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Sunday, December 30, 2007

सुशांत सिंह:अक्षत प्रतिभा


सत्या के पकिया ,कौन के चोर और जंगल के दुर्गाशंकर चौधरी...इन तीन फिल्मों के बाद ही दर्शकों ने सुशांत सिंह को पहचान लिया था.फिल्म इंडस्ट्री ने तो पहली ही फिल्म सत्या में महसूस कर लिया था कि एक प्रतिभा आ चुकी है.राम गोपाल वर्मा उन दिनों जिस ऐक्टर को छू देते थे उसे फिल्म इंडस्ट्री स्वीकार कर लेती थी.सुशांत सिंह के बारे में भी माना जा रहा था कि जंगल के बाद उनके पास काम की कमी नहीं रहेगी.संयोग कुछ ऐसा बना कि जंगल से फरदीन खान का कैरीअर तो सही ट्रैक पर आ गया,लेकिन जिसके बारे में उम्मीद की जा रही थी,उसे लोगों ने नज़रअंदाज कर दिया.चवन्नी को याद है कि जंगल की छोटी भूमिका को लेकर ही राजपाल यादव कितने उत्साहित थे.उनके उत्साह का असर ही था कि वे जल्दी ही मशहूर हो गए और अपनी एक जगह भी बना ली.आज वे पैसे और नाम के हिसाब से सुखी हैं,लेकिन काम के हिसाब से,,,?राजपाल ही सही-सही बता सकते हैं।
अरे हम बात तो सुशांत सिंह की कर रहे थे.सुशांत को जंगल से झटका लगा होगा.यों कहें कि उनके पांव के नीचे की कालीन लेकर राजपाल यादव ले उड़े.सुशांत निराश भी हुए होंगे,लेकिन वे टूटे नहीं.चवन्नी की उनसे समय-समय पर मुलाक़ात होती रही.चवन्नी कह सकता है कि उसने सुशांत में कभी तिक्तता नहीं महसूस की.राज कुमार संतोषी की भगत सिंह में सुखदेव की भूमिका में सुशांत सिंह खूब जमे थे.चवन्नी को तो वे दम के मोहन की भूमिका भी जंचे थे.सुशांत में कुछ है,जो प्रभावित करता है,लेकिन चवन्नी को लगता रहता है कि वे अपनी प्रतिभा का १६ आना इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं.हो सकता है कि उन्हें अपनी भूमिकाएं फिजूल लगती हों.हर पेशे में आदमी कई बार चलते रहने के लिए बेमन से कुछ-कुछ करता रहता है.अगर वह प्रतिभाशाली है तो उसका साधारण काम भी औसत से बेहतर होता है.सुशांत सिंह इसी श्रेणी के अभिनेता हैं.उनकी प्रतिभा अभी तक अक्षत है।
२००७ में सुशांत सिंह ने कुल ४ फिल्में की.चवन्नी को उनकी फिल्में अच्छी नहीं लगीं.पिछले दिनों एक मुलाक़ात में सुशांत ने स्वीकार किया कि ४ में से ३ फिल्में बेकार थीं.अगर अपने बुरे काम और बुरी फिल्मों का एहसास हो और उन्हें स्वीकार करने की हिम्मत हो तो चवन्नी मानता है कि अभी सम्भावना शेष है।
सुशांत सिंह,,,चवन्नी उम्मीद करता है कि आप २००८ में अपने दर्शकों और प्रशंसकों को खुश कर देंगे.

Saturday, December 29, 2007

रिटर्न आफ हनुमान: निराश करती है फिल्म


-अजय ब्रह्मात्मज
दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए रिटर्न आफ हनुमान के निर्माताओं ने पापुलर हो चुकी एनीमेशन फिल्म हनुमान की छवि का भरपूर इस्तेमाल किया। फिल्म देखने गए। अचानक पर्दे पर दिखा कि रिटर्न आफ हनुमान सिक्वल के तौर पर नहीं बनाई गई है। यह पूरी तरह से काल्पनिक कहानी है।

चलिए मान लिया कि काल्पनिक कहानी है तो कल्पना के घोड़े कुछ मामलों में क्यों ठिठक गए? रिटर्न आफ हनुमान के मारुति को बगैर पूंछ के भी दिखाया जा सकता था। मिथक और फैंटेसी का घालमेल बच्चों को कन्फ्यूज करता है। फिल्म में मनोरंजन है, लेकिन वह एनीमेशन और मारुति के चमत्कारी कारनामों के कारण है। मारुति की कहानी को मिथ से जोड़कर दिखाने की वजह महज इतनी रही होगी कि दर्शक उसके कारनामों पर यकीन कर सकें।

एनीमेशन फिल्मों में इतिहास और मिथ से हीरो तलाशने की कोशिश जारी है। पहली बार हनुमान देखने के बाद लगा था कि बाल हनुमान के रूप में हीरो मिल गया है, लेकिन मारुति अवतार में बाल हनुमान जंचते नहीं हैं। फिल्म में हिंदी फिल्मों के मशहूर कलाकारों की आवाजों की मिमिक्री का तुक भी समझ में नहीं आया। कहीं रिटर्न आफ हनुमान वैसे शहरी बच्चों के लिए तो नहीं बनाई गई है, जो टीवी और फिल्में देखकर बड़े हो रहे हैं? फिल्म निराश करती है।

लेखक और निर्देशक अनुराग कश्यप ने इस फिल्म में शहरी बोलचाल की अंग्रेजी मिश्रित भाषा और आधुनिक उपकरणों का जमकर इस्तेमाल किया है। यहां तक कि देवलोक में भी लैपटाप का चलन दिखा है और देवगण भी धड़ल्ले से अंग्रेजी शब्दों की मिश्रित खिचड़ी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। शायद निर्माता-निर्देशक मल्टीप्लेक्स में आने वाले बाल दर्शकों को ध्यान में रखकर ही रिटर्न आफ हनुमान ले आए हैं। इस सोच के कारण उन्होंने अपने ही दर्शकों को सीमित कर लिया है।

Friday, December 28, 2007

औसत से भी नीचे है शोबिज


-अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी फिल्मों में मीडिया निशाने पर है। शोबिज इस साल आई तीसरी फिल्म है, जिसमें मीडिया की बुराइयों को दर्शाया गया है। शोबिज समेत तीनों ही फिल्में मीडिया की कमियों को ऊपर-ऊपर से ही टच कर पाती हैं।


रोहन आर्य (तुषार जलोटा) अचानक स्टार बन जाता है। आरंभ में ही इस स्टार की शरद राजपूत (सुशांत सिंह) नामक पत्रकार से बकझक हो जाती है। शरद राजपूत कैसे पत्रकार हैं कि तस्वीरें भी खीचते हैं और टीवी चैनलों में भी दखल रखते हैं। बहरहाल, उन दोनों की आपसी लड़ाई में कहानी आगे बढ़ती है और एक नाटकीय मोड़ लेती है। रोहन की कार में पत्रकार एक लड़की को देखते हैं। वो उसका पीछा करते हैं। पत्रकारिता में आए कथित पतन के बावजूद पत्रकार शोबिज के पत्रकारों जैसी ओछी हरकत नहीं करते। बहरहाल, कार दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है। पता चलता है कि कार में रोहन के साथ तारा नाम की वेश्या थी। बड़ा स्कैंडल बनता है, लेकिन रोहन पूरे मामले को अपने हाथ में लेता है। हिंदी फिल्मों का हीरो है न ़ ़ ़ वह अकेले ही मीडिया से टकराता है और आखिरी दृश्य में मीडिया की भूमिका पर एक प्रवचन भी देता है।

शोबिज किसी भी स्तर पर प्रभावित नहीं करती। भट्ट कैंप की फिल्में औसत स्तर की तो होती ही थीं, शोबिज औसत से नीचे है। नए अभिनेता तुषार जलोटा पूरी तरह से निराश करते हैं।

आख़िरी शुक्रवार,२८ अक्तूबर, २००७

साल का आख़िरी शुक्रवार चवन्नी को दुखी कर गया.कैसे?

अनुराग कश्यप और महेश भट्ट दोनों चवन्नी को प्रिय हैं.अनुराग के पैशन और समर्पण का चवन्नी कायल है.यही कारण है कि चवन्नी अनुराग की बातों को यहाँ लाता रहा है.आज अनुराग कश्यप ने बहुत निराश किया.रिटर्न ऑफ़ हनुमान के लेखक-निर्देशक हैं अनुराग कश्यप.इस फिल्म में वे पूरी तरह से निराश करते हैं.चवन्नी ने फिल्म देखी और बेहद उदास हो गया.आख़िर क्या सोच कर अनुराग ने यह फिल्म लिखी और निर्देशित की.और अगर की तो पूरा ध्यान क्यों नहीं दिया?यह फिल्म अनुराग कश्यप के नाम पर धब्बा हो गयी।

चवन्नी को महेश भट्ट अपनी साफगोई और बेलौस बयानों के कारन पसंद हैं.वे दो तरह की बातें नहीं करते.उनकी फिल्म शोबिज़ आज रिलीज हुई है.इसे किसी राजू खान ने निर्देशित की है.भट्ट कैंप से इतनी बुरी फिल्म की उम्मीद चवन्नी नहीं कर सकता.फिल्म मीडिया की भूमिका और रवैये पर सवाल उठाती है ,लेकिन सब कुछ इतना सतही और ऊपरी है कि सच्चाई की झलक भी नही मिल पाती।

Thursday, December 27, 2007

कुछ अलग और उल्लेखनीय फिल्में

-अजय ब्रह्मात्मज

नए विषय, नए प्रयोग या प्रस्तुति की नवीनता को हमेशा अपेक्षित सराहना नहीं मिलती, क्योंकि कई बार दर्शक भी उन्हें नकार देते हैं, लेकिन एक अरसा गुजरने के बाद हम उन फिल्मों को दोबारा जब देखते हैं, तो उनका महत्व समझ में आता है। इसके साथ कुछ ऐसी फिल्में भी होती हैं, जिनसे कोई अपेक्षा नहीं रहती, लेकिन दर्शक उनसे अभिभूत नजर आते हैं। जीवन के दूसरे क्षेत्रों की तरह फिल्मों के विकास का भी यही मंत्र है। पुरानी चीजें छूटती हैं और नई कोशिशें जुड़ती हैं।


इस साल सबसे ज्यादा चर्चा भेजा फ्राई की हुई। छोटे बजट में मामूली एक्टरों को लेकर बनी यह फिल्म शहरी दर्शकों को खूब पसंद आई। इस फिल्म में शहरी ऊब, घुटन और हास्य को नए तरीके से पेश किया गया था। फिल्म ने कई स्तरों पर शहरी दर्शकों को लुभाया। गौर करें, तो यह फिल्म छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन थिएटरों में बिल्कुल नहीं चली, लेकिन मल्टीप्लेक्स से मिले व्यापार ने इसे उल्लेखनीय फिल्म बना दिया। अनुराग कश्यप की नो स्मोकिंग की तीखी आलोचना हुई और समीक्षकों ने उसे सहज रूप में नहीं लिया। अनुराग के प्रति कठोर रवैया अपनाते हुए समीक्षकों ने इस फिल्म को धो डाला। इस फिल्म के बिंबों, प्रतीकों और निहितार्थ को दर्शकों ने नहीं समझा। मूल रूप से इंसान की व्यक्तिगत आजादी और सिस्टम के शिकंजे की यह कहानी आम दर्शकों की समझ से परे रही। अनुराग ने स्वीकार किया कि हमें अपने दर्शकों के लिए स्पष्ट बिंबों के साथ सरल कहानी चित्रित करनी चाहिए।


मनीष तिवारी की फिल्म दिल दोस्ती एटसेट्रा की ज्यादा चर्चा नहीं हुई। यह फिल्म समाज में बढ़ रहे भेद को सही परिप्रेक्ष्य में रखती है। शहरी और छोटे शहरों के युवकों की सोच-समझ और आकांक्षाओं की परतों को यह फिल्म उद्घाटित करती है। सच तो यह है कि हिंदी में ऐसी राजनीतिक फिल्में कम ही बनती हैं। आमतौर पर राजनीति का मतलब हम पार्टी-पॉलिटिक्स ही समझते हैं। हम अराजनीतिक होने का दावा करते हैं, लेकिन समाज और देश की राजनीति हमें प्रभावित करती रहती है। एक चालीस की लास्ट लोकल अपने नए अंदाज के कारण अच्छी लगती है, तो मनोरमा सिक्स फीट अंडर नाम की विचित्रता के बावजूद छोटे शहर के संतप्त युवक की निराशा और मनोदशा को व्यक्त करती है।


श्रीराम राघवन की जॉनी गद्दार अधिक सफल नहीं रही। राघवन ने थ्रिलर फिल्मों की परंपरा में कुछ नया और आधुनिक करने का प्रयास किया। इस फिल्म की गति और सस्पेंस की निरंतरता रोमांचित करती है। राघवन को खुली छूट और पर्याप्त बजट मिले, तो वे और भी बेहतरीन और रोमांचक फिल्म बना सकते हैं। फिरोज अब्बास खान की गांधी माई फादर गांधी जी के जीवन के अज्ञात पहलुओं का मर्मस्पर्शी चित्रण करती है। हम राष्ट्रपिता गांधी को पिता के रूप में विचलित और विवश होते देखते हैं। पूजा भट्ट की फिल्म धोखा वैसे ही गुजर गई, लेकिन इस फिल्म में पहली बार मुसलमान नायक अपने अधिकारों और अस्मिता की बात करता है। ऐसी फिल्में लगातार आएं, तो सामाजिक वैमनस्य कम होगा। अल्पसंख्यकों की मनोदशा से परिचित होने पर परस्पर समझदारी बढ़ेगी। कौशिक राय की अपना आसमान और आमिर खान की तारे जमीं पर बच्चों के प्रति अधिक समझदार और संवेदनशील होने के लिए प्रेरित करती है। अंत में अमृत सागर की 1971 और सुधीर मिश्रा की खोया खोया चांद का उल्लेख जरूरी है। दोनों ही फिल्मों में अपने-अपने पीरियड की पीड़ा है। 1971 उन युद्धबंदियों की याद दिलाती है, जिन्हें हम भूल चुके हैं, तो खोया खोया चांद छठे दशक की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की वास्तविक झलक देती है।

सलमान खान का सदाचार

चवन्नी चकित है.हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के सितारे चौंकाते ही रहते हैं.कभी अपने काम से तो कभी अपने दाम से.चवन्नी को मालूम है कि देश और विदेश में सलमान खान के करोडों दीवाने हैं.उन सभी को सलमान खान में कभी कोई बुराई नहीं दिखती है.सलमान खान कई विवादों और कानूनी उलझनों में फँसे हैं.सच्चाई केवल सलमान खान ही जानते हैं।

