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Monday, February 4, 2008

मैंने युवा अकबर का किरदार निभाया है: रितिक रोशन


-अजय ब्रह्मात्मज


रितिक रोशन को इंटरव्यू के लिए पकड़ पाना लगभग उतना ही मुश्किल काम है, जितनी दिक्कत उन्हें किसी फिल्म के लिए राजी करने में किसी निर्देशक को होती होगी।


आप अपनी फिल्मों के चुनाव के प्रति काफी सावधान रहते हैं। क्या वजह रही कि जोधा अकबर के लिए हाँ कहा? पीरियड, कॉस्टयूम और अकबर तीनों में से क्या आपको ज्यादा आकर्षित कर रहा था?


मेरे लिए अकबर आकर्षण और चुनौती दोनों थे। कोई मिल गया और धूम 2 की मेरी भूमिका को देखते हुए जोधा अकबर में मेरी भूमिका एकदम अलग है। इसके लिए मुझे खास तरह से तैयारी करनी पड़ी। 14 किलो का कवच पहनकर मैंने स्वयं को किसी पुराने योद्धा की तरह से महसूस किया। मेरी कोशिश रही है कि अकबर के बारे में जो भी जानकारी है, उसके आधार पर उनके एटीट्यूड को ईमानदारी से पर्दे पर उतार सकूं। अकबर के लिए मैंने ढेर सारी किताबें पढ़ीं। मुगल काल और अकबर के बारे में सारी जानकारियां एकत्रित कीं। उन्हें आत्मसात किया। शूटिंग शुरू करते समय मैंने सारी जानकारियां दिमाग से निकाल दीं।

आप इस फिल्म को किस नजरिये से देखते है?


जोधा अकबर का मकसद मनोरंजन करना है, शिक्षा देना या डाक्यूमेंट्री नहीं है। मैं ऐसी फिल्मों पर विश्वास कम ही करता हूं। यह मेरे लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।

कृष से कितनी अलग रही जोधा अकबर?


मेरे लिए कृष से बिल्कुल अलग फिल्म रही जोधा अकबर। कृष में मुझे मालूम था कि क्या करना है? उसकी हर अदा पहले से मेरे दिमाग में थी। सेट पर जाने के बाद मैं उन्हें करता गया। अकबर के साथ ऐसी बात नहीं थी। इसकी शूटिंग मेरे लिए किसी मुकाबले की तरह रही। जब जो चुनौती आई, उसका मुकाबला डायरेक्टर आशुतोष गोवारिकर की मदद से करता रहा।

क्या अकबर की भूमिका निभाते समय सचेत या अप्रत्यक्ष रूप से आप पृथ्वीराज कपूर से प्रभावित रहे?


अगर आप पता करें तो पाएंगे कि अकबर की वास्तविक आवाज और उनका कद पृथ्वीराज जी से बिल्कुल अलग था। अकबर उतने लंबे नहीं थे और उनकी आवाज पतली थी। पृथ्वीराज जी ने अपनी प्रतिभा से अकबर को जिस तरह से चित्रित किया, वही अकबर की छवि बन गयी। उस छवि को कमर्शियल स्वीकृति भी मिल गयी, क्योंकि मुगलेआजम सफल रही। मैंने जिस अकबर की भूमिका निभायी है, वह उम्र में छोटा है और अभी दुनिया को समझ रहा है। उसकी आंखों में खोज है। वह कभी विस्मित और चकित होता है तो कभी हैरान और परेशान भी होता है। आप कह सकते हैं कि दोनों में उम्र के फर्क से काफी अंतर आ गया है। मुगलेआजम के अकबर उम्रदराज, अनुभवी और महाबली थे, जबकि जोधा अकबर के अकबर अनिश्चित है और अभी राह खोज रहा है। आशुतोष भी नहीं चाहते थे कि मैं अकबर को कांफीडेंट और पावरफुल रूप में चित्रित करूं।


इस फिल्म के दौरान अकबर को जानने के बाद उनके व्यक्तित्व की किस खासियत से प्रभवित हुए और क्या अकबर की जिंदगी मिले तो आप उसे स्वीकार करेंगे? आपको मानना पड़ेगा कि आज कल के फिल्म स्टार किसी राजा की तरह ही होते हैं?


हंसते हुए, बाहर से ऐसा लग सकता है, लेकिन उनकी जिंदगी और हमारी जिंदगी में बहुत फर्क है। हम जवाबदेह हैं। हमें दूसरों की नौकरी करनी पड़ती है। अकबर के व्यक्तित्व में कई खासियतें हैं। उसने इतने पावरफुल होने के बावजूद दूसरों की सलाह पर ध्यान दिया और खुद को सुधारने के लिए तैयार रहा। इसके अलावा वह ताकतवर होने के साथ ही संवेदनशील है। रही बात अकबर की जिंदगी स्वीकार करने की तो मैं अपनी जिंदगी से संतुष्ट हूं। इसे बदलना नहीं चाहूंगा। हम वैसी जिंदगी आज के समय में नहीं जी सकते।

ऐश्वर्या राय का अप्रोच कैसा रहा?


सेट पर ऐश्वर्या का अप्रोच मेरे जैसा ही है। मैं को-एक्टर के लिए भी सेट पर रहता हूं और फ्रेम में नहीं होने पर भी अपने संवाद बोलता हूं। मैंने देखा है कि ऐश्वर्या भी ऐसा ही करती हैं। वह समर्पित आर्टिस्ट हैं और उनकी मौजूदगी में काम करने में मजा आता है।

निर्देशक आशुतोष गोवारिकर के बारे में आपकी क्या राय है?


आशुतोष की जितनी तारीफ की जाए कम है मैं हमेशा आशुतोष के साथ काम करना चाहूंगा। यह सही है कि जोधा अकबर की स्क्रिप्ट ने मुझे खासा प्रभावित किया है जो कि मेरे लिए किसी बोनस से कम नहीं है। उनके अंदर ऐसी क्षमता है जो किसी भी दृश्य को पर्दे पर साकार रूप में उतार देती है। उनमें मानवीय रिश्तों की संवेदनशीलता को समझने की गहरी पकड़ है। आशुतोष अक्सर शॉट के बीच में भी दखल देकर उसे नया रूप दे देते है। मैंने ऐसा महसूस किया कि शॉट पहले से भी अच्छा हो जाता है।

1 comment:

पूनम said...

सचमुच दोनों फिल्मों के अकबर अलग हैं.उनकी तुलना नहीं होनी चाहिए.