-अजय ब्रह्मात्मज
यह खबर लोगों ने पढ़ी और देखी जरूर होगी। मधुर भंडारकर चाहते हैं कि उनकी फिल्म की नायिका किसी मॉडल की तरह छरहरी दिखे। इसी कारण वे प्रियंका चोपड़ा पर वजन कम करने का दबाव भी डाल रहे हैं। कहा जा रहा है कि शूटिंग के पहले प्रियंका को अपना वजन आठ किलोग्राम घटाना है। वे अभी तक आधे में पहुंची हैं। इस खबर के पीछे का सच यह है कि आजकल निर्देशक चरित्रों के अनुसार एक्टर के कायिक परिवर्तन पर बहुत जोर दे रहे हैं। दरअसल, एक्टर भी इससे आ रहे फर्क को महसूस करने के बाद ऐसे परिवर्तन के लिए सहज ही तैयार हो जा रहे हैं।
ज्यादा पीछे न जाएं और पिछले साल की फिल्मों को याद करें, तो तीन एक्टर इस नए ट्रेंड के सबूत के तौर पर दिखते हैं। गुरु में अभिषेक बच्चन, ओम शांति ओम में शाहरुख खान और तारे जमीं पर में आमिर खान॥। सच तो यह है कि इन तीनों ने ही फिल्म के चरित्र के अनुसार अपना वजन बढ़ाने और घटाने के साथ ही शरीर पर अलग ढंग से मेहनत भी की। गुरु के मुख्य किरदार के लिए अभिषेक बच्चन को अपना वजन बढ़ाना पड़ा। मध्यांतर के बाद में वे काफी तोंदिले और मोटे दिखाई पड़ते हैं। तोंद तो विशेष मेकअप से बनाई गई थी, लेकिन मोटापा उन्होंने अर्जित किया था। इसी प्रकार ओम शांति ओम में अपने सिक्स पैक एब को दिखाने के लिए शाहरुख ने महीनों वर्जिश भी की और विशेष खाद्य और पेय पदार्थो का सेवन किया। बयालीस की उम्र में ऐसा गठीला बदन बनाना और दिखाना सचमुच मुश्किल काम है। शाहरुख की महीनों की मेहनत बेकार नहीं गई। इस फिल्म को देखने के लिए दर्शकों की भीड़ टूट पड़ी और अगर पत्र-पत्रिकाओं की खबरों पर यकीन करें, तो ओम शांति ओम के बाद शाहरुख के महिला प्रशंसकों की संख्या और बढ़ गई है। तारे जमीं पर में आमिर खान को शिक्षक बनना था, इसलिए उन्होंने भी चोला बदला। हालांकि क्लोजअप शॉट में उनकी उम्र चेहरे से झांकती रही, लेकिन बाकी दृश्यों में वे जंचे।
माना जा रहा है कि आज के डायरेक्टर और एक्टर बेहद प्रोफेशनल हो गए हैं। इसलिए वे कैरेक्टराइजेशन पर बहुत जोर देते हैं। ऊपरी तौर पर यह सही भी लगता है, लेकिन लोग दो बीघा जमीन देखें और उसी के आगे-पीछे के वर्षो में बनी बलराज साहनी की कोई और फिल्म देखें, तो पाएंगे कि दो बीघा जमीन में बीमार और कमजोर रिक्शेवाले की भूमिका निभाने के लिए बलराज साहनी ने अपनी काया बदली थी। चूंकि बलराज साहनी उस जमाने की त्रयी (दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद) की तरह स्टार नहीं थे, इसलिए उन्होंने ऐसी मेहनत की। इसके अलावा, वे अभिनय की यथार्थवादी परंपरा से अभिभूत थे। खुद देव आनंद ने गाइड के क्लाइमेक्स के लिए अपना वजन कम किया था। पहले केवल सीरियस किस्म के एक्टर ही कैरेक्टराइजेशन के लिए इसे जरूरी मानते थे। लोग गौतम घोष की फिल्म पार देखें। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह ने अपना वजन कम किया था और बाल भी कटवाए थे।
कैरेक्टराइजेशन पर आमिर खान ने सबसे पहले ध्यान दिया। गुलाम और सरफरोश के बाद वे अपनी हर फिल्म के साथ लुक बदलते हैं और जरूरत के मुताबिक वजन भी घटाते और बढ़ाते हैं। इस बदलाव के बाद उन्हें कामयाबी पाते देख दूसरे एक्टरों ने भी इस पर अमल करना शुरू किया। अब यह घोषित ट्रेंड बन गया है। इन दिनों एक्टर इस संबंध में बताते हुए खूब इतराते हैं।
निजी जिंदगी में वैसे शरीर पर ध्यान देने का फैशन संजय दत्त और सलमान खान से आरंभ हुआ। इन दोनों एक्टरों ने देश भर में जिम कल्चर फैला दिया। इनके बाद रितिक रोशन ने स्वस्थ शरीर का जम कर प्रचार किया और कसरत की कद्र बढ़ा दी। इसके बावजूद इन दिनों रणबीर कपूर जैसे भी एक्टर हैं, जो यह जरूरी नहीं समझते कि एक्टर को मांसपेशियां दिखानी चाहिए। हां, वे यह जरूर मानते हैं, अगर किसी किरदार के लिए मुझे सिक्स पैक एब की जरूरत पड़ी, तो तीन महीने के अभ्यास के बाद मैं खुद को जरूर ढाल लूंगा।
Thursday, January 31, 2008
कैरेक्टर में ढलने की जरूरत क्यों?