बहरहाल सलमान खान आज अपने जीवन के ४२ वसंत पूरे कर रहे हैं.उम्र के इस मोड़ पर उन्हें एहसास हुआ है कि समाज ने उन्हें बहुत कुछ दिया है.अब वक़्त आ गया है कि वे भी समाज को कुछ दें.चैरिटी वे करते रहते हैं.दयालु स्वाभाव के हैं और मददगार की उनकी छवि काफी मशहूर है. कहा तो यह भी जाता है कि उनके घर आया कोई भी ज़रूरतमंद खाली हाथ नहीं लौटता.वे उसे खाना खिलाना और ठंडा पानी पिलाना भी नहीं भूलते।

सलमान खान ने सामाजिक काम के लिए एक संस्था शुरू करने की सोची है.इस संस्था का नाम है बिईंग ह्यूमन फाउंडेशन.इस संस्था का एक वेब साइट होगा.उस साइट पर सलमान खान की पेंटिंग्स,स्केच,फिल्मों में पहने गए कपडे और अन्य प्रकार के आँटोग्राफ किये निजी सामान होंगे.वहाँ से उनकी नीलामी की जायेगी और नीलामी से मिले पैसों का उपयोग असमर्थ मरीजों के इलाज में किया जाएगा।

इसके अलावा सलमान खान १ नाम से एक अभियान आरंभ करेंगे.इस अभियान में शामिल होने वाले व्यक्ति के वेतन से रोजाना एक रूपया लिया जाएगा,इस तरह साल के ३६५ रुपये जमा होंगे.इन रुपयों से केवल कैंसर के मरीजों का इलाज करवाया जाएगा.सलमान साल में एक बार इस अभियान में शामिल व्यक्तियों का सम्मान करेंगे।

इतना ही नहीं सलमान खान अस्पताल और हैल्थ यूनिट कि श्रृंखला आरंभ करना चाहते हैं.वे दवाइयों की फैक्ट्री भी बिठाना चाहते हैं.इतने सारे नेक काम आगे-पीछे आरंभ कर वे समाज से मिले प्रेम और शोहरत के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करना चाहते हैं।

चवन्नी उनके जन्मदिन के अवसर पर उन्हें बधाई देता है और उनके सदाचारपूर्ण योजनाओं के लिए शुभकामनाएं देना चाहता है.

Wednesday, December 26, 2007

चवन्नी सर्वेक्षण-२००७ सर्वोतम फिल्म

साल ख़त्म होने जा रहा है.चवन्नी अपनी तरफ से किसी फिल्म का नाम नहीं लिख रहा है.चवन्नी की चाहत है कि ब्लॉग लिखने-पढ़ने वाले फिल्मों के दर्शक अपनी राय यहाँ लिखें.यह राय टिप्पणी के रुप में दी जा सकती है. ब्लॉगर जनमत जानने की सुविधा देता है,लेकिन वहाँ चवन्नी को पहले कुछ नाम लिखने पड़ते.चवन्नी नहीं चाहता कि आप चंद विकल्पों में फँसें।

तो आइये इस आयोजन में हिस्सा लें और अपनी पसंद जाहिर करें।

उम्मीद है आप चवन्नी को निराश नहीं करेंगे.

Saturday, December 22, 2007

चमके तारे ज़मीन पर

-अजय ब्रह्मात्मज

तारे जमीन पर में आमिर खान तीन भूमिकाओं में हैं। इस फिल्म में अभिनय करने के साथ ही वह निर्माता और निर्देशक भी हैं। निर्देशक के रूप में यह उनकी पहली फिल्म है। पहली फिल्म में ही वह साबित करते हैं कि निर्देशन पर उनकी पकड़ किसी अनुभवी से कम नहीं है। वैसे उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत निर्देशन से ही की थी।

तारे जमीन पर न तो बच्चों की फिल्म है और न सिर्फ बच्चों के लिए बनायी गई है। यह बच्चों को लेकर बनायी गई फिल्म है, जो बच्चों को देखने और समझने का नजरिया बदलती है। निश्चित ही इस फिल्म को देखने के बाद दर्शक अपने परिवार और पड़ोसी के बच्चों की खासियत समझने की कोशिश करेंगे। आमिर खान ने तारे जमीन पर में यह जरूरी सामाजिक संदेश रोचक तरीके से दिया है। तारे जमीन पर ईशान अवस्थी की कहानी है। ईशान का पढ़ने-लिखने में कम मन लगता है। वह प्रकृति की अन्य चीजों जैसे पानी, मछली, बारिश, कुत्ते, रंग, पतंग आदि में ज्यादा रुचि लेता है। उसके इन गुणों को न तो शिक्षक पहचान पाते हैं और न माता-पिता। उन्हें लगता है कि ईशान अनुशासित नहीं है, इसलिए पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहा है। ईशान के माता-पिता उसे अनुशासित करने के लिए बोर्डिग स्कूल भेज देते हैं। बोर्डिग स्कूल में ईशान और भी अकेला हो जाता है। वह दबा-सहमा रहता है। उस स्कूल में एक नए आर्ट टीचर राम शंकर निकुंभ आते हैं। निकुंभ इस अनोखे बच्चे की परेशानी समझते हैं और उसके अनुरूप स्थितियां तैयार करते हैं। ईशान में तब्दीली आती है और वह स्कूल के सबसे होनहार छात्र के रूप में नजर आने लगता है।

आमिर खान की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने बेसिर-पैर की कामेडी, आइटम गीत और विदेशी लोकेशनों की फिल्मों के इस दौर में एक सफल संवेदनशील फिल्म बनायी है। फिल्म का संदेश दर्शकों के बीच पहुंचता है और वह भी फिल्म को बगैर गंभीर किए, सहज तरीके से। आमिर खान ने हिंदी फिल्मों की रोचक और मनोरंजक परंपरा के सारे अवयवों का सुंदर उपयोग किया है। खुद को पीछे रखकर कहानी की मांग के मुताबिक बच्चे पर फिल्म केद्रिंत करने का साहस दिखाया है। यह जोखिम भरा काम था, क्योंकि हिंदी फिल्मों में स्टार का आकर्षण ज्यादा बड़ा होता है। अगर वह स्टार आमिर खान हो तो यह आकर्षण और बढ़ जाता है।

ईशान अवस्थी की भूमिका को दर्शील सफारी ने बहुत स्वाभाविक तरीके से निभाया है। कोई भी दृश्य सायास नहीं लगता। ऐसा लगता है मानो किसी ने छिप कर ईशान अवस्थी की जिंदगी को कैमरे में उतार लिया हो। उसके माता-पिता की भूमिका में टिस्का चोपड़ा और विपिन शर्मा ने विश्वसनीय अभिनय किया है। कोई भी परिचित कलाकार इन भूमिकाओं को कृत्रिम कर देता। ईशान के बड़े भाई योहान के रोल में सचेत इंजीनियर ठीक हैं तो सहपाठी राजन दामोदरन की भूमिका में तनय छेड़ा ने बराबर का साथ दिया है।

फिल्म का गीत-संगीत कथ्य के अनुरूप है। गीत के भाव दिल छूते हैं और बच्चे के प्रति संवेदना जगाते हैं। प्रसून जोशी ने ओस की बूंदों से बच्चों की तुलना की है। फिल्म के पाश्‌र्र्व संगीत पर भी समुचित ध्यान दिया गया है।

तारे जमीन पर की सोच और पटकथा का श्रेय अमोल गुप्ते को मिलना चाहिए। वह इस फिल्म के क्रिएटिव डायरेक्टर भी हैं। छोटे बच्चों की जिंदगी में सलीके से झांकने का मशविरा देती है तारे जमीन पर। हिंदी फिल्मों के पारिवारिक मनोरंजन की श्रेणी में बरसों बाद आयी यह श्रेष्ठ फिल्म है।

वेलकम-रोचक आइडिया, नाकाम कोशिश

-अजय ब्रह्मात्मज

वेलकम का तामझाम भव्य और आकर्षक है। एक साथ नए-पुराने मिला कर आधा दर्जन स्टार, एक हिट डायरेक्टर और उसके ऊपर से हिट प्रोडयूसर ़ ़ ़ फिल्म फील भी दे रही थी कि अच्छी कामेडी देखने को मिलेगी, लेकिन वेलकम ऊंची दुकान, फीका पकवान का मुहावरा चरितार्थ करती है।

फिल्म का आइडिया रोचक है। दो माफिया डान हैं उदय शेट्टी और मंजनू। वो अपनी बहन की शादी किसी ऐसे लड़के से करना चाहते हैं, जो सीधा-सादा नेक इंसान हो। उनकी हर कोशिश बेकार जाती है, क्योंकि कोई भी शरीफ खानदान उनके परिवार से रिश्तेदारी नहीं चाहता। तीन संयोग बनते हैं। तीनों ही संयोगों में संजना और राजीव की जोड़ी बनती है। पहले संयोग में मंजनू को राजीव पसंद आता है। वह राजीव के मामा से रिश्ते की बात करता है। दूसरे संयोग में राजीव और संजना के बीच प्यार हो जाता है। तीसरे संयोग में मामा को राजीव के लिए संजना पसंद आती है। इस छोटी और अतिरेकी कहानी को लेखक-निर्देशक ने इतना लंबा खींचा कि फिल्म कमजोर पड़ जाती है। हंसी पैदा करने के लिए जोड़ी गई घटनाएं अलग प्रसंगों के तौर पर तो हंसाती हैं, पर कहानी में कुछ जोड़ नहीं पातीं। वेलकम बिखरी हुई कामेडी फिल्म है।

नाना पाटेकर और अनिल कपूर की जोड़ी हास्य की नयी स्थितियां पैदा करती है। अनिल कपूर टपोरी अंदाज में ज्यादा स्वाभाविक लगते हैं। नाना पाटेकर की मेहनत दिखाई पड़ती है। उन्हें अपनी विशेषताओं के साथ सीमाओं का भी ख्याल रखना चाहिए। फिल्म में मल्लिका शेरावत का ट्रैक अलग से चस्पा चिप्पी की तरह नजर आता है। परेश रावल और अक्षय कुमार की कामिकल जोड़ी की केमिस्ट्री अच्छी होती है। वह इस फिल्म में भी दिखती है। रहीं कैटरीना कैफ तो वह हिंदी फिल्मों के लिए आश्चर्यजनक घटना हैं। अभिनय और नृत्य में लचर होने के बावजूद सिर्फ कथित सौंदर्य के बल पर वह फिल्म-दर-फिल्म हासिल करने में कामयाब हो रही हैं। फिल्म के गीत-संगीत में कोई ताजगी नहीं है, जबकि तीन-तीन, चार-चार गीतकार और संगीतकार लिए गए हैं। ऐसा लगता है कि निर्माता-निर्देशक फिल्म को कामयाब बनाने के लिए इसे भी ले लो, उसे भी ले लो के फार्मूले से चल रहे थे। ऐसी जोड़-तोड़ फिल्मों में नही चलती.

Friday, December 21, 2007

मुम्बई में भटकते रहे दर्शक

मालूम नही आप के शहर में क्या हाल रहा?मुम्बई में तो बुरा हाल था?सारे सिंगल स्क्रीन टूट रहे हैं और उनकी जगह मल्टीप्लेक्स आ रहे हैं.इसे अच्छी तब्दीली के रुप में देखा जा रहा है,जबकि टिकट महंगे होने से चवन्नी की बिरादरी के दर्शकों की तकलीफ बढ़ गयी है.उनकी औकात से बाहर होता जा रहा है सिनेमा.आज उनके लिए थोड़ी ख़ुशी की बात थी,क्योंकि मल्टीप्लेक्स के आदी हो चुके दर्शकों को आज सिंगल स्क्रीन की शरण लेनी पड़ी।

हुआ यों कि मल्टीप्लेक्स और निर्माताओं के बीच मुनाफे की बाँट का मामला आज दोपहर तक नहीं सुलझ पाने के कारण किसी भी मल्टीप्लेक्स में तारे ज़मीन पर और वेलकम नहीं लगी.चूंकि पीवीआर के बिजली बंधु तारे ज़मीन पर के सहयोगी निर्माता थे,इसलिए उनके मल्टीप्लेक्स में वह फिल्म लगी.वहाँ भी वेलकम को लेकर असमंजस बना रहा.दर्शकों को हर मल्टीप्लेक्स से निराश होकर आखिरकार सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर की शरण लेनी पड़ी.चवन्नी दो दिन पहले से टिकट लेने की कोशिश में लगा था.आज सुबह भी वह एक मल्टीप्लेक्स में पहुँचा तो बॉक्स ऑफिस पर बैठे कर्मचारी ने सलाह दी कि दो बजे आकर चेक करना.चवन्नी भला इतनी देर तक कैसे इंतज़ार करता.एक-एक कर वह आसपास के तीनों मल्टीप्लेक्स में गया.हर जगह उसे टिकट की जगह निराशा मिली.थक हार कर वह सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर पहुँचा.वहाँ उसे अपने जैसे कई लोग मिले।

हाँ वे सारे लोग फर्स्ट डे फर्स्ट शो वाले थे.एक सज्जन से मुलाक़ात तो बेहद रोचक रही.सफ़ेद दाढ़ी,सफ़ेद पगड़ी और सफ़ेद सलवार कमीज पहने एक बुजुर्ग सरदार जी मिले.चवन्नी ने देखा कि उनके हाथ काँप रहे हैं,लेकिन आंखो पर कोई चश्मा नहीं था.वे मल्टीप्लेक्स वालों को कोस रहे थे कि अपना मामला पहले क्यों माही सुलझा लेते.यह क्या कि शुक्रवार आ गया और पता ही नहीं है कि फिल्म लगेगी कि नहीं लगेगी?इस से बेहतर तो सिंगल स्क्रीन का ज़माना था कि फिल्म देखने को मिल ही जाती थी.चवन्नी की तरह वह भी कई मुल्तिप्लेक्स के चक्कर लगा कर वहाँ पहुंचे थे.उन्होने बताया कि वे पिछले ६४ सालों से फर्स्ट डे फर्स्ट शो देख रहे हैं.उन्होंने पहली फिल्म १९४३ में देखी थी.फिल्म थी अशोक कुमार की किस्मत.चवन्नी चौंका,उस ने सहज भाव से पूछा कि अगर एक ही हफ्ते कई फिल्में हों तो वे क्या करते हैं?फाटक से उन्होंने जवाब दिया जो सबसे अच्छी लग रही हो उसे सबसे पहले देखते हैं.सबसे अच्छी का फैसला वे स्टार देख कर करते हैं.चवन्नी को अफ़सोस हुआ कि उस के पास कैमरा क्यों नही था.वह इस ब्लॉग पर उनकी तस्वीर लगाता.

