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Thursday, December 11, 2008

दरअसल:रामगोपाल वर्मा की ताज यात्रा

-अजय ब्रह्मात्मज
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के साथ राम गोपाल वर्मा ताज होटल क्या चले गए, हंगामा खड़ा हो गया! उनके हाथ से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई। हालांकि उनकी कुर्सी के जाने या रहने का सीधा ताल्लुक रामू की ताज यात्रा से नहीं होना चाहिए, लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो रामू को इसके लिए जिम्मेदार मानेंगे। एक एसएमएस भी चला कि रामू ने दो बार सरकार बनाई और एक बार गिरा दी।
बगैर उत्तेजित हुए हम सोचना आरंभ करें, तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के साथ रामू की ताज यात्रा पर व्यक्त हो रहीं तीखी प्रतिक्रियाएं दरअसल फिल्मों के प्रति हमारी सोच की बानगी है। फिल्मों को हम सभी ने मनोरंजन का माध्यम मान लिया है। निर्माता हमारे लिए एंटरटेनर के सिवा और कुछ नहीं। समाज में फिल्मों को ऊंचा दर्जा नहीं हासिल है। हम फिल्मी चर्चाओं में इतने गैरजिम्मेदार होते हैं कि उनकी जिंदगी के बारे में चटखारे लेकर बातें करते हैं और उन्हें नीची नजर से देखते हैं। अजीब विरोधाभास दिखता है समाज में। एक तरफ तो फिल्में देखने के लिए आतुर दर्शकों की भीड़ हमें अचंभित करती है। किसी भी स्थान पर स्टार की मौजूदगी आकर्षण का केंद्र बन जाती है। हम उन्हें छूने के लिए लालायित रहते हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर चर्चा और बातचीत में फिल्मों को सिरे से खारिज कर देते हैं। क्या निर्माता, आर्टिस्ट और फिल्म बिरादरी के लोग इस समाज में नहीं रहते? क्या वे मुंबई हमले जैसी घटनाओं से प्रभावित नहीं होते? देखें, तो लोगों के सुख-दुख और हर्ष-विषाद के साथ ही राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों से वे भी उसी प्रकार आहत या गर्व महसूस करते हैं, जैसा कि एक आम हिंदुस्तानी। मुंबई हमले की ही बात करें, तो मीडिया में अमिताभ बच्चन, आमिर खान, अजय देवगन समेत छोटी-बड़ी फिल्मी हस्तियों के बयानों और टिप्पणियों को प्रमुखता से छापा और प्रसारित किया जा रहा है। बहस में हम उन्हें शामिल करते हैं, पैनल चर्चा में बुलाते हैं, ताकि दर्शक टीवी से चिपके रहें। अगर उनकी बिरादरी का एक प्रमुख व्यक्ति मौका पाकर ताज होटल में चला जाता है, तो हम हाय-तौबा मचाने लगते हैं और उसकी संवेदनशीलता को मसखरी बना देते हैं।
बेटे रितेश देशमुख को लेकर ताज होटल गए विलासराव देशमुख पर सवाल उठा रहे लोगों को क्या तब भी आपत्ति होती, जब रितेश राजनीति में होते? शायद नहीं होती। नेहरू इंदिरा गांधी को लेकर महत्वपूर्ण बैठकों और यात्राओं में जाते थे। कहा जा सकता कि इंदिरा गांधी भी राजनीति में थीं, लेकिन क्या सिर्फ फिल्मों में काम करने से व्यक्ति कम समझदार और असंवेदनशील हो जाता है? क्या फिल्मों से जुड़ने के बाद मनुष्य को तकलीफ नहीं होती?
अपराध और आतंक पर फिल्में बनाने के माहिर राम गोपाल वर्मा ने एक फिल्मकार की हैसियत से पहला मौका मिलते ही मुंबई हमले के ठिकाने को देखने की पहल की। मान लें कि उनके दिमाग में कोई फिल्म घूम रही हो और वे उसके फ‌र्स्ट हैंड रिसर्च के लिए ही वहां चले गए हों, तो क्या उन्होंने अपराध कर दिया? आखिर विलासराव देशमुख के साथ रामू की ताज यात्रा प्रहसन क्यों बन गई है?
दरअसल, हमारी नजर में फिल्मकार महज मनोरंजन का सामान परोसने वाले होते हैं और यही वजह है कि गंभीर और संवेदनशील मुद्दों से उन्हें दूर रखा जाता है। माना जाता है कि उनकी सामाजिक और राजनीतिक समझ खोखली होती है। वे नाच-गाने और मनोरंजन के लिए ही ठीक हैं। वे विदूषक हैं और उन्हें बस विदूषक की भूमिका में ही रहना चाहिए। वास्तव में यह फिल्मकारों के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह की एक झलक है। क्या हम इस पूर्वाग्रह को छोड़ने के लिए तैयार हैं..?

