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Monday, October 13, 2008

बारिश में भीगता हुआ पोस्टर-दिनेश श्रीनेत


हिन्दी टाकीज-१२

इस बार दिनेश श्रीनेत.दिनेश श्रीनेत इंडियन बाइस्कोप नाम से ब्लॉग लिखते हैं.हिन्दी में फिल्मों पर लिखनेवाले चंद गंभीर और महत्वपूर्ण में से एक हैं दिनेश श्रीनेत.इन दिनों वे एक हिन्दी पोर्टल की संपादन जिम्मेदारियों की वजह से बैंगलोर में रहते हैं.अपने बारे में उन्होंने लिखा है,बीते दस सालों से पत्रकारिता. फिलहाल बैंगलोर में. एक न्यूज़ पोर्टल में एडीटर. कुछ लेख, कुछ कहानियां प्रकाशित, सिनेमा तथा अन्य दृश्य विधाओं से गहरा लगाव. सिनेमा के प्रति सबसे पहले मन में कब अनुराग जन्मा यह तो नहीं कह सकता, पर इतना जरूर है कि जितनी स्मृतियां वास्तविक जीवन की हैं, उतनी ही सिनेमाई छवियों की भी.

अगर सिनेमा को याद करूं तो मैं उन तमाम पोस्टरों को नहीं भूल सकता, जिन्होंने सही मायनों में इस माध्यम के प्रति मेरे मन में गहरी उत्सुकता को जन्म दिया। जबसे मैंने थोड़ा होश संभाला तो सिनेमा के पोस्टरों ने मेरा ध्यान खींचना शुरु किया। मुझे यह पता होता था कि ये फिल्में मैं नहीं देख सकता मगर पोस्टर से मैं उनकी कहानियों के बारे में कयास लगाया करता था। बाद के दिनों में भी पोस्टरों से इतना ज्यादा जुडा़ रहा कि मेरे लिए फिल्म देखने की प्रक्रिया पोस्टर के साथ ही शुरु हो जाती थी। अक्सर मैं उन पोस्टरों के जरिए फिल्म के बारे में मन ही मन एक धारणा तय करता- अगर फिल्म उस धारणा पर खऱी नहीं उतरती थी तो मुझे निराशा होती। शायद यही वजह थी कि बाद में जब मैनें 'स्टारवार्स' के निर्देशक जार्ज लुकाच का यह कथन पढ़ा कि 'दर्शक एक सर्वथा नई अनुभूति की उम्मीद लेकर फिल्म देखने जाता है, यह अनुभूति जितनी गहरी होगी फिल्म उतनी ही सफल होगी', तो मुझे यह बिल्कुल सही लगा। अगर मैं अपनी जिंदगी की सबसे आरंभिक अनुभूतियों में उतरूं तो कुछ धुंधली यादों में किसी कसबे के छोटे से स्टेशन पर चिपका फिल्म 'हिन्दुस्तान की कसम' का पोस्टर और बनारस में आटो के भीतर से बाहर पानी में भीगते 'मिस्टर नटरवरलाल' के पोस्टर याद आते हैं। उन दिनों रेलवे स्टेशन पर आने वाली फिल्मों के पोस्टर काफी पहले लग जाया करते थे। तब राजेश खन्ना की फिल्म 'रेड रोज़' ने मेरा ध्यान खींचा था। काली पृष्ठभूमि वाले पोस्टर पर सफेद रंग का गुलाब, जिस पर खून टपक रहा था और उसकी वजह से गुलाब का रंग आधा सुर्ख हो चला था। एक और फिल्म 'चलते-चलते' का पोस्टर भी मुझे याद आता है। सिमी ग्रेवाल की इस फिल्म से मिलती-जुलती कहानी पर बाद में 'प्यार तूने क्या किया' बनी। ये वो दिन हैं जब रेडियो पर बजता 'कालीचरण' फिल्म का गीत 'छोटी-छोटी बातों में बंट गया संसार...' और 'गीत गाता चल' और 'जय संतोषी मां' के गीत घर-घर सुनाई देते थे।

बचपन में ही इलाहाबाद आकर सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा वहां के कुछ सिनेमाघरों में लगने वाली हॉलीवुड की फिल्मों के पोस्टरों ने। 'द लीगेसी' के पोस्टर में बिल्ली का चेहरा, 'नार्थ बाई नार्थ वेस्ट' में किसी शख्स का पीछा करती प्लेन, 'मैकेनाज़ गोल्ड' में आपस में भिड़ते ग्रेगरी पैक और उमर शरीफ शायद ही कभी भूलें। इसी तरह से 'डेडली बीज़' का वह पोस्टर भी कभी नहीं भूलेगा जिसमे एक औरत के आधे से ज्यादा चेहरे को मक्खियों ने ढक रखा था। उन दिनों अंग्रेजी फिल्में बनने के कई बरस बाद भारत में प्रदर्शित होती थीं। बचपन में देखी गई हॉलीवुड की फिल्मों में स्टीवेन स्पिलबर्ग की 'क्लोज एनकाउंटर्स आफ द थर्ड काइंड' ऐसी फिल्म थी, जिसके बारे में मैंने पत्रिकाओं में पढ़ा और जल्द ही वह देखने को भी मिल गई।