शुक्रवार,21 दिसम्बर,२००७

आज दो फिल्में रिलीज हो रही हैं.चवन्नी को लगता है कि एक मज्दार फिल्म है और दूसरी समझदार फिल्म है.अब आप तय करो कि पहले कौन सी देखने जा रहे हो.दो मिजाज की हैं फिमें,लेकिन अनुमान है कि दोनों मनोरंजक होंगी।
पिछली बार चवन्नी के एक नियमित पाठक ने आदेश दिया था कि चवन्नी को फिल्म की सिफारिश करनी चाहिए और साफ-साफ बताना चाहिए कि फिल्म देखने जाएँ या न जाएँ?चवन्नी इस भरोसे का कायल हो गया है.दिक्कत यह होती है कि आप के मनोरंजन की १००% गारंटी वाली फिल्में ही तो नही आतीं।
इस बार चवन्नी गारंटी के साथ कह सकता है कि आप आमिर खान की तारे ज़मीन पर देखने जाएँ.आप निराश नहीं होंगे.फिल्म आपको पहले से समझदार बना देगी और मनोरंजन होगा सो अलग.जी हाँ ,यकीन करें तारे ज़मीन पर पैसा वसूल फिल्म है.रोचक तथ्य यह है कि फिल्म का हीरो नया लड़का दर्शील सफारी है और आमिर खान ने फिल्म में उसे पूरी महत्ता दी है.आम तौर पर पॉपुलर हीरो दूसरों के रोल काटने में लगे रहते हैं.यहाँ आप देखेंगे कि कैसे आमिर ने स्क्रिप्ट की ज़रूरत के मुताबिक अपना रोल छोटा रखा है.चवन्नी इतनी बातें इस वजह से बता पा रहा है कि उसने फिल्म देख ली है।
दूसरी फिल्म वेल्कोमे भी मजेदार होगी.इस फिल्म की कास्ट जबरदस्त है और सब कॉमेडी कर रहे हैं.आप अनिल कपूर और नाना पाटेकर के हास्य बोध की कल्पना कर सकते हैं.साथ में कैटरिना कैफ और मल्लिका शेरावत के हुस्न के जलवे हैं.इन सबके ऊपर अक्षय कुमार और परेश रावल की कॉमिक जोड़ी है।
लगता है क्रिसमस के पहले का शुक्रवार पूरी तरह से मनोरंजक होगा.वैसे आज बकरीद की भी छुट्टी है.कल शनिवार और फिर रविवार ...यानी दर्शकों के साथ ही निर्माताओं के भी मजे होंगे.

Thursday, December 20, 2007

सिक्स पैक एब और एक्टिंग


-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले दिनों आई फिल्म ओम शांति ओम की कामयाबी के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में शरीर को सुडौल बनाने का नया फैशन चल पड़ा है। संजय दत्त जेल से बाहर आए, तो घोषणा कर दी कि एट पैक एब बनाऊंगा। खबर है कि इन दिनों अजय देवगन भी गुपचुप उसी राह पर निकल पड़े हैं और एक पर्सनल ट्रेनर की देखरेख में वर्जिश भी कर रहे हैं। सुडौल शरीर की इस चिंता से लगने लगा है कि एक्टिंग के लिए शरीर का सुगठित होना जरूरी है। अभी के फैशन को देखकर कहा जा सकता है कि अगर दारा सिंह इन दिनों एक्टिव होते, तो सारी बड़ी फिल्में और मुख्य भूमिकाएं उन्हें ही मिलतीं! हिंदी फिल्मों का इतिहास पलट कर देखें, तो पाएंगे कि पॉपुलर स्टार और एक्टर्स ने कभी शरीर को इतना महत्व नहीं दिया। शाहरुख खान भी ओम शांति ओम के पहले शरीर की वजह से विख्यात नहीं थे। हां, उनकी अदम्य ऊर्जा की चर्चा अवश्य होती थी। के.एल. सहगल और पृथ्वीराज कपूर से लेकर रणबीर कपूर तक को देखें, तो हम पाएंगे कि भारतीय दर्शकों ने कभी स्टार या एक्टर के सुडौल शरीर को अधिक महत्व नहीं दिया। हिंदी फिल्मों के पॉपुलर स्टार अदाओं और अभिनय की वजह से मशहूर हुए। हां, हिंदी फिल्मों के पहले ही-मैन के रूप में धर्मेन्द्र का नाम जरूर लिया जा सकता है। पंजाब से आए इस गठीले और सुंदर नौजवान ने अपनी फिल्मों में शरीर दिखाने से परहेज नहीं किया।
कसरती शरीर, छलकती मांसपेशियां और सुगठित बदन का फैशन हिंदी फिल्मों में हॉलीवुड से ही आया। आर्नोल्ड श्वार्जनेगर की देखादेखी हिंदी फिल्मों के चंद स्टारों ने शरीर पर ध्यान देना शुरू किया। पिछले पंद्रह-बीस सालों में संजय दत्त और सलमान खान इस मामले में अगुआ रहे। बाद में उनकी राह पर चलने वाले दूसरे स्टार भी आए। उन सभी ने यह स्वीकार किया कि संजय दत्त और सलमान खान से प्रेरित होकर ही उन्होंने शरीर पर ध्यान दिया। सन् 2000 में आई कहो ना..प्यार है की रिलीज के बाद रातोंरात स्टार बने रितिक रोशन ने खुले शब्दों में यह कहा था कि मैंने सुडौल शरीर के लिए सलमान खान से टिप्स लिए थे। सलमान इस तथ्य पर गर्व महसूस करते हैं और क्रेडिट लेने से नहीं चूकते कि उन्होंने ही देश के युवकों के बीच जिम कल्चर की चाहत बढ़ाई।
स्वस्थ शरीर हर मनुष्य की जरूरत है। इन दिनों जिम, योगा, कसरत और अन्य उपायों से स्वास्थ्य की देखभाल की जा रही है। करीना कपूर शाकाहारी हो गई हैं और योगा करती हैं। वे जिस सेट पर रहती हैं, वहां मौजूद अन्य कलाकारों को भी योगा के लिए कहती हैं। योगाभ्यास सराहनीय है, लेकिन उसके साथ अन्य सकारात्मक भाव भी मन में आने चाहिए। मन में कलुष हो, तो कोई भी उपाय शरीर को स्वस्थ नहीं रख सकता।
शाहरुख खान ने ओम शांति ओम में सिक्स पैक एब को एक आइटम और आकर्षण के रूप में इस्तेमाल किया। संजय दत्त और सलमान खान अपने सुडौल शरीर से एक्टिंग की अन्य खामियों को छिपाते रहे। अन्य कलाकार भी बेवजह डोले-सोले दिखाते रहे। यह सब अपनी जगह ठीक और दुरुस्त है, लेकिन एक्टिंग से इन सभी विशेषताओं का सीधा रिश्ता नहीं है, क्योंकि एक्टिंग में भाव प्रदर्शन ही जरूरी है। जब इसकी कमी महसूस होती है, तो एक्टर शरीर प्रदर्शन पर आ जाते हैं और फिर सिक्स या एट पैक एब की खबरें फैलाई जाती हैं।

(आप तय करें कि यह एब है कि ऐब है।)

अजय ब्रह्मात्मज के लेखों के लिए लिंक ...

http://in.jagran.yahoo.com/cinemaaza/cinema/darasal.html

कुछ अफवाहें तारे ज़मीन पर को लेकर

आमिर खान चाहें न चाहें वह विवादों में रहने के लिए अभिशप्त हैं.उनकी सबसे बड़ी दिक्कत उनकी बिरादरी के ही लोग हैं.उन्हें लगता है कि उनके बीच रहते हुए यह आदमी कैसे बदल गया?वह उनकी तरह ही क्यों नही सोचता या उनके जैसा ही डरा हुआ क्यों नही रहता.और फिर बड़ी-बड़ी बातें क्यों करता है?निशित रुप से आमिर खान में बदलाव आया है.वे खुद इस बदलाव को घुलाम के समय से देखते हैं.उनके प्रशंसक भी मानते हैं कि सरफ़रोश के बाद आमिर की सोच और फिल्मों में गुणात्मक बदलाव आया है.बस यही कारण है कि सभी की निगाह आमिर पर लगी रहती है।
देश का एक बड़ा मीडिया हाउस कुछ कारणों से आमिर खान को पसंद नही करता,क्योंकि आमिर ने दुसरे स्टारों की तरह उसके आगे घुटने नही टेके और न ही उनके द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार की परवाह की.यह मीडिया हाउस आमिर की फिल्म आते ही अफवाहों से नेगेटिव माहौल तैयार करता है.मंगल पण्डे के खिलाफ हवा बनने में इस मीडिया हाउस का हाथ रहा.आमिर के खिलाफ निगेटिव स्टोरी करने में अव्वल इस मीडिया हाउस से यह खबर उड़ी कि तारे ज़मीन पर खास लोगों की फिल्म है,इसलिए आम दर्शक इसे देखने नही जायेंगे.तारे ज़मीन पर को तथाकथित आर्ट हाउस सिनेमा बता कर दर्शकों को काटने की कोशिश नाकाम हो गयी तो यह खबर फैलाई गयी कि इस फिल्म में आमिर खान का रोल छोटा है।
फिल्म देख चुके लोग बता रहे हैं कि फिल्म का हीरो तो ईशान अवस्थी है.आमिर खान मुख्य रुप से इंटरवल के बाद आते हैं.तब भी कहानी ईशान पर ही केन्द्रित रहती है.इस फिल्म की यही ज़रूरत है.क्या यह ज़रूरी है कि पॉपुलर स्टार पूरी फिल्म में दिखे?वास्तव में दर्शकों को इस तरह बरगलाया जाता है कि अगर पूरी फिल्म में मेन स्टार नही है तो पैसा वसूल नही होता.पैसा वसूल अच्छी फिल्म से होता है और देखने वाले कह रहे हैं कि तारे ज़मीन पर बहुत अच्छी फिल्म है।
फिल्म की रिलीज के बाद भी अफवाहें उड़ेंगी और कोशिश रहेगी कि अलग किस्म की फिल्म को सफल न होने दिया जाये,क्योंकि अगर कोई अलग और बेहतर फिल्म बना कर कामयाब होता है तो फिल्म इंडस्ट्री की भेड़ियाधसान का क्या होगा?
ताज़ा खबर है कि गुजरात में कोई संगठन इसके खिलाफ जुटा है.उसकी कोशिश है कि तारे ज़मीन पर गुजरात के सिनेमाघरों में न लगे.वे नर्मदा आंदोलन के समर्थन में दिए आमिर के बयानों की सजा लंबी करना चाहते हैं.इस तरह वे गुजरात के दर्शकों को एक अच्छी फिल्म सिनेमाघर में देखने से वंचित करेंगे.दर्शक तो देख ही लेंगे..सिनेमाघरों में नही तो डीवीडी या वीसीडी पर.

Tuesday, December 18, 2007

हल्ला बोल में दुष्यंत कुमार?

हल्ला बोल के निर्देशक राज कुमार संतोषी हैं.इस फिल्म के प्रति जिज्ञाशा बनी हुई है.पहले खबर आई थी कि इसमें सफदर हाशमी का संदर्भ है.बाद में पता चला कि नहीं सफदर तो नहीं हैं,हाँ जेसिका लाल के मामले से प्रेरणा ली गयी है.वास्तव में किस से प्रेरित और प्रभावित है हल्ला बोल ...यह ११ जनवरी को पता चलेगा.वैसे अजय देवगन को देख कर लगा रहा है कि गंगाजल और अपहरण की कड़ी की अगली फिल्म है।
अरे,चवन्नी को तो दुष्यंत कुमार की बात करनी थी.आज ही इस फिल्म का ऑडियो सीडी ले आया चवन्नी.उस ने कहीं देखा था कि इस फिल्म के क्रेडिट में दुष्यंत कुमार का भी नाम है.फटाफट सीडी के ऊपर चिपका पन्नी फाड़ा और गीतों की सूची पढ़ गया चवन्नी.उसने दिमाग पर जोर दिया लेकिन किसी भी गीत के मुखड़े में दुष्यंत कुमार के शब्द नहीं दिखे.मजबूरन थोड़े सब्र का सहारा लेकर सीडी प्ले किया.पहले गीत के शब्दों में दुष्यंत कुमार का आभास हो रहा था,लेकिन परिचित अशआर नहीं मिल रहे थे.चवन्नी ने बेचैन होकर अपने मित्र को फ़ोन किया.उसे विश्वास था कि उन्हें ज़रूर पता होगा.उनहोंने कहा कि हाँ दुष्यंत कुमार की गज़लें ली गयी हैं.जब चवन्नी ने उन्हें बताया कि कोई परिचित शब्द नहीं सुनाई पड़ रहा है तो उनहोंने पता कर बताने कि बात कही.दो मिनट के अन्दर ही उनका फ़ोन आ गया.उनहोंने बताया कि पूरी ग़ज़ल तो नहीं लेकिन चंद अशआर इस्तेमाल किये गए हैं.तब तक चवन्नी सिस्टम पर भी सुखविंदर की आवाज़ गूंजी ...हो गयी है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए ,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। इसके बाद दुष्यंत कुमार की इसी ग़ज़ल के दो और अशआर सुनाई पड़े.थोडा संतोष हुआ,लेकिन चवन्नी का मन खिन्न हो गया।
पता करने पर मालूम हुआ कि हिन्दी फिल्मों के धुरंधर गीतकार ने दुष्यंत कुमार की ज़मीन पर अपना हल चला दिया और उन्हें पूरी तरह से बेदखल तो नही किया ,हाँ मेड़ पर जरूर बिठा दिया है.चवन्नी समझ नहीं पा रहा है कि दुष्यंत कुमार के चंद अशआरों के इस्तेमाल को उपयोग समझे या दुरूपयोग माने.आप सुधीजन हैं,आप ही बताएं.वैसे ऑडियो सीडी के कवर पर LATE SHREE DUSHYANT KUMAR लिखा हुआ है.

