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Monday, November 3, 2008

हिन्दी टाकीज:फिल्म बनाई है तो कोई बात होगी-सचिन श्रीवास्तव

हिन्दी टाकीज-१५

इस बार सचिन श्रीवास्तव.सचिन नई इबारतें नाम से एक ब्लॉग लिखते हैं.उनके लेखन में एक बांकपन है,जो इन दिनों दुर्लभ होता जा रहा है.आजकल सभी चालाक और सुरक्षित लिखते हैं.अगर सचिन की बात करें तो उनके ही शब्द हैं,'मैं अपने बारे में उतना ही जानता हूं जितना कोई अपने किसी पडोसी के बारे में जानता हो सकता है। गांव देहात में यह भी पता होता है कि पडोसी ने कल कितनी रोटियां खाई थीं और नगरीय सभ्यता ने सिखाया कि पडोसी के बेटी के ब्याह में भी पूछकर ही मदद की जाए... मैं खुद को इतना ही जानता हूं... बडी और दिलचस्प बात यह कि सारी दुनिया का कुछ न कुछ हिस्सा जानने का दम भरता हूं और कभी कभी आइने में अपनी ही शक्ल देखकर बाजू हट जाता हूं कि भाई सहाब को शायद यहां से कहीं जाना है... मैं सफर पर हूं कहां पहुंचना है यह नहीं जानता बस चल रहा हूं थके कदमों से अकेला...'

हिन्दी टाकीज सीरिज़ के लिए बात हुई तो आरम्भिक आलस्य के बाद सचिन ने यह लेख भेजा,'पूरी ईमानदारी से बताया,'इसे लिखते हुए मेरे सामने कोई नहीं था बस मुंगावली, गुना, गंजबासौदा और ऐसे ही आसपास के कस्बों के टॉकीज थे। लिखते हुए उन यादों को फिर महसूस कर पाया जिनमें सपने भी देखे थे और फिल्मों का दर्शन भी समझा था। मैं फिल्में देखता हूं वक्त काटने के लिए और वक्त महज तीन घंटे का नहीं होता. असल में इसमें वह वक्त भी जुड जाता है जब सीन फिर फिर पलटकर आंखों में तैर जाते हैं. वो डायलॉग जो गप्पबाजी में अनायास मुंह से बाहर आ जाते हैं और वे गुनगुनी हथेलियों से फिसलते गाने जो होठों पर थिरकते रहते हैं. कभी सफर में कभी बिस्तर पर कभी खिडकी से आती धूप में. शुक्रिया जो लिखने को प्रेरित किया. फायदे और नुकसान के तराजू में देखूं तो एक बडा फायदा तो ये हुआ कि अपनी गलियों में फिर घूमने का सुख मिल गया, जो छोड आए हैं. '



मन अकुलाता था बचपन में

बचपन में टॉकीज मुझे बुरे लगते रहे। गर्मियों की छुट्टियों में जब गंजबासौदा जाते, नाना के घर, तो मौसी, मां और बहनें फिल्म देखने का प्रोग्राम बनाती थीं। गीता टॉकीज उस शहरनुमा कस्बे का एकमात्र टॉकीज था. जब परिवार फिल्म देखने जाता, तो हमें भी साथ घसीट लिया जाता. मामा-मौसी के बच्चों में सबसे बडा लडका होने की बुजुर्गियत के बावजूद मुझे इस तरह पिछलग्गू होना अच्छा भी नहीं लगता था. दूसरे वे फिल्में भी रोती-धोती होती थीं. एक मुच्छड हीरो हम भूल गए रे हर बात गाता और उधर हीरोइन कौन सुनेगा किसको सुनाएं का रोना रोती. वह उमर भी नहीं थी इस तरह के गानों में डूबने की. सो मैं अकुलाता रहता. अंधेरे में सब ध्यान लगाए उस रोन्टू फिल्म को देखते रहते. इस बीच मेरी मूंगफली, जो टिकट खरीदने के पहले के इंतजार में दिलाई गई थीं, खत्म हो चुकी होतीं. इंटरवल में मिलने वाले समोसे भी टॉकीज की तरफ खींचने के लिए नाकाफी होते थे.