Wednesday, January 30, 2008
सिगरेट और शाहरुख़ खान
शाहरुख़ खान ने कहा कि फिल्मों में सिगरेट पीते हुए कलाकारों को दिखाना कलात्मक अधिकार में आता है और इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए.अगर आप गौर से उस समाचार को पढें तो पाएंगे कि एक पंक्ति के बयान से खेला गया है.फिल्म पत्रकारिता की यही सामाजिकता है।
हमेशा बहस कहीं और मुड़ जाती है.सवाल फिल्मों में किरदारों के सिगरेट पीने का नहीं है.सवाल है कि आप उसे अपने प्रचार में क्यों इस्तेमाल करते हैं.क्या पोस्टर पर स्टार की सिगरेट पीती तस्वीर नहीं दी जाये तो फिल्म का प्रचार नहीं होगा ?चवन्नी ने देखा है कि एक ज़माने में पोस्टर पर पिस्तौल जरूर दिखता था.अगर फिल्म में हत्या या बलात्कार के दृश्य हैं तो उसे पोस्टर पर लाने की सस्ती मानसिकता से उबरना होगा. फिल्म के अन्दर किसी किरदार के चरित्र को उभारने के लिए अगर सिगरेट जरूरी लगता है तो जरूर दिख्यें.लेकिन वह चरित्र का हिस्सा बने,न कि प्रचार का।
शाहरुख़ खान इधर थोड़े संयमित हुए हैं.पहले प्रेस से मिलते समय कैमरे के आगे वे बेशर्मों की तरह सिगरेट पीते रहते थे.इधर होश आने पर उन्होंने कैमरे के आगे सिगरेट से परहेज कर लिया है.चवन्नी को याद है एक बार किसी टॉक शो में उन्होंने इसी सवाल पर कहा था कि मैं अपने प्रशंसकों को को सिगरेट पीने के लिए नहीं कहता.यह मेरी व्यक्तिगत पसंद है.आप क्यों अपनाते हैं?अब उन्हें कौन समझाए कि एक स्टार अगर सार्वजनिक तौर पर सिगरेट पीता है तो उसका क्या असर होता है?
इस मामले में उन्हें आमिर खान से सीखना चाहिए.तारे ज़मीन पर की रिलीज के समय आमिर ने यह लत पकड़ ली थी,लेकिन उस फिल्म के धुआंधार प्रचार में वे कहीं भी सिगरेट पीते नज़र नहीं आये.अमिताभ बच्चन पर जब आपत्ति की गयी थी तो उन्होंने माफ़ी माँग ली थी.
Tuesday, January 29, 2008
छोटे कद का उम्दा कलाकार
चवन्नी राजपाल यादव की बात कर रहा है।
राजपाल यादव को पहली बार दर्शकों ने प्रकाश झा के सीरियल मुंगेरी के भाई नौरंगी लाल में देखा था.वे सभी को पसंद आये थे.लोगों ने पूछा भी था कि प्रकाश झा कहाँ से मुंगेरी लाल यानी रघुबीर यादव के छोटे भाई को खोज कर ले आये. शयद सरनेम की समानता के कारण ऐसा हुआ था और दोनों की कद-काठी भी मिलती थी.वैसे दोनों ही राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र रहे हैं।
राजपाल को फिल्मों का पहला मौका इ निवास की फिल्म शूल में मिला.इस फिल्म में राजपाल यादव ने कुली का छोटा सा रोल किया था.राम गोपाल वर्मा को वह जंच गए.रामू ने उन्हें फिर जंगल में थोड़ा बड़ा रोल दिया.इस फिल्म में वह मुख्य खलनायक सुशांत सिंह से ज्यादा चर्चित हुए.देखते ही देखते राजपाल यादव के पास काम की कमी नहीं रही.उन दिनों राजपाल यादव से चवन्नी की लगातार मुलाकातें होती थीं या कम से कम हर फिल्म की रिलीज के समय बात होती थी कि फिल्म कैसी लगी?
