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Tuesday, December 2, 2008

दरअसल:फूहड़ कामयाबी,अश्लील जश्न

-अजय ब्रह्मात्मज

मीडिया की भूख और निर्माताओं के स्वार्थ से फिल्मों की कामयाबी का जश्न जोर पकड़ रहा है। फिल्म रिलीज होने के दो हफ्तों के अंदर ऐसे जश्न का आयोजन किया जाता है। सूचना दी जाती है कि सिलेक्ट मीडिया को निमंत्रण भेजा जा रहा है। आप जश्न की जगह पहुंचेंगे, तो सड़क पर लगे ओबी वैन और अंदर कैमरों की भीड़ बता देती है कि ऐरू-गैरू, नत्थू-खैरू सभी आए हैं। हां, स्टारों से बात करने का व्यक्तिगत मौका सिलेक्ट मीडिया को दिया जाता है। बाद में सभी ग्रुप में खड़े कर दिए जाते हैं। स्टारों की इस कृपा से भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मजबूर पत्रकार अभिभूत और संतुष्ट नजर आते हैं। वे इस सामूहिक इंटरव्यू को संपादन कला से एक्सक्लूसिव बनाकर प्रसारित कर देते हैं। दो दिनों के अंदर मुंबई के सभी अखबारों में जश्न में आए मेहमानों और फिल्म के स्टारों की तस्वीरें छप जाती हैं। जश्न का मकसद पूरा हो जाता है। कामयाबी ठोस हो और जश्न असली हो, तो सचमुच आनंद आता है। औरों की खुशी में शरीक होने में भी एक उत्साह रहता है। पहले जश्न के ऐसे अवसरों पर मेहमानों का खास खयाल रखा जाता था। फिल्म के स्टार और निर्माता-निर्देशक संबंधित फिल्म के बारे में विस्तार से बातें करते थे। भविष्य की योजनाएं शेयर करते थे। आत्मीयता बढ़ती थी। नए संबंध बनते थे। पुराने संबंध मजबूत होते थे। अब ऐसा कुछ नहीं होता। एक तो आजकल की कामयाबी कमजोर और फूहड़ हो गई है और दूसरे जश्न के पीछे का स्वार्थ माहौल और मकसद को अश्लील बना देता है। पूरी कवायद इस बात की रहती है कि मीडिया के जरिए फिल्म की चर्चा रिलीज के बाद के हफ्तों में चलती रहे। फिल्म गर्म रहे और बचे-खुचे, अनिच्छुक, हां और ना के बीच फंसे दर्शक सिनेमाघरों का रुख कर लें।
कुछ पार्टियों में स्टारों को अलग बिठा दिया जाता है या पहले से उनके लिए अलग जगह सुरक्षित रहती है। मीडिया के सामने जश्न की औपचारिकता निभाने के बाद स्टार अपने सुरक्षित जोन में चले जाते हैं। वहां मीडिया का प्रवेश वर्जित रहता है। समझाया जाता है कि स्टारों को प्राइवेसी दो। उन्हें भी एंज्वॉय करने दो। लगता है मीडिया उनकी खुशी कतर देगी या सार्वजनिक कर देगी, तो कोई भेद खुल जाएगा। इसके पीछे दो इरादे काम कर रहे होते हैं। एक तो मीडिया के लोगों को अपने बीच बिठाने की क्या जरूरत है? दूसरे स्टार और निर्माता-निर्देशक के हंसी-मजाक आम लोगों से ज्यादा अलग नहीं होते। उन्हें डर रहता है किकहीं दर्शक और प्रशंसक यह न जान जाएं कि वे सभी कितने साधारण, फूहड़ और अश्लील हैं। वे ग्लैमर का आवरण बनाए रखना चाहते हैं।
मीडिया की मजबूरी है कि इन दिनों उसे अपनी मर्जी से स्टार नहीं मिलते। चंद संपर्कवान पत्रकारों को छोड़ दें, तो बगैर अवसर के किसी स्टार से बात कर पाना लगभग नामुमकिन होता जा रहा है। सभी ने अपने प्रवक्ता रख लिए हैं। वे बातचीत का मकसद और उसमें स्टार का फायदा देखने के बाद ही संपर्क करवाते हैं। पुराने संबंधों को ताक पर रखा जा रहा है और किसी भी जिज्ञासा केजवाब में प्रवक्ता या मीडिया मैनेजर का नाम और नंबर बता दिया जाता है। ऐसी स्थिति में हर सार्वजनिक आयोजन और अवसर पर मीडिया का उमड़ना स्वाभाविक है। सभी को ऐसे अवसरों पर स्टार की तस्वीर, बातचीत और फुटेज मिल पाते हैं। हालांकि हिदायत रहती है कि कोई भी बातचीत अवसर और जश्न की सीमा में ही रहे, लेकिन मीडिया के लोग अपने सवाल पूछ लेते हैं। भले ही जवाब आधा-अधूरा मिले।
जश्न-ए-कामयाबी वास्तव में आत्मप्रचार का ही एक आयोजन है। आत्ममुग्ध फिल्म बिरादरी ऐसे अवसरों का भरपूर फायदा उठाती है। कम खर्च में उन्हें महंगा मीडिया कवरेज मिल जाता है। मीडिया का स्वार्थ भी पूरा होता है, इसलिए हर जश्न में मीडियाकर्मी मौजूद रहते हैं।
-अजय ब्रह्मात्मज

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