एक व्यवस्थित शुरुआत : नायक नहीं खलनायक हूं मैं


धीरे-धीरे उस अंधेरे की प्रताडना का दौर खत्म हुआ और ऐसे पारिवारिक समारोहों में मेरी हिस्सेदारी खत्म हो गई। तब तक मैं अकेले 30-40 किलोमीटर की यात्राओं पर जाने लगा था और एकतरफा प्रेम का सिलसिला भी शुरू हो गया था. इसी समय में आगे की पढाई के लिए मुझे गांव से बाहर भेजा गया. यह हिंदी फिल्मों में दिल, जिगर, गुर्दे की भरमार वाले खरपतवारी गानों का दौर था, जिन्हें गुनगुनाते हुए हम दोस्तों के साथ टॉकीजों का रुख करने लगे थे. दोस्तों के साथ जो पहली फिल्म देखी थी वह खलनायक थी. संजय दत्त के हीरोइज्म में शाहरुख खान पिद्दी का शोरबा लगता था, जो आज तक आंख को नहीं सुहाया. बल्लू ने तेज संगीत के बीच दमदार घोषणा की कि वो नायक नहीं खलनायक है. हमने भी माना, लेकिन वैसे खलनायक आसपास बहुत थे. उनके सामने बल्लू जैसों की खलनायकी वजनदार लगती. उसका रंग अलग था. एंटी हीरो का रंग. विरोध का अपना वाला रंग.


मिथुन की फिल्में और आनंद टॉकीज


उसी दौर में मिथुन चक्रवर्ती की कई फिल्में देखीं, जिनमें टाइटल के अलावा सब कुछ एक जैसा ही होता था। यह सिलसिला 96-97 तक चला. दस पचास गुंडों से एक साथ निपटता मिथुन हीरो था. बुरा लगता था कि प्रीयर्स ब्रासनन पूरी रशियन आर्मी की आंख फाडकर चला आता है उसे लोग पचा लेते हैं लेकिन मिथुन ओवर एक्टिंग करता लगता है. तब तक मुंगावली के एकमात्र विधायक की एकमात्र टॉकीज के एकमात्र गेटकीपर की मदद से हमने कई फिल्में अपने खाते में जोड लीं थी. असल में दोस्तों के साथ शाम में होने वाली गप्पबाजी में बने रहने के लिए यह जरूरी दृश्य अध्ययन होता था. वरना आप चुप लगाकर सुनने के अलावा कुछ नहीं कर सकते. बस स्टेंड से स्टेशन के बीच टहलते हुए क्रिकेट और लडकियों के अलावा फिल्में बातचीत का प्रमुख विषय होती थीं. जिनपर अपनी सार्थक टिप्पणियां देते हुए हम सोचते थे कि ये सारे के सारे निर्माता-निर्देशक मूर्ख (उस बातचीत में दूसरा शब्द इस्तेमाल किया जाता था, जिसका मोटा-मोटा अर्थ मूर्ख ही होता है. ब्लॉग की गरिमा के लिहाज से उससे परहेज किया गया है) होते हैं. एक बार फिल्म को बनाने के बाद देखते भी नहीं, वरना जरा-जरा सी गलतियां तो यूं चुटकियों में पकड में आ जाती हैं. फिर बातचीत आखिर में यहां खत्म होती थी कि "उसने करोडों खर्च करके फिल्म बनाई है तो कोई बात होगी और फिर उसे चिंता नहीं है अपने पैसे डूबने की तो अपन काये मरे जाएं. वैसे एक बैर देखवे की तो है जै फिल्म."