इधर राजपाल की फिल्मों की संख्या बढ़ती गयी और उसी अनुपात में वार्तालाप छोटी और कम होती गयी.अब केवल गाहे-बगाहे कभी बात हो जाती है.चवन्नी अपने परिचित कलाकारों की ऐसी व्यस्तता से खुश होता है.राजपाल यादव ने कहा था कि वह हिन्दी फिल्मों का हीरो बनना चाहते हैं.तब यह बात कई लोगों को छोटे मुँह बड़ी बात लगी थी.लेकिन राजपाल ने साबित किया कि फिल्मों में जगह पाने के लिए कद-काठी से अधिक प्रतिभा की ज़रूरत रहती है।
राजपाल यादव की अगली फिल्म रामा रामा क्या है ड्रामा इस शुक्रवार को रिलीज हो रही है.राजपाल की कुछ फिल्में यादगार हैं.मैं,मेरी पत्नी और वो;मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूँ;वक़्त;आदि आदि.राजपाल यादव ने फिल्में लेते समय किरदार की लम्बाई-चौड़ाई या रुप-रंग पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.उनकी फिल्मों की संख्या १०० के लगभग पहुंच रही होगी.उनहोंने नाम,शोहरत और पैसे कमा लिए हैं.लेकिन इसके साथ ही वे हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के कुचक्र के शिकार भी हो गए है.हर तरह की फिल्म करने के चक्कर में उनकी प्रतिभा का उपयोग नहीं हो पा रहा है।
रघुबीर यादव और राजपाल यादव में यह बड़ा फर्क है.राजपाल ने धारा के साथ चलना स्वीकार किया,जबकि रघुबीर यादव किनारे बैठ कर फिल्मों की धारा देखते रहे.किसने सही किया?यह वक़्त बताएगा.चवन्नी इसी बात से खुश है कि रघुबीर यादव और राजपाल यादव ने एक मुकाम पाया और कई लोगों के लिए प्रेरणा बने.
Monday, January 28, 2008
फिल्मी चलन- एक प्रतिनिधि इंटरव्यू
इन दिनों फिल्म स्टार इंटरव्यू देने से भागते हैं.बेचारे पत्रकारों की समस्या का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.आम तौर पर फिल्म पत्रकारों को ही दोषी माना जाता है और कहा जाता है कि उनके पास सवाल नहीं रहते.ऊपर से फिल्म बिरादरी के लोग शिक़ायत करते हैं कि हम से एक ही तरह के सवाल पूछे जाते हैं।
चलिए आपको चवन्नी बताता है कि आम तौर पर ये इंटरव्यू कैसे होते हैं.मान लीजिये एक फिल्म 'मन के लड्डू' रिलीज हो रही है.इसमें कुछ बड़े कलाकार हैं.बड़ा बैनर और बड़ा निर्देशक भी है.फिल्म की रिलीज अगर १ मार्च है तो १५ फरवरी तक प्रोड्यूसर की तरफ से फिल्म का पी आर ओ एक मल्टी मीडिया सीडी भेजेगा.इस सीडी में चंद तस्वीरें,फिल्म की कहानी और फिल्म के कलाकारों की लिस्ट रहती है.इधर सीडी मिली नहीं कि अख़बारों में उसके आधार पर पहली झलक आने लगती है.न प्रोड्यूसर कुछ बताता है और न निर्देशक को फुरसत रहती है.अमूमन फिल्म की रिलीज के दो दिनों पहले तक फिल्म पर काम ही चल रहा होता है।
बहरहाल,इसके बाद तय किया जाता है कि फिल्म के स्टार इंटरव्यू देंगे.पत्रकार से पूछा जाता है कि क्या आप इंटरव्यू करना चाहेंगे?अब कौन मना करेगा?बताया जाता है कि आप १८ फरवरी को शाम में ६ बजे प्रोड्यूसर के ऑफिस में आ जाइये.वहाँ १०-१० के कमरे में सारे पत्रकार बिठा दिए जाते हैं.प्रोड्यूसर थोडा उदार हुआ तो चाय,ठंडा,पानी का इन्तेजाम कर देगा.अब सारे पत्रकार इंतज़ार शुरू करते हैं.पी आर ओ का आदमी बार-बार बताता रहेगा कि बस स्टार चल चुका है.मुम्बई की ट्रैफिक का बहाना बना कर आराम से हीरो दो घंटे देर से मुस्कराता हुआ पहुंचेगा.परिचित और सीनियर पत्रकारों से हाथ मिला कर वह सभी के गुस्से को शांत कर देगा.फिर इंटरव्यू शुरू होगा.वह मुखिया की तरह मध्य में बैठ जाएगा और पंचों और गाँव के लोगों की तरह सारे पत्रकार उसे घेर लेंगे।
अरे हाँ पी आर ओ का आदमी पहले ही बता देगा कि आप कोई पर्सनल सवाल नहीं पूछेंगे.सवाल सिर्फ फिल्मों से संबंधित हो.किसी पर्सनल सवाल से स्टार का मूड ऑफ़ हो गया तो मुश्किल होगी,क्योंकि इंटरव्यू नहीं होगा।
पहला सवाल-आप को इस रोल में क्या खास लगा?