4 comments:

महेन said...

आपकी बात को थोड़ा सा घुमाकर कहूँ तो यह सच है कि सिनेमा को लेकर द्विस्तरीय सोच हमारे समाज में हमेशा रही है। यदि यही घटना दक्षिण में होती और रजनीकांत या चिरंजीवी किसी मुख्यमंत्री के साथ होते तो यह मुद्दे की शक्ल नहीं लेता। वहां और उत्तर भारत में सिने-स्टार अलग-अलग किस्म के जीव माने जाते हैं।
जहां तक द्विस्तरीय सोच का मसला है, वह मुझे इतना गलत नहीं लगता क्योंकि उसका कारण बहुत हद तक बालीवुड ही है, जहां ज़्यादातर लोगों का उद्देश्य पैसा बटोरना है। जो लोग स्टार्स को पूजते हैं, उन्हें उनके देशमुख के साथ जाने में कोई आपत्ति नहीं होती मगर वे लोग समाज में ट्रेंड स्थापित करने वाले लोगों में से नहीं हैं। यदि वे विरोध करें भी तो देशमुख को इस्तीफ़ा नहीं देना पड़ता और यदि वे समर्थन पर आ जाएं तो भी देशमुख को इस्तीफ़ा देना ही पड़ता। वे लोग, जो ट्रेंड स्थापित करते हैं (जिन्हे शायद आप सभ्य समाज कहते हैं), उनका फ़िल्मों से जुड़े लोगों का मूल्यांकन पूरा पूरा ग़लत नहीं ठहराया जा सकता। RGV या रितेश के बजाय वहां गुलज़ार होते तो शायद ऐसा मुद्दा ही नहीं उठता। मैं RGV या रितेश की संवेदनशीलता पर सवाल नहीं उठा रहा हूँ, मगर वह आम आदमी तक प्रेषित नहीं होती और न ही वे लोग इसे गंभीरता से लेते हैं इसलिये लोग भी उन्हें पैसे छापने की मशीन से ज़्यादा कुछ नहीं समझते।

आनंद said...

मैं आपकी बातों से सहमत हूँ। मुझे भी यही लगता है कि‍ इस बात को अनावश्‍यक तूल दि‍या गया है। हमें सोच के स्‍तर पर और उदार होने की ज़रूरत है।
- आनंद

''ANYONAASTI '' said...