सजा भी पाई है जनाब


इस बीच 96 में जिला स्तरीय विज्ञान प्रदर्शनी में हिस्सेदारी के लिए गुना जाना हुआ। वहां तीन दिन रुकना था लेकिन पहले दिन ही सेकेंड शो में फिल्म देखने का प्रोग्राम बना. मिश्रा जी हम पर निगरानी के लिए तैनात थे और रात में 12 बजे लौटने पर पिटाई का खतरा भी था. आखिरकार दिसंबर की ठंड में सन्नी देओल की चिल्लाहट सुनने का सुख, डैनी की अकड और अमरीश पुरी की घिघियाहट का मिला जुला नशा जीत गया. देखेंगे जो होगा के अंदाज में हम (यानी राहुल, शशिकांत, नीतेन्द्र, विकास, दो और नाम भूल रहा हूं) सातों गणेश टॉकीज की ओर चल दिए. साढे आठ बजे मैस के खाने के बाद निकलना तय हुआ था और रात में नगेन्द्र को जिस स्कूल में हम रुके थे उसका मैन गेट खोलने की जिम्मेदारी दी गई थी. पहली बार घातक में हमें आइटम सांग देखने का "सु"अवसर मिला. कात्या को काशी नाथ के हाथों पिटवाकर और जनता के हाथों दूसरे लोक में पहुंचाकर हम लौटे. ठंड के खिलाफ कुछ सिगरेटें थीं, जो नाकाफी पड रही थीं. फिर आइडिया आया कि अगर तेजी से दौड लगाई जाए तो कुछ गर्मी मिल सकती है. जब हांफते हुए हम गेट पर आए तो सब कुछ सामान्य था. मैन गेट पर सीटी बजाई तो गेट खुल गया. हाल के गेट पर पहुंचे तो गेट भीतर से बंद था. नगेंद्र मैन गैट खोलकर दूसरे कमरे में जा चुका था. अब हमें गेट खुलवाने की मशक्कत करनी थी. तय हुआ कि कोई एक गेट खुलवाए और मिश्रा जी जागें तो कहे कि बाथरूम करने गया था किसी ने गेट बंद कर दिया. बाकी सब छुप गए और शशिकांत ने गेट पर दस्तक दी. भीतर मिश्रा जी हमारा ही इंतजार कर रहे थे. गेट खोलते ही पूछा बाकी कहां हैं. उनके गुस्से से भरे चेहरे को देखकर शशिकांत की भी घिघ्घी बंध गई और उसकी उंगलियां हमारी तरफ उठ गईं. फिर शुरू हुआ डांट और लेक्चर का दौर. ठंड हमें कंपा रही थी. चाहते थे कि जो हो यही निपट जाए मामला घर तक न पहुंचे. बीच बीच में घरवालों के सपनों और हमारी हरकतों को मिलाकर मिश्रा जी ऐसा खाका खींच रहे थे कि हम दुनिया के सबसे बदमाश लडके लगने लगे थे खुद को ही. अति भावुकता में नीतेन्द्र रोने लगा. उसका फायदा ये हुआ कि उसे हॉल में एंट्री मिल गई. बाकी को सारी रात बरामदे में गुजारने की सजा तजबीज हुई.


किसके महबूब की चूडी का टुकडा था चांद


ये वो दौर था जब हम अपने अपनी पढाई को तरतीब देकर देश दुनिया में नाम कमाने के बारे में सोचने लगे थे। बूट पॉलिश करते लडके का उद्योगपति बन जाना, कार साफ करते करते कार बनाने वाली फैक्टरी का मालिक हो जाना और लैंप की रोशनी में पढते लडके का प्रोफेसर बन जाना हमें भाता था. लगता था सपने मुट्ठी में हैं. बस इसे अभी बंद रखना चाहिए. रातों में तब नींद खूब आती थी. तब पता नहीं था कि ये नींद का आखिरी दौर है. हम समझते थे कि अंधेरी रातों में कोई मसीहा निकला हुआ है, जुल्म मिटाने को. बस जिनके घर नहीं है वे आवारा ही सडकों पर निकले हैं, खो जाने को और रात में कोई दूसरा ही चांद होता है आसमान पर जो किसी के मेहबूब की चूडी का टुकडा होता था.