स्टार-बहुत जबरदस्त रोल है.मैंने पहले कभी ऐसा रोल नहीं किया.मैं निर्देशक का एहसानमंद हूँ कि उन्होने मुझे इसके लिए चुना.इस रोल का ग्रे शेड मुझे पसंद है.अब आप ही बताएं कि है न जबरदस्त रोल।
(पत्रकारों के बीच फुसफुसाहट होती है ...हाँ...हाँ..सभी अपनी खीसें निपोर देते हैं।)
दूसरा सवाल-क्या रोल है और अगर कहानी बता सकें?
स्टार-कहानी तो मैं नहीं बता सकता.आप फिल्म देखें.हाँ,मेरे किरदार का नाम मनोज है और इस रोल के लिए मुझे वजन घटाना पड़ा.तीन महीने की मेहनत और कसरत से यह हो सका.हाँ,मेरे कपड़े विक्रम ने डिजाईन किये हैं.उनमें खास बात है.वे किरदारों के अनुरूप कपडे डिजाईन करते हैं.इतना ही कह सकता हूँ कि फिल्म की कहानी जबरदस्त है और बिल्कुल नए तरीके से निर्देशक ने इसे चित्रित किया है।
तीसरा सवाल-फिल्म की नायिका के बारे में क्या कहेंगे?
स्टार-जी उनकी क्या तारीफ करूं.वह बहुत सहयोग करती है.उनके रहने पर सेट का माहौल बहुत खुशगवार रहता है.मैंने उनके नखरों के बारे में सुना था,लेकिन मुझे कभी ऐसा एहसास नहीं हुआ।
चौथा सवाल-और फिल्म के निर्देशक?
स्टार-उन्हें मालूम रहता है कि उन्हें क्या चाहिए.वह हम कलाकारों को निखरने का मौका देते है.बहुत फ़ोकस होकर काम करते हैं.आप यकीन मानें अभी कोई ऐसा निर्देशक नहीं है ,जो उनके जैसा काम कर सके।
पांचवां सवाल-शूटिंग कैसी रही?
स्टार-घरेलू माहौल था.बिल्कुल पिकनिक जैसा रहा.पता ही नहीं चला और शूटिंग खत्म हो गयी।अच्छा दोस्तों मैं थोडा जल्दी में हूँ...अगर और कोई सवाल हो तो फ़ोन कर लीजियेगा.स्टार किसी और का मोबाइल नंबर देकर चलता बनेगा...
चवन्नी ने स्टार के जवाब थोड़े छोटे कर दिए हैं.क्योंकि स्टार इसी को रबड़ की तरह खींच कर बताता है.और भी सवाल-जवाब होते हैं.उन पर फिर कभी।
इसके बाद पत्रकारों का काम शुरू होता है.वे इसे विशेष इंटरव्यू बताते हैं और अपनी तरफ से जोड़कर इसे पठनीय और रोचक बनाते हैं.किसी फिल्म की तरह ही इस तरह के ज्यादातर इंटरव्यू सच पर आधारित कल्पना से तैयार किया जाता है.उद्देश्य एक ही है कि मनोरंजन हो.पाठक पढें तो मनोरंजित हों.
