा। वैसे, शक्ति सागर ने बताया है कि पिछली बार जो चीजें छूट गई थीं, इस बार वे सारी चीजें दिखाई जाएंगी। सवाल उठता है कि वे क्या चीजें हैं, जो छूट गई थीं? क्या कोई नई व्याख्या होगी? या कोई नया कथा प्रसंग होगा? रामायण के प्रसारण के बाद उसको लेकर काफी विचार-विमर्श हुआ था। कुछ समाजशास्त्री की राय में देश में आए भगवा उफान की पीठिका में इस सीरियल का भी प्रभाव था। बाद में इस सीरियल के कई कलाकार भाजपा के मंच पर देखे गए और उनमें से कुछ को चुनाव के टिकट भी दिए गए। क्या फिर से इतिहास खुद को दोहरा रहा है? या किसी नए उफान का संकेत है यह?

इधर रामायण का प्रसारण आरंभ होना है और उधर महाभारत की सुगबुगाहट आरंभ हो गई। खबरों के मुताबिक स्टार टीवी पर महाभारत का प्रसारण होगा और बॉबी बेदी इसका निर्माण करेंगे। क्रिएटिव सहयोग और निर्देशन के लिए बॉबी बेदी ने डॉ। चंद्रप्रकाश द्विवेदी का चुनाव किया है। इसका आरंभिक लेखन फारूक ढोंडी करेंगे। गौरतलब है कि डॉ. द्विवेदी ने दूरदर्शन के लिए चाणक्य का निर्देशन किया था। एक अर्से बाद वे फिर से धारावाहिकों की दुनिया में लौट रहे हैं।

रामायण और महाभारत पर नए सिरे से धारावाहिकों के निर्माण और प्रसारण से ऐसा लग रहा है कि टीवी इंडस्ट्री में सीरियलों के रिमेक का फैशन आरंभ होगा। धार्मिक और पौराणिक सीरियल फिर से बनाए जा सकते हैं। हो सकता है कि मशहूर सीरियलों के सिक्वल में भी चैनल अधिकारियों और दर्शकों की रुचि बढ़े। नुक्कड़, खानदान और ये जो है जिंदगी जैसे सीरियल के सिक्वल या अगले एपिसोड आराम से तैयार किए जा सकते हैं। फिल्मों के बाद सीरियल में रिमेक और सिक्वल का दौर आ सकता है।

दरअसल , रोचक विषयों का ऐसा अभाव है कि चैनल अधिकारी दर्शकों को उलझाए रखने और अपने चैनलों से बांधे रखने के लिए नई युक्तियों की तलाश में रहते हैं। दर्शक भी सास-बहू के सीरियल देखते-देखते थक गए हैं। लोग गौर करें, तो सीरियलों के केंद्र में भी अब बहू की जगह बेटी और बहनों ने ले ली है। ऐसा लग रहा है कि एक अंतराल के बाद टीवी मनोरंजन में नैरेटिव के स्तर पर बदलाव आने जा रहा है। अभी देखना है कि नई पीढ़ी के दर्शक रामायण और महाभारत जैसे सीरियल से जुड़ पाते हैं या नहीं? अगर पुरानी गति और प्रस्तुति रही, तो आज के दर्शक चैनल बदलने में नहीं हिचकिचाएंगे। यह दूरदर्शन का दौर नहीं है, जब टीवी का नया-नया प्रसार हुआ था और दर्शकों के पास कोई विकल्प नहीं था।

Wednesday, January 16, 2008

एकलव्य बाहर हो गया एकैडमी से

सुबह-सुबह एकैडमी की लिस्ट आ गयी.एकैडमी के विदेशी भाषा श्रेणी में फिल्म भेजने के लिए जो मारकाट मची थी,उस से आप सभी परिचित हैं.धर्म और एकलव्य ऐसे टकराए थे मानो एकैडमी में फिल्म नहीं गयी तो फिल्म ही बनाना बेकार है.पता नहीं अब कौन मातम मना रहा होगा.शाम तक लोगों की प्रतिक्रियाएं आ जायेंगी।
फिलहाल आप को बता दें के इस साल ६३ देशों की फिल्मों को एंट्री मिली थी,उनमें से ९ पहले चरण में नामांकित की गयी हैं.२२ जनवरी को इनमें से ५ की अन्तिम सूची जारी की जायेगी।

1.Austria, “The Counterfeiters,” Stefan Ruzowitzky, director
2.Brazil, “The Year My Parents Went on Vacation,” Cao Hamburger, director
3.Canada, “Days of Darkness,” Denys Arcand, director
4.Israel, “Beaufort,” Joseph Cedar, director
5.Italy, “The Unknown,” Giuseppe Tornatore, director
6.Kazakhstan, “Mongol,” Sergei Bodrov, director
7.Poland, “Katyn,” Andrzej Wajda, director
8.Russia, “12,” Nikita Mikhalkov, director
9.Serbia, “The Trap,” Srdan Golubovic, director

चलिए हम सभी इन फिल्मों को देखने का इन्तेजाम करें.इसे शर्म कहें या विडम्बना कि भारत में ६०० से ज्यादा फिल्में बनती हैं और उनमें से कोई भी इस योग्य नहीं होती कि नामांकित भी हो सके.भारत से नामांकित होने वाली आख़िरी फिल्म लगान थी।

आप बताएं कि इस साल कौन सी फिल्म एकैडमी अवार्ड के लिए भेजी जानी चाहिए.

Tuesday, January 15, 2008

असली-नकली सलमान खान


आप की नज़रों से भला असली और नकली सलमान खान छुप सकते हैं.दोनों तस्वीरें देखने के बाद तो समझ ही गए होंगे.कैसा ज़माना आ गया है.असली सलमान खान नकली सलमान खान के आगे-पीछे खड़ा है ... हा हा हा हा .........

Sunday, January 13, 2008

'अशोक' बनेंगे अमिताभ बच्चन और अजय देवगन

एक हैं डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी...उन्होंने कुछ सालों पहले पिंजर नाम की फिल्म बनाईं थी.उस फिल्म की काफी तारीफ हुई थी.सभी ने मन था कि उन्होंने चाणक्य के बाद एक और बेहतरीन काम किया है.पिंजर के बाद डॉ द्विवेदी ने सनी देओल के साथ पृथ्वीराज रासो की योजना बनाईं.इस फिल्म की अभी घोषणा भी नहीं हुई थी कि राज कुमार संतोषी ने विज्ञापन तक प्रकाशित कर दिया कि वे अजय देवगन और ऐश्वर्या राय के साथ पृथ्वीराज रासो बनायेंगे.कहते हैं राज कुमार संतोषी और सनी देओल की पुरानी लड़ाई और अहम का शिकार हो गयी डॉ द्विवेदी की पृथ्वीराज रासो.कुछ समय के बाद पता चला कि दोनों ही फिल्मों को निर्माता नहीं मिल पाए.भगत सिंह के दौरान पैसे होम कर चुके निर्माताओं ने नहीं टकराने का फैसला लिया.नतीजा सभी के सामने है.पृथ्वीराज रासो नहीं बन सकी।