भारतीय पुरूषों की कुरूपता

प्रिय पाठक चौंके नहीं कि चवन्नी को आज क्या सूझी?
फिल्मों की दुनिया से निकल कर वह आज क्या कहने जा रहा है?चवन्नी को एक नई किताब हाथ लगी है.लेखक हैं मुकुल केसवन... चवन्नी के अंग्रेजी पाठक उनके नाम से परिचित होंगे.नयी दिल्ली के वासी मुकुल केसवन इतिहास पढ़ाते हैं aur हर लेखक की तरह सिनेमा,क्रिकेट और पॉलिटिक्स पर लिखते हैं.सिनेमा पर लिखने की छूट हर लेखक ले लेता है.उसके लिए अलग से कुछ पढाई करने की ज़रूरत कहाँ पड़ती है.हर भारतीय को सिनेमा घुट्टी में पिला दी जाती है.यकीं नही तो किसी से भी सिनेमा का ज़िक्र करें,अगर वह आपकी जानकारी में इजाफा न करे तो चवन्नी अपनी खनक खोने को तैयार है।
बहरहाल,मुकुल केसवन की नयी किताब आई है.चवन्नी को नही मालूम कि उनकी कोई किताब पहले आई है कि नही?इस किताब का नाम उन्होने रखा है भारतीय पुरूषों की कुरूपता और अन्य सादृश्य॥(the ugliness of the indian male and other proportions)।
इस किताब में उनहोंने विस्तार से पुरूषों की कुरूपता की चर्चा की है.अगर यह किताब किसी औरत ने लिखी होती तो शायद अभी तक मोर्चा निकल चूका होता,लेकिन यहाँ एक पुरुष ही अपने समूह को आईना दिखा रहा है.वह आगे बढ़ कर कहते हैं कि छोंकी भारतीय पुरुष कुरूप होते हैं,इसलिए वे कुरूप हीरो को पसंद करते हैं.भारतीय फिल्मों के हीरो कुरूप ही होते हैं.चवन्नी को पूरा विश्वास है कि अपने आलोक पुराणिक इस मामले में खामोश नहीं रहेंगे.वैसे भी ज्यादातर कुरूप जन ही ब्लॉग लिख रहे हैं ,इसलिए ब्लॉग जगत में खलबली मचनी चाहिए।
मुकुल केसवन ने उदाहरण भी दिया है.आप फिल्मों के मशहूर कुरूपों के नाम देखें...प्रेम अदीब,कुन्दन लाल सहगल,अशोक कुमार,प्रेमनाथ,किशोर कुमार,राज कपूर,दिलीप कुमार,देव आनंद,भारत भूषण,गुर दत्त,बिश्वजीत,जोय मुख़र्जी,राजेंद्र कुमार,शम्मी कपूर,शशि कपूर,धर्मेन्द्र,राज कुमार,शत्रुघन सिन्हा,राजेश खन्ना,अमिताभ बच्चन,अजय देवगन,गोविंदा,नसीरुद्दीन शाह,मिथुन चक्रवर्ती,आमिर खान,शाहरुख़ खान,रितिक रोशन,अनिल कपूर,सनी देओल, सलमान खान,संजय दत्त,सुनिल शेट्टी..इनमें जो नाम शामिल हैं वे खुद को कुरूपों से अलग न मानें .किताब को सिर्फ नामों की सूची से तो नही भरना था न?
मुकुल लिखते हैं कि भारतीय दर्शकों को तब आत्मिक ख़ुशी मिलती है जब ये कुरूप हीरो सुन्दर हीरोइनों को अपने वश में करते हैं.भारतीय सिनेमा की लोकप्रियता का यह नया तर्क है।
अब आप बताएं कि मुकुल केसवन की धारणा से आप कितना सहमत हैं?

Monday, December 17, 2007

४४% की पसंद आमिर खान

चवन्नी के पाठकों में से ४४% को आमिर खान पसंद हैं।
चवन्नी ने पिछले हफ्ते पूछा था कि आपका प्रिय स्टार कौन है?६ स्टारों के नाम थे.आमिर कान,सलमान खान,शाहरुख़ खान,रितिक रोशन.अक्षय कुमार और शाहिद कपूर। चवन्नी के पाठकों ने शाहिद कपूर और सलमान खान को सबसे नीचे रखा.शाहरुख़ खान और अक्षय कुमार को एक बराबर ११-११% मत मिले.हाँ रितिक रोशन दूसरे नुम्बेर पर रहे.उन्हें २२% पाठकों ने पसंद किया.अव्वल स्थान मिला आमिर खान को.उन्हें चवन्नी के ४४% पाठकों ने पसंद किया।
आप भी अपनी पसंद दर्ज कर सकते हैं.

Saturday, December 15, 2007

स्ट्रेंजर्स: भूली भटकी स्टाइलिश फिल्म

-अजय ब्रह्मात्मज
क्या सचमुच विदेश में बसे भारतीय वहां के समाज से अलग-थलग रहते हैं? क्या वे मिलते ही हिंदी में बातें करने लगते हैं? विदेश में पूरी तरह से शूट की गई हिंदी फिल्मों से जो तस्वीर बनती है, वह बिल्कुल सच्ची नहीं लगती। आनंद राय की स्ट्रेंजर्स भी ऐसी भूलों का शिकार हुई है।
लंदन पहुंचने वाली एक ट्रेन के फ‌र्स्ट क्लास कूपे में दो भारतीय मूल के यात्री मिलते हैं। दोनों अजनबी हैं। उनकी आपस में बातचीत आरंभ होती है तो पता चलता है कि दोनों ही अपनी-अपनी बीवियों से तंग हैं। किसी भी प्रकार उनसे मुक्ति चाहते हैं। इंटरवल तक दोनों की योजना बनती है कि वो एक-दूसरे की बीवी की हत्या कर देंगे। पहली हत्या होती है और फिर हमें अजनबी व्यक्तियों के बीच अचानक सी लग रही घटना और योजना की असलियत मालूम होती है।
फिल्म में कई सवाल अनुत्तरित हैं। अब पति-पत्नी के बीच तलाक बहुत अनहोनी बात नहीं रही। अगर राहुल और संजीव बीवियों से तंग थे तो उनसे छुटकारा पाने के लिए तलाक ले सकते थे। उन्होंने तलाक का रास्ता न चुन कर उन्हें हलाक करने की क्यों सोची? राहुल और प्रीति या संजीव और नंदिनी के संबंधों में प्रेम नहीं है, लेकिन ऐसी कड़वाहट भी नहीं दिखी कि वह जहर बन जाए। फिल्म के लेखक ने एल्फ्रेड हिचकाक की मूल अंग्रेजी फिल्म से ढांचा तो लिया, लेकिन उसमें भारतीय रंग भरने में विफल रहे। फिल्म में फ्लैश बैक शैली का उपयोग किया गया है, लेकिन अनगढ़ उपयोग से वर्तमान और अतीत आपस में गड्डमड्ड हो गए हैं। हिंदी फिल्मों में फ्लैश बैक का सुंदर उपयोग गुलजार से सीखा जा सकता है। उनकी कई फिल्मों में तो फ्लैश बैक में छिपे एक और फ्लैश बैक का सुंदर सामंजस्य देखा जा सकता है। बहरहाल, कच्ची और अतार्किक कहानी के कारण स्ट्रेंजर्स स्टाइलिश होने के बावजूद अपील नहीं करती। ऐसी साधारण फिल्मों में कलाकार का उत्तम अभिनय भी अनदेखा रह जाता है। सिर्फ रिकार्ड के लिए कह सकते हैं कि नंदना सेन और जिमी शेरगिल ने बेहतरीन अभिनय किया है। केके मेनन की भाव मुद्राएं अब देखी हुई लगती हैं। उन्हें अपने किरदार पर अधिक मेहनत करनी चाहिए थी।

Friday, December 14, 2007

'खोया खोया चांद' - रिलीज से ठीक पहले

(सुधीर मिश्र ने यह पोस्ट खोया खोया चांद की रिलीज से एक दिन पहले पैशन फॉर सिनेमा पर लिखा था.चवन्नी चाहता है कि उसके पाठक और सिनेमा के आम दर्शक इसे पढें और खोया खोया चांद देखें.निर्देशक सुधीर मिश्र के इस आलेख से फिल्म की मंशा समझ में आती है। )



इसके पहले के पोस्ट में मैंने 'खोया खोया चांद' बनाने के कुछ कारणों की बात की थी. उस पोस्ट के टिप्पणीकारों के साथ ईमेल पर मेरा संपर्क रहा है. कल मेरी फिल्म रिलीज हो रही है. इस फिल्म के बारे में मेरे कुछ और विचार...

'खोया खोया चांद' में मैंने एक ऐसी कहानी ली है, जिसे छठे दशक का कोई भी फिल्मकार बना सकता था. हां, मैं उस समय की नैतिकता और तकनीक से प्रभावित नहीं हूं. इसलिए हर सीन में मैं थोड़ा लंबा गया हूं, जबकि उस दौर के फिल्मकार थोड़ा पहले कट बोल देते.

मेरे खयाल में आप तभी ईमानदारी से फिल्म बना सकते हैं, जब उनके साथ घटी घटनाओं में खुद को रख कर देखें... आप क्या करते? क्योंकि आप केवल खुद को ही सबसे अच्छी तरह जानते हैं.

'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' में वस्तुगत सत्य का चित्रण था. इस फिल्म में अंतर का सत्य है. उनमें से अधिकांश अपने प्रेत से लड़ रहे हैं. इसलिए जब आप अंतर्द्वद्व के बाहरी कारण समझने की कोशिश करेंगे तो ज्यादा कुछ नहीं जान पाएंगे. यह एक मासूम लड़की की कहानी है. इस फिल्म में ऐसी संभावना नहीं थी कि मैं अपने परिचित ट्रिक का इस्तेमाल करता. ठोस और गंभीर विषयों पर फिल्म बनाने के तरीकों का का इस्तेमाल इस फिल्म के शॉट, साउंड, कट में नहीं कर सकता था.

मुझे मालूम है कि दर्शक प्रतिक्रिया करेंगे, क्योंकि आपकी एक छवि होती है. आपकी फिल्में भी उसी छवि में देखी जाती है. जैसे कि किसी ने कहा कि चमेली वैसी हार्ड हिटिंग नहीं थी, जैसी वेश्याओं की जिंदगी होती है. चमेली वैसी थी ही नहीं. चमेली एक परिकथा थी. वह अनंत बलानी के आइडिया पर बनी थी. मुझे आइडिया अच्छा लगा था. मैंने उसे फिर से लिखा और उसके लिए मैं जिम्मेदार हूं. वह 'अगर ऐसा होता ...' टाइप की फिल्म नहीं थी.

खोया खोया चांद बनाते समय मैंने 'हजारों...' या 'चमेली' के बारे में नहीं सोचा. मैं नहीं मानता कि एक फिल्म दूसरे से बेहतर होती है. वह एक फिल्म थी और वह हो गयी. और यह दूसरी फिल्म है.

'खोया खोया चांद' को लेकर मैं रोम फिल्म फेस्टिवल गया. जितने इतालवी दर्शकों ने इसे देखा, उनमें से अधिकांश को फिल्म पसंद आई. उन्होंने काफी देर तक सवाल-जवाब किए. उन्होंने फिल्म मेकिंग के प्रति श्रद्धांजलि के तौर पर भी इसे देखा.

मेरी अभी तक की फिल्मों में यह सबसे ज्यादा रचित फिल्म है. मुझे दर्शकों को एक दुनिया में ले जाना था.

उस समय की फिल्मों में स्पष्ट भावनाएं होती थीं और लोग अपनी भावनाओं के बारे में सीधी बातें करते थे. उनके मेल-मिलाप में भावनात्मक कृत्रिमता या छल का अभाव था. हां, कुछ गरिमापूर्ण अपवाद थे. उदाहरण के लिए 'मुगलेआजम' में फिल्म के अंत में अकबर से अनारकली कहती है कि वह एक रात सलीम के साथ बिताना चाहती है, क्योंकि भविष्य के बादशाह इस एहसास के साथ जिंदा न रहें कि उनकी एक ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी. वह साफ झूठ बोल रही थी. उसकी असली ख्वाहिश अपने प्रेमी के साथ एक रात बिताने की थी. मेरे ख्याल में सिनेमा में बोला गया यह सबसे शानदार झूठ है.

मेरी फिल्म उस दृश्य को दी गयी एक श्रद्धांजलि है । मेरे खयाल में वह दृश्य सिनेमा का एक अनुपम दृश्य है. इस फिल्म को बनाने की एक प्रेरणा यह भी थी कि उस दौर की अभिनेत्रियों को हंसते हुए देखा जाए- आप सिर पीछे कर उन्हें देख सकें. उदाहरण के लिए मधुबाला का चेहरा याद करें.

ये औरतें साधारण परिस्थितियों से आयी थीं, लेकिन उन्होंने खुद को फिर से खोजा. खुद को नया नाम दिया और स्टार बन गयीं. हमारी यादों में हमेशा के लिए बस गयीं. उनमें से अधिकांश किसी बड़े ठिकाने से नहीं आई थीं. वे साहसी, बोल्ड और कामुक थीं. आज की अधिकांश अभिनेत्रियां लड़कियां है. वे औरतें थी. उनकी नाजुक दुनिया थी.

निखत उस दौर की अनेक फिल्मों की महिला करदारों जैसी है. फर्क यही है कि आप उसके साथ थोड़ा आगे जा सकते हैं. इसलिए कभी लुक, कभी संवाद, कभी आवेग के क्षणों में वह उस दौर की औरतों को मिली अनुमति से कुछ ज्यादा कह और कर जाती है. वही बात है कि उस समय की भावना का इस्तेमाल करना है, लेकिन वैसी भावुकता नहीं दिखानी है. हम निराशा के भोग-विलास में लीन नहीं हैं, हालांकि हम उसे कभी-कभी छूते हैं. वह भी फिल्म के अंत में उस दौर की फिल्मों को श्रद्धांजलि देते हुए .

फिल्मों में काम करने वाले हम सभी लोग जानते हैं कि इस माध्यम के निहित तनाव एक दिन हमारी जान ले लेंगे. हम फिल्म पूरी कर लेने के बाद की उस चिंता को भी समझते हैं कि हमारी फिल्म चलेगी या नहीं चलेगी? असफल होने का भय हम समझते हैं. हम हर दिन सब कुछ अपनी मुट्ठी में (नियंत्रण) में लेने की ग्रंथि से ग्रस्त रहते हैं और हम परपीड़क भी होते हैं. इस जगह को चलाने वाली सेक्स की राजनीति हमें निराश करती है. लेकिन सब कुछ के बाद अंत में यह यात्रा मजेदार लगती है.

उस पीरियड की फिल्म बनाने का एक आनंद यह है कि आप उनकी तरह संगीत का उपयोग कर सकते हैं. वास्तव में इस फिल्म की एक चुनौती संगीत है. आप उस समय के संगीतकारों की नकल नहीं कर सकते, लेकिन उस दौर में खुद को रख कर फिल्म बनाते हैं तो उनसे प्रेरित हो सकते हैं.