Sunday, January 27, 2008
शाहरुख़ खान को फ़्रांस का सम्मान
शाहरुख़ खान को कल रात फ़्रांस के राजदूत जेरोम बोनाफों ने फ़्रांस के प्रतिष्ठित insignia of officer in the order of arts & letters से सम्मानित किया.उन्हें यह सम्मान इसलिए दिया गया है कि उन्होंने कला और साहित्य के क्षेत्र में प्रसिद्धि पायी है और फ़्रांस एवं शेष दुनिया में उसे प्रचारित भी किया है.यह हिन्दी फिल्मों का जलवा है.शाहरुख़ खान को इतराने का यह मौका उसी हिन्दी फिल्म ने दिया है,जिसमें बोलने और बात करने से वे कतराते हैं.उस पर चवन्नी फिर कभी विस्तार से बताएगा।
कल रात मुम्बई के एक पंचसितारा होटल में यह सम्मान दिया गया.फ़्रांस के राजदूत महोदय ने आश्वस्त किया कि भविष्य में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्मों को ज्यादा तरजीह दी जायेगी.कोशिश रहेगी कि कान फिल्म महोत्सव में भारत की फिल्में आमंत्रित की जाएँ.राजदूत महोदय ने स्वीकार किया कि फ़्रांस अभी तक भारतीय फिल्मों को अधिक तवज्जो नहीं दे रहा था।
इस अवसर पर शाहरुख़ खान ने फ्रांसीसी फिल्मों की तारीफ की और जोर देकर कहा कि हर दर्शक और फिल्मकार को फ़्रांस की फिल्में देखनी चाहिए.उन्होंने बगैर किसी शर्म के बताया कि वे दिल्ली में जवानी के दिनों में फ्रांसिसी फिल्में देखा करते थे.देखने के मुख्य वजह उन फिल्मों के प्रणय दृश्य होते थे।
फ़्रांस के अपने अनुभव बांटते हुए उनहोंने बताया कि उन्हें इस बात का एहसास है कि वे फ़्रांस में काफी पॉपुलर हैं.एक बार वे मशहूर रित्ज़ होटल में ठहरे थे.होटल से निकलने लगे तो भीड़ उमड़ पड़ी.किसी ने कहा कि यह टॉम क्रूज़ नहीं है ,फिर इतनी भीड़ क्यों?थोडी देर में भीड़ का एक और रेला शाहरुख़ खान और एस आर के चिल्लाता हुआ आया और सवाल पूछने वाला उस लहर में खो गया.
चोली में फुटबाल
माफ़ करें अगर ऐसे गानों और गब्बर सिंह जैसी फिल्मों से भोजपुरी सिनेमा आगे बढ़ रहा है तो बहुत गड़बड़ है.कहीं भोजपुरी सिनेमा किसी गड्ढे में गिरकर तो आगे नहीं बढ़ रहा है.भोजपुरी फिल्मों में अश्लील गीतों और उसी के मुताबिक अश्लील मुद्राओं पर बहुत जोर रहता है।क्या सचमुच दर्शक यही चाहते हैं?
चवन्नी की समझ में एक बात आ रही है कि भोजपुरी सिनेमा के दर्शक मुख्य रुप से पुरुष हैं.उनकी अतृप्त यौन आकांक्षाओं को उकसा कर पैसे बटोरे जा रहे हैं.यह अच्छी बात नहीं है.भोजपुरी इलाक़े के बुद्धिजीवियों को हस्तक्षेप करना चाहिए.वक़्त आ गया है कि हम भोजपुरी सिनेमा की मर्यादा तय करें और उसे इतना शिष्ट बनायें कि परिवार की बहु-बेटियाँ भी उसे देख सकें।
शीर्षक में आये शब्द गब्बर सिंह नाम की फिल्म के हैं.इसमें चोली में बाल,फुटबाल और वोलीबाल जैसे शब्दों का तुक भिडा़या गया है.इस गाने में फिल्म के दोनो नायक और लिलिपुट जैसे वरिष्ठ कलाकार अश्लील तरीके से नृत्य करते नज़र आये हैं.कृपया इस तरफ ध्यान दें और अपनी आपत्ति दर्ज करें।
भोजपुरी सिनेमा को गंगा,बियाह,गवना,बलमा,सैयां आदि से बाहर आने का समय आ गया है.बाबु मनोज तिवारी और बाबु रवि किशन भी इस दिशा में पहल कर सकते हैं.