डॉ द्विवेदी मन मसोस कर रह गए.उधर राज कुमार संतोषी हल्ला बोल बनने में जुट गए.लंबे शोध और अध्ययन के बाद डॉ द्विवेदी ने अशोक के जीवन के उत्तर काल पर फिल्म बनने की सोची.इस फिल्म के सिलसिले में उनकी मुलाक़ात देश के कई निर्माताओं से हुई.सभी ने इस फिल्म में रूचि दिखाई.मामला धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था.खबर थी कि इस फिल्म में अशोक की भूमिका अमिताभ बच्चन निभाएंगे.इस बार फिर दे द्विवेदी की फिल्म की घोषणा से पहले ही राज कुमार संतोषी ने अशोक की घोषणा कर दी.इनकी अशोक में अजय देवगन जवान एवं वृद्ध अशोक के साथ उनके बेटे कुणाल की भी भूमिका निभाएंगे।

दोनों ही निर्देशक अशोक के उत्तर काल पर फिल्म बना रहे हैं.अशोक कि उम्र उस समय ६०-६५ की रही होगी.क्या अजय देवगन इस भूमिका में सही लगेंगे.एक सवाल यह भी है कि क्या दर्शक उन्हें तिहरी भूमिका में देखना पसंद करेंगे?चवन्नी को लगता है कि शांतिदूत अशोक की भूमिका में अमिताभ बच्चन अधिक सही लगेंगे?

Saturday, January 12, 2008

कई मुद्दों का हल्ला बोल


-अजय ब्रह्मात्मज
छोटे शहर का युवक अशफाक (अजय देवगन) एक्टर बनने की ख्वाहिश रखता है। मेहनत और जरूरी युक्तियों से वह सुपर स्टार समीर खान बन जाता है। स्टार बनने के साथ उस में कई अवगुण आ जाते हैं। वह माता-पिता और गुरु तक को पलटकर ऐसा जवाब देता है कि वो रूठ कर चले जाते हैं। फिर बीवी स्नेहा (विद्या बालन) की बारी आती है। वह भी उससे विमुख हो जाती है। हर तरफ से भावनात्मक रूप से ठुकराए जाने के बाद समीर का जमीर जागता है। वह एक हत्या का चश्मदीद रहा है। वह हिम्मत करता है और अपराधियों को बेनकाब करता है, लेकिन पावर, पब्लिक और पैसे के बूते अपराधी बरी हो जाते हैं। अंतत: समीर खान सड़क पर उतरता है और सिद्धू के सहयोग से नुक्कड़ नाटक के जरिए हल्ला बोलता है। उस पर हमला होता है। सिद्धू की ललकार से मीडिया और पब्लिक भी हल्ला बोल में शामिल हो जाती है। आखिरकार अपराधियों को सजा मिलती है।

राज कुमार संतोषी ने जेसिका लाल कांड, सफदर हाशमी प्रसंग और फिल्मी सितारों में प्रचलित कुरीतियों को एक साथ जोड़ा है। वह एक ही कहानी में कई मुद्दे पिरोते हैं। इस वजह से फिल्म का फोकस बार-बार बदलता रहता है। हल्ला बोल का मुख्य विषय दूसरों पर हो रहे अत्याचार के समर्थन में खड़े होने का आह्वान है। फिल्म में सिद्धू का एक संवाद है जानवर भी अपनी तकलीफ से चीखता है, दूसरों की तकलीफ से चीखने पर ही हम इंसान कहला सकते हैं। इसी भाव की बर्तोल्त ब्रेख्त की एक कविता है, जिसे हल्ला बोल का आधार बनाया गया है।

राज कुमार संतोषी की हल्ला बोल कथ्य के स्तर पर प्रभावित और उत्तेजित करती है, लेकिन शिल्प पुराना है। पुराने शिल्प में नाटकीयता, संयोग और बनावटी संवाद से दर्शकों की तालियां बटोरी जाती हैं। इस फिल्म को देखते समय भी तालियां बजेंगी। अजय देवगन ऐसी भूमिकाओं में सिद्धहस्त हैं। पंकज कपूर ने फिर से साबित किया है कि वह वर्तमान दौर के महत्वपूर्ण अभिनेता हैं। विद्या बालन ने छोटी सी भूमिका में भावभीनी संजीदगी दिखाई है। निगेटिव किरदार में दर्शन जरीवाला जंचे हैं।
कुछ सवाल हैं, जैसे कि चंबल में डकैत रहे सिद्धू को पंजाबी क्यों बताया गया है? सुपर स्टार होते ही समीर खान का व्यक्तित्व निगेटिव क्यों कर दिया गया है? परेशान किरदारों को पूजा स्थलों की शरण में जाते हुए दिखाने का फार्मूला पुराना नहीं हो गया है क्या? एक स्तर पर यह फिल्म दामिनी का नया संस्करण भी लगती है। हिंदी साहित्यप्रेमी दर्शक खुश हो सकते हैं कि उनके प्रिय गजलकार दुष्यंत कुमार के चंद अशआर फिल्म के महत्वपूर्ण दृश्य में इस्तेमाल किए गए हैं।

Friday, January 11, 2008

माई नेम इज.. सच्चाई से टकराव


-अजय ब्रह्मात्मज
इस फिल्म से नए अभिनेता निखिल द्विवेदी का करियर शुरू हुआ है। निखिल अपनी पहली फिल्म के लिहाज से संतुष्ट करते हैं। उनमें पर्याप्त संभावनाएं हैं। फिल्म इंडस्ट्री के बाहर से आए अभिनेता की एक बड़ी दिक्कत पर्दे पर आकर्षक दिखने की होती है, चूंकि उसकी ग्रूमिंग वैसी नहीं रहती, इसलिए कैमरे से दोस्ती नहीं हो पाती। निखिल में भी पहली फिल्म का अनगढ़पन है।


अनाथ एंथनी (निखिल) को सिकंदर भाई (पवन मल्होत्रा) का सहारा मिलता है। वे उसे फादर ब्रेगैंजा (मिथुन चक्रवर्ती) के पास शिक्षा के लिए भेजते हैं। एंथनी बड़ा होकर बारटेंडर बन जाता है। वह जिस पब में काम करता है, उसके मालिकों में सिकंदर भाई भी हैं। एंथनी की ख्वाहिश एक्टर बनने की है। उसकी ख्वाहिश को मूर्ति (सौरभ शुक्ला) का समर्थन मिलता है। उसे एक फिल्म मिलती है। फिल्म की असिस्टेंट डायरेक्टर रिया से एंथनी को प्यार हो जाता है।

कहानी मोड़ लेती है, जब फिल्म में शेक्सपियर के नाटक जूलियस सीजर से मिलती-जुलती स्थिति बनती है। एंथनी एक घटना का गवाह है, अगर वह सच बता दे तो सिकंदर भाई समेत सारे अपराधी पकड़े जाएंगे और हो सकता है कि उसका फिल्मी करियर ही ठहर जाए। वह सिकंदर भाई का एहसानमंद है, इसलिए नहीं चाहता कि वह कानून की चपेट में आए। इस अंतद्र्वंद्व से जूझता एंथनी परिस्थितियों का मुकाबला करता है। निर्देशक ई निवास ने नए ढंग से कहानी चित्रित की है। माई नेम इज .. की खूबी है कि इसके सहयोगी चरित्र मजबूत हैं और उन्हें दमदार अभिनेताओं ने निभाया है। पवन मल्होत्रा ने सिकंदर भाई के मर्म को बखूबी पर्दे पर उतारा है। अमृता राव थोड़ी सी अलग किस्म की भूमिका में जंची हैं। वह ग्लैमरस होने की सफल कोशिश करती हैं। मुकेश तिवारी और दयाशंकर पांडे का काम उल्लेखनीय है।