उन दिनों कुछ लोगों का बड़ा क्रेज था, यानी टेनिस स्टार ब्योन बोर्ग, क्रिकेटर सुनील गावस्कर, बॉक्सर मोहम्मद अली और मार्शल आर्ट के उस्ताद ब्रूस-ली। तो इन सबके साथ वेस्टर्न पॉप ग्रुप आबा और रोलिंग स्टोन के पोस्टर अक्सर इलाहाबाद के उन घरों में दिख जाया करते थे जहां पर किशोरवय के लड़के-लड़कियां होते। इस तरह के पोस्टरों को पॉपुलर बनाने में उस वक्त की एक मैगजीन सन का खासा योगदान था। उन्हीं दिनों इलाहाबाद में एक ऐसा अखबारवाला था जो हमारी कालोनी में शाम आठ-साढ़े आठ बजे आया करता था। वह पच्चीस से तीस पैसे प्रतिदिन पर पत्रिकाएं किराए पर दिया करता था। उस दौरान साप्ताहिक हिन्दुस्तान सिनेमा पर काफी दिलचस्प सामग्री दिया करता था। इसके अलावा टाइम्स ग्रुप की मैगजीन इलस्ट्रेटेड वीकली आफ इंडिया में भी सिनेमा पर काफी मौलिक और दिलचस्प सामग्री होती थी।

और एक्सप्रेस ग्रुप की स्क्रीन को मैं भला कैसे भूल सकता हूं। पोस्टर्स के प्रति मेरी संवेदनशीलता को बढ़ाने में इस अखबारनुमा साप्ताहिक पत्रिका का बड़ा योगदान था। इसमें पोस्टर की तरह फुल साइज के और स्प्रेडशीट पर फिल्मों के विज्ञापन छपा करते थे। खास तौर पर फिल्म 'शान' के विज्ञापन मुझे आज भी उतनी ही स्पष्टता के साथ याद हैं जिनमें ऊंची-ऊंची इमारतों के बैकग्राउंड में कलाकारों के चेहरे नजर आते थे। इनमें से बहुत सी फिल्मों की घोषणा होने के बाद अक्सर वे बनती नहीं थीं। मगर मेरे मन में उन तमाम खो-गई फिल्मों का खाका आज भी मौजूद है। इसमें सुनील दत्त के प्रोडक्शन की दो फिल्में हैं, पहली जिसे वे खुद निर्देशित करने वाले थे 'मसीहा'- इसमें संजय दत्त और कुमार गौरव की जोड़ी थी, दूसरी फिल्म थी '...और गंगा बहती रही' जिसमें संजय दत्त थे और जिसका निर्देशन जेपी दत्ता करने वाले थे, मुझे इस फिल्म के कांसेप्ट से आज भी लगाव है, पहला तो इसका शीर्षक जो मिखाइल शोलोखोव के उपन्यास 'क्विट फ्लोज द दोन' से मेल खाता है, जेपी दत्ता से उस दौर में यह उम्मीद की जा सकती थी, जब उन्होंने 'गुलामी' के नायक से मैक्सिम गोर्की का जिक्र करवाया था, और राजस्थान और उत्तर प्रदेश के परिवेश के प्रति उनका लगाव, यह सब कुछ एक बेहतर फिल्म की उम्मीद जगाता था। सुभाष घई की 'शिखर' और 'देवा' के अलावा रमेश सिप्पी की 'जमीन' भी इन फिल्मों की सूची में शामिल है। धीरे-धीरे मुझे स्क्रीन के विज्ञापन देखकर फिल्मों की स्तरीयता का अंदाजा हो जाता था।

हाईस्कूल पहुंचते-पहुंचते मैं क्लास से भागकर फिल्में देखने लगा। इनमें मार्निंग-शो में लगने वाली 'सहारा', 'द बुलेट ट्रेन', 'द प्रोटेक्टर' जैसी अंग्रेजी फिल्में खूब शामिल होती थीं। इस दौरान मैंने कई अंडररेटेड मगर उम्दा फिल्में देखीं। आज आईएमडीबी या विकीपीडिया पर उनके बारे में सर्च करना मेरे लिए काफी दिलचस्प होता है। इस श्रंखला में 'वाइल्ड बीस्ट्स', 'वेनजेंस', 'इमेक्यूलेट कांसेप्शंस', 'बॉर्न आफ फायर' और 'ब्ल्डी बर्ड' जैसी फिल्मे थीं जो कि मूलतः इटैलियन, लैटिन अमेरिकी अथवा पाकिस्तान के निर्देशकों द्वारा निर्देशित होती थीं मगर कुछ हॉट दृश्यों के चलते भारतीय बाजार में भी इन गंभीर फिल्मों का वितरण हो जाता था।

आज भी मुझे सिनेमा के पोस्टर देखना पहले की तरह भाता है। अक्सर वे मन के किन्ही गुमसुम कोनों में कोई अनकही सी कहानी रचने लगते हैं। तस्वीरें देखकर कहानियां गढ़ने का मेरा पुराना शगल है। वैसे शायद यह रचनात्मकता का सबसे बेहतर स्रोत है। गैब्रियल गारसिया मार्क्वेज़ ने कभी अपने एक साक्षात्कार में बताया था कि किस तरह से उनके उपन्यास 'वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सालिट्यूड' की शुरुआत उनकी स्मृति में कैद इमेज से हुई थी। तो आज भी किसी धुंधले मौसम में, किसी मोड़ से गुजरते हुए, बारिश से भीगा कोई पोस्टर मुझे दिखता है तो मैं ठिठकता हूं, अपनी बाइक की रफ्तार थोड़ी कम करता हूं। शायद मेरे चेहरे पर वैसा ही विस्मय दिखता हो जैसा छह-सात बरस की उम्र में आटो से झांकते हुए रहा होगा। ....मैं चाहता हूं कि वह विस्मय बना रहे।

1 comment:

manish said...

दिनेश भाईसाहब
सचमुच सिनेमा को लेकर आपकी स्मृतियां आज भी कितनी साफ हैं। इसे देखकर तो मुझे ईर्ष्या हो रही है।