Friday, January 25, 2008
कॉमेडी, थ्रिलर और एक्शन यानी संडे
-अजय ब्रह्मात्मज
कॉमेडी, थ्रिलर और एक्शन तीनों को उचित मात्रा में मिला कर रोहित शेट्टी ने अपने किरदारों के साथ ऐसा घोला कि एक मनोरंजक फिल्म तैयार हो गई है। रोहित ने पारंपरिक तरीके से एक-एक कर अपने प्रमुख किरदारों को पेश किया है। किरदारों को स्थापित करने के बाद उनके ट्रैक आपस में मिलना शुरू करते हैं। शुरू में एक कंफ्यूजन बनता है, जो इंटरवल तक सस्पेंस में तब्दील हो जाता है।
फिल्म के शुरू में चेजिंग होती है। उस समय हीरो राजवीर चांदनी चौक की गलियों, मुंडेरों और छतों पर दौड़ता-छलांग लगाता दिखाई पड़ता है। फिल्म के अंत में भी चेज है, लेकिन वह कारों में हैं। कारें नाचती हुई पलटती हैं। कारों को उड़ाने, पलटाने और ध्वस्त कराने में रोहित को आनंद आता है।
सहर (आयशा टाकिया) और राजवीर (अजय देवगन) की इस प्रेम कहानी में कुमार (इरफान खान) और बल्लू (अरशद वारसी) भी आते हैं। सहर की जिंदगी से एक संडे मिसिंग है और फिल्म का सस्पेंस इसी संडे से जुड़ा है। इरफान खान ने स्ट्रगलिंग एक्टर का सुंदर काम किया है। आखिरकार वे भोजपुरी फिल्मों के सिंगिंग स्टार बन जाते हैं, लेकिन इस उपलब्धि को छोटी नजर से पेश किया गया है। फिल्म का सस्पेंस कहानी में धीरे से घुस जाता है और सारे किरदारों को अपनी ओर मोड़ लेता है। फिर सस्पेंस को खोलने और सुलझाने में राजवीर और उसके सहयोगी अनवर (मुकेश तिवारी) की तरकीबें रोचक तरीके से सामने आती हैं।
इरफान खान के किरदार में और भी संभावनाएं थीं। उनकी कॉमिक प्रतिभा का और सुंदर इस्तेमाल हो सकता था। फिर भी जितने दृश्य उन्हें मिले हैं, उनमें इरफान अपनी मसखरी से संतुष्ट करते हैं। अरशद वारसी इस बार कभी लाउड तो कभी किरदार से अलग होते से दिखे। अजय देवगन कॉमिक दृश्यों में फबते हैं। आयशा टाकिया को उलझनों से भरी एक लड़की का किरदार निभाना था। वह इसे निभा ले जाती हैं।
गीत-संगीत कहानी के अनुरूप है। थोड़ी मौज-मस्ती और चुहलबाजी गानों में दिखाई पड़ती है। हां, आयटम सौंग में तुषार कपूर और ईशा देओल कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते। फिल्म के अंत में जोड़ी गई मेकिंग की फुटेज भी रोचक है।
चवन्नी की सलाह :देख सकते हैं
Thursday, January 24, 2008
शुरू हो फिल्मों की पढ़ाई
-अजय ब्रह्मात्मज
अब स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में फिल्मों को पाठ्यक्रम में शामिल करने का वक्त आ गया है। दरअसल, आज फिल्में हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन गई हैं। हर व्यक्ति फिल्में देखता है और यही वजह है कि फिल्में और उनके स्टार हमारी बातचीत और विमर्श का हिस्सा बन गए हैं। फिल्मों के इस प्रसार और प्रभाव के बावजूद अभी तक सामाजिक स्तर पर फिल्मों के प्रति हमारा रवैया सहज नहीं हो पाया है, क्योंकि इसे एक विषय के तौर पर पाठ्यक्रम में शामिल करने को हम तैयार नहीं हैं। कुछ विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र कोर्स या किसी कोर्स के हिस्से के तौर पर सिनेमा की पढ़ाई आरंभ जरूर हो गई है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।
इन दिनों हर तरह की प्रतियोगिता की परीक्षाओं में सिनेमा से संबंधित सवाल पूछे जाते हैं। इन प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थी अपने सामान्य ज्ञान या उपलब्ध सीमित जानकारियों के आधार पर ही जवाब देते हैं। अभी तक कोई व्यवस्थित पुस्तक या संदर्भ स्रोत नहीं है, जहां से विधिवत और क्रमिक जानकारी ली जा सके। फिल्मों पर आ रही पुस्तकें मुख्य रूप से स्टार या फिल्म पर ही केंद्रित होती हैं, क्योंकि ट्रेंड, इतिहास और प्रवृत्तियों को लेकर पुस्तकें लिखने का चलन नहीं है। प्रकाशक भी हीरोइनों की रसदार जीवनी में रुचि दिखाते हैं। उनसे किसी पीरियड या ट्रेंड पर किताब की बात करें, तो सीधा जवाब होता है कि हिंदी में कौन पढ़ता है ऐसी पुस्तकें? अब सवाल यह उठता है कि पहले पुस्तकें छपेंगी, तभी तो पता चलेगा कि उसके पाठक हैं या नहीं? इधर जरूरत महसूस की जा रही है कि दर्शकों में सिने संस्कार लाने के लिए उन्हें फिल्मों के इतिहास की सही जानकारी दी जाए। फिल्म एप्रिसिएशन के कोर्स छोटी कक्षाओं के लिए भी तैयार किए जाएं, ताकि दर्शकों की रुचि विकसित हो सके।