निखिल द्विवेदी: उभरा एक नया सितारा


-अजय ब्रह्मात्मज
देश भर के बच्चे, किशोर और युवक फिल्में देख कर प्रभावित होते हैं। वे उनके नायकों की छवि मन में बसा लेते हैं कि मैं फलां स्टार की तरह बन जाऊं। जहां एक ओर आज देश के लाखों युवक शाहरुख खान बनना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर 20-25 साल पहले सभी के ख्वाबों में अमिताभ बच्न थे। उन्हीं दिनों इलाहाबाद के एक मध्यवर्गीय परिवार के लड़के निखिल द्विवेदी ने भी सपना पाला। सपना था अमिताभ बच्चन बनने का। उसने कभी किसी से अपने सपने की बात इसलिए नहीं की, क्योंकि उसे यह मालूम था कि जिस परिवार और पृष्ठभूमि में उसकी परवरिश हो रही है, वहां अमिताभ बच्चन तो क्या, फिल्मों में जाने की बात करना भी अक्षम्य अपराध माना जाएगा! ऐसी ख्वाहिशों को कुचल दिया जाता है और माना जाता है कि लड़का भटक गया है। वैसे, आज भी स्थिति नहीं बदली है। आखिर कितने अभिनेता हिंदी प्रदेशों से आ पाए? क्या हिंदी प्रदेश के युवक किसी प्रकार से पिछड़े या अयोग्य हैं? नहीं, सच यही है कि फिल्म पेशे को अभी तक हिंदी प्रदेशों में सामाजिक मान्यता नहीं मिली है।
दिल में अपना सपना संजोए निखिल द्विवेदी पिता गोविंद द्विवेदी के साथ मुंबई आ गए। मुंबई महानगर में एक बस्ती है मुलुंड, जहां निखिल का कैशोर्य बीता। पिता की मर्जी के मुताबिक उन्होंने एमबीए की पढ़ाई की। बाद में एक बड़ी कंपनी में बिजनेस एग्जिक्यूटिव बने, लेकिन मन से फिल्म की बात नहीं गई। देश के लाखों युवकों से अलग निखिल ने अपने सपने को हमेशा हरा रखा और वे उसे दुनिया की नजरों से छिप कर सींचते भी रहे। इलाहाबाद में जो सपना अंकुराया था, वह वर्षो बाद मुंबई में फला-फूला। निखिल ने अपने पांव पर खड़े होने के बाद फिल्मों की तरफ रुख किया। लोगों से मुलाकातें हुई और एक नेटवर्किंग आरंभ हुई। इसे निखिल का आत्मविश्वास ही कहेंगे कि जब ई निवास ने उन्हें एक फिल्म में छोटी-सी भूमिका सौंपी, तो उन्होंने साफ मना कर दिया और कहा कि मैं हीरो का रोल करूंगा। सही मौके और बड़ी भूमिका के लिए निखिल प्रयत्नशील रहे। वक्त आया और ई निवास ने ही बुलाकर उन्हें माई नेम इज एंथनी गोंजाल्विस में हीरो का रोल दिया। हालांकि फिल्म मिलने के बाद भी संकट कम नहीं हुए। एक बार लगा कि फिल्म नहीं बन पाएगी। फिल्म की स्क्रिप्ट इतनी अच्छी थी कि एक बड़ा स्टार इस फिल्म को करना चाहता था। इतना ही नहीं, एक बड़े बैनर ने ई निवास को सलाह दी कि निखिल को निकाल दो। सच तो यह है कि वह बैनर बड़ी रकम देकर स्क्रिप्ट भी खरीदने को तैयार था, लेकिन फिर भी निर्देशक ई निवास और उनके लेखक निखिल के साथ डटे रहे। दरअसल, उन्हें निखिल पर भरोसा था। निखिल ने आखिरकार साबित किया कि वे भरोसे के योग्य हैं। संयोग ऐसा बना कि शाहरुख खान भी निखिल के प्रशंसक बन गए। उन्होंने अपने बैनर को हिदायत दी कि निश्चित बजट में निखिल की फिल्म पूरी होनी चाहिए। अब माई नेम इज.. रिलीज के लिए तैयार है। इसके पोस्टर में दिखने वाला युवक बड़ी उम्मीद से दर्शकों को निहार रहा है। उसकी आंखों में सपने के साकार होने की चमक है। उसकी सफलता लाखों युवकों के लिए प्रेरणा बनेगी।