आप की सोच सही ही है मुझे आज भी याद है कि जब अमित जी राजीव गांधी के साथ के साथ राजनीती में आए थे तो हमारे एक तथाकथित नेता मित्र जो अपने को 'समाज वादी 'घोषित कर चुके थे ,बड़े अफसोस से बोले अब नचनिया गवैया देश कि राजनीत चलाएंगे ? मुझे हँसी आगई थी ! वह पूछ बैठे मैं क्यों हंसा था उन्होंने तो इतनी गंभीर ढंग से देश के प्रति अपनी चिंता व्यक्त कि थी ? मैं बात को टालना चाहता था पर वे उत्तर के लिए अडी पर आगये ] तब मैंने उन से तुलनात्मक बहस कि " आप अपने परिवार के पहले और अकेले शिक्षित सदस्य हैं ' बच्चन का पूरा परिवार एक एकेडमिक रूचि का परिवार है ] ] आप नक़ल टीप कर फलां डिग्री कालेज से [जो उस समय अपनी अराजकता भरे माहौल और नक़ल के लिए सुविख्यात हो चुका था ] अपनी सारी शिक्षा पाए हैं ;'बच्चन पररिवर कि शिक्षा का स्तर बहु उंचा और पीढी दर पीढी का है अमेरिका का राष्ट्र पति भी भैडैत है / आमेरिका कि बात ना करें अच्छा ही होगा ,कोमुनिज्म के कुछ सिद्धांत झाड़ बैठे ] सनद है कि उन्होंने मुझस दोस्ती समात करदी देश के दुर्भाग्य से वे एक बार विधायक भी हो गाये उनकी नेता गिरी कि डिग्री बढ गयी मैं शासकीय सेवा में आकर सेवानिवृत होगया हूँ और वे आज भी दुबारा विधायिकी के लिए चुनाव लड़े दो बार हारे ,अगाली बार पार्टी ने भी धता बता दी ,विधान परिषद् का वादा कर दिया ] उनकी निगाह में बन्दा यानी कि मै बहुत हकीर चीज हूँ क्योंकि जिस शासन कोवे चला चुकें हैं मैं उस में एक दाना कारिन्दा रहा ]यह बात दीगार है वह मैंने अपनी योग्यता से पाई ३३ वर्षों बढ सेवा निवृत हुआ उन जनता ने अगली टर्म में रिटायर कर बैठी ]यह उन लोगों के विचा र हैं जो राज निति में हैं ]जो हमारे आप के ही बीचसे अआते हैं और समाज का आईना हैं ]

''ANYONAASTI '' said...

आप की सोच सही ही है मुझे आज भी याद है कि जब अमित जी राजीव गांधी के साथ के साथ राजनीती में आए थे तो हमारे एक तथाकथित नेता मित्र जो अपने को 'समाज वादी 'घोषित कर चुके थे ,बड़े अफसोस से बोले अब नचनिया गवैया देश कि राजनीत चलाएंगे ? मुझे हँसी आगई थी ! वह पूछ बैठे मैं क्यों हंसा था उन्होंने तो इतनी गंभीर ढंग से देश के प्रति अपनी चिंता व्यक्त कि थी ? मैं बात को टालना चाहता था पर वे उत्तर के लिए अडी पर आगये ] तब मैंने उन से तुलनात्मक बहस कि " आप अपने परिवार के पहले और अकेले शिक्षित सदस्य हैं ' बच्चन का पूरा परिवार एक एकेडमिक रूचि का परिवार है ] ] आप नक़ल टीप कर फलां डिग्री कालेज से [जो उस समय अपनी अराजकता भरे माहौल और नक़ल के लिए सुविख्यात हो चुका था ] अपनी सारी शिक्षा पाए हैं ;'बच्चन पररिवर कि शिक्षा का स्तर बहु उंचा और पीढी दर पीढी का है अमेरिका का राष्ट्र पति भी भैडैत है / आमेरिका कि बात ना करें अच्छा ही होगा ,कोमुनिज्म के कुछ सिद्धांत झाड़ बैठे ] सनद है कि उन्होंने मुझस दोस्ती समात करदी देश के दुर्भाग्य से वे एक बार विधायक भी हो गाये उनकी नेता गिरी कि डिग्री बढ गयी मैं शासकीय सेवा में आकर सेवानिवृत होगया हूँ और वे आज भी दुबारा विधायिकी के लिए चुनाव लड़े दो बार हारे ,अगाली बार पार्टी ने भी धता बता दी ,विधान परिषद् का वादा कर दिया ] उनकी निगाह में बन्दा यानी कि मै बहुत हकीर चीज हूँ क्योंकि जिस शासन कोवे चला चुकें हैं मैं उस में एक दाना कारिन्दा रहा ]यह बात दीगार है वह मैंने अपनी योग्यता से पाई ३३ वर्षों बढ सेवा निवृत हुआ उन जनता ने अगली टर्म में रिटायर कर बैठी ]यह उन लोगों के विचा र हैं जो राज निति में हैं ]जो हमारे आप के ही बीचसे अआते हैं और समाज का आईना हैं ]