इस फिल्म के तीन गीत कैबरे, मुजरा और पियानो गीत 'खुश्बू सा', 'चले आओ सैयां' और 'ये निगाहें' का खास संदर्भ है. आपको ये गीत उस दौर के ऐसे गीतों की याद दिलाएंगे. 'ये निगाहें' का संगीत खास तौर पर दूसरे पश्चिमी गीतों की तरह है. जैसे 'ये है मुंबई मेरी जान' वास्तव में 'ओ माई डार्लिंग क्लेमेनटाइन ' है.

आपको अच्छा लगे या न लगे लेकिन उसमें समय का ज्यादातर हल्का संगीत पश्चिमी गीतों की नकल हैं . ओ पी नैयर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि गुरुदत्त ने उन्हें एक गीत लाकर दिया और कहा कि इसकी नकल करें... और इसी कारण ओ पी नैयर ने सीआईडी के बाद उनके साथ दोबारा काम नहीं किया.

इस फिल्म में दो मौलिक गीत हैं. शीर्षक गीत और थिरक थिरक... और दोनों अच्छे गीत हैं . 'ओ री पाखी' भी मौलिक है, लेकिन उस पर रवींद्र संगीत का प्रभाव है.

यह जफर का गीत है. इसे बर्मन दा की संगीत रचना की तरह रखना था. जफर का प्रभाव बिमल राय की तरह का है, जिनके लिए वे संगीत तैयार करते थे.

ये दोनों गीत उस समय से प्रेरित हैं, लेकिन फिर अपनी दुनिया रचते हैं. शीर्षक गीत कव्वाली की तरह है, लेकिन उसकी शुरूआत रैप की तरह है. जानबूझ कर मजाज की एक नज्म का प्रभाव लिया गया है. उस नज्म का एक हिस्सा जिया सरहदी की फिल्म फुटपाथ में इस्तेमाल किया गया था, जिसके हीरो दिलीप कुमार थे.

इसलिए इस फिल्म का संगीत किरदारों से नियमित है, जो मेरी फिल्म में आ गए हैं. दूसरे शब्दों में कहूं तो ये गीत उस समय की फिल्म के सेट पर शुरू होते हैं और फिर किरदारों की वास्तविक जिंदगी पर छा जाते हैं.

मैंने अपने संगीतकार शांतनु मोइत्रा से कहा था कि वे खुद को उस समय के संगीतकार के रूप में देखें. वैसा संगीत सुनें जो शायद बर्मन दा सुनते हों ... जैसे कि बाउल, भटियाली और रवींद्र संगीत.

मुझे खुशी है कि संगीत सराहा गया.

यह फिल्म इस बजट में टीम के समर्पण भाव के कारण बन सकी.

निहारिका खान - कॉस्ट्यम डिजाइनर, शांतनु-संगीत, स्वानंद-गीत, कला निर्देशक-गौतम सेन और सबके ऊपर कैमरामैन - सचिन कृष्ण.

मेरे एसोसिएट डायरेक्टर समीर शर्मा. मेरे चीफ एसिस्टैंट तारिक और मेरे सारे एसिस्टैंट . 14 जवान लड़कों का झुंड. सभी ने बहुत काम किया.

मेरे पहले ब्लॉग पर नो स्मोकिंग को लेकर भी कुछ टिप्पणियां की गयी हैं.

मुझे लगता है कि अनुराग अतिवादी प्रतिक्रिया के लिए उकसाता है. लोग उसकी प्रतिक्रिया के कारण कठोर रवैया अपनाते हैं. मैं अनुराग के लिए कोई माफी नहीं मांग रहा हूं और लोग अपनी सोच के लिए आजाद हैं. लेकिन फिल्म के बारे में सवाल है, क्या वह सचमुच इतनी बुरी है? आप कई लोगों को अतिरिक्त स्टार देते हैं. कई फिल्मों को आप माफ कर देते हैं. सब लोग इतने कठोर क्यों हो गए?

मेरे ख्याल में अनुराग अपने लिए जो स्टैंडर्ड तय करता है और लोग उस से जिस स्टैंडर्ड की उम्मीद करते हैं, वे काफी बड़ी है. इस अर्थ में वह एक जाल में फंस जाता है. अगर आप क्रिटिकल हैं और आलोचना करते हैं या यों कहें कि आप कुछ और हैं या दूसरों की तरह नहीं हैं तो लोग आपके दावे से ही आपके स्टैडर्ड को जांचेंगे और अगर लोगों को लगा कि आप में थोड़ी भी कमी रह गयी तो यकीन करें आपकी जम कर मालोचना होगी. यह अवश्यंभावी है.अनुराग ने अपने स्टैंडर्ड के दावे किए. यह उसके और उसके दर्शकों के बीच की बात है कि वह उन दावों को पूरा करता है या नहीं? मुझे लगता है कि उसके और उसके आलोचकों के बीच की परस्पर बात है. वह चलती रहे. उनके बीच यह बातचीत चल रही है.

मेरी फिल्म नो स्मोकिंग के विपरीत है. यह सॉफ्ट, भावुक और सीधे तौर पर भावनात्मक फिल्म है.

यह जवान लड़की निखत के दिमाग में चल रही है. यह सॉफ्ट और स्लो है. थ्रिलर की तरह तेज नहीं हो सकती यह फिल्म. यह चीखने-चिल्लाने वाले किरदार की कहानी नहीं है. यह एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो अंदर से टूटती है. ऐसा नहीं है कि उसमें जोश नहीं है. लेकिन वह कहीं से भी हिंसक नहीं है. यह मर्दाना फिल्म नहीं है. यह एक अर्थ में जनाना फिल्म है. यह एक लड़की के बारे में है, जो यकीन रखती है.

आमतौर पर मैं नहीं जानना चाहता कि लोगों को मेरी फिल्म पसंद आई कि नहीं आई. जब 'हजारों...' बना रहा था तो वह डेढ़ साल के लिए रूक गई थी. लेकिन में शुक्र मनाता हूं कि आखिरकार वह रिलीज हो गयी. ठीक है कि वह कायदे से रिलीज नहीं हो सकी, क्योंकि तब तक उस स्वभाव की फिल्में रिलीज नहीं होती थीं.

और कोई फिल्म तभी बनती है, जब फायनेंस मिलता है. हम जैसे लोग अपनी कहानियां लेकर घूमते रहते हैं, चूंकि हम डीवीडी की नकल नहीं करते, इसलिए चार-पांच कहानियां हमारे पास रहती हैं. जिस फिल्म को फायनेंस मिल जाता है, वह बन जाती है. ऐसा नहीं है कि मैं 'खोया खोया चांद' अभी बनाना चाहता था. मैं इसे तीन साल पहले बनाना चाहता था. पर इसे अभी फायनेंस मिला. मैं 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' आठ साल पहले बनाना चाहता था, लेकिन उसे पांच साल पहले बना सका. तीन सालों तक वह लटकी रही, क्योंकि किसी ने पैसे नहीं लगाए. फिल्म निर्माण का यह व्यावहारिक यथार्थ है.

मैं किसी दिन 'हजारों...' का सिक्वल बनाना चाहूंगा. और मैंने सुना है कि चित्रांगदा सिंह लौट रही है मेरे साथ फिल्म करने के लिए. अच्छी बात है. आप कई तरह से सिक्वल लिख सकते हैं, लेकिन आप गीता के बगैर उसे नहीं लिख सकते.

'हजारों...' बिल्कुल अलग किस्म की फिल्म थी. वह मानवीय जोश की फिल्म नहीं थी और किसी स्थिति से विजयी होकर निकले लोगों की कहानी भी नहीं थी. वह दुष्ट लोगों की फिल्म भी नहीं थी .उस में अंधेरेपन की खोज नहीं की गयी थी. हम हर नेक इंसान के अंदर का अंधेरा खोज रहे थे. वह अतिवादी किस्म की फिल्म नहीं है. वह विवादास्पद या सनसनी फैलाने वाली फिल्म भी नहीं थी. गीता को किसी के साथ सोने के लिए गीता के उद्धरण की जरूरत नहीं थी. फिर भी फिल्म चली और मैं शुक्र मानता हूं. मैं अब 'हजारों...' को किसी और की बनायी फिल्म की तरह देखता हूं.

कुछ लोगों के उस फिल्म के साथ अपने संबंध है. कुछ लोगों ने कहा कि उन्होंने उसे 24 बार देखा. मेरे अलावा कोई और वजह होगी, जो उन्हें उन किरदारों या विचारों तक ले जाती होगी. 'हजारों...' के साथ जो हुआ, वह बहुत अच्छा हुआ, लेकिन मैं कभी प्रतिक्रियाओं के लिए परेशान नहीं रहा.

'खोया खोया चांद' के लिए परेशान हूं. चाहता हूं कि लोगों को फिल्म पसंद आए. मैंने कोशिश की है और उम्मीद करता हूं कि वह कोशिश लोगों को पसंद आए.

6 दिसंबर, 2007 11.06 पूर्वाह्न

Thursday, December 13, 2007

जन्मदिन विशेष - राजकपूर , आरके बैनर और कपूर खानदान


-अजय ब्रह्मात्मज


राजकपूर और रणबीर कपूर में एक समानता है। दोनों जिस डायरेक्टर के असिस्टेंट थे, दोनों ने उसी डायरेक्टर की फिल्म से एक्टिंग करियर की शुरुआत की। सभी जानते हैं कि राजकपूर ने स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं की थी। वे केदार शर्मा के असिस्टेंट रहे और सन् 1944 में उन्हीं की फिल्म नीलकमल से बतौर एक्टर दर्शकों के सामने आए। 1947 में उन्होंने आरके फिल्म्स एंड स्टूडियोज की स्थापना की।
रणबीर भी अपने दादा की तरह संजय लीला भंसाली के सहायक रहे और फिर उनकी ही फिल्म सांवरिया से बतौर एक्टर दर्शकों के सामने आए। अब यह देखना है कि वे आरके फिल्म्स एंड स्टूडियोज को कब पुनर्जीवित करते हैं?
राजकपूर ने जब स्कूल न जाने का फैसला किया, तो उनके पिता ने उन्हें जवाब-तलब किया। राजकपूर ने जवाब देने के बजाए अपने सवाल से पिता को निरुत्तर कर दिया। उन्होंने पृथ्वीराज कपूर से पूछा, सर, स्कूल की पढ़ाई के बाद क्या होगा? अगर आपको वकील बनना हो, तो आप लॉ कॉलेज में जाते हैं। अगर आपको डॉक्टर बनना हो, तो आप मेडिकल कॉलेज में जाते हैं और अगर आपको फिल्ममेकर बनना हो, तो आप कहां जाएंगे? मैं जिस पेशे में जाना चाहता हूं, उसके लिए जरूरी है कि मैं किसी स्टूडियो में काम शुरू कर दूं। इस तरह राजकपूर की फिल्मी पढ़ाई केदार शर्मा से आरंभ हुई, जो चांटा खाने के साथ आगे बढ़ी और फिर एक्टिंग के मुकाम तक पहुंची।
राजकपूर और फिर उनके भाइयों ने फिल्म इंडस्ट्री में प्रतिष्ठा और शोहरत हासिल की और बाद में बेटे भी आए। उनके परिवार को फिल्म इंडस्ट्री के पहले परिवार के रूप में पहचाना गया। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इस परिवार के योगदान का मूल्यांकन अभी तक नहीं हो सका है। कपूर खानदान के तमाम सदस्यों ने इंडस्ट्री में योगदान दिया है। इस परंपरा में नया नाम रणबीर का जुड़ा है। उल्लेखनीय है कि रणबीर का नाम आरके बैनर के वारिस के रूप में भी उछाला गया। यहां एक सवाल उभरता है। क्या रणबीर ही आरके बैनर के वारिस होने के हकदार हैं? अगर हां, तो क्यों? रणबीर की पीढ़ी के सदस्यों की बात करें, तो उनसे पहले करिश्मा कपूर फिल्मों में नाम कमा चुकी हैं और करीना कपूर आज भी एक्टिव हैं। करिश्मा और करीना के फिल्मों में आने के समय किसी ने उनके वारिस होने की बात नहीं कही और न ही इस दिशा में सोचा गया।
दरअसल.., फिल्मों में करिश्मा के प्रवेश को एक विरोध के रूप में लिया गया था। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पहले परिवार में एक अनलिखा नियम था कि परिवार की लड़कियां फिल्मों में काम नहीं करेंगी। वैसे, यह नियम और भी फिल्मी परिवारों में है। मालूम नहीं, यह सवाल कभी राजकपूर से पूछा गया या नहीं कि उनकी बेटी रीतू फिल्मों में क्यों नहीं आई? उनकी जीवनियों में ऐसा संकेत मिलता है कि राजकपूर कभी इस पक्ष में नहीं रहे कि परिवार की लड़कियां फिल्मों में आएं। बबीता ने सिर्फ अपनी जिद के तहत करिश्मा को फिल्मों में उतारा। करिश्मा और करीना की लॉन्चिंग पर कपूर परिवार में वैसी खुशी नहीं मनाई गई थी, जैसी रणबीर की लॉन्चिंग के समय दिखी। इस प्रसंग में उल्लेखनीय यह है कि रणबीर की सांवरिया को लेकर चर्चा में जरूर रहे, लेकिन ऐसा नहीं है कि वे करीना से अधिक टैलॅन्टेड हैं। उनकी फिल्म ने इस बात को साबित किया है। इसे दर्शकों की पसंद कहिए या और कुछ..। ऐसी स्थिति में आरके बैनर का असली वारिस किसे समझा जाए? रणबीर या करीना को? वारिस के संबंध में हमारी-आपकी दो राय हो सकती है, लेकिन राजकपूर द्वारा आरंभ की गई परंपरा और उसमें इस परिवार के योगदान के संबंध में दो राय नहीं हो सकती। राजकपूर उन फिल्मकारों में हैं, जिनमें फिल्म निर्माण और निर्देशन का पैशन था। वे सिर्फ पैसों या मुनाफे के लिए फिल्में नहीं बनाते थे। आरके बैनर के तहत फिल्म विधा में किए गए उनके सफल प्रयोग आज उदाहरण बन चुके हैं। इस परिवार से यही अपेक्षा है कि वे आरके फिल्म्स एंड स्टूडियोज के पट शीघ्र ही खोलेंगे और फिल्म निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाएंगे। वैसे, रणबीर ने संकेत दिया है कि वे अपने दादा की तरह फिल्मकार बनना चाहते हैं। हम चाहेंगे कि रणबीर की चाहत पूरी हो।

हर बच्चा 'स्पेशल' होता है-आमिर खान



पॉपुलर हिंदी फिल्म स्टारों में आमिर खान अकेले ऐसे अभिनेता हैं, जिनकी फिल्म इतने लंबे गैप के बाद आ रही है। दर्शकों को याद होगा कि उनकी पिछली फिल्म यशराज कैंप की फना थी। उसके बाद आमिर अलग-अलग कारणों से सुर्खियों में जरूर रहे, लेकिन वे साथ ही साथ खामोशी से अपनी नई फिल्म भी पूरी करते रहे। लगान के बाद उनके प्रोडक्शन की दूसरी फिल्म है तारे जमीं पर। वे इसके निर्माता-निर्देशक तो हैं ही, साथ ही इसमें अभिनय भी कर रहे हैं। पिछले दिनों आमिर खान से मुलाकात हुई। प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश..
बधाई कि आप अभिनेता और निर्माता के बाद निर्देशक भी बन गए। क्या फिल्म तारे जमीं पर में अभिनेता आमिर खान को निर्देशक आमिर खान ने चुना?