Thursday, January 10, 2008

कूल और कामयाब हैं रितिक रोशन


-अजय ब्रह्मात्मज
जन्मदिन, 10 जनवरी पर विशेष..
अगर आपके समकालीन और प्रतिद्वंद्वी आपकी सराहना करें, तो इसका मतलब यही है कि आपने कुछ हासिल कर लिया है। पूरी दुनिया से स्वीकृति मिलने के बाद भी प्रतिद्वंद्वी आपकी उपलब्धियों को नजरंदाज करते हैं। पिछले दिनों एक बातचीत में अभिषेक बच्चन ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी रितिक रोशन की खुली तारीफ की। फिल्मों के चुनाव से लेकर अभिनय तक में उनकी विविधता का उल्लेख किया और स्वीकार किया कि रितिक ने थोड़े समय में ही ज्यादा सफल फिल्में दी हैं। हां, यह सच भी है, क्योंकि रितिक रोशन ने पिछले आठ सालों में केवल तेरह फिल्में की हैं और उनमें से सच तो यह है कि पांच फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की है। रितिक रोशन ने अभी तक केवल चुनिंदा फिल्में की हैं। उनके समकालीनों में अभिषेक बच्चन, विवेक ओबेराय और जॉन अब्राहम ने उनसे ज्यादा फिल्में जरूर कर ली हैं, लेकिन फिर भी वे काम और कामयाबी के लिहाज से रितिक रोशन से काफी पीछे हैं।
रितिक रोशन के रातोंरात स्टार बनने का गवाह रहा है दैनिक जागरण। पहली फिल्म कहो ना प्यार है के समय से रितिक रोशन और दैनिक जागरण का साथ रहा है। इस फिल्म के सिलसिले में पहली बार मुंबई से बाहर निकले रितिक रोशन से जब यह पूछा गया था कि वे अपने प्रति दर्शकों की दीवानगी को किस रूप में लेते हैं? उन्होंने स्वाभाविक विनम्रता के साथ कहा था, लोगों की दीवानगी को मैं अपनी सराहना समझता हूं। मुझे लगता है कि वे पसंद कर रहे हैं। रितिक ने अपने दीवानों और प्रशंसकों को हमेशा पूरा आदर और स्नेह दिया। बहुत मुश्किल होता है हर किसी से मुस्करा कर मिलना। अगर दिन में पांच सौ लोगों से हाथ मिलाना पड़े और हर बार मुस्कराना पड़े, तो हाथ और होंठ में दर्द होने लगता है। फिर व्यवहार और मुस्कराहट में कृत्रिमता आ जाती है, लेकिन रितिक के साथ ऐसा नहीं है। वे प्रशंसकों के स्पर्श को इनाम समझते हैं। उन्हीं दिनों रितिक ने कहा था, मुझे मालूम है कि यह ऊंचाई महंगी पड़ेगी, क्योंकि यहां से सीधी ढलान होगी। कहो ना प्यार है के बाद की असफलता के दौर में वन फिल्म वंडर के ताने सुनने के बावजूद रितिक कूल बने रहे। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, मैं लौटूंगा और वादा करता हूं कि दस सालों में शाहरुख खान से आगे निकल जाऊंगा, लेकिन मुझे दस साल का वक्त चाहिए। ऐसे बयानों को बड़बोलापन समझने वालों के सामने रितिक ने अपनी लगन, मेहनत और परफेक्ट एटीट्यूड से साबित किया कि वे नापतौल कर ही फिल्में चुनते हैं। रितिक की लगन और मेहनत के ताजा प्रशंसक निर्देशक आशुतोष गोवारीकर हैं। उनकी फिल्म जोधा अकबर हाल ही में पूरी हुई है। आशुतोष बताते हैं, इस फिल्म की वेशभूषा से लेकर भाषा तक के प्रति रितिक रोशन अतिरिक्त रूप से सावधान रहे। अतिरिक्त इसलिए कि सामान्य तौर पर एक्टर अपने रोल के प्रति इतने गंभीर नहीं होते। पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और रितिक के प्रशंसक जोधा अकबर में उनकी भूमिका को लेकर जिज्ञासु हैं। युवा अभिनेताओं में अभी तक किसी और ने ऐसी चुनौतीपूर्ण भूमिका स्वीकार नहीं की है। खबर तो यह भी है कि श्याम बेनेगल ने उन्हें बुद्ध का रोल ऑफर किया है।
एक नजर में
जन्मतिथि- 10 जनवरी,1974
सहायक निर्देशक- खुदगर्ज, करण-अर्जुन, कोयला।
बाल कलाकार- आपके दीवाने (1980), आशा (1980), भगवान दादा (1986)।
बतौर नायक - कहो ना प्यार है (2000), फिजा, मिशन कश्मीर, यादें, कभी खुशी कभी गम, आप मुझे अच्छे लगने लगे, न तुम जानो न हम, मुझसे दोस्ती करोगे, मैं प्रेम की दीवानी हूं, कोई मिल गया, लक्ष्य, कृष और धूम-2।
आने वाली फिल्में- जोधा अकबर

Wednesday, January 9, 2008

आत्मविश्वास से हैं लबरे़ज: दीपिका पादुकोन


-अजय ब्रह्मात्मज
किसी नयी-नवेली अभिनेत्री की दमदार मौजूदगी का इससे बडा सबूत नहीं हो सकता कि फिल्म इंडस्ट्री का हर सक्रिय निर्देशक उसे अपनी फिल्म में लेने के लिए तैयार हो। मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इन दिनों दीपिका पादुकोन इसी सुंदर स्थिति से गुजर रही हैं। उनके सिर्फ हां कहने और तारीखें देने के साथ फिल्म शुरू हो सकती है। 21 वर्षीया दीपिका पादुकोन ने पहली फिल्म में ही गहरे आत्मविश्वास का परिचय दिया है।

आत्मविशवास से भरा व्यक्तित्व
दीपिका पादुकोन में यह आत्मविश्वास पुराना है। ओम शांति ओम की सफलता और पहली ही फिल्म में शाहरुख खान के साथ ने पुराने आत्मविश्वास को गाढा कर दिया है। दो साल पहले सुपर मॉडल के तौर पर विख्यात होने के बाद एक लाइव चैट में उन्होंने एक जिज्ञासु के सवाल-जवाब में कहा था कि वह शाहरुख खान के साथ काम करना चाहेंगी, लेकिन हिंदी फिल्मों में आने के पहले वह कन्नड या तमिल की फिल्म में खुद को मांजेंगी। दीपिका ने वही किया, जो कहा था। उन्होंने ओम शांति ओम के पहले कन्नड में इंद्रजीत लंकेश के निर्देशन में ऐश्वर्या नामक फिल्म की। ऐसा लगता है कि दीपिका पादुकोन अपना भविष्य पढ सकती हैं। ग्रह-नक्षत्रों की दिशा देखकर भविष्य का अनुमान ज्योतिषी लगाते हैं, लेकिन अपनी क्षमताओं के अनुरूप भविष्य की संभावना आत्मविश्वासी जाहिर कर देते हैं।

इंटरनेशनल छवि
5 जनवरी, 1986 को प्रकाश पादुकोन और उज्जला के परिवार में आई दीपिका का आरंभिक बचपन डेनमार्क के कोपेनहेगेन में बीता। यही कारण है कि दीपिका की कामयाबी का जश्न नम्मा बेंगालुरू के साथ डेनमार्क में भी मनाया गया। जन्म से ही इंटरनेशनल बन चुकीं दीपिका पादुकोन से ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि सफलता के शिखर पर पहुंचने के पहले दम नहीं लेंगी वह। ऊंचा कद, छरहरा बदन, आकर्षक व्यक्तित्व और सुगंधित छवि की दीपिका पादुकोन की उपस्थिति हर माहौल में खुशबू बिखेरती और हिलोर पैदा करती है। बचपन से ही अपने आकर्षण से आम जनों को बहलाकर कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के ग्राहक बनाती रहीं दीपिका बचपन से ही मॉडलिंग करती रही हैं। मॉडलिंग के अगले पडाव के तौर पर उन्होंने स्वाभाविक रूप से एक्टिंग को चुना और करोडों दर्शकों को अपना दीवाना बना दिया। तभी तो जावेद अख्तर ने लिखा- आंखों में तेरी अजब-सी अदाएं हैं।

खरी उतरीं हर मापदंड पर
फराह खान ने जब ओम शांति ओम की कल्पना की थी तो वह एक ऐसी स्वप्निल खूबसूरती को अपनी फिल्म की नायिका के तौर पर देख रही थीं, जो आज की अधिकांश लडकियों की तरह सिर्फ सिंथेटिक सौंदर्य की धनी न हों। उसमें दम हो और खम हो। दीपिका उस मापदंड पर खरी उतरीं। दीपिका अपने पिता के थ्रीडी (डिसिप्लिन, डिटर्मिनेशन और डेडिकेशन) के सिद्धांत पर अमल करती हैं। अनुपम खेर और श्यामक डावर से अभिनय और नृत्य का प्रशिक्षण ले चुकीं दीपिका ने पहली ही फिल्म में शाहरुख खान के साथ सफलता की पींग मारी है। अभी उन्हें और पींगे मारनी हैं। बस, उनका संतुलन बना रहे।

