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Friday, October 31, 2008

दरअसल:छोटी सफलता को बड़ी कामयाबी न समझें


-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले दिनों सीमित बजट की कुछ फिल्मों को अच्छी सराहना मिली। संयोग से वे महानगरों के मल्टीप्लेक्स थिएटरों में सप्ताहांत के तीन दिनों से ज्यादा टिकीं और उनका कुल व्यवसाय लागत से ज्यादा रहा। तीन-चार फिल्मों की इस सफलता को अब नया ट्रेंड बताने वाले पंडित बड़ी भविष्यवाणियां कर रहे हैं। वे बता रहे हैं कि अब छोटी फिल्मों का जमाना आ गया है। इन भविष्य वक्ताओं में एक निर्माता भी हैं। चूंकि वे कवि, पेंटर और पत्रकार भी हैं, इसलिए अपनी धारणा को तार्किक बना देते हैं। उन्होंने इस लेख में अपनी जिन फिल्मों के नाम गिनाए हैं, उनकी न तो सराहना हुई थी और न ही उन्हें कामयाब माना गया। आमिर से लेकर ए वेडनेसडे की सराहना और कामयाबी के बीच हल्ला और अगली और पगली जैसी असफल फिल्में भी आई हैं। हां, चूंकि इन फिल्मों की लागत कम थी, इसलिए नुकसान ज्यादा नहीं हुआ। आमिर, मुंबई मेरी जान और ए वेडनेसडे जैसी फिल्मों का उदाहरण देते समय हमें यह भी देखने की जरूरत है कि इनके निर्माता कौन हैं? लोग गौर करें कि बड़ी फिल्मों के निर्माताओं और निर्माण कंपनियों ने ही छोटी फिल्मों के लिए एक शाखा खोल ली है। वे कुछ फिल्में इस श्रेणी की बनाते हैं। असल मुद्दा यह है कि क्या इन छोटी फिल्मों से बिजनेस मोड्यूल बदल रहा है? बड़ी कारपोरेट कंपनियां खास मिजाज, विषय और अंदाज की ही फिल्में चुन रही हैं। वे मल्टीप्लेक्स थिएटरों के दर्शकों की रुचि को ध्यान में रख कर फिल्में बना रही हैं। इन फिल्मों के निर्देशकों को भी अलग से देखें। ज्यादातर विज्ञापन फिल्मों की दुनिया से आए हैं। पहली फिल्म के लिए उन्हें बड़ा बजट नहीं मिल पाता, इसलिए छोटी फिल्म का ताना-बाना रचते हैं। छोटी फिल्म से क्वालिफाई करने के बाद वे बड़ी फिल्म के लिए हाथ-पांव मारते हैं।
इम्तियाज अली ने सोचा न था के बाद जब वी मेट बनाई और अब वे सैफ अली खान के प्रोडक्शन की फिल्म निर्देशित कर रहे हैं। छोटी फिल्मों का बाजार हमेशा रहा है और उसके दर्शक भी रहे हैं। कभी श्याम बेनेगल, कभी गुलजार, कभी बासु चटर्जी, तो कभी सईद मिर्जा की फिल्मों के रूप में हम उन्हें देखते रहे हैं। हिंदी फिल्मों के हाल-फिलहाल का इतिहास बताता है कि ऐसी फिल्मों की संभावनाएं सिमट गई हैं। स्वतंत्र निर्माता धीरे-धीरे खत्म होते गए हैं। फिल्म इंडस्ट्री चंद बड़े बैनर, प्रोडक्शन हाउस और कारपोरेट कंपनियों की मुट्ठी में आ चुकी हैं। इस माहौल में स्वतंत्र निर्माता और स्वतंत्र सोच के निर्देशकों के लिए कोई जगह नहीं है। साबुन और तेल की कंपनियों की तरह फिल्मों की कंपनियां भी प्रीमियम प्रोडक्ट्स और ब्लॉक बस्टर के साथ कम लागत की फिल्में बना रही हैं। ग्राहक बने दर्शक को तो सिनेमाघरों में बड़ी और छोटी दोनों फिल्मों के लिए एक ही राशि के टिकट खरीदने पड़ते हैं। इस तरह जो भी फायदा है, वह निर्माता का है। हिंदी फिल्मों का संसार बाकी भाषाओं और खासकर हॉलीवुड की फिल्मों से अलग नहीं है। बड़ी और भव्य फिल्में अधिक दर्शकों को आकर्षित करती हैं। लोकप्रिय स्टार दर्शकों को थिएटरों में ले आते हैं। आम दर्शकों का मनोरंजन इन फिल्मों से होता है और नतीजतन दर्शक ऐसी फिल्मों को बड़ी हिट बना देते हैं। विषय, शिल्प और शैली के लिहाज से ओम शांति ओम भले ही साधारण फिल्म रही हो, लेकिन उसका बिजनेस ए वेडनेसडे और आमिर के बराबर है, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री अंतत: ओम शांति ओम जैसी फिल्मों से ही चलती है। यह क्रूर विडंबना है, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री का यही सच है।
हां, छोटी फिल्मों की संभावना है, लेकिन उस संभावना को मूर्त रूप देने के लिए कारपोरेट कंपनियों के चंगुल से फिल्म इंडस्ट्री को बाहर आना होगा। नई सोच के युवा निर्देशकों को मौका देना होगा और मल्टीप्लेक्स और मेट्रो के बाहर के दर्शकों को भी ध्यान में रखना होगा। छोटे दर्शक समूहों को ध्यान में रखकर भी छोटी फिल्मों को बनाया जा सकता है, लेकिन उसके लिए कारपोरेट कंपनियों को एमबीए ऑफिसर के बजाए साहित्य, संस्कृति और इतिहास के जानकारों को बहाल करना होगा!

1 comment:

संगीता पुरी said...

बहुत सही कहा।