चूंकि बचपन से हम लोकप्रिय सिनेमा के नाम पर ज्यादातर फूहड़, अश्लील और घटिया फिल्में देखकर आनंदित होते रहते हैं, इसलिए हमारा सिने संस्कार भी वैसा ही हो जाता है। हमें साधारण किस्म की मनोरंजक फिल्में अच्छी लगती हैं। अगर किसी फिल्म में मुद्दे और महत्व की बातें हों, तो हम उन्हें गंभीर का दर्जा देकर किनारे कर देते हैं। बेहतरीन फिल्में सिर्फ आभिजात्य और शिक्षित समूह तक ही सीमित रह जाती हैं। ऐसा मान लिया गया है कि पढ़े-लिखे लोगों का सिनेमा अलग होता है और सिनेमा का आम दर्शक चालू किस्म की फार्मूला फिल्में ही पसंद करता है। इस धारणा को हमारे निर्माता, निर्देशक और स्टार अपनी सुविधा और फायदे के लिए हमेशा पुष्ट करते रहते हैं। निश्चित तौर पर हर दौर में बेहतरीन फिल्मों का प्रतिशत कम रहता है। दर्शकों के बीच फिल्मों का ज्ञान बढ़ाकर अच्छी और खराब फिल्मों का भेद बताकर और सिनेमा की समझ पैदा कर हम दर्शकों को बेहतरीन सिनेमा से जोड़ सकते हैं। अगर देश के विशिष्ट और अविवादित फिल्मी हस्तियों और सार्थक व खूबसूरत फिल्मों से हम उन्हें परिचित कराएं, तो अवश्य फर्क आएगा। सामाजिक जीवन और पाठ्यक्रम में फिल्मों से परहेज कर हम दर्शकों को यथास्थिति में ही रखेंगे। दरअसल.. जरूरत है कि हम फिल्मों को सहेज कर रखें और उसकी शिक्षा दें।
Wednesday, January 23, 2008
रिया की पार्टी में नहीं आएंगे रुश्दी
चवन्नी कल रात से ही परेशान था .उसे बताया गया था कि रिया सेन की जन्मदिन पार्टी में सलमान रुश्दी आ रहे है.मायानगरी मुम्बई के लिए यह बड़ी घटना है और चवन्नी को इस पर नज़र रखनी चाहिए.चवन्नी ने अपना चश्मा साफ किया और कल रात जल्दी सो गया ताकि ताज़ा दिमाग से पूरे मामले को देख और समझ सके.सलमान रुश्दी सिर्फ लिख कर ही परेशान नहीं करते.वे देख कर भी दुखी करते हैं.अब इसी प्रसंग को लें.पद्मा लक्ष्मी से बिछुड़े अभी कुछ ही महीने हुए होंगे और जनाब रिया सेन के रसिक हो गए।
हुआ यों कि परमेश्वर गोदरेज की एक पार्टी में शामिल होने के लिए वे मुम्बई आये थे.बड़े लोगों की उस पार्टी में कई बड़ी हस्तियाँ थीं.वहीं अपनी सेन सिस्टर्स रिया और राइमा भी थीं.दोनों आकर्षक हैं,जवान हैं और नैन मटक्का करने में उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं होती.वास्तव में चवन्नी की मध्यवर्गीय बिरादरी की यह समस्या है कि कोई पुरुष किसी स्त्री से थोडा अंतरंग हो जाता है तो खबर फैल जाती है कि आग लगने वाली है,क्योंकि धुआं दिखा है.चवन्नी को लगता है कि यह धुआं उन पत्रकारों के दिमाग में रहता है जो भावनात्मक रुप से असुरक्षित ज़िंदगी जी रहे होते हैं.उस पर अलग से और कभी बात होगी।
रिया और रुश्दी के प्रसंग में नया पेंच यह है कि रुश्दी साहब का दिल रिया और राइमा की अम्मा मुनमुन सेन पर आया है.और वहाँ तक पहुँचने के लिए उन्हें बेटियों का जरिया आसान लगा.पार्टी के दौरान उन्होंने थोडी रूचि और अंतरंगता दिखाई.लगे हाथ रिया ने उन्हें अपने जन्मदिन के लिए आमंत्रित कर लिया.रुश्दी जैसा व्यक्ति भला क्यों रिया का दिल तोड़ता?उन्होंने कहा कि जरूर आएंगे.खबर फैल गयी।
ताज़ा खबर है कि सलमान रुश्दी चुपके से अपने ठिकाने को रवाना हो गए और अब रिया सफ़ाई देत फिर रही हैं कि ऐसी तो कोई बात ही नहीं थी.चवन्नी खुश है कि चलो राहत मिली.
Tuesday, January 22, 2008
दिल्ली,लाहौर और मुम्बई पर बन रही फिल्में
भारत और पाकिस्तान के ये तीन महानगर हैं.लाहौर तो किसी ज़माने में शिक्षा और संस्कृति के साथ व्यापर का भी केन्द्र हुआ करता था.देश के विभाजन के साथ पंजाब का भी विभाजन हुआ और लाहौर लहूलुहान हो गया.आज तक लाहौर रिस रहा है.उस पर कभी और चर्चा करेगा चवन्नी...लेकिन चवन्नी क्यों चर्चा करे?