अच्छा सवाल है, लेकिन मैं बता दूं कि इस फिल्म में मेरी भागीदारी पहले एक्टर और प्रोड्यूसर की जरूर थी, लेकिन डायरेक्टर मैं बाद में बन गया। लोग कह सकते हैं कि डायरेक्टर आमिर को एक्टर आमिर गिफ्ट में मिल गया। सच कहूं, तो मैंने सोच रखा था कि जब डायरेक्टर बनूंगा, तो फिल्म में एक्टिंग नहीं करूंगा, लेकिन इस फिल्म में सिचुएशन कुछ ऐसी बनी कि पहले एक्टर, फिर डायरेक्टर बन गया।
फिल्म के बारे में बताएंगे?
रिलीज के पहले किसी फिल्म के बारे में बताना अच्छा नहीं होता। मैं फिल्म की रिलीज के बाद बात करना ज्यादा पसंद करता हूं। मेरा मानना है कि दर्शक पहले अनुभव हासिल करें। तारे जमीं पर एक बच्चे की कहानी है। उसे स्कूल में तकलीफ हो रही है। उसके पैरेंट्स उसे संभाल और समझ नहीं पा रहे हैं। उस बच्चे की जिंदगी में एक टीचर आता है, जो उसे खिलने का मौका देता है और इस तरह उस बच्चे की जिंदगी बदल जाती है। इस कहानी में हम एक मुद्दा यह उठा रहे हैं कि हर बच्चा स्पेशल होता है। स्पेशल शब्द के दो अर्थ हैं, एक तो यह कि हर बच्चे में खास क्वालिटी होती है और दूसरा यह कि जब हम कहते हैं कि यह स्पेशल बच्चा है, तो यहां स्पेशल का मतलब किसी तकलीफ से होता है। हालांकि उस तकलीफ को भी हम प्यार से दूर कर सकते हैं।
कहते हैं कि बच्चे जबरदस्त एक्टर होते हैं। उन्होंने कैसी चुनौती दी आपको?
बच्चे कमाल का काम करते हैं। ऐसा इसलिए कि उनके अंदर कोई कॉम्प्लेक्स नहीं होता। मेरी फिल्म में आठ-नौ साल के बच्चे हैं। वे इंस्ट्रक्शन भी समझ लेते थे। फिल्म के मुख्य बच्चों के अलावा, बाकी बच्चों ने भी कमाल का योगदान दिया है। मुख्य बच्चा ईशान है। उसका रोल दर्शील सफारी ने किया है। मेरी समझ से उसका यह काम इस साल का बेहतरीन काम माना जाएगा। सिर्फ बच्चों के बीच ही नहीं, वह इस साल बड़े एक्टर के लिए भी चुनौती बनेगा। इन बच्चों ने मुझे सेट पर चुनौती तो नहीं दी, क्योंकि मैं किसी से तुलना नहीं करता। हां, उनके अच्छे काम की वजह से मेरा काम भी और अच्छा हो गया।
तारे जमीं पर में आप टीचर राम शंकर निकुंभ की भूमिका निभा रहे हैं, जो कि देखने में टीचर नहीं लगता?
हां, यही खासियत है इस टीचर की। अमोल गुप्ते (फिल्म के लेखक) ने अपने किसी शिक्षक का नाम दिया है इस किरदार को। निकुंभ खुले दिल का टीचर है। वह बच्चों को पढ़ाने के लिए किसी भी नियम या पारंपरिक तरीके का पालन नहीं करता। उसका मानना यही है कि हर बच्चा अलग होता है, इसलिए हर बच्चे को अलग तरीके से पढ़ाना चाहिए। वह बेहद संवेदनशील है। दूसरे पर क्या बीत रही है, इसका अहसास उसे तुरंत हो जाता है। गौर करें, तो निकुंभ सर की हेयर स्टाइल, कपड़े, जूते भी आज की स्टाइल के हैं। यही कारण है कि वह बच्चों में पॉपुलर है।
इस फिल्म ने आपको किस रूप में बदला?
बच्चों को देखने और समझने का हमारा नजरिया बदल गया है। इस फिल्म को अभी तक जितने लोगों ने देखा है, सभी का कहना है कि इसने बच्चों को देखने का उनका नजरिया बदल दिया है।
क्या मान लें कि आपकी इस फिल्म से भी समाज में नई चेतना आएगी?
मुझे उम्मीद है। लोग मुझसे पूछते हैं कि तारे जमीं पर ऑफ बीट फिल्म है क्या? मेरा जवाब होता है कि मैं ऑफ बीट फिल्में ही करता हूं। दर्शक उन्हें पसंद करते हैं और वे मेनस्ट्रीम की फिल्में हो जाती हैं। अब दर्शकों को कुछ अलग चाहिए। कुछ ठोस चाहिए। उन्हें लगे कि हां यार, कोई बात कही। रंग दे बसंती की तरह ही तारे जमीं पर भी प्रेरक फिल्म होगी।

Wednesday, December 12, 2007

करीना कपूर को मिला लैपटॉप

चवन्नी पिछले दिनों गोवा में था.वहाँ रोहित शेट्टी की फिल्म गोलमाल रिटर्न्स की शूटिंग चल रही है.इस फिल्म में थोडे फेरबदल के साथ गोलमाल वाली ही तें है.शर्मन जोशी की जगह श्रेयश तलपडे आ गए हैं और अभिनेत्रियों में सेलिना जेटली,अमृता अरोरा और करीना कपूर आ गयी हैं.गोवा में एक रिसॉर्ट किराये पर लिया गया है और वहीं शूटिंग चल रही है.मुम्बई से मीडिया के चंद लोगों को वहाँ ऑन लोकेशन के लिए ले जाया गया था.होता क्या है कि जब फिल्म बन रही होती है तो पत्रकारों को शूटिंग दिखने और स्टारों से मिलवाने के लिए ले जाया जाता है.वहाँ से लौटकर सारे पत्रकार अपने-अपने हिसाब से लिखते हैं और फिल्म की जानकारी अपने पाठकों को देते हैं.चवन्नी भी गया था।

इस तरह की नियमित यात्राओं मेंकुछ रोचक जानकारियां मिल जाती हैं और फिल्म स्टारों की मेहनत और हिस्सेदारी भी करीब से देखने को मिलती है.पता चलता है कि स्टारों के साथ और कितने लोगों की मदद से एक फिल्म पूरी होती है,जबकि उनमें से अधिकांश गुमनाम ही रह जाते हैं.उनका काम मोर्चे पर तैनात सैनिकों की फुर्ती में होता है.वे सबसे पहले सेट पर आते हैं और आख़िरी में जाते हैं.अरे चवन्नी भी आपको क्या बताने लगा?

असल मजेदार वाकया तो कुछ और था.तय हुआ कि करीना कपूर अभी शॉट के बाद बात करेंगी.करीना आयीं.वह पहले से दुबली हो गयी हैं.स्क्रीन पर बहुत अच्छी दिखती हैं.ऐक्टर वास्तव में जितने दुबले या मोटे होते हैं ,उस से २०% ज्यादा स्क्रीन पर दिखते हैं.बहरहाल करीना आकर बैठीं और किसी ने पूछ दिया कि शूटिंग के बाद के समय में वह क्या करती हैं.करीना ने टपक से कहा कि सैफ अली खान ने उन्ही लैपटॉप गिफ्ट किया है और वह खली समय में उस पर हाथ आजमाती हैं.आजकल ई मेल वगैरह भी करती हैं.इसके बाद उन्होने योग,संबंध,पुरस्कार,सैफ,गोलमाल रिटर्न्स और कई दुसरे विषयों पर बातें कीं.लेकिन चवन्नी ने देखा कि मुम्बई के दो पोपुलर अख़बारों के रिपोर्टर थोडे बेचैन से हैं.दोनों बातचीत खत्म होते ही अपने-अपने फ़ोन पर लग गए.उन्होने फ़ोन पर खबर लिखवाई कि सैफ ने करीना को लैपटॉप गिफ्ट किया है.चवन्नी ने अगले दिन पढ़,सुना और देखा कि देश भर मिनिस खबर की चर्चा है.टीवी पर भी फ्लैश चल रहा था कि करीना इन दिनों लैपटॉप पर लगी रहती हैं.करीना की बाकी बातें तो मालूम नही कब उन अख़बारों में छपेंगी,लेकिन चवन्नी ने महसूस किया कि कैसे एक फालतू या सामान्य जानकारी से देश को चौंकाया जा सकता है।

चवन्नी का उद्देश्य ऐसा ही कुछ करने का कतई नही था.चवन्नी सिर्फ आप को बता रहा है कि फिल्म पत्रकारिता में आजकल क्या चल रहा है...

Monday, December 10, 2007

निखिल द्विवेदी:२००८ का पहला सितारा


चवन्नी अमृता राव से मिलने गया था.विवाह सफल हो गयी थी.अमृता की तारीफ हो रही थी और हिरोइन के तौर पर उनका दर्जा थोडा ऊँचा हो गया था.हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में हर फिल्म के साथ स्टारों का कद छोटा -बड़ा होता रहता है.बहरहाल बातचीत खतम होने पर अमृता ने चवन्नी से कहा कि आप मेरी फिल्म के हीरो से मिल लो.अरे हाँ,बताना भूल गया.अमृता राव माई नेम इज एन्थोनी गोंसाल्विस की शूटिंग कर रही थीं।
चवन्नी को तो नए लोगों से मिलना अच्छा लगता है.उसने टपक से हाँ कहा.एक शॉट चल रहा था.शॉट में एक नौजवान दौड़ता हुआ आता है और अमृता राव से कुछ कहता है.साधारण सा रनिंग शॉट था ,लेकिन उस नौजवान का उत्साह देखते ही बन रहा था.शॉट खत्म होने पर मुलाक़ात हुई और क्या यादगार मुलाक़ात रही कि चांद ही बातों में उसने चवन्नी को अपने मुरीद बना लिया.जी,चवन्नी निखिल द्विवेदी की बात कर रहा है।
निखिल की माई नेम इज एन्थोनी गोंसाल्विस २००७ में ही आनेवाली थी.किसी कारन से फिल्म में देरी हो गयी है,लेकिन अच्छा ही रहा .अब निखिल द्विवेदी २००८ का पहला सितारा होगा.निखिल की फिल्म ११ जनवरी २००८ को रिलीज हो रही है.निखिल इलाहबाद के हैं और उनकी आंखों में फिल्म स्टार बनने के सपने तैर रहे हैं.उनका आत्मविश्वास भरोसा देता है कि उनके सपने ज़रूर पूरे होंगे.इसे संयोग कहें कि उनकी पहली फिल्म बतौर हीरो ही आ रही है.फिल के निर्देशक इ निवास ने उन्हें दो फिल्में दिन.दोनों में ही छोटे रोल थे.निखिल ने मना कर दिया और यह कहते हुए मना किया कि मुझे तो स्टार बनना है।
निखिल को शाहरुख़ खान पसंद करते हैं.उनकी कम्पनी माई नेम इज एन्थोनी गोंसाल्विस का निर्माण कर रही है.पिछले दिनों वे इस फिल्म के म्यूजिक रिलीज में आये और अपना प्रेम जाहिर किया.चवन्नी को इस बात की ख़ुशी है कि लंबे समय के बाद हिन्दी प्रदेश से एक नौजवान स्टार बनने का सपना लेकर मुम्बई पहुँचा है और उसे पहली कामयाबी मिली है.

Sunday, December 9, 2007

सलाम! शबाना आजमी...दस कहानियाँ

-अजय ब्रह्मात्मज

एक साथ अनेक कहानियों की फिल्मों की यह विधा चल सकती है, लेकिन उसकी प्रस्तुति का नया तरीका खोजना होगा। एक के बाद एक चल रही कहानियां एक-दूसरे के प्रभाव को बाधित करती हैं। संभव है भविष्य के फिल्मकार कोई कारगर तरीका खोजें। दस कहानियां में सिर्फ तीन याद रहने काबिल हैं। बाकी सात कहानियां चालू किस्म का मनोरंजन देती हैं।
दस कहानियां के गुलदस्ते में पांच कहानियों के निर्देशक संजय गुप्ता हैं। ये हैं मैट्रीमोनी, गुब्बारे, स्ट्रेंजर्स इन द नाइट, जाहिर और राइज एंड फाल। इनमें केवल जाहिर अपने ट्विस्ट से चौंकाती है। फिल्म की सभी कहानियों में ट्विस्ट इन द टेल की शैली अपनायी गई है।
जाहिर में मनोज बाजपेयी और दीया मिर्जा सिर्फ दो ही किरदार हैं। यह कहानी बहुत खूबसूरती से कई स्तरों पर प्रभावित करती है। मेघना गुलजार की पूर्णमासी का ट्विस्ट झकझोर देता है। मां-बेटी की इस कहानी में बेटी की आत्महत्या सिहरा देती है। रोहित राय की राइस प्लेट को शबाना आजमी और नसीरुद्दीन शाह के सधे अभिनय ने प्रभावशाली बना दिया है। दक्षिण भारतीय बुजुर्ग महिला की भूमिका में शबाना की चाल-ढाल और संवाद अदायगी उल्लेखनीय है। सलाम! शबाना आजमी ़ ़ ़आप की संजीदगी बताती है कि रोल छोटा हो या बड़ा, कलाकार की भागीदारी पूरी होनी चाहिए। स्ट्रेंजर्स इन द नाइट का कथ्य अच्छा है, लेकिन कृत्रिम लगता है। शेष कहानियां चालू किस्म की हैं। यों लगता है कि किसी फिल्म के कुछ सिक्वेंस शूट कर लिए गए हों। हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों को फिल्मों की ऐसी प्रस्तुति को एक्सप्लोर करना चाहिए। हर कहानी के लिए दो घंटे की दरकार नहीं होती। इस विधा में निर्देशक रोचक फिल्में बना सकते हैं और दर्शकों को भी विविधता मिल सकती है।

