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Friday, December 19, 2008

फ़िल्म समीक्षा:वफ़ा


दर्दनाक अनुभव

काका उर्फ राजेश खन्ना की फिल्म वफा से उम्मीद नहीं थी। फिर भी गुजरे जमाने के इस सुपर स्टार को देखने की लालसा थी। यह उत्सुकता भी थी कि वापसी की फिल्म में वह क्या करते हैं? हिंदी फिल्मों के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना ने कभी अपने अभिनय और अनोखी शैली से दर्शकों को दीवाना बना दिया था। दूज के चांद जैसी अपनी मुस्कराहट और सिर के झटकों से वह युवाओं को सम्मोहित करते थे। आरंभिक सालों में लगातार छह हिट फिल्मों का रिकार्ड भी उनके नाम है। फिर इस सुपरस्टार को हमने गुमनामी में खोते भी देखा।
वफा से एक छोटी सी उम्मीद थी कि वह अमिताभ बच्चन जैसी नहीं तो कम से कम धर्मेंद्र जैसी वापसी करेंगे। लगा जवानी में दर्शकों के चहेते रहे राजेश खन्ना को प्रौढ़ावस्था में देखना एक अनुभव होगा। अनुभव तो हुआ, मगर दर्दनाक। एक अभिनेता, स्टार और सुपरस्टार के इस पतन पर। क्या वफा से भी घटिया फिल्म बनाई जा सकती है? फिल्म देखने के बाद बार-बार यही सवाल कौंध रहा है कि राजेश खन्ना ने इस फिल्म के लिए हां क्यों की? किसी भी फिल्म की क्रिएटिव टीम से पता चल जाता है कि वह कैसी बनेगी? अपने समय के तमाम मशहूर निर्माता-निर्देशकों और अभिनेत्रियों के साथ काम कर चुके राजेश खन्ना को निर्देशक राकेश सावंत और अभिनेत्री सारा के साथ काम करने की क्या जरूरत पड़ गई?
वफा अश्लील ही नहीं, फूहड़ और घटिया भी है। स्त्री चरित्र का ऐसा घटिया चित्रण सी ग्रेड की कामुक फिल्मों में भी नहीं होता। उन फिल्मों की अश्लीलता का भी एक लाजिक होता है। वफा दर्शकों की संवदेनशीलता को चोट पहुंचाती है। राजेश खन्ना के प्रशंसकों को घोर निराशा होगी। ऐसी वापसी से तो बेहतर था कि राजेश खन्ना गुमनाम ही रहते।

2 comments:

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

आपकी समीक्षा से पैसे बच गए अब तो ये फ़िल्म नही देखना है . सटीक

संगीता पुरी said...

जानकारी देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।