चवन्नी को पता चला है कि लाहौर की पृष्ठभूमि पर हिन्दी में तीन फिल्मों की तैयारी चल रही है.इनमें से दो फिल्मों की कहानी तो हीरामंडी के इर्द-गिर्द घूमती हैं और तीसरी का संबंध विभाजन से है.पूजा भट्ट की फिल्म हीरामंडी पर ही केन्द्रित है और इस में आशुतोष राणा फिर से एक खतरनाक खलनायक की भूमिका निभाने जा रहे हैं.उम्मीद है कि फ़रवरी में इस फिल्म की शूटिंग आरंभ हो जायेगी.संजय लीला भंसाली ने भी एक फिल्म प्लान की है.उनकी फिल्म में मुमकिन है रानी मुख़र्जी शीर्ष भूमिका निभाएं,संजय के व्यक्तित्व की तरह यह फिल्म अभी तक रहस्य में है.मालूम नहीं कब शुरू होगी फिल्म?लाहौर पर बन रही तीसरी फिल्म होगी राज कुमार संतोषी की.घोषणाएं करने में अव्वल संतोषी की फिल्म असगर वजाहत के नाटक जिस लाहौर नइ देख्या ... पर आधारित है.इस फिल्म के लिए संतोषी ने सैफ अली खान से बात की थी,लेकिन उनहोंने मन कर दिया है.मालूम नहीं रतन की माँ का रोल संतोषी किसे दे रहे हैं?इस नाटक को पढ़ते हुए गुलज़ार के मेरे अपने की मीना कुमारी याद आ जाती हैं.क्या है कोई अभिनेत्री जो मीना कुमारी का किरदार निभा ले?
चवन्नी अब बात करेगा दिल्ली की-दिल्ली पर भी तीन फिल्में बन रही हैं.दिली-६,चांदनी चौक टू चाइना और दिल्ली बेली.दिल्ली-६ की शूटिंग चालू हो गयी है.फ़िलहाल जयपुर में अभिषेक बच्चन और सोनम कपूर के साथ राकेश मेहरा फिल्म के खास दृश्य वहाँ फिल्मा रहे हैं.दिल्ली-६ चांदनी चौक का पिन कोड है.निखिल अडवानी की चांदनी चौक टू चाइना भी चांदनी चौक से शुरू होगी.इस में अक्षय कुमार और दीपिका पादुकोन भी हैं. तीसरी फिल्म के निर्माता आमिर खान हैं और वे मुख्य भूमिका भी निभाएंगे .दिल्ली बेली वास्तव में दिल्ली की अंतड़ियों को खोलेगी.इस फिल्म को लिखा है अक्षत वर्मा ने और इसका निर्देशन स्वीडेन के रॉबर्ट कर रहे हैं मार्च से इसकी शूटिंग आरंभ हो जायेगी।
अब अंत में मुम्बई.मुम्बई तो लगातार हिन्दी फिल्मों में दिखती रही है,लेकिन कुछ ही फिल्मों में इसका चरित्र सामने आया है.युवा निर्देशक संजय झा की फिल्म चकाचक मुम्बई -अ क्लीन लव स्टोरी में मुम्बई अलग अंदाज में दिखेगी.मुम्बई पर ही मुम्बई मेरी जान भी बन रही है.इसमें आर माधवन और इरफान खास भूमिकाएं निभा रहे हैं.इसके निर्देशक कामथ हैं,जिनकी मराठी में बनी डोंबिवली फास्ट खूब चर्चित हुई थी.
सलाम सलीम बाबा
नोर्थ कोलकाता में रहते हैं सलीम बाबा. दस साल की उम्र से वे सिनेमाघरों के बाहर फेंके फिल्मों के
७०% मत मिले अमिताभ बच्चन को
पिछले दिनों चवन्नी ने आप कि राय मांगी थी कि आप अशोक की भूमिका में अमिताभ बच्चन और अजय देवगन में किसे देखना चाहेंगे?इस बार आप की हिस्सेदारी उत्साहजनक रही.चवन्नी के पाठकों में से जिन सभी ने मतदान दिए,उन में से ७० प्रतिशत ने अमिताभ बच्चन के पक्ष में मतदान किया.अजय देवगन को केवल ३०% मतदाता ही अशोक की भूमिका में देखना चाहते हैं।
अगर आप ने मतदान नहीं किया था और अब अपनी राय देना चाहते हैं तो स्वागत है.आप टिप्पणी के रुप में अपनी राय पोस्ट करें.