Saturday, December 8, 2007

खोया खोया चांद


-अजय ब्रह्मात्मज


सुधीर मिश्र की फिल्म खोया खोया चांद सातवें दशक की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बैकड्राप पर बनी है। माहौल, लहजा और पहनावे से सुधीर मिश्र ने उस पीरियड को क्रिएट किया है। खास बात है कि फिल्म में पीरियड कहानी पर हावी नहीं होता। वह दर्शकों को धीरे से सातवें दशक में ले जाता है। खोया खोया चांद के मुख्य किरदार किसी मृत या जीवित व्यक्ति पर आधारित नहीं हैं, लेकिन उनमें हम गुजरे दौर के अनेक कलाकारों और फिल्मकारों को देख सकते हैं। नायक जफर अली नकवी (शाइनी आहूजा) में एक साथ गुरुदत्त, कमाल अमरोही और साहिर लुधियानवी की झलक है तो निखत (सोहा अली खान) में मीना कुमारी और मधुबाला के जीवन की घटनाएं मिलती हैं। फिल्म की कहानी व्यक्ति केंद्रित नहीं है। जफर और निखत के माध्यम से सुधीर मिश्र ने उस दौर के द्वंद्व और मनोभाव को चित्रित करने की कोशिश की है। प्रेम कुमार (रजत कपूर) और रतनमाला (सोनिया जहां) सातवें दशक की फिल्म इंडस्ट्री के प्रतिनिधि किरदार हैं। जफर और निखत की निजी जिंदगी और उनके रिश्तों की अंतर्कथाओं में फिल्म उलझ जाती है। सुधीर मिश्र एक साथ कई पहलुओं को छूने और सामने लाने के प्रयास में मुख्य कहानी से भटक जाते हैं। सुधीर मिश्र के शिल्प की यह खासियत है कि उनकी फिल्म के मुख्य किरदार नायक और नायिका की भूमिका में नहीं रहते, लेकिन वह खासियत खोया खोया चांद जैसी फिल्म की कमी बन गई है। खोया खोया चांद मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों की शैली में प्रस्तुत की गई है। ऐसे में सुधीर मिश्र का यथार्थवादी शिल्प आड़े आता है। फिल्म की कहानी सरल तरीके से संप्रेषित नहीं हो पाती। मुख्यधारा की फिल्मों में दर्शक किरदारों से सीधा संबंध चाहते हैं। उन्हें हर हाल में हीरो चाहिए। जफर हिंदी फिल्मों का पारंपरिक हीरो नहीं है। जफर की भूमिका में शाइनी आहूजा उपयुक्त नहीं लगते। शाइनी का नियंत्रित अभिनय जफर के व्यक्तित्व को उभार नहीं पाता। वे जफर के गुणों को पर्दे पर नहीं ला पाते। सोहा अली खान ने निखत को जीने की भरपूर कोशिश की है। संवाद अदायगी और उर्दू के उच्चारण में वह थोड़ा मार खा जाती हैं। आवाज में कशिश आ जाती तो निखत साकार हो जाती। रजत कपूर और सोनिया जहां ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है। सोनिया जहां तो अपनी मौजूदगी से चौंकाती हैं। खोया खोया चांद में निर्माता और स्टूडियो के मालिक खोसा की भूमिका में सौरभ शुक्ला और प्रेम कुमार के सेक्रेटरी एवं जफर के दोस्त श्यामल की भूमिका में विनय पाठक हर लिहाज से उल्लेखनीय हैं। फिल्म का गीत-संगीत अलग से सुनने में अधिक मधुर और अर्थपूर्ण है। फिल्म में टुकड़ों-टुकड़ों में हुए उपयोग से गीत का मूल असर छिन्न-भिन्न हो गया है।

Friday, December 7, 2007

शुक्रवार,७ दिसम्बर, २००७

आज दो फिल्में रिलीज हुई हैं.सुधीर मिश्र की खोया खोया चांद और संजय गुप्ता कि दस कहानियाँ.खोया खोया चांद खास फिल्म है,क्यों?

सबसे पहले तो इस फिल्म का निर्देशन सुधीर मिश्र ने किया है.सुधीर की फिल्में अलग और विशेष होती हैं.उन्होने इस फिल्म में सातवें दशक की हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री की झलक दी है.फिल्म देखते हुए आपको कभी गुरुदत्त तो कभी कमाल अमरोही तो कभी साहिर लुधियानवी की याद आ सकती है.आप मीना कुमारी और मधुबाला को भी सोहा अली खान में देख सकते हैं.यह फिल्म आप ज़रूर देखें।

दूसरी फिल्म नया प्रयोग है.एक फिल्म में दस कहानियाँ.अलग अलग १० कहानियो को एक साथ मनोरंजन का गुलदस्ता पेश किया है संजय गुप्ता ने.इस फिल्म में शाबान आज़मी,मनोज बज्पाई और नाना पाटेकर कि कहानियाँ देखने लायक हैं.

Thursday, December 6, 2007

अकेलेपन से मुक्त करती हैं फिल्में


-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्मों के प्रभाव, कार्य और दायित्व को लेकर बहसें हमेशा होती रही हैं। हर दौर में तात्कालिक और सामाजिक स्थितियों के अनुसार, फिल्मों के स्वरूप और प्रभाव को समझा और समझाया गया है। पिछले दिनों शाहरुख खान ने 38वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए दो बातों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हम सपने बेचते हैं। ऐसे सपने, जो पूरे होते हैं और कभी-कभी अधूरे ही रह जाते हैं। दूसरा, फिल्में अकेलेपन से मुक्ति देती हैं।
सपने बेचने की बात एक जमाने से कही जा रही है। शायद यही वजह है कि फिल्मकारों को सपनों का सौदागर भी कहा जाता है। सपने नींद में भले ही खलल डालते हों, लेकिन जिंदगी में सपने हमें एक उम्मीद से भर देते हैं। हम अपनी कठिनाइयों में भी उस उम्मीद की लौ को जलाए रहते हैं और कुछ पाने या कर गुजरने की संभावना में संघर्ष से नहीं सकुचाते। हिंदी की मुख्यधारा की फिल्मों में सपनों पर ज्यादा जोर दिया गया है। सपनों की यह अतिरंजना वास्तविकता से पलायन का मौका देती है। हिंदी फिल्मों को पलायनवादी कहा भी जाता है। आजादी के बाद से सपनों को बेचने का यह कारोबार चल रहा है। पहले ये सपने जिंदगी के करीब रहते थे, इसीलिए ऐसा लगता था कि आम दर्शक भी उन्हें हासिल कर सकता है। पहले की फिल्मों में सपनों का भावनात्मक आधार मजबूत रहता था, लेकिन इधर की फिल्मों में सपने भावनात्मक से अधिक भौतिक हो गए हैं। यह उपभोक्तावादी संस्कृति का दबाव है। हमारी फिल्मों के मुख्य पात्र इन दिनों भौतिक समृद्धि परोसते हैं और कहीं न कहीं दर्शकों को खरीदार में तब्दील कर देते हैं। अब यदि यह कहें कि बाजार समाज के सभी क्षेत्रों पर हावी है, तो ऐसी स्थिति में फिल्में भी बची नहीं रह सकतीं?
शाहरुख खान की दूसरी धारणा गौरतलब है -अकेलेपन से मुक्त करती हैं फिल्में। इस कथन के आशय के विस्तार में जाएं, तो हमें मानना ही होगा कि दर्शक अकेला हो चुका है और वह अकेलेपन की तकलीफ से मुक्ति के लिए ही फिल्में देखने जाता है। क्या वास्तव में ऐसा होता है? क्या हिंदी फिल्मों के दर्शक सचमुच अकेले हो गए हैं और उन्हें हिंदी फिल्मों से राहत मिलती है। अकेलापन वास्तव में पूंजीवादी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था का परिणाम है। भारत में कुछ महानगरों को छोड़ दें, तो भारतीय समाज में व्यक्ति अकेलापन महसूस ही नहीं करता। महानगरों में आजीविका की तलाश में सुदूर इलाकों से आए श्रमिक जरूर अकेलापन महसूस करते हैं। मनोरंजन के सस्ते माध्यम फिल्मों से उन्हें मुक्ति मिलती है। दिन भर की थकान के बाद फिल्में देखकर वे खुद को बहलाते हैं। यहां हमें इस पर भी गौर करना चाहिए कि महानगरों में तेजी से उभरे मल्टीप्लेक्स ने इन श्रमिक दर्शकों को सिनेमाघरों से बाहर कर दिया है। अब ये दर्शक वीडियो पार्लर या डीवीडी सिनेमाघरों में पुरानी फिल्में देखते हैं। थोड़े संपन्न हुए, तो उन्हें पाइरेटेड डीवीडी या वीसीडी लाकर समूह में फिल्में देखने का नया तरीका मिल गया है।
शाहरुख खान ने हिंदी फिल्मों के संदर्भ में उल्लेखनीय बातें कहीं। उनकी फिल्में उनके वक्तव्य पर खरी उतरती हैं। उनकी हालिया रिलीज ओम शांति ओम के लिए यही तर्क दिया जा रहा है कि वह मनोरंजन करती है। मनोरंजन जरूरी है। वर्तमान के तनावपूर्ण समय में फिल्में दर्शकों को टेंशन फ्री करने का बड़ा काम कर रही हैं। शाहरुख खान फिल्मों के इस दायित्व को अच्छी तरह समझते हैं। यही कारण है कि वे फिल्मों की सार्थकता और सामाजिकता से अधिक महत्व उसके मनोरंजन पर देते हैं। हालांकि, उन्होंने अशोका, पहेली और फिर भी दिल है हिंदुस्तानी जैसे सचेत और गंभीर फिल्मों का निर्माण भी किया, लेकिन उनकी असफलता और मैं हूं ना और ओम शांति ओम जैसी फिल्मों की सफलता ने उन्हें फिल्मों में मनोरंजन का प्रवक्ता बना दिया है। सफलता हमारी सोच बदलती है और शाहरुख खान की भी..

Wednesday, December 5, 2007

हिट और फ्लॉप का समीकरण-२

कल के पोस्ट को काफी लोगों ने padhaa .कुछ ने चवन्नी को फ़ोन भी किया.लेकिन चवन्नी का अनुभव है कि कुछ भावुक या अतीत के बखान में कुछ लिखो तो लोग टिप्पण्णियाँ करते हैं.आज की बात करो तो लोग पढ़ कर किनारा कर जाते हैं.उन्हें शायद लगता हो कि यह तो हम भी जानते हैं.चवन्नी कोई शिक़ायत नही कर रहा.ब्लॉग की दुनिया में भी रहीम का कथन उपयुक्त है...रहिमन निज मन की व्यथा मन ही रखो गोय ,सुनी इठलैंहै लोग सब बांटि न लैंहै कोय ।

बहरहाल,बात आगे शुरू करें .चवन्नी के मित्र ने ब्रिटेन से सूचित किया कि लंदन और न्यूयॉर्क के टिकेट राते सही नही हैं.सही देना मकसद नही था.चवन्नी का सारा ध्यान इस तथ्य को सामने लाने में था कि इन दिनों फिल्मों के व्यापारी (निर्माता,निर्देशक और एक्टर) यह नही देखते कि उनकी फिल्म को कितने दर्शकों ने देखा.उनके लिए वह रकम खास होती है जो दर्शक देते हैं.महानगरों,विदेशी शहरों और मल्टीप्लेक्स से प्रति दर्शक ज्यादा पैसे आते हैं,इसलिए फिल्म के विषय और परिवेश पर उन दर्शकों की रूचि का प्रभाव दिखता है।

यह अचानक नही हुआ है कि हिन्दी फिल्मों में सिर्फ संवाद हिन्दी में होते हैं,बाकी सब में सावधानी बरती जाती है कि हिन्दी जैसा न दिखे.चवन्नी यहं हिन्दी का प्रयोग स्थान और जाति (nationality) के संदर्भ में कर रहा है.हिन्दी को डाउन मार्केट समझा जाता है.हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में आप किसी को नमस्ते कह दें तो वह चौंक जाता है.हेलो का चलन है और गाल पर चुम्बन चिपकाना फैशन हो गया है। निर्देशक लंदन में बैठ कर फिल्म लिखते हैं और उसकी शूटिंग अमेरिका में करते हैं.आजकल तो संवाद भी अंग्रेजी में बोले जाने लगे हैं।

अगर कोई फिल्म मुम्बई,लंदन और न्यूयॉर्क में चली हो तभी उसे हिट मन जाता है.पटना,लखनऊ ,भोपाल और जयपुर में चलने से फिल्में हिट नही होतीं.सीधी सी वजह है कि इन शहरों से आया रिटर्न मुम्बई,लंदन और न्यूयॉर्क कि कमाई का पासंग भी नहीं होता.विवाह उत्तर भारत में चली और खूब चली,लेकिन उसे फ्लॉप कहा जा रहा है.इसके विपरीत लगे रहो मुन्नाभाई नही चली,तो भी वह हिट है.हिन्दी बेल्ट में कोई फिल्म हिट हो तो भी हिट नही मानी जाती,जबकि मुम्बई में औसत रही फिल्म भी हिट मान ली जाती है।

तात्पर्य यह कि मुम्बई का हिट ही हिट है,बाकी सब जगह कि हिट सिर्फ फ्लॉप है.

Tuesday, December 4, 2007

हिट और फ्लॉप का समीकरण

चवन्नी कुछ ऐसी बातें बताना चाहता है ,जिसके बारे में आप सभी जानना चाहते होंगे.अब जैसे हिट और फ्लॉप की ही बात करें.कई बार आपको ताज्जुब होता होगा कि अरे यार यह फिल्म तो कोई खास नही चली थी,फिर हिट कैसे हो गयी.इसी तरह कई बार आप खुद से ही पूछते होंगे कि फलां फिल्म तो हमारे इलाक़े में खूब चली ,लेकिन फ्लॉप कैसे हो गयी.तो हिट और फ्लॉप का पूरा लम्बा-चौड़ा खेल है.इस खेल में फिल्म स्टार,निर्माता-निर्देशक,वितरक,प्रदर्शक और चवन्नी छाप दर्शक भी शामिल रहते हैं.यह घलात्फह्मी दिल-ओ-दिमाग से निकल दीजिए कि केवल दर्शक ही किसी फिल्म के भाग्य का फैसला करते हैं.अरे हाँ,मीडिया का भी रोल होता है.आजकल एक पोपुलर हीरो और प्रोड्यूसर मीडिया के लोगों को धन्यवाद पत्र के साथ उपहार भी भिजवा रहे हैं,क्योंकि मीडिया बिरादरी उनके प्रति उदार रही है.यहाँ स्पष्ट हो लें कि फिल्म बिरादरी के लिए मीडिया का मतलब इंग्लिश प्रेस और एल्क्ट्रोनिक मीडिया होता है.इसमें हिन्दी या अन्य भाषायी प्रेस शामिल नही हैं।

हिट और फ्लॉप

हिट और फ्लॉप फिल्मों के बारे में सोचते और सुनते ही हमें लगता है कि किसी फिल्म को ज्यादा से ज्यादा दर्शकों ने देखा होगा तभी वह हिट हुई होगी या नही देखा होगा तो फ्लॉप हो गयी होगी.यह आंशिक सत्य है.दर्शकों की संख्या फिल्म के हिट और फ्लॉप के लिए मणि रखती है,लेकिन एक लेवल के बाद इस गिनती का कोई अर्थ नही रह जाता.हिट और फ्लॉप में पुतलियों की नही पैसों कि गिनती होती है.किस फिल्म से कितने पैसों की कमी हुई.असल फैसला यहाँ से होता है.आपके मन में सवाल कुलबुला रहा है कि जिस फिल्म को जयादा दर्शक देखेंगे वही तो हिट होगी.ऊपरी तौर पर आपका तर्क सही है,लेकिन सिनेमा के बिजनेश में यह तर्क काम नही करता.कैसे?