समझ badhi तो अपनी फिल्में याद आईं


धीरे धीरे स्कूल पढाई से उचटा मन क्रिकेट के मैदान से होता हुआ बारास्ता सुरेंद्र मोहन पाठक किताबों की ओर गया। और राजेश जोशी, दुष्यंत कुमार, मनोहर श्याम जोशी, गुलशेर अहमद शानी का हाथ पकड कर हमने किताबों से यारी कर ली. तब समझ में आया कि फिल्में देखना असल में आता ही नहीं था. धीरे धीरे सीखना शुरू किया. अच्छी और बुरी फिल्मों को अलग अलग करना सीखा. फिर लगा जो अच्छी फिल्में है वे वक्त बहुत मांगती हैं. उनमें घुसना पडता है, डूबना पडता है, जोडती हैं तो छोडती ही नहीं. परेशानी बहुत होती थी. कॉलेज लाइफ शुरू हो चुकी थी. भारी भरकम सिद्धांतों के बीच फिल्म भी एक सब्जेक्ट थी. हमें पढने को कहा गया. अमिताभ का अ. यशवंत व्यास की किताब. अमिताभ की कई शक्लों को एक साथ दिखाती. फुलस्पीड की किताब. एक बैठक में पढ डाली. दिमाग दौडा तो कह उठे कि ऐसी किताब तो मिथुन चक्रवर्ती पर लिखी जानी चाहिए. नाम पूछे मिथुन की कौन सी फिल्में देखी हैं. हमने एक सुर में बता दिये. जल्लाद, चांडल, मिलिट्री राज, शपथ, दादागीरी..... डांट मिली. आज तक समझ में नहीं आया कि इन फिल्मों में कमी क्या थी. उस दौर में जब कमल हसन की चाची 420 मुंगावली के आनंद टॉकीज में दो दिन चली थी. मिथुन की फिल्में 15 और 20 दिन चलती थीं. और जिस दिन उतरनी होती थी. तब रात में एक शो और चलाना पडता था. और ठीक उसी समय आईं अमिताभ की फिल्में औंधे मुंह गिर रही थीं. तब लगने लगा ये प्रोफेसर भी भांग खाए हुए हैं. इन्हें फिल्मों की समझ वमझ है नहीं. उनकी समझ में नहीं आ सकता था कि क्यों फटी हुई सीटों पर निकली कीलों से जख्म लेने, पसीने पसीने होकर फिल्म देखने 20-20 किलोमीटर से भरी दोपहर में लोग आते हैं? क्यों सब्जी के लिए रखे गए पैसे में से बचाकर सात रुपए का टिकट खरीदा जाता है? और क्यों पटियों पर बैठकर बुरे आदमी को पिटता देखकर आंखों में खुशी की चमक दौड जाती है?.


फिल्म अब भी हैं, टॉकीज भी, पर कमी क्या है?


फिल्में तो अब भी देखते हैं और खूब देखते हैं. पर न जाने क्यों अब मन वैसा नहीं रम पाता जैसा उन टूटी कुर्सियों में उधडती पेंट के बावजूद रमता था. मल्टीप्लैक्स के ठंडेपन में बर्फ से चेहरे बनाकर फिल्म देखना, अच्छे डॉयलॉग पर न चीखना न ताली पीटना बस चेहरे पर हल्का सी मुस्कुराहट ला देना, जैसे यही अहसान हो उस करोडों के शाहकार पर. दूसरी बात यहां तो जितने टिकट साथ में लिए हैं बस वे ही आपके साथ हैं. उन अंधेरों में भी पता होता था कि आगे से तीसरी लाइन के पांचवी सीट पर तलैया वाले रमजान चचा बैठे हैं और प्रमोद हवलदार भी अपनी ड्यूटी यहीं बजा रहे हैं. किसी सीन को फिर से चलवाना है तो बस हाथ को उस खिडकी पर रखना हैं, जहां से नीली हरी रोशनियां परदे की तरफ जा रही होती हैं. परदे पर एक काला साया आता है और उसी के साथ गालियों का एक रैला निकलता था. जिनकी आड में सीन फिर से दिखाने का आदेश दिया जाता था. उन्हीं यादों को खंगालने थके कदमों से टाम क्रूज को देखने जाते तो हैं पर इस दृश्य में कुछ खालीपन रहता है. पसीने, धुएं, अंधेरे और रील में अधूरी तस्वीरों का खालीपन.

3 comments:

यशवंत सिंह yashwant singh said...

सचिन तो हमेशा से शानदार लिखता रहा है। उनके फिल्मी अनुभव पढ़कर मजा आया। इस कालम के लिए अजय जी को साधुवाद।
जय भड़ास
यशवंत

नीरज गोस्वामी said...

शानदार और रोचक लेखन...ये लेखन का कमाल है की हमें वापस बचपन की उन यादों में ले गया जब हम भी इसी तरह किसी टूटे फूटे हाल में बैठकर सीटी बजाते हुए मूंगफली खाते हुए फ़िल्म देखते थे...मिथुन की नहीं तब हमारे ज़माने में राजेंद्र कुमार और धर्मेन्द्र का बोलबाला था...सच फ़िल्म देखने का वो लुत्फ़ अब जाता रहा...
नीरज

आलोक सिंह "साहिल" said...

ओये बेहतरीन लिखा है भाई जी,
बचपन की कुछ चाही अनचाही यादों से रूबरू होना अच्छा लगा.बहुत ही सही तरीके से आपने इस फिल्मी सफर को प्रस्तुत किया.
आलोक सिंह "साहिल"