Tuesday, January 8, 2008

प्रीमियर होता है आज भी,लेकिन

आये दिन खबरें छपती हैं या टीवी चैनलों पर चलती-फिरती तस्वीरें दिखाई जाती हैं कि फलां फिल्म का प्रीमियर हुआ और उसमें फिल्म के सभी कलाकारों के साथ इतने सारे स्टार आये.खबर और इवेंट बन कर रह गए प्रीमियर में अब पहले जैसी भव्यता या उत्सव का माहौल नहीं रह गया है।

आपने सुना ही होगा कि मुग़ल-ए-आज़म के प्रीमियर में के आसिफ ने हाथी तक मंगवा लिए थे.उन दिनों प्रीमिएर किसी जश्न से कम नहीं होता था.बहुत पहले से खबर फैल जाती थी और यकीं करें सिनेमाघर को किसी दुल्हन की तरह सजाया जाता था.पूरा शृंगार होता था और फिल्म बिरादरी के लोग किसी बाराती की तरह वहाँ पहुँचते थे.हर व्यक्ति अपना सबसे सुन्दर और आकर्षक परिधान निकालता था.फिल्म से संबंधित हीरो-हिरोइन तो विशेष कपड़े बनवाते थे.कहा जाता है कि राज कपूर अपनी फिल्मों के प्रीमिएर के समय यूनिट के सभी सदस्यों के लिए शूट सिलवाते थे।

तब सिनेमाघर इतने बड़े और विशाल होते थे कि सितारों की भीड़ मेला का रुप ले लेती थी और उनकी जगमगाहट से माहौल रोशन हो उठता था.मुम्बई में ऐसे सिनेमाघर थे जहाँ आराम से १५०० दर्शक एक साथ फिल्म देख सकते थे.प्रीमियर में आये सितारों को देखने की भीड़ भी लगी रहती थी.दर्शकों के लिए यह नायाब मौका होता था कि वे अपने पसंदीदा सितारों को साक्षात् देख सकें.आज की तरह का मीडिया विस्फोट नहीं था कि टीवी पर सितारे दिन-रात टिमटिमाते रहते हैं और एक समय के बाद उनमें दर्शकों की रूचि खत्म हो जाती है.तब केवल ऐसे ही अवसरों पर सितारों के दर्शन होते थे।

एक बार अमिताभ बच्चन ने चवन्नी को बताया था कि उन्हें याद है कि आरंभिक दिनों में वे कैसे प्रीमियर का इंतज़ार करते थे.पहले से तैयारी रहती थी कि प्रीमियर में जाना है.मल्टीप्लेक्स संस्कृति में तकनीकी सुविधा तो बढ़ गयी है,लेकिन सिनेमाघर इतने छोटे और संकरे हो गए हैं कि २०० दर्शक एक साथ बाहर आ जाएँ तो कंधे टकराने लगते हैं.सिनेमाघर आधुनिक हो गए हैं,लेकिन उनकी सजावट साधारण हो गयी है.याद करें जब आप पहले सिनेमाघरों में बैठते थे और सामने से लाल मखमली पर्दा हटता था तो कैसी अनुभूति होती थी?अब वह मखमली एहसास नहीं होता.

आज कल भी प्रीमियर होते हैं,लेकिन अब वह बात कहाँ?आज कल तो फिल्म की यूनिट को भी नहीं मालूम रहता कि उनकी फिल्म का प्रीमियर होगा या नहीं?अगर कोई स्पोंसर मिल गया तो फटाफट इन्तेजाम कर लिया जाता है.ऐसे प्रीमियर में पूरी फिल्म बिरादरी के आने का सवाल ही नहीं उठता.शाहरुख़ खान तो प्रीमियर करने ब्रिटेन चले जाते हैं.हाल-फिलहाल में सांवरिया का प्रीमियर भव्य था,फिर भी वह पुराने प्रीमियर के पासंग बराबर भी नहीं कहा जा सकता।

प्रीमियर के बाद पार्टी भी होती थी.उसका किस्सा कभी और बयान करेगा चवन्नी.

क्या आप में से किसी को कोई प्रीमियर याद है.कृपया उसका बखान करें.चवन्नी और उसके पाठकों को ख़ुशी होगी.

Monday, January 7, 2008

अजय देवगन से अजय ब्रह्मात्मज की मुलाक़ात


-अजय ब्रह्मात्मज


अजय देवगन पिछले दिनों गोवा में फिल्म गोलमाल रिट‌र्न्स की शूटिंग कर रहे थे। रोहित शेट्टी निर्देशित इस फिल्म के कलाकार हैं करीना कपूर, तुषार कपूर, अरशद वारसी और अमृता अरोड़ा। सेट पर ही अजय देवगन से मुलाकात हुई। उनसे बातचीत शुरू हुई इस सवाल के साथ कि आपकी दो फिल्में लगातार आएंगी हल्ला बोल और संडे। क्या इनमें गैप रखना उचित नहीं होगा? वे कहते हैं, फिल्म हल्ला बोल पहले 2007 में रिलीज होने वाली थी। 21 दिसंबर की तारीख भी फाइनल हो गई थी, लेकिन उसी दिन आमिर खान की फिल्म तारे जमीं पर और अक्षय कुमार की वेलकम आ रही थी। इसलिए मुझे उसी दिन हल्ला बोल को रिलीज करना सही नहीं लगा। इसी कारण यह फिल्म खिसक कर जनवरी में आ गई। संडे की रिलीज तारीख को आगे खिसकाना संभव नहीं था। संयोग ही कहें कि बैक-टू-बैक मेरी फिल्में आ रही हैं। वैसे बैक-टू-बैक रिलीज होने पर मेरी फिल्में चलती हैं।
फिल्म हल्ला बोल के बारे में अजय बताते हैं, जिसको लेकर चर्चा है कि यह गंगाजल और अपहरण जैसी लग रही है, यह वैसी फिल्म नहीं है। उनसे ज्यादा कॉमर्शिअॅल है। दरअसल, राजकुमार संतोषी को कॉमर्शिअॅल ढांचा पसंद है, इसीलिए उन्होंने इसी ढांचे में रहते हुए कुछ कहने की कोशिश की है। ऐसी स्क्रिप्ट पाना मुश्किल होता है, जिसमें ह्यूमर, एक्शन, ड्रामा, सब कुछ हो। फिल्म लोगों से क्या कहती है? अजय बताते हैं, सीधी-सी बात है। अगर आपकी आंख के सामने कुछ गलत हो रहा है, तो आपको इंतजार नहीं करना चाहिए। आपको यह इंतजार नहीं करना चाहिए कि कोई कुछ करेगा या सरकार कोई कदम उठाएगी, क्योंकि आवाज आप ही को उठानी पड़ेगी। फिल्म के अंदर जेसिका लाल जैसा एक प्रसंग है, जिसमें आप देखेंगे कि अवाम और मीडिया के आवाज उठाने पर ही कुछ हो सका। फिल्म में एक संवाद है कि कोई किसी को पीट रहा है और आप कुछ नहीं करते, तो अगली बार आपकी पिटाई हो सकती है, तब भी कोई बचाने नहीं आएगा।
फिल्म में अजय की भूमिका एक फिल्म एक्टर की है। वे बताते हैं, छोटे शहर से बड़े ख्वाब लेकर यह एक्टर आता है और अपने मेहनत से स्टारडम हासिल करता है। स्टारडम और कामयाबी पाने के बाद वह कैसे बदलता है। सिस्टम कैसे बदलता है उसे। फिर उसके सामने परीक्षा की घड़ी आती है। उसे तय करना है कि सच्चाई के साथ खड़ा रहे या अपनी आंखें मूंद ले। अगर वह सच्चाई के साथ खड़ा रहेगा, तो उसे सब कुछ खोना पड़ सकता है। वह कैसे यह जोखिम उठाता है, यही इसकी कहानी है। फिल्म में मैंने वह सब कुछ किया है, जो स्टार के तौर पर मैं खुद नहीं करता।
अजय से बात होती है कि ऐसा रोल करने में उन्हें दिक्कत भी आई होगी? वे कहते हैं, नहीं, यही तो एक्टिंग है। हम जो हैं, वही पर्दे पर दिखें, तो फिर कैसे अलग-अलग किरदारों को निभा पाएंगे! मैं एक्टर हूं, लेकिन इस फिल्म का किरदार मुझसे मिजाज और व्यवहार में अलग है। मुझे उसी को पर्दे पर साकार करना था, ताकि आप उस स्टार के अंतद्र्वद्व को समझ सकें।
अजय निर्देशन में उतरे और फिल्म पूरी कर ली। उसके बारे में वे कहते हैं, उस फिल्म के बारे में उसकी रिलीज के समय बताऊंगा। अभी कुछ बताना जल्दबाजी होगी। मेरी फिल्म का नाम यू, मी और हम है। फिल्म का विषय भावना प्रधान है। क्या निर्देशक बनने की ख्वाहिश पहले से थी? अजय झट से कहते हैं, हां, कम लोग जानते हैं कि मैंने निर्देशन से ही अपने करियर की शुरुआत की थी। शेखर कपूर का सहायक था मैं। उससे पहले अपनी फिल्में बनाया करता था। उन फिल्मों को देखकर ही शेखर कपूर ने बुलाया। उनके साथ कुछ ऐड फिल्में कीं और दुश्मनी में सहायक रहा। बाद में आधी फिल्म छोड़कर एक्टिंग में आ गया। इस साल आई अजय की फिल्में नहीं चलीं। इस बारे में उनका स्पष्ट मानना है, क्योंकि वे खराब फिल्में थीं। उन फिल्मों में कमियां थीं। उन पर बातें करना उचित नहीं है। अजय की दूसरी फिल्म संडे कॉमेडी फिल्म बताई जा रही है? वे कहते हैं, उसमें कॉमेडी के साथ एक्शन भी है। यह थोड़ी अलग किस्म की फिल्म है। रोहित शेट्टी ने बहुत अच्छी कहानी चुनी है। फिल्म की कास्ट भी अलग है। मुझे कॉमेडी करने में मजा आता है। संडे फन फिल्म है।
देखा गया है कि अजय की सोशल फिल्में अधिक पसंद की जाती हैं? वे कहते हैं, मेरी समझ से यह अच्छी बात है। वैसे, हम लोग फिल्म करते वक्त ही समझ जाते हैं कि यह कैसी बनी है? कई बार ऐसा भी होता है कि फिल्म अच्छी बनती है, लेकिन दर्शकों को वे पसंद नहीं आती। इन दिनों स्लो फिल्म नहीं चल सकती। रेनकोट का विषय अच्छा था, लेकिन मुझे लग गया था कि फिल्म नहीं चलेगी। वह बहुत ही स्लो फिल्म थी। सिर्फ अच्छा क्लाइमेक्स देखने के लिए दर्शक दो ढाई घंटे नहीं बैठेंगे!
अजय एक एनिमेशन फिल्म भी कर रहे थे? वे कहते हैं, उसका नाम टुनपुर का सुपर हीरो है। उसकी तैयारी चल रही है। एनिमेशन और लाइव कैरेक्टर के साथ यह फिल्म बनेगी। फिल्म की एनिमेटेड दुनिया रहेगी, जिसमें जिंदा किरदार भी होंगे। राजकुमार संतोषी के साथ अजय अशोक भी कर रहे हैं, जिसकी चर्चा कुछ समय पहले से है? वे स्वीकारते हैं, हां, उसकी तैयारी चल रही है। संतोषी जी अमेरिका गए हैं। वहां वे फिल्म के तकनीशियन फाइनल करने गए हैं। मैं उनके साथ ही बाद में रामायण भी कर रहा हूं।

Sunday, January 6, 2008

हिन्दी प्रदेशों से क्यों नहीं आते हीरो?

नए साल में चवन्नी की चाहत है कि उसकी बिरादरी के लोगों की सक्रियता बढे.सवाल है कि यह सक्रियता कैसे बढेगी?एक तरीका यह हो सकता है कि सामूहिक ब्लोग मोहल्ला और भड़ास कि तरह चवन्नी भी सिनेमा के शौकीनों को आमंत्रित करे और उनकी बातें यहाँ रखे।
एक दूसरा तरीका यह हो सकता है कि अगर आप में से कोई भी सिनेमा के किसी भी पहलू पर कुछ लिखना या बताना चाहता है तो वह चवन्नी को मेल कर दे और चवन्नी उसे फटाफट ब्लोग पर डाल दे.इस प्रसंग में कई मुद्दों पर सामूहिक बहस हो सकती है और कई नए विचार और दृष्टिकोण सामने आ सकते हैं।
मसलन एक लंबे समय के बाद फिल्म इंडस्ट्री के बाहर का एक नौजवान फिल्मों में आ रहा है.निखिल द्विवेदी का संबंध इलाहबाद से रहा है.वे आज भी खुद को इलाहाबादी ही कहते हैं.सवाल है कि हिन्दी प्रदेशों से हीरो क्यों नहीं आते?संभव है कि यह सवाल आपके मन में भी आया हो और आपके पास भी इसके जवाब हों.क्यों न हम इस मुद्दे पर विमर्श करें?
और भी कई सवाल हैं.जैसे की दर्शक बदले हैं और सिनेमा देखने का तरीका भी बदला है.अनंत फिल्में हैं और अनंत है फिल्मों से संबंधित कथाएँ...आइये एक ने शुरुआत करें।

चवन्नी का मेल आईडी है-chavannichap@gmail.com

Thursday, January 3, 2008

साल के आखिरी और पहले हफ्ते का अपशकुन

-अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में शकुन-अपशकुन पर बहुत ध्यान दिया जाता है। संयोग और घटनाओं के कारण परिणामों के दोहराव से शकुन-अपशकुन का निर्धारण होता है और फिर बगैर किसी लॉजिक और पुनर्विचार के उसका पालन भी होने लगता है। धारणाएं अंधविश्वास का रूप ले लेती हैं और अंधविश्वास धारणाएं बदल देती हैं।
पिछले कुछ वर्षो से यह देखा जा रहा है कि साल के आखिरी हफ्ते या पहले हफ्ते में रिलीज हुई फिल्में अच्छा बिजनेस नहीं करती हैं। शायद इसीलिए ज्यादातर निर्माता कोशिश यही करते रहते हैं कि उनकी फिल्में इन हफ्तों में न फंसें। पिछले हफ्ते हनुमान रिट‌र्न्स और शोबिज रिलीज हुई। दोनों फिल्मों का बिजनेस उत्साहजनक नहीं रहा। इस हफ्ते की बात करें, तो कोई भी उल्लेखनीय फिल्म रिलीज नहीं हो रही है। हल्ला बोल, माई नेम इज एंथनी घोनसाल्विस और बॉम्बे टू बैंकॉक तीनों फिल्में 11 जनवरी को रिलीज होंगी। बहुत पहले महेश भट्ट की कसूर और राज जैसी फिल्में पहले हफ्तों में आने के बाद भी कामयाब रही थीं। महेश भट्ट कहते हैं, मुझे इंडस्ट्री के इस अंधविश्वास की जानकारी है। फिल्म अपने कॉन्टेंट और प्रेजेंटेशन से चलती है। इसलिए मैं अपशकुन की धारणा में यकीन नहीं करता। किसी साल कोई बेहतरीन फिल्म पहले हफ्ते में रिलीज होकर हिट हो जाएगी, तो यह अंधविश्वास टूट जाएगा।
एक निर्माता के मुताबिक, हम लोग अपशकुन से ज्यादा इस तथ्य पर ध्यान देते हैं कि साल का पहला हफ्ता होने के कारण लोग पारिवारिक उत्सव के माहौल में रहते हैं। नए साल की पार्टियों और जलसों की वजह से दर्शकों की जेब ढीली रहती है, इसलिए लोग सिनेमाघरों का रुख नहीं करते। चूंकि बिजनेस की संभावना कम रहती है, इसलिए हर निर्माता चाहता यही है कि वे थोड़ा आगे-पीछे के हफ्तों में ही अपनी फिल्म ले आए। निर्माता की इस बात में सच्चाई झलकती है।
पहले हफ्ते में फिल्मों के फ्लॉप होने का दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि अच्छी और बड़ी फिल्मों के आगे-पीछे खिसक जाने से छोटी और कम बजट की साधारण फिल्मों को खाली तारीखें मिल जाती हों। छोटे निर्माता अपनी फिल्म उन खाली शुक्रवार को रिलीज कर लेने में अपनी भलाई समझते हों। अब चूंकि उनकी फिल्में पहले से ही साधारण और छोटी होती हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से दर्शक नहीं आते। नतीजा यह होता है कि वे फिल्में फ्लॉप हो जाती हैं और पहले हफ्ते के अपशकुन की अवधारणा मजबूत हो जाती है। फिल्मों की रिलीज के साथ अन्य मामलों में भी शकुन-अपशकुन का खयाल रखा जाता है। कई बार किसी हीरो, हीरोइन या आर्टिस्ट को लेकर भी यह धारणा बन जाती है। जॉन अब्राहम को अभी अपशकुन माना जा रहा है और कैटरीना कैफ शकुन मानी जाती हैं, जबकि दोनों समान रूप से साधारण एक्टर हैं। फिल्म इंडस्ट्री में जो फिल्म हिट हो जाती है, उसकी सारी चीजें हिट मान ली जाती हैं। यहां तक कि हिट फिल्मों के प्रॉपर्टी की भी मांग बढ़ जाती है। कुछ लोगों को भ्रम हो जाता है कि यदि हिट फिल्म के कैमरे और लाइट इस्तेमाल किए जाएं, तो उनकी फिल्म भी हिट हो सकती है। फिल्मों की रिलीज के पहले प्रिंट को लेकर धार्मिक स्थलों पर जाने का रिवाज पुराना है। कुछ निर्माता-निर्देशकों को लगता है कि दैवीय कृपा से फिल्में हिट हो सकती हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि फिल्में अपनी क्वालिटी और कॉन्टेंट से ही पसंद की जाती हैं। फिर चाहे उसमें किसी भी कलाकार ने काम किया हो या किसी भी हफ्ते उन्हें रिलीज की तारीख मिली हो। दरअसल.. फिल्म इंडस्ट्री के लोग अपनी कमजोरियों और कमियों को शकुन-अपशकुन के ऐसे अंधविश्वासों से ढकने की कोशिश करते हैं।

वड़ा पाव क्यों खाते थे दिलीप कुमार?

चलिए आज हिन्दी फिल्मों की पुरानी गलियों में चलते हैं.यह किस्सा दिलीप कुमार से संबंधित है.चवन्नी ने अभी फिल्म पत्रकारिता में कदम नहीं रखा था,तभी उसके एक अभिनेता मित्र ने यह किस्सा सुनाया था.इस किस्से की सच्चाई का दावा करना मुश्किल है.दिलीप कुमार हिन्दी फिल्मों के जीवित किंवदंती है,उनके बारे में अनेक किस्से सुनाई पड़ते हैं।
दिलीप कुमार उन दिनों लोकप्रियता के उत्कर्ष पर थे.आये दिन उनके सम्मान में भोज और पार्टियाँ हुआ करती थीं.हर मौक़े पर दिलीप साहेब ही मुख्य अतिथि होते थे.यह किस्सा उनके ड्राइवर का बताया हुआ है,इसलिए इसके सच होने की पूरी गुंजाईश है.और फिर जैसा किस्सा है,वह दिलीप साहब के अंतर्मुखी स्वभाव से मेल खाता है.माना जा सकता है कि दिलीप साहेब ऐसा कर सकते हैं।
उनके ड्राइवर ने नोटिस किया कि साहेब कहीं डिनर या पार्टी में जा रहे हों तो अक्सर वहाँ पहुँचने के पहले गाड़ी रुकवा लेते थे और ड्राइवर से वड़ा पाव मंगवा कर खा लेते थे.ऐसा एक बार नहीं कई बार हुआ तो ड्राइवर अपना अचरज नहीं रोक सका .एक दिन उसने हिम्मत जुटाई और पूछ ही लिया,'साहेब ,ये पार्टियाँ आप के लिए ही रखी जाती हैं और आप ही खास मेहमान होते हैं,लेकिन आप ज्यादातर पार्टियों में जाने के पहले वड़ा पाव खा लेते हैं.ऐसे में आप वहाँ क्या खाते होंगे?'
दिलीप साहेब तो दिलीप साहेब हुए.उनहोंने ड्राइवर के सवाल का बिल्कुल बुरा नहीं माना.वैसे भी स्टार और ड्राइवर का रिश्ता बहुत मजबूत और खास होता है.ड्राइवर के सीने में स्टार के अनेक राज छुपे होते हैं.दिलीप साहेब ने ड्राइवर को वड़ा पाव खाने की वजह बताई.यह वजह इतनी प्यारी है कि हम सभी इसे अपना सकते हैं.चवन्नी ने तो अपना लिया है।
दिलीप साहेब ने बताया कि खास मेहमान होने के कारण ही वड़ा पाव खा लेता हूँ.अब मैं खास मेहमान हूँ तो घुसते ही सबकी नज़र मुझ पर पड़ती है और उसके बाद जब तक मैं वहाँ हूँ,तब तक लोग मेरी एक-एक हरकत पर गौर कर रहे होते हैं और निष्कर्ष भी निकाल रहे होते हैं.जाहिर सी बात है कि जब मैं खाना लेता हूँ और कौर उठता हूँ, तब भी उनकी नज़र मुझ पर ही टिकी रहती है.अब अगर मैं सचमुच भूखा रहूँगा तो प्लेट में खाना लेने से लेकर कौर उठाने तक में उसकी झलक रहेगी.पेट भरा रहेगा तो पूरी नफासत से प्लेट उठाऊँगा और थोड़ा खाकर भी संतुष्ट हो जाऊँगा.हम कहीं भी रहें लोग हमारा मुआयना कर रहे होते हैं और वह बातें फैलती हैं.अगर मैं किसी भुक्खड़ की तरह खाऊँगा तो मेरी क्या छवि बनेगी?पेट खाली रहा तो भूख इस बात की परवाह नहीं करेगी कि मैं स्टार हूँ और लोग मुझे देख रहें हैं।
चवन्नी ने इस किस्से की गाँठ बांध ली है.कहीं भी औपचारिक जगहों पर जाना हो तो वह कुछ न कुछ ठूंस लेता है.आप भी आजमा कर देखें.एक अलग किस्म का आत्मविश्वास पायेंगे और खाने में बला की नफासत आ जायेगी.

Tuesday, January 1, 2008

बधाई विद्या...जन्मदिन की बधाई

माफ़ करें.पहली बार ऐसा हुआ.न जाने कैसे इस पोस्ट का शीर्षक ही पहली बार पोस्ट हो पाया.शायद चवन्नी ने ही गफलत में कोई और बटन दबा दिया होगा।

आज विद्या बालन का जन्मदिन है.क्या आप ने बधाई भेजी?मीडिया ने विद्या के जन्मदिन पर कोई हो-हल्ला नहीं किया.चवन्नी की मानें तो विद्या अभी बिकाऊ वस्तु नहीं बनी हैं.यह विद्ता और उनके प्रशंसकों के लिए अच्छी बात है.बहुत बारीक़ से लकीर होती है.लोकप्रियता और बाज़ार के लिए उपयोगी होने में इसी लकीर से अंतर आता है.बाज़ार को लगता है कि विद्या अभी उत्पाद बेचने में उपयोगी नहीं हैं,इसलिए उनकी लोकप्रियता के बावजूद वह उन्हें तवज्जो नहीं देता.अगर बाज़ार महत्व नहीं देता तो मीडिया भी नज़रंदाज कर देता है।

विद्या से चवन्नी की मुलाक़ात है.परिणीता की रिलीज के समय ही यह मुलाक़ात हुई थी.जब भी कोई नयी फिल्म रिलीज होने को होती है तो उस फिल्म के स्टार और बाकी सदस्यों से पत्रकारों की मुलाक़ात करवाई जाती है.ऐसी मुलाकातों के लिए ८-१० पत्रकारों को एक साथ बिठा दिया जाता है और फिर घिसी-पिटी बातचीत होती है.मसलन यह रोल कैसे मिला?रोल के लिए कैसे तैयारी की?निर्देशक और नायक के साथ कैसी निभी?ऐसे सवाल पत्रकारों की सोच और समझ की सीमा के कारण नहीं पूछे जाते.एक परिपाटी बन गयी है कि ऐसे ही सवाल पूछ सकते हैं।

चवन्नी को भी ऐसी बातचीत के लिए बुलाया गया था.चवन्नी ने आदतन मन कर दिया था.चवन्नी सीधी और अकेली बातचीत में यकीन रखता है.चवन्नी को चेतावनी दी गयी कि फिर तो उनके घर जाना होगा.जो लोग मुम्बई से परिचित हैं,वे बता सकते हैं कि पश्चिमी उपनगर के लोग क्यों सेन्ट्रल लाइन में जाने से घबराते हैं.चवन्नी सहज ही तैयार हो गया.वह उनके घर गया और उनकी अमिट यादें लेकर लौटा।

विद्या के बारे में ज्यादा बताने की ज़रूरत नहीं है.पिछले साल विद्या की चार फिल्में रिलीज हुईं.गुरु,सलाम-ए-इश्क,हे बेबी और भूल भुलैया ...इन चारों फिल्मों में विद्या ने अपने अभिनय से दर्शकों को प्रभावित किया,लेकिन उनकी कोई चर्चा नहीं सुनाई पड़ रही है.पूछने पर विद्या कहती हैं कि जब तक मुझे दर्शकों का प्यार और निर्देशकों की फिल्में मिल रही हैं,तब तक मुझे कोई चिंता नहीं हैं।

चवन्नी ने कुछ समय पहले दिल्ली-दरभंगा लेने पर विद्या बालन से अविनाश की बातचीत पढ़ी थी .आप भी पढें .विद्या को करीब से जानने का मौका मिलेगा.

२००८ में चवन्नी का नमस्कार

चवन्नी का नमस्कार ...


साल २००८ आज से शुरू हो रहा है.सभी चाहते हैं कि जैसा बीता पिछला साल ,उस से बेहतर हो यह साल.इंसानी फितरत है वह कल से बेहतर आज से बेहतरीन आने वाला कल चाहता है.दर्शक भी इंसान हैं.उनकी भी इच्छा रहती है कि इस साल पिछले साल से ज्यादा तगड़ा मनोरंजन हो,अधिक सारगर्भित फिल्में दिखें और सिनेमा उनके करीब आये.करीब आने का मतलब विषय,प्रस्तुति और प्रदर्शन से है.अभी तो मल्टीप्लेक्स कल्चर ने सिनेमा को आम दर्शकों से दूर कर दिया है.बड़े शहरों में तो हालत और भी बुरी होती जा रही है.चवन्नी की बिरादरी के लिए सिनेमाघरों के दरवाजे बंद हो रहे हैं।


कैसी विडम्बना है?गाँव,देहात और छोटे शहरों से आये जिन दर्शकों ने हिन्दी सिनेमा को इस मुकाम तक पहुँचाया,वे ही अब वंचित किये जा रहे हैं.ऐसा लग रहा है कि सिनेमा अब आम दर्शकों का मनोरंजन माध्यम नहीं रह गया है.न जेब में पैसे होंगे और न दर्शक सिनेमाघरों में घुस पायेंगे?४००० से ६००० रुपये प्रति माह कमाने वाला दर्शक कहाँ से २०० रुपये लाएगा कि वह सिनेमा देख पायेगा?


वैसे एक खुशखबरी भी है कि सिनेमा के डिजिटल होने कि प्रक्रिया में तेजी आने के साथ सिनेमा के सस्ते होने की सम्भावना बढ़ गयी है।कुछ समय के बाद ४०-५० सीटों के सिनेमाघर भी अस्तित्व में आएंगे.इसके अलावा पान और सिगरेट के भाव से फिल्मों के डीवीडी मिलेंगे।


२००८ बड़ी फिल्मों का साल माना जा रहा है.आइये हम अपनी उम्मीद बड़ी कर लें।


चवन्नी आप सभी के लिए स्वस्थ मनोरंजन की कामना करता है.और हाँ,इस साल चवन्नी बताएगा कि आप फिल्म को देखें या न देखें? चवन्नी ने फिल्मों की पांच श्रेणियाँ की हैं:


ज़रूर देखें

देख लेन

देख सकते हें

न देखें तो चलेगा

बिल्कुल न देखें