पैसे और पुतलियाँ

हिन्दी सिनेमा के हिट और फ्लॉप में उत्तर भारत के ग़रीब दर्शकों की नियामक भूमिका नही रह गयी है.पहेलियाँ न बुझाते हुए चवन्नी सीधे तथ्यों पर आता है। ओम शांति ओम की बात करें.यह फिल्म एक साथ पूरी दुनिया में रिलीज हुई.न्यूयॉर्क से लेकर नवादा और लंदन से लेकर लखनऊ तक के सिनेमाघरों में लगी.देश के महानगरों के मल्टीप्लेक्स में भी लगी.अब पहले शो से गिनती शुरू होती है.गिनती दर्शकों की नही पासों की होती है.न्यूयॉर्क,लंदन,मुम्बई,दिल्ली ,नवादा,जौनपुर,बसंतपुर...इन सभी शहरों के सिनेमाघरों के टिकेट अलग-अलग कीमत के होते हैं.न्यूयॉर्क में 15 डॉलर,लंदन में 7 पौंड ,मुम्बई में ३५० रुपये ,दिल्ली में ३०० रुपये,नवादा,जौनपुर और बसंतपुर में १५ से २५ रुपये...लगभग इन कीमतों में टिकेट खरीद कर विभीन्न शहरों के दर्शक सिनेमा देखते हैं.अब अगर न्यूयॉर्क १०० दर्शक फिल्म देखेंगे तो १५०० डॉलर मिलेंगे,मुम्बई के १०० दर्शक ३५,००० रुपये दे जायेंगे,लेकिन नवादा,जौनपुर और बसंतपुर के सिनेमाघरों से ३५,००० जमा करने में कितने दर्शकों की ज़रूरत पड़ेगी.इन छोटे शहरों के १०० दर्शक केवल २५०० रुपये ही दे पायेंगे.चवन्नी यहाँ न्यूयॉर्क और लंदन की कमाई को रुपयों में नही बदल रहा है। सामान्य तौर पर छोटे शहरों के १५०० से २००० दर्शक किसी फिल्म को देखेंगे तभी ३५,००० की कमाई हो पायेगी।

अब चूंकि हिट और फ्लॉप के लिए कमाई ही महत्वपूर्ण है,इसलिए शहरों के दर्शकों का छोटा हिस्सा भी फिल्म को हिट कर देता है,जबकि देश के छोटे शहरों और कस्बों के अधिकांश दर्शकों की पसंद निर्माताओं के पल्ले ही नही पड़ती ।

बाकी बातें अगली बार.क्या यह जानकारी रोचक लगी.आपकी टिप्पणियां और राय ही चवन्नी का मार्गदर्शन करती हैं.

Monday, December 3, 2007

फिल्मों का लोकतंत्र

अक्षय कुमार
आमिर खान
रितिक रोशन
सलमान खान
शाहरुख़ खान

फिल्मों के इन पॉपुलर अभिनेताओं के नाम चवन्नी ने अकारादि क्रम में लिखे हैं.चवन्नी दवा नही कर सकता कि इनमे से कौन आगे है और कौन पीछे?पिछले दिनों एक ट्रेड विशेषज्ञ ने एक अंग्रेजी अखबार के सन्डे सप्लीमेंट में लम्बा सा लेख लिखा और बताया कि ये पांच स्टार ही हैं,जो हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री चला रहे हैं.आप पूरा लेख पढ़ जाये और अगर आप पंक्तियों के बीच पढना जानते हों या लेख का निहितार्थ समझने में माहिर हों तो आसानी से अनुमान लगा लेंगे कि पूरा लेख यह बताने के लिए लिखा गया है कि देश के सबसे बडे स्टार शाहरुख़ खान हैं और उनके बाद चार और नाम लिए जा सकते हैं.चवन्नी तफसील में जाकर नही बताना चाहता कि यह लेख क्यों लिखा गया है और इस लेख से क्या साबित किया जा रहा है?

एक आम धरने है राजनीति में जो ज्यादा वोट ले आये,वो सबसे बड़ा नेता और फिल्मों में जो सबसे ज्यादा दर्शक ले आये,वो सबसे बड़ा अभिनेता.लोकतंत्र तो यही कहता है.फिल्मों के लिओक्तंत्र में सबसे जयादा दर्शक बटोरने वाले अभिनेता को ही सुपरस्टार और बादशाह और शहंशाह आदि आदि कहा जाता है.हम सभी जानते हैं कि पिछले सालों में सिनेमा किसी उत्पाद की तरह ही खरीदा और बेचा जा रहा है.फिल्मों के बाज़ार में उस स्टार की ज्यादा कीमत लगती है,जो ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को सिनेमाघरों में लाने की उम्मीद जगाता है.इस लिहाज से उसके बिकाऊ होने का महत्व है.फिर हमें यह भूल जान चाहिए कि वह अभिनेता भी बेहतर होगा.बिकाऊ स्टार बेस्ट सेलर की तरह होते हैं,जिन्हें पढा और फेंका.इन्हें कोई अपने घरों में सेल्फ पर नही रखता।

पिछले दिनों ओम शांति ओम को शाहरुख़ खान ने किसी साबुन की तरह बेचा और वैसे ही दर्शकों को सिनेमाघरों में ले आये जैसे कोई विज्ञापन कम्पनी हमें किसी साबुन का ग्राहक बना देती है.उन्हें इस तथ्य से ज्यादा मतलब नही है कि कोई दोबारा इस्तेमाल कर रहा है या नही?बस एक बार की खरीद या एक बार के देखने से ही उनकी कमाई सुनिश्चित हो जाती है.चवन्नी को ओम शांति ओम का छिछला मनोरंजन कतई पसंद नही आया.क्या अपने देश में मनोरंजन मजाक है?यह फिल्म जाहिर तौर पर बताती है कि फराह खान और शाहरुख़ खान अपने प्रोफेशन को लेकर कितने गंभीर हैं.चवन्नी को आश्चर्य होता है कि फिल्म इंडस्ट्री के कई नामी-गिरामी अभिनेता-अभनेत्री खुद का मजाक करने से भी नही हिचकते.और यह मजाक नही है,चवन्नी शबाना आजमी के विचारों को गंभीरता से लेता है।चवन्नी को बेहद तकलीफ हुई है।

बात चल रही थी लोकप्रिय स्टारों की .चवन्नी आप से जानना चाहेगा कि आप किन स्टारों को लोकप्रिय मानते हैं?

Sunday, December 2, 2007

बच ले,बच ले,यशराज तू बच ले

यही होना था.उत्तर प्रदेश में मायावती की भृकुटी तनी और इधर यशराज कैंप में हड़कंप मच गया.मायावती को आपत्ति थी कि फिल्म के शीर्षक गीत में मोची भी बोले वह सोनार है पंक्ति उपयोग हुआ जातिसूचक शब्द खेदजनक है.इस शब्द से एक जाति विशेष का अपमान हुआ है.अब यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि गीतकार पीयूष मिश्र ने यहाँ किस संदर्भ में इस शब्द का प्रयोग किया है.तिल का ताड़ बना देने वालों से बहस नही की जा सकती और जब मामला सवेंदनशील हो तो बिल्कुल ही बात नही की जा सकती।

हिन्दी साहित्य और लोकगीतों में खुल कर जाती सूचक शब्दों का इस्तेमाल हुआ है.क्या हम सारे साहित्य से चुन-चुन कर ऐसे शब्दों को निकालेंगे?और अगर निकाल दिए तो क्या साहित्य का वही मर्म रह जाएगा?ताज्जुब है कि देश के बुद्धिजीवी इस मामले में खामोश हैं.कोई कुछ भी नही बोल रहा है.मायावती का विरोध करने के बजाए एक-दो स्वर उनके समर्थन में ही सुनाई पड़े कि आप जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर किसी की भावना को ठेस नहीं पहुँचा सकते।

यशराज ने अपना पक्ष रखने के बजाए माफ़ी माँग लेने में भलाई समझी.पहले फिल्मकार बहस करते थे,अपना पक्ष रखते थे और कोर्ट तक जाते थे.उन्हें अपने काम और सोच पर इतना विश्वास होता था कि लड़ जाते थे.इस बार खुद यश चोपड़ा और पीयूष मिश्र ने आगे बढ़ कर माफ़ी माँग ली.उनहोंने कहा कि अगर अनजाने में हमने किसी की भावना को ठेस पहुंचाई है तो हमें माफ कर दें.यह जमाना भिड़ने का नहीं है.यशराज को तो माफी मांगनी ही था.उनके लिए करोड़ों का कारोबार है.एक पंक्ति के कुछ शब्दों के लिए करोड़ों का नुकसान नहीं उठाया जा सकता.यज्ञराज ने विवाद से बचने का उपक्रम किया.

Saturday, December 1, 2007

आजा नचले: पूरी तरह फिट बैठी माधुरी


-अजय ब्रह्मात्मज
आजा नचले की सबसे बड़ी खासियत सहयोगी कलाकारों का सही चुनाव है। धन्यवाद, अक्षय खन्ना, इरफान, रघुवीर यादव, रणवीर शौरी, कुणाल कपूर, कोंकणा सेन, दिव्या दत्ता, विनय पाठक और यशपाल शर्मा का ़ ़ ़ इन सभी ने मिलकर नायिका दीया (माधुरी दीक्षित) को जबर्दस्त सपोर्ट दिया है। माधुरी दीक्षित के तो क्या कहने? इस उम्र में भी नृत्य की ऐसी ऊर्जा? नई हीरोइनें सबक ले सकती हैं कि दर्शकों के दिल-ओ-दिमाग पर छाने के लिए कैसी लगन और कितनी मेहनत चाहिए। अनिल मेहता की आजा नचले की थीम चक दे इंडिया से मिलती जुलती है। वहां माहौल खेल का था, यहां माहौल नृत्य और संगीत का है। फिल्म उतनी ही असरदार है।
सबके जेहन में सवाल था कि पांच साल की वापसी के बाद माधुरी दीक्षित पर्दे पर अपना जादू चला पाएंगी या नही? आदित्य चोपड़ा और जयदीप साहनी ने उन्हें ऐसी स्क्रिप्ट दी है कि माधुरी फिल्म में पूरी तरह फिट बैठती हैं। 35 पार कर चुके दर्शक अपनी धक धक गर्ल पर फिर से सम्मोहित हो सकते हैं। नई उम्र के दर्शक देख सकते हैं कि नृत्य केवल स्टेप्स या ऐरोबिक नहीं होता, उसमें भाव होता है, भंगिमा भी होती है। माधुरी सिद्ध करती हैं कि नृत्य अभिनय का ही एक हिस्सा है।
एक छोटे शहर शामली की दीया अपने गुरु मकरंद के सान्निध्य में नृत्य और अभिनय की दीवानी हो चुकी है। उस पर पाबंदी लगाई जाती है तो वह एक विदेशी स्टीव के साथ भागकर अमेरिका चली जाती है। वहां वह नृत्य का स्कूल चलाती है। उसे खबर मिलती है कि उसके गुरु मरणासन्न हैं। वह तुरंत लौटती है, लेकिन तब तक गुरु दिवंगत हो जाते हैं। गुरु का स्थापित किया हुआ अजंता थिएटर ध्वस्त हो चुका है। उसे तोड़कर शापिंग माल बनाने की बात चल रही है। थिएटर संचालक (रघुवीर यादव) की मदद से दीया अपने गुरु की विरासत में जान फूंकने का प्रण करती है। तमाम विरोध के बावजूद कामयाब होती है। बतौर दर्शक हमें ऐसी कामयाबी प्रेरित करती है ़ ़ ़ अच्छी लगती है।
लेखक और निर्देशक ने छोटे शहर को उसके चरित्र के साथ उभारा है। अजंता थिएटर की रक्षा के बहाने फिल्म छोटे शहर की अन्य स्थितियों को भी छूती है। परोक्ष रूप से अनेक संदेश भी दे जाती है। फिल्म में कुछ भी प्रवचन की मुद्रा में नहीं है। दीया की लड़ाई वास्तव में संस्कृति और बाजार के द्वंद्व के रूप में सामने आती है। आजा नचले में सहयोगी चरित्र निभा रहे कलाकारों की कोई भी तारीफ कम होगी। यह फिल्म स्टार और बड़े कलाकार की अवधारणा को तोड़ती है। सारे कलाकार अपने किरदार में ढल गए हैं और आजा नचले को वास्तविक बना देते हैं। आखिरकार, माधुरी दीक्षित सारी अपेक्षाएं पूरी करती हैं। फिल्म की नयनाभिराम फोटोग्राफी दर्शकों को कथ्य से जोड़ती है। निर्देशक अनिल मेहता अपनी खूबियों के साथ उपस्थित हैं। अगर निर्देशक कैमरामैन रहा हो तो कथ्य और कैमरे की संगति अच्छी होती है।
फिल्म में एक ही बात खटकती है। अमेरिकी स्टीव से दीया की शादी को कामयाब भी बताया जा सकता था। क्या दीया का दांपत्य जीवन सफल होता तो कहानी में कोई फर्क पड़ता?
मुख्य कलाकार : माधुरी दीक्षित,कुणाल कपूर,कोंकणा सेन शर्मा,रणवीर शौरी,रघुबीर यादव,दर्शन जरीवाला
निर्देशक : अनिल मेहता
तकनीकी टीम : निर्माता-आदित्य चोपड़ा,लेखक-जयदीप साहनी,संगीतकार-सलीम सुलेमान,कोरियोग्राफर-वैभवी